Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 6 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

:थैंक्यू: बीआरओ... कहानी को पसंद करने के लिए...

अब किसे कुछ यूँ हे बीआरओ के गोविन्द ने अभी नया नया रोमांस स्टार्ट किया हे और गुप्त अंगो का चस्का भी कुछ नया सा उस के लिए तो अभी हमारा हीरो कुछ कंफ्यूज हे... जेसे hi इस का मन ज़रा भरे गए इस खेल से तो हमें कुछ अंदाज़ा होगा के इस के दिल पे क़ब्ज़ा करने वाली राजकुमारी कोण होगी....

जुड़े रहिये... आप सब का साथ बोहत एहम हे मेरे लिए.... 🙏
 
EPISODE – 43

कुक ने इन्फॉर्म किया के कॉफ़ी स्टडी रूम में लगा दी हे…

आशा ने कुक को कहा के साहिब को स्टडी में बिताहएँ और खुद अपने कमरे की तरफ चली गयी…

गोविन्द स्टडी में जा कर बेथ गया… एक छोटा सा कमरा जिस में एक तरफ बुक्स रैक था और बोहत साडी लिटरेचर की बुक्स थीं… उसी के साथ एक टेबल कुर्सी और कमरे की दूसरी तरफ एक 2 सीटर काउच था…

गरम कॉफ़ी के 2 मग टेबल पर रखे थे…

गोविन्द जा कर बेथ गया काउच पर और उसी वक़्त एंटर हुई… आशा शर्ट हाथ में पकड़े हुए और गोविन्द खरा हो गया ताकि शर्ट लेकर पहन ले और हाथ बढ़ाया आगे…

मगर आशा ने शर्ट उस के हाथ में देने के बजाये शर्ट के बाज़ू को गोविन्द के आगे बढ़े हाथ पर पहना कर, पूरे बाज़ू पर शर्ट का बाज़ू डालते हुए गोविन्द के पीछे चली गयी और शर्ट उस के पीछे कमर पर सीढ़ी करती हुई उस का दूसरा बाज़ू ऊपर उठा कर शर्ट के बाज़ू में दाल दी…

गोविन्द बस बट बना हुआ ये सब देख रहा था… उस के बाद आशा उस के सामने आ गयी और उस की आँखों में देखते हुए शर्ट के बटन बंद करने लगी… आशा के होंटो पर तबस्सुम था, मुस्कराहट थी…

गोविन्द कही खोया हुआ सा था… वो जो लड़की को लपक के पाकर के छोड़ देता था… अभी गम शूम था… कोई बट बना हुआ था… कोई मट्टी का मधु… जीता जगता बेसुध सा…. नशे में धुत…

और फिर आशा ने हद कर दी… और शर्ट को उस की पंत में डालने लगी और बोहत आहिस्ता आहिस्ता से शर्ट को… गोल गोल घूम कर… उस की पंत के अंदर दाल दी…. और फिर उस के सीने पर हाथ से हल्का सा ढाका देते हुए… काउच पर बिठा दिया और कफ का मग उठा कर उस के सामने कर दिया…

गोविन्द ने ख़ामोशी से मग ले लिया…

फिर आशा ने दूसरा मग उठाया और वही काउच पर गोविन्द के साथ बेथ गयी… दोनों एक दुसरे के साथ चिपक गए थे… और कॉफ़ी पीने लगे…

गोविन्द कॉफ़ी पि रहा था फिर भी उस को ऐसा लग रहा था जेसे उस का गाला खुश्क हो गया हो… वो कुछ भी बोल नहे प् रहा था…

आशा… शरारत से भरी खनकती आवाज़ में… “क्या हुआ… गोविन्द, आज सुबह तो इतनी बरी बरी और बोहत साडी बाटे कर रहे थे…”

गोविन्द… अपनी कॉफ़ी का मग टेबल पे रखते हुए… बोलै… “आशा…”

एक तो गोविन्द ने पहली बार उस का नाम लिया था ुर दुसरे ये के उस की आवाज़ में कुछ ऐसा था के आशा की धरकने तेज़ होने लगी और पलके नीचे झुक गयी जेसे धक् रही हो अपनी नज़रो को के कही मेहबूब को नज़र न लग जये…

आशा… मधुर आवाज़ में… “जी…”

गोविन्द… “आप को प्यार कर लून…”

आशा… की धरकने अब बेकाबू थी… “क्यों…”

गोविन्द… “मेरा दिल छह रहा हे… मुझ से अब बर्दाश्त नहे हो रहा…”

आशा… “में भी आप से बोहत सारा प्यार करना चाहती हूँ मगर यहाँ नहे… मेरे मुलाज़िम हे यहाँ पर…”

गोविन्द… “फिर कब और कहाँ…”

आशा… “में कल बताऊँ गई… थोड़ा सबर करो…”

गोविन्द ने फिर अपना बाज़ू उस के गिर्द कर के उस को अपने क़रीब कर लिया…

आशा… सिसकते हुए… “उफ़… गोविन्द अभी मत चेरो मुझे… प्लस… मेरी खातिर…”

गोविन्द समझते हुए उस की मजबूरी को… खरा हुआ और उस के गाल पर चम्मा देते हुए बहार निकल गया… “कल मिले गए…”

आशा वही काउच पर बैठी रही और फिर उस के जाने के बाद फूट फूट कर रोने लगी….

गोविन्द भी बहार आ कर अपनी कार में बैठा और अपने घर की तरफ रुख किया….

आशा को ज़िन्दगी में कभी इतना बारे दुःख, इतना बारे रंज, नहे हुआ था के जिस के प्यार में वो जल रही थी उस को ज़रा सा भी प्यार न कर सकीय सिर्फ इस लिए के वो एक द्क्प हे… उस को खौफ हे के किसी ने देख लिया तो उस की बदनामी हो जये गई… एक द्क्प को अपना वक़ार बुलंद रखना था… अपनी भावनाओ और जज़्बात को मरते हुए… वो ये क़ुरबानी दे तो गयी मगर आँखों पर काबू न रख सकीय और आंसू थम नहे रहे थे… फिर उससे ख्याल आया के कुक अभी कॉफ़ी के मग लेने ए गए तो उस ने अपने आप को संभाला और स्टडी रूम से निकलते हुए कुक को आवाज़ लगाई के मग उठा ले और खुद अपने कमरे में जा कर दरवाज़ा बंद कर दिया… फिर से जलने लगी… तड़पने लगी… “गोविन्द… मेरे मेहबूब मुझ से नाराज़ न होना… में भी तुम्हें जी भर कर प्यार करना चाहती हु… क्या करू … मजबूर हु… एक द्क्प हूँ इस शहर की… मुझे इस द्क्प की पोस्ट की लाज रखनी हे… मुझे माफ़ कर देना मेरे मेहबूब… में पूरी की पूरी तुम्हारी हु… दिल भी तुम्हारा और जान भी तुम्हारी हे…

आशा सोने की कोशिश करने लगी… मगर नींद आज उस के नसीब में नहे थी… आज मेहबूब के इतने पास आ कर प्यार भी नसीब में नहे था…

गोविन्द जब आशा के पास से निकला था तो कुछ मलाल सा था दिल में मगर जब उस ने आशा के दिमाग़ में जा कर उस की सोच को पढ़ा तो वो समझ गया के आशा हक़ पर थी… उन का प्यार या फिर सेक्स करना ठीक नहे था आशा की पुलिस रेजिडेंस में… हर तरफ शहर में अफ़साने बन जाते… उस की इज़्ज़त को ढाबा लग सकता था…

वो घर पोहंचा तो सब अपने अपने कमरे में जा चुके थे…

वो भी अपने कमरे में आया और कपड़े चेंज कर के बीएड पर लेट गया…

उस को जिस्म में हल्का सा दर्द भी था… वो कोई इतनी लड़ाई मार्कुटई का आदि नहे था… उस ने ये फैसला लिया के जो पहलवान विक्रम के शोरूम में मिले थे उन की अकादमी ज्वाइन करे गए… अपने जिस्म को मज़बूत करने के लिए… फिर उस ने सब के दिमाग़ में जा कर चेक किया… सब ठीक था… ेषणा, सीमा के कमरे में सो रही थी… दोनों आपस में अछि दोस्त बन चुकी थी… पुराने गोदाम और ऑफिस का काम भी काफी स्पीड में आगे बढ़ा था … और साथ साथ प्लाट पर भी नया गोदाम और घर की काफी कंस्ट्रक्शन हो चुकी थी… दोनों दिदिया भी खुश थी…

मैनेजर और उस के साथी सुपरविसोर्स की सोच ये थी के चाहे पुराण गोदाम रिपेयर और रेनोवेट हो भी जये और नया गोदाम बन भी जये तो मंडी में सौदे तो मुंशी और उन की मर्ज़ी के होने हैं तो लाला जी के हाथ कुछ आना हे नहे… बस इतना था के सुपरविसोर्स ये ज़रूर सोच रहे थे के उन को नौकरी चोरनी नहे चाहिए थी… क्यों के उन को अछि खासी पाय और वो भी बिना किसी काम के मिल रही थी… और साथ ऊपर से हराम के पैसे भी मिल जाते थे हिसाब किताब में गर बार कर के… गोविन्द के दिमाग़ में ख्याल आया के इन कमीने सुपरविसोर्स ने भी तो लाला जी का मॉल लूटा हे तो मज़ीद कुरेदने लगा सुपरविसोर्स का दिमाग़ तो पता चला के दोनों अब तक 50 – 50 लाख का मॉल खा चुके थे… जिस से उन लोगो ने अपना घर और मोटरसाइकिल लिया था और साथ में पार्टनरशिप में 4 शॉप्स मार्किट में परचेस की थी 20 लाख की… जो के अब 50 लाख की हो चुकी थी…. गोविन्द उन के घर को चेरना नहे छठा था बस उन के ज़ेहन में ये डाला के वो 4 शॉप्स 50 लाख में बेच दें गए जल्द से जल्द… उस के बाद गोविन्द ने सुपरविसोर्स के दिमाग़ में ये भी दाल दिया के मैनेजर ने उन की नौकरी ख़तम कर व कर खुद मज़े से नौकरी कर रहा हे… गोविन्द का प्लान था के इन लोगो को डिवाइड किया जये और इन के दरमियान फूट परे टेक ये कमज़ोर हो कर मज़ीद साज़िश न करे लाला जी के खिलाफ…

सुबह कॉलेज जाना था 9 बजे… तो इस लिए वो सोने लगा…

सुबह वो 8 बजे उठा… जब माँ उस के कमरे में आयी… उस को देखने… तो उस की आँख खुल गयी… माँ ने उस को प्यार किया और कहा के उठ जये नाश्ता तैयार हे… गोविन्द फ़ौरन रेडी हुआ 20 मिनट के अंदर और नयी पंत और शर्ट निकली और नए शूज भी जो सीमा लेई थी उस के लिए…

बहार आया तो देखा के पापा, माँ, माँ, बापू और प्रकाश नास्ता कर चुके थे… बापू और प्रकाश जा चुके थे प्लाट पर… और सीमा और ेषणा भी उसी वक़्त उठ कर आ चुकी थी… सीमा ने यूनिवर्सिटी जाना था… सब नाश्ता करने लगे…

ेषणा… “में सारा दिन क्या करूँ गई… स्कूल भी नहे हे…”

गोविन्द… “बस में एक आध दिन में तुम्हारा स्कूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट मंगवा लेता हु… मेरे कॉलेज के पास जो स्कूल हे वह तुम्हारी एडमिशन के लिए में बात कर लूँ गए…”

वो और सीमा बहार ए तो सीमे ने उस को कहा… “आज आइस क्रीम खिलने ले चलो गए…”

सीमा की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए… “आज कुछ काम हे पुलिस स्टेशन जाना हे… एक दो दिन ठहर जाओ… ये पुलिस वालो के कुछ मामले निमत जये पहिर चले गए…”

सीमा ने कहा… “ok…” और ड्राइवर के साथ यूनिवर्सिटी के लिए निकल गयी…

उस ने मुर कर देखा तो ेषणा वह लाउन्ज के दरवाज़े पर खरी मुस्कुरा रही थी…

गोविन्द भी उस को देख कर मुस्कुरा दिया और हाथ हिलाते हुए अपनी कार में कॉलेज के लिए निकला और साथ में ेषणा के दिमाग़ में पोहंचा तो…
 
EPISODE – 44

गोविन्द कॉलेज के लिए अपनी कार में बैठते हुए ेषणा के दिमाग़ में पोहंचा तो…

ेषणा की सोच… “सीमा भी भाई को पसंद करती हे… रत को भी भाई की hi बाटे करती रही और जब भी कोई बात पूछती गाँव की तो घूम फिर कर ज़िकर ले आती भाई का… पता नहे भाई भी सीमा को पसंद करते हे या नहे… किरण को भी मिल कर नहीं आयी… मिले गई तो गलियां दे गई… पता नहे भाई उस को कब छोड़ें गए… भाई भी न… सब को बेवक़ूफ़ बना रहे हे… मुझ से ज़यादा बात भी नहे कर रहे… न वक़्त दे रहे हे… शहर आ कर बदल गए हे… पता नहे सीमा को छोड़ा हे या नहे…” और फिर किरण की वो वाली बात यद् करने लगी के गोविन्द के और लड़कियों के साथ भी चाकर हों गए…

