Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 5 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

बीआरओ.... थैंक यू सो सो मच फॉर सुच ा वंडरफुल सेलिब्रेशन...

आप का प्यार और सपोर्ट hi असल मोटिवेशन हे मेरे लिए.... आप जैसे प्यारे और महानए दोस्त मेरे लिए सब कुछ हैं... प्यारे भाई... जब एक बार अपडेट लिख लेता हु तो उस अपडेट के हिसाब से पिक्स / गिफ्स नहे मिलती जो के कहानी को एफ्फेक्टिवेली सपोर्ट कर सके... फिर भी में कोशिह करूँ गए के आप को मज़ीद राज़ी कर सकूँ... बिलकुल सखी हे बीआरओ... में ने एक पोस्ट रिज़र्व की हुई हे फर्स्ट पेज पर वह जल्द कुछ शार्ट इंट्रोडक्श्न या समरी लिखूं गए...

यूँही साथ बनाये रखिये और में आप के मनोरंजन के लिए लिखता रहूं गए...

:थैंक्स:
 
EPISODE – 34

प्लाट पर काम अब बंद हो चुक्का था और फिर से सुबह 8 बजे स्टार्ट होना था… वर्कर्स ने अपने लिए टेंट वग़ैरा लगा लिए थे… मगर बापू और प्रकाश को वह रहने में तकलीफ होती तो इस लिए… गोविन्द ने प्रकाश और बापू को साथ में लिया और लाला जी के घर ले आया…

लाला जी और उन की पत्नी सब को देख कर बोहत खुश हुए… और ये तय पाया के जब तक कंस्ट्रक्शन कम्पलीट नहे होती प्लाट पर घर की तब तक… कैलाश और प्रकाश को सुबह 7 बजे कार चोर के ए गई प्लाट पर और 6 बजे कार वापिस ले कर ए गई लाला जी के बंगला पर और उन दोनों को ठहरने का बंदोबस्त एनेक्सी में कर दिया गया था…

कैलाश और प्रकाश एनेक्सी चले गए फ्रेश होने के लिए…

गोविन्द बेथ गया लाला जी के साथ और लाला जी उस को सरे दिन की करवाई बताने लगे… गोविन्द सब जनता था और काफी काम उस की दिमाग़ी मौजूदगी में हुए थे मगर वो लाला जी को इम्पोर्टेंस देते हुए उन की बातें सुन ने लगा…

गोविन्द… “पापा… आज आप ने आज बरी हिम्मत की हे… अगर आप इतनी हिम्मत न करते तो ये सब इतने अचे से स्टार्ट न होता…”

लाला जी… “नहे बीटा… असल काम तुम ने किया वो राह दिकहि और मेरे साथ खरे हुए… मुझे भी बीटा मिला… में बोहत खुश हूँ…”

गोविन्द… “माँ… सीमा कहाँ हे में उस से मिल लून तो गाँव के लिए निकलूं गए क्यों के वहां माँ और ेषणा अकेले होंगे… कल संडे हे तो फिर में मंडे को सुबह आऊं गए… क्लास भी अटेंड करनी हे कॉलेज जाना हे…”

गंगा देवी… “बीटा… वो अपने कमरे में हे… जाओ वही मिल लो… स्टडी कर रही हे…”

गंगा देवी… “बीटा… रजनी बहन और ेषणा को भी यहीं ले आओ… उन को अकेले गाँव न चोरो… जब तक प्लाट पर घर नहे बन जाता वो रुक सकती हे यहाँ पर… एनेक्सी में 3 कमरे हैं… उन को कोई तकलीफ नहे होगी.. और हमें भी ख़ुशी होगी… तुम्हरी माँ और बहन हे… तुम से ज़ुरा हुआ हर रिश्ता हमें प्यारा हे…”

गोविन्द, माँ की बाटे सुन कर बोहत भावक हो गया और गनगा देवी के गले लग गया… माँ ने भी बारे प्यार से उस को अपने सीने से लगा लिया…

गोविन्द… “माँ आप बोहत अछि हो… जाने में ने क्या पुण्य किया हे जो मुझे दो माँ और दो बाप मिले हे और सीमा बहन के रूप में… सब मुझ से बोहत प्यार करते … में शायद इस दुनिया का सब से ज़यादा खुशकिस्मत इंसान हु…”

गंगा देवी… बारे प्यार और ममता से गोविन्द को अपने सीने से lagaye…us का सर सहलाने लगीं… “बीटा… तुम्हारी शकल में मुझे भी बीटा मिला हे …. और सीमा को भाई… सीमा भी हर वक़्त तुम्हारी बातें और तुम्हे यद् करती हे… मेरा गोविन्द भाई ऐसे करता हे… मेरा गोविन्द भाई वैसा कहता हे… बस तुम्हारा ज़िक्र हे हर वक़्त उस की ज़बान पर… और तुम जिस तरह अपने पापा का सहारा बने हो जैसा की में ने अपनी कोख से तुम्हे जन्मा हो…” और ख़ुशी से रोने लगी…

लाला जी… की आँखें भी नुम हो गयीं… वो भी बोहत भावक हो रहे थे… “बस गंगा न खुद रो न अपने बेटे को रुलाओ… ये ख़ुशी के पल हे इन को खुश रह कर गुज़ारो… जाओ बीटा तुम जा कर सीमा से मिल लो… दो बार तुम्हारा पूछ चुकी हे… भाई कब ाएँ गए… भ कब ाएँ गए…. की… रत लगाई हुई थी उस ने…”

गोविन्द ने अपने आप को शांत किया और पापा और माँ के साथ hi बेथ गया और सीमा के कमरे की तरफ जाने से पहले ये चेक किया के विक्रम गाँव गया या नहे… तो पता चला के उस को देर हो जये गई क्यों के नेक्स्ट डे वीकेंड हे तो आज काम निपटा कर निकले गए….

गोविन्द ने फ़ौरन लैंडलाइन फ़ोन से कॉल मिले विक्रम के शोरूम पर और उस से बात कर के कहा के वो उस का वेट कर रहा हे और दोनों साथ चले गए गाँव… विक्रम खुश हो गया…

गोविन्द ने सीमा के कमरे का दरवाज़े पर नॉक किया…

सीमा… “आ जाएँ दरवाज़ा खुला हे…”

गोविन्द अंदर दाखिल हुआ तो सीमा स्टडी टेबल पर बैठी पढ़ रही थी… एक स्लीवलेस t-shirt और नीचे पायजामा था… बालों को बंधा हुआ था पोनी टेल की तरह… आँखों पर ऐनक… सीमा की नज़र ज़यादा कमज़ोर नहे थी बस वो इस लिए ऐनक पहनती थी के मज़ीद न वीक हो जये… और उस के सामने बुक्स खुली पारी थीं…

गोविन्द को देखते hi सीमा उछाल कर उठी और डरते हुए उस के गले लग गयी…

सीमा… “गोविन्द भाई… इतनी देर से आये हो… कहाँ थे सारा दिन… रत को भी गाँव चले गए थे…” उस की आवाज़ रोने जैसी हो रही थी…

गोविन्द भी परेशां हो गया आज पहली बार सीमा ने उस के नाम के साथ भाई लगाया था और इतना इमोशनल रिएक्शन… वो कुछ देर के लिए तो समझ hi न सका के ये क्या हे…

फिर उस ने अपने आप को स्मभाला और अपने गले से लगी सीमा के सर को प्यार से सहलाने लगा…

गोविन्द… “मेरी प्यारी बहन… मेने भी तुम्हे बोहत मिस किया… मेरी जान क्या करें… काम भी करने हे ना…”

सीमा… “में कुछ नहे जानती आप ने आज नहे जाना कहीं…”

गोविन्द… “मेरी जान से प्यारी बहन… में हर वक़्त तुम्हारे साथ हूँ… वह गाँव में माँ और ेषणा अकेले हे…”

सीमा… “तो फिर या मुझे अपने साथ ले चलो, वैसे भी कल संडे हे… या माँ और ेषणा को यहाँ ले आओ…”

गोविन्द… “मेरी प्यारी गुड़िया… कल मुझे आस पास के कुछ गाँव जाना हे बीऑपर की बात करने… और दुसरे तुम्हारी स्टडी भी डिस्टर्ब नहे होना चाहिए…”

गोविन्द ने जज़्बात में सीमा को और करीब कर लिया… अपनी बांहों का घेरा उस के गिर्द और सख्त कर ली…

सीमा… “भाई… आप का जिस्म कितना मज़बूत हे और ग्रिफ्ट कितनी कामुक हे… बोहत सकूं मिलता हे आप की बांहो में…”

गोविन्द के मुंह से बेइख्तियार निकल गया… “सीमा… तुम बोहत नाज़ुक हो और तुम्हारा बदन बोहत नरम हे… तुम्हे गले लगा कर बोहत ाचा लगता हे… दिल करता हे यूँही बांहो में लिए खरा राहु…”

सीमा… का दिल धरकने लगा तेज़ी से और ाचा लगने लगा… उस ने एक किश कर दी गोविन्द के गाल पे और अपना सर रख दिया उस के कंधे पर… और उस का लहजा कुछ धीमा सा हो गया अपने ap…“na जाया करो न यूँ चोर कर…”

गोविन्द का लुंड न चाहते हुए भी सख्त होने लगा…

सीमा को अहसास काफी देर से हुआ के कुछ सख्त चीज़ लग रहे हे उस की रनो से… उस ने अपनी तंग कुछ आगे कर दी और वो चीज़ अब उस की तंग के अंदरूनी हिस्से पर रैगर खाने लगी…

चुके गोविन्द की छाती में धंसने लगे… गोविन्द को सीमा की धरकने सुनाई दे रही थी…

दोनों बोहत कुछ समझते हुए भी नासमझ बने हुए थे… यूँही एक दुसरे के बदन की गर्मी लेते रहे… दोनों पिघल रहे थे… बहार से माँ की आवाज़ aayee…”Govind, सीमाने… आओ बचो कहना लग गया हे… डाइनिंग टेबल पर आ जाओ…”

गोविन्द ने आहिस्ता से सीमा को खुद से दूर किया… और वहीं बेथ गया काउच पर… थोड़ी देर के लिए ताकि लुंड बेथ जये…

सीमा फ़ौरन चली गयी वाशरूम में और वाशरूम में जा कर सोचने लगी…

सीमा की soch…“ye हम दोनों को क्या हो जाता हे… अब जब के में गोविन्द को भाई मन ने लगी हु फिर भी वो एक मर्द के रूप में क्यों ाचा लगता हे… कोई नहे हम ने सिर्फ एक दुसरे को फील किया… इस में क्या प्रॉब्लम हे…”

और फिर जल्दी से मुंह धोया और एक शार्ट शर्ट निकल कर पहनने लगी…

गोविन्द… “ये मुझे क्या हो जाता हे… मेरा लुंड क्यों खरा हो जाता हे… मुझे अपने आप पर कण्ट्रोल रखना चाहिए… सीमा को में अपनी बहन मंटा हु और उस के साथ ऐसा नहे करना चाहिए… अगर सीमा मेरी बहन हे तो फिर ेषणा के साथ क्यों करता हूँ… उस के साथ भी तो में सिर्फ टच और फील करता हु तो इस लिए सीमा के साथ भी कर लिए तो कोई बरी बात नहे… नहे मुझे दोनों के साथ नहे करना चाहिए…”

गोविन्द का दिमाग़ चकराने लगा अपनी ज़मीर की अदालत में सवाल जवाब करते हुए … हाँ उस को ये फ़ायदा ज़रूर हुआ के उस का लुंड अब बेथ चुक्का था…

सीमा वाशरूम से बहार आयी तो दोनों मिल कर डाइनिंग रूम की तरफ आ गए…
 
EPISODE – 35

गोविन्द और सीमा साथ डाइनिंग रूम में पोहंचे… वह पर पापा, माँ, बापू और प्रकाश बैठे थे… गोविन्द ने सीमा और बापू और प्रकाश का इंट्रोडक्शन करवाया… सब बोहत खुश थे परिवार के बढ़ने पर… सब ने हँसते बाटे कर्त डिनर किया…

