Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran - Page 3 - SexBaba
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Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran

CHAPTER 16

मेरी माँ अब वह पाकीज़ह और नेक माँ नहीं रही, अब तोह वह सच

में एक पूरी रंडी बन चुकी है.

माँ अभी भी उसके ऊपर ऊपर नीचे हो रही थी, ज़ोर ज़ोर से कराह रही थी, उसका जिस्म पसीने से चमक

रहा था लिविंग रूम की बेडसाइड लैंप की हलकी रौशनी में, जो अब हमारा राज़ का अड्डा बन गया था.

हवा में उनकी जोश की मुस्की खुशबू घुली हुई थी, पुराण सोफे उनके वज़न के नीचे चीख रहा

था.

गजेंद्र पीछे लेट गया था, उसका चौड़ा सीना ऊपर नीचे हो रहा था, हाथ ढीले से उसकी कमर

पकडे हुए, जब वह कण्ट्रोल ले रही थी, खुद को उसके मोटे लुंड से ऑलमोस्ट पूरा ऊपर उठती और फिर ज़ोर

से नीचे बैठ जाती, जिससे उसके भरे हुए चूचे उसकी उलझी हुई ब्लाउज के नीचे ज़ोर ज़ोर से उछलते.

उसकी आँखें आधी बांध थी सुकून में, होंठ खुले हुए, गले से गहरी आवाज़ें निकल रही थी –

मोती, आवाज़ वाली कराहटें जो खामोश घर में हराम संगीत की तरह गूँज रही थी.

"ओह, शाहिदा, मेरी सुन्दर कमल," गजेंद्र धीमे से बोलै, आवाज़ गहरी और हस्की, उस मिठास भरे

लहजे में जो उसे और गहरे ले जाता था. "तुम बिलकुल परफेक्ट हो, देवी की तरह मुझ पर सवार. चलती

रहो, मेरी जान, दिखाओ कितना ज़रुरत है तुम्हे इसकी."

वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी; बल्कि उसके शब्दों ने उसे और जोश दिया, हरकतें और जान बूझ

कर, और बेचैन. माँ की जांघें हर उठने नीचे में सख्त हो रही थी, घुटने सोफे के कुशिओं

में धंस रहे थे दोनों तरफ, हाथ उसके सीने पर मज़बूत टिकाये हुए. उसके अंदरूनी जाँघों की

रेशम उसकी खाल से रगड़ रही थी, हर एहसास को और तेज़ कर रही थी.

वह नीचे हर बार छोटे गोल चक्कर लगाती, उसे पूरा महसूस करती, स्ट्रेच करती जिससे वह सांस

रोक लेती. "हाँ, मेरा प्यारा मोर," गजेंद्र बोलै, आँखें उसकी आँखों में, होठों पर चालाक

मुस्कराहट, हाथ ऊपर उठा कर उसके गाल को सेहला रहा था.

"आज रात तुम मेरे लिए खिल रही हो. मत रुकना, मेरी मीठी मोहिनी – मुझे हर इंच महसूस होने दो

तुम्हारे जोश का." उसके रोमांटिक नाम शहद की तरह बह रहे थे, हर एक धीमा धक्का, उसे और

खोने के लिए.

माँ: (गजेंद्र पर बिस्तर पर बैठी, आबय कमर तक ऊपर चढ़ी हुई, वैल अभी भी सर पर लेकिन थोड़ा

ढीला, धीरे से उसके मोटे लुंड पर बैठती हुई, सांस रोक कर जब पूरा अंदर जाता है) अह्ह्ह… गजेंद्र

… धीरे… प्लीज… यह पहले से hi बहुत बड़ा गुनाह है…

गजेंद्र: (हाथ उसकी चौड़ी कमर पर, हरकतें गाइड करते हुए, उसके लाल चेहरे पर मुस्कुराते हुए)

मुझ पर सवार हो, शाहिदा. ऊपर नीचे जैसे अच्छे छोटे _ रंडी की तरह. महसूस कर रहा है

कितना गहरा हूँ? तेरी दीनदार छूट फिर से मुझे भिगो रही है.

माँ: (हरकत शुरू, पहले ना चाहते हुए कमर घूमती, फिर तेज़, अपने आप को रोक नहीं पाती, होंठ काट

कर कराहटें रोकने की कोशिश) ममम… नहीं… नहीं करना चाहिए… ओह ,.'… यह महसूस… अहह… कितना

गलत… लेकिन रुक नहीं प् रही…

गजेंद्र: (नीचे से धक्के देते हुए उसके साथ मिल कर, आवाज़ और सख्त) फ़क, कितनी टाइट है तू… हिंदू

लुंड पर उछाल रही है… तेरा शोहर कभी ऐसे भर नहीं सकता तुझे, न?

माँ: (चूचे टॉप के नीचे उछाल रहे, आवाज़ शर्म और बढ़ते सुकून से कांप रही) प्लीज… ऐसा

मत बोलो… वह बीमार है… यह धोका है… ममम… मैं बुरी बीवी हूँ… बुरी _…

गजेंद्र: (गहरी आवाज़ से कराह कर, आँखें उसके हिलते जिस्म पर) सहित… शाहिदा… मैं झड़ने वाला हूँ

… बहुत ज़ोर से अंदर hi…

माँ: (आँखें दर से फैली, लेकिन कमर नीचे hi घूमती रही) नहीं! गजेंद्र, नहीं – अंदर मत छोड़ना!

बहार निकाल… प्लीज… मैं मिन्नत कर रही हूँ… मत… अहह… रिस्क मत ले…

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए, दांत पीस कर, हाथ उसकी गांड ज़ोर से दबाते हुए उसे हिलाते रखा) अब

मिन्नत? हॉस्पिटल में मेरा लुंड चूसने के वक़्त कहाँ थी यह मिन्नत? या दस मिनट पहले टांगें

फ़ैलाने के वक़्त? तू पहले से बर्बाद है, शाहिदा – अब पूरा माल ले ले जैसे सही रंडी.

माँ: (तेज़ सवार होने लगी बेचैनी में, आवाज़ पहात रही, आंसू भर आये) नहीं, नहीं प्लीज… तेरा

बच्चा नहीं हो सकता… सब बर्बाद हो जायेगा… मेरा घर… मेरा ईमान… बहार निकाल… मैं अपनी रूह

पर क़सम देती हूँ… अंदर मत छोड़ना… या ,.', माफ़ कर दे…

गजेंद्र: (सांस रुक रुक कर, धक्के बेकाबू) बहुत देर हो गयी… फ़क… तेरी मिन्नत सुन कर और ज़्यादा

ब्रीड करने का मैं कर रहा है… सोच, तेरा पेट फूलता हुआ मेरा हिंदू बच्चा… जब तू रोज़ पांच

वक़्त ,,., पड़ेगी प्रेटेंडिंग पुरे होने की…

माँ: (कराहटें के बीच धीमे रोने लगी, फिर भी बेबस उछलती रही) बस कर… प्लीज ऐसा मत बोल…

दिल को दर्द होता है… मत… अंदर मत ख़तम कर… कुछ भी करुँगी… बस वहां नहीं…

लेकिन सुकून के बीच माँ की कराहटें टुकड़े टुकड़े इक़रार बन गयी, आवाज़ टूट रही थी जब अंदर से खुद से

नफरत उभर रही थी. "अहह… मैं कितनी बुरी माँ हूँ, आअह्ह्ह्ह" वह सिसकारी, एक पल के लिए रदम रुक गया

फिर ज़ोर से नीचे बैठ गयी, जैसे खुद को सजा दे रही हो.

"कैसे कर सकती हूँ यह? मेरा बीटा… आआह्ह्ह्ह ऊह्ह्ह्ह… वह मुझे देखता है, और मैं यहाँ रंडी की

तरह. सब बर्बाद कर दिया – शादी, ईमान. हुसैन इसका हक़दार नहीं… ओह ,.', माफ़ कर." आंसू आँखों

में भर आये, पसीने के साथ मिल कर चेहरे पर बह रहे थे, लेकिन रुक नहीं रही थी; जिस्म उसके शब्दों से

धोका दे रहा था, रिलीज़ के पीछे दौड़ रहा था.

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गजेंद्र धीमे से हांसे, हाथ ऊपर उठा कर उसके चूचे पकडे, अंगूठा निप्पल्स को छेड़ रहा था.

"श, मेरी जादुई गुलाब, तू बुरी नहीं – तू ज़िंदा है. सावर होती रहो, सब निकाल दो."

वह सर हिला रही थी, लेकिन कमर हिलती रही, ऊपर नीचे be-ruk, अंदरूनी दीवारें हर धक्के पर उसके चरों

तरफ बांध रही थी. "मैंने अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी," वह कराहटें के बीच रोई, आवाज़ तेज़ होती गयी

जब सुकून बढ़ा.

"इतने साल दीनदार बन कर, पांच वक़्त ,,.,, और अब… यह. हुसैन से तलाक़ मांग लू – वह बीमार है,

हॉस्पिटल बीएड पर तड़प रहा है, और मैं यहाँ धोका दे रही हूँ. कैसी बीवी हूँ मैं? खुदगर्ज़,

गुनहगार आह्ह्ह्ह. मुझे बहार निकाल देना चाहिए, कम्युनिटी से निकाल देना. मेरा घर कभी माफ़ नहीं

करेगा… अहह, हाँ वही… नहीं, मतलब मैं खुद से नफरत करती हूँ इसके लिए! ोुह्ह्ह्ह गजेन्द्रा"

उसके शब्द जल्दी जल्दी निकले, गुनाह और सुकून का मिला जुला तूफ़ान, जिस्म पीछे झुक गया तेज़ सवार करते हुए,

नाख़ून उसके कन्धों में धंस रहे थे.

"मैं _ औरत के तौर पर नाकाम हूँ – हराम, सब कुछ. क्यों रुक नहीं पाती? जैसे शैतान ने

पकड़ लिया हो. हुसैन से ख़तम करुँगी, नयी शुरुआत, लेकिन कैसे? तेरे साथ? नहीं, वह और बुरा होगा…

ओह गजेंद्र, मत रुकना मुझे ेन्सॉरगे करना, मुझे यह शर्म चाहिए."

वह धीमे से हांसे, आवाज़ उसके तूफ़ान के खिलाफ मीठा मरहम. "मेरी आग वाली अंगारा, तू बर्बाद नहीं

– नयी पैदाइश हुई है. तेरी हर कराहट मेरे लिए संगीत है. और बता, यह हमें जोश दे." और वह बोली,

इक़रार तूफ़ान की तरह बह रहे थे.

"मैं गन्दी हूँ – मेरे बेटे के लिए बुरा मिसाल. वह सोचता है मैं मज़बूत हूँ, लेकिन देखो मुझे,

दुसरे मर्द के लुंड पर उछलती हुई जब उसका बाप ज़िन्दगी से लड़ रहा है. मैंने घर को मैला किया, दीं को.

तलाक़ hi रास्ता है ाओह्ह्ह्हह्ह"

मेरी रूह काला हो गयी… लेकिन इतना अच्छा लग रहा है, इतना गलत. अब आदत हो गयी है, न? बर्बाद औरत,

जन्नत से ज़्यादा सुकून के पीछे.

उसकी सवार तेज़ हुई, गांड उसकी जाँघों पर चटक चटक बज रही थी हर नीचे जाने पर, उनकी मिलाप की

गीली आवाज़ें कमरे में भर रही थी. वह आगे झुकी, बाल उन पर परदे की तरह, सांसें उसकी गर्दन

पर गरम जब वह और खुद पर इलज़ाम लगाती रही, हर एक उसे और तेज़ कर रहा था.

वक़्त उनके जोश के धुंध में गम हो गया; एक घंटा गुज़र गया बिना पता चले, सिर्फ साँसों की बदलती

रदम और गहरी क़ुरबत से. माँ की हरकतें थकावट से थोड़ी धीमी हुई, लेकिन आग अभी जल रही थी.

अचानक गजेंद्र के हाथ उसकी कमर पर सख्त हुए, उसका जिस्म नीचे से ऊपर उठा उसके साथ मिलने.

"अब, मेरी जान," वह गरज कर बोलै, रफ़्तार तेज़, नीचे से और गहरे तेज़ धक्के. माँ की आँखें फैल गयी;

वह पहचान गयी – उसके मुसलें सख्त, सांसें बेकाबू. "इस बार अंदर hi झाड़ेगा," वह सांस रोकते

हुए बोली, दर और जोश मिला हुआ. "महसूस हो रहा है बढ़ता हुआ… ओह गजेंद्र, प्लीज मत…"

गजेंद्र: (ज़ोर से कराह कर, जिस्म सख्त, कमर ज़ोर से ऊपर) Ahhh—fuck—aa रहा hai—Shahida—le—har

बूँद le—nggghhh!

(वह अंदर hi फूट पड़ा, माँ की छूट में स्पेर्म्स पल्स करते हुए गहरे, मोटे झटके भरते हुए उसे

नीचे दबाये रखा ताकि भाग न सके.)

माँ: (शॉक और दर से सांस रोक कर जब महसूस हुआ वह अंदर hi छोड़ रहा है) न्यू… गजेंद्र…

तूने… अंदर hi… ओह ,.'… तूने क्या कर दिया… (वह अपने अनचाहे क्लाइमेक्स से काँप उठी, जिस्म ने आखरी

बार धोका दिया)

गजेंद्र: (तेज़ सांस लेते हुए, अभी भी अंदर, बुरी मुस्कराहट) फ़क… परफेक्ट था… तूने मुझे इतना अच्छा

दूध दिया, दीनदार रंडी…

माँ: (जल्दी से उठ कर गीली आवाज़ के साथ उससे अलग हुई, उसका माल बहार निकलने लगा, बिस्तर पर बगल

में गिर गयी, सीना ऊपर नीचे, छत पर देखते हुए मायूसी में) तू… तू जानवर… कैसे कर सकता

है? मैंने मन किया था… मिन्नत की… अब मैं तेरे… तेरे गंदे से भरी हूँ… अगर बच्चा हो गया

तो? मेरी ज़िन्दगी… शादी… सब बर्बाद…

गजेंद्र: (साइड पर पलट कर, ऊँगली से उसकी जांघ पर लाइन बनाते हुए, समुग) रिलैक्स, शाहिदा. तू देवी की

तरह सावर होती है. सबसे अच्छी छूट जो कभी मिली – टाइट, गीली, और इतनी गुनहगार. इससे और गरम

बना देती है.

माँ: (चेहरा दूर कर, आवाज़ छोटी टूटी) ऐसा तारीफ मत कर… यह मुझे और बुरा महसूस करवाता है…

मैं गन्दी हूँ… मैंने होने दिया… फिर से…

गजेंद्र: (हँसते हुए, हाथ से उसकी कमर थपथपाते हुए) अरे, अब रोना मत. मेरे बैग में सुबह

की पिल है. जाने से पहले ले लेना. कोई बच्चा नहीं, कोई प्रॉब्लम नहीं. देखा? मैं अपनी पसंदीदा वैली

रंडी का ख्याल रखता हूँ.

माँ: (फिसफिसाते हुए, आंसू गालों पर) अभी दे दे… प्लीज… अभी ले लू… जितना देर तेरे साथ रहूंगी…

उतना बुरा महसूस होगा… दिल भरी है… खुद से नफरत है… घर जाना है… इस गुनाह को धोना है…

गजेंद्र: (धीरे बैठ कर, मुस्कुराते हुए पंत उठाने के लिए) ठीक है, ठीक है. पिल तेरी. लेकिन एक पल के

लिए मानते है – तूने अंदर माल महसूस कर के बहुत पसंद किया. तेरा जिस्म पहले कभी ऐसे नहीं

काँपा था.

माँ: (दोनों हाथों से चेहरा छुपाते हुए, आवाज़ डब्बी) नहीं… नहीं मानती… यह हराम है… गलत है

… बस पिल दे और जाने दे… प्लीज… पहले hi टूट रही हूँ…

बाद में, जब वह अलग हुए, माँ गेस्ट रूम के बिस्तर के किनारे बैठी – ज़्यादा प्राइवेसी के लिए वहां

गए थे – पीली रेशम की शॉर्ट्स पेहेन रही थी और ब्लू वैल ठीक कर रही थी बैखरी बालों पर.

शॉर्ट्स उसके कर्व्स से चिपकी हुई, रेशम लैंप की रौशनी में चमक रही थी, वैल उसके लाल चेहरे को

फ्रेम कर रहा था, कुछ पल पहले के बिखरने से बिलकुल अलग.

गजेंद्र हैडबोर्ड के सहारे लेट गया, सिगरेट जलाई, धुंआ धीमे ऊपर जा रहा था. उसने उसे

देखा मिस्चिएवोउस ग्रीन के साथ. "शाहिदा, तूने बहार बिलकुल रंडी की तरह कराह कर के," वह बेशर्मी

से बोलै, धुंआ छोड़ कर. "इतनी वाइल्ड आवाज़ें, और मांगती रही – कोई भी सोचेगा तू प्रोफेशनल है."

माँ ने उसे देखा, चेहरा डेफिएंस और बाकी सुकून का मिला हुआ. वह झुकी नहीं या शर्म से लाल

नहीं हुई; बल्कि सीधा बैठी, नज़र मिलायी. "और अगर किया तो? उस पल में सही लगा. मुझे छोटा मत

दिखाने की कोशिश कर, गजेंद्र. हम दोनों यहाँ हैं, न? अगर मैं रंडी हूँ, तो तू क्या है?"

उसकी आवाज़ शांत, ऑलमोस्ट चैलेंज भरी, उसके शब्दों को अंदर नहीं लेने देती. वह हांसे, एक और

काश लिया.

"सही कहा, मेरी जान. लेकिन मानते है – हर पल पसंद आया." वह हल्का गुस्सा हुई, सर हिला कर.

"शायद. लेकिन यह हम दोनों के बीच है. लेबल की ज़रुरत नहीं."

प्यास गाला सूखा रही थी म्हणत से, पसीने और म्हणत का नमकीन स्वाद अभी भी. "पानी चाहिए,"

वह धीमे से बोली, कड़ी हुई और शॉर्ट्स ठीक की.

जब वह किचन की तरफ गयी, हिप्स नैचुरली हिल रहे थे, पीली रेशम उसकी भरी गोल गांड से चिपकी

हुई, साइज और शेप को और उभार रही थी. कपडा पतला, ऑलमोस्ट see-through, हर कदम पर थोड़ा

ऊपर चढ़ता, गांड के बीच में फँस जाता जैसे बिना चाहे दावत.

उसकी गांड धीमे से हिल रही थी हरकत में, कर्व्स साफ़ और बहकाने वाली, नज़र को रोक नहीं

पाती. गजेंद्र की नज़र हर हरकत पर थी, आँखें सिकुड़ कर तारीफ में. वह धीमे सर

हिलाया, जान कर मुस्कराहट फैली, जैसे कोई प्राइवेट मज़ाक एन्जॉय कर रहा हो.

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मेरे छुपने वाली जगह से हॉलवे के अँधेरे में, मैं भी देख रहा था – पहली बार बिना शर्म

के. मैंने कभी माँ को ऐसे नहीं देखा था, कभी गांड पर नज़र नहीं टिकाई थी.

लेकिन आज रात, बंधन टूट गए; उसकी गांड, इतनी भरी और बिना माफ़ी मांगे, अंदर कुछ जानवरों

जैसा जगाया. सोचा गजेंद्र क्या सोच रहा होगा – उसे कनक्वेस्ट, खिलौना? या कुछ ज़्यादा? उसकी नज़र

नहीं हटी जब वह किचन पहुंची, जग से पानी डाली, गिलास काउंटर पर हलकी आवाज़ से टकराया.

साड़ी देर उसकी नज़र उसकी गांड के आउटलाइन पर थी, शॉर्ट्स कैसे हर चउरवे को उभार रही थी. मैं

समझ गया वह कोई प्लान बना रहा था, कुछ शैतानी उसी हिस्से पर, मुस्कराहट और गहरी

ांतिकिपतिओं में.

माँ ने पानी पिया, ठंडा पानी गले को सुकून दिया, और गेस्ट रूम वापस आयी, उसके बगल में

बैठ गयी. सिगरेट का धुंआ उनकी इंटिमेसी की बाक़ी खुशबू से मिला.

गजेंद्र ने सिगरेट ऐशट्रे में दबाया, उसे देखा आँखों में चमक. "शाहिदा, कभी

सोचा है कुछ अलग तरय करने का? जैसे… पीछे से… तेरी गांड में?" उसका सवाल हवा में

लटका, सीधा लेकिन क्यूरोसिटी भरा.

माँ: (बिस्तर के किनारे बैठी, आबय जाँघों पर नीचे की, आवाज़ कांप रही और धीमी)

गजेंद्र… बस करो. अब घर जाना है. मेरा बीटा इंतज़ार कर रहा है, और… मैं पहले से hi

बहुत गन्दी महसूस कर रही हूँ. प्लीज, जाने दो.

गजेंद्र: (अभी नंगा, लुंड आधा सख्त, दीवार के सहारे मुस्कुराते हुए) गन्दी? तूने तीन

बार मेरे लुंड पर झाड़ गयी, शाहिदा. तेरी दीनदार छूट मांग रही थी. अब प्रेयर मत पर

वापस जाना चाहती है जैसे कुछ हुआ hi नहीं?

माँ: (हाथों को देखते हुए, कांप रही) मैं… गलती की. बहुत बड़ा गुनाह. मेरा शोहर

हॉस्पिटल में है, और मैंने… धोका दिया. यहाँ नहीं रह सकती. ,.' कभी माफ़ नहीं करेगा.

गजेंद्र: (पास आते हुए, आवाज़ अब धीमी, ऑलमोस्ट बहलाते हुए) अरे, इतना ड्रामेटिक मत बन.

तू यहाँ है. बैठ जा. रिलैक्स कर. मेरे पास कुछ और तरय करना है तेरे साथ. कुछ… ख़ास.

बहुत औरतें करती हैं. यह गहरा है, क़रीब करता है.

माँ: (नर्वस नज़र उठा कर) क्या… क्या मतलब? मैंने पहले hi बहुत दे दिया. और कुछ नहीं

कर सकती.

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गजेंद्र: (उसके बगल में बैठ कर, हाथ घुटने पर) ऐसे सोच… जैसे कुछ फल अंदर से hi

मीठे होते हैं? गहराई में जाना पड़ता है असली रास चखने के लिए. या जैसे घर में

सीक्रेट दरवाज़ा. ज़्यादातर लोग सिर्फ आगे का दरवाज़ा उसे करते हैं, लेकिन पीछे वाला छुपी हुई

कमरों तक ले जाता है. औरत के जिस्म में भी वही है. एक और तरीका क़रीब होने का.

माँ: (नाक सिकोड़ कर, थोड़ा दूर हुई) गजेंद्र… समझ नहीं आ रहा क्या बोल रहे हो. सीधा

बताओ. घर जाना है.

गजेंद्र: (पास झुक कर, फिसफिसाते हुए) मैं तेरी गांड छोड़ना चाहता हूँ, शाहिदा. वह टाइट

छोटा छेद जिसकी तू बहुत शर्म करती है. अंदर स्लाइड करना चाहता हूँ, तुझे मुझ पर बांध

महसूस करना. सबसे गंदे तरीके से तुझे अपना बनाना.

माँ: (आँखें दर से फैली, जिस्म पीछे हटा) क्या?! नहीं! कभी नहीं! क्या!!! वह… वह छेद

गन्दगी के लिए है! वहां से… टट्टी निकलती है! गन्दा है! मेरा शोहर – मेरा अपना शोहर – कभी

नहीं माँगा! वह मुझे इज़्ज़त देता है! यह हराम है, गजेंद्र! हमारे मज़हब में मन

है! सोडोमी बड़ा गुनाह है! मैं कभी नहीं करने दूंगी!

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए) सुन तो सही. अब क़ुरान की आयात सुना रही है? हॉस्पिटल में मेरा

माल निगला था अच्छे छोटे रंडी की तरह, और अब स्कॉलर बन गयी? तेरे ईमान ने रोका नहीं हिंदू

लुंड के लिए टांगें फ़ैलाने से.

माँ: (आवाज़ दर से तेज़) वह अलग था! वह… कमज़ोरी थी. लेकिन यह… बिलकुल अलग है. नहीं करुँगी.

नहीं कर सकती. प्लीज, जाने दो.

गजेंद्र: (आवाज़ सख्त) पेट के बल लेट जा, शाहिदा. अभी.

माँ: (सर तेज़ हिला कर) नहीं… गजेंद्र, प्लीज. दर लग रहा है. मत मजबूर कर.

गजेंद्र: (धीमी और गुस्से वाली आवाज़, कलाई पकड़ कर) मैंने कहा लेट जा. सोचती है मासूम

बीवी की तरह निकल जाएगी? तू पहले से बर्बाद है. अंदर माल छोड़ दिया. बीच की तरह करहि थी.

यह कुछ भी नहीं जो तूने पहले किया उसके सामने.

माँ: (आंसू भर आये, आवाज़ छोटी) तू मुझे डरा रहा है… तू गुस्सा है…

गजेंद्र: किचन जा और तेल ले आ.

मेरी माँ जल्दी से किचन गयी जैसे हुक्म हुआ, दर रही थी, उससे गुस्सा नहीं करना चाहती थी. वह

ज़ालिम बन रहा था.

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वह रुक गयी, सोचा, फिर बिना बोले कड़ी हुई. कार्नर की शेल्फ से छोटी बोतल तेल ली – घर के काम

का बचा हुआ, शायद मस्सगे या खाना बनाने के लिए. वापस आयी, बिस्तर पर पेट के बल लेट गयी,

सर बंधे हाथों पर, गांड दावत की तरह पेश.

गजेंद्र के हाथ तुरंत उसकी गांड पर गए, नरम भरी मांस को ज़ोर से मसलते हुए, तेल हाथों

पर लगाकर मस्सगे कर रहा था. उसकी गांड भरी, गोल, दबाव में नरम लेकिन रोज़ की ज़िन्दगी से

सख्त.

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मेरे ख्यालों में, छुप कर देखते हुए, सोच रहा था कितना किस्मत वाला है गजेंद्र आज रात

– वह माँ की गांड लेने वाला था, वह जगह जिसे किसी ने छुआ नहीं, बाप ने भी इतने सालों की शादी

में नहीं. वह कुंवारी थी, पाक होने की अलामत उसके भटकने में भी, कोई मर्द वहां नहीं

गया, यह काम और गहरा बना देता था, आखरी रुकावट टूट रही थी.

गजेंद्र: (उसे ज़ोर से खींच कर बिस्तर पर, पेट के बल धकेल कर) अच्छा. दर जा. डरना चाहिए.

जब तक मुझे जो चाहिए न मिले, नहीं जायेगी. ठीक से पलट. गांड ऊपर.

माँ: (सिसकते हुए, मुँह तकिये में, जिस्म कांप रहा) प्लीज… मिन्नत है. मेरा घर… मेरे

बच्चे… अगर देर से घर गयी तो पता चल जायेगा कुछ गलत है…

गजेंद्र: (पीछे घुटनो पर बैठ कर, गांड फैलते हुए धीरे) वह जान जायेंगे तू एक रंडी है

जो बीमार शोहर से धोका देती है. वही जानेंगे. अब रिलैक्स कर अपनी कुंवारी गांड. मैं इसे

बर्बाद करूँगा. फैलाऊंगा. खुलवाऊंगा मेरे लिए. तू कभी नहीं भूलेगी इस छेद का मालिक कौन है.

माँ: (धीमे रोटी हुई) नहीं… प्लीज… पहले से hi बहुत गन्दी महसूस हो रही है… सब खो दिया…

गजेंद्र: (उसकी गांड पर थूक कर, ज़ोर से रगड़ कर) सब खो दिया? तूने डिग्निटी हॉस्पिटल में

घुटनो पर बैठ कर खो दी थी. यह तो ऊपर का चेरी है. एक गन्दी _ रंडी अपने हिंदू

पडोसी से शितोले छुड़वा रही है. ज़ोर से बोल – बता मुझे तू ले रही है.

माँ: (आवाज़ टूट रही, मुश्किल से सुनाई देती) मैं… नहीं… बहुत ज़्यादा है…

गजेंद्र: (गांड पर ज़ोर से थप्पड़) बोल, शाहिदा. वर्ण और दर्द होगा. बोल तू अपना गन्दा टट्टी

वाला छेद छुड़वाने देगी.

माँ: (ज़ोर से रोटी हुई, हार मान कर) …मैं… देगी… प्लीज बस… दर्द मत करना…

गजेंद्र: (मुस्कुराते हुए, सुपर उस पर रगड़ कर) सही है. अच्छी लड़की. तू पहले से सबसे बुरी

रंडी है. पूरा जाने दे. मैं तेरी दीनदार छोटी गांड बर्बाद करूँगा.

माँ: (तकिये में सिसकते हुए) ओह ,.'… माफ़ कर… बहुत शर्मिंदा हूँ…

उसने उसे वैसी रंडी की तरह ट्रीट किया जैसे मैंने ऑनलाइन फोर्बिडन पोर्न वीडियोस में देखा था

– हुक्म देते, चीज़ बनाते, हाथ गांड फैला कर सबसे प्राइवेट जगह दिखा रहे थे.

मैं हैरान था की माँ ने इतनी जल्दी मान लिया; यह वह औरत जो मुझे सख्त --- तालीम देती थी,

मॉडेस्ट रहना सिखाती थी और क़ुरान पद्धति थी. हमारे मज़हब में औरत की गांड में घुसना

सबसे बड़े गुनाहों में से है, हदीथ में मन है जैसे जानवरों के काम, ,.' के गुस्से

और शादी में बिगाड़ का सबब. यह जिस्म और रूह को मैला करता है, इज़्ज़त और सेहत के लिए

मन. फिर भी वह मान गयी.

गजेंद्र: (बुरी मुस्कराहट, हाथ गांड से नीचे, ऊँगली उसकी बांध गांड के दरवाज़े पर) ओह,

शाहिदा, तेरा गन्दा छोटा छेद मांग रहा है. देख कैसे ट्वीटच कर रहा – मैं ऊँगली

अंदर दाल रहा हूँ, तू गन्दी _ रंडी.

माँ: (आँखें दर से फैली, ज़ोर से चिल्लाते हुए, तड़पते हुए और पलटने की कोशिश, हाथ उसके

सीने पर धकेल रहे) नहीं! गजेंद्र, रुक! मत करना! अह्ह्ह! यह घिन आती hai—please, नहीं!

(वह टांगें धीमे लात मारती, गांड बांध कर रोकने की कोशिश, आंसू चेहरे पर बह

रहे) यह मन है! मेरा शोहर ने कभी वहां हाथ नहीं लगाया!

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गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, एक हाथ से उसकी टांगें ज़ोर से अलग करके, ऊँगली धीरे से उसकी

टाइट गांड में डालते हुए, गरम विरोध को तोड़ते हुए) बहुत देर हो चुकी है, तुम झूटी छिनाल.

महसूस कर रही हो? मेरी ऊँगली अब तुम्हारी टट्टी वाली छेद में गहरी दाल दी है, जहाँ से तुम्हारी

पाक टट्टी निकलती है. तुम इसके ird-gird कास रही हो जैसे कोई बेबस धोकेबाज़ — शायद तुम्हारी

किताबों में वैली की गांड में ऊँगली डालने का ज़िक्र नहीं है, है न?

माँ: (ज़ोर से चिल्लाते हुए, जिस्म शॉक और शर्म से टेढ़ा हो जाता है, नाख़ून उसके बाहों में

गाड़ते हुए हाथ हटाने की कोशिश में) आआह! रुको! दर्द हो रहा है — बहार निकालो! हे

भगवन, मुझे माफ़ कर दो… यह मेरी बेइज़्ज़ती हद्द से ज़्यादा कर रहा है… ममम… मिन्नत है,

रुक जाओ!

गजेंद्र: (ऊँगली और गहरी धकेल कर, अंदर घूमते हुए, उसकी मिन्नत को नज़रअंदाज़ करते हुए)

जितनी मिन्नत करनी है कर लो, शाहिदा. यह मिलता है तुम्हे इतना पाक बनने का नाटक करने की सजा,

मस्जिद में ,,., पढ़ने वाली और चुपके से लुंड की प्यासी. तुम्हारी गांड इतनी गन्दी और गरम

है — बिलकुल उस _ शर्म के टट्टी से भरी हुई.

माँ: (ज़ोर से चीखते हुए भी be-ikhtiyar कराह रही, कमर उठा कर उसे हटाने की कोशिश, एक

हाथ पीछे जा कर उसकी कलाई पकड़ कर खींचती) नहीं… अह्ह्ह! अभी बहार निकालो! यह सब

बर्बाद कर देगा — मिन्नत है, मेरी इज़्ज़त मत बर्बाद करो… ओह्ह… मेरा ईमान, मेरा

ghar-baar… रुक जाओ!

गजेंद्र: (आखिर ऊँगली धीरे बहार निकालते हुए, उसे नाक के पास ले जा कर ज़ोर से सूंघते हुए,

आँखें उसकी आँखों में गड़े) ममम, यह बू सूँघो? तुम्हारी गांड की टट्टी की बू आ रही

है, शाहिदा — ताज़ा टट्टी और तुम्हारी नकली पाकि का मिक्सचर. तुम कोई नेक बीवी नहीं, तुम एक

बदबूदार शौचालय हो जो संत बनने का नाटक करती है. कैसा लग रहा है जान्ने से की तुम्हारी

सबसे छुपी छेद अब सीवर जैसी बू दे रही है तुम्हारे आबय के नीचे?

माँ: (सांस फूलते हुए, शर्म से सिमट कर, आवाज़ कांप रही जब वह अपने आप को छुपाती

है) ओह्ह्ह… यह कितनी बेइज़्ज़ती है… प्लीज, ऐसे शब्द मत बोलो और… ममम… तुम मेरा नाम,

मेरी पाकि बर्बाद कर रहे हो… रुक जाओ!

गजेंद्र: (अँधेरे में हँसते हुए, अब अपनी बीच की ऊँगली को उसके hi रास से गीला कर के बिना

चेतावनी के उसकी गांड में फिर से धकेल देते हुए, पहले से ज़्यादा गहरा) नाम बर्बाद

करना? शाहिदा पाक? ज़्यादा सही शाहिदा Tatti-Boo वाली छिनाल. महसूस करो यह दूसरी ऊँगली

तुम्हारी गन्दी छेद को खींच रही है — तुम सिर्फ एक धोकेबाज़ कुटिया हो जो वैल के पीछे

छुप कर पडोसी का लुंड चूसती है जब उसका शोहर हॉस्पिटल में साद रहा है. तुम्हारे

बच्चे तुम्हे मिसाल समझते हैं? है, तुम एक वीर्य पीने वाली नकली औरत हो जिसकी गांड

झूठ और मसाला की पुदीने की बू से भरी है.

माँ: (फिर ज़ोर से चीखते हुए, जिस्म हिलता हुआ, उसके हाथ पर थप्पड़ मरते हुए और पलटने

की कोशिश) आआह! नहीं, एक और नहीं! बहार निकालो — मिन्नत है गजेंद्र, रेहम करो! अहह…

यह मेरी इतनी बेइज़्ज़ती कर रहा है… हे भगवन क्यों… ममम… मुझे ऐसे मैला मत करो!

गजेंद्र: (ऊँगली अंदर बहार ज़ोर ज़ोर से चलते हुए, फिर बहार निकाल कर ज़ोर से सूंघते हुए,

उसे उसकी नाक के नीचे हिलाते हुए) यह सूँघो, बेकार रंडी. तुम्हारी अपनी टट्टी की बू —

तुम्हारा पाक नाम हमेशा के लिए मैला. शाहिदा का मतलब 'ज़िंदा', लेकिन तुम्हारी बू

मुर्दा इज़्ज़त जैसी है. पाक बनने का नाटक? तुम नाली से भी गन्दी हो, हिंदू के लिए टांगें

फैलाती हो और दुआ पढ़ती हो. तुम्हारा इमाम तुम पर थूक देगा, तुम्हारी दादी ज़ैनब शायद

वही छिनाल खून थी जो तुम तक आया.

माँ: (सर पलट कर, चीखते हुए जब वह ऊँगली उसके चेहरे के पास लाता है, हाथ कमज़ोर

से उसे हटाते हुए) नहीं! मुझे मत सुँघाओ — अह्ह्ह! यह गन्दा है… प्लीज रुक जाओ, तुम

मेरी रूह तोड़ रहे हो… ममम… मेरा मज़हब यह बेइज़्ज़ती इजाज़त नहीं देता… ओह्ह… मिन्नत है,

और मत!

गजेंद्र: (ऊँगली थोड़ी देर उसके होंठों पर दबाते हुए फिर पीछे खिंच कर, मुस्कुराते हुए)

अपनी बेइज़्ज़ती का स्वाद चखो, शाहिदा. तुम कोई वफादार _ नहीं, तुम एक tatti-boo वाली

जीना करने वाली हो, बीमार शोहर को, बच्चों को, खुदा को धोका देती हो — सिर्फ इसके लिए. कैसी

लगी यह नकली पाकि बर्बाद करना? अब तुम सिर्फ एक गन्दी, be-izzat छेद रह गयी हो.

बाद में, उसने उँगलियों से उसकी पंतय और शॉर्ट्स की कमर पकड़ी और एक hi झटके में टांगों

से नीचे कर दिया, उसे बिलकुल नंगा कर दिया.

उसके गांड के दोनों हिस्से थोड़ा अलग हुए, टाइट, सिकुड़ी हुई छेद दिखी. उसने और तेल डाला,

उँगलियों से धीरे धीरे gol-gol मस्सगे करते हुए, पहले हलके से छेड़ते हुए, फिर गहरा,

जिससे उसके मुँह से हलकी सांस निकलती है. "अपनी बड़ी गांड के दोनों हिस्से मेरे लिए फैलाओ, शाहिदा,"

उसने हुक्म दिया, आवाज़ में इख़्तियार.

वह रुक गयी, फिर पीछे हाथ दाल कर अपने मांस को पकड़ कर अलग करती है. "प्लीज गजेंद्र

… नरम रहना. मिन्नत है — मुझे अच्छा महसूस कराओ."

उसने मुस्कुराते हुए बेइज़्ज़ती भरे शब्दों में कहा. "पहले से मिन्नत? कितनी भूखी छिनाल

बन गयी हो. ज़्यादा फैलाओ — मुझे इंतज़ार मत करवाओ." उसकी बड़ी गांड, इतनी नरम और लुभाने

वाली, उसे सीधा करने में मुश्किल दे रही थी; गांड के हिस्से विरोध कर रहे थे, बंद हो रहे

थे. "अरे, यह मोती गांड बीच में आ रही है," उसने बेइज़्ज़ती की, एक गांड पर हल्का थप्पड़

मारा.

"ठीक से फैलाओ औरत — मुझे तड़पा मत." उसने अपना लुंड पूरा तेल से गीला किया, चमक रहा

था, और खुद को पोजीशन किया, सर उसकी छेद पर रखा. माँ चिल्लाई, "रुको — बहार निकालो! बहुत

ज़्यादा है!" लेकिन वह आगे बढ़ा, बुरी बातें करते हुए. "चुप और ले लो, छिनाल. मत कसो —

ढीला करो, वर्ण ज़्यादा दर्द होगा. तुमने यह चाहा था, याद है?"

माँ: (तेज़ सांस लेते हुए जब गजेंद्र अचानक अपने लुंड का सर उसकी टाइट, कभी न छुई गांड

पर दबाता है, जिस्म सख्त हो जाता है) नहीं… गजेंद्र, वहां नहीं! प्लीज… वहां कभी नहीं…

अह्ह्ह!

गजेंद्र: (बुरी तरह मुस्कुराते हुए, उसकी सिकुड़ी छेद पर थूक कर मोटा सर ज़ोर से धकेल देते

हुए विरोध को तोड़ते हुए) अपना पाक मुँह बंद करो, शाहिदा. आज यह पाक _ गांड

चूड़ी जाएगी. महसूस कर रही हो? तुम्हारी टट्टी वाली छेद हिंदू लुंड के ird-gird खुल रही है

— कितना जलता अच्छा लग रहा है, है न?

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माँ: (आवाज़ पहात कर ऊँची चीख में बदल जाती जब वह गहरा धकेल रहा है, एक एक ज़ुल्म

भरा इंच) अह्ह्ह… ओह ,.'… दर्द हो रहा है… ममम… बहुत बड़ा… प्लीज धीरे… यह

गुनाह है… बिलकुल गुनाह…

गजेंद्र: (अब ज़ोर से धक्का देते हुए, आधा लुंड एक hi धक्के में दाल देते हुए, हाथ कमर

पर पकड़ कर) गुनाह? तुम्हे गुनाह पसंद है, गन्दी वैली रंडी. मेरे लिए चीखो. बताओ कितनी

टाइट है तुम्हारी गांड अपनी धोकेबाज़ छूट से.

माँ: (टूटी हुई कराहते हुए, आंसू बह रहे, जिस्म हर धक्के से आगे हिलता) अहह… अहह… यह…

बहुत टाइट… ममम… मैं नहीं… गजेंद्र रुक जाओ… मेरा मज़हब… मेरी रूह…

गजेंद्र: (एकदम से पूरा अंदर धकेल देते हुए, उसे चीखने पर मजबूर करते हुए) ठीक

से जवाब दो, छिनाल. कौन सा लुंड अभी तुम्हारी कुंवारी गांड बर्बाद कर रहा है? ज़ोर से

बोलो.

माँ: (रोने और कराहते हुए, आवाज़ कांप रही) तुम्हारा… अह्ह्ह… गजेंद्र का लुंड… यह मेरी

… मेरी गांड बर्बाद कर रहा है…

जब वह गहरा धकेल रहा था इंच इंच, मैं देखता रहा, हाथ पंत के ऊपर से अपना लुंड

सहलाता हुआ, शर्मिंदा लेकिन उत्तेजित. कैसे देख सकता हूँ अपनी माँ को रंडी बनाते हुए, इतनी

बेइज़्ज़ती होते हुए? अब उसका पूरा लुंड अंदर था, हिलत तक.