गोविन्द मुस्कुराने लगा “बरी तेज़ हे ेषु… मेरी जान… में तुझ से जल्द मिलूं गए… क्या करूँ इतने सरे बखेरे हे…”

ेषु बोहत प्यारी थी उसे… उस को दुखी नहे देख सकता था…

कॉलेज आ कर गोविन्द अपनी क्लासेज में बिजी हो गया… उधर द्क्प, आशा बक्शी, रघु के हवाले से बिजी हो गयी… रघु के अरेस्ट की इनफार्मेशन रत को hi भिजवा दी गयी थी… हेडक्वार्टर्स को…

द्क्प और उस की साडी टीम को ढेर साडी अप्प्रेसिअशन मिली थी… आगे इन्वेस्टीगेशन होनी थी के रघु का यहाँ फैसिलिटेटर कोण हे और किस मक़सद के लिए उन्हों ने आग लगाई… वो सोच रही थी के असल हीरो जो के गोविन्द था उस के बारे में तो कोई जनता नहे था और ये के असल अप्प्रेसिअशन का हक़दार तो गोविन्द था…

द्क्प 12 बजे तक बिजी रही साडी फॉर्मलिटीज और क़ानूनी करवाई के हवाले से और फिर 1 बजे प्रेस कांफ्रेंस भी हुई… प्रेस को बारे अचे से डील किया और उस की काफी अप्प्रेसिअशन वह भी हुई… वो बोहत खुश थी… और सोच रही थी के कैसे राब्ता करे… गोविन्द से…

ज़ाहिर हे के वो नहे जानती थी के गोविन्द उस के दिमाग़ में 3 – 4 बार आ कर चेक कर चुक्का हे और इंतज़ार कर रहा हे के वो कब फ़ारिग़ होती हे… गोविन्द की क्लासेज भी 1 बजे तक थी… गोविन्द चेक कर चुक्का था… हर तरफ सकूं था… बस लाला जी के ऑफिस में सेठ गिरधारी लाल खुद ए थे अपने दोनों बेटो के साथ (गोविन्द के दोनों जीजा…) सेठ गिरधारी लाल ने उन को गोविन्द की बहादुरी के बारे में बताया… लाला जी को गोविन्द पहले hi मना कर चुक्का था के फ़िलहाल वो सेठ गिरधारी से कोई बात नहे करे गए… तो लाला जी ने भी बस रस्मी बातें की सेठ और उन के बेटो से और उन को यक़ीन दिलाया के गोविन्द को ज़रूर भेजे गए सेठ के घर… मिलने के लिए और खाने वग़ैरा के लिए…

आशा 2 बजे तक फ़ारिग़ हुई सरे कामो से और मज़ीद काम के लिए उस ने अपने इंस्पेक्टर्स को इंस्ट्रक्शंस दे दी थी और कुछ थकावट महसूस कर रही थी तो सोचा के रेजिडेंस जा कर एक घंटा सो जये… रत को भी नींद पूरी नहे हुई थी…

उस ने अपनी प् को फ़ोन कर के कहा के वो थोड़ा सा आराम करने जा रही हे रेजिडेंस पर … गारी लगवा दे और 1-2 घंटे तक वापिस आ जये गई ऑफिस…

आशा अपनी रेजिडेंस पोहंच कर चेंज कर के बीएड पर लेती hi थी… के… उस के कमरे का इण्टरकॉम बजा… बहार गेट से चेक पोस्ट से ड्यूटी अफसर ने बताया के एक ऑटो पर एक खतून हे जो बुर्क़े में हे और कह रही के द्क्प की माँ की पुराणी सहेली हे और इस वक़्त मुश्किल में हे और उन से मिलना चाहती हे….

द्क्प पहले तो सोचने लगी कोण हे मगर माँ की सहेली का सोचा तो कहा फ़ौरन अंदर भेजो… उस ने एक स्लीवलेस t-shirt और पजामा पहन लिया था पहले hi तो इस लिए एक शाल ले कर लाउन्ज में आयी तो देखा के एक चोरे और भरे जिस्म की औरत बुर्क़े में भेटि हे…

आशा… “जी फरमाइए…. आप कोण हे और क्यों मिलना चाहती हे मुझ से…??”

खातून जिस के जिस्म पर पूरा बुर्का और चेहरे पर नक़ाब था… बोली… “बीटा में आप की माँ की सहेली हु कुछ प्राइवेट बात करनी हे अगर इजाज़त हो तो आप के कमरे में चल कर कहु… मेरी इज़्ज़त का सवाल हे…”

आशा उस की बात सुन कर कुछ फैसला नहे कर प् रही थी… एक तो आवाज़ कुछ भरी सी थी खातून की और दुसरे ये के वो अपना नक़ाब क्यों नहे हटा रही… मगर फिर आशा ने सोचा के बात सुनने में क्या हर्ज हे… शायद ये खातून वाक़ई किसी मुश्किल में हो…

और उस को कहा “आइये…”

खतून के साथ वो अपने कमरे में आइये तो खातून ने अपना नक़ाब हटते हुए कहा के… “आशा जी शोर नहे करना…”

नक़ाब हट्टे hi गोविन्द का चेहरा दिखा और आशा साडी बात समझ गयी…

आशा अब रिलैक्स हुई और मुस्कुराने लगी…

“ये क्या तरीका हे… द्क्प की रेजिडेंस में घुसने का… बालों पुलिस को तुम्हे अरेस्ट करने के लिए…”

गोविन्द… “मैडम में अरेस्ट तो हो चुक्का हूँ पहले से… अप्प की ज़ुल्फ़ों की ज़ंजीर ने मुझे अपना क़ैदी बना लिया हे…”

आशा हंसने लगी और हँसते हुए गोविन्द के गले लग गयी… “किसी को शक तो नहे हुआ था न…??”

गोविन्द… “अगर शक होता तो अंदर आने देते क्या…??”

आशा ये तो नहे जानती थी के गोविन्द ने अंदर आने के लिए सब के दिमाग़ को इन्फ्लुएंस भी किया हे…

आशा… “स्वांग ाचा रचा लेते हो… पूरे मर्द तो हो ना… कही अंदर से औरत तो नहे हो…”

गोविन्द ने ये सुनते hi उस का हाथ पाकर कर अपने तन्ने हुए लुंड पर रख दिया…

रेशमी शलवार औरत की और अंदर सख्त कुंड… आशा को बारे रोमांचक लगा… उस ने लुंड को महसूस किया मगर हाथ फ़ौरन हटा लिया… ये उस का पहला अनुभव था मर्द के जिस्म का और वो अंदर से अभी भी शर्मा रही थी…

गोविन्द ने आशा के दिमाग़ को गाइड किया तो वो एक मिनट में आने का कह कर बहार चली गयी…

आशा… बहार आ कर अपने गार्ड्स और कुक को बताया …”आंटी एक पर्दा दर खातून हे और वो अब लाउन्ज में भी न ाएँ और जो बात करनी हो इण्टरकॉम पे कर लें…” इस तरह आशा को ये इत्मीनान था के कोई बैडरूम की तरफ तो चोरो लाउन्ज में भी नहे ए गए…

गोविन्द भी गार्ड्स और कुक के दिमाग़ में जा कर चेक कर चुक्का था के किसी को कोई शक नहे हे और कोई इस तरफ उस वक़्त तक नहे ए गए जब तक द्क्प खुद इजाज़त नहे देती…

आशा बैडरूम में वापिस आइये तो देखा के गोविन्द बीएड पर चादर ले कर लेता हुआ हे… और चेयर पर औरतो वाली रेशमी क़मीज़ शलवार बुर्का और ब्रा और दो बारे ोरांगेस रखे हे… वो शर्मा गयी… लाल हो गया उस का चेहरा…

आशा… “बेशरम… ये सब क्या हे…”

गोविन्द… “वह कुछ नहे हे असल चीज़ तो चद्दर के नीचे हे…” गोविन्द ने अपने लुंड पे हाथ फेरते हुए कहा…

“पक्के बदमाश हो तुम… क्या करना चाहते हो…”

गोविन्द… “मेरी जान बस अब देर न करो… दरवाज़े को लॉक करो और अपने कपड़े उतर कर मेरे पास आजाओ…”

आशा… अभी तक नज़रे झुकी हुई थी… अंदर से वो शर्म से पानी पानी हो रही थी… बरी मुश्किल से बोल पैई… “ये कोनसा प्यार हे… नंगे हो कर करने वाला प्यार तो नहे करना था…”

गोविन्द… “ाचा तुम क्या समझ रही थी के तन्हाइये में लूडो खेलना हे क्या…”

आशा मुस्कुराने लगी… और समझ गयी के अब उस का बचना मुश्किल हे… ये ज़ालिम इस को अब चोरे गए नहे… वो देख रही थी के चादर लुंड वाली जगा से ऊपर को उठी हुई हे… और सोच रही थी के इस का कितना बारे होगा… उस ने दरवाज़ लॉक किया…

आशा बीएड पर उस के पास लेटते हुए… “में कोई कपड़े नहे उतार रही… ऐसे hi जो प्यार करना हे कर लो…”

गोविन्द… “ाचा यार… चादर के अंदर तो आ जाओ…”

आशा… “नहे… तुम नंगे हो चादर के अंदर…”

फिर बोली… “क्या पूरे नंगे हो… अंडरवियर भी उतर दिया हे…???” शर्मीली मुस्कराहट के साथ…

गोविन्द ने कोई जवाब न दिया बस उस का हाथ पाकर कर चादर के अंदर ले गया और अपने लुंड पर रख दिया…

सख्त लोहे जैसे लोड का स्पर्श पते hi आशा ने आँखें बंद कर लीं और सिसकी निकली उस के मुंह से… ाः…

मगर अपना हाथ हटाया नहे वह से…
 
EPISODE – 45

आशा… धीमी आवाज़ में… “क्या करो गए…?? में ने कभी क्या नहे…”

आशा… जवाब का इंतज़ार किये बग़ैर… खुद hi सवाल और खुद hi जवाब देते हुए… “में वो नहे करूँ गई… तुम मेरे पति थोड़ी न हो…”

गोविन्द को भी मज़ा आ रहा था इस प्यारी और मीठी बात चीत में… “रत को एक पत्नी की तरह शर्ट को आयरन क्यों कर रही थी..”

आशा… अब आँखें खोलते हुए मगर नज़रे अभी भी नीचे हे और लबो पे तबस्सुम हे… “आयरन करने तक ठीक हे… और भी कपड़े हे तो दो वो भी कर देती हूँ आयरन मगर कपड़े नहे उतरूं गई…”

गोविन्द… “ठीक हे तुम मत उतरना … कपड़े में उतर दूँ गए तुम्हारे…”

आशा… “कपड़ों के ऊपर ऊपर से प्यार कर लो न…”

गोविन्द… “ाचा ठीक हे जेसे तुम कहो गई वैसे hi करें गए…”

और फिर गोविन्द ने करवट लेते हुए चादर हटा कर खुद आशा के क़रीब हो गया…

आशा की नज़र अब सीधे लुंड पर गयी… सांप की तरह पहन काढ़े हुए… जेसे कला नाग…

आशा… “ये ये इतना बारे… और… मोटा कितना हे… उफ़ ये तो पोर्न वाला हे…”

गोविन्द… “पोर्न देखती हो क्या…”

आशा… “35 साल की हो गयी हु … शादी की नहे… कभी सेक्स भी नहे किया तो ज़ाहिर हे पोर्न देख कर hi खुद को संतुष्ट करती हूँ… क्या करूँ मजबूरी हे…”

गोविन्द… “ऊँगली करती हो अंदर…”

आशा… “नहे… अंदर कभी ऊँगली नहे डाली… सिर्फ ऊपर से रगरती हु…”

गोविन्द… “कोई और चीज़ भी कभी अंदर नहीं डाली…??”

आशा… “किसी बेतुकी बात हे… जब ऊँगली hi नहीं डाली तो कुछ और कैसे दालु गई…”

फिर आशा चीरते हुए…

आशा… “और ये तो बताओ और चीज़ से क्या मतलब हे तुम्हारा… और क्या दालु गई…?”