फिर लाउन्ज में आ गए… चाय पीते हुए लाला जी ने बोहत तारीफ की गोविन्द की… काम को आगे बढ़ाने के हवाले से… और फिर सब ने मिल कर रिपेयर और कंस्ट्रक्शन के काम को डिसकस किया… और बीऑपर को आगे किस तरह बढ़ाना हे किस तरह मैनेज करना हे उस पे बात करने लगे…

गोविन्द… “दौलत पुर के आस पास 15 गाँव हैं जहाँ से अनाज आता हे शहर की मंडी में… इन 15 गाँव में से 6 से 7 बारे गाँव हे और बाक़ी छोटे गाँव… हमें फिलहाल बारे गाँव से 5 या 7 से डायरेक्ट ज़मींदारो से बात करनी हे के वो डायरेक्ट अनाज हमें दे दें और मंडी में न लाएं… उन का ट्रांसपोर्ट का खर्चा और मंडी का कमीशन बचे गए और साथ साथ हम उन को पिछले साल के रेट का 5 टक्का बढ़ा कर दें गए… ये म्हणत प्रकाश भैया खुद करे गए… हर ज़मींदार के पास जाना और वह उन से सौदा तये कर के ट्रक पे वह की लबोर से लोडिंग करवा के प्लाट वाले नए गोदाम में स्टोर कर न हे… इस तरह हम ने ये सारा काम 1 महीने के अंदर करना हे क्यों के 1 महीने के बाद मंडी में सौदे के लिए बोली लगनी हे… और हमारे पास ज़यादा क्वांटिटी में अनाज आना चिहिए… अनाज के साथ हमें उन गाँव से स्पिकेस (मसाले) भी उठाने हैं लेकिन उन के लिए प्रकाश भैया को अलग से ट्रिप लगाने हों गए… में अपने गाँव में सिमर सिंह से बात कर ली हे उस ने एग्री किया हे और वो और ज़मींदारों से दुसरे गाँव में भी बात कर रहा हे हमारे लिए… उस को इस काम का हम अलग से 2 टक्का दे गए हर सौदे पर…”

गोविन्द… “बापू आप ने मवेशी और बर्ड्स ीखते करने हे और इस हवाले से जो आप की पुराणी जान पहचान हे उस को इस्तेमाल करना हे… और आप ने जो नए कर्मचारी मवेशी और बर्ड्स के काम के रखने हैं वो भी आप खुद मैनेज करें गए”

जब ये बात निकली तो गोविन्द ने लाला जी को सारा किस्सा सुनाया के कैसे सेठ गिरधारी लाल ने बापू को धोका दिया था…

लाला जी… “कैलाश बाबू… तुम मुझे अपना बारे भाई समझो और किसी चीज़ में परेशां मत होना… ये कारोबार अब सिर्फ मेरा नहे बल्कि हम सब का हे और हम ने मालिक की हैसियत से जो मुनासिब लगे वो फैसला लेना हे… किसी को कोई आपत्ति नहे होगी…”

कैलाश और प्रकाश बोहत खुश हुए ये सुन कर और सुक्रिया ऐडा किया लाला जी…

लाला जी… “आप शुक्रिया ऐडा कर के अभी भी मुझे पराया बना रहे हैं… आप देखिये ये सब गोविन्द hi आगे लेकर जा रहा हे के न सिर्फ आप का बल्कि अब मेरा भी बीटा हे और इसी तरह परकाश और ेषणा भी मेरे बचे हैं… कल सुबह आप को कार 7 बजे प्लाट पर चोरे गई और 6 बजे शाम को वाहन से लेकर यहाँ घर आये गई… आप अपना घर समझ कर रहिये और किसी चीज़ की ज़रुरत हो तो बिला झिझिक मुझे या गोविन्द को बताइये… बाक़ी हम इन सब कामो से फ़ारिग़ हो कर अपनी बेटिओं वर्षा और अक्षरा से भी मिलें गए… सेठ गिरधारी लाल हमारी बच्चियों को यूँ बंदी बना कर नहे रख सकता… न हमे उन से मिलने से रोक सकता हे…”

बापू की आँखों में आंसू आ गए… वो रोने लगे… पापा अपनी जगा से उठ कर उन को गले से लगा लिया…

पापा… “कैलाश हम सब तुम्हारा दर्द समझ सकते हे… और खुद को अकेला न समझो… बस ये कुछ दिन गुज़र जाने दो फिर में खुद बात करूँ गए सेठ गिरधारी से… तुम चिंता न करो और ख़बरदार जो आइंदा यूँ बच्चों की तरह रोये…”

पापा की बच्चों वाली बात पर सब हंस परे और बापू भी मुस्कराने लगे… माहौल एक दम फिर से हल्का हो गया…

गोविन्द ने इस बीच चेक किया तो विक्रम का बस 15 से 20 मिनट का काम रह गया था… और अब 9 बजने वाले थे… गोविन्द ने रुखसत ली तो सब ने गीले मिल कर उस को रुखसत किया… प्रकाश बहार आ गया उस के साथ गारी तक चोर्ने…

गोविन्द… “भैया अब आप पे बरी ज़िम्मेदारी आ रही हे… और आप से रिक्वेस्ट हे के मैकेनिक के हाँ रोज़ एक चाकर ज़रूर लगाएं के ट्रक 5 दिन के अंदर अंदर रिपेयर होना चाहिए… फिर आप ने अगले वीक से गाँव ले कर जाना हे… और आप अपने साथ अगर किसी को रखने चाहे तो रख लें… 2 से 3 बन्दे… जो के ट्रक में आप के साथ होंगे…”

परकसह ने कहा वो अपनी जान लगा दे गए… कोई चिंता की ज़रुरत नहे…

गोविन्द अब हर तरफ से सटिस्फी हो कर कार में जा बैठा और विक्रम के पास पोहंचा… शोरूम अभी तक ओपन था और विक्रम अंदर था… गोविन्द अंदर आया तो विक्रम एक कस्टमर के साथ एक कार के पास खरा था और उस को कार कीस देते हुए पहलवान जी ये आप की गारी हे…

कस्टमर देखने वाक़ये एक पहलवान लग रहा था… 40 साल का, लम्बा क़द, छोरा सीना, छोरा चेहरा, मज़बूत जिस्म, भरा हुआ मगर मोटा नहे, आँखों में चमक…

गोविन्द पास पोहंचा तो विक्रम ने इंट्रोडस करवाया…

विक्रम… “पहलवान जी… ये मेरा दोस्त हे गोविन्द… और गोविन्द ये मुहताक़ पहलवान हे… स्टेट चैंपियन रह चुके हे… अपने वक़्त में इन को कोई हरा नहे सकता था… आज भी इन से सब दूर दूर रहते हे… अब ये अपनी ट्रेनिंग अकादमी चलते हे…”

गोविन्द ने जब हाथ मिलाया तो उस को अंदाज़ा हुआ के जेसे मुश्ताक़ पहलवान के हाथ लोहे के हों…

गोविन्द… “ख़ुशी हुई आप से मिल कर… मुझे भी बारे शौक़ हे के में कसरत वग़ैरा की ट्रेनिंग लून…”

मुश्ताक़ पहलवान… “आप का जिस्म भी ाचा और मज़बूत हे इस पे अगर आप म्हणत करो तो और मज़बूत हो सकता हे…”

गोविन्द… “में किसी दिन आऊंगा आप के पास अकादमी में…”

पहलवान… “ज़रूर आना…”

उस के बाद पहलवान अपनी गारी में बेथ कर निकल गया…

शोरूम से बहार आकर विक्रम ने कहा के कार वो चलाये गए… गोविन्द ने उस को के दे दी कार की…

गोविन्द भी कुछ थकावट महसूस कर रहा था… कार विक्रम चलने लगा तो वो भी रिलैक्स हुआ…

गोविन्द और विक्रम एक दुसरे से बातें भी कर रहे थे और साथ साथ गोविन्द अपना धयान भी लगा कर हर एक की रिपोर्ट भी ले रहा था…

आशा बक्शी अस उसुअल गोविन्द को मिस कर रही थी… कोई खास क्राइम रिपोर्ट नहे हुआ था न hi शहर में कोई ऐसी एक्टिविटी हुई थी जो के रघु की तरफ इशारा कर सके… ेषणा और माँ दोनों hi सोच रही थीं के गोविन्द ए गए या नहे… रजनी अपने पति और bête प्रकाश के लिए भी फिकरमंद थी…

मैनेजर की तरफ दीमघ लगाया तो पता चला के वो अपने ड्राइंग रूम में दोनों सुप्परविसोर्स के साथ बैठा हे… 3 बैठे पि रहे हे…

सुपरवाइजर – 1: “मैनेजर साहिब, आप ने तो कहा था के हम और हमारे दोस्त कर्मचारी नौकरी छोड़ें गए तो लाला जी परेशां हो जये गए… उन का काम बंद होजये गए… मगर न सिर्फ पुराने गोदाम का काम भी स्टार्ट हो गया हे और वह प्लाट पर भी काम स्टार्ट हो गया हे और एक hi दिन में मैप वग़ैरा भी मंज़ूर हो गया हे… कल संडे को भी काम होगा…”

मैनेजर… “मुझे खुद ये परेशानी हे… लाला जी ने तो कभी किसी काम में दखल नहे दिया था… मेरी चेक बुक सिग्नेचर और पेमेंट अप्रूवल की अथॉरिटी कैंसिल कर के उन हों ने बैंक को भी लेटर लिख दिया हे… में मुंशी से आने वाली अनाज के सौदे की डील भी कर चुक्का हूँ… मुझे खुद समझ नहे आ रही… इसी लिए तो तुम दोनों को यहाँ बुलाया हे…”

गोविन्द समझ गया के यहाँ रुकना फज़ूल हे … कुछ देर के बाद मैनेजर का दिमाग़ चेक करूँ गए के क्या प्लानिंग की हे उस ने… एक फ़ायदा अभी गोविन्द को हुआ के उस को दोनों सुपरविसोर्स के दिमाग़ तक रसाई हो गयी और वक़्त पर्ने पर उन दोनों के दिमाग़ भी पढ़ सकता था… गोविन्द अभी तक इस क़ाबिल नहे हुआ था के बग़ैर किसी को मिले या उस की तस्वीर या आवाज़ सुने बग़ैर उस के दिमाग़ तक पोहंच सके… बहनो तक वो इस लिए पोहंच सका के उन की यद् उस के दिल में थी… एक कनेक्शन था… इसी लिए वो रघु तक नहे पोहंच प् रहा था के उस से कभी मिला नहे था… न उस की फोटो देखि थी… न आवाज़ सुनी थी… मंडे या ट्यूसडे को जब फोटोज उस के रिकॉर्ड के साथ ाएँ गई द्क्प के पास तो वो फिर उस के दिमाग़ तक जा सकता था…

इस बीच गोविन्द विक्रम के साथ बातें भी करता जा रहा था…

दूसरी तरफ रघु एक्शन में आ चुक्का था….
 