वह उसकी गांड बर्बाद करना चाहता था, ज़ुल्म भरे इरादे से धक्के मर रहा था, ज़ोर ज़ोर

से छोड़ रहा था, बिस्तर हिल रहा था. उसके गांड के हिस्से हर धक्के से हिल रहे थे, लहार जैसे

मांस पर. वह नीचे हाथ दाल कर अपनी छूट सहलाने लगी, कराह रही थी, और उसने बेइज़्ज़ती

की: "खुद को सेहला रही हो जैसे कोई बेबस कुटिया? घिन आती है."

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गजेंद्र: (लगातार धक्के देते हुए, चमड़ी चमड़ी टकरा रही) अच्छी लड़की. अब बताओ अपने

बेकार शोहर के लुंड के बारे में. कितना छोटा है? क्या वह तुम्हे कभी झाड़ता भी है?

बोलो, वर्ण इस छेद को छोड़ता रहूँगा जब तक तुम टट्टी न कर दो.

माँ: (मिन्नत भरी आवाज़ में, चेहरा शर्म से लाल) यह… छोटा… ममम… उसने कभी…

अहह… कभी मुझे संतुष्ट नहीं किया… जैसे यह…

गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, उसके वैल से सर पीछे खींच कर) ज़ोर से बोलो, कुटिया. बोलो:

“मेरे शोहर का छोटा लुंड बेकार है. वह एक कमज़ोर कुक है जो अपनी बीवी को छोड़ नहीं सकता.”

माँ: (आवाज़ कांप रही, शर्म से कराहते हुए मान लेती) मेरा… अह्ह्ह… शोहर का छोटा लुंड

बेकार है… वह एक कमज़ोर कुक है… जो अपनी बीवी को छोड़ नहीं सकता… हे भगवन मुझे माफ़

कर दो…

गजेंद्र: (और ज़ोर से धक्के देते हुए, उसकी गांड हिलाते हुए) बिलकुल सही. अब बोलो तुम असल में

क्या हो. बोलो: “मैं एक गन्दी _ छिनाल हूँ जो अपनी टट्टी वाली छेद को काफिर लुंड से

बर्बाद करवाना पसंद करती है.”

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Maa: (cheekhte hue, jism be-ikhtiyar uske ird-gird kas raha) Main… ahhh… main ek gandi _

chhinal hoon… jo apni tatti wali ched ko… kafir lund se barbaad karwana pasand karti hai… mmm…

Gajendra: (garajte hue, haath aage daal kar uski clit ko zor se dabate hue) Aur bolo. Apne ko aur

bura bolo. Sach bolo, tum jhooti dua padhne wali randi.

Maa: (zor se karahate hue, shabd toot toot kar nikal rahe) Main… ek gandi haram dhokebaaz kutiya…

ek lund ki pyaasi veili randi… ahh… Hiindu veery ka shauchalay… main gandi hoon… main iski

haqdaar hoon…

Gajendra: (zulm bhare dhakke dete hue, awaaz mein nafrat) Haan haqdaar ho. Phir se bolo — zor

se. Bolo ki tum mere pairon ke neeche ki mitti se bhi neeche ho kyunki tumne mujhe har ched

maila karne di jo tumhare shohar ne kabhi chhua nahi.

Maa: (rone wali karahate hue, bilkul toot chuki) Main… ahhh… mitti se bhi neeche… maine tumhe har

ched maila karne di… jo mera shohar kabhi nahi chhua… main kuchh nahi… sirf ek bekaar… gaand

chudi hui chhinal…

Gajendra: (garajte hue, tez aur be-rehem raftaar) Yeh meri acchi chhoti _ suar. Karahati raho

jaise be-sharam shauchalay ho jab main is paak tatti wali ched ko barbaad kar raha hoon. Ab tum

meri ho, Shahida — tumhara har ganda inch mera hai।

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CHAPTER 17

क्या मैं एक बेशर्म बीटा हूँ? क्यों मुझे अपनी माँ को ज़लील

होते देख कर मज़ा आ रहा है?

उसकी गांड में दर्द बहुत तेज़ होगा; मैं देख सकता था उसके जिस्म के टेंस होने से, पीठ थोड़ी

सी उठी हुई जब वह तैसे कर रहा था. पहले जब उसने पहली बार अंदर डाला था, वह चीख उठी थी,

"आह्हः! दर्द हो रहा है... बहुत बड़ा है, गजेंद्र, प्लीज धीरे करो!"

उसका स्फिंक्टर, जो ऐसे घुसने के आदि नहीं tha—Abbu सालों से बीमार थे, और उससे पहले भी उनका

रिश्ता सदा और इज़्ज़त वाला tha—uski मोटाई के चरों तरफ दर्द से खिंच गया था, मसल्स तेज़

चुभन के साथ विरोध कर रहे थे जो नीचे के जिस्म में फ़ैल रही थी.

अब जब वह दोबारा अंदर जाने वाला था, दर्द अभी भी बाकी था, एक जलन भरी खिचाव जो उसकी

जाँघों को काँप रही थी. "तेरी गांड कितनी अच्छी तरह हिल रही है, शाहिदा,"

गजेंद्र बोलै, आवाज़

में मज़ाक भरा हुआ जब उसने उसकी गांड पर हल्का सा थप्पड़ मारा, देख रहा था की गोश्त तालाब

की तरह लहरा रहा है. "मेरे लिए हिलाओ isko—ise मुस्लिम गांड को हिलाओ जैसे सच में चाहती हो.

दिखाओ कितना चाहती हो यह, चाहे मुँह से न भी कहो."

अम्मी झिझकी, सांस रुक गयी, लेकिन उसकी हुक्म भरी नज़र के नीचे वह मान गयी, कमर इधर उधर

हिलने लगी, गांड के दोनों हिस्से गोल गोल घूम रहे थे जो गोश्त को नरम नरम उछाल रहे थे.

"ऐसे?" उसने शर्माते हुए पुछा, आवाज़ छोटी सी, और मैं दिल डूबते हुए समझ गया की वह

पूरी तरह उसके क़ब्ज़े में thi—meri मज़बूत, दीनदार अम्मी, उसके हर इशारे पर चल रही थी.

उसने खुद से हिलना शुरू कर दिया बिना और कहने के, यह बहुत कुछ बोल रहा था; उसने उसमें

कुछ टूट दिया था, विरोध को मजबूरी में बदल दिया था.

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"हाँ, बिलकुल ऐसे," उसने मज़ाक में तारीफ की, हाथ से एक और थप्पड़ maara—is बार ज़्यादा ज़ोर से—

जिससे उसके होंठों से तेज़ "ओह्ह!" निकला, जिस्म आगे को झटका खाया. उसने be-rehmi से शर्मिंदा किया,

उसके ईमान और वफादारी पर तीर चलाये.

"देखो अपने आप को, Shahida—ek अच्छी मुस्लिम बीवी, रोज़

पांच वक़्त ,,., पढ़ती है, बहार सर धखतई है, लेकिन यहाँ हिंदू मर्द के लिए गांड हिला रही

है. तुम्हारा इमाम क्या कहेगा? या तुम्हारा बीमार शोहर हुसैन, जो हॉस्पिटल के बिस्तर पर पड़ा है

जब तुम उसके साथ धोका कर रही हो?

मुनाफ़िक़ हो न? बीटा को पाक होने की तालीम देती हो, लेकिन उस

मर्द के लिए टांगें फैला रही हो जिसने शोहर के हॉस्पिटल बिल भरे. बड़ा गुनाह है yeh—sabse बुरा

जीना, दुसरे मज़हब से अडुल्टेरी. तुमने अपना दीं मैला कर दिया, और किस लिए? कुछ रुपये और एक

सख्त लुंड के लिए?"

उसने एक एक कर के उसकी मुनाफ़िक़ात निकाली, शब्द छुरी जैसे थे, और अपने ज़ुल्म भरे मोड़ डाले. "याद

है जब पहली मुलाक़ात में हलाल हराम की बात की थी? कहा था कभी non-Musslim को हाथ नहीं

लगाउंगी. लेकिन अब तेरी गांड मुझे पुराने दोस्त की तरह स्वागत कर रही है. और वह रमजान का

रोज़ह जो तूने रखा लेकिन मुझे चोरी चोरी देखती rahi—munafiq! या वह वैल जो इतनी शर्म से

पहनती हो, लेकिन अंदर से मेरे लिए गीली हो जाती हो. बड़ा गुनाह, Shahida—tera खुदा सब देख रहा

है, और वह तुझे रंडी की तरह हिलते देख रहा है."

एक और थप्पड़ उसकी गांड पर पड़ा, आवाज़ तेज़ गूंजी, और वह चीखी, "आह्हः! प्लीज, इतना ज़ोर से

नहीं!" उसकी चमड़ी उसके हाथ के नीचे लाल हो गयी, चुभन शर्मिंदगी में इज़ाफ़ा कर रही थी.

वह यहीं नहीं रुका; उसने उसके बदबू वाले पड़ने पर भी शर्मिंदा किया, जो पहली घुसाई के दौरान

निकल गए थे.

"तेरे यह पद, Shahida—tez बदबू वाले, जैसे सदी अंडे करी के साथ मिले हुए. क्या मुस्लिम औरतों

के अंदर से ऐसी बू आती है? घिन आती है, लेकिन मुझे गरम कर देती है. फिर से पद कर दिखा—

निकल दे, दिखा अपनी असली गन्दगी." और और गहरा करने के लिए, उसने माँ होने की शान पर मज़ाक

उदय:

"तूने बेटे को औरतों की इज़्ज़त सिखाई, लेकिन यहाँ मुझे तुझे कचरे की तरह ट्रीट करने दे

रही है. कैसा नमूना है तू? मुनाफ़िक़ माँ, गुनहगार बीवी."

अम्मी: (ज़ोर से चीखते हुए जब गजेंद्र उसकी टाइट गांड में धक्का मारता है, जिस्म चार हाथों

पर टेंस और कांपते हुए, वैल आंसुओं भरे चेहरे पर गिरता हुआ) रुको! गजेंद्र, मेरी गांड

छोड़ना बंद करो! दर्द हो रहा है... अह्ह्ह! अच्छा नहीं लग रहा... प्लीज, बहार निकालो! यह बहुत

ज़्यादा है... ओह खुदा, नहीं!

गजेंद्र: (हर गहरे धक्के के साथ गरजते हुए, कमर को मज़बूत पकडे रखता हुआ) अब रुकना

चाहती हो, शाहिदा? तुम महीनों पहले यह चक्कर ख़तम कर सकती थी, पता है न. लेकिन नहीं, तू

बार बार वापस आती रही, जैसे कोई बेकरार छिनाल. अब देखो अपने आप को, अपना घर टुकड़े टुकड़े कर

रही हो.

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अम्मी: (दांत पीस कर चिल्लाते हुए, पीछे धकेलने की कोशिश करती लेकिन जिस्म मजबूरी से कराह रहा

है) आआह! मैंने कहा रुक जाओ! तू मुझे बर्बाद कर रहा है... ममम... मेरा बेचारा शोहर...

वह हॉस्पिटल में है मेरी वजह से स्ट्रेस की... ओह्ह्ह, नहीं!

गजेंद्र: (ज़ोर से धक्के मारते हुए, आवाज़ मज़ाक से टपकती हुई) बर्बाद कर रहा हूँ? तू ने उसको

बर्बाद किया है, शाहिदा. बीमार शोहर के साथ धोका, पडोसी जैसे मुझसे चुदवाती रही जब वह

ज़िन्दगी के लिए लड़ रहा था. क्या तुझे लगता है तेरे झूठ और राज़ ने उसको नहीं तोडा? तू अपने घर

में hi घर तोड़ने वाली है, बच्चों को शर्मिंदा करती है, अपने ईमान ko—sab कुछ इस लुंड के लिए

जो तेरी गांड में है.

अम्मी: (ज़ोर से चीखते हुए, मुँह पर मुट्ठियां मारते हुए दर्द और गुस्से में) चुप कर! अह्ह्ह!

सच नहीं है... मेरा इरादा नहीं था... लेकिन... ओह खुदा, शायद सच है... मैंने सब बर्बाद कर

दिया... ममम... जल्दी ख़तम कर, गजेंद्र! जल्दी कर ताकि मैं घर जा कर यह सब भूल जाऊं...

जल्दी कर, हरामी!

गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, रफ़्तार धीमी करके उसका दुःख बढ़ता हुआ) भूल जाना? गुनाह

को भूल नहीं सकती तू, गन्दी मुस्लिम रंडी. अभी तेरी गांड मेरे लुंड को कास कर पकड़ रही hai—agar

नफरत है तो इतना ज़ोर से क्यों पकड़ रही है? मान ले, तेरी गांड इस हराम धक्के से प्यार करती है.

अम्मी: (गुस्से से कराहते हुए, आवाज़ गुस्से और na-chahte हुए मज़े में, जिस्म विरोध के बावजूद

उठ रहा है) नहीं... ममम... मज़ा नहीं आ रहा! यह मत पूछो... अहह... बस... हो रहा है... प्लीज,

और शर्मिंदा मत करो... ओह्ह्ह!

गजेंद्र: (फिर तेज़ करते हुए, गांड पर हल्का थप्पड़ मार्के ज़ोर देता हुआ) तो तेरी गांड मुझे वाईस

की तरह क्यों पकड़ रही है? बता, शाहिदा, किसी और ने कभी इस गन्दी छेद को खिंचा है? या सिर्फ मैं

hi तेरी पाक पीछे वाली दरवाज़े को मैला कर रहा हूँ? तू गुनहगार है न? अपने बेचारे शोहर

से प्यार पर सवाल उठ रहा hai—kya वह जानता है उसकी बीवी अब गांड की रंडी बन गयी है?

अम्मी: (रोटी हुई, चीखें अब मायूस सिसकियों में बदल रही) अह्ह्ह... हाँ, मैं गुनहगार हूँ...

ममम... मैं अपने शोहर से प्यार करती हूँ, लेकिन... ओह खुदा, मैं यह क्यों कर रही हूँ? मुझे

जवाब मत दिलवाओ... बस रुक जाओ... नहीं, मतलब जल्दी कर!

गजेंद्र: (गहरा धक्का देते हुए, सख्ती से मांगता हुआ) मेरी वजह से गांड कास, शाहिदा. कर—

दिखा कितना छुपा छुपा कर यह शर्मिंदगी चाहती है. ज़ोर से कास, मुनाफ़िक़.

अम्मी: (झिझकते हुए लेकिन मान कर, गांड के मसल्स को उसके लुंड के चरों तरफ कास रही है गुस्से

के बावजूद, मजबूरी से कराह रही) ममम... ठीक है... अहह... लो, कर दिया... अब ख़तम कर, तू

मॉन्स्टर! यह बहुत गलत है... ओह्ह्ह...

गजेंद्र: (मज़े से गरजते हुए जब टाइट कास महसूस करता है, फिर हवा को सूंघते हुए मज़ाक

में) हाँ, यह कास महसूस हो रहा hai—teri गांड मेरे लुंड को गले लगा रही है जैसे कभी

छोड़ना नहीं चाहती. लेकिन रुक... (रुक कर जब छोटा सा पद निकल जाता है) ः, अभी अभी मेरे लुंड

पर पद किया? Dekho—teri be-qaboo पद और be-qaboo लस्ट एक साथ. गांड मरते हुए गैस भी नहीं

रोक सकती, गन्दी, be-imaan कुटिया. शायद तेरे शोहर ने कभी तेरी बदबू वाली निकलने वाली चीज़ों

का सामना नहीं किया.

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अम्मी: (चेहरा शर्म से जलते हुए, शर्मिंदा गुस्से में चिल्लाते हुए कराह रही) अह्ह्ह! ाहूःठ

ओह्ह्ह गजेंद्रआ!! उस बात पर चुप कर... ममम... पहले से hi बहुत शर्मिंदगी है बिना तू बोले!

हाँ, मैं बर्बाद हूँ... लस्ट में डूबी हुई घर बर्बाद करने वाली... बस जल्दी झाड़ जा ताकि मैं

माफ़ी मांगने के लिए ,,., पद सकूं... ओह्ह्ह, और नहीं!

गजेंद्र: (be-rehmi से धक्के मारते हुए, शर्मिंदा करते हुए) ,,.,? गांड मरते हुए सूअर की

तरह पड़ने के बाद? तेरी लस्ट उतनी hi be-qaboo है जितनी तेरी ांतरें, शाहिदा. सोच जब घर जाएगी

बच्चे तेरी गुनाह की बू soonghenge—gaand चुदाई और धोके की बू. फिर से क्यों कास रही है अगर

पूरी रंडी नहीं है? मान ले तू खुद को मेरे लिए बर्बाद करने से प्यार करती है.

अम्मी: (टूट कर, आंसुओं में गुस्से से कराह रही) ममम... क्योंकि... अहह... शायद मैं गुनहगार

हूँ... मैं तुझसे नफरत करती हूँ इसके लिए... लेकिन जल्दी कर, प्लीज... मेरा घर इंतज़ार कर रहा

है... ओह खुदा, मैं क्या बन गयी हूँ?

अम्मी दर्द से चीखी, "ओह्ह! आह्हः, बहुत गहरा! जलन हो रही है!" घुसाई ने उसे पूरा भर दिया,

ांतरें अचानक भरपूर होने से विरोध कर रही थी, रगड़ की गर्मी ने नेर्वेस को जगा दिया जो उसे

पता भी नहीं थे.

"तेरी गांड कितनी गरम और नरम है, Shahida—jaise रेशम में लपेटा हुआ भट्ठी," वह गरजता

हुआ बोलै, कमर धीमी रफ़्तार से हिलने लगा. "टाइट bhi—pehle कभी यहाँ छोड़ा नहीं गया न?

मैंने बहुत औरतों को छोड़ा है, लेकिन मुस्लिम की गांड में नहीं. बहुत इलाही लग रहा है, जैसे

मना किया इलाका फ़तेह कर रहा हूँ. तेरा मज़हब इसको मन करता है न? गांड मरना, हराम—

लेकिन तू इससे प्यार कर रही है न?"

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उसने अपना दबदबा और दिखाया, धक्के के बीच पूछा. "अपने कमज़ोर शोहर को तलाक़ दे दे,

Shahida—tu अपनी इज़्ज़त खो चुकी है. पूरी तरह मेरी हो जा; मैं तेरा ख्याल रखूँगा, बिल सब. इतने

गुनाह वाले रिश्ते से क्यों चिपकी हुई है?"

और एक चीज़ जोड़ कर, "अपने बेटे के बारे में soch—kya वह जानता है उसकी अम्मी रंडी बन गयी

है? हुसैन को तलाक़ दे, वर्ण मैं कम्युनिटी को सब बता दूंगा हमारे बारे में."

मैं अँधेरे में मुठ मार रहा था, हाथ तेज़ तेज़ चल रहा था, मुझमें इज़्ज़त या शर्म का

नाम ो निशाँ नहीं बचा. क्यों मैं इससे गरम हो रहा था? मेरी अपनी अम्मी की बेइज़्ज़ती, और मैं

उसकी कराहों के ताल पर हाथ चला रहा tha—sharmnaak, घिनोना, लेकिन गर्मी रुक नहीं रही थी.

अम्मी ने सख्ती से इंकार किया, आवाज़ साँसों के बीच टूट रही थी. "कभी नहीं! मैं हुसैन को

कभी तलाक़ नहीं doongi—woh मेरा शोहर है, मेरे बच्चे का बाप. यह... यह गलती है, गजेंद्र.

अब रुक जाओ या जल्दी ख़तम karo—main और नहीं सेह सकती."

लेकिन वह हँसता हुआ ज़ोर से धक्का मारता रहा. "तू खुद से झूठ बोल रही है, शाहिदा. तेरा

जिस्म धोका दे रहा hai—mehsoos कर कितनी गीली है तू? तू रुकने की मिन्नत करती है, लेकिन तेरी गांड

और चाहती है. झूठी, munafiq—buri मुस्लिम रंडी. तुझे गुनाहों की सजा मिलनी चाहिए, अपने

मज़हब से धोका, घर से धोका. ले जैसे रंडी है तू." वह मिन्नत जारी राखी, बेचैनी में लम्बी

मिन्नतें:

"गजेंद्र, प्लीज, रेहम kar—jaldi ख़तम कर, मैं मिन्नत करती हूँ. मेरी गांड बहुत दर्द कर

रही है; यह मुझे चीयर रही है. ,.' का soch—nahi, इन्साफ का सोच. रुक जाओ, या काम से काम

नरम रहो. मैं ज़्यादा देर नहीं टिक सकती."

अब वह झड़ने वाला था, रफ़्तार तेज़ जैसे इंजन में पिस्टन, be-rehmi से थोक रहा था, बिस्तर ज़ोर

से चीख रहा था, उसकी गांड के हिस्से उसकी जाँघों से रदमीक थप्पड़ खा रहे थे.

इस दौरान पसीना उनके जिस्म से बह रहा था, सेक्स और मुश्क की बू मिल रही थी; अम्मी की कराहें बढ़

रही थी, "आह्हः! ओह्ह, बहुत तेज़!" उसके गरजने के साथ मिल रही थी. उसके छातियां तेज़ी से हिल रही

थी, चूचियां चादर को छू रही थी, और उँगलियाँ कपडे को ज़ोर से पकडे हुए थी.

गजेंद्र: (अपना मोटा लुंड धीरे से उसकी टाइट गांड में धकेल रहा है, उसे स्ट्रेच करते हुए

जब वह नीचे इनके कर रही है, आबय कमर के चरों तरफ चढ़ी हुई) ममम, यही है,

शाहिदा... तेरी कुंवारी मुस्लिम गांड आखिर मेरी हो गयी. लगभग एक घंटा से इस टट्टी वाले छेद

को थोक रहा हूँ, और तू अभी भी छोटी वैली की तरह कास रही है. महसूस कर रहा है? हर

धक्का और गहरा उस जगह में जहाँ से तेरी गन्दगी निकलती है.

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अम्मी: (तेज़ सांस लेते हुए, जिस्म कांप रहा है, चादर को ज़ोर से पकडे, वैल के नीचे चेहरे

पर आंसू बह रहे) आह्हः… नहीं, गजेंद्र… बहुत दर्द हो रहा है… ओह्ह्ह… बस करो यह…

यह ग़लत है… या ,.', मेरे गुनाह माफ़ कर… ममम… मेरा मज़हब इस गन्दगी को मन करता

है…

गजेंद्र: (ज़ोर ज़ोर से धक्के मारते हुए, रदम बनाते हुए, पसीना उसकी पीठ पर टपक रहा)

ग़लत? तेरा जिस्म तो इससे प्यार कर रहा है, तू मुनाफ़िक़ औरत. देख, तू गरम कुटिया की तरह कराह

रही है. और ओह, रुक — (आधा बहार निकाल कर अपने लुंड को देखते हुए, मुस्कुराते हुए) यह क्या

भूरी लकीर है मेरे लुंड पर? तूने मेरे लिए चॉकलेट बना दिया, शाहिदा. तू जानती है यह क्या

है?

अम्मी: (भरी सांस लेते हुए, चेहरा शर्म से लाल, नज़र हटाने की कोशिश) K-kya? चॉकलेट?

मैं… मैं नहीं जानती… आह… बस करो… यह पहले से hi बहुत शर्मिंदगी है… ओह ,.'…

गजेंद्र: (अँधेरे में हँसते हुए, लुंड को उसके चेहरे के पास ले जाते हुए जबकि अभी भी थोड़ा

अंदर) ः, तू बेवक़ूफ़ नेक छिनाल. यह तेरी टट्टी है, शाहिदा. तूने मेरी गांड चुदाई के वक़्त

थोड़ी टट्टी कर दी मेरे लुंड पर. रोक नहीं पायी न? सारा हलाल खाना अब हिंदू के लुंड पर भूरी

दाग बन गया.

अम्मी: (दर से सिसक कर, एक हाथ से मुँह धक् कर) ओह नहीं… माफ़ करना गजेंद्र… यह बहुत

घिनौनी है… आह्हः… मैंने जान बुझ कर नहीं किया… माफ़ कर दो… ममम… यह बहुत शर्म की

बात है… बस करो, मैं मिन्नत करती हूँ…

गजेंद्र: (ज़ोर से वापस अंदर धकेल कर, उसी 'चॉकलेट' को लुब्रिकेशन की तरह इस्तेमाल करते हुए,

उसकी छेद के चरों तरफ फैलाते हुए) माफ़ करूँ? तेरी जानवर जैसी टट्टी मेरे ऊपर गिराने के लिए?

तू माफ़ी मांग रही है, लेकिन तेरी गांड अब और ज़ोर से पकड़ रही है. शर्त लगाऊं तेरा शोहर ने

कभी तुझे सेक्स के दौरान टट्टी करते नहीं देखा — ओह रुक, उसने यह छेद छुआ hi नहीं था न?

अब देख, एक नेक _ अम्मी अपनी टट्टी से मेरे लुंड को सजा रही है. यह बू तेरी इज़्ज़त के

मरने की है न?

अम्मी: (वह धक्के जारी रखते हुए be-ikhtiyar कराह रही, आवाज़ रोने से टूट रही) ममम… नहीं…

ऐसा मत कहो… यह मुझे बर्बाद कर रहा है… आह… मेरी नेकी… मैं कभी इतनी ज़लील नहीं

हुई… रेहम करो मेरी रूह पर…

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गजेंद्र: (तेज़ करते हुए, ऊँगली पर थोड़ा सा दाग ले कर उसके नाक के पास हिलाते हुए) रेहम?

सूंघ यह, शाहिदा — यह तेरी टट्टी है, तेरे पाक जिस्म से ताज़ा. वही गांड जो तू वुज़ू के लिए

धोती है, अब मेरे लुंड को भूरा रंग दे रही है. सोच मग़रिब की ,,., इस बू के साथ. तू

ईमान वाली औरत नहीं; तू काफिरों के लिए टट्टी करने वाला टॉयलेट है.

अम्मी: (सर पलट कर, थोड़ा ुबक कर लेकिन धक्के से कराह रही) ओह्ह्ह… मत हिलाओ… यह गन्दी है

… या रब्ब, मुझे बचा… ममम… मैं बहुत गन्दी महसूस कर रही हूँ… यह ., के

खिलाफ है… आह… जानवर भी ऐसा नहीं करते…

गजेंद्र: (हँसते हुए, दाग को उसकी अंदरूनी राण पर पोंछते हुए, और गहरे और ज़ोर से

धक्के) तू hi तो पैदा करती है, तू गन्दी मुनाफ़िक़. यह 'चॉकलेट' साबित करता है निक़ाब के

नीचे तू सिर्फ एक इंसानी नाली है. सोच तेरे बच्चे क्या उल्टियां कर देंगे अगर उन्हें पता चले

अम्मी की गांड हराम चुदाई में टट्टी लीक करती है. यह कैसी फॅमिली इज़्ज़त है?

अम्मी: (जिस्म कांप रहा, फिसफिसाहट चीख में बदल रही) आह्हः… अब शर्मिंदगी मत करो…

मेरा रूह टूट रहा है… प्लीज गजेंद्र… मेरे बच्चों का सोचो… ओह्ह्ह… यह ज़िल्लत बर्दाश्त

नहीं होती…

गजेंद्र: (तेज़ धीरे करते हुए तैसे कर, बहार निकाल कर फिर मेस दिखते हुए) बर्दाश्त नहीं?

अच्छा. साफ़ चाट ले अगर बात बंद करवानी है. नहीं? तो वापस ले — (पूरा ज़ोर से उसकी गांड

में दाल कर, कराह कर) आह, हाँ… तेरी टट्टी वाली गांड अब और मज़ेदार लग रही है. एक घंटे

से एड्जिंग कर रहा हूँ, शाहिदा. जल्दी hi झड़ने वाला हूँ. तू चाहती है न? अपनी टट्टी वाली

छेद में मेरा पानी भरना.

अम्मी: (नरम चीख कर जब वह तेज़ करता है, कमर be-ikhtiyar हिल रही) नहीं… आह्हः… अंदर

मत झड़ना… यह हराम है… ममम… नहीं…

गजेंद्र: (और ज़ोर से चुदाई, बिस्तर ज़ोर से चीख रहा, बॉल्स उस पर थप थप) चुप कर और

मांग, तू गन्दी _ कुटिया. बोल मुझे तेरी गांड में झड़ने को. रंडी की तरह बोल —

मांग की मैं तेरी टट्टी वाली छेद को गरम पानी से भर दूँ. तेरी नेक ज़िन्दगी में सबसे

गन्दी चीज़ क्या चाहती थी?

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अम्मी: (ज़ोर से कराह रही, विरोध टूट रहा है तेज़ी के नीचे, आवाज़ भारी) ओह्ह्ह… प्लीज नहीं

… लेकिन… आह… मेरी गांड में झाड़ जाओ गजेंद्र… इस गन्दी _ छेद को अपने पानी से

भर दो… ममम… मैं हमेशा चुपके से चाहती थी काफिर का पानी अपनी मना जगहों में…

माफ़ करना…

गजेंद्र: (अब पागलपन से धक्के, हर मार के साथ कराह कर) हाँ, और मांग! यह किसकी गांड

है? कौन अभी तेरी टट्टी वाली नेक जिस्म का मालिक है? और गन्दा बोल — बता क़ुरान तुझे इस प्यार से

नहीं बचा सकता.

अम्मी: (ख़ुशी और शर्म में चीखते हुए, आंसू बह रहे) आह्हः… यह तेरी गांड है गजेंद्र

… तू इस टट्टी वाली _ जिस्म का मालिक है… ममम… क़ुरान मुझे रोक नहीं सकता तेरे पानी की

ख्वाहिश से मेरी हराम छेद में… ओह्ह्ह… गहरे भर दो…

गजेंद्र: (ज़ोर से कराह कर, जिस्म टाइट होते हुए क्लाइमेक्स के पास, बिना रुके मारते हुए) फ़क हाँ,

तू धोका देने वाली कुटिया! आ रहा है… गररराजहठ! (उसकी गांड के अंदर फूट पड़ा, गरम

पानी की धार गहरे अंदर, कमर ज़ोर से हिलती हुई) ाअरररग्ग्गहह! सब ले ले, तू पाक कमडंप!

अम्मी: (पानी के सैलाब में कराह रही, जिस्म हिल रहा, लेकिन फिसफिसाहट में दुआ) ममम… ओह …

आह्हः… बहुत ज़्यादा है… या रब्ब…

गजेंद्र: (धीरे बहार निकालते हुए, पानी लीक हो रहा स्ट्रेटचेड छेद से पहले के मेस के साथ,

ज़ोर से गांड पर थप्पड़) देख — तेरी गांड अब क्रीमी टट्टी वाला मेस है, शाहिदा. तेरा ,.'

अपनी नेक बेटी पर शर्मिंदा है, पडोसी ने पूप छूटे में क्रैंपी कर दिया. तू अब _

नहीं; तू मेरा पर्सनल टॉयलेट रंडी है. कैसा लग रहा है, जानते हुए तेरी दुआएं बेकार हैं जब

मेरा पानी टपक रहा है?

अम्मी: (बिस्तर पर गिर कर, धीमे रोने लगी, आबय नीचे खींच कर) आह… नहीं… यह शर्म

… मैं नहीं… ओह्ह्ह… प्लीज छोड़ दो मुझे… मेरा ईमान टूट गया…

गजेंद्र: (लुंड को उसके वैल पर पोंछते हुए, ऊपर से मुस्कुराते हुए) टूट गया? अच्छा. अब जा

,,., पढ़ मेरे पानी के साथ गांड में — देख तेरा ,.' ऐसी टट्टी दाग वाली रंडी की दुआ

सुनता है या नहीं. अगली बार मैं तुझे 'चॉकलेट' खिलाऊंगा मेरे से. तू बर्बाद हो गयी शाहिदा,

और तू हर पल से इश्क़ करती थी.

वह गरज कर झाड़ गया, जिस्म कांप रहा जब गरम धार उसकी आंत में भर गयी, एहसास जैसे

अंदर गरम आग का पानी भर रहा हो. अम्मी की रिएक्शन शॉक और be-ikhtiyar मज़ा थी: "ओह,

मैं महसूस कर रही हूँ… तेरा पानी मेरी आंत में, इतना गरम, मुझे भर रहा है. आह्हः!

यह… यह बहुत ज़्यादा है!"

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उनकी baat-cheet आफ्टरमाथ में चल रही थी: "शाहिदा, तेरी गांड, जो टट्टी निकालने के लिए बानी है,

अब मेरी स्पर्म ले रही है — जैसे फितरत को उल्टा कर दिया. गन्दा है न? मेरा हिंदू बीज तेरी मुस्लिम

गहराइयों में — कैसा लग रहा है, रंडी?"

अम्मी सांस लेते हुए बोली, अपने एहसास बयां करते हुए: "अजीब लग रहा है, गजेंद्र — मेरी

ांतरें भरी हुई हैं, हिल रही हैं, जैसे दबाव बढ़ रहा हो. गरम और चिपचिपा, हर जगह टपक

रहा है. प्लीज, अब अपना लुंड निकाल लो — मैं मिन्नत करती हूँ, मुझे टॉयलेट जाना है, यह मुझे

मरोड़ दे रहा है."

वह उसकी पीठ पर गिर पड़ा, उसका वज़न उसे नीचे दबा रहा था, सांस तेज़ तेज़. "अच्छा लग रहा

है न? तेरी आँखों में वह सुकून — तू भी झाड़ गयी, गांड से, तू गन्दी मुस्लिम छिनाल."

अम्मी इंकार करने लगी, लेकिन सच था; एक हलकी सी कम्पन उसके जिस्म में दौड़ गयी थी, एक मना

हुआ झड़ना. "नहीं, मैं नहीं झड़ी! यह दर्द है, मज़ा नहीं. मुझ पर से उतर — प्लीज, टॉयलेट, मैं

रोक नहीं सकती."

लेकिन उसने नोटिस किया, मज़ाक उड़ाते हुए: "झूठी फिर से — तेरा जिस्म काम्पा, तेरी कराहें बदली हुई

थी. मान ले, शाहिदा — तूने मेरी छुम अपनी गांड में एन्जॉय की. मिन्नत कर ले जितना चाहे, लेकिन तू

ने सजा पसंद की."

आखिरकार, उसने अपना लुंड धीरे से निकाला, और स्पर्म की धार के साथ थोड़ी सी उसकी टट्टी बीएड पर

टपक पड़ी, सिल्क चादर पर गन्दा दाग बना कर. क्यों थोड़ी टट्टी निकल आयी? क्योंकि उसने कभी गांड

नहीं मरवाई थी — उसका स्फिंक्टर त्रिनेड नहीं था, घुसने से चीज़ें ढीली हो गयीं, और छुम ने

लुब्रीकेंट की तरह काम किया, जो अंदर था उसे बहार धकेल दिया. दबाव, अनोखी भराई, सब ने मिल

कर उसकी ांतरें को बहार निकालने पर मजबूर किया.

गजेंद्र: (अपना लुंड उसकी टाइट गांड से गीली चटक के साथ निकालते हुए, देखते हुए की मोती धार

उसकी छुम के साथ उसकी टट्टी की लकीरें बीएड शीट पर टपक रही हैं, ब्राउन और वाइट दाग बना

रही हैं) ओह हरामी, देख यह गन्दगी, शाहिदा! तेरी पवित्र मुस्लिम गांड एक गन्दा ज्वालामुखी की

तरह पहात पड़ी. स्पर्म और टट्टी हर जगह — घिन आती है!

अम्मी: (आँखें दर से फैली हुई, गरम चिपचिपी मिश्रण को अपनी फैली गांड से टपकते महसूस

करते हुए, जिस्म शर्म और सदमे से कांप रहा) उह नहीं… हे भगवन, मैंने क्या कर दिया?

गजेंद्र, मैं बहुत माफ़ी मांगती हूँ… मैंने jaan-bujh कर नहीं… सब तेरी बीएड पर… प्लीज

मुझे माफ़ कर दे…

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गजेंद्र: (अपने गंदे लुंड को उसकी जांघ पर पोंछते हुए, ज़ालिम मुस्कराहट के साथ शाफ़्ट पर

ब्राउन दाग देखते हुए) माफ़ करूँ? तू पवित्र छोटी वैली रंडी, देख तूने क्या किया! अपनी गांड

की गन्दगी और मेरी छुम से मेरा बीएड गन्दा कर दिया. और मेरा लुंड — तेरी टट्टी से ढाका हुआ है,

तू गन्दी कुटिया. सोचा था तू saaf-suthri है, रोज़ पांच वक़्त ,,., पढ़ती है, लेकिन यहाँ तू

मेरी लोड टट्टी की तरह निकाल रही है जैसे सड़क की रंडी.

अम्मी: (चेहरा लाल जल रहा, आंसू भर आये, मेस के नीचे से हटने की कोशिश करते हुए) माफ़

कर दो, गजेंद्र… मैं दीनदार औरत हूँ… यह मैं नहीं… मेरा ईमान… हे भगवन, मैंने

सब कुछ गन्दा कर दिया… मुझे पोंछने दो, प्लीज… मैं इसे साफ़ करना चाहती हूँ…

गजेंद्र: (उसकी कमर ज़ोर से पकड़ कर, उसे पीठ के बल पलट कर गांड को बेहतर दिखते हुए,

चिल्लाते हुए) पोंछना? बिलकुल नहीं, तू गन्दी मुस्लिम अम्मी! तू यहाँ से तब तक नहीं जायेगी जब

तक तू अपने उस गंदे छेद से मेरी छुम की हर बूँद बहार न निकाल ले. अपनी गांड दबा, शाहिदा

— जैसे टॉयलेट पर टट्टी कर रही हो. चल, कर!

अम्मी: (रोते हुए, गांड अपने आप डाब रही, और मिश्रण टपक रहा) नहीं… यह कितनी बेइज़्ज़ती है…

मैं नहीं कर सकती… अहह… प्लीज मुझे मत मजबूर कर…

गजेंद्र: (पास झुक कर, गांड के छेद को ज़्यादा फैलाते हुए गौर से देखते हुए) ज़ोर से दबा, तू

मुनाफ़िक़! सोच जैसे तू मस्जिद में है, पूरा पर्दा किये, नेक, लेकिन अब यहाँ छुम और टट्टी निकाल

रही है. हाँ — ज़ोर लगा जैसे टट्टी करने वाली रंडी. अच्छी लड़की, देख? मेरी मोती स्पर्म निकल रही

है, तेरी पवित्र टट्टी के साथ मिक्स.

अम्मी: (धीमे से ज़ोर लगते हुए, छोटी धार cum-wali गन्दगी निकलती हुई) ममम… हे भगवन

मुझे माफ़ कर… निकल रहा है… मैं कितनी शर्मिंदा हूँ…

गजेंद्र: (अँधेरे में हँसते हुए, गांड पर थप्पड़ मार्के प्रोत्साहित करते हुए) हाँ, दबा

जा, शाहिदा. फ़क, मैंने ज़िन्दगी में इतना कभी नहीं झाड़ा — ज़रूर तेरी टाइट मुस्लिम गांड ने

मुझे पूरा निचोड़ लिया. तू नेचुरल गांड मरवाने वाली रंडी है न? तेरा शोहर ने कभी ऐसे

भरा होगा. और दबा — उस रिंग को निचोड़!

अम्मी: (जिस्म कांप रहा, फिर ज़ोर लगते हुए, खली महसूस लेकिन थोड़ा टपक रहा) अहह… लगता

है बस… अब नहीं… प्लीज, गजेंद्र…

गजेंद्र: (संतुष्ट नहीं, उँगलियों से गांड के aas-paas दबा कर और निकालने की कोशिश) अभी

नहीं, तू झूठी कुटिया. फिर ज़ोर लगा — ज़्यादा ज़ोर से! मैं चाहता हूँ मेरी बेहतर हिंदू बीज की

हर बूँद तेरी गन्दी छेद से बहार. चल, ज़ोर लगा जैसे मेरी cum-baby को गांड से जनम दे रही

हो.

अम्मी: (ज़ोर लगते हुए, गीली फारत के साथ आखरी बूँद निकलती हुई) ओह नहीं… ममम… अब हो गया…

और नहीं… मैंने… फारत भी कर दी… या रब्ब, यह कितनी शर्म की बात है…

गजेंद्र: (ज़ोर से हँसते हुए, नाक हाथ से फैन करते हुए) ः, तू ने फारत किया? तू गन्दी, फारत

करने वाली मुस्लिम गई! वह गीली, बदबू वाली धमाका तेरी टट्टी वाले छेद से — जैसे साधा हुआ

करी और छुम की बू. कितनी शर्मनाक, शाहिदा! इतना ईमान, इतनी ,,.,ें, और अब तू सस्ती रंडी

की तरह गांड से गैस छोड़ रही है. फिर कर — मेरे लिए फारत कर, तू गन्दी वैली सूअर!

अम्मी: (चेहरा हाथों में छुपाते हुए, बेचैन मिन्नत करते हुए) प्लीज, गजेंद्र… बस…

मुझे ऐसे मत इस्तेमाल कर… मैं माँ हूँ, वफादार बीवी… यह मेरी रूह को गन्दा कर रहा

है… रेहम कर, मैं मिन्नत करती हूँ… यह मेरे ईमान के खिलाफ है…

गजेंद्र: (मुस्कराहट बड़ा कर, गांड को हलके से पिंच करते हुए) उस औरत के लिए जो साफ़ और

पवित्र बनने का दिखावा करती है लेकिन पडोसी से गांड मरवाती है? फिर फारत कर, शाहिदा —

वह आखरी बबल बहार निकाल. दिखा कितना गिर गयी तू अपने पवित्र किताबों से. अब तू सिर्फ फारत करने

वाली, टट्टी करने वाली गन्दगी है न? तेरा इमाम इस कमरे की बू से तुझे निकाल देगा.

