Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran - Page 4 - SexBaba
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Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran

CHAPTER 25

अब से मैं अपनी माँ को गजेंद्र की रंडी मानता हूँ, पापा की बीवी नहीं. वह इम्पुरिटी

से पूरी तरह धूस गयी है.

सुबह हो गयी. रास्ते से गुजरने वाले लोग हमारे घर को देखते तो सोचते— यहाँ नेक लोग रहते हैं, रोज़ाना तिलावत,

हलाल खाना साथ बाँट कर, घर वाले kitab-e-muqaddas की तालीम से बंधे हुए.

लेकिन अंदर, ओह अंदर तो यह गन्दगी का ब्रॉथेल बन चूका था, छुपे गुनाहों का अड्डा जो हर कोने को मैला कर चूका

था. हवा भारी थी रात के दबौचेरी के निशानों से: शादी के कमरे के बिस्तर पर पसीने से भीगी चादरों की

मुस्की बू जहाँ अम्मी ने गजेंद्र के सामने अपने आप को समर्पित कर दिया था, शरीर के फ्लुइड्स की तेज़, तीखी बू और

गजेंद्र के अम्मी की गांड में जाने से निकली मिटटी जैसी टट्टी की गन्दी बू— अम्मी की टट्टी, जल्दी साफ़ न होने की वजह

से स्मीयर हुई हुई.

मैं उस सुबह थका हुआ उठा, जिस्म भारी रात के बेचैन ख्वाबों से जो मैंने देखे थे. पतली चादर के नीचे हिलते

हुए महसूस हुआ मेरे लुंड के ird-gird सूखी मणि की कृसत्य लेयर, छिपके हुए देखने के वक़्त अपनी शर्मनाक निकलने

की चिपचिपी याद.

मुँह बनाते हुए उठा, आँखें रगड़ कर धुप से बचाया. जल्दी से ब्लैक शार्ट और सादा t-shirt पहना, कपडा जिस्म पर

ठंडा लगा, उम्मीद थी नया कपडा गुनाह को धोने देगा, लेकिन वह बू की तरह चिपका रहा. नंगे पाऊँ हॉलवे में

चलते हुए पहले नज़र पड़ी अब्बू पर जो सोफे पर अभी सो रहे थे, सीना ऊपर नीचे हो रहा था गहरी, ghair-tabee

साँसों में.

रात को अम्मी ने जो दवाई चाय में डाली थी वह उस पर भारी थी, उसे मजबूर be-hoshi में रखे हुए ताकि वह

गजेंद्र के साथ अपना अफेयर बिना रुकावट के कर सके. अब्बू का चेहरा सुकून भरा था, बच्चे जैसा, be-khabar की

उनकी बीवी ने यह सब प्लान किया था उनके शादी के बिस्तर पर धोका देने के लिए.

क्यूरियस और बेचैन होकर मैं शादी के कमरे के दरवाज़े की तरफ धीरे से गया, जो थोड़ा खुला था. अंदर झाँक कर

देखा गजेंद्र अभी गहरी नींद में बिस्तर पर पड़ा था, चौड़ी सीना नंगा, एक बाज़ू फैला हुआ जैसे यह जगह उसकी हो

जो असल में अब्बू की थी. कमरा बिखर गया था: तकिये इधर उधर, हवा में उनके मिलान की गर्मी.

लेकिन अम्मी कहाँ थी? दिल तेज़ धड़का. वह बिस्तर पर नहीं, अटैच्ड बाथरूम में भी नज़र नहीं आयी. पीछे हटा कर

मैंने घर में उसकी तलाश शुरू की, धीमे क़दमों से.

पूरा घर पसीने और रात की उस ख़ास, चिपकी हुई टट्टी की बू से भरा था— अम्मी की टट्टी, जब गजेंद्र ने उसकी गांड

मारी थी, जल्दी में पूरी साफ़ न होने की वजह से. यह बू कॉरिडोर में फैली हुई थी, याद दिलाती कितना नीचे गिर

चुके थे हम.

जब मैं घर के पीछे छोटे एक्सरसाइज एरिया में घुमा— योग मत और कुछ डम्ब्बेल्स वाला छोटा सा— वहां उसको

देखा. अम्मी वाइट शार्ट में थी जो टांगों से चिपकी हुई, मैचिंग वाइट टॉप जो कर्व्स पर कासी हुई, और हैरान करने

वाला— वाइट वैल सर पर लपेटा हुआ, जैसे दीनदारी और प्रोवोकेशन को मिला रही हो.

वह अपनी रूटीन में थी, स्ट्रेचिंग और हलके स्क्वाट्स, जिस्म की फ्लुइडिटी से गांड हर हरकत में थोड़ा हिल रही थी. माथा

पर पसीना, सांस स्टेडी, फॉर्म पर फोकस. उस तरह देख कर एक पल ख़ुशी हुई— वह ज़िंदा लग रही थी, खुद का ख्याल

रख रही— लेकिन फिर खतरा याद आया.

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गजेंद्र अभी घर में था, अब्बू लिविंग रूम में द्रुग्गेड; वह कैसे फ़िक्र नहीं करती? वह हमारे घर को बर्बाद

करने को तैयार लग रही थी, इतने रेवेलिंग कपड़ों में जिस्म दिखा कर जब खतरा पास था. यह be-dari मुझे गरम कर

गयी, शॉर्ट्स में अनवांटेड हलचल जब मैं उसकी be-dari की तारीफ कर रहा था. वह डर्टी क्यों नहीं? अब्बू के अचानक

जागने से, पड़ोसियों के खिड़की से देखने से?

मैं धीरे पास गया, गाला साफ़ कर के आवाज़ दी. “अस्सलामु अलैकुम, अम्मी. इतनी सुबह एक्सरसाइज कर रही हो. अच्छा लग

रहा है.”

वह सीढ़ी हुई, हाथ की पीठ से माथा पोंछा, चेहरे पर मुस्कराहट. “व अलैकुम अस्सलाम, बीटा. हाँ, सोचा दिन

शुरू होने से पहले जल्दी सेशन कर लून. एनर्जी देती है. तू ने नींद कैसी ली?”

“ठीक थी, शायद. थोड़ी बेचैन. अब्बू अभी सोफे पर सो रहे हैं. वह ठीक हैं? फज्र के लिए तो उठ जाते हैं.”

अम्मी का चेहरा नहीं बदला, लेकिन आँखें एक पल झुकी. “ओह, वह ठीक हैं. शायद कल से थक गए. हॉस्पिटल से

रिकवरी में वक़्त लगता है न? रात भर पथ्थर की तरह सोये रहे. थोड़ा और आराम करने दो.”

फिर हम और बातें करने लगे, हलके टॉपिक्स पर. “तो नाश्ता क्या है?” मैंने दीवार के सहारे पुछा.

वह धीमे से हनासी, पाऊँ छूने झुकी. “सोचा अंडा और पराठा. या फिर हल्का कुछ, आज गर्मी है. तू क्या

चाहता

है?”

“अंडे अच्छे लगेंगे. वैसे, जाबिर से बात हुई लटल्य? सोचा कॉल कर लून.”

“नहीं रिसेंटली, लेकिन कर लेना. दोस्ती ज़रूरी है. और पढाई कैसी चल रही? तू इस बारे में चुप रहता है.”

बाद में वर्कआउट ख़तम कर अम्मी बाथरूम में नहाने गयी. बहार निकली तो leopard-print जुंपसुइट पहना था

जो हर

चउरवे पर कैसा हुआ, बोल्ड पैटर्न हिप्स और बस्ट को हाईलाइट कर रहा था, बिलकुल मॉडेस्ट नहीं.

कपडा स्लीक, चमकदार, हलके ज्वेलरी के साथ, मॉडर्न और कॉंफिडेंट लग रही थी. उसने पहले गजेंद्र के लिए

नाश्ता

बनाया, ट्रे में चाय, टोस्ट और फल ले कर बैडरूम में गयी जहाँ वह जाग रहा था. अब्बू की तरफ देखा भी

नहीं

उठाने या खाना देने के लिए; गजेंद्र उसका फोकस था, प्रायोरिटी साफ़ बदल गयी.

इसका मतलब वह पूरी तरह उसकी लवर बन चुकी थी, शौहर को बिना पछतावे के साइड कर दिया, घर के अंदर

आने वाले

को घर का सर पर रख दिया. यह हमारे फॅमिली के डायनामिक्स का पूरा उल्टा था— अब्बू प्रोवाइडर थे, अब बाद में,

जबकि

बहार वाला पहला.

फिर भी अब वह बहुत केयरफुल थी, इधर उधर देखती प्राइवेसी के लिए, हरकतें प्लान किया हुआ फसाड बनाये

रखने के

लिए.

उनकी बात धीमे से आयी जब वह ट्रे रखती थी. “गुड मॉर्निंग, गजेंद्र. तेरे लिए नाश्ता लाया. खा ले जाने

से

पहले.”

वह बैठा, आँखें रगड़ कर, ग्रीन फैला. “शाहिदा, तू मेरे लिए बहुत अच्छी है. कल रात कमल थी. तू आग थी.”

वह शर्मा गयी लेकिन मुस्कुरायी. “श, धीमे. हाँ, थी. अब सीरियसली, जल्दी जा हुसैन जागने से पहले या

मेरा बीटा देख ले. दवाई का असर जल्दी ख़तम होने वाला है.”

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उसने कमर से खींच कर पास किया. “इतनी जल्दी क्या? थोड़ा मज़े ले लून. तू इस जुंपसुइट में शानदार लग रही. एक

राउंड और चाहता हूँ.”

“गजेंद्र, नहीं. अभी नहीं. रिस्क नहीं ले सकते. जा, प्लीज. बाद में मिलते हैं.”

वह झुका, गहरा चुम्बन, हाथ गांड पर गए, पतले कपडे के ऊपर नरम गोश्त निचोड़ा. अम्मी ने मजबूरी

से चुम्बन तोडा. “बस. अब जा, देर हो जाएगी.”

“ठीक है,” वह खड़ा हुआ. “लेकिन आज रात— फिर छोड़ना चाहता हूँ. वही आग, वही सब.”

वह रुक गयी, फिर सर हिला दिया. “ठीक है. आज रात. अब जल्दी जा.”

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वह पीछे के दरवाज़े से निकल गया, चुपके से. अम्मी पीछे देखती रही, अब्बू को चेक किया जो अभी धीमे

खर्राटे ले रहे थे. वह जानती थी सुबह होने से दवाई का असर काम होने वाला था, कभी भी जाग सकते थे.

मैं जानता था वह हमारे घर को पूरा जलाना नहीं चाहती, इसलिए अच्छी _ बीवी की तरह छुपाती थी—

दीनदारी का ढोंग बनाये रखते हुए अपनी ख्वाहिशें पूरी करती.

एक सांस ले कर उसने झाड़ू और बाल्टी उठायी, फर्श साफ़ करने लगी, रात के गंदे निशाँ मिटटी हुई.

बाद में धीरे से अब्बू को उठाया.

अम्मी: (अब्बू के कंधे धीरे हिला कर, आवाज़ मीठी और फिकरमंद) हुसैन, उठो हबीबी. सुबह हो गयी. कल रात

सोफे पर सो गए. आओ, आँखें खोलो.

अब्बू: (सुस्ती से बैठ कर, आँखें रगड़ कर कंफ्यूज) हँ? क्या... शाहिदा? मैं यहाँ क्यों? पूरी रात सोफे पर

सोया? सर भरी लग रहा... जैसे बेहोश हो गया था.

अम्मी: (मासूम मुस्कराहट, उसे सीधा बैठने में मदद) ओह बेचारा. डिनर के बाद पुराण क्रिकेट मैच देख

रहे थे टीवी पर, याद है? बीच में सो गए. तुम्हे डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी— इतने सुकून से सो रहे थे. लो,

पानी ले लो.

अब्बू: (पानी ले कर धीरे पी, अभी भी घबराया) क्रिकेट मैच? मुझे... याद नहीं. आखरी बात शाम को तेरे

साथ चाय पीते हुए याद है. उसके बाद कुछ ब्लेंक. अजीब है. सर तो नहीं लगा?

अम्मी: (हाथ पैट कर तसल्ली से) नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं. बस दिन भर थके हुए थे. रिकवरी में ज़्यादा म्हणत

कर रहे हो. शायद इसलिए याद थोड़ी कमज़ोर है. फ़िक्र मत करो, मैं हूँ न तेरे लिए.

अब्बू: (माथा छू कर, दर्द से) हाँ शायद... लेकिन ठीक नहीं लग रहा, शाहिदा. जिस्म दर्द कर रहा, पेट

घबराया हुआ. जैसे हैंगओवर. यह नार्मल नहीं.

अम्मी: (सहानुभूति से सर हिला, आवाज़ केयरिंग) ओह हुसैन, बहुत बुरा लग रहा होगा. अभी हॉस्पिटल जा कर चेक करा

लो. शायद दवाइयों का साइड इफ़ेक्ट या थकन जमा हो गयी. पहले हल्का नाश्ता बना देती हूँ— कुछ भरी नहीं,

सिर्फ टोस्ट और चाय पेट सेटल करने के लिए.

अब्बू: (रुक कर सोच) नाश्ता... कल रात क्या खाया या पिया था? कुछ अजीब तो नहीं था? शायद उसी से यह.

अम्मी: (आवाज़ स्टेडी और गरम) कुछ आम से अलग नहीं, हबीबी. तेरा पसंदीदा— सादा दाल चावल, वह हर्बल चाय

जो सेहत के लिए पीते हो. सब अच्छा, हलाल चीज़ें तुझे मज़बूत रखने के लिए. तू ने कहा था टास्ते परफेक्ट है टीवी

देखने बैठने से पहले. ज़्यादा सोच मत; अभी पूरी रिकवरी नहीं हुई.

अब्बू: (अचानक हवा सूंघते, भौं सिकोड़) रुक... यह बू क्या है? जैसे... कोलोन या कुछ. तेज़, मुस्की. पहचानी

सी— जैसे पडोसी गजेंद्र का परफ्यूम. वह यहाँ था?

अम्मी: (एक पल जैम गयी, आँखें शॉक से फैली फिर संभाली, आवाज़ थोड़ी रुक रुक) गजेंद्र? ओह... हाँ, सुबह थोड़ी

देर आया था. बस देखने आया तू कैसा है, पडोसी वाली फ़िक्र. कुछ मिनट पहले गया. मैंने नहीं बताया क्योंकि तू सो

रहा था.

अब्बू: (सर टेढ़ा कर कंफ्यूज) सुबह? लेकिन बू इतनी तेज़... जैसे ज़्यादा देर था. मुझे क्यों नहीं उठाया? ठीक से सलाम

करता. वह मोहल्ले में मदद करता है; hello न कहना बदतमीज़ी है.

अम्मी: (जल्दी रिकवर, मुस्कुराते) सोचा था, लेकिन तू इतने गहरे खर्राटे ले रहा था, हुसैन. आराम डिस्टर्ब नहीं करना

चाहती थी— अभी तुझे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. गजेंद्र ने समझा; सलाम कहने को कहा और बोलै जब तू बेहतर

हो तब आएगा.

अब्बू: (धीरे सर हिला, माथा रगड़ते) ठीक है, समझ आता है. लेकिन यह सर दर्द... हाँ, तू सही कह रही.

हॉस्पिटल जा कर डॉक्टर से मिल लून. शायद टेस्ट करवा लून.

अम्मी: (उसके साथ कड़ी, उठाने में मदद) हाँ, अभी जा हबीबी. आराम से— गाडी धीरे चलना. मैं यहाँ

ख़तम कर के थोड़ी देर में आ जाउंगी. फार्मेसी से कुछ चाहिए तो ला देना.

अब्बू: (चाबी ले कर, दरवाज़े पर रुक) शुक्रिया, शाहिदा. तू हमेशा मेरे लिए इतनी अच्छी. पहुँच कर टेक्स्ट कर दूंगा.

अम्मी: (मीठी मुस्कराहट से हाथ हिला) सब ठीक हो जायेगा. लव यू.

(अब्बू निकल गए, दरवाज़ा बंद कर के.)

अम्मी: (खुद से, खिड़की से उनको जाते देख कर स्मिर्क) ओह, बहुत उस्ताद तरीके से संभाला. उस बेवक़ूफ़ से झूठ

बोलना कितना आसान— पसीना भी नहीं आया. हुसैन, तू कितना अहमक़ है. जब गजेंद्र पहली बार आया था मैंने

तुझे चेतावनी दी थी, बोलै बहुत फ्रेंडली, बहुत चार्मिंग लगता है. लेकिन नहीं, तू ने उसको भाई जैसे भरोसा किया,

चाय पे बुलाया. और अब? अब गजेंद्र हर मौके पर मुझे पागल कर के छोड़ता है, तेरे सामने. तेरी गलती है— तेरी

कमज़ोरी, तेरी बिमारी ने मुझे असली मर्द की भूख दी. खुद को ब्लामे कर इतने सालों से मुझे सटिस्फी न करने के

लिए.

तू इतना अँधा कैसे, बेकार शौहर? अपने बिस्तर पर बीवी को रंडी की तरह चुड़ते हुए नोटिस नहीं कर सकता, हर

छेद से छुम टपकता जब तू द्रुग्गेड सूअर की तरह खर्राटा है. चाय में पाउडर इतनी आसानी से डाला, और तू ने

बिना सवाल पि लिया. बेचारा. तू इस धोके का हक़दार है— तेरा छोटा लुंड कभी गजेंद्र की तरह मुझे

झड़वाया नहीं, मुझे फैला कर, मुझे अपना बना कर.

मुझे तुझ पर धोका देना पसंद है, हुसैन, हमारी शादी अब बोरिंग है. तुझ पर धोका देना कितना ाचा लगता

है हुसैन, यह थ्रिल, यह ताक़त.

तुझे be-khabar लड़खड़ाते देख कर जब मैं दुसरे मर्द की बू से भरी हूँ? मज़ेदार. और तेरी सेहत? मुझे

अब परवाह नहीं. हॉस्पिटल में साद, जितना चाहे— शायद ज़्यादा वक़्त मिले गजेंद्र के लिए टाँगे फ़ैलाने को. तू

अब सिर्फ बोझ है, बेवक़ूफ़, अँधा ककोल्ड. मैं क़सम खाती हूँ, अब दिखावा ख़तम. मैं गजेंद्र की रंडी

हूँ, तू सिर्फ बैकग्राउंड का बेवक़ूफ़.

उसी सुबह, हमारी पड़ोसन आंटी नफीसा अम्मी से मिलने आयी.

अम्मी: (दरवाज़ा खोल कर, थोड़ी बिखेरी लेकिन हलकी मुस्कराहट) सलाम अलैकुम, नफीसा! क्या सरप्राइज है. अंदर

आओ, अंदर आओ. इतनी सुबह— पूरा चल कर आयी?

नफीसा: (मुस्कुराते हुए) व अलैकुम सलाम, शाहिदा! हाँ, सोचा आ जॉन. वृंदा पर चलते हैं; बहार अच्छा

है, और हुसैन या तेरे बेटे को जगाये बिना बात कर सकते हैं.

नफीसा: तो बता, बेहेन. कल रात तूने टेक्स्ट किया था “कुछ वाइल्ड हुआ”— मत सोच भूल गयी. क्या है टिया? या कहूं,

क्या है डिक? ( आँख मार कर)

अम्मी: (गहरी लाली, चाय सिप करते) नफीसा, श! इतनी ज़ोर से नहीं. ठीक है... कल रात... पागलपन था. कहाँ से

शुरू करून. गजेंद्र फिर आया.

नफीसा: (जोश से झुक कर, आँखें फैली) गजेंद्र? तेरा हॉट हिंदू पडोसी? ओह मेरा खुदा, सब बता! छोड़ा उसने?

आजा, तू छिनाल, डिटेल्स!

अम्मी: (रुक कर, फिर सांस छोड़) हाँ... किया. मेरे सब छेदों में, नफीसा. यहाँ घर में, जब हुसैन

सिटींग रूम में सो रहा था. मुझे ऐसी रंडी महसूस हो रही है इसको होने दिया.

नफीसा: (हाथों से ताली बजा कर एक्ससिटेड) सब छेद? तू पूरी छिनाल, शाहिदा! जानती थी तेरे अंदर है. पूरा

play-by-play बता— कैसे शुरू हुआ? चुपके आया? ज़ोर दार था? बता, बता!

अम्मी: (कप से खेलती) पाउडर से शुरू हुआ. गजेंद्र ने दिन में यह स्लीपिंग पाउडर दिया. बोलै हार्मलेस है,

बस हुसैन को गहरी नींद देने के लिए ताकि पकडे न जाएँ. मैंने शाम की चाय में मिक्स कर दी, नफीसा.

यकीन है मैंने अपने शौहर के साथ यह किया? वह भरोसा करता था, बिना सवाल पि गया. जल्दी असर हुआ—

कुछ मिनट में काउच पर बेहोश, धीमे खर्राटे. गजेंद्र ने टेक्स्ट किया पीछे दरवाज़ा खोलने को. दिल

धड़क रहा था जब मैंने खोला, जानती थी क्या होने वाला है.

नफीसा: (शरारती हंसी) ओह, तू चालू कुटिया! शौहर को ड्रग कर साइड डिक के लिए? नेक्स्ट लेवल नॉटी. बेट सोच

कर hi छूट गीली हो गयी. कैसा पाउडर? अफ्रोदिसिअस जैसा या सिर्फ बेहोश करने वाला? और हुसैन हिला भी नहीं?

खुदा, यह थ्रिल!

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माँ: (सर हिलाते हुए) बस एक सेडेटिव था, कुछ ख़ास नहीं. हाँ, पूरी रात एक मुस्कले भी नहीं हिला उसने.

बहुत बुरा लग रहा है, नफीसा. हुसैन इतना कमज़ोर हो गया है बिमारी se—woh मुझ पर पूरा भरोसा

करता है, हर चीज़ के लिए मुझ पर निर्भर. और मैं वहां उसके साथ धोका दे रही थी अपने hi घर

में. ऐसी कौनसी बीवी होती है?

नफीसा: (हाथ हिला कर) अरे बस करो यह हमदर्दी, शाहिदा. हुसैन बड़ा आदमी है; वह ठीक हो जायेगा.

कभी खुद के बारे में सोचो! महीनों से उसकी देखभाल कर रही ho—kya तुम्हे थोड़ा मज़ा नहीं मिलना

चाहिए? गुनाह छोडो; रंडी ज़िन्दगी को गले लगाओ.

माँ: (जारी रखते हुए, आवाज़ धीमी) वैसे भी, जब हुसैन बेहोश हो गया, गजेंद्र ने मुझे ड्राइंग

रूम में hi खींच लिया. हमने जोश से चुम्बन किया, उसके हाथ मेरे पूरे जिस्म पर, निघती के ऊपर

से चूचियों को निचोड़ रहा था. हुसैन की खर्राटे बैकग्राउंड में थी, Nafisa—kitna खतरनाक, कितना

गलत. मैं देख सकती थी काउच पर उसका साया, सीना ऊपर नीचे हो रहा था आराम से, और यह दूसरा

मर्द मेरी जुबां चूस रहा था. पहले मैं हटने की कोशिश की, फिसफिसाया 'यहाँ नहीं, अगर वह जाग गया

तो?' लेकिन गजेंद्र हँसा और और ज़ोर से चुम्बन किया, मुझ पर रगड़ते हुए. उसके होंठ सख्त थे, मांगने

वाले, हुसैन के नरम चुम्बनों से बिलकुल अलग. यह बोहोत देर तक चलता raha—main उसके मुँह में

धीमी कराह रही थी, जिस्म धोका दे रहा था, गीली होती जा रही थी.

नफीसा: सोये हुए शौहर के सामने चुम्बन? यह तो बहुत गरम है! उसके लुंड का दबाव महसूस हुआ? बेट

तुम टपक रही थी, छोटी शैतान. जारी rakho—usne वहां ऊँगली की या क्या?

माँ: (सर हिला कर) हाँ... हाथ कपड़ों के नीचे डाला, चुम्बन करते हुए मुझे छेड़ा. फिर मुझे उठा

कर बिस्तर पर ले गया. हुसैन के बिस्तर पर, Nafisa—hamara शादी का बिस्तर.

नफीसा: (हाथ से पंखा करते हुए) उठाकर ले गया? हर छेद में छोड़ा? शाहिदा, तुम सपना जी रही हो!

गांड वाले हिस्से की tafseel—dard हुआ? मज़ा आया? इतनी रंडी हो की उसको तेरी कुंवारी गांड देने दी.

माँ: (नीचे देखते हुए, उलझन में) पूरा वक़्त बुरा लग रहा था. हर धक्के में मेरी क़समें याद

आती थी, हुसैन के साथ बनायीं ज़िन्दगी. वह अच्छे आदमी hain—hamara खर्चा उठाते हैं, मेरे साथ

,,., पढ़ते हैं, बेटे से प्यार करते हैं. और मैं वहां हमारे बिस्तर को मैला कर रही थी, पोर्नस्टार

की तरह कराह रही थी जब वह बिमारी से उभर रहा था. गुनाह लहार लहार आता था; मैं दरवाज़े की

तरफ देखती रहती थी, सोचती थी अगर वह अंदर आ गया, अपनी बीवी को पडोसी के लिए फैली देख कर. रूह चीयर

रही थी, Nafisa—main दीनदार होनी चाहिए, मिसाल. कैसे इतनी नीचे गिर गयी?

नफीसा: (आँखें घुमा कर) फिर से यह बुरा महसूस? शाहिदा, होश में आओ. हुसैन की बिमारी तेरी गलती

नहीं, और तेरी बोरियत भी नहीं. तुम्हे मज़ा हक़ hai—us पर हमदर्दी मत बर्बाद करो.

माँ: (रुक कर, धीमे से क़बूल करते हुए) लेकिन... एक हिस्सा ाचा लगा. सच में ाचा. हुसैन के नाक के

नीचे धोका? यह जोशीला था. हराम थ्रिल ने हर एहसास बढ़ा diya—Gajendra का लुंड बड़ा, सख्त, बेहतर

लगा जितना हुसैन ने कभी दिया. मैं कई बार झड़ी, नफीसा, सालों से इतनी ज़ोर से नहीं. हुसैन इतना पास, इतना

कमज़ोर, यह उलझा हुआ उत्साह जोड़ा. खुद से नफरत हुई, लेकिन जिस्म को पसंद आया. मैं ज़िंदा महसूस हुई,

चाही हुई, औरत जैसे, सिर्फ देखभाल करने वाली नहीं.

नफीसा: (जोश से सर हिला कर) देखा? यही बात है! गुनाह सिर्फ मज़ा बढ़ता है. हमदर्दी मत karo—Hussein का

वक़्त था; अब तुम्हारा है. हम जैसी औरतें रंडी होनी चाहिए, शाहिदा. हर लुंड का मज़ा लो, ज़ोर से सवारी

करो, चूसो, भरवाओ. एक बोर शौहर से क्यों बस? दुनिया भर के लुंड हैं. चुपके से रंडी बनो; यह ताक़त

देता है!

माँ: (आँखें फैल कर) नफीसा, यह कितना शर्मनाक है! लेकिन... जारी रखो.

नफीसा: (आगे झुक कर, जोश में) Bilkul—sharmnaak और सच. .,? सब नकली है, बेहेन. मर्दों ने बनाये

क़ानून औरतों को काबू में रखने के लिए. 'हाय रखो, पर्दा करो, पांच वक़्त ,,.,'—बकवास! यह

हमारी फिटरी ख्वाहिशों से रोकने के लिए. हर वैली के अंदर छुपी निम्फो होती है जो बहार निकलना चाहती

है. मज़हब को छोड़ दो; पाकिज़ागी को छोड़ do—sach में छोड़ दो! लुंड लो, छुम लो, झाड़ लो. ज़िन्दगी छोटी

है नकली पाकिज़ागी के लिए.

माँ: (हैरान लेकिन धीरे सर हिला कर) तुम सही हो... मैं हमेशा इसमें क़ैद महसूस करती थी. ,,.,,

roza—kabhi अंदर की आग बुझाई नहीं. मेरी अम्मी ज़ैनब को कसाई के साथ देख कर? शायद उसको सच पता

था. ., कभी कभी नकली लगता है, जैसे क़ैदी खाना. तुमसे मुतमईन होना आज़ादी देता है.

माँ: (चाय की चुस्की लेते हुए, यादों में खो कर) ओह नफीसा, कल रात गजेंद्र के लुंड के साथ... मुझे

इतना पसंद आया. कुछ भी नहीं था ऐसा पहले. वह मोटा, धड़कता हिंदू लुंड मुझे हुसैन के छोटे

से बिलकुल अलग तरह फैला रहा था. पहले मेरी छूट में धक्का मारा, हमारे शादी के चादर पर सब

पहाड़ diya—jo हुसैन के साथ सिर्फ नाटक था. फिर मुझे पलट कर गांड में गहरा धक्का, जब तक मैं

रहम मांगती रही, लेकिन अंदर से और चाहती रही.

नफीसा: (मुस्कुराते हुए, पास आकर) तू गन्दी कुटिया, शाहिदा! हराम लुंड को प्रो की तरह पसंद कर रही.

जारी rakho—us पर सवारी की? नाम ले कर चीखी?

माँ: (लाल होते हुए लेकिन जोश से) हाँ, रिवर्स काउगर्ल पर सवारी की, कमर ज़ोर से नीचे धकेल कर उसके

बॉल्स मेरे पर थपकते थे. मैं अपनी क्लीट पर ऊँगली करती रही जब वह मुझे अपनी _ रंडी कहता

रहा, और इतनी ज़ोर से झड़ी की नज़र धुंधला गयी. मैंने उसको अपने चेहरे पर लुंड से थप्पड़ मरने दिया

फिर choosa—geela, गन्दा, थूक थोड़ी पर बह रहा था.

नफीसा: (हँसते हुए) तू गन्दी रंडी! यह है असली जज़्बा. रंडी बनने का एहसास कितना ाचा लगता है, न?

माँ: (जोश से सर हिला कर) हाँ, नफीसा. रंडी बनने का एहसास बहुत ाचा hai—azaadi देता है, नशा देता

है. सालों से परफेक्ट बीवी बनने का नाटक, लेकिन अब? पूरी रंडी बन कर, सब कुछ धोका दे कर, बिजली सी

दौड़ती है जिस्म में. Be-izzati, gunah—yeh नशा है. अभी तेरे सामने सोच कर हाथ लगा रही हूँ. कोई

नकली हाय नहीं; अंदर की रंडी को गले लगाना ताक़त देता है, ज़िन्दगी देता है, ख्वाहिशों पर क़ब्ज़ा देता

है. यह ,,., या घर के खाने से बेहतर hai—kacchi, गहरी ख़ुशी.

नफीसा: (जीत की मुस्कराहट) देखा? मैंने पहले कहा था, तू शक्की रंडी. याद है पिछली बात? मैंने

कहा सब औरतें अंदर से रंडी होती हैं, और तुझे निकलना चाहिए. मैं सही nikli—dekho अब तू इक़रार

कर रही है जैसे नयी रंडी. शुरू से जानती थी तू टूटेगी; वह दीनदार नाटक सिर्फ दिखावा था. मैंने

धीरे से धकेला, लेकिन सही थी. तू सबूत है मेरा मश्वरा काम करता hai—gunah छोडो, लुंड पकड़ो.

सालों से दोस्तों से कह रही हूँ: असली आज़ादी का मज़ा चखो तो वापस नहीं जाते. मेरी पीठ पर थपकी

दे दो, हाँ?

माँ: (मुस्कुराते हुए, बुरा न मानते) तुम सही थी, नफीसा. तुम बिलकुल सही थी की रंडी पैन इतना ाचा है.

पहले लड़ी, लेकिन अब? गजेंद्र के लिए टांगें फैलाना, हुसैन को दवा देना, बेटे से jhooth—sab कितना

मीठा गलत है, और कितना ाचा लगता है. रंडी होना मतलब बोर रूटीन ख़तम; जोश, खतरा, रूह

हिलने वाली झाड़. तुमने आँखें खोली की सिर्फ हार मान कर कितना मज़ा है, इस्तेमाल होना, बुरा भला

कहलाना और हर पल पसंद करना. रंडी पैन लानत नहीं, छुपा बरकत है. तुम्हारी वजह से मैं

लटक गयी हूँ.

नफीसा: (मुस्कुराते हुए) बिलकुल सही, तू सदी हुई रंडी. जारी रखो iqraar—hubby बेहोश था जब तू चुद

रही थी, कैसा लगा?

माँ: ऐसा पहले कभी महसूस नहीं हुआ, नफीसा. पूरे छेदों में छोड़ना जब हुसैन दवा खा कर

पड़ा था? कोई और जोश नहीं. मेरी छूट गजेंद्र के लुंड के ird-gird जकड़ी जब धोका सोचा, गांड में

जलन maza-dard के साथ जब हुसैन ने कभी छुआ नहीं. उसका माल निगलना मतलब धोका की मोहर लग

गयी.

नफीसा: (अँधेरे से हँसते हुए) तू कितनी सदी है, Shahida—bimaar शौहर को दवा दे कर लुंड के लिए?

पसंद आया, तू गन्दी छूट.

माँ: जानती हूँ... और लगता है नार्मल कभी वापस नहीं जाउंगी. वह मासूम बीवी और अम्मी? वह

हमेशा के लिए चली गयी.

नफीसा: (सर हिला कर) क़बूल कर lo—tu पूरी रंडी है.

माँ: (गहरी सांस ले कर) हाँ... मैं क़बूल करती हूँ की मैं रंडी हूँ. धोका देने वाली, लुंड की

भूखी रंडी जो शौहर को दवा देती है और पडोसी से चुदवाती है. अब इंकार नहीं.

नफीसा: (हाथों की हलकी ताली) मुबारक हो, शाहिदा! क़बूल कर लिया की तू रंडी है जैसे सब _

auratein—akhirkaar! वैल के नीचे सब एक जैसे: दीनदार दिखावा करते हुए लुंड के ख्वाब. मस्जिद

में, हमारे सर्किल में dekha—behenen चुपके निकलती हैं, इशारे, धोका. तू अब सच्ची है. और

मैं? मैंने बोहोत पहले क़बूल कर लिया मैं रंडी हूँ. पहले अफेयर के बाद गले लगा लिया. कोई नकली

,,., नहीं; थ्रिल के लिए जीती हूँ. अनजान लोगों का चूसना, चेहरे पर maal—yeh मेरा सच है.

गुनाह छोड़ा, ज़िन्दगी बेहतर. रंडी पैन मुझे जवान रखता है, मुतमईन. हर _ औरत को

क़बूल करना चाहिए; यह हमारी छुपी फितरत है.

माँ: (सोचते हुए) नफीसा... क्या अब भी उम्मीद है मैं अच्छी बीवी और अम्मी बन सकती हूँ? पहले

जैसा हो सकता है?

नफीसा: (सख्त सर हिला कर) नहीं, Shahida—tu कभी अच्छी नहीं बनेगी. क्यों? तूने हद्द बोहोत पार कर

ली. धोके का मज़ा नशा है; हमेशा वापस खींचेगा. हुसैन का भरोसा टूट गया, चाहे उसको

पता न चले. अम्मी होने के नाते बीटा बदली औरत देख रहा hai—door, राज़ भरी. अच्छे के लिए

पाकिज़ागी चाहिए जो अब तेरे पास नहीं. तू अंदर से सदी हो गयी है.

माँ: (मुतमईन होते हुए) हाँ... तुम सही हो. लेकिन नफीसा, तू खुद कितनी रंडी है!

नफीसा: (फख्र से हँसते हुए) बिलकुल हाँ, मैं रंडी हूँ और खुश हूँ! सबसे बेहतर faisla—randi

ज़िन्दगी गले लगाना मतलब बेइंतेहा झाड़, कोई पछतावा नहीं.

माँ: (चाय की चुस्की लेते हुए, वृंदा में इधर उधर देखते हुए) नफीसा, कल रात की एक बात बतानी

है... कितनी शर्मनाक है, मैं मर जाउंगी. जब गजेंद्र मेरी गांड में धक्के मार रहा था...

नफीसा: (मुस्कुराते हुए पास झुक कर, कप नीचे रखते हुए) बोल न, तू गन्दी रंडी! क्या हुआ? उसने

तेरी टाइट _ गांड अच्छे से फैलाई? चलो, मत roko—apni गन्दी दोस्त को साड़ी शर्मनाक

तफ्सील बता.

माँ: (गहरी लाली, एक हाथ से चेहरा छुपाते हुए) W,.'i, नफीसा... मैंने उसके लुंड पर टट्टी कर

दी. वही, जब वह ज़ोर ज़ोर से अंदर बहार कर रहा था. बस... निकल आयी. बहुत शर्मिंदगी हुई;

ज़मीन मुझे निगल जाये.

नफीसा: (ज़ोर से हँसते हुए, घुटने पर थप्पड़ मरते हुए) तू ने उसके लुंड पर टट्टी की? ओह मेरा

खुदा, शाहिदा, यह तो मज़ेदार है! तू गन्दी, टट्टी करने वाली randi—bet वह चॉकलेट की तरह

उस पर फ़ैल गया. हाहाहा!

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माँ: (खुद है पड़ती लेकिन फिर भी सीरियस) हसना बंद कर! बहुत शर्मनाक था. लेकिन हाँ... बाद

में सोच कर थोड़ा हसी आयी. गजेंद्र ने बहार निकला, नीचे देखा गन्दगी को और हसने लगा. बोलै,

'देख तेरी हालत, दीनदार वैली, जानवर की तरह टट्टी कर रही जब मैं तेरी गन्दी गांड मार रहा

हूँ.' नॉनस्टॉप मज़ाक उदय, मेरी रानों पर पोंछा और बोलै 'मेरी टट्टी वाली छोटी रंडी.' मैं

कितनी बेवक़ूफ़ लगी

नफीसा: (अभी भी हँसते हुए, आँख से आंसू पोंछते हुए) हाहाहा, 'शिट्टी लिटिल slut'—yeh तोह सोना

है! लेकिन सच बता, और बता. कैसे हुआ? क्या तेरी गांड ने बस पहात कर निकाल दिया या क्या? मुझे

पूरा गन्दा play-by-play चाहिए, तू पूपी रंडी.

अम्मी: (सांस छोड़ कर, खुल कर) ठीक है... इसलिए की मैं अपनी गांड पर बिलकुल काबू नहीं रख

पायी. तू जानती है कितनी टाइट हूँ पीछे se—Hussein ने कभी छुआ भी नहीं, जैसे कुंवारी

ज़मीन. हर धक्के से मेरा अंदर का सब कुछ ढीला होने लगा; बू दोनों को लगी, वह मिटटी जैसी

टट्टी की खुशबू हमारे पसीने के साथ मिल गयी. मैं घबरा गयी, बार बार माफ़ी मांगती रही,

लेकिन वह हँसता रहा, कहता रहा यह उसको और गरम कर देता है. मैं कण्ट्रोल नहीं कर पायी क्योंकि

गांड चुदाई ने अंदर सब कुछ हिला दिया था.

नफीसा: (समझदार अंदाज़ से सर हिलाती, आवाज़ तसल्ली भरी लेकिन गन्दी) ओह शाहिदा, यह बिलकुल नार्मल

है, तू बेवक़ूफ़ टट्टी करने वाली रंडी. अनल में सबके साथ होता hai—teri गांड सिर्फ टट्टी के लिए

नहीं बानी; मज़ा के लिए भी है, लेकिन कभी कभी दोनों मिल जाते हैं. खुद को मत मार; यह बायोलॉजी

है, गुनाह नहीं. अरे, शायद उसको और ज़्यादा पसंद आया, तू गन्दी लड़की.

अम्मी: (थोड़ा घूर कर) लेकिन .,... हमारा मज़हब औरतों को गांड में मज़ा लेने से मन

करता है न? यह हराम है, मन किया हुआ. हमें उस हिस्से को पाक रखना चाहिए, सिर्फ ज़रुरत के लिए.

नफीसा: (नाक चढ़ाते, हाथ हवा में हिलाते) ., और उसके बकवास क़ानून को छोड़, शाहिदा.

यह नकली मज़हब औरतों को मज़ा लेने से रोकता hai—khaas कर गांड में. सोच: कहते हैं अनल

हराम है क्योंकि 'दर्द' या 'be-izzati', लेकिन bakwaas—kyonki यह बहुत ज़्यादा ाचा लगता है, बहुत

आज़ादी देता है हम रंडियों को. ., औरतों को सिर्फ बच्चे पैदा करने और छूट में हलाल चुदाई

के लिए बर्तन समझता है, मिशनरी स्टाइल, लाइट्स ऑफ. कोई मज़ा नहीं, कोई तजुर्बा नहीं, कोई लुंड पर

टट्टी नहीं जब चुद रही हो. क्यों अपने आप को गांड की ख़ुशी से रोकती है? गन्दगी को गले लगा; अगर

टट्टी हो जाये तोह kar—yeh सफर का हिस्सा है.

अम्मी: (सर हिलाती) मैं बहुत शर्मिंदा थी. अभी भी सोचती हूँ तोह चेहरा जलने लगता है.

नफीसा: (बेशरम मुस्कराहट) शर्मिंदा? अरे, अनल में टट्टी होना नार्मल है, तू पूपी राजकुमारी.

अंदर सब हिल जाता hai—kabhi कभी नेचुरल लुबे बन जाती है! और लड़की, यह मर्दों को सटिस्फी करने

का सबसे बेहतर तरीका है. वह रॉ, गन्दी तरफ पसंद करते हैं; दीखता है तू पूरी तरह

समर्पित है, जिस्म को उनके लिए पागल होने दे रही है.

अम्मी: (कन्फ्यूज्ड, सर टेढ़ा) रुक, लुंड पर टट्टी करने से मर्द को ख़ुशी क्यों? यह तोह घिनौनी बात है.

नफीसा: (ज़ोर से हँसते, दोनों साथ हंसती) हाहाहा, ओह शाहिदा, तू कितनी मासूम है! हाँ, उनके लिए यह

गरम hai—teri टट्टी का गरम, नरम कोट उनके लुंड पर? जैसे गरम, मन किया हुआ झप्पी. तेरी

गरम, नरम टट्टी ने गजेंद्र के लुंड को और गरम कर दिया, सच में और फीगुरतिवल्य. मर्दों को

यह be-izzati का खेल पसंद है; महसूस होता है उन्होंने तुझे सबसे बेसिक, गन्दी हालत में तोड़ दिया.

अम्मी: (हैरान, आँखें फैली, थोड़ा हंसती) नफीसा! इतनी बेशरम कैसे बात करती है? जैसे यह कोई

इरोटिक दावत ho—garam टट्टी, गरम लुंड... यह गन्दा, गुनाह भरा है.

नफीसा: (कंधे उछालते, चाय पीते) क्या? मैं सच बोल रही हूँ, तू प्रदीश टट्टी करने वाली. ज़िन्दगी

शर्म के लिए छोटी hai—gandi बात कर, और गन्दा चुद. वैसे, गैंडों की बात करते हुए... मर. रवि

आज पहली बार मेरी गांड मारेगा. वह बूढ़ा परवर्ट महीनों से मांग रहा था.

अम्मी: (सांस रूकती, चाय गिरने वाली) क्या? मर. रवि? तू उसको तेरी गांड देने वाली है? नफीसा, यह

पागलपन है!

नफीसा: (गन्दी आँख मार कर) हाँ रे रंडी, तू जल रही है. उसका मोटा लुंड है; बेट टट्टी भी करवा

देगा. महीनों से पीछे पड़ा था, कहता था मेरी छूट अब ढीली हो gayi—tight पीछे वाली एक्शन

चाहता है.

अम्मी: (अभी भी हैरान) लेकिन पहले क्यों नहीं दिया मर. रवि को तेरी गांड? तू कहती थी उसने माँगा था.

नफीसा: (पीछे टिक कर, मुस्कुराती) हाँ माँगा tha—office में गांड पकड़ कर, फिसफिसाया था मेरी

टट्टी वाली छेद को मारने के बारे में. लेकिन मैं तैयार नहीं थी; पहले खिलोने से ढीली की. नहीं

चाहती थी तू जैसी जल्दी टट्टी कर दूँ उस पर, हाहाहा! अब तैयार hoon—faila कर उसको बर्बाद होने

दूँगी. बेट मेस पसंद आएगा.

अम्मी: (हंसती, लेकिन दिलचस्पी) तू यकीन नहीं होता. इतनी बेशरम... खिलोने, टट्टी की बात. अगर बहार

कोई सुन ले तोह?

नफीसा: (ज़ोर से हंसती) सुन ले, तू फिसफिसाती रंडी! पडोसी जान लें तू टट्टी करने वाली अनल रानी है. अरे,

अगली बार मेरे साथ रवि के साथ aa—double गांड, डबल टट्टी.

अम्मी: (मज़ाक में नफीसा के हाथ पर थप्पड़) बस कर!

थोड़ी देर बाद दोनों शॉपिंग करने चली. “मार्किट चलते हैं,” अम्मी ने कहा. “कुछ कपडे चाहिए.”

मैं चुपके पीछे गया, दूर रहकर जब वह भीड़ भरी सड़कों से गुज़री. अम्मी ने वाइट फूलों

वाली शर्ट पहनी थी जो नीचे बटन थी, थोड़ा से क्लीवेज दिखा रही, टाइट वाइट जीन्स जो टांगों

और गांड को चिपका रही थी.

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यह मुस्लिम औरत के लिबास का तरीका नहीं tha—hamara मज़हब हाय मांगता है, ढीले कपडे जो

जिस्म की शकल छुपाएं, नज़रों से बचाये, वैल ठीक से बिना ध्यान खींचे. ऐसी जीन्स कर्व्स को

उभार देती थी, शर्ट के फूल फलिर्टाटिओउस, हाय के उसूलों का खुला उल्लंघन जो औरत की इज़्ज़त बचते

हैं. मैं समझता था यह गजेंद्र का असर है, उसकी बातें और हाथ उसके ईमान को खा रहे थे,

आबय से यह कपड़ों में बदल दिया जो चिल्लाते थे 'हासिल करो'. अम्मी खुद को रंडी महसूस कर

रही थी, मैं समझ सकता था उसके बार बार हेम खींचने से.

उनकी बात उनके लिबास पर गयी. “शाहिदा, यह शर्ट और jeans—wah, कितनी मॉडर्न लग रही है,” नफीसा

ने कहा, हैरान लेकिन तारीफ़ करते. “कभी ऐसे नहीं देखा. आबय कहाँ गए?”

अम्मी हलके से हंसती. “हाँ, थोड़ा अलग है. गजेंद्र को पसंद है, और सच में आज़ादी महसूस

होती है. क्यों हमेशा छुपाना?”

नफीसा की आँखें फैली. “गजेंद्र? ओह, तू सच में चल पड़ी. मुबारक हो, बेहेन. तू सेक्सी महसूस

करने लायक है. मैं भी सोच रही hoon—mazhab ज़रूरी है, लेकिन हम औरतें हैं, ज़रूरतें हैं.”