EPISODE – 36

रघु एक्शन में आ चुक्का था…

इस बात से बेखबर गोविन्द विक्रम के साथ गाँव जा रहा था… दोनों आपस में बातें करते जा रहे थे और साथ साथ गोविन्द अपनों के दिमाग़ भी चेक करता जा रहा था…

आधे घंटे में वो गाँव पोहचने वाले थे…

उस ने फिर से धयान लगाया ेषणा पर… तो पता चला के माँ ने उस को अपने साथ सोने को कहा हे… क्यों के काफी देर हो चुकी थी और उन को कन्फर्म नहे था के गोविन्द ए गए या नहे… मगर ेषणा चाहती थी के वो अलग कमरे में सोये…

ेषणा की सोच… “भैया… शायद आ जाएँ… तो उन को कहूं गई के मेरे कमरे में सो जयें… शायद आज कुछ मेरा भी काम बन जये… किरण को कितना मज़ा दिया था भाई ने…” वो मज़ीद एक्ससिटेड हो गई थी…

मगर गोविन्द पता नहे क्यों आज ेषणा से दूर रहना चाहता था… कही न कही उस के दिमाग़ में एक गिल्ट सा आ रहा था ेषणा के साथ क्लोज होने के हवाले से… उस ने सोचा के अगर ेषणा माँ के पास सो जये गई तो वो अलग कमरे में सो जये गए… और ेषणा से दूर रहने का बहाना मिल जये गए…

वो इसी लिए फिर से माँ के दिमाग़ में गया ताकि उस को गाइड करे के वो ेषणा को अपने पास सुलाने के हवाले से… लेकिन जेसे hi वो माँ के दिमाग़ में पोहंचा तो उस के ऊपर हेरात के पहर टूट परे…

माँ की सोच… “कैलाश (पति) जब मेरे साथ सम्भोग कर रहे थे तो उन के चेहरे पर मुझे गोविन्द की छवि दिख रही थी और साफ ऐसा लग रहा था के मुझे मेरा पति नहे बल्कि मेरा बीटा छोड़ रहा हो… हर वक़्त यही ख्याल सताता रहता हे के में ऐसा क्यों सोचती हु… क्यों मुझे गोविन्द का पास आना ाचा लग रहा हे… क्यों में चाहती हु के गोविन्द मेरे साथ वो सब करे जो एक पति अपनी पत्नी के साथ करता हे… कही में फिर से अपने भाई, कृष्णा, को तो यद् नहे कर रही… गोविन्द का चेहरा बिलकुल मेरे प्यारे बही कृष्णा जैसा हे…”

ये बात एक नया झटका साबित हुई गोविन्द के लिए के उस को कोई मां (माँ अक भाई) भी हे… कभी उन के घर में उस के ननिहाल का ज़िक्र हे नहे हुआ था… और ये बात के मां या फिर माँ पसंद करते थे एक दुसरे को…

गोविन्द की सोच… “क्या उन के बीच भी कोई सम्बन्ध था…??”

गोविन्द एक अब्र फिर से उलझ गया था… उस ने अपने मां का सोचा के कोई कृष्णा नाम का मर्द हो जो उस का मां भी हो और उस का धयान लगाने की कोशिश की मगर कामयाब न हुआ वो किसी भी दिमाग़ तक पोहचने पर… उस का ख़याल या धयान भटकता रहा…

वो फिर से माँ के दिमाग़ में पोहंचा…

माँ की सोच… “गोविन्द जब भी मेरे पास होता हे मुझे एक क़रार होता हे… काश वो आ जये… आज तो उस को अपने पास स्कूलों गई… अपने बचे को… जिस तरह बचपन में वो लिपट कर सोता था.. कितना तंग करता था साडी रत… टंगे मरता रहता था… वो पास होगा तो में भैया मुझे यद् भी नहे आएं गए… पता नहे कैसे हों गए भैया… माँ किसी होगी… बाबू जी कैसे हों गए…??”

गोविन्द को अपनी माँ बोहत परेशान और दुखी नज़र आयी…

उस ने एक फैसला कर लिए… “आज अपनी माँ के पास सौं गए… कोशिश करूँ गए के उन को अपने भाई की याद न ए… अपने के भाई को याद कर के माँ बोहत बीजकल हे…

गोविन्द… “लेकिन मुझे ये भी खोजना होगा के मेरा ननिहाल कहा हे… और कभी उन के बारे में घर में बात क्यों नहे हुई…??”

विक्रम… “अरे कहा खो गया … कही सो तो नहे गया…?? गाँव आ गया हे…”

गोविन्द फ़ौरन अपने खयालो से बहार आया …. वो लोग गाँव पोहंचे तो विक्रम अपने घर पर उतर गया और गोविन्द कार ले कर अपने घर की तरफ चल दिया…

गोविन्द ने गर के बहार कार पार्क करते हुए चेक किया तो माँ और ेषणा दोनों जग रही थीं… उस ने कुण्डी खटखटी और साथ में ज़ोर से बोलै “माँ… दरवाज़ा खोलो…”

माँ और ेषणा ने गोविन्द की आवाज़ पहचान ली और दोनों ीखते दरवाज़े पर आ गए… माँ ने कुण्डी खोली… वो अंदर आया तो माँ ने बारे ज़ोर से उस को गले लगा लिया… और रोने लगी…

गोविन्द… “अरे अरे माँ… कोई नहे… क्यों रट हो… में आ गया हु न… बस चुप करो… अब में आप की आँख में आंसू न देखु…” माँ को ऐसे देख कर वो भी रोना चाहता था… गोविन्द ने अपने आप पर काबू रखा… फिर ेषणा भी मिली…

माँ… अपनी आँखें साफ करते hue…“Beta… खाना लगा दू…”

गोविन्द… दरवाज़ा बंद करते hue…“Maa… खाना खा कर आया हु… बोहत थक गया हु… अब सौं गए…”

माँ… “वो बीटा तुम्हारे आने का कुछ पता न था तो हम दोनों एक hi कमरे में सोने लगे थे… तुम भी वही सो जाओ हमारे साथ…”

3 तीनो कमरे की तरफ जाते हुए…

गोविन्द… “माँ… मगर वह पर तो सिर्फ एक बीएड हे… आप को तकलीफ होगी…”

माँ… “नहे बीटा तकलीफ किसी… मेरा बचा मेरे पास सोये गए तो मुझे ाचा लगे गए…”

ेषणा के मन में लाडू फुट रहे थे…

फिर ये तय पाया के गोविन्द बीच में सोये गए ुर उस के एक तरफ ेषणा और दूसरी तरफ माँ सोये गई… गोविन्द ने वाशरूम जा कर कपड़े तब्दील किये…

कमरे की लाइट ेषणा ने बंद कर के वो अपनी साइड से आ कर बीएड पर लेट गयी… गोविन्द के बराबर में… कमरे में अँधेरा था बस हलकी रौशनी चाँद की रोशनदान से आ रही थी….

गोविन्द ेषणा के दिमाग़ में गया…

ेषणा की सोच… “माँ सो जये तो भैया के प्यार करूँ गई…” और साथ hi एक हाथ रख दिया गोविन्द के हाथ पर… गोविन्द ने हाथ हटाया नहे…

गोविन्द अब माँ की सोच पढ़ने लगा…

माँ की सोच… “ेषणा बस सोने वाली होगी… फिर अपने बचे को अपने सीने लगा कर सौं गई…”

गोविन्द माँ की तरफ आकर्षित हो रहा था… उस ने ेषणा का हाथ प्यार से थपकते हुए… उस के दिमाग़ में मुसलसल सोच पैदा करने लगा… “मुझे नींद आ रही हे… मुझे नींद आ रही हे…” इस सोच की तकरार ने… ेषणा को मजबूर कर दिए और वो 5 मिनट के अंदर hi सो चुकी थी…

गोविन्द ने इत्मीनान करने के बाद…

गोविन्द… “माँ… तुम सो गयी…”

माँ… “नहे बीटा… में जग रही हु… क्यों बीटा…”

गोविन्द… “ेषणा सो गयी हे… माँ… मुझे आप के पास सोना हे…”

माँ… “मेरा बचा… मेरे पास तो सोया हुआ हे…”

गोविन्द … “नहे माँ… मेरा मतलब था जेसे में बचपन में आप की आग़ोश में सोता था वैसे सोना हे…”

रजनी खुश हो गयी… और उस का हाथ पाकर कर अपने पास खेंच लिया… “आजा मेरे बचे… मेरे पास आ जा…”

गोविन्द ने अपना सर माँ के कंधे पर रख लिया… माँ ने अपना बाज़ू, जिस पर गोविन्द का सर था, उस के गिर्द लपे लिया और अपना हाथ उस के सीने पर रख दिया… गोविन्द के सर कंधे पर रखने की वजा से दोनों के चेहरे बिल्कु करीब आ चुके थे… एक दुसरे की सांसे भी टकराने लगी… रजनी की नरम नरम छाती की साइड गोविन्द के सीने में खूब गयी…

रजनी अभी तक सीढ़ी hi लेती हुई थी…

गोविन्द न अब अपना एक बाज़ू रजनी की कमर के नीचे दाल दिया और दुसरे बाज़ू का हाथ उस के पेट पर रख दिया…

रजनी अपने हाथ से गोविन्द का सीना सहलाने लगी…

रजनी की सोच… “मेरे बचे का सीना केसा सख्त हे… सरे बल हे सीने पर… कितना ाचा स्पर्श हे…”

सोचते सोचते रजनी ने, बेटे के माथे को चुम लिया… गोविन्द ने भी अपनी माँ के गाल को चुम लिया… दोनों हलकी आवाज़ में हंसने लगे…

रजनी के पेट पर रखे हाथ ने हरकत की तो उस को नाभि का अहसास हुआ… गोविन्द ने एक ऊँगली क़मीज़ के ऊपर से नाभि पर घुमाई… फिर से रजनी … हलकी सी हंसी… और कहा… “क्यों गुदगुदी कर रहा हे शरीर…”

गोविन्द… “ाचा लगता हे माँ…”

रजनी ये सुन कर चुप हो गयी…

गोविन्द फिर से माँ की नाभि को प्यार से सहलाया…

माँ… “कृष्णा भी ऐसे hi मेरी नाभि के अंदर ऊँगली घूमता था… में मन करती थी तब भी बाज़ नहे आता था… कितना शरीर था न…”

गोविन्द ने माँ के अंदर सोच पैदा की… “और भैया…” इतनी सोच पैदा कर के रुक गया…

रजनी… “और भैया मेरी गर्दन पे चुम्बन देते थे…”

गोविन्द ने हलके से… चुम लिया रजनी की गर्दन को…

“ाः…” रजनी के जिस्म में बिजली सी दौरि….
 
EPISODE – 37

गोविन्द ने अपना मुंह वही रजनी की गर्दन पर रहने दिया और उस की साँस गर्दन पर महसूस कर के माँ उत्तेजित हो रही थी…

“हम्म्म ाः….” फिर माँ के मुंह से निकला…

गोविन्द का लुंड पूरे आकर में आ चुक्का था मगर उस ने जिस्म के निचले हिस्से को दूर रखा हुआ था माँ से…

गोविन्द ने नाभि को सहलाते सहलाते एक ऊँगली पूरी अंदर दाल दी…

माँ ने कोई आपत्ति न दिखाई और अपना हाथ जो गोविन्द के सीने पर था… उस की एक ऊँगली से गोविन्द के निप्पल के पास छुआ…

अब बरी गोविन्द की थी… “ाः माँ”…

गोविन्द ने अपना हाथ नाभि से हटा कर माँ के ऊपर नीचे होते सीने पर रख दिया…

और उस को झटका लगा… माँ ने ब्रा नहे पहनी हुई थी…

गोविन्द ने फ़ौरन ेषणा को चेक किया… वो सो रही थी…

गोविन्द के हाथ का अहसास पते hi रजनी अपनी ऊँगली से गोविन्द का निप्पल सहलाने लगी… चरने लगी… बारे प्यार से…

गोविन्द को जेसे इशारा सा मिला…

उस ने भी अपनी माँ के निप्पल पर ऊँगली फेरनी स्टार्ट कर दी… निप्पल पहले से hi सख्त घुंडी का आकर लिए था… जेसे छोटा सा दाना अंगूर का… मुलायम… तन्ना हुआ… रास से भरा…

गोविन्द के मुंह से बे इख़्तियार निकला… “माँ आप का दूध पि लून…”

ये शब्द सुन कर रजनी सिहार उठी…

माँ… “बीटा अब दूध नहे हे…”

गोविन्द… “हे न माँ… दूध हे… मुझे चूसने दे…”

माँ… “चूस ले बीटा…”

माँ की सोच… “भैया भी ऐसे hi ज़िद करते थे… चुके चूसने की… बारे शरीर थे…”

माँ… “तू भी बारे शरीर हे गोविन्द… ऐसे नहे मने गए…” और ये बोलते हुए माँ ने कमीज के आगे से लगे बूटूँ खोल दिए…. और गोविन्द का मुंह पाकर कर एक चुके पर लगा दिया… और साथ hi अपने हाथ से उस का सर सहलाने लगी…

गोविन्द ने मुंह आगे बढ़ा कर एक चुका अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगा…

रजनी…. “ाः… ोोोोीीी…”

गोविन्द को पता न चला के उस ने जो माँ के चुके को मुंह में लेने के लिए करवट ली थी उस वजा से उस की टंगे माँ की रनो के पास आ गयी और उस का लुंड माँ की टैंगो के दरमियान आ गया… बिलकुल छूट के करीब…

रजनी को पहला अहसास चुके पर मुंह का हुआ तो वो सिसक पारी और दूसरा अहसास बेटे के लुंड का अपनी छूट के पास हुआ तो वो होश खो बैठी…

और लपक कर अपने बेटे का मुंह दबा दिया अपने दोनों चुचों पर…

और साथ साथ…

अपनी टंगे खोल कर लुंड को टैंगो के अंदर दबा लिया… क़ैद कर लिया एक मेहमान को… अपनी रेशमी घाटी के पास...

