- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 92,714
CHAPTER 16
मेरी माँ अब वह पाकीज़ह और नेक माँ नहीं रही, अब तोह वह सच
में एक पूरी रंडी बन चुकी है.
माँ अभी भी उसके ऊपर ऊपर नीचे हो रही थी, ज़ोर ज़ोर से कराह रही थी, उसका जिस्म पसीने से चमक
रहा था लिविंग रूम की बेडसाइड लैंप की हलकी रौशनी में, जो अब हमारा राज़ का अड्डा बन गया था.
हवा में उनकी जोश की मुस्की खुशबू घुली हुई थी, पुराण सोफे उनके वज़न के नीचे चीख रहा
था.
गजेंद्र पीछे लेट गया था, उसका चौड़ा सीना ऊपर नीचे हो रहा था, हाथ ढीले से उसकी कमर
पकडे हुए, जब वह कण्ट्रोल ले रही थी, खुद को उसके मोटे लुंड से ऑलमोस्ट पूरा ऊपर उठती और फिर ज़ोर
से नीचे बैठ जाती, जिससे उसके भरे हुए चूचे उसकी उलझी हुई ब्लाउज के नीचे ज़ोर ज़ोर से उछलते.
उसकी आँखें आधी बांध थी सुकून में, होंठ खुले हुए, गले से गहरी आवाज़ें निकल रही थी –
मोती, आवाज़ वाली कराहटें जो खामोश घर में हराम संगीत की तरह गूँज रही थी.
"ओह, शाहिदा, मेरी सुन्दर कमल," गजेंद्र धीमे से बोलै, आवाज़ गहरी और हस्की, उस मिठास भरे
लहजे में जो उसे और गहरे ले जाता था. "तुम बिलकुल परफेक्ट हो, देवी की तरह मुझ पर सवार. चलती
रहो, मेरी जान, दिखाओ कितना ज़रुरत है तुम्हे इसकी."
वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी; बल्कि उसके शब्दों ने उसे और जोश दिया, हरकतें और जान बूझ
कर, और बेचैन. माँ की जांघें हर उठने नीचे में सख्त हो रही थी, घुटने सोफे के कुशिओं
में धंस रहे थे दोनों तरफ, हाथ उसके सीने पर मज़बूत टिकाये हुए. उसके अंदरूनी जाँघों की
रेशम उसकी खाल से रगड़ रही थी, हर एहसास को और तेज़ कर रही थी.
वह नीचे हर बार छोटे गोल चक्कर लगाती, उसे पूरा महसूस करती, स्ट्रेच करती जिससे वह सांस
रोक लेती. "हाँ, मेरा प्यारा मोर," गजेंद्र बोलै, आँखें उसकी आँखों में, होठों पर चालाक
मुस्कराहट, हाथ ऊपर उठा कर उसके गाल को सेहला रहा था.
"आज रात तुम मेरे लिए खिल रही हो. मत रुकना, मेरी मीठी मोहिनी – मुझे हर इंच महसूस होने दो
तुम्हारे जोश का." उसके रोमांटिक नाम शहद की तरह बह रहे थे, हर एक धीमा धक्का, उसे और
खोने के लिए.
माँ: (गजेंद्र पर बिस्तर पर बैठी, आबय कमर तक ऊपर चढ़ी हुई, वैल अभी भी सर पर लेकिन थोड़ा
ढीला, धीरे से उसके मोटे लुंड पर बैठती हुई, सांस रोक कर जब पूरा अंदर जाता है) अह्ह्ह… गजेंद्र
… धीरे… प्लीज… यह पहले से hi बहुत बड़ा गुनाह है…
गजेंद्र: (हाथ उसकी चौड़ी कमर पर, हरकतें गाइड करते हुए, उसके लाल चेहरे पर मुस्कुराते हुए)
मुझ पर सवार हो, शाहिदा. ऊपर नीचे जैसे अच्छे छोटे _ रंडी की तरह. महसूस कर रहा है
कितना गहरा हूँ? तेरी दीनदार छूट फिर से मुझे भिगो रही है.
माँ: (हरकत शुरू, पहले ना चाहते हुए कमर घूमती, फिर तेज़, अपने आप को रोक नहीं पाती, होंठ काट
कर कराहटें रोकने की कोशिश) ममम… नहीं… नहीं करना चाहिए… ओह ,.'… यह महसूस… अहह… कितना
गलत… लेकिन रुक नहीं प् रही…
गजेंद्र: (नीचे से धक्के देते हुए उसके साथ मिल कर, आवाज़ और सख्त) फ़क, कितनी टाइट है तू… हिंदू
लुंड पर उछाल रही है… तेरा शोहर कभी ऐसे भर नहीं सकता तुझे, न?
माँ: (चूचे टॉप के नीचे उछाल रहे, आवाज़ शर्म और बढ़ते सुकून से कांप रही) प्लीज… ऐसा
मत बोलो… वह बीमार है… यह धोका है… ममम… मैं बुरी बीवी हूँ… बुरी _…
गजेंद्र: (गहरी आवाज़ से कराह कर, आँखें उसके हिलते जिस्म पर) सहित… शाहिदा… मैं झड़ने वाला हूँ
… बहुत ज़ोर से अंदर hi…
माँ: (आँखें दर से फैली, लेकिन कमर नीचे hi घूमती रही) नहीं! गजेंद्र, नहीं – अंदर मत छोड़ना!
बहार निकाल… प्लीज… मैं मिन्नत कर रही हूँ… मत… अहह… रिस्क मत ले…
गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए, दांत पीस कर, हाथ उसकी गांड ज़ोर से दबाते हुए उसे हिलाते रखा) अब
मिन्नत? हॉस्पिटल में मेरा लुंड चूसने के वक़्त कहाँ थी यह मिन्नत? या दस मिनट पहले टांगें
फ़ैलाने के वक़्त? तू पहले से बर्बाद है, शाहिदा – अब पूरा माल ले ले जैसे सही रंडी.
माँ: (तेज़ सवार होने लगी बेचैनी में, आवाज़ पहात रही, आंसू भर आये) नहीं, नहीं प्लीज… तेरा
बच्चा नहीं हो सकता… सब बर्बाद हो जायेगा… मेरा घर… मेरा ईमान… बहार निकाल… मैं अपनी रूह
पर क़सम देती हूँ… अंदर मत छोड़ना… या ,.', माफ़ कर दे…
गजेंद्र: (सांस रुक रुक कर, धक्के बेकाबू) बहुत देर हो गयी… फ़क… तेरी मिन्नत सुन कर और ज़्यादा
ब्रीड करने का मैं कर रहा है… सोच, तेरा पेट फूलता हुआ मेरा हिंदू बच्चा… जब तू रोज़ पांच
वक़्त ,,., पड़ेगी प्रेटेंडिंग पुरे होने की…
माँ: (कराहटें के बीच धीमे रोने लगी, फिर भी बेबस उछलती रही) बस कर… प्लीज ऐसा मत बोल…
दिल को दर्द होता है… मत… अंदर मत ख़तम कर… कुछ भी करुँगी… बस वहां नहीं…
लेकिन सुकून के बीच माँ की कराहटें टुकड़े टुकड़े इक़रार बन गयी, आवाज़ टूट रही थी जब अंदर से खुद से
नफरत उभर रही थी. "अहह… मैं कितनी बुरी माँ हूँ, आअह्ह्ह्ह" वह सिसकारी, एक पल के लिए रदम रुक गया
फिर ज़ोर से नीचे बैठ गयी, जैसे खुद को सजा दे रही हो.
"कैसे कर सकती हूँ यह? मेरा बीटा… आआह्ह्ह्ह ऊह्ह्ह्ह… वह मुझे देखता है, और मैं यहाँ रंडी की
तरह. सब बर्बाद कर दिया – शादी, ईमान. हुसैन इसका हक़दार नहीं… ओह ,.', माफ़ कर." आंसू आँखों
में भर आये, पसीने के साथ मिल कर चेहरे पर बह रहे थे, लेकिन रुक नहीं रही थी; जिस्म उसके शब्दों से
धोका दे रहा था, रिलीज़ के पीछे दौड़ रहा था.
गजेंद्र धीमे से हांसे, हाथ ऊपर उठा कर उसके चूचे पकडे, अंगूठा निप्पल्स को छेड़ रहा था.
"श, मेरी जादुई गुलाब, तू बुरी नहीं – तू ज़िंदा है. सावर होती रहो, सब निकाल दो."
वह सर हिला रही थी, लेकिन कमर हिलती रही, ऊपर नीचे be-ruk, अंदरूनी दीवारें हर धक्के पर उसके चरों
तरफ बांध रही थी. "मैंने अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी," वह कराहटें के बीच रोई, आवाज़ तेज़ होती गयी
जब सुकून बढ़ा.
"इतने साल दीनदार बन कर, पांच वक़्त ,,.,, और अब… यह. हुसैन से तलाक़ मांग लू – वह बीमार है,
हॉस्पिटल बीएड पर तड़प रहा है, और मैं यहाँ धोका दे रही हूँ. कैसी बीवी हूँ मैं? खुदगर्ज़,
गुनहगार आह्ह्ह्ह. मुझे बहार निकाल देना चाहिए, कम्युनिटी से निकाल देना. मेरा घर कभी माफ़ नहीं
करेगा… अहह, हाँ वही… नहीं, मतलब मैं खुद से नफरत करती हूँ इसके लिए! ोुह्ह्ह्ह गजेन्द्रा"
उसके शब्द जल्दी जल्दी निकले, गुनाह और सुकून का मिला जुला तूफ़ान, जिस्म पीछे झुक गया तेज़ सवार करते हुए,
नाख़ून उसके कन्धों में धंस रहे थे.
"मैं _ औरत के तौर पर नाकाम हूँ – हराम, सब कुछ. क्यों रुक नहीं पाती? जैसे शैतान ने
पकड़ लिया हो. हुसैन से ख़तम करुँगी, नयी शुरुआत, लेकिन कैसे? तेरे साथ? नहीं, वह और बुरा होगा…
ओह गजेंद्र, मत रुकना मुझे ेन्सॉरगे करना, मुझे यह शर्म चाहिए."
वह धीमे से हांसे, आवाज़ उसके तूफ़ान के खिलाफ मीठा मरहम. "मेरी आग वाली अंगारा, तू बर्बाद नहीं
– नयी पैदाइश हुई है. तेरी हर कराहट मेरे लिए संगीत है. और बता, यह हमें जोश दे." और वह बोली,
इक़रार तूफ़ान की तरह बह रहे थे.
"मैं गन्दी हूँ – मेरे बेटे के लिए बुरा मिसाल. वह सोचता है मैं मज़बूत हूँ, लेकिन देखो मुझे,
दुसरे मर्द के लुंड पर उछलती हुई जब उसका बाप ज़िन्दगी से लड़ रहा है. मैंने घर को मैला किया, दीं को.
तलाक़ hi रास्ता है ाओह्ह्ह्हह्ह"
मेरी रूह काला हो गयी… लेकिन इतना अच्छा लग रहा है, इतना गलत. अब आदत हो गयी है, न? बर्बाद औरत,
जन्नत से ज़्यादा सुकून के पीछे.
उसकी सवार तेज़ हुई, गांड उसकी जाँघों पर चटक चटक बज रही थी हर नीचे जाने पर, उनकी मिलाप की
गीली आवाज़ें कमरे में भर रही थी. वह आगे झुकी, बाल उन पर परदे की तरह, सांसें उसकी गर्दन
पर गरम जब वह और खुद पर इलज़ाम लगाती रही, हर एक उसे और तेज़ कर रहा था.