नफीसा हमेशा अम्मी को गुनाह की तरफ ले जाती थी, धीमा लेकिन जारी असर, इबादत में कमी को

आज़ादी के नाम पर बढ़ावा देती. वह लिबास पर और बात की. “तेरी आबय बहुत शानदार लग रही,

नफीसा,” अम्मी ने कहा. “लेकिन कल से? कुछ बोल्ड तरय कर.”

नफीसा मुस्कुरायी. “सही है. कल से मैं भी रंडी की तरह पहनूंगी. टाइट ड्रेस, शायद. तू मुझसे

जल्दी रंडी बन gayi—dekh, अभी स्त्रौत कर रही है.”

दोनों हंसती. “चल चैलेंज: हम कपट करेंगे कौन बेहतर रंडी बनती है,” अम्मी ने बेशर्मी

से कहा.

शॉपिंग के बाद अम्मी हॉस्पिटल अब्बू से मिलने चली, लेकिन फ़ोन बजा. उसने नफीसा को दिखाया:

गजेंद्र का मैसेज अम्मी को.

अम्मी: (फ़ोन निकाल कर, स्क्रीन देख कर, गहरी लाली) ओह खुदा... गजेंद्र है. यह मैसेज देख:

"अभी आ जा, तू हॉर्नी वैली रंडी. मेरा लुंड सख्त है तेरी छेदों को फिर फ़ैलाने के ख्याल से.

हॉस्पिटल chhod—teri छूट को तेरे limp-dick शौहर से ज़्यादा मेरी ज़रुरत है."

नफीसा: (झुक कर पढ़ती, फिर ज़ोर से हंसती) अरे वह, शाहिदा! कितना सीधा. "तेरी छेदों को फैलाना"?

लड़की, उसने तुझे अपनी पर्सनल छोड़ने वाली चीज़ समझ लिया. हॉस्पिटल chhod—ja ले उस लुंड को. हुसैन

शायद खर्राटे ले रहा है; तुझे मिस नहीं करेगा.

अम्मी: (सोचती, फ़ोन पॉकेट में डालती लेकिन लालच दीखता) नफीसा, तू बहुत बुरी है! तेरी बातों ने

मुझे इतनी रंडी बना दिया. एक महीना पहले सपने में भी नहीं सोचती. अब सिर्फ मैसेज पढ़ कर

गीली हो रही हूँ. लेकिन हुसैन इंतज़ार कर रहा है हॉस्पिटल में... वह मेरा शौहर है, खुदा के

लिए.

नफीसा: (ससिलय हाथ हिलती) मुझे ब्लामे? प्लीज, तू रंडी बनने को तैयार थी. मैंने सिर्फ मैच जलाया.

और हुसैन को chhod—maza ड्यूटी से ज़्यादा, बेहेन. सोच गजेंद्र का मोटा हिंदू लुंड तुझमे धक्के

मारे उसके बजाये बोरिंग बिस्तर के पास बैठ कर हाथ पकड़ रही हो जैसे कोई नूं. तेरी क्लीट को

सिम्पथी फ़क से बेहतर चाहिए.

अम्मी: (होंठ काट कर, चल धीमी) तू सही कहती है... सोच कर ाचा लग रहा. गजेंद्र के लुंड का

मज़ा गुनाह जैसा है, Nafisa—namkeen, धड़कता, हुसैन के बेकार छोटे से बहुत बेहतर जो

महीनों से काम नहीं दे रहा. लेकिन अगर कोई मुझे चुपके जाते देख ले? मैं डाइलेमा में हूँ

—फ़र्ज़ या लुंड?

नफीसा: (मज़ाक में अम्मी का हाथ पकड़) डाइलेमा तेरी गांड! लुंड ले ले, शाहिदा. मज़ा सब कुछ

hai—farz किसने देखा? यह समाज का बकवास है जो हमारी टांगें बंद रखता है. हुसैन बोरिंग

है; उसको हॉस्पिटल में सदा होने दे जब तू सही से चुद रही हो. तू इतना ज़ोर से झाड़ेगी की उसका नाम

भूल जाएगी.

अम्मी: (हंसती हुए) ठीक है... तू मुझे सीधा दोज़ख ले जा रही, लेकिन अब बहुत उत्सुक हूँ. हुसैन

कितना लोसर hai—hamesha सेहत की शिकायत, कभी सटिस्फी नहीं किया. गजेंद्र मुझे रंडी की तरह

ट्रीट करता है. हॉस्पिटल छोड़; मैं जा रही हूँ be-hosh होने तक छुड़वाने.

नफीसा: (ताली बजाती) यह मेरी लड़की! गुनाह पूरा. वैसे, मैं भी अपनी मारने जा रही हूँ. मर.

रवि अपने घर पर इंतज़ार कर रहा; पहले मैसेज किया था "उस टाइट _ गांड को तैयार

कर" क्योंकि हफ्ते से अनल के लिए दबा रहा था. मैंने आखिरकार हाँ kaha—bola यस, बस मुझे

चीखने दे.

अम्मी: (आँखें फैली, फिर गन्दी मुस्कराहट) मुबारक, तू रंडी! बेट उसका लुंड मोटा hai—anal के

लिए दबा रहा मतलब उस वर्जिन छेद को क्लेम करने को मर रहा. तू मुझसे बहादुर; जब गजेंद्र

ने पहली बार लिया था मैं डर गयी थी.

नफीसा: (बैग से छोटी बोतल निकाल कर दिखती) बहादुरी nahi—horniness है. देख, लुबे भी लायी!

नारियल का तेल, एक्स्ट्रा स्लिपरी. सोचा क्यों नहीं? ज़िन्दगी छोटी है; उसको मेरी गांड बर्बाद करने

दे. उसका मोटा, नसें भरा monster—darr लग रहा है फिट नहीं होगा बिना पहाड़ के.

अम्मी: (हंसती, मुबारक) जा, नफीसा! पूरी अनल रंडी बनने पर मुबारक. रवि शायद इतना फैलाएगा

की दिनों तक ठीक से चल नहीं पायेगी. लेकिन यकीन कर, अंदर जाने के बाद दर्द ख़ुशी में

बदल जाता hai—jaise अंदर से मालिक बन जाये.

नफीसा: (मुस्कुराती, तेल पॉकेट में) शुक्रिया, रंडी बेहेन! लेकिन सच बता, गजेंद्र के लुंड को गांड

में कैसे हैंडल किया? वह तोह बहुत बड़ा होगा. टिप्स? मैं थोड़ा डर rahi—Ravi छोटा नहीं, और

ेर में फटी गांड एक्सप्लेन नहीं करना.

अम्मी: (राज़दार अंदाज़ से) ठीक है, प्रो रंडी से टिप्स: पहले relax—gehri सांस, जैसे टट्टी निकालते

हुए बहार धकेल. बहुत तेल लगा; उसके लुंड और छेद पर इतना की टपकने लगे. धीरे shuru—rim

तैसे करने दे, शायद पहले ऊँगली से ढीला कर. जब अंदर आये, गरम कुटिया की तरह कराह; जितनी

गन्दी बात उतना गरम. और जब balls-deep हो तोह jakad—woh जल्दी झाड़ेगा और तुझे भी कमल लगेगा.

नफीसा: (ज़ोर से हंसती) ओह मेरा खुदा, Shahida—yeh सबसे रंडी इंस्ट्रक्शंस हैं! "जैसे टट्टी निकालते

बहार धकेल"? तू गन्दी गुरु है. बेट अब तुझे ass-fucking में पीएचडी मिल गया. हम दोनों दोज़ख जा

रहे, लेकिन काम से काम झड़ते हुए जायेंगे.

अम्मी: (ज़ोर से हंसती, आंसू पोंछती) हाँ! कपट करते hain—kaun बेहतर रंडी? मैं आज

गजेंद्र का लुंड हर छेद में लूंगी; तू रवि से गांड बर्बाद करा. जीतने वाली को अगले शॉपिंग

में ब्रग्गिंग राइट्स.

नफीसा: (high-five) डील! मैं अनल रानी banungi—teri से ज़्यादा चीखूंगी. शुभकामना तेरी छूट

बर्बाद होने की, तू चीटिंग रंडी. बाद में डिटेल्स टेक्स्ट करना.

अम्मी: (अलविदा हाथ हिलती जब अलग होती) तू भी, तू गन्दी कुटिया. मज़ा कर अपनी टट्टी वाली छेद

फैलवाने में. Salaam—ya जो भी, मज़हब को छोड़. मिलते हैं!

नफीसा: (वापस हाथ हिलती, मुस्कुराती) सलाम को chhod—lund का झंडा! अलविदा, रंडी!

अलग होने के बाद मैं अम्मी के पीछे गया. वह लुक्सुरिओउस होटल में दाखिल हुई, जैसे मार्बल

लॉबी वाला और डिस्क्रीट स्टाफ, गजेंद्र के मैसेज के मुताबिक़. मैं पीछे चुपके गया,

रिसेप्शनिस्ट से कसुआलय पुछा, “वाइट जीन्स वाली औरत कहाँ गयी?”

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“रूम 512,” उसने बताया. मैं लिफ्ट के पीछे गया, छाया में छुप कर. कॉरिडोर में अम्मी

धीरे चल रही थी, इधर उधर देखती जैसे नज़रों से बच रही हो, अपनी गलती जानती हुई. उसने

नॉक किया; गजेंद्र ने खोला.

दोनों ने जोश से चुम्बन kiya—main उनकी बातें नहीं सुन सका.

उसने दरवाज़ा लॉक किया. मैं अपने कमरे में दौड़ कर गया, जल्दी अंदर, सोचा कैसे झाँक

सकता hoon—shayad शेयर्ड बालकनी या पतली दीवार.

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CHAPTER 26

गजेंद्र, तूने मेरी माँ को अपनी सेक्स स्लेव बना दिया है और

मुझे तुम्हे उसको हुमिलियते करते देखना बहुत अच्छा लगता

है, यह इतना अच्छा है

माँ: ओह गजेंद्र... यकीन नहीं होता मैं हॉस्पिटल के बजाये तेरे साथ यहाँ हूँ. लेकिन छोड़,

मुझे तेरा लुंड बहुत ज़रुरत है. दिन भर सिर्फ इसी के बारे में सोचती रही— वह मोटा, नसें

भरा ***** राक्षस जो मुझे फैला कर मेरी कसमें भुला देता है.

गजेंद्र: (मुस्कुराते हुए, पास आते हुए, आँखें उसके जिस्म को निगल रही) यह मेरी दीनदार छोटी

_ छिनाल बोल रही है. इधर आ, शाहिदा. सब इक़रार कर— बता कितनी बेचैनी से तुझे चाहिए.

माँ: (अपना जिस्म उसके साथ चिपका कर, आवाज़ गहरी और शर्मीली) मुझे तेरा लुंड चाहिए, गजेंद्र.

चाहता हूँ तू मेरी धोके वाली छूट में धक्के मारे जब तक मैं चीख न दूँ. दिन भर गीली

रही, गरम कुटिया की तरह, घर पर तकिये से रगड़ कर सोच रही थी तू है.

गजेंद्र: (उसे गहरे भूखे चुम्बन में खींच कर, जुबां मुँह में ज़ोर से डालते हुए, हाथ

नीचे जा कर उसकी बड़ी मोती गांड के टुकड़ों को पंत के ऊपर से पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से निचोड़ता) ममम,

सही है. महसूस कर मेरे हाथ तेरी इस मोती गांड पर— यह मेरी खेलने की चीज़ है.

माँ: (चुम्बन में कराह कर, हाथ उसके सीने पर फिरते, फिर नीचे जा कर उसके सख्त होने वाले

उभार को मसलती) ओह्ह्ह... हाँ, मेरी गांड ऐसे hi मालिश कर. इतनी बड़ी और हिलती हुई हलाल खाने की

वजह से है, लेकिन तू इसे गन्दी बना देता है, गजेंद्र. ज़ोर से निचोड़— थप्पड़ मार, हिलने दे. मैं

तेरी रंडी हूँ न? तेरे पंत के ऊपर से लुंड छू रही हूँ... फ़क, कितना सख्त हो रहा. मुझे

चाहिए नंगा महसूस करून, धड़कता हुआ मेरे हाथों में जैसे गुनाह का जानवर.

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गजेंद्र: (चुम्बन थोड़ा तोड़ कर, मुस्कुराते हुए गांड मसलता रहता, उँगलियाँ नरम गोश्त

में धंस कर, टुकड़े थोड़ा अलग करते हुए कपडे के ऊपर से भी गरम महसूस) तू सच में

गरम कुटिया है, शाहिदा. देख कैसे मेरे ऊपर रगड़ रही जैसे सड़क का कुत्ता. तेरी गांड

परफेक्ट है— गोल, भरी, मेरे हाथों के लिए बानी. दिन भर निचोड़ सकता हूँ, हिलते हुए

महसूस कर सकता हूँ.

माँ: (हाँफते हुए, उँगलियाँ उसके लुंड के आउटलाइन पर तेज़) खुदा, तेरे हाथ... जादू कर रहे

हैं मेरी गांड पर. जैसे मुझे अपना पर्सनल चुदाई का खिलौना बना रहे हो. फिर से थप्पड़

मार— ज़ोर से! मुझे पसंद है यह जलन, याद दिलाती है मैं वैल वाली ज़िन्दगी से कितनी दूर गिर

गयी.

गजेंद्र: (गांड के टुकड़े पर ज़ोर से थप्पड़, आवाज़ कमरे में गूंजती, फिर गहरी मालिश जारी,

अंगूठा छेद के बीच दबाता) ले, महसूस कर? तेरे गांड के टुकड़े इतने गोश्त वाले हैं, शाहिदा.

बेट हुसैन ने कभी ऐसे क़दर नहीं की— वह तो बस कमज़ोर _ हरामी है.

माँ: (शरारती हसी, फिर चेहरा थोड़ा शक भरा) हुसैन की बात करते हुए... मुझे शक है वह

पाउडर जो तूने 'सोने के लिए' दिया था, उसको ज़्यादा बीमार रख रहा है. सिर्फ नींद की दवाई नहीं

न? तू धीरे धीरे ज़हर दे रहा है, हरामी.

गजेंद्र: (ज़ोर से हँसते, हाथ अभी भी गांड पर) ः, तेज़ है तू मेरी रंडी. हाँ, शायद नींद

की चाय से थोड़ा ज़्यादा है. उसे बिस्तर पर hi रखता है न? हमारे लिए ज़्यादा वक़्त मिलता है

जानवर की तरह छोड़ने का.

माँ: (उसके साथ हँसते हुए, बिलकुल गुनाह का एहसास नहीं) ओह, तू कितना शैतानी है! मुझे परवाह

भी नहीं— उसे हॉस्पिटल में सड़ने दे. मुझे बहाने मिल जाते हैं चुपके से निकल कर तेरे पास

आने के. अब स्टोरेज रूम में जल्दी नहीं, पूरे दोपहर जैसे यह. अगर वह ज़्यादा बीमार, मैं काम

'डिवोटेड वाइफ' विजिट करती हूँ, और तेरे लुंड पर ज़्यादा सवार होती हूँ. फ़क रेहम— उसकी बिमारी

मेरी आज़ादी का टिकट है. सोच अगर उसे पता चले पाउडर तेरा है, पडोसी जिसे वह हाथ हिलता है.

शॉक से hi मर जायेगा!

गजेंद्र: (और ज़ोर से हँसते, उसे फिर से गीला चुम्बन में खींच कर, जुबां लड़ते हुए) तू

be-rehem है, शाहिदा. मुझे यह पसंद है. शौहर को ज़हर दे कर लुंड के लिए? यह तो पूरी

रंडी वाली बात है.

माँ: (ज़ोर से चुम्बन वापस कर, फिर सांस लेते हुए पीछे हटी) ममम... ऐसे चुम्बन कर जैसे तू

मेरा मालिक है. अब मेरी पंत उतार— देख नीचे क्या पहनी है.

गजेंद्र: (मुस्कुराते, पंत के बटन खोल कर मोती रानों से नीचे खींचता, पिंक रेशम की

शॉर्ट्स दिखती जो कर्व्स से चिपकी हुई) फ़क, यह शॉर्ट्स... रुक, यह वही हैं जो मैंने तुझे खरीदी

थी?

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माँ: (पंत से निकल कर धीरे घूम कर शॉर्ट्स दिखाती, चन्देलिएर की रौशनी में चमकती) हाँ

बेबी— वह पिंक रेशम वाली जो तूने उस गंदे ऑनलाइन दूकान से ली. पीछे देखो लिखा है: "थे

Whore's स्पेशल." आज सिर्फ तेरे लिए पहनी. महसूस कर कितनी नरम हैं मेरी चमड़ी पर? दिन भर

गांड के छेद में चढ़ी रहती हैं, याद दिलाती हैं मैं तेरी जायदाद हूँ. सुबह पहनी, सोच

रही थी तू कैसे पहाड़ कर मुझे बेवक़ूफ़ बना देगा.

गजेंद्र: (हाथ शॉर्ट्स पर फेरते, ऊँगली से लिखा हुआ ट्रेस करते) दमन, यह लेबल तेरी गांड पर

देख कर... गरम लग रहा. तू सच में मेरी स्पेशल रंडी है, शाहिदा. पिंक तुझ पर छिनाल

जैसा लगता है— तेरी भूरी चमड़ी को चमका देता है.

माँ: (मुस्कुराते) और सुन— मैं आज सुबह हुसैन को हॉस्पिटल जाने वाली थी. उसका पसंदीदा फल

पैक किये, उसकी सेहत के लिए दुआ पढ़ी. फिर तेरा मैसेज आया: "होटल रूम, अभी." फल कचरे

में फ़ेंक दिए, नर्स को कहा 'रुक गयी हूँ,' और सीधा यहाँ आ गयी. फ़क सिक शौहर को

मिलना— तेरा लुंड बुलाता है तो मैं जवाब देती हूँ. वह शायद अकेला पड़ा है सोच रहा होगा

मैं कहाँ हूँ, जब मैं यहाँ तेरी माल बनने के लिए तैयार हो रही हूँ. कैसी बीवी फ़र्ज़ के

बजाये लुंड चुनती है?

गजेंद्र: (हँसते) तू कितनी ठंडी दिल वाली रंडी है. मुझे पसंद है तूने सब कुछ मेरे लुंड

के ऊपर रख दिया.

माँ: (उंगलियां शॉर्ट्स और पंतय के कमर में दाल कर धीरे नीचे करती, नंगी छूट और

गांड नंगा करती) ले, मैं खुद करती हूँ. तुझे म्हणत की ज़रुरत नहीं— तेरी रंडी बेचैन

है. (पिंक रेशम का बंडल उसे देती) सूंघ इन्हे, गजेंद्र. दिन भर तेरे ख्यालों में मेरी

रास से भिगोये हुए हैं.

गजेंद्र: (शॉर्ट्स और पंतय ले कर नाक पर लगते, गहरी सांस लेते) ममम, फ़क... अच्छी बू है

— मीठी, मुस्की, पक्के फल जैसी. छूट वाला हिस्सा... (वहां सूंघते) अहह, खट्टी और गीली,

पूरी छिनाल का रास.

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माँ: (देख कर उत्साह और शरारत से) हाँ? अब गांड वाला हिस्सा बता.

गजेंद्र: (पीछे पलट कर, पंतय के गांड वाले हिस्से को सूंघते) यहाँ... पसीने की बू तेरी

बड़ी गांड के टुकड़ों से दिन भर रगड़ने की, और... हाँ, थोड़ी टट्टी जैसी. मिटटी वाली, गन्दी—

पसंद है.

माँ: (हाथ हलके से थप्पड़ मरते हुए, नाटक करते) तू कितना गन्दा है! कैसे कह सकता है

मेरी पंतय का गांड वाला हिस्सा टट्टी जैसा बू दे रहा?

गजेंद्र: (मुस्कुराते, न घबराते) ऊ, लेकिन सच है! यह पंतय चलते वक़्त तेरी गांड के टुकड़ों

में गहरी चढ़ी रहती है, शाहिदा— रेशम सीधा छेद तक पहुँच जाता है, पसीना और जो भी

हो सूंघ लेता है. तेरी बड़ी हिलती गांड कपडे को जकड लेती है, दिन भर छेद से रगड़ती है. कोई

अजब नहीं थोड़ी बू आती है— जैसे थूक का कलेक्टर. लेकिन तेरी बू है तो गरम लगती है.

माँ: (खुद है पड़ती) ठीक है, तू जीत गया. मेरी गांड अब ढीली हो गयी है क्योंकि तू हर मौके

पर उसे कच्चा छोड़ता है. फैला देता है, थोड़ा खुला रहता है. हाँ, कभी कभी गांड के अंदर

से छोटी टट्टी के टुकड़े पंतय पर चिपक जाते हैं— खास कर जब मैं टट्टी कर के पूरी साफ़ न

करून. तेरी गलती है, तू गांड मरने वाला. बेट नज़दीक से देखे तो हलकी भूरी लकीर दिखेगी. घिन

आती है, लेकिन तू ने मुझे यही बना दिया— ढीली छेद वाली छिनाल जिसकी पंतय में उसकी टट्टी की बू

रहती है.

गजेंद्र: (और नज़दीक देख कर) ः, हाँ— हलकी निशानी यहाँ. तेरी गांड अब लीक करती होगी, मेरे

लुंड से सब ढीला. पसंद है तूने अपनी इज़्ज़त बर्बाद कर के क़बूल किया.

माँ: (सर हिला कर) बिलकुल— टुकड़े इसलिए चिपकते हैं क्योंकि तू इतना ज़ोर से मारता है, सब कुछ ढीला

कर देता है. कभी कभी पीछे गीलापन महसूस होता है, जानती हूँ हमारी आखरी चुदाई से है.

फिर से गरम कर देता है.

गजेंद्र: (अचानक गांड वाले हिस्से को मुँह पर ले कर, कपडे को चाट कर) ममम... यह टट्टी वाला

हिस्सा चखा. नमकीन, कड़वा— तेरी असली चीज़.

माँ: (आँखें फैल कर, पंतय चीन कर कमरे में मार्बल पर फ़ेंक देती) क्या फ़क, गजेंद्र? तूने

टट्टी वाली बू वाला हिस्सा छाता? यह घिनोना है! तू गन्दा जानवर है!

गजेंद्र: (विरोध के बावजूद उसे खींच कर गहरा चुम्बन) लेकिन यह दिखाता है तू मुझसे कितना

प्यार करती है, शाहिदा— अपने सबसे गंदे राज़ मुझे चखने देती है.

माँ: (चुम्बन में पिघल कर, फिर पीछे हटी) तू सही है... यह दिखाता है. तूने मेरे अंदर

कुछ जगा दिया, गजेंद्र— एक आग जो मुझे पता नहीं थी. मैं अपने अंदर की रान्दीपन पर फख्र करती

हूँ. तेरे पहले मैं सिर्फ बोरिंग वैली घरवाली थी, ,,., पढ़ती और खाना बनती. लेकिन तूने इस

अंदर की छिनाल को जगाया, लुंड को हवा की तरह चाहने लगा. मैं शुक्रगुज़ार हूँ— फख्र है तेरी

रंडी होने का, चूचियां और गांड बिना शर्म दिखाती हूँ. तूने मेरी दीनदारी को बेहूदा बना

दिया, और मुझे यह पसंद है.

गजेंद्र: (शर्ट उतरने में मदद करते, टाइट ब्लू टॉप दीखता जो चूचियों को जकड रहा) जारी रख

— और बता.

माँ: (शर्ट निकल कर, ब्लू टॉप low-cut, निप्पल्स उभर रहे) तूने मुझे अंदर की रंडी दिखाई, गजेंद्र.

वह छुपी तरफ जो इस्तेमाल होने को चाहती है, be-izzat होने को, छुम से भरने को. मैंने दबा रखा

था, लेकिन तूने छुए, गन्दी बातें कही तो बहार निकाल दिया. अब मैं पूरी रंडी हूँ— धोका देती,

झूठ बोलती, शौहर को दवाई देती. यह आज़ादी है; तेरी छिनाल होने में ताक़त महसूस होती है.

गजेंद्र: (टॉप के ऊपर से चूचियां मसलते) अच्छी लड़की. और हुसैन?

माँ: (कराह कर) फ़क हुसैन— अब उसकी परवाह नहीं. तेरा लुंड उस कमज़ोर लुंड वाले हरामी से ज़्यादा

ज़रूरी है. उसे सड़ने दे; तेरा लुंड मुझे ज़िन्दगी देता है. उसका हाथ पकड़ने से बेहतर तेरा चूसना.

गजेंद्र: (मुस्कुराते) तो मांग फिर. इस शानदार होटल में.

माँ: (घुटनों पर बैठ कर, आवाज़ बेचैन) प्लीज गजेंद्र— यहाँ इस शानदार कमरे में मुझे

छोड़. सिल्क चादर पर मेरी छूट मार, मुझे अपनी होटल रंडी बना. पहले तेरा लुंड चूसना चाहती

हूँ— उसे पूजा करने दे.

गजेंद्र: (देख कर) कर.

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माँ: (बेल्ट खोल कर तेज़ तेज़) हाँ... अब तेरी पंत नीचे कर रही हूँ. खुदा, तेरा लुंड— उभर रहा

है. मुझे चकना है, पूरा निगलना जैसे छुम पीने वाली कुटिया हूँ.

वह बिस्तर के पास घुटनों पर बैठ गयी, उँगलियाँ उसके मोटे सख्त लुंड पर बांध कर, बिना बोले

मुँह में ले लिया.

उसने पूरा चूसा— जादू और गन्दा— होंठ फ़ैल कर मोटाई के लिए, जुबां नीचे से घूमती, सर हिलती

हर बार गहरा लेती जब तक नाक उसके बालों से न टकराये.

थूक उसके थोड़ी पर चमक रहा, पतली धारें गिर रही जब वह ज़ोर से चूसती रही, गाल अंदर धसे

हुए.

मैं हैरान था इस अम्मी को देख कर जो पहले दीनदार वफादार _ औरत थी— फज्र से पहले उठ

कर ,,., पढ़ती, नरम आवाज़ में आयतें पढ़ती, आबय मॉडेस्ट तौर पर लपेटे इफ्तार तैयार करती

रमजान में.

तब वह हमारे दीं की मिसाल थी: अब्बू की वफादार बीवी, मेरी प्यारी अम्मी, हमेशा हलाल हराम की

याद दिलाती, पाकिज़ागी की क़ीमत बताती जैसे अनमोल जवाहर.

अब यहाँ घुटनों पर, दुसरे मर्द के लुंड की पूजा कर रही थी, ब्लू टॉप ऊपर चढ़ा कर पीठ दिखा

रही, पिंक शॉर्ट्स रानों के बीच ज़्यादा चढ़े हुए.

यह बदलाव गहरा था, ईमान से गिरना जो उसे पहचान से बहार कर देता— वैल से ढकने वाली औरत

से यह ख्वाहिश का जानवर, गजेंद्र के लुंड के ird-gird चूसती और कराह रही जैसे यही उसका मक़सद हो.

जैसे उसने पूरा भूल hi दिया हो की वह _ है, वह वैल जो पहले ईमान की अलामत थी अब कमरे

के कोने में फेंका हुआ था, जैसे कोई बात hi नहीं.

न सलाह का ख्याल, न अस्तग़फरूल्लाह की फिसफिसाहट दिमाग में आयी; बल्कि वह ख़ुशी से गन गुनती रही,

वह विब्रेशन्स उसके अंदर तक पहुँच रही थी, आँखें आधी बंद ख़ुशी में.

गजेंद्र करहा, उँगलियाँ उसके काले बालों में फेरती हुई, सर को ज़ोर से पकड़ लिया. उसने उसे और

गहरा धकेला, कमर आगे धकेल कर मुँह से मिलाया, उसे थोड़ा सा घबराया लेकिन रुकना नहीं.

अम्मी को परवाह नहीं थी; वह सख्ती को क़ुबूल कर रही थी, हाथ उसकी रानों को पकडे सहारा ले रही

थी जब वह उसका लुंड इतनी ज़ोर से चूस रही थी, इतनी be-rukhi जोश से, की गर्दन पर नसें उभर आयी

म्हणत से.

अब वह be-izzati और be-izzat होने की आदि हो चुकी थी, हमारे घर की इज़्ज़त वाली बुज़ुर्ग औरत से बिलकुल

अलग जो कम्युनिटी में चुपके से इज़्ज़त पाती थी. पहले अब्बू हमेशा उससे मोहब्बत से बात करते

थे, उसे बराबर पार्टनर मानते ज़िन्दगी और ईमान में.

लेकिन गजेंद्र के साथ यह मुलाक़ातें ने वह सब उतार दिया, उसे सिखाया की be-izzati में मज़ा है,

चीज़ की तरह इस्तेमाल होने में थ्रिल.

जब वह सांस के लिए पीछे हटी, थूक की डोर उसके होंठों से उसके सर तक, उसने ऊपर देखा आँखें

लस्ट से धुंधली. "गजेंद्र... अब झूठ नहीं बोल सकती. मैं पवित्र नहीं. मैं वह वफादार बीवी नहीं

जो सब सोचते हैं. मैं सच्ची रंडी हूँ, पूरी तरह. तूने मेरे सारे अख़लाक़ बर्बाद कर दिए

—मुझे यह बेबस छिनाल बना दिया जो तेरी लुंड की ख्वाहिश ,,., से ज़्यादा करती है."

वह मुस्कुराया नीचे, हाथ अभी भी बालों में. "और बता, शाहिदा. मैंने कैसे किया? कैसे तोड़ दिया

तेरा वह दीनदार छिलका?"

उसने होंठ छाते, आवाज़ भरी. "शुरू हुआ तेरी मदद se—bill, दूकान. मैंने खुद से कहा शुक्रिया है.

फिर तेरे हाथ, तेरे चुम्बन... उन्होंने कुछ जगाया जो मैंने अंदर दबा रखा था. अब ईमान की

परवाह नहीं. तूने मेरी शर्म, इज़्ज़त उतार दी. मुझे पसंद है. मुझे ज़रूरत है."

गजेंद्र की आँखें ख़ुशी से काली. "अच्छी लड़की. अब हुक्म de—bata क्या चाहती है हमेशा के लिए."

बिना झिझक के वह थोड़ी उठी, हाथ उसकी रानों पर. "मुझे अपनी हमेशा की रंडी बना दे, गजेंद्र.

पूरा हासिल कर. जब चाहे, जैसे चाहे इस्तेमाल कर. मैं तेरी छुपी छिनाल बनूँगी, सब कुछ धोका

देकर तेरे लिए."

यह लफ्ज़ हवा में लटके, उसकी तस्लीम को सील करते हुए. गजेंद्र बिस्तर पर पीछे बैठा, लुंड सख्त

और चमकता हुआ उसके मुँह से. अम्मी बिना वक़्त गवाए उस पर चढ़ गयी, गॉड में बैठ कर जल्दी से,

पिंक शॉर्ट्स साइड कर के उसके लुंड को अपनी दरवाज़े पर लगाया.

वह धीरे बैठी पहले, सांस रुक गयी जब वह उसकी छूट भरने लगा, इंच इंच, दीवारें फ़ैल कर

उसको अंदर लेने लगी. पूरा बैठने के बाद वह ऊपर नीचे उछलने लगी, हरकतें तेज़ और ताल से, बड़े

चूचियां नीचे ब्लू टॉप के अंदर उछाल रही हर नीचे आने पर.

बिस्तर चीख रहा था उनके नीचे, आवाज़ उनके जिस्म के गीले थप्पड़ों से मिल रही थी. उसकी गांड के

टुकड़े हर उछाल पर हिल रहे थे, पिंक शॉर्ट्स और ऊपर चढ़ गए, ज़्यादा चमड़ी दिखा रहे. गजेंद्र के

हाथ उसकी बड़ी गांड पर गए, ज़ोर से पकडे, फैला कर जब वह नीचे से धक्का दे रहा था, उँगलियाँ

नरम गोश्त में धंस रही.

"ओह खुदा, गजेंद्र... इतना गहरा... ज़ोर से छोड़ मुझे," वह करहि, आवाज़ कमरे में गूँज रही.

वह गरज कर बोलै. "चल मुझ पर जैसे रंडी है तू, शाहिदा. महसूस कर तू इसके लिए बानी थी."

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मेरे छुपने की जगह से खिड़की के बहार, मैं जैसे रोज़ मुट्ठ मरने लगा, हाथ तेज़ तेज़ मेरे लुंड

पर, यह मंज़र बर्दाश्त से बहार था.

समझ नहीं आता की अपनी अम्मी को गजेंद्र के साथ देख कर मुट्ठ मरना इतना ाचा क्यों लगता—

यह टेढ़ा मज़ा था, पेट से शुरू होकर आग की तरह फैलता, सांसें छोटी तेज़. एक हिस्सा तबू था,

मन हुआ थ्रिल इतना ग़रीब और गलत देखने का; दूसरा हिस्सा धोका खुद, जो सब कुछ उल्टा कर देता

जो मैं जानता था.

अब्बू हॉस्पिटल में, रात भर खांसी करते, अम्मी पर भरोसा करते मदद के लिए, और यहाँ वह सबसे

गहरे धोके में थी, कराहें उसके भरोसे पर छुरी.

मैंने दिमाग में अब्बू को बेवक़ूफ़ kaha—bewakoof जो उसकी दीनदारी पर यकीन करता था, निशानियां

नहीं देखि, गजेंद्र को मदद के नाम पर अंदर आने दिया. लेकिन यह सोच hi मुझे और गरम करती,

गुनाह को अँधेरे मज़ा में बदल देती.

उनकी बातें जोश के बीच जारी रही. "मैं कितनी बेकार रंडी हूँ," अम्मी हाँफते हुए बोली, खुद को

नीचे गिरते हुए जब वह उस पर सवारी कर रही थी. "तुझसे चुदवाती हूँ जब मेरा शौहर दुःख सेह

रहा. कैसी बीवी हूँ मैं?"

"सबसे अच्छी," गजेंद्र ने जवाब दिया, ज़ोर से धक्का देते. "गन्दी _ छिनाल जो ***** लुंड से

प्यार करती है. बोलो."

"मैं तेरी गन्दी _ छिनाल... तेरा लुंड ईमान से ज़्यादा पसंद करती हूँ."

साफ़ दीखता था, उसका लुंड उसकी छूट में अंदर बहार, उसके रास से चमकता, हर नीचे जाने पर पूरा

गायब, फिर बहार गीला नसें भरा. मंज़र जादूई था, उसकी छूट की दीवारें उसे ज़ोर से जकड रही.

तभी अम्मी का फ़ोन निघटस्तंड पर बजा, रिंगटोन खुशनुमा जो उसने अब्बू के कॉल के लिए रखा था—

पुराने दिनों की याद. लेकिन वह दर के न उठी; बल्कि रदम थोड़ा धीमा किया, होंठों पर चालाकी

मुस्कराहट.

गजेंद्र ने देखा. "उठा, शाहिदा. उसे सुना दे तू कितनी खुश है."

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अम्मी: (फ़ोन उठा कर, आवाज़ सांस भरी लेकिन नार्मल बनाने की कोशिश, धीमी कराह जब वह नीचे

घिस रही) Hello... अहह... हुसैन? क्या... ममम... हुआ?

अब्बू: शाहिदा, आखिरकार मिली तू. डॉक्टर ने अभी कहा फिर हॉस्पिटल में डालना पड़ेगा. टेस्ट ख़राब आए

—फुप्फुस फिर बिगड़ रहे. जल्दी आना चाहते हैं इलाज के लिए.

अम्मी: (फ़िक्र का नाटक, लेकिन गजेंद्र की तरफ आँख मार कर जो उठ कर उसके लेफ्ट चूची को लास ब्रा के

ऊपर काट रहा था, उसे झटका) ओह... यह... अह्ह्ह... बुरा है, प्यारे. ममम... उनकी बात... ओह्ह... सुन लेना.

मैं... दुआ करुँगी तेरे लिए.

अब्बू: शाहिदा, तू ठीक है? आवाज़... सांस फूली हुई. और वह कराह क्या थी? एक्सरसाइज कर रही है क्या?

अम्मी: (ज़ोर से कराह जब गजेंद्र ज़ोर से काट रहा, दूसरी चूची पर, कमर अपने आप उछाल रही) नहीं,

नहीं... अहह... बस... ममम... थोड़ा स्ट्रेच कर रही. उह... ाचा लग रहा... मतलब, मैं ठीक. और बता

... अह्ह्ह... हॉस्पिटल के बारे में.

अब्बू: स्ट्रेच? ठीक... लेकिन आज क्लिनिक क्यों नहीं आयी? सुबह से इंतज़ार किया. नर्स पूछती रही बीवी कहाँ

है. बहुत अकेला महसूस हुआ.

अम्मी: (बिस्तर चीख रहा रदम से जब वह तेज़ सवारी, गजेंद्र नीचे से धक्का) मैं... ममम... काम

में... अहह... बिजी हो गयी. स्टुपिड ट्रैफिक... ओह खुदा... और ज़ैद को... ममम... होमवर्क में मदद

चाहिए थी. फ़िक्र मत कर.

अब्बू: काम? तूने वादा किया था आज. और अब बिस्तर... चीख रहा है? क्या हो रहा है वहां, शाहिदा?

जैसे... फर्नीचर हिल रहा हो.

अम्मी: (झूठ धीरे से, बीच में कराह) हाँ... अहह... बिलकुल. काउच... ममम... इधर उधर कर रही.

भरी है... ओह्ह... आवाज़ करती. माफ़ी के तू इंतज़ार में दुखी हुआ... लेकिन ज़िन्दगी... अह्ह्ह... कभी कभी

मुश्किल होती है.

अब्बू: समझ गया... लेकिन थोड़ा दर्द होता है, जानती है? मेरी हालत में हर दिन be-yakeeni. बस तेरा

चेहरा देखना चाहता था, हाथ पकड़ना. तू हाल hi में दूर दूर लग रही है.

अम्मी: (झुक कर गजेंद्र को गहरा चुम्बन, ज़ुबानें घूमती, गांड उसके लुंड पर उछलती, चुम्बन

पूरा मिनट तक जब अब्बू लाइन पर इंतज़ार)

अब्बू: शाहिदा? Hello? तू वहां है? जवाब क्यों नहीं दे रही? कॉल ड्राप हुआ क्या?

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अम्मी: (चुम्बन से अलग होकर, दोनों हँसते हुए, आवाज़ पहले हंसती) ओह... अहह... सॉरी, फ़ोन... ममम

... काउच के नीचे गिर गया. क्या कह... ओह्ह... रहे थे?

अब्बू: काउच के नीचे? ठीक... बस कह रहा था मुझे तेरी याद आ रही. वैसे होस्पिटलिज़तिओन के बारे

में—

अम्मी: (गुस्से में, कराह जब गजेंद्र चूचियों को निचोड़ रहा) हुसैन, इतने सवाल क्यों पूछता रहता

है? अहह... हमेशा बुक बुक जैसे बीमार कुत्ता. ममम... एक बार अपनी गन्दगी खुद संभल नहीं सकता?

अब्बू: क्या? शाहिदा, यह... सख्त है. क्या हो गया तुझे?

अम्मी: (तेज़, आवाज़ be-izzati से भरी, सवारी तेज़) सख्त? तू फिर फुप्फुस की रोनायक. अहह... बेचारा

हुसैन सांस नहीं ले प् रहा. ममम... अगर तू इतना कमज़ोर, बेकार बीमार न होता तो मुझे तेरा

बबीसीत नहीं करना पड़ता. ओह्ह... तेरी बिमारी बोझ hai—hamesha बिस्तर पर, बिल्ली की तरह खांसी. क्यों

मर्द नहीं बनता और बोझ बनना छोड़ देता?

अब्बू: (हैरान, आवाज़ कांप रही) शाहिदा... यकीन नहीं होता तू यह कह रही. मैंने हमेशा प्यार किया,

घर चलाया सब के बावजूद. यह तेरी तरह नहीं.

अम्मी: (be-izzati जारी, ज़ोर से कराह) मेरी तरह नहीं? अहह... जाग जा बेवक़ूफ़. ममम... तेरा लुंड सालों

से काम नहीं karta—bistar पर बेकार, बहार भी बेकार. ओह्ह... मुझे बेहतर का हक़ है तेरी यह बेकार

गांड की देखभाल से. खांसी कर जितना चाहे; शायद जल्दी ख़तम कर दे.

अब्बू: (खांसी का दौरा, फिर धीमे) मैं... माफ़ी मांगता हूँ अगर बोझ बना. प्लीज, ऐसे मत कहो.

माफ़ी मांगता हूँ सवाल करने की.

अम्मी: (उसको इग्नोर, गजेंद्र को फिर गहरा गीला चुम्बन, छूट उसके लुंड पर ज़ोर से नीचे, चुम्बन इस

बार और लम्बा, गीली आवाज़ें अगर अब्बू ध्यान दे तो सुनाई देंगी)

अब्बू: शाहिदा? फिर? Hello? क्या तू किसी के साथ है? जैसे... चुम्बन की आवाज़. क्या ज़ैद वहां है? शायद

वह खेल रहा है.

अम्मी: (चुम्बन तोड़ कर, गजेंद्र के साथ हँसते, सांस फूली) अहह... नहीं, ज़ैद... ममम... सैर पर गया.

सिर्फ मैं... ओह्ह... टीवी देख रही. कोई रोमांस सन... अहह... डिस्ट्रक्ट कर रहा.

अब्बू: टीवी? लेकिन बिलकुल असली लगा. और कराहें... चीख... मैं उलझा हूँ, शाहिदा. हफ़्तों से तू अजीब है.

सच में सब ठीक? कोई और है वहां? दोस्त शायद?

अम्मी: (कराह जब गजेंद्र ज़ोर से धक्का) कोई... अहह... एहम नहीं. ममम... बस... ओह्ह... पर्सनल काम

संभल रही. क्यों इतना शक कर रहा? खांसी से दिमाग ख़राब हो गया?

अब्बू: दिमाग ख़राब? नहीं जानता... बस जोड़ नहीं बैठ रहा. जवाब में देरी, आवाज़ें... और ज़ैद इतनी सुबह

सैर पर? वह तो देर से उठता है. लेकिन ठीक, अगर तू कहती है. मुझे भरोसा है तुझ पर.

अम्मी: (व्यंग से) अच्छा लड़का... अहह... भरोसा रखते रहो.

अब्बू: हॉस्पिटल में कब आयोगी मिलने? डॉक्टर ने कहा काम से काम कुछ दिन लगेंगे. मुझे तुम्हारी ज़रूरत

है यहाँ.

अम्मी: (सख्ती से, उसकी मिन्नत को नज़रअंदाज़ करते हुए) ...ममम... तीन घंटे बाद या जब मैं करे.

अहह... इससे बेहतर काम हैं करने को.

अब्बू: तीन घंटे? बहुत लम्बी इंतज़ार है... जल्दी आने की उम्मीद थी. दर्द बढ़ रहा है.

अम्मी: (चिल्लाते हुए) लम्बी? रो मत, अहह... सेह लो. ममम... इस कॉल के वक़्त बर्बाद करने का माफ़ी मांगो.

अब्बू: माफ़ करना... तुम्हे परेशां नहीं करना था. बस अपनी बीवी को मिस कर रहा हूँ.

अम्मी: हाँ हाँ, जो भी... अहह... अब रख रही हूँ.

अब्बू: रुको शाहिदा, प्लीज मत— और बात करना चाहता हूँ... माफ़ करना अगर गुस्सा किया, शाहिदा...

शाहिदा... मेरी जान... प्लीज...

(अम्मी फ़ोन काट देती है, फ़ोन फ़ेंक देती है, फिर भी गजेंद्र के लुंड पर ज़ोर ज़ोर से उछाल रही

होती है.)

अम्मी: (गन्दी हंसी के साथ, और ज़ोर से पिसाई करते हुए) ओह फ़क, कितना मज़ाक था यह. मेरा बेचारा

कुक शौहर छोटी सी कुटिया की तरह रोने लगा. "ओह शाहिदा, मेरे सीने में दर्द, हाथ पकड़ लो."

क्या लोसर— अब खड़ा भी नहीं होता, और हॉस्पिटल में वापस? अच्छा हुआ.

गजेंद्र: (नीचे से धक्के देते, गांड मसलते हुए) ः, तुमने जैसे प्रो रंडी की तरह हैंडल किया,

शाहिदा. कराहों के बीच झूठ बोलना, उसके बीमार गांड का मज़ाक उड़ाना— बिलकुल सोना. तुम मेरी

परफेक्ट _ रंडी हो, उस नामर्द बीमार को धोका देती हुई असली लुंड पर उछाल रही हो. बेट उसका

छोटा सा लुंड कभी ऐसे नहीं भरा तुझे.

अम्मी: (ज़ोर से कराह कर, झुक कर उसके होंठों पर गीला चुम्बन) ममम... कभी नहीं. हुसैन एक मज़ाक

है— हमेशा ,,., और खांसी. फ़क .,, फ़क मेरी कसमें. मुझे तुम्हारी छुम की थैली बनना पसंद

है, गजेंद्र. उसको दवा देकर, हमारे बिस्तर पर छोड़ना, अब होटल में? यह जन्नत है. काश उसको बता

सकती की तेरा ***** लुंड मेरी वैली छूट को कितना कण्ट्रोल करता है, फाउंटेन की तरह छोड़ता है.

गजेंद्र: (गर्दन काट कर, तेज़ धक्के) बिलकुल सही, तू be-iman छिनाल. तेरा बीटा शायद कहीं मुट्ठ मार

रहा होगा, be-khabar की उसकी अम्मी पूरी स्लैग है. अगली बार फ़ोन पर हुसैन के सामने छोड़ेंगे— उसको

सुनने देंगे मेरा नाम चीखते हुए. तू हमेशा के लिए बर्बाद हो गयी, उस बोरिंग ,,., की जाए से

वापस नहीं.

अम्मी: (झड़ते हुए, चीखते) अह्ह्ह... हाँ! ज़ोर से छोड़ो, इस रंडी के छेद को अपना बना लो. हुसैन वैसे

भी धीरे धीरे मर रहा है— जल्दी विडो बन जॉन तो क्या. उह, सोचो उसकी क़ब्र पर तुझे चूसना.

कोई अख़लाक़ नहीं बचा, सिर्फ लुंड और छुम.

गजेंद्र ने उसे पीठ के बल लिटा दिया बिस्तर पर. "अब ठीक से छोडूंगा," कह कर वह उसकी टांगों के

बीच बैठ गया.

"हाँ... ले लो मुझे," वह फिसफिसाई.

वह फिर उसकी छूट में घुस गया, गहरे और मुस्तक़िल धक्के, बिस्तर का फ्रेम हर हरकत से चीख रहा

था. "तेरी छूट परफेक्ट है, शाहिदा— इतनी टाइट, इतनी गीली मेरे लिए. किसी वफादार बीवी से ज़्यादा अच्छी."