गोविन्द भी अपने होश में कहाँ था…

वो चुके भी चूस रहा था और साथ साथ अपनी माँ की छूट की गर्मी अपने लुंड पर महसूस कर रहा था…

ाः ाः ाः…. मममम… मममम…. ाः… ाः… मममम…

लाज़त आमेज़ सिसकियाँ निकल रही थी रजनी के मुंह से…

दीवानगी थी … जज़्बात का तूफ़ान था… ऐसा तूफ़ान तो किसी समंदर ने भी न देखा था जो तूफ़ान इन दोनों जीव के अंदर उठ रहा था…

गोविन्द के मुंह में शीरीनी ऐसे घुल रही थी जेसे के सच मच दूध आ रहा हो उस के मुंह में…. वो लैप लैप लैप… चूसे जा रह था… कभी एक चूसता कभी दूसरा… कभी पूरा चूसता और कभी सिर्फ एक निप्पल को…

न दूध ख़तम हो रह था… न… प्यास मिट रही थी गोविन्द की…

रजनी की छूट अब बाक़ायदा से पानी चोर्ने लगी थी और उस से अब बर्दाश्त नहे हो रहा था….

रजनी ने अपने हाथ से लुंड पकड़ा गोविन्द का और उस के और करीब हो गयी… दोनों के दरमियान अब हवा गुजरने की जगा भी नहे थी… रजनी ने लुंड अपनी छूट के साथ शलवार के ऊपर से लगाया और टंगे बंद कर लीं और ज़ोर ज़ोर से भेंचने लगी लुंड को छूट पर… और रगड़ने लगी छूट को लुंड पर…

गोविन्द भी चुस्त रहा चुके…

गोविन्द के लिए एक और अहसास भी बारे हे रोमांचक था वो ये के रजनी की गुदाज़ और गदरायी हुई रणें उस के लुंड की सख्ती को अपने रेशमी अहसास से जाकर हुए थीं… रेशमी पाकर ऐसी जो चोर भी नहे रही और पाकर का लतीफ़ अहसास मुसलसल जज़्बात को बर्खाये जा रहा था… लुंड को गुदाज़ टाँगें बारे प्यार से भीचते हुए छूट के साथ रगरती और ढीला चोरटी… लुंड की टोपी छूट के नरम लबों से सत्ती हुई फिसलती हुई छूट की चिकनाई में एक मीठा अशअस जगा रही थी… दोनों के बदन लरज़ रहे थे… कम्प रहे थे…

कोई दस मिनट तक ये दीवानगी छाई रही और फिर दोनों साथ झरे… छूट से पानी निकला और लुंड ने भी अपना हिस्सा मिलाया…

दोनों की शाल्वरें एक दुसरे के रास से सं गयीं और दोनों इतने थक चुके थे के मज़ीद कोई एक लफ्ज़ बोले …. बेसुध से हो कर सो गए… एक दुसरे की बांहो में…

संडे था तो सब देर से उठे… 8 बजे पहले रजनी की आँख खुली… उठी तो उस के चेहरे पर ख़ुशी और दमक थी… उस ने प्यार से अपने बेटे को साइड में किया और पहले उस की नज़र गोविन्द के तन्ने हु लुंड पर गयी…

रजनी… “हए… ये तो अभी भी खरा हे… कितना बारे हे…” फिर उस का कहयल अपनी शलवार पे गया जो पूरी आकर चुकी थी … उस के अपने और बेटे के रास से… वो शर्माने लगी… और अपने बेटे के ऊपर चादर दाल दी और बहार चली गयी वाश रूम की तरफ…

थोड़ी देर के बाद… ेषणा की भी आँख खुली… वो भी बरी फ्रेश थी… नींद उस की पूरी हो गयी थी… उस को रत का कुछ भी याद नहे था…

उस ने गोविन्द के तरफ देखा जो अब तक सो रहा था… उस ने बारे प्यार से अपने बही के गाल को चूमा और बहार निकल आयी… और वाशरूम की तरफ चल दी… उस के वह पोंहच्ने तक रजनी नाहा कर बहार आ चुकी थी…

रजनी नाश्ता बना ने लगी… ेषणा भी फ़ारिग़ हो कर वाशरूम से किचन में आ गयी माँ का हाथ बताने…

कुछ देर बाद गोविन्द भी उठ गया… उस कर सर ज़रा सा भरी था मगर मूड ाचा था… 8.30 हो चुके थे…

वो भी गुनगुनाता हुआ वाशरूम की तरफ गया और नहाने लगा… नहाते नहाते… पहले बापू को चेक किया वो और प्रकाश प्लाट पर आ गए थे और काम स्टार्ट हो गया था… गोविन्द खुश हुआ… और फिर उस ने धयान लगाया सीमा पर … सीमा उस को याद आ रही थी…

सीमा के दिमाग़ में आते hi उस को एक शॉक सा लगा… सीमा और माँ दोनों लाउन्ज में बैठी रो रहीं थीं… उस ने सीमा का दिमाग़ टटोला तो पता चला के 8 बजे पुलिस आयी थी और पापा को साथ ले गयी… वजा बताये बग़ैर…

गोविन्द भी परेशानी के आलम में पोहंच गया पापा के पास… तो देखा के उन को पुलिस स्टेशन के एक कमरे में एक चेयर पर बिठा कर एक पेपर पर स्टेटमेंट लिया जा रहा हे…

पापा के दिमाग़ को टटोलने पर पता चला के 8 बजे उन के घर पर पुलिस ने राइड कर के उन को ग्रिफ्तार किया था… ये आरोप लगाया था के उन की ज़मीन जो शहर के नार्थ साइड पर हे और वहां खाना बदोशों की झोंपड़िओं को आग लगाई गयी हे… साड़ी झोंपड़ियां और सारा सामान जल गया हे… काफी लोग ज़ख़्मी हुए हैं और 3 की हालत बोहत नाज़ुक हे… आग रत को 2 बजे के बाद लगाई गयी थी…
 
EPISODE – 38

अभी तक पुलिस ने फोर्मल्ली फिर रजिस्टर नहे की मगर उन का इरादा था रिपोर्ट बना ने का…

गोविन्द ने फ़ौरन नाहा कर कपड़े पहनते हुए… पापा के दिमाग़ से उन के वकील का नाम और नंबर नोट किया और सीमा के दिमाग़ में डाला के उन की टेलीफोन डायरेक्टरी चेक कर के वकील को फ़ोन कर के साडी सिचुएशन बता दे… सीमा ने ऐसा hi किया…

गोविन्द किचन की तरफ आया तो नाश्ता तैयार था… उस ने अपनी माँ और ेषणा को कुछ न बताया और जल्दी से 10 मिनट के अंदर नाश्ता करता हुआ काम का बोल कर निकल गया और कार में शहर की तरफ चल पारा…

कार चलते हुए उस का ज़ेहन पापा के दिमाग़ में जाता रहा… उस ने इंस्पेक्टर को इन्फ्लुएंस किया के फिर न रजिस्टर करे… इसंपेक्टर ने कुछ डिले किया तो वकील भी पोहंच गए… वो शहर के जाने मने वकील थे… उन के पुलिस स्टेशन पोहचने से पापा को कुछ तसली हुई….

गोविन्द को इंस्पेक्टर के दिमाग़ से भी पता चला के आग चारो तरफ से लगी थी और कोई झोंपड़ी नहे बची इस का मतलब आग लग्न इत्फ़ाकि हादसा नही बल्कि किसी ने जान बूझ कर लगाई थी…

गोविन्द का पहला ख्याल मैनेजर की तरफ गया जो के रत को सुपरविसोर्स के साथ बैठा साज़िश कर रहा था… और गोविन्द को ये भी ग़ुस्सा आया अपने आप पर के रत को देर से उस ने मैनेजर का दिमाग़ क्यों चेक नहे किया… वो फ़ौरन मैनेजर के पास पोहंचा… पता चला के उस आग वाले इंसिडेंट से उस का कोई सम्बन्ध नहे और न उस को ये खबर थी आग लगने की…

उसी दौरान द्क्प अपने ऑफिस पोहंच गयी और उस ने पापा, उन के वकील, और इंस्पेक्टर को अपनी ऑफिस में तालाब कर लिया…

गोविन्द भी बस कुछ देर में शहर पोहचने वाला था…

द्क्प… “इतनी खौफनाक आग लगा कर साडी झोंपड़िआ और सामान जला दिया गया… काफी लोग ज़ख़्मी हे और 3 की हालत बोहत ख़राब हे और वकील साहिब आप कहते हे पुलिस एक्शन न ले…”

वकील… “लाला जी शहर के एक मोअज़िज़ शहरी हे… इन का सोसाइटी में एक नाम और रेपुटेशन हे… इन्हों ने खुद उन खाना बदोशों को इजाज़त दी थी के वो इन की ज़मीन पर रहें और उन को कभी उठाने का नहे कहा… लाला जी पहले किसी भी किस्म की ऐसी एक्टिविटी में इन्वॉल्व नहे रहे… उन के खिलाफ किसी ने स्टेटमेंट नहे दिया… पुलिस ज़रूर अपनी करवाई करे मगर लाला के खिलाफ और उन के नाम पर फिर रजिस्टर करना ज़यादती होगी… और ये विओलेशन ऑफ़ लॉ भी हे के कोई एविडेंस पुलिस के पास ऐसा नहे जो साबित करे के ये आग लाला जी ने या उन कहने पर लगवाई गयी…”

द्क्प… “किसी और को लाला जी के ज़मीन पर आग लगाने से क्या फ़ायदा हो सकता हे… फ़ायदा तो सिर्फ लाला जी को हो सकता हे के कई सैलून से उन की ज़मीन पे क़ाबिज़ लोग वह से उठ जयें…”

वकील… “में आप को किसी भी किस्म की जांच से नहे रोक सकता और न रोक रहा हूँ … सिर्फ इतनी रिक्वेस्ट कर रहा हूँ के लाला जी के नाम से फिर न रजिस्टर करें… फिर सिर्फ एक इंसिडेंट की रजिस्टर करे और अगर इन्वेस्टीगेशन के बाद लाला जी या किसी और का कसूर साबित हो तो ज़रुस उस को अरेस्ट करें…”

इस दौरान, गोविन्द पोहंच गया द्क्प ऑफिस… वह प् ने उस को रोक लिया और अंदर इण्टरकॉम पे इजाज़त मांगी के “लाला जी का बीटा आया हे…” द्क्प ने इजाज़त दे दी अनादर आने की…

गोविन्द जब अंदर दाखिल हुआ तो, द्क्प उस को देख कर थोड़ी देर के लिए बस उसी के चेहरे को देखती रही… जिस को इतने दिनों से उस की निगाहे ढूंढ रहीं थी… वो अचानक से उस के ऑफिस आ गया था एक आरोपी के बेटे की हैसियत से…

द्क्प ने अपने आप पर कण्ट्रोल करते हुए उसे बैठने को कहा…

गोविन्द बैठते हुए… “द्क्प मैडम, हमारा इस इंसिडेंट से कोई लिंक नहे… आप अगर विक्टिम्स का बयां ले तो वो आप को खुद बताएं गए के पापा ने उन को इजाज़त दी थी ज़मीन पर रहने की… और साथ साथ ये भी के उन को कभी वह से उठाने के लिए नहे कहा…”

द्क्प ने गोविन्द के चेहरे पर भरपूर नज़र डाली और पुछा… “आप का नाम…??”