वक़्त उनके जोश के धुंध में गम हो गया; एक घंटा गुज़र गया बिना पता चले, सिर्फ साँसों की बदलती
रदम और गहरी क़ुरबत से. माँ की हरकतें थकावट से थोड़ी धीमी हुई, लेकिन आग अभी जल रही थी.
अचानक गजेंद्र के हाथ उसकी कमर पर सख्त हुए, उसका जिस्म नीचे से ऊपर उठा उसके साथ मिलने.
"अब, मेरी जान," वह गरज कर बोलै, रफ़्तार तेज़, नीचे से और गहरे तेज़ धक्के. माँ की आँखें फैल गयी;
वह पहचान गयी – उसके मुसलें सख्त, सांसें बेकाबू. "इस बार अंदर hi झाड़ेगा," वह सांस रोकते
हुए बोली, दर और जोश मिला हुआ. "महसूस हो रहा है बढ़ता हुआ… ओह गजेंद्र, प्लीज मत…"
गजेंद्र: (ज़ोर से कराह कर, जिस्म सख्त, कमर ज़ोर से ऊपर) Ahhh—fuck—aa रहा hai—Shahida—le—har
बूँद le—nggghhh!
(वह अंदर hi फूट पड़ा, माँ की छूट में स्पेर्म्स पल्स करते हुए गहरे, मोटे झटके भरते हुए उसे
नीचे दबाये रखा ताकि भाग न सके.)
माँ: (शॉक और दर से सांस रोक कर जब महसूस हुआ वह अंदर hi छोड़ रहा है) न्यू… गजेंद्र…
तूने… अंदर hi… ओह ,.'… तूने क्या कर दिया… (वह अपने अनचाहे क्लाइमेक्स से काँप उठी, जिस्म ने आखरी
बार धोका दिया)
गजेंद्र: (तेज़ सांस लेते हुए, अभी भी अंदर, बुरी मुस्कराहट) फ़क… परफेक्ट था… तूने मुझे इतना अच्छा
दूध दिया, दीनदार रंडी…
माँ: (जल्दी से उठ कर गीली आवाज़ के साथ उससे अलग हुई, उसका माल बहार निकलने लगा, बिस्तर पर बगल
में गिर गयी, सीना ऊपर नीचे, छत पर देखते हुए मायूसी में) तू… तू जानवर… कैसे कर सकता
है? मैंने मन किया था… मिन्नत की… अब मैं तेरे… तेरे गंदे से भरी हूँ… अगर बच्चा हो गया
तो? मेरी ज़िन्दगी… शादी… सब बर्बाद…
गजेंद्र: (साइड पर पलट कर, ऊँगली से उसकी जांघ पर लाइन बनाते हुए, समुग) रिलैक्स, शाहिदा. तू देवी की
तरह सावर होती है. सबसे अच्छी छूट जो कभी मिली – टाइट, गीली, और इतनी गुनहगार. इससे और गरम
बना देती है.
माँ: (चेहरा दूर कर, आवाज़ छोटी टूटी) ऐसा तारीफ मत कर… यह मुझे और बुरा महसूस करवाता है…
मैं गन्दी हूँ… मैंने होने दिया… फिर से…
गजेंद्र: (हँसते हुए, हाथ से उसकी कमर थपथपाते हुए) अरे, अब रोना मत. मेरे बैग में सुबह
की पिल है. जाने से पहले ले लेना. कोई बच्चा नहीं, कोई प्रॉब्लम नहीं. देखा? मैं अपनी पसंदीदा वैली
रंडी का ख्याल रखता हूँ.
माँ: (फिसफिसाते हुए, आंसू गालों पर) अभी दे दे… प्लीज… अभी ले लू… जितना देर तेरे साथ रहूंगी…
उतना बुरा महसूस होगा… दिल भरी है… खुद से नफरत है… घर जाना है… इस गुनाह को धोना है…
गजेंद्र: (धीरे बैठ कर, मुस्कुराते हुए पंत उठाने के लिए) ठीक है, ठीक है. पिल तेरी. लेकिन एक पल के
लिए मानते है – तूने अंदर माल महसूस कर के बहुत पसंद किया. तेरा जिस्म पहले कभी ऐसे नहीं
काँपा था.
माँ: (दोनों हाथों से चेहरा छुपाते हुए, आवाज़ डब्बी) नहीं… नहीं मानती… यह हराम है… गलत है
… बस पिल दे और जाने दे… प्लीज… पहले hi टूट रही हूँ…
बाद में, जब वह अलग हुए, माँ गेस्ट रूम के बिस्तर के किनारे बैठी – ज़्यादा प्राइवेसी के लिए वहां
गए थे – पीली रेशम की शॉर्ट्स पेहेन रही थी और ब्लू वैल ठीक कर रही थी बैखरी बालों पर.
शॉर्ट्स उसके कर्व्स से चिपकी हुई, रेशम लैंप की रौशनी में चमक रही थी, वैल उसके लाल चेहरे को
फ्रेम कर रहा था, कुछ पल पहले के बिखरने से बिलकुल अलग.
गजेंद्र हैडबोर्ड के सहारे लेट गया, सिगरेट जलाई, धुंआ धीमे ऊपर जा रहा था. उसने उसे
देखा मिस्चिएवोउस ग्रीन के साथ. "शाहिदा, तूने बहार बिलकुल रंडी की तरह कराह कर के," वह बेशर्मी
से बोलै, धुंआ छोड़ कर. "इतनी वाइल्ड आवाज़ें, और मांगती रही – कोई भी सोचेगा तू प्रोफेशनल है."
माँ ने उसे देखा, चेहरा डेफिएंस और बाकी सुकून का मिला हुआ. वह झुकी नहीं या शर्म से लाल
नहीं हुई; बल्कि सीधा बैठी, नज़र मिलायी. "और अगर किया तो? उस पल में सही लगा. मुझे छोटा मत
दिखाने की कोशिश कर, गजेंद्र. हम दोनों यहाँ हैं, न? अगर मैं रंडी हूँ, तो तू क्या है?"
उसकी आवाज़ शांत, ऑलमोस्ट चैलेंज भरी, उसके शब्दों को अंदर नहीं लेने देती. वह हांसे, एक और
काश लिया.
"सही कहा, मेरी जान. लेकिन मानते है – हर पल पसंद आया." वह हल्का गुस्सा हुई, सर हिला कर.
"शायद. लेकिन यह हम दोनों के बीच है. लेबल की ज़रुरत नहीं."
प्यास गाला सूखा रही थी म्हणत से, पसीने और म्हणत का नमकीन स्वाद अभी भी. "पानी चाहिए,"
वह धीमे से बोली, कड़ी हुई और शॉर्ट्स ठीक की.
जब वह किचन की तरफ गयी, हिप्स नैचुरली हिल रहे थे, पीली रेशम उसकी भरी गोल गांड से चिपकी
हुई, साइज और शेप को और उभार रही थी. कपडा पतला, ऑलमोस्ट see-through, हर कदम पर थोड़ा
ऊपर चढ़ता, गांड के बीच में फँस जाता जैसे बिना चाहे दावत.
उसकी गांड धीमे से हिल रही थी हरकत में, कर्व्स साफ़ और बहकाने वाली, नज़र को रोक नहीं
पाती. गजेंद्र की नज़र हर हरकत पर थी, आँखें सिकुड़ कर तारीफ में. वह धीमे सर
हिलाया, जान कर मुस्कराहट फैली, जैसे कोई प्राइवेट मज़ाक एन्जॉय कर रहा हो.
मेरे छुपने वाली जगह से हॉलवे के अँधेरे में, मैं भी देख रहा था – पहली बार बिना शर्म
के. मैंने कभी माँ को ऐसे नहीं देखा था, कभी गांड पर नज़र नहीं टिकाई थी.
लेकिन आज रात, बंधन टूट गए; उसकी गांड, इतनी भरी और बिना माफ़ी मांगे, अंदर कुछ जानवरों
जैसा जगाया. सोचा गजेंद्र क्या सोच रहा होगा – उसे कनक्वेस्ट, खिलौना? या कुछ ज़्यादा? उसकी नज़र
नहीं हटी जब वह किचन पहुंची, जग से पानी डाली, गिलास काउंटर पर हलकी आवाज़ से टकराया.
साड़ी देर उसकी नज़र उसकी गांड के आउटलाइन पर थी, शॉर्ट्स कैसे हर चउरवे को उभार रही थी. मैं
समझ गया वह कोई प्लान बना रहा था, कुछ शैतानी उसी हिस्से पर, मुस्कराहट और गहरी
ांतिकिपतिओं में.
माँ ने पानी पिया, ठंडा पानी गले को सुकून दिया, और गेस्ट रूम वापस आयी, उसके बगल में
बैठ गयी. सिगरेट का धुंआ उनकी इंटिमेसी की बाक़ी खुशबू से मिला.
गजेंद्र ने सिगरेट ऐशट्रे में दबाया, उसे देखा आँखों में चमक. "शाहिदा, कभी
सोचा है कुछ अलग तरय करने का? जैसे… पीछे से… तेरी गांड में?" उसका सवाल हवा में
लटका, सीधा लेकिन क्यूरोसिटी भरा.
माँ: (बिस्तर के किनारे बैठी, आबय जाँघों पर नीचे की, आवाज़ कांप रही और धीमी)
गजेंद्र… बस करो. अब घर जाना है. मेरा बीटा इंतज़ार कर रहा है, और… मैं पहले से hi
बहुत गन्दी महसूस कर रही हूँ. प्लीज, जाने दो.
गजेंद्र: (अभी नंगा, लुंड आधा सख्त, दीवार के सहारे मुस्कुराते हुए) गन्दी? तूने तीन
बार मेरे लुंड पर झाड़ गयी, शाहिदा. तेरी दीनदार छूट मांग रही थी. अब प्रेयर मत पर
वापस जाना चाहती है जैसे कुछ हुआ hi नहीं?
माँ: (हाथों को देखते हुए, कांप रही) मैं… गलती की. बहुत बड़ा गुनाह. मेरा शोहर
हॉस्पिटल में है, और मैंने… धोका दिया. यहाँ नहीं रह सकती. ,.' कभी माफ़ नहीं करेगा.
गजेंद्र: (पास आते हुए, आवाज़ अब धीमी, ऑलमोस्ट बहलाते हुए) अरे, इतना ड्रामेटिक मत बन.
तू यहाँ है. बैठ जा. रिलैक्स कर. मेरे पास कुछ और तरय करना है तेरे साथ. कुछ… ख़ास.
बहुत औरतें करती हैं. यह गहरा है, क़रीब करता है.
माँ: (नर्वस नज़र उठा कर) क्या… क्या मतलब? मैंने पहले hi बहुत दे दिया. और कुछ नहीं
कर सकती.
गजेंद्र: (उसके बगल में बैठ कर, हाथ घुटने पर) ऐसे सोच… जैसे कुछ फल अंदर से hi
मीठे होते हैं? गहराई में जाना पड़ता है असली रास चखने के लिए. या जैसे घर में
सीक्रेट दरवाज़ा. ज़्यादातर लोग सिर्फ आगे का दरवाज़ा उसे करते हैं, लेकिन पीछे वाला छुपी हुई
कमरों तक ले जाता है. औरत के जिस्म में भी वही है. एक और तरीका क़रीब होने का.
माँ: (नाक सिकोड़ कर, थोड़ा दूर हुई) गजेंद्र… समझ नहीं आ रहा क्या बोल रहे हो. सीधा
बताओ. घर जाना है.