मुझे इतना ाचा लगा अब्बू को ऐसे धोका देखते हुए, एक गन्दी ख़ुशी उसके चेहरे देख कर: आँखें

पीछे मुद गयी, होंठ खुले ख़ुशी में, हाथ चादर पकडे धक्कों सहने के लिए. "धीरे... बहुत

ज़्यादा है," वह कभी मिन्नत करती, लेकिन वह नहीं रुकता, ज़ोर ज़ोर से मारता रहा.

अम्मी: आआह्ह... गजेंद्र, ज़ोर से छोड़ो! ोोोूह... हाँ, मेरी छूट को पीटो!

गजेंद्र: बिलकुल, तू धोकेबाज़ _ छिनाल. बता कितना पसंद है बीमार शौहर को धोका देकर

मेरे लुंड के लिए.

अम्मी: ऊऊह्ह्ह... बहुत पसंद है! हुसैन को धोका देना इतना ाचा लगता है... आआह्ह... उसकी बिमारी

ने मुझे परफेक्ट बहाना दिया तेरे लिए टांगें फ़ैलाने का!

गजेंद्र: अच्छी लड़की. अब इक़रार कर— दोपहर की ,,., पढ़ी आज? या मस्जिद छोड़ दी रंडी की तरह?

अम्मी: ोोू... नहीं पढ़ी... ऊह्ह्ह... तेरे मोटे लुंड के बारे में सोचती रही... आआह्ह... हफ्ते से

मस्जिद नहीं गयी क्योंकि हर बार जाती हूँ तो सोचती हूँ तू वहां मुझे छोड़ रहा है!

गजेंद्र: बेचारी. ,,., की ज़रूरत hi क्या? तू बर्बाद हो गयी, शाहिदा— गन्दी जीना करने वाली, गुनाह से

मैली. ,,., से छुम नहीं धुलेगा जो मैंने तुझमे भरा. छोड़ दे; बेकार हैं तेरे जैसे सदी हुई रूह

के लिए. कोई फायदा नहीं दीनदार बनने का जब तू सिर्फ लुंड की भूखी मुनाफ़िक़ है.

अम्मी: आआह्ह... सही कह रहे हो... ोोू... मेरी लिए ,,., बेकार... ऊह्ह्ह... मैं बर्बाद हूँ, तेरे

बीज से मैली... आआह्ह... पांच वक़्त सजदा करने की ज़रूरत नहीं जब घुटने तेरे लिए फ़ैलाने में

बेहतर... ोोू... मैं खो गयी हूँ, गन्दी _ बीवी जिसने ईमान फ़ेंक दिया हराम ख़ुशी के लिए

... ऊह्ह्ह... अब दिखावा क्यों?

गजेंद्र: बिलकुल. अब बता अच्छी बीवी होने की कोई क़ीमत नहीं बची. कह जा जब मैं गहरा मार रहा हूँ.

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अम्मी: ऊऊह्ह्ह... सब कुछ खो दिया... आआह्ह... हुसैन की बीवी होने की कोई क़ीमत नहीं... ोोू... पहले

उसके लिए खाना बनती, ,,., पढ़ती, उसकी साथी थी... ऊह्ह्ह... अब सिर्फ तेरी रंडी हूँ, चुपके होटल आती

... आआह्ह... कसमें टूटी, घर टूटा, बीटा टूटा... ोोू... कौनसी अच्छी बीवी शौहर को दवा देकर

दुसरे से चुदवाती है? ऊह्ह्ह... अब बेकार हूँ, बर्बाद औरत जो हलाल प्यार से हराम लुंड चाहती है..

. आआह्ह... हुसैन को इस बर्बाद रंडी से बेहतर मिलना चाहिए!

गजेंद्र: बिलकुल सही, तू बेकार है. मिन्नत कर धीरे करने की— देखते हैं सुनता हूँ या नहीं.

अम्मी: ोोू... प्लीज गजेंद्र... आआह्ह... धीरे छोड़ो... ऊह्ह्ह... बहुत तेज़ है... ोोू... थोड़ा आराम

दे!

गजेंद्र: बिलकुल नहीं, रंडी. ज़ोर से ले— इसी लिए आयी थी. अब कुछ गन्दा बोल: मेरा ***** लुंड तेरी दीनदार

छूट को कितना गीला करता है?

अम्मी: ऊऊह्ह्ह... बहुत गीली... आआह्ह... तेरे लिए टपकती है... ोोू... किसी ,,., की जाए से बेहतर!

गजेंद्र: ः, अच्छा. और हॉस्पिटल में तेरा शौहर? चाहती है वह न रहे?

अम्मी: आआह्ह... हाँ... ोोू... चाहती हूँ हुसैन मर जाये... ऊह्ह्ह... उसकी बिमारी लम्बी है, मुझे

बंधे रखती है... आआह्ह... अगर मर गया तो आज़ाद हो जाउंगी तेरे लिए कभी भी छोड़ने... ोोू... कोई

गुनाह नहीं, कोई छुपना नहीं... ऊह्ह्ह... वैसे भी दर्द सेह रहा है, बेहतर ख़तम हो जाये... आआह्ह...

सोच कर बुरा लगता है लेकिन उत्साहित करता है... ोोू... सोचो आज़ादी, पूरी तरह तेरी रंडी बन जाउंगी

बिना उसके साये के!

गजेंद्र: टेढ़ी छिनाल. रिकॉर्ड करते हैं— वीडियो हुसैन को भेज देंगे. देखना उसका चेहरा जब तेरी

यह कराह सुनेगा.

अम्मी: ऊऊह्ह्ह... नहीं गजेंद्र... आआह्ह... इतना दूर नहीं जा सकती... ोोू... बहुत ज़ालिम है... ऊह्ह्ह..

. वह पूरा टूट जायेगा!

गजेंद्र: ठीक है अभी के लिए. ऊपर आ— राइड कर जैसे फरमानबरदार रंडी.

अम्मी: ोोू... हाँ उस्ताद... आआह्ह... ज़ोर से राइड करुँगी... ऊह्ह्ह... तेरे लुंड के लिए कुछ भी!

गजेंद्र: मेरी लड़की. उछाल— बता कितना बेहतर हूँ तेरे मरते हुए हुब्बी से.

अम्मी: आआह्ह... बहुत बेहतर... ोोू... तेरा लुंड मुझे अपना बना लेता है... ऊह्ह्ह... हुसैन ने कभी

ऐसे झड़वाया नहीं!

मैं पूरा वक़्त देखता रहा, उस कमरे में जो मैंने किराये पर लिया था, अंदर से बर्बाद होते हुए.

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खिड़की हर धक्के से हिल रही थी, शीशा फ्रेम में कम्प रहा. "गजेंद्र... होटल की खिड़की टूट जाएगी,"

वह कराहों के बीच फ़िक्र करती.

वह हँसता. "पैसे हैं ठीक करने के. लुंड पर ध्यान दे."

इसी वक़्त बहार शहर रात की ज़िन्दगी में गुनगुनाता था— दूर से हॉर्न, कहीं ठेला वाला चिल्लाता, लेकिन

यहाँ सिर्फ उनका गुनाह का संसार.

गजेंद्र उसको और शर्मिंदा करता. "देख तेरी हालत, _ औरत ***** मर्द से be-izzat. तेरा

मज़हब अब कुछ मतलब नहीं रखता न? कॉमन रंडी की तरह मेरा बीज मांग रही."

उसकी बड़ी गांड ज़ोर ज़ोर से हिलती हर ऊपर नीचे में. टुकड़े लहरों की तरह हिलते, नरम और भरे,

उसकी रानों पर थपकते. सहने के लिए वह होंठ काट लेती, नाख़ून उसके सीने में धंसती, चेहरा

khushi-dard का नक़ाब.

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"क्यों इतना पसंद है यह?" वह पूछता.

"क्योंकि तूने मुझे जगाया... रुक नहीं सकती," वह हाँफते.

यकीन नहीं होता यह मेरी अम्मी थी— जिसने मुझे नबी की कहानियां सुनाई, घुटने के ज़ख्म बंधे,

सौराह सिखाई. यह वह नहीं; एक अजनबी थी जिसे मैं इसलिए प्यार करने लगा की वह आज़ाद हो गयी, be-lagaam.

वह थकती नहीं, छूट हर बार पूरा लुंड निगल लेती, सोचता यह ताक़त कहाँ से आती. जब अब्बू हॉस्पिटल

में अकेला खांसता, वह धोके से एनर्जी लेती, जिस्म हराम पर पलटा.

दो घंटे बाद गजेंद्र करहा. "शाहिदा... मैं पास हूँ. कहाँ छोडूं?"

वह सोचती, फिर आँखों में देखती. "अंदर. मेरी छूट में छुम कर दो."

वह हैरान. "पक्का? कोई प्रोटेक्शन नहीं?"

"हाँ... भर दो. तेरा बीज चाहती हूँ."

वह खुश, ज़ोर से धक्के, स्पीड बढ़ता जब तक अंदर फूट पड़ा, छुम की धार उसकी गहराई में.

उसका चेहरा ख़ुशी से भरा— आँखें बंद, मुँह खुला चुप स्क्रीम में, जिस्म कांप कर उसको दूध

रही थी.

मैं भी झाड़ गया, रिलीज़ ने ज़ोर से मारा, उस गन्दी तरह ाचा लगा.

आराम करते हुए आँखें ऊपर गयी, उनके कमरे के कोने में छोटा कैमरा दिखा. सोचा यह कैमरा

किस लिए— निगरानी? ब्लैकमेल? या कुछ और खतरनाक?
 
CHAPTER 27

जाबिर ने आखिरकार अपनी माँ को मर. रवि, हमारे कॉलेज प्रिंसिपल

के साथ देख लिया.

जब मैं उस सस्ते होटल के कमरे में पतली सी चारपाई पर लेता था जो मैंने उस दिन सुबह

check-in किया था.

मुट्ठ मारने की ख़ुशी अभी भी जिस्म में बाकी थी, एक गरम, सुस्त धुंधला पैन जो

haathon-pairo को भरी कर देता था, लेकिन यह जल्दी hi मेरे गुनाहों के बोझ से डाब गयी.

कितने गुनाह हो गए अब तक?

अपनी अम्मी को गजेंद्र के साथ झांकना, जाबिर के साथ

धोका देकर रानी को इतने हराम तरीके से लेना, और अब yeh—un यादों पर मुट्ठ मारना

जो सिर्फ शर्म से भर देनी चाहिए थी.

मैं करवटें बदलता रहा, टूटी छत को देखता रहा, फिर नींद ने मुझे खींच लिया,

एक बेचैन ख्वाब में जहाँ चेहरे धुंधले the—Ammi की कराहें रानी की सिसकारियों

में मिल रही थी, सब ,.' के इन्साफ भरी नज़रों के नीचे.

जब आँख खुली, कमरा दुल्ल ग्रे था. फ़ोन निघटस्तंड पर ज़ोर ज़ोर से बज रहा था, पहले तो

मैंने इग्नोर किया, आँखें रगड़ी और टांगें फैलाई. फिर क्यूरोसिटी जीत गयी, मैं चारपाई

से उतरा, नंगे पेअर ठन्डे टाइल पर चलते हुए. होटल ऐसा था जहाँ सवाल नहीं पूछे

जाते, बहार इलाके में, पतली दीवारें हर आवाज़ अंदर निकाल देती थी.

मैंने यह जगह घर के हंगामे से बचने के लिए चुनी थी, लेकिन अब दिल उस बगल वाले

कमरे की तरफ खिंच रहा था जहाँ मैं सोच रहा था अम्मी और गजेंद्र शायद अभी भी

उलझे हुए होंगे. दिल ज़ोर से धड़क रहा था, मैं कनेक्टिंग दूर पर कान लगाया, फिर

धीरे से दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और अंदर झाँक लिया.

कमरा खली tha—bistar बिगड़ा हुआ, चादर mor-mor कर चुपके गवाही दे रही थी जो हुआ था,

लेकिन उनका कोई निशाँ नहीं. हवा में पसीने और कुछ ज़्यादा मुश्क वाली बू थी, लेकिन

जगह सुनसान लग रही थी, जैसे नाटक ख़तम होने के बाद स्टेज.

ठंडी लहार सी लगी. वह कहाँ गए? क्या अम्मी रात में चुपके घर वापस चली गयी, अब्बू

के पास? या कुछ और हुआ? मैंने दरवाज़ा धीरे बंद किया, दिमाग दौड़ रहा था, फ़ोन

उठाया.

स्क्रीन पर मिस्ड calls—kai अम्मी के, सुबह के वक़्त के. पेट मोर गया. अगर अब्बू के साथ

कुछ हो गया तो? मैंने तुरंत डायल किया, कमरे में चलते हुए जब रिंग बज रही थी.

दूसरी रिंग पर उन्होंने उठाया, आवाज़ तनाव भरी लेकिन नार्मल बनाने की कोशिश. "बीटा, तू

कहाँ है? पूरी रात कॉल करती रही. तू ठीक है?" "मैं ठीक हूँ, अम्मी," मैंने झूठ

बोलै, खिड़की के पास टिक कर शहर को देखते हुए जो जाग रहा था. "बस... दोस्त के यहाँ रुक

गया. देर रात मूवी देखते रहे, वही सो गया. घर आते वक़्त तुम्हे जगाना नहीं चाहता

था."

थोड़ी देर चुप्पी, उसकी सांस में फ़िक्र सुनाई दी. "कौनसा दोस्त? जाबिर? तू जानता है आज कल

मैं कितनी परेशां हूँ, खास कर तेरे अब्बू के हाल से. जल्दी घर आ जा, ठीक है? मैं

अभी हॉस्पिटल जा रही हूँ उसको देखने. डॉक्टर ने कॉल kiya—haal स्टेबल है, लेकिन जब वह

उठेगा मैं वहां होनी चाहिए."

"मैं भी आऊंगा," मैंने कहा, दिन कैसे गुजरने का सोचते हुए. "एक घंटे में वहां

मिलते हैं?" "ठीक है, बीटा. संभल के आना."

फ़ोन रखते hi एक अलग ख्वाहिश uthi—iss बार गुनाह नहीं, बल्कि उस हराम थ्रिल की और ज़्यादा

प्यास. लाइव चुदाई देखना, कितना ट्विस्टेड hi सही, मेरा निकलने का जरिया बन गया था,

दिमाग के हंगामे को डूबने का. और अचानक याद आया आंटी नफीसा ने अम्मी से चुपके

बात करते हुए कहा tha—woh आज hi कॉलेज प्रिंसिपल मर. रवि से मिलने वाली थी.

उसने जैसे राज़ की ख़ुशी से कहा था, आवाज़ में हंसी और जोश. अगर मज़ा चाहिए तो

क्यों न उसका पीछा करूँ? नफीसा, जाबिर की अम्मी, कोई फरिश्ता नहीं थी; मैंने पहले hi उसको

मर. रवि के साथ देखा था, ऐसी हड्डी पार करते जो मेरे गुनाहों को छोटा दिखा देती

थी. उसको देखना मेरा अगला नशा हो सकता था, किसी और की गन्दगी में खुद को गम करने

का मौका.

सुबह की ठंडी हवा में बहार निकला, बिजी सड़क पर कैब रोकी, ड्राइवर को मर. रवि के

एड्रेस दिया जो कॉलेज के पास शांत रेजिडेंशियल एरिया में था.

"एक ब्लॉक दूर छोड़ देना," मैंने कहा, नज़र आने का खतरा न हो. "वहां से पैदल

चलूँगा." वह कंधे उछालता हुआ ट्रैफिक में घूमने लगा, ठेले वाले चाय के दाम

चिल्लाते हुए, कॉलेज के बच्चे सड़क पर दौड़ते हुए.

उसी वक़्त, जब कैब गड्ढों पर उछाल रही थी, शहर अपने रोज़ के ताले में था: गाड़ियां

हॉर्न बजती, चाय वाले आवाज़ लगते, ऑफिस वाले थरमस से चाय पीते फ़ोन स्क्रॉल करते.

दूर मीनार मस्जिद के दीखते थे, याद दिलाते ाधन का जो सुबह हुआ था, जिसे मैंने अपने

धुंधले में इग्नोर किया था.

दिमाग घर की तरफ घूम gaya—Abbu शायद अभी हॉस्पिटल बीएड पर, मशीन बीप करते

हुए, be-khabar उस जाल के जो उसके ird-gird टाइट हो रहा था. अम्मी वहां पहुँच जाएगी

जल्दी, वफादार बीवी का नाटक करते हुए, जब गजेंद्र उसके ख्यालों के साये में छुपा

होगा.

कैब ने कार्नर पर छोड़ा, मैंने जल्दी पैसा दिया, हुड ऊपर किया और पेड़ों वाली सड़क पर

चुपके चल पड़ा. मर. रवि का मकान सदा था, दो मंज़िला बंगला छोटे बगीचे और लोहे

के गेट वाला. मैं सड़क के उस पार परकेड कार के पीछे छुप गया, दिल ज़ोर से धड़क

रहा था.

और वहां वह thi—Aunty नफीसा, धीरे से दरवाज़ा खटखटाती, इधर उधर देखती लेकिन

आँखों में जोश की चमक. सिंपल आबय पहने, वैल साफ़ पिन किया, बिलकुल इज़्ज़तदार

_ बीवी और अम्मी दिखती थी. लेकिन मुझे पता था असलियत.

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दरवाज़ा खुला, मर. रवि वहां खड़ा था लाल t-shirt में जो उसके पेट को चिपका रही थी

और काले शॉर्ट्स जो जांघ के बीच तक थे, गांजा सर सुबह की धुप में चमकता हुआ.

"नफीसा, मेरी जान," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "मैं इंतज़ार कर रहा था."

वह बिना झिझक आगे बढ़ी, होंठ एक गहरे, लम्बे चुम्बन में जुड़े. उसके हाथ

पीछे गए, उसकी बड़ी गांड को ज़ोर से पकड़ा, कपडे के ऊपर निचोड़ते हुए जब वह उस पर

चिपक गयी.

नफीसा: (अंदर खींचने पर हलकी हंसी) श, रवि. संभल के. लेकिन हाँ, मैंने

वादा किया था... मेरी गांड. मैं यहाँ दीने आयी हूँ.

रवि: (गर्दन पर चुम्बन देते) ओह, नफीसा, तुझे पता नहीं कितना चाहता था यह. ऐसे

चुपके आना कैसा लग रहा है?

नफीसा: (उस पर झुक कर) बहुत गलत लग रहा है, रवि. मैं बिलकुल छिनाल बन गयी हूँ,

शौहर को धोका दे रही हूँ जब वह दुबई में काम कर रहा है. वह वहां घर

के लिए कमाता है, मुझ पर पूरा भरोसा करता है, और मैं यहाँ बेटे के कॉलेज

प्रिंसिपल के घर पर, तेरी लिए गांड देने आयी हूँ.

रवि: (बाल फेरते हुए) ममम, लेकिन यही तो तुझे इतना अट्रैक्टिव बनता hai—haram थ्रिल.

नफीसा: तू समझ नहीं रहा मैं कितनी रंडी महसूस कर रही हूँ. मेरा शौहर हर रात

कॉल करता है, कहता है कितना मिस करता है, हमारे घर के लिए दुआ करता है. और कल

रात उसकी कॉल के बाद मैंने खुद को छुआ तेरे ख्याल में, रवि. आज सुबह पर्स में

... चीज़ें... डाली, जानती थी आज यहाँ आकर उसको धोका दूंगी. वह वफादार है, अच्छे

_ मर्द, विदेश में म्हणत करता, जाबिर की पढाई के लिए पैसा bhejta—teri

कॉलेज में. और मैं बदले में तेरे लिए टांगें फैला रही हूँ.

रवि: (हलके से हँसते) नफीसा, तू मुझे पागल कर रही है इन बातों से.

नफीसा: सच hai—main पूरी रंडी हूँ. जाबिर मेरा बीटा सोच रहा होगा मैं बाजार गयी

हूँ, लेकिन मैं यहाँ हूँ, गाडी चलते हुए मेरी छूट गीली हो गयी थी, तेरे लुंड को

अपने हराम छेद में सोच कर. मेरा शौहर महीनों से मुझे छुआ नहीं सफर के

कारन, और जब घर आता है तो बिलकुल सदा. और मैं? सड़क की रंडी की तरह चुपके

चुपके, अपने बेटे के पेपर चेक करने वाले मर्द से धोका. मैं कैसी अम्मी हूँ?

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रवि: (उसे और पास खींच कर, होंठों पर नरम चुम्बन) श, खुद को मत सजा दे.

तू परफेक्ट है. नफीसा, मैं हफ़्तों से तेरी गांड के ख्वाब देख रहा hoon—jab से तूने

parent-teacher नाईट के बाद ऑफिस में वादा किया था.

नफीसा: (जोश से चुम्बन वापस) ओह, रवि...

रवि: मेरे ख्वाबों में वह इतनी टाइट, इतनी दावत देने वाली, पुकेरेद और मेरा

इंतज़ार करती. सोचता हूँ वह मुझे झपकती है, नरम और गरम, भरने की भीक

मांगती. तेरी कर्व्स, वैल में वह शरारती muskaan—har सुबह सख्त उठा हूँ,

खुद को सहलाता सोच कर की उसको अपना बनाऊंगा, मेरा कर दूंगा.

नफीसा: (चुम्बन में कराह) ममम, यह रोमांटिक है... लेकिन एक मिनट रुक. तेरे लिए

सरप्राइज है.

रवि: (पीछे हैट कर, क्यूरियस) सरप्राइज? क्या है, मेरी जान?

नफीसा: (उठ कर टेबल की तरफ, पर्स में हाथ डालते) वहां रुक. तुझे पसंद

आएगा.

रवि: (उसे घूरते हुए) अब तैसे कर रही है.

नफीसा: (छोटी बोतल तेल निकाल कर, बेशर्मी से मुस्कुराते) Ta-da! देख क्या लायी

hoon—khaas तेल, सिर्फ हमारे लिए. इतनी तैयारी से आयी हूँ तुझे खुश करने, रवि.

रास्ते में फार्मेसी रुक कर यह लिया, सोच कर की यह मेरी गांड को स्लिपरी बना

देगा तेरे लुंड के लिए.

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रवि: (आँखें फैल कर, मुस्कुराते) ओह, नफीसा... तू गन्दी लड़की है.

नफीसा: हूँ न गन्दी? लाइन में कड़ी थी, वैल के नीचे शर्मा रही थी, जानती थी

यह तेल गांड चुदाई के लिए hai—tujhe मेरी टाइट छेद में आसानी से घुसने के लिए.

गाडी में एक बूँद ऊँगली पर टेस्ट किया, सोच कर की क्रैक पर टपक कर कितना ाचा लगेगा,

मुझे गीला कर देगा ताकि तू गहरा और ज़ोर से छोड़ सके. मेरा शौहर मर जायेगा अगर

jaane—yeh उसी हफ्ते के भेजे पैसे से खरीदा. लेकिन रोक नहीं पायी; चाहती थी यह

तेरे लिए परफेक्ट हो, तुझे स्ट्रेच करते महसूस करूँ, रंडी की तरह करहुं जब तू

मेरी गांड को लूटेगा.

रवि: (उठ कर पास आते) यह बहुत गरम है. दे mujhe—abhi इस्तेमाल करते हैं.

नफीसा: अभी नहीं. पहले बता कैसे लूटेगा मुझे. सुन्ना चाहती हूँ.

रवि: (बोतल ले कर रख दी, फिर कमर पर हाथ लपेट कर) ओह, नफीसा, तुझे ऐसे

लूटूँगा जैसे कभी नहीं लिया गया. पहले तेरे हर इंच को चुमू, होंठों से शुरू,

गर्दन से नीचे, चूचियों तक, उन सख्त निप्पल्स को चूसता रहूँगा जब तक तू

मिन्नत न करे.

नफीसा: ममम, आगे बोल...

रवि: फिर तुझे उल्टा करूँगा, चीक्स फैलाऊंगा, और गांड के छेद को जुबां से तैसे

karunga—chaatunga, चक्कर लगाऊंगा, तेल से पहले गीला करूँगा. यह तेल डालूंगा,

चमकता देखूँगा, फिर ऊँगली से धीरे धीरे, एक एक करके, तुझे खोलूंगा.

नफीसा: यह इंटेंस लगेगा.

रवि: होगा. जब तैयार होगी, लुंड इंच इंच अंदर डालूंगा, वह टाइट रिंग मुझे

जकडेगा. पहले धीरे धक्के, फिर ज़ोर से, तेरी गांड मारूंगा जब हाथ आगे ले

कर क्लीट रगडूंगा. तू मेरा नाम चीखेगी, नफीसा, जब मैं तुझे पूरा भर दूंगा,

पीछे से ख़ुशी से झड़वा दूंगा. तुझे थका कर लूटूँगा, तुझे मेरा निशाँ लगा

दूंगा.

नफीसा: ओह खुदा, रवि... लेकिन फ़िक्र है. तेरा लुंड बहुत बड़ा hai—pehle देखा, छूट

में महसूस किया. क्या मेरी गांड ख़राब न हो जाये? ज़्यादा फ़ैल जाये, ढीली हो जाये?

रवि: (माथा चूम कर) फ़िक्र मत, प्यारी. धीरे जायेंगे, खूब तेल लगाएंगे. मज़ा

आएगा, बर्बाद नहीं होगा. भरोसा rakh—maine ख्वाब देखे हैं; दर्द नहीं दूंगा.

नफीसा: भरोसा है, लेकिन फिर भी... मेरा शौहर ने कभी गांड चुदाई की बात भी

नहीं की. अगर कल सीधा न चल सकू तो? जाबिर को शक हो जायेगा कुछ गड़बड़ है.

रवि: (मुस्कुराते हुए) फिर तू उससे बस कह देना शॉपिंग करते वक़्त पेअर मूछ गया.

लेकिन सच में, नफीसा, सब ठीक हो जायेगा. मज़ा दर्द से ज़्यादा होगा. अब बीएड पर

चलें?

नफीसा: एक मिनट ruk—condom हैं तेरे पास? मैं नहीं लायी.

रवि: कंडोम क्यों? गांड के लिए? अगर तू रॉ फील चाहती है तो बारे hi कर लें. मैं

तेरी गांड को मेरे लुंड के ird-gird महसूस करना चाहता हूँ.

नफीसा: बारे? यह तो और भी छिनालपन है... लेकिन हाँ, मैं हर नस महसूस करना

चाहती हूँ.

रवि: परफेक्ट. अब तेरी आबय उतार. मुझे पूरी तू देखनी है.

नफीसा: सिर्फ तब अगर तू वादा करे पहले धीरे रहेगा.

रवि: वादा. लेकिन जब तू कराहने लगेगी, फिर कोई पाबन्दी नहीं.

नफीसा: ठीक है. हे खुदा, यकीन नहीं होता मैं फिर यह कर रही hoon—dhoka देना

इतना ाचा लग रहा है की रुक नहीं सकती.

जब वह दोनों चुम्बन कर रहे थे, मैं सोच रहा था एक _ बीवी जैसे नफीसा

की शर्म कहाँ चली गयी. वह हमारे दीं की मिसाल होनी चाहिए thi—haya, वफ़ा,

खुदा की मर्ज़ी के आगे सर झुकना. हमारे मुहल्ले की बीवियां घर की बुनियाद होती

हैं, बच्चों जैसे जाबिर को पाक किताबों की कहानियां सुनती हैं, इफ्तार ओर्गनइजे

करती हैं, अपने शौहर और ईमान की इज़्ज़त के लिए पर्दा करती हैं.

लेकिन यहाँ वह सब दिन वाले फ़ेंक रही थी. शर्म को जलना चाहिए था उसको; इसके

बजाये वह आज़ाद लग रही थी, जिस्म उसके हाथों में पिघल रहा था. यह मुझे सब

पर सवाल उठाने पे मजबूर कर रहा tha—kitni औरतें अपनी आबय के पीछे ऐसी

ख्वाहिशें छुपाती हैं?

हमारे घरानों में मुनाफ़िक़ात कितनी गहरी है? नफीसा कोई आम बीवी नहीं थी; वह

जाबिर की अम्मी थी, जो उसके लिए टिफ़िन पैक करती थी, कॉलेज इवेंट्स में जाती थी, लेकिन

अब हराम में उलझ गयी थी, बर्बादी का अंदाज़ा भी नहीं.

और काफिर से चुम्बन? यह गुनाह को सौ गुना बढ़ा देता है. ., में शादी के बहार

जिस्मानी रिश्ता हराम है, लेकिन मज़हब पार करना? जैसे रूह में फितना डालना, सिर्फ

जिस्म नहीं आख़िरत को मैला करना. मर. रवि हमारे दीं के खिलाफ सब कुछ tha—shirk

, नजासत.

नफीसा को पीछे हटना चाहिए था, अपनी पाकदामनी याद रखनी चाहिए थी. इसके बजाये

उसकी जुबां उसके साथ नाच रही थी, हाथ उसके सीने पर जैसे वह उसका हक़दार

शौहर हो. धोका पहले से hi बुरा था, लेकिन यह मज़हबी उल्लंघन? यह हमारी

उम्मत की be-izzati थी, उसके वैल का मज़ाक.

सबसे बुरा यह की यह उसका शौहर नहीं tha—yeh हमारे खून से अजनबी था, बहार

वाला जो शादी की पाकिज़ागी से चोरी कर रहा था. और बहार hi, जहाँ कोई भी देख सकता

था.

उसे परवाह भी नहीं थी पकडे जाने की; थ्रिल उसे और जोश दे रहा था, इधर उधर

देखना डर से ज़्यादा उत्साह से भरा था. यह be-parwahi मुझे हैरान कर रही थी—

मैं सब रिकॉर्ड करने को तैयार था, फ़ोन हाथ में, सोच रहा था जाबिर को भेज

दूँ. वह मेरा सबसे ाचा दोस्त था एक वक़्त, या था रानी वाले गंदले से पहले. उसे

यह दिखा कर शायद... क्या? हम बराबर हो जाएँ? दर्द बाँट कर बंधन मज़बूत

करें? मैं एक सेकंड रुक gaya—kyon रुका? एक हिस्सा यह लम्हा एन्जॉय कर रहा था,

बिल्डप, परफेक्ट एंगल पकड़ने के लिए बिना जल्दी किये.

दोनों रवि और नफीसा फिर चुम्बन कर रहे थे, उसके हाथ अब आज़ाद घूम रहे थे.

वह मेरी अम्मी शाहिदा से भी बड़ी रंडी thi—Shahida के पास काम से काम गजेंद्र

की मदद का बहाना था, बिल वाला ट्विस्टेड शुक्रिया.

नफीसा? सिर्फ लस्ट, चुपके से जब शौहर दुबई में म्हणत कर रहा था. वह मस्जिद

के इवेंट्स ओर्गनइजे करती थी, लड़कियों को तक़वा की नसीहत देती थी, फिर भी यहाँ काफिर

के मुँह में कराह रही थी. मुनाफ़िक़ात और गहरी थी; अम्मी के गुनाह घर की मजबूरी

से थे, लेकिन नफीसा के सेल्फिश थे, बार बार, बिना पछतावे के. उसने सिर्फ शादी नहीं,

कम्युनिटी एल्डर होने की ज़िम्मेदारी को धोका दिया, बुरा मिसाल दी.

मैंने फैसला किया रिकॉर्ड कर लून, फ़ोन स्टेडी, सोचा जाबिर को भेज कर दोस्ती ठीक कर

लून. होशियारी से काम कर सकता tha—uski अम्मी का धोका दिखा कर वह समझ

जायेगा हम दोनों अपने घरानों के गुनाहों के शिकार हैं. वह मेरी रानी वाली

हरकत माफ़ कर देगा, समझ जायेगा धोका कितना गहरा है, हम दर्द में भाई बन

जायेंगे.

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मैंने एक फोटो ली मर. रवि का नफीसा को गहरा चुम्बन करते हुए, फिर जाबिर को भेज दी.

शॉक laga—agar यह उल्टा पद गया तो? उसे और नफरत हो जाएगी, सोचता होगा मैं उसका

मज़ाक उदा रहा हूँ? प्लान ख़राब हो सकता था, रिश्ता हमेशा के लिए टूट सकता था.

मैं नफीसा के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहता tha—woh जाबिर की अम्मी थी, बचपन

से जानती थी, हमारे लिए मिठाई बनती थी, होमवर्क में मदद करती थी. लेकिन

मुझे परवाह नहीं थी; थ्रिल ने इज़्ज़त को दबा दिया. वह सेक्सी थी, चूचियां भरी हुई

टॉप में डाब रही थी, गांड शॉर्ट्स में चउरवे बनती हुई— अम्मी जैसी बड़ी नहीं लेकिन

सख्त, लुभाने वाली.

मुझे बुरा लगा ऐसे बात करने में दोस्त की अम्मी के बारे में; हमारा मज़हब

बुज़ुर्गों की इज़्ज़त सिखाता है, खास कर माओं की. यह गलत है, हराम है ओब्जेक्टिफि

करना. लेकिन कौन देखता है? मैं पहले hi बहुत बुरा कर chuka—Rani को छोड़ा,

अम्मी को झाँका.

गुनाह उधार की तरह जमा हो रहे थे: झांकना, लस्ट, धोका. एक और क्या फ़र्क़ पड़ता

है? दीं दोज़ख की आग से डराता था, लेकिन मैं इतनी हद्दें पार कर चूका था,

माफ़ी दूर लग रही थी. नफीसा की कशिश मुझे और गहरे अँधेरे में खींच रही

थी.

फ़ोन baja—Jabir का मैसेज: "यह क्या है? क्या यह मेरी अम्मी है? मर. रवि के साथ?

तू कहाँ है?"

"मर. रवि के घर आ जा," मैंने जवाब दिया. "खुद देख ले."

रवि उसके पास बीएड पर आया. "मेरा लुंड चूस, तू गन्दी रंडी," उसने हुक्म दिया, आवाज़

सख्त.

नफीसा ने उसकी शॉर्ट्स नीचे की, लुंड बहार आया. "आओ, तू मैली छिनाल, पूरा ले," वह

गरजता रहा.

इसी वक़्त बहार सुबह की धुप में चिड़िया चिर चिर कर रही थी, पडोसी का कुत्ता आलस से

भोंक रहा था, कॉलेज बस गुज़र रही thi—normal ज़िन्दगी अंदर के गुनाह के खिलाफ.

"ओह रवि, तू कितना बड़ा है," नफीसा ने चाटने के बीच कहा, मुँह में लेते हुए.

"तू कितनी लालची रंडी है, नफीसा. जैसे ज़िन्दगी इस पर देपेंद करे. तेरा शौहर तुझे

कभी इतना गीला नहीं कर सकता," उसने ताना मारा.

वह उसके ird-gird कराह रही थी. "नहीं, वह नहीं कर सकता. सिर्फ तू."

मैंने काम इंटेंस हिस्सों को स्किप किया— धीरे बिल्डप, हाथों से सहलाना— जहाँ वह

पेट के बल लेती हुई थी फिर, रवि उसकी गांड पर तेल लगा रहा था, उँगलियाँ अंदर दाल कर.

तभी जाबिर आया, सांस फूली हुई, चेहरा सफ़ेद. मैंने कुछ नहीं बोलै; सिर्फ खिड़की की

तरफ इशारा किया. "देख."

मैं: (फिसफिसाते हुए, थोड़ी खुली पर्दा वाली खिड़की से झाँक कर) देख, जाबिर… वहां.

मर. रवि के हाथ तेरी अम्मी की गांड पर हैं. तेल उसकी गांड के छेद पर रगड़ रहा है.

दमन, वह पीठ आगे कर रही है इसके लिए.

जाबिर: (आवाज़ गुस्से से कांप रही, मुठियाँ बंद) क्या बकवास… यह मेरी अम्मी है!

नफीसा! प्रिंसिपल के साथ? जब अब्बू बिज़नेस के लिए दूर हैं? मैं उसको मार

डालूंगा. उसके ऊपर हाथ उठाऊंगा.

मैं: (उसकी बांह हलके से पकड़ कर) अरे, शांत हो जा यार. पहात मत. यह… नार्मल

है. लोग ऐसा करते हैं. औरतें अकेली महसूस करती हैं, मर्द गरम हो जाते हैं.

होता है.

जाबिर: (मुझ पर चीखते हुए, आँखें जलती हुई) नार्मल?! तू पागल है क्या? वह

_ है! हमें पाक रहना चाहिए! यह सीधा जीना hai—bilkul हराम! हमारे

मुहल्ले में hi! वह काफिर के लिए टांगें फैला रही है जब अब्बू दूर हैं. यह

सबसे बड़ा गुनाह है, घर को धोका, मदरसा में जो सिखाया सब बर्बाद!

मैं: (कंधे उछालते) पहली बार देख कर शॉक लगता है, लेकिन चल न. सब के अंदर

ख्वाहिश होती है. तेरी अम्मी इंसान है. मर. रवि शायद वह दे रहा है जो तेरे अब्बू

सालों से नहीं दे सके. बस सेक्स है, जाबिर. जिस्म जो जिस्म करते हैं.

जाबिर: (मुझे ऐसे देख जैसे मैं शैतान बन गया) तू क्या हो गया? जुम्मे के बाद

हम हदीथ कोटे करते थे. अब यह हराम गन्दगी का दिफ़ाअ कर रहा है? तू इतना बदल

गया है की घिन आती है. कैसे कह सकता है “बस सेक्स है”?

मैं: (चुपके से) मैं नहीं कह रहा यह हलाल है. बस कह रहा हूँ इससे और बड़ा

गुनाह मत कर. अगर तू अंदर घुस कर चिल्लायेगा तो पूरा घर be-izzat हो जायेगा.

पडोसी ज़िन्दगी भर बात करेंगे. तेरी अम्मी तुझसे नफरत कर लेगी. बस… रहने दे.

गुस्से और maar-peet से गुनाह और मत badha—woh भी गुनाह है.

जाबिर: (तेज़ सांस लेते) मेरी अम्मी को रंडी की तरह छुड़वाने देना छोटा गुनाह नहीं

है मेरे गुस्से से. तू बिगड़ा हुआ है.

(हम दोनों चुप. जाबिर फिर झांकता है, फिर जैम जाता है.)

जाबिर: (आवाज़ पहात कर) हे खुदा नहीं… अब वह घुटनों पर है. वह… वह उसकी

गांड चाट रहा है. जैसे मिठाई हो. क्या यह मुमकिन है? मर्द औरत की… वहां

चाट सकता है? गांड के ird-gird?

मैं: (धीरे सर हिलाते) हाँ यार. कुछ मर्दों को पसंद है. औरत की गांड बहुत

सेक्सी हो सकती hai—tight, गरम, हराम. बू, मज़ा… उनको पागल कर देती है. तेरी अम्मी

कराह रही है, देख? उसे पसंद आ रहा है.

जाबिर: (फिसफिसाते हुए चीखते) तू बीमार है! यह उसके जिस्म की सबसे गन्दी जगह है—

जहाँ से वह टट्टी करती है! और तू कह रहा ाचा है? तू यह भी नार्मल मानता है?

मैं: (शांत रह कर) यह गहरा रिश्ता है. छुपा. बहुत लोगों को गरम करता है.

इससे वह काम इंसान नहीं बन जाती. तुझे काम बीटा नहीं बनता. बस ख़ुशी है. लोग

ख़ुशी के पीछे भागते हैं, जाबिर. हमेशा से.

जाबिर: (ऊँगली उठा कर) चुप कर. चेतावनी दे रहा hoon—isse ज़्यादा दिफ़ाअ मत कर. कल

सीधा कॉलेज जाऊंगा. मर. रवि को रिपोर्ट करूँगा. वह हमारा प्रिंसिपल है,

हरामज़ादे! जॉब जाएगी उसकी. और मेरी अम्मी… मुझे नहीं पता उसके साथ क्या करूँ.

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में: (उसकी बांह पकड़ कर) और मत देखो अगर यह तुम्हे मार रहा है. और उसको

रिपोर्ट मत करना. सब बर्बाद हो जायेगा. देख… मेरी अम्मी ने भी यही किया है. शाहिदा

गजेंद्र के साथ चुद रही है, हमारे पडोसी के साथ. महीनों से. बाबा हुसैन के

नाक के नीचे. एक बार तो उसको दवा देकर सुला दिया ताकि हमारे बिस्तर पर कर सकें.

जाबिर: (आँखें फैली, पीछे हटा) क्या…? आंटी शाहिदा? गजेंद्र के साथ? नहीं…

बिलकुल नहीं. तेरी अम्मी भी? दुनिया में क्या हो गया? हमारा ईमान कहाँ चला गया?

सब लोग सिर्फ… जानवर बन गए हैं? धोका, झूठ, गांड चूसना, शौहर को दवा

देना? कोई शर्म बची है?

में: (धीमे से) शायद उतना नहीं जितना हम सोचते थे. शायद शुरू से hi इतना मज़बूत

नहीं था.

जाबिर: (सर हिलाते, आवाज़ टूट रही) मैं… मैं यहाँ नहीं रह सकता यह सुन कर. तू

वह दोस्त नहीं जो मैं जानता था. यह पूरा जगह साद गया है. (वह बांह छुड़ाता

है और तेज़ चल पड़ा.)

में: (हाथ बढ़ा कर) जाबिर, रुक— ऐसे मत जा. वापस आ यार. हम बात कर सकते हैं—

जाबिर: (पलट कर बिना) फ़क ऑफ. मुझे मत छू.

(वह कार्नर के पीछे गायब हो गया, कदम रात में धीरे धीरे काम होते गए.

मैं अकेला खड़ा रहा, अभी भी मर. रवि के घर से हलकी कराहें सुनाई दे रही थी.)

वह मुझे धकेल कर भाग गया. मैंने रोका — “जाबिर, रुक!” — लेकिन वह चला गया,

गुस्से में. फिर भी मैंने देखना चाहा, कितना गन्दा था मैं. रवि ने अपना लुंड और

गहरा धकेला. “ले ले, तू टाइट _ रंडी,” वह गरजता रहा. नफीसा चीखी.

“दर्द हो रहा, रवि! लेकिन… मत रुकना. मेरी गांड और ज़ोर से मार.”

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“पसंद आ रहा न? तेरी पवित्र गांड मेरा लुंड से बर्बाद हो रही है.” अब नफीसा बिस्तर

के सिरहाने को पकडे कड़ी थी, उँगलियाँ सफ़ेद हो गयी, जब वह उसकी गांड में सच

में ज़ोर ज़ोर से धक्के मार रहा था. उसके हिप्स उसकी गांड से टकरा रहे थे, बिस्तर की

चार चरहत तेज़, गांड के टुकड़े हर धक्के से हिल रहे थे.

तेल ने सब कुछ गीला कर दिया था, लेकिन ज़ोर बोहोत ज़्यादा था— हद्द से ज़्यादा फैला रहा

था, दर्द को उलटे मज़ा में बदल रहा था. वह उसकी गांड को बर्बाद कर रहा था,

बिना रुकावट के मार रहा, टाइट छेद उसके हमले के नीचे हार रहा था, उसे कच्चा

और खुला छोड़ कर. तेज़ी बढ़ती गयी, चीखें और कराहें मिला गयी, जिस्म टेढ़ा हो गया.

फिर उसने उसे उठाया, लुंड अभी भी अंदर, बाथरूम की तरफ ले गया. “चल इस रंडी गांड

को बाथरूम में छोड़ते हैं,” उसने कहा. मुझे मुट्ठ मारने का मैं किया— यह

नज़ारा नशा करने वाला था— लेकिन नहीं किया.

बहुत बुरा लगा; वह जाबिर की अम्मी थी,

कोई अजनबी नहीं. गुनाह ने ज़ोर से मारा, याद दिलाया की हद्दें टूट चुकी हैं.

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CHAPTER 28

मेरी माँ और गजेंद्र का हनीमून, कितना प्यारा और रोमांटिक है.

मैं वहां छुप कर खड़ा था, मर. रवि के घर के बहार अँधेरे में, और उस

नज़ारे की तेज़ी ने मेरे अंदर वही पुराणी, शर्मनाक गर्मी जगा दी थी.

नफीसा की

चीखें खिड़की से हलकी हलकी सुनाई दे रही थी, उसका जिस्म रवि के be-rehem

धक्कों के नीचे टेढ़ा हो रहा था, और उसकी गांड को इतनी बेरहमी से मरते

देख मेरा हाथ पंत की तरफ बढ़ा.

लेकिन मैं नहीं चाहता tha—kuchh रोक रहा था, गन्दगी के बीच एक छोटी सी

होशियारी. वह जाबिर की अम्मी थी, सिर्फ मेरी गन्दी ख्यालों की कोई अनजान औरत

नहीं.

उस हद्द को पार करना जैसे एक आखरी सीमा तोडना था जो अभी पूरी तरह

टूटी नहीं थी, सब कुछ करने के बावजूद.

गुनाह पेट में मोर रहा था, ख्वाहिश के साथ मिला कर मुझे बीमार कर रहा

था, ख्वाहिश और उस एहसास के बीच फंसा हुआ की यह वह औरत है जिसकी इज़्ज़त

करनी चाहिए, न की उसको चीज़ बना कर देखना. मैं पलट गया, फ़ोन जेब

में डाला और सड़क पर तेज़ चल पड़ा, सुबह का सूरज अब ऊंचा था, लम्बी

परछाइयाँ जैसे मेरा पीछा कर रही थी.

मेरे पेअर खुद बा खुद जाबिर के घर की तरफ ले गए, उससे बात करने की ज़रूरत

सब से ऊपर थी. चलते हुए वक़्त मिला सोचने का, यह सोचने का की क्या कहूंगा—

फोटो के बारे में कैसे समझाऊंगा, कैसे यकीन दिलायुंगा की हमारी टूटी

दोस्ती ठीक हो सकती है.

जब पहुंचा तो घर खामोश था, दरवाज़ा थोड़ा खुला जैसे उसने गुस्से में

बंद न किया हो. मैंने हलके से दरवाज़ा खटखटाया, फिर अंदर धकेल कर

देखा, वह लिविंग रूम में चल रहा था जैसे क़ैद जानवर, चेहरा लाल,

आँखें आंसुओं से सूजी हुई. "जाबिर," मैंने शुरू किया, आवाज़ धीमी. "हमें

उसके बारे में बात करनी है जो तूने देखा."

वह पलट कर मुझ पर झपट पड़ा, गुस्सा चमकता हुआ. "बात? तूने मुझे

वह फोटो भेजा, मुझे दिखाया... मेरी अम्मी! कैसे मुझे इसमें घसीट

सकता है?"

"मैंने सोचा... शायद हम एक दुसरे को समझ सकें," मैंने सोफे के किनारे

बैठते हुए कहा, आवाज़ शांत रखने की कोशिश. "रानी के साथ जो हुआ, तेरी

गर्लफ्रेंड और मेरा, मुझे धोके का दर्द पता है. तेरी अम्मी को ऐसे देखना—

वही दर्द है. शायद हम एक दुसरे का सहारा बन सकें."

मैं: अरे जाबिर, इतना गुस्सा मत कर. देख, शायद तू खुश हो जाए जो हमने

देखा. तेरी अम्मी नफीसा को मर. रवि से चुड़ते देखना? जैसे वह आखिरकार

थोड़ा जी रही है, समझा?