मैडम मेरा नाम “गोविन्द…” हे

“Ok… मर. गोविन्द हम आप के पापा को जाने देते हैं मगर आप को यहाँ रुकना होगा और पुलिस इन्वेस्टीगेशन में आप को कोआपरेट करना होगा… हम सिर्फ इंसिडेंट की रिपोर्ट रजिस्टर करे गए किसी के नाम से नहे… लेकिन ये भी याद रहे अगर कोई डेथ हुई तो फिर लाला जी के नाम से hi कटे गई…”

पापा और वकील जहा खुश हुए वही…

पापा… “तो फिर मैडम आप गोविन्द को क्यों रोक रहे हैं…??”

गोविन्द… “पापा आप परेशां न हों… आप घर जयें और माँ और सीमा बोहत परेशां हैं उन से मिलें और फिर रिपेयर के काम को देखें में पुलिस के साथ कोआपरेट करूँ गए इन्वेस्टीगेशन में… और में आप के साथ राब्ते में रहूं गए… और साथ में हॉस्पिटल में राब्ता करे जो ज़ख़्मी हैं उन को हेल्प चाहिए होगी… और उन के जो मुखिया हैं उन से कहें के वो पुलिस स्टेशन ज़रूर ाएँ… उन का स्टेटमेंट इम्पोर्टेन्ट हे… और आप ये भी देखिये के हम फ़ौरन उन खाना बदोशो के रहने का इंतज़ाम कैसे कर सकते हैं… क्यों के नयी झूंपड़ीआं बन ने में तो वक़्त लगे गए… और साथ साथ जो बचे और औरते हे उन के खाने दूध का भी इंतज़ाम करें… और पापा अगर हो सके तो प्रकाश भैया के साथ ड्राइवर और कार भेज दें गाँव के वह से माँ और ेषणा को ले आएं…”

द्क्प हैरानगी से इस नौजवान को देख रही थी… इतना कॉन्फिडेंस और इतनी समझदारी… “ये हे कौन….??”

पापा… “ठीक हे बीटा… में चलता हु…”

पापा और वकील वह से रवाना हो गए…

द्क्प, इंस्पेक्टर और गोविन्द रह गए थे वह….

द्क्प… “इंस्पेक्टर… आप हॉस्पिटल से रिपोर्ट लीजिये और साथ साथ कोई एविडेंस हे तो वो भी ले आइये… में… मर. गोविन्द से कुछ सवाल पूछना चाहती हूँ…” इंस्पेक्टर सलूट कर के निकल गया…

द्क्प कुछ देर गोविन्द की आँखों में देखती रही और फिर इण्टरकॉम पर 2 कॉफ़ी के लिए कहा…

गोविन्द ने चेक किया… द्क्प के चेहरे पर ख़ामोशी मगर दिल और दिमाग़ में एक तूफ़ान सा बरपा था… एक जुंग जारी थी… उस के दिमाग़ और दिल के दरमियान…

द्क्प अचानक अपनी सीट से उठी और टहलने लगी अपनी ऑफिस में…

गोविन्द खामोश बैठा उसे देखता रहा…

द्क्प… “इस नौजवान में कुछ हे… मेरा दिल क्यों खिंचा जा रहा हे इस की तरफ… ये एक आरोपी का बीटा हे और में ने इस के लिए कफ आर्डर कर दी हे… ये में क्या कर रही हूँ… इस से नज़र मिलों तो दिल बेकरार सा हो जाता हे…”

गोविन्द की नज़र उस की गांड पे पारी… यूनिफार्म में गोल और डल गांड देख कर वो दांग रह गया… गांड न छोटी न बरी… मगर उस का शेप ऐसे जेसे के वो कोई मॉडल या एक्ट्रेस हो…

द्क्प आगे जाते वापिस मूर्ति तो उस ने नोट कर लिया के गोविन्द उस की अस्स को देख रहा हे… उसे ाचा लगा…

द्क्प… “यह इतना शरीफ भी नहे जितना में समझ रही हु… मेरी अस्स तर रहा हे… क्या मेरी गांड अछि लगी इससे… ओह सहित!!! ये में क्या सोच रही हूँ… मुझे कुछ हिम्मत कर के इस से कुछ तो बात करनी होगी… में तो बिलकुल स्टुपिड लग रही हूँ… ये तो मुझे कितने कॉन्फिडेंस से देखे जा रहा हे…”

द्क्प… “मर. गोविन्द…” आवाज़ में नरमी हे अब भी… “उस दिन आप ने बस स्टॉप पे बताया के आप गाँव से आ रहे हो और एक ग़रीब नौजवान हो और आज आप के पापा… लाला जीवट राम सामने आ जाते हे… जो शहर के जाने मने रईस और बोपारी हे… ये क्या माजरा हे…”

गोविन्द… मुस्कुराते हुए… “मैडम जो उस दिन में ने कहा वो भी सही था और जो आज आप ने देखा वो भी ग़लत नही…”

द्क्प… “मर. गोविन्द… ये कोई क्विज शो नहे… साफ साफ लफ्ज़ो में बताइये…” आवाज़ में अभी भी सख्ती नहे हे…

फिर गोविन्द ने द्क्प को मज़ीद तुंग न करते हुए सारा क़िस्सा सुनाया के कैसे उस ने लाला जी की हेल्प की और उन की बेटी को बचाया और उन्हों ने उसे अपना बीटा बना लिया… सिर्फ शक्ति और साधू महाराज का ज़िकर को चुप्पा लिया…

द्क्प… “ये तो कोई फ़िल्मी स्टोरी लग रही हे… बहरहाल… ये बताओ के आप की आगे क्या हे…”

गोविन्द… “18 इयर्स…”

द्क्प… “क्या कहा… 18 इयर्स…?? क़द काठ और मज़बूत जिस्म से तो लगता हे के आप 20-22 साल के हो और आप की समझदारी वाली बाटे और कॉन्फिडेंस देखते हुए लगता हे के आप 40 साल के हो… कुछ तो आप में हे मर. गोविन्द जो आप छुपा रहे हो… मगर मुझे कुछ अलग सा फील हो रहा हे आप में…”

उसी वक़्त कफ भी आ गयी…

द्क्प… “टेक योर कॉफ़ी, मर. गोविन्द…”

गोविन्द… कफ लेते हुए मुस्कुराया… “मैडम आप को कितने साल का गोविन्द चाहिए…?”
 
EPISODE – 39

द्क्प ये सुन कर… हेरात से उस का मुंह खुल गया और वो फिर से गोविन्द की तरफ देखने लगी…

द्क्प… “अब इस का क्या मतलब हुआ…??”

गोविन्द… “मैडम… हम जिस को जिस नज़र या नज़रिये से देखते हे वो हमें उसी तरह दीखता हे… किसी भी व्यक्ति का इमेज हम अपनी परसेप्शन के चश्मे से देखते हुए बनाते हैं…”

द्क्प फिर से लाजवाब हो गयी…

द्क्प… “18 साल आप की आगे हे और आप की बातें…?? मुझे तो समझ नहे आ रहा के आप कोण हो…”

गोविन्द… “मैडम… में वैसा हूँ जैसा आप मुझे अपने ख्यालों में सोचती हैं…”

द्क्प एक बार फिर हेरात में पर गयी… “क्या ये जनता हे के में इस के बारे में सोचती हु और क्या ये भी जनता हे के में इस के बारे में क्या और कैसे सोचती हु…”

ये सोचते सोचते द्क्प का चेहरा शर्म से लाल हो गया…

उस की निगाहें झुक गयीं… साँस तेज़ हो गयी…

गोविन्द… “मैडम आप की कॉफ़ी ठंडी हो रही हे…”

द्क्प हार्बर कर अपने खेलों से निकली और कॉफ़ी पीने लगी… “नहे नहे ये मेरे खेलों के बारे में कुछ नहे जनता… कोई भी किसी के ख्याल कैसे जान सकता हे… ये सिर्फ इस का कॉन्फिडेंस हे… जो ये इस तरह की बातें कर रहा हे… में इस के आगे सरेंडर नहे करूँ गई… में एक पुलिस अफसर हु…”

गोविन्द… अपनी कॉफ़ी ख़तम कर चूका था और द्क्प भी पी चुकी थी…

गोविन्द… “मैडम… क्या आप मुझे इजाज़त दें गई के में भी अपने पापा का हाथ बताऊँ… में आप से प्रॉमिस करता हु के आप मुझे जब और जहाँ बुलाएँ गई में आऊं गए….”

द्क्प ने ीाक ठंडी साँस भरते हुए… “ठीक हे मर. गोविन्द… ज़रुरत हुई तो आप को कॉल करें गए…”

गोविन्द ने अपना हाथ बढ़ाया हैंडशेक के लिए… द्क्प ने उस का हाथ थमा और फिर से द्क्प की हालत ख़राब होने लगी…

सख्त मरदाना हाथ और ऊपर से उस का जिस के बारे में वो कई दिन से सोच रही थी… गोविन्द ने बारे प्यार से द्क्प का हाथ मसल दिया… द्क्प ने नज़रे नीचे कर्ली मगर हाथ न चुराया… और द्क्प ने भी हाथ पे ग्रिफ्ट मज़बूत कर दी… “गोविन्द मुझे सिग्नल दे रहा हे… मेरा हाथ सेहला रहा हे… हे लाइक्स में…” द्क्प मुस्कुराने लगी…

गोविन्द… “मादाम में जॉन…??”

द्क्प… “हाँ… जाइये…”

गोविन्द… “तो फिर मेरा हाथ छोड़िये…”

द्क्प फिर से शर्मिंदा हो गयी और शर्म से नज़रे नीची कर लीं… और हाथ चोर दिया… गोविन्द मुस्कुराता हुआ कमरे से बहार चला गया…

फिर द्क्प खुद सोचने लगी के “में ने ये क्या कर दिया… में उस का हाथ फील कर रही थी… में कितनी स्टुपिड हूँ… कुछ भी हे उस का हाथ पकड़ना मुझे बोहत ाचा लगा…” और फिर अपने हाथ को दुसरे हाथ में ले कर सहलाने लगी जेस ेके गोविन्द के हाथ को सेहला रही हो…

गोविन्द ख़ामोशी से ऑफिस से बहार निकला और प् से रिक्वेस्ट की के वो एक कॉल करना चाहता हे… पहले उस ने पापा को कॉल की… वो ऑफिस में थे… गोविन्द ने उन को तसली दी और कहा के सब ठीक हे… और वो ऑफिस में रहें… वो खुद हॉस्पिटल जा रहा हे… और ये भी बताया के प्रकाश को गाँव न भेजें वो खुद जा कर माँ और ेषणा को ले ए गए…

उस के बाद उस ने इजाज़त मांगी प् से एक और कॉल की… इजाज़त मिलने पर फिर उस ने मल्टी भाभी को कॉल लगाई… मल्टी भाभी ने hi फ़ोन अटेंड किया… गोविन्द उन के दिमाग़ को पहले hi कह चुक्का था…

गोविन्द ने भाभी को बताया के किसी को भेज दे घर पे जो उन को मैसेज दे दे के माँ और ेषणा त्यार रहे उन को लेने प्रकाश भैया ाएँ गए… उस ने अपना न बताया क्यों के फिर भाभी मिलने के लिए ज़िद करतीं…