अब थोड़ा थोड़ा खुल रही थी और माथे पर बल भी आ रहे थे…

गोविन्द… अपने आप को सीरियस करते हुए… “मेरा मतलब हे के कोई सब्ज़ी बेंगन या खीरा…”

आशा… “की… कितने गंदे हो तुम… कोई सब्ज़ी खाने की चीज़े अंदर डालता हे क्या…”

गोविन्द ने अब झुक कर उस के माथे को चूम लिया तो वो फिर से शर्माने लगी और मुस्कुराने लगी…

गोविन्द सोच रहा था … “ये देखने में कितनी सख्त करक लगती हे द्क्प के रूप में और अंदर से नरम और नाज़ुक सी लड़की हे… जिस ने अपने मन में जाने कैसे कैसे अरमान और सपने छुपाये हुए हे…”

और फिर झुका और होल से अपने लबो से आशा के लैब छुए… चूमा नहे सिर्फ छुआ… और लैब वही रहने दिए…

आशा किसी रोबोट की तरह आँखें बंद करते हुए… अपने होंठ खोल के गोविन्द के होंटो को चूमने लगी और फिर अचानक से उस के ऊपर आ गयी…

और दोनों हाथो से गोविन्द का चेहरा पाकर कर ज़ोर ज़ोर से होंठ चूसने लगी.. उस की गांड गोविन्द के लुंड के ऊपर पेट पर थी और दोनों टंगे खोल के गोविन्द की दोनों जानिब की हुई थीं…

गोविन्द भी उस की किश का भरपूर जवाब देते हुए एक हाथ उस की गांड पे रख दिया और दुसरे हाथ से उस की कमर पर ब्रा वाली जगा सहलाने लगा…

पजामा बोहत hi महीन कपड़े का था गोल गोल गांड पर हाथ ऐसे लग रहा था के जेसे बीच में कपड़े की कोई खास रुकावट नहे हे… और हाथ बरी आसानी से गांड की दोनों फैंको के दरमियान चला गया और छेद पर घिसने लगा…

आशा की सिसकी कुछ बढ़ी… एक लम्हे को उस ने होंठ हटाए और फिर से चूसने लगी होंटो को…

गोविन्द ने अब आशा की गांड को पीछे की तरफ सरकते हुए अपने लुंड को उस की गांड के नीचे दबा दिया… उस के ऐसा करते hi आशा ने खुद से अपनी गांड के छेद और छूट की जगा को घिसना शुरू कर दिया लुंड पर… फिर होंठ चोर दिए उस ने…

आशा की आँखें बंद और लैब खुले और सर पीछे को और ज़ोर ज़ोर से घिसे जा रही हे गांड छूट वाली जगा को लुंड पर…

जैसे होश खो बैठी हो… अब वो बस सीढ़ी बैठी हुई लुंड के ऊपर छूट और गांड को रैगर रही थी ज़ोर ज़ोर से…

गोविन्द ने दोनों हाथ कमर की तरफ से उस की शर्ट में दाल दिए और एक जहटके में उस की ब्रा का हुक खोल दिया…

आशा ने आँखें खोल कर उस की आँखों में देखा मगर रुकी नहे और अपनी गांड छूट की जगा को घिसती रही लुंड पर… अब छूट वाली जगा से गीला पैन साफ लग रहा था गोविन्द को…

छूट अब पानी चोरे जा रही थी और सिसकियाँ निकलने लगी थी मुंह से… लुंड अब गीला हो गया था छूट के रास से…

आह… आह… अम्मा.. ममम… ooommm…mmmoo…aah… आह

सिसकियों के साथ रफ़्तार भी बढ़ गयी आशा की….

10 मीठे तक आशा ऐसे hi करती रही… जेसे hi झरि… उस का जिस्म झटके कहने लगा… गोविन्द जेसे मुन्तज़िर था इस घरी का उस ने कास के आशा को अपने सीने से लगा लिया… और उस की गर्दन को चूमने चाटने लगा…. और पीछे से उस के हाथ जो ब्रा को खोल चुके थे… उस के अंगूठे पीछे से आगे की तरफ आ कर आशा के चुचो की साइड को सहलाने लगे…

आशा फ़ारिग़ हो चुकी थी और अब उस ने सकूं से अपना सर रख दिया गोविन्द के कंधे पर…

और आहिस्ता से बोली… “मुझे वाशरूम जाने दो… वाश करना हे…”

गोविन्द… “दोनों साथ चलते हे…”

आशा… “नंगे…? नहे मुझे शर्म आती हे…”

गोविन्द ने उस को अपनी गॉड में उठा लिया और ले कर वाशरूम में आ गया… आशा मना करती रही मगर एक न सुनी गोविन्द ने…

वाशरूम के अंदर ला कर उस ने आशा की शर्ट और पजामा फ़ौरन से उतर दिया… वो कुछ न बोली न रोका…

ब्रा भी हटा दी… आबो वो पूरी नंगी थी… और उस को उठा कर बिठा दिया कमोड के ऊपर…

आशा… नीचे नज़रें… “तुम बहार जाओ… मुझे सुसु करना हे…”

गोविन्द… “मेरे सामने करो…” आशा घूरने लगी गोविन्द को…

गोविन्द ने आशा का हाथ पाकर कर फिर से अपने लुंड पर रख लिया…

आशा अब कुछ और न बोली और ज़ोर ज़ोर से लुंड पे हाथ आगे पीछे करने लगी और साथ साथ सुर्र्र्र… सुर्र… सुर्र… की आवाज़ आने लगी जिस से पता चला के वो गोविन्द के सामने hi पेशाब करने लगी हे… और फिर उस का चेहरा झुक गया था… वो शर्मा रही थी… हाथ से मुठिए रही थी लुंड को और पेशाब कर रही थी…

पेशाब करने के बाद उस ने लुंड पर से हाथ हटते हुए… “गंदे… बेशरम… मुझे भी बेसहराम बना दिया… हटो यहाँ से… अब तो बहार जाओ…”

मगर गोविन्द वही खरा रह… और अपने लुंड को हिलने लगा…

यह देख कर वो शर्मीली मुस्कराहट से बोली… “ढीट हो बारे…”

और पानी से अपनी छूट धोने लगी… “मत देखो इधर … गंदे… बेशरम…”

छूट धोने के बाद वो उठी और बेसिन के पास आ कर हाथ धोने लगी… गोविन्द उस के पीछे खरा हो कर उस की गांड में लुंड दबा दिया ुर हाथों से चुके दबाने लगा और किश करने लगा गर्दन पर और चाटने काटने लगा कानो पर…

“हाथ तो धोने दो…. Aah…aaah… कमरे में तो जाने दो… आह… हम्म्म… चोरो न…. नहे कर…. Mmmm…aaah…”

गोविन्द उस के कानो को चूसते हुए… “केसा लग रहा हे द्क्प…”

“द्क्प क्यों बोल रहे हो… नाम लो ना…” आशा तनक कर बोली…

गोविन्द… “रत को अगर में न आता तो रघु तुम्हारे साथ क्या करता द्क्प….???”

आशा… “आह… आह… तो मेरी जान बचने की क़ीमत वसूल कर रहे हो… और अब इज़्ज़त तो तुम भी लूट रहे हो जो तुम ने रघु से बचाई थी…”

गोविन्द… “में तो तुम से प्यार करता हूँ… अगर नहे चाहती तो में चला जाता हु”

यह के कर गोविन्द… वाश रूम से बहार निकलने लगा…
 
EPISODE – 46

आशा एक दम उस की तरफ जेसे लपक पारी और उस को अपनी बांहो में भर कर रोने लगी… में तो मज़ाक़ कर रही थी…

आशा… “गोविन्द… न जाओ मुझे चोर कर… ी ऍम सॉरी… ी ऍम सॉरी… अगर मेरी बात बुरी लगी… माफ़ कार्डो मेरी जान… ”

और वही खरे खरे गोविन्द को चूमने लगी सरे बदन पर… होंटो पर… आँखों पर…

गोविन्द… “रिलैक्स… रिलैक्स… में भी जा थोड़ी रहा था ऐसे hi मज़ाक़ कर रहा था…”

मगर आशा जेसे कुछ सुन hi न रहो …“बोहत बुरी हूँ में… में ने अपनी जान का दिल दुख दिया… माफ़ कार्डो मेरी जान”

और चूमते चूमते… उस के नाभि को चाटने लगी… नाभि में ज़बान दाल कर अंदर बहार करने लगी… गोविन्द ने पीछे बेसिन की स्लैब का सहारा ले लिया… उस का लुंड अब झटके खाने लगा था…

आशा… “ओह्ह्ह्ह… ये देखो कैसे उतावला हो रहा हे…”

और ये कहते कहते… लुंड को हाथ में लेकर पहले उस को चूमा और फिर पूरा मुंह खोल कर चूसने लगी…

छप… कक्कछप्प… ccchpp..ccchppp… सच्चप्पप… क्छपपप… क्या ज़बरदस्त छुपे मर रही थी… गोविन्द को यक़ीन नहे हो रहा था के ये वही आशा हे… शर्मीली जो के न… न… कर रही थी और अब द्क्प बानी हुई हे … पुलिस कमांडो… पूरा एक्शन कर रही हे…

काफी देर तक चूसने के बाद… गोविन्द का हाथ पाकर कर बीएड पर ले गयी… और खुद लेट कर गोविन्द को अपने ऊपर खेंच लिया… “मेरी जान में बोहत प्यासी हूँ… मुझे प्यार करो… जेसे एक पति अपनी पत्नी से करता हे…”

गोविन्द उस के सामने खरा हो गया… वो भी ननगा था और आशा भी पूरी नंगी सामने लेती हुई थी… मुस्कुरा रही थी… गोविन्द की नज़र होंटो से नीचे गयी… पुर शबाब चुके… गोलाई के आकर में… उन पे छोटे छोटे से मोती के दाने …. गुलाबी रंग के निप्पल… सपाट पेट… एक्ससरसीज़े जो रोज़ करती थी आशा… जिस के कारन पेट बिलकुल था hi नहे… पेट के बीच गोल छोटा सूराख … कामुक… नाभि…. और नीचे टैंगो के दरमियान एक टीकों बनती जगा… बोहत हलके बल न होने के बराबर… जैसे गोविन्द ने छूट की तरफ देखा… आशा ने मुस्कुराते हुए अपनी टंगे खोल दी… वह क्या रोमांचक छूट थी… होंठ पूरे बंद… साफ पता लग रहा था के काली अभी खिल कर फूल नहीं बानी…. छूट के बिलकुल ऊपर एक दाना सा उभरा हुआ… छूट का दाना….

गोविन्द ने फिर ऊपर चेहरे की तरफ देखा के जज़्बात की शिदत से होंठ लरज़ रहे थे और फिर छूट की तरफ देखा तो छूट के लैब आपस में मिले हुए गीले… खुल और बंद हो रहे थे… क्या आकर्षिक मंज़र था…

गोविन्द उस के चेहरे पर झुक कर उस के होंटो को चूमने लगा… गोविन्द की ज़बान पाकर ली आशा ने और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी… अब वो पूरी मस्त हो चुकी थी… गोविन्द उस के चुके दबाने लगा… आशा की मस्ती बढ़ने लगी… गोविन्द के बालो को पाकर कर उस के होंटो को अपने मुंह में दबाने लगी… वो भी अब फुल जोश से उस के चुके दबा रहा था… फिर कोई 5 मिनट बाद उस ने गोविन्द को छोरा…

गोविन्द अब उस के चुचो को मुंह में लेकर चूसने लगा… उस की सिसकियाँ तेज़ होने लगी…. आह्हः… आअह्ह्ह… ाःह… आह्हः… आह्हः… आठ… आठ… एक हाथ गोविन्द ने उस की छूट पर रख कर रगड़ने लगा… वो फुल मस्ती में… आअह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्हह… आह्हः… आह्हः… आह्हः… आह्ह्ह्हह्ह… करती रही…

कोई 10 दस मिनट उस के चुके चूसने क बाद… गोविन्द उठा और लुंड उस के होंटो पर रखा… उस ने मुंह खोल कर लुंड ले लिया मुंह में…

गोविन्द ने आशा का एक हाथ पाकर कर अपने लुंड पर रखा फिर आशा ने खुद दूसरा हाथ लुंड पर रख कर दोनों हाथो की मुठी बना कर मसलना शुरू कर दिया और साथ साथ मुंह में लेकर चूसने लगी… लुंड पर दो तरह का दबाओ पर रहा था… मुंह की नरमी और मुठी की सख्ती…

गोविन्द उस की छूट पर झुका और छूट को चूसने लगा… आशा की मस्ती बदलने लगी पागल पैन में…

कोई 5 मिनट तक उस की छूट को चूसा गोविन्द ने… और दाने पे प्यार से ज़बान फेरने लगा…

आशा ने लुंड चोर दिया और ज़ोर ज़ोर से सिसकने लगी…

आअह्ह्ह्ह… आअह्ह्ह्ह… आअह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह… आठ… आठ… आठ… आह्हः… आठ… मममम….