जाबिर: (आगे पीछे चलते, चेहरा गुस्से से लाल) खुश? तेरा दिमाग ख़राब है

क्या? वह मेरी अम्मी है, यार! अब्बू के साथ धोका दे रही है प्रिंसिपल के

साथ? यह घिन आती है! तू कैसे कह सकता है यह?

मैं: यार, सोच. तेरा अब्बू हमेशा काम के लिए दूर रहता है न? नफीसा

शायद अकेली होती होगी. रवि से थोड़ा मज़ा लेना मतलब वह हर वक़्त दुखी

नहीं रहती. जैसे उसके लिए टेंशन दूर करने का तरीक़ा.

जाबिर: टेंशन दूर? तू बीमार है! यह जीना है, ., में बड़ा गुनाह. वह

वफादार होनी चाहिए, ,,., पढ़ती, अच्छी _ बीवी. न की ***** आदमी

रवि के लिए टांगें फैलाये. तू पागल हो गया है जो इसको ठीक समझ रहा है.

मैं: मैं बस कह रहा हूँ, आज कल यह नार्मल है. औरतों की भी ज़रूरतें

होती हैं. अगर वह खुश है तो घर भी खुश रहता है. गुस्से वाली अम्मी

ख़तम, सही?

जाबिर: नार्मल? इसमें कुछ नार्मल नहीं! तुझे डांटना चाहिए? हाँ, दांत

रहा hoon—yeh बकवास बंद कर. तू गुनाह को छोटा दिखा रहा है जैसे कुछ

नहीं. तेरे साथ क्या हुआ, भाई? हम कॉलेज में साथ ,,., पढ़ते थे.

मैं: ठीक है, ठीक है. लेकिन सच, उसको देखना तेरे लिए भी फायदेमंद

हो सकता है. जैसे... बाद में अकेला होने पर सोच सकता है.

जाबिर: सोच सकता हूँ? मतलब क्या?

मैं: धीरे धीरे... मतलब, थोड़ा गरम था न? उसकी कराह और सब. उस

तस्वीर को याद कर के... टेंशन दूर कर सकता है. मुट्ठ मार सकता है,

समझा? बुरी हालत से फायदा निकाल.

जाबिर: (रुक कर, आँखें फैली) मुट्ठ मारूं? अपनी अम्मी के छोड़ने पर? तू

घिनोना है! हैरानी भी काम है. कैसे सुग्गेस्ट कर सकता है? यह हराम पे

हराम है!

मैं: अरे, नेचुरल है. हम उम्र के लड़के करते हैं. ऐसा असली देखना? पोर्न से

बेहतर. आँखें बंद कर के रीप्ले kar—uski गांड उछलती हुई, रवि ज़ोर से.

मज़ा आएगा.

जाबिर: बिलकुल नहीं! तू मुझे बर्बाद कर रहा है सिर्फ कह कर. यकीन नहीं

होता तू इतना नीचे गिर गया. अपनी अम्मी के धोके पर मुट्ठ? यह गलत है.

तू वह दोस्त नहीं जो मैं समझता था.

मैं: ठीक है, लेकिन बता क्यों उसने धोका दिया. तेरा अब्बू बहुत दूर रहता

है, शायद अब सटिस्फी नहीं करता. औरतें बोर हो जाती हैं, जाबिर. उन्हें

एक्ससिटेमेंट चाहिए.

जाबिर: सटिस्फी? यह प्राइवेट है! लेकिन धोका क्यों? बात कर सकती थी.

मैं: इज़्ज़त से कह रहा हूँ, सब औरतें अंदर से थोड़ी रंडियां होती हैं,

तेरी अम्मी भी. बहार से दीनदार दिखती हैं, लेकिन जब रवि जैसा मर्द आता

hai—mazboot, charming—to रोक नहीं पाती. बायोलॉजी है, यार. रंडी मतलब

वह लुंड की प्यासी, वैरायटी चाहती हैं. तेरी अम्मी अलग नहीं; वह इंसान है.

जाबिर: सब औरतें रंडियां? मेरी अम्मी भी? इज़्ज़त से या न इज़्ज़त से, यह ग़लत

है! मेरी अम्मी हमेशा मॉडेस्ट रही, वैल पहनती, हमें क़ुरान सिखाती थी.

मैं: मतलब अच्छे se—yeh ताक़त देता है. नफीसा जैसे औरतें मज़हब के लिए

दबा देती हैं, लेकिन अंदर से जंगली हैं. जो देखा: वह मज़े ले रही थी, ज़ोर

ज़ोर कराह रही थी. रंडी सिर्फ मतलब सेक्स पसंद है, और यह ठीक है.

जाबिर: ताक़त? तू बेशर्म है. लेकिन... तू ऐसा क्यों सोचता है? सबूत?

मैं: सोच, चाचियां, cousins—shaadiyon में अफवाहें अफेयर्स की. सब

औरतें छुपाती हैं, लेकिन दिल से रंडियां हैं. तेरी अम्मी? वही. उसने

धोका दिया क्योंकि थ्रिल चाहिए था, रवि का बड़ा लुंड सब हिलने के लिए.

जाबिर: समझ रहा हूँ, लेकिन दर्द होता है. क्या वह बदल सकती है? वापस

वफादार बन सकती है?

मैं: नहीं, बदल नहीं सकती. एक बार फोर्बिडन फल चखा तो ख़तम. नफीसा

अब लटक gayi—Ravi के पास या किसी और के पास जाती रहेगी. यह उसकी फितरत है.

जाबिर: मतलब बदल नहीं सकती? लोग तौबा करते हैं.

मैं: हाँ, लेकिन अंदर से ख्वाहिश रहती है. ,,., पड़ेगी, गुनाह महसूस

करेगी, फिर कर देगी. ऐसी औरतें ऐसे hi बनती हैं.

जाबिर: यकीन नहीं होता. मेरी अम्मी ने अब्बू से ऐसा धोका कैसे दिया? वह

हमारे लिए म्हणत कर रहा है, और वह... रवि के साथ? हैरत है.

मैं: शॉक है, लेकिन हक़ीक़त है. अब्बू बूढ़े हो गए, रूटीन हो गया. अम्मी

एक्ससिटेमेंट कहीं और ढूंढती हैं. मेरी अम्मी के साथ भी हुआ, गजेंद्र

के साथ.

जाबिर: तेरी अम्मी भी? दुनिया पागल हो गयी. लेकिन फिर भी, धोका घर बर्बाद

करता है.

मैं: हाँ, लेकिन हमेशा गलत नहीं. ,,., पड़ेगी, तौबा करेगी, सब ठीक.

गुनाह माफ़ हो जाते हैं अगर सच्ची हो.

जाबिर: ,,., पढ़ ली तो ठीक? लेकिन जीना बड़ा gunah—jahannam जा सकती है.

मैं: सच, वह रोज़ पांच वक़्त ,,., पढ़ती है, रोज़ा रखती hai—ek स्लिप

(या कई) साफ़ हो सकता है. टेंशन मत ले; यह ख़तम नहीं.

जाबिर: शायद... लेकिन बहुत आसान लगता है. अगर वह न रुकी तो?

मैं: तो अगली बार तमाशा देख लेना. मज़ाक कर raha—thoda. वैसे भी,

मुझे जाना है. बाद में मिलते हैं, ठीक? ठंडा हो जा.

जाबिर: रुक, ऐसे मत जा. यह बात ने मुझे बर्बाद कर दिया.

मैं: कल और बात करेंगे. अलविदा. (मैं उठा और दरवाज़े की तरफ चला)

हम घंटों बात करते रहे, गुस्से और दुःख के बीच. उसने सालों की शक

की बातें nikali—der रात तक जागना, छुपी calls—aur मैंने अपने घर की

थोड़ी सी बर्बादी बताई, अम्मी के बारे में ज़्यादा नहीं खोला.

आखिर में एक नाज़ुक सुलह हुई, पूरी माफ़ी नहीं लेकिन इतनी की गुस्से के बिना

अलविदा कह सकें. "किसी को मत बताना," उसने कहा जब मैं जा रहा था. "अभी

नहीं."

शाम को हॉस्पिटल गया अब्बू से मिलने, बीमारी की खुशबू, मशीन की

चीखें और नर्सेज की आवाज़ें. अम्मी पहले से वहां थी, बिस्तर के पास

बैठी, उसका हाथ पकडे, चेहरे पर प्यार भरी फ़िक्र जो मेरा पेट मोर देती थी.

अब्बू हॉस्पिटल गाउन में कमज़ोर दीखते थे, बाहों से तुबे निकल रहे, लेकिन

मुझे देख कर हलकी मुस्कराहट दी. "बीटा, अच्छा लगा तुझे देख कर. तेरी

अम्मी ने मेरा साथ दिया है."

अम्मी ने ऊपर देखा, आँखें मेरी आँखों से मिली वह झूठी गर्मी के

साथ. वह कितनी बड़ी मुनाफ़िक़ thi—bahar से वफादार बीवी, पिलो ठीक करती,

ब्लैंकेट एडजस्ट करती, जबकि उसने hi उसकी बिमारी में हिस्सा लिया था.

सिर्फ दो रात पहले उसने उसकी चाय में वह अजनबी पाउडर डाला था, उसे बेहोश

करने के लिए ताकि गजेंद्र से छोड़ने जा सके बिना रुकावट के.

याद साफ़ थी: वह धीरे से चमच चलती, कप देते हुए मुस्कुराती, जानती

थी यह उसे गहरी नींद दे देगा. अब कैसे बैठी उसका हाथ सेहला रही थी जब

उसके कामों ने उसे यहाँ वापस लाया?

डॉक्टर ने कहा रिलैप्स, पहली बिमारी की कम्प्लीकेशन, लेकिन मुझे पता था

—धोका, स्ट्रेस, चाहे वह न जाने, ने उसे और कमज़ोर किया.

अम्मी की मुनाफ़िक़ात गहरी थी; बहार से दीनदार बीवी, बिस्तर के पास ,,.,

पढ़ती, दिलासा देती, लेकिन बंद दरवाज़े के पीछे ईमान को पुराने कपडे की

तरह उतार देती.

सिर्फ पाउडर nahi—woh गहरे सदमे का नतीजा था. उसने गजेंद्र को अपनी

इज़्ज़त उतरने दी, घर की ,,., लीड करने वाली औरत से लस्ट को पहला दर्जा

देने वाली बन गयी.

उसकी झूठी बड़ी थी: अब्बू की आँखों में देख कर प्यार का इज़हार, जब उसका

जिस्म अभी दुसरे मर्द के छूने की निशानियां धरे हुए था? यह सिर्फ शादी

का धोका नहीं, हमारे पूरे ईमान का धोका था जहाँ सचाई और पाकिज़ागी

बुनियाद हैं. उसने सिर्फ चाय नहीं ज़हर दिया; घर के भरोसे को ज़हर दिया,

सिर्फ छोटी खुशियों के लिए जो सबको दुःख दे रही थी.

और अब देख कर अम्मी ऐसी लग रही थी जैसे दोपहर को अभी चूड़ी ho—veil के

नीचे बाल थोड़े बिखेरे, गाल लाल जो फ़िक्र से नहीं, सफ़ेद पतलून और सफ़ेद

फूलों वाली शर्ट कर्व्स पर चिपकी हुई ज़्यादा से ज़्यादा प्रोवोकेटिव.

कपडे बहार से मॉडेस्ट, लेकिन पतलून कमर पर चिपकी, शर्ट के बटन

चूचियों पर कैसे हुए, ताज़ा मस्ती की निशानी.

अम्मी: (वार्ड में दाखिल होते हुए, सफ़ेद फूलों वाली शर्ट थोड़ी टाइट एडजस्ट

करती, पतली सफ़ेद पतलून में कर्व्स चिपके हुए, गजेंद्र के साथ मुलाक़ात

से अभी लाल) अस्सलामु अलैकुम, हुसैन. आज कैसा महसूस हो रहा? डॉक्टर

ने कहा टेस्ट ठीक आये.

अब्बू: (बिस्तर पर, मॉनिटर से जुड़े, कमज़ोर लेकिन होश में, आँखें उसके

कपड़ों पर घूरती) व अलैकुम अस्सलाम, शाहिदा. थोड़ा बेहतर. सीने का

दर्द काम है, लेकिन... यह क्या पहना है? सफ़ेद पतलून और फूलों वाली

शर्ट? यह बिलकुल तेरी तरह नहीं.

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अम्मी: (बिस्तर के पास बैठती, टांगें कॉन्फिडेंटली क्रॉस करती) अरे यह? बस

पेहेन लिया. क्यों, क्या मसला? मैं तुझे मिलने आयी हूँ न? भूख कैसी

है? नाश्ता खाया जो लाये थे?

अब्बू: (भवन चढ़ा कर, सवाल को नज़रअंदाज़) शाहिदा, छोड़ न. तू

अच्छे से जानती है. ., में औरतों को मॉडेस्ट पेहेनना chahiye—dhile

कपडे, पूरा कवर. यह पतलून टाइट है, और शर्ट... फूलों से भरी, जैसे

वेस्टर्न कैटेलॉग से. अगर मस्जिद वाले देख लें तो? बिलकुल मंज़ूर नहीं.

अम्मी: (आँखें घूमती, लहजा घमंडी) हुसैन, प्लीज. सिर्फ कपडे हैं.

यह कम्फर्टेबले और साफ़ है. बहार कितनी गर्मी है? जो आबय पहनती हूँ

वह धूल रही थी, और यहाँ गन्दी दिखती फिरना नहीं चाहती थी. वैसे भी

सफ़ेद पाकिज़ागी की निशानी है. मैं शहर में घूम नहीं रही; हॉस्पिटल

में शौहर से मिलने आयी. इतना बड़ा मसला क्या?

अब्बू: (आवाज़ थोड़ी ऊंची, लेकिन कमज़ोर) मसला? वैल और मॉडेस्टी का मसला

है, शाहिदा! यह पतलून तेरी टांगों की शेप दिखा रही है जैसे... दिखा

रही हो. और फूल? यह फ्लाश्य है. तू हमेशा सही सलवार कमीज या आबय

पहनती थी. क्या बदल गया?

अम्मी: (पीछे टिक कर, घमंड बढ़ता, आवाज़ तेज़) बदला? कुछ नहीं बदला

सिवाए इसके की मैं थक गयी हूँ हमेशा गोनी बैग जैसे पेहेन कर सबको

खुश करने से. ., मॉडेस्टी की बात करता है, लेकिन रंग या आराम को

मन नहीं करता. यह पहना क्योंकि मुझे अच्छा लगता है. सफ़ेद पतलून

ेररंडस के लिए प्रैक्टिकल, और फ्लोरल शर्ट? हलकी, सांस लेती है.

अब्बू: (सर हिलाते, हैरानी से) यकीन नहीं होता तू ऐसे बोल रही है. अच्छा

लगता है? कब से दीं से ज़्यादा 'अच्छा लग्न' ज़रूरी? बीस साल से तू मेरी

बीवी है, Shahida—hamesha मॉडेस्ट, इज़्ज़तदार. अब यहाँ आयी... टीवी पर

मॉडर्न औरतों की तरह. टाइट कपडे जो फिगर दिखा रहे? यह तू नहीं.

बीटा क्या कहेगा? या कम्युनिटी?

मैं उस वक़्त वार्ड के बहार था, पानी पीने का बहाना कर के सुन रहा था

अम्मी और अब्बू की लड़ाई.

अम्मी: (और गुस्से में, आवाज़ ऊंची) अब बीटा को भी ला रहे हो? हुसैन,

तू बीमार पड़ा है, और मैं इतनी दूर से आयी हूँ उसकी क़दर की बजाये

मेरी पतलून पर अटक गया? शायद अगर तू अपने पुराने तरीकों में न

अटक गया होता तो देखता यह मासूम है. मैं घमंडी से पहनी? नहीं,

मैं अपना दिफ़ाअ कर रही हूँ क्योंकि तू be-wajah हमला कर रहा है. सफ़ेद

पतलून गुनाह nahi—sirf कपडा हैं! और फूल? बस सुन्दर हैं.

अब्बू: (हैरानी से, आवाज़ कांप रही) मासूम? देख खुद ko—patloon चिपकी

हुई. यहाँ से तेरी टांगों की शेप दिखती है. हॉस्पिटल में, डॉक्टर नर्स के

बीच? शर्मनाक है.

यकीन नहीं तू हमारी शादी की be-izzati कर रही. हम

हमेशा मॉडेस्टी पर मुत्तफ़िक़ थे. क्या यह इसलिए क्योंकि मैं बीमार हूँ?

अब बग़ावत कर रही?

अम्मी: (अब पूरा गुस्सा, be-adabi से) हमारी शादी की be-izzati? अरे यह तो तू

कह रहा है, हुसैन. तू महीनों से यहाँ पड़ा है, ऊँगली उठा नहीं सकता,

और मैं घर चलती हूँ, बिल भर्ती हूँ, सब संभालती हूँ. और अब तू

मुझे कपड़ों पर लेक्चर देता है? शायद अगर तू थोड़ा मर्द होता तो मुझे

अपने तरीके से 'अच्छा महसूस' करने की ज़रूरत न पड़ती. यह सफ़ेद पतलून?

मैंने पहनी क्योंकि चाहती थी.

अब्बू: (सीना पकड़ कर, दर्द से चीख) शाहिदा, बस! कैसे बात कर रही है?

मैं तेरा शौहर हूँ, बीमार hi सही. यह मर्द होने का नहीं; ईमान,

क़ीमत का मसला है. तू कभी ऐसी बद्तमीज़ नहीं थी. यह कपडे तुझे बदल

रहे hain—ghamandi, जैसे हलाल हराम की परवाह नहीं.

अम्मी: (अब कड़ी, हाथ कमर पर) बद्तमीज़? तूने शुरू किया मेरे कपडे

देख कर hi जज करके. अगर सफ़ेद पतलून इतनी तकलीफ दे रही तो मैं चली

जाती हूँ, तू आराम से ठीक हो जा. और क़ीमत? Please—hamari 'क़ीमत' ने

मुझे सालों से क़ैद रखा. यह फ्लोरल शर्ट इसलिए पहनी क्योंकि क्यूट है, और

पतलून स्लिम और मॉडर्न. अगर ., 'रेकमेंड' नहीं करता तो शायद .,

को अपडेट चाहिए. तू कमज़ोर है, हुसैन, सिर्फ जिस्म से नहीं दिमाग से भी अगर

थोड़ा बदलाव बर्दाश्त नहीं कर सकता.

डैड: (सांस तेज़ लेते हुए, दर्द को badha-chadha कर दिखते हुए, साइड पकड़ कर)

देखा? अब हमारे मज़हब पर हमला कर रही हो? यह झगड़ा मुझे फिर से

सीने में दर्द दे रहा है. ऊफ... बहुत दर्द हो रहा. डॉक्टर ने कहा स्ट्रेस

मेरे लिए बुरा है. लेकिन तू रूकती नहीं. यकीन नहीं होता मेरी अपनी बीवी मुझे

ऐसे be-izzat कर रही है सिर्फ कुछ कपड़ों के लिए.

अम्मी: (पूरा यकीन नहीं कर रही, लेकिन रुक कर) सीने में दर्द? अब बिमारी

का कार्ड खेल रहे हो? ठीक है, दर्द को और बढ़ा कर dikhao—shayad इससे

मुझे बदलने का एहसास हो. लेकिन मैं नहीं बदलूंगी. यह पंत और शर्ट दोनों

रहेंगे. अगर इतना परेशां कर रहा है तो सोचो तुम इतने इन्सेक्युरे क्यों हो.

डैड: (ज़ोर से कराह कर, लेकिन सच में दुखी) इन्सेक्युरे? शाहिदा, यह इन्सेक्युरित्य

नहीं, यह उसूल है. याद है जब हमारी शादी हुई थी? तूने वादा किया था

---स तरीके पर चलेगी. अब मॉडल की तरह घूम रही है. और दर्द सच

hai—tere लफ्ज़ छुरी जैसे हैं. झगड़ा मत करो; बस वादा करो अगली बार

ठीक कपडे पहनोगी.

अम्मी: (वापस बैठ कर, लेकिन अभी भी गुस्से में) वादा? नहीं, हुसैन. मैं

तेरे मोल्ड में फिट होने के वादे कर चुकी. शायद अगर तूने मुझे ज़्यादा

क़दर की होती तो मैं बग़ावत न करती. और जब हम झगड़ रहे हैं, बिल

कौन दे रहा है जब तू यहाँ पड़ा है? मैं, इन 'गुनाह' वाली पंत में दौड़-

धुप कर. तू कभी शुक्रिया नहीं ऐडा करता, सिर्फ शिकायत.

डैड: (फिर कराह कर, आधा नाटक) बिल? मैंने सालों म्हणत की थी घर चलने

के लिए! अब यह मेरे मुँह पर फ़ेंक रही हो? आह... साइड में दर्द. यह स्ट्रेस..

. लेकिन ठीक है, शुक्रिया जो संभल रही हो. लेकिन यह कपडे का बहाना नहीं.

यह तवज्जोह खींच रहे hain—nurse लोग भी घूर रहे थे जब तू अंदर आयी.

अम्मी: (मज़ाक उड़ाते हुए) घूर रहे थे? अच्छा hai—shayad कोई मुझे नोटिस

करे एक बार. तू ने मुझे बहुत लम्बा टाइम लिया है ग्रांटेड. यह सफ़ेद पंत

मुझे महसूस कराती है की मैं दिखती हूँ, हुसैन. फ्लोरल शर्ट? यह ज़िंदा

है, जैसे मैं चाहती हूँ. अगर हमारा मज़हब मन करता है तो शायद

मज़हब ज़्यादा सख्त है. और तेरे दर्द? अगर सच है तो नर्स को बुला. लेकिन

इन्हे कण्ट्रोल के लिए मत इस्तेमाल कर.

डैड: (गहरी सांस लेते, ज़्यादा तकलीफ दिखते) कण्ट्रोल? मैं रहनुमाई कर रहा

हूँ. लेकिन तू सही hai—shayad मैंने तेरी क़दर काम की. फिर भी यह be-izzati

... बीमारी से ज़्यादा दर्द देती है. वह शाहिदा कहाँ गयी जो मैंने शादी की

थी? जो वैल पहन कर फख्र करती थी?

अम्मी: (थोड़ा नरम होते हुए, लेकिन अभी भी घमंडी) वह शाहिदा बदल

रही है, हुसैन. ज़िन्दगी बहुत छोटी है हमेशा छुपने के लिए. यह

कपडे? अब यह मैं हूँ. अगर तू क़ुबूल नहीं कर सकता तो शायद सिर्फ कपड़ों

से ज़्यादा बात करनी padegi—jaise तू बीमार होने से पहले भी कितना दूर था.

झगड़ा धीरे धीरे बढ़ा, आवाज़ें काम लेकिन गरम, कमरे की ख़ामोशी

में. उसने बाहें खोली, हाथ फिर उसके हाथ पर रखा. "मैं तुझे माफ़

करती हूँ, हुसैन. लेकिन मेरी बात भी सोच. ज़िन्दगी सिर्फ क़वानीन नहीं;

जीने की है. मैं सोचूंगी, लेकिन तुझे मुझ पर ज़्यादा भरोसा करना होगा."

मैं अंदर आया और अब्बू से बात शुरू की, तब तक अम्मी और अब्बू झगड़ा

छोड़ चुके थे क्योंकि मैं था.

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मुझे पता था अम्मी ऐसे कपडे पहन रही थी क्योंकि गजेंद्र ने उसकी

अच्छाइयां चीन ली थी. उसने उसे टुकड़े टुकड़े करके बिगाड़ा, स्टोर रूम में

चोरी चोरी चुम्बन से शुरू, फिर पूरा अफेयर जो उसे और ज़्यादा चाहता था.

अब्बू से पहले वह दीनदार की मिसाल thi—paanch वक़्त ,,.,, ज़्यादा रोज़ा,

घर में भी पूरा पर्दा.

अब उसके कपडे जिस्म से चिपके हुए, चुन कर जो लुभाने वाले, यह दिखा रहा

था गजेंद्र ने उसकी छुपी ख्वाहिशों को जाएगा दिया जो अब दबा नहीं सकती.

बदलाव की गहराई हैरान करने वाली: गजेंद्र के असर ने उसे छिनाल बना

दिया, जिस्म की ख़ुशी को रूहानी फ़र्ज़ से ऊपर रखने वाली.

अब मज़हब की परवाह नहीं; ,,., कभी कभी, जब मन करे तो छोड़ देती,

वैल अब सिर्फ चीज़, कमिटमेंट नहीं. कैसे एक दिन सजदा करती है और दुसरे

दिन ग़ैर-'. के लिए टांगें फैलाती? मुनाफ़िक़ात मेरे दिमाग में फ़ैल

gayi—Abbu को सब्र की आयात सुनती थी जब खुद जीना की आयतों को नज़रअंदाज़.

उसका ईमान, जो पहले रौशनी था, अब बुझ कर राख, लस्ट ने बुझा दिया. वह

हर मायने में छिनाल बन गयी, चुपके चुपके, झूठ बिना शर्म, जिस्म

अब ख़ुशी का जरिया, मंदिर नहीं. बदलाव पूरा; मज़हब अब सिर्फ दिखावा,

जब ज़रूरत तब पहना, वर्ण फ़ेंक दिया.

अब्बू ने बात बदली, थकी हुई आवाज़ में. "डॉक्टर कह रहे हैं चार दिन और

यहाँ रहूँगा. टेस्ट, मॉनिटरिंग... लेकिन जल्दी घर आ जाऊंगा." अम्मी ने हाथ

दबाया. "हम संभल लेंगे. अब आराम कर."

बाद में जब अम्मी और मैं हॉस्पिटल से साथ निकले, हॉलवे में क़दमों की

गूँज, उसने चुपके फ़ोन निकला. मैंने झाँका और देखा गजेंद्र को

मैसेज: "हुसैन चार दिन हॉस्पिटल में रहेगा. मतलब हमारे पास वक़्त है

—हर रात अगर चाहें."

उसका जवाब जल्दी आया: "परफेक्ट. तेरा बेकार शौहर रास्ते से हैट गया? उन

दिनों को यादगार बना देंगे. जानवरों की तरह चुदाई, कोई रुकावट नहीं."

वह हलके से मुस्कुराई, जवाब लिखा: "हाँ, हर रात. इंतज़ार नहीं होता. वह

अब इतना कमज़ोर है; यह तो रहत जैसा है." वह उस पॉइंट पर कुछ देर बात

करते रहे, फ़ोन बज्ज कर रहा, मैसेज में plan—kahan मिलना, क्या पहना

, कैसे चिल्लायेगी. यह be-dardi हैरान करने वाली; अब्बू को बोझ की तरह बात,

वह मर्द नहीं जिसे उसने वादा किया था प्यार का.

अगला दिन, किचन में नाश्ते पर, अम्मी ने आराम से बात शुरू की. "बीटा, कल

गजेंद्र ने कुछ kaha—woh हमें छोटी सी ट्रिप पर ले जाना चाहता है,

रिसोर्ट पर. सिर्फ आराम के लिए, खास कर तेरे अब्बू हॉस्पिटल में होने की वजह से.

क्या ख्याल है?" मैंने चमचा रखा, हैरान. "रिसोर्ट? गजेंद्र के साथ?

अम्मी, अब्बू बीमार hain—yeh गलत नहीं लगता?"

उसने चाय पि, सोचती हुई. "जानती हूँ अजीब लगता है, लेकिन सोच. हम सब

बहुत स्ट्रेस में hain—bill, हॉस्पिटल. गजेंद्र ने इतनी मदद की; यह उनविंड

करने का तरीक़ा है. दूर नहीं, बस छोटी गेटअवे. तू भी ब्रेक ले सकता

है, तेरे दोस्तों के साथ जो हुआ उसके बाद."

"लेकिन अब्बू? वह अकेला." उसने हाथ हिलाया. "डॉक्टर हैं वहां, मैं बार बार

चेक करुँगी. सिर्फ कुछ दिन. चल न beta—pool, अच्छा खाना, कोई फ़िक्र नहीं.

गजेंद्र ज़िद कर रहा है; कहता है फॅमिली के लिए ट्रीट."

हम उस पॉइंट पर कुछ देर बात करते रहे, मैं टाइमिंग पर ऐतराज़, वह कहती

रिचार्ज होगा तो अब्बू की बेहतर मदद कर पाएंगे. "ज़िन्दगी बीमारी से नहीं

रूकती," उसने कहा. "थोड़ा जीना भी चाहिए."

अम्मी ने अब्बू से चुपके झूठ बोलै फ़ोन पर, कहा गाओं जा रही है कजिन से

मिलने कुछ दिन. "फॅमिली का काम है, हुसैन. जल्दी वापस आ जाउंगी." अब्बू ने

इजाज़त दी, भरोसे वाली आवाज़. "ठीक है, शाहिदा. लेकिन याद रखना, वहां

जीन्स या मॉडर्न कपडे nahi—hamesha की तरह मॉडेस्ट पेहेनना." "बिलकुल," उसने

क़बूल किया, लेकिन झूठ tha—gaon जाने या मॉडेस्ट पहनने का इरादा नहीं.

मुझे पता था यह अम्मी और गजेंद्र का छुपा हनीमून था, बिना दर के

मज़े लेने का मौका. कितनी be-dil हो गयी Ammi—ab परवाह नहीं, अब्बू को

हॉस्पिटल बीएड पर छोड़ कर ख़ुशी के पीछे.

जब वह गजेंद्र की छिनाल नहीं बानी थी, वह मेहरबान थी, तवज्जोह देने

वाली, घर की धड़कन, पसंदीदा खाने बनती, सोने से पहले कहानियां सुनती,

रेहम की मिसाल. अब अब्बू के दर्द को नज़रअंदाज़, उसकी हमदर्दी लस्ट ने खा ली.

फ़र्क़ साफ़: पुराणी अम्मी उसके पास रहती; नयी वाली ओर्गास्म को ज़िम्मेदारी से

ऊपर रखती.

उस रात अम्मी ने पिंक टॉप पहना जो सीने से चिपका और लाल ड्रेस जो नरम

लहरों में बह रही थी लेकिन कर्व्स हिंट करती थी. गजेंद्र ने वह ड्रेस

खरीदी थी, छुपी मुलाक़ात का तोहफा, टिश्यू में लपेट कर नोट के साथ की

यह उसे महसूस कराएगी चाह. वह घूम कर दिखा रही थी जाने से पहले,

आँखें चमक रही. "बीटा, अच्छा नहीं लग रहा?"

गजेंद्र ने प्राइवेट जेट बुक किया था, स्लीक कार से पिक करने आया. अम्मी

खुश थी, हलकी हसी के साथ बोर्ड किया, लाठर सीट नरम और अंदर

चमकदार लक्ज़री. उसे महसूस हुआ जैसे रानी बन गयी, पम्पेर जो अब्बू कभी

नहीं कर sakte—champagne इंतज़ार में, अटेंडेंट स्नैक्स दे रहे.

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उसकी ख़ुशी की गहराई साफ़ थी: सालों तक कंजूसी, सदा ख़ुशी में गुज़ारा;

अब गजेंद्र ने उसे अमीरी दी, क़दर, चाहत, रानी जैसा महसूस. यह उसके

लिए नशा था, अब्बू के साथ सदी ज़िन्दगी से बिलकुल अलग.

हम जेट में दाखिल हुए, इंजन धीमे से गूँज रहा, अंदर बैठ गए.

कितना शानदार jet—badi केबिन, नरम रेक्लिनेर, पीछे छोटा बैडरूम.

मुझे अब्बू के लिए दुःख हुआ, हॉस्पिटल बीएड पर पड़ा, be-khabar अम्मी के इस सफर

से, सोच रहा गाओं गयी फॅमिली से मिलने जब वह अब्बू के madadgar-cum-rival

के साथ बादलों में उड़ रही थी.

मैं गजेंद्र और अम्मी के सामने बैठा, वह पीछे, यह बंदोबस्त जान बुझ

कर लग रहा. पहली बार इतने मेहेंगे जेट में, अम्मी की भी— आँखें बड़ी कर

पॉलिशड वुड और नरम रौशनी देख रही. गजेंद्र और अम्मी पहले नार्मल

बात कर रहे, मौसम, रिसोर्ट की चीज़ें, मेरे सामने फ्लिर्टिंग नहीं. "यह हम

सब के लिए अच्छा होगा," गजेंद्र ने कहा. "सांस लेने का मौका."

मैंने बहाना बनाया वाशरूम जाने का. "अभी आता हूँ." लेकिन वहां छुप

गया, छोटे वेंट से झाँका, और देखा वह गहरे चुम्बन कर रहे, उसका

हाथ उसकी राण पर.

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मुझे गरम महसूस हुआ, एक na-chaha हुआ उत्साह का jhonka—Abbu की जायदाद,

उनकी दूकान को बचने के पैसे, यह सब उसके लिए खर्च हो रहे थे जब वह

अकेला दुःख सेह रहा था.

यह सफर लगभग 8 घंटे लगा, जेट आसमान में सुकून से चलता रहा, रिसोर्ट

के पास एक प्राइवेट एयरस्ट्रिप पर उतरा.

होटल बहुत महंगा दीखता tha—bada दरवाज़ा, संगमरमर की फर्श, क्रिस्टल

झूमर, हर खिड़की से समुन्दर का नज़ारा. अम्मी को कभी ऐसा ट्रीट नहीं मिला,

अब्बू ने भी नहीं दिया; उनके हनीमून सिंपल थे, लोकल सफर, सस्ती जगहों पर.

अब वालेट बैग उठा रहे थे, स्टाफ वेलकम ड्रिंक दे रहे the—Gajendra की दुनिया

ने उसे ऊंचा उठाया, उसे ख़ास, प्यार भरी महसूस करवाया, जैसे अब्बू की

सादगी कभी नहीं कर सकती थी. फ़र्क़ बहुत बड़ा था: अब्बू का प्यार मुस्तक़िल लेकिन

सादा था; गजेंद्र का लविश, उत्साह भरा, वह ख्वाब पूरे करने वाला जो उसे

पता भी नहीं था.

हम रिसोर्ट की तरफ चल पड़े, ताड़ के पेड़ हिल रहे थे, हवा में नमक की

ताज़गी. मुझे पता था पहली रात यहाँ वह उसे छोड़ेगा, बिलकुल जैसे पहले

दिनों mein—kacchi, जोशीली, बिना rok-tok के.

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उस रात हमने दो कमरे बुक kiye—ek दुसरे से जुड़े सुईठे, बालकनी से समुन्दर

दीखता था. गजेंद्र ने मुझसे कसुआलय कहा, “बीटा, तू लेफ्ट वाला ले ले. तेरी

अम्मी और मैं doosra—woh बड़ा है, बैठने की जगह भी है. फ्लाइट के बाद

वह आराम से सो सकेगी.”

मैं खुश होने का नाटक किया, मुस्कुराया, “हाँ, यह ठीक है. अम्मी को जगह

चाहिए.”

अम्मी बोली, आवाज़ हलकी, “हाँ बीटा, यह प्रैक्टिकल है. सबको प्राइवेसी मिलेगी, लेकिन

पास hi रहेंगे अगर कुछ चाहिए तो. गजेंद्र ने इतनी अच्छी जगह बुक की,

मेहेरबानी की.”

हम थोड़ी देर इस बात पर बात करते रहे, मैं रिसोर्ट के पूल के बारे में

पूछता, वह कहते मुझे पसंद आएगा, बात आसानी से चलती रही ताकि असली

इरादा छुपा रहे.

अम्मी ने नहाया भी नहीं, और दोनों कमरे में दरवाज़ा बंद होते hi चुम्बन

शुरू कर दिए. कितनी गरम थी वह dono—flight का इंतज़ार ने बढ़ाया, हाथ

बेचैन. गजेंद्र ने उसे तुरंत खींच लिया, होंठ टकराते हुए, जैसे भूखे

हों. बेचैनी साफ़ थी; इंतज़ार नहीं कर सकते थे, जिस्म एक दुसरे से चिपक

गए जैसे चुम्बक.

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उसने उसकी बड़ी गांड पकड़ी और ज़ोर से मसला, उँगलियाँ नरम गोश्त को ड्रेस के

ऊपर से निचोड़ रही थी, उसके मुँह से धीमी कराह निकल रही थी. अम्मी में

कोई शर्म nahi—doosre मर्द से चुम्बन, अब्बू से झूठ बोल कर यह ट्रिप,

और बीटा बगल वाले कमरे में. Be-adabi की हद्द पार: शादी के वादे छोड़

दिए, मज़हब की तालीम, माँ होने की ज़िम्मेदारी.

कोई झिझक नहीं, जुबां उसके मुँह में घुस रही जैसे यह आम बात हो, अब्बू

से ताज़ा झूठ दिमाग में. मेरे इतने पास होने पर भी खतरा, लेकिन लस्ट ने

अँधा कर दिया, संभल को be-parwahi में बदल दिया.

मेरे दिमाग में ख्याल aaya—kya अगर मैं बीच में रुक जाऊं जब वह

चुम्बन कर रहे हों? कैसा होगा, उन्हें अचानक पकड़ना, अम्मी की घबराहट

देखना, गजेंद्र का गुस्सा? ताक़त का यह पालक पालक बदलना मुझे उत्साहित

कर रहा tha—uske मुनाफ़िक़ होने को काम के बीच में दिखा देना, सामना

करवाना. लेकिन उलझन ने पकड़ लिया: यह सब बर्बाद कर सकता था, या मुझे

फायदा दे सकता था.

मैंने फैसला किया रुकने का, जिज्ञासा जीत गयी, चुपके से बहार निकला.

अब तक उसने उसकी ड्रेस ऊपर कर दी थी, नीचे पीली टाइट शॉर्ट्स दिखाई, इतनी

सेक्सी की पूरी गोल गांड दिखती थी, कपडा कैसा हुआ.

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मैंने दरवाज़ा खटखटाया और अंदर गया, बोलै, “अम्मी, मुझे लगता है तेरे

कमरे का बाथरूम उसे कर loon—mera ठीक नहीं चल रहा.”

अम्मी शॉक, चुम्बन के बीच रुक गयी, ड्रेस ऊपर, पर्पल टॉप और वह पीली

शॉर्ट्स mein—rang चमकदार उसकी चमड़ी के खिलाफ. “बीटा! तू यहाँ क्या कर

रहा है?” वह हकला गयी, ड्रेस जल्दी नीचे की, चेहरा सफ़ेद.

गजेंद्र पीछे हटा, खुद को संभाला. “सब ठीक है, बीटा?”

मैं नाटक किया जैसे कुछ देखा नहीं, आवाज़ आम, “हाँ, बस बाथरूम

चाहिए. तेरा बड़ा है वैसे भी.”

अम्मी घबराई, सोच रही थी मैंने उसका धोका देख liya—baal ठीक किये, मेरी

आँखों से नज़र बचती. “हाँ बीटा, जा. हम बस… बात कर रहे थे.”

हम तीनो थोड़ी देर बात की, मैं डिनर के प्लान पूछा, वह ावक्वार्ड जवाब

देते. “रिसोर्ट का रेस्टोरेंट बहुत अच्छा है,” गजेंद्र बोलै. “हम सब साथ

जा सकते हैं.”

“ठीक है,” मैंने कहा, उसकी हालत पर कुछ कहे बिना गुज़र गया.

मैंने देखा वह पसीना आ रहा था, माथे पर बूँदें, लेकिन मैं बाथरूम

चला गया. बाद में झाँक कर देखा, वह फिर चुम्बन कर रहे थे, जोश

फिर से जाग गया.

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CHAPTER 29

इस दुनिया में सबसे बेहतरीन एहसास अपनी पाक माँ को एक बेकार

औरत की तरह चुड़ते हुए देखना है

मैं अंदर से गरम हो रहा था, जल रहा था जब मैं अम्मी को छुड़वाने के मूड में देखा,

उनका जिस्म गजेंद्र के हाथों के छूने से पहले hi रियेक्ट कर रहा था, जिससे मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से

धड़क रहा था और चेहरा शर्म के गरम लाल हो रहा था.

मैं खिड़की से सब कुछ देख रहा था बिना नोटिस हुए, काम रौशनी वाला लैंप गोल्डन चमक दाल

रहा था सन पर जो बहुत क़रीब और बिलकुल गुनाह भरा लग रहा था.

अम्मी के गाल गहरे गुलाबी हो गए थे, सांसें तेज़ और छोटी, आँखें उस तरह चमक रही थी

जो मैंने कभी अब्बू की तरफ नहीं देखि.

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वह वहां कड़ी थी टाइट पीली शॉर्ट्स और सादगी सफ़ेद टॉप में, कपडा उनके भरे कर्व्स से

चिपका हुआ, हर छोटी हरकत से टांगें एक दुसरे से डाब रही थी जैसे वह पहले से hi और ज़्यादा

की प्यासी हो.

गजेंद्र के बड़े हाथ उसके सीने पर आज़ाद घूम रहे थे, पतले कपडे के ऊपर से उसके भरी

चूचियों को पकड़ कर धीरे धीरे निचोड़ रहे थे जैसे वह हर इंच का मालिक हो.

उसने उन्हें थोड़ा उठाया, वज़न हाथों में वापस बैठने दिया, अंगूठों से सख्त होने वाले

चूचियों के छेदों पर चक्कर लगते हुए जो कपडे के ऊपर साफ़ दिखाई दे रहे थे.

“खुदा, शाहिदा, तेरी यह चूचियां हर बार मुझे पागल कर देती हैं,” वह धीमी मोती आवाज़

में बोलै. “इतनी भरी, इतनी नरम, फिर भी जब मैं ऐसे खेलता हूँ तो कितनी सख्त. देख कैसे

हाथों से बहार निकल रही हैं.

मैं घंटों सिर्फ इन्हे पकड़ सकता हूँ, मसल सकता हूँ, देख

सकता हूँ जब यह बाउंस कर रही होंगी जब मैं तुझे be-hosh कर के छोडूंगा. यह परफेक्ट हैं

— मेरे जैसे मर्द के मज़े के लिए बानी, तेरे उस कमज़ोर शौहर के लिए नहीं जो शायद नोटिस भी

नहीं करता क्या पाया है.”

अम्मी ने धीमी, सांस भरी कराह निकली, पीठ झुककर सीना और ज़्यादा उसके हाथों में

धकेल दिया. “गजेंद्र… तू हमेशा ऐसा कहता है. यह तो… मामूली हैं. लेकिन जब तू ऐसे छूटा

है तो लगता है यह तेरी हो गयी हैं.” उसके लफ्ज़ आधे विरोध, आधे दावत थे, और कमर का हिलना

बता रहा था वह वक़्त में खो चुकी थी.

वह फिर चुम्बन करने लगे, पहले गहरा और धीमा, फिर भूखा सा, ज़ुबानें एक दुसरे से

गीली आवाज़ों के साथ फिसल रही थी जो खामोश कमरे में गूँज रही थी. उसके हाथ चूचियों

पर कभी नहीं छोड़े, रदम से मसलते हुए जब उनके मुँह परफेक्ट सिंक में थे, उसकी उँगलियाँ

उसके बालों में उलझ कर उसे और करीब खींच रही थी.

चुम्बन चलता रहा, सिर्फ छोटी सांस के लिए टूट कर, जब अचानक अम्मी का फ़ोन पास डेस्क पर

बजा. मुझे पता था यह अब्बू का रिंगटोन था— वह नरम, jaana-pehchaana सुर जो उन्होंने सालों

पहले फॅमिली कॉल्स के लिए चुना था.

मेरा पेट सिकुड़ गया, लेकिन अम्मी हिलती भी नहीं. वह गजेंद्र को चुम्बन देती रही जैसे आवाज़

सुना hi नहीं, जिस्म अभी भी उससे चिपका हुआ.

गजेंद्र थोड़ा पीछे हटा, फ़ोन की तरफ फ्रौं कर के देखा. “मत उठा, शाहिदा. बजने दे.

अभी वक़्त है— चार पूरे दिन जब वह घर पर रिकवर कर रहा है. इग्नोर कर.”

अम्मी एक सेकंड के लिए रुक गयी, फिर धीरे सर हिलाया, होंठ अभी भी उसके होंठों पर. “मुझे

उठाना पड़ेगा, गजेंद्र. अगर नहीं उठाया तो वह फ़िक्र करेगा और बार बार कॉल करेगा.”

उसने सांस भरी लेकिन रोका नहीं, हाथ अभी भी चूचियों को मालिकाना निचोड़ रहे थे. “ठीक

है, लेकिन जल्दी. जो बोलना है बोल दे. मैं जो शुरू किया वह नहीं रुकूंगा.”

अम्मी डेस्क की तरफ चली, पीली टाइट शॉर्ट्स में कमर हिलती हुई, गजेंद्र बिलकुल पीछे साया की

तरह.

जब उसने फ़ोन उठाया, उसने पीछे से बाहों में जकड लिया, जिस्म से जिस्म चिपका कर गर्दन पर

मुँह लगा दिया.

वह वहां चुम्बन और चूसने लगा, भूखा और be-sabr, दांत हलके से रगड़ते हुए जब एक

हाथ टॉप के अंदर घुस कर नंगी चूचियों से खेलने लगा. अम्मी ने कॉल उठाया, आवाज़ हैरान

करने वाली तरह सख्त थी चाहे जिस्म कांप रहा हो.

अम्मी: (गजेंद्र के बैडरूम में कड़ी, टाइट पीला क्रॉप टॉप और रेशम शॉर्ट्स में, फ़ोन

हाथ में, सांसें थोड़ी तेज़ क्योंकि गजेंद्र बिलकुल पीछे है) सलाम अलैकुम, जान. अब कैसा

महसूस हो रहा है?

अब्बू: व अलैकुम सलाम, शाहिदा. मैं ठीक हूँ. पहले बता— कजिन के घर पहुँच गयी

साफल्य? शाम का ट्रैफिक तो भरी होगा.

अम्मी: हाँ हाँ, साफल्य पहुँच गए, जान. ट्रैफिक नार्मल था, ज़्यादा बुरा नहीं. यहाँ सब तेरे

बारे में पूछ रहे हैं.

(गजेंद्र पास आया और अचानक उसकी गोल गांड के टुकड़े को सिल्क शॉर्ट्स के ऊपर से ज़ोर से पिंच

किया)

अम्मी: (तेज़ हैरान चीख) आआह—! (जल्दी से खांसी से कवर किया) सॉरी… बस टेबल के कोने से

घुटना टकरा गया. जानती है नयी जगह में कितनी ावक्वार्ड हो जाती हूँ.

अब्बू: (फिकरमंद) अरे, संभल के, मेरी जान. चोट मत लगा लेना. तो… वहां सब कैसे हैं?

तेरी कजिन और उसका घर? वह लोग अच्छे से देखभाल कर रहे हैं?

अम्मी: सब बहुत अच्छे हैं, अल्हम्दुलिल्लाह. अभी बैठ कर बातें कर रहे हैं. सब ठीक है.