फिर वो निकल पारा हॉस्पिटल के लिए… वहां जा कर जो ज़ख़्मी थे उन की हालत पूछी और उन को तसली दी… डॉक्टर्स से मिला… बेहतरीन से बेहतरीन फैसिलिटीज के लिए उन को कन्विंस किया… और अब वो उन 3 जख्मियों के मंद में गया जिन की हालत खतरे में थी… उन के ज़ेहन में जा कर उन का हौसला बढ़ाया… उन के ज़ेहन में बिठा दिया के वो ठीक हो जयें गए… इंसान की मेन्टल वेल बीइंग का काफी असर होता हे फिजिकल कंडीशन पर… और डॉक्टर्स ने एक घंटे के बाद रिपोर्ट दी के वो अब खतरे से बहार हैं… वह पर इंस्पेक्टर भी मौजूद था उस के दिमाग़ में जा कर अछि रिपोर्ट बनाई और वह से निकल कर घर आया तो देखा के सीमा और माँ अब शांत थी और गोविन्द से मिल कर खुश हुईं…

लंच का वक़्त हो रहा था…

गोविन्द ने फिर एक टेंट वाले से कांटेक्ट किया ुर टेंट लगवा दिए पास की एक और ज़मीन पर … क्यों के जिस ज़मीन पर आग लगी थी वह बोहत सारा डेब्रिस (मलबा) था और वैसे भी वो एक क्राइम सन था तो जब तक पुलिस उस जगा को क्लियर न करती वो जगा इस्तेमाल नहे की जा सकती थी…

साथ सतह खाना, दूध और चीज़ें भी भिजवा दीं औरतो और बचो के लिए…

मुखिया ये सब इंतज़ाम देख कर बोहत खुश हुए और पुलिस स्टेशन जा कर लाला की फेवर में स्टेटमेंट दे दिया…

गोविन्द ने पापा को सब अपडेट दिया और खुद माँ के दिमाग़ में आया… माँ और ेषणा त्यार थे… पूरा दिन लग गया था गोविन्द को ये सब मैनेज करते हुए 4 बज चुके थे… उस ने गाँव का रुख कर लिया ताकि माँ और ेषणा को पिक कर सके… वो अब शहर में रहना चाहता था… पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक़ आग जान बूझ कर लगाई गयी थी… इस लिए वो चाहता था के शहर में रह कर खोज लगाए के आग किस ने लगाई हे… उस ने निकलने से पहले पापा को कहा था के वो एक बार हॉस्पिटल ज़रूर चाकर लगा लें… और जख्मियों और मुखिया और दुसरे लोगो से मिल लें… बाद में कार भेज दें बापू और प्रकाश भैया के लिए…

वो गाँव पोहंचा तो माँ और ेषणा उस को देख कर बोहत खुश हुए… वक़्त न जाया करते हुए सामान कार की दिग्गी में रखा… घर को लॉक किया और माँ को अगली सीट पर अपने साथ और ेषणा को पिछले सीट पर बिठाया… माँ बोहत खुश थी सरे रस्ते उस को दुआएं देती रही…

ेषणा पिछले सीट से उस के साइड को सहलाती और छेरती रही… अँधेरा होने की वजा से माँ देख न सकीय… 6 बजे शहर पोहंचे… माँ और सीमा ने उन को वेलकम किया और एनेक्सी दिखाई जहा उन को रहना था… माँ और ेषणा इतना ाचा और बारे सा बंगला देख कर बोहत खुश हुईं… इतनी देर में बापू और प्रकाश भी आ गए तो सब आपस में बेथ कर बाटे करने लगे…

गोविन्द अपने कमरे में जा कर शावर लिया और नहाते हुए द्क्प को चेक किया जांच के बारे में और पता चला के वो इस वक़्त भी ऑफिस में हे और काफी बारीकी से हर मामले को देख रही हे… फिर गोविन्द ने अपनी दीदियों को चेक किया… वो रज़ाना एक या दो बार दिन में अपनी दीदियो को ज़रूर चेक करता था… जेसे hi वो वर्षा दीदी के दिमाग़ में गया तो पता चला के दिन 2 बजे से बिपिन लाल (अक्षरा के पति) ग़ायब हैं… और कुछ देर पहले किसी ने घर पे कॉल कर के अपनी डिमांड बाटी थी बिपिन भैया को चोर्ने के लिए… सब परेशां हे… वो फ़ौरन अक्षरा दीदी के दिमाग़ में गया जो के इस वक़्त अपने कमरे में बैठी रो रही थी… उस ने दीदी का चेहरा उठाया ऊपर और देखा बिपिन भैया की तस्वीर पर जो दीवार पर लगी थी… वहां से गोविन्द पोहंच गया… बिपिन भैया के दिमाग़ में… और गोविन्द ने साथ साथ बहार निकल कर कपड़े भी पहन लिए…

बिपिन भैया की आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी और किसी कुर्सी पर बैठे थे… उन के हाथ पाऊँ भी राशि से बंधे हुए थे… पति बन्दे होने की वजा से उन को कुछ नज़र तो नहे आ रहा था मगर अंदाज़ा ये था के वो किसी अँधेरी जगा या कमरे में थे… उन को 2 बजे जब वो ऑफिस से निकल कर घर की तरफ गारी में जा रहे थे तो रस्ते में एक जीप ने उन का रास्ता रोका और 2 घुँडो ने गुपोइन्ट पर किडनैप कर लिया… जीप में बिठाते वक़्त उन की आँखों पर पति बढ़ दी गयी थी और अभी तक नहे उतरी गयी थी… रस्ते में और बाद में उन को मारा पीटा गया था… और 2 घंटे से वो अकेले थे… अभी तक उन को खाने पीने के लिए कुछ नहे दिया गया था… किसी का कोई पता नहे था… ख़ामोशी थी हर तरफ…
 
EPISODE – 40

गोविन्द ने अब धयान लगा दिया वर्षा दीद की तरफ और वह से पोहंचा सेठ गिरधारी लाल के दिमाग़ में… और शॉक हुआ ये जान कर के… किडनैपर्स ने मांग की थी के सेठ की जो 50 एकर ज़मीन हे शहर के नार्थ साइड वो बेच दे… वैसे तो किडनैपर रुपए पैसे की डिमांड करते हे … ये ज़मीन बेचने वाली डिमांड बरी अजीब लगी… मज़ीद पता चला के उस ज़मीन के लिए उन को कुछ शामे से प्रेससूरिजे किया जा रहा था…

गोविन्द के लिए कुछ राह नज़र आ रही थी… और फिर वो पोहंचा लाला जी के दिमाग़ में तो पता चला के उन को उस पार्टी का फ़ोन आया था जो पहले भी ज़मीन के लिए राब्ता कर चुकी थी… उस पार्टी ने उन को राब्ता करते हुए कहा था के अब तो कहना बदोशो का ताँता भी ख़तम हो गया हे और उन की झोंपड़ियां जल गयी हे तो उन को 100 एकर ज़मीन बेच देनी चाहिए…

अब पूरा मामला साफ था… आग ज़मीन पर उसी पार्टी ने लगवाई थी और उसी पार्टी ने बिपिन भैया को भी किडनैप किया था… और अब वो पार्टी सेठ गिरधारी लाल को बेटे के किडनैप के हवाले से मांग कर रही थी… मगर गोविन्द के लिए इस वक़्त इम्पोर्टेन्ट था बिपिन भैया को बचाना… तो वो फिर से उन के दिमाग़ में आ गया…

और बिपिन भैया… गोविन्द के गाइड करने पर… ज़ोर ज़ोर से छिलने लगे… “पानी… पानी… पानी…”

थोड़ी देर के बाद… किसी के कदमो की आवाज़ आयी और कोई उन के करीब आ कर एक ज़ोरदार जहाँपर मारा … और भारी आवाज़ में बोलै… “चुप बे… भोस्डिके… क्यों शोर कर रहा हे… कोई पानी वाणी नहे मिले गए… प्यासा मर…”

बिपिन भैया रोने लगे…

गोविन्द फ़ौरन उस गुंडे के दिमाग़ में पोहंचा… पता चला के वो रघु का आदमी हे… प्रॉपर्टी के लिए बिपिन भैया को किडनैप किया हे और लाला की ज़मीन पर रत को आग भी इन्ही लोगो ने लगाई थी… इस वक़्त उन को शहर से कुछ बहार एक खण्डार नुमा जगा पर क़ैद किया गया था… और उन की निगरानी के लिए वो घुंडा और एक और साथी मौजूद थे… उस्ताद रघु अपने दुसरे आदमियों के साथ आधे घंटे में वह पोहचने वाला था…

गोविन्द ने फ़ौरन डिसिशन लिया के वो उस जगा पर अगर अभी पोहंच जाता हे तो सिर्फ दो लोगो से निमटने परे गए और बाद में पता नहे क्या सिचुएशन होगी… और पुलिस को कैसे बताये के उस को ये साडी इनफार्मेशन कैसे मिली…

इस लिए गोविन्द ने ये फाइल्स लेते हुए घर से बहार निकला के वो अकेले नीमते गए…

कार चलते हुए… वो फिर से उस गुंडे के दिमाग़ में गया तो पता चला के वो घुंडा और उस का दूसरा साथी उस कमरे के बहार hi हे जहाँ बिपिन भैया क़ैद हे और एक के पास पिस्तौल और दुसरे के पास राइफल हे…

गोविन्द 15 मिनट के अंदर पूरी रफ़्तार से ड्राइव करते हुए खण्डार के पास पोहंचा… कुछ दूर कार रोकी… लॉक कर के… 100 गज़ चलता हुआ पोहंचा… एक पत्थर की आर में चुप कर देखा तो वह पर सिर्फ एक लालटेन (लैंप) जल रही थी… और उस कमरे तक जाने के रस्ते पर दोनों गुंडे खरे थे… पूरी तरह अलर्ट और होशियार…

गोविन्द पहले वाले गुंडे के दिमाग़ में पोहंचा और उस ने दुसरे को कहा के वो जा रहा हे पेशाब करने और खण्डार के बहार की साइड निकल आया… अँधेरा था… रौशनी थी तो बस हलकी चाँद की… गोविन्द भी ख़ामोशी से उस के पीछे आया और उस पेशाब करते गुंडे के मुंह पर हाथ रखते हुए (ताकि वो चीखे न) दुसरे हाथ में पकड़ा हुआ एक पत्थर उस के सर पे मारा… पत्थर लगते hi वो बेहोश हो गया और उस के सर से खून निकलने लगा…

गोविन्द उस को वही चोर कर दुसरे के दिमाग़ में आया जिस के हाथ में राइफल थी… और ख़ामोशी से सरकता हुआ… ऐसी घुटी घुटी आवाज़ निकली जेसे के किसी से लार रहा हो और उस गुंडे का नाम लिया… राइफल वाला घुंडा समझा के ये उस का साथी हे… वो इस तरफ बढ़ा तेज़ी से… थोड़ा आगे अँधेरा था… लैंप की रौशनी वह नहीं थी… गोविन्द वही छुपा हुआ था… जेसे hi राइफल थामे घुंडा तेज़ चलता आगे आया… गोविन्द ने तंग आगे कर दी… घुंडा धरम से नीचे गिरा… राइफल उस के हाथ से निकल गयी… गोविन्द ने फ़ौरन वही पत्थर उस के भी सर पर दे मारा…

दे मार साढ़े चार और वो भी वही ढेर हो गया…

गोविन्द ने फ़ौरन लैंप उठाया और उस तरफ ले गया जहाँ बिपिन बंधा हुआ था… वह जा कर उस की पति उतर दी और बोलै के वो परेशां न हो वो उस को बचने आया हे… और जल्दी जल्दी उस की राशि खोली…

और उस को सहारा दे कर कुर्सी से उठाया…

बिपिन… “तुम कोण हो… और मुझे कैसे जानते हो…??”