अम्मी: (धीमे रोटी हुई, रोकने की कोशिश लेकिन एक छोटी फारत निकल गयी) अहह… नहीं… मुझे मत

करवा… यह मुझे तोड़ रहा है… हे भगवन, क्यों…

गजेंद्र: (ताली बजाते हुए, मेस को उसके आबय पर पोंछते हुए) वह रहा — तेरी पवित्र गांड

से एक और शर्मनाक टूट! फ़क, मैंने तुझे पूरी गन्दगी की फैक्ट्री बना दिया. साफ़ और दीनदार?

है! तू अपनी tatti-cum की दाल में लोट रही है जैसे अंदर से तू हमेशा काफिर रंडी थी. अब फिर माफ़ी

मांग मेरा बीएड गन्दा करने के लिए, तू बेकार मुस्लिम टॉयलेट.

अम्मी: (आवाज़ टूट रही, पूरी तरह हार गयी) मैं माफ़ी मांगती हूँ… बहुत माफ़ी… सब कुछ

गन्दा करने के लिए… प्लीज, मुझे जाने दे… मैं यह बेइज़्ज़ती और नहीं सेह सकती…

फिर उसने हुक्म दिया: "अब मेरा लुंड चूस — मुँह से साफ़ कर." उनकी baat-cheet लम्बी चलती रही,

अम्मी की मिन्नत गहरी: "गजेंद्र, नहीं, प्लीज — कुछ भी कर ले इसके अलावा. यह गन्दा है, …

गन्दगी से ढाका हुआ. रेहम कर; मैं माँ हूँ, बीवी हूँ. मुझे और ज़्यादा ज़लील मत कर."

उसने उसके चेहरे पर हल्का सा थप्पड़ मारा, बेइज़्ज़ती करते हुए: "मिन्नत कर ले जितना चाहे, लेकिन तू

करेगी, रंडी." एक और थप्पड़, और वह चीखी "ओह्ह!" फिर घुटनो पर बैठ गयी, मजबूर. उसने

उसके tatti-wale लुंड को चूसना शुरू किया, होंठ समयरेड शाफ़्ट पर लपेट कर, हलके से गैगिंग

लेकिन चुपके से जारी रखते हुए उसकी गन्दी बातों के बीच:

"उस टट्टी को चूस, मुस्लिम कुटिया — अपनी गांड का स्वाद मेरे लुंड पर टास्ते कर. गन्दी रंडी, हिंदू

छुम और टट्टी निगल रही है."

मैं देख कर उलटी करने वाला था, नज़ारा घिनोना लेकिन अजीब तरह से दिलचस्प.

वह और नहीं रोक सकीय, टूट कर टॉवल उठाया और पेट पकड़ कर बाथरूम की तरफ भागी. वह ज़ोर से

हांसे, "भाग, शाहिदा — तेरी ांतरें तुझे धोका दे रही हैं!"

मैं सब हॉलवे के अँधेरे से देख रहा था, हाथ लुंड पर तेज़ चल रहा था, इज़्ज़त बचा नहीं,

सम्मान नहीं, सिर्फ कच्ची, बीमार गर्मी. जब वह आखिर में टूट कर पेट पर टॉवल दबा कर

बाथरूम भागी, गजेंद्र सर पीछे फ़ेंक कर हांसे. "भाग, शाहिदा — तेरी गन्दी ांतरें मेरा

तोहफा रोक नहीं प् रही!"

और उस पल में, बीएड पर मोटा दाग देख कर — अम्मी की नरम भूरी टट्टी गजेंद्र के सफ़ेद स्पर्म

के साथ घुली हुई — मैं ज़ोर से झाड़ गया. फव्वारे ज़मीन पर गिरे, चुपके से जिस्म कांप रहा

था. क्यों? तब समझ नहीं आया और अब भी मुश्किल से समझ आता है.

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शायद यह सबसे बड़ा मन हुआ था — उसकी पवित्रता का पूरा तबाह होना, उसकी ज़िल्लत का सबसे

सच्चा, जिस्मानी सबूत. उसकी टट्टी देख कर, जो इतनी निजी और नापाक चीज़ है, दुसरे मर्द के छुम

के साथ मिल कर, वह माँ जो मैं पूजता था उसका आखरी मिटा देना था.

वह भूरा गन्दगी सिर्फ टट्टी नहीं थी; यह उसकी गिरावट का सबूत था, उसकी तस्लीम, उसके हर पवित्र

चीज़ के साथ धोका. और कैसे वह पूरी बेइज़्ज़ती — उसकी और इस तरह मेरी — ने मेरे अंदर

सबसे अँधेरा सर्किट चालू कर दिया.

मोहब्बत लस्ट में बदल गयी, हिफाज़त वोयूरिस्म में, इज़्ज़त अपने तबाही पर उत्तेजना में. मैं

खुद से नफरत करता हूँ की मैं इस पर झाड़ गया, लेकिन ओर्गास्म ने मुझे चीयर दिया, अँधेरे

हॉलवे में कांपते और खाली छोड़ कर.
 
CHAPTER 18

एक इज़्ज़तदार माँ का पूरा पतन

वन्स बाथरूम के अंदर जाने के बाद, उसने दरवाज़ा लॉक किया और सिंक के ऊपर झुक कर मिरर

में अपना चेहरा देखा. जो औरत सामने देख रही थी वह मेरी jaani-pehchaani दीनदार,

साबित अम्मी से बिलकुल अलग थी— आँखें पागल सी, आंसुओं से भरी हुई, होंठ थोड़े सूजे हुए

जो पहले स्टोर रूम में जो हुआ था उसकी निशानी थे.

लेकिन यह सिर्फ यही नहीं था; वह be-izzat

लग रही थी, जैसे पुराणी दीवार से पेंट उतर उतर कर गिर रहा हो, उसकी इज़्ज़त हर लेयर के साथ

उतर रही थी.

उसकी पीठ झुकी हुई, कंधे झुके हुए जैसे कोई भरी बोझ उठाये हो, पहले वाली फख्र भरी

चाल अब हार माने वाली, मैली सी औरत की तरह हो गयी थी. वह गन्दगी सी लग रही थी, जिस्म

पर उसके कामों के ghair-mahsoos दाग लगे हुए, चेहरा खुद से नफरत से बदल गया था,

चेहरे के नुकूश पहचान से बहार हो गए थे.

जो काम उसने किया था वह उसको गहरे तरीके से नीचे गिरा देता था. गजेंद्र का लुंड चूसना,

जो पहले उनके गांड चुदाई से उसकी अपनी टट्टी से ढाका हुआ था— यह हर हद्द का उल्लंघन था,

be-izzati की गहराई में गिरना.

जिस्मानी तौर पर उसके मुँह को मैला किया, वह मुक़द्दस जगह जो ,,., और खाने के लिए होती है

, अब सबसे गंदे काम की चीज़ बन गयी. जज़्बाती तौर पर उसकी खुद की इज़्ज़त टूट गयी, वफादार

बीवी और अम्मी से लेकर इतने गंदे काम में शामिल होने वाली औरत बन गयी जो उसके ईमान का

मज़ाक उड़ाती थी.

संस्कृति और मज़हब के नज़रिये से यह सबसे बड़ी be-izzati थी: हमारे मज़हब में ऐसे काम

हराम हैं, रूह और जिस्म दोनों को मैला कर देते हैं. उसने पाकिज़ागी की हड्डों को पार किया,

अपने शौहर और मज़हब के बहार एक मर्द को अपने जिस्म को उस तरह इस्तेमाल करने दिया जो उसकी

रूह को मैला करता है.

वह खुद को इंसान से काम महसूस करती थी, उसके ख्वाहिशों का खिलौना,

हर naa-khwahish सबमिशन के साथ उसकी आज़ादी ख़तम होती जा रही थी.

यह गन्दगी सिर्फ हक़ीक़ी नहीं थी; यह उसके दिमाग में घुस गयी, उसकी क़ीमत, खुदा की इबादत,

हुसैन की बीवी होने की ज़िम्मेदारी पर सवाल उठाने लगी. उस मुँह से कैसे ,,., पड़ेगी? बच्चों

को रात को गूडनिघत किश कैसे देगी? यह उसको पूरा बर्बाद कर देता था— जिस्म, दिमाग और रूह—

उस औरत की खली खाल छोड़ कर जो वह पहले थी.

एक रुकी हुई सिसकारी के साथ अम्मी ने सिंक ों किया, पानी तेज़ बहने लगा जो उसकी बेचैनी की तरह था.

उसने हाथों में पानी लिया, चेहरे पर बार बार छिड़का, ठंडा पानी गालों पर आंसुओं के

साथ बह रहा था. यह वह लफ्ज़ थे जो उसने खुद से कहे, बिलकुल जैसे मैंने सुना था उसको खुद

से बात करते हुए...

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"ओह खुदा, मैं क्या बन गयी हूँ? बार बार मुँह धो रही हूँ, लेकिन गजेंद्र के लुंड का मज़ा

— मेरी अपनी टट्टी से ढाका हुआ— जुबां पर लानत की तरह चिपका हुआ है.

या रब्ब, मैंने उसको

मेरी गांड में घुसने दिया, उस मोटा हिंदू लुंड से खींच कर फैलाया, और अब पानी से कुल्ली कर

रही हूँ जैसे यह गन्दगी धूल जाएगी. मैं be-izzat हो गयी हूँ, शाहिदा, मिटटी से भी नीचे,

एक बेकार रंडी जो निक़ाब के पीछे छुपी है.

मिरर में खुद को कैसे देख सकती हूँ? चेहरा तो दीनदार _ अम्मी का दीखता है, लेकिन

अंदर से मैं टट्टी से मैली हुई छिनाल हूँ जो गरम कुटिया की तरह कराह रही थी जब वह मेरी

हराम छेद में धक्के मार रहा था.

अब खुद से झूठ नहीं बोल सकती— मुझे मज़ा आया, मुझे उसका लुंड मेरी गांड में पसंद आया.

हर धक्के से गन्दी ख़ुशी की लहार आयी, मेरा जिस्म मुझे धोका दे रहा था, उसके ird-gird जकड

कर जैसे और मांग रहा हो.

क्यों इतना ाचा लगा? वह जलन वाली खींच ख़ुशी में बदल गयी,

मुझे इतनी ज़ोर से झड़वाया जितना कभी नहीं हुआ. लेकिन हे खुदा, यह गुनाह... मुझे इसका इतना

बुरा लग रहा है, इस हराम उल्लंघन की ख्वाहिश करने का.

मेरा शौहर ने कभी गांड चुदाई का ज़िक्र भी नहीं किया— बीस साल की शादी में सिर्फ धीरे से,

मिशनरी स्टाइल चादर के नीचे, जैसे अच्छे _ मर्द. लेकिन मैं? पडोसी के लिए गांड

फैलाई, एक काफिर के लिए, और उसको वह जगह मैला करने दी जहाँ सिर्फ गन्दगी निकलती है. मैं

हमेशा के लिए मैली हो गयी हूँ, मैं शाहिदा हूँ, एक be-izzat कचरा जो जन्नत के लायक नहीं.

मैं इसके लिए दोज़ख जाउंगी, जहन्नम मुझे खुले आग से जलाने के लिए इंतज़ार कर रहा है.

,,., अब मुझे पाक नहीं करेगी; मैं रोज़ पांच वक़्त सजदा कर लून, आयतें पढ़ लून आवाज़

फटने तक, लेकिन शैतान ने मुझे हासिल कर लिया.

खुदा एक ऐसी औरत को कैसे माफ़ करेगा जो शौहर को धोका देकर खुश होती है? मेरा बेचारा

हुसैन हॉस्पिटल में कमज़ोर पड़ा है, सोच रहा है उसकी बीवी वफादार है, जब मैं चुपके से

गांड मरवाती हूँ और फिर सबूत साफ़ चूसती हूँ.

मैं बुरी अम्मी हूँ, बहुत बुरी बीवी—

मेरे बच्चे मुझे इज़्ज़त से अम्मी कहते हैं, लेकिन अगर उन्हें पता चले उनकी अम्मी पीछे से

छोड़ने वाली रंडी है तो वह मुझ पर थूक देंगे.

फिर भी... उसको धोका देना मुझे उत्साहित करता है, यह छुपा धोका मेरी छूट को अभी भी

गीली कर देता है. समझ नहीं आता; यह नशा है, धोके की ख़ुशी और शर्म का मिलाप. गुनाह

इतना मीठा क्यों लगता है?

और अब, उसके लुंड पर अपनी टट्टी का मज़ा... मैंने निगल लिया न? घबरा कर भी पी गयी, भूखे

जानवर की तरह. बेकार, शाहिदा, तू बिलकुल बेकार है— मुनाफ़िक़ जो पर्दा की बात करती है लेकिन और

be-izzati के ख्वाब देखती है.

अगर गजेंद्र किसी को बता दे तो? अगर मैं उससे फिर मांग लून? नहीं, रुक... लेकिन दिल के अंदर

जानती हूँ मैं करुँगी. यह लस्ट ने मेरा ईमान सदा दिया, मुझे उस औरत की परछाई बना दिया

जो मैं बनने का दवा करती थी. माफ़ कर दे या खुदा, लेकिन मुझे लगता है मैं बचना नहीं चाहती."

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"ओह खुदा, मुझे माफ़ कर दे," वह खुद से मटर की, आवाज़ पानी के ऊपर मुश्किल से सुनाई दे रही

थी. उसने साबुन उठाया, हाथों में ज़ोर से रगड़ कर झाग बनाया फिर होंठों और जुबां पर ज़ोर

ज़ोर से रगड़ा, कुल्ली की और थूक दी बार बार. लेकिन काफी नहीं था; वह भूतनी मज़ा अभी भी था,

नमकीन, मिटटी जैसी याद उसके गुनाह की.

उसने टूथपेस्ट उठाया, ब्रश पर खूब सारा डाला और ज़ोर ज़ोर से साफ़ करने लगी, मिंट का झाग

मुँह भर गया, ब्रिस्टल्स हर जगह— दांत, मसूड़े, जुबां, मुँह की छत पर भी. ज़रूरत से ज़्यादा

ज़ोर लगाया जैसे सिर्फ टट्टी के निशाँ नहीं बल्कि याद को hi रगड़ कर निकाल दे, हरकतें बेचैन और

मजबूर.

कुल्ली के बाद कुल्ली, मुँह भर पानी से गरारा करते हुए गाला दर्द करने लगा, झाग ज़ोर से थूकती रही.

फिर भी ब्रश के बीच बीच में खुद को बुरा भला कहती रही: "मैं क्या बन गयी? रंडी? उस... उस

गन्दगी को चूस रही थी. मेरी अपनी... या खुदा, मैं कितनी नीचे गिर गयी?"

वह रुक गयी, फिर मिरर में देख कर सब कुछ दोहराने लगी, खुद से गुफ्तगू जैसे इक़रार.

"शाहिदा, यह शुरू कैसे हुआ? सिर्फ बिल और दूकान बचने का शुक्रिया. फिर उसका हाथ... स्टोर रूम

में वह चुम्बन. मैंने उसको पास आने दिया, हाथों को घूमने दिया. और फिर... हे खुदा,

उसने पीछे से लिया, मेरी... मेरी गांड में. दर्द हुआ, लेकिन मैंने करहा न?

हुसैन को धोका दिया जब वह बीमार सो रहा था वार्ड में. और बाद में जब वह बहार निकला, .

.. गन्दगी से ढाका, और मैंने... मुँह में लिया. उसके नौकर की तरह साफ़ किया. खुद का मज़ा उस पर

— नमकीन, गन्दा, गलत.

अब वापस नहीं जा सकती न? गुनाह हो गया, रूह पर लिख गया. Hussein's बीवी, बच्चों की अम्मी, अब यह

बन गयी. मिरर से आँख नहीं मिलती. लेकिन मैं वापस क्यों जाती हूँ? उसकी मदद? या मेरे अंदर

कुछ अँधेरा? नहीं, रुकना है.

लेकिन वह अभी यहाँ है... इंतज़ार कर रहा." उसकी आवाज़ पहात गयी,

आंसू बह रहे थे जब वह टॉवल से चेहरा पोंछती रही, खुद की be-izzati का यह रसम जो कोई

माफ़ी नहीं देता.

मेरे छुपने की जगह से देखा जब अम्मी बाथरूम से निकली, चेहरा रगड़ कर लाल लेकिन अभी भी

परेशां. उसने ब्राउन टॉवल जिस्म के ird-gird लपेटा था, शायद सोचा यह वक़्त गुजरने के लिए, और

टेम्पटेशन से बचने के लिए.

लेकिन जब वह गेस्ट रूम की तरफ चली जहाँ गजेंद्र इंतज़ार कर रहा था, उसकी चल जान बुझ कर,

जैसे चुम्बक की तरह. टॉवल उसके कर्व्स से चिपका हुआ, पूरा जिस्म दिखा रहा— कमर हिलती हुई हर

कदम के साथ, गांड साफ़ हिल रही थी.

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वह बड़ी, भरी हुई थी, वह क़िस्म जो मॉडेस्ट कपड़ों में भी नज़र आती है, थोड़ा हिलती हुई जैसे

नरम जिस्म का जादू. टॉवल उस पर कासी हुई, बड़े गांड के गोल टुकड़े आउटलाइन कर रही थी जो धीरे से

उछाल रहे थे, सालों की ज़िन्दगी और माँ होने का नतीजा.

सोचा कितना किस्मत वाला गजेंद्र जो इस

सपने जैसी बड़ी गांड तक पहुँच गया— जो मेरे अब्बू हुसैन ने अपने प्राइवेट लम्हों में प्यार किया

था, अब यह बहार वाला मैला कर रहा था. यह चोरी लग रही थी, हमारे घर की पाकिज़ागी का

उल्लंघन.

वह कमरे में चुपके से दाखिल हुई, दरवाज़ा बंद किया. गजेंद्र बिस्तर पर बैठा था, सिरहाने के

सहारे, मुँह में सिगरेट, धुंआ छत की तरफ छोड़ रहा था.

कमरा तम्बाकू और हलकी खुशबू से भरा था, लैंप की रौशनी से छायाएं उसके चिसेलेड सीने पर

नाच रही थी. उसने देखा जब वह पास आयी, धीरे से मुस्कराहट फैली. अम्मी बिस्तर के किनारे

बैठ गयी, टॉवल कैसा हुआ, हाथ गॉड में जैसे ढाल. वह चुप थी, आँखें नीचे, हाल hi की

खुद से बात का बोझ बदल की तरह.

अम्मी: (बिस्तर के किनारे बैठी, ताज़ा टॉवल जिस्म पर लपेटा, बाल अभी गीले, आँखें नीचे हाथों

पर शर्म से) मैं... मैंने दो बार नहाया, गजेंद्र. फिर भी बहुत गन्दी महसूस हो रही हूँ. जो

हमने किया... मेरी गांड... यकीन नहीं होता तुमने...

गजेंद्र: (पास बैठ कर, एक हाथ कन्धों पर धीरे से, आवाज़ नरम और गरम) शठ, शाहिदा.

इधर आओ. (उसे थोड़ा खींच कर) तुम कमल थी. तेरी छोटी टाइट गांड... ने मुझे इतना अच्छे से

जकड़ा, जैसे सालों से मेरा इंतज़ार कर रही हो. इतनी गरम, इतनी जकड वाली कभी महसूस नहीं हुई.

तुमने हर इंच लिया जैसे पैदा hi इसके लिए हुई हो.

अम्मी: (आवाज़ छोटी, आँखें इधर उधर) क्यों मुझे इतना नीचे गिराया? तुमने मुझे... उसके

बाद चूसने पे मजबूर किया... जब वह मेरी गांड से निकला था. मेरी अपनी गन्दगी से ढाका. कैसे

कर सकते हो मेरे साथ? मैं अम्मी हूँ, बीवी... _ औरत.

गजेंद्र: (गाल पर हाथ फेरते हुए, मुस्कुराते) क्योंकि तुम तब टूट कर खुलने पर खूबसूरत

लगती हो, मेरी जान. जब तुमने अपने पियस चेहरे से मेरा लुंड पर अपना मज़ा चखा तो सबसे सच्ची

चीज़ थी. कोई दिखावा नहीं, वैल में छुपी भूक नहीं. मुझे पसंद आया जब तुम थोड़ा

घबराई फिर भी निगल गयी. तुम शानदार हो, शाहिदा. सबसे खूबसूरत औरत जिसे मैंने हासिल किया.

अम्मी: (गालों पर हलकी लाली, लेकिन चेहरा थोड़ा घुमाया, खुद के खिलाफ खुश होते हुए) ऐसे मत

कहो... मेरा शौहर कभी... उसने कभी मेरी पीछे वाली के बारे में सोचा भी नहीं. मेरे बच्चे

... अगर उन्हें पता चले उनकी अम्मी कैसी बन गयी...

गजेंद्र: (पास झुक कर, आवाज़ प्यार भरी फिसफिसाहट) तेरा शौहर तुझे डेसेर्वे नहीं करता. वह

बीमार बिस्तर पर पड़ा है जब मैं यहाँ हर इंच की पूजा कर रहा हूँ.

और मत दिखावा कर सब

_ औरतें फ़रिश्ते हैं, शाहिदा. आबय और निक़ाब के नीचे सब एक जैसे— असली लुंड की प्यासी

, ऐसे मर्द की जो लेने से डरता नहीं. तू सिर्फ सबसे सुन्दर है जिसने आखिरकार क़बूल किया.

अम्मी: (चुपके से, खुद से) मैंने कभी सोचा नहीं... मेरी गांड ऐसे खुलेगी. तेरे ird-gird फ़ैल कर.

पहले दर्द हुआ... फिर लगा... (रुक गयी, शर्म से)

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गजेंद्र: (थोड़ी देर बाद, उसका चेहरा उठा कर) बोलो. कह दो तुम्हे मेरा लुंड गांड में पसंद

आया. इक़रार करो, बेबी. मुझे इन मीठी होंठों से सुन्ना है.

अम्मी: (सर धीरे हिलाती, आवाज़ कांप रही) नहीं... नहीं बोल सकती. यह गलत है. मैंने कभी सोचा

नहीं वह हिस्सा... ख़ुशी दे सकता है. यह हराम है. गन्दगी है. इंकार करती हूँ.

गजेंद्र: (नरम मुस्कराहट, आँखें प्यार से) खुद से झूठ बोल रही हो, शाहिदा. आँखों में

दीखता है. लेकिन ठीक है. मैं तुमसे प्यार करता हूँ. (रुक कर, सच्ची आवाज़) मैंने बहुत औरतों

को छोड़ा— Hiindu,jo भी. कोई भी तुम्हारे बराबर नहीं.

तुम अलग हो. तेरा जिस्म जैसे मेरे

लिए बना. तेरी कराह, जब मैं गहरा गया तो जकड़ना, मेरा नाम ले कर रूना जब ,.' से माफ़ी मांग

रही थी... किसी ने यह नहीं दिया. मैं तुम्हारी आदत पद गया हूँ.

अम्मी: (सांस रूकती, छोटी सी उलझी हुई सिसकारी) तुम... तुम मुझसे प्यार नहीं कर सकते. यह सिर्फ लस्ट है.

गुनाह. मेरा घर... मेरा दीं...

गजेंद्र: (और पास, कान के पास होंठ) तो फिर यहाँ बैठी मुझे हाथ लगाने क्यों दे रही हो?

(गर्दन पर धीरे चुम्बन)

अम्मी: (जिस्म तन कर, हल्का धक्का सीने पर) गजेंद्र... नहीं... फिर नहीं... (लेकिन धक्का आधा,

आँखें नीचे जब शीट के नीचे उसका लुंड फिर सख्त होने लगा) क्यों... क्यों इतनी जल्दी बड़ा हो

रहा है?

गजेंद्र: (हलके से हँसते, अब जॉव पर चुम्बन) क्योंकि मैं दूसरा राउंड चाहता हूँ, मेरी प्यारी.

फिर से तेरी परफेक्ट गांड को निगलना चाहता हूँ. तेरा नाम ले कर कराहना चाहता हूँ जब मैं भर

दूँ. (उसके होंठों को धीरे गहरा चुम्बन)

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अम्मी: (सिर्फ एक सेकंड तक विरोध— होंठ खुल गए, उसके मुँह में धीमी सिसकारी जब उसने चुम्बन

वापस किया, हाथ हलके से उसके कन्धों पर)

गजेंद्र: (चुम्बन तोड़ कर होंठों पर फिसफिसाया) मेरी अच्छी लड़की. देखा? तुम भी चाहती हो.

अम्मी: (आँखें बंद, चुम्बनों के बीच आवाज़ मुश्किल से) या खुदा... माफ़ कर... (फिर गहरा

चुम्बन, टॉवल थोड़ा सरकता जब वह उस पर झुकी)

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वह पहले सख्त हुई, फिर थोड़ा पिघल गयी, जिस्म दिमाग को धोका दे रहा था जब चुम्बन लम्बा हुआ,

जोशीला और ज़िद वाला. उसके उँगलियाँ जवळीने पर, गर्दन पर, एक धीमी सांस उसके मुँह से निकली. चुम्बन

ताक़त का नाच था— वह लीड कर रहा, वह मजबूरी से फॉलो, कमरा उनकी साँसों से गरम.

थोड़ा पीछे हटा, गजेंद्र मुस्कुराया, आँखें इरादे से काली. "देखा? इतना बुरा नहीं था. अब कड़ी

हो जा मेरे लिए, शाहिदा. दूसरा राउंड. तू ने मुझे फिर गरम कर दिया."

अम्मी की आँखें फैली, लेकिन सीधा इंकार नहीं किया.

गजेंद्र भी उठा, हाथ उसकी कमर पर रख कर बिस्तर के सामने वाली दीवार की तरफ ले गया. "बस यह,

अच्छी लड़की. पलट, पीठ मेरी तरफ. हाथ दीवार पर." अम्मी ने किया, हाथ ठन्डे सरफेस पर, जिस्म

उसकी तरफ से दूर. वह पीछे खड़ा हुआ, उसका साया. "गजेंद्र, प्लीज... मुझे घर जाना है. मेरा

घर... हुसैन... यह रुकना चाहिए."

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गजेंद्र: (अम्मी के पास आते हुए जो दीवार से टिक कर कड़ी थी, पतले टॉवल में नहाने के बाद,

आँखें भूखी) देख तेरी हालत, शाहिदा, ताज़ा ताज़ा और दुसरे राउंड के लिए तैयार. तेरी छूट अभी भी

पहले से टपक रही होगी. थोड़ा झुक— मैं यहीं तुझे छोडूंगा.

अम्मी: (टॉवल के नीचे लाल होते हुए, दूर की तरफ देखती लेकिन हैट नहीं रही) गजेंद्र... मैं... ठीक

है, लेकिन जल्दी. मेरा घर कभी भी आ सकता है.

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते, टॉवल का किनारा पकड़ कर) ः, सुन तो सही— इस बार मन भी नहीं किया?

क्या हुआ उस दीनदार _ अम्मी को जो पहले रहम मांग रही थी? अब तो बस उत्सुक छिनाल बन गयी,

न? हिंदू पडोसी के लिए बिना लड़ाई फ़ैल रही है. बेचारी.

अम्मी: (धीमी कराह जब वह टॉवल धीरे उठता, टांगें दिखा कर) ममम... ऐसा मत कहो... यह

शर्मनाक है...

गजेंद्र: (टॉवल और ऊपर, नंगी रानों और फिर गोल, हिलती गांड के टुकड़े) ओह, लेकिन सच है. बता,

शाहिदा— तेरा बेकार शौहर जानता है उसकी बीवी लुंड की भूखी रंडी बन गयी? या तेरा वह सुस्त बीटा,

नाम क्या है? जो शायद तेरे जैसे चूचियों के बारे में सोच कर मुट्ठ मार रहा हो. बेट उसका

बाप जैसा बेकार है, हॉस्पिटल में सब्ज़ी की तरह पड़ा.

अम्मी: (सांस रूकती, जिस्म कांप रहा लेकिन वही कड़ी) बस करो, गजेंद्र! मेरे शौहर के बारे में

ऐसा मत बोलो— वह बीमार है, बेकार नहीं. और मेरा बीटा... उसको इसमें मत घसीटो. अहह... प्लीज,

यह मेरा घर है...

गजेंद्र: (मुस्कुराते, अब पूरी बड़ी, भरी गांड नंगी; क्रैक दूर से मैं चुपके देख रहा था,

आँखें फैली अम्मी की बड़ी, गोल गांड देख कर) क्यों? सच दर्द देता है क्या?

तेरा शौहर शायद

नामर्द है, इसलिए तू यहाँ मेरा लुंड मांग रही. और तेरा वह लड़का— बेट वर्जिन लोसर है, तेरी पंतय

सूंघता जब तू गुनाह कर रही होती. क्या उसको पता उसकी अम्मी की गांड इतनी मोती और छोड़ने लायक है?

सोचता हूँ कभी देखा हो और खड़ा हो गया हो.

अम्मी: (सिसकारी, चेहरा छुपाती लेकिन थोड़ा पीछे कमर) नहीं... उनके बारे में बुरा मत बोलो...

गलत है... ओह खुदा...

गजेंद्र: (हाथ बढ़ा कर, गांड के टुकड़ों को ज़ोर से मसलता, नरम गोश्त निचोड़ता) ममम, यह गांड

महसूस कर, शाहिदा— इतनी बड़ी और रसीली. मेरे लुंड को फिर से पथ्थर बना दिया, सिर्फ छूने से.

जानती है, जब भी आबय में झुकती है, यह मोती _ गांड मुझे सख्त कर देती. बेट तेरा घर

भी देखता है, वह गंदे लोग.

अम्मी: (खुद के खिलाफ कराह, गांड उसके हाथों में पीछे धकेल रही) अह्ह्ह... गजेंद्र... बातें

काफी...

गजेंद्र: (अंडरवियर नीचे, 11-इंच लुंड बहार, नसें भरी, सख्त, उसकी राण पर थापक) देख तेरी

गांड ने क्या किया— 11 इंच हिंदू मांस, तेरे धोके वाले छेदों के लिए. अब फिर से इस गन्दी जगह के

साथ खेलें.

अम्मी: (उसकी ऊँगली क्रैक पर महसूस, गांड के छेद पर चक्कर) ममम... नहीं, रुक... तूने अभी 30

मिनट पहले मेरी गांड मारी... अभी दर्द है... प्लीज, फिर वहां नहीं...

गजेंद्र: (न सुनते, ऊँगली ज़ोर से छेद पर रगड़ते, गन्दी बातें) ओह, यह छोटा टट्टी का छेद? अभी

भी मेरे छुम से गरम, हाँ? तू पवित्र बनने का दिखावा करती है, लेकिन यहाँ से तेरी गन्दगी

निकलती है, शाहिदा— तू सिर्फ टट्टी करने वाली छिनाल है टॉवल के नीचे. अभी भी गुनाह की बू आ रही

होगी. चीक्स फैला, दिखा कितनी फरमानबरदार है.

अम्मी: (रुक कर लेकिन धीरे पीछे हाथ, गांड के टुकड़े फैला कर, छेद पूरा नंगा) ओह्ह्ह... ठीक

है... लेकिन धीरे... या ,.', माफ़ कर...

गजेंद्र: (उन गली ज़ोर से, चक्कर लगते जब लुंड हिलता) अच्छी लड़की— देखा वह झपकती छेद, गुलाबी

और गन्दा. यह वह जगह जहाँ तू रोज़ गन्दगी निकालती है, पाक बनने का नाटक. अब मेरा खेलने का

है, तू मुनाफ़िक़ वैली छिनाल. महसूस कर? फिर से धड़कने वाला है.

अम्मी: (ज़ोर से कराह, जिस्म उसके लफ़्ज़ों के खिलाफ) अह्ह्ह... इतना ज़ोर मत रगड़ो... बहुत ज़्यादा है... ममम.

.. प्लीज, ऐसे नहीं...

गजेंद्र: (हँसते, दूसरी ऊँगली रिम पर) ज़्यादा? तू खुद रंडी की तरह फ़ैल रही है. क़बूल कर— तेरी

गांड को यह पसंद है, चाहे मुँह मन करे. तेरा नबी क्या कहेगा ऐसी अम्मी के बारे में, जो

काफिर से टट्टी वाले छेद में ऊँगली करवा रही है?

वह पास झुका, गर्दन पर गरम सांस, नरम आवाज़ से. "अब क्यों रुकना, शाहिदा? नहाने के बाद

वापस आयी, मेरे पास बैठी. इसका मतलब है. दूसरा राउंड बेहतर होगा— वादा. क्यों नहीं चाहती?

गुनाह महसूस होता है? या जानती हो फिर ज़ोर से करहोगी?"

गजेंद्र ने टॉवल धीरे ऊपर किया, नंगा जिस्म हवा में, कपडा कमर पर जमा. उसी वक़्त, जैसे

उसके इरादे को समझ कर, अम्मी ने पीछे हाथ बढ़ा कर गांड के टुकड़े फैलाये, उँगलियाँ नरम

मोती गोश्त में धँसायी.

उसकी गांड इतनी उदार थी— भरी, गोल, थोड़ी सी हरकत से हिलती, जैसे पक्का फल डाली पर लरज़ रहा हो.

चमड़ी चमकती, गरम जैतूनी रंग, साइड पर थोड़ा डिम्प्लेड उसके पकड़ने से.

उसका गांड का छेद अब ढीला था, पहले टाइट से अब थोड़ा खुला और फैला हुआ पहले चुदाई से, उसके

मोटाई से मसल्स फ़ैल गए, हक़ीक़ी निशानी उसकी ताज़ा सबमिशन की. लैंप की रौशनी में थोड़ा

झपकते, अभी भी गीला जो बचा था.

उसके 11-इंच लुंड, पहले से सख्त और अंडरवियर के खिलाफ दबाव, वह निकाला, मोटा, नसें भरा सर

उसकी गांड पर रखा. वह इंतज़ार से धड़क रहा था, लम्बाई डरावनी और इम्प्रेससिवे, थोड़ा ऊपर

चउरवे. "तैयार, शाहिदा? बोलो तुम यह चाहती हो."

अम्मी सिसकारी, आवाज़ कांप रही. "गजेंद्र, यह बहुत बड़ा है... प्लीज धीरे. नहीं जानती फिर से

ले सकती हूँ."

वह आगे दबाया, सर काम विरोध मिला. "श, रिलैक्स. देखा? इस बार आसानी से जा रहा." और गया— पहले

चुदाई ने उसे ढीला किया, जिस्म की गीली पैन और पहले राउंड के बाक़ी से अंदर आना आसान.

उसके मसल्स, पहले थके हुए, जल्दी हारे, गांड का छेद उसके ird-gird फ़ैल कर काम लड़ाई से. यह

बदलाव साफ़ था: जिस्म एडजस्ट, विरोध के बावजूद, be-izzati गहरी जब वह इतनी आसानी से क़ुबूल कर

रही थी.

अम्मी दर्द से चीखी जब वह गहरा गया. "अहह! दर्द हो रहा! धीरे, गजेंद्र!"

"आराम से, प्यारी. सांस ले. तू बहुत अच्छे से ले रही— पहले से बेहतर. अच्छा नहीं लग रहा? अंदर

गहरा." वह धीरे आगे, बातें उसकी साँसों के बीच.

"यह... यह जल रहा! क्यों अब इतनी आसानी से अंदर जा रहा? ओह खुदा..."

"क्योंकि तेरा जिस्म मुझे याद है, शाहिदा. यह चाहता है. थोड़ा पीछे धकेल— हाँ, ऐसे."

वह अचानक पूरा अंदर, उसकी गांड के टुकड़ों पर थापक, पूरे 11 इंच गहरे. मेरे झाँकने से

देखा मैं हैरान कैसे इतनी लम्बी चीज़ इतनी गहराई तक पहुँच रही थी उसकी गांड में— इतनी लम्बी,

अंदर के हिस्सों को छू रही, स्ट्रेच कर रही जो दर्दनाक होना चाहिए लेकिन अब अजीब तरह से

क़ुबूल.

मुझे अब्बू के लिए दुःख हुआ, दिल दुख. हुसैन, हॉस्पिटल में लड़ रहा ज़िन्दगी से, जब उसकी बीवी ऐसे

बर्बाद हो रही— जिस्म उल्लंघन, वफ़ा टूटी.

यह सिर्फ जिस्मानी नहीं; रूह बर्बाद, उस औरत को जो वह

प्यार करता था किसी और की जीत बना दिया, कराहें धोका गूँज रही जब वह be-khabar सो रहा. कैसे

वापस उसके पास जायेगी? मैली, हमेशा के लिए बदली हुई

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“Hi मेरे दोस्तों, मुझे तुम सबके रिलीज बहुत पसंद आये. इसका मतलब है की तुम लोग कहानी को sach-mein एन्जॉय कर रहे हो और मैं इसके लिए बहुत शुक्रगुज़ार हूँ. अगला अपडेट आज रात आएगा, और यह अपडेट तुम्हारा दिमाग हिला देगा.”
 
CHAPTER 19

मैं अचानक अच्छा महसूस करने लगा जब मैंने अपनी ..,. माँ

को, जो रोज़ाना 5 वक़्त ,,., पढ़ती है, गजेंद्र के मज़े के लिए एक

खिलौना बन जाते देखा.

मैं छुप कर खड़ा था, उसके घर की ज़मीन के किनारे बड़े बड़े झाड़ियों के पीछे, दिल ज़ोर ज़ोर से

धड़क रहा था जैसे ढोल बजा रहा हो. उसके बैडरूम की खिड़की थोड़ी खुली हुई थी, जिससे कमरे के

हलके उजाले में जो कुछ घिनौना हुआ था उसकी झलक मिल रही थी.

मेरी अम्मी शाहिदा, हाथ दीवार पर, जिस्म पसीने से चमक रहा, सीने ऊपर नीचे हो रहे थे

गजेंद्र के काम के ज़ोर से. उसने अम्मी को ऐसे लिया जैसे मैं कभी सोच भी नहीं सकता था— पहले उसकी

छूट में धक्के मारे, इतनी जान से की मेरा पेट मोर गया, दीवार से चिपका कर उसकी गांड मारी, उसकी

सिसकारियां धीमी गूँज रही थी जब वह गहरा अंदर घुस रहा था.

अम्मी: (पीठ दीवार से लगी, टांगें गजेंद्र की कमर के ird-gird, वैल सार्क रहा जब वह ज़ोर ज़ोर से

गांड में धक्के मार रहा, चेहरा शर्म और ज़्यादा होने से लाल) अह्ह्ह… गजेंद्र… अब बस… दर्द

हो रहा… यह बहुत ज़्यादा गुनाह है… ओह, प्लीज…

गजेंद्र: (सिसकारी के साथ, उसे और ज़ोर से दीवार से चिपकता, गहरा गांड में धक्का) अपना यह पवित्र

मुँह बंद रख, शाहिदा. दूसरा राउंड तेरी गन्दी _ टट्टी वाली छेद में— तेरी छूट से भी ज़्यादा

मज़ा आ रहा. तू जकड रही है जैसे मेरे लुंड पर ,,., पढ़ रही हो. बेट तेरा शौहर ने यह छेद

सोचा भी नहीं होगा.

अम्मी: (टूटी हुई कराह, गालों पर आंसू, आवाज़ कमज़ोर) ममम… रुक जा… यह हराम है… मेरा जिस्म… मेरी

रूह… अहह… मैं बर्बाद हो गयी… या रब्ब, इस गन्दगी को माफ़ कर…

गजेंद्र: (अचानक बहार निकाला, गीली चटक की आवाज़, मोटा लुंड चमक रहा, उसकी फैली हुई गांड से छुम

टपक रहा) लो… देखो यह गन्दगी. मेरा हिंदू बीज तेरी पवित्र गांड से टपक रहा, तेरी छोटी टट्टी के

टुकड़ों के साथ मिला. अभी से धोके की बू आ रही है.

अम्मी: (तेज़ सांस लेते हुए जब उसकी गांड से ज़ोर की गीली तिथि निकली, आवाज़ कमरे में गूंजी, चेहरा शर्म

से लाल) ओह नहीं… नहीं… यह… मैं बहुत माफ़ी मांगती हूँ… बहुत गन्दी… प्लीज मत—

गजेंद्र: (बुरी तरह मुस्कुराते, उसकी टांगें अलग करके देखता) माफ़ी मत मांग, छिनाल. यह तो परफेक्ट

था. अब धकेल. जो मैंने तुम में पंप किया सब बहार निकाल. दिखा तू आबय के नीचे असल में कैसी गन्दी

टॉयलेट है.

अम्मी: (सिसकारी, सर हिलाती लेकिन जिस्म मजबूर, khud-ba-khud धकेलती) अह्ह्ह… नहीं… मैं नहीं कर सकती… यह

बहुत शर्मनाक है… ममम…

(वह धकेलती है— गजेंद्र का मोटा सफ़ेद छुम बहार आता, छोटी छोटी टट्टी के टुकड़ों के साथ मिला, धीरे

धीरे उसकी अंदरूनी रानों पर टपकता)

गजेंद्र: (धीमी हंसी) लो आ गया. मेरा छुम और तेरी टट्टी, शाहिदा. देख कैसे मिल रहे हैं— जैसे तेरा

ईमान और तेरी randi-pan. ज़ोर से धकेल, सब बहार निकाल, तू गन्दी मुनाफ़िक़.