(गजेंद्र मुस्कुराया और झुक कर गर्दन के पीछे धीमे गीले चुम्बन करने लगा, हाथ

कमर पर)

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अम्मी: (छोटी सी थरथराहट) ममम…

अब्बू: अच्छा, अच्छा. सुन, खबर है. डॉक्टर्स ने एक घंटा पहले डिस्चार्ज कर दिया. बस

दवाइयां घर पर कंटिन्यू और पूरा आराम. अब मैं हमारे घर पर हूँ.

अम्मी: (बड़ी ख़ुशी का नाटक, आवाज़ चमकती) ओह मैश,.'! यह तो बहुत अच्छी खबर है, हुसैन!

बहुत सुकून मिला. अल्हम्दुलिल्लाह. घर पहुँच कर खुश होंगे आखिरकार.

अब्बू: हाँ… लेकिन घर तेरे और ज़ैद के बिना बिलकुल खाली लग रहा है.

(गजेंद्र के होंठ नीचे गए, गर्दन के साइड पर धीमे चूसते हुए; एक हाथ पीले टॉप के अंदर

घुस कर चूची निचोड़ा)

अम्मी: (नरम, न रोक पाने वाली कराह) अह्ह्ह… ममम…

अब्बू: शाहिदा? आवाज़ अजीब लग रही है. ठीक है तू? क्यों यह आवाज़ें निकल रही हैं बार बार?

अम्मी: (जल्दी फ़ोन हाथ से कवर किया, सर घुमा कर गजेंद्र से फिसफिसाया) धीरे… प्लीज… वह सब

सुन लेगा!

(गजेंद्र सिर्फ मुस्कुराया और जारी रखा, गर्दन पर चुम्बन और चाटना और भूखा, हाथ शॉर्ट्स

के अंदर नीचे फिसलता)

अम्मी: (फ़ोन खोला, नार्मल बनने की कोशिश) सॉरी, जान… मैं ठीक हूँ. बस कजिन के साथ

कुछ भरी सुईटकासेस रअर्रंगे कर रही हूँ. पुराने मकान में कॉरिडोर कितने तंग होते हैं.

अब्बू: हम्म… आजकल तू बहुत ऐसा कर रही है. रिप्लाई में वक़्त, सांसें फूली हुई… बिलकुल जैसे

दूसरी रात जब देर से कॉल किया था. क्या हो रहा है, शाहिदा?

अम्मी: (घबराहट भरी हंसी) कुछ नहीं, बिलकुल कुछ नहीं. शायद उस रात भी थक गयी थी. फॅमिली

गाथेरिंग्स जानती है— बहुत काम, इधर उधर दौड़ना.

अब्बू: उम्मीद है. जब तू ऐसी आवाज़ करती है तो फ़िक्र होती है.

अम्मी: अब तू कहाँ है? अभी हॉस्पिटल में या घर पहुँच गया?

अब्बू: घर पर हूँ, हमारे बिस्तर पर बैठा. तेरे बिना कितना अजीब लग रहा है. कमरा बहुत खामोश

है. तेरे तकिये को देखता रहता हूँ और तेरी खुशबू मिस करता हूँ. अभी कॉफ़ी पी रहा हूँ, बारिश

हो रही है.

अम्मी: (नरम गुनाह भरी आवाज़ और झूठ) मैं भी तुझे मिस कर रही हूँ, जान. घर बहुत सुनसान

होगा. काश अभी वहां होती.

अब्बू: हाँ. कभी समझ नहीं आया कितना देपेंद करता हूँ तुझ पर जब तक यह दिन नहीं आये. बीवी के

बिना बहुत अकेला महसूस होता है. रातें सबसे बुरी.

अम्मी: (गजेंद्र ने गर्दन काट ली तो कराह) ममम… अहह… जानता हूँ, हुसैन. बस चार दिन और मैं

वापस आ जाउंगी.

अब्बू: चार दिन भी बहुत लम्बी लग रही है. ज़ैद कैसा है? वह भी तेरे साथ गया था न?

अम्मी: (एक सेकंड रुक कर) …हाँ हाँ, ज़ैद भी यहाँ है. बहार बच्चों के साथ खेल रहा है.

(गजेंद्र ने गर्दन ज़ोर से चूसी, दो उँगलियाँ अब शॉर्ट्स के अंदर टांगों के बीच तैसे कर रही)

अम्मी: (फिर कराह निकल गयी) ओह्ह्ह… ममम… अहह…

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अब्बू: शाहिदा! क्यों बार बार कराह रही हो? सच बताओ — तुम ठीक हो या वहां कुछ गलत हो रहा

है?

अम्मी: (सांस फूली हुई, झूठ बोलते हुए) कुछ नहीं है, जान. मेरी कजिन की छोटी बेटी अभी मेरी गॉड

में कूद कर चिपक गयी. तुम जानते हो बच्चे कितने प्यार भरे होते हैं — गुदगुदी हो गयी, बस

इतना hi.

अब्बू: (सांस छोड़ते हुए) ठीक है… सुनो, उस दिन जब मैंने तुमसे ट्राउज़र्स पहनने पर सवाल किया

था… मैं सच में माफ़ी मांगता हूँ. मुझे पता है तुम्हे बुरा लगा. मैं सिर्फ इसलिए परेशां

था क्योकि हमारे मज़हब में औरतों के लिबास के बारे में जो है. लेकिन तुम मेरी बीवी हो. मुझे

तुम पर भरोसा है. बस… सोच लेना, ठीक है? सोचना की हमारे दीं के लिए क्या सही है.

अम्मी: (आवाज़ अचानक टाइट) हुसैन, प्लीज… अभी इस बारे में बात नहीं करना चाहती. जब मैं वापस

आउंगी तब बात करेंगे. फ़ोन पर नहीं.

अब्बू: ठीक है, ठीक है. मैं ज़ोर नहीं डालूंगा. बस चाहता हूँ तुम खुश रहो और सही रास्ते पर

भी. बस इतना hi.

अम्मी: मुझे पता है.

अब्बू: (नरम आवाज़ में) मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, शाहिदा. बहुत ज़्यादा. तुम मेरी सब

कुछ हो.

अम्मी: (चुप, उलझन में) मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, हुसैन.

अब्बू: तो… बिलकुल किस दिन वापस आ रही हो? मैं तुम्हारा पसंदीदा मटन बिरयानी बनाऊंगा.

अम्मी: चार दिन में, जान. गुरूवार शाम को.

अब्बू: चार दिन… हर घंटे गिनूंगा. तुम्हे बहुत मिस करूँगा. बिस्तर अभी से ठंडा लग रहा

है.

अम्मी: मैं भी तुम्हे मिस करुँगी. सब दवाइयां टाइम पर लेना, ठीक से खाना, और आराम करना.

,,., मत भूलना.

अब्बू: करूँगा. कल सुबह भी कॉल करोगी?

अम्मी: बिलकुल. हर रोज़. खुदा हाफिज, जान.

अब्बू: खुदा हाफिज, मेरी जान. प्यार करता हूँ.

(अम्मी कॉल ख़तम करती है, लम्बी कांप रही सांस लेती है, फ़ोन अभी भी हाथ में)

अम्मी: (गजेंद्र की तरफ पलट कर, आधा हँसते आधा daant-te हुए) तुम बिलकुल नामुमकिन हो… उसने

काम से काम पांच बार मेरी कराह सुनी! कितने झूठ बोलने पड़े.

गजेंद्र: (उसे खींच कर पास लाते, मुस्कुराते हुए) और तुम कितने खूबसूरत झूठ बोले, मेरी

छोटी धोकेबाज़ _ बीवी. अब… यह रेशम की शॉर्ट्स उतर रही हैं. मैं बहुत इंतज़ार कर

चूका हूँ.

अम्मी: (पहले से उसमें पिघल रही, धीमी कराह जब वह चुम्बन करता) तुम एक दिन मुझे पकड़वा

डोज… लेकिन अभी तो मुझे परवाह भी नहीं.

गजेंद्र: अच्छा. क्योंकि आज रात मैं तुम्हे इतना ज़ोर से छोडूंगा की तुम भूल जाओगी तुम्हारा कोई

शौहर भी है. झुक जाओ.

वह जल्दी कॉल ख़तम कर के फ़ोन धीरे से रख दिया, फिर गजेंद्र की बाहों में पलट कर छोटी

सी हनासी के साथ.

“देखा? इतना बुरा नहीं था. लेकिन सुनो मुझे — मैं कितनी बुरी औरत बन गयी हूँ

अब, अपने शौहर से इतनी आसानी से झूठ बोल रही जो अभी हॉस्पिटल से वापस आया है और घर पर अकेला

मेरा इंतज़ार कर रहा है. कैसी बीवी हूँ मैं? बहुत बुरा लग रहा है… लेकिन साथ hi यह रुक नहीं

सकती. तुम्हे चाहती हूँ.”

गजेंद्र मुस्कुराया, उसे फिर से खींच कर पास लाया. “तुम बुरी नहीं हो, शाहिदा. तुम आखिरकार खुद

से सच बोल रही हो. पूरे चार दिन — चार दिन जब मैं तुम्हे जब चाहे, जैसे चाहे छोड़ सकता हूँ,

जब वह सोच रहा होगा तुम बस काम या दोस्तों से मिलने गयी हो. हम संभल कर रहेंगे, लेकिन हर

पल का मज़ा लेंगे. सोचो: सुबह, दोपहर, रात — सब मेरा.”

अम्मी ने सर हिलाया, आँखें गुनाह और उत्साह से चमकती हुई. “हाँ, लेकिन संभल कर, गजेंद्र.

ज़ैद इन दिनों घर पर बहुत रहता है. मेरा बीटा चीज़ें नोटिस करता है. उससे कुछ शक नहीं होने

देना. वह कभी कभी सवाल भी करता है. हम चुप रहना होगा… या जब वह बहार हो तब मिलना

होगा.”

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वह फिर जोश से चुम्बन करने लगे, मुँह एक दुसरे से टकराते हुए, हाथ हर जगह घूम रहे.

गजेंद्र ने उसे आसानी से उठाया और बिस्तर पर ले गया, किनारे पर बैठा दिया ताकि टांगें लटक

रही थी. वह उसकी रानों के बीच घुटनो पर बैठा, गहरा चुम्बन जारी रखते हुए, फिर थोड़ा पीछे

हटा कर बोलै.

“चार दिन, शाहिदा. चार दिन जब भी मौका मिले मैं तुम्हारे अंदर दफन. इतनी बार तुम्हे

झड़वाउंगा की तुम अपने शौहर को भूल जाओगी. और तुम और मांगोगी, न?”

अम्मी के गाल लाल हो गए, लेकिन वह शर्मा कर मुस्कुरायी. “मैं… मैं जानती हूँ मैं मांगूंगी.

तुमने मुझे ऐसी चीज़ें पसंद करा दी जिन्हे मैं कभी सोची भी नहीं. बस वादा करो ज़ैद के

सामने संभल कर रहेंगे. मुझे नहीं चाहती वह कुछ देखे या सुने जो उसे ठेस पहुंचाए.”

“बिलकुल संभल कर रहेंगे,” उसने तसल्ली दी, उसकी रानों पर हाथ फेरते हुए.

“लेकिन अभी सिर्फ हम हैं. कोई और मटर नहीं करता.”

वह फिर चुम्बन करने लगे, इस बार धीमे, एक दुसरे का मज़ा लेते हुए.

अम्मी थोड़ा पीछे हटी, आवाज़ नरम और सपनों जैसी. “मुझे तुमसे चुम्बन करना बहुत पसंद

है, गजेंद्र. तेरे होंठ बिलकुल अलग लगते हैं — इतने मज़बूत, इतने यकीनी. हर बार चुम्बन करते

वक़्त लगता है मैं पिघल रही हूँ. मैं घंटों चुम्बन करती रह सकती हूँ बिना थके.”

उसने उसे धीरे से बिस्तर पर लिटाया, उस पर चढ़ कर, मुँह ज़्यादा देर तक उसके मुँह से अलग नहीं हुआ.

चुम्बनों के बीच फिसफिसाया, “तुम अब बिलकुल त्रिनेड रंडी बन गयी हो, शाहिदा. मुझे फख्र है कितनी

अच्छे से ट्रैन किया मैंने तुम्हे. याद है पहली बार कितनी शर्मा रही थी? अब देखो — बिना मांगे

टांगें फैला रही हो, जो भी दूंगा सब लेने को तैयार. मेरी परफेक्ट छोटी रंडी.”

अम्मी ने शर्म से चेहरा घुमाया, लेकिन जिस्म ने धोका दिया, कमर उसकी तरफ उठी. “ऐसा मत कहो…

यह सुन कर बहुत गन्दा महसूस होता है. मुझे पता है मैं बदल गयी हूँ, लेकिन ज़ोर से सुन्ना…

शर्म आती है. तुमसे पहले मैं ऐसी कभी नहीं थी. तुमने मुझे ऐसा बनाया.”

उसने गालों पर नरम चुम्बन किये, माथा, आँखों की पलटाकों पर, नाक पर, चेहरे को प्यार भरे

छोटे चुम्बनों से धक् दिया. “और मुझे वह औरत बहुत पसंद है जो मैंने बनायीं. मेरी

खूबसूरत, बेचैन रंडी जो बिलकुल जानती है मुझे खुश कैसे करना.”

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गजेंद्र नीचे गया, उँगलियाँ उसकी टाइट पीली शॉर्ट्स के कमर बंद में डाली. धीरे से नीचे

खींच कर उतरा, नरम रानें दिखाई दी और नीचे छोटी पंतय. अम्मी ने कमर उठा कर मदद

की, होंठ काट कर. “गजेंद्र… शायद पहले जल्दी से नहा लून. सुबह से बहार थी. ताज़ा नहीं महसूस

हो रही.”

उसने सर हिलाया, शॉर्ट्स फ़ेंक दी. “कोई नहाना नहीं. मुझे बिलकुल ऐसे hi चाहिए — गरम, असली, नेचुरल.

मुझे तेरी बू और मज़ा पसंद है जब तू मेरे लिए इंतज़ार करती है. एक चीज़ भी मत धो.”

थोड़ी देर बात हुई, अम्मी पहले धीरे से ज़िद करती रही. “लेकिन चिपचिपा महसूस हो रहा… दिन लम्बा

था. सिर्फ पांच मिनट शावर में?”

“यहीं रहो,” उसने प्यार से लेकिन सख्ती से कहा, अंदरूनी राण पर चुम्बन करते हुए. “मुझे असली तुम

चाहिए, कोई saaf-suthri खुशबूदार नहीं. याद करो पिछली बार जब मार्किट से आयी थी तब मैंने तुझे

तुरंत लिया था? कितनी गीली, मुश्क वाली और परफेक्ट थी. भरोसा रख — तू बिलकुल ऐसे hi लाजवाब है.”

अम्मी आखिरकार शर्मा कर हनासी. “ठीक है… अगर तुम सच में ऐसे hi चाहते हो. तुम हमेशा

अपनी मनमानी करवा लेते हो.”

जब उसने पंतय नीचे की तो थोड़ी साफ़ की हुई छूट दिखी — ऊपर हल्का सा काळा बालों का पैच, नीचे

फूली हुई होंठ, चमड़ी चमकती और गीली.

होंठों के बीच थोड़ा खुला, पहले से गीला और बुलावा देता.

गजेंद्र खुले दिल से देखता रहा, आवाज़ में तारीफ. “देख यह सुन्दर छूट. मेरे लिए इतनी अच्छे से

साफ़ की, सिर्फ थोड़ा बाल छोड़ा ताकि इतनी औरताना और नेचुरल लगे. होंठ पहले से पहले और चमक रहे

— देखा कितने खुल रहे हैं मेरे लिए? परफेक्ट. इतनी गुलाबी और रसीली. दिन भर देखता रह सकता हूँ.”

अम्मी ने शर्म से हाथ बीच में रख दिया, छुपाने की कोशिश. “इतना घूर कर मत देखो… अब

भी शर्म आती है. इतनी बार छोड़ा फिर भी जब ऐसे देखते हो तो शर्मा जाती हूँ.”

उसने धीरे से लेकिन मज़बूती से उसका हाथ हटा कर बिस्तर पर दबा दिया. “कोई छुपाना नहीं. क्यों

शर्मा रही हो, प्यारी? मैं हर इंच देख चूका, हर हिस्सा चखा. यह छूट अब मेरी है. देख कितनी

गीली हो गयी सिर्फ चुम्बन और बातों से. खूबसूरत.”

गजेंद्र ने सर नीचे किया और लम्बी, धीमी छतों से उसकी छूट चाटने लगा, जुबां चौरी और

गरम उसकी शिकारों पर. अम्मी ज़ोर से करहि, पीठ बिस्तर से उठ गयी. “ओह्ह्ह… गजेंद्र… बहुत ाचा

लग रहा… वहीँ… ”

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उसने सर उठाया एक पल के लिए, होंठ उसकी रास से चमकते हुए. “तेरी छूट का स्वाद बहुत ाचा है,

Shahida—meetha और थोड़ा खट्टा, बिलकुल वैसा जैसा मुझे पसंद है. इतनी क्रीमी और गरम. मैं

तुझे घंटों चाट सकता हूँ.”

उसकी छूट अभी भी थोड़ी बाल वाली थी उस नरम त्रिअंगुलार पैच में, काले घुंगराले बाल अब गीले

और चिपचिपा हुए उसकी जुबां और उसकी गीली पैन से. जब वह चाट रहा था, मेरा दिमाग बार बार

अब्बू की तरफ जा रहा tha—kitna पूरा धोका दे रही थी अम्मी अभी.

अब्बू हॉस्पिटल से घर वापस आ गए थे, शायद अपनी पसंदीदा कुर्सी पर आराम कर रहे होंगे,

फ़ोन पर उसने जो भी कहा उस पर पूरा यकीन करते हुए. वह उस पर बिलकुल भरोसा करते थे, सोचते

थे वह मासूम काम से बहार गयी है, कभी ख्याल भी नहीं आता की जिस औरत से प्यार करते थे वह

होटल के बिस्तर पर टांगें फैला कर दुसरे मर्द के साथ लेती हुई है.

अब्बू हमेशा उसकी तारीफ करते the—perfect बीवी, दीनदार, ख्याल रखने वाली, शर्मीली. लेकिन यहाँ

वह रंडी की तरह कराह रही थी जब गजेंद्र की जुबां उसकी छूट की परतों के बीच काम कर रही

थी, जिस्म हर क़सम को धोका दे रहा था जो उसने उसके साथ ली थी.

यह फ़र्क़ दिल घबराने वाला और उत्साहित करने वाला दोनों tha—Abbu अकेला और कमज़ोर, बिमारी से उभर

रहे, जब अम्मी की छूट उसी मर्द से छाती जा रही थी जिसने “मदद” की थी उसके इलाज के बिल में.

उससे बिलकुल खबर नहीं की उसकी बीवी की छूट की पूजा हो रही है, उसकी कराहें किसी और के लिए हैं. यह

धोका इतना गहरा, इतना ज़ालिमाना, फिर भी अम्मी जारी रखे हुए थी, कमर गजेंद्र के चेहरे पर रगड़

रही थी जैसे अब्बू का वजूद hi न हो.

मैं चुपके से गजेंद्र और अम्मी को गंदे काम करते देखता रहा, कीहोल से झाँक कर पूरा

छुपा हुआ था.

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बाद में, ज़ोर की कराहों के बीच, अम्मी सांस फूलते हुए बोली, “गजेंद्र… मैं तेरा लुंड चूसना

चाहती हूँ… प्लीज… मुझे तेरा स्वाद चखने दे.”

वह थोड़ी देर और छाता रहा, उसका मज़ा लेते हुए, फिर बिस्तर पर ऊपर चला गया. अम्मी चार हाथों

पर बैठ गयी, चेहरा उसके क्रॉत्च के सामने.

उसका लुंड बहुत बड़ा tha—mota और लम्बा, आसानी से ग्यारह इंच, नसें भरा और भरी, सर पहले से hi

प्रेकम टपक रहा था. अम्मी की आँखें फैल गयी, वह पुराणी भूक और थोड़ा दर का मिला जुला नज़ारा.

“खुदा, यह कितना बड़ा है,” वह फिसफिसाई, दोनों हाथों से नीचे पकड़ कर. “हर बार देख कर यकीन

नहीं होता यह मेरे अंदर फिट हो जाता है. ग्यारह इंच की पूरी मोटाई… इस चीज़ के साथ तू चल भी कैसे

पता है?”

गजेंद्र हांसे, उसके बाल सहलाते हुए. “लेकिन तू इससे प्यार करती है न? बता कितना प्यार करती है मेरे

बड़े लुंड से.”

“हाँ… मुझे कितना भरा हुआ महसूस होता है. यह मुझे इतना ज़्यादा फैलता है जितना… कोई और कभी

नहीं कर सकता. यह ऑलमोस्ट ज़्यादा है, लेकिन मैं इसकी प्यासी हूँ.”

उसने सर पर थूक दिया, लार शाफ़्ट पर बहने दी, फिर मुँह में लिया. धीरे धीरे निगला, इंच बी इंच,

जब तक होंठ मोटाई के ird-gird फ़ैल गए और गाल के अंदर लुंड का उभार साफ़ दिखाई दिया.

वह पूरी रंडी लग रही thi—professional wali—kitni जोश से काम कर रही थी, कितना गहरा ले रही थी, गाला

कितना ढीला कर के हर इंच क़ुबूल कर रही थी.

आँखें पानी से भर रही थी लेकिन रूकती नहीं, हलकी गैगिंग आवाज़ें ख़ुशी की कराहों के साथ मिल

रही थी, जुबां नीचे से एक्सपर्ट तरीके से चल रही thi—sab कुछ अब तजुर्बा दिखा रहा था, हफ़्तों

की छुपी मुलाक़ातों से गजेंद्र ने जो ट्रेनिंग दी थी.

वह अब वह शर्मीली, मॉडेस्ट बीवी नहीं थी; वह एक औरत थी जो इतने बड़े लुंड की पूजा करना अच्छे से

जानती थी.

गजेंद्र ने उसका सर धीरे लेकिन मज़बूती से पकड़ा, हरकतें गाइड करते हुए. “बस यह, मेरी अच्छी

लड़की. हर इंच ले. Dekh—tera गाल मेरे लुंड से उभर रहा है. कितनी खूबसूरत.”

यह नज़ारा मुझे शर्म की बड़ी लहार से भर diya—yeh मेरी अम्मी थी, जिसने बचपन में मुझे लोरियां

सुनाई थी, अब दुसरे मर्द के बड़े लुंड पर गैग कर रही थी जैसे यह सबसे आम बात हो.

फिर भी इसी वक़्त मुझे बहुत ाचा लग रहा था, शर्मनाक उत्साह, मेरा अपना लुंड पंत में दर्द से

धड़क रहा था देखते हुए.

बाद में, अम्मी बिस्तर पर पीठ के बल लेट गयी, टांगें पूरी फैला कर. गजेंद्र उस पर चढ़ गया,

उसका भरी जिस्म उसके ऊपर. उसने ग्यारह इंच का लुंड हाथ में लिया और मोटा सर उसकी दरवाज़े पर रगड़ा,

गीली परतों पर ऊपर नीचे.

“तैयार है मेरी जान?” वह धीरे से पुछा. “पहले धीरे धीरे अंदर जाऊंगा.”

अम्मी ने सर हिलाया, होंठ काट ते हुए. “हाँ… लेकिन धीरे, गजेंद्र. तू बहुत बड़ा है. मुझे वक़्त

चाहिए खुलने के लिए.”

वह आगे धकेला, सर ने छूट के होंठों को फैलाया. “यह मेरी टाइट छोटी रंडी… महसूस कर तेरी छूट

कैसे मुझे निगल रही है? अच्छी लड़की. सब ले.”

अम्मी ज़ोर से करहि, हाथ उसके कन्धों पर जकड कर. “ओह्ह्ह… इतना गहरा पहले से… धीरे… प्लीज…

तू मुझे पूरा भर रहा है…”

“ले, तू गन्दी छोटी बीवी. तेरा शौहर तुझे कभी ऐसे फैला नहीं सकता न? सिर्फ मेरा बड़ा लुंड यहाँ

का हक़दार है.”

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वह अंदर धकेल रहा रहा, इंच बाद मोटा इंच गायब होता गया जब तक पूरा हिलत तक अंदर नहीं गया.

फिर उसने छोड़ना शुरू kiya—zor के गहरे धक्के जो पूरा बिस्तर हिला रहे थे, हैडबोर्ड दीवार से

टकरा रहा था हर धक्के के साथ. अम्मी के चूचियां ज़ोर ज़ोर से उछाल रहे थे, कराहें ख़ुशी की

चीखों में बदल गयी.

“मुझे और ज़ोर से छोड़ो, गजेंद्र!” वह उत्सुक होकर बोली, आवाज़ कच्ची. “हाँ, ऐसे hi—rukna मत!

हर इंच से मुझे बर्बाद करने दे!”

“यह मेरी रंडी,” वह गरजते हुए बोलै, तेज़ धक्के मारते हुए. “ले यह लुंड. तेरी छूट मेरे लिए बानी

hai—lalchi, गीली, और परफेक्ट.”

“और ज़ोर से! मुझे अपना बना ले! मुझे पसंद है तू कैसे छोड़ता hai—itna मज़बूत, इतना गहरा! मत

रुकना!”

बिस्तर चीख रहा था और कराह रहा था उनके नीचे, कमरा गीली आवाज़ों से भर gaya—chamdi से

चमड़ी टकराने की, और अम्मी की be-sharam उत्सुकता. “हाँ… हाँ… बिलकुल वहां! छोड़ अपनी बुरी बीवी

को! मैं चार दिन के लिए पूरी तेरी हूँ!”

और वह जारी रखे, एक दुसरे में खोये हुए, जब मैं अँधेरे से देखता रहा, शर्म, जलन और ना-

इंकार उत्साह से जलते हुए जो अब मैं इंकार नहीं कर सकता था.

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CHAPTER 30

मेरी be-sharam माँ अपनी रूह तक साद चुकी है, इस chapter को पढ़ो

और जानो क्यों.

गजेंद्र उसको ज़ोर ज़ोर से छोड़ रहा था, उसकी ताक़तवर कमर उस पर धक्के मार रही थी,

एक be-rehem, सजा देने वाली रदम में जो पूरा होटल का बिस्तर उनके वज़न के नीचे चीख

रही थी और कराह रही थी.

हर गहरा धक्का अम्मी के जिस्म में बिजली की तरह दौड़ता, उसके बड़े भरी चूचियों का उछलना,

नरम पेट का हिलना, मोती रानों का कांपना जब वह खुद को सँभालने की कोशिश करती.

चमड़ी की थप थप की आवाज़ कमरे में गूँज रही thi—geeli, ग़लीज़, और रुकने वाली नहीं.

दोनों के जिस्म पर पसीना चमक रहा था, गजेंद्र के मज़बूत सीने से टपक कर अम्मी की

पीठ पर गिर रहा, उसकी पहले से गीली चमड़ी के साथ मिल कर. उसने उसकी चौड़ी कमर को

मज़बूत उँगलियों से पकड़ा, इतना ज़ोर से निचोड़ा की लाल निशाँ पद गए, हर आगे के धक्के के

साथ उसे पीछे खींच कर अपने मोटे लुंड पर बैठा रहा.

“ओह्ह्ह… गजेंद्र… मैं कितनी गन्दी गुनहगार हूँ,” अम्मी कराह के बीच सांस लेते हुए बोली,

आवाज़ शर्म और ख़ुशी से कांप रही. “मुझे तो अच्छे _ बीवी होना चाहिए… रोज़

पांच वक़्त ,,.,… पर्दा… लेकिन देखो अब. मैं एक ***** मर्द को मुझे बर्बाद करने दे

रही हूँ. मैं अपने मज़हब की हर बात से धोका दे रही हूँ. मैं रंडी हूँ… गन्दी,

be-sharam रंडी जो दोज़ख की आग की हक़दार है.”

गजेंद्र धीमे अँधेरे से हँसता, स्पीड कभी नहीं घटाई. “सही कहा, शाहिदा. बता कितनी

सदी हुई है तू. बता कितना पसंद है तुझे अपने ,.' से धोका देते हुए मेरा लुंड तुझे

फैलता हुआ.”

“आअह्ह्ह… ऊह्ह्ह… हाँ मुझे पसंद है,” वह चीखती, ज़ोर से पीछे धकेल रही. “मेरा

शौहर घर पर बीमार पड़ा है, शायद मेरी दुआ कर रहा है, और मैं यहाँ… तेरे लिए

टांगें फैला रही हूँ. मेरा मज़हब कहता है यह हराम है… बारे गुनाह… लेकिन रुक नहीं

सकती. मैं अब _ नहीं. मैं सिर्फ तेरी छिनाल हूँ. मुझे इस्तेमाल कर… मेरी कमज़ोरी

की सजा दे.”

इसी वक़्त, होटल की दीवार पर लगे घडी ने धीमे से मिडनाइट पार किया, उसकी हलकी tik-tik

आवाज़ उनकी भरी साँसों और गीली चुदाई की आवाज़ में खो गयी. खिड़की के बहार दूर से

एक गाडी का हॉर्न बजा और खामोश हो गया, कॉरिडोर में एलीवेटर की हलकी डिंग गूंजी, याद

दिलाते हुए की दुनिया के नार्मल ज़िन्दगी सिर्फ इन दीवारों के पार चल रही है.

अब्बू घर पर अकेला सो रहे थे, उनका कमज़ोर जिस्म पतली चादर के नीचे मोढ़ा हुआ, सीना

धीरे धीरे उठ रहा गिर रहा, बिलकुल be-khabar की उनकी वफादार बीवी कुछ किलोमीटर दूर

सबसे गहरी randi-pan कर रही थी.

गजेंद्र अचानक बहार निकला गीली चटक के साथ, अम्मी को एक hi झटके से पीठ के बल

लिटा दिया. “अब तू मुझ पर चढ़, तू ईमान छोड़ने वाली कुटिया. दिखा कितना तूने अपना

मज़हब छोड़ दिया.”

अम्मी ने झट से न कहा. वह उस पर चढ़ गयी, कमर पर बैठ कर, उसकी बड़ी नरम गांड

उसकी गॉड में बैठ गयी. उसने अपने टांगों के बीच हाथ डाला, उसके चमकते लुंड को

अपने मुँह तक ले आयी और धीरे बैठ गयी, हर मोटा इंच अंदर लेते हुए जब तक उसकी छूट

ने उसे पूरा निगल नहीं लिया.

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“ऊऊह्ह्ह… ाहहए… कितना गहरा,” वह करहि, आँखें पीछे मुद गयी. उसने ऊपर नीचे

होना शुरू किया, बड़ी गांड हिलती उछलती, हर उठने गिरने से गोश्त लहरा रहा. ऊपर नीचे, उसकी

बड़ी गांड के टुकड़े उसकी रानों पर थप थप कर रहे, हरकत जादूई और ग़लीज़.

गजेंद्र के हाथ ऊपर गए, चूचियों को निचोड़ा, निप्पल्स को ज़ोर से दबाया. “देख तेरी हालत,

शाहिदा. तेरा बीटा भी घिन खा जायेगा अगर जान ले उसकी दीनदार अम्मी ***** लुंड पर सस्ती

रंडी की तरह उछाल रही है.”

“एस्सस… आअह्ह्ह… मैं घिनौनी हूँ,” वह सिसकारी, आगे झुक कर भूखे चुम्बन करने लगी.

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उनकी ज़ुबानें गीली गीली लड़ रही थी जब वह तेज़ चढ़ने लगी, बड़ी गांड अब ज़ोर से हिल रही,

बिस्तर के स्प्रिंग चीख रहे. “मेरी छूट तेरे लिए टपक रही… मेरा ईमान ख़तम… मैं सिर्फ

तेरे मज़ा के लिए छेद हूँ. ऊऊह्ह्ह… और गहरा… मुझे भर दे.”

उसका लुंड इतना गहरा था की हर नीचे बैठने से उसका पेट थोड़ा उभर रहा, सर सर्विक्स पर डाब

रहा. अम्मी की कराहें तेज़ होती गयी, टूटी hui—“Aaaahhh… ऊऊह्ह्ह… ओह खुदा… मैं झाड़ रही…

तेरे लुंड पर झाड़ रही जब मेरा शौहर अकेला सो रहा!”

बाद में गजेंद्र ने उसे फिर पलटा, इस बार हाथों घुटनों पर डोग्गिस्टीले में. “अब तेरी

गांड चाहिए. अपनी मोती गांड के टुकड़े फैला, तू गन्दी _ रंडी.”

अम्मी ने पीछे हाथ बढ़ाया, उँगलियाँ नरम भरी गोश्त में धँसायी और टुकड़े पूरे

फैलाये, छेद बिलकुल नंगा. “ऐसे? ाहः… क्या खुला काफी है?”

अम्मी: (बिस्तर पर चार हाथों घुटनों पर, सफ़ेद ब्लाउज आधा खुला, लाल वैल अभी भी साफ़

पिन्नेद, सांस भरी जब वह अभी छूट से बहार निकला) गजेंद्र… मेरी गांड… अब तेरी है. ले

ले. यह तेरी है.

गजेंद्र: (पीछे घुटनों पर सिर्फ टाइट सफ़ेद बनियान में, हाथ पहले से उसकी चौड़ी कमर

पर) बिलकुल सही, शाहिदा. देख यह मोती _ गांड… (हलके से थप्पड़, फिर धीरे

धीरे टुकड़ों को गोल गोल मसलता) कैसे इतनी बड़ी रसीली हो गयी, हाँ? सारा बिरयानी नान जमा

हो गया जब तेरा बेकार शौहर टीवी देखता रहा?

अम्मी: (उसके हाथों पर थोड़ा पीछे धकेल, आवाज़ धीमी गुनहगार) ममम… हाँ…

हुसैन ने कभी छुआ नहीं. ठीक से देखा भी नहीं. उसके नज़र में गन्दा है, सोचना भी

हराम. तो यह बस… बढ़ती गयी. सालों से. तेरे जैसे किसी के इंतज़ार में.

गजेंद्र: (अँधेरे से हँसता, गहरा मसलता) तेरा पवित्र छोटा shauhar—bimaar बिस्तर पर,

पांच वक़्त ,,.,, जब उसकी बीवी की मोती गांड एक काफिर पूज रहा. बेचारा. यह छेद उसके

लायक नहीं. मेरे लायक है.

अम्मी: (नरम कराह जब उसके अँगूठ टुकड़े फैलते) अहह… तू सही है… उसने कभी डेसेर्वे

नहीं किया…

(गजेंद्र झुकता, गरम सांस चमड़ी पर, फिर जुबां धीरे से उसके पुकेरेद छेद पर ले

जाता)

अम्मी: ओह्ह्ह… गजेंद्र… आज ठीक से धोया भी नहीं… सुबह नहाया था लेकिन… अभी भी…

नीचे गन्दा है…

गजेंद्र: (जुबां जान बुझ कर गोल गोल, आवाज़ उसके खिलाफ मुफ्फलेड) परवाह नहीं. तेरा मज़ा

है. पसीना, बू, असली. यह चाहिए मुझे.

अम्मी: (ज़ोर से कराह, चेहरा लाल) तू कितना बुरा… गन्दा आदमी… औरत के ुँढोये गांड छेद को

जानवर की तरह चाट रहा… ुघठ… मेरे दिमाग में बुरा मत सोच, जानता हूँ तू सोच रहा…

गजेंद्र: (हँसता, जुबां ज़ोर से) तू पसंद करती है, पवित्र छिनाल. गरम कुटिया की तरह

कराह रही जब मैं तेरी टट्टी वाली छेद चाट रहा.

(अचानक, छोटी सी be-ikhtiyar टट्टी निकल gayi—tez और सुनाई देने वाली, वह ज़ोर से थरडी)

अम्मी: (आँखें फैली, जिस्म जैम गया) ओह मेरा खुदा—! माफ़ करना… (घबरा कर हंसती, शर्म

से) यह बस… निकल गया… जान बुझ कर नहीं… बहुत शर्मिंदा हूँ…

गजेंद्र: (पीछे नहीं हटा, जान बुझ कर सूंघता) ममम… छोटी गन्दी थरडी. अंडे और करि की

बू. तेज़.

अम्मी: (आधी हंसती, आधी सिसकारी) बस… ऐसे मत बोलो… घिन आती है… मैं अब बहुत सस्ती महसूस

कर रही…

गजेंद्र: (मुस्कुराते, फिर चाटने लगा) नहीं, यह सच है. जैसे तेरा सदा करैक्टर, शाहिदा.

परफेक्ट वैली बीवी बनने का दिखावा, लेकिन मेरी जुबां पर थरडी करते हुए जब तेरा शौहर

हॉस्पिटल में साद रहा. जैसे तेरी रूह गुनाह से साद रही.

अम्मी: (शर्म के बावजूद कराह, कमर हिलती) तू बहुत बुरा… लेकिन… शायद सही. यह सब बू…

मेरी थरडी, झूठ, सब… मैं कितनी बुरी औरत हूँ…

गजेंद्र: (जुबां गहरा घूमता, एक ऊँगली साथ में डालता) बिलकुल. और मुझे पसंद है. याद

है पिछली बार? जब मैंने यह छेद छोड़ा और तूने थोड़ी टट्टी मेरे लुंड पर कर दी? कितना गरम

था.

अम्मी: (सांस रूकती, आवाज़ कांप) ओह्ह्ह… फिर क्यों चाहता है? यह कितना गन्दा… शर्मनाक…

गजेंद्र: (उन गली अंदर बहार धीरे) क्योंकि यह असली है. कोई नकली पाकिज़ागी नहीं. सिर्फ tu—gandi,

बू वाली, टट्टी करने वाली _ अम्मी जो मुझे सब देती जो तेरा शौहर कभी नहीं पाया. अब

यह मोती टुकड़े फैला.

अम्मी: (दोनों हाथों से पीछे, गांड और फैला कर, आवाज़ कांप) ऐसे…? या ,.'… मैं सच में

यह कर रही…

गजेंद्र: (थूक मोटा छेद पर, लुंड के सर से रगड़ता) अच्छी लड़की. खुले रख. धीरे अंदर जा

रहा… महसूस कर तेरा थूक तेरी बू के साथ मिल रहा.

अम्मी: (लम्बी धीमी कराह जब वह अंदर दबाता) अह्ह्ह्ह… फ़ैल रहा… इतना मोटा… तू सच में मेरी

गन्दी छेद में फिर जा रहा…

गजेंद्र: (इंच इंच, कराह) फ़क हाँ… अब भी टाइट. यह गांड ***** लुंड के लिए बानी, तेरे

नामर्द शौहर के लिए नहीं. बता किस की है.

अम्मी: (हाँफते, पीछे धकेल कर मिलती) तेरी… सिर्फ तेरी… और गहरा ले… मुझे तेरी गन्दी छिनाल

बना…

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गजेंद्र: (पूरा अंदर, एक सेकंड रुक कर) सही. अब जकड. महसूस कर यह गन्दा छोटा थरडी

वाला छेद मुझे पकड़ता.

अम्मी: (उसके ird-gird जकड, सिसकारी) ममम… ऐसे…? हवा में मेरी थरडी की बू अभी भी…

बहुत शर्म…

गजेंद्र: (धीरे धक्के शुरू) शर्म और परफेक्ट. बातें गन्दी करते रह जब मैं यह

छेद फिर बर्बाद करून. बता हुसैन से कितना बेहतर हूँ मैं.

अम्मी: (हर धक्के से कराह में टूट) बहुत बेहतर… उसने कभी… अहह… इतना भरा महसूस

नहीं करवाया… इतना इस्तेमाल… इतना गन्दा… ज़ोर से छोड़ो, गजेंद्र… प्लीज…

गजेंद्र: (तेज़ होता, हाथ कमर पर) मेरी लड़की. ज़ोर से कराह. पडोसी सुन ले कैसी आवाज़

निकलती है जब धोके वाली _ रंडी गांड मरवाती है.

“अच्छी लड़की,” गजेंद्र गरजा, छेद पर थूक कर मोटा सर रखा. “तेरी गांड इतनी बड़ी… और

फैला. सब कुछ देखना चाहता हूँ.”

अम्मी ने ज़ोर से फैलाया, सिसकारी. वह धीरे धीरे अंदर गया, फिर ज़ोर का धक्का. वह गरम

कुटिया की तरह cheekhi—“AAAHHHAAA… ऊऊह्ह्ह… अंदर जा रहा… इतना बड़ा… ाहहए…

ऊह्ह्ह!”

क्योंकि उसने पहले कई बार गांड मारी थी, इस बार आसानी से अंदर गया, छेद उसकी मोटाई के

ird-gird फ़ैल कर बिना ज़्यादा विरोध, गहरा तक जब तक उसके बॉल्स उसकी छूट से टकरा नहीं गए.

घर पर, अब्बू के फ़ोन पर बेडसाइड टेबल पर हॉस्पिटल की याद टेक्स्ट आयी, लेकिन वह दवाई के

गहरे नींद में सो रहे थे.

गजेंद्र ने लम्बी ताक़तवर धक्के शुरू की, उसकी बड़ी गांड हर धक्के से ज़ोर से हिलती. भरी

टुकड़े हिलते थपकते, गोश्त की लहरें बहार की तरफ, जहाँ उसकी कमर टकरा रही थी. “फ़क…

तेरी गांड परफेक्ट है,” वह करहा. “इतनी नरम… इतनी ढीली पहले से, जितनी बार मैंने

बर्बाद की.”

मैं अपने छुपने वाले कमरे से जोर जोर से मुट्ठ मार रहा था, हाथ ऊपर नीचे, क्रैक

दूर से देखते हुए. अपनी अम्मी को ऐसे ट्रीट होते देख कर लुंड दर्द से धड़क रहा. मैं

मुस्कुराया देखते हुए.

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“ऊऊह्ह्ह… ाहहए… अब बहुत ाचा लग रहा है,” अम्मी कराह रही थी, अभी भी अपने गांड

के टुकड़े फैलाये हुए. “तेरा लुंड मेरी गन्दी छेद में इतना गहरा… मैं कितनी बुरी

_ हूँ… तुझे ऐसे मैला करने दे रही हूँ.”

“अब फैलाना बंद कर,” गजेंद्र ने कहा, आवाज़ लस्ट से भरी. “मेरा लुंड तेरी रंडी गांड

में पूरा दफन है. महसूस कर रही है कितनी ढीली हो रही है? दीवारें हाथ दे

रही हैं… अब सही लुंड की स्लीव बन रही है.”

उसने गांड के टुकड़े छोड़े, वह हिलते हुए उसके धक्के वाले लुंड के ird-gird आज़ाद हो गए.

“आअह्ह्ह… हाँ… ढीली हो रही है… हर बार जब तू पीछे छोड़ता है यह और फैलती है.

ऊऊह्ह्ह… महसूस हो रहा है खुल रही है तेरे लिए.”

“मुझे पसंद है तेरी गांड कितनी ढीली हो रही है,” वह बोलै, ज़ोर ज़ोर से धक्के मारते

हुए. “जल्दी hi यह खुली hi रहेगी जब मैं अंदर नहीं भी रहूँगा… हमेशा की याद

दिलाने वाली निशानी की तू अब मेरी गांड की रंडी है, कोई पवित्र बीवी नहीं.”

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अम्मी को फिर दर्द महसूस होने लगा जब be-ruk धक्के तेज़ हो गए. “ाहहए… ऊऊह्ह्ह…

दर्द होने लगा… लेकिन रुकना मत… प्लीज…”

वह आगे गिर पड़ी, पेट के बल लेट गयी, चेहरा तकिये में दबा हुआ. मुझे बहुत पसंद आया

वह उसके साथ जैसे पूरी रंडी ट्रीट कर रहा था— उसके मज़हब को be-izzat कर रहा, जिस्म

को be-rahmi से इस्तेमाल कर रहा, एक बार मॉडेस्ट औरत को अपना पर्सनल चुदाई का खिलौना

बना रहा. यह देखना नशा करने वाला था.

अब गजेंद्र पूरा उसकी पीठ पर था, उसका वज़न उसे मैट्रेस्स में दबाये हुए जब वह

prone-bone पोजीशन में गांड में धक्के मार रहा था.

इस पोजीशन में गांड में गहराई ज़्यादा होती है क्योंकि उसका जिस्म पूरा फ्लैट था, गांड के

टुकड़े उसके वज़न से आपने आप फ़ैल गए, लुंड पहले से कई इंच ज़्यादा अंदर जा रहा था,

एंगल बिलकुल परफेक्ट था उसकी आंत के सबसे गहरे हिस्से को छूने के लिए.

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इसी वक़्त होटल का एयर कंडीशनर धीमे से गूंज रहा था, कमरे की बढ़ती बदबू वाली हवा

को घुमा रहा था.

“फ़क… तेरी गरम गांड कितनी शानदार लग रही है,” गजेंद्र तारीफ़ कर रहा था, कमर

आगे पटक कर. “इतनी गरम और टाइट अभी भी इतनी फैलने के बाद. कराह मेरे लिए, रंडी.”

“ऊऊह्ह्ह… ाहहए… हाँ… अंदर इतनी गरम है… तू कितना किस्मत वाला है मेरी बड़ी गांड

छोड़ने के लिए,” अम्मी सांस लेते हुए बोली. “हर मर्द मेरी जैसे गांड का सपना देखता है…

नरम… बड़ी… और अब तेरी बर्बाद करने के लिए.”

अम्मी: (बिस्तर पर पेट के बल लेती, गांड थोड़ी ऊपर, तकिये में कराह रही जब गजेंद्र

धीरे धीरे गांड में धक्के मार रहा) अह्ह्ह… गजेंद्र… ओह्ह्ह… इतना गहरा… ममम…

गजेंद्र: (मुस्कुराते, हाथ कमर पर पकडे, रदम से धक्के) फ़क, तेरी छोटी टाइट

_ गांड मेरे लुंड के ird-gird परफेक्ट लग रही है. जानती है… मैंने तुझे कभी

वैल के बिना नहीं देखा. एक बार भी नहीं. हमेशा अच्छे दीनदार बीवी की तरह ढकी हुई.

अम्मी: (धक्के के बीच सांस रूकती) अहह… यह… ममम… मेरा मज़हब की निशानी है…

शर्म… या खुदा… ओह्ह्ह…

गजेंद्र: (धीमे हँसते, एक ज़ोर का धक्का मार कर) शर्म? अभी देख तेरी हालत, शाहिदा

—चेहरा नीचे, गांड ऊपर, ***** लुंड अपनी टट्टी वाली छेद में ले रही जैसे सस्ती रंडी.

तेरा मज़हब अब बिलकुल be-maani है. हर क़ानून तोड़ दिया तूने. रोज़ पांच वक़्त ,,.,,

फिर मेरे लिए गांड फैलाना? साद गयी है तू. पूरी तरह साद गयी.

अम्मी: (सिसकारी, जिस्म हर धक्के से हिलता) नहीं… ऐसा मत बोल… अह्ह्ह… यह अभी भी मेरा ईमान

है… मैं बस… ममम… गिर गयी… ओह खुदा…

गजेंद्र: गिरी? तू कूद गयी, बेबी. तूने शौहर को बेहोश किया, उसके साथ सोये हुए मेरा

चूसा, घर के हर छेद मरवाये. वह वैल अब सिर्फ झूठ है जो तू पहनती है. उतर दे.