गोविन्द… “में तुम्हे नही जनता में यहाँ से गुज़र रहा था तो देखा के ये दो गुंडे हथिआर ले कर सस्पीशियस अंदाज़ में खरे हे तो मेने इन को ज़ख़्मी कर के तुम्हे बचाया हे…”

और फिर गोविन्द ने बिपिन को दोनों बेहोश गुंडे दिखाए…

पहले गोविन्द ने ये सोचा के इन को बांध दे और पुलिस के पास ले जये मगर फिर ये सोचा के ये दोनों रघु तक पोहचने का जरिया और यंत्र बने गए … क्यों के ये दोनों गुंडे नहे जानते थे के रघु किस के लिए काम कर रहा हे… हाँ मगर उन के हथिआर उठा कर दिग्गी में दाल दिए… खुद बैठा ड्राइविंग सीट पर और बिपिन को बिठाया साथ वाली सीट पर… और कार वह से निकल ली… रस्ते में पानी और कुछ स्नैक ले कर दिए बिपिन को… बिपिन उस का बोहत शुक्रिया ऐडा कर रहा था के उस ने इस की जान बचायी… गोविन्द ने अपना बताया के वो लाला जीवट राम का बीटा हे तो बिपिन ने भी बताया के वो सेठ गिरधारी लाल का बीटा हे और साडी स्टोरी किडनैप की सुना ने लगा…

गोविन्द तो सब जनता था मगर चुप रह कर सुनता रहा…

गोविन्द ने कहा के वो उस को उस के घर चोरे गए और बाद में वो पुलिस को रिपोर्ट ज़रूर करे के उस को किडनैप किया गया था और वो खुद वह से बच गया… गोविन्द का नाम न ले… इस लिए के वो बोपारी का बीटा हे तो इन सब लफड़ों, पुलिस कचेहरी, से दूर रहना चाहता हे…

सेठ गिरधारी लाल की कोठी शहर से बहार की तरफ थी और बिलकुल नयी बानी हुई बोहत शानदार थी… गोविन्द ने उस को जब कोठी के बहार छोरा तो बिपिन ज़िद करने लगा के वो उस के साथ घर में अंदर चले और कुछ चाय पानी और खिदमत का मौक़ा दे… दिल तो उस का भी चाहता था के अपनी डीडीओ से मिले… मगर उस वक़्त… गोविन्द के लिए चैलेंज रघु का सामने था और वो चाहता था के वो क़ानून की पाकर में अजय… फिर बिपिन ने उस से वादा लिया के वो एक पूरा दिन उस के साथ उस के घर पर गुज़ारे गए और उस को खिदमत का मौक़ा दे गए… गोविन्द ने एग्री किया और वह से निकल आया… कार चलते हुए… उस ने धयान लगाया बेहोश घुँडो की तरफ…

उसी वक़्त रघु अपने दो साथी घुँडो के साथ वह पोहंचा था… और उन घुँडो को होश आ चुक्का था… रघु उन पर बरस रहा था… उन के निकम्मे पैन पर उन को गलियां दे रहा था…

गोविन्द फ़ौरन रघु के दिमाग़ में पोहंचा और फिर पूरा प्लान जान गया…

रघु को रियल एस्टेट टाइकून सेठ राजेंदर सिंह ने इंगगे किया था… सेठ राजेंदर… दौलत पुर शहर के नार्थ साइड पर ज़मीन परचेस करना चाहता था क्यों के सर्कार के फैसले के मुताबिक़ वह से by-pass रोड गुज़ारना था जो के कनेक्ट होना था स्टेट हाईवे के साथ… और उस प्रॉपर्टी की क़ीमत बोहत ज़यादा बढ़ने वाली थी…

सेठ राजेंदर… लाला जी और सेठ गिरधारी को रघु के माध्यम से डरा कर ज़मीन लेना चाहता था…

रघु इस वक़्त बोहत ग़ुस्से में था… और अपने दिमाग़ को शांत करने के लिए वो इंडस्ट्रियल एरिया में एक पुरानी फैक्ट्री में जो के काफी शामे बंद पारी हुई थी वह क़ब्ज़ा कर के पहले से अपना ऐडा बनाया था… वो वह पोहंच कर शराब पीने लगा और आगे का सोचने लगा… इस वक़्त उस के साथ सिर्फ एक hi साथी था बाक़ी के साथी एक और जगा पर थे… क्यों के जो ज़ख़्मी थे उन को देख भाल की ज़रुरत थी…

गोविन्द को ये मौक़ा ाचा लगा और उस ने फ़ौरन एक और डिसिशन ले लिया… और कार द्क्प के ऑफिस की तरफ मोर ली…
 
EPISODE – 41

उस वक़्त रत के 9 बज रहे थे मगर द्क्प अभी तक ऑफिस में थी… उसी वक़्त दोनों इंस्पेक्टर्स निकले थे उस की ऑफिस से आगे का प्लान ले कर… और द्क्प भी इस वक़्त सोच रही थी के अपने रेजिडेंस जाये और जा कर आराम करे… और फिर उस का ख्याल चला गया गोविन्द की तरफ… “फिर पता नहे कब मुलाक़ात हो गई… गोविन्द से…”

उसी वक़्त इण्टरकॉम बीप बजी… प् ने बताया के मर. गोविन्द आप से मिलना चाहते हैं…

वो आश्चर्य से… “गोविन्द इस वक़्त… मेरे ऑफिस…?? भेजो अंदर…”

गोविन्द का नाम सुनते hi उस का मूड खिल गया…

द्क्प… “आयी मर. गोविन्द बैठे… कैसे आना हुआ…”

गोविन्द… “मैडम… मॉर्निंग में इंस्पेक्टर से पता चला था के आग लगाने के लिए पेट्रोल के साथ फोसपोहोरोस भी उसे हुआ हे और शहर से फ़ास्फ़रोस ज़यादा क्वांटिटी में कल एक केमिकल शॉप से खरीदा गया था और उस के 5 कग कंटेनर की डिलीवरी एक फैक्ट्री के नाम से की गयी… में ने जब उस फैक्ट्री को इंडस्ट्रियल एरिया में जा कर चेक किया तो वो फैक्ट्री तो 5 साल से बंद हे और उस का मालिक आउट ऑफ़ कंट्री हे मगर वह पर दो लोग इस वक़्त मौजूद हे और शायद उन के पास वेपन भी हों… लेकिन अगर उन दोनों को पकड़ा जये तो हमें पता चल सकता हे के आग किस ने और क्यों लगाई…”

द्क्प… “मर. गोविन्द… आप जब भी मिलते हो… मुझे हैरान कर देते हो.. आप 18 साल के हो कर आप ने इतना बारे सुराग़ लगा लिया हे… मेरे दोनों इन्सपेकर्स अपनी टीम के साथ दो अलग जगा छापा मरने गए हैं… ऐसा करते हैं के आप मुझे एड्रेस बताओ… में खुद चेक करती हूँ…”

गोविन्द… “मैडम… में आप को अकेला नहे जाने दूँ गए… में भी आप के साथ चलूँ गए…”

द्क्प… हेरात से गोविन्द की बात सुन कर सोचने lagi…“ye मुझे अकेला नहे जाने दे गए… ये कैसे कह दिया इस ने… क्या ये मेरी केयर करता हे… क्यों…” उससे ाचा लगा था…

वो कुछ नहे बोली और अपनी सीट से उठ कर ऑफिस से बहार निकल आये तो गोविन्द भी उस के पीछे बहार आ गया…

गोविन्द… “मैडम ाएँ मेरी कार में चलें…”

द्क्प किसी रोबोट की तरह जेसे उस की हर बात मन ने लगी थी उस के पीछे चलते हुए उस की कार में बेथ गयी…

गोविन्द ने कार में बेथ कर दौरा दी स्पीड से…

द्क्प… बारे घोर से देखने लगी गोविन्द को कार चलते हुए… “केसा शानदार मर्द हे ये… काश मुझे कुछ वक़्त मिल जये इस के साथ…”

कार कुछ hi देर में फैक्ट्री के पास पोहंच गयी… गोविन्द ने कार कुछ दूर पार्क कर दी… दोनों कार से उतरे… गोविन्द ने कार लॉक की… और द्क्प को फैक्ट्री दिखायी… फैक्ट्री कंडीशन से लग रहा था के काफी शामे से बंद हे… हलकी रौशनी एक हिस्से से हो रही थी…

द्क्प… “में इस तरफ से जॉन गई… आप दूसरी तरफ से अंदर आओ…”

गोविन्द… “मैडम… साथ चलते है…”

द्क्प… “नहे… अलग अलग रस्ते से अंदर जयें गए…”

मजबूर हो कर गोविन्द फैक्ट्री की बक्सीडे पर चला गया और द्क्प फ्रंट से…

फिर भी गोविन्द बार बार जा रहा था द्क्प के दिमाग़ में के शायद उससे ज़रुरत परे…

गोविन्द ने देखा के बैक साइड वाला छोटा लोहे का गेट बिलकुल बून्द हे और उस को दीवार से चरना परे गए… द्क्प फ्रंट साइड से गेट की तरफ बरही और गेट को नॉक किया… अंदर से कोई आवाज़ न आयी तो उस ने भी दीवार से जाने का सोचा…

दोनों दीवार से चरने की कोशिश करने लगे… गोविन्द अगर यहाँ अपनी शक्ति इस्तेमाल करता तो द्क्प जो पहले hi उस पर शक कर रही थी वो और उस के बारे में सचेत हो जाती….

गोविन्द दीवार के ऊपर चढ़ गया था और उस ने दीवार पर चरने के बाद वही दीवार पर बैठे बैठे नीचे देखा… अँधेरा होने की वजा से कुछ नज़र नहे आ रहा था… उस ने सोचा के नीचे जहरीअं वग़ैरा न हो कैर उस ने रिस्क लेते हुए नीचे छलांग लगाई और नीचे उस की अपेक्षा के खिलाफ एक 7-8 फ़ीट का गाढ़ा था … वो उस में जा गिरा… थोड़ी बोहत चोट आये मगर वो सेह गया… ये शुक्र किया के नीचे ज़मीन कच्ची मट्टी की थी… अगर सीमेंटेड होता तो हदी टूट जाती… उस ने उछाल उछाल कर गढ़े में से निकलने की कोशिश की मगर कामयाब न हुआ… एक तो अँधेरा और दुसरे उस के पास कोई लाइट भी न थी… उस ने दीवार को चारो तरफ से घूम कर टटोलना शुरू कर दिया टेक कही से कोई ऐसी चीज़ या सहारा मिले जिससे पाकर ऊपर चढ़ सके… और गढ़े से बहार निकल सके… अब वो द्क्प के दिमाग़ में नहे जा प् रहा था… वो अपनी फ़िक्र में लग गया था के इस क़बर नुमा खड़े से कैसे बहार निकले… कोई दस 10 मिनट की म्हणत के बाद उस को एक जगा दीवार में 5 फ़ीट के हाइट पर एक सूराख सा महसूस हुआ… उस ने उस में एक हाथ फंसा कर खुद को ुतःने की कोशिश की… इस का अपना क़द… 6 फ़ीट था… उस का हाथ आखिर उस सूराख में जैम गया और उस ने आहिस्ता आहिस्ता दूसरा हाथ खड़े के किनारे पर रख के अपने आप को ऊपर उठा लिया… पहले एक तंग पहला कर बहार फर्श पर पाऊँ धरा फिर उस ने सीने तक अपने आप को बहार निकलते हुए दुसरे हाथ से बहार एक लोहे की रोड जो ज़मीन में धंसी हुई थी पाकर ली और अपने आप को बहार खेंच लिया…

20 मिनट लग चुके थे उस को और हर तरफ ख़ामोशी थी… वो इन्तेहायी परेशानी में द्क्प के दिमाग़ में पोहंचा तो उसे शदीद ग़ुस्सा आ गया… रघु अपने साथी की मदद से द्क्प को पाकर चुक्का था और इस वक़्त एक कुर्सी पर राशि से बांध कर के सामने खरा ज़ोर से केहक़हे लगा रहा था…

रघु… “अरे भय… आज तो अपने हाथ द्क्प लगी हे… आज तो अपनी मौज हे… अरे पक्रिया… ज़रा बहार देख तो इस के साथ कोई और तो नहे… ये साली अकेले कैसे आ गयी… रघु के पास… हहहहआ…”

गोविन्द समझ गया के “पक्रिया” (रघु का साथी) अभी बहार आने वाला हे… गोविन्द फ़ौरन लपक कर उस हॉल नुमा कमरे के दरवाज़े के पास पोहंचा और जेसे hi पक्रिया उस को नज़र आया उस ने बग़ैर कुछ सोचे समझे पक्रिया पर छलांग लगा दी… उस वक़्त गोविन्द पूरे जोश में था… द्क्प का पकड़े जाना उस को अंदर से मलामत करने लगा था के वो एक औरत की हिफाज़त नहे कर सका…