गोविन्द ने घूम कर देखा आशा की तरफ जिस की आँखे बंद थी… वो उस की टैंगो क बीच में आगया और लुंड को आशा की छूट पर रगड़ना शुरू कर दिया… उस की छूट पानी पानी हो रही थी… लुंड भी चिकना होगया था

सिसकियाँ गूँज रही थी कमरे में… आह्ह्ह्हह… आह्ह्ह्हह… आह्ह्ह्हह.. अब ड़ालड़ूऊऊ जणू…. आअह्हह्ह्ह्हह… Aahh..aahhh…

गोविन्द ने लुंड उस की छूट के मोहने पर सेट किये और एक झटका मारा… लुंड की टोपी अंदर चली गयी और वो आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह aaahhhhhhhhhh aahhhhhhhhhhhh आह्ह्हह्ह्ह्ह करने लगी…

2 मिनट रुक कर गोविन्द उस के चुके चूसता रहा फिर एक और झटका मारा… ये झटका ज़ोरदार साबित हुआ और लुंड उस की छूट को चीरता हुआ… उस की सील को तोरता हुआ… आधे से ज़ियादा उस की छूट में चला गया और वो अपना सर पटकने लगी इधर उदार और aaaaaahhhhhhhhhhhhhh aahhhhhhhhhhhhhhhhhh आह्ह्ह्हह्ह्ह्हह माआ mmmmmmiiiiiiiiiii मर gaiiiiiiiiiiiii ममम… उसी वक़्त गोविन्द आशा के दिमाग़ में जा कर उस को ज़रा शांत किया… और हेल्प की दर्द का अहसास काम करने में… गोविन्द रुका और उस के होंटो को चूसने लगा.. उस की आवाज़ अब गोविन्द के मुंह में डाब रही थी… और साथ hi वो उस के दिमाग़ में जाकर उस का दर्द काम करता रहा…

फिर भी आशा की आँखों से ांसो निकल रहे थे…

गोविन्द उस के होंटो को चूसता रहा… फिर वो थोड़ी नार्मल हुई… तो उस ने एक और झटका मरडिया… लुंड सीधा छूट को पूरा चीरता हुआ बचे दानी से जा लगा और वो अपना मुंह इधर उधर मरने लगी और aaaahhhhhhhhhh aahhhhhhhhhhhhh aahhhhhhhhhhhhhhhh निकाआलल्लूऊओ बहहहहाआररररर aahhhhhhhhhhhhhhhhh ोीीी ammmmiiiiiiiiiiiii करने लगी…

गोविन्द अब उस के चुचो को पाकर के दोनों हाथो से दबाने लगा और चूसने लगा निप्पल… और साथ साथ उस के दिमाग़ को शांत करता रहा…

आहिस्ता आहिस्ता उस की सिसकिया कम होने लगी…

5 मिनट बाद उस का झटपटाना कुछ काम हुआ और उस ने आँखे थोड़ी सी खोली और गोविन्द की तरफ ग़ुस्से से देखने लगी… जेसे के कह रही हो.. कितना दर्द दिया हे तुम ने ज़ालिम…

गोविन्द ने मुस्कुराते हुए अपने होंठ रख दिए आशा के होंटो पर… अब आशा ने अपने होंठ खोल लिए और गोविन्द के होंटो को चूसने लगी… और थोड़ी देर बाद उस ने अपनी गांड हिलनी शुरू करदी… अब वो लुंड को अंदर से महसूस कर रही थी… गांड ऊपर निचे कर के… गोविन्द अब बिलकुल भी नहे हिल रहा था और आशा को हिलने दे रहा था उस की अपनी मर्ज़ी से…

कुछ देर के बाद आशा ने अपनी गांड को हल्का सा पीछे किया तो लुंड आधा इंच बहार निकला और फिर से आशा ने गांड आगे की तो वो आधा इंच फिर अंदर गया और कुछ देर वो ऐसा करती रही… और हलकी हलकी सिसकिया फिर से लेने लगी… साफ पता चल रहा था के अब उस की हालत बेहतर हे और छूट एडजस्ट करने लगी हे…

गोविन्द ने फिर चेक किया… उस की सोच के अनुसार उस को मीठा मीठा दर्द और बोहत सारा मज़ा आ रहा था… वो अंदर से खुश थी…

अब गोविन्द ने भी हलके झटके देना शोरो किये… लुंड बस दो इंच क करीब hi बहार आता और अंदर जाता… साथ साथ गोविन्द मुसलसल उस के होंटो को भी चूस रहा था… अब वो बिलकुल नार्मल होगई थी और मज़े ले रही थी… और अपने एक हाथ से उस का सर और दुसरे हाथ से उस की गांड दबा रही थी…

गोविन्द ने अब ढकों की गति बढ़ा दी और उस की छूट में पूरा लुंड अंदर बहार करना शुरू किया…

और वो… आह्ह्ह्ह ऐसे हाँ… आह्ह्ह्हह आह्हः आह्हः ऐसे हाँ… आह्ह्ह्हह ऐसे आह्ह्ह्हह… आठ आह्हः aahhhhhhhhhhhh… aahhhhhhhhhhh करती रही…

कुछ देर बाद उस ने लुंड पूरा निकल कर… ज़ोर का झटका मारा वो फिर हिल गई लेकिन मज़े में आवाज़े भर्ती गई उस की…

वो मुसलसल आअह्हह्ह्ह्हह आह्ह्ह्हह्ह आह्ह्ह्ह आअह्ह्ह्ह आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह aahhhhhhhhhhhh करती रही… अब लुंड पूरी रफ़्तार से अंदर बहार हो रहा था… कमरे में थप थप थप थप थप की अब्ज़ो क साथ उसकी आठ आह्हः आह्हः आह्हः आह्हः आह्ह्ह्ह आह्हः आह्हः आह्ह्ह्ह गूँज रही थी…

कोई 5 मिनट की धुंवाधार चुदाई के बाद उस का जिसम ाकरने लगा…

उस ने गांड उछालनी शोरो कर दी और उस की सिसकिया और तेज़ होगी… उस के जिसम ने झटके लिए और तेज़ सिसकियों के साथ वो आआह्ह्हह्ह्ह्ह aahhhhhhhhhhhhhh aahhhhhhhhhhhhhh ahhhhhhhhhhhh करते हुए फ़ारिग़ होगी…

गोविन्द फिर भी उसे छोड़ता रहा…

अब वो… बस करो… बस करो… की आवाज़ें और साथ में सिसकिया भी निकल रही थी….

10 मिनट तक मज़ीद ढके मरने के बाद… गोविन्द ने देखा के आशा का बदन फिर से झटके खाने लगा हे और वो फिर से झरने लगी… इस बार उस की गांड जेसे हवा में उछाल सी गयी थी और वो चीख सी पारी थी…. ोये गोविन्द… जान … बस करो…. ोीीी … अम्मा…. ोीी…

अब वो बेसुध हो चुकी थी…

गोविन्द ने अब लुंड बहार निकला और हाथ से मुठिएने लगा और थोड़ी देर में सारा माल आशा के पेट प् दाल दिया…

गोविन्द का लुंड और आशा की छूट दोनों पर खून के ढाबे थे… कुछ खून बीएड की शीट पर भी था…

आशा की छूट से जवानी के रास के क़तरे अब भी टपक रहे थे…

गोविन्द भी उस के बराबर में लेट गया… वो 3 बार फ़ारिग़ हुई थी… इस लिए बेसुध थी…

गोविन्द ने पहली बार एक कुंवारी लड़की छोड़ी थी जो सील पैक थी…

आशा की सोच… “उफ़ … कितना मज़ा आया… बस हल्का सा दर्द हे… लेकिन मज़ा बोहत आया… मस्टरबैशन से इतना सुख कहाँ मिलता हे… गोविन्द का लुंड कितना बारे हे… ऐसा लग रहा था के हलक़ तक आ जये गए… मेरा जणू सही का मर्द हे…”

आँखें अब भी बंद थी…

गोविन्द ने उस के होंटो को चूमा… तो उस ने घबरा कर आँखे खोल ली… “नहे… नहे… बस अब और नहे….”
 
EPISODE – 47

आशा की सोच… “उफ़ … कितना मज़ा आया… बस हल्का सा दर्द हे… लेकिन मज़ा बोहत आया… मस्टरबैशन से इतना सुख कहाँ मिलता हे… गोविन्द का लुंड कितना बारे हे… ऐसा लग रहा था के हलक़ तक आ जये गए… मेरा जणू सही का मर्द हे…”

आँखें अब भी बंद थी…

गोविन्द ने उस के होंटो को चूमा… तो उस ने घबरा कर आँखे खोल ली… “नहे… नहे… बस अब और नहे….”

आशा… दूर हटते हुए गोविन्द को… रोहणसी आवाज़ में… “मेरे जिस्म में अब जान नहे हे… और ज़ुल्म न करो मेरे साथ… आज पहली बार था… मुझे अब रेस्ट करने दो…”

गोविन्द… “प्रॉमिस मेरी जान… बस अब नहे करूँ गए… मेरे पास मेरी बांहो में तो आजाओ…”

आशा… ऊँघती हुई… “आह्हःन…” और अपना सर रख दिया गोविन्द के सीने पर… और होल से कराहने लगी… ममम… ममम… हम्म…

गोविन्द बारे प्यार से उस के सर सहलाने लगा… उस ने अपनी ग्रिफ्ट ढीली राखी थी आशा पर… क्यों के वो वाक़ये थक गयी थी और उसे रेस्ट की ज़रुरत थी….

कुछ देर के बाद आशा की साँसें मद्धम हो गयी और साफ लग रहा था के वो सो गयी हे…

गोविन्द ने उस के दिमाग़ को चेक किया…. बोहत सकूं और मज़े की हालत में थी वो… और नींद की पारी की आग़ोश में जा चुकी थी… गोविन्द ने कुछ वक़्त गुजरने के बाद उस को आहिस्ता से एक साइड में किया और उठ कर जानना कपड़े पहन ने लगा… बुर्का पहन कर नक़ाब लगा कर उस ने चादर से आशा का जिस्म अछि तरह धक् दिया… वो पूरी नंगी थी अभी भी… और ख़ामोशी से बाहर निकला और लाउन्ज से निकल कर… सब के दिमाग़ को इन्फ्लुएंस करता हुआ… ख़ामोशी से बहार रोड पर आ गया और एक ऑटो रोका और एक नज़दीकी पार्क के पास उतर गया और ऑटो वाले के जाने के बाद… अपनी कार जो के वो यहीं पार्क कर के गया था… उस को ओपन किया और पिछली सीट पर बेथ कर कपड़े चेंज कर लिए…

4 बजे से कुछ शामे ऊपर हो गया था… वो वहां से सीधा पोहंचा मुश्ताक़ पहलवान की अकादमी... अकादमी काफी बरी बानी हुई थी कुछ 1 एकर से ऊपर जगा पर शहर से कुछ हैट कर…. अकादमी की गिर्द ऊंची दीवारें और बारे सा एक hi गेट… गेट पर उस को रोक लिया गया और वहां उस ने ज़िक्र किया अपने दोस्त विक्रम का… गेट से सिक्योरिटी ने इण्टरकॉम पर पहलवान से उस के लिए पेर्मिशन ले कर उस की कार अंदर जाने दी… वो वहां से एंटर हुआ तो कुछ अंदर आने के बाद उस को पार्किंग में कार पार्क कर के पेडल कुछ चलना पारा… उस को एक गार्ड गाइड कर रहा था… गार्ड से पता चला के पहलवान का अपना घर भी अकादमी में hi हे और एक 50 रूम्स का हॉस्टल भी हे… कुछ स्टूडेंट्स दुसरे शहरों से आते हे उन के लिए… और पहलवान उन को फाइनेंसियल सपोर्ट भी करता हे…

मुश्ताक़ पहलवान इस वक़्त एक बारे से हॉल में मौजूद था और वह पर 10 स्टूडेंट्स को लाठी चलना सीखा रहा था… 10 मिनट का लेसन देने के बाद वो उन को प्रैक्टिस का बोल कर गोविन्द से मिला और उस को अपनी ऑफिस में बिठाया… पहलवान उस वक़्त खुद एक ट्रॉउज़र और t-shirt में था…

उस ने गोविन्द को एक फॉर्म फइलल कर व कर… 3 फोटोज के लिए कहा ताकि उस का कार्ड बन सके.. और उस की एंट्री गेट पर कर व दी… गोविन्द को बताया के 3 – 4 दिन वीक में आना परे गए और 2 घंटे की ट्रेनिंग करनी हो गई… पहले वीक हलकी फुल्की एक्सरसाइज और वार्म उप एक्सरसाइजेज हों गई… मॉर्निंग या इवनिंग जिस वक़्त भी चाहे वो आ सकता हे ट्रेनिंग के लिए…. स्विमिंग के बारे में बात हुई तो गोविन्द ने बताया के वो गाँव की नदी में स्विमिंग करता रह हे और ाचा स्वीम्मर हे…

पहलवान ने बताया के अकादमी में मैडिटेशन और ब्रीथिंग कण्ट्रोल एक्सरसाइजेज भी ट्रेनिंग का part हे…

सुबह 4 बजे अकादमी ओपन होती हे और 12 बजे दोपहर को बंद होती हे फिर 4 बजे शाम को ओपन होती हे और रत 10 बजे बंद होती हे… टोटल 6 इंस्ट्रक्टर्स हे जो के अलग किस्म की ट्रेनिंग के लिए हे और वो खुद फाइनल स्टेज की ट्रेनिंग देता हे और डिफरेंट स्टेजेस पे स्टूडेंट्स / ट्रैनीस को चेक करता रहता हे…

फिर गोविन्द को बताया के एक स्ट्रांग बॉडी से मंद स्ट्रांग होता हे और जब मंद स्ट्रांग हो तो रेफ्लेक्सेस भी बेहतर हो जाते हे और फाइट के लिए रेफ्लेक्सेस का एक्टिव होना बोहत ज़रूरी हे… मुक़ाबिल के अटैक करने से पहले अपना डिफेंस तैयार कर लेना या फिर अटैक कर देना hi जीत की असल वजा होती हे… इसी तरह की कुछ और बातें पहलवान ने बताई…

गोविन्द अपने डिसिशन से खुश था के उस ने अकादमी ज्वाइन की… अकादमी से प्लाट, जहा पर काम हो रहा था, ज़यादा दूर नहे था… वो वह से प्लाट पर चला गया और रस्ते में चेक किया द्क्प को… वो उठ चुकी थी उस को चलने में कुछ तकलीफ थी… और थोड़ा सा छूट में दर्द था… कुछ सूजन भी थी… उस ने इन्फॉर्म कर दिया था ऑफिस के वो रेस्ट कर रही हे… कॉफ़ी के साथ उस ने पैन किलर ले ली थी…. काफी बेहतर महसूस कर रही थी और गोविन्द को मिस कर रही थी…