दिखा असली रंडी को नीचे.

अम्मी: (आवाज़ कांप रही, आधी कराह आधा विरोध) अगर उतर दिया… अह्ह्ह… बिलकुल नंगी

महसूस होगी… खुली हुई… जैसे सब कुछ खो दिया… प्लीज… धीरे कर… मेरी गांड बहुत

दर्द कर रही… दर्द हो रहा…

गजेंद्र: (धक्के थोड़े धीमे किये लेकिन अभी भी गहरे, आगे झुक कर वैल के पिन

खींचना शुरू) दर्द? अच्छा है. मतलब हर इंच महसूस कर रही है जो बुरी लड़की

डेसेर्वे करती है. आ… छोड़ दे. मैं उतर दूँ स्कार्फ़? ठीक है?

अम्मी: ठीक है… उतर दिया… अह्ह्ह… धीरे… प्लीज… मैं मिन्नत कर रही हूँ…

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गजेंद्र: (वैल फ़ेंक कर, उँगलियाँ उसके खुले बालों में फेरता जब गांड में धीमे

ग्राइंडिंग रदम) फ़क… देख तेरी हालत. बिलकुल अलग. इतनी सुन्दर अब. अब छुपाने की

ज़रूरत नहीं.

अम्मी: (सांस रूकती, आवाज़ छोटी) क्या मैं… सुन्दर हूँ? इसके बिना?

गजेंद्र: (झुक कर गर्दन के पीछे चुम्बन) सुन्दर? सहित, शाहिदा, तू बहुत शानदार

है. बालों में उलझन, चेहरा लाल, गांड लुंड से भरी. यह असली तू है. वह ढकी हुई

नूं वाला दिखावा नहीं.

अम्मी: (धीमी कराह, शर्म के बावजूद थोड़ी ख़ुशी) ममम… शुक्रिया… अह्ह्ह… लेकिन

बहुत अजीब लग रहा… जैसे कोई और हूँ…

गजेंद्र: (हवा सूंघते हुए, फिर हँसते) असली बात… मैं तेरी टट्टी की बू आ रही है,

बेबी. यह बदबू सीधे वहां से जहाँ मेरा लुंड दफन है. अभी मेरी लुंड पर टट्टी

कर रही है?

अम्मी: (चेहरा लाल, आवाज़ शर्म से भरी) ओह्ह्ह नहीं… ऐसा मत बोल… क्या उम्मीद करता

है? तेरा लुंड इतने देर से मेरी… मेरी टट्टी वाली छेद में… अह्ह्ह… ज़रूर बू आएगी…

गजेंद्र: (एक ज़ोर का धक्का एम्फेसिस के लिए, उसको चीखने पर मजबूर) बिलकुल.

मुबारक हो, रंडी. तू ऑफिशियली मेरी लुंड पर टट्टी कर रही है जब मैं छोड़ रहा हूँ.

कितनी इज़्ज़त बची अब?

अम्मी: (शर्म से सिसकारी) प्लीज… इसके बारे में बात मत कर… बहुत शर्मनाक है…

ममम…

गजेंद्र: शर्मनाक? अच्छा है. खुद सूंघ यह टट्टी की बदबू— ले, अंदर ले. यह वह

बू है एक औरत की जिसने अपना मज़हब, शादी, शर्म सब कचरे में फ़ेंक दिया. न

वैल, न शर्म, बस एक गन्दी _ रंडी जो अपनी टट्टी की बू से भरी हुई गांड

मरवा रही है.

अम्मी: (be-ikhtiyar सूंघती, फिर चेहरा घूमती) हाँ… महसूस हो रही है… ओह खुदा

… बहुत गन्दी है… मैं गन्दी हूँ…

गजेंद्र: (फिर थोड़ा तेज़, आवाज़ में मज़ाक) गन्दी और खूबसूरत. देख— बिना वैल,

बाल बिखेरे, गांड मेरे लुंड के ird-gird फैली, टॉयलेट की तरह बू. यह असली रंडी की

शकल है, शाहिदा. वह नकली दीनदार दिखावा नहीं. यह तू है.

अम्मी: (ज़ोर से कराह, आँखों में आंसू के बावजूद) अह्ह्ह… जानती हूँ… मैं रंडी

हूँ… तेरी रंडी… ओह्ह्ह… ज़ोर से… प्लीज…

गजेंद्र: (मुस्कुराते, गांड पर हल्का थप्पड़) सही कहा. फिर बोल.

अम्मी: मैं तेरी रंडी हूँ… बिना वैल के… बदबू वाली… बर्बाद… ममम… छोड़ मुझे…

गजेंद्र: अच्छी लड़की. अब हर इंच ले और शुक्रिया ऐडा कर मुझे नंगा करने का— जिस्म,

रूह और इज़्ज़त सब.

अम्मी: शुक्रिया… अह्ह्ह… शुक्रिया मुझे ऐसा बनाने का… ओह्ह्ह…

मैं अब उनके जिसमें जुडी हुई बॉडीज से हलकी टट्टी की बू महसूस कर रहा था— मिटटी जैसी,

बिलकुल साफ़ पहचान वाली, उनके जिस्म से उठ रही थी. गजेंद्र ने भी नोटिस किया. “तेरी

गांड टट्टी की बू दे रही है, शाहिदा. इतना ज़ोर ज़ोर से धक्के मारने से अंदर सब

कुछ हिल गया है.”

“ऊह्ह्ह… जानती हूँ… बहुत शर्म की बात है… लेकिन रुकना मत,” वह कराह रही थी.

“ज़ोर से दबा,” उसने अचानक हुक्म दिया. “अपनी गांड को ऐसे दबा जैसे टट्टी कर रही हो.

मुझे अंदर रहने देकर बहार निकाल.”

अम्मी रुक गयी, आवाज़ कांप रही. “लेकिन… यह गन्दा हो जायेगा… बेडशीट पर सब फ़ैल

जायेगा…”

“ज़ोर से दबा,” उसने ज़िद की, अभी भी धीरे धीरे धक्के मारता हुआ. “मैं महसूस

करना चाहता हूँ तेरी गांड खुले और मेरे लुंड पर दबाये. कर, तू गन्दी कुटिया.”

“ठीक है… कोशिश करती हूँ… ाहहए…” अम्मी ने ज़ोर लगाया, चेहरा म्हणत से लाल.

“ऐसे? ऊऊह्ह्ह… अजीब लग रहा है…”

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उसने और ज़ोर लगाया, और क्योंकि उसकी गांड अब इतनी ढीली और फैली हुई थी बार बार के सख्त

चुदाई से, यह आसानी से खुल गयी. थोड़ी सी नरम टट्टी उसके लुंड के ird-gird लगनी शुरू

हो गयी जब वह दबा रही थी, गरम, गन्दा महसूस कर के वह शर्म और अजीब ख़ुशी

में सिसकारी भर रही थी.

“तू मेरी चुदाई के वक़्त मेरे लुंड पर टट्टी कर रही है,” गजेंद्र ख़ुशी से करहा.

“देख कितनी नीचे गिर गयी है. एक वक़्त की दीनदार _ औरत अब सच में टट्टी

वाली छिनाल बन गयी. तूने हर --- हद्द पार कर दी— जीना, गांड चुदाई, दुसरे

मज़हब से, और अब यह. तू अब इंसान भी नहीं— सिर्फ मेरा छेद है जो टट्टी करता है और

मेरे लिए झाड़ता है.”

“आअह्ह्ह… ऊऊह्ह्ह… जानती हूँ… मैं इतनी be-izzat हो गयी… लेकिन ाचा लग रहा है…

रुकना मत…”

गजेंद्र की रफ़्तार तेज़ हो गयी. “मैं झड़ने वाला हूँ, तू गन्दी रंडी. तेरी टट्टी वाली

गांड में अपना माल भर दूंगा.”

अम्मी फ़िक्र से करहि. “रुक… होटल की बेडशीट… हम बर्बाद कर देंगे… वह एक्स्ट्रा

पैसा मांगेंगे…”

“शीट को छोड़,” उसने be-izzati से कहा. “अभी तेरी गन्दी गांड में झाड़ रहा हूँ.”

उसने तेज़ और सख्त धक्के मरने शुरू किये, कमर इतनी तेज़ हिल रही थी जैसे ओर्गास्म के

पीछे दौड़ रहा हो. “ले… हर बूँद ले, तू टट्टी से ढकी छिनाल.”

उसकी बड़ी गांड ज़ोर ज़ोर से हिल रही थी हमले के नीचे, टुकड़े बार बार उछाल रहे थे.

“आआह्ह्ह… ऊऊह्ह्ह… ाःहाहा… महसूस हो रहा है… तू मेरी गांड के अंदर झाड़

रहा है… इतना गरम… इतना ज़्यादा माल… मेरी आंत में भर रहा… मेरी टट्टी के साथ

मिल रहा… ऊह्ह्ह… तेरे लुंड के ird-gird बहार निकल रहा है…”

जब वह झाड़ा, मोती मोती धारे उसकी बर्बाद गांड में गहरे तक गयी, कुछ बहार

उबाल कर टट्टी के साथ मिल कर क्रीमी, गन्दा मेस बना दिया जो उसके गांड के टुकड़ों

और उसके बॉल्स के बीच फ़ैल गया.

अम्मी का चेहरा ख़ुशी और शर्म से बिखर गया, तकिये को काट कर चीखें दबायी,

हाथ शीट्स को ज़ोर से पकडे हुए जब जिस्म तेज़ एहसास से कांप रहा था.

वह दोनों वैसे hi देर तक रहे, गजेंद्र उसकी पीठ पर भरी हुई लेता, लुंड अभी भी

गहरे गांड में, ढीला पड़ता हुआ लेकिन बहार नहीं निकलता. उसके ख़तम हुए लुंड की

गर्मी उसको भर रही थी, गन्दा मेस हर छोटी हरकत से चिपचिपा आवाज़ कर रहा था,

उसे आफ्टरग्लो में रखे हुए.

“अभी मत हिलना,” अम्मी सांस फूलते हुए फिसफिसाई. “तेरा लुंड अभी भी मेरी गांड में

इतना ाचा लग रहा… इतना भरा हुआ… इतना गरम… नहीं निकलना चाहती.”

वह हंस पड़ा, धीरे से घिसाई करते हुए. “अब सच में आदत पद गयी न? मेरा माल

और तेरी टट्टी सब अंदर मिल कर.”

बाद में उसने बहार निकला, गीली गन्दी आवाज़ के साथ.

वह साइड पर लेट गया, सांस तेज़. उसका लुंड अम्मी की नरम टट्टी और उसके मोटा सफ़ेद माल

से ढाका था, सर और शाफ़्ट चमक रहे थे गंदे मिलाप से, दाग बॉल्स तक बह रहे थे.

कुछ मेस अम्मी की बड़ी गांड के टुकड़ों पर भी फ़ैल गया था, नरम हिलते गोश्त पर

भूरे दाग छोड़ कर.

जैसे हमेशा, अम्मी जल्दी उठी और बाथरूम की तरफ भागी, हाथ टांगों के बीच

रख कर बहने वाले मेस को रोकने की कोशिश में.

गजेंद्र के लुंड पर मेरी अपनी अम्मी की टट्टी देख कर मैं हद्द पार कर गया. मैंने

ज़ोर से मुट्ठ मारी, मोती धारे छुपने की जगह के फर्श पर गिरी, जिस्म गुनाह भरी

ख़ुशी से कांप रहा था जब मैं उसकी be-izzati का गन्दा सबूत देख रहा था.

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पूरा होटल रूम अब बू मार रहा था— मिटटी जैसी टट्टी की बू, माल और पसीने के

साथ मिला कर, तेज़ और गहरी, हवा में चिपकी हुई जैसे उनके गुनाह का दाग हमेशा

के लिए.

बाथरूम के अंदर मैंने फिर से थोड़े खुले दरवाज़े से झाँका. गजेंद्र अम्मी के

साथ शावर में था. गरम पानी उनके नंगे जिस्मों पर बह रहा था जब वह उसकी

पीठ पर धीरे से साबुन लगा रहा था, अब ऑलमोस्ट प्यार से.

“तू आज रात कमल थी, शाहिदा,” वह धीमे से बोलै, उसके गीले कंधे पर चुम्बन

किया. “इतने मेस के बावजूद… तूने सब कुछ परफेक्ट छिनाल की तरह लिया.”

अम्मी उस पर पीछे झुक गयी, आवाज़ नरम लेकिन शर्म से भरी. “यकीन नहीं होता मैंने

ऐसे दबा… तुझे अंदर रहने देकर टट्टी कर दी. बहुत गन्दी महसूस हो रही हूँ… लेकिन

रुक नहीं पायी.”

वह हंस पड़ा, हाथ गांड के टुकड़ों के बीच नीचे ले जाते हुए धो रहा था. “यही

तुझे ख़ास बनता है. अब कोई हद्द नहीं. तेरा ईमान, तेरी इज़्ज़त, तेरी गांड— सब मेरा

बर्बाद करने के लिए.”

वह सांस छोड़ कर उसकी तरफ मुड़ी, पानी के नीचे. “बस वादा कर यह हम दोनों के

बीच रहेगा. मेरा घर कभी नहीं जान सकता मैं कितनी नीचे गिर गयी हूँ.”

गजेंद्र उसे खींच कर पास लाया, पानी उनके बीच बह रहा था. “जब तक तू और

मांगती रहेगी, तेरा राज़ मेरे पास सुरक्षित है, मेरी सुन्दर टट्टी वाली छिनाल.”

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CHAPTER 31

मैं एक बेशर्म बीटा हूँ जो बिलकुल भी शुक्रिया के लायक नहीं

, क्यूंकि मैंने अपनी माँ को अपने डैड के साथ धोखा देते

हुए देखा.

अगली सुबह मैं धीरे धीरे जाएगा, होटल के कमरे की पतली पर्दों से सूरज की रौशनी

अंदर आ रही थी, बिस्तर पर गरम निशाँ बना रही थी.

मेरा हाथ अभी भी सूखा और चिपचिपा था रात के वीर्य से, जो मैंने ज़ोर ज़ोर से

मुट्ठ मार कर गिराया था अम्मी के गजेंद्र से गांड मरवाने के ज़िंदा यादों पर

— उसका जिस्म कैसे टेढ़ा हुआ था, कराहें मेरे दिमाग में गूँज रही थी जैसे कोई

मन हुआ गीत.

मैंने आँखें रगड़ी, नींद और अभी भी उत्तेजना का मिला जुला एहसास, चादर टांगें

में उलझी हुई बेचैन नींद से. गजेंद्र ने जो होटल बुक किया था वह सच में

शानदार था, नरम फर्श, किंग साइज बिस्तर जो आपको आराम में डुबो देता, और

बालकनी नीचे शांत बगीचे की तरफ.

जैसे हनीमून सुईठे, बिलकुल अम्मी और गजेंद्र के छुपके गेटअवे के लिए परफेक्ट,

उनका gair-qanooni इश्क़ फूल रहा था जब अब्बू घर पर थे, अम्मी के झूठों में

फंसे हुए— "फॅमिली ट्रिप" या जो भी बहाना उसने बनाया था इस बार.

वह शायद सोच

रहा होगा वह कुछ काम निपटा रही है या रिश्तेदारों से मिलने गयी है, कभी

शक नहीं किया उसके धोके की गहराई का.

मैंने टांगें फैलाई और उठा, धुंधला पैन झटका, और उनके कमरे से जुडी दरवाज़ा

की तरफ चला. पहले हल्का थोखा, फिर थोड़ा ज़ोर से जब तुरंत जवाब नहीं आया.

अंदर से पहले चुम्बन की आवाज़ें सुनाई दी.

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"अम्मी? जाग गयी?" मैंने पुकारा, कान दरवाज़े से लगाया. अंदर से कराहें की

आवाज़ें— पहले धीमी, फिर तेज़ होती हुई, लाय दार और बिलकुल पहचान वाली.

मेरा दिल ज़ोर से धड़का; क्या वह सुबह सुबह छोड़ना शुरू कर रहे थे? आवाज़ें गहरी

थी, सांस की गरम फूंक और धीमी बातें, दिमाग में उलझे हाथ पेअर और गरम

त्वचा की तस्वीर बना रही थी.

सोचा शायद वह जुड़ कर उठी होंगी, गजेंद्र के हाथ दिन शुरू होने से पहले hi

उसके जिस्म पर घूम रहे होंगे, दुनिया की परवाह किये बिना उनका जोश फिर से भड़क

रहा होगा.

यह बिलकुल समझ आता था— वह छुपने के इस बबल में थे, हर पल इंडल्ज करने

का मौका. कराहें और तेज़ हुई, औरत की सिसकारी जो मैं पहचान गया अम्मी की थी,

और मैंने तसव्वुर किया वह एक दुसरे में खोये हुए, मेरी मौजूदगी से be-khabar.

एक हिस्सा उनके be-parwahi पर जल रहा था, कैसे वह ख्वाहिश में पूरा समर्पण

कर देते हैं, दूसरा हिस्सा उसी पुराणी, शर्मनाक जानकारी से उबाल रहा था.

दरवाज़े के पार उनकी बात सुनाई दी, धुंधली लेकिन काफी साफ़ सन बनाने के लिए.

(मैं दरवाज़े पर थोक रहा हूँ जो दोनों कमरों को जोड़ता है, मासूम बन कर लेकिन

अंदर से मुस्कुराता हुआ क्योंकि मुझे बिलकुल पता है क्या चल रहा है और उनके

"हनीमून" मूड को ख़राब करना चाहता हूँ)

मैं: अम्मी? जाग गयी? दरवाज़ा खोलो, ब्रेकफास्ट के बारे में बात करनी है. होटल

का बुफे जल्दी बंद हो जायेगा.

(अम्मी और गजेंद्र अपने कमरे में खड़े थे, नहाने के बाद ताज़ा, दोनों सफ़ेद

होटल टॉवल में लपेटे हुए. गजेंद्र के हाथ बिजी— एक ऊँगली उसकी गीली छूट में

अंदर बहार, दूसरी उसकी टाइट गांड के छेद में.

वह अम्मी के पीछे खड़ा था,

अम्मी के घुटने थोड़े झुक गए, चेहरा ख़ुशी से लाल, लेकिन वह नार्मल बनने की

कोशिश कर रही थी)

अम्मी: (आवाज़ गरम सांस वाली, खुद को सँभालते हुए) यह... आ रही हूँ, ज़ैद!

बस... एक सेकंड दो.

(वह गजेंद्र से सख्ती से फिसफिसाई, लेकिन कमर अपने आप उसकी उँगलियों पर पीछे

धकेल रही थी— वह इस हराम थ्रिल से पागल हो रही थी)

अम्मी: (फिसफिसाते हुए) गजेंद्र, रुक... प्लीज... वह बिलकुल यहीं है...

गजेंद्र: (मुस्कुराते हुए, नहीं रुकते, उँगलियाँ तेज़) श, तुझे पसंद है. महसूस

कर कितनी गीली हो गयी है?

मैं: अम्मी, किस से बात कर रही हो? गजेंद्र अभी सो रहा है क्या? सोचा था हम

सब साथ नीचे जायेंगे.

अम्मी: (धीमी कराह जब गजेंद्र ऊँगली छूट के अंदर मोड़ता) ममम... नहीं, वह...

जाग गया है. हम बस... तैयार हो रहे हैं.

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मैं: तैयार? इतनी देर से अंदर हो. क्यों आवाज़ अजीब लग रही है? जैसे कराह रही हो

या कुछ. ठीक हो?

अम्मी: (सांस रूकती जब गजेंद्र क्लीट पर अंगूठा रगड़ता और दूसरी ऊँगली गांड में

गहरी) अहह... मैं ठीक हूँ! बस... बिस्तर के फ्रेम से पाऊँ थोक दिया. आह!

मैं: पाऊँ थोक दिया? फिर से? कल रात भी यही कहा था. हे, गजेंद्र! अंदर हो?

क्यों दरवाज़ा नहीं खोल रहे?

गजेंद्र: (धीमे से हँसते हुए, उँगलियाँ अंदर hi रखते हुए पुकारा) हाँ बीटा. एक

सेकंड दो— हम... नहाने के बाद पोंछ रहे हैं.

अम्मी: (जल्दी से हाँ में, आवाज़ कांप रही) हाँ ज़ैद... बहार इंतज़ार करो. जल्दी

निकलते हैं.

मैं: (ज़िद करते हुए, फिर हल्का थोखा, अंदर से हँसता क्योंकि पता था उनका मज़ा

ख़राब कर रहा हूँ) आओ न, खोलो! भूक लगी है. इतनी देर क्यों? अजीब आवाज़ें आ

रही हैं— जैसे सांस रुकना या कुछ गीला सा.

(दरवाज़े के पार अम्मी की धुंधली कराहें और गजेंद्र की उँगलियाँ छूट और गांड में

ज़ोर ज़ोर से काम करने की गीली चटक आवाज़ें)

अम्मी: (गजेंद्र से फिसफिसाते हुए, बीच में कराह) गजेंद्र... अहह... रुक जाओ प्लीज...

तूने कल रात मेरी छूट और गांड दोनों मारी थी... नहीं कर सकते... वह यहीं है...

गजेंद्र: (फिसफिसाते, तेज़ नहीं करते) लेकिन तुझे खतरा पसंद है न? तेरे छेद मेरी

उँगलियों के ird-gird जकड रहे हैं. और मांग रहे हैं.

अम्मी: (लफ़्ज़ों के बावजूद पसंद करते हुए, जिस्म कांप रहा) ममम... बहुत खतरनाक

है... लेकिन... ओह खुदा...

मैं: (ज़ोर से थोखा, अभी भी बेवक़ूफ़ बन कर) अम्मी? फिर वह आवाज़ें— यह गीली

चटक क्या है? जैसे कोई पुडिंग हिलाया जा रहा हो. दरवाज़ा खोलो!

(मैं चुपके से दरवाज़े के छेड़ में आँख लगाया, अंदर साफ़ देख रहा था: अम्मी का

टॉवल थोड़ा सार्क रहा, चूचियां उभर रही; गजेंद्र पीछे, उँगलियाँ उसकी चमकती

छूट और छेद में अंदर बहार. उसके रास टांगें पर टपक रहे थे)

अम्मी: (अब ज़ोर से कराह, रोक नहीं प् रही) अहह... ज़ैद, कुछ नहीं! बस... बाथरूम में

नल टपक रहा है.

मैं: नल? ज़्यादा तो... छोडो. गजेंद्र, आओ न— उसको दरवाज़ा खुलवाने दो!

गजेंद्र: (उँगलियाँ धीरे बहार निकालते हुए, अम्मी सिसकारी) इंतज़ार कर, ज़ैद. बस तैयार.

(छेड़ से देखा गजेंद्र ने छूट वाली ऊँगली मुँह में डाली, चूस कर साफ़ की— संतुष्ट

हम के साथ उसके मीठे रास का मज़ा लेते हुए. फिर गांड वाली ऊँगली भी, धीरे चूस

कर, मुस्की मिटटी जैसा स्वाद सवार करते हुए)

अम्मी: (देख कर, घिन और उत्तेजना दोनों, फिसफिसाते) गजेंद्र... यह गन्दा है... मेरी

गांड... ऐसे नहीं चाट सकते...

गजेंद्र: (मुस्कुराते) मेरे लिए जन्नत जैसा मज़ा है. तेरा यह गन्दा छोटा छेद मेरा

सबसे पसंदीदा है.

अम्मी: (दरवाज़े की तरफ मुद कर, अभी भी धीमी कराह जब वह फिर से तैसे करता) ज़ैद

... वह एक मिनट में खोलेगा. प्लीज... अहह... बस इंतज़ार कर.

मैं: (अंदर से ग्रीन करते हुए, एक और थोखा) अम्मी, फिर कराह रही हो. सच बताओ क्या

हो रहा? नहीं खोलोगी तो सुबह भर ठोकता रहूँगा!

अम्मी: (अब मिन्नत करते हुए, आवाज़ में ख़ुशी जब गजेंद्र ऊँगली फिर छूट में डालता)

ज़ैद प्लीज... ममम... अपने कमरे में वापस जा. हम नीचे ब्रेकफास्ट के लिए मिलेंगे.

वादा... ओह्ह...

मैं अंदर से मुस्कुराया, उलझा हुआ ग्रीन थ्रिल से, लेकिन दिल में जानता था मैं उन्हें

परेशां करना चाहता था— उनके छुपके दुनिया में घुसना, शायद जलने से या बस

उनके रिएक्शंस देखने के लिए.

"अम्मी, खोलो! बात करनी है," मैंने ज़ोर से पुकारा, फिर थोखा. वह खोलती नहीं, बिलकुल;

बहुत रिस्क था, गजेंद्र वहां था और उनकी हालत इतनी ख़राब.

वह दरवाज़े के पार मिन्नत की, आवाज़ तन कर. "बीटा प्लीज... कुछ मिनट दो. मैं..

. गजेंद्र के साथ कुछ ज़रूरी काम कर रही हूँ. जल्दी निकलते हैं."

मुझे बिलकुल पता था वह "ज़रूरी" काम क्या था— उनकी गन्दगी, चोरी के लम्हे. "ठीक है

अम्मी," मैंने मासूम बन कर कहा, और अपने कमरे में वापस चला गया, बिस्तर पर

बैठ कर फ़ोन स्क्रॉल करने लगा वक़्त गुजरने के लिए.

गजेंद्र: (पुकारते हुए) हाँ बीटा— पांच मिनट और. तेरी अम्मी... बिजी है.

मैं: बिजी? किस चीज़ से? आओ न,

अम्मी: (सांस रूकती, गजेंद्र के हाथ को धकेलने की कोशिश लेकिन नाकाम) ज़ैद... मेरी

बात सुनो... अहह... बस जा. प्लीज बीटा... हम जल्दी कर लेंगे.

मैं: (हलके से हँसते हुए, डीडे किया काफी परेशां कर दिया) ठीक है ठीक है. जल्दी

करो! भूक लगी है. नीचे मिलते हैं.

(मैं दरवाज़े से पीछे हटा, मुस्कुराता हुआ अपने कमरे की तरफ, जानता था उनके सुबह

के मज़े में गड़बड़ दाल दी. दरवाज़े के पार अम्मी की रहत भरी सांस और एक और कराह

सुनाई दी)

अम्मी: (गजेंद्र से फिसफिसाते) शुक्र है खुदा का... अब जो शुरू किया था पूरा कर...

गजेंद्र: (मुस्कुराते) ख़ुशी से

करीब 20 मिनट बाद मेरा फ़ोन बजा— अम्मी का कॉल था. "आओ बीटा अभी," उन्होंने कहा,

आवाज़ साबित थी लेकिन थोड़ी सांस फूली हुई सी.

मैंने फिर दरवाज़ा खटखटाया और जब उन्होंने खोला तो अंदर गया. अम्मी बहुत

खूबसूरत लग रही थी, लम्बी काली ज़ुल्फ़ों को खुला छोड़ा हुआ, होंठों पर हल्का लाल

लिपस्टिक जो उनके भारी होंठों को और निखार दे रहा था, सिंपल टॉवल में भी उनका भरा

जिस्म साफ़ दिखाई दे रहा था.

कपडा उनकी गीली चमड़ी से चिपका हुआ था, चूचियों का उभार, कमर का डूबना, और

कमर का फैलाव— सब औरतपन की खुशबू दे रहा था.

वह हमेशा से hi दिलकश थी, लेकिन बिना रुमाल के वह और क़रीब, और इंसानी लग रही थी

— बाल चेहरे के ird-gird नरम लहरों में, कुछ तार अभी भी नहाने के बाद गीले,

ताज़ा बेबसियत की हवा दे रहे थे.

उनकी चमड़ी चमक रही थी, शायद सुबह के कामों से, आँखों में चमक थी जो

माँ वाली मोहब्बत और कुछ छुपा राज़ मिला रही थी.

टॉवल मुश्किल से उनको संभल रहा था, नीचे की नरमी का इशारा दे रहा, टांगें

चमकती और सख्त, थोड़ा सा क्रॉस किये हुए जब वह वज़न बदल रही थी.

यह नज़ारा उनको जवानी के पूरे रंग में दिखा रहा था, भरोसा और चाहत भरी, घर

में देखि जाने वाली parda-posh शक्ल से बिलकुल अलग.

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वह अभी भी टॉवल में थी, बिना रुमाल के— कुछ जो मैंने कभी नहीं देखा था. घर

में non-mahram मर्दों के सामने बाल हमेशा धक् लेती थी, हमारे मज़हब की

आदत, लेकिन यहाँ इस खास जगह पर वह क़वानीन भूल गए लग रहे थे.

गजेंद्र उनके बगल में खड़ा था, उँगलियाँ धीरे से नाक पर ले जा कर सूंघ रहा

था— वही उँगलियाँ जो कुछ मिनट पहले उनकी छूट और गांड के अंदर थी. हवा में

हलकी, क़रीबी बू थी.

हमने एक दुसरे को गर्मजोश से सलाम किया, baat-cheet आम सी चल पड़ी हालाँकि

नीचे कुछ लहरे थी. "सुबह बखैर, बीटा," अम्मी ने कहा, मुझे जल्दी से गले

लगते हुए, टॉवल मुझसे रगड़ गया. "नींद अच्छी आयी?" "हाँ अम्मी, बिस्तर

आरामदेह था," मैंने जवाब दिया, गले लगते हुए. "और आप दोनों?"

गजेंद्र मुस्कुराया, मेरे कंधे पर थपकी देते हुए. "बच्चे की तरह सोया. यह

जगह परफेक्ट है— खामोश, कोई रुकावट नहीं. सिर्फ तेरी खटखटाहट अलग थी."

अम्मी हलके से हांसे. "हम अभी तैयार हो रहे थे. नीचे होटल का नाश्ता बहुत

अच्छी बू दे रहा है. भूख लगी?" "थोड़ी सी," मैंने कहा. "अम्मी आप बहुत अच्छी

लग रही हैं. आराम से."

उन्होंने थोड़ा शर्मा कर कहा, "शुक्रिया बीटा. थोड़ा ब्रेक मिल गया तो अच्छा लग रहा.

" गजेंद्र बोलै, "ब्रेक की बात करते हुए, पूल पर चलते हैं बाद में? होटल का

प्राइवेट पूल है— हम तीनो के लिए परफेक्ट उनविंड करने के लिए."

मुझे आईडिया पसंद आया, चेहरा खिल गया. "बहुत अच्छा लगेगा! मुझे स्विमिंग बहुत

पसंद है." अम्मी ने मुझे फिर गले लगाया, बाहों में गरमाह. "ठीक है, मज़ा

आएगा."

फिर गजेंद्र आया, हम दोनों को बड़े बेयर हुग में ले लिया, बाहें मुझे और अम्मी

को साथ में घेरे हुए. "फॅमिली टाइम, सही?" इससे अम्मी बेचैन हो गयीं, जिस्म

थोड़ा सा तन गया जब मैं बिलकुल वहां था, इस गले में फंसा हुआ.

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गले लगते हुए उसने धीरे से हाथ बढ़ा कर अम्मी की बड़ी गांड पकड़ी, टॉवल

के ऊपर से निचोड़ा— मेरे सामने यह हिम्मत भरा, खतरनाक काम. मैं हैरान

रह गया की वह इतने खुले में रिस्क ले रहे थे, आँखें फैल गयी.

कैसे इतने लापरवाह हो सकते हैं? मैं कुछ इंच दूर, उनकी हालत में तब्दीली

महसूस कर रहा था, सांस रुक गयी थी. यह be-hud थी, हड्डों को ऐसे पार करना

जो अगर मैं गलत रियेक्ट करूँ तो सब टूट सकता था.

यह हिम्मत मुझे उत्साहित भी करती थी और डरती भी थी— गजेंद्र अपना दावा दिखा

रहा था, अम्मी खतरे के बावजूद इजाज़त दे रही थी. यह उनकी लत का सबूत था,

ख्वाहिश ने होश्यारी को मार दिया, नतीजे से अँधा कर दिया.

अम्मी उसको इशारों से रोक रही थी— आँखें फैलती, सर हल्का सा हिलाती, हाथ धीरे

से उसका हाथ हटा रही थी— लेकिन वह धीमी हांसे, आवाज़ में घबराहट और मस्ती

मिला हुआ.

"संभल के, गजेंद्र," उन्होंने फिसफिसाया, मुझ पर नज़र डालते हुए. "अभी नहीं." वह

हांसे. "क्या? सिर्फ दोस्ताना गले लगाना. सही न बीटा?"

"हाँ... बिलकुल," मैंने कहा, साथ निभाते हुए, हालाँकि दिमाग दौड़ रहा था. अम्मी

धीरे से अलग हुई.

"बस, अब काफी गले लगाना. बीटा, तू जा कर कुछ हल्का कपडा पेहेन ले? हम जल्दी नीचे

चलते हैं." मैंने उन से रुमाल न पहनने का सवाल नहीं पुछा— यह सवाल दिमाग

में लटका था, लेकिन छोड़ दिया, इस नाज़ुक सुकून को बिगड़ने का दिल नहीं किया.

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जब मैं बहार निकला, अम्मी ने दरवाज़ा बंद किया. पतले लकड़ी के दरवाज़े के पार उनकी

बात सुनाई दी, धुंधली लेकिन साफ़. "क्या लगता है उसको हमारे बारे में पता है?"

अम्मी ने बेचैन आवाज़ में पुछा.

गजेंद्र ने तसल्ली दी. "शाहिदा, रिलैक्स करो. वह अभी बच्चा है— शायद सोचता है हम

सब दोस्त हैं यहाँ. अगर शक भी करे तो क्या कर सकता है? हम संभल कर हैं."

"लेकिन कभी कभी जिस तरह देखता है... मुझे गुनाह महसूस होता है. वह मेरा बीटा

है."

"गुनाह से तेरी मेरे लिए फीलिंग्स नहीं बदलेंगी. इधर आओ— मुझे गले लगाने दे.

देखा? सब ठीक है." उन्होंने सांस छोड़ी, शांत होते हुए. "तुम सही कहते हो. बस..

. ठीक है."

उस लम्हे मुझे अब्बू के लिए दुःख नहीं हुआ; अजीब तरह से मुझे अम्मी का अब्बू को

धोका देना ाचा लगा, उनकी छुपी ज़िन्दगी का खुलना मज़ा दे रहा था. मैं एक

be-sharam बीटा बन गया था, उनके धोके में ख़ुशी महसूस कर रहा था बजाये

घर की इज़्ज़त बचने के.

यह ाचा लग रहा था, आज़ादी जैसा, उमीदों के बोझ से छुटकारा— उनके गुनाहों में

शामिल होना, उस लड़के की बजाये जो रोज़ पांच वक़्त ,,., पढता और बिना सवाल

किये हुक्म मंटा था.

बीटा होने के नाते मुझे अब्बू की इज़्ज़त बचानी चाहिए थी, उनको सामना करना

चाहिए था, मज़हब की वफ़ा और इज़्ज़त के सबक़ पर अमल करना चाहिए था. लेकिन

यह छुपा इल्म का नशा, मुझे ताक़तवर महसूस करना, उसको हरा देता था.

मैं be-sharam था हाँ— देखना, मदद करना, उनके गिरने से मज़ा लेना. यह उनकी

be-sharmi से मिलता था, हमें एक उलझे तरीके से बांध देता था. पवित्र किताबों

में maa-baap की इज़्ज़त का ज़िक्र था, लेकिन मैंने उसको अँधेरे में बदल दिया,

बर्बादी में सुकून ढूंढ लिया.

Be-sharam होना आज़ादी जैसा लग रहा था, उस दीनदारी से छुटकारा जो हम सबको

बंधे रखता था, घर के छुपे सच को बिना पछतावे के क़ुबूल करने देता था.

फिर हम होटल के बहार स्विमिंग पूल गए, सिर्फ हमारे लिए प्राइवेट एरिया, ऊंचे

हेजेज और उम्ब्रेल्लास के नीचे लाउन्ज चेयर्स से घिरा हुआ. पानी चमक रहा था,

हवा में क्लोरीन और फूलों की ताज़गी थी.

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अम्मी ने हल्का नीला ड्रेस पहना था, बहुत हल्का और पतला, जिसमे से उसकी चूचियां और

बड़ी गांड साफ़ दिखाई दे रही थी. कपडा उसके कर्व्स से चिपका हुआ था और सिर्फ जाँघों

तक पहुँच रहा था, टांगें पूरी नंगी.

मैं सोच रहा था की उसको शर्म क्यों नहीं आती ऐसे कपडे पेहेन कर एक ऐसे मर्द के

सामने जो उसका शौहर नहीं— हमारे मज़हब में हमेशा पर्दा और हाय की बात

होती है, खास कर non-mahram मर्दों के सामने, लेकिन यहाँ वह बिलकुल be-dar और

be-sharam थी.

मैं सफ़ेद छोटी और jungle-print शर्ट में था, कासुअल और पानी के लिए तैयार.

गजेंद्र ने भी सफ़ेद छोटी और बिना आस्तीन की शर्ट पहनी थी, उसकी बाहें मज़बूत

और ताम्बे रंग की.

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अम्मी ने शुरू किया गजेंद्र के साथ लाउन्ज चेयर पर बैठ कर, ऊँचे गिलास में

पीला आम का रास पी रही थी, मीठा और ताज़ा. वह धीमे से बातें कर रहे थे

जब मैं शैलो एन्ड में खेलने चला गया, पानी में छपाक मचा रहा और

ठन्डे पानी का मज़ा ले रहा.

दूर से देखा उनको— सर पास पास, वह कुछ कह रहा था और दोनों हांसे.

कुछ मिनट बाद गजेंद्र ने कान में कुछ कहा, दोनों उठ गए और ज़मीन

के नीचे वाले ओपन सीक्रेट रूम की तरफ चले, एक छोटा कबाना जैसा कमरा

जहाँ पर्दा प्राइवेसी के लिए था.

मैं चुपके से उनके पीछे गया, क्यूरोसिटी मुझे खींच रही थी. एक पोटेड प्लांट

के पीछे छुप कर और पास आया, दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, और अंदर झाँका.

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वहां वह दोनों थे, गहरे चुम्बन कर रहे थे, उसके हाथ अम्मी की बड़ी गांड

पकडे हुए, पतले ड्रेस के ऊपर से नरम गोश्त को निचोड़ रहे थे. चुम्बन जोशीला

था, ज़ुबानें एक दुसरे से मिली हुई, उसका जिस्म उस पर दबा हुआ जब वह और ज़ोर से

निचोड़ रहा था, उसे थोड़ा उठा कर.

उसकी उँगलियाँ गहरी धंसी हुई, मालिकी और सख्त, गांड उसके हाथों के नीचे डाब

रही थी, कर्व्स उसकी हाथों में बिलकुल फिट. यह कच्चा, बिना फ़िल्टर का इश्क़ था—

उसकी ताक़त साफ़ दिखती थी कैसे वह चुम्बन को कण्ट्रोल कर रहा था, अम्मी की धीमी

कराहें उसके मुँह में डाब रही थी.

यह नज़ारा मुझे बांध लिया, ड्रेस थोड़ा ऊपर चढ़ा, और टांगें दिखाई, उसके

हाथ बिना rok-tok के घूम रहे थे. दोनों के जिस्म एक साथ हिल रहे थे, उनके

बीच गर्मी बढ़ रही थी, बहार की दुनिया से be-khabar.

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CHAPTER 32

ये नया मज़बूत आदमी कौन है जो मेरी माँ में इंटरेस्ट

दिखा रहा है?

जब वह दोनों कमरे में हलकी रौशनी में चुम्बन कर रहे थे, जिस्म एक दुसरे से चिपके हुए

जल्दी और हराम गर्मी में उलझे हुए थे, गजेंद्र का फ़ोन उसके फेंके हुए पंत की जेब से ज़ोर

से बज उठा. तेज़ आवाज़ हवा में काट कर आयी जैसे कोई naa-khwahish मेहमान, वाइब्रेशन ज़ोर

से चल रही थी.

अम्मी ने पीछे नहीं हटी; बल्कि चुम्बन और गहरा कर दिया, हाथ उसके कन्धों पर जकड कर

जैसे उसे वहां hi रोकना चाहती हो, होंठ भूखे हुए उसके होंठों पर हिल रहे थे, सांस

धीमी और ज़रूरत भरी.

वह रुकावट को नज़रअंदाज़ करने पर टुल्ली थी, जिस्म और पास झुक कर, एक टांग उसकी राण पर

लपेट कर चुपके से कह रही थी जारी रखो. गजेंद्र ने नाराज़गी से करहा और मजबूरी से

चुम्बन तोडा, नीचे हाथ दाल कर फ़ोन निकाला जबकि एक हाथ उसकी कमर पर था.

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उसने स्क्रीन देखा, चेहरा जोश से बदल कर चिड़चिड़ा हो गया. “यह मेरा एसोसिएट hai—kaam का

इमरजेंसी,” वह बुदबुदाया, स्वाइप कर के उठाया. “हाँ, क्या है?” आवाज़ तेज़ और प्रोफेशनल

हो गयी जब वह सुन रहा था, कुछ कदम दूर चल कर अम्मी से अलग, जो वहां कड़ी उसे देख

रही थी ख्वाहिश और बेचैनी के मिलाप से.

उसने बाहों को सीने पर बाँध लिया, होंठ अभी भी चुम्बन से सूजे हुए, आँखें उसके

जिस्म की लकीरों पर फिरती हुई जब वह तेज़ आवाज़ में किसी अर्जेंट डील के बारे में बात कर

रहा था जो इंतज़ार नहीं कर सकती. “ठीक है, मैं बीस मिनट में पहुँचता हूँ.

डाक्यूमेंट्स तैयार रखना.” उसने सिघ कर के फ़ोन बंद किया, पलट कर उसकी तरफ आया.

“मुझे माफ़ करना, शाहिदा,” उसने कहा, उसे फिर से पास खींच कर छोटी सी माफ़ी भरी

चुम्बन दी. “काम बुलावा रहा है. एक बड़ा क्लाइंट अनएक्सपेक्टेड मीटिंग के liye—ruk नहीं सकता.

जल्दी hi सब ठीक करूँगा, वादा.” उसके हाथ उसकी कमर पर रुके, धीरे से निचोड़ा जैसे

छुआने की याद छोड़ना चाहता हो.

अम्मी ने थोड़ा मुँह फुला लिया, उँगलियाँ उसके सीने पर फेरती हुई. “इतनी जल्दी? हम तो अभी शुरू

हुए थे.” लेकिन उसने सर हिला दिया, उसकी दुनिया की मजबूरियां समझते हुए, चाहे दिल दुखी हो.

गजेंद्र ने जल्दी कपडे पहने, शर्ट और पंत में दाखिल हुए, आखरी चुम्बन माथा पर दे

कर दरवाज़े की तरफ चला.

“मेरे लिए खूबसूरत बने रहना,” वह फिसफिसाया, फिर चला गया, दरवाज़ा क्लिक से बंद हुआ,

कमरा अचानक ठंडा और खली सा लग रहा था.

अम्मी थोड़ी देर वहां कड़ी रही, बंद दरवाज़े को देखती हुई, कंधे झुक गए जब हक़ीक़त

समझ आयी. उसने धीमी सांस ली, हाथों से बालों में फेरती हुई जो उनके काम से बिखेरे

हुए थे. चेहरे पर जगा हुआ जोश अब मिट गया, जगह ले ली एक चुप्पी उदासी ने जो आँखों को दूर

दूर कर देती थी और हरकतें धीमी.

वह खिड़की के पास चली गयी, नीचे होटल के स्विमिंग पूल को देखती हुई, पानी दोपहर के

सूरज में चमक रहा था जैसे कोई लालच भरा जन्नत. कुछ मिनट बाद वह कमरे से

निकल कर पुलसीदे गयी, किनारे के पास एक अलग लाउन्ज चेयर चुनी, दूर दूर से दूर दूसरे

मेहमानों से जो पानी में खेल रहे थे.

वह पेट के बल लेट गयी, रोबे थोड़ा खुल गया स्विमसूट के नीचे के कर्व्स दिखा कर, बाहें

सर के नीचे तकिया बनाकर. सूरज ने जिस्म गरम किया, लेकिन चेहरा उदास रहा— भौं सिकुड़ी

हुई, होंठ पतले लाइन में, जैसे बोझ भरे ख्यालों में खोयी हुई.

वह सच में उदास लग रही थी, जैसे ख्वाहिश के बीच छोड़ दी गयी औरत, जिस्म आराम से

लेकिन दिमाग तूफ़ान में. पूल का हल्का लहार और दूर दूर चिड़ियों की आवाज़ ने उसके बदल को

नहीं हटाया; वह कभी कभी हिलती, गहरी सांस लेती, उँगलियाँ चेयर के कपडे पर बेकार

लकीरें खींचती.

जब मैं हॉलवे के अँधेरे में छुपने की जगह से दूर चला, दिल अभी भी तेज़ धड़क रहा

था जो मैंने देखा था, एक आदमी अचानक मेरे सामने आ गया, रास्ता रोक कर. वह गांजा

था, सर चमकता हुआ होटल की रौशनी में, मोती सफ़ेद दादी जो सख्त लेकिन क्यूरियस चेहरे को

घेरे हुए थी.

जिस्म मोटा था, अथॉरिटी का हवा, टैलोरेड सूट में— गहरा नेवी कपडा जो चौड़ी कन्धों

और सीने से चिपका, सफ़ेद शर्ट और हलके सोने के तार वाली सिल्क टाई.

गोल्ड वाच कफ से झलक रहा था, जूते चमड़े के पॉलिशड, जो दौलत और देखभाल

दिखाते थे. वह अमीर लग रहा था, बिलकुल— वह दौलत जो जायदादों से आती है, करोड़

के डील्स, लक्ज़री के गिरदाब में बिना दिखावे के.

यह आदमी सिर्फ अमीर नहीं था; वह चुप्पी ताक़त दिखाता था किसी का जो एम्पिरेस चलता है,

शायद यह होटल उसका है, रियल एस्टेट या बुसिनेस्सेस जो शहरों तक फैली हुई.

मैं सोच सकता था उसको बोर्डरूम में, हाथ मिला कर कॉन्ट्रैक्ट सील करते, फैसले जो सौ

लोगों की ज़िन्दगी बदलते. यह एहसास ज़ोर से लगा: अगर यह जगह उसकी है तो दौलत बोहोत

बड़ी होगी, सालों की चालाकी, रिश्तों के जाल, और शायद थोड़ी be-rahmi से बानी. मैं हैरान

हो गया, मुँह सूख गया जब उसको देखा, सोच रहा कितना जानता है यह अपने होटल के

मेहमानों के बारे में.

मैं (ज़ैद): (पूल एरिया में इधर उधर देखते, पहले उस आदमी को नोटिस नहीं किया) यह,

hello? क्या मैं आपको जानता हूँ?