पक्रिया जो के ऐसे किसी हमले के लिए तैयार नहे था… उस के बोझ टेल दबता चला गया और उस के हाथ में मौजूद पिस्तौल दूर जा गिरा… गोविन्द ने पक्रिया के गिरते hi उस के सीने पर चढ़ बैठा और दो ज़ोरदार घूंसे उस के मुंह पर दे मरे… एक मुक्का जो कनपटी पर लगा शैयद वो पक्रिया के लिए बेहोशी का सबब बना…

गोविन्द ने उस को चोर कर उस का पिस्तौल उठा लिया ुर चेक किया… लोडेड था… और रघु के दिमाग़ में झाँका… वो नशे में धुत अपने आप को मेहफ़ूज़ समझते हुए अपना पिस्तौल साइड वाली टेबल पर रख चुक्का था… और उस के हाथ द्क्प के ऊपर थे… गोविन्द ख़ामोशी से अंदर दाखिल हुआ और धरा… “बस तुम्हारा खेल ख़तम… हाथ ऊपर उठा लो…”

रघु ने पिस्तौल उठाने की कोशिश की तो गोविन्द ने उस के पैरों के क़रीब फायर कर दिया… रघु अपनी जगा पर रुक गया…

गोविन्द ने फिर उस के दिमाग़ में जा कर उस को दूर कर दिया और जब पास पोहंचा द्क्प के तो उस के होश ुर्र गए…

रघु… द्क्प की शर्ट फर चुक्का था और उस के चुके ब्रा के अंदर क़ैद थे और वाइट कलर की ब्रा सामने थी…

बारे दिलकश मंज़र था… कुछ देर के लिए गोविन्द बट की तरह देखता रहा द्क्प के चुके ब्रा में… कैसे हुए…

द्क्प ने भी देख लिया के गोविन्द उस के चुके देख रहा हे बरी दिलचस्पी से…

रघु ने देखा के गोविन्द की तवजा नहे हे तो भागने लगा बहार को…

द्क्प चीखी… “गोविन्द… वो भाग रहा हे…”

गोविन्द स्वचालित अंदाज़ में पलटा और फायर कर दिया रघु की तंग पर मगर गोली ज़रा सा दूर लगी फर्श पर…

रघु दरवाज़े के पास पोहंच चुक्का था…
 
EPISODE – 42

गोविन्द स्वचालित अंदाज़ में पलटा और फायर कर दिया रघु की तंग पर मगर गोली ज़रा सा दूर लगी फर्श पर…

रघु दरवाज़े के पास पोहंच चुक्का था…

फिर से फायर किया गोविन्द ने…

और इस बार रघु की तंग पे गोली लगी तो वो नीचे गिर गया…

गोविन्द अब रस्सी खोलने लग गया द्क्प की और साथ साथ उस के चुके भी देख रहा था…

द्क्प… “क्या देख रहे हो… गोविन्द…”

गोविन्द मुस्कुराने लगा मगर उस ने नज़रें न हटाईं…

द्क्प शरमाते हुए… “बदमाश हो पूरे… पहले खोलो मुझे बाद में देख लेना…”

राशि पूरी खुल चुकी थी…

गोविन्द… “मैडम… बाद में कब…”

द्क्प मुस्कुराते हुए… धीमी आवाज़ में… “शट उप… बदमाश”

और उस ने अपनी शर्ट कुछ ठीक कर ली…

रघु सामने ज़ख़्मी पारा था… और गोविन्द को अब ख्याल आया पक्रिया का… उस ने बहार देखा तो वो होश में आ चुक्का था और उठने की कोशिश कर रहा था…

गोविन्द ने उसे भी आवाज़ लगाई और साथ फायर कर दिया तो वो भी रुक गया और हाथ ऊपर उठा लिए…

गोविन्द और द्क्प ने मिल कर रघु और पक्रिया को राशि से बांध दिया और राशि बढ़ते वक़्त दोनों कई बार एक दुसरे से टकराये और सट्टे और दोनों के बदन आपस में टच हुए… हाथ भी टच हुए… द्क्प मुस्कुराती रही… उस को ाचा लग रहा था…

गोविन्द तो उस के सरे विचार जान प् रहा था तो वो भी मुस्करा रहा था…

गोविन्द ने वह पर परे एक कपड़े को रघु के ज़ख़्म पर बांध दिया टेक खून ज़यादा न बहे…

दोनों को कार की पिछली सीट पर दाल कर गोविन्द और द्क्प भी बेथ गए कार में…

द्क्प… “पहले हॉस्पिटल चलो…”

गोविन्द फ़ौरन रघु से ब्रेन इन्फ्लुएंस करते हुए उस के दुसरे साथी जहा थे वह का एड्रेस ले लिया… द्क्प ने नोट कर लिया…

हॉस्पिटल पोहंच कर गोविन्द ने अपनी शर्ट उतर कर द्क्प को दे दी जो उस ने ले कर अपनी शर्ट के ऊपर hi पहन ली… गोविन्द अब सिर्फ पंत और बनियान में था…

द्क्प ने हॉस्पिटल से अपने ऑफिस कॉल कर के फाॅर्स मंगवा ली और गोविन्द ने घर कॉल कर के बता दिया के वो कुछ देर से आये गए… सब परेशां थे घर पर… उस के फ़ोन आने पर सब को सकूं मिला…

इस दौरान इंस्पेक्टर्स अपनी फाॅर्स के साथ पोहंच चुके थे और द्क्प से कहने लगे वो अकेली क्यों गयी…

द्क्प… “में अकेली कहाँ थी … मर. गोविन्द मेरे साथ थे… हे इस वैरी ब्रेव यंग मन… हे हेल्पेद एंड रेसक्यूएड में…”

एक इंस्पेक्टर अपने साथ रघु और उस के साथी को ले गया पुलिस स्टेशन और दूसरा इंस्पेक्टर अपनी फाॅर्स के साथ चला गया रघु के दुसरे साथिओ के ठिकाने पर उन को पकड़ने…

सब से फ़ारिग़ हो कर गोविन्द… “मैडम… आप की ऑफिस चोर दू या आप की रेजिडेंस…”

द्क्प… “मेरी रेजिडेंस चलो…”

रेजिडेंस पोहंच कर द्क्प… “आओ गोविन्द अंदर आओ… कॉफ़ी पीते हैं साथ में…”

गोविन्द कार पार्क कर के… उस के साथ अंदर आ गया…

द्क्प… “नहे ऐसा करते हे डिनर करते हे…” और अपने कुक से कहा “…जो बनाया हे टेबल पर लगा दो… आज हमारे खास मेहमान ए हैं…” फिर गोविन्द की तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए… “में ज़रा चेंज कर लून… और आप की शर्ट आप को वापिस कर दूँ…”

गोविन्द ने कहा… “मैडम मेरी शर्ट यही उतर कर दे दें”

द्क्प… “अगर आप के सामने उतरी तो आप फिर से मुझे घूरने लग जये गए…”

गोविन्द… “इस में मेरा क्या क़सूर… आप हैं hi इतनी खूबसूरत…”

द्क्प बग़ैर कोई जवाब दिए… मुस्कुराती… अपने कमरे की तरफ चली गयी…

गोविन्द… लाउन्ज में बने कॉमन वाश रूम में चला गया और उस की पंत पे जो मिटटी वग़ैरा लग गयी थी उसे साफ करके हाथ मुंह धो कर बहार आया और वही लाउन्ज में बेथ गया…

आशा बक्शी भी अपने कमरे से बहार आयी… उस ने एक खूबसूरत सी साड़ी पहनी हुई थी… साड़ी एक डैम फिट और जिस्म पर कस्सी हुई लग रही थी… बाल खुले थे हिप्स तक आ रहे थे… होंटो पर हलकी सी लिप स्टिक गुलाबी रंग की, हल्का सा मेक उप, कानो में एअर रिंग्स, ख़ुशी से दमकता चेहरा और हाथ में गोविन्द की शर्ट… बहार चलती हुई ऐसे आयी जैसे झूम रही हो… रक़्स कर रही हो… एक मोरनी की तरह…

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गोविन्द मुंह खोले उस को देखता रह गया और खो सा गया… बस देखता रहा आशा की तरफ… वो बोहत ख़ूबसूरत लग रही थी…

आशा… गोविन्द की हालत देख कर हंसने लगी… उस को बोहत ाचा लगा के गोविन्द उस को इतनी पसन्दीदगी से देख रहा हे…

आशा ने अपने हाथ में जो गोविन्द की शर्ट थी उस को उस की आँखों के सामने लहराते हुए …. हँसते हुए कहा… “क्या हुआ मिस्टर…??”

गोविन्द… “वो वो में में…”

आशा फिर से हंसने लगी…

फिर गोविन्द का ख्याल गया शर्ट की तरफ…. शर्ट कुछ गिल्ली सी लग रही थी…

आशा… “वो मेने इस पे लगी मिटटी साफ कर दी हे तो ज़रा पानी से गीली हो गयी…”

गोविन्द… अपना हाथ आगे किया के शर्ट ले कर पहन ले… “मुझे दी जिए में ऐसे hi पहन लेता हु…”

आशा… “नहे गोविन्द… आप बैठो … में शर्ट को आयरन कर देती हु…”

और वही लाउन्ज में रखे आयरन स्टैंड पे शर्ट रख कर उसे प्रेस करने लगी…

गोविन्द भी वही बेथ गया और उस को प्रेस करते हुए देखने लगा… ऐसा लग रहा था जेसे कोई पत्नी अपने पति की शर्ट प्रेस कर रही हो…

आशा को पता था के गोविन्द उसे पीछे से देख रहा हे…

आशा… “क्या देख रहे हो….”

गोविन्द… “क क क कुछ नहे…”

आशा के दिल में लाडू फूट रहे थे… ये नौजवान जो इतना बहादुर हे … घुँडो से लड़ने वाला और अब इस के मुंह से आवाज़ नहे निकल रही… उस के हुस्न की वजा से…

“और में क्या कर रही हूँ… एक पत्नी की तरह गोविन्द की शर्ट को आयरन कर रही हूँ…” ये सोचते hi वो भी शर्माने लगी…

गोविन्द वाक़ई बोहत प्रभावित था आशा की और… और चाहता था के उस को गले से लगाए, चूमे और प्यार करे…

दोनों hi एक दुसरे के क़रीब आना चाहते थे मगर पहल कोण करे… एक पर्दा था… एक झिझिक थी… इस परदे को कोण उठाये…

कुक लाउन्ज में आया… “मैडम… खाना लगा दिया हे…”

आशा… “ाचा तुम जाओ… हम आते हैं…”

आशा शर्ट को आयरन कर चुकी थी उस ने शर्ट उठाई और उस को अपने कमरे में ले जार कर हेंगर कर दिया…

आशा… “शर्ट अभी हॉट हे… खाना खा कर पहन लेना…”

गोविन्द उठाते हुए… और आशा की आँखों में देखते हुए… “आप भी तो हॉट हो…”

आशा ये सुन कर शर्मा गयी… और बरी खुमार बहरी नज़रों से देखने लगी गोविन्द को… गोविन्द को ऐसा लगा जैसे आज वो बिलकुल घायल हो गया हे…

फिर आशा बरी शरारत से … “खाना भी हॉट हे…”

दोनों हंसने लगे…

और डाइनिंग रूम की तरफ आ कर बेथ गए खाना खाने और एक दुसरे की आँखों में देखते खाना ख़तम किया… इस बीच आशा कॉफ़ी के लिए कह चुकी थी…

दोनों एक दुसरे की दिल की बात समझ रहे थे पर जाने क्यों चुप थे… असल मुड़े पर कोई बात नहे कर रहा था… दोनों की आँखों ने अलबत्ता दिल खोल कर साडी बातें कह डाली थीं…
 
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