बापू और प्रकाश को अपनी कार में बिठा कर घर का रुख किया… उन को लेने कार आ चुकी थी मगर गोविन्द उन को अपनी कार में लेकर आया ताकि कुछ बातें आपस में कर सकें… और ड्राइवर को भी घर जाने का कह दिया… घर वापसी के बीच बापू और प्रकाश से काम के प्रोग्रेस के हवाले से बातें हुई… प्रकाश ने बताया के ट्रक दो दिन में तैयार हो जये गए… और उस ने एक हेल्पर को भी नौकरी पर रख लिया हे जो के उस के साथ ट्रक पर होगा… गोविन्द ने उस को कहा अगर ज़रुरत हो तो दूसरा हेल्पर भी ढूंढे… टेक उस के साथ काम से काम 2 हेल्पर ट्रक पे होने चाहिए…

बापू ने बताया के फाउंडेशन भी दाल दी गयी हे… पूरी कंस्ट्रक्शन की… और काम बिलकुल सही स्पीड से हो रहा हे… और साथ साथ एक बारे सा ओवरहेड वाटर टैंक भी तैयार करना हे जो के पानी स्टोर करने के लिए होगा… पूरे प्लाट को कवर करने के लिए एक बाउंड्री वाल की फाउंडेशन भी तैयार हे… सरे मज़दूर और दुसरे कर्मचारी अपना काम भी ठीक ढंग से कर रहे हे बल्कि अछि खासी स्पीड से कर रहे हे और 5 दिन में 70% काम कम्पलीट हो जये गए… गोविन्द ये सुन कर खुश हुआ…

प्रकाश का आईडिया था के अनाज के साथ राइस भी परचेस किया जये… ये एक ाचा आईडिया था… गोविन्द ने एग्री किया…

बापू ये चाहते थे के वो कुछ अपना पर्सनल बिज़नेस भी स्टार्ट करें… लाला जी के काम को सुपरवाइज़ करने के साथ साथ… गोविन्द ने उन से कहा के वो काया करना चाहते हे… बापू ने कहा के अभी वो सोच रहे के काया काम स्टार्ट कर सकते हे…

गोविन्द ने बापू को बताया के कैसे उस ने इत्तेफ़ाक़ से बिपिन जीजा की जान बचाई हे मगर वो लोग ये जानते हे के वो लाला जी का बीटा हे और अभी अपनी आइडेंटिटी पूरी तरह से ज़ाहिर करने के लिए मुनासिब वक़्त का इंतज़ार करना चाहिए… बापू और प्रकाश ने एग्री किया… ये तय हुआ के फ़िलहाल माँ को इस बारे में न बताया जये क्यों के वो दुखी हो जयें गई…

लाला के घर पोहंच कर सरे फ्रेश होने चले गए… गोविन्द ने कॉल की द्क्प के रेजिडेंस पर तो द्क्प काफी इमोशनल नज़र आयी…

आशा… “यार तुम मुझे यूँ सोता चोर कर निकल गए थे… थिस इस नॉट फेयर… उठी तो बोहत मिस किया… फिर कब मिले गए…”

गोविन्द… “मेरी जान… में भी तुम्हे बोहत ज़यादा मिस कर रहा हु मगर काम भी ज़रूरी हे न… प्लस यार अब ज़रा रघु की इन्वेस्टीगेशन चेक करो… उस के और कोण कोण साथी हे और किस ने उस को इंगगे किया था… उस के यूँ आसानी से हाथ आने पर रिलैक्स हो जाना ठीक नहे…”

आशा… “don’t वोर्री… मेरे ऑफिसर्स उस पर काम कर रहे हे… आज कोर्ट से फिजिकल रिमांड भी मिल गया हे और में अब फिर कांटेक्ट करती हु के कितनी इनफार्मेशन मिली उस से…”

गोविन्द ने ok कहते हुए कॉल कट करदी…

इतनी देर में सब ीखते हो चुके थे लाउन्ज में… पापा ने बताया के खाना बदोश लोग जो ज़ख़्मी थे… वो अब बेहतर हे और हॉस्पिटल से उन को हर तरह की फैसिलिटीज मिल रही हे… उन का मुख्या राब्ते में हे… सब कुछ कण्ट्रोल में हे… पुराने गोदाम का काम और दूसरा रिपेयर का काम भी कण्ट्रोल में हे… पुलिस से बात हो गयी हे… रघु के अरेस्ट के बाद सरे ज़रूरी एविडेंस कलेक्ट कर लिए गए हे और कल से वो अपनी ज़मीन को साफ करके खानाबदोशो की नयी झोंपड़िआ बनाना स्टार्ट कर व दें गए… इस बात से गोविन्द बोहत खुश हुआ और इस काम के खर्चे का पुछा तो लाला जी ने बताया के ज़यादा नहे 500 क रूपीस में काम हो जये गए… कोई इशू नहे… फिर पापा ने कहा के गोविन्द को डिनर के लिए ज़रूर जाना चाहिए सेठ गिरधारी लाल के घर… उस वक़्त माँ और माँ मौजूद नहे थी वो डिनर की तैयारी के लिए किचन में थी… सीमा और ेषणा भी सीमा के कमरे में थीं…

गोविन्द के इंकार करने पर पापा और बापू दोनों ने कहा के बीटा बुरी बात हे उन लोगो ने डिनर का बार बार कहा हे एक बार तो ज़रूर जाना चाहिए… गोविन्द ने भी अब ज़यादा आगे न किया और प्रॉमिस किया के कल चला जये गए उन के घर…

गोविन्द ने पापा को बताया के बापू अपना कुछ अलग से काम करना चाहते आप के काम को देखने के साथ साथ… मगर कोई आईडिया नहे आ रहा तो आप कुछ हेल्प करें… पापा ने रत के खाने के बाद बेथ के डिसकस करने के लिए कहा…
 
EPISODE – 48

खाना कहते वक़्त सब ीखते थे… खाना कहते हुए…

ेषणा… “भइया कहीं घूमने ले जाओ ना आज…”

गोविन्द… “अब तो रत हो गयी हे कल चलें गए…”

पापा बोले… “यार हमारी गुड़िया को आज कहीं बहार ले जाओ… इस को नाराज़ न करना…”

सीमा… “हाँ… बिलकुल… में भी चलूँ गई… आइस क्रीम खाने चलते हे… खाना खाने के बाद…”

ेषणा घर कर देख रही थी… सीमा की तरफ… सोचते हुए… “तुम hi चली जाओ अकेली…”

गोविन्द ने उस को देख लिया और हंसने लगा…

सब गोविन्द की तरफ देखने लगे… के क्या हुआ… हंस क्यों रहे हो… पूछने लगे… उस ने कहा… “कुछ नहे वो कॉलेज की बात यद् आ गयी थी तो इस लिए हंस पारा…”

ेषणा ने फिर बुरा मुंह बनाया… “लो अब कॉलेज में भी कोई फंसा ली हे इस बंधु ने…”

गोविन्द फिर से मुस्कराया… हंसी को कण्ट्रोल करते हुए…

यूँ हंसी मज़ाक़ करते करते खाना खाया सब ने… सब बोहत खुश थे… रजनी भी यहाँ आ कर बोहत खुश थी… सब का आपस का प्यार देख कर… गंगा देवी भी काफी खुश थी…

सब फिर से बेथ गए लाउन्ज में आपस में बाटे करने लगे… सीमा ने ेषणा और गोविन्द को कहा के वो चले उस के साथ उस के कमरे में… वहां चल कर बैठते हे…

तो इस तरह सीमा, ेषणा और गोविन्द चले गए सीमा के कमरे में और बाक़ी सब बेथ कर इधर उधर की बाटे करने लगे…

गोविन्द, सीमा के कमरे में जा कर लेट गया उस के बीएड पर… वो भी काफी थक चूका था… उस के एक तरफ सीमा और दूसरी तरफ ेषणा बेथ गयी…

गोविन्द दोनों बहनो से बाटे करने लगा और दोनों के हाथ अपने हाथ में ले लिए थे प्यार से…

बाटे करते करते वो दोनों भी गोविन्द के बराबर में लेट गयी…

अब ेषणा को बोहत ाचा लग रहा था और कुछ मूड भी ठीक हो रहा था… एक बात जो गोविन्द को समझ में आयी के ेषणा बस ये चाहती हे के वो उस के साथ हो फिर बहले कोई और भी साथ हो या न हो…

इसी तरह बाटे करते करते गंगा देवी रूम में आयी और बताया के द्क्प, आशा बक्शी, उन के घर आयी हैं…

गोविन्द ये सुन कर बारे हैरान हुआ के वो क्यों आयी हे…

और कमरे से बहार निकलते हुए आशा के दिमाग़ में चला गया तो पता चला के वो गोविन्द को बोहत ज़यादा मिस कर रही थी तो लाला जी से सॉरी करने का बहाना बना कर उस से मिलने चली आयी…

आशा लाउन्ज में सब के साथ बैठी थी और गोविन्द को आता देख कर खरी हो गयी… और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया हैंडशेक के लिए… “hello मर. गोविन्द…”


गोविन्द ने उस से हैंडशेक किया ुर बैठने को कहा… वो इस वक़्त एक मैरून कलर के टाइट फिटिंग वाले ड्रेस में थी और आफत लग रही थी…

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गोविन्द कुछ परेशां सा हो गया के सब क्या कहें गए… मगर कोई इस तरह से नहे सोच रहा था…

सीमा… “क्या स्मार्ट पुलिस अफसर हे…”

ेषणा… “ओह तो ये पुलिस अफसर हे… ये तो कोई एक्ट्रेस लग रही हे… कितनी खूबसूरत हे… अगर गोविन्द भाई इस के चाकर में परे तो गए काम से…”

गोविन्द ेषणा की सोच पर कर मुस्कुराया… “ये नहे सुधरे गई…”

आशा जानती थी के गोविन्द कुछ परेशां या सरप्राइज हो गए उस के यहाँ आने पर… वो बोली… “लाला जी… आप के साथ कल जो कुछ हुआ उस के लिए में आप से पुलिस डिपार्टमेंट की तरफ से माफ़ी मांगती हु बस यूँ समझ ली जिए के शक करना हमारी मजबूरी हे…”

लाला जी… “जी द्क्प मैडम… में समझता हु के आप लोग अपना फ़र्ज़ निभा रहे थे और मुझे तो कोई तकलीफ भी नहे दी पुलिस ने…”

गंगा देवी उठ गयी चाय वग़ैरा के लिए…

आशा… रजनी की तरफ देखते हुए… “आप का बीटा बोहत बहादुर हे इस ने पुलिस की बोहत हेल्प की…”

गोविन्द की सोच… “ो तेरी… हेल्प तो बस तेरी की थी…”

रजनी… बारे प्यार से अपने bête की तरफ देखते हुए… “मेरा लाल हे hi ऐसा… सब की मदद करता हे…”

ेषणा… “मदद करता हे…!!! फिर उस के बाद….” और वो भी मुस्कुराने लगी…

इतनी देर में चाय आ गयी और इसी तरह की हलकी फुल्की बातों के बाद आशा… “आप सब लोग कभी मेरी तरफ आयी… खाना कहिये मेरे हाँ… मुझे ख़ुशी होगी…”

गंगा देवी… “नहीं बीटा… पहले आप हमारे घर दुबारा आये और खाना हमारे पास खाये… आज से आप हमारी बेटी हो… और ये यद् रखना के आप की दो माँ हे… में और रजनी बहन…”

रजनी… “हाँ बीटा… आते रहना.. तुम हमारी बेटी हो…”

आशा इस पारिवारिक माहौल को देखकर बोहत भावक हो रही थी और फिर वो बोली गोविन्द से.. “मर. गोविन्द… आप को तो पता हे के हमारी ड्यूटी किसी होती हे न दिन को आराम और न रत को रेस्ट… इस वक़्त मुझे यहाँ से जाना हे पुलिस स्टेशन और हमें कुछ आप की हेल्प चाहिए… लेकिन आप को कुछ लेट हो जये गई…”

गोविन्द उस के दिमाग़ से असल काम समझते हुए कहा… “जी मैडम में अजौं गए पनि कार में…”

ेषणा… “ओह तो ये बात हे… अब भाई भला पुलिस की क्या मदद करे गए… ये तो साफ साफ लैला मजनू का खेल खेल रहे हे दोनों… हम्म शायद इस को छोड़ लिया हे भाई ने…”

गोविन्द उस की सोच पढ़ चुक्का था… “बोहत चालू हो गयी हे… ये ेषु…”

आशा … “जी ठीक हे मुझे इजाज़त दी जिए…”

फिर जाते हुए जब ेषणा से मिली तो “तुम तो बिलकुल एक गुड़िया सी लगती हो… में कल तुम्हे अपने साथ ले जॉन गई…”

ेषणा की सोच… “अब मुझे ले जा कर के तुम्हे क्या फ़ायदा होना हे… ले जाओ साथ इस लम्बे मोठे लुंड वाले को…”