मर. विजय: (गरम मुस्कराहट, हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया, कासुअल होटल पोलो शर्ट में)

नहीं बीटा, तुम नहीं जानते. लेकिन मैं खुद को इंट्रोडस कर लून. मैं विजय शर्मा

हूँ, इस शानदार होटल का मालिक. कभी कभी मेहमानों से खुद मिलना पसंद है—

स्टे को ख़ास बना देता है. और तुम?

मैं: (हलके से हाथ मिलते) ओह, अच्छा. मैं ज़ैद हूँ. आप से मिल कर ख़ुशी हुई, मर.

विजय.

मर. विजय: ज़ैद? मज़बूत नाम. तो बताओ, क्या लाया तुम्हे हमारे इस छोटे जन्नत में?

फॅमिली के साथ छुट्टी? काम? या शहर की bhaag-daud से बचने?

मैं: हाँ, ज़्यादातर छुट्टी. मुझे और अम्मी को ब्रेक चाहिए था. यहाँ का पूल बहुत

अच्छा है— बोहोत आराम देता है.

मर. विजय: सुन कर अच्छा लगा! हमने बोहोत म्हणत की है इसको बेस्ट बनाने में. इटली से

टाइल्स आये, इंफिनिटी एज गार्डन की तरफ. तुम ज़्यादा तैरते हो? या चेयर पर लेटने वाले?

मैं: थोड़ा दोनों. पहले तेरा, अब आराम कर रहा. आपने यह जगह कब से संभाली? बोहोत

शानदार लगती है.

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मर. विजय: लगभग दस साल हो गए. छोटे बुटीक से शुरू किया, अब यह खूबसूरत बना दिया.

बिजी रखता है, लेकिन प्यार है. तुम जैसे इंटरेस्टिंग लोगों से मिलना फायदा है. बताओ ज़ैद,

वहां पुलसीदे चेयर पर पेट के बल सोई हुई वह खूबसूरत औरत कौन है तुरकोईसे ड्रेस

में? बोहोत सुकून से लग रही है.

मैं: (देखा, नोटिस किया वह उसकी बड़ी गांड को घूर रहा है जो पोजीशन से और उभर रही

थी) यह... हाँ, वह मेरी अम्मी है. क्यों?

मर. विजय: (आँखें एक सेकंड ज़्यादा रुकी फिर वापस) तुम्हारी अम्मी? सच में? तीस के ऊपर

नहीं लगती. आपके फॅमिली के अच्छे गेन्स होंगे. वह भी एन्जॉय कर रही है स्टे?

मैं: हाँ. वह थोड़ी देर से वहां सो रही है— कहा सूरज अच्छा लग रहा है.

मर. विजय: समझ सकता हूँ. वह ड्रेस उस पर बिलकुल फिट है— पूल टाइल्स के साथ तुरकोईसे,

जैसे ज़मीन पर पारी. लेकिन रुक, यह सच में तुम्हारी अम्मी है? तुम दोनों उम्र में इतना

फ़र्क़ नहीं लगता.

मैं: (ावक्वार्ड हसी) हाँ, बिलकुल मेरी अम्मी. शाहिदा. मैं 18 का हूँ, वह... उससे ज़्यादा

उम्र की. ऐसा लोग कहते रहते हैं.

मर. विजय: शाहिदा— खूबसूरत नाम. और तुम ज़ैद... '. लगता है? तुम लोग _ हो?

मैं: हाँ. काफी ट्रेडिशनल फॅमिली से, लेकिन हम कूल हैं.

मर. विजय: अच्छा. वह बिलकुल सुन्दर है, ज़ैद. सो रही हो तब भी चमक रही है. उम्मीद है

कह सकता हूँ— क्या तुम्हारे मज़हब में ऐसे तारीफ अल्लोवेद है, या रुक जॉन?

मैं: नहीं, ठीक है. तारीफ तो चलती है. वह आदि है शायद.

मर. विजय: अच्छा जाना. मेरे कल्चर में ख़ूबसूरती को खुले दिल से क़दर करते हैं— यह

खुदा की दें है. तुम्हारी अम्मी में वह be-misaal लावणी है. क्या उसने हमारा स्पा तरय

किया? आयल मस्सगे जो उसको रानी जैसा महसूस करवाए.

मैं: अभी नहीं, लेकिन शायद. हम सिर्फ दो दिन से हैं.

मर. विजय: उसे मनाओ. अब बताओ— इसमें तुम्हारे अब्बू कहाँ हैं? बाद में आ रहे हैं,

या...?

मैं: वह मुंबई में हैं. काम की वजह से नहीं आ सके. इस बार सिर्फ मैं और अम्मी.

मर. विजय: मुंबई, हाँ? बिजी शहर. अफ़सोस उन्होंने नहीं आये— फॅमिली टाइम ज़रूरी है.

लेकिन तुम दोनों के लिए ज़्यादा बॉन्डिंग. वह तुम दोनों के बिना कैसे हैं?

मैं: ठीक हैं, रोज़ कॉल करते हैं चेक करने.

मर. विजय: अच्छा आदमी लगते हैं. लेकिन सच कहु ज़ैद, तुम्हारी अम्मी... उसमे एक अलग

और है. वह कैसी है? काम करती है, या घर सँभालने वाली?

मैं: ज़्यादातर घर संभालती है, लेकिन एक्टिव है— कभी मस्जिद में वालंटियर करती है,

खाना बनाना पसंद. इतने सवाल क्यों?

मर. विजय: (मुस्कुराते) रोक नहीं पाटा— दिलचस्पी हो गयी. एक सुन्दर _ औरत अपने

बेटे के साथ... यह दिलकश है. वह सिंगल है? रुक, तुमने अब्बू का ज़िक्र किया—

shadi-shuda, हाँ?

मैं: हाँ, shadi-shuda. लेकिन वह कूल है, अपने तरीके से आज़ाद.

मर. विजय: आज़ाद औरतें सबसे अच्छी. बेट उसके पास कहानियां होंगी. वह तैरती भी है या

सिर्फ लेती है?

मैं: थोड़ा तैरती है, लेकिन रिलैक्स पसंद. पुलसीदे किताब पढ़ना.

मर. विजय: पढ़ने वाली? स्मार्ट और सुन्दर— जैकपोट. जानते हो, मालिक होने के नाते मैं

प्राइवेट डिनर अर्रंगे कर सकता हूँ अगर उसको होटल की हिस्ट्री में दिलचस्पी हो.

मैं: यह, शायद. लेकिन वह चिल है.

वह थोड़ा झुका, सफ़ेद दादी हिलती हुई मुस्कराहट के साथ. “वह काफी ख़ास औरत लगती

है. और बताओ उसके बारे में— क्या करती है? छुट्टी पर है या काम? उसकी मौजूदगी

इतनी शानदार है; ऑफिस की खिड़की से पूल देख कर नोटिस कर लिया.”

उसके सवाल एक के बाद एक आये, धीरे लेकिन ज़िद से: हम कितने दिन से हैं? होटल की

चीज़ें पसंद आयी? नाम क्या? पसंदीदा शौक़? साफ़ था उसको उसमे दिलचस्पी थी,

आँखें चमकी जब मैंने शाहिदा का नाम लिया और फॅमिली के प्रति वफादारी बताई.

उसने उम्र पूछी, बैकग्राउंड, shaadi-shuda है या नहीं— फॅमिली के बारे में क्यूरोसिटी

के नाम पर— लेकिन डिटेल्स पर रुकना, तारीफ इंदिरेक्ट्ली, गहरी दिलचस्पी दिखा रहा था.

“ऐसी औरत जहाँ भी जाए सर घुमा देती होगी,” उसने कहा, आवाज़ में क़दर. “मज़बूत,

लावणी— ऐसी शान काम hi दिखती है.” यह सवालों की बौछार ने मुझे बेचैन किया,

फिर भी उसकी हिम्मत ने इंटरिगुए किया.

मैं वहां खड़ा था, नहीं जानता रोकना चाहिए— बीच में बोलूं, बहाना बनाऊं,

अम्मी को दूर करूँ— या उसे पास जाने दूँ. एक तरफ वह अजनबी था, हमारे मज़हब

में बहार वालों से होशियारी सिखाई जाती है, ख़ास कर shaadi-shuda औरतों में

दिलचस्पी दिखने वालों से. दूसरी तरफ, एक बड़ी क्यूरोसिटी उभर रही थी.

मेरे ख्याल तूफ़ान में थे. जब से गजेंद्र बिज़नेस ट्रिप पर चला गया, अम्मी को

अधूरा छोड़ कर, शायद उसे किसी और मर्द से चुदाई की ज़रूरत है.

यह ख्याल मेरे दिमाग में घुस गया जैसे ज़िद भरी फिसफिसाहट, हर सेकंड ज़ोर से.

गजेंद्र ने उसमे कुछ जाएगा दिया, मेरी दीनदार अम्मी को ख्वाहिशों से भरी औरत

बना दिया, जिस्म को वह सख्त, ग़ालिब छुवन चाहिए जो वह देता था. उसके बिना वह

पुलसीदे इतनी उदास लग रही थी, कर्व्स दिखा रही जैसे तवज्जोह मांग रही हो.

शायद मर. विजय, अपनी दौलत और हुकूमत भरी शख्सियत से, वह खली जगह भर दे—

उसे ज़ोर ज़ोर से ठोके, कराहें होटल में गूँजाये. ख्याल उभर रहे थे: उसको उसके डेस्क

पर झुकाया, हाथ बड़ी गांड पर, छूट या गांड में गहरा धक्के, चीखें हवा में.

यह बीमार था, गलत, मेरा दिमाग ज़हरीला हो गया जो मैंने देखा— लेकिन जो उत्साह

जगाया वह इंकार नहीं कर सकता. क्यों यह ख्याल पकड़ रहे? क्योंकि मैंने उसको बदलते

देखा, बार बार लस्ट में सर रेंडर करते.

एक हिस्सा चाहता था उसे और toot'te देखना, किसी और मर्द को उस पर क़ब्ज़ा करते देखना,

गुनाहों की ज़ंजीर में एक और कड़ी. यह हमला रुकने वाला नहीं था, दिल तेज़ धड़क

रहा फंतासी से, गुनाह और एक्ससिटेमेंट का ज़हरीला मिलाप.

फिर उसने पुछा क्या वह मेरी अम्मी से बात कर सकता है, मैंने कहा हाँ जा सकते हो.

मैं नज़दीक की दीवार के पीछे छुप गया, कोने से झाँक कर सुनने लगा जब मर. विजय

पुलसीदे अम्मी के पास गया. वह लाउन्ज चेयर से सर उठाया, सूरज से आँखें बचती,

रोबे थोड़ा खुल कर स्विमसूट के जिस्म को और दिखा रहा था.

अम्मी: (पुलसीदे चेयर पर छोटी ड्रेस में लेती, पानी को उदास देख रही, गजेंद्र की

याद में जो बिज़नेस ट्रिप पर चला गया, सनग्लासेस एडजस्ट करती)

मर. विजय: (चुपके पास आते, सफ़ेद शर्ट और पंत में, गरम मुस्कराहट) माफ़ कीजिये

मेमसाब. नमस्ते. उम्मीद है आपकी आराम में रुकावट नहीं दाल रहा.

अम्मी: (सर उठा कर, हैरान, उसे पहचान नहीं, हलकी मुस्कराहट) ओह, नमस्ते. नहीं,

बिलकुल नहीं. मैं बस... सोच रही थी.

मर. विजय: (आँखें थोड़ी देर उसके भरे जिस्म पर, ख़ास कर बड़ी गांड पर जब वह

थोड़ा हिलती है चेयर पर) आप ख्यालों में खोयी हुई लग रही हैं. सब ठीक? मैं

विजय हूँ— विजय शर्मा. यह होटल मेरा है.

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अम्मी: (आँखें फैली हैरानी से, थोड़ा सीधा बैठी, समझ गयी यह बोहोत अमीर है)

ओह! मर. शर्मा? मालिक? मुझे पता नहीं था. मैं शाहिदा हूँ. आप से मिल कर ख़ुशी

हुई.

मर. विजय: (सर हिला कर, आँखें एक पल उसके बूब्स पर रुक कर फिर आँखों से मिलायी)

ख़ुशी मुझे है, शाहिदा. खूबसूरत नाम. बैठ सकता हूँ? (पास वाली चेयर की तरफ

इशारा)

अम्मी: (रुक कर फिर सर हिलाया) हाँ, बैठिये. मुझे लगा यहाँ कोई और नहीं— मेरा...

दोस्त ने पूल सिर्फ हमारे लिए बुक किया था. मैं, वह और मेरा बीटा ज़ैद.

मर. विजय: (बैठ कर, टांगें कसुआलय क्रॉस) हाँ, उस अरेंजमेंट के बारे में सुना.

लेकिन मालिक होने के नाते विप मेहमानों का खुद चेक करना पसंद है. सब परफेक्ट

हो.

अम्मी: (छोटी ड्रेस एडजस्ट करती जो रानों तक चढ़ी हुई, नीचे खींचने की कोशिश

लेकिन ज़्यादा कवर नहीं, शर्म से टांगें क्रॉस) विप? यह तो तारीफ है. यह होटल सच

में शानदार है, बोहोत लुक्सुरिओउस.

मर. विजय: (जब वह एडजस्ट करती है बूब्स पर नज़र, फिर मुस्कुराते) शुक्रिया. हमने

बोहोत म्हणत की है इसको जन्नत बनाने में. और बात करते हुए... तुम्हारा बीटा ज़ैद

लॉबी में था तब उसने तुम्हारा ज़िक्र किया. कहा तुम बोहोत अच्छी तैराक हो. तुम्हारी

तारीफ करता है.

अम्मी: (थोड़ी लाली, एक हाथ से सीना कसुआलय कवर) ज़ैद ने कहा? वह बोहोत प्यारा लड़का

है. हम पूल एन्जॉय कर रहे थे, लेकिन... मेरा दोस्त अचानक बिज़नेस के लिए चला गया.

अब थोड़ा अकेलापन लग रहा है.

मर. विजय: (थोड़ा झुक कर, हलकी फ़्लर्ट आवाज़ में) अकेलापन? ऐसे जगह में? अफ़सोस. आप

जैसी सुन्दर औरत को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए. और बताइये अपने बारे में,

शाहिदा— पूल के अलावा क्या लाया यहाँ?

अम्मी: (हलके से मुस्कुराती, ज़्यादा कम्फर्टेबले) ओह, बस छोटी सी गेटअवे. शहर से हूँ,

shadi-shuda, फॅमिली लाइफ... लेकिन उनविंड करना अच्छा लगता है. आप? ऐसा होटल चलना

कितना एक्ससिटिंग होगा.

मर. विजय: (हँसते) अपने फायदे हैं. आप जैसे इंटरेस्टिंग लोगों से मिलना एक है. और

नज़ारे... (आँखें थोड़ी देर रानों पर) ...हमेशा दिलचस्प.

अम्मी: (उसकी नज़र नोटिस कर, ड्रेस फिर एडजस्ट, शर्म से लेकिन कुछ न कह कर) ुम,

हाँ, पूल का नज़ारा ज़बरदस्त है. तो आपने यह जगह कब से संभाली?

मर. विजय: (चेहरे पर फोकस) लगभग दस साल. शुरू से बनाया. यह मेरा फख्र है.

लेकिन मेरे बारे में काफी— ज़ैद ने कहा तुम बोहोत अडवेंचरउस हो. हमारा स्पा तरय

किया?

अम्मी: (हलके से हसी) अडवेंचरउस? ज़ैद ज़्यादा बोल देता है. नहीं, अभी स्पा नहीं तरय किया.

शायद कल.

मर. विजय: (सर हिला) करना चाहिए. World-class है. बताइये शाहिदा, सोचा था... आप और

ज़ैद आज रात मेरे प्राइवेट सेक्शन में डिनर ज्वाइन करोगे? ज़्यादा एक्सक्लूसिव, शेफ का

स्पेशल मेनू. कोई भीड़ नहीं.

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माँ: (सर थोड़ा टेढ़ा करके, जांचती हुई लेकिन सावधान) डिनर? हम क्यों? हम नहीं

चाहते किसी पर बोझ बनें.

मर. विजय: (मुस्कुराते हुए तसल्ली से) बिलकुल बोझ नहीं. ज़ैद बहुत तेज़ लड़का लगता है, और

मैं आपके घर के बारे में और सुन्ना चाहता हूँ. वैसे भी, आपके दोस्त जल्दी चला

गया उसका मुक़ाबला करने का तरीक़ा है यह. पैराडाइस में थोड़ी सी साथ.

माँ: (अदब से सर हिलाती) बहुत मेहेरबानी, मर. शर्मा, लेकिन हम रूम सर्विस hi आर्डर

कर लेंगे. दिन बहुत लम्बा था.

मर. विजय: (नरम अंदाज़ में ज़िद करते हुए, आगे झुक कर) अरे शाहिदा, एक डिनर से

क्या फ़र्क़ पड़ेगा. मेरे सुईठे का नज़ारा यहाँ से भी बेहतर है. और खाना... लाजवाब.

ज़ैद के लिए bhi—usko होटल की तारिख की कहानियां सुनाने में मज़ा आएगा.

माँ: (सोचती हुई, अदब से मुस्कुराती) शुक्रिया, सच में. लेकिन हम chhupa-chhupi रहना

चाहते हैं. शायद किसी और वक़्त?

मर. विजय: (थोड़ा और ज़िद) किसी और वक़्त शायद देर हो jaye—main आज रात स्पेशल मेनू

रख रहा हूँ. ताज़ा समुंदरी खाना, इंटरनेशनल विन्स. दोनों के लिए ट्रीट होगा.

होटल की mehmaan-nawaazi का बेहतरीन अंदाज़ समझो.

माँ: (थोड़ा बेचैन होते हुए, फिर भी अदब से) बहुत ाचा लग रहा है, लेकिन आपकी शाम

बर्बाद नहीं करना चाहती. ज़ैद और मैं सिंपल चीज़ से खुश हैं.

मर. विजय: (मुस्कुराते हुए ज़िद जारी) बकवास. ऐसी शामें अच्छे साथ के लिए होती हैं.

Suno—main शेफ से ज़ैद के लिए भी बच्चों वाला खाना बनवा दूंगा. कोई मजबूरी नहीं,

सिर्फ ाचा खाना.

माँ: (धीमी सांस ले कर, आधी मंज़ूरी से) ठीक है... शायद. लेकिन सिर्फ थोड़ी देर.

ज़्यादा नहीं रुकेंगे.

वह बहुत देर बात करते रहे, उसकी बातों ने उसे खोल दिया. पहले मौसम की तारीफ, फिर

उनके स्टे के बारे में पुछा, होटल की तारिख की कहानियां sunayi—kaise छोटी सी

प्रॉपर्टी से बड़ा बिज़नेस बनाया, कौन कौन सेलिब्रिटी रुके, रेनोवशन्स खुद देखे.

अम्मी धीरे धीरे खुल गयी, अब्बू की बिमारी का ज़िक्र किया बिना तफ्सील के, यह ट्रिप ब्रेक

के लिए था. विजय गौर से सुनता रहा, उसकी सफ़ेद दादी हिलती रही, मोटा जिस्म आगे झुका जैसे

हर लफ्ज़ सोना हो. "आप इतनी शान्ति से चलती हैं," उसने एक बार कहा. "आज की daud-bhaag

में यह ताज़ा है."

बातें चलती rahi—pasandida खाने, सफर के ख्वाब, ज़िन्दगी के हैरतअंगेज़ मोड़ पर

हलकी फलसफा. उसने do-teen बार हसाया, धीमी हसी जो उसकी उदासी को थोड़ा दूर कर

देती थी.

फिर धीमे से मुस्कुराते हुए उसने अम्मी का हाथ पकड़ा. "मुझे अपना ऑफिस नीचे

दिखाने do—garden का खूबसूरत नज़ारा है, और ताज़ा चाय बन रही है. कोई दबाव

नहीं, सिर्फ झटका सा टूर."

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माँ: (उसके हाथ से थोड़ा उठ कर, ड्रेस ठीक करती) रास्ता दिखाओ.

(वह होटल के एंट्रेंस की तरफ चल पड़े, मर. विजय ने हाथ थोड़ा ज़्यादा देर तक पकडे

रखा जैसे ज़रूरी हो)

मर. विजय: (रास्ता दिखते, हाथ अभी भी हलके से पकडे) Idhar—yahan से रास्ता. ऑफिस

प्राइवेसी के लिए छुपा हुआ है, लेकिन सब कुछ है.

माँ: (थोड़ा ावक्वार्ड महसूस करते हुए लेकिन तुरंत हाथ नहीं छुड़ाया) यहाँ कितना

सुकून है. आपको ऐसे खूबसूरत जगह में काम करने में मज़ा आता होगा.

मर. विजय: (हाथ हलके से दबाते हुए) हाँ. और आप जैसे मेहमानों के साथ बांटने

से और मज़ा आता है. क़दम sambhalo—yahan छोटी सी सीढ़ी है.

माँ: (उनके हाथों की तरफ देखती, दरवाज़े पर पहुँच कर अदब से हाथ छुड़ाती)

शुक्रिया. अभी से hi बहुत इम्प्रेससिवे लग रहा है.

मर. विजय: (दरवाज़ा खोल कर) आइये. अंदर dekho—yeh मेरा छोटा सा कण्ट्रोल रूम है.

माँ: (अंदर कदम रख कर, इधर उधर देखती) वह, कितना खुला है. और वह गार्डन

का नज़ारा... लाजवाब.

मर. विजय: (अंदर आते हुए, दरवाज़ा धीमे से बंद) ख़ुशी हुई पसंद आया. यहाँ और

बात कर सकते हैं अगर चाहें, धुप से दूर.

माँ: (मुस्कुराती) सिर्फ झटका देखना था. जल्दी ज़ैद के पास वापस जाना है.

मर. विजय: (सर हिलाते) बिलकुल. जाने से पहले, यह मेरा डायरेक्ट नंबर. (जेब से छोटा

नोट निकाल कर नंबर लिख कर देता) बाद में डिनर के डिटेल्स कन्फर्म करने के लिए

मैसेज कर देना.

माँ: (नोट ले कर देखती लेकिन पूरा वादा नहीं करती) शुक्रिया. याद रखूंगी.

मर. विजय: (फिर हाथ ले कर पीछे से जेंटलमैन की तरह चुम्बन) आज रात मिलते हैं,

शाहिदा. बाक़ी दिन मज़ा करो.

(आखरी बार मुस्कुराता, उसके जिस्म पर नज़र डालते हुए दरवाज़ा खोलता)

माँ: (लाल होते हुए, धीरे हाथ छुड़ाती) खुदा हाफिज, मर. शर्मा. मिल कर ाचा लगा.

मुझे पता था वह ऐसा क्यों बेहवे कर रही थी: विजय बिलकुल अजनबी था, कहीं से भी

आया, अब्बू से बिलकुल अलग जिनसे वह गहरा प्यार करती थी चाहे धोके देती हो, या

गजेंद्र से जिसकी मदद ने उसे जोश में दाल दिया. विजय के साथ कोई तारिख नहीं,

कोई मजबूरी nahi—sirf एक ताक़तवर मर्द की खुली ख्वाहिश.

वह सिर्फ अब्बू और गजेंद्र से अपने टेढ़े तरीके से प्यार करती थी, दिल वफ़ा और लस्ट

के बीच फटा हुआ. लेकिन यह नया आदमी? यह उस बैलेंस को बिगाड़ रहा था, बिना किसी

बंधन के नया लालच दे रहा, इसलिए वर्य लेकिन दिलचस्पी. यह झिझक ईमान के

बचे हुए टुकड़ों से thi—zina पहले से गुनाह था, लेकिन एक और बहार वाले के साथ?

यह सब कुछ खतरे में दाल देता.

फिर भी उसकी मंज़ूरी अंदर की छिनाल को दिखा रही थी, हमेशा और ज़्यादा की भूखी.

बाद में मैं पूल के पास उसके पास गया, वह वापस कुर्सी पर बैठ गयी थी, नोट

छुपा कर. "हे, अम्मी," मैं कसुआलय बोलै, पास बैठ कर.

उसने ऊपर देखा, उदास आँखें थोड़ी रोशन. "बीटा, आ गए तुम. क्या तुम मर. विजय

से मिले? होटल ओनर?"

मैं हैरानी का नाटक किया. "हाँ, हॉलवे में मिला था. ाचा आदमी लगा. क्यों?"

उसने बताया, आवाज़ naapa-tola. "उसने मुझसे पहले पहचान करवाई. बहुत देर बात

ki—office भी दिखाया, बहुत शानदार. और... हम दोनों को आज रात डिनर पर इन्विते

किया उसकी प्राइवेट जगह पर. तुम और मैं."

मैं सर हिला कर जोश का दिखावा किया. "मज़ा आएगा. चलना चाहिए."

उसने होंठ काट कर इधर उधर देखा. "पक्का? बहुत अचानक है. और... सिर्फ डिनर

है, लेकिन किसी और मर्द के साथ? गलत लग रहा है, बीटा. अब्बू को पता चला तो पसंद

नहीं आएगा."

"अरे अम्मी, ठीक है. सिर्फ dinner—muft खाना, ाचा साथ. ट्रिप पर हैं, मज़ा कर लें.

मर. विजय हार्मलेस लगता है, mehmaan-nawaazi क़ुबूल करना अदब है."

मेरे दिमाग में वह पवित्र बनने का नाटक कर रही थी, अख़लाक़ को ढाल की तरह पकडे,

लेकिन मुझे पता था गजेंद्र के साथ उसकी छिनाल harkatein—uske नीचे कराहना,

और माँगना, जिस्म हर तरह से झुकना.

वह मुनाफ़िक़ थी, दीनदार दिखावा करती जब उसके छेद बार बार इस्तेमाल होते थे. मेरे

सामने जो chehra—modest अम्मी, वफादार biwi—hansne लायक था; मैंने उसके नंगे स

अच् देखे थे, छूट और गांड फैली हुई, ईमान पुराने कपड़ों की तरह फेंका हुआ.

मुनाफ़िक़ात गहरी थी: ,,., छूती, कसमें टूटी, फिर भी पाक बनने का दिखावा.

यह उसकी बर्बादी पर मेरा टेढ़ा फख्र बढ़ाता था.

बात जारी रही. "वैसे गजेंद्र कहाँ है? सोचा वह तुम्हारे साथ था."

उसने सांस ली, उदासी वापस. "एक घंटा पहले चला गया. कॉल aaya—business इमरजेंसी,

इग्नोर नहीं कर सका."

मैं अनजाने का नाटक. "बिज़नेस? कैसा?"

"किसी क्लाइंट का, अर्जेंट मीटिंग. तुरंत जाना पड़ा." उसकी आवाज़ रुक गयी, आँखें नीचे.

मुझे पता था वह इसलिए उदास थी क्योंकि गजेंद्र चला गया; अब कोई उसकी छूट और गांड

ज़ोर से नहीं मारेगा, ख्वाहिश अधूरी रह जाएगी.

वह मर्द जो उस पर हुकूमत करता था चला गया, जिस्म उसके ज़बरदस्त क़ब्ज़े की प्यासा.

यह उसकी उदासी की वजह thi—gunah की आदि, बिना उसके खली महसूस करती थी.

"क्यों इतनी उदास लग रही हो, अम्मी?" मैं नरम से पुछा.

उसने मजबूरी से मुस्कराहट दी. "उदास? नहीं बीटा, ठीक हूँ. बस... धुप से थक गयी.

और अब्बू की याद आ रही है, बस इतना."

सच में, अम्मी अब रंडी बन चुकी थी, किसी से भी छोड़ने के क़ाबिल. उसकी chhinal-pan ने

हमारे मज़हब के सारे क़द्रों को ख़तम कर diya—paanch वक़्त ,,., नहीं, हौली बुक

की तिलावत नहीं, सिर्फ ख़ुशी की तलाश.

अंदर से साद गयी थी, पैसों या तवज्जोह के लिए आसानी से बहक जाती, रूह बार बार

गुनाहों से मैली. जो दीनदार औरत थी अब लस्ट की चीज़ बन गयी, इबादत को झड़वायों

से बदल दिया, जिस्म तिजारत. यह उसे कमज़ोर बनती थी, हर मर्द के लिए खुली जो

दिलचस्पी दिखाए, उसके उसूल शीशे की तरह टूट गए.

उस रात अम्मी ने सुनेहरा भूरा ड्रेस पहना ब्लैक लाइन्स के साथ जो कर्व्स को उभार रहा

था, कपडा दूसरी खाल की तरह चिपका, low-cut से क्लीवेज दीखता, हेम छोटी से तैसे

करती. वह पोर्नस्टार लग रही thi—makeup बोल्ड, बाल लहरों में, हील्स सेडक्टिव आवाज़

करते. मुझे अपनी रंडी अम्मी पर फख्र था, उसकी यह तब्दीली गन्दी मज़ा देती थी.

मैंने हल्का नीला सूट पहना, बहुत ाचा लग रहा था, तब अम्मी मेकअप लगा रही थी

मिरर के सामने कड़ी होकर.

माँ: ज़ैद, बीटा, इधर आओ. यह मर. विजय शर्मा के बारे में क्या सोचते हो? उसने आज

रात डिनर पर इन्विते किया अपने प्राइवेट सेक्शन में. तुम लॉबी में उससे मिले थे न पहले?

में: (पीछे खड़ा ब्लू सूट में, टाई ठीक करते, थोड़ा ज़्यादा आसानी से मुस्कुराते) हाँ,

थोड़ी देर बात की थी. बहुत ाचा आदमी लगता है, अम्मी. अदबदार, कामयाब, पूरा होटल

उसका. कॉन्फिडेंस दीखता है, अच्छे कपडे. सच्चा लगता है.

माँ: (लिपस्टिक हाथ में रुक कर, मेरी परछाई देखती) सच्चा... हम्म. पूल के पास भी

बात हुई थी. ाचा था, लेकिन... पता नहीं. डिनर के दौरान वादा करो मुझसे दूर नहीं

जाओगे, ठीक? एक मिनट भी उसके साथ अकेली नहीं रहना चाहती.

में: (हलके से हँसते, पास आते) अम्मी, रिलैक्स करो. इतना फ़िक्र क्यों? सिर्फ डिनर है. आम बात.

लोग रोज़ साथ कहते हैं.

माँ: (कुर्सी घुमा कर सामने करती, आवाज़ गहरी) आम? बीटा, ., में आम नहीं होता

की औरत शौहर के बग़ैर किसी मर्द के साथ प्राइवेट खाना खाये. अब्बू घर पर

बीमार हैं, और मैं... किसी और के प्राइवेट सुईठे में जा रही हूँ. पहले से hi बेचैन हूँ.

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में: (कंधे उछालते, शांत और तसल्ली भरी आवाज़) सिर्फ एक डिनर, अम्मी. कुछ नहीं

होगा. वह ओनर hai—shayad बोहोत मेहमानों के लिए करता है. ज़्यादा सोच रही हो.

वैसे भी मैं पूरा वक़्त साथ रहूँगा.

माँ: (सांस ले कर, मिरर की तरफ पलट कर गाल पर थोड़ा ब्लश लगाती) शायद तुम सही

हो. बस... फितना नहीं चाहती. क्या तुमने उसमे आज कुछ अजीब देखा? नज़रों का अंदाज़

या बात करने का?

में: (उसे गौर से देखते) अजीब? कैसा?

माँ: (मुँह खोलती, रूकती, फिर सर झटका कर टॉपिक बदलती) कुछ नहीं, भूल जाओ. बस...

ख्याल था. वैसे, मैं कैसी लग रही हूँ? वैल सीधा है?

में: (और पास आते, गरम मुस्कराहट) बहुत खूबसूरत, अम्मी. सच में. यह भूरा

वैल आँखों को उभार रहा, और ड्रेस... परफेक्ट. शानदार.

माँ: (शर्मा कर मुस्कुराती, फिर मस्ती से आँखें सिक्योरटी) शुक्रिया, बीटा. लेकिन इतना

क्यों मुस्कुराते हो? और मेकअप भी क्यों लगा रही हूँ? सिर्फ डिनर तो है...

में: (मज़ाक से, वैनिटी के सहारे) अरे, थोड़ा एक्स्ट्रा ग्लो मर. विजय के लिए? क़बूल करो,

आज रात अच्छा दिखना चाहती हो.

माँ: (तुरंत डांटती, आवाज़ तेज़ लेकिन गुस्से में नहीं) ज़ैद! ऐसे बात मत करो. यह

मज़ाक भी हराम है. मैं अपने लिए कर रही हूँ, किसी मर्द के लिए नहीं. तुम्हे पता

होना चाहिए.

में: (हलके से हँसते, हाथ उठा कर) ठीक है, ठीक है, मज़ाक था, अम्मी. माफ़

करो. लेकिन सच में... तुम सच में शानदार लग रही हो. हमेशा की तरह.

माँ: (तुरंत नरम होकर, आँखें गरम. मुझे ज़ोर से गले लगाती, गाल मेरे कंधे

पर) मेरा प्यारा बीटा. मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, ज़ैद. तुम हमेशा मुझे

बेहतर महसूस करवाते हो.

में: (गले लगते हुए, गहरी सांस. उसके ड्रेस पर गजेंद्र की खुशबू की हलकी सी बू—

मुस्की, लकड़ी जैसी, जो उसके कपड़ों पर दिनों तक थी. पेट मोर गया यक़ीन से: वह बिलकुल

छिनाल है, पवित्र दिखावा करते हुए इस सब में डूबी) मैं भी तुमसे प्यार करता

हूँ, अम्मी. सबसे ज़्यादा.

माँ: (थोड़ा पीछे हटी, वैल आखरी बार ठीक करती) चलो, देर न हो जाये. और याद

rakhna—aaj रात मेरे पास रहना, ठीक?

में: (सर हिलाते, मुस्कुराते हुए) वादा. तुम्हारे पास से नहीं हटूंगा.

बाद में मर. विजय ने दरवाज़ा खटखटाया

ज़ैद (मैं): (होटल के कमरे का दरवाज़ा और खोलते हुए) मर. शर्मा! अंदर आइये,

प्लीज. अम्मी, मर. विजय आये हैं.

अम्मी (शाहिदा): (हलके समर ड्रेस में बिस्तर के किनारे बैठी, जल्दी कड़ी होकर

बाल ठीक करती हुई) ओह… मर. शर्मा. सलाम. इतनी जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी.

मर. विजय: (अंदर आते हुए गरम मुस्कराहट के साथ, दरवाज़ा धीरे बंद करता हुआ)

शाम मुबारक, शाहिदा. शाम मुबारक, ज़ैद. उम्मीद है मैं डिस्टर्ब नहीं कर रहा.

बस यह देखने आया की डिनर से पहले आप दोनों आराम से हैं या नहीं.

ज़ैद: कोई डिस्टर्ब नहीं, सर. हम तैयार हो रहे थे.

मर. विजय: (पहले मुझे देखते हुए, आँखें झुक कर) ज़ैद, तू बहुत अच्छा लड़का बन

रहा है— शांत, तेज़. तेरी अम्मी को फख्र होगा. (अम्मी की तरफ मुद कर, आवाज़ नरम)

और शाहिदा… आज रात तुम बहुत चमक रही हो. यह रंग तुम पर बिलकुल जांचता है.

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अम्मी: (एक पल के लिए नज़र नीचे, शर्मीली मुस्कराहट होंठों पर) शुक्रिया… आपने

बहुत मेहेरबानी से कहा.

(वह फिर उसको देखती है— इस बार ज़्यादा देर— फिर जल्दी खिड़की की तरफ नज़र हटा लेती

है. मैं नोटिस करता हूँ उसकी आँखें उसके चौड़ी कन्धों पर, शर्ट के फिट पर

थमी रही, और सोचता हूँ वह अचानक इतनी चुप क्यों हो गयी.)

ज़ैद: (उत्सुक होकर, दोनों के बीच देखते हुए) अम्मी, सब ठीक है?

अम्मी: (तुरंत वापस, ज़ोर से मुस्कुराते हुए) हाँ, हाँ, बिलकुल. बस… हैरान हूँ की

आप इतनी ऊपर तक आये.

मर. विजय: (हलके से हँसते हुए) रोक नहीं सका खुद को. (अम्मी की तरफ थोड़ा झुक कर)

और मैं कह सकता हूँ— आपकी खुशबू बिलकुल जादुई है. क्या है यह? चमेली?

गुलाब?

अम्मी: (और गहरी लाली चेहरे पर, गर्दन पर हाथ रख कर शर्म से) यह… बस

थोड़ा सा ित्तर है. कुछ ख़ास नहीं.

मर. विजय: कुछ ख़ास नहीं? यह तो नशा कर देती है. तुम पर बिलकुल सूट करता है.

ज़ैद: (मुस्कुराते हुए) अम्मी हमेशा अच्छी खुशबू लगाती हैं. कभी कभी सोते

वक़्त भी परफ्यूम लगाती हैं.

अम्मी: (मुझे मज़ाकिया घूरते हुए) ज़ैद! मुझे शर्मिंदा मत करो.

मर. विजय: (हँसते हुए) शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं. यह तो बहुत प्यारा है.

चलते हैं रूफटॉप बालकनी पर? शाम अच्छी है और वहां से नज़ारा और भी

बेहतर. वादा है, डिनर से पहले देखना बनेगा.

अम्मी: (रुक कर, मुझे देखते हुए) मुझे अभी भी डिनर के दावत पर यकीन नहीं

… यह बहुत ज़्यादा लग रहा है.

मर. विजय: (नरम लेकिन मज़बूत आवाज़ में) कोई तकलीफ नहीं. बस अच्छा खाना,

अच्छी बातें. ज़ैद मुझे कॉलेज की सब बातें बता देगा, और आप… जो चाहें वह

बता सकती हैं. कोई दबाव नहीं.

ज़ैद: चलो न अम्मी. मज़ा आएगा. रूफटॉप बहुत कूल लग रहा है.

अम्मी: (धीमी सांस ले कर, फिर सर हिला कर) ठीक है… बस थोड़ी देर के लिए.

(हम हॉलवे में निकलते हैं. मर. विजय प्राइवेट एलीवेटर की तरफ लीड करता है.

अम्मी उसके बगल में चलती है; मैं कुछ कदम पीछे, देखता हुआ.)

मर. विजय: (एलीवेटर ऊपर जाते हुए) यह होटल— मैंने खुद इसका ज़्यादातर हिस्सा डिज़ाइन

किया था. चाहता था जैसे पुराण राजस्थान अंदर आ जाये… मिडिवल मेहराब,

हाथ से बानी नक़्क़ाशी, जाली स्क्रीन्स. हर कोने में एक कहानी है.

अम्मी: (धीमे से) बहुत खूबसूरत है. लॉबी में सर्विंग्स देखि थी— बहुत गहरी

डिटेल.

मर. विजय: (उसको मुस्कुराते हुए) आपकी नज़र बहुत अच्छी है. ज़्यादातर मेहमान नोटिस

नहीं करते. (कसुआलय हाथ बढ़ा कर उसका हाथ पकड़ता है जब रूफटॉप बालकनी

पर कदम रखते हैं) आओ— सबसे अच्छी जगह दिखाता हूँ.

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अम्मी: (हाथ पकड़ने से थोड़ा चौंकती है, लेकिन तुरंत नहीं छुड़ाती; आवाज़

धीमी) यह… बहुत सोच समझ कर बनाया है. पूरा जगह महल जैसा लगता है.

मर. विजय: (अभी भी हाथ हलके से पकडे, रेलिंग तक ले जाते हुए) यही इरादा था. एक

ऐसी जगह जहाँ लोग दुनिया भूल जाएं थोड़ी देर के लिए. (उसकी तरफ देखते हुए)

तुम भी यह डेसेर्वे करती हो, शाहिदा. तुम इतनी शान से चलती हो… लेकिन उसके

पीछे थोड़ी बेचैनी दिखती है.

अम्मी: (उनके हाथों को देखती, फिर समुन्दर की तरफ) बेचैनी? शायद. ज़िन्दगी

कभी कभी… उलझी हुई हो जाती है.

ज़ैद: (पास पहुँच कर, रेलिंग पर झुक कर) ऊपर का नज़ारा पागलपन है. देखो

वह आसमान.

मर. विजय: (अम्मी का हाथ धीरे छोड़ता है, लेकिन पास hi रहता है) देखा? कहा

था वर्थ आईटी है. (अम्मी से) जानते हो, जब मैंने यह रूफटॉप बनाया था, ऐसे hi

रातें सोची थी— अच्छी साथ, सुनहरी रौशनी, कोई जल्दी नहीं.

अम्मी: (छोटी मुस्कराहट) बहुत सुकून है. हमें यहाँ लाने के लिए शुक्रिया.

मर. विजय: (सिर्फ उसके लिए आवाज़ धीमी कर के) ख़ुशी मेरी है. और उम्मीद है तुम

मुझे यह जगह के सबसे अच्छे हिस्से दिखने डौगी… शुरू डिनर से आज रात.

मैं समझ नहीं पाया वह क्या मतलब था जब उसने कहा “…उम्मीद है तुम मुझे

यह जगह के सबसे अच्छे हिस्से दिखने डौगी… शुरू डिनर से आज रात”. क्या उसका

मतलब था की वह अम्मी के साथ कुछ और ज़्यादा करना चाहता है?

हाँ, बिलकुल यही मतलब था. यह लफ्ज़ सिर्फ डिनर तक सीमित नहीं थे— यह एक छुपा

इशारा था. “सबसे अच्छे हिस्से” और “शुरू डिनर से” का मतलब था की वह डिनर को

सिर्फ शुरुआत मानता था, उसके बाद और गहरे, और क़रीबी लम्हों की तरफ जाने की

ख्वाहिश रखता था.

वह अम्मी को धीरे धीरे अपने क़रीब लाना चाहता था—

शायद रोमांटिक या जिस्मानी तौर पर भी— बिना सीधा कह कर. उसने अम्मी की तरफ

अट्रैक्शन दिखाई थी (खुशबू, रंग, ग्रेस की तारीफ), हाथ पकड़ा, पास रहने की

कोशिश की— यह सब इस बात की तरफ इशारा था की वह सिर्फ दोस्ताना डिनर नहीं, बल्कि

कुछ ज़्यादा इंटिमेट चीज़ चाहता था. यह एक तरह का सॉफ्ट सेडक्टिव था, जिसमे वह

अम्मी को कम्फर्टेबले फील करवाते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ना चाहता था.

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CHAPTER 33

जो औरत मुझे अच्छे --- अदब सिखाती थी, वह सबसे बड़ी सस्ती

रंडी और बेशर्म निकली, मैंने यह खोज लिया है.

हम तीनो होटल के टॉप फ्लोर पर एलिगेंट डाइनिंग टेबल के पास बैठ गए, ऊपर से चन्देलिएर

की नरम रौशनी हर चीज़ पर गरम, घरेलु चमक दाल रही थी.

टेबल बहुत सुन्दर सजा था— सफ़ेद चमकती चादर, चमकते सिल्वर के बर्तन, गरम गरम

खाने की पलटें जो हवा में खुशबू भर रही थी— मसालेदार ग्रिल्ड चिकन, केसर

वाला खुशबूदार बासमती चावल, तंदूर से ताज़ा गरम नान, और क्रीमी दाल और सब्ज़ी

की करी के बाउल.

विजय ने सब अर्रंगे किया था, कह रहा था यह उसका ट्रीट है लम्बी दिन के बाद, और अब हम

तीनो— अम्मी, विजय और मैं— कुर्सियों पर बैठ कर आराम से फील कर रहे थे. नीचे

शहर की लाइट्स चमक रही थी बड़े गिलास विंडोज से, लेकिन यहाँ ऊपर सब कुछ अलग

दुनिया जैसा था, बाक़ी सब से जुड़ा.

जब मैं प्लेट में चावल दाल रहा था, मेरा दिमाग इधर उधर भटक रहा था. सोच

रहा था की क्या विजय यह सब— फैंसी होटल, शानदार डिनर, ख्याल रखना— सिर्फ अच्छे से

कर रहा है, जैसे कोई मददगार दोस्त करता है.

या फिर वह अम्मी से कुछ चाहता है? कुछ ज़्यादा? पहले उसने जिस तरह अम्मी को देखा

था, वह छुपी नज़रें, सब पर सवाल उठा रही थी. मैं मुस्कराहट के पीछे ख़यालात

छुपाये रखे, धीरे धीरे चबाते हुए दोनों को देखता रहा.

अम्मी ने चिकन का टुकड़ा मुँह में लिया, आँखें बंद कर के सच्चे मज़ा लेते हुए. “यह

बिलकुल लाजवाब है, विजय. मसाले परफेक्ट— न ज़्यादा तेज़, बिलकुल सही. तुम सच में बेस्ट

जगह चुनते हो. इतने दिनों से ऐसा खाना नहीं खाया.”

विजय गरम मुस्कराहट से झुका, बाउल से और दाल उसके प्लेट में डालते हुए. “खुश हुई

तोह मेरा दिन बन गया, शाहिदा. तुम्हारे शौहर की सेहत के स्ट्रेस के बाद तुम्हारी

मुस्कराहट देख कर कुछ नहीं अच्छा लगता. थोड़ा लक्ज़री डेसेर्वे करती हो. करी के

साथ नान तरय करो— बहुत अच्छा लगता है.”

मैं भी बात में शामिल हुआ, सब कुछ हल्का रखते हुए. “हाँ अम्मी, यह हॉस्पिटल

के कैफेटेरिया के खाने से लाख दर्जा बेहतर है. विजय अंकल, इतना म्हणत करने की ज़रूरत

नहीं थी. सच में, शुक्रिया सब के लिए.”

उसने हाथ हिला कर ताल दिया, आँखें थोड़ी देर अम्मी पर फिर मुझ पर. “कोई म्हणत

नहीं, लड़के. तेरी अम्मी ने बहुत कुछ सहा है. अगर मैं उनकी शाम थोड़ी बेहतर कर

सकूं तोह यह सबसे छोटी बात है. बताओ शाहिदा, आज शौहर की तबियत कैसी है?

कुछ बेहतरी?”

अम्मी ने सर हिलाया, एक और बाईट ले कर मज़ा लेते हुए. “वह स्टेबल है. डॉक्टर कह रहे

हैं नयी दवाइयां काम कर रही हैं. लेकिन थक जाती हूँ. यह डिनर… अच्छा ब्रेक है.

फिर से शुक्रिया.”

खाना कहते हुए बातें आसानी से चलती रही— हॉस्पिटल की रूटीन, विजय के सफरों की हलकी

कहानियां, और अम्मी ने कुछ पुराणी फॅमिली की यादें शेयर की जिनसे थोड़ी हसी भी हुई.

वह सच में मज़े ले रही थी, कंधे ढीले, हसी नरम और सच्ची, पानी के सिप के

बीच. खाना धीरे धीरे ख़तम होता गया, पलटें आसानी से रिफिल होती रही, और एक पल

के लिए सब कुछ नार्मल सा लग रहा था, जैसे तीनो दोस्त मिल कर खाना खा रहे हों.