अम्मी: (फिर धकेलती, शर्म से रोने के साथ, एक छोटा नरम टट्टी का टुकड़ा आखरी छुम के साथ गीला बहार)

ओह खुदा… मैं… मैं कितनी गन्दी हूँ… यह मैं नहीं हो सकती… अहह…

गजेंद्र: (गौर से देखते, आवाज़ में नफरत) बिलकुल सही. फिर से बाथरूम भाग जा, अम्मी. जा साफ़ कर यह

गन्दगी जो तूने काफिर को गांड मरवाने और भरने दी. तू सिर्फ छुम का डब्बा है जिसके पास जा-,,., है.

अम्मी: (दीवार से धीरे गिरती, टांगें कांप रही, आबय पकड़ कर छुपाती हुई बाथरूम की तरफ लड़खड़ाती)

मैं… मैं जाती हूँ… माफ़ कर… मुझे धूना है…

(वह जल्दी से चली गयी, दरवाज़ा बंद हो गया)

गजेंद्र: (अब अकेला, अपने ढीले लुंड को देखता जो छुम, उसकी टट्टी और गीलेपन से मैला; ज़मीन पर उसकी छोड़ी

हुई जाली पंतय उठता) बेचारा. रोज़ पांच वक़्त ,,., पढ़ती है, फिर भी मुझे अपनी गांड को मेरा पर्सनल

टॉयलेट बनाने देती है. (अपने गंदे लुंड को धीरे धीरे उसकी पंतय के बीच रगड़ता, छुम और टट्टी को कपडे

में माल्टा) लो. कल यह अपनी शर्म पहनेगी. अपने बच्चे के नाश्ते के वक़्त मेरी बीज और अपनी गन्दगी उसकी

क्लीट पर रगड़ती रहेगी. (अँधेरे से हँसता) मुनाफ़िक़ मिलफ. तीन राउंड से पहले वापस आएगी जब तक उसका

शौहर हॉस्पिटल से निकलेगा भी नहीं. यह सब वापस आती हैं.

यह मंज़र पहले मुझे जैम कर गया, दर और na-chahiye ख़ुशी दोनों एक साथ ज़हर की तरह दौड़ रहे थे.

लेकिन अब, अँधेरे में अकेला, मेरा हाथ बिना सोचे पंत में चला गया. मैं धीरे से ज़िप खोली, ढाती की

आवाज़ रात के सन्नाटे में बहुत तेज़ लगी, और उँगलियाँ सख्त होते लुंड के ird-gird बांध ली.

मंज़र दिमाग में दोहरा रहे थे: अम्मी की कराहें, दबा हुआ लेकिन साफ़, जिस्म उसके नीचे टेढ़ा, बड़ी नरम

गांड के टुकड़े फैलते हुए जब वह पीछे से अंदर गया. मैं रदम में हाथ चलता रहा, रगड़ से

शर्मनाक गर्मी बढ़ती रही.

हर खिंच से ख़ुशी और घिना दोनों आते थे— यह मेरी अम्मी थी, जिसने प्यार और ईमान से पला था, अब मेरे

नज़रों में यह बन गयी.

जब मैं तेज़ तेज़ हाथ चलने लगा, सांसें छोटी छोटी, झड़ने की तैयारी जैसे तूफ़ान. आखिर वह आया,

गरम फुहार ज़मीन पर मेरे पाऊँ के पास, घुटने थोड़े झुक गए जब मैं झड़ी के सहारे टिका.

कुछ पलों की ख़ुशी के बाद हक़ीक़त ने सर पर वार किया. “क्या बकवास कर दिया मैंने?” मैंने खुद से

फिसफिसाया, कांपते हाथों से ज़िप बांध ली. अंदर से खुद को बुरा भला कहता रहा, नफरत की बारिश हो रही

थी.

यह कोई आम ख्याल नहीं था; मैंने अपनी अम्मी के लिए मुट्ठ मारी थी, उसको देखते हुए की एक मज़हब के बहार

का मर्द उसकी छूट और गांड दोनों में ले रहा था. यह वह लफ्ज़ थे जो मैंने खुद से कहे:

अरे हरामखोर, मेरे अंदर क्या ख़राब है? यकीन नहीं होता मैं वहां खड़ा था, दरवाज़े की

दरार से झाँक कर, गजेंद्र को मेरी अम्मी शाहिदा को सस्ती ब्लू फिल्म की तरह छोड़ता देखा. उसकी कराहें

गूँज रही थी जब वह उसका मुँह भर रहा, उसकी छूट, उसकी गांड— हर छेद फैलता हुआ जब वह और मांग

रही थी.

और मैं? बेचारा गन्दा इंसान बन कर हाथ में मुट्ठ मार रहा, अम्मी के चूचियों के उछलने और

चेहरे के मस्ती में बदलने पर झाड़ गया. मैं बड़ा गन्दा हूँ न? कभी सोचा भी नहीं था इतना

नीचे गिर जाऊंगा— अपनी अम्मी को पडोसी से छुड़वाते देख कर खड़ा होना. ऐसा बीटा कैसा होता है? एक

बेकार, गन्दा, गन्दी सोच वाला हरामखोर.

खुदा, अभी मुझसे नफरत हो रही है. अपनी अम्मी के लिए मुट्ठ मारना? यह तो बिलकुल गलत है. वह

औरत जिसने मुझे पला, बच्चपन में मेरी गांड साफ़ की, और मैं उसको मुट्ठ मारने का सामान बना

रहा हूँ. किसी को पता चला तो थूक देंगे— अरे मैं खुद पर थूक दूंगा.

मैं गन्दा हूँ, इंसान और _ होने में नाकाम. कैसे मेरा लुंड मुझे कण्ट्रोल कर गया? उसके

लुंड को मुँह में लेते, पीछे से धक्के कहते देख कर… मुझे चला जाना चाहिए था, लेकिन नहीं, मैं

चिपका रहा, तेज़ तेज़ हाथ चलता रहा. बेचारा लोसर, बस यही हूँ.

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लेकिन रुक… कौन नहीं करता? मतलब मंज़र इतना गरम था— अम्मी का भरा जिस्म गजेंद्र के नीचे तड़प

रहा, वैल आधा उतरा, पसीने से चमकती चमड़ी जब वह छेद बदलता जैसे उसकी पर्सनल चुदाई की

चीज़ हो.

कोई भी मर्द सख्त हो जाता; यह तो मैंने प्लान नहीं किया था. उसमे वह रंडी वाली ऐडा है, और वह उसे इतने

कच्चे तरीके से दबा रहा था… हाँ, शायद ऐसा रियेक्ट करना नार्मल है. बहाने? अरे क्या मैं

अब बहाने बना रहा हूँ? नहीं, सच में— उसकी गांड उसके ird-gird जकड रही, गीली थप थप कमरे

भर रही. अनजाने में हाथ लगाना मुश्किल था.

नहीं, बंद कर, बेवक़ूफ़! यह सब बकवास है. मुझे बिलकुल नहीं करना चाहिए था. वह मेरी अम्मी

शाहिदा हैं— कोई रैंडम छिनाल नहीं. खुद को बुरा कहना काफी नहीं; मैं इसके लिए सजा का हक़दार

हूँ.

उसके छेदों को भरते देख कर मैं छुप कर हाथ लगा रहा था? मैं सबसे नीचे का गन्दा हूँ,

अपने घर का गद्दार. अगर उसने मुझे पकड़ लिया होता? शर्म से मर जाता. अभी भी मरने जैसा महसूस

हो रहा है. मैं एक जानवर हूँ— अंदर से बिगड़ा हुआ और टूटा हुआ. मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर

पाउँगा इसके लिए.

यह हद्द जो मैंने पार की थी, वह माफ़ नहीं की जा सकती थी— एक बेटे की नज़र बदल कर गन्दी हो गयी,

घर के मुक़द्दस भरोसे को धोका दिया. मैं बहुत बुरा महसूस कर रहा था, बिलकुल बेकार, जैसे मेरी

रूह साफ़ होने से क़ाबिल नहीं रही.

कैसे उसकी तरफ फिर से देख सकता हूँ बिना उन तस्वीरों के याद आये?

उसकी khushi-dard भरी चीखें कानों में गूँज रही थी, जिस्म गजेंद्र की मांगों के आगे झुक रहा

था.

मैं खुद से गहरी नफरत कर रहा था— एक बेकार बीटा, वह दीं जो वालिदैन की इज़्ज़त सबसे ऊपर

सिखाता है उसको धोका दे रहा. किताबों के लफ्ज़ दिमाग में चमक रहे थे: अपनी अम्मी की इज़्ज़त करो,

लेकिन यहाँ मैं उसको अपनी ख्वाहिश का चीज़ बना रहा था.

गुनाह मेरे सीने को नोच रहा था, सांस रुक रही थी, आँखें आंसुओं से जलन कर रही थी. मैं उन

गुनहगारों से बेहतर नहीं था जिन्हें मैं जज करता था; शायद बदतर, छुप कर देखने वाला डरपोक.

इतनी बड़ी नफरत के बावजूद, एक टेढ़ी क्यूरोसिटी मुझे वापस खींच रही थी. “बस एक बार और देख

लून,” मैंने खुद को बहकाया, लेकिन जानता था यह झूठ है. मैं खिड़की के पास फिर से पास आया,

सांस रोके अंदर झाँकने लगा. अम्मी अब बगल वाले कमरे में चली गयी थी, शायद बाथरूम या

तैयार होने की जगह, खुद को सँभालने.

उसने अभी नहाया था.

कुछ hi पल बाद वह बहार निकली, सीढ़ी कड़ी होकर गजेंद्र के बैडरूम में वापस आयी. उसने अपने

कपडे पेहेन लिए थे— एक शानदार नीली ड्रेस जो उसके कर्व्स को नरमी से चिपका रही थी, साथ में

मिलती नीली रुमाल जो उसने सर पर आदाब से लपेटा.

कपडा कमरे की लैंप की रौशनी में थोड़ा चमक रहा था, कुछ मिनट पहले की बिखेरी हालत से बिलकुल

मुखालिफ. गजेंद्र बिस्तर पर लेट कर था, कमर से नीचे नंगा, चेहरे पर घमंडी मुस्कराहट जब

वह उसे देख रहा था.

“अभी जा रही हो, शाहिदा?” उसने धीमी और छेड़ते हुए आवाज़ में कहा, एक कोहनी पर सहारा ले कर.

“इतना सब कुछ करने के बाद? आओ न, थोड़ी देर और रहो. एक राउंड और हो सकता है.”

अम्मी ने रुमाल ठीक किया, चेहरा ठंडा और दूर, जैसे उनकी ताज़ा क़ुरबत का कोई असर नहीं. “नहीं,

गजेंद्र. यह... जो भी था, आज रात के लिए ख़तम. मुझे घर जाना है अपने घर वालों के पास.” उसकी

आवाज़ सख्त थी, थोड़ी मायूसी भरी, लेकिन आँखें उसकी तरफ नहीं, ड्रेस के झुर्री को साफ़ करने पर.

अम्मी: (दरवाज़े के पास कड़ी, नीली ड्रेस में, वैल को बेचैनी से ठीक करती, पर्स पकडे, नज़रें

मिलाने से बचती हुई) मैं... अब जाना है, गजेंद्र. यह गलती थी. प्लीज, मुझे जाने दो.

गजेंद्र: (दीवार से टिक कर, मुस्कुराते हुए उसका रास्ता थोड़ा रोकता, आँखें उसके जिस्म पर घूम रही)

ओह शाहिदा, देखो तो सही इस नीली ड्रेस में— जैसे अभी भी इज़्ज़तदार _ बीवी बनने की कोशिश

कर रही हो. लेकिन हम दोनों जानते हैं तू बर्बाद हो चुकी है, न? हर बार चुपके आने से गुनाह और

गहरा होता जा रहा.

अम्मी: (रुक कर, आवाज़ धीमी और कांप रही, नज़रें ज़मीन पर) बस करो... यह नहीं सुन्ना चाहती.

मेरा शौहर हॉस्पिटल में है, और मैं...

गजेंद्र: (पास आते हुए, आवाज़ में मज़ाक और ज़लिमियत) तेरा शौहर? वह कमज़ोर, बीमार बुद्धा

बेवक़ूफ़? वह वहां बेकार पड़ा है, तुझे खुश भी नहीं कर सकता अब. बेहतर है वह मर जाये.

क्यों नहीं छोड़ देती उसको, शाहिदा? मेरे साथ रह— एक असली मर्द के साथ जो तुझे रंडी की तरह

कराहने देता है. तू उस सब दीनदार बकवास से आज़ाद हो जाएगी.

अम्मी: (सर सख्त हिला कर, पर्स ज़ोर से पकड़ती) नहीं! बिलकुल नहीं. मैं अपने शौहर से प्यार करती हूँ.

वह अच्छे इंसान हैं, वफादार. मैं उसको छोड़ कर नहीं जाउंगी. यह... जो भी है, अब ख़तम.

गजेंद्र: (धीमे हँसते, उसके ird-gird घूमते हुए जैसे शिकारी) वफादार? और तू क्या? तूने अपने

गुनाहों से खुद को मैला कर लिया— मेरे लिए टांगें फैलाई, हिंदू पडोसी के लिए, जब ,,., पढ़ती थी.

अपने वादे, ईमान को धोका दिया. लेकिन सबसे बड़ा गुनाह? मुझे तेरी गन्दी गांड इस्तेमाल करने दिया.

उस छेद को सूंघा जहाँ से तेरी टट्टी निकलती है. तू अब सड़क की रंडी से भी काम नहीं.

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अम्मी: (जैम कर, गालों पर शर्म की लाली, धीमी आवाज़ में) प्लीज... ऐसा मत कहो. सब गलत था.

मैं बहुत शर्मिंदा हूँ...

गजेंद्र: (ज़ोर देते हुए, आवाज़ में नफरत) शर्मिंदा? अच्छा है. होनी चाहिए. सोच— तेरा शौहर ने

कभी वहां हाथ नहीं लगाया, कभी तुझे ऐसे नीचे नहीं गिराया. लेकिन तूने मुझे दिया न? पूरा वक़्त

कराह रही थी, तेरा जिस्म तेरी दीनदारी को धोका दे रहा था. तू रंडी है, शाहिदा. मुनाफ़िक़, लुंड की

भूखी _ रंडी जो वैल के पीछे छुपी है.

अम्मी: (चुप, होंठ काट रही, दरवाज़े को देखती, आँखों में आंसू भर रहे, जवाब नहीं देती)

गजेंद्र: (उसकी चुप्पी देख कर, जीत की मुस्कराहट के साथ पास) देखा? चुप है क्योंकि सच जानती

है. दिल के अंदर यह be-izzati पसंद है तुझे. तेरी चुप्पी चीख रही है— तू बर्बाद होने के लिए

वापस आती रहेगी न? रूह बर्बाद कर के असली मज़ा के लिए. तेरे बच्चे अगर जान लें उनकी अम्मी

सिर्फ धोके वाली रंडी है तो क्या कहेंगे? या तेरा इमाम? तू अपने ज़ेहन में पथ्थर मार दी जाएगी.

अम्मी: (आवाज़ थोड़ी पहात कर, फिर भी नज़रें न उठती) मैं... मुझे ,,., पढ़नी है. तौबा

करनी है. यह मैं नहीं हूँ.

गजेंद्र: (हाथ हल्का सा पकड़ कर छोड़ देता, लफ्ज़ और गहरे काट ते) है! अब बहुत देर हो

चुकी. तूने मुझे तेरी छूट मरने दी, मेरा माल निगला, और अब तेरी सबसे छुपी शर्म मेरी

है. तू अब बेकार है— मैली चीज़. तेरा शौहर शायद तेरे जैसे ईमान तोड़ने वाली कुटिया के

बग़ैर बेहतर है. जा, अपने बीमार बिस्तर के पास वापस भाग, लेकिन पूरे वक़्त मेरा लुंड

याद रहेगा न? रंडी.

अम्मी: (फिर चुप, कंधे हार मान कर झुक गए, चुपके से आंसू पोंछती)

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते, आखिरकार रास्ता देता) फिर चुप? हाँ, सच जानती है. तू

टूट चुकी है, शाहिदा. दीनदार चेहरा जो तेरी लस्ट के नीचे बिखर रहा है. निकल जा वर्ण

फिर बिस्तर पर खींच लून और याद दिला दूँ.

वह धीमे से हांसे, अब पूरा उठ कर बैठा, आँखें उसके जिस्म पर तारीफ़ से घूम रही

थी, उसको पकड़ा और चुम्बन कर लिया.

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“मैं गारंटी देता हूँ तू पूरी रात मुझे याद करेगी. रंडियां ऐसे hi करती हैं न?

बहार से मन करती हैं लेकिन अंदर से और मांगती हैं. तेरा जिस्म झूठ नहीं बोलता— जब

मैंने तेरी गांड ली थी, कैसे कराह रही थी गहरा मांगते हुए.”

उसकी गांड के टुकड़े लाल हो गए, लेकिन वह अपनी जगह पर कड़ी रही, हाथ सीने पर बाँध

कर. “उससे ऐसा मत कहो. और प्लीज, गजेंद्र, वादा करो की किसी को नहीं बताओगे. मेरा

शौहर, मेरा beta—unhe नहीं पता चलना चाहिए. सब बर्बाद हो जायेगा.”

गजेंद्र की मुस्कराहट शिकारी सी हो गयी, धीरे धीरे सर हिलाते हुए. “ओह, मैं ऐसा

वादा नहीं करूँगा, शाहिदा. क्यों करून? यह मुझे ताकत देता है.

मैं तुझे और बार बार छोड़ना चाहता hoon—jab चाहे. सोच इसे मेरा हिसाब: हॉस्पिटल के बिल,

हुसैन की दूकान बचने से. तू मुझ पर क़र्ज़दार है, और मैं वसूल करूँगा.” वह

खड़ा हुआ, कॉंफिडेंट क़दमों से पास आया, लेकिन वह पीछे हटी.

“कोई ब्लैकमेल नहीं, गजेंद्र. यह गलती thi—sirf एक बार की. मैं तेरी मदद की क़दर करती

हूँ, सच में, लेकिन मैं तेरी खिलौना नहीं बनूँगी.” उसकी आवाज़ थोड़ी कांप रही, फैसले

के नीचे दर छुपा था.

उसने उसकी बांह पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह झटक गयी. “काम से काम घर तक छोड़

दूँ. देर हो गयी, सड़कें खतरनाक हैं.” अम्मी ने ज़ोर से सर हिलाया. “मैं मन करती हूँ.

मुझे चलना है, दिमाग साफ़ करना है. तेरी गाडी में... और गन्दी महसूस करुँगी.”

वह

सच में गन्दी महसूस कर रही thi—kandhe थोड़े झुके, चीज़ें जल्दी जल्दी इकट्ठी कर

रही थी.

उनके किये हुए काम उस पर बोझ थे, रूह पर दाग, खास तोर पर एक दीनदार _ औरत के

लिए जो हिंदू मर्द के साथ उलझ गयी. आखरी नज़र के बाद वह पलटी और कमरे से निकल गयी,

दरवाज़ा क्लिक से बंद हो गया.

वह रात के आसमान के नीचे घर की तरफ चल पड़ी, सड़कें खामोश, सिर्फ कभी कुत्ता भोंकता

या दूर मोटरसाइकिल की आवाज़. मैं छायाओं में छुपा, दूर से देखता रहा जब वह गजेंद्र

के दरवाज़े से निकली, स्ट्रीटलैम्प की रौशनी में उसकी परछाई.

वह गुस्से में चल रही थी, कदम तेज़ और इरादे वाले, लेकिन चल में अजीब सी दिक्कत— थोड़ा

लंगड़ाना, हर कदम संभल कर, शायद दोनों छेदों में इतनी गहरी चुदाई से दर्द.

उसकी बड़ी गांड हर कदम के साथ हिल रही थी, नीली ड्रेस उस पर चिपकी हुई, और मैं सोच रहा

था गजेंद्र कितना किस्मत वाला जो इस नरम, झुकने वाले गोश्त में घुस गया.

मैं दूर से उसके पीछे चलता रहा, कदम चुपके, फिर अचानक पास आ कर जैसे इत्तेफ़ाक़ से.

“अम्मी? क्या तुम हो?” मैं धीमे से बोलै, हैरानी का नाटक करते हुए.

अम्मी: (अँधेरी सड़क पर तेज़ चलती हुई, आबय और वैल ठीक करती, अभी भी लाली और उलझी हुई,

जुबां पर जल्दी दुआ पढ़ती) या खुदा, मैंने क्या किया... फिर से...

मैं: (पेड़ की छाया से निकल कर, जैसे आम, उसके साथ चलते हुए) अम्मी? हे अम्मी, रुक जाओ!

अम्मी: (थोड़ा उछाल कर, आँखें फैली, हाथ सीने पर) तुम... तुमने डरा दिया! इतनी रात को

यहाँ क्या कर रहे हो?

मैं: (मुस्कुराते हुए, मासूमियत से) मैं बस... वाक पे था. दिमाग साफ़ करने. तुम रात को

अकेली क्यों बहार हो? खतरनाक है.

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अम्मी: (आँखें झपकती, वैल फिर से ठीक करती, आवाज़ थोड़ी कांप रही) मैं? ओह, मैं...

अब्बू से मिलने हॉस्पिटल गयी थी. जानती हो बीटा, विजिटिंग हॉर्स देर तक चल गयी. लेकिन तुम—

कहाँ से आ रहे हो? घर पर पढाई नहीं करनी थी?

मैं: पढाई? हाँ, कर रहा था, लेकिन ब्रेक चाहिए था. घर भरी लग रहा था. वैसे,

अब्बू कैसे हैं? डॉक्टर ने कुछ कहा?

अम्मी: (रुक कर, आँखें इधर उधर, आस्तीन के किनारे से खेलती) अब्बू? वह... ुम, स्टेबल

हैं. हाँ, स्टेबल. नर्स ने कहा वाइटल ठीक हैं, लेकिन और टेस्ट्स चाहिए. क्यों पूछ रहे

हो अब? और अँधेरे में ऐसे क्यों घूम रहे हो? तुम्हारे जैसे नहीं.

मैं: (कंधे उछालते, उसकी तरफ देखते) नहीं पता, बस ऐसे hi. लेकिन सच में अम्मी, अकेली

नहीं होना चाहिए. अगर कुछ हो जाये? सड़कें खामोश हैं, फिर भी...

अम्मी: (नर्वस हसी, कदम थोड़ा तेज़) कुछ हो जाये? नहीं नहीं, सब ठीक है. मैं अपना

ख्याल रख सकती हूँ. मैं बच्ची नहीं. लेकिन tum—logon पर छुप कर आ रहे हो. बिलकुल

कहाँ से आ रहे थे? पार्क से? या... कहीं और?

मैं: कहीं और? नहीं, बस गली के आस पास. दूर से तुम दिखी तो साथ चलने का सोचा. सेफ्टी

इन नंबर्स, न? वैसे हॉस्पिटल कैसे था? अब्बू ने कुछ कहा?

अम्मी: (गाला खाली करते, आवाज़ थोड़ी पहात रही) विजिट? थक गया. वह ज़्यादातर सो रहे थे.

ज़्यादा नहीं बोलै. डॉक्टर उम्मीदवार हैं. लेकिन बीटा, इतनी रात को क्यों बहार? तेरी एक्साम्स

आने वाली हैं. आराम करना चाहिए.

मैं: एक्साम्स थोड़ी देर रुक सकते हैं. मुझे तुम्हारी फ़िक्र है. तुम आज रात... अलग लग रही

हो. खूबसूरत, हमेशा की तरह, लेकिन थकी हुई. सब ठीक?

अम्मी: (वैल के नीचे लाल, एक सेकंड रुक कर खुद को संभालती, फिर चलती) खूबसूरत?

ऐसे मत बोलो, बेवकूफी है. थकी? हाँ, हॉस्पिटल की हवा भरी है, और... बस लेट थी तो

थोड़ा चलना पड़ा. बस इतना. कुछ ज़्यादा नहीं.

मैं: बस लेट? हम्म, ठीक है. लेकिन सच में खूबसूरत लग रही हो अम्मी. यह वैल तुम

पर सूट करता है, आँखें चमक रही हैं. बस कह रहा हूँ.

अम्मी: (शक से देखती, दिल ज़ोर से धड़कता) आँखें? बस करो, यह ठीक नहीं. और bus—haan,

ट्रैफिक या कुछ था. क्यों ऐसे देख रहे हो? क्या... कुछ अजीब देखा आज रात?

मैं: अजीब? क्या? नहीं, बस आम मोहल्ले की चीज़ें. क्यों, रास्ते में कुछ हुआ?

अम्मी: (जल्दी सर हिलाती, आँख मिलाने से बचती) नहीं! कुछ नहीं. बस... रात लम्बी लग रही

है. चलो जल्दी घर.

मैं: पक्का अब्बू ठीक हैं? उनके बारे में बात करते हुए थोड़ा उलझी लग रही हो.

अम्मी: उलझी? नहीं उलझी. बस... फ़िक्र है. उसके लिए. और तुम्हारे लिए, ऐसे घूम रहे हो. किसी

ने देखा तो?

मैं: देखा? हम बस चल रहे हैं. रिलैक्स अम्मी. सच में थकी लग रही हो. घर पहुँच

कर आराम करना. चाय बना दूँ?

अम्मी: चाय? प्यारा है, लेकिन नहीं, मैं संभल लुंगी. बस ईशा पढ़ कर सोना है. हॉस्पिटल की

रौशनी से सर दर्द होता है कभी कभी. इसलिए थकी लग रही हूँ.

मैं उसके साथ चल पड़ा, नार्मल बनने की कोशिश, लेकिन अंदर शर्म तेज़्ज़ जल रही थी. अपनी

अम्मी के साथ चल रहा हूँ जब अभी गजेंद्र के साथ उसकी गन्दगी देखि— वह कच्चे,

खुले काम दिमाग में दोहरा रहे थे, मुझे मुनाफ़िक़ बना रहे थे. कैसे बात कर सकता

हूँ जब मैंने उसे नंगा, उल्लंघन, किसी और मर्द के नीचे कराहते देखा?

गुनाह और गहरा हो गया, सीने पर भरी बोझ; मैं अपनी ख़ुशी से शर्मिंदा, छुप कर

देखने से, वह हद्द पार जो किसी बेटे को नहीं करनी चाहिए.

फिर भी चलते हुए मैं उसकी बड़ी गांड को हिलते देख रहा था हर कदम, ड्रेस के नीचे

नरम उछाल, एक सताने वाली याद. कितनी छिनाल बन gayi—ya शायद हमेशा थी? नहीं, यह

सोच मुझे और नफरत दिलाती थी. हम दोनों गुनहगार थे अब, राज़ से बंधे.

“मैं बस सोच रहा था अम्मी. जाबिर वाली सब चीज़ों के बाद दिमाग साफ़ कर रहा था. फ़िक्र

मत karo—main ठीक हूँ. वैसे, सूरज के घर जा रहा था उन्हें मिलने. वह दादी के लिए

मददगार रहे हैं याद है? जल्दी hi आ जाऊंगा.”

वह रुक गयी, मुख कर के घूरती हुई. उसको पता था उसकी माँ, दादी ज़ैनब की सूरज के साथ

अफेयर, अम्मी ने हफ़्तों पहले अपनी माँ को सूरज के साथ चुम्बन करते देखा था.

“सूरज के घर? इतनी रात को? बिलकुल नहीं. रात के 12 बजे हैं, और उसका घर जंगल के पास, बहार

है. अगर कुछ हो गया तो? मेरे साथ घर chalo—kal दिन में मिल लेना. तेरी हिफाज़त पहले, बीटा.”

मैं धीरे से ज़िद की, शक न होने दूँ. “अम्मी प्लीज. ज़रूरी hai—maine वादा किया था अगर

पास हूँ तो मिलने का. चलना दूर नहीं, जल्दी hi. तुम जानती हो सूरज को; वह घर वाले जैसे

हैं. चांदनी रात है, फ़ोन है मेरे पास. बस hello बोल कर वापस आ जाऊंगा. भरोसा करो?”

उसने सांस ली, मेरे चेहरे को देखती हुई, माँ वाली फ़िक्र साफ़ दिखती थी. "मुझे पसंद नहीं,

लेकिन... तू अब बड़ा लड़का हो गया है. ठीक है, जा अगर जाना hi है. लेकिन वादा कर,

पहुँच कर मैसेज कर देना और निकलते वक़्त भी.

और सीधा ghar—koi घुमक्कड़ नहीं." "वादा, अम्मी. शुक्रिया." हमने जल्दी से गले लगाया,

उसकी खुशबू— जस्मिने की परफ्यूम और शाम की कुछ मुस्की— मेरे साथ रह गयी जब वह

घर की तरफ चली गयी.

जब मैं सूरज के घर की तरफ चल पड़ा, रास्ता शहर की रोशनियों से दूर जंगल की तरफ

मुड़ता हुआ, अँधेरे में घुस रहा था. खुद से नफरत फिर से खा रही थी मुझे.

मैं कैसा बीटा हूँ? अम्मी को झाँक कर देखा, उसकी be-izzati पर मुट्ठ मारी, फिर उसके

सामने झूठ बोलै. दिल hi दिल में गालियां दी खुद को: "तू राक्षस है, अपने ईमान का नाम

नहीं रख सकता." गुनाह और गहरा हो रहा था— अब ,,., कैसे पढूंगा?

क्या मेरी सलत क़ुबूल होगी इतने गुनाहों के बाद? खुद से इतनी नफरत थी, जैसे बेइंतेहा गड्ढा:

घर के रिश्तों को धोका, हराम ख्वाहिशों में डूबना, वह झाँकू बन गया जो मुझे

खुद घिन आती थी. फिर भी आगे बढ़ता गया, बंगला नज़र आने लगा.

सूरज का बंगला वही था जो पहले देखा था— सदा, एक मंज़िला मकान, सफ़ेद दीवारें,

टाइल्ड छत, जंगल के किनारे पर, शहर की भीड़ से दूर.

छोटी बरामदा बेलों से भरी, ग्रेवल का रास्ता दरवाज़े तक. Alag-thalag, अब यह प्राइवेसी

भयानक लग रही थी.

पास आते हुए सोचा दादी ज़ैनब अभी भी यहाँ होगी क्या, लेकिन अकाल ने कहा नहीं— अब तक

घर पहुँच कर दादा के साथ बिस्तर पर होंगी. लेकिन कुछ अजीब था, जिस्म पर कांटे

उभर रहे थे; रात बहुत शांत थी, हवा में छुपे राज़ भरी हुई.

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बंगला के अंदर से रौशनी निकल रही थी, गरम पीली चमक खिड़कियों से बह रही थी इतनी

देर के बावजूद. सूरज सोया क्यों नहीं? वह अकेला रहता था, छोटा दुकानदार, कोई घर

वाले पास नहीं. क्यूरोसिटी— और वह लानत भरा झुकाओ— मुझे पास ले आया.

चुपके से घूमा, पहले बैठक की खिड़की में झाँका. झटका लगा जैसे थप्पड़: ज़मीन

पर दादी के कपडे बिखेरे हुए— सफ़ेद सलवार कमीज, सिकुड़ी हुई फेंकी हुई, अंदर के कपडे,

ब्रा और पंतय सूरज की शर्ट और पंत के साथ उलझी हुई. पास में पोर्क का मांस प्लेट पर,

ग्रास्य और आधा खाया हुआ.

पोर्क से हैरानी नहीं हुई; पहले भी देखा था उसने हराम मांस खाया सूरज के असर में,

हमारे मज़हब के मन होने के बावजूद. वह यहाँ थे— या अभी थोड़ी देर पहले थे.

और घूम कर देखा, बैडरूम की रौशनी ों थी, अब आवाज़ें आने लगी: कराहें और चीखें,

कच्ची और तेज़. खिड़की ऊँची थी, हाथ नहीं पहुँच रहा था, तो पास के जंगल से लकड़ियां

इकट्ठी की— गिरी हुई डालियाँ और लकड़ियां— खतरा भरा ढेर बना कर चढ़ने के लिए.

ढेर मेरे वज़न से हिल रहा था, अंदर से धुप की हलकी खुशबू आ रही थी, पर्दा थोड़ा

खुला था. पूरा झाँकने से पहले संभाला, दिल ज़ोर से धड़क रहा था.

आखिरकार देखा और दिल हिल गया. दादी ज़ैनब पेट के बल बिस्तर पर पड़ी थी, चीख रही

थी और दर्द से चेहरा बनती हुई, पसीना माथा पर मोती जैसे. दोनों कमर से नीचे

नंगे थे, सूरज उसकी पीठ पर, जिस्म धक्के दे रहा था रदम से.

वह उसकी गांड मार रहा था— वह बड़ी, मोती गांड हर हरकत से हिल रही थी. तुरंत समझ

आया अम्मी का यह सब दादी ज़ैनब से शुरू हुआ; सेब पेड़ से दूर नहीं गिरता, गुनाह विरासत की

तरह चलता है. इसने अम्मी के गजेंद्र के साथ गिरने की वजह समझा दी— सीखी कमज़ोरी,

छुपे ख्वाहिश उभर आयी.

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साफ़ था यह उसकी पहली बार थी गांड में लुंड लेने की; जैसे चादर पकड़ राखी थी, चीखें

दर्द ज़्यादा ख़ुशी से काम, "सूरज, दर्द हो रहा! धीरे कर!" वह धीरे लेकिन ज़िद से, पास की

बोतल से तेल लगता हुआ अंदर कर रहा था.

जानता था दादी ज़ैनब ने कभी नहीं किया यह, हमेशा पाकिज़ागी की बात करती थी, ऐसे

कामों को ghair-fitri और हराम कहती थी. बैडरूम में निशानियां साफ़: निघटस्तंड पर ताज़ा

लुब्रीकेंट की बोतल, तिसुएस बिखेरे जैसे साफ़ करने के लिए, जिस्म सख्त और अनादि, हरकतों में

कोई आसानी नहीं.

झटका मुझे सुन्न कर दिया, लेकिन फिर से उत्साह जग उठा. लकड़ी की कमज़ोरी का ध्यान नहीं

रहा, ढेर हिल गया. हाथ पंत में गया, लुंड बहार निकाल कर मुट्ठ मारने लगा— यह

आदत बन गयी थी, गुनाह के वक़्त शर्म उड़ जाती थी.

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क्यों गुनाह नहीं महसूस? क्योंकि हराम का जोश सब कुछ सुन्न कर देता था, ज़मीर सो जाता

था. सूरज धीरे धीरे गांड मार रहा था दर्द काम करने के लिए, फिसफिसा रहा, "रिलैक्स,

ज़ैनब जी. जल्दी ाचा लगेगा. सांस ले. पहली बार है, बस गांड ढीली कर." सोचा वह यह

कैसे कर सकती थी— दादा को धोका, मज़हब को धोका, सूरज के साथ.

पूरा हाथ हिलने से पहले लकड़ी गिर गयी ज़ोर की आवाज़ से, डालियाँ बिखर गयी. घर के अंदर

गूँज गयी जैसे बिजली गिरी. दादी की आवाज़: "सूरज, यह क्या था? बहार कोई है!"

पता था उन्होंने सुन लिया. घबराहट में नीचे कूड़ा और भगा, पेअर जंगल में दौड़ते,

डालियाँ चेहरे पर मार रही थी, जब तक अँधेरे में सुरक्षित नहीं हो गया.

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अगला दिन चमकदार सुबह हुआ, सूरज परदे से छान कर अंदर आ रहा था जैसे रात के अँधेरे

का मज़ाक उदा रहा हो. अब्बू हॉस्पिटल से घर आ गए थे, ताज़ा और ताज़ा दीखते हुए, रंग

वापस आया, लिविंग रूम में अखबार पढ़ते हुए.

"मैं नए आदमी जैसा महसूस कर रहा हूँ," उन्होंने नाश्ते पर ख़ुशी से कहा. गजेंद्र

बिना बताये आ गया था, अब्बू की सेहत देखने के बहाने, लेकिन आँखें अम्मी पर टिक रही

थी जो किचन में रोटी और करी बना रही थी, खुशबू घर भर रही थी.

बाद में अम्मी चाय और नाश्ता— समोसा और बिस्कुट— ट्रे पर लगाकर बरामदे में ले गयी

जहाँ अब्बू और गजेंद्र बात कर रहे थे. मैं अंदर से देख रहा था, पेट में गांठ. पता

था कुछ होने वाला है; हवा में तनाव था, राज़ बहने को तैयार.

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CHAPTER 21

मेरे पापा को मेरी माँ की तरफ से जो धोखा मिल रहा है, वह बिलकुल

डेसेर्वे नहीं करते. मेरी माँ पापा को सबसे बुरा तरीके से धोखा दे रही है.

अम्मी, शाहिदा, अपनी आम शान से चलती हुई आयी, कल रात वाला पिंक रेशम का ड्रेस अब एक साधा

एप्रन से बंधा हुआ कमर पर. वह थोड़ा झुक कर ट्रे को उनके बीच के नीचे टेबल पर राखी,

समोसे, बिस्कुट और ताज़ा चाय पेश करते हुए.

जैसे hi वह झुकी, गजेंद्र की नज़र सीधे उसकी छाती पर चली गयी, ड्रेस का मॉडेस्ट गाला उस

हालत में थोड़ा सा खुल कर नीचे के नरम उभार दिखा रहा था.

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उसकी नज़र वही रुक गयी, उसके चूचियों के हलके उभार को देखते हुए, होंठों पर हलकी सी

मुस्कराहट, जो अब्बू चाय हिलाते हुए नोटिस नहीं कर रहे थे. अम्मी जल्दी सीढ़ी हुई, गाल थोड़े

लाल हुए, लेकिन गजेंद्र की तरफ आँख नहीं उठायी, सिर्फ अब्बू पर तवज्जोह दी.

“यह लो, हुसैन. समोसे ताज़ा बनाये hain—tumhara पसंदीदा भरावन,” उसने कहा, आवाज़

मुस्तक़िल लेकिन एक खतरनाक धागे पर चल रही थी, जैसे नार्मल होने और अंदर के तूफ़ान के बीच

बैलेंस कर रही हो.

अम्मी और गजेंद्र के बीच चीज़ें सिर्फ सरफेस के नीचे उबाल रही थी, अब्बू की भरोसे भरी

नज़र से छुपी हुई. जब उसने गजेंद्र के कप में चाय और डाली, उँगलियाँ chhui—uski तरफ से जान

बुझ कर, अंगूठा उसके हाथ पर थोड़ा ज़्यादा देर तक रुका.

वह धीरे से हाथ पीछे खींची, लेकिन उससे पहले बिजली का एक झटका गुज़र गया, सांस रुक सी गयी.

अब्बू ने गजेंद्र की मार्किट की बातों पर हांसे, बिलकुल be-khabar की गजेंद्र का पाऊँ टेबल के

नीचे अम्मी के एंकल को धीमे से छेड़ रहा था.

वह पीछे हटी, स्कार्फ़ को बेचैनी से एडजस्ट करती, हरकतें साफ़ लेकिन तनाव भरी. वह उनके सामने

खतरनाक तरीके से काम कर रही thi—abbu को मुस्कराहट से जवाब देती, होस्टेस की तरह रिफिल पेश

करती, लेकिन जिस्म की भाषा झूठ बोल रही थी: कंधे थोड़े झुके, आँखें गजेंद्र की तरफ

चेतावनी और naa-khwahish ख्वाहिश के मिलाप से.

जैसे वह एक नाज़ुक नाच कर रही हो, वफादार बीवी का दिखावा बनाये रखते हुए, जबकि कल रात

उसके जिस्म को हासिल करने वाला मर्द वही बैठा था, उसकी मौजूदगी गुनाह की याद दिलाती हुई.

मैं लिविंग रूम के दरवाज़े के साये में छुपा देखता रहा, दिल गुस्से और दुःख के मिलाप से मोर

रहा था. अब्बू को इतना पूरा धोका दिया जा रहा था, अम्मी और गजेंद्र पर उसका भरोसा बिलकुल न

टूटने वाला, जैसे भेड़िये को खाने पर दावत दी जा रही हो.

कैसे वह नहीं देख प् रहा गजेंद्र की आँखें अम्मी को खा रही थी, या उसकी हालत में हलके सी

झटके? इसने मुझे अम्मी को बुरी सोचने पर मजबूर कर दिया, बिलकुल उसकी Ammi—meri दादी ज़ैनब

की तरह, जिसने कल रात सूरज के साथ हराम सूअर का गोश्त खाया, फिर जंगल के किनारे के उस एकांत

बंगला में उसको अपनी गांड मरवाने दी.

याद साफ़ उभरी: दादी की दर्द भरी चीखें और naa-khwahish ख़ुशी की मिलाप, बड़ी गांड सूरज

के धक्कों से हिलती हुई, सब ग्रैंडपा को धोका देते हुए.

क्यों मुझे लगा दादी ने अम्मी को रंडी

तरह पला था? यह उन पैटर्न्स से आया जो मैंने dekhe—daadi के छुपे अफेयर, हराम खाने और

कामों में डूबना, टेम्पटेशन की कमज़ोरी की विरासत अम्मी तक पहुंची.

अम्मी हमेशा दादी की इज़्ज़त से बात करती थी, लेकिन अब यह पर्दा लगता था: दादी की दीनदारी सिर्फ

दिखावा, असली सबक़ कामों में छुपे, अम्मी को सिखाया की ख्वाहिशें ईमान पर भारी पद सकती

हैं, हमारे दीं के बहार के मर्द वफादार शौहरों के छोड़े खलियों को भर सकते हैं.

यह अम्मी के गजेंद्र के साथ फिसलने की वजह बता रहा tha—virasat में आयी कमज़ोरी, सालों

तक दादी के मुनाफ़िक़ात देख कर पोषी गयी रंडी सी फितरत.

कुछ मिनट और सर्वे करने के बाद अम्मी ने माफ़ी मांगी, किचन में डिनर चेक करने का

बहाना बनाते हुए. “अगर कुछ चाहिए तो मैं जल्दी वापस आउंगी,” उसने हलकी लेकिन तनाव

भरी आवाज़ में कहा, फिर अंदर चली गयी.