गोविन्द उस की सोच पढ़ कर मनो बरी मुश्किल से अपनी हंसी रोक रह अतः…

फिर गोविन्द बहार तक उस को चोर्ने आया तो साथ चलते हुए… आशा… “11 बजे तक पार्क के पास आ जाना अपनी कार में… में तुम्हे वह से पिक करू गई… बाक़ी वह बताऊ गई…”

गोविन्द वैसे तो सब जान चुक्का था बस उस को दिखने के लिए बोलै … “ok…”

उस वक़्त तक 10 बज चुके थे…

गोविन्द वापस आया तो सब अपने अपने कमरे में जा चुके थे… बस ेषणा वही थे… लाउन्ज में…

गोविन्द जनता था के वो कुछ अपसेट हे तो उस ने सोच लिया के इस को कुछ टाइम दिया जये… उस ने ेषणा को अपने कमरे में आने का इशारा किया… और अपने कमरे में जा कर कुछ लाइट से कपड़े निकलने लगा रत के पहन ने के लिए… ेषणा भी अंदर आ गयी उस के पास और जा कर पीछे से उस के गिर्द अपने बाज़ू कर लिए और पूरी तरह से चिपक गयी… “भैया मेरे साथ तो बैठते भी नहे हो… शहर में कितने बिजी हो गए हो… इस पुलिस वाली के साथ क्या चाकर हे…”

गोविन्द उस की बात सुन कर हंस पारा… और उस की तरफ पलट कर उस को अपने गले से लगा लिया… “तुम जाने क्या क्या खुराफात सोचती रहती हो… क्या ऐतबार नहे अपने भाई पे…”

ेषणा… मुंह बनाते हुए और कास के गोविन्द के सीने पर अपने चुके दबती हुई… “नहे… बिलकुल भी नहे हे… आप पे ऐतबार…”

गोविन्द… “चल अब नौटंकी चोर… मुझे नहाना हे…”

ेषणा… “भैया थोड़ा सा प्यार करो न पहले मुझे…”

गोविन्द ने उस का माथा चूमा तो ेषणा ने अपने होंठ ऊपर को उठा दिए… आँखें बंद करते हुए… गोविन्द ने हल्का सा बोसा उस के होंटो पर दिया और उस को बारे प्यार से एक तरफ हटा कर बाथरूम चला गया… ेषणा वही खरी रही कुछ देर आँखे बंद किये हुए और अपने होंटो पर ज़बान फेरती रही… गोविन्द के होंटो के लम्स को महसूस करती रही…

गोविन्द नाहा कर बहार आया तो ेषणा कमरे से जा चुकी थी… फिर वो तैयार हो कर 11 बजे पार्क के पास पोहंच गया… उसी वक़्त आशा अपनी जीप ड्राइव करते हुए वह पोहंची और उस को कहा के वो उस की जीप की पिछली सीट पर नीचे सर झुका कर के बेथ जये… ताकि बहार से देखने पर नज़र न आये… गोविन्द ने ऐसा hi किया… आशा जीप को ड्राइव करते हुए अपनी रेजिडेंस में लाई और जीप को बिलकुल दरवाज़े के पास पार्क कर दिया और नीचे उतर कर जो 2 दो गार्ड्स खरे थे उन से बात करते करते उन्हें कुछ दूर ले गयी… 10 – 10.30 तक आशा का कुक और दुसरे मुलाज़िम अपने क्वार्टर्स में चले जाते थे… बस दो गार्ड्स रह जाते थे दरवाज़े के बहार और उन दोनों को आशा ने बातो में लगा कर दरवाज़े से दूर ले गयी और उन की तवजा दूसरी तरफ करदी ताकि गोविन्द जीप से निकल कर कमरे में चला जये…

गोविन्द ख़ामोशी से जीप से उतरा और अंदर जा कर सीधा कमरे में चला गया…
 
EPISODE – 49

आशा कुछ देर के बाद मैं दूर लॉक कर के अपने कमरे आयी… अब घर में कोई मुलाज़िम या गार्ड एंटर नहे हो सकता था… कमरे में आ कर उस का दरवाज़ा भी लॉक करदिया… और गोविन्द के गले लग गयी…

दोनों एक दुसरे की बांहो में… एक दुसरे की आँखों में देखते रहे… आशा के चेहरे पर बोहत साडी ख़ुशी और शर्मीली मुस्कराहट थी… फिर गोविन्द ने पहल करते हुए… आशा के होंटो को चूमा… आशा ने आँखे बंद कर लीं और जेसे अपने आप को अपने मेहबूब को सौंप दिया… दोनों एक दुसरे के होंटो को चूस रहे थे… और दोनों के हाथ एक दुसरे की कमर को सेहला रहे थे…

कुछ देर के बाद… आशा ने अपने आप को चुराया और वाश रूम को चली गयी… दरवाज़ा बंद नहे किया मगर गोविन्द उस के पीछे जाने के बजाये बीएड पर लेट गया… थोड़ी देर के बाद आशा एक स्लीवलेस t-shirt और पजामा में बहार आयी… उस ने अपने बल खोल लिए थे जो के अब तक एक पोनी टेल की तरह से बंधे हुए थे…

आशा ने फिर कमरे में साडी लाइट्स ऑफ कर के नाईट बल्ब ों करके उस के पास आ कर बीएड पर लेट गयी… और अपना सर उस के सीने पर रखते हुए कहा…

आशा… “क्या करना हे जणू…??”

गोविन्द उस के विचार जान चुक्का था तो उस ने उस के विचारो के अनुसार उस से कहा… “यार ी ऍम सॉरी… में उस वक़्त तुम्हे सोता चोर कर चला गया था… मगर बोहत सरे काम करने थे… और में अब चाहता हु के तुम अपने दिल की बात मुझ से कहो… में अब सिर्फ सुनो गए…”

आशा ने अपना सर ऊपर उतःया और बारे ग़ौर से उस की तरफ देखने लगी जेसे के गोविन्द ने उससे हैरान कर दिया हो…

और फिर से अपना सर उस के सीने पर टिका दिया…

आशा… “गोविन्द… कभी कभी मुझे यक़ीन नहे होता के तुम इतने परफेक्ट मर्द कैसे हो सकते हो… अभी में ये समझ रही थी के तुम दुसरे मर्दो की तरह बस फ़क़त जिस्म के लिए बेकरार होंगे और फिर से एक बार सेक्स करना चाहो गए… मगर तुम ने वो कहा जो मेरे मन में था… तुम ने मुझे पूरा का पूरा जीत लिया हे… पहले में सिर्फ तुम से प्यार करती थी मगर अब से में तुम से प्यार करने के साथ साथ तुम्हारी रेस्पेक्ट भी करती हु…”

कुछ देर ठहर कर… आशा फिर से बोली… “में नहे जानती के तुम ने इस से पहले कभी सेक्स किया या नहे और मुझे जान ने की कोई इच्छा भी नहे… और में ये भी नहे जानती के कोई और लड़की या औरत पहली बार सेक्स के बाद कैसे रियेक्ट करती… मगर आज जब पहली बार में ने अपने आप को तुम्हे सौंपा तो मेरा दिल बस अब ये छह रहा था के कुछ पल में तुम्हारी बांहो में लेट कर तुम से ढेर साडी बातें करू… वो बाटे जो आज तक में किसी से नहे कह सकीय…”

गोविन्द ख़ामोशी से उस को सुन रहा था और उस के बालों में उंगलिया फेर ते हुए उस का हेड मस्सगे कर रहा था मगर बिलकुल हलके हाथ से…

आशा… “मेरे मेहबूब… तुम न सिर्फ एक मुकमल मर्द हो बल्कि एक अचे इंसान भी हो… मुझे पता नहे क्यों लगता हे के में ने जो इतने बरस इंतज़ार किया और फिर सेक्स तुम्हारे साथ कर के में मेरा इंतज़ार जाया नहीं हुआ…” फिर कुछ देर रुकी और फिर बोलने लगी…. अब तक उस ने अपना सर गोविन्द के सीने पर hi रखा हुआ हे…

आशा… “में ये अहेड कर चुकी हु के कभी शादी नहे करू गई… मगर में ये ज़रूर चहु गई के कभी कभी तुम से मिल कर अपने बदन की प्यास भुजाओ… हम रोज़ रोज़ इस तरह से नहे मिल सकते जैसे तुम ए या फिर अभी में तुम को लेकर आयी… हमें कोई और जगा देखनी परे गई… कुछ और सोचना परे गए मिलने के लिए… जो के मेरे लिए सेफ हो…”

आशा… “और मुझे कभी इस बात पर भी ऐतराज़ नहे होगा के तुम किसी और के साथ अगर सम्बन्ध रखना चाहो… या शादी करना चाहो… बस मुझे मत चूर्ण…”

कुछ देर वो खामोश रही तो गोविन्द बोलै… “एक बात में कहूं…???”

आशा… “हम्म्म… कहो…”

गोविन्द… “तुम बोलती बोहत हो…”

आशा… वही उस के सीने पर रखे रखे हंसने लगी… “अब ये तो तुम्हे बर्दाश्त करना परे गए…”

और अपनी आंखे बंद कर ली… गोविन्द ने उस के दिमाग़ में चेक किया तो वो अब सोना चाहती थी… और गोविन्द भी काफी थका हुआ था… तो उस ने साइड टेबल पर रखे टेबल क्लॉक पर टाइम सेट किया सुबह 4 बजे का और आँखे बंद कर ली…

दोनों प्रेमी कुछ देर में hi एक दुसरे की बांहो में सो गए…

क्लॉक अलार्म बजने के साथ hi गोविन्द की आँख खुल गयी और उस ने अलार्म को ऑफ करके आशा की तरफ देखा तो हैरान हो गया के वो दोनों अब तक उसी तरह एक दुसरे की बांहो में सोये हुए थे… उस ने किश किया आशा के होंटो पर और उस के सरे जिस्म पर बारे प्यार से हाथ फेरा… अंगराई लेती आशा ने ऑंखें खोली और कहा… “क्यों उठा दिया यार… कितना सकूँ से सो रही थी अपनी जान की बांहो में…” और मुस्कुराने लगी…

कुछ देर किश करने के बाद… दोनों उठे… और वाश रूम की तरफ बढ़े तो आशा ने कहा…

आशा… “यार दोनों साथ कैसे जयें गए तुम ऐसा करो लाउन्ज वाले वाश रूम में चले जाओ…”

गोविन्द ने कोई जवाब नहे दिया और अपने कपड़े फ़ौरन से उतर कर फिर आशा को पाकर उस के कपड़े भी उतर दिए और उस को उठा लिया अपनी बांहो में…

आशा… हँसते हुए… “बदमाश… कैसे उठा लेते हो मुझे… ाचा खासा वेट हे मेरा…”

गोविन्द… “मेरी जान तुम फूलों से भी नाज़ुक हो…”

और उस को उठा कर वाशरूम में ला कर कमोड की तरफ कर दिया और खुद शावर के नीचे चला गया…

आशा शर्माती मुस्कुराती कमोड पर फ़ारिग़ होती रही और देखती रही अपने मेहबूब को नहाते हुए… उस की नज़र गोविन्द के अध् खरे लुंड की तरफ गयी तो… उस के जिस्म में चिऊँटिआ सी रेंगने लगी… 5 मिनट लगे होंगे उस को फिर उस ने अपने आप को वाश किया… फ्लश कर के गोविन्द के पास शावर के नीचे जा कर उस को सोप लगाने लगी… सीने पर सोप लगते हुए गोविन्द ने उससे पाकर कर सीने से लगा लिया और किश करने लगा…

आशा ने बरी मुश्किल से अपने आप को चुराया और कहा… “यार दिन निकलने से पहले तुम को बहार चूर्ण हे वर्ण मुश्किल हो जये गई… अगर कुछ देर और मुझे पकड़े रहे तो हम दोनों कण्ट्रोल नही कर सकें गए…”

गोविन्द को उस की बात ठीक लगी…

गोविन्द ने फिर नहाते नहाते पेशाब करना शुरू कर दिया जो के सीधा आशा की टैंगो पर गिरने लगा…

आशा… हँसते हुए… झुटमुट का घुसा करते हुए… “ोये बदमाश… गंदे … ये क्या आकर रहे हो… मुझे अपनी जान कहते हो फिर अपनी जान पर पेशाब करते हो… गंदे… ये तुम्हारा लुल्ला काट दूँ गई…”

गोविन्द बस हँसता रहा…

दोनों ने फिर से एक दुसरे को वाश किया और बहार निकल कर कपड़े पहन ने लगे… आशा ने एक्सरसाइज के लिए ट्रैक सूट पहन लिया और फिर दोनों बहार ए… अब भी बाहर अँधेरा था… दूर ओपन करके बहार देखा तो दोनों गार्ड्स कुछ दूर बैठे ऊँघ रहे थे… गोविन्द फिर से ख़ामोशी से पिछली सीट पर बेथ गया और आशा ड्राइविंग सीट पर… आशा ने जीप पार्क के पास खरी कर दी… गोविन्द जीप से उतर कर अपनी कार में बैठा… आशा उसे bye कर के पार्क के अंदर चली गयी एक्सरसाइज करने और गोविन्द घर की तरफ चल दिया… घर आ कर गोविन्द ने अकादमी के लिए t-shir और ट्रॉउज़र जोग्गेर्स पहने और अकादमी पोहंच गया…