लेकिन फिर मैंने देखा— विजय की नज़र. जब अम्मी चिकन का टुकड़ा काट रही थी, उसकी

आँखें खुली तौर पर उसके सीने पर थमी रही, ब्लाउज के पतले कपडे के नीचे उसके

ब्रेअस्ट्स की गोलाई को देखते हुए.

यह तेज़ था, लेकिन साफ़, भूखी चमक जो जैसे hi वह ऊपर देखती उसने गायब हो गयी.

अम्मी को कुछ पता नहीं चला; वह बस मुस्कुरायी और चावल के बारे में बात करने

लगी की यह घर के खाने की याद दिला रहा है.

उस एक नज़र ने मेरे ख़यालात को तेज़ कर दिया. क्यों अम्मी ने आज अपने उसुअल --- कपडे

नहीं पहने? घर पर वह हमेशा ठीक से ढकती थी— ढीली आबय, साफ़ पिन किया वैल,

सब कुछ मॉडेस्ट और इज़्ज़त वाला. यहाँ होटल में उसने टाइट ब्राउन ड्रेस पहनी थी जो

उसके जिस्म को थोड़ा सा हाईलाइट कर रही थी. क्यों वह इतनी be-sharam हो रही थी? यह उसके

जैसे नहीं था.

अगर अब्बू ने देखा होता— किसी और मर्द के सामने ऐसे कपड़ों में बैठी, खुल कर है

रही, उसका ख्याल क़बूल कर रही— उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आता. वह हमेशा मॉडेस्टी पर

सख्त थे, फख्र करते थे की अम्मी पब्लिक में ईमान की पाबन्दी करती हैं.

यह अम्मी बिलकुल अजनबी सी लग रही थी, be-fikr और be-khabar की उसका जिस्म कितनी नज़रें

खींच रहा है. यह बदलाव मुझे बहुत परेशां कर रहा था, प्रोटेक्शन का एहसास

और कुछ अँधेरा जो मैं नाम नहीं देना चाहता था.

मैं (ज़ैद): वह, खाना लाजवाब था, मर. विजय! यह बटर चिकन मेरी ज़िन्दगी का सबसे

अच्छा था. अम्मी, तुम्हे प्रॉन्स कितने पसंद आये?

अम्मी: (टाइट ब्लू ड्रेस में मुस्कुराती, दुपट्टा थोड़ा एडजस्ट करते हुए) हाँ ज़ैद, सब

कुछ बहुत टेस्टी था. फिर से शुक्रिया मर. विजय, हमें इन्विते करने के लिए. शेफ ने सच

में कमल कर दिया.

मर. विजय: (रेलिंग पर झुक कर, दोनों को मुस्कुराते हुए) खुश हुआ की पसंद आया, शाहिदा

और ज़ैद. हमारा शेफ five-star ट्रेनिंग वाला है. तो ज़ैद, तेरे होब्बीएस क्या हैं, लड़के?

वीडियो गेम्स? क्रिकेट?

मैं (ज़ैद): ज़्यादातर क्रिकेट, सर. और स्विमिंग! आज अम्मी ने मुझे यहाँ पूल पर सिखाया.

अम्मी: (धीमी हसी) वह काम बोलता है. पढाई में भी बहुत अच्छा है. और आप, मर.

विजय? होटल चलने के चक्कर में बहुत सफर करते होंगे.

मर. विजय: (सर हिलाते, आँखें थोड़ी देर अम्मी के सीने पर फिर हटती) सफर तोह है,

लेकिन ज़्यादातर काम. मेरी शादी… लम्बी घंटों की वजह से नहीं बची. दो साल पहले

डाइवोर्स हो गया. कोई बच्चे नहीं. कभी कभी अकेलापन लगता है.

अम्मी: (हैरान लेकिन नरम आवाज़ में) ओह… अफ़सोस हुआ सुन कर. शादी में मुश्किलें आती

हैं. अल्हम्दुलिल्लाह, मेरी तोह स्टेबल है, चाहे शौहर काम में ज़्यादा बिजी रहते हैं.

मर. विजय: स्टेबल अच्छी बात है. मैंने कभी किसी _ औरत से इतनी खुल कर बात नहीं

की, शाहिदा. तुम सब इतनी… कन्सेर्वटिवे लगती हो, ढकी हुई, चुप. ऐसे नार्मल बात करना

ताज़ा लग रहा है.

अम्मी: (थोड़ी लाली, हाथ सीने पर क्रॉस करते हुए उसकी नज़र नोटिस कर) कन्सेर्वटिवे?

शायद थोड़ा. हमारा मज़हब मॉडेस्टी सिखाता है, लेकिन हम भी नार्मल लोग हैं.

मर. विजय: बिलकुल. मुझे लगता था _ औरतें मर्दों को देखती भी नहीं, डिनर तोह

दूर की बात. आज तुम मेरे स्टेरोटीपीस तोड़ रही हो.

अम्मी: (हलके से हसी) इतने स्ट्रिक्ट हर जगह नहीं होते. फॅमिली पर देपेंद करता है.

मर. विजय: फिर भी इम्प्रेससिवे है. जो औरतें मैं मिलता हूँ वह बहुत… ओपन होती हैं.

तुम अलग तरह से खुद को रखती हो.

अम्मी: (जल्दी ड्रेस की स्ट्राप एडजस्ट करते) शुक्रिया… लगता है?

बाद में, जब पलटें साफ़ हुई और हम पीछे झुक कर सुकून से सांस ले रहे थे,

मैंने सोचा प्लान टेस्ट करने का वक़्त है. “अम्मी, मैं थोड़ी देर होटल में वाक कर लून?

टॉप फ्लोर पर बालकनी और गार्डन बहुत अच्छे हैं. जल्दी वापस आ जाऊंगा.”

अम्मी का फोर्क बीच में रुक गया. “नहीं बीटा. तूने पहले कहा था किसी के साथ अकेला

नहीं छोडूंगा. याद है? हमने प्रॉमिस किया था.”

विजय कुर्सी में पीछे झुक कर, आवाज़ नरम और यक़ीन दिलाने वाली.

“शाहिदा, लड़के को मज़े लेने दो. हॉस्पिटल की फ़िक्रों में दिन भर बंद रहा है. थोड़ी

ताज़गी और घूमना नुक्सान नहीं. मैं यहीं तेरे साथ रहूँगा— अगर चाहे तोह होटल

के ग्राउंड्स में साथ वाक कर लेंगे. बिलकुल सेफ है, और वह जल्दी वापस आ जायेगा.”

अम्मी ने सीधा मुझे देखा, आँखों में वह चुपके याद दिलाना की मैंने प्रॉमिस

किया था उसके साथ रहने का इस मर्द के साथ. उस नज़र में थोड़ी बेचैनी थी, जैसे

टेस्ट कर रही हो की मैं याद रखता हूँ या नहीं.

मैंने उसकी आँखों से नज़र मिलायी और तेज़ विंक की, इतनी हलकी की विजय को पता न चले,

मुँह से सिलेंटली कहा “मैं जल्दी वापस आऊंगा”. वह थोड़ा रिलैक्स हुई, कन्धों से टेंशन

गायब, और छोटी मुस्कराहट के साथ सर हिला दिया. “ठीक है… लेकिन ज़्यादा देर मत

करना बीटा. और संभल कर रहना.”

विजय खड़ा हुआ, अदब से अम्मी को हाथ दिया. “चलें? होटल के वालकवायस और बालकनी

बहुत सुन्दर हैं, लाइट्स देखने लायक. सब कुछ क्लियर करने में मदद मिलेगी.”

वह दोनों साथ चले गए, और मैं थोड़ी देर इंतज़ार कर के उनके पीछे निकल पड़ा,

फासला रखते हुए. मेरा प्लान सादः था: अगर मैं उन्हें अकेला छोड़ दूँ, तोह विजय

अम्मी के साथ फ्री फील करेगा. मुझे उसके असली इरादे जान्ने थे.

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मैं कोर्रिडोर्स और स्टेवेल्ल से चुपके चलता रहा, दिल तेज़ धड़क रहा था, जब तक उन्हें

उप्पेर लेवल के एक खामोश बालकनी पर खड़ा पाया. रात की हवा धीरे से उनके ird-gird

चल रही थी, पास के लैंप की नरम रौशनी लम्बी परछाइयाँ दाल रही थी.

वह धीमी आवाज़ में बात कर रहे थे, अम्मी रेलिंग पर हल्का झुक कर, विजय बहुत

पास— ज़्यादा पास.

अम्मी: (सर हिलाते) हाँ बीटा. पास रहना.

मर. विजय: तो सच बताओ शाहिदा— _ औरतें इतनी कन्सेर्वटिवे क्यों होती हैं?

वैल की वजह से, रूल्स की, या लोग क्या कहेंगे की दर से?

अम्मी: (सोचते हुए) ज़्यादातर तालीम की वजह से. हमारी इज़्ज़त बचानी होती है. लेकिन…

कभी कभी यह बोझ सा लगता है.

मर. विजय: बोझ? जैसे तुम अपने असली रूप को छुपा रही हो? वैसे आज यह ब्राउन टाइट

ड्रेस तुम पर लाजवाब लग रही है. उस बोरिंग ब्लैक --- कपड़ों से लाख दर्जा बेहतर.

अम्मी: (हैरान, कपडे को छूटे हुए) यह? गजेंद्र… मेरा दोस्त… ने ट्रिप के लिए

खरीदी थी. पहले अजीब लगा था पेहेन कर.

मर. विजय: अजीब? तुम इसमें खूबसूरत लग रही हो. जैसे यह तुम्हारे जिस्म को जकड

रही है… ऐसे कपडे ज़्यादा पहनो. खुले, टाइट, मॉडर्न. वह ढीले तम्बू नहीं.

अम्मी: (नर्वस हसी) खुले? नहीं जानती… यह अलग है.

मर. विजय: अलग अच्छा है. कभी --- कपडे बोरिंग नहीं लगते? सब कुछ छुपाते

हैं, तुम्हारी नेचुरल खूबसूरती चमकने नहीं देते.

अम्मी: (ज़्यादा हसी, मुँह छुपाते) ठीक है, शायद थोड़ा. कम्फर्टेबले होते हैं,

लेकिन… हाँ, कभी कभी फ्रीली पेहेन्ने की ख्वाहिश होती है बिना फ़िक्र के.

मर. विजय: बिलकुल! तुम्हे हमेशा रेवेलिंग कपडे पेहेन्ने चाहिए. आज की तरह टाइट.

अपने कर्व्स… अपने सुन्दर एसेट्स… को दिखाओ और क़दर करवाओ जैसे डेसेर्वे करते हैं.

मर्दों को यह नरमाई, यह भरा हुआ जिस्म पसंद है. यह औरत को इररेसिस्टिबले

बनता है.

अम्मी: (समझ गयी, लाल होते हुए हसी) मर. विजय! बहुत डायरेक्ट हो. लेकिन… शायद सही

कह रहे हो. मेरे “एसेट्स” छुपाने से बेहतर दीखते हैं जब बहार आते हैं.

मर. विजय: देखा? तुम एग्री करती हो. यह मोती, रसीली एसेट्स तोह गिफ्ट हैं. इन्हे छुपाना

मर्दों पर ज़ुल्म है.

अम्मी: (गुदगुदी, सर हिलाते) मुझे शर्मा रहे हो. बस करो.

मर. विजय: (मुस्कुराते) सच बताओ— औरतें मर्दों में सच में क्या पसंद करती

हैं? खुल कर बोलो.

अम्मी: (शर्म से, नज़र हटा कर) मैं… नहीं जानती. किंडनेस? स्टेबिलिटी?

मर. विजय: (मज़ाक में पास झुक कर) आओ शाहिदा. यह पूरा जवाब नहीं. दिल के अंदर

क्या चाहती हैं औरतें? वह असली चीज़ जो कमज़ोर कर देती है?

अम्मी: (छोटी आवाज़, लफ्ज़ अवॉयड करते) कुछ… मज़बूत. ताक़तवर. तुम समझ रहे

हो.

मर. विजय: (मुस्कुराते) बड़ा, मोटा और सटिस्फीइंग? बिलकुल. लेकिन तुम शर्म से नहीं बोल

पाती.

अम्मी: (शर्म से हसी) मर. विजय! ज़ैद कभी भी वापस आ सकता है.

मर. विजय: अगर मैं तुम्हारा शौहर होता तोह ऐसी औरत को ऐसे रिसोर्ट में अकेला नहीं

छोड़ता. कभी नहीं. तेरा शौहर पागल है जो तुझे बिना अपने यहाँ आने दिया.

अम्मी: (जल्दी डिफेंड करते) नहीं नहीं, हुसैन अच्छे आदमी हैं. वह बस बिमारी से

ठीक हो रहे हैं. मुझ पर पूरा भरोसा है.

मर. विजय: (धीरे से दोनों हाथ पकड़ कर) फिर भी… अगर मेरी होती तोह हर रात पास

रखता. तुम बहुत क़ीमती हो अकेला छोड़ने के लिए. (हाथ के पीछे धीरे चुम्बन)

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अम्मी: (जिस्म कांप रहा, आवाज़ कांप रही) मर. विजय… मैं क्यों… ऐसे कांप रही

हूँ?

मर. विजय: (हाथ अभी पकडे, दुसरे हाथ पर चुम्बन) क्योंकि तुम भी महसूस कर

रही हो. वह चिंगारी. कुछ नए का एक्ससिटेमेंट. तेरा जिस्म जानता है चाहे दिमाग

लड़ रहा हो.

अम्मी: (तेज़ सांस) मैं… नहीं जानती. यह गलत है.

मर. विजय: (फिर हाथों पर चुम्बन, धीरे) यह चुम्बन? यह तोह सिर्फ आज रात के

शुक्रिया का तरीक़ा है. सच होने का, इतनी खूबसूरत दिखने का.

अम्मी: (फिसफिसाते, अभी कांप रही) वह… वह चुम्बन सच में किस लिए था? सच बताओ.

मर. विजय: (आँखों में देखते) यह दिखने के लिए की कन्सेर्वटिवे _

खूबसूरत भी टाइट ब्लू ड्रेस में ज़िंदा महसूस कर सकती है. और उम्मीद के लिए…

शायद अगली बार… तुम मुझे और ज़्यादा दिखने दो.

मर. विजय: (हाथ धीरे पकडे, आँखें गरम लेकिन तेज़) जानती हो शाहिदा, तेरा

शौहर बहुत किस्मत वाला आदमी है. सच में ब्लेस्ड.

अम्मी: (सर टेढ़ा कर, अभी भी लाली से) किस्मत वाला? क्यों?

मर. विजय: (मुस्कुराते, आवाज़ थोड़ी धीमी) क्योंकि वह हर रात ऐसे परफेक्ट, नरम

जिस्म वाली औरत के पास आता है. यह कर्व्स जो ड्रेस में भर रही हैं… जैसे तेरी

कमर हिलती है चलते हुए… ज़्यादातर मर्द ऐसी बीवी के लिए जान दे देंगे जो बोरिंग

कपड़ों के नीचे ऐसा दिखती हो.

अम्मी: (सख्त लाल, हाथ थोड़ा पीछे खींच) मर. विजय, प्लीज… यह ज़्यादा हो गया.

टॉपिक बदलें? यह उनकंफर्टबले हो रहा है.

मर. विजय: (मज़ाक में रेलिंग पर झुक कर) उनकंफर्टबले? क्यों? क्योंकि मैं वह बोल

रहा हूँ जो हर मर्द सोचता है तुझे देख कर? या इसलिए की दिल के अंदर तुझे सुन्ना

अच्छा लग रहा है?

अम्मी: (सर हिलाते, आवाज़ सख्त लेकिन पोलाइट) क्योंकि मैं shadi-shuda हूँ, और मेरा

शौहर अच्छे आदमी हैं. कुछ और बात करते हैं. होटल, तुम्हारे सफर… कुछ नार्मल.

मर. विजय: (धीमी हसी) ठीक है ठीक है. ठीक कहा. तो… तेरा शौहर क्या करता

है? बिज़नेस? सरकारी नौकरी?

अम्मी: (थोड़ा रिलैक्स, टॉपिक बदलने से खुश) वह बैंक में काम करता है. बहुत स्टेबल

, ज़िम्मेदार. हम ऑलमोस्ट बीस साल से साथ हैं.

मर. विजय: बीस साल? कमल है. मैं तोह आठ भी नहीं टिक पाया. बताओ, तुम दोनों साथ

सफर ज़्यादा करते हो?

अम्मी: (हलके मुस्कुराते) ज़्यादा नहीं. यह ट्रिप… अलग था. मेरा दोस्त गजेंद्र ने

अर्रंगे किया था हमारे लिए.

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मर. विजय: (सर हिलाते हुए, फिर धीरे से लहजा बदलते) खूबसूरत चीज़ों की बात

करते हुए… तुम्हारे होंठ सबसे सुन्दर हैं, शाहिदा. भरे हुए, नरम, बिलकुल

नेचुरल गुलाबी. जब मैंने तुम्हे पूल के पास पहली बार देखा था तभी नोटिस किये थे.

अम्मी: (आँखें फैल कर असली हैरानी से, हाथ अपने मुँह पर जाते हुए) मेरे…

होंठ? मर. विजय, यह बिलकुल अचानक! ऐसा क्यों कह रहे हो?

मर. विजय: (मासूमियत से कंधे उचकाते) क्योंकि सच है. यह ऐसे लगते हैं जैसे

मुस्कुराने के लिए बने हैं… या चुम्बन के लिए. डिनर के वक़्त इनके बारे में सोचता रहा.

अम्मी: (घबरा कर हलके से हंसती, आधा कदम पीछे) आज रात तुम बहुत बोल्ड हो गए

हो. होटल ओनर से ऐसी बातें की उम्मीद नहीं थी.

मर. विजय: (एक छोटा कदम पास आते, आवाज़ धीमी) मैं सिर्फ सच बोल रहा हूँ.

ज़्यादातर औरतें ऐसी तारीफ सुन्ना पसंद करती हैं.

अम्मी: (अब कुछ अजीब महसूस करने लगी — उसकी आँखें कैसे अँधेरी होती हैं जब उसे

देखता है, वह हलकी मुस्कराहट जो ज़्यादा देर तक रहती है) मैं… मुझे लगता है तुम

चीज़ों को ज़्यादा गहरा समझ रहे हो. हम तो बस नार्मल बात कर रहे थे.

(मर. विजय धीरे से झुकता है, चेहरा उसके पास लाते हुए जैसे चुम्बन करने)

अम्मी: (आँखें फैलती, तेज़ फिसफिसाहट) मर. विजय… क्या कर रहे हो? रुको!

अम्मी: (तेज़ से चेहरा इधर घुमा कर, अब समुन्दर की तरफ मुँह, दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क

रहा) यह ठीक नहीं. मैं shadi-shuda औरत हूँ. प्लीज इज़्ज़त करो.

मर. विजय: (अभी भी बहुत पास, सांस गरम कान पर) रोक नहीं प् रहा, शाहिदा. पूल के

पास से hi तुम पर लस्ट कर रहा हूँ. यह टाइट ड्रेस में तेरा जिस्म… मुझे पागल कर

रहा है.

अम्मी: (हाथों को पूरा अलग करते, बालकनी के दरवाज़े की तरफ घबरा कर देखती जहाँ

ज़ैद आ सकता था) मेरा बीटा बिलकुल यहीं है! कभी भी बहार आ सकता है. तुम यह नहीं

कर सकते.

मर. विजय: (नरम, तसल्ली देते) ज़ैद फ़ोन पर बिजी है, तुमने खुद कहा था. वह बहार

नहीं आएगा. सिर्फ एक चुम्बन, शाहिदा. उससे ज़्यादा कुछ नहीं. वादा.

अम्मी: (अभी भी मुँह घुमाये, आवाज़ कांप रही) नहीं. मैं अपने शौहर के प्रति

वफादार हूँ. यह मेरे ईमान के खिलाफ है — मेरा मज़हब, मेरी शादी, .,. जीना

हराम है. सोचना भी गलत. मैं हुसैन को धोका नहीं दे सकती.

मर. विजय: (नरम लेकिन पक्का) मैं तुम्हारे मज़हब को समझता हूँ, लेकिन… मुझे

कुछ बताना है. मैंने तुम्हे देखा.

अम्मी: (थोड़ा पलट कर, उलझन और दर से) देखा? क्या मतलब?

मर. विजय: (फ़ोन धीरे से निकालते) मैंने तुम्हे गजेंद्र के साथ सेक्स करते देखा.

तुम्हारे होटल रूम में. कई बार. मेरे पास वीडियो है.

अम्मी: (चेहरा सफ़ेद पद गया, आवाज़ टूट रही) तुम… क्या?! कैसे?! यह… यह सच नहीं

हो सकता…

मर. विजय: (शांत) बिलकुल समझता हूँ, शाहिदा. यह नार्मल है. औरतों को एक्ससिटेमेंट

चाहिए. मज़ा है. तुम इंसान हो. मैं जज नहीं कर रहा.

अम्मी: (दिमाग में लाखों सवाल, फिसफिसाते हुए दरवाज़े की तरफ देखती) आवाज़ धीमी

करो! ज़ैद सुन लेगा! वीडियो कैसे मिला? क्या तुम रूम में थे? कोई और? यह गलती होगी!

मर. विजय: (फ़ोन खोल कर साफ़ छोटा क्लिप दिखाते) यह तुम हो. उसका नाम ले कर ज़ोर

से कराह रही थी. देखो.

अम्मी: (स्क्रीन देख कर हॉरर से, हाथ मुँह पर) हे खुदा… नहीं… प्लीज डिलीट कर

दो. यह ब्लैकमेल है न?

मर. विजय: (फ़ोन जल्दी लॉक कर) कोई ब्लैकमेल नहीं. कसम से. मैं सिर्फ तुम पर फ़िदा

हूँ. सिर्फ एक चुम्बन चाहता हूँ. बस. तुम पहले hi एक बार धोका दे चुकी हो —

चुम्बन उसके सामने कुछ नहीं.

अम्मी: (आवाज़ कांप रही, शर्म से) तुम्हे उसका नाम कैसे पता? गजेंद्र…

मर. विजय: मैं उसको नहीं जानता. बस दिवार के पार से सुना “गजेंद्र… ज़ोर से…” चिल्ला

रही थी. मिस नहीं हो सकता था.

अम्मी: (पूरी शर्मिंदा, चेहरा लाल, फिर घबरा कर इधर उधर) हे खुदा… कितनी

be-izzati. यकीन नहीं होता तुमने मेहमानों पर कैमरा लगाए! यह गलत है!

मर. विजय: (शांत) स्पाई नहीं. सिक्योरिटी. कॉरिडोर और कुछ सुइट्स में कैमरा होते

हैं सेफ्टी के लिए. लक्ज़री होटल में नार्मल है. सबकी हिफाज़त.

अम्मी: (हल्का तनक़ीद करते, अभी शॉक में) लेकिन तुमने प्राइवेट लम्हे देखे! यह

हिफाज़त नहीं — यह दखल है!

मर. विजय: (नरम) शायद. लेकिन अब जब मुझे पता है तुमने अपने शौहर के साथ लाइन

पार कर ली… तो मेरे साथ चुम्बन क्यों नहीं? यह हल्का है. सिर्फ होंठ. किसी को दर्द

नहीं. तुमने तो उससे ज़्यादा किया.

अम्मी: (पीछे हैट कर, आवाज़ पक्की लेकिन उदास) नहीं. नहीं कर सकती. नहीं करुँगी.

यह बहुत ज़्यादा हो गया.

(अम्मी पलट कर बालकनी के दरवाज़े की तरफ चल पड़ती, गहरी फ्रौं, आँखें गुनाह

और उदासी से चमकती)

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“शाहिदा, रुक जाओ,” वह पीछे से बोलै, आवाज़ नरम लेकिन पक्की. “प्लीज. सिर्फ एक चुम्बन

चाहता हूँ तुमसे. बस. कसम से ब्लैकमेल नहीं करूँगा — चाहे मेरे फ़ोन में फुटेज

सेव्ड हो. मैं ऐसा आदमी नहीं. सिर्फ एक चुम्बन, उससे ज़्यादा कुछ नहीं.”

वह नहीं रुकी. तेज़ क़दमों से चलती रही, कॉरिडोर में गायब हो गयी अपने कमरे की तरफ.

मैं छुपा हुआ देखता रहा पूरा वाक़िअ. अब उसके इरादे साफ़ थे. और अजीब तरह से मैं

उसको दोष नहीं दे रहा था अम्मी से सेक्सुअल फेवर मांगने के लिए. उसकी गलती बिलकुल नहीं थी.

उसकी जगह कोई भी मर्द अम्मी को छोड़ने की प्यास करता.

उसका जिस्म ऐसा था — भरे कर्व्स, नरम चमड़ी, कमर का नेचुरल हिलना जो बिना कोशिश

आँखें खींचता. उसके छूछे भरे और भरी, गांड गोल और दावत देने वाली और

मोती, चेहरा शादी के सालों बाद भी जवान और सुन्दर.

विजय जैसे मर्द रोक नहीं पाते; उसका देखना hi ख्वाहिश जगाता जो काबू से बहार. यह

बायोलॉजी थी, सीधा सादा. ऐसी औरत, जो चुपके से सेंसुअलिटी बिखेर रही हो जब छुपाने

की कोशिश करती है, हर नार्मल मर्द को सोचने पर मजबूर करती है उसे छूने का,

हासिल करने का.

विजय इसमें अलग नहीं — वह इंसान था, और वह लानत थी.

असल में अम्मी की ज़्यादा गलती थी उसकी.

उसने मुझे भी सडके किया था, वह तरीके जो मैं क़बूल नहीं करना चाहता. वही

कर्व्स जो विजय को घूर रही थी ने मुझे हर वह लाइन पार करवाई जो बेटे को कभी

नहीं पार करनी चाहिए.

वह be-khabar ग्रेस से चलती थी जो तवज्जोह मांगती — छूछे कपडे पर दबाव, कमर

नेचुरल हिलती, होंठ भरे और जज़्बाती.

उसने यह सिलसिला शुरू किया खुद को दिखने से, कपडे चुन कर जो छुपाने की बजाये

इशारा करते, क़ुरबत की इजाज़त दे कर जो और मांगती. उसका जिस्म हथियार था जिसका उसे

एहसास भी नहीं, मर्दों को खींचता जब तक वह सोच नहीं पाते.

अगर वह पहले जैसे मॉडेस्ट कपडे पहनती तो यह सब न होता. लेकिन उसने नहीं किया, और

अब विजय — और मैं — दोनों उसके जाल में फंसे.

अम्मी अकेली अपने होटल रूम में दाखिल हुई, दरवाज़ा क्लिक से बंद.

मैं सिर्फ अंदाजा लगा सकता था उसके दिमाग में कितने ख्याल दौड़ रहे थे. वह बर्बाद

थी; हर ज़र्रे में महसूस कर रही होगी. उस आदमी के पास अब गजेंद्र के साथ उसका

वीडियो था, और वह साफ़ सेक्स मांग रहा था ख़ामोशी के बदले.

ब्लैकमेल का दर, खुलने का दर, सब खो देने का — शादी, इज़्ज़त, ईमान — ने उसको कुचल

दिया होगा.

वह शायद फँसी महसूस कर रही थी, अपनी गलतियों से घेर ली गयी, सोच रही होगी एक

छोटी सी गलती कैसे इस खौफनाक सपने में बदल गयी.

मेरा फ़ोन तुरंत बजा. अम्मी थी.

“बीटा, अभी तुम कहाँ हो?” उसकी आवाज़ पहात रही थी, बेचैन, बिलकुल नार्मल नहीं.

“मैं अपने रूम में हूँ, अम्मी. वाक के बाद आराम कर रहा हूँ. क्यों? सब ठीक

है?”

लम्बी ख़ामोशी. उसकी सांस सुनाई दी, छोटी और बेकाबू. “हाँ… हाँ, मैं ठीक हूँ.

सब ठीक है. बस… तुम्हारा हाल पूछ रही थी.”

“तुम नार्मल नहीं लग रही, अम्मी. आवाज़ कांप रही है. क्या विजय के साथ कुछ हुआ?

मुझे बता सकती हो.”

वह जल्दी संभाली, ज़ोर दे कर आवाज़ ठीक की. “नहीं, बिलकुल नहीं. बस दिन भर से थक

गयी हूँ. सच में, बीटा, मैं ठीक हूँ. कल बात करते हैं. गूडनिघत. अच्छे से सो जाओ.”

उसने ऐसा बोलै जैसे कॉल ख़तम कर रही हो, लेकिन नहीं किया. लाइन खुली रही. फ़ोन डेस्क

पर रखने की हलकी आवाज़ आयी, शायद सोचा कॉल बंद हो गया. फिर उसकी आवाज़ —

धीमी, टूटी हुई, खली कमरे में खुद को बुरा भला कहती.

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“मैं इतनी बेवक़ूफ़ कैसे हो सकती हूँ? सब मेरी गलती है. गजेंद्र के साथ अफेयर शुरू

किया… अपने शौहर को धोका दिया, खुद को धोका दिया. महीनों से ,,., छोड़ दी. दिल

से _ नहीं रही. अब यह विजय ने सब रिकॉर्ड कर लिया और शायद वह भी मुझसे

सेक्स चाहता है. मुझे यह मिलना चाहिए. मैं बर्बाद हो गयी. कैसी बीवी हूँ मैं?

कैसी अम्मी?”

वह जारी राखी, खुद को शर्मिंदा करते हुए फिसफिसाहट की धरा में. “मैंने खुद

यह सब लाया. एक गलती और अब हमेशा के लिए सजा. खुदा माफ़ कर… लेकिन अब माफ़ी

के लायक भी नहीं रही.”

फिर फ़ोन से दरवाज़े पर तेज़ थपकी सुनाई दी — कोई उसके दरवाज़े पर.

मेरा दिमाग दौड़ पड़ा. विजय hi होगा, शायद तसल्ली देने आया, अपना पॉइंट धीरे से

दबाने. मैंने जल्दी कॉल बंद किया, दिल ज़ोर से धड़कता, सीढ़ियां चढ़ता उसके कमरे

की तरफ दौड़ा.

मेरा दिल का धड़कन कान में गूँज रहा था. लिफ्ट के पास छुप कर, तेज़ सांस लेते,

कार्नर से झाँका बिलकुल सही वक़्त पर. अम्मी ने दरवाज़ा खोल दिया था. विजय अंदर

दाखिल हुआ, दरवाज़ा धीमी क्लिक से बंद.

मेरा दिल जानलेवा तेज़ धड़का, दर्द से, और मेरा लुंड पंत में सख्त और धड़कता

खड़ा. आगे क्या होने का ख्याल — खतरा, हराम क़ुरबत, सब फटने का खतरा — ने

मेरे अंदर आग लगा दी जो काबू नहीं थी. यह गलत था, बीमार था, लेकिन यह उत्साह

इंकार नहीं कर सकता था.

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अम्मी: (होटल सुईठे के बीच कड़ी, हाथों से खुद को जकड़े हुए, आवाज़ कांप रही)

मर. विजय… आप यहाँ क्या कर रहे हैं? कैसे… कैसे आपने वह देखा? कामर्स…

हे खुदा, सांस नहीं ले प् रही मैं.

मर. विजय: (दरवाज़ा धीरे से बंद करते हुए, आवाज़ शांत और धीमी) शाहिदा,

रिलैक्स करो. मैं इसलिए आया क्योंकि मैंने विला में लगाए सिक्योरिटी कामर्स का

फुटेज देखा. लेकिन ध्यान से suno—main यहाँ ब्लैकमेल करने नहीं आया. मैं उस वीडियो

का कभी इस्तेमाल नहीं करूँगा. न अब, न कभी. मैं सब पर क़सम खता हूँ.

अम्मी: आप क़सम खा रहे हो? लेकिन… मैंने कभी नहीं चाहा यह सब हो! मुझे

नहीं चाहा किसी को गजेंद्र के बारे में पता चले… अफेयर के बारे में. मैं

बहुत शर्मिंदा हूँ, बहुत गन्दी महसूस कर रही हूँ. अगर मेरे शौहर को

कभी पता चला… या मेरे बेटे को… मैं मर जाउंगी. यह सब मेरी गलती है.

मर. विजय: (धीरे से पास आते हुए, दोनों हाथों से उसके कन्धों पर रख कर,

तसल्ली से दबाते हुए) हे… हे, मुझे देखो. सांस लो. तुमने कुछ गलत नहीं

किया, शाहिदा. जीना? यह नार्मल है. औरतों की ज़रूरतें होती हैं. मर्दों की

होती हैं. ज़िन्दगी ऐसे hi चलती है. खुद को इतना सजा मत दो.

अम्मी: (सर हिलाती, आवाज़ पहात रही) नार्मल? आप कैसे कह सकते हो? मैंने शुरू

किया. मैंने पहले गजेंद्र को छूने दिया. अगर मैं न करती… यह सब न होता.

मैं hi सब बर्बाद करने वाली हूँ. मैं बहुत बुरी बीवी हूँ, बहुत बुरी

_…

मर. विजय: (उसे धीरे पीछे ले जाते हुए) आओ, बिस्तर पर बैठो. जब तुम आराम

से बैठोगी तब ठीक से बात करेंगे. यहाँ कोई जज नहीं कर रहा. सबसे काम मैं.

अम्मी: (बिस्तर के किनारे बैठती, अभी भी कांप रही) ठीक… ठीक है. लेकिन मुझे

बहुत गुनाह महसूस हो रहा है. हर बार आँखें बंद करती हूँ तो हुसैन का

चेहरा दीखता है. वह मुझ पर पूरा भरोसा करता है.

मर. विजय: (उसके पास बैठ कर, एक हाथ कंधे पर रखे हुए) और तुम्हे यह गुनाह

अकेली नहीं उठाना चाहिए. तुम खूबसूरत, सेहतमंद औरत हो. तुम्हे रेगुलर

सेक्स डेसेर्वे है, शाहिदा. हर रात अगर चाहो तो. तेरा जिस्म इसकी ज़रुरत रखता

है. यह गुनाह नहीं, ख़ुशी महसूस करना.

अम्मी: (शक से, हाथों को देखते हुए) रेगुलर सेक्स? …अजनबियों के साथ? मुझे

नहीं पता, मर. विजय. यह गलत लगता है. मैं shadi-shuda हूँ. मेरे ज़िम्मेदारियाँ

हैं.

मर. विजय: (नरम आवाज़ से) तुम जैसी खूबसूरत औरतें हर रात बिस्तर पर ले

जाई जानी चाहिए. चुम्बन, छुअन, पूरा सटिस्फैक्शन. तेरा जिस्म इसके लिए बना

है. उस अंदर की आग छुपाना hi असली गुनाह है. जब कोई तुम्हे चाहता है तो क्या

ज़िंदा महसूस नहीं होती?

अम्मी: (आवाज़ धीमी, थोड़ा शांत होती) Kabhi-kabhi… हाँ. लेकिन फिर भी लगता

है मैं hi दोषी हूँ. मैंने यह रास्ता चुना.

मर. विजय: (कंधे धीरे से सहलाता) अब शांत हो रही हो, अच्छा है. गुनाह को

छोड़ दो. तुम दोषी नहीं हो औरत बन कर महसूस करने के लिए. सच batao—kya

तुम्हारा शौहर तुम्हे पूरा सटिस्फी करता है? क्या वह तुम्हे वैसा महसूस

करवाता है जैसा गजेंद्र ने किया?

अम्मी: (सहक्ति, आवाज़ छोटी) वह… अपने तरीके से करता है. हाँ. लेकिन अभी हुसैन

के बारे में बात नहीं करना चाहती. प्लीज.

मर. विजय: (सर टेढ़ा कर, प्यार से लेकिन क्यूरियस) क्यों नहीं? क्योंकि यह और गुनाह महसूस

करवाता है? या अंदर से जानती हो जवाब पूरा हाँ नहीं है?

अम्मी: (सांस छोड़ कर, नज़र हटा कर) दोनों. उसके बारे में बात करना जब मैं

यहाँ हूँ… सब कुछ और बुरा कर देता है. मैं पहले से hi उसके साथ काफी धोका

कर चुकी हूँ.

मर. विजय: (धीरे से एक हाथ उसकी नंगी राण पर रख कर, हलके से सहलाता) तुम्हे

बिना सजा दिए ाचा महसूस करने का हक़ है. तुम्हे चाहा जाना चाहिए. तुम

शानदार हो, शाहिदा. स्मार्ट, मेहरबान, और बहुत सेक्सी. कोई भी मर्द तुझे पाकर

खुशनसीब होगा.

अम्मी: (आवाज़ कांप रही लेकिन धीमी) आप… आप यह किसी को नहीं बताएँगे. प्लीज.

एक शख्स को भी नहीं.

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मर. विजय: (गरम हसी के साथ) ओह, नहीं बताऊंगा. लेकिन हम दोनों के बीच? सच

बताऊँ… मुझे बहुत पसंद आया कैसे तुम गजेंद्र पर सवार हुई थी. तेरी बड़ी,

रसीली गांड हर उछाल पर कैसे हिल रही थी… तुम कमल थी. इतनी कॉंफिडेंट, इतनी जंगली.

बिलकुल शानदार.

अम्मी: (हैरानी से हसी निकल गयी, गाल लाल) मर. विजय! बस… यह बहुत शर्मनाक है.

लेकिन… शुक्रिया? मुझे नहीं पता अभी मैं क्यों है रही हूँ.

मर. विजय: (मुस्कुराते, हाथ अभी भी राण पर) देखा? गुनाह थोड़ा काम हो रहा है.

यह नार्मल है, शाहिदा. तेरे शौहर को कभी पता नहीं चलेगा. बड़े लोगों के

बीच एक छोटा सा राज़. इसका सब बर्बाद होने की ज़रुरत नहीं.

अम्मी: (मुस्कराहट फिर ख़तम) लेकिन मुझे उसके लिए बुरा लग रहा है. वह बीमार

है, ठीक हो रहा… और मैं यहाँ उसका भरोसा तोड़ रही हूँ. ऐसी कौनसी बीवी

होती है?

मर. विजय: (पास झुक कर, आवाज़ मज़बूत लेकिन नरम) अभी उसके ख्यालों की इतनी फ़िक्र

मत करो. हॉस्पिटल के बिस्तर से या घर से तुम्हारी ज़िन्दगी कण्ट्रोल मत होने दो.

तुम यहाँ हो. तुम ज़िंदा हो. तुम्हे चाहा जाना, छुआ जाना, माँगा जाना

डेसेर्वे है. एक बार खुद को आज़ाद होने दो.

अम्मी: (सांस ठीक होती, उसको देखती) आज़ाद… सालों से यह महसूस नहीं हुआ.

आप मुझे… हल्का महसूस करा रहे हो. जैसे मैं इतनी बुरी नहीं हूँ.

मर. विजय: (एक हाथ से उसका चेहरा धीरे से पकड़ कर) तुम बुरी नहीं हो. तुम

खूबसूरत औरत हो जो ख़ुशी डेसेर्वे करती है. तुम स्मार्ट हो, मज़बूत हो,

और अभी… बिलकुल वहां हो जहाँ होना चाहिए. मुझे तुम्हे फिर से ाचा

महसूस करवाने दो.

अम्मी: (आँखें झपकती, आवाज़ फिसफिसाहट से ज़्यादा नहीं) मर. विजय…

मर. विजय: (धीरे से झुक कर, उसके होंठों पर नरम, गहरा चुम्बन)

अम्मी: (पहले थोड़ा ज़िद, हाथ हलके से उसके सीने पर दबाये, लेकिन पीछे नहीं

हटी… वही रही)

मर. विजय: (लम्बे चुम्बन के बाद सिर्फ एक इंच पीछे, होंठों पर सांस) सिर्फ एक

चुम्बन, शाहिदा. बस यह. उससे ज़्यादा कुछ नहीं जब तक तुम हाँ न कहो.

अम्मी: (आँखें आधी बंद, कांप रही) तो… फिर से चुम्बन करो.

मर. विजय: (नरम मुस्कराहट, दोनों हाथों से चेहरा पकड़ कर गालों पर

चुम्बन, धीमे, ज़्यादा जोश से, उंगलियां उसके चूचियों पर सहलाती)

मेरी अच्छी लड़की… बस महसूस करो. आज रात गुनाह नहीं.

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जो भी उन्होंने कहा, काम कर गया, क्योंकि जल्दी hi धीमी हरकतों की आवाज़ें आयी,

फिर साफ़ चुम्बन की आवाज़. अम्मी ने बालकनी जैसा विरोध नहीं किया. वह हार गयी.

मुझे इससे हैरानी नहीं हुई. जैसे मैंने पहले खुद से कहा था, कोई भी मर्द अम्मी को

छोड़ना चाहेगा. वह इसके लिए बानी thi—woh भरे छूछे, वह नरम, चौड़ी

गांड, जिस्म कैसे जवाब देता था जब दिमाग लड़ता था.

वह अंदर से रंडी थी, और उसको छोड़ा जाना डेसेर्वे था. दुनिया ने उसको यह सच

बार बार दिखाया. उसने शादी के बहार ख़ुशी चखी और अब रुक नहीं सकती थी.

हर मर्द जो उसको देखता वही खिंचाव महसूस karta—Vijay, गजेंद्र, मेरे

अँधेरे लम्हों में भी मैं. वह चुम्बक की तरह ख्वाहिश खींचती थी, और

लड़ना उसे और कमज़ोर बनता था. उसके जिस्म को याद दिलाया जाना चाहिए था उसके

लिए बना था.

थोड़ी देर बाद चुम्बन बंद किया, आवाज़ सांस रूकती. “बस, विजय. प्लीज… अब

जाना चाहिए.”

वह जाने को तैयार नहीं था. मैंने सुना उसने उसे पकड़ा, आवाज़ धीमी और

ज़िद भरी. “क्यों रुकना? तुमने भी महसूस किया. दिखावा मत करो.”

“क्या कर रहे हो? मुझे छोड़ दो.”

वह काफी देर बात करते रहे, आवाज़ें ऊँची नीचे होती रही.

“मैं ज़बरदस्ती कुछ नहीं कर रहा. अगर सच में जाना चाहती हो तो मेरे चेहरे

देख कर बोलो. आँखों में देख कर कहो जाने को.”

उसका चेहरा उसके पास tha—awaazon से तसव्वुर हो रहा था. अम्मी पूरी उलझन में

थी, सही और जो जिस्म चाहता था उसके बीच फटी हुई.

“प्लीज, विजय… मुझे फिर गलत काम मत करवाओ. मैं एक बार बदलना चाहती

हूँ. अच्छी बीवी और अम्मी बनना. मैं गजेंद्र को भी नहीं देखना चाहती अब.

यह रुकना चाहिए.”

वह धीमे से बोलै, लेकिन लफ्ज़ गहरे लगे. “तुम यह कहती हो, शाहिदा, लेकिन हम

दोनों सच जानते हैं. तुम कभी नहीं बदलोगी. यह सेक्स की भूक अब तुम्हारी

शख्सियत का हिस्सा है. यह तुम हो. जितना मन करो, लेकिन तेरा जिस्म पहले से

जानता है.”

वह काफी देर चुप रही. फिर वह उसको जोश से चुम्बन करने लगी, पूरी तरह

हार गयी. वह कमज़ोर थी.

और मुझे बिलकुल यक़ीन हो गया, कोई शक नहीं बचा, की मेरी अम्मी एक सस्ती रंडी

थी.

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CHAPTER 34

मेरी माँ उसी रात मर. विजय से छुड़वा लेती है.

अम्मी ने पीछे हाथ धीरे से बढ़ाया, अपने भूरे रंग के ड्रेस की ज़िप पकड़ी. कमरे की ख़ामोशी में मैटेलिक खरखराहट धीमी गूंजी जब उसने इंच इंच नीचे की, आवाज़ इतनी क़रीब थी जैसे कोई राज़ कह रही हो.

ड्रेस पहले कन्धों पर ढीली हुई, कपडा अलग हुआ तो ऊपर की पीठ की नरम, गरम चमड़ी दिखी और ब्रा की पतली सफ़ेद पत्तियां उसकी चमड़ी पर नाज़ुक लकीरों की तरह. उसने हलके से कंधे हिलाये, ड्रेस बाहों से नीचे गिरी, चूचियों के उभार से गुज़री, कमर पार की, फिर पैरों के पास नरम ढेर बन कर गिर गयी भूरे रेशम का.

उसने एक पेअर से निकाला, दुसरे से, अब सिर्फ सफ़ेद लास ब्रा और उसी रंग की पंतय में कड़ी थी जो उसकी बड़ी कमर और गांड के गोल टुकड़ों से चिपकी हुई थी.

कमरे की हलकी सुनहरी रौशनी हर तफ्सील पकड़ रही थी— चमड़ी की चमक, हलके स्ट्रेच मार्क्स जो उसकी असलियत बढ़ाते थे, भारी चूचियों का हर तेज़ सांस के साथ ऊपर नीचे होना.

मैं अपनी छुपी जगह पर जैम कर रह गया, दिल सीने से टकरा रहा था, एक अँधेरा, उलझा ख़ुशी का तूफ़ान अंदर दौड़ रहा था. वहां थी— मेरी अपनी अम्मी— दुसरे मर्द के लिए खुद कपडे उतार रही थी, फिर से उसको छोड़ने देने वाली.

यह नज़ारा मुझे बीमार, बिजली सी ज़िंदा कर रहा था. यह था वह लम्हा: जब वह पूरी तरह हार मानती है, जिस्म नंगा, हद्दें फिर टूट रही थी. मैं खुश था— सच में, शर्मनाक तरीके से खुश— उसे ऐसे देख कर, नंगी, गरम, लेने के लिए तैयार.

हर बार जब कोई और मर्द उस पर दावा करता, यह सबूत लगता था जो मैं अंदर से जानता था: वह सिर्फ अम्मी नहीं रही. वह एक औरत थी जिसे ख्वाहिशें चलती थी, और उसे हारते देख मेरा खून गरम हो जाता.

विजय दो कदम में पास आया, हाथों से उसका चेहरा पकड़ा और गहरा चुम्बन किया. होंठ मिले, धीमी गीली आवाज़, तुरंत अलग हुए ताकि जीभें मिल सकें.

उसने ऐसे चूमा जैसे भूखा हो— पहले धीरे, मज़ा लेते, फिर ज़ोर से, मालिकी से, एक हाथ कमर के नीचे, दूसरा बालों में उलझा. अम्मी एक धड़कन के बाद जवाब दी, बाहें उसकी गर्दन पर, उसे खींच कर पास लायी. चुम्बन लम्बा हुआ, गन्दा और भूखा, सांसें मिलती, छोटी सिसकारियां उसके गले से निकलती.

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उसने सिर्फ इतना तोड़ की होंठों पर बोले, आवाज़ जज़्बात से भरी. “शाहिदा… मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ. जानता हूँ तुमने कहा था फीलिंग्स नहीं, लेकिन रोक नहीं प् रहा.

तुम्हारी चाल, कभी कभी नज़र… मैं प्यार में हूँ.” अम्मी थोड़ा पीछे हटी, आँखें उसके चेहरे पर तलाश करती. आवाज़ धीमी लेकिन मज़बूत. “विजय, प्