किचन गरम जगह थी, सिमरिंग करी और स्टोव पर ताज़ा चपाती की खुशबू से भरी. वह

काउंटर पर मसरूफ हो गयी, सब्ज़ियां ज़ोर ज़ोर से काटने लगी, चाकू कटाई बोर्ड पर थप थप

कर रहा था जैसे उसके ख्यालों को दबा दे.

वह खुद से बात करने लगी, यह वह लफ्ज़ थे जो उसने खुद से कहे...

ओह गॉड, मैंने क्या कर दिया? अभी वृंदा से गजेंद्र को चाय सर्वे कर के आयी, और मेरा दिल

ढोल की तरह बज रहा है. वह वहां मेरे शौहर के साथ बैठा hai—mera बेचारा बीमार

shauhar—aur फिर भी उसने मुझे भूखी आँखों से देखा, कप देते वक़्त हाथ पर उँगलियाँ

रगड़ दी.

क्यों यह मुझे इतना गरम, इतना ज़िंदा महसूस करता है? मेरा जिस्म सिसकारी ले रहा है, स्कार्फ़ भी

फ्लूसेड चमड़ी पर सांस रोक रहा है. अगर मेरे शौहर ने देख लिया तो? वह कमज़ोर है, लेकिन

कभी कभी आँखें तेज़ होती हैं. या रब्ब, अगर शक हुआ तो हमारा घर टूट जायेगा.

मैं अच्छी बीवी हूँ न? मैंने उसकी बिमारी में ख्याल रखा, खाना बनाया, बच्चों को ---

तरीके से पला. सालों से वफादार रही, हर सुबह ,,., पढ़ी. यह गजेंद्र वाला अफेयर ख़तम

होना चाहिए.

मैं क़सम कहती हूँ, अब रुक जाउंगी. कोई चोरी के लम्हे नहीं, कोई साये में फिसफिसाहट नहीं. मैं

वापस नार्मल बीवी, वफादार अम्मी बनूँगी. आज रात से ज़्यादा रकत पड़ूँगी, माफ़ी मांगूंगी.

लेकिन अभी खुद से इतनी नफरत क्यों? देख Shahida—tu मुनाफ़िक़ है, गुनहगार जो दीनदारी के पीछे

छुपी है. पिछले दिनों की ,,., बेकार थी न? खली लफ्ज़, क्योंकि अंदर से मैं गजेंद्र के हाथ

की ज़्यादा तलबगार हूँ खुदा की रेहमत से. इसे तन्हाई कहते हूँ, शौहर के लम्बी हॉस्पिटल में

रहने से कमज़ोरी, लेकिन यह बहाना है.

क्या मैं रंडी हूँ? नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मैं _ औरत हूँ, मॉडेस्ट पला, जवानी

में अच्छे मर्द से शादी की. रंडियां वह होती हैं जो खुद को दिखाती हैं, गुनाह बिना पछतावे

के तालाब करती हैं. मैं सिर्फ कमज़ोरी से फिसली, गजेंद्र की चार्म ने मुझे हरा दिया. यह मेरी असलियत

नहीं.

ओह, लेकिन खुद से झूठ बोल रही हूँ न? दिल के अंदर सच जानती hoon—main गजेंद्र की रंडी हूँ.

क़बूल करना पड़ेगा. जब वह मुझे अकेले में ऐसा कहता है तो मैं पिघल जाती हूँ, जिस तरह

उसने मुझे छोड़ा, घुटनो पर बैठने की ख़ुशी...

रंडी होने में इतना मज़ा आता है, उस हराम आग में समर्पण, उस तरह महसूस करना जो मेरा

शौहर कभी नहीं करा सका. हाँ, यह मुझे उत्साहित करता है, सिर्फ सोच कर मेरी छूट दर्द करती

है.

नहीं नहीं नहीं, मैं ऐसे कैसे बोल रही? यह शैतान बोल रहा है, मैं नहीं. होश में आओ; यह

पागलपन है. इक़रार करती हूँ, हाँ, मैंने सख्त गुनाह किया, अहद तोडा, ईमान को धोका दिया.

लेकिन अब नहीं. मैं बदलने का फैसला करती हूँ, फिर से अच्छी औरत और अम्मी बनूँगी. कल रोज़ा

रखूंगी, ज़्यादा हदीथ पढूंगी, गजेंद्र से पूरा दूर रहूंगी. मेरा खुदा रहीम है; अगर

सच्ची तौबा करून तो राह दिखा देगा.

फिर भी... गजेंद्र का हाथ मेरे हाथ पर क्यों चिपका है? नहीं, बस करो. ,,., पर तवज्जोह

दो. अभी वुज़ू करुँगी और सजदे में सुकून ढूंढूंगी. यह आज ख़तम.

फिर गजेंद्र ने अब्बू से माफ़ी मांगी की बाथरूम जा रहा है.

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अब्बू ने be-dhyaan नोद किया, जूस पी रहा था. गजेंद्र चुपके से किचन में घुस आया, अम्मी के

पीछे से आया जैसे साया. वह सख्त हो गयी जब उसके हाथ कमर पर लपेट गए, उसे पीछे खींच

कर सीने से लगा लिया. “शाहिदा, आज तू बहुत टेम्पटिंग लग रही है,” उसने कान में गरम सांस के

साथ फिसफिसाया. “यह ड्रेस... हर जगह सही से चिपकी हुई.”

अम्मी धीमी सांस ली, हाथ चाकू पर जैम गए. “गजेंद्र, क्या कर रहे हो? हुसैन बहार है. प्लीज,

बस करो. मेरी शादी बर्बाद मत karo—main पहले hi बहुत खतरे में हूँ.”

उसकी आवाज़ छुपी मिन्नत थी, दर से भरी, जिस्म उसकी पकड़ में तन गया.

वह उसे और ज़ोर से पकड़ा, बाहों में लोहे की तरह, एक हाथ पेट पर फैला, दूसरा साइड पर ऊपर

चढ़ता हुआ.

“ओह, छोड़ न, शाहिदा. तू वृंदा पर शौहर के बगल बैठ कर मुझे जिस तरह देखती थी, वह

झूठ नहीं बोल सकती. वह nazrein—josh भरी, और मांगती हुई. तू भी उतना hi चाहती है जितना मैं.”

वह सर हिलाती रही, निकलने की कोशिश लेकिन ज़ोर से नहीं, जैसे आवाज़ न हो. “नहीं, मैंने ऐसा नहीं किया

. सिर्फ अदब था. तू ख्याल बना रहा है. गजेंद्र, बहार जा. मेरा शौहर अभी भी वहां hai—kabhi

भी अंदर आ सकता है.”

गजेंद्र धीमे से हांसे, होंठ गर्दन पर रगड़ते हुए. “अदब? ऐसा कहती है? तुझमे वह आग

दिखती है, Shahida—wahi आग जो कल रात मेरे नीचे कराह रही थी. तेरा जिस्म झूठ नहीं बोलता. और

हुसैन? वह अच्छे आदमी हैं, लेकिन कमज़ोर. बीमार, हमेशा दूसरों पर निर्भर. वह सामने जो

है वह नहीं देखता. मुझे दिखाने दे एक असली मर्द क्या कर सकता है.”

अम्मी रुक गयी, विरोध कमज़ोर पड़ते हुए जब उसके हाथ घूमने लगे. “प्लीज... यह गलत है. वह

मेरा शौहर है, मेरे बच्चे का बाप. उसके बारे में ऐसा मत बोलो. वह इतना कुछ सेह चूका है

बिमारी से.”

लेकिन गजेंद्र नहीं रुका, उसे थोड़ा घुमा कर सामने किया, आँखें उसकी आँखों में. “गलत? तो

फिर मुझे ज़ोर से क्यों नहीं धकेल रही? क़बूल kar—tu इस उत्साह की तलबगार है. हुसैन बेवक़ूफ़

है, बहार स्नैक खा रहा है जब मैं उसकी चीज़ ले रहा हूँ.” वह झुका, उसके होंठों को गहरे

चुम्बन में बांध लिया, मुँह मांगने वाला और ज़िद वाला.

अम्मी पहले विरोध नहीं किया; होंठ उसके नीचे खुल गए, धीमी सांस निकली जब वह उसके छुए

हुए में पिघल गयी. क्यों? शायद खतरे की ख़ुशी, वह हराम कशिश जो पहले भी उसे खींच

लायी, उस गरम लम्हे में दर को हरा देती हुई.

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चुम्बन गहरा हुआ, ज़ुबानें एक दुसरे से मिली, हाथ अब आज़ाद घूम rahe—ek हाथ बड़ी नरम

गांड पर, ड्रेस के ऊपर से नरम गोश्त निचोड़ता, दूसरा पीठ पर दबाव देता उसे और पास खींच

कर, उसके चूचियों को सीने से दबाते हुए, उनकी भरी फुल्नेस्स दबाव में डाब गयी.

मैं छुपे हुए देख रहा था, हैरान की वह इतना खतरा कर रहे थे जब अब्बू वृंदा पर कदम दूर

था. अम्मी इतनी हिम्मत कहाँ से लायी? या यह नशा था, बिलकुल दादी की तरह सूरज के साथ सब

बर्बाद करने वाली? मेरा दिमाग घूम रहा था, जज़्बात के तूफ़ान में.

वह अचानक चुम्बन तोड़ कर पीछे हटी, आँखें फैली. “हम नहीं कर सकते... मुझे दर लग रहा

है. अगर उसने सुन लिया? अगर अंदर आ गया?”

गजेंद्र मुस्कुराया, हाथ अभी भी उस पर. “शाहिदा, रिलैक्स. वह बहार चाय एन्जॉय कर रहा है, बिलकुल

be-khabar. सिर्फ जल्दी का maza—mujhe महसूस करने दे. तू जानती है तू चाहती है. कल रात याद है?

तेरा जिस्म इसके लिए बना था.”

उसकी ज़िद उसके समझने में टूट गयी, हाथ कांपते हुए नीचे गया, उसके लुंड को पंत के ऊपर से

पकड़ा. “ठीक है... लेकिन जल्दी. और दरवाज़ा देखते रहना.” वह पीछे मुद कर वृंदा की तरफ

देखती रही, दर आँखों में साफ़, दरवाज़ा देख कर कन्फर्म किया की अब्बू नहीं देख रहे फिर

गजेंद्र को चुम्बन जारी रखा.

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मैं नज़र नहीं हटा प् रहा था, मेरे अंदर का अँधेरा हिस्सा अम्मी को खिलोने की तरह देखते हुए

पसंद कर रहा tha—Gajendra का खेलौना, विरोध के बावजूद फरमानबरदार और उत्सुक.

मेरे अख़लाक़ ख़तम हो गए थे, इन हक़ीक़तों की गर्मी में उड़ गए; पहले मैं मज़हब की तालीम

पर था, घर की इज़्ज़त, हराम ख्यालों से दूर. अब वह पाकिज़ागी दूर लगती थी, बदले में एक

be-sharam ख़ुशी जो मुझे शर्मिंदा भी करती थी और उत्साहित भी. मैं इतना नीचे कैसे गिरा,

फ़रज़न्दा फरमानबरदार से यहाँ तक?

जब वह दोनों चुम्बन कर रहे थे, अम्मी ने अपनी ड्रेस के ऊपर के बटन खोलने शुरू किये,

क्लीवेज दिखाने के लिए उसको दिखते हुए.

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अम्मी धीरे धीरे घुटनों पर बैठ गयी, हाथों से उसकी ज़िप बड़ी संभल कर खोली. बेल्ट को भी

बहुत ध्यान से उतरा. वह कोई गलती नहीं करना चाहती थी, और मैंने देखा वह लगातार कांप रही

थी. मुझे लगा यह इसलिए की उसका शौहर सिर्फ कुछ मीटर दूर था, दर लग रहा था.

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उसने पूरा मुँह में नहीं डाला एकदम से; बल्कि धीरे शुरू किया, जुबां बहार निकाल कर सिर्फ

सुपारी को छाता, प्रेकम का मज़ा लेते हुए धीमी सी आवाज़ निकली. धीरे से हाथ से पकड़ कर सिर्फ

सुपारी को होंठों के बीच लिया, पहले हलके से चूसा, गाल अंदर धसे हुए रदम बनाते हुए.

गजेंद्र धीमे से करहा, हाथ उसके बालों में दाल कर, किचन की खिड़की से बहार देखता रहा,

यकीन करते हुए की अब्बू अभी भी बहार बैठा है, बिलकुल be-khabar. "जारी रख, शाहिदा. तेरा

शौहर वही है, कुछ पता नहीं," गजेंद्र फिसफिसाया, आवाज़ में हुक्म और मज़ाक मिला हुआ.

"मैं देख रहा हूँ— वह ठीक है, सिर्फ फूलों को घूर रहा. जारी रख."

यह यक़ीन दिलाने से अम्मी को हौसला मिला; दर ख़तम हो गया जब गजेंद्र देखभाल का ज़िम्मा लिया,

तो वह पूरा ध्यान दे सकीय. उसने रफ़्तार बढ़ा दी, सर तेज़ तेज़ आगे पीछे, हर बार ज़्यादा अंदर

लेते हुए.

गजेंद्र ने अब्बू को और नीचे गिराया, लफ़्ज़ों में नफरत टपकती हुई. "देख उसको, हुसैन,

बेवक़ूफ़ की तरह बैठा है जब तेरी बीवी इतनी जोश से मेरा लुंड चूस रही है. हुसैन तू कमज़ोर

है, शाहिदा— तुझे डेसेर्वे नहीं करता."

उसने उसका सर पकड़ कर मज़बूती से गाइड किया, अम्मी ने मान लिया, ब्लोजॉब तेज़ और जोशीला. मुझे

लगा वह मज़े ले रही थी— आँखें झपकती हुई, धीमी कराहें उसके ird-gird गूंजती हुई, हाथ

उसकी रानों पर पकड़ कर सहारा ले रही थी. उसकी जोश से साफ़ था, खतरे के बावजूद यह काम

उसको पसंद आ रहा था.

गजेंद्र ने उसको शर्मिंदा किया, फिसफिसाहट में be-izzati: "बस यह, तू छिनाल. अपने hi किचन

में मेरा लुंड चूस रही है जब तेरा बेचारा शौहर इंतज़ार कर रहा. अब तू मेरी है न? इस लुंड

की आदि."

उसका छोटा मुँह उसके 11-इंच लम्बाई के ird-gird फैला हुआ, फिर भी पूरा अंदर जा रहा था, एक ऐसा

काम जो मुझे हैरान कर गया— अम्मी का नाज़ुक मुँह तो गाजर भी छोटे टुकड़े कर के नहीं खाती,

लेकिन यहाँ पूरा अंदर ले रही थी, होंठ कैसे हुए.

अचानक एक आवाज़— काउंटर पर से बर्तन गिर गए, अम्मी की कोहनी से टकरा कर. आवाज़ तेज़ गूंजी, और

अब्बू की आवाज़ वृंदा से आयी: "शाहिदा? सब ठीक है वहां?"

अम्मी जैम गयी, हैरान, मुँह अभी भी गजेंद्र के लुंड में, आँखें दर से फैली हुई.

गजेंद्र ने जल्दी से अपने आप को संभाला, कसुआलय जवाब दिया, "ठीक है, हुसैन! बस चमच

गिर गया. शाहिदा संभल रही है." फिर अम्मी की तरफ मुद कर फिसफिसाया, "चुप रहो— मैं उसको

यक़ीन दिलाता हूँ."

अम्मी रुक गयी लेकिन पूरा पीछे नहीं हटी, लुंड अभी मुँह में, थूक थोड़ी सी थोड़ी सी दादी पर

बह रही थी. वह सुस्ती से जाग गयी, मुँह पोंछे बिना कड़ी हुई और बोलै, "हाँ हुसैन, सब

ठीक! आज थोड़ी be-dhyaani हो गयी." उसकी आवाज़ मज़बूत थी, लेकिन सांस तेज़.

अब्बू हंस पड़ा. "ठीक है, फ़िक्र मत करो. गजेंद्र, वापस आओ ताकि दूकान के बढ़ने की बात

जारी रखें."

गजेंद्र ने खिड़की की तरफ सर हिलाया. "एक मिनट में, हुसैन. शाहिदा को जल्दी से कुछ मदद

कर रहा हूँ."

अम्मी बिना कहे फिर नीचे बैठ गयी, भूक साफ़ दिखती हुई उसने गजेंद्र के बड़े लुंड को फिर

चूसना शुरू किया, और गहरा और तेज़. मुझे तब पता चला वह कितनी छिनाल थी— उसके लुंड की

आदि, खतरा hi उसकी ख्वाहिश को बढ़ा रहा था, बुझा नहीं रहा. वह यह गुलामी, यह हराम

थ्रिल चाहती थी, जिस्म पहले के दर के बावजूद जवाब दे रहा था.

मुझे अजीब सी ख़ुशी हुई अम्मी को गजेंद्र का लुंड चूसते देख कर जब अब्बू बहार बेवक़ूफ़

की तरह बैठा था, be-khabar. यह याद दिलाता था की अम्मी ने अब्बू को ऐसे लोगों से चेतावनी दी

थी— गजेंद्र जैसे मदद के नाम पर अंदर घुसने वालों से.

"हुसैन, बहार वालों से संभल के," वह महीनों पहले बोली थी. "सामने मुस्कुराते हैं लेकिन

पीछे से तेरा माल ले जाते हैं." वह मिसालों में बोली थी, हिंट देती हुई की अगर non-Musslim

जैसे गजेंद्र से ज़्यादा क़रीब रहेगा तो वह खो जाएगी, लेकिन अब्बू ने नज़रअंदाज़ किया, अपने

"दोस्त" की भलाई पर यकीन किया.

अब अम्मी पूरी तरह गजेंद्र की हो चुकी थी; अब्बू ने अपनी बेवकूफी से उसको खो दिया, एक ऐसे

मर्द पर भरोसा किया जो उसकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठा रहा था. अब्बू ने गलती की उसकी चेतावनी न

सुन कर, गजेंद्र को घर में दाखिल कर दिया.

गजेंद्र ज़ोर से करहा जब वह झड़ने के क़रीब पहुंचा, जिस्म तन गया. "शाहिदा... मैं निकल

रहा हूँ." उसने अपना दूध उसके चेहरे पर डाला, गरम झरते गालों और होंठों पर, कराह

गूंजती हुई.

अब्बू ने फिर सुना: "गजेंद्र? ठीक हो? जैसे ज़ोर से आवाज़ आयी."

गजेंद्र ने अपने आप को संभाला, माथा पोंछा. "हाँ, बस गलत स्ट्रेच हो गया— पुराणी

पीठ दर्द उठ गया. जल्दी आता हूँ."

अब्बू यकीन कर लिया, हंस कर. "आराम से. यह कुर्सियां इतनी आरामदेह नहीं."

अब्बू कितना बेवक़ूफ़ था, इतनी आसानी से धोका खा गया? इस बार अम्मी उठ कर जवाब नहीं दिया;

उसका चेहरा पूरा स्पर्म से भरा, टपक रहा था.

गजेंद्र ने नीचे देखा, मुस्कुराते हुए. "शाहिदा, ऐसे बहुत खूबसूरत लग रही हो. लेकिन

साफ़ कर लो— हुसैन को अपनी बीवी को मेरे निशाँ के साथ नहीं देखना चाहिए."

गजेंद्र: (अपने लुंड से आखरी बूँदें छुम को उसके गाल पर पोंछते हुए, मुस्कुराते जब वह

किचन में घुटनो पर बैठी थी, चेहरा चमक रहा) ममम, अच्छा काम किया, शाहिदा. बिलकुल

प्रोफेशनल की तरह चूसा. अब जा बहार और अपने शौहर को अच्छा गहरा चुम्बन दे होंठों

पर.

अम्मी: (हाथ के पीछे से मुँह पोंछते हुए, आँखें दर से फैली, आवाज़ तेज़ फिसफिसाहट में)

क्या? नहीं! क्या पागल हो गए हो, गजेंद्र? मेरा चेहरा तेरे... तेरे गंदे छुम से भरा है!

मैं उसके साथ ऐसे चुम्बन कैसे कर सकती हूँ जब मैंने अभी तेरा लुंड चूसा है

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गजेंद्र: (धीमे से हँसते, पंत की ज़िप बंद करते हुए) ओह, हाँ कर सकती हो. और करोगी भी.

ज़्यादातर पोंछ लो अगर चाहती हो, लेकिन थोड़ा चमक छोड़ देना. मैं चाहता हूँ वह बिना

जाने मेरा मज़ा चखे.

अम्मी: (कांपते हुए कड़ी होती, वृंदा की तरफ देखती जहाँ अब्बू be-khabar बैठा था) क्यों?

क्यों मुझे इतना गन्दा काम करवा रहे हो? तुम राक्षस हो!

गजेंद्र: (पास झुक कर, गरम सांस कान पर) क्योंकि यह गन्दा गरम है, शाहिदा. सोचो उसके

होंठ तेरे पर, अभी भी मेरे छुम से चिपचिपा. वह सोचेगा यह सिर्फ तुम्हारा चॉपस्टिक या

पसीना है, लेकिन तुम जानोगी यह मेरा बीज है जो वह चाट रहा है. यह सबसे बड़ा धोका

है जो मैं देखना चाहता हूँ.

अम्मी: (कांपते हुए, आस्तीन से चेहरा साफ़ करने की कोशिश) बस करो! यह घिन आती है. मेरा

शौहर अच्छे आदमी है— वह इस be-izzati के लायक नहीं. और मैं भी नहीं!

जब वह सिंक के पास झुक कर चेहरा और मुँह धो रही थी, पानी ज़ोर ज़ोर से छिड़कती हुई,

गजेंद्र पीछे खड़ा था, हाथों से उसकी बड़ी गांड को मालिश कर रहा— नरम टुकड़ों को ज़ोर

से निचोड़ता, अंगूठों से ड्रेस के ऊपर से कर्व्स ट्रेस कर रहा.

"गजेंद्र, रुक जाओ," वह विरोध करती रही, लेकिन आधा दिल से, मुँह कुल्ली करते हुए. "हम यह बार

बार नहीं कर सकते. हुसैन बहार hi बैठा है." वह और पास डाब गया, मालिश ज़्यादा ज़िद वाली

हो गयी, गांड के टुकड़ों को खींच कर फैलाते हुए मस्ती में.

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"लेकिन मुझे और चाहिए, शाहिदा. अभी यहीं तेरी छूट मर लून— तेज़ और ज़ोर से. तू जानती है

तुझे ज़रूरत है."

अम्मी सीढ़ी हुई, गुस्से से उसकी तरफ पलटी. "नहीं! बिलकुल नहीं. मैं तुम पर इतना गुस्सा हूँ की

सब खतरे में दाल रहे हो. मेरा शौहर— हुसैन— वृंदा पर है. एक आवाज़ और, सब

ख़तम. वापस बहार जाओ पहले वह शक करे. क्यों चाहते हो मैं अपने शौहर को चुम्बन

दूँ जब मैंने अभी तेरा लुंड चूसा है?"

गजेंद्र: (मुस्कराहट और फैलते, उसकी कलाई पकड़ कर पोंछने से रोकता) यही तो मक़सद

है, तुम धोकेबाज़ वैली. मैंने तेरे सुन्दर _ मुँह को कच्चा छोड़ा, तेरे पियस

चेहरे पर अपना माल गिरा दिया. अब जा शेयर कर. उसे बिना जाने थोड़ा सा निगलवा दो जो तूने

पी लिया.

अम्मी: (खींच कर अलग होती, आवाज़ घिन से कांप रही) तुम कितने गंदे हो, गजेंद्र. कैसे

सोच सकते हो ऐसा? जैसे तुम मेरी शादी को नीचे गिरा कर मज़ा ले रहे हो!

गजेंद्र: (सर हिलाते, आँखें चमकती) बिलकुल सही. सोचो— तेरा शौहर बहार be-khabar, जब

उसकी बीवी के होंठ दुसरे मर्द के छुम से चमक रहे. जब तू उसको चुम्बन देगी, जैसे मैं

उसके मुँह में अपना निशाँ लगा रहा हूँ.

अम्मी: (दरवाज़े की तरफ पीछे हटती, चेहरा शर्म से लाल) नहीं, नहीं करुँगी. यह बहुत

ज़्यादा है. मेरा मज़हब, मेरे वादे... तुम सब पाक चीज़ों को बिगाड़ रहे हो!

गजेंद्र: (पास आते, आवाज़ में मज़ाक) पाक? पांच मिनट पहले तू घुटनो पर मेरा हिंदू

लुंड गले तक ले रही थी. जा, शाहिदा. गहरी चुम्बन दे— जुबां के साथ. उसे वह नमकीन

मज़ा चखा जो मैंने तेरे गालों पर छोड़ा था.

अम्मी: (सिसकारी, लेकिन दरवाज़े पर रुक कर) प्लीज, मत करवाओ. यह बहुत गलत है... वह सूंघ

लेगा, या चखेगा. अगर शक कर लिया तो?

गजेंद्र: (धीमे हँसते) नहीं करेगा. बूढ़ा आदमी शायद आधा बेवक़ूफ़ है. लेकिन तू

महसूस करेगी न? हर बार जब उसकी जुबां तेरी छुएगी, याद आएगा मेरा गाला तक कैसे था.

इसलिए चाहता हूँ— तेरी छुपी शर्म, हमारा छोटा खेल.

अम्मी: (आँखों में आंसू, पलट कर) तुम बिलकुल शैतान हो. बिलकुल शैतान. ठीक है मैं जाती

हूँ और उसको चुम्बन दूँगी लेकिन मुझे मत देखो और यह यहीं ख़तम. और नहीं.

गजेंद्र: (उसे जाते देख कर, मुस्कुराते) यह ख़तम नहीं होगा रंडी, अभी जा.

फिर मेरी आँख के किनारे से देखा कैसे अम्मी सीढ़ी उस जगह गयी जहाँ अब्बू बैठा था, अब्बू

हैरान हो गया अम्मी के चेहरे को देख कर, अब्बू कुछ बोलने से पहले, अम्मी झुक कर उसको

चुम्बन दे दिया.

मुझे बहुत घिन आयी लेकिन साथ hi बहुत गरम भी लगा क्योंकि अम्मी सच में मेरे अब्बू को

बर्बाद कर रही थी. वह उसको चुम्बन दे रही थी सिर्फ कुछ मिनट बाद जब उसने गजेंद्र को

ब्लोजॉब दिया था, मुझे अब्बू के लिए बहुत दुःख हुआ, उसको नहीं पता वह क्या चखा रहा है.

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CHAPTER 22

अब मैं मज़ा ले रहा हूँ यह देख कर की मेरी माँ गजेंद्र की रंडी बन

रही है. वह मेरे डैड की ज़िन्दगी बर्बाद कर रही है.

“शाहिदा! गजेंद्र और मैं थोड़ी देर की सैर पे जा रहे हैं. ज़्यादा देर नहीं hogi—shayad आधा घंटा या

उसके aas-paas. बाजार से कुछ चाहिए तो बता देना.”

अम्मी किचन से निकली, हाथों को डिश टॉवल से पोंछते हुए, चेहरा घर की मामूली सादगी का मास्क पहने

हुए. लेकिन मैं देख सकता था उसकी हालत में छुपी bechaini—kandhon की थोड़ी सी तनाव, आँखें एक पल

गजेंद्र की तरफ फिर अब्बू पर ठहरी. “सैर? हुसैन, तुम सच में तैयार हो? डॉक्टर ने कहा था आराम

करना.”

अब्बू ने उसकी फ़िक्रों को मुस्कराहट से ताल दिया, वही मुस्कराहट जो पहले हमेशा उसकी ना को हाँ में

बदल देती थी. “मैं ठीक हूँ, सच में. गजेंद्र सही कह रहा hai—yahaan बैठने से ताक़त नहीं आएगी.

बस गली के कोने तक चलेंगे और वापस.

थक गया तो पलट आएंगे. वादा.” उसने अम्मी के गाल पर हल्का

सा चुम्बन किया, वह नरम एहसास जो मेरे अंदर कुछ मोर देता था, जानते हुए उसके राज़.

अम्मी ने वृंदा से उन दोनों को जाते देखा, बाहें सीने पर बांधे हुए.

वह बिलकुल थकी हुई लग रही थी, कंधे झुके हुए, एक पल के लिए चेहरा हाथों में छुपा लिया. मैं

महसूस कर सकता था वह गन्दगी जो वह लड़ रही thi—Gajendra के साथ के लम्हों की शर्म अभी भी, उसी

दिन किचन के किसी छुपा कोने में जब अब्बू वृंदा पर थे, उसने गजेंद्र का लुंड मुँह में लिया था,

मजबूरी से झुक कर, होंठ उसके ird-gird लपेट कर.

कुछ मिनट बाद वह उठी, जैसे मायूसी झाड़ कर. “मुझे ,,., पढ़नी है,” उसने ज़ोर से कहा, चाहे कोई

सुनने वाला न था. सब कुछ होने के bawajood—haram काम, शादी के वादे का धोका, गजेंद्र के साथ हराम

ख़ुशी में doobna—woh कमरे के कोने में ,,., की जा-,,., पर गयी.

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लेकिन यह सोच का लम्हा दरवाज़े पर तेज़ दस्तक से टूट गया. अम्मी ,,., के बीच रुक गयी, सर उठा कर हैरान.

“कौन हो सकता है?” उसने खुद से कहा, जल्दी से सलाम फेर कर ,,., ख़तम की.

उसने वैल ठीक किया, हाथ से साफ़ किया, और दरवाज़े की तरफ धीरे से गयी. आँखों में फ़िक्र thi—lag रहा था

गजेंद्र hi होगा, जल्दी वापस आ कर कोई बहाना बना कर उसे फिर गुनाह के जाल में खींचना चाहेगा जब

अब्बू बहार हैं. हाथ नॉब पर रुक गया, सांस रुक कर छोटी सी झांकी से देखा.

रहत hui—aur मेरी bhi—woh गजेंद्र नहीं था. दरवाज़ा खोला तो आंटी नफीसा, जाबिर की अम्मी, कड़ी थी,

चेहरे पर गरम मुस्कराहट और हाथ में ढाका हुआ बर्तन. “सलाम, शाहिदा! उम्मीद है डिस्टर्ब नहीं

कर रही. ताज़ा समोसे लायी hoon—jaanti हूँ हुसैन को कितने पसंद हैं, और हॉस्पिटल से अभी निकले हैं तो

थोड़ा मज़ाक चाहिए होगा.”

“सलाम, नफीसा! अंदर आओ, अंदर आओ,” अम्मी ने कहा, साइड होकर रास्ता दिया, लेकिन मुस्कराहट थोड़ी मजबूरी

वाली थी, ,,., और अंदर की लड़ाई से अभी उभर रही थी. दोनों ने हल्का सा गले लगाया, पुराणी दोस्ती की तरह, और

अम्मी उसे सोफे पर ले गयी. “बहुत दिन हो गए तुम आयी नहीं. बैठो. चाय बनाती हूँ.”

नफीसा मेरी दोस्त जाबिर की अम्मी थी, जिस की गर्लफ्रेंड रानी की गांड मैंने मारी थी, वह धोका जो अभी भी रातों

को सताता है. जाबिर मेरा भाई जैसा था, और मैंने उस रिश्ते को सबसे गंदे तरीके से तोड़ diya—Rani की टाइट,

कुंवारी गांड में धक्के मारते हुए जब वह कराह रही थी, तेल लगाकर रास्ता आसान किया, वादा किया की

उसकी कुंवारी जाबिर के लिए बची रहेगी.

यह याद मुझे बीमार कर देती थी, लेकिन नफीसा को यहाँ अम्मी के साथ बात करते देख कर नफरत और बढ़

गयी. मैं उस से नफरत करता हूँ क्योंकि उसने अपने शौहर को धोका दिया था, जो बहार मुल्क में काम कर

रहा है, हर महीने पैसा भेजता है. मैंने देखा था उसको हमारे ***** ट्यूशन टीचर मर. रवि के साथ

चुम्बन करते हुए.

वह गांजा आदमी मोती चश्मे वाला, रात को दरवाज़े par—honthon से होंठ जुड़े, जिस्म चिपके हुए, उसके हाथ

उसके बालों में जैसे उसने अपने वादे पूरे भुला दिए हों. यह मुनाफ़िक़ात थी: मस्जिद के इवेंट्स ओर्गनइजे

करने वाली औरत, नेक बातें सीखने वाली, लेकिन रात को काफिर मर्द के साथ हराम गले लगाती हुई.

और बुरा यह सोच कर की नफीसा अम्मी को गुनाह की तरफ और धकेल देगी. दोनों पुराणी दोस्त थी, चाय पे सालों

से राज़ बांटती thi—shadi की परेशानियां, शौहर के दूर या बीमार होने की तन्हाई. नफीसा का धोका शायद

उन बातों में ज़हर की तरह घुल जायेगा, धोके को मामूली बता कर, कह कर की कहीं और से सुकून लेना

ठीक है.

मैं छुपा दरवाज़े के पीछे, कान लगा कर सुन रहा था. अम्मी अचानक बोली, “बीटा! इधर आओ ज़रा. आंटी

नफीसा आयी hain—ja कर सलाम करो ठीक से.”

मैं मजबूरी से निकला, चेहरे पर मजबूरी वाली मुस्कराहट दाल कर. “सलाम, आंटी नफीसा. आप कैसे हैं?”

“सलाम बीटा! देखो कितना बड़ा हो गया,” उसने गरम आवाज़ में कहा, आँखें माँ जैसी मोहब्बत से, जो

अब मुझे झूठी लगती थी.

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बाद में मैंने कहा, “आंटी नफीसा, आप से मिल कर ाचा लगा, लेकिन होमवर्क ख़तम करना है. माफ़

कीजिये.” मैं पॉलिटेली बहार निकल गया, लेकिन अपने कमरे में दरवाज़ा थोड़ा सा खोल कर छुप कर सुनने

लगा, कान गैप पर लगा कर.

अम्मी: ुम, नफीसा, कुछ दिल पर है. नहीं जानती बोलूं या नहीं...

नफीसा: अरे बेहेन, बोल न. सालों से दोस्त hain—kuchh भी बता सकती हो. क्या परेशानी है? घर की बात?

पैसा? खुल कर बोल, मैं सुन रही हूँ.

अम्मी: इतना आसान नहीं. सोच कर hi शर्म आती है. शायद कुछ और बात karen—mausam ाचा है न आजकल?

नफीसा: शाहिदा, अब ताल मत. जानती हो मैं जज नहीं करुँगी. दोनों shadi-shuda औरतें हैं, पहले भी

राज़ बांटे हैं. जो भी है, हम दोनों के बीच रहेगा. दबाने से और बुरा होगा.

अम्मी: ठीक है... लेकिन वादा करो मुझे काम न समझोगी. मैं... मैं किसी से मिल रही हूँ. सिर्फ मिलना

nahi—affair चल रहा है. हमारे नए पडोसी गजेंद्र के साथ.

नफीसा: क्या? गजेंद्र? बगल वाला *****? हे खुदा, शाहिदा! मज़ाक तो नहीं? (हंसती है) वह, दीवार पार

बड़े लुंड की तरफ! कभी सोचा नहीं था तू इतनी हिम्मत वाली है!

अम्मी: नफीसा! यह मज़ाक नहीं. मैं सीरियस हूँ. बहुत बुरा लग रहा है. प्लीज, हलके में मत लो.

नफीसा: ठीक है, sorry—bas हैरान हो गयी! लेकिन सच बता, कैसे शुरू हुआ? पूरी कहानी सुना, मैं मर

रही हूँ जान्ने के लिए.

अम्मी: बिलकुल मासूमियत से शुरू हुआ. एक महीने पहले वह बगल में शिफ्ट हुए, एक दिन ग्रोसरी मदद की

जब हुसैन हॉस्पिटल में थे. बातें शुरू हुई... वह मेहरबान, दिलकश. फिर एक रात हॉस्पिटल में, जब

हुसैन सो रहा था अपने बिस्तर पर...

नफीसा: हुसैन सो रहा था? वह शाहिदा, कितनी चालाक! क्या हुआ?

अम्मी: हम... हमने चुम्बन किया. वही कमरे में. अचानक, गलत, लेकिन उसके होंठ मेरे पर... रुक नहीं

पायी.

नफीसा: सिर्फ चुम्बन? वह शुरुआत! फिर? पूरा बता.

अम्मी: और गहरा हुआ. अगली बार मैंने... मैंने मुँह से कुछ किया.

नफीसा: ओह्ह्ह, मतलब ब्लोजॉब दिया? बेहेन, बोल न साफ़! सब सोचते हैं कभी न कभी.

अम्मी: हाँ... मैंने चूसा. हॉस्पिटल के स्टोर रूम में. जब मेरा शौहर ऊपर बीमार पड़ा था. बहुत

गुनाह महसूस होता है, नफीसा. उसके साथ धोका, अब जब वह इतना कमज़ोर hai—yeh माफ़ नहीं हो सकता.

नफीसा: (मज़ाक में) वह, जब वह बीमार था? बिलकुल नेक्स्ट लेवल नॉटी, शाहिदा! बेट बुरी लड़की जैसा लगा

होगा न? पडोसी का लुंड चूसती हुई जब बेचारा हुसैन सो रहा था. टस्क टस्क, मस्जिद की औरतें क्या कहेंगी?

अम्मी: बस कर Nafisa—yeh मज़ाक नहीं. रोज़ बुरा लगता है. मैं अच्छी बीवी हूँ, जानती है? ,,., वक़्त पर

पढ़ती हूँ, घर के लिए खाना बनती हूँ, बेटे को अच्छे क़द्रों के साथ पला. हुसैन हमेशा मेहरबान

रहा, सब कुछ दिया. कैसे मैंने उसके साथ धोका किया?

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नफीसा: ठीक है, मज़ाक बंद. लेकिन सुन, शाहिदा तूने कुछ गलत नहीं किया. सच में.

अम्मी: क्या? कैसे कह सकती हो? हम दोनों _ हैं, जीना बारे गुनाह है! सोचा था तू कहेगी तौबा कर,

न की यह...

नफीसा: अरे प्लीज. सच बोलने पर तनक़ीद मत कर. देख, हुसैन महीनों से बीमार है न? शायद तुझे

छुआ भी नहीं. तू औरत है, ज़रूरतें हैं, गजेंद्र उन्हें पूरा कर रहा है. घर छोड़ तो नहीं रही—

हुसैन के लिए अभी भी हूँ. कभी कभी साइड का मज़ा मैं शादी को चलाये रखता है.

अम्मी: नफीसा, यह तेरे मुँह से सुन कर हैरान हूँ. हमारा ईमान? किताब साफ़ कहती है जीना हराम है.

हमें अपनी नेक राखी है.

नफीसा: नेक? है! सब औरतें फ़रिश्ते बनने का दिखावा करती हैं, शाहिदा, लेकिन अंदर से सब रंडियां हैं.

स्कार्फ़ के पीछे छुप कर नेक बनती हैं, लेकिन मौका मिले तो सबसे पहले मज़ेदार चीज़ पर झपटती हैं. यह

इंसानी फितरत है.

अम्मी: यह... यह बहुत ज़्यादा है! कैसे कह सकती हो? हम सब ऐसे नहीं.

नफीसा: सच में? याद है हमारी दोस्त फातिमा? हमेशा पर्दा की बात करती थी, लेकिन पिछले हफ्ते डिलीवरी वाले

से फ़्लर्ट करते देखा. और मस्जिद वाली आंटी जो सब जानते हैं उसके भाई के दोस्त के साथ सोती है. हमारे

मोहल्ले में भी यह हर जगह है. औरतें दुनिया के दर से दिखावा करती हैं, लेकिन ख्वाहिश दिल में होती

है.

अम्मी: हाँ... कुछ तो सही कह रही हो. मैंने भी देखा है औरतें चुपके राज़ बांटती हैं. और गजेंद्र

के साथ... कुछ आज़ादी जैसा लगता है. लेकिन फिर भी गुनाह...

नफीसा: बिलकुल! थोड़ा क़ुबूल कर. जब तक किसी को पता न चले कोई नुकसान नहीं. और bata—Gajendra तुझे ज़िंदा

महसूस करता है? हुसैन से ज़्यादा?

अम्मी: कभी कभी हाँ. यह जोश नशा है. लेकिन रूह की फ़िक्र होती है, जन्नत की.

नफीसा: जन्नत इंतज़ार करेगी. अभी थोड़ा जी ले बेहेन. अगली बार मुझे बुला लेना, मैं डिटेल सुन्ना चाहती

हूँ की वह “पडोसी मदद” कितना बड़ा है! (आँख मार कर)

अम्मी: नफीसा, तू ऐसे क्यों बोलती है? जैसे कोई और hi बन गयी है. हम साथ बड़ी हुई, ,,., साथ padhi—kaise

ईमान को इतनी आसानी से ताल देती है?

नफीसा: क्योंकि मैं जाग गयी हूँ, शाहिदा. और चूँकि राज़ बाँट रहे हैं... मेरा भी अफेयर चल रहा है.

मर. रवि के साथ, मेरे बेटे जाबिर के कॉलेज प्रिंसिपल के साथ. हाँ, वह खूबसूरत आदमी. महीनों से चल

रहा है.

अम्मी: क्या?! नफीसा! मर. रवि? जाबिर का प्रिंसिपल? अपने शौहर के साथ यह कैसे कर सकती है? वह बहार मुल्क

में म्हणत कर रहा है, पैसा भेज रहा है, बच्चों के लिए क़ुरबानी दे रहा है. यह धोका है!

नफीसा: धोका? अरे. मेरा शौहर सालों से दूर है, वहां घुलम की तरह काम कर रहा जब मैं यहाँ सब

संभल रही हूँ. हमारा मज़हब हमारी ख्वाहिशों को दबा देता है, शाहिदा, कहता है यह आग अंदर

दबाओ जैसे गुनाह हो. लेकिन गुनाह नहीं! रवि मुझे ज़िंदा महसूस करता है, चाहा जाता है. मैं इस लायक

हूँ.

अम्मी: तेरी अख़लाक़, नफीसा... कहाँ गयी? तू बहुत बदल गयी. हम साथ रोज़ा रखते थे, किताब पढ़ते थे. अब

तू जैसे कोई gair-mulki औरत बिना शर्म की बात कर रही है. कैसे जस्टिफाई करती है?

नफीसा: अख़लाक़? है! सुन behen—pichle हफ्ते parent-teacher मीटिंग के बाद मैंने रवि का लुंड उसके ऑफिस में

चूसा. मोटा, धड़कता, मेरे शौहर के दिए से बेहतर. फिर उसने मुझे डेस्क पर झुकाया और ज़ोर से छोड़ा,

तीन बार झड़वाया. रवि बिस्तर पर खुदा hai—aurat को संभालना जानता है, जैसे यह दबाये हुए _

मर्द नहीं.

अम्मी: बस! यह गन्दी बातें नहीं सुन्नी नफीसा. या खुदा, मेरे कानों की हिफाज़त कर. अपने घर soch—tera

बीटा जाबिर उस प्रिंसिपल को पूजता है. और तेरा शौहर... यह सब पाक चीज़ों को बर्बाद कर रहा है.

नफीसा: पाक? अरे शाहिदा, सच bol—jab गजेंद्र ने तुझे छोड़ा तो कुछ बिजली सी नहीं लगी? वह जोश, जिस्म

दिमाग को धोका देता हुआ?

अम्मी: नहीं, मैं... उसके बारे में बात नहीं करुँगी. यह प्राइवेट है, गुनाह है. कुछ और बात करें.

नफीसा: अरे नहीं. बोल न. मैंने अपना गन्दा बता दिया, अब तेरी बारी. कैसा लगा? गर्मी, धक्के... बेट तारे

दिखे होंगे.

अम्मी: ठीक है... ओवरव्हेल्मिंग लगा. गजेंद्र के हाथ मेरी कमर पर, गहरे धक्के, मेरी मर्ज़ी के

खिलाफ कराह निकल रही थी. जिस्म झुक कर ख़ुशी की लहरें, जब दिल हराम चीख रहा था. इतना भरा हुआ

महसूस हुआ, चाहा जाना... लेकिन क़बूल करना भी बुरा लगता है. मुझे गन्दी महसूस होती हूँ.

नफीसा: गन्दी? यह hi तो मज़ा है! और bata—paon के उँगलियाँ मोर गयी? वह जगह मारी जो तेरा शौहर

कभी नहीं मार सका?

नफीसा: क्योंकि इक़रार करने में मज़ा आता है. अब सच bol—kya तू रात को सो पाती है बिना गजेंद्र के

लुंड के ख्याल के? घर के काम करते वक़्त भी टांगो के बीच खुजली नहीं होती?

अम्मी: ...नहीं. Palat-ti रहती हूँ, सब याद आता है. बर्तन धोते वक़्त भूत जैसे हाथ महसूस होते

हैं. ,,., पढ़ते वक़्त दिमाग उसके लुंड पर चला जाता है. जैसे मैं नशा कर रही हूँ. ज़ोर से

बोलने से और बुरा लगता है.

नफीसा: देखा? यह असली छिनाल और रंडी की निशानी है, शाहिदा. क़बूल kar—tera जिस्म और मांग रहा है.

अम्मी: नफीसा, जुबां संभल! यह हद्द से ज़्यादा है. मैं ऐसी nahi—main अम्मी हूँ, बीवी. यहाँ सख्त

हद्द है.

नफीसा: हद्द से ज़्यादा? सच का जवाब नहीं दे सकती. तेरी छूट झूठ नहीं बोलती. यह सारा गुनाह सिर्फ समाज

की बात है. अंदर से तू यह चाहती है, बिलकुल मेरी तरह.

अम्मी: लेकिन... सब _ औरतें? आबय में दिखावा, अंदर से छिनाल? यह सब पर चढ़ा देना है.

सब ऐसे नहीं.

नफीसा: अरे, सब ऐसे hi हैं. इधर उधर dekh—hamari चाचियां "दीनदार" बहनों के बारे में चुगली

करती हैं जो चुपके निकल जाती हैं. तेरी वह कजिन जो एक्स से मैसेज पकड़ी गयी? हम सब एक जैसे बने

हैं, शाहिदा. ईमान हमें बांधता है, लेकिन ख्वाहिश टूट कर निकल आती है. क़बूल kar—tu महसूस

करती है जैसे जीन ने सवार कर लिया है, न?

अम्मी: हाँ... महसूस होता है जैसे सवार हो गया हूँ. यह ख्वाहिश अचानक आती है, गजेंद्र के

ख्याल से गीली हो जाती हूँ. क्यों मैं? क्यों अब? जैसे शैतान खुद डोर खींच रहा हो.

नफीसा: बिलकुल! लेकिन शैतान nahi—tu खुद, आखिरकार ज़िंदा हुई. दबाओ तो मुरझा जाएगी. क़बूल कर तो

ज़िन्दगी पहात पड़ेगी.

अम्मी: नफीसा, क्या तू सच में छिनाल है? इतनी बेझिझक बोल रही...

नफीसा: बिलकुल हाँ, मैं छिनाल हूँ. लेकिन अच्छी wali—raaz रखती हूँ. मेरा शौहर नहीं जानता, जाबिर

को भी कुछ पता नहीं. फिर भी ,,., पढ़ती हूँ, खाना बनती हूँ, बहार से परफेक्ट बीवी. राज़ यही

है: मज़ा लो बिना ज़िन्दगी बर्बाद किये.

अम्मी: लेकिन यह मुनाफ़िक़ात नहीं? दो ज़िंदगियाँ जीना?

नफीसा: मुनाफ़िक़ात? होशियारी. ज़िन्दगी बर्बाद मत कर, शाहिदा. तू गरम hai—abaya के नीचे बड़ी

गांड हिलती है, चूचियां जो ट्रैफिक रोक दें. इनका इस्तेमाल होना चाहिए, पूजा होना चाहिए. बीमार

शौहर पर बर्बाद मत कर जो तुझे सटिस्फी नहीं कर सकता. ज़िन्दगी छोटी hai—maza उठा जब मौका है.

अम्मी: मेरी शकल? नफीसा, यह चीज़ों को ऑब्जेक्ट बनाना है. लेकिन... सुन कर कुछ हिल गया. हुसैन की

बिमारी ने मुझे इतने दिनों से तनहा छोड़ दिया.

नफीसा: देखा? हिल gaya—yeh आग है. सोच गजेंद्र हर चउरवे की तारीफ करे, तुझे देवी जैसा महसूस

कराये. तेरा शौहर? प्यारा है, लेकिन बोरिंग. ईमान के नाम पर सेक्सलेस क़ब्र मत जा.

अम्मी: शायद... लेकिन अगर सब बर्बाद हो गया तो? खतरा...

नफीसा: खतरा hi मज़ा देता है.

अम्मी: लेकिन... यह ख्याल दिल की धड़कन तेज़ कर देता है. तू मुझे और बिघाड रही है, नफीसा.

नफीसा: बता, सोचा है हुसैन सोये हुए वक़्त उसको बुला लून? चुपके से अंदर, बैडरूम में उसके बगल

में उस पर सवार हो जॉन.

अम्मी: मैंने... ख्याल किया है. उसके मज़बूत बाहों में दबना, जब हुसैन खर्राटे ले रहा हो. खतरा

मुझे और ज़्यादा उत्साहित करता है.

नफीसा: बस यह! मेरी लड़की. अब रवि के बारे mein—uske जुबां का एक जादू है जो...

अम्मी: नफीसा, डिटेल्स बस! लेकिन ठीक है, बोलती ja—jaanti हूँ कैसे तू सब बैलेंस करती है बिना गुनाह

महसूस किये.

नफीसा: मैं इसे बेहतर सेक्स में बदल देती हूँ. पिछली बार रवि ने मेरे hi दुपट्टे से हाथ बंधे—

रमज़ है न? उस कपडे से आज़ादी जो हमें बांधता है.

अम्मी: यह... क्रिएटिव है. और ट्विस्टेड. क्या जाबिर को कॉलेज में शक है?

नफीसा: बिलकुल नहीं. रवि क्लास में उसको "एहसान" के तौर पर एक्स्ट्रा मदद देता है. Jeet-jeet. लालच अच्छा

है. ज़िन्दगी अफ़सोस के लिए बहुत छोटी है, शाहिदा. अगली ,,., में गजेंद्र को याद कर, देख कैसा लगता

है.

अम्मी: कुफ्र! लेकिन... क़बूल करती हूँ, मेरी ,,.,ें हाल hi में भटक रही हैं. शायद हम सब थोड़ा

सवार हुए हैं.

नफीसा: पैशन के जीन से.

अम्मी: नफीसा, क्या तू मुझे सच में छिनाल मानती है इस सब के लिए? अंदर से महसूस होता है मैं एक

हूँ. उसके साथ जैसे मैं कण्ट्रोल खो देती हूँ.

नफीसा: (हँसते हुए) अरे शाहिदा, अगर जूता फिट बैठता है! लेकिन सीरियसली, हर औरत में छिनाल पैन होता

है. खुद को क्यों सजा देती है? क़बूल kar—lagta है तू ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मज़ा ले रही है.

अम्मी: यह मज़ाक नहीं, नफीसा. रुक नहीं सकती, चाहे कोशिश कर लून. जब गजेंद्र के साथ होती हूँ, बहार

से मन करती हूँ, हराम बोलती हूँ, लेकिन सच में... उसका लुंड इतना चाहती हूँ. मोटा, नसें भरा, और

कैसे मुझे भर देता hai—maaf कर, लेकिन दिन भर सोचती रहती हूँ, ,,., के वक़्त भी.

नफीसा: (ज़ोर से हँसते) लुंड चाहती है? लड़की, अब तो पोर्न स्टार की तरह बोल रही! यह तो मज़ाक hai—deendar

शाहिदा ,,., में पडोसी के लुंड के ख्याल में खोयी हुई. बोलती जा, यह सुना है.

अम्मी: हसना बंद कर! यह सीरियस है. महसूस होता है जैसे जीन कण्ट्रोल कर रहा हो, और मांग रहा हो.

और सिर्फ... आम चीज़ नहीं. उसने... कुछ और किया. बोल नहीं सकती.

नफीसा: क्या, गांड चुदाई? बोल न. क्या उसने तेरी गांड मारी, शाहिदा? यह हिंट दे रही है न?

अम्मी: हाँ... उसने मेरी गांड मारी. वही, ज़ोर ज़ोर से धक्के मारे जैसे मैं कुछ नहीं. पूरा वक़्त

कराह रही थी, चाहे पहले दर्द हुआ.

नफीसा: वह, गांड? हैरान हूँ! सोचा नहीं था तू इतनी आगे जाएगी, बेहेन. यह तो अगली सतह की छिनालपन

है. बेट बहुत मज़ा आया, हाँ?

अम्मी: आया... और यह सबसे बुरा है. मुझे उसकी be-izzati पसंद आती hai—meri गांड सूंघना, मुझे

गन्दी _ रंडी कहना, मिन्नत करवाना. यह क़बूल करना शर्मनाक है, लेकिन यह मुझे कुछ

और नहीं उत्साहित करता.

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नफीसा: हुमिलिएशन किंक? वह शाहिदा, तू तोह बड़ी सुरपरिसेस भरी है. लेकिन सुन, एक बार गांड मरवा ली

तोह वापस उस नार्मल दीनदार औरत बनने का कोई रास्ता नहीं. जैसे एक लाइन पार कर li—ab पलट नहीं सकती.

अम्मी: क्यों? क्या मतलब? मैं तौबा कर सकती हूँ न? ज़्यादा ,,.,, ज़्यादा रोज़ा...

नफीसा: तौबा? हां! _ औरतें जो अपनी पीछे वाली में मर्द को जाने देती हैं? वह हमेशा के

लिए निशाँ लग जाती हैं. पाकिज़ागी gayi—ab तू सिर्फ छिनाल है, सीधा सीधा. हमारा मज़हब मॉडेस्टी

की बात करता है, लेकिन गांड? यह तोह सीढ़ी गन्दगी है, वापस नहीं आती. तू हमेशा यह be-izzati की

ख्वाहिश करेगी, चुपके से रंडी की तरह घूमती रहेगी.

अम्मी: यह बहुत सख्त है, नफीसा. लेकिन... शायद तू सही है. उसका लुंड मुझे सत्ता रहा hai—ghanton बाद

भी मुँह में मज़ा, गांड में फैलने का एहसास. कुछ मेरा जिस्म पर क़ब्ज़ा कर लिया है; मैं खुद को

छूती हूँ उसकी be-izzati सोच कर, जब हुसैन बगल के कमरे में हो.

नफीसा: देखा? तेरी बोरिंग हाउसवाइफ बनने की साड़ी उम्मीदें बर्बाद. ईमान वैसे भी बेकार hai—paanch

वक़्त ,,.,, पर्दा, फरिश्ता बनने का नाटक. ज़िन्दगी मज़ाक के लिए है, शाहिदा! छोटी खुशियां ले, लुंड

ले, ज़िंदा महसूस कर. इबादत की परवाह किस को जब यह ख़ुशी इतनी अच्छी लगती है?

अम्मी: तू मुझे बर्बाद करना चाहती है न? मुझे गुनाह में और गहरा धकेल रही है. मैं अच्छी बीवी

थी, वफादार अम्मी...

नफीसा: बर्बाद? बिलकुल nahi—main तुझे आज़ाद कर रही हूँ! वह सारा दीनदार नाटक क़ैद था. क़बूल कर:

तुझे उसकी छिनाल बनने में मज़ा आता है. वापस जाने की उम्मीद छोड़ de—ek बार गांड मरी और

be-izzati हुई तोह तू लटक गयी. अंदर की रंडी को गले लगा; जन्नत के वादे से ज़्यादा मज़ा तोह यह है.

अम्मी: शायद तू सही है. मैं सपने देखती हूँ उसके लुंड के मुझे क़ब्ज़ा करने के, हर गन्दी सोच पर

कण्ट्रोल. लेकिन मेरा बीटा? हुसैन? मेरी रूह?

नफीसा: उनको एक पल के लिए भूल जा. हमारा मज़हब सिर्फ मर्दों के बनाये क़ैद के रूल्स हैं. मैंने इमाम

को भी रखेलें रखते dekhe—sab मुनाफ़िक़. तू ख़ास नहीं; सीक्रेट छीनलों के क्लब में आ जा. अब तेरे लिए

कोई पाकिज़ागी नहीं बची, शाहिदा. अगली be-izzati का टाइम फिक्स कर ले. तेरा असली नाम है "गजेंद्र की छिनाल"

अम्मी: नफीसा, बस कर... लेकिन इंकार नहीं कर सकती. पिछली बार उसने मेरे बॉल्स चाटवाये जब मुझे

िमानहीं कुटिया बोलै. Be-izzati थी, फिर भी मैं पहले से ज़्यादा ज़ोर से झड़ी. मैं बर्बाद हो गयी न?

वापस नार्मल का कोई रास्ता नहीं.

नफीसा: पूरी तरह barbaad—aur इसमें मज़ा ले रही! बता, क्या वह तुझे वैल पहने हुए छोड़ता है? वह

तोह गरम होगा.

अम्मी: कभी कभी हाँ. वह वैल साइड करता है, कहता है यह मुझे पवित्र रंडी बनता है. मैं इतनी

नंगी, इतनी गुनहगार महसूस करती हूँ. क्यों यह उत्साहित करता है?

नफीसा: क्योंकि नार्मल ज़िन्दगी सोती है. आगे बढ़ behen—imaan को पूरा बर्बाद कर दे. अगली बार पकडे

जाने की कोशिश कर; वह थ्रिल सबसे बेहतर है.

अम्मी: नहीं! यह बहुत दूर है... लेकिन सोच... ओह नहीं, तूने मेरे साथ क्या कर दिया?

उस रात, जब घर शाम के रूटीन में डूब गया, हवा में छुपी बेचैनी घुल गयी. डिनर चुप था

—चिकन करी और चावल, अम्मी की खास dish—lekin बाद में जब अब्बू और मैं सोफे पर क्रिकेट मैच

देख रहे थे टीवी की चमकती रौशनी में, अम्मी का फ़ोन जेब में धीमे से विबरते हुआ.

उसने जल्दी देखा, चेहरा थोड़ा सफ़ेद पद गया, फिर फ़ोन छुपा लिया. गजेंद्र का था, मैं जानता था

—शायद उसके घर बुलावा, मीठी बातों में लपेटे वादे या हुक्म.

अब्बू ने उसकी बेचैनी देखि, कुर्सी पर हिलती हुई, आँखें घडी पर. "शाहिदा, आज रात तू थोड़ी अलग लग

रही है. सब ठीक? तू जुम्पी है, जैसे कुछ इंतज़ार कर रही हो. हॉस्पिटल से फ़ोन आया क्या फिर?"

अम्मी ने मजबूरी से हांसे, वैल के नीचे बाल ठीक किये. "अरे कुछ नहीं हुसैन. दिन भर थक गयी

हूँ बस. नफीसा आयी थी, अच्छा लगा लेकिन याद दिला दिया कितना काम बाकी है. शायद जल्दी सो जॉन." वह

उठी, ड्रेस ठीक की, लेकिन बहाना खोखला था, हाथ थोड़े कांप रहे थे जब टेबल साफ़ करती रही.

अब्बू ने सर हिलाया, लेकिन माथा सिकुड़ गया फ़िक्र से. "जैसे तू कहे. लेकिन अगर कुछ परेशां करे तोह

बता देना. हमने साथ बहुत कुछ saha—bimaari, पैसों की टेंशन. हम टीम हैं." उसके लफ्ज़ प्यार भरे

थे, जो उनकी शादी को संभाले हुए थे, लेकिन अम्मी ने सिर्फ हलकी मुस्कराहट दी और किचन की तरफ चली गयी.

रात के अँधेरे में वह चुपके निकल गयी, अब्बू मैच में खोये हुए थे तोह इंतज़ार किया. "मैं थोड़ी

ताज़ी हवा ले आती हूँ, हुसैन. जल्दी वापस," वह धीमे से बोली, लेकिन उसने सुन्ना भी नहीं, विकेट पर चीयर

कर रहा था.

मैं उसके पीछे गया, अब छुपने की आदत पद gayi—saya मेरा साथी, दूर से पीछे, दिल तेज़ धड़क रहा

दर और उस बीमार थ्रिल से. क्यों करता था मैं यह? उसे बचने के लिए?

या और देखने के लिए? सड़कें हलकी रौशनी वाली, नमी भरी हवा में कीड़े गूँज रहे थे, वह तेज़ चल

रही थी, कभी पीछे मुद कर देखती लेकिन अँधेरे में मुझे नहीं देखा. गजेंद्र का घर सामने था,

दो मंज़िला, साफ़ लॉन वाला, हमारे छोटे मकान से बिलकुल अलग.

उसने धीमे से दरवाज़ा खटखटाया, तीन बार, दरवाज़ा तुरंत खुला. गजेंद्र वहां खड़ा था, साफ़

नीली शर्ट ब्लैक पंत में, बाल ठीक, चेहरे पर शिकारी मुस्कराहट.

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"शाहिदा, तू आयी. अच्छी लड़की. जल्दी अंदर aa—koi देख न ले." वह तेज़ अंदर गयी, पकडे जाने के दर से,

दरवाज़ा बंद हुआ.

मुझे झाँकने की जगह पता thi—side की खिड़की जहाँ पर्दा थोड़ा खुला, झाड़ियों के पीछे छुपा जहाँ

मैं पहले खड़ा हुआ था. वहां पहुँच कर पोजीशन ली, थ्रिल बढ़ता गया गुनाह के बावजूद.

अम्मी: (बेचैन, उसकी नज़र से बचती, आवाज़ ठंडी) देख, मैं उस बारे में बात नहीं करना चाहती. यह

ख़तम होना चाहिए, गजेंद्र. जो भी यह... चीज़ है हमारे बीच, ख़तम. मैं थक गयी. यह मुझे

बर्बाद कर raha—meri शादी, मेरा ईमान, सब कुछ. मैं हुसैन को और धोका नहीं दे सकती. वह अच्छा

आदमी है, मैं उससे प्यार करती हूँ. हमारे घर को बर्बाद होने से पहले रुकना है.

गजेंद्र: (धीमे से हँसते, दीवार से टिक कर, बाहें बांधे) ख़तम? वह औरत कहती है जो रात के

बीच में मेरे दरवाज़े पर आयी, बीमार शौहर को झूठ बोल कर. अगर सच में ख़तम करना होता तोह

नहीं आती. क़बूल कर, Shahida—tu यह चाहती है. खुद को गुनहगार बता रही है, लेकिन यहाँ है.

अम्मी: (कमज़ोर से, सर हिलाती) नहीं, यह सच नहीं. मैं... मजबूर थी. तूने मैसेज किया कुछ ज़रूरी है

बोलै, मैंने सोचा मोहल्ले की वाच या कुछ मासूम. मैंने प्लान नहीं किया. प्लीज, जो भी है दे दे और जाने

दे.

गजेंद्र: (भौं उठा कर, मज़ा लेते) मोहल्ले की वाच? यह बहाना? कमज़ोर, शाहिदा. एक महीने से चल रहा

hai—hospital में चुम्बन, स्टोर रूम में चूसना, तेरी गन्दी गांड को जानवर की तरह छोड़ना. अब नाटक

कर रही एक्सीडेंट? वैसे हुसैन कैसा है? अभी भी बीमार से उभर रहा जब तू चुपके घूम रही?

अम्मी: (सांस छोड़ कर, घडी देखती) वह बेहतर है, घर पर आराम. आज उसने मेरे बेटे के बारे में बात

ki—kitna फख्र है उस पर. घर वाली बातें, जानती है? नार्मल ज़िन्दगी. इस गन्दगी के उलट. उनको इसमें मत

घसीटो? बस... तू मुझे यहाँ क्यों बुलाया?

गजेंद्र: (सर हिलाते) हाँ, वह "कुछ ज़रूरी". रुक. (किचन काउंटर पर गया, छोटा पॉलिथीन बैग

उठाया जिसमे सफ़ेद पाउडर भरा, उसे दिया) ले. यही था जो लेने आयी थी.

अम्मी: (बैग लेते हुए, शक से देखती) यह क्या है? पाउडर जैसा लग रहा... आता? क्यों दे रहा है? और रात

में? बता, गजेंद्र. यह समझ नहीं आ रहा.

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गजेंद्र: (शैतानी मुस्कराहट) यह आता नहीं, शाहिदा. यह खास सेडेटिव hai—nuksaan नहीं, लेकिन काम

करता है. आज रात का प्लान अलग है. मैं तुझे तेरे hi घर में छोड़ना चाहता हूँ, हुसैन के साथ.

सोच thrill—woh लिविंग रूम में बेहोश, और हम बैडरूम में, तू मेरे नीचे कराह रही.

अम्मी: (आँखें फैल कर, पीछे हटी) क्या? बिलकुल नहीं! पागलपन है, गजेंद्र. मेरा घर? शौहर के

साथ? इंकार. बहुत खतरा, बहुत गलत. अगर वह जाग गया तोह? या बीटा सुन लिया? नहीं, मैं नहीं करुँगी.

गजेंद्र: (कंधे उचकाते, ज़िद से) अरे आसान है. रात को सोने से पहले चाय में थोड़ा sa—ek chutki—daal

देना. घंटों बेहोश, कोई दर्द नहीं, याद नहीं. पीछे के दरवाज़े से अंदर, जानवर की तरह चुदाई, और

सुबह होने से पहले मैं निकल जाऊंगा. तूने इससे बुरा कर chuki—ab क्यों रुकना?

अम्मी: (आवाज़ मज़बूत लेकिन कांप रही) क्योंकि मैं वैसी औरत नहीं हूँ, गजेंद्र. मैं अच्छी बीवी हूँ,

दीनदार _. रोज़ ,,., पढ़ती हूँ, रोज़ा रखती हूँ, अपने बेटे को क़ुरान पद्धति हूँ. यह पाउडर

वाली बात? अपने शौहर को नशे में देना? यह वह हद्द है जो मैं भी पार नहीं करुँगी. प्लीज, इसे

वापस ले लो.

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते हुए, पास आते हुए) अच्छी बीवी? दीनदार? ओह शाहिदा, यह नाटक बंद कर. तू

अच्छी नहीं— तू धोकेबाज़ रंडी है जिसने उसे बढ़ा बार धोका दिया. हॉस्पिटल याद है? जब वह ऊपर सो रहा

था तब मेरा लुंड चूस रही थी? या पिछले हफ्ते, मेरी गांड की बू सुंघवाने दी, गरम कुटिया की तरह

कराह रही थी? तूने उसके साथ और बुरा किया— मेरा छुम मुँह में रखे उसको चुम्बन दिया. तू गन्दी है,

मुनाफ़िक़ जो वैल के पीछे छुपी है.

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अम्मी: (कांप कर, आवाज़ कमज़ोर) यह... यह इन्साफ नहीं. तब मैं कमज़ोर थी. परेशां थी. लेकिन अब मुझे

सब पर अफ़सोस है. प्लीज, ऐसे बातें मत करो.

गजेंद्र: (ज़ोर देते हुए, मज़ाक उड़ाते) अफ़सोस? बकवास. तूने अपने टांगें मेरे लिए फैलाई, ***** पडोसी

के लिए, जब घर में दीनदारी की बातें सिखाती थी. बीमार शौहर को धोका दिया जब उसे सबसे ज़्यादा

ज़रूरत थी.

मेरे मुँह, मेरी छूट, और वह गन्दी गांड जहाँ से टट्टी निकलती है— खुद को be-izzat किया और

हर पल मज़ा लिया. तू छिनाल है, शाहिदा. गन्दी _ छिनाल जो पिछले हफ्ते झड़ने से भी तेज़ बर्बाद

हुई. तेरा इमाम क्या कहेगा? या तेरा बीटा अगर जान ले उसकी अम्मी लुंड की भूखी रंडी है? अब मुझे चुम्बन

दे.

अम्मी: (मममम, उसको चुम्बन करते हुए, बैग पकडे) बस... बस करो. तू सही है, ठीक है? मैंने बहुत बुरी

चीज़ें की हैं. लेकिन अब मेरे पास कोई चारा नहीं, है न? तू मुझे जाने नहीं देगा जब तक मैं मान

न लून.

गजेंद्र: (जीत के मुस्कुराते हुए) बिलकुल. तो पाउडर ले, उसकी चाय में दाल जैसे मैंने कहा— बस थोड़ा सा,

अच्छे से घुमा. वह बच्चे की तरह सो जायेगा. फिर जब हो जाये मुझे कॉल करना. हम उसके नाक के नीचे

मज़ा करेंगे.

अम्मी: (हार मानते हुए सर हिलाती, आँखें पोंछती) ठीक है... मैं करुँगी. बाद में कॉल करुँगी.

लेकिन यह आखरी बार है, गजेंद्र. वादा करो.

गजेंद्र: (उसे जाते देख कर, पीछे से पुकारते) आखरी बार? बिलकुल नहीं, तू वैली छिनाल. गन्दी रंडी,

मेरा पाउडर हाथ में ले कर शौहर के पास भाग रही है. निकल, छिनाल— जा उसको नशे में दाल मेरे

लिए. पहले चुम्बन दे. (उसने ज़ोर से चुम्बन किया)

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अम्मी: (दरवाज़े पर रुक कर, पीछे मुद कर नहीं देखती, आवाज़ धीमी) अलविदा, गजेंद्र. (वह निकल गयी,

दरवाज़ा धीरे से बंद करते हुए.)
 
CHAPTER 23

मैं अपनी माँ पर फख्र करता हूँ, उसने हमारे पाक घर को एक रंडीखाना बना

दिया है और मैं इसे देख कर मज़ा ले रहा हूँ.

मैं पहले घर भगा, पीछे के दरवाज़े से अंदर घुस गया ताकि शक न हो, दौड़ने से सांसें फूल रही थी.

उस रात हमने बची हुई चीज़ें गरम करके खायी, माहौल आम सा था, लेकिन नीचे से तनाव उबाल रहा था.

उसके बाद अब्बू और मैं सोफे पर क्रिकेट देखने बैठ गए, टीवी की रौशनी कमरे में हलकी चमक रही थी.

“बहुत ज़बरदस्त मैच था न, बीटा?” अब्बू ने पीछे टिक कर ख़ुशी से सांस ली. “कुछ नहीं होता अच्छे मैच से

दिल बहलाने के लिए.”

मैं ने हाँ में सर हिलाया, लेकिन अंदर से उनके लिए बहुत दुःख hua—gehra दुःख. यह वह मर्द था जिसने हमारे

घर के लिए din-raat म्हणत की, बिमारी से लड़ते हुए भी इज़्ज़त से, अपनी बीवी पर पूरा भरोसा किया. जिसे उन्होंने शादी

में चुना, अम्मी, उनकी बुनियाद थी, लेकिन अब वह घर में hi धोका साज़िश कर रही थी.

यह दिल चीयर रहा था: अब्बू की मासूम हसी जब बाउंड्री लगी, हाथ घुटने पर प्यार से थपकी, सब कुछ जब उन्हें

मालूम नहीं था की उनके लिए नींद की दवा तैयार हो रही है. उनकी बनायीं ज़िन्दगी, ईमान जो वह पकड़ते थे, सब

राज़ से टूट रहा था. वह औरत जिसे वह प्यार करते थे, नरम मुस्कराहट और घर का खाना बनाने वाली, गुनाह

में डूब रही थी, और उनकी अनदेखी नीचे से मुझे दर्द दे रही थी.

यह गुनाह और गहरा हो gaya—Abbu ने कितना कुछ क़ुर्बान किया, मुझे कॉलेज भेजा, daadi-dada की मदद की, सब अपनी

छोटी दूकान की कमाई से. और अम्मी, जिसे उन्होंने अर्रंगे मैरिज में चुना, साथ ,,.,, घर के इफ्तार बनाये—

उसने यह सब हराम कामों से लौटा दिया. मुझे धोके का दुःख, उनके रिश्ते के टूटने का दुःख, अब्बू के घर में hi

कमज़ोर होने का दुःख.

मैं ने अब्बू से इजाज़त ली. “मैं अम्मी को देखने जाता हूँ, किचन में मदद चाहिए तो.” उन्होंने हाथ हिला दिया.

“अच्छा बीटा. उससे कह देना चाय तैयार है अगर पीना चाहे.”

किचन में देखा अम्मी को, पिंक ड्रेस में उसकी बड़ी गांड हिल रही थी जब वह हिल रही थी, कपडा उसके कर्व्स से

चिपका हुआ. वह अब्बू की चाय में पाउडर दाल रही थी, सफ़ेद दाने चुपके से घुल रहे थे. उस वक़्त मुझे इसमें कोई

गलत नहीं लगा.

खुदगर्ज़ी से मैं चाहता था की गजेंद्र उसको चोदे जब अब्बू घर में सो रहा हो, यह थ्रिल मोरालिटी से ज़्यादा था

. मेरे मैनर्स कहाँ गए? क्योंकि नशा मुझे पकड़ चूका tha—chhup कर देखने का नशा, हराम चीज़ों का नशा.

मुझे अब्बू को बताना चाहिए था, अंदर घुस कर सब खोल देना चाहिए था, उनकी be-izzati बचानी चाहिए थी. लेकिन

नहीं, मैं चुप खड़ा देखता रहा, उसकी तरफ देखते हुए जब वह लिविंग रूम की तरफ चुपके से देखती थी, हाथ से

चमचा हिलती रही ताकि गांठे न बने. वह बार बार पीछे देखती, होंठ काट टी फ़िक्र से, लेकिन डालती रही,

काम चुपके से पूरा करती रही.

वह चाय धीरे से हिलती रही, चमचा मेटल के साथ हलकी खनक पैदा कर रहा था. हर कुछ सेकंड में सर

थोड़ा घूमती, आँखें लिविंग रूम की तरफ झुकाती जहाँ अब्बू कमेंटेटर की मज़ाक पर हांसे हुए थे,

यकीन करने के लिए की उन्होंने कुछ नोटिस नहीं किया. फिर भी वह डालती रही, हिलती रही, पाउडर को

पूरा घुलने देती रही जब तक वह बिलकुल घुल नहीं गया गरम चाय में.

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मैं वहां खड़ा देखता रहा, चुप, हिलता नहीं. यह नज़ारा मुझे इतना डरना चाहिए था की चीख

पड़ता, कप हाथ से छीन लेता, सवाल करता. लेकिन मैं वही जैम गया, उसके जिस्म की हरकत देख

कर, पहले से सोच रहा था अगर गजेंद्र आया तो बाद में क्या होगा. यह खुदगर्ज़ी मुझे घिन भी दे रही थी लेकिन मुझे बंधे रखे हुए थी.

मेरे मैनर्स ख़तम हो गए थे, शर्म ख़तम, वह मर्द जो मुझे पला था उसकी हिफाज़त का जज़्बा

ख़तम. पहले मैं बिना सोच के अब्बू के पास दौड़ता, खतरे को तुरंत खोल देता. अब अंदर तक बिगाड़ बैठ

गया था; मैंने बहुत सी हराम चीज़ें देखि थी, अँधेरे में बहुत सी हद्दें पार की थी, और कुछ हिस्सा

चाहता था की यह कितना आगे जायेगा.

मैं ने उसको खुद से बात करते सुना, यह वह लफ्ज़ थे जो मैंने सुना...

ओह खुदा, मैं यहाँ हुसैन की चाय में गजेंद्र के दिए पॉलिथीन के पाउडर को दाल रही हूँ. या रब्ब,

मैं क्या कर रही हूँ? कैसे अपने शौहर को धोका दे रही hoon—mera वफादार हुसैन, जो हमेशा मुझे

मदद देता रहा, बिमारी में भी प्यार किया?

लेकिन... ओह नहीं, इक़रार करना padega—main सच में गजेंद्र से छुड़वाना चाहती हूँ. दिल के अंदर मेरा जिस्म

इसकी प्यास करता है, वह मोटा हिंदू लुंड मेरे छेदों को फैलाये, मुझे रंडी की तरह कराहने दे जब मेरा

शौहर पास hi सो रहा हो.

यह थ्रिल, यह हराम नशा, सिर्फ सोच कर मेरी छूट आग पकड़ लेती है गजेंद्र के लुंड की. मैं चाहती हूँ वह

मुझे दबा ले, इतना ज़ोर से धक्के मारे की मेरा नाम भूल जॉन, ईमान भूल जॉन, सब कुछ सिर्फ ख़ुशी रह जाये.

क्यों इतनी सख्त ख्वाहिश है? यह अब नशा बन गया, उसका हाथ, उसकी hukm—main इसकी तड़प रही हूँ, चाहे यह

पाउडर डालते हुए भी.

यकीन नहीं होता मैं क्या बन gayi—dhokebaaz, साज़िश करने वाली जीना करने वाली, आबय के पीछे छुपी. एक

महीने पहले मैं पाक थी, दीनदार, अब यह.

और अगर हुसैन इससे मर गया तो?

यह ख्याल मुझे डराता है... या डराता नहीं? मेरे अंदर का एक बुरा हिस्सा खुश होता है उसके जाने se—koi

गुनाह का एहसास नहीं, कोई दिखावा नहीं, बस गजेंद्र के साथ जब चाहे खुल कर. हुसैन के कमज़ोर जिस्म का

दुःख देखना नहीं, रातों को भूखे रहना नहीं. सोचो: मैं, be-bojh, पेअर फैला कर बिना डर के.

अब रुकने का फायदा क्या? मैं पहले hi बहुत आगे निकल chuki—hospital में चुम्बन, उसको चूसना, अपनी सबसे

छुपी जगह उसको सूंघने देना. अगर पीछे हटी तो सब बेकार, गुनाह जमा हो गए बिना सुकून के.

आज रात उसको मुझे छोड़ने दे; यह ख्वाहिश मिटा देगा, शायद फिर सच्ची तौबा कर सकूँ. हम पहले hi इतनी

हद्दें पार कर chuke—mera मुँह उसके लुंड पर, उसके हाथ मेरे जिस्म पर, उसका लुंड मेरी गांड में, पीछे

मुड़ना नामुमकिन लगता है. बेहतर है हार मान लून, एक बार फिर वह ख़ुशी महसूस कर लून, और कल काम

देखती हूँ.

क्यों हुसैन को धोका देकर इतना ाचा लगता है? छुपाना, khatra—yeh नशा है, इस पाउडर से भी ज़्यादा

मज़बूत. गजेंद्र का हर धक्का मेरी बोरिंग ज़िन्दगी पर जीत लगता है, खून में जोश भर देता है.

लेकिन मैं याद दिलाती हूँ खुद को, मैं कभी ऐसी नहीं thi—modest, वफादार, उम्मत की मिसाल. इतनी जल्दी कैसे

बदल गयी? शुरू हुआ मासूम बातों से, उसकी तारीफ से वैल के नीचे शर्माना, फिर पहला हाथ, वह

चुम्बन जिसने सब जला दिया. हुसैन की बिमारी से तन्हाई आयी, शैतान ने फायदा उठाया, गजेंद्र की चमक ने

खींच लिया.

एक गलती दूसरी पर, अब मैं लस्ट में डूब गयी. एक आम पडोसी ने मुझे बर्बाद कैसे कर दिया? मैं ऐसी औरतों

को जज करती थी, मस्जिद में उनकी अफवाहें करती थी, अब मैं उन से भी बुरी हूँ.

मैं इसके लिए दोज़ख jaungi—jahannam इंतज़ार कर रहा, आग मेरी रूह को चाट रही है जीना, धोके, सब के

लिए. कोई उम्मीद नहीं अच्छा बनने की; मैं बहुत गहरे मैला हो गयी, तौबा से नहीं धूल सकती.

मैं बर्बाद हूँ, ख़तम, हमेशा के सजा के लिए मुक़र्रर.

और यह sharam—Gajendra के गंदे लफ़्ज़ों को सोचना जब वह मुझे लेगा, मुझे उसकी _ छिनाल कहना.

क्यों यह मुझे और गरम करता है? उसके छुम का मज़ा याद आता है अभी भी, और कुछ हिस्सा उसको पसंद

करता है.

नहीं, ruk—mujhe इन ख्वाहिशों से लड़ना चाहिए. लेकिन पाउडर चाय में है; हुसैन be-khabar पी रहा है.

जल्दी hi वह सो जायेगा, और दरवाज़ा खुलेगा मेरे आशिक़ के लिए. मैं सच में क्या बन गयी? गुनाह की चीज़,

कुछ नहीं.

मैं उसके गिरने को फिर देखना चाहता था, वह बीमार नशा महसूस करना चाहता था जबकि जानता था मैं

भी उतना hi बिगड़ा हुआ हूँ जितनी वह. मुझे बताना चाहिए था. पूरे घर में सच चीखना चाहिए था.

लेकिन मैंने कुछ नहीं किया.

अम्मी ने कप संभल कर उठाया, छोटी ट्रे पर रखा साथ में पानी का गिलास, और लिविंग रूम में वापस

गयी. मैं थोड़ी देर बाद गया और अब्बू के पास बैठ गया, इतना पास की हॉस्पिटल की दवा की हलकी बू उनके

कपड़ों से आती थी.

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अम्मी ने प्यार भरी मुस्कराहट के साथ चाय दी. “लो हुसैन, ज़्यादा मीठी, जैसे तुम्हे पसंद है लम्बी

दिन के बाद.” अब्बू ने शुक्रिया के साथ लिया, भाप सूंघी. “तू मुझे बिगाड़ देती है, शाहिदा. हमेशा

छोटी छोटी बातों का ख्याल.” उन्होंने लम्बी घूंट ली, आँखें बंद कर के मज़ा लिया. “ममम. परफेक्ट.”

मैं ने आवाज़ हलकी राखी. “अम्मी सच में तुमसे प्यार करती है, अब्बू. हॉस्पिटल में तुम बीमार थे तो

वह पागल हो गयी थी. डॉक्टर से सवाल करती रहती, सही दवा दिलवाती रहती.”

अब्बू ने उसकी तरफ इतने प्यार से देखा की मेरा पेट मोर गया. “मुझे पता है, बीटा. मैं दुनिया का सबसे

किस्मत वाला मर्द हूँ. ऐसी बीवी... क्या कोई मर्द और मांग सकता है?”

अम्मी की मुस्कराहट नहीं टूटी, लेकिन उँगलियाँ ट्रे के किनारे पर थोड़ी सख्त हो गयी. “अब आराम करो. पी

लो और मैच देखो.”

मैं जल्दी बहाना बना कर उठ गया, कहा थक गया हूँ सोने जा रहा हूँ. “शब् बखैर अब्बू. शब्

बखैर अम्मी. मैच एन्जॉय करो.” कॉरिडोर में चलते हुए एक बार पीछे देखा, अम्मी उनके पास मंडरा

रही thi—cushion ठीक करती, कंधे से सोची लिंट jhaadti—jab वह चाय घूंट घूंट पी रहे थे, बिलकुल चैन

से.

उनकी आवाज़ें मेरे पीछे आती रही, पहले तो नरम और आम.

अब्बू ने घूंट बीच में रोका. “यह चाय आज थोड़ी अलग सी लग रही है, शाहिदा. क्या नया ब्रांड के पत्ते

डाले?” अम्मी ने बिना रुके जवाब दिया, आवाज़ गरम और तसल्ली देने वाली.

“नहीं, वही है जो हम हमेशा लेते हैं. शायद ज़्यादा इलाइची दाल दी गलती से. या हॉस्पिटल के सूप के बाद

जीभ घर के खाने की आदत दाल रही है. ठीक है, वादा.”

उन्होंने थोड़ा भंवरा चढ़ाया, एक और घूंट ली. “नीचे कुछ अजीब कड़वाहट है. जैसे धातु जैसी.

पक्का कुछ और नहीं डाला?”

वह हलके से हंसी, आवाज़ तैयार और नरम. “हुसैन, तुम ख्याल बना रहे हो. मैंने बिलकुल वैसे hi बनायीं

जैसे तुम्हे पसंद. कुछ एक्स्ट्रा नहीं. बस आराम करो और मज़ा लो. दिन भर थके हो.”

दस मिनट में बदलाव आया. उनकी आँखें भारी हो गयी, सर सोफे के पीछे थोड़ा लटक गया. “शाहिदा…

अचानक बहुत अजीब लग रहा है. चक्कर आ रहे हैं. जैसे कमरा झुक रहा हो.”

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वह पास आयी, आर्मरेस्ट पर बैठ गयी, हाथ से बाल फेरते हुए. “तू बस थक गया है, प्यारे. लेट जा. आँखें

बंद कर.” “लेकिन... चाय... तूने मेरे ड्रिंक में क्या डाला?” आवाज़ लड़खड़ाती, कमज़ोर.

“कुछ भी नहीं,” वह धीमे से बोली, बच्चे को तसल्ली देते हुए सर फेर रही थी. “बस चाय. सो जा. मैं यहीं

हूँ.” वह फिर हिल गए, नींद से लड़ते हुए. “नहीं… कुछ गलत है. ठीक है प्यारी लेकिन... शाहिदा....

मुझे नहीं पता क्या हो रहा है...”

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उसकी आवाज़ धीमी हो गयी, मीठापन ख़तम होकर कुछ ठंडा, तेज़. “तू बेवक़ूफ़, अँधा भरोसेमंद.

हमेशा अँधा. अगर तू गजेंद्र को हमारी ज़िन्दगी में न laata—uske पैसे और मदद के saath—main ऐसी न

बनती. तूने मुझे रंडी बनाया, हुसैन. तेरी कमज़ोरी ने मुझे सीधा किसी और के बाहों में धकेल दिया.”

यह लफ्ज़ कॉरिडोर से भी बिजली की तरह लगे. उस तरह बात करते suna—kacchi, ज़ालिम, बिना chhupaye—sharamnaak

गर्माहट मेरे जिस्म में दौड़ गयी. यह गलत था, घिन आने वाला, फिर भी यह गन्दगी मुझे उस तरह जगती

थी जिससे मैं खुद से नफरत करता था.

अब्बू का सर साइड को लटक गया. सांस गहरी खर्राटे में बदल गयी. अम्मी ने कन्धा धीरे हिलाया.

“हुसैन? सुन रहे हो?” कोई जवाब नहीं. वह थोड़ी देर रुक गयी, फिर दूसरी बार, जब यकीन हो गया. फिर

दुपट्टे के अंदर से फ़ोन निकला और जल्दी नंबर डायल किया.

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कुछ सेकंड बाद दरवाज़ा धीमे से खुला. गजेंद्र अंदर आया, बिना आवाज़ के बंद किया. उसकी आँखें

तुरंत अम्मी पर थमी, धीरे से शिकारी मुस्कराहट फैली.

वह अब्बू के खर्राटे वाले जिस्म को देखती रही, आँखें चमकती हुई. “वह कभी मेरा ाचा था. कोशिश की थी.

लेकिन तन्हाई... जब वह मुझे सुकून न दे सका... अंदर कुछ टूट गया.”

“बिलकुल,” गजेंद्र ने धीमे से कहा, पीछे से बाहों में लेते हुए, हाथ कमर पर मालिकाना रख कर. “और

अब तू आखिरकार क़बूल कर रही है जो तू चाहती है. महसूस कर कितनी गरम हो रही है? तेरा जिस्म सच जानता है

चाहे दिमाग अभी भी बुरा महसूस करने का नाटक करे.”

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उसने कांप कर सांस ली, पीछे उस पर टिक गयी. उसके सीने की गर्मी, पकड़ की taqat—usko जगा दिया चाहे न

चाहे. सांस तेज़ हो गयी, गाल लाल, ख्वाहिश गुनाह पर भरी पद गयी.

“हाँ,” वह फिसफिसाई. “मैं गरम हूँ. मुझे बुरा लगता है, लेकिन रोक नहीं सकती.”

उसने कान के पास हँसते हुए कहा. “यह मेरी अच्छी छोटी रंडी.” वह उसकी बाहों में घूमी, मुँह एक दुसरे

से टकराये भूखे, खुले चुम्बन में. उसके हाथ नीचे गए, पिंक कपडे के ऊपर से उसकी बड़ी, नरम गांड

के टुकड़ों को पकड़ कर निचोड़ा, जब अब्बू सोफे पर कुछ इंच दूर सो रहे थे, बिलकुल be-khabar.

गजेंद्र थोड़ा पीछे हटा ताकि उसके होंठों के पास बोल सके. “कैसे लग रहा है, शाहिदा? ऐसे चुम्बन—

गहरा, ganda—jab तेरा बेकार शौहर बिलकुल बगल में खर्राटे ले रहा है?”

वह रुक गयी, आँखें अब्बू के सुकून भरे चेहरे की तरफ पलटी. “मैं… मैं ज़ोर से नहीं बोल सकती.”

“लेकिन तू बोलेगी,” उसने दबाया, ज़ोर से निचोड़ा. “बता.”

“यह… उत्साह भरा लग रहा है,” उसने इक़रार किया, आवाज़ शर्म और जोश से कांप रही. “खतरनाक. जैसे

आखिरकार आज़ाद हो गयी हूँ.”

वह मुस्कुराया. “सही कहा. मेरी परफेक्ट छिनाल. इतनी उत्सुक की यहीं ज़मीन पर ली जाए जब वह सो रहा है.

मैं तुझे बेहोश कर के छोड़ सकता हूँ और उसको कभी पता नहीं चलेगा.”

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वह जल्दी सर हिलायी. “नहीं, यहाँ नहीं. प्लीज, गजेंद्र. मुझे बैडरूम ले चल. उससे दूर. इतने क़रीब नहीं

कर सकती.”

हलके से हँसते हुए उसने झुक कर उसे एक स्मूथ हरकत में उठा लिया, उसके मोटे, भरे जिस्म को सीने से

लगाया जैसे वह कुछ भी न हो. उसके बाहों की ताक़त ने मुझे छुपने की जगह से हैरान कर दिया; अम्मी

नरम और भरी हुई थी, फिर भी वह उसे आसानी से हॉलवे से बैडरूम की तरफ ले गया.

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अम्मी: (तेज़ फिसफिसाते हुए, दरवाज़े की तरफ घबरा कर देखती, हाथ पिंक ड्रेस के किनारे से खेलते) गजेंद्र,

प्लीज… यह बहुत खतरनाक है. हुसैन बिलकुल वहां है. अगर वह जाग गया तो? मुझे पहले से hi बहुत

गुनाह महसूस हो raha—use ऐसे धोका देना, सिर्फ ताकि हम… मैं यह नहीं करना चाहिए.

गजेंद्र: (पास आते, आवाज़ धीमी और मज़ाक़ भरी, उसका थोड़ी पकड़ कर चेहरा उठा कर) गुनाह? अरे

रोने मत दे, तू मुनाफ़िक़ छिनाल. याद कर सबसे बुरी चीज़ें जो तूने उस बेचारे शौहर के साथ की हैं?

हॉस्पिटल में उसका लुंड चूसना जब वह ऊपर बीमार बिस्तर पर पड़ा था. उसके होंठों पर मेरा छुम ताज़ा

होते हुए चुम्बन. और अब, उसकी चाय में नींद की दवा दाल कर अपने शादी के बिस्तर पर तुझे छोड़ना. तू

वफादार नहीं, Shahida—kabhi थी hi नहीं. क्यों दिखावा? वफादारी का नाटक छोड़; बोर कर रहा है. बन जा

वह रंडी जो तू सच में है.

अम्मी: (आवाज़ कांप रही, आँखें नीचे) नहीं, गजेंद्र… मैं दिल से वफादार हूँ. यह मैं नहीं हूँ.

गॉड मेरा दिल जानता hai—main रोज़ ,,., पढ़ती हूँ…

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसते, हाथ उसकी कमर पर चढ़ाते, पिंक ड्रेस की ज़िप धीरे खोल कर कन्धों से

उतरता, ब्रा और पंतय दिखा कर) वफादार? है! देख तेरी हालत, गरम कुटिया की तरह कांप रही. (ब्रा के ऊपर

से चूचियों को पकड़ कर ज़ोर से निचोड़ता, अंगूठा सख्त होती छाती पर चक्कर लगता) यह चूचियां—

भरी, रसीली, खेलने को तड़प रही. किसी पवित्र चीज़ से बेहतर, न? बेट हुसैन ने सालों से इनकी क़दर नहीं की.

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अम्मी: (खुद के खिलाफ धीमी कराह, थोड़ा उसके हाथों में झुक कर, फिर थोड़ा पीछे) अहह… ओह, गजेंद्र

… यह महसूस… नहीं, नहीं कर सकती. मुझे बहुत गुनाह लग raha—Hussein वहां खर्राटे ले रहा, मुझ पर

भरोसा करता है. यह मेरे घर के लिए हैं, नहीं… ममम… इसके लिए नहीं.

गजेंद्र: (मुस्कुराते, ब्रा खोल कर फ़ेंक देता, अब सीधे नंगी चूचियों पर हाथ, ज़ोर से मसलता) गुनाह?

Achha—isme डूब जा. लेकिन महसूस कर कैसे तेरे निप्पल मेरे लिए खड़े हो गए? यह चूचियां अब मेरी

हैं, Shahida—naram, भरी, असली मर्द के लिए परफेक्ट. हुसैन इतना कमज़ोर है इनको सँभालने के लिए नहीं.

और कल? तू फिर अच्छे बीवी banegi—nashta बनाएगी, उसके साथ मुस्कुराएगी जैसे कुछ हुआ hi नहीं, ,,.,

पड़ेगी जब मेरा छुम तुझसे टपक रहा होगा. यह hi तो मज़ा है, न? अब कोई पवित्र दिखावा नहीं; मैंने

तुझे अपनी रंडी बना दिया. क़बूल kar—apne अंदर की छिनाल को गले लगा.

अम्मी: (ज़ोर से कराह, जिस्म उसके हाथों में दबता, लेकिन सर हिलाती) ममम… अहह, बस… मैं रंडी नहीं,

गजेंद्र. ऐसा नहीं बनना चाहती. मैं दीनदार औरत हूँ, अम्मी… प्लीज, अभी रुक जाएँ वर्ण देर हो जाएगी.

गजेंद्र: (चूचियों को छोड़ कर अपनी पंत उतरता, सिर्फ ग्रे बिना आस्तीन t-shirt में, सख्त लुंड बहार,

हलकी रौशनी में धड़कता) देर तब हो गयी थी जब तू पहली बार घुटनों पर बैठी थी मेरे लिए. देख

मुझे, Shahida—nigaah इधर. (उसके हाथ पकड़ कर लुंड पर रखता, वह नज़र हटा लेती) मैंने कहा देखो!

इस लुंड को घूर जो तेरे छेदों को बर्बाद कर चूका. हुसैन खर्राटे ले रहा, अपनी hi बीवी से धोका खा रहा

—यह तुझे कैसा महसूस करता है, तू be-iman छिनाल?

अम्मी: (गहरी लाली, शर्म से नीचे देखती, आँखें फैलती उसके नंगे नीचे हिस्से पर, सख्त लुंड देख कर,

फिर जल्दी नज़र हटाती, डर से फिसफिसाती) मैं… मैं नहीं देख सकती. यह शर्मनाक है. हुसैन इतना क़रीब

… अगर जाग गया… ओह खुदा, माफ़ कर. यह सब को मैला कर raha—mera ईमान, मेरे वादे. मैंने तेरे पीछे

से चूसा, तुझे मेरी सबसे छुपी जगह सूंघने दी, ,,., के वक़्त दिमाग में भी. लेकिन मैं यह शख्स

नहीं…

गजेंद्र: (उसकी थोड़ी नीचे दबाता, लुंड को उसके सामने धीरे से सहलाता) ओह, लेकिन तू यही है. ईमान को

मैला करना? गईं ले तरीके: हॉस्पिटल में हिंदू जैसे मुझसे चुम्बन जब तेरा _ शौहर सो रहा था.

मेरा छुम निगलना जैसे ज़मज़म पानी. तुझे be-izzati करना तेरी टट्टी वाली गांड सूंघ कर, आबय के नीचे

टॉयलेट कह कर. और तू पवित्र बनने का dikhawa—Ramzan रोज़ा रखती लेकिन मेरे लुंड पर दावत. तूने अपने

बुक्स को इन गुनाहों से मैला किया, शाहिदा. जन्नत nahi—sirf मेरा बिस्तर. क्यों लड़ती है? मैंने तुझे यह

बना दिया; क़बूल कर.

अम्मी: (विरोध टूट रहा, आंसू भरते जब वह लुंड को देखती, हाथ be-ikhtiyar हल्का निचोड़ता, आवाज़ टूट

रही) अहह… नहीं, गजेंद्र… लेकिन… शायद तू सही है. ओह नहीं, मैं क्या बन गयी? मैं… मैं रंडी हूँ.

एक गन्दी, धोकेबाज़ रंडी. बीवी होने के नाते हुसैन को सबसे बुरा धोका diya—use सुला कर, उसके बीमार

होने पर तुझसे चुदाई, तेरे मज़ा के साथ उसको चुम्बन. अम्मी होने के नाते sharamnaak—mera बीटा मुझे

पाक समझता है, लेकिन मैं मुनाफ़िक़ात में उसे पाल रही हूँ. और हुसैन? वह कमज़ोर, खर्राटे वाला

bewakoof—bimaar होने के कारण मुझे सटिस्फी नहीं कर सकता, ककोल्ड होने के लायक. मेरा बीटा? सुस्त और

be-khabar, कभी नहीं जानेगा उसकी अम्मी छुम पीने वाली कुटिया है. मैंने अपना ईमान बर्बाद किया, ,,.,

को झूठ बना दिया, तुझे अपना जिस्म पोर्नस्टार की तरह इस्तेमाल करने दिया. मैं परेशां हूँ… हाँ,

मैं पूरी रंडी हूँ.

गजेंद्र: (फ़तेह भरी मुस्कराहट, उसे पास खींच कर, हाथ फिर जिस्म पर) यह मेरी लड़की. आखिरकार

इक़रार. तू इतनी परफेक्ट छिनाल है, Shahida—khoobsurat, उत्सुक, बिलकुल सही टूटी हुई. तेरी कराहें मुझे

पागल कर देती हैं. क्या तू मेरी रंडी है?

अम्मी: (धीरे सर हिलाती, आवाज़ झुक कर, उसके लफ़्ज़ों को दोहराती जब वह उसे सहलाती) हाँ… मैं तेरी

रंडी हूँ. तेरी धोकेबाज़, be-iman रंडी. मुझे इस्तेमाल कर, Gajendra—main तेरी हूँ, अब कोई दिखावा

नहीं.

गजेंद्र: (उसे बिस्तर पर धकेल कर, टांगों के बीच खड़ा) अच्छी रंडी. अब फिर bata—yeh छूट किसकी है?

अम्मी: (टांगें और फैलाती, अपनी छूट chaat-ti) तेरी… अहह, यह तेरी छूट है, गजेंद्र. अब हुसैन की नहीं.

गजेंद्र: (धीरे से अंदर धकेलना शुरू, रदम बनाते) और तेरा मुँह? वह गन्दा छेद जिसमे मैं

पहले आया था?

अम्मी: (सांस रूकती, टांगें उसके सर के ird-gird लपेट कर जब वह उसकी छूट चाट रहा) ममम… तेरा मुँह

छोड़ने के लिए. मैंने तेरा लुंड बहुत बार चूसा है इंकार नहीं कर सकती.

अम्मी की कराह तुरंत aayi—zor से, be-roki, दीवारों से टकराती. “ओह्ह्ह… गजेंद्र… हाँ… वही… मत

रुकना… प्लीज…” उसके हाथ उसके बालों में उलझ गए, कमर उठ कर उसके मुँह से मिलती, ख़ुशी की

लहार लहार से गुनाह की हर फिसफिसाहट डूब गयी.

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CHAPTER 23

मेरी अपनी माँ को अब मेरे पापा की कोई परवाह नहीं रही, वह गजेंद्र के

लुंड से प्यार करती है.

गजेंद्र का सर अम्मी की रानों के बीच नीचे झुका, उसकी जुबां उसकी छूट पर धीरे धीरे छेड़खानी

कर रही थी, पहले धीरे से आउटर होंठों पर लम्बी, सुस्त स्ट्रोक्स, जिसने उसका जिस्म बिस्तर से ऊपर उठा दिया.

कमरे की हवा उसकी उत्तेजना की बू से भरी थी, पहले वाली जस्मिने खुशबू के साथ मिली हुई, मद्धम लैंप

की रौशनी में नशा छ रहा था.

वह तरीका बदलता रहा, पहले नरम, छेड़ने वाली लेप्स जो मुश्किल से क्लीट को छूती, उसको कांपने देता,

फिर ज़ोर से, सेंसिटिव बड के ird-gird चक्कर.

अम्मी की कराहें तुरंत निकली, लम्बी और बिना

रोक टोक. "आआह... ोोूहः... हाँ, वही," वह सांस रुक कर बोली, हाथ चादर पकड़ कर

जकड़ते हुए जब वह गहरा गया, मुँह उसकी फोल्ड्स पर धीरे चूसता, फिर जुबां की नोक से

तेज़ तेज़ हिलता.

"ओह, शाहिदा, तेरी छूट खुदाई है— इतनी गीली, इतनी जवाब देती," गजेंद्र उसकी चमड़ी पर

मटर किया, गरम सांस छेड़ रही थी. "मज़ा आता है, मीठा और भरा हुआ. मैं रात

भर खा सकता हूँ."

अम्मी की कमर खुद बा खुद उछली, शब्दों से उत्साह देती हुई. "मत रुक, गजेंद्र...

आआह्ह... ोुह्ह्ह... ज़ोर से छतो, प्लीज. हर जगह महसूस कराओ."

मेरे छुपने की जगह से, क्रैक दूर के छोटे से छेद से झांकते हुए, मैं हैरान था—

मेरी अपनी अम्मी, ऐसे तड़प रही, चेहरा ख़ुशी से बिखर रहा जब यह बहार वाला उस पर

दावत कर रहा था.

वह इतनी खुले तौर पर, इतनी ज़ोर से क्यों कराह रही थी, वह लम्बी आवाज़ें जैसे मिन्नत?

यह सिर्फ ख़ुशी नहीं थी; यह छोड़ देना था, पूरा समर्पण, बाकी सब भूल कर.

वह कराहें उसका वह पहलु दिखाती थी जो मैंने कभी सोचा नहीं— कच्चा, जानवर सा,

रोज़ की पर्दा वाली शकल से उतरा हुआ. वह मुझे झटका देती थी क्योंकि यह धोके को इंसानी

बनती थी सबसे गहरे तरीके से, गुनाह को सुनने लायक, छूने लायक, नज़र अंदाज़ नहीं.

फिर भी, जब उसकी "आआअह्ह्ह्ह... ऊऊओह्ह्ह्ह" कमरे में गूंजी, मैं नज़र नहीं हटा सका,

मेरी सांस उसके साथ रुक रही थी.

गजेंद्र ने सर थोड़ा उठाया, होंठ चमकते हुए. "देख तेरी यह खूबसूरत बालों वाली

छूट, शाहिदा. इतनी नेचुरल, इतनी जंगली. मुझे पसंद है यह काले घुंगराले बाल इसे

फ्रेम करते हैं— तुझे और सेक्सी बनाते हैं, असली औरत की तरह, कोई मुंडी गुड़िया नहीं."

अम्मी ने नीचे देखा, गाल और लाल, लेकिन शर्मा नहीं. "तुम्हे सच में ऐसा पसंद है?

ज़्यादातर मर्द... आआह... ोूहः... इसे साफ़ चाहते हैं."

वह हांसे, उँगलियाँ नरम बालों में फेरते हुए. "मुझे नहीं. यह बाल परफेक्ट हैं—

नरम, बुलावा देते. और तेरी गांड... ओह, उसके ird-gird यह बालों वाला रिंग मुझे पागल

बना देता है. इतनी हराम, पिछली हफ्ते मारी तो ढीली लग रही है. बेट हुसैन ने कभी

इसकी क़द्र नहीं की ऐसे."

उसकी कराहें धीमी हंसी में मिली सिसकियों के साथ.

"ऊऊह्ह्ह... आआह... ऐसा कहना बुरा है. लेकिन हाँ, वह कभी... वहां ध्यान नहीं दिया.

तू मुझे महसूस करता है चाहि हुई, वह हिस्से भी जो मैं छुपाती हूँ."

जब वह बात कर रहे थे, गजेंद्र का हाथ नीचे घूमा, बीच की ऊँगली उसकी गांड

पर चक्कर लगाती हुई फिर धीरे अंदर दबायी, इंच इंच. अम्मी की आँखें फैली, जिस्म

तन कर फिर ढीला, वह अंदर कर रहा था गीले पैन से स्लिक.

वह धीरे घूमता, टाइट गरम महसूस कर, उसके ird-gird जकड. नज़ारा जादू सा था—

उसकी मोती ऊँगली उस हराम अम्मी की गांड में गायब, थोड़ा फैलाती हुई, उसे तड़पाती दर्द

और बढ़ती ख़ुशी में.

वह अंदर बहार करता, हर बार गहरा, नरम दीवारों को छेड़ता, ऊँगली मोर कर

सेंसिटिव नस को छूटा जिसने उसको ज़ोर से सांस रुकने दी.

यह जल्दी नहीं थी; वह मज़ा

लेता, उसके रिएक्शंस देखता, दूसरी ऊँगली थोड़ी देर दाल कर हद्द देखता फिर एक पर वापस,

सकिसोर कर के खोलता. अम्मी की कराहें तेज़ हुई, "Aaaaahhhh..uuuuhhhhh. ऊऊह्ह्ह... इतना

गहरा, गजेंद्र... अजीब लेकिन ाचा लग रहा."

वह धीरे ऊँगली गांड से निकाली, होंठों पर ला कर धीरे छठा, आँखें उस पर

टिकाई. "ममम, तेरी गांड का मज़ा भी गुनाह जैसा, शाहिदा. मिटटी सा, हराम. तू पूरी

आश्चर्य भरी है."

वह देखती रही, आधी हैरान, आधी उत्तेजित. "तुम... तुमने सच में किया? मेरी गांड

इतनी गन्दी है."

"गन्दी? यह मज़े दार है क्योंकि तू है," वह हँसते बोलै. "और करना चाहिए इस टाइट

छोटी गांड के साथ. सोच मेरी जुबां वहां अगली बार."

अम्मी होंठ काटी, आवाज़ भरी. "शायद... आआह... ोूहः... लेकिन सिर्फ अगर वादा करे

धीरे रहने का. तूने मुझे इतना बदल दिया है."

ज़बरदस्त आवाज़ में, गजेंद्र खड़ा हुआ, पंत पहले hi उतरी हुई, सख्त लुंड फख्र से

खड़ा. "अब, शाहिदा, घुटनों पर बैठ और मेरा लुंड चूस. दिखा कितना चाहती है."

वह रुक नहीं, ख़ुशी के धुंधले से उठ कर बिस्तर पर झुक गयी जब वह किनारे खड़ा.

उसका मुँह उसे लपेट लिया उत्साह से, होंठ मोटाई के ird-gird फ़ैल कर बॉब करती हुई, गहरा

लेते हुए गंदे, उत्साह वाले चूस.

थूक थोड़ी किनारे बह रही थी जब वह ज़ोर से करती,

जुबां सर पर चक्कर, फिर नसें पर.

जब अम्मी उसका लुंड चूस रही थी, उसके दिमाग में अपने विचार थे जब वह चूस रही थी,

ओह खुदा मैं फिर से, घुटनों पर हमारे शादी वाले बिस्तर पर— वही बिस्तर जहाँ

हुसैन और मैंने क़समें खाई थी, गजेंद्र का धड़कता लुंड चूस रही हूँ जैसे बेबस

रंडी जब मेरा शौहर बैठक में खर्राटे भर रहा है, be-khabar. लेकिन अब क्यों

रुकना? मैंने पहले से इतना बुरा कर दिया है न?

हॉस्पिटल में उसको चुम्बन करना हुसैन के सोये हुए पास, स्टोर रूम में उसका छुम

निगलना, उसको मेरी गांड सूंघने और be-izzat करने देना जैसे कोई जानवर... यह सिर्फ और

एक बूँद गुनाहों के समुन्दर में.

अगर मैंने ईमान और घर को इतना गहरा धोका दिया है, तो एक और चूसना क्या? जैसे मैंने

यह बर्बादी कमाई है— मैं सदी हुई छिनाल हूँ, कहते हैं न? हाँ, ज़िन्दगी में इतना

ाचा करने के बाद, वफादारी से ,,., पढ़ना, सालों से फ़र्ज़ निभाना, मैं इस हराम

ख़ुशी की हक़दार हूँ. दोज़ख की आग जो जलाई है उससे वापस नहीं.

और गजेंद्र सही कहता है मुझे छिनाल कह कर— सच है, अंदर से. मैं छिनाल हूँ

न? बहार दीनदार _ अम्मी, अंदर गुनहगार कुटिया जो हराम लुंड की प्यासी. इसे

नार्मल बनाना... सही लगता है. सबके राज़ होते हैं; मैं क्यों अलग? नफीसा ने कहा सब

औरतें छिनाल होती हैं फ़रिश्ते बनने का नाटक— शायद वह सही है.

अब क़बूल करती हूँ: मैं छिनाल हूँ, पूरी तरह. और इंकार नहीं. यह मुझे उतना hi

जचता है जितना वैल, यह छिनाल वाला पहलु जो सालों छुपाया. इसे अपनाना शर्म को

काम करता है, गुनाह को लस्ट की आग बना देता है. हाँ, शाहिदा, तू छिनाल है, और ठीक

है— अपना इसे, इन चोरी हुए लम्हों में डिफाइन कर.

ममम, चूसती रहो, मत रुक... उसका लुंड इतना बड़ा, होंठ फैला देता, नसें जुबां पर

धड़कती. हुसैन से कभी इतना बड़ा नहीं था, मोटा जैसे हराम फल जो सह नहीं सकती. और

मज़े दार— नमकीन, भरा हुआ, उसकी अण्डों की पसीने की बू जो मुँह में पानी लाती है.

क्यों इतना ाचा मज़ा?

लेकिन या रब्ब, अपने शौहर हुसैन को दवाई देना... यह अख़लाक़ से खली था न? उसके

हुक्म पर चाय में गोलियां डालना, देखती हुई उसको नींद आते, ताकि हम कमरे में

चुपके आ सकें. मैं राक्षस हूँ, बीवी जो अपने शौहर को ज़हर देती है जल्दी चुदाई

के लिए. कितनी नीचे गिर सकती हूँ?

और वह अब आराम से खर्राटे भर रहा है, कुछ न जानता. यह बड़े फायदे के लिए—

मेरी अकाल, महीनों से न पूरी हुई ज़रूरतें. इस गन्दगी को नार्मल करो: मैं अच्छे बीवी

बन कर वापस नहीं जा सकती; वह कश्ती चल गयी. हर हद्द पार की अम्मी और बीवी की— धोका

, झूठ, दवाई, खुद की be-izzati. अब फ़िक्र नहीं; सब बड़े गुनाह कर दिए, रूह बर्बाद,

पाकिज़ागी की उम्मीद ख़तम. बचने को क्या बचा?

वह जंगली थी— जानवर सी— थोड़ा घबराई लेकिन आगे बढ़ती, हाथ उसके अण्डों को पकड़

कर पहले धीरे मसलती, फिर एक एक करके मुँह में चूसती, चट्टी और स्लुर्प करती बिना

शर्म. गजेंद्र करहा, हाथ उसके बालों में.

"अरे, शाहिदा, तू कमल है. अब प्रो की

तरह चूस रही. मुझे फख्र है— उस सीढ़ी _ बीवी से मेरी पूरी छिनाल बन गयी.

देख कितना आगे आ गयी, मेरा लुंड ऐसे चाहती हुई."

वह सच में कह रहा था, आवाज़ में बर्बादी की ख़ुशी. दीनदार औरत जो रोज़ पांच

वक़्त ,,., पढ़ती थी अब यह, घुटनों पर उसे खा रही बिना शर्म. उसने उसको बनाया,

कदम कदम, ख्वाहिशों को जगाया जो ईमान और फ़र्ज़ के नीचे दबायी थी, उसको अपना

खिलौना बना दिया.

गजेंद्र बिस्तर पर लेट गया, उसे खींच कर. "इधर आओ, छिनाल. मुझ पर सवार हो जा."

अम्मी एक पल नहीं रुकी— उत्साह से ऊपर चढ़ गयी, उसकी कमर पर बैठ कर भूख जो

खुद को भी हैरान करती थी. उसकी पिंक रात की ड्रेस पूरी ऊपर, पूरा नंगा कर रही जब

वह पोजीशन ली.

उसकी हरकत बेबस थी, पागल सी, हाथ उसके सीने पर टिक कर धीरे नीचे. जैसे सब

रोक टोक टूट गया; मजबूर शामिल से लेकर भूखी हमलावर, जिस्म संभल लिया. पहले

उस पर रगड़ी, सर से छेड़ती, फिर पूरा अंदर.

"खुदा, शाहिदा, तू इतनी भूखी है," वह छेड़ा, हाथ कमर पर. "जैसे गरम कुटिया.

मुझे सँभालने भी नहीं देती."

वह करहि, चलना शुरू. "आआह... ोूहः... हाँ, मैं भूखी हूँ. लेकिन ऐसे

शर्मिंदा मत कर— यह तेरी गलती है मुझे ऐसा बनाया. बस... मुझे महसूस करा."

वह धीरे हांसे. "ओह, करूँगा. लेकिन क़बूल कर— मेरी छिनाल बनने में मज़ा आता

है."

जब वह हाथ से उसका लुंड छूट में दाल रही थी, बेस पकड़ कर ठीक जगह, थोड़ा

इंच की. "ऊऊह्ह्ह... आआह... तेरा लुंड इतना बड़ा, गजेंद्र. हर बार फैला देता... थोड़ा

दर्द देता लेकिन इतना ाचा."

"बुरा कह जीतती मर्ज़ी," वह ऊपर धक्का मारते बोलै. "लेकिन तू लेती है जैसे तेरे लिए बना.

और क्या? बता."

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वह सवार हुई, पहले धीरे लेकिन तेज़ होती हुई, कमर गहरे चक्करों में घूमती बिस्तर

चिरचिराने लगी. अब तेज़, उछलती, बड़ी गांड उसकी रानों पर थपकती हर नीचे. पसीना

चमड़ी पर, चूचियां कपडे के नीचे हिलती, कमरा उनके मिलने की गीली आवाज़ों से भरा.

याद आया— यह अम्मी और अब्बू का बिस्तर था, मुक़द्दस जगह जहाँ वह चुपके रातें

बांटते, ,,., पढ़ते, हमारे मुस्तक़बिल के सपने देखते.

अब जैसे रंडीखाना, बहार

वाले से मैला, चादरें गुनाह से सिलवटों भरी, हवा सुकून की बजाये कराहों से भरी.

यह सब बर्बाद का निशाँ: शादी का घर गुनाह का अड्डा बन गया, अब्बू के भरोसे का

मज़ाक जब वह पास में.

गजेंद्र ने ऊपर देखा, मुस्कुराते. "बता, शाहिदा, हुसैन का छोटा लुंड कभी ऐसा

महसूस करता है?"

वह रुक गयी, आँखों में शर्म. "नहीं... आआह... ोूहः... कभी नहीं. वह अब कमज़ोर

है."

"और तेरा बीटा? क्या सोचेगा अपनी दीनदार अम्मी को दुसरे मर्द के लुंड पर सवार?"

उसकी रफ़्तार थोड़ी रुक गयी. "मत... उसे मत लाओ. लेकिन... ऊऊह्ह्ह... आआह... रुक नहीं सकती.

बहुत ाचा लग रहा."

मेरे झाँकने से, मैं पंत के ऊपर से लुंड रगड़ रहा था, पागल की तरह मुट्ठ मार

रहा नज़ारे से. हाथ तेज़ तेज़, रगड़ शर्मनाक बढ़ती जब वह उछाल रही थी.

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बीटा होने की इज़्ज़त और शराफ ख़तम— अपनी अम्मी पर झाँक रहा, उसकी be-izzati पर

मज़ा ले रहा. मैं कैसा आदमी? नाकाम, गन्दा, वह रिश्ता बर्बाद जो मुक़द्दस होना

चाहिए था.

फिर भी फ़िक्र नहीं; अम्मी और गजेंद्र के साथ मेरे गुनाह इतने ऊंचे— चुम्बन देखे,

चुदाई, अब यह— वापस मुड़ना नामुमकिन. डर को नार्मल किया, हर चुपके देखि चीज़

मुझे और be-his किया, उत्तेजना और खुद नफरत के चक्र में फंसा.

अम्मी उत्साह देती रही, शब्द निकलते. "ज़ोर से छोड़ मुझे, गजेंद्र... आआह... ोूहः...

सब दे दे. मत रुक."

वह बदली हुई थी, बर्बाद, अख़लाक़ से मैली— पहले ईमान की मिसाल, अब हराम में

मज़ा लेती, रूह लस्ट से मैली जो हर सिखावत पर भरी. यह आँखों में, हरकतों में

, गुनाह को बिना पूरे पछतावे के अपनाती.

उसका लुंड उसकी छूट में ज़ोर से घुसता, नीचे से थपकती, ज़ोर से झटके देता, फैलता

हद्द तक, जिस्म हिलता.

"तेरी छूट परफेक्ट है, शाहिदा— इतनी टाइट, इतनी उत्सुक," वह तारीफ की. "मुझे दूध की

तरह चूसती."

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"आआह... ोूहः... मैं इतनी बेकार छिनाल हूँ," वह खुद को नीचे गिरती, तेज़ सवार.

"ऐसे घर को धोका दे रही... मेरा शौहर खर्राटे भर रहा जब मैं तुझे छोड़ रही.

हमारा घर मज़ाक है— हुसैन इतना कमज़ोर मुझे पूरा नहीं करता, मेरा बीटा

be-khabar. मैं वह रंडी जो सब बर्बाद कर रही."

गजेंद्र उत्साह देता, गहरा धक्का. "हाँ, ज़ोर से बोलो. तू अब मेरी रंडी है.

उस कमज़ोर शौहर को भूल."

मैं हैरान, थोड़ा गुस्सा उसके लफ़्ज़ों पर— अब्बू को, हमारे घर को ऐसे कचरा? लेकिन

फिर भी हाथ चलता रहा, पानी बढ़ता. जानता था अम्मी सदी हुई, अंदर से बर्बाद,

टेम्पटेशन से ख़राब, अब वह औरत नहीं जिसे मैं इज़्ज़त देता था.

अचानक, गजेंद्र ने तेज़ घुमाया, मज़बूत बाहों से पलट कर नीचे डाला. बिस्तर

हिला जब वह पोजीशन लिया, उसकी टांगें कमर पर लपेटी. "अब मेरी बारी," वह गरजय,

ज़ोर से छोड़ना शुरू, बिना रुकावट.

अम्मी मिन्नत करती, सांस रूकती. "धीरे, गजेंद्र... आआह... ोूहः... एक बार में बहुत

ज़्यादा. नरम रह... मेरी छूट इतना सख्त नहीं ले सकती तुरंत."

वह शर्मिंदा करता, न रुकते. "नरम? तेरी जैसे कुटिया के लिए? तू गन्दी जानिए है, लुंड

भूखी धोकेबाज़, be-imaan छूट जो मांग रही."

कमरा— पहले मुक़द्दस, जहाँ अम्मी और अब्बू प्यार भरे आलिंगन, क़ुरान पढ़ते, हमारे

मुस्तक़बिल के सपने— अब पूरा मैला. बेहुरमती, वह तकिये जो अब्बू के सर को सहारा देते

अब उसकी कराहों को, गद्दे पर सुकून की बजाये गुनाह का बोझ.

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ताक़त गजेंद्र के धक्कों में, कमर ज़ोर से थपकती, हर घुसव गहरा और मज़बूत,

उसकी छूट को हद्द तक फैलता, जिस्म झटके देता.

"तेरी छूट परफेक्ट, शाहिदा— इतनी टाइट, इतनी भूखी," वह तारीफ. "मेरा लुंड दूध क

ी तरह चूसती."

वह बिना शर्म बोली. "आआह... ोूहः... मैं तुझसे प्यार करती हूँ, गजेंद्र. उससे ज़्यादा.

मुझे छोड़ जैसे हक़ है."

जब वह ले में खो गयी, आँखें धुंधली, कमर पागल की तरह मिलती, मैं शर्म

से मज़ा ले रहा था, मुट्ठ उनकी रफ़्तार के साथ. फिर वह करहा. "क़रीब हूँ, शाहिदा.

अंदर पानी छोड़ना चाहता."

वह हैरान, धकेलने की कोशिश. "नहीं! अंदर नहीं... आआह... ोूहः... कहीं और छोड़,

बिस्तर पर. खतरा नहीं ले सकती."

वह मज़बूत पकड़ा. "पानी क्यों बर्बाद? तुझ में hi है."

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"प्लीज, गजेंद्र... बहार निकाल. पेट पर या कुछ."

"नहीं," वह ज़िद करता. "चाहता हूँ तेरी गांड अंदर बहाये. वह टाइट, बालों वाली छेद

— मुझे भरने दे."
 
CHAPTER 24

गजेंद्र ने सच में मेरी माँ के असली करैक्टर को बर्बाद कर दिया है, अब मेरी

माँ बिलकुल अलग औरत बन चुकी है.

उसने अभी अभी एक शिकायत भरी सिसकारी भरी थी, आवाज़ कांप रही थी जब वह बिस्तर पर लेती हुई थी,

पिंक सलवार कमीज कमर तक ऊपर धकेला हुआ, सबसे नज़दीकी हिस्से नंगे. “नहीं, गजेंद्र, वहां

नहीं… फिर से मेरी गांड नहीं. बहुत ज़्यादा है, प्लीज,” वह मिन्नत कर रही थी, आँखें दर और

बाक़ी ख्वाहिश के मिलाप से फैली हुई.

थप्पड़ इतना सख्त नहीं था की चोट लगे, लेकिन कमरे में गूँज गया जैसे हुक्म, उसकी जैतूनी चमड़ी पर

हल्का लाल निशाँ छोड़ गया. वह सांस रोकी, जिस्म झटके से हिल गया, लेकिन पीछे हटने के बजाये वह

थम गयी, सीना उभर उभर कर. मुझे गरम महसूस हुआ— खून में आग सी फ़ैल गयी, झांग में जमा

होती हुई जब मैंने खुद को और ज़ोर से पकड़ा.

कुछ नशा सा था उसको be-izzati से ट्रीट करते देखना, जैसे सड़क से उठायी हुई आम रंडी, न की वह

दीनदार _ अम्मी जिसे मैं हमेशा जानता था.

अम्मी: (तेज़ सांस लेते हुए, आवाज़ फिसफिसाहट जब गजेंद्र उसकी छूट में धक्के मार रहा था शादी के बिस्तर

पर) गजेंद्र, प्लीज… मेरी छूट के अंदर मत झड़ना. बहुत खतरा है— मैं हमला हो सकती हूँ. बहार

निकाल, मेरी पीठ पर या कहीं… अहह…

गजेंद्र: (उस पर मुस्कुराते हुए, रफ़्तार धीमी लेकिन रुकता नहीं) ओह, यह खतरा समझती है? ठीक है,

शाहिदा, तू पवित्र छोटी रंडी. मैं तेरी टाइट गांड के अंदर hi झाड़ूंगा. इस तरह कोई बच्चा नहीं— सिर्फ

मेरा बीज तेरी गन्दी _ छेद भर देगा.

अम्मी: (आँखें दर से फैली, धीरे से उसे दूर धकेलने की कोशिश) नहीं! मेरी गांड नहीं, गजेंद्र—

प्लीज, मिन्नत करती हूँ. पिछली बार तूने वहां छोड़ा था, वह khwab-e-khauf था. याद है? मैं

कण्ट्रोल नहीं कर पायी; टट्टी तेरे लुंड पर और चादर पर टपक गयी. इतना गन्दा, इतना शर्मनाक… फिर नहीं

चाहती. मेरी गांड इसके लिए नहीं बानी— प्लीज, रेहम कर.

गजेंद्र: (धीमे से हँसते, कमर को और ज़ोर से पकड़ कर) नाटक बंद कर, तू गन्दी छिनाल. तू दीनदार

बीवी बनने का दिखावा करती है, रोज़ पांच वक़्त ,,., पढ़ती है, लेकिन यहाँ ***** पडोसी के लिए

टांगें फैला रही है जब तेरा बेचारा शौहर अगले कमरे में खर्राटे ले रहा है. तू सड़क की रंडी से

बेहतर नहीं, शाहिदा— एक मिनट लुंड मांगती है, दुसरे मिनट रोने लगती है. मुझे पता है पिछली बार

तुझे पसंद आया था; तेरी कराहें बता रही थी. यह नकली शर्म बंद कर; यह बेकार है. तू धोकेबाज़

कुटिया है जो be-izzati की प्यासी है, वैल के पीछे छुप कर पाक बनने का दवा करती है. लेकिन अंदर

से तू सिर्फ छुम की भूखी आवारा है, है न? क़बूल कर— किसी को नहीं छुपा रही, खास कर मुझे नहीं.

अम्मी: (आवाज़ कांप रही, आँखों में आंसू) लेकिन… लेकिन गन्दगी… मैं तुझे मैला नहीं करना चाहती.

काम से काम कंडोम उसे कर अगर गांड hi मारनी है. ड्रावर में हैं— प्लीज, गजेंद्र. तेरा लुंड मेरी

… मेरी टट्टी से ढाका नहीं देखना चाहती. यह घिन आती है; सब बर्बाद कर देगा.

गजेंद्र: (सर हिलाते) कंडोम होता भी तो तेरे ऊपर उसे नहीं करता, तू गन्दी रानी. मुझे तेरी गरम टट्टी

मेरे लुंड पर महसूस करना पसंद है— वह मुझे नेचुरल लुबे की तरह कोट करती है, स्लिक और मिटटी जैसी

तेरी अंदर से. पिछली बार जब मेरे शाफ़्ट पर वह भूरी लकीर दिखी, उसने मुझे और ज़ोर से छोड़ने पे मजबूर

किया. तेरी टट्टी तेरी हिस्सा है, शाहिदा— गरम, मुस्की, सीधे उस शाही छेद से. वह मेरे लुंड को ऐसे गरम

करती है जैसे कोई और चीज़ नहीं, जैसे हराम गले लग्न. क्यों इस इंटिमेसी को छुपाऊ? यह तुझे मेरी ख़ास

रंडी बनता है— बिस्तर की रानी, मेरे लुंड पर टट्टी कर के जैसे यह तख़्त हो. इसको क़ुबूल कर; यह कंडोम से

बेहतर है.

अम्मी: (सिसकारी, जिस्म उसके खिलाफ ट्वीटच कर रहा) मैं डर्टी हूँ… अगर बिस्तर मैला हो गया तो? हुसैन अगले

कमरे में है, नशे में पड़ा लेकिन घर में hi. अगर जाग गया और गन्दगी देखि— दाग, बू… सब ख़तम

हो जायेगा. प्लीज, सोच ले— हम यह खतरा नहीं ले सकते.

गजेंद्र: (अचानक बहार निकाल कर उसके चेहरे पर ज़ोर का थप्पड़, आवाज़ कमरे में गूंजी) मुँह बंद कर, तू

नाशुक्रा कुटिया! (फिर थप्पड़, और सख्त, गाल पर लाल निशाँ) कैसे हिम्मत की शिकायत करने की जैसे बिगड़ी हुई

छूट? तेरा शौहर बेकार बीमार है, तू खुद ने उसको पाउडर खिला कर सुला दिया, और तू चादर पर थोड़ी टट्टी

से घबरा रही है? तू मुनाफ़िक़ रंडी है, शाहिदा— शादी के बिस्तर पर मुझसे चुद रही है, वही जगह जहाँ

तू वफादार बनने का नाटक करती है. एक शब्द और शिकायत का तो पूरा मोहल्ला जान लेगा तू कितनी छिनाल है.

(फिर एक थप्पड़ ज़ोर से, थोड़ी ज़ोर से उसका थोड़ी पकड़ कर) माफ़ी मांग, तू बेकार गांड का टुकड़ा!

अम्मी: (दर्द और शॉक से चीख कर, फिर जल्दी मुँह दबा लिया, आंसू बह रहे) अहह! आह, दर्द हो रहा! माफ़

करना, गजेंद्र— बहुत माफ़ करना! प्लीज, मुझे माफ़ कर… मैं शिकायत नहीं करना चाहती थी. तू सही है;

मैं सिर्फ बेवक़ूफ़ छिनाल हूँ. फिर मत थप्पड़ मारना… जो तू कहेगा वह करुँगी. बस… धीरे करना. मैं

इस नाशुक्री की सजा डेसेर्वे करती हूँ. ओह खुदा, मेरा गाल जल रहा… लेकिन अब शिकायत नहीं. मैं तेरी रानी हूँ,

जैसे तूने कहा— मुझे उसे कर.

गजेंद्र: (मुस्कुराते, थप्पड़ वाली जगह रगड़ते) अच्छी लड़की. अब शिकायत बंद, वर्ण तेरी गांड को थप्पड़

मरूंगा जब तक वह तेरे चेहरे जैसा लाल न हो जाये. पेट के बल लेट जा, शाहिदा— गांड के टुकड़े फैला. अब तेरी

शाही छेद भरने का वक़्त.

अम्मी: (सर झुकाते, पेट के बल लेट कर, चेहरा तकिये में दबा) ठीक है… लेट गयी. बस… शुरू में धीरे.

अहह…

गजेंद्र: (पीछे बैठ कर, टुकड़े फैला कर) यह बेहतर है. देख यह छोटा पुकेरेद छेद— अभी भी पिछली

बार से झपक रहा. बेट अभी से मेरे लिए ढीला हो रहा. (उस पर थूक कर लुबे, फिर धीरे से सर अंदर)

महसूस कर, छिनाल? मेरा लुंड तेरी टट्टी वाली जन्नत में घुस रहा.

अम्मी: (तकिये में मुफ्फलेड कराह, चादर पकड़ कर) ममम… ओह्ह्ह… फ़ैल रहा है मुझे… प्लीज, बहुत तेज़

मत…

गजेंद्र: देर हो गयी— सब ले ले, तू गन्दी _ अम्मी. तेरी गांड वाईस की तरह जकड रही. और अगर थोड़ी

टट्टी बहार आयी तो? मैं उसे तेरी पीठ पर मालिश कर दूंगा ताकि याद रहे तू क्या है.

उस पल मुझे एहसास हुआ मैं खुद कितना गिर चूका हूँ, हर मायने में सदा बीटा बन गया. यहाँ मैं

अपनी अम्मी को थप्पड़ कहते और दबाये जाते देख रहा था, और रुकने के बजाये, उसकी इज़्ज़त बचने या काम

से काम इस खौफ को सामना करने के बजाये, मैं खड़ा था गरम होकर, हाथ झांग के बीच तेज़ तेज़

चलते हुए.

कैसा बीटा है यह? वह लड़का जो कभी उसके साथ घर के काम करता था, मस्जिद में उसके बगल में ,,.,

पढता था, उसको घर की ताक़त का रूप मानता था— अब यह झाँकने वाला साया बन गया, उसकी be-izzati से

मज़ा ले रहा. सिर्फ काम नहीं; यह हमारे घर के हर उसूल का धोका था, उस ईमान का जो हम दावा करते थे.

मैंने पहले उसके गुनाह देखे थे, लेकिन अब मैं उनका मज़ा ले रहा था, दिमाग उस मंज़र को अपनी लस्ट का ईंधन

बना रहा. गुनाह मुझे कुचलना चाहिए था, लेकिन वह थ्रिल के साथ मिला कर ज़हर बना रहा था जो मुझे

और ज़्यादा नफरत दिलाता था खुद से. मैं अंदर से सदा था, ख़राब, हर राज़ के साथ जो मैंने खोला, मेरी

अख़लाक़ की लेयर उतरती गयी जब तक सिर्फ यह बिगड़ा हुआ देखने वाला बचा नहीं रहा, अपनी अम्मी की be-izzati

पर हाथ चलता हुआ.

कोई नेक बीटा यह होने नहीं देता, यह तो दूर की बात उसमे मज़ा लेना; मैं उसके गिरने का साथी बन गया,

चुपके से उसकी be-izzati का हिस्सा, और यह एहसास सिर्फ उस हराम गरम को और तेज़ कर रहा था.

फिर, एक हाथ उसकी कमर पकड़ कर सँभालते हुए, उसने अपना लुंड उसकी टाइट गांड पर लगाया, धीरे से आगे

दबाया, सर अंदर घुसा एक नरम पॉप के साथ जिसने उसको सिसकारी दी.

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कमरा उनके जिस्मों के मिलने की आवाज़ों से भर गया— चमड़ी का गीला सरकना, उसकी तेज़ सांस, बिस्तर की चादर

का हल्का चीखना जब वह एडजस्ट कर रही थी. मैं आँखें भर कर नहीं देख प् रहा था: मेरी _

अम्मी, शाहिदा, वह औरत जो रोज़ पांच वक़्त सर धक् कर ,,., पढ़ती थी, अब तीसरी बार काफिर के लुंड को अपनी

गांड में ले रही थी.

अब्बू ने कभी उसको वहां छुआ भी नहीं था, जितना मैं सोच सकता था; उनकी शादी इज़्ज़त पर, ईमान की पाकिज़ागी

पर बानी थी, जहाँ ऐसे काम ghair-fitri, हमारे मज़हब में हराम थे.

फिर भी यहाँ गजेंद्र, हमारे मज़हब के बहार का मर्द, बिना झिझक उस हराम इलाके में घुस रहा था, उस

हिस्से को हासिल कर रहा जो पाक रहना चाहिए था. यह बेहुरमती थी, उसकी सबसे छुपी छेद को अपना हक़ समझ

कर फैलाना, उस तरह स्ट्रेच करना जो उसके वादे का मज़ाक उडाता था.

और गांड क्यों न उसे करे? वह टाइट, छुपी हुई छेद अगर एक्स्प्लोर न हो तो क्या फायदा? मेरे बिगड़े ख्यालों

में यह बर्बाद लगता था अगर ऐसा हिस्सा छूटा रहे, खास कर जब उसकी भरी, गोल गांड पूरी हासिल मांग रही

हो.

अम्मी की गांड, वह पुकेरेद छेद जो निकलने के लिए बना, अब ख़ुशी के लिए इस्तेमाल— यह हर मस्जिद की तालीम

को चैलेंज करता था जिस्म की पाकिज़ागी के बारे में.

लेकिन उस गरम लम्हे में यह लाज़मी लग रहा था, जैसे उसका जिस्म इस दोहरापन के लिए बना: रोज़ का काम और

एक्सटेसी का इमकान. उसकी गांड उसे करने की ज़रूरत उसी बुनियादी ख्वाहिश से थी हर इंच हासिल करने की, कोई हिस्सा

न छूटे, हराम को सबसे बड़ी जीत बना दे.

उसकी बड़ी गांड, इतनी नरम और हिलती हुई, जैसे गांड चुदाई की मांग करती हो— वह भरी टुकड़े फ़ैल कर उसको

जगह देते, धक्के कुशिओं करते, और गहराई दावत देते. ऐसी बड़ी गांड दूर से देखने के लिए नहीं; उसको फैलाना,

अंदर जाना, भरना पड़ता है, कर्व्स मर्द को पकड़ने के लिए परफेक्ट गृप देते जब वह अंदर घुस रहा हो.

गजेंद्र का बड़ा लुंड उसकी गांड में जाना इस काम को और ज़्यादा नुमायां करता था, हर हरकत साफ़, उसकी

चमड़ी रिप्पल करते हुए धक्के के नीचे— यह सबूत था ऐसे जिस्म इस तरह की ख़ुशी के लिए बने हैं.

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यह बहुत गलत था— यह छेद जहाँ से टट्टी निकलती है, गन्दगी और na-paaki की जगह, अब उसके लुंड से भरी हुई,

प्रोफाने और इरोटिक का मिलाप जो ., के तहरा के हर उसूल को तोड़ता था, पाकिज़ागी के.

यह सिर्फ जिस्मानी नहीं था; यह रूह पर हमला था, उस औरत को जो ,,., पढ़ती थी, अब यह गन्दी छेद एक काफिर के लिए

खोल रही थी, हर धक्के के साथ ईमान की be-izzati.

बहुत लोगों ने अम्मी की बड़ी गांड को छोड़ने के ख्वाब देखे होंगे— पडोसी मार्किट में उसकी हिलती चल को देखते,

दुकानदार जब वह कपडे के daam-tol करती तो उसके कर्व्स पर नज़र टिकते, दूर के रिश्तेदार फॅमिली गाथेरिंग्स

में चुपके से देखते जब सोचते थे कोई नहीं देख रहा.

उसकी गांड अपने आप में मशहूर थी, भरपूर और गोल, जो कपड़ों में आसानी से भर जाती थी और बिना कोशिश

के लोगों की नज़र खींच लेती थी, चुप्पी हुई हसरत और नफरत पैदा करती थी. एक कम्युनिटी इवेंट में मैंने

सुना था, मर्द चुपके से मज़ाक कर रहे थे "शाहिदा के एसेट्स" पर, उनकी हंसी में वह हसरत थी जो ज़ोर से

कहने की हिम्मत नहीं थी.

अब गजेंद्र वह ख्वाब जी रहा था, अम्मी की गांड में गहरा घुस कर, हर ज़ोर के धक्के से अंदर की दीवारों

को फैला रहा था. वह आगे बढ़ता रहा, कमर से धक्के देते हुए लुंड और अंदर धकेल रहा, टाइट रास्ता इंच

इंच फैला रहा, फ्रिक्शन से उसका जिस्म जकड़ता और छोड़ता.

फैलाव साफ़ दीखता था— गांड का छेद पहले सख्त जकड रहा था, फिर ढीला पड़ता, अंदर की गहराई उसकी लम्बाई

को क़ुबूल करती जब वह पूरा अंदर तक घुस जाता, पीछे खींचता फिर और गहरा धकेल देता, वह जगहें

छू रहा जो किसी और ने नहीं छुई थी.

उसकी बड़ी गांड हर थप से हिलती, नरम गोश्त जेली की तरह लरज़ रहा, कांटेक्ट पॉइंट से लहार निकलती, गांड के टुकड़े

उसकी रानों से टकराते हुए हिप्नोटिक धुन में उछाल रहे थे, बिस्तर का फ्रेम चीख रहा था.

हिलना जादू सा था, हर धक्के से उसके जिस्म में कम्पन, कर्व्स मोशन को बढ़ाते हुए जैसे गांड खुद ज़िंदा

हो, उसके हमले के जवाब में हिलती हुई.

गजेंद्र की ताक़त गजब थी, जिस्म पसीने से चमक रहा लेकिन रफ़्तार में कमी नहीं, शायद सालों के बिज़नेस

काम से— डील्स करना, गोदाम देखना, वह फिट और बर्दाश्त करने वाला रखता था. वह थकता नहीं जैसे बुज़ुर्ग

मर्द थकते हैं; वह वही सख्त, सजा देने वाली रदम रखता, अम्मी के जवाबों को निकालता.

अम्मी की चीखें दर्द से ख़ुशी में बदली, आवाज़ जोश में बुलंद:

"ओह खुदा... अब बहुत ाचा लग रहा... और गहरा!" अम्मी चीखी, गांड से ख़ुशी हराम थी, हमारे मज़हब

में सबसे बुरा गुनाह, जिस्म की फितरत का बिगाड़, फिर भी यह न रोकने वाला था, सबसे बुरा गुनाह सबसे मीठा

फल सा लग रहा था, उसे खींच रहा था जबकि दोज़ख का वादा था.

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गजेंद्र: (धीरे धीरे धक्के देते हुए, हाथ कमर पर पकडे जब वह शौहर के बिस्तर पर लेती थी, चादर

पहले से उलझी) ओह फ़क, शाहिदा, तेरी गांड कितनी गरम है... जैसे टाइट, मखमली भट्टी मेरे लुंड को लपेट

रही हो. तेरी छूट से भी ज़्यादा गरम, हर धक्के से अंदर खींच रही.

अम्मी: (सांस फूलते हुए कराह, चेहरा तकिये में दबा, जिस्म तन कर) आअह्ह्ह्ह... ऊऊह्ह्ह्हो... गजेंद्र,

प्लीज... धीरे... आह्हः... बहुत ज़्यादा है, अभी इतना गहरा नहीं... ऊऊह्ह्ह...

गजेंद्र: (रफ़्तार थोड़ी बढ़ाते, ख़ुशी से कराह) खुदा, कितना ाचा लग रहा, शाहिदा. जो भी छेद मैंने छोड़ा,

इससे बेहतर नहीं. यह गर्माहट पूरे जिस्म में फैलती है, मेरे बॉल्स टाइट कर देती— जैसे तेरी गांड ज़िंदा हो,

गर्मी से धड़कती जो मुझे पागल कर देती. सब अच्छी औरतें गांड में लेती हैं ऐसे, जानती है? जो मर्द

को पूरा खुश करना जानती हैं, सिर्फ छूट से नहीं. तू अब उनमें से एक है न? पूरी तरह खुलने वाली छिनाल.

अम्मी: (सिसकारी, चादर पकड़ कर) आह्हः... हाँ, लेकिन... ऊऊह्ह्ह्हो... धीरे, गजेंद्र... थोड़ा दर्द हो रहा.

.. आअह्ह्ह्ह... पूरा अंदर मत... ऊऊह्ह्ह... महसूस हो रहा फ़ैल रहा हूँ...

गजेंद्र: (झुक कर, कान में गरम फिसफिसाहट से धक्के देते हुए) सुन, तेरी गांड मेरी सबसे पसंदीदा है,

शाहिदा— तेरी छूट से कहीं बेहतर. छूट गीली और खुल कर मिलती है, ठीक है, लेकिन यह? यह टाइट छेद वाईस की

तरह निचोड़ता है, हर बार मुझे सूखा कर देता.

अम्मी: (ज़ोर से कराह, दर्द और ख़ुशी मिला) ऊऊह्ह्ह्हो... आअह्ह्ह्ह... ठीक है, ाचा भी लग रहा... लेकिन प्लीज,

और गहरा नहीं... आह्हः... तू बहुत बड़ा है इसके लिए... ऊऊह्ह्ह...

गजेंद्र: (सख्त आवाज़, हल्का थप्पड़ गांड पर) गांड के टुकड़े फैला मेरे लिए, शाहिदा. अभी कर— दिखा

कितना चाहती है. पूरे फैला कर रखो ताकि मैं अंदर तक घुस सकूं.

अम्मी: (रुक कर लेकिन मान कर, कांपते हाथों से पीछे फैलाती, एक पल be-sharm) ठीक है... ऐसे?

ऊऊह्ह्ह्हो... देखो कितना खुला हूँ तेरे लिए... आअह्ह्ह्ह... लेकिन धीरे...

गजेंद्र: (मुस्कुराते, अचानक गहरा धक्का देते जब वह फैलाती, पूरा अंदर) बस यह— अच्छी लड़की. फ़क, अब

और गरम, पूरा अंदर. तेरी गांड मुझे पूरा निगल रही.

अम्मी: (तेज़ चीख, जिस्म कमर से उठा) आआह्ह्ह्ह! गजेंद्र! बहुत गहरा! दर्द हो रहा!

गजेंद्र: (हाथ मुँह पर दबा कर, ज़ोर से धक्के) चुप कर, बेवक़ूफ़ रंडी! ऐसे चीखेगी तो पूरा मोहल्ला

जाग जायेगा. क्या, चाहती है तेरा नशेड शौहर सुने उसकी दीनदार बीवी गांड मरवा रही है?

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अम्मी: (हाथ के नीचे डाब कर, फिर थोड़ा हटती, शिकायत) लेकिन... आअह्ह्ह्ह... जब तू इतना गहरा जाता है

सच में दर्द होता... ऊऊह्ह्ह्हो... चीख रोक नहीं पाती... तू मुझे चीयर रहा... प्लीज, थोड़ा पीछे...

गजेंद्र: (रफ़्तार न घटते, मज़ाक उड़ाते) दर्द? यही मक़सद है, छिनाल. और याद रख, हुसैन बैठक

में खर्राटे ले रहा है उस पाउडर से जो तूने दिया. लेकिन नशेड भी अगर तू बांसुरी की तरह चीखेगी तो

जाग सकता है. चाहती है वह पकडे बीच में, गांड ऊपर कर के पडोसी के लिए?

अम्मी: (कराह, be-sharm इक़रार निकल आया) ऊऊह्ह्ह... नहीं... लेकिन इतना भरा हुआ महसूस... आअह्ह्ह्ह...

शायद थोड़ा गहरा अब... ऊऊह्ह्ह... नहीं चाहती वह सुने...

गजेंद्र: (धीमे हँसते, रदम से ठोकते) वही है— असली _ रंडी. दिन भर वैल में छुपती,

,,., पढ़ती, लेकिन रात को? अपने सबसे हराम छेद में ***** लुंड फैलाती. यही तुझे ख़ास बनता है,

शाहिदा— दिन में दीनदार बेहेन, अंदर से शैतान की खेलनी. तेरा मज़हब पाकिज़ागी, हाय, no जीना सिखाता

... फिर भी तू यहाँ, गांड मेरे लुंड के ird-gird जकड रही. ऐसी औरतें पवित्र बनने का नाटक करती हैं,

लेकिन असल में रंडियां होती हैं जो असली मर्द का इंतज़ार करती हैं बर्बाद करने का.

अम्मी: (फिर शिकायत, आवाज़ कांप रही) आअह्ह्ह्ह... यह ठीक नहीं... ऊऊह्ह्ह्हो... मैं अच्छी बनने की

कोशिश कर रही... लेकिन तेरा लुंड... भुला देता है... आह्हः... मेरे ईमान के बारे में ऐसा मत बोल...

गजेंद्र: (गहरा धक्का देते हुए ज़ोर देकर) ओह, लेकिन सच है. _ रंडियां जैसे तू सबसे अच्छी होती

हैं; साड़ी rok-tok जमा होती है, और फूट पड़ती है तो सबसे ज़ोर से लेती हैं. हुसैन शायद जन्नत के

ख्वाब देख रहा है जब उसकी बीवी उनके बिस्तर पर गांड मरवा रही. क़बूल कर— तू लुंड की असली ईमान वाली

है.

अम्मी: (be-sharm कराह, थोड़ा हार मानती) ऊऊह्ह्ह... हाँ, अब बहुत ाचा लग रहा... आअह्ह्ह्ह... जारी

रख... लेकिन अगर ज़्यादा दर्द हो तो धीरे... ऊऊह्ह्ह... तू सही है, मैं रंडी हूँ...

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गजेंद्र: (कराह, क़रीब पहुँचते) देखा? मेरी लड़की. तेरी गांड और गरम हो रही— महसूस कर कितना ढीला

सही से हो रहा? सब अच्छी औरतों को तुझसे सीखना चाहिए: छूट फ़र्ज़ के लिए, गांड मज़ा के लिए. क्यों

पसंदीदा? टाइट, गन्दी, और यहाँ तू पूरी तरह झुक जाती है. Aadha-adhoora नहीं.

अम्मी: (फिर शिकायत, ख़ुशी मिला) आह्हः... लेकिन हुसैन कभी... ऊऊह्ह्ह्हो... यह बहुत गलत... थोड़ा बहार

निकाल... आअह्ह्ह्ह... वर्ण फिर चीखूंगी...

गजेंद्र: (न सुनते, तेज़ धक्के) चीख जितना चाहे, लेकिन धीमे से, दीनदार छिनाल. सोच अगर तेरा बीटा

अंदर आ जाये— देखे उसकी अम्मी, हाय वाली _, ऐसे गांड मरवा रही. तेरा ईमान मज़ाक है; सब

दिखावा. असली इबादत इस लुंड की है जो तेरी गरम छेद को अपना बना रहा.

अम्मी: (अब be-sharm कराह) ोुह्ह्ह... अपना बना ले... आअह्ह्ह्ह... लेकिन उसको मत जगा... ऊऊह्ह्ह्हो... गहरा,

हाँ...

गजेंद्र: (हाँफते, बढ़ाते हुए) फ़क हाँ. तू _ रंडियों की रानी है— गरम गांड यह साबित करती

है. एक और गहरा धक्का...

मैं मुट्ठ मार रहा था, हाथ तेज़ चल रहा लुंड पर, सामने का लाइव नंगा तमाशा मेरी सबसे अँधेरी

ख्वाहिशों के लिए बना हुआ लग रहा था. उनको रियल टाइम देखना— आवाज़ें, पसीने और उत्साह की हलकी बू,

उसके जिस्म का इस्तेमाल— किसी वीडियो से लाख गुना बेहतर, असलियत हर एहसास को बढ़ा रही थी जब तक मैं खो

गया, तेज़ मुट्ठ मारते, दिमाग सिर्फ जोश के अलावा कुछ नहीं.

अचानक गजेंद्र की आवाज़ काटी, सख्त और जल्दी में. "मैं झड़ने वाला हूँ, शाहिदा... तेरी टट्टी मेरे लुंड

पर लगी है, मोती कोट— बिस्तर को इस गन्दगी से बर्बाद नहीं करना चाहता." वह थोड़ा पीछे खिंचा, लुंड पर

भूरे दाग साफ़ दिखे, काम की कच्चाई का सबूत, उसके जिस्म की फिटरी जवाब उनकी हसरत से मिला हुआ.

गजेंद्र: (उसकी टाइट गांड में धीरे धीरे धक्के मारते हुए, हाथों से कमर को ज़ोर से पकडे, माथे

पर पसीना) ओह हरामज़द, शाहिदा, तेरी गांड कितनी सख्त है... लेकिन अब महसूस हो रहा है. तेरी गरम, नरम

टट्टी मेरे लुंड के साथ मिल रही है. जैसे तेरी अंदर की गन्दगी मुझे कोट कर रही हो, तेरी _ आंत से

निकली वह साड़ी मैली चीज़ मेरे अंदर घुल रही है जब मैं और गहरा जा रहा हूँ.

अम्मी: (चेहरा तकिये में दबाये, जिस्म घिन से कांप रहा, आवाज़ डब्बी और डरावनी) ओह नहीं... आआह्ह्ह

ऊऊह्ह्ह. गजेंद्र, यह घिनौनी बात है... अहह... मुझे बहुत घिन आ रही है... प्लीज, ऐसा मत बोलो...

ममम... यह बहुत शर्मनाक है...

गजेंद्र: (थोड़ा तेज़ धक्के, कराहते हुए जब विरोध महसूस होता) घिन? तू hi तो वह है जिसकी टट्टी मेरे

लुंड के ird-gird घूम रही है, शाहिदा. हर टुकड़ा महसूस हो raha—naram टुकड़े टूट कर मेरे लम्बाई पर

फ़ैल रहे हैं जब मैं इस पवित्र छेद को छोड़ रहा हूँ. सोच अगर तेरा शौहर जान ले उसकी बीवी की गांड

एक गन्दा नाला है, जो एक अच्छे ***** लुंड को अपनी रोज़ की टट्टी से मैला कर रही है. जैसे तेरी गन्दगी का

बर्तन हिला रहा हूँ, गरम और चिपचिपा, और इससे मैं और सख्त हो रहा हूँ. तुझे शर्म आणि चाहिए,

बीच चुदाई में अपनी आंत को ऐसे छोड़ने के लिए.

अम्मी: (सिसकारी, चद्दर में मुठी बंद, उलटी की लहार आती हुई) उह खुदा... मैं नहीं... बहुत ज़्यादा है...

ओह्ह... गजेंद्र, बाथरूम चलते हैं... प्लीज... मेरी गांड अब कण्ट्रोल नहीं कर प् रही... अहह... तेरा लुंड

बहुत बड़ा है, सब कुछ बहार धकेल रहा है... ममम... रुकना पड़ेगा वर्ण गन्दा हो जायेगा...

गजेंद्र: (गांड पर ज़ोर से थप्पड़, रुकते नहीं, आवाज़ सख्त और हुक्म वाली) मुँह बंद कर, तू रोने वाली रंडी.

कहीं नहीं जा rahe—main तेरी टट्टी वाली गांड में पूरा अंदर हूँ, और तू यहीं अपने शादी के बिस्तर पर ले.

एक शब्द बाथरूम का और मैं तुझे बाद में जुबां से साफ़ करवाऊंगा. बस अंदर hi रख जैसे वह

पवित्र वैली बनने का नाटक करती है.

अम्मी: (सांस रूकती, कमरे में हलकी मिटटी जैसी बू फैलने लगी, जिस्म मजबूरी से जकड रहा) लेकिन... अहह...

बू... फ़ैल रही है... मेरी... मेरी टट्टी की हलकी तेज़ बू... ओह खुदा, बहुत शर्म की बात है... ममम...

जैसे कोई गन्दा राज़ हवा में निकल रहा हो...

गजेंद्र: (गहरी सांस ले कर, ज़ोर से सूंघते हुए धक्के, कमरे में हलकी बू फ़ैल rahi—musky, गरम, साफ़

टट्टी वाली, पसीने और उत्साह की बू के साथ मिल कर, कमरा एक हराम गन्दगी का धुंधला बन गया) हाँ,

अब महसूस हो रहा है, शाहिदा. तेरी गांड से टट्टी की बू ऊपर आ रही है, कमरे को भर रही जैसे कोई बुरा

पेडू जो छुपा नहीं सकती. अभी तेज़ नहीं, सिर्फ हलकी लेकिन अगर कोई अंदर आये तो घबरा जायेगा. तेरी टट्टी की

बू चद्दर पर चिपक रही है,

अम्मी: (शर्म से कराह, गाल लाल, बू उसके नाक तक पहुंची, घिन और उलटे उत्साह का मिलाप) नहीं... कितनी

गन्दी... अहह... लेकिन तेरा लुंड... वहां ाचा लग रहा... ममम... बू के साथ भी...

गजेंद्र: (आधा बहार निकाल कर देखता, उसके बड़े लुंड पर हलकी भूरी दाग, हलकी रौशनी में चमकती)

देख yeh—teri टट्टी ने मेरे लुंड को थोड़ा कोट कर दिया, शाहिदा. पूरा गन्दा नहीं, लेकिन इतनी चिपचिपी

परत, तेरी गन्दगी की पतली चादर मेरे चमड़े पर.

अम्मी: (हिलती हुई, खुद चिपचिपाहट महसूस, आवाज़ शिकायत और मजबूरी से क़ुबूल) ओह्ह्ह... यह बहुत

घिनौनी है... मत देखो... अहह... मुझे बिलकुल रंडी जैसा महसूस हो रहा... ममम...

गजेंद्र: (पूरा अंदर धकेल, शर्म दिलाते हुए जब बू थोड़ी तेज़) यहाँ मैं तुझे ज़िन्दगी का सबसे ाचा

चुदाई दे रहा हूँ, और तू बदले में अपनी भूरी टट्टी मेरे लुंड पर फैला रही है. अब बू और tez—woh

टट्टी वाली खट्टी खुशबू ऊपर आ रही, जैसे दिन भर रोकी थी सिर्फ मुझ पर छोड़ने के लिए. कैसी औरत

गांड चुदाई के बीच आंत छोड़ देती है? तेरी जैसी मुनाफ़िक़ रंडी, दिन में ., की बात और रात में

लुंड पर टट्टी.

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अम्मी: (ज़ोर से विरोध, गांड उसके ird-gird मजबूरी से जकड रही) गजेंद्र, प्लीज... कण्ट्रोल नहीं कर प् रही

... तेरा लुंड बहुत बड़ा... अहह... मुझे बहुत फैला रहा, अंदर सब पर दबाव... ममम... मेरी मसल्स रोक

नहीं प् रही... ओह खुदा, तेरी गलती इतना बड़ा होने की... नहीं...

गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते, रुकते नहीं) यही होता है जब छोटी _ छेद को असली मर्द का लुंड मिलता

hai—tera जिस्म हार मान रहा, टट्टी लीक कर रही क्योंकि साइज बर्दाश्त नहीं. महसूस कर? हर इंच अंदर

जकड रहा, तेरी गन्दगी टूथपेस्ट की तरह निकल रही. तू मेरा वजह से गन्दी है, और अंदर से पसंद भी

करती है न?

अम्मी: (अब be-sharam कराह, घिन के बावजूद) हाँ... अहह... बहुत ज़्यादा... लेकिन ज़ोर से छोड़ मुझे...

ममम... नहीं, रुक... गन्दी है...

गजेंद्र: (तेज़ धक्के, चेतावनी देते हुए जब वह तन रही) बीएड को पूरी टट्टी से बर्बाद करने से पहले,

मैं जल्दी झाड़ जाऊंगा, शाहिदा. तुझे मेरे बीज से भर दूंगा तेरी गन्दगी के साथ मिला kar—soch बाद

में वह कॉकटेल बहार टपकता हुआ. अब तेज़ और ज़ोर से छोडूंगा, अंदर रख वर्ण नतीजा भुगत.

अम्मी: (फिर शिकायत, जिस्म कमर उठा रही) लेकिन... ओह्ह्ह... बिस्तर... हुसैन को पता चल जायेगा... अहह...

प्लीज, धीरे...

गजेंद्र: (न सुनते, गांड को be-raahmi से पौंड, बिस्तर ज़ोर से चीख रहा) अब देर हो gayi—ab आ रहा.

महसूस कर मेरा लुंड तेरी टट्टी वाली गहराई में थोक रहा. ज़ोर से, tez—teri गांड मेरी है!

अम्मी: (ज़ोर से चीखती, आवाज़ कमरे में गूंजती, दर्द, ख़ुशी और घिन का मिलाप) आआह्ह्ह्ह! गजेंद्र!

बहुत ज़ोर... ओह खुदा... आआह्ह्ह्ह! दर्द हो रहा... ममम... हाँ... नहीं... आआह्ह्ह्ह!

मैंने कहीं ऑनलाइन पढ़ा था, किसी हराम फोरम में रात को, की जब औरत की गांड मरी जाती है और वह

मर्द के लुंड पर टट्टी कर देती है, अक्सर इसलिए होता है क्योंकि वह इतनी गहरी ख़ुशी में होती है; मज़ा

इतना ज़्यादा होता है की कण्ट्रोल छूट जाता है, मसल्स ढीले पद जाते हैं, मजबूरी से निकल जाता है.

जैसे ख़ुशी दिमाग का स्फिंक्टर पर काबू ख़तम कर देती है, ख़ुशी को गंदे मेस में बदल देती है,

पूरी तस्लीम की निशानी. गजेंद्र तब इतना ज़ोर से करहा, जानवर जैसी आवाज़, कमरा भर गयी, एक आखरी

धक्का.

अम्मी उसकी कराह से डर गयी, आँखें फैली हैरानी से, लेकिन पीछे नहीं हटी. उसने अपना सारा दूध

उसकी गांड के अंदर उगला, जानवर की तरह कराह: "ले ले, तू गन्दी _ रंडी... महसूस कर मेरा

छुम तेरी मैली छेद में भर रहा... तू मेरी गांड की रंडी बनने से प्यार करती है न?" अम्मी करहि,

"आआह्ह आह्हः ोूह ओह ओह ओह ाःह गजेन्द्रा!! मेरा प्यार आअह्ह्ह्ह"

यह लफ्ज़ be-izzat थे, उसको बुरी किताबें dete—randi, छिनाल, kutiya—use सिर्फ उसके बीज के लिए बर्तन

बना देते. अम्मी काँप उठी जब उसने अंदर झाड़ दिया, जिस्म गरम बीज से भरने से हिल रहा, ख़ुशी की

लहार शर्म के बावजूद; वह हलके से मुस्कुरायी भी, छुपी हुई मुस्कान, जैसे भरपूर होने से पूरी

हुई.

गजेंद्र और शर्म दिलाया, सांस फूलते हँसते: "महसूस कर रही हो न गांड से मेरे लुंड को जकड

कर हर बूँद निकाल रही... तू कितनी लालची कुटिया है? अभी भी काफी नहीं."

लगभग पांच मिनट बाद, जब सांसें धीमी हुई, वह झुक कर उसकी पीठ पर धीरे चुम्बन

किया, पसीने से गीली चमड़ी पर. "तू कमल है, मेरी सुन्दर शाहिदा," वह धीमे से बोलै, आवाज़

नरम, तसल्ली वाली. "इतनी मज़बूत, इतनी जोशीली. जानता हूँ तेरे लिए मुश्किल है, लेकिन तू रानी की तरह

सेह लेती है."

अम्मी सांस छोड़ी, जिस्म अभी भी कांप रहा. "गजेंद्र... दर्द हो रहा, लेकिन तेरे साथ सही लग रहा

. बस... बहार निकालते वक़्त धीरे. बीएड पर मेरी टट्टी और तेरा छुम फैलना मुश्किल साफ़ होगा बिना किसी

को जगाये."

उसने कंधे पर चुम्बन, लुंड अभी भी अंदर गहरा. "मेरी प्यारी, कोशिश करूँगा. लेकिन मुश्किल है—

तेरी गांड मुझे इतना जकड रही, जैसे छोड़ना नहीं चाहती. हर हरकत में गर्माहट, चिपचिपाहट

मुझे वापस खींचती है. जैसे तेरा जिस्म मुझे हमेशा अंदर रहने को कह रहा हो."

उसने गाइड किया. "धीरे, बहुत धीरे. एक इंच पीछे, मैं जकड कर रोकने की कोशिश करुँगी. लेकिन

... मुश्किल है; तूने मुझे इतना फैलाया, अब ढीली हूँ, खुली हुई."

वह स्किन पर सर हिला. "ठीक है, मेरी जान. Chal—ek इंच... महसूस? कितनी गरम, कितनी घनी. तू बहुत

अच्छा कर रही, मेरी अनमोल."

जब वह धीरे धीरे बहार निकालने लगा, इंच बी इंच दर्द भरा, अम्मी पहले जकड भी नहीं पायी;

मसल्स थक गए थे, लम्बी स्ट्रेचिंग से, स्फिंक्टर ढीला और be-jawaab, वह छेद जो इतना फैलाया

गया था अब जल्दी बंद नहीं हो प् रहा.

वह हल्का झपकते, पूरा जकड नहीं प् रहा, खली होने का एहसास बढ़ता जब वह बहार, जिस्म कण्ट्रोल

हार रहा बाद में. टट्टी और उसके बीज का मिलाप थोड़ा बीएड पर tapka—bhuri, सफ़ेद क्रीम वाली बूँद

चद्दर पर दाग, मिटटी की बू हलकी उठी, उनके मिलान की गन्दी याद.

मिलाप चिपचिपा, कपडे पर छोटे छोटे धब्बे, उसका सफ़ेद बीज उसकी टट्टी से धरा, साफ़ बिस्तर को गुनाह

का सबूत बना दिया.

गजेंद्र बहार निकाल कर शर्म दिलाया, आवाज़ मज़ाक वाली: "देख तेरी हालत, गन्दी randi—sahi तरह रोक

भी नहीं पायी. तेरी गांड मेरे लुंड से बर्बाद, टट्टी हर तरफ टपक रही जैसे टूटा नल. कैसी बीवी है

तू, टट्टी और झड़ना हर तरफ फैला रही?"

बुरी किताबें barasti—gandi कुटिया, ढीली छेद, मैली suar—har एक उसकी be-izzati गहरी करती, बता रही

कैसे उसका जिस्म बाद में रोक नहीं पाया, पहले टाइट गांड अब ढीली और टपकती, पूरी तस्लीम की निशानी.

अम्मी फिर सीढ़ी हुई, चेहरा शर्म से लाल, बाथरूम की तरफ भागी, हाथ टांगों के बीच दबा कर

लीक रोकने की कोशिश. अंदर जा कर दरवाज़ा बंद, गांड थोड़ी जकड पायी, मसल्स हल्का कॉन्ट्रैक्ट, लेकिन

कमज़ोर, पौण्डिंग के बाद फ्लटर hi था.

उसकी गांड इतनी ढीली थी गजेंद्र के मोठे लुंड se—usne अंदर से रेशपे किया, छेद फैला और नरम,

इलास्टिसिटी वक़्त के लिए खो गयी. टट्टी और बीज टांगों पर गरम निशाँ छोड़ते टपके, चिपचिपा और

शर्मनाक, जिस्म पर उनके मिलाप की चमक जब वह टॉयलेट की तरफ दौड़ती.

मैं तब इतना ज़ोर से झाड़ गया, गरम स्पोर्ट्स हाथ पर, इंटेंसिटी से घुटने कांप गए, दीवार के सहारे.

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यह बिल्डप बहुत tha—nazaare, आवाज़ें, सबकी गलतनेस मुझे हद्द पार कर गयी.

बाथरूम से सुना अम्मी टॉयलेट में ज़ोर ज़ोर से पेडू और tatti—prrrrt, सप्लाट, बररआप— पपपरररर!!

बब्बररररपपररर!!

पेडू लम्बी, गरज जैसे, फिर पानी पर टट्टी गिरने की आवाज़, हर एक पहले से तेज़ जब हवा और गीला

बहार निकल रहा उसकी थकी गांड से.

वह ज़ोर ज़ोर से पेडू कर रही थी बाक़ी टट्टी और गजेंद्र के बीज निकालने के लिए, प्रेशर से सब कुछ

निकल रहा, आंत पूरी खली कर रही कुछ नार्मल होने के लिए.

गजेंद्र बिस्तर पर बैठा, तिसुएस से अपने बीज और उसकी टट्टी साफ़ कर रहा, आवाज़ों पर ज़ोर से हँसता.

"ः, सुन यह! तू वहां ट्रम्पेट बजा रही, Shahida—mere तोहफे को सब बहार फ़ेंक रही!"

अम्मी दरवाज़े के पीछे से भी हंसी, शर्म और रहत मिला. "गजेंद्र, बस कर! मत hanso—teri गलती

है. इतना गहरा गया, सब हिला दिया. अब मैं भुगत रही हूँ."

वह और ज़ोर से हंसा. "अरे आ न, मेरी जान. बहुत मज़ाक है. Prrrt—aur एक! तू वहां घर साफ़ कर

रही. लेकिन सच में, यह प्यारा है. तुझे इंसान बनता है, सिर्फ मेरी परफेक्ट रंडी नहीं."

उसने फिर pedu—brraap, sploosh—aur हंस कर. "देखा? अब तू भी हंसा रही, रुक नहीं रहा. तू बुरा है

यह सब ेन्सॉरगे करने वाला. लेकिन... अब ाचा लग रहा है."

अम्मी ने टॉवल से अपनी गांड और टांगों पर टट्टी का दाग पोंछा, टॉवल भी बहुत गन्दा हो गया.

फिर उसने नहाने का फैसला किया और जब नाहा रही थी, वह मुस्कुरायी, पता नहीं क्यों लेकिन मैं जानता

था उसको गजेंद्र की तरफ से रंडी जैसी be-izzati बहुत पसंद आयी थी.

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