आज पहला दिन था उस को बस वार्म उप और बॉडी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजेज करवाई गयी…

घर वापिस आ कर कॉलेज के लिए निकल गया और क्लासेज अटेंड की… कॉलेज में उस ने अपने आप को रिज़र्व रखा और किसी के साथ ज़यादा बात चीत नहे की… कुछ क्लास मातेस लड़के और लडकिया ने उस से बात करने की कोशिश भी की मगर उस ने बस रस्मी बातें की सब से… कालस्सेस ख़तम हुई तो लाइब्रेरी आ कर सब को चेक किया…

द्क्प ने ेषणा को गारी भेज कर अपने ऑफिस बुला लिया था और उस को साथ लेकर जा रही थी कुछ कपड़े दिलवाने और लंच के लिए… गोविन्द ेषणा के दिमाग़ में जा कर उस को गाइड किया के कोई ऐसी बात न करे जो के ठीक न हो… पापा और बापू को चेक किया… सब ठीक था… पापा के पास से पता चला के सेठ गिरधारी लाल का फिर से फ़ोन आया था डिनर के लिए और वो सब को इन्विते कर रहे थे अपने घर पर… मगर पापा ने कह दिया के गोविन्द ज़रूर ए गए…

फिर घर पोहंच कर लंच करने के बाद 2 घंटे सो गया… 3 दिन से नींद नहे पूरी हुई थी…

शाम को उठा तो ेषणा बोहत खुश थी… उस को आशा ने खूब साडी शॉपिंग करवाई थी… ड्रेसेस, मेकअप, शूज और कुछ इमीटेशन जेवेलरी… एक एक साड़ी माँ और माँ के लिए और एक ड्रेस सीमा के लिए भिजवाई थी… सब को कपड़े पसंद आये…

5 बजे वो पोहंच गया आशा की ऑफिस… उस वक़्त वो कुछ रिलैक्स हुई थी काम से… गोविन्द को देख कर बोहत खुश हुई और कॉफ़ी का बोल दिया…

आशा… “बारे दिल छह रहा हे के तुम्हे गले लगा लूँ… मगर क्या करू ऑफिस में हूँ…”

गोविन्द उस की हालत देख कर हंसने लगा… और उस का हाथ पाकर दबा दिया… वो शर्माने लगी…

फिर दोनों डिसकस करने लगे… रघु के केस पर…
 
EPISODE – 50

शाम में गोविन्द, आशा के ऑफिस आता हे और दोनों रघु के केस को डिसकस कर रहे हे… ये सब बाटे पहले से गोविन्द जान चूका होता हे…

आशा… “रघु के स्टेटमेंट पर हम ने सेठ राजेंदर के मैनेजर को बुलाया… मगर उस ने इंकार कर दिया के उस का या सेठ राजेंदर का कोई सम्बन्ध हे रघु के लाला जी की ज़मीन पर आग लगाने से और सेठ गिरधारी लाल के बेटे के किडनैप करने से…”

आशा… “सेठ राजेंदर खुद मुल्क से बहार हे और उस ने इंस्पेक्टर से फ़ोन पर बात की और कहा के जेसे hi वापिस ए गए खुद पेश होगा पुलिस के पास और तब तक उस का मैनेजर फुल कोआपरेट करे गए पुलिस के साथ…”

आशा… “अब एक तरफ एक क्रिमिनल का स्टेटमेंट हे और दूसरी तरफ एक बारे रियल एस्टेट टाइकून के मैनेजर का स्टेटमेंट हे… पुलिस फ़िलहाल मैनेजर को अरेस्ट नहे कर सकती… क्यों के मैनेजर का स्टेटमेंट रघु के स्टेटमेंट के मुक़ाबले में ज़यादा क़ाबिल इ ऐतबार हे… पुलिस फुरदर इन्वेस्टीगेशन ज़रूर कर सकती हे… और करे गई… पुलिस ने पाबंद कर दिया हे मैनेजर को के वो पुलिस को इन्फॉर्म किये बग़ैर शहर से बहार नहे जये गए…”

अब पुलिस के रिकॉर्ड पर ये बात आ गयी थी के सेठ गिरधारी लाल का बीटा किडनैप हुआ था और वो खुद से hi वह से निकल गया था… बिपिन लाल ने खुद स्टेटमेंट दिया था पुलिस को…

गोविन्द, को आशा की बात ठीक लगी के पुलिस की अपनी मजबूरिऑन हैं… मगर उस ने ये बात अछि तरह समझ ली के अब उस को अपनी शक्ति इस्तेमाल करनी परे गई सेठ रेजेन्दर या उस के मैनेजर को बे नक़ाब करने के लिए… ये बात वो पहले से समझता था के इतने बारे बिज़नेस मन को यूँ क्रिमिनल साबित नहे किया जा सकता… वो पहले hi मैनेजर के दिमाग़ तक पोहंचा हुआ था…

गोविन्द और आशा उस वक़्त उस की ऑफिस में अकेले थे…

गोविन्द… “जणू… एक जगा हे मिलने के लिए… जब तुम कहो…”

आशा ये सुनते hi शर्मा गयी… और नज़रे उस की नीचे झुक गयी… कुछ देर चुप रही तो गोविन्द ने पुछा…

गोविन्द… “बताओ न जान… कब मिलना हे…”

आशा… नज़रे नीचे झुकाये हुए… “किस लिए…”

गोविन्द… “लूडो खेलने के लिए…”

आशा पहले तो समझी नहे के गोविन्द ने क्या कह दिया हे फिर जब उस ने नज़र उठा कर गोविन्द की तरफ देखा जो के उस वक़्त मुस्कुरा रहा था तो वो फिर से शर्मा गयी…

आशा… “पूरे बदमाश हो तुम… हर वक़्त एक hi बात का सोचते हो…”

गोविन्द… “क्या करूँ इन मीठे मीठे लबो का रास जो पीने का मन करता हे… इस कामुक बदन को अपनी बांहो में भरने का मन जो करता हे… इन नशीली आँखों से मधुरा पीने को मन जो करता हे…”

आशा की नज़र और झुक गयी और गाल लाल हो गए…

आशा… धीमी जज़्बात बहरी आवाज़ में… “और….???”

गोविन्द… “छोड़ने को मन करता हे…”

आशा ने अपने चेहरे को हाथो से छुपाते हुए… “बदमाश… अनरोमांटिक… गंदे…”

अब फिर से गोविन्द हंसने लगा… और अब उठने लगा…

गोविन्द… “ाचा जणू… अब में चलता हु…”

आशा… “कुछ देर तो बैठो… अभी तो ए थे… प्रोग्राम तो फाइनल कर लो न मिलने का…”

गोविन्द… “बस 1 – 2 दिन में… bye…”

आशा… बरी निराशा भरी आवाज़ में … “bye… अपना ख्याल रखना मेरे मेहबूब…”

गोविन्द बहार प् के पास आ कर वह से फ़ोन कॉल की घर पर और ेषणा और सीमा को कहा के तैयार रहे बहार जाना हे आइस क्रीम खाने… उन को पिक कर के ले गया आइस क्रीम खिलने… ेषणा पिछली सीट से साइड से गोविन्द को हाथ से सहलाती रही… सीमा को इस सब का पता न चला… फिर ये लोग घर वापिस आ गए…

गोविन्द ने घर आ कर बापू और पापा और प्रकाश से मिला… वर्क प्रोग्रेस डिसकस हुई… पापा ने बापू के हवाले से एक काम का आईडिया दिया के अगर कैलाश बाबू चाहे तो 1000 स्क्वायर यार्ड्स का स्पेस प्लाट पर खली हे… वहां पर दूध वाले मवेशी रख कर पूरे शहर को दूध सप्लाई का काम किया जा सकता हे… क्यों के बापू का पहले इस काम का तजरुबा भी हे… और साथ साथ ये के बापू को वैसे भी लाला के मवेशी की देख बल के लिए सुबह सवेरे उठना hi था तो वो अपने काम को भी देख सकते थे… लाला के मवेशी तो सिर्फ इस लिए थे के उन की ब्रीडिंग कर के आगे बेचना था… और बापू का काम होता दूध के मवेशी रख के उन का दूध सेल करना पूरा शहर में…

बापू को ये मश्वरा ठीक लगा… और उन्हों ने कहा के पहले वाला काम ख़तम हो जये प्लाट पर तो फिर इस काम के लिए भी कंस्ट्रक्शन स्टार्ट करवा दें गए… अब 7 बजने वाले थे तो गोविन्द ने कहा के वो रेडी हो रहा हे डिनर के लिए सेठ गिरधारी लाल के वह जाने के लिए…

गोविन्द, सेठ गिरधारी लाल की मेन्टल एप्रोच को जनता था तो उस ने क़ीमती कपड़े पहने उन को इम्प्रेस करने के लिए… रस्ते से मिठाई और चॉकलेट्स और फ्लावर्स ले कर गोविन्द पोहंच गया उन के घर…

कार पार्क करने के बाद… गोविन्द जब कोठी के दरवाज़ पर पोहंचा तो उस का दिल धारक रहा था… काया पता डीडीओ में से कोई दरवाज़ा खोले… कोण सी दीदी हो गई दरवाज़े पर…. वर्षा दीदी या अक्षरा दीदी…

क्या सोचें गई उसे देख कर… क्या पहचान सके गई अपने मुन्ने बहिया को…

ऐसे बोहत सरे सवाल उस के मन में थे… उस के कदम लरज़ रहे थे… दिल बोहत तेज़ी से धारक रहा था…

वैसे तो कई बार अपनी डीडीओ के दिमाग़ में जा चुक्का था मगर सामना अब करे गए… ऑंखें नुम सी हो गयी… उस ने फिर अपने आप को संभाला… अपनी हिम्मत जुताई… और लरज़ते हाथो और धड़कते दिल के साथ दूर बेल्ल बजा दी…

दरवाज़ा खुला और जो लड़की उस को नज़र आयी दरवाज़े पे तो वो ये सोचने लगा के कही किसी ग़लत एड्रेस पर तो नहे आ गया… क्यों के उस के सामने कोई और नहे बल्कि रिया खरी थी….

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यही हल रिया का था… गोविन्द को देख कर…

उस दिन के बाद से गोविन्द रिया को नहे मिला था और अब यहाँ उस के घर पोहंच गया था…

रिया ये समझी के गोविन्द उस की वजा से उस के घर तक आ गया हे…

रिया… “गोविन्द… तुम ऐसे मेरे घर तक क्यों आ गए… यूनिवर्सिटी में मिल लेते में मन तो न करती… में तो खुद तुम से मिलना चाहती थी… प्लीज चले जाओ… किसी ने देख लिया तो प्रॉब्लम हो जये गई…”

गोविन्द पहले तो घबरा गया फिर उस ने अपने आप को संभाला और पुछा…

गोविन्द… “ये क्या सेठ गिरधारी लाल का घर नहे…??”

रिया… “हाँ सेठ गिरधारी लाल का घर hi हे स्टुपिड… में उन की बेटी हु… अब निकलो जल्दी यहाँ से… प्लीज कल यूनिवर्सिटी में मिले गए… 4 बजे कैंटीन में…”

गोविन्द… “रिलैक्स हो जाओ मेरी जान… में आज तुम्हारे घर पे इन्वितेद हु डिनर करने लिए…”

रिया… “ता ता ता तुममम… लाला जी के बेटे हो जिस ने बिपिन भैया की जान बचाई थी… ओह्ह्ह्ह सहित… रियली….??”

गोविन्द… “जी में hi… लाला जी का बीटा गोविन्द हु… अब रास्ता दो अंदर आने का… स्टुपिड….”