गजेंद्र: (पास झुक कर, फिसफिसाते हुए) मैं तेरी गांड छोड़ना चाहता हूँ, शाहिदा. वह टाइट
छोटा छेद जिसकी तू बहुत शर्म करती है. अंदर स्लाइड करना चाहता हूँ, तुझे मुझ पर बांध
महसूस करना. सबसे गंदे तरीके से तुझे अपना बनाना.
माँ: (आँखें दर से फैली, जिस्म पीछे हटा) क्या?! नहीं! कभी नहीं! क्या!!! वह… वह छेद
गन्दगी के लिए है! वहां से… टट्टी निकलती है! गन्दा है! मेरा शोहर – मेरा अपना शोहर – कभी
नहीं माँगा! वह मुझे इज़्ज़त देता है! यह हराम है, गजेंद्र! हमारे मज़हब में मन
है! सोडोमी बड़ा गुनाह है! मैं कभी नहीं करने दूंगी!
गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए) सुन तो सही. अब क़ुरान की आयात सुना रही है? हॉस्पिटल में मेरा
माल निगला था अच्छे छोटे रंडी की तरह, और अब स्कॉलर बन गयी? तेरे ईमान ने रोका नहीं हिंदू
लुंड के लिए टांगें फ़ैलाने से.
माँ: (आवाज़ दर से तेज़) वह अलग था! वह… कमज़ोरी थी. लेकिन यह… बिलकुल अलग है. नहीं करुँगी.
नहीं कर सकती. प्लीज, जाने दो.
गजेंद्र: (आवाज़ सख्त) पेट के बल लेट जा, शाहिदा. अभी.
माँ: (सर तेज़ हिला कर) नहीं… गजेंद्र, प्लीज. दर लग रहा है. मत मजबूर कर.
गजेंद्र: (धीमी और गुस्से वाली आवाज़, कलाई पकड़ कर) मैंने कहा लेट जा. सोचती है मासूम
बीवी की तरह निकल जाएगी? तू पहले से बर्बाद है. अंदर माल छोड़ दिया. बीच की तरह करहि थी.
यह कुछ भी नहीं जो तूने पहले किया उसके सामने.
माँ: (आंसू भर आये, आवाज़ छोटी) तू मुझे डरा रहा है… तू गुस्सा है…
गजेंद्र: किचन जा और तेल ले आ.
मेरी माँ जल्दी से किचन गयी जैसे हुक्म हुआ, दर रही थी, उससे गुस्सा नहीं करना चाहती थी. वह
ज़ालिम बन रहा था.
वह रुक गयी, सोचा, फिर बिना बोले कड़ी हुई. कार्नर की शेल्फ से छोटी बोतल तेल ली – घर के काम
का बचा हुआ, शायद मस्सगे या खाना बनाने के लिए. वापस आयी, बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी,
सर बंधे हाथों पर, गांड दावत की तरह पेश.
गजेंद्र के हाथ तुरंत उसकी गांड पर गए, नरम भरी मांस को ज़ोर से मसलते हुए, तेल हाथों
पर लगाकर मस्सगे कर रहा था. उसकी गांड भरी, गोल, दबाव में नरम लेकिन रोज़ की ज़िन्दगी से
सख्त.
मेरे ख्यालों में, छुप कर देखते हुए, सोच रहा था कितना किस्मत वाला है गजेंद्र आज रात
– वह माँ की गांड लेने वाला था, वह जगह जिसे किसी ने छुआ नहीं, बाप ने भी इतने सालों की शादी
में नहीं. वह कुंवारी थी, पाक होने की अलामत उसके भटकने में भी, कोई मर्द वहां नहीं
गया, यह काम और गहरा बना देता था, आखरी रुकावट टूट रही थी.
गजेंद्र: (उसे ज़ोर से खींच कर बिस्तर पर, पेट के बल धकेल कर) अच्छा. दर जा. डरना चाहिए.
जब तक मुझे जो चाहिए न मिले, नहीं जायेगी. ठीक से पलट. गांड ऊपर.
माँ: (सिसकते हुए, मुँह तकिये में, जिस्म कांप रहा) प्लीज… मिन्नत है. मेरा घर… मेरे
बच्चे… अगर देर से घर गयी तो पता चल जायेगा कुछ गलत है…
गजेंद्र: (पीछे घुटनो पर बैठ कर, गांड फैलते हुए धीरे) वह जान जायेंगे तू एक रंडी है
जो बीमार शोहर से धोका देती है. वही जानेंगे. अब रिलैक्स कर अपनी कुंवारी गांड. मैं इसे
बर्बाद करूँगा. फैलाऊंगा. खुलवाऊंगा मेरे लिए. तू कभी नहीं भूलेगी इस छेद का मालिक कौन है.
माँ: (धीमे रोटी हुई) नहीं… प्लीज… पहले से hi बहुत गन्दी महसूस हो रही है… सब खो दिया…
गजेंद्र: (उसकी गांड पर थूक कर, ज़ोर से रगड़ कर) सब खो दिया? तूने डिग्निटी हॉस्पिटल में
घुटनो पर बैठ कर खो दी थी. यह तो ऊपर का चेरी है. एक गन्दी _ रंडी अपने हिंदू
पडोसी से शितोले छुड़वा रही है. ज़ोर से बोल – बता मुझे तू ले रही है.
माँ: (आवाज़ टूट रही, मुश्किल से सुनाई देती) मैं… नहीं… बहुत ज़्यादा है…
गजेंद्र: (गांड पर ज़ोर से थप्पड़) बोल, शाहिदा. वर्ण और दर्द होगा. बोल तू अपना गन्दा टट्टी
वाला छेद छुड़वाने देगी.
माँ: (ज़ोर से रोटी हुई, हार मान कर) …मैं… देगी… प्लीज बस… दर्द मत करना…
गजेंद्र: (मुस्कुराते हुए, सुपर उस पर रगड़ कर) सही है. अच्छी लड़की. तू पहले से सबसे बुरी
रंडी है. पूरा जाने दे. मैं तेरी दीनदार छोटी गांड बर्बाद करूँगा.
माँ: (तकिये में सिसकते हुए) ओह ,.'… माफ़ कर… बहुत शर्मिंदा हूँ…
उसने उसे वैसी रंडी की तरह ट्रीट किया जैसे मैंने ऑनलाइन फोर्बिडन पोर्न वीडियोस में देखा था
– हुक्म देते, चीज़ बनाते, हाथ गांड फैला कर सबसे प्राइवेट जगह दिखा रहे थे.
मैं हैरान था की माँ ने इतनी जल्दी मान लिया; यह वह औरत जो मुझे सख्त --- तालीम देती थी,
मॉडेस्ट रहना सिखाती थी और क़ुरान पद्धति थी. हमारे मज़हब में औरत की गांड में घुसना
सबसे बड़े गुनाहों में से है, हदीथ में मन है जैसे जानवरों के काम, ,.' के गुस्से
और शादी में बिगाड़ का सबब. यह जिस्म और रूह को मैला करता है, इज़्ज़त और सेहत के लिए
मन. फिर भी वह मान गयी.
गजेंद्र: (बुरी मुस्कराहट, हाथ गांड से नीचे, ऊँगली उसकी बांध गांड के दरवाज़े पर) ओह,
शाहिदा, तेरा गन्दा छोटा छेद मांग रहा है. देख कैसे ट्वीटच कर रहा – मैं ऊँगली
अंदर दाल रहा हूँ, तू गन्दी _ रंडी.
माँ: (आँखें दर से फैली, ज़ोर से चिल्लाते हुए, तड़पते हुए और पलटने की कोशिश, हाथ उसके
सीने पर धकेल रहे) नहीं! गजेंद्र, रुक! मत करना! अह्ह्ह! यह घिन आती hai—please, नहीं!
(वह टांगें धीमे लात मारती, गांड बांध कर रोकने की कोशिश, आंसू चेहरे पर बह
रहे) यह मन है! मेरा शोहर ने कभी वहां हाथ नहीं लगाया!
गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, एक हाथ से उसकी टांगें ज़ोर से अलग करके, ऊँगली धीरे से उसकी
टाइट गांड में डालते हुए, गरम विरोध को तोड़ते हुए) बहुत देर हो चुकी है, तुम झूटी छिनाल.
महसूस कर रही हो? मेरी ऊँगली अब तुम्हारी टट्टी वाली छेद में गहरी दाल दी है, जहाँ से तुम्हारी
पाक टट्टी निकलती है. तुम इसके ird-gird कास रही हो जैसे कोई बेबस धोकेबाज़ — शायद तुम्हारी
किताबों में वैली की गांड में ऊँगली डालने का ज़िक्र नहीं है, है न?
माँ: (ज़ोर से चिल्लाते हुए, जिस्म शॉक और शर्म से टेढ़ा हो जाता है, नाख़ून उसके बाहों में
गाड़ते हुए हाथ हटाने की कोशिश में) आआह! रुको! दर्द हो रहा है — बहार निकालो! हे
भगवन, मुझे माफ़ कर दो… यह मेरी बेइज़्ज़ती हद्द से ज़्यादा कर रहा है… ममम… मिन्नत है,
रुक जाओ!
गजेंद्र: (ऊँगली और गहरी धकेल कर, अंदर घूमते हुए, उसकी मिन्नत को नज़रअंदाज़ करते हुए)
जितनी मिन्नत करनी है कर लो, शाहिदा. यह मिलता है तुम्हे इतना पाक बनने का नाटक करने की सजा,
मस्जिद में ,,., पढ़ने वाली और चुपके से लुंड की प्यासी. तुम्हारी गांड इतनी गन्दी और गरम
है — बिलकुल उस _ शर्म के टट्टी से भरी हुई.
माँ: (ज़ोर से चीखते हुए भी be-ikhtiyar कराह रही, कमर उठा कर उसे हटाने की कोशिश, एक
हाथ पीछे जा कर उसकी कलाई पकड़ कर खींचती) नहीं… अह्ह्ह! अभी बहार निकालो! यह सब
बर्बाद कर देगा — मिन्नत है, मेरी इज़्ज़त मत बर्बाद करो… ओह्ह… मेरा ईमान, मेरा
ghar-baar… रुक जाओ!
गजेंद्र: (आखिर ऊँगली धीरे बहार निकालते हुए, उसे नाक के पास ले जा कर ज़ोर से सूंघते हुए,
आँखें उसकी आँखों में गड़े) ममम, यह बू सूँघो? तुम्हारी गांड की टट्टी की बू आ रही
है, शाहिदा — ताज़ा टट्टी और तुम्हारी नकली पाकि का मिक्सचर. तुम कोई नेक बीवी नहीं, तुम एक
बदबूदार शौचालय हो जो संत बनने का नाटक करती है. कैसा लग रहा है जान्ने से की तुम्हारी
सबसे छुपी छेद अब सीवर जैसी बू दे रही है तुम्हारे आबय के नीचे?
माँ: (सांस फूलते हुए, शर्म से सिमट कर, आवाज़ कांप रही जब वह अपने आप को छुपाती
है) ओह्ह्ह… यह कितनी बेइज़्ज़ती है… प्लीज, ऐसे शब्द मत बोलो और… ममम… तुम मेरा नाम,
मेरी पाकि बर्बाद कर रहे हो… रुक जाओ!
गजेंद्र: (अँधेरे में हँसते हुए, अब अपनी बीच की ऊँगली को उसके hi रास से गीला कर के बिना
चेतावनी के उसकी गांड में फिर से धकेल देते हुए, पहले से ज़्यादा गहरा) नाम बर्बाद
करना? शाहिदा पाक? ज़्यादा सही शाहिदा Tatti-Boo वाली छिनाल. महसूस करो यह दूसरी ऊँगली
तुम्हारी गन्दी छेद को खींच रही है — तुम सिर्फ एक धोकेबाज़ कुटिया हो जो वैल के पीछे
छुप कर पडोसी का लुंड चूसती है जब उसका शोहर हॉस्पिटल में साद रहा है. तुम्हारे
बच्चे तुम्हे मिसाल समझते हैं? है, तुम एक वीर्य पीने वाली नकली औरत हो जिसकी गांड
झूठ और मसाला की पुदीने की बू से भरी है.
माँ: (फिर ज़ोर से चीखते हुए, जिस्म हिलता हुआ, उसके हाथ पर थप्पड़ मरते हुए और पलटने
की कोशिश) आआह! नहीं, एक और नहीं! बहार निकालो — मिन्नत है गजेंद्र, रेहम करो! अहह…
यह मेरी इतनी बेइज़्ज़ती कर रहा है… हे भगवन क्यों… ममम… मुझे ऐसे मैला मत करो!
गजेंद्र: (ऊँगली अंदर बहार ज़ोर ज़ोर से चलते हुए, फिर बहार निकाल कर ज़ोर से सूंघते हुए,
उसे उसकी नाक के नीचे हिलाते हुए) यह सूँघो, बेकार रंडी. तुम्हारी अपनी टट्टी की बू —
तुम्हारा पाक नाम हमेशा के लिए मैला. शाहिदा का मतलब 'ज़िंदा', लेकिन तुम्हारी बू
मुर्दा इज़्ज़त जैसी है. पाक बनने का नाटक? तुम नाली से भी गन्दी हो, हिंदू के लिए टांगें
फैलाती हो और दुआ पढ़ती हो. तुम्हारा इमाम तुम पर थूक देगा, तुम्हारी दादी ज़ैनब शायद
वही छिनाल खून थी जो तुम तक आया.
माँ: (सर पलट कर, चीखते हुए जब वह ऊँगली उसके चेहरे के पास लाता है, हाथ कमज़ोर
से उसे हटाते हुए) नहीं! मुझे मत सुँघाओ — अह्ह्ह! यह गन्दा है… प्लीज रुक जाओ, तुम
मेरी रूह तोड़ रहे हो… ममम… मेरा मज़हब यह बेइज़्ज़ती इजाज़त नहीं देता… ओह्ह… मिन्नत है,
और मत!
गजेंद्र: (ऊँगली थोड़ी देर उसके होंठों पर दबाते हुए फिर पीछे खिंच कर, मुस्कुराते हुए)
अपनी बेइज़्ज़ती का स्वाद चखो, शाहिदा. तुम कोई वफादार _ नहीं, तुम एक tatti-boo वाली
जीना करने वाली हो, बीमार शोहर को, बच्चों को, खुदा को धोका देती हो — सिर्फ इसके लिए. कैसी
लगी यह नकली पाकि बर्बाद करना? अब तुम सिर्फ एक गन्दी, be-izzat छेद रह गयी हो.
बाद में, उसने उँगलियों से उसकी पंतय और शॉर्ट्स की कमर पकड़ी और एक hi झटके में टांगों
से नीचे कर दिया, उसे बिलकुल नंगा कर दिया.
उसके गांड के दोनों हिस्से थोड़ा अलग हुए, टाइट, सिकुड़ी हुई छेद दिखी. उसने और तेल डाला,
उँगलियों से धीरे धीरे gol-gol मस्सगे करते हुए, पहले हलके से छेड़ते हुए, फिर गहरा,
जिससे उसके मुँह से हलकी सांस निकलती है. "अपनी बड़ी गांड के दोनों हिस्से मेरे लिए फैलाओ, शाहिदा,"
उसने हुक्म दिया, आवाज़ में इख़्तियार.
वह रुक गयी, फिर पीछे हाथ दाल कर अपने मांस को पकड़ कर अलग करती है. "प्लीज गजेंद्र
… नरम रहना. मिन्नत है — मुझे अच्छा महसूस कराओ."
उसने मुस्कुराते हुए बेइज़्ज़ती भरे शब्दों में कहा. "पहले से मिन्नत? कितनी भूखी छिनाल
बन गयी हो. ज़्यादा फैलाओ — मुझे इंतज़ार मत करवाओ." उसकी बड़ी गांड, इतनी नरम और लुभाने
वाली, उसे सीधा करने में मुश्किल दे रही थी; गांड के हिस्से विरोध कर रहे थे, बंद हो रहे
थे. "अरे, यह मोती गांड बीच में आ रही है," उसने बेइज़्ज़ती की, एक गांड पर हल्का थप्पड़
मारा.
"ठीक से फैलाओ औरत — मुझे तड़पा मत." उसने अपना लुंड पूरा तेल से गीला किया, चमक रहा
था, और खुद को पोजीशन किया, सर उसकी छेद पर रखा. माँ चिल्लाई, "रुको — बहार निकालो! बहुत
ज़्यादा है!" लेकिन वह आगे बढ़ा, बुरी बातें करते हुए. "चुप और ले लो, छिनाल. मत कसो —
ढीला करो, वर्ण ज़्यादा दर्द होगा. तुमने यह चाहा था, याद है?"
माँ: (तेज़ सांस लेते हुए जब गजेंद्र अचानक अपने लुंड का सर उसकी टाइट, कभी न छुई गांड
पर दबाता है, जिस्म सख्त हो जाता है) नहीं… गजेंद्र, वहां नहीं! प्लीज… वहां कभी नहीं…
अह्ह्ह!
गजेंद्र: (बुरी तरह मुस्कुराते हुए, उसकी सिकुड़ी छेद पर थूक कर मोटा सर ज़ोर से धकेल देते
हुए विरोध को तोड़ते हुए) अपना पाक मुँह बंद करो, शाहिदा. आज यह पाक _ गांड
चूड़ी जाएगी. महसूस कर रही हो? तुम्हारी टट्टी वाली छेद हिंदू लुंड के ird-gird खुल रही है
— कितना जलता अच्छा लग रहा है, है न?
माँ: (आवाज़ पहात कर ऊँची चीख में बदल जाती जब वह गहरा धकेल रहा है, एक एक ज़ुल्म
भरा इंच) अह्ह्ह… ओह ,.'… दर्द हो रहा है… ममम… बहुत बड़ा… प्लीज धीरे… यह
गुनाह है… बिलकुल गुनाह…
गजेंद्र: (अब ज़ोर से धक्का देते हुए, आधा लुंड एक hi धक्के में दाल देते हुए, हाथ कमर
पर पकड़ कर) गुनाह? तुम्हे गुनाह पसंद है, गन्दी वैली रंडी. मेरे लिए चीखो. बताओ कितनी
टाइट है तुम्हारी गांड अपनी धोकेबाज़ छूट से.
माँ: (टूटी हुई कराहते हुए, आंसू बह रहे, जिस्म हर धक्के से आगे हिलता) अहह… अहह… यह…
बहुत टाइट… ममम… मैं नहीं… गजेंद्र रुक जाओ… मेरा मज़हब… मेरी रूह…
गजेंद्र: (एकदम से पूरा अंदर धकेल देते हुए, उसे चीखने पर मजबूर करते हुए) ठीक
से जवाब दो, छिनाल. कौन सा लुंड अभी तुम्हारी कुंवारी गांड बर्बाद कर रहा है? ज़ोर से
बोलो.
माँ: (रोने और कराहते हुए, आवाज़ कांप रही) तुम्हारा… अह्ह्ह… गजेंद्र का लुंड… यह मेरी
… मेरी गांड बर्बाद कर रहा है…
जब वह गहरा धकेल रहा था इंच इंच, मैं देखता रहा, हाथ पंत के ऊपर से अपना लुंड
सहलाता हुआ, शर्मिंदा लेकिन उत्तेजित. कैसे देख सकता हूँ अपनी माँ को रंडी बनाते हुए, इतनी
बेइज़्ज़ती होते हुए? अब उसका पूरा लुंड अंदर था, हिलत तक.
वह उसकी गांड बर्बाद करना चाहता था, ज़ुल्म भरे इरादे से धक्के मर रहा था, ज़ोर ज़ोर
से छोड़ रहा था, बिस्तर हिल रहा था. उसके गांड के हिस्से हर धक्के से हिल रहे थे, लहार जैसे
मांस पर. वह नीचे हाथ दाल कर अपनी छूट सहलाने लगी, कराह रही थी, और उसने बेइज़्ज़ती
की: "खुद को सेहला रही हो जैसे कोई बेबस कुटिया? घिन आती है."
गजेंद्र: (लगातार धक्के देते हुए, चमड़ी चमड़ी टकरा रही) अच्छी लड़की. अब बताओ अपने
बेकार शोहर के लुंड के बारे में. कितना छोटा है? क्या वह तुम्हे कभी झाड़ता भी है?
बोलो, वर्ण इस छेद को छोड़ता रहूँगा जब तक तुम टट्टी न कर दो.
माँ: (मिन्नत भरी आवाज़ में, चेहरा शर्म से लाल) यह… छोटा… ममम… उसने कभी…
अहह… कभी मुझे संतुष्ट नहीं किया… जैसे यह…
गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, उसके वैल से सर पीछे खींच कर) ज़ोर से बोलो, कुटिया. बोलो:
“मेरे शोहर का छोटा लुंड बेकार है. वह एक कमज़ोर कुक है जो अपनी बीवी को छोड़ नहीं सकता.”
माँ: (आवाज़ कांप रही, शर्म से कराहते हुए मान लेती) मेरा… अह्ह्ह… शोहर का छोटा लुंड
बेकार है… वह एक कमज़ोर कुक है… जो अपनी बीवी को छोड़ नहीं सकता… हे भगवन मुझे माफ़
कर दो…
गजेंद्र: (और ज़ोर से धक्के देते हुए, उसकी गांड हिलाते हुए) बिलकुल सही. अब बोलो तुम असल में
क्या हो. बोलो: “मैं एक गन्दी _ छिनाल हूँ जो अपनी टट्टी वाली छेद को काफिर लुंड से
बर्बाद करवाना पसंद करती है.”
Maa: (cheekhte hue, jism be-ikhtiyar uske ird-gird kas raha) Main… ahhh… main ek gandi _
chhinal hoon… jo apni tatti wali ched ko… kafir lund se barbaad karwana pasand karti hai… mmm…
Gajendra: (garajte hue, haath aage daal kar uski clit ko zor se dabate hue) Aur bolo. Apne ko aur
bura bolo. Sach bolo, tum jhooti dua padhne wali randi.
Maa: (zor se karahate hue, shabd toot toot kar nikal rahe) Main… ek gandi haram dhokebaaz kutiya…
ek lund ki pyaasi veili randi… ahh… Hiindu veery ka shauchalay… main gandi hoon… main iski
haqdaar hoon…
Gajendra: (zulm bhare dhakke dete hue, awaaz mein nafrat) Haan haqdaar ho. Phir se bolo — zor
se. Bolo ki tum mere pairon ke neeche ki mitti se bhi neeche ho kyunki tumne mujhe har ched
maila karne di jo tumhare shohar ne kabhi chhua nahi.
Maa: (rone wali karahate hue, bilkul toot chuki) Main… ahhh… mitti se bhi neeche… maine tumhe har
ched maila karne di… jo mera shohar kabhi nahi chhua… main kuchh nahi… sirf ek bekaar… gaand
chudi hui chhinal…
Gajendra: (garajte hue, tez aur be-rehem raftaar) Yeh meri acchi chhoti _ suar. Karahati raho
jaise be-sharam shauchalay ho jab main is paak tatti wali ched ko barbaad kar raha hoon. Ab tum
meri ho, Shahida — tumhara har ganda inch mera hai।
मेरी माँ अब वह पाकीज़ह और नेक माँ नहीं रही, अब तोह वह सच
में एक पूरी रंडी बन चुकी है.
माँ अभी भी उसके ऊपर ऊपर नीचे हो रही थी, ज़ोर ज़ोर से कराह रही थी, उसका जिस्म पसीने से चमक
रहा था लिविंग रूम की बेडसाइड लैंप की हलकी रौशनी में, जो अब हमारा राज़ का अड्डा बन गया था.
हवा में उनकी जोश की मुस्की खुशबू घुली हुई थी, पुराण सोफे उनके वज़न के नीचे चीख रहा
था.
गजेंद्र पीछे लेट गया था, उसका चौड़ा सीना ऊपर नीचे हो रहा था, हाथ ढीले से उसकी कमर
पकडे हुए, जब वह कण्ट्रोल ले रही थी, खुद को उसके मोटे लुंड से ऑलमोस्ट पूरा ऊपर उठती और फिर ज़ोर
से नीचे बैठ जाती, जिससे उसके भरे हुए चूचे उसकी उलझी हुई ब्लाउज के नीचे ज़ोर ज़ोर से उछलते.
उसकी आँखें आधी बांध थी सुकून में, होंठ खुले हुए, गले से गहरी आवाज़ें निकल रही थी –
मोती, आवाज़ वाली कराहटें जो खामोश घर में हराम संगीत की तरह गूँज रही थी.
"ओह, शाहिदा, मेरी सुन्दर कमल," गजेंद्र धीमे से बोलै, आवाज़ गहरी और हस्की, उस मिठास भरे
लहजे में जो उसे और गहरे ले जाता था. "तुम बिलकुल परफेक्ट हो, देवी की तरह मुझ पर सवार. चलती
रहो, मेरी जान, दिखाओ कितना ज़रुरत है तुम्हे इसकी."
वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी; बल्कि उसके शब्दों ने उसे और जोश दिया, हरकतें और जान बूझ
कर, और बेचैन. माँ की जांघें हर उठने नीचे में सख्त हो रही थी, घुटने सोफे के कुशिओं
में धंस रहे थे दोनों तरफ, हाथ उसके सीने पर मज़बूत टिकाये हुए. उसके अंदरूनी जाँघों की
रेशम उसकी खाल से रगड़ रही थी, हर एहसास को और तेज़ कर रही थी.
वह नीचे हर बार छोटे गोल चक्कर लगाती, उसे पूरा महसूस करती, स्ट्रेच करती जिससे वह सांस
रोक लेती. "हाँ, मेरा प्यारा मोर," गजेंद्र बोलै, आँखें उसकी आँखों में, होठों पर चालाक
मुस्कराहट, हाथ ऊपर उठा कर उसके गाल को सेहला रहा था.
"आज रात तुम मेरे लिए खिल रही हो. मत रुकना, मेरी मीठी मोहिनी – मुझे हर इंच महसूस होने दो
तुम्हारे जोश का." उसके रोमांटिक नाम शहद की तरह बह रहे थे, हर एक धीमा धक्का, उसे और
खोने के लिए.
माँ: (गजेंद्र पर बिस्तर पर बैठी, आबय कमर तक ऊपर चढ़ी हुई, वैल अभी भी सर पर लेकिन थोड़ा
ढीला, धीरे से उसके मोटे लुंड पर बैठती हुई, सांस रोक कर जब पूरा अंदर जाता है) अह्ह्ह… गजेंद्र
… धीरे… प्लीज… यह पहले से hi बहुत बड़ा गुनाह है…
गजेंद्र: (हाथ उसकी चौड़ी कमर पर, हरकतें गाइड करते हुए, उसके लाल चेहरे पर मुस्कुराते हुए)
मुझ पर सवार हो, शाहिदा. ऊपर नीचे जैसे अच्छे छोटे _ रंडी की तरह. महसूस कर रहा है
कितना गहरा हूँ? तेरी दीनदार छूट फिर से मुझे भिगो रही है.
माँ: (हरकत शुरू, पहले ना चाहते हुए कमर घूमती, फिर तेज़, अपने आप को रोक नहीं पाती, होंठ काट
कर कराहटें रोकने की कोशिश) ममम… नहीं… नहीं करना चाहिए… ओह ,.'… यह महसूस… अहह… कितना
गलत… लेकिन रुक नहीं प् रही…
गजेंद्र: (नीचे से धक्के देते हुए उसके साथ मिल कर, आवाज़ और सख्त) फ़क, कितनी टाइट है तू… हिंदू
लुंड पर उछाल रही है… तेरा शोहर कभी ऐसे भर नहीं सकता तुझे, न?
माँ: (चूचे टॉप के नीचे उछाल रहे, आवाज़ शर्म और बढ़ते सुकून से कांप रही) प्लीज… ऐसा
मत बोलो… वह बीमार है… यह धोका है… ममम… मैं बुरी बीवी हूँ… बुरी _…
गजेंद्र: (गहरी आवाज़ से कराह कर, आँखें उसके हिलते जिस्म पर) सहित… शाहिदा… मैं झड़ने वाला हूँ
… बहुत ज़ोर से अंदर hi…
माँ: (आँखें दर से फैली, लेकिन कमर नीचे hi घूमती रही) नहीं! गजेंद्र, नहीं – अंदर मत छोड़ना!
बहार निकाल… प्लीज… मैं मिन्नत कर रही हूँ… मत… अहह… रिस्क मत ले…
गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए, दांत पीस कर, हाथ उसकी गांड ज़ोर से दबाते हुए उसे हिलाते रखा) अब
मिन्नत? हॉस्पिटल में मेरा लुंड चूसने के वक़्त कहाँ थी यह मिन्नत? या दस मिनट पहले टांगें
फ़ैलाने के वक़्त? तू पहले से बर्बाद है, शाहिदा – अब पूरा माल ले ले जैसे सही रंडी.
माँ: (तेज़ सवार होने लगी बेचैनी में, आवाज़ पहात रही, आंसू भर आये) नहीं, नहीं प्लीज… तेरा
बच्चा नहीं हो सकता… सब बर्बाद हो जायेगा… मेरा घर… मेरा ईमान… बहार निकाल… मैं अपनी रूह
पर क़सम देती हूँ… अंदर मत छोड़ना… या ,.', माफ़ कर दे…
गजेंद्र: (सांस रुक रुक कर, धक्के बेकाबू) बहुत देर हो गयी… फ़क… तेरी मिन्नत सुन कर और ज़्यादा
ब्रीड करने का मैं कर रहा है… सोच, तेरा पेट फूलता हुआ मेरा हिंदू बच्चा… जब तू रोज़ पांच
वक़्त ,,., पड़ेगी प्रेटेंडिंग पुरे होने की…
माँ: (कराहटें के बीच धीमे रोने लगी, फिर भी बेबस उछलती रही) बस कर… प्लीज ऐसा मत बोल…
दिल को दर्द होता है… मत… अंदर मत ख़तम कर… कुछ भी करुँगी… बस वहां नहीं…
लेकिन सुकून के बीच माँ की कराहटें टुकड़े टुकड़े इक़रार बन गयी, आवाज़ टूट रही थी जब अंदर से खुद से
नफरत उभर रही थी. "अहह… मैं कितनी बुरी माँ हूँ, आअह्ह्ह्ह" वह सिसकारी, एक पल के लिए रदम रुक गया
फिर ज़ोर से नीचे बैठ गयी, जैसे खुद को सजा दे रही हो.
"कैसे कर सकती हूँ यह? मेरा बीटा… आआह्ह्ह्ह ऊह्ह्ह्ह… वह मुझे देखता है, और मैं यहाँ रंडी की
तरह. सब बर्बाद कर दिया – शादी, ईमान. हुसैन इसका हक़दार नहीं… ओह ,.', माफ़ कर." आंसू आँखों
में भर आये, पसीने के साथ मिल कर चेहरे पर बह रहे थे, लेकिन रुक नहीं रही थी; जिस्म उसके शब्दों से
धोका दे रहा था, रिलीज़ के पीछे दौड़ रहा था.
गजेंद्र धीमे से हांसे, हाथ ऊपर उठा कर उसके चूचे पकडे, अंगूठा निप्पल्स को छेड़ रहा था.
"श, मेरी जादुई गुलाब, तू बुरी नहीं – तू ज़िंदा है. सावर होती रहो, सब निकाल दो."
वह सर हिला रही थी, लेकिन कमर हिलती रही, ऊपर नीचे be-ruk, अंदरूनी दीवारें हर धक्के पर उसके चरों
तरफ बांध रही थी. "मैंने अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी," वह कराहटें के बीच रोई, आवाज़ तेज़ होती गयी
जब सुकून बढ़ा.
"इतने साल दीनदार बन कर, पांच वक़्त ,,.,, और अब… यह. हुसैन से तलाक़ मांग लू – वह बीमार है,
हॉस्पिटल बीएड पर तड़प रहा है, और मैं यहाँ धोका दे रही हूँ. कैसी बीवी हूँ मैं? खुदगर्ज़,
गुनहगार आह्ह्ह्ह. मुझे बहार निकाल देना चाहिए, कम्युनिटी से निकाल देना. मेरा घर कभी माफ़ नहीं
करेगा… अहह, हाँ वही… नहीं, मतलब मैं खुद से नफरत करती हूँ इसके लिए! ोुह्ह्ह्ह गजेन्द्रा"
उसके शब्द जल्दी जल्दी निकले, गुनाह और सुकून का मिला जुला तूफ़ान, जिस्म पीछे झुक गया तेज़ सवार करते हुए,
नाख़ून उसके कन्धों में धंस रहे थे.
"मैं _ औरत के तौर पर नाकाम हूँ – हराम, सब कुछ. क्यों रुक नहीं पाती? जैसे शैतान ने
पकड़ लिया हो. हुसैन से ख़तम करुँगी, नयी शुरुआत, लेकिन कैसे? तेरे साथ? नहीं, वह और बुरा होगा…
ओह गजेंद्र, मत रुकना मुझे ेन्सॉरगे करना, मुझे यह शर्म चाहिए."
वह धीमे से हांसे, आवाज़ उसके तूफ़ान के खिलाफ मीठा मरहम. "मेरी आग वाली अंगारा, तू बर्बाद नहीं
– नयी पैदाइश हुई है. तेरी हर कराहट मेरे लिए संगीत है. और बता, यह हमें जोश दे." और वह बोली,
इक़रार तूफ़ान की तरह बह रहे थे.
"मैं गन्दी हूँ – मेरे बेटे के लिए बुरा मिसाल. वह सोचता है मैं मज़बूत हूँ, लेकिन देखो मुझे,
दुसरे मर्द के लुंड पर उछलती हुई जब उसका बाप ज़िन्दगी से लड़ रहा है. मैंने घर को मैला किया, दीं को.
तलाक़ hi रास्ता है ाओह्ह्ह्हह्ह"
मेरी रूह काला हो गयी… लेकिन इतना अच्छा लग रहा है, इतना गलत. अब आदत हो गयी है, न? बर्बाद औरत,
जन्नत से ज़्यादा सुकून के पीछे.
उसकी सवार तेज़ हुई, गांड उसकी जाँघों पर चटक चटक बज रही थी हर नीचे जाने पर, उनकी मिलाप की
गीली आवाज़ें कमरे में भर रही थी. वह आगे झुकी, बाल उन पर परदे की तरह, सांसें उसकी गर्दन
पर गरम जब वह और खुद पर इलज़ाम लगाती रही, हर एक उसे और तेज़ कर रहा था.
वक़्त उनके जोश के धुंध में गम हो गया; एक घंटा गुज़र गया बिना पता चले, सिर्फ साँसों की बदलती
रदम और गहरी क़ुरबत से. माँ की हरकतें थकावट से थोड़ी धीमी हुई, लेकिन आग अभी जल रही थी.
अचानक गजेंद्र के हाथ उसकी कमर पर सख्त हुए, उसका जिस्म नीचे से ऊपर उठा उसके साथ मिलने.
"अब, मेरी जान," वह गरज कर बोलै, रफ़्तार तेज़, नीचे से और गहरे तेज़ धक्के. माँ की आँखें फैल गयी;
वह पहचान गयी – उसके मुसलें सख्त, सांसें बेकाबू. "इस बार अंदर hi झाड़ेगा," वह सांस रोकते
हुए बोली, दर और जोश मिला हुआ. "महसूस हो रहा है बढ़ता हुआ… ओह गजेंद्र, प्लीज मत…"
गजेंद्र: (ज़ोर से कराह कर, जिस्म सख्त, कमर ज़ोर से ऊपर) Ahhh—fuck—aa रहा hai—Shahida—le—har
बूँद le—nggghhh!
(वह अंदर hi फूट पड़ा, माँ की छूट में स्पेर्म्स पल्स करते हुए गहरे, मोटे झटके भरते हुए उसे
नीचे दबाये रखा ताकि भाग न सके.)
माँ: (शॉक और दर से सांस रोक कर जब महसूस हुआ वह अंदर hi छोड़ रहा है) न्यू… गजेंद्र…
तूने… अंदर hi… ओह ,.'… तूने क्या कर दिया… (वह अपने अनचाहे क्लाइमेक्स से काँप उठी, जिस्म ने आखरी
बार धोका दिया)
गजेंद्र: (तेज़ सांस लेते हुए, अभी भी अंदर, बुरी मुस्कराहट) फ़क… परफेक्ट था… तूने मुझे इतना अच्छा
दूध दिया, दीनदार रंडी…
माँ: (जल्दी से उठ कर गीली आवाज़ के साथ उससे अलग हुई, उसका माल बहार निकलने लगा, बिस्तर पर बगल
में गिर गयी, सीना ऊपर नीचे, छत पर देखते हुए मायूसी में) तू… तू जानवर… कैसे कर सकता
है? मैंने मन किया था… मिन्नत की… अब मैं तेरे… तेरे गंदे से भरी हूँ… अगर बच्चा हो गया
तो? मेरी ज़िन्दगी… शादी… सब बर्बाद…
गजेंद्र: (साइड पर पलट कर, ऊँगली से उसकी जांघ पर लाइन बनाते हुए, समुग) रिलैक्स, शाहिदा. तू देवी की
तरह सावर होती है. सबसे अच्छी छूट जो कभी मिली – टाइट, गीली, और इतनी गुनहगार. इससे और गरम
बना देती है.
माँ: (चेहरा दूर कर, आवाज़ छोटी टूटी) ऐसा तारीफ मत कर… यह मुझे और बुरा महसूस करवाता है…
मैं गन्दी हूँ… मैंने होने दिया… फिर से…
गजेंद्र: (हँसते हुए, हाथ से उसकी कमर थपथपाते हुए) अरे, अब रोना मत. मेरे बैग में सुबह
की पिल है. जाने से पहले ले लेना. कोई बच्चा नहीं, कोई प्रॉब्लम नहीं. देखा? मैं अपनी पसंदीदा वैली
रंडी का ख्याल रखता हूँ.
माँ: (फिसफिसाते हुए, आंसू गालों पर) अभी दे दे… प्लीज… अभी ले लू… जितना देर तेरे साथ रहूंगी…
उतना बुरा महसूस होगा… दिल भरी है… खुद से नफरत है… घर जाना है… इस गुनाह को धोना है…
गजेंद्र: (धीरे बैठ कर, मुस्कुराते हुए पंत उठाने के लिए) ठीक है, ठीक है. पिल तेरी. लेकिन एक पल के
लिए मानते है – तूने अंदर माल महसूस कर के बहुत पसंद किया. तेरा जिस्म पहले कभी ऐसे नहीं
काँपा था.
माँ: (दोनों हाथों से चेहरा छुपाते हुए, आवाज़ डब्बी) नहीं… नहीं मानती… यह हराम है… गलत है
… बस पिल दे और जाने दे… प्लीज… पहले hi टूट रही हूँ…
बाद में, जब वह अलग हुए, माँ गेस्ट रूम के बिस्तर के किनारे बैठी – ज़्यादा प्राइवेसी के लिए वहां
गए थे – पीली रेशम की शॉर्ट्स पेहेन रही थी और ब्लू वैल ठीक कर रही थी बैखरी बालों पर.
शॉर्ट्स उसके कर्व्स से चिपकी हुई, रेशम लैंप की रौशनी में चमक रही थी, वैल उसके लाल चेहरे को
फ्रेम कर रहा था, कुछ पल पहले के बिखरने से बिलकुल अलग.
गजेंद्र हैडबोर्ड के सहारे लेट गया, सिगरेट जलाई, धुंआ धीमे ऊपर जा रहा था. उसने उसे
देखा मिस्चिएवोउस ग्रीन के साथ. "शाहिदा, तूने बहार बिलकुल रंडी की तरह कराह कर के," वह बेशर्मी
से बोलै, धुंआ छोड़ कर. "इतनी वाइल्ड आवाज़ें, और मांगती रही – कोई भी सोचेगा तू प्रोफेशनल है."
माँ ने उसे देखा, चेहरा डेफिएंस और बाकी सुकून का मिला हुआ. वह झुकी नहीं या शर्म से लाल
नहीं हुई; बल्कि सीधा बैठी, नज़र मिलायी. "और अगर किया तो? उस पल में सही लगा. मुझे छोटा मत
दिखाने की कोशिश कर, गजेंद्र. हम दोनों यहाँ हैं, न? अगर मैं रंडी हूँ, तो तू क्या है?"
उसकी आवाज़ शांत, ऑलमोस्ट चैलेंज भरी, उसके शब्दों को अंदर नहीं लेने देती. वह हांसे, एक और
काश लिया.
"सही कहा, मेरी जान. लेकिन मानते है – हर पल पसंद आया." वह हल्का गुस्सा हुई, सर हिला कर.
"शायद. लेकिन यह हम दोनों के बीच है. लेबल की ज़रुरत नहीं."
प्यास गाला सूखा रही थी म्हणत से, पसीने और म्हणत का नमकीन स्वाद अभी भी. "पानी चाहिए,"
वह धीमे से बोली, कड़ी हुई और शॉर्ट्स ठीक की.
जब वह किचन की तरफ गयी, हिप्स नैचुरली हिल रहे थे, पीली रेशम उसकी भरी गोल गांड से चिपकी
हुई, साइज और शेप को और उभार रही थी. कपडा पतला, ऑलमोस्ट see-through, हर कदम पर थोड़ा
ऊपर चढ़ता, गांड के बीच में फँस जाता जैसे बिना चाहे दावत.
उसकी गांड धीमे से हिल रही थी हरकत में, कर्व्स साफ़ और बहकाने वाली, नज़र को रोक नहीं
पाती. गजेंद्र की नज़र हर हरकत पर थी, आँखें सिकुड़ कर तारीफ में. वह धीमे सर
हिलाया, जान कर मुस्कराहट फैली, जैसे कोई प्राइवेट मज़ाक एन्जॉय कर रहा हो.
मेरे छुपने वाली जगह से हॉलवे के अँधेरे में, मैं भी देख रहा था – पहली बार बिना शर्म
के. मैंने कभी माँ को ऐसे नहीं देखा था, कभी गांड पर नज़र नहीं टिकाई थी.
लेकिन आज रात, बंधन टूट गए; उसकी गांड, इतनी भरी और बिना माफ़ी मांगे, अंदर कुछ जानवरों
जैसा जगाया. सोचा गजेंद्र क्या सोच रहा होगा – उसे कनक्वेस्ट, खिलौना? या कुछ ज़्यादा? उसकी नज़र
नहीं हटी जब वह किचन पहुंची, जग से पानी डाली, गिलास काउंटर पर हलकी आवाज़ से टकराया.
साड़ी देर उसकी नज़र उसकी गांड के आउटलाइन पर थी, शॉर्ट्स कैसे हर चउरवे को उभार रही थी. मैं
समझ गया वह कोई प्लान बना रहा था, कुछ शैतानी उसी हिस्से पर, मुस्कराहट और गहरी
ांतिकिपतिओं में.
माँ ने पानी पिया, ठंडा पानी गले को सुकून दिया, और गेस्ट रूम वापस आयी, उसके बगल में
बैठ गयी. सिगरेट का धुंआ उनकी इंटिमेसी की बाक़ी खुशबू से मिला.
गजेंद्र ने सिगरेट ऐशट्रे में दबाया, उसे देखा आँखों में चमक. "शाहिदा, कभी
सोचा है कुछ अलग तरय करने का? जैसे… पीछे से… तेरी गांड में?" उसका सवाल हवा में
लटका, सीधा लेकिन क्यूरोसिटी भरा.
माँ: (बिस्तर के किनारे बैठी, आबय जाँघों पर नीचे की, आवाज़ कांप रही और धीमी)
गजेंद्र… बस करो. अब घर जाना है. मेरा बीटा इंतज़ार कर रहा है, और… मैं पहले से hi
बहुत गन्दी महसूस कर रही हूँ. प्लीज, जाने दो.
गजेंद्र: (अभी नंगा, लुंड आधा सख्त, दीवार के सहारे मुस्कुराते हुए) गन्दी? तूने तीन
बार मेरे लुंड पर झाड़ गयी, शाहिदा. तेरी दीनदार छूट मांग रही थी. अब प्रेयर मत पर
वापस जाना चाहती है जैसे कुछ हुआ hi नहीं?
माँ: (हाथों को देखते हुए, कांप रही) मैं… गलती की. बहुत बड़ा गुनाह. मेरा शोहर
हॉस्पिटल में है, और मैंने… धोका दिया. यहाँ नहीं रह सकती. ,.' कभी माफ़ नहीं करेगा.
गजेंद्र: (पास आते हुए, आवाज़ अब धीमी, ऑलमोस्ट बहलाते हुए) अरे, इतना ड्रामेटिक मत बन.
तू यहाँ है. बैठ जा. रिलैक्स कर. मेरे पास कुछ और तरय करना है तेरे साथ. कुछ… ख़ास.
बहुत औरतें करती हैं. यह गहरा है, क़रीब करता है.
माँ: (नर्वस नज़र उठा कर) क्या… क्या मतलब? मैंने पहले hi बहुत दे दिया. और कुछ नहीं
कर सकती.
गजेंद्र: (उसके बगल में बैठ कर, हाथ घुटने पर) ऐसे सोच… जैसे कुछ फल अंदर से hi
मीठे होते हैं? गहराई में जाना पड़ता है असली रास चखने के लिए. या जैसे घर में
सीक्रेट दरवाज़ा. ज़्यादातर लोग सिर्फ आगे का दरवाज़ा उसे करते हैं, लेकिन पीछे वाला छुपी हुई
कमरों तक ले जाता है. औरत के जिस्म में भी वही है. एक और तरीका क़रीब होने का.
माँ: (नाक सिकोड़ कर, थोड़ा दूर हुई) गजेंद्र… समझ नहीं आ रहा क्या बोल रहे हो. सीधा
बताओ. घर जाना है.
गजेंद्र: (पास झुक कर, फिसफिसाते हुए) मैं तेरी गांड छोड़ना चाहता हूँ, शाहिदा. वह टाइट
छोटा छेद जिसकी तू बहुत शर्म करती है. अंदर स्लाइड करना चाहता हूँ, तुझे मुझ पर बांध
महसूस करना. सबसे गंदे तरीके से तुझे अपना बनाना.
माँ: (आँखें दर से फैली, जिस्म पीछे हटा) क्या?! नहीं! कभी नहीं! क्या!!! वह… वह छेद
गन्दगी के लिए है! वहां से… टट्टी निकलती है! गन्दा है! मेरा शोहर – मेरा अपना शोहर – कभी
नहीं माँगा! वह मुझे इज़्ज़त देता है! यह हराम है, गजेंद्र! हमारे मज़हब में मन
है! सोडोमी बड़ा गुनाह है! मैं कभी नहीं करने दूंगी!
गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए) सुन तो सही. अब क़ुरान की आयात सुना रही है? हॉस्पिटल में मेरा
माल निगला था अच्छे छोटे रंडी की तरह, और अब स्कॉलर बन गयी? तेरे ईमान ने रोका नहीं हिंदू
लुंड के लिए टांगें फ़ैलाने से.
माँ: (आवाज़ दर से तेज़) वह अलग था! वह… कमज़ोरी थी. लेकिन यह… बिलकुल अलग है. नहीं करुँगी.
नहीं कर सकती. प्लीज, जाने दो.
गजेंद्र: (आवाज़ सख्त) पेट के बल लेट जा, शाहिदा. अभी.
माँ: (सर तेज़ हिला कर) नहीं… गजेंद्र, प्लीज. दर लग रहा है. मत मजबूर कर.
गजेंद्र: (धीमी और गुस्से वाली आवाज़, कलाई पकड़ कर) मैंने कहा लेट जा. सोचती है मासूम
बीवी की तरह निकल जाएगी? तू पहले से बर्बाद है. अंदर माल छोड़ दिया. बीच की तरह करहि थी.
यह कुछ भी नहीं जो तूने पहले किया उसके सामने.
माँ: (आंसू भर आये, आवाज़ छोटी) तू मुझे डरा रहा है… तू गुस्सा है…
गजेंद्र: किचन जा और तेल ले आ.
मेरी माँ जल्दी से किचन गयी जैसे हुक्म हुआ, दर रही थी, उससे गुस्सा नहीं करना चाहती थी. वह
ज़ालिम बन रहा था.
वह रुक गयी, सोचा, फिर बिना बोले कड़ी हुई. कार्नर की शेल्फ से छोटी बोतल तेल ली – घर के काम
का बचा हुआ, शायद मस्सगे या खाना बनाने के लिए. वापस आयी, बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी,
सर बंधे हाथों पर, गांड दावत की तरह पेश.
गजेंद्र के हाथ तुरंत उसकी गांड पर गए, नरम भरी मांस को ज़ोर से मसलते हुए, तेल हाथों
पर लगाकर मस्सगे कर रहा था. उसकी गांड भरी, गोल, दबाव में नरम लेकिन रोज़ की ज़िन्दगी से
सख्त.
मेरे ख्यालों में, छुप कर देखते हुए, सोच रहा था कितना किस्मत वाला है गजेंद्र आज रात
– वह माँ की गांड लेने वाला था, वह जगह जिसे किसी ने छुआ नहीं, बाप ने भी इतने सालों की शादी
में नहीं. वह कुंवारी थी, पाक होने की अलामत उसके भटकने में भी, कोई मर्द वहां नहीं
गया, यह काम और गहरा बना देता था, आखरी रुकावट टूट रही थी.
गजेंद्र: (उसे ज़ोर से खींच कर बिस्तर पर, पेट के बल धकेल कर) अच्छा. दर जा. डरना चाहिए.
जब तक मुझे जो चाहिए न मिले, नहीं जायेगी. ठीक से पलट. गांड ऊपर.
माँ: (सिसकते हुए, मुँह तकिये में, जिस्म कांप रहा) प्लीज… मिन्नत है. मेरा घर… मेरे
बच्चे… अगर देर से घर गयी तो पता चल जायेगा कुछ गलत है…
गजेंद्र: (पीछे घुटनो पर बैठ कर, गांड फैलते हुए धीरे) वह जान जायेंगे तू एक रंडी है
जो बीमार शोहर से धोका देती है. वही जानेंगे. अब रिलैक्स कर अपनी कुंवारी गांड. मैं इसे
बर्बाद करूँगा. फैलाऊंगा. खुलवाऊंगा मेरे लिए. तू कभी नहीं भूलेगी इस छेद का मालिक कौन है.
माँ: (धीमे रोटी हुई) नहीं… प्लीज… पहले से hi बहुत गन्दी महसूस हो रही है… सब खो दिया…
गजेंद्र: (उसकी गांड पर थूक कर, ज़ोर से रगड़ कर) सब खो दिया? तूने डिग्निटी हॉस्पिटल में
घुटनो पर बैठ कर खो दी थी. यह तो ऊपर का चेरी है. एक गन्दी _ रंडी अपने हिंदू
पडोसी से शितोले छुड़वा रही है. ज़ोर से बोल – बता मुझे तू ले रही है.
माँ: (आवाज़ टूट रही, मुश्किल से सुनाई देती) मैं… नहीं… बहुत ज़्यादा है…
गजेंद्र: (गांड पर ज़ोर से थप्पड़) बोल, शाहिदा. वर्ण और दर्द होगा. बोल तू अपना गन्दा टट्टी
वाला छेद छुड़वाने देगी.
माँ: (ज़ोर से रोटी हुई, हार मान कर) …मैं… देगी… प्लीज बस… दर्द मत करना…
गजेंद्र: (मुस्कुराते हुए, सुपर उस पर रगड़ कर) सही है. अच्छी लड़की. तू पहले से सबसे बुरी
रंडी है. पूरा जाने दे. मैं तेरी दीनदार छोटी गांड बर्बाद करूँगा.
माँ: (तकिये में सिसकते हुए) ओह ,.'… माफ़ कर… बहुत शर्मिंदा हूँ…
उसने उसे वैसी रंडी की तरह ट्रीट किया जैसे मैंने ऑनलाइन फोर्बिडन पोर्न वीडियोस में देखा था
– हुक्म देते, चीज़ बनाते, हाथ गांड फैला कर सबसे प्राइवेट जगह दिखा रहे थे.
मैं हैरान था की माँ ने इतनी जल्दी मान लिया; यह वह औरत जो मुझे सख्त --- तालीम देती थी,
मॉडेस्ट रहना सिखाती थी और क़ुरान पद्धति थी. हमारे मज़हब में औरत की गांड में घुसना
सबसे बड़े गुनाहों में से है, हदीथ में मन है जैसे जानवरों के काम, ,.' के गुस्से
और शादी में बिगाड़ का सबब. यह जिस्म और रूह को मैला करता है, इज़्ज़त और सेहत के लिए
मन. फिर भी वह मान गयी.
गजेंद्र: (बुरी मुस्कराहट, हाथ गांड से नीचे, ऊँगली उसकी बांध गांड के दरवाज़े पर) ओह,
शाहिदा, तेरा गन्दा छोटा छेद मांग रहा है. देख कैसे ट्वीटच कर रहा – मैं ऊँगली
अंदर दाल रहा हूँ, तू गन्दी _ रंडी.
माँ: (आँखें दर से फैली, ज़ोर से चिल्लाते हुए, तड़पते हुए और पलटने की कोशिश, हाथ उसके
सीने पर धकेल रहे) नहीं! गजेंद्र, रुक! मत करना! अह्ह्ह! यह घिन आती hai—please, नहीं!
(वह टांगें धीमे लात मारती, गांड बांध कर रोकने की कोशिश, आंसू चेहरे पर बह
रहे) यह मन है! मेरा शोहर ने कभी वहां हाथ नहीं लगाया!
गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, एक हाथ से उसकी टांगें ज़ोर से अलग करके, ऊँगली धीरे से उसकी
टाइट गांड में डालते हुए, गरम विरोध को तोड़ते हुए) बहुत देर हो चुकी है, तुम झूटी छिनाल.
महसूस कर रही हो? मेरी ऊँगली अब तुम्हारी टट्टी वाली छेद में गहरी दाल दी है, जहाँ से तुम्हारी
पाक टट्टी निकलती है. तुम इसके ird-gird कास रही हो जैसे कोई बेबस धोकेबाज़ — शायद तुम्हारी
किताबों में वैली की गांड में ऊँगली डालने का ज़िक्र नहीं है, है न?
माँ: (ज़ोर से चिल्लाते हुए, जिस्म शॉक और शर्म से टेढ़ा हो जाता है, नाख़ून उसके बाहों में
गाड़ते हुए हाथ हटाने की कोशिश में) आआह! रुको! दर्द हो रहा है — बहार निकालो! हे
भगवन, मुझे माफ़ कर दो… यह मेरी बेइज़्ज़ती हद्द से ज़्यादा कर रहा है… ममम… मिन्नत है,
रुक जाओ!
गजेंद्र: (ऊँगली और गहरी धकेल कर, अंदर घूमते हुए, उसकी मिन्नत को नज़रअंदाज़ करते हुए)
जितनी मिन्नत करनी है कर लो, शाहिदा. यह मिलता है तुम्हे इतना पाक बनने का नाटक करने की सजा,
मस्जिद में ,,., पढ़ने वाली और चुपके से लुंड की प्यासी. तुम्हारी गांड इतनी गन्दी और गरम
है — बिलकुल उस _ शर्म के टट्टी से भरी हुई.
माँ: (ज़ोर से चीखते हुए भी be-ikhtiyar कराह रही, कमर उठा कर उसे हटाने की कोशिश, एक
हाथ पीछे जा कर उसकी कलाई पकड़ कर खींचती) नहीं… अह्ह्ह! अभी बहार निकालो! यह सब
बर्बाद कर देगा — मिन्नत है, मेरी इज़्ज़त मत बर्बाद करो… ओह्ह… मेरा ईमान, मेरा
ghar-baar… रुक जाओ!
गजेंद्र: (आखिर ऊँगली धीरे बहार निकालते हुए, उसे नाक के पास ले जा कर ज़ोर से सूंघते हुए,
आँखें उसकी आँखों में गड़े) ममम, यह बू सूँघो? तुम्हारी गांड की टट्टी की बू आ रही
है, शाहिदा — ताज़ा टट्टी और तुम्हारी नकली पाकि का मिक्सचर. तुम कोई नेक बीवी नहीं, तुम एक
बदबूदार शौचालय हो जो संत बनने का नाटक करती है. कैसा लग रहा है जान्ने से की तुम्हारी
सबसे छुपी छेद अब सीवर जैसी बू दे रही है तुम्हारे आबय के नीचे?
माँ: (सांस फूलते हुए, शर्म से सिमट कर, आवाज़ कांप रही जब वह अपने आप को छुपाती
है) ओह्ह्ह… यह कितनी बेइज़्ज़ती है… प्लीज, ऐसे शब्द मत बोलो और… ममम… तुम मेरा नाम,
मेरी पाकि बर्बाद कर रहे हो… रुक जाओ!
गजेंद्र: (अँधेरे में हँसते हुए, अब अपनी बीच की ऊँगली को उसके hi रास से गीला कर के बिना
चेतावनी के उसकी गांड में फिर से धकेल देते हुए, पहले से ज़्यादा गहरा) नाम बर्बाद
करना? शाहिदा पाक? ज़्यादा सही शाहिदा Tatti-Boo वाली छिनाल. महसूस करो यह दूसरी ऊँगली
तुम्हारी गन्दी छेद को खींच रही है — तुम सिर्फ एक धोकेबाज़ कुटिया हो जो वैल के पीछे
छुप कर पडोसी का लुंड चूसती है जब उसका शोहर हॉस्पिटल में साद रहा है. तुम्हारे
बच्चे तुम्हे मिसाल समझते हैं? है, तुम एक वीर्य पीने वाली नकली औरत हो जिसकी गांड
झूठ और मसाला की पुदीने की बू से भरी है.
माँ: (फिर ज़ोर से चीखते हुए, जिस्म हिलता हुआ, उसके हाथ पर थप्पड़ मरते हुए और पलटने
की कोशिश) आआह! नहीं, एक और नहीं! बहार निकालो — मिन्नत है गजेंद्र, रेहम करो! अहह…
यह मेरी इतनी बेइज़्ज़ती कर रहा है… हे भगवन क्यों… ममम… मुझे ऐसे मैला मत करो!
गजेंद्र: (ऊँगली अंदर बहार ज़ोर ज़ोर से चलते हुए, फिर बहार निकाल कर ज़ोर से सूंघते हुए,
उसे उसकी नाक के नीचे हिलाते हुए) यह सूँघो, बेकार रंडी. तुम्हारी अपनी टट्टी की बू —
तुम्हारा पाक नाम हमेशा के लिए मैला. शाहिदा का मतलब 'ज़िंदा', लेकिन तुम्हारी बू
मुर्दा इज़्ज़त जैसी है. पाक बनने का नाटक? तुम नाली से भी गन्दी हो, हिंदू के लिए टांगें
फैलाती हो और दुआ पढ़ती हो. तुम्हारा इमाम तुम पर थूक देगा, तुम्हारी दादी ज़ैनब शायद
वही छिनाल खून थी जो तुम तक आया.
माँ: (सर पलट कर, चीखते हुए जब वह ऊँगली उसके चेहरे के पास लाता है, हाथ कमज़ोर
से उसे हटाते हुए) नहीं! मुझे मत सुँघाओ — अह्ह्ह! यह गन्दा है… प्लीज रुक जाओ, तुम
मेरी रूह तोड़ रहे हो… ममम… मेरा मज़हब यह बेइज़्ज़ती इजाज़त नहीं देता… ओह्ह… मिन्नत है,
और मत!
गजेंद्र: (ऊँगली थोड़ी देर उसके होंठों पर दबाते हुए फिर पीछे खिंच कर, मुस्कुराते हुए)
अपनी बेइज़्ज़ती का स्वाद चखो, शाहिदा. तुम कोई वफादार _ नहीं, तुम एक tatti-boo वाली
जीना करने वाली हो, बीमार शोहर को, बच्चों को, खुदा को धोका देती हो — सिर्फ इसके लिए. कैसी
लगी यह नकली पाकि बर्बाद करना? अब तुम सिर्फ एक गन्दी, be-izzat छेद रह गयी हो.
बाद में, उसने उँगलियों से उसकी पंतय और शॉर्ट्स की कमर पकड़ी और एक hi झटके में टांगों
से नीचे कर दिया, उसे बिलकुल नंगा कर दिया.
उसके गांड के दोनों हिस्से थोड़ा अलग हुए, टाइट, सिकुड़ी हुई छेद दिखी. उसने और तेल डाला,
उँगलियों से धीरे धीरे gol-gol मस्सगे करते हुए, पहले हलके से छेड़ते हुए, फिर गहरा,
जिससे उसके मुँह से हलकी सांस निकलती है. "अपनी बड़ी गांड के दोनों हिस्से मेरे लिए फैलाओ, शाहिदा,"
उसने हुक्म दिया, आवाज़ में इख़्तियार.
वह रुक गयी, फिर पीछे हाथ दाल कर अपने मांस को पकड़ कर अलग करती है. "प्लीज गजेंद्र
… नरम रहना. मिन्नत है — मुझे अच्छा महसूस कराओ."
उसने मुस्कुराते हुए बेइज़्ज़ती भरे शब्दों में कहा. "पहले से मिन्नत? कितनी भूखी छिनाल
बन गयी हो. ज़्यादा फैलाओ — मुझे इंतज़ार मत करवाओ." उसकी बड़ी गांड, इतनी नरम और लुभाने
वाली, उसे सीधा करने में मुश्किल दे रही थी; गांड के हिस्से विरोध कर रहे थे, बंद हो रहे
थे. "अरे, यह मोती गांड बीच में आ रही है," उसने बेइज़्ज़ती की, एक गांड पर हल्का थप्पड़
मारा.
"ठीक से फैलाओ औरत — मुझे तड़पा मत." उसने अपना लुंड पूरा तेल से गीला किया, चमक रहा
था, और खुद को पोजीशन किया, सर उसकी छेद पर रखा. माँ चिल्लाई, "रुको — बहार निकालो! बहुत
ज़्यादा है!" लेकिन वह आगे बढ़ा, बुरी बातें करते हुए. "चुप और ले लो, छिनाल. मत कसो —
ढीला करो, वर्ण ज़्यादा दर्द होगा. तुमने यह चाहा था, याद है?"
माँ: (तेज़ सांस लेते हुए जब गजेंद्र अचानक अपने लुंड का सर उसकी टाइट, कभी न छुई गांड
पर दबाता है, जिस्म सख्त हो जाता है) नहीं… गजेंद्र, वहां नहीं! प्लीज… वहां कभी नहीं…
अह्ह्ह!
गजेंद्र: (बुरी तरह मुस्कुराते हुए, उसकी सिकुड़ी छेद पर थूक कर मोटा सर ज़ोर से धकेल देते
हुए विरोध को तोड़ते हुए) अपना पाक मुँह बंद करो, शाहिदा. आज यह पाक _ गांड
चूड़ी जाएगी. महसूस कर रही हो? तुम्हारी टट्टी वाली छेद हिंदू लुंड के ird-gird खुल रही है
— कितना जलता अच्छा लग रहा है, है न?
माँ: (आवाज़ पहात कर ऊँची चीख में बदल जाती जब वह गहरा धकेल रहा है, एक एक ज़ुल्म
भरा इंच) अह्ह्ह… ओह ,.'… दर्द हो रहा है… ममम… बहुत बड़ा… प्लीज धीरे… यह
गुनाह है… बिलकुल गुनाह…
गजेंद्र: (अब ज़ोर से धक्का देते हुए, आधा लुंड एक hi धक्के में दाल देते हुए, हाथ कमर
पर पकड़ कर) गुनाह? तुम्हे गुनाह पसंद है, गन्दी वैली रंडी. मेरे लिए चीखो. बताओ कितनी
टाइट है तुम्हारी गांड अपनी धोकेबाज़ छूट से.
माँ: (टूटी हुई कराहते हुए, आंसू बह रहे, जिस्म हर धक्के से आगे हिलता) अहह… अहह… यह…
बहुत टाइट… ममम… मैं नहीं… गजेंद्र रुक जाओ… मेरा मज़हब… मेरी रूह…
गजेंद्र: (एकदम से पूरा अंदर धकेल देते हुए, उसे चीखने पर मजबूर करते हुए) ठीक
से जवाब दो, छिनाल. कौन सा लुंड अभी तुम्हारी कुंवारी गांड बर्बाद कर रहा है? ज़ोर से
बोलो.
माँ: (रोने और कराहते हुए, आवाज़ कांप रही) तुम्हारा… अह्ह्ह… गजेंद्र का लुंड… यह मेरी
… मेरी गांड बर्बाद कर रहा है…
जब वह गहरा धकेल रहा था इंच इंच, मैं देखता रहा, हाथ पंत के ऊपर से अपना लुंड
सहलाता हुआ, शर्मिंदा लेकिन उत्तेजित. कैसे देख सकता हूँ अपनी माँ को रंडी बनाते हुए, इतनी
बेइज़्ज़ती होते हुए? अब उसका पूरा लुंड अंदर था, हिलत तक.
वह उसकी गांड बर्बाद करना चाहता था, ज़ुल्म भरे इरादे से धक्के मर रहा था, ज़ोर ज़ोर
से छोड़ रहा था, बिस्तर हिल रहा था. उसके गांड के हिस्से हर धक्के से हिल रहे थे, लहार जैसे
मांस पर. वह नीचे हाथ दाल कर अपनी छूट सहलाने लगी, कराह रही थी, और उसने बेइज़्ज़ती
की: "खुद को सेहला रही हो जैसे कोई बेबस कुटिया? घिन आती है."
गजेंद्र: (लगातार धक्के देते हुए, चमड़ी चमड़ी टकरा रही) अच्छी लड़की. अब बताओ अपने
बेकार शोहर के लुंड के बारे में. कितना छोटा है? क्या वह तुम्हे कभी झाड़ता भी है?
बोलो, वर्ण इस छेद को छोड़ता रहूँगा जब तक तुम टट्टी न कर दो.
माँ: (मिन्नत भरी आवाज़ में, चेहरा शर्म से लाल) यह… छोटा… ममम… उसने कभी…
अहह… कभी मुझे संतुष्ट नहीं किया… जैसे यह…
गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, उसके वैल से सर पीछे खींच कर) ज़ोर से बोलो, कुटिया. बोलो:
“मेरे शोहर का छोटा लुंड बेकार है. वह एक कमज़ोर कुक है जो अपनी बीवी को छोड़ नहीं सकता.”
माँ: (आवाज़ कांप रही, शर्म से कराहते हुए मान लेती) मेरा… अह्ह्ह… शोहर का छोटा लुंड
बेकार है… वह एक कमज़ोर कुक है… जो अपनी बीवी को छोड़ नहीं सकता… हे भगवन मुझे माफ़
कर दो…
गजेंद्र: (और ज़ोर से धक्के देते हुए, उसकी गांड हिलाते हुए) बिलकुल सही. अब बोलो तुम असल में
क्या हो. बोलो: “मैं एक गन्दी _ छिनाल हूँ जो अपनी टट्टी वाली छेद को काफिर लुंड से
बर्बाद करवाना पसंद करती है.”
Maa: (cheekhte hue, jism be-ikhtiyar uske ird-gird kas raha) Main… ahhh… main ek gandi _
chhinal hoon… jo apni tatti wali ched ko… kafir lund se barbaad karwana pasand karti hai… mmm…
Gajendra: (garajte hue, haath aage daal kar uski clit ko zor se dabate hue) Aur bolo. Apne ko aur
bura bolo. Sach bolo, tum jhooti dua padhne wali randi.
Maa: (zor se karahate hue, shabd toot toot kar nikal rahe) Main… ek gandi haram dhokebaaz kutiya…
ek lund ki pyaasi veili randi… ahh… Hiindu veery ka shauchalay… main gandi hoon… main iski
haqdaar hoon…
Gajendra: (zulm bhare dhakke dete hue, awaaz mein nafrat) Haan haqdaar ho. Phir se bolo — zor
se. Bolo ki tum mere pairon ke neeche ki mitti se bhi neeche ho kyunki tumne mujhe har ched
maila karne di jo tumhare shohar ne kabhi chhua nahi.
Maa: (rone wali karahate hue, bilkul toot chuki) Main… ahhh… mitti se bhi neeche… maine tumhe har
ched maila karne di… jo mera shohar kabhi nahi chhua… main kuchh nahi… sirf ek bekaar… gaand
chudi hui chhinal…
Gajendra: (garajte hue, tez aur be-rehem raftaar) Yeh meri acchi chhoti _ suar. Karahati raho
jaise be-sharam shauchalay ho jab main is paak tatti wali ched ko barbaad kar raha hoon. Ab tum
meri ho, Shahida — tumhara har ganda inch mera hai।