रिया अब अपने मुंह पे हाथ रख कर हंसने लगी… और उस के रस्ते से हैट गयी… गोविन्द अंदर दाखिल हो गया तो उस ने दरवाज़ा बंद कर दिया… और मुस्कुराती… उस को साथ ड्राइंग रूम में ले आयी… गोविन्द ने मिठाई, चॉकलेट्स और फ्लावर्स एक टेबल पर रख दिए… ड्राइंग रूम में किसी को न देख कर गोविन्द ने कहा…

गोविन्द… “यहाँ तो कोई नहे हे… मेरी जान एक किश तो दे दो…”

रिया घबरा गयी… “ये क्या कह रहे हो… पागल तो नहे हो गए… सब घर पर हे कोई भी किसी वक़्त भी आ सकता हे…”

मगर गोविन्द ने उस को अपनी बांहो में भर कर ज़ोर से चूम लिया उस के होंटो पर… और हैट ते हुए उस के चुके बरी ज़ोर से मसल दिए…

रिया… “उफ़… चोरो … पागल… इतने दिन से मिले नहे और अब ऐसे तंग कर रहे हो… चोरो”

और अपनी बेतरतीब सांसे सँभालने लगी… चेहरा शर्म से लाल… मगर अंदर से बोहत खुश हुई उस का यूँ अपने लिए प्यार देख कर… और इस से पहले के गोविन्द उसे और तंग करता… वो ड्राइंग रूम से बहार निकल गयी और सब को बता दिया के लाला जीवट राम का बीटा गोविन्द जी ए हैं…

चेतन लाल और बिपिन लाल तो फ़ौरन पोहंच गए… और पूरे जोश से गले लगा कर मिले…

“बोहत धनवाद तुम्हारा…” चेतन बोलै…

बिपिन भी कहने लगा “यार बारे इंतज़ार कराया हे कीतिनि बार बोलने के बाद ए हो घर पे…”

रिया भी आ गयी थी तो बिपिन ने परिचय कराया के उन की बहन हे… दोनों ने प्रणाम किया एक दुसरे को… फिर सेठ गिरधारी लाल और उन की पत्नी ए… गोविन्द दोनों के पाऊँ छु कर आशीर्वाद लिया… इस बात से वो दोनों बोहत खुश हुए… कितने अचे संस्कार हे तुम्हारे बीटा… अरे भाई दोनों बहु को बुलाओ…

और फिर गोविन्द का इंतज़ार ख़तम हुआ…
 
EPISODE – 51

गोविन्द सेठ गिरधारी लाल के घर पे सब से मिलता हे और अब उस की नज़रे बेकरार हे अपनी डीडीओ को देखने के लिए जो उस के पिता और माँ के जिगर का टुकड़ा और उन की परछाई हे… जिन को देखे 2 साल नहे जैसा के कई युग बीत चुके हो… उन का मुन्ना उन को देखने को बेताब था…

और फिर गोविन्द को ऐसा लगा जैसे पुरवाई की हवा का ठंडा झोंका आया हो और फिर वर्षा और अक्षरा ड्रांइगरूम में दाखिल हुईं… चेतन बोलै… देखो ये लाला जी के bête गोविन्द जी ए हमारे घर… हमारे मोहसिन… जिस ने बिपिन की जान बचाई…

वर्षा

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अक्षरा

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वर्षा और अक्षरा पहले से hi प्रभावित थी और जब उन्हों ने निगाह डाली गोविन्द पर तो एक लम्हे के लिए ऐसा लगा जैसे उन का hi मुन्ना सामने खरा हे घाबरू जवान के रूप में और दुसरे पल अपने आप को मलामत करने लगी के हर नौजवान में अपने मुन्ने बही को ढूंढने लग जाती हैं…

गोविन्द की हालत अपनी बहनो से कुछ अलग न थी… जिन की ऊँगली पाकर कर उस ने चलना सीखा था… जिन की गॉड में वो घंटो पारा रहता था… जो के ममता का hi एक रूप थी… ठंडी चयन थी… उस के बचपन की अनगिनत यादें थी…

बहने भले hi न जानती हो के वो उन का भाई हे या नहे और इस लिए वो तो अपने दिल को संभल चुकी थी मगर गोविन्द अपने दिल का क्या करता जो के जनता था के ये उस की बहने हे… उस की माँ की hi छवि हे… वो बोहत बेकरार था… मगर उसे भी अपने आप को अभी संभालना था… अभी वक़्त था समझदारी बरतने का… अभी वक़्त था नियंत्रण रखने का अपने आप पर… तो उस ने भी सबर का घूँट पि लिया और नज़रे नीचे कर ली…

चेतन… “गोविन्द… इन से मिलो ये दोनों तुम्हारी भाभी हैं…”

गोविन्द… “अगर आप को बुरा न लगे तो में इन को दीदी कह लून … वो क्या हे न के मेरी एक hi बहन हे न तो दो बहने और हो जयें गई…”

सेठ… “अरे बीटा… दीदी या भाभी क्या फ़र्क़ हे… तुम हमारे मोहसिन हो… जो मन में आये वो रिश्ता बना लो…”

गोविन्द आगे बढ़ कर दोनों बहनो के पैर छु लेता हे…

वर्षा और अक्षरा एक तो गोविन्द के बहन कहने पर भावक हो जाती हे और दुसरे जब वो उन के पैर छु कर उन को सामान देता हे तो अब अपने ऊपर काबू न रखते हुए जेसे … ीखते उस के सर और कंधे पर हाथ फेरते फेरते गले से लगा लेती हैं…

बाक़ी सदस्य घर के इतने खुश हैं के वो इस बात को नोटिस नहे कर पते…

सेठ… “अरे भाई अब क्या यही खरे रहना हे… कुछ मेहमान की खातिर तो करो…”

वर्षा… “बबऊ जी… खाना भी तैयार हे…”

सेठ… “तो चलो भोजन को इंतज़ार नहे करवाते… डाइनिंग रूम की तरफ चलो…”

बिपिन… “अरे क्या बापू… अभी से भोजन… अभी तो मूड भी नहे बना…”

मूड बना ने से बिपिन का मतलब दारू पीना था… बिपिन और चेतन तो रोज़ रात को ड्रिंक करते थे और उस के बाद hi खाना खा कर बेहोश हो जाते थे… और ये बात तो सब घर वाले जानते थे तो चेतन और बिपिन सब के सामने hi पीते थे और कोई लेहाज़ न करते थे…

अब सब की नज़रे गोविन्द की तरफ हो गयी… तो वो जल्दी से बोल पारा…

गोविन्द… “बोपिन भैया… में तो नहे पीटा और न कभी पि हे… तो में तो खाना खून गए…”

तो फिर ये तय हुआ के चेतन और बिपिन डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे गए और हल्का फुल्का छकें गए और बाक़ी अपने ड्रिंक करने के बाद खा लें गए और गोविन्द दुसरे घर के सदस्यों के साथ डिनर कर ले गए…

डाइनिंग टेबल पर बैठते शामे कुछ यूँ पोजीशन बानी के रिया उस के साथ वाली चेयर पर बेथ गयी… खाना कहते शामे सब बोहत खुश थे और खूब खातिर दरी कर रहे थे गोविन्द की… वर्षा और अक्षरा गोविन्द के सुभाऊ से बोहत प्रभावित थी… और दोनों यही सोच रही थी के हमारा मुन्ना भाई भी इतना hi बारे हो गया होगा… और दोनों के दिल में कसक अब चिंगारी बनने लगी थी… रिया मौके को देखते हुए अपने हाथ से बार बार गोविन्द की राण और उस के लुंड को सेहला देती थी… इस से रिया को बोहत मज़ा आ रहा था… वो भी बोहत खुश थी… गोविन्द भी हंसी मज़ाक़ सब के साथ कर रहा था…

इस बीच सेठ गिरधारी लाल ने चेतन को बताया के मार्किट की 4 शॉप्स सेल हो रही हैं… डिमांड और मार्किट रेट 50 लाख हे मगर में ने 40 की ऑफर दे दी हे… देखो कल प्रॉपर्टी डीलर से मिल लो और अगर 5 लाख बढ़ाने परे तो भी हम फायदे में रहें गए… इस जगा के रेट वैसे भी बढ़ने वाले हे… इस बात पे गोविन्द के कण खरे हो गए और वो सेठ के दिमाग़ में गया तो पता चला के ये वही शॉप्स हे जो लाला के नौकरी से निकले हुए सुपरविसोर्स बेच रहे हे… उस ने एक फैसला इस हवाले से ले लिया… और फिर से सब की तरफ तवज कर ली…

चेतन… “यार तुम मिज़ाज के बोहत अचे हो… अब हमारे साथ भी बेथ कर हमें भी कंपनी दो जब हम ड्रिंक करे गए…”

बिपिन फ़ौरन बोलै “यार प्लीज आज एक रत हमारे पास hi रुक जाओ… जी बाहर कर बातें करे गए…”

सेठ… “हाँ… हाँ… बीटा… ये तुम्हारा hi घर हे… में अभी लाला जी को फ़ोन कर के कह देता हु के तुम यहाँ रत रुको गए…”

गोविन्द, रिया की चेर चार की वजा से काफी गरम हो चुक्का था तो उस ने सोचा अगर रत यहाँ रुक जॉन तो रिया के साथ मस्ती कर लूँ गए… तो इस लिए उस ने कहा… “आप सब की इतनी मोहबत देख कर मेरा भी मन कर रहा के में रत यही रुक जॉन…” गोविन्द के लिए रत को रुकने का एक और कारन भी था के उस ने ये चेक किया था के सुबह 8 बजे लाला जी अपने ऑफिस चले जाते हे और रिया यूनिवर्सिटी और सेठ की पत्नी मंदिर… चेतन और बिपिन 10 बजे से पहले नहीं उठाते तो वो आसानी से उस बीच… अपनी डीडीओ से मिल कर ढेर साडी बातें कर ले गए…

गोविन्द के रत रुकने की बात को मान लेने पर सब बोहत खुश हुए… और रिया का दिल तेज़ तेज़ धरकने लगा… उस ने जज़्बात में आते हुए एक ज़ोर की चुटकी काट ली गोविन्द की राण पर… गोविन्द इस के लिए बिलकुल भी तैयार न था… उस के हाथ से स्पून गिरते गिरते बचा… अब गोविन्द ने दिल में ठान ली के इस रिया को तो आज सही का पेलना हे…

खाने से फ़ारिग़ हो कर सेठ गिरधारी ने लाला जी को फ़ोन कर के बता दिया के गोविन्द को रोक लिया हे वो रत रुके गए उन के घर पर… और फिर सेठ और उन की पत्नी अपने कमरे में चले गए आराम करने के लिए…

सेठ गिरधारी लाल का घर कुछ इस तरह का था के ग्राउंड पर 2 बीएड रूम्स थे… एक किचन, लाउन्ज, ड्राइंग रूम और डाइनिंग रूम… और ऊपर मंज़िल पर एक बारे सा लाउन्ज… और 4 बेडरूम्स थे… सीडी चरने के साथ hi सामने लाउन्ज था और लाउन्ज के एक तरफ 2 कमरे चेतन और बिपिन के और दूसरी तरफ 2 कमरे, एक रिया का और दूसरा खली रहता था… मेहमान वग़ैरा के लिए…

रोज़ रत को चेतन और बिपिन वही ऊपरी मंज़िल में बने लाउन्ज में शराब पिया करते थे… और उन की पत्निया उस बीच उन दोनों को पेपर और दूसरी चीज़ें फ्राई कर देती रहती थी… सब मिल कर ऊपरी मंज़िल में आ गए…

चेतन और बिपिन अपने शराब दारू की बॉटल्स को सेट करने में लग गए और वर्षा उन के लिए गिलास और आइस वग़ैरा अर्रंगे करने में लग गयी और अक्षरा किचन में चली गयी कुछ फ्राई वग़ैरा करने के लिए…

गोविन्द ने चेतन से कहा कुछ नाईट के लिए कपड़े जो कम्फर्टेबले हो मिल जये तो वो चेंज कर ले… चेतन ने रिया से कहा के चेतन या बिपिन के कमरे से कोई नाईट सूट गोविन्द के लिए कमरे में रख दे… रिया नाईट सूट ले कर आयी तो गोविन्द उस के पीछे कमरे में आ गया और कमरे में रिया को फिर से पाकर कर किश की और उस को कहा के जब उस के भाई सो जाएँ तो वो उस के कमरे में ाज्ये… रिया शरमाते हुए मान गयी… गोविन्द कपड़े चेंज कर के लाउन्ज में आ गया जहा चेतन और बिपिन बोतल खोल चुके थे…

हंसी मज़ाक़ चलता रहा… चेतन और बिपिन अपना पीते रहे… और वर्षा, अक्षरा और रिया वह से आती जाती रति… कभी एक आध घरी के लिए वह बेथ जाती और फिर चली जाती कोई न कोई काम करने… गोविन्द ने रिया को चाय के लिए कहा तो वो ख़ुशी से नीचे बना ने चली गयी… रिया को ाचा लगा के गोविन्द ने उस को बोलै हे चाय बनाने को… वो तो पहले hi मर मिटी थी उस पे… अब तो बस फ़िदा होने वाली थी और साथ रत को मिलने का सोच सोच कर उस के बदन में चिऊँटिआ रेंग रही थी…

वर्षा और अक्षरा को गोविन्द का हंस मुख होना और साथ साथ ड्रिंक न करना बोहत ाचा लगा… ये नौजवान कितना खुश मिज़ाज और अचे सुभाऊ वाला हे… और वो आपस में यही बात कर रही थी के काश हमारा मुन्ना भी बारे हो कर इसी की तरह के गुणों वाला बना हो….

11 बजे तक चेतन और बिपिन दोनों गिरने वाले हो गए तो उन्हों ने गिलास चोरे… गोविन्द पहले चेतन को सहारा दे कर उस के कमरे तक चोर आया और फिर बिपिन को उस के कमरे तक चोर आया… वस्र्शा और अक्षरा अपने अपने पति को यूँ मदहोश किसी घेर के सहारे देख कर काफी शर्मिंदा थी…

रिया पहले hi अपने कमरे में जा चुकी थी और उस ने स्लीवलेस निघ्त्य पेह ली थी… ब्रा और पंतय पहले से उतर चुकी थी… निघ्त्य भी ओने पीेछे थी जो के पीछे एक ज़िप को खोलने से पूरी उतर जाती… वर्षा और अक्षरा भी अपने अपने पति के साथ अपने कमरे में जा कर चेंज करके निघ्त्य पहन ली और सोने लगी… गोविन्द कमरे में आ कर नाईट सूट जो पहले से ढीला था उतर कर पूरा नंगा हो गया… वो पूरी तरह से तैयार था एक्शन के लिए…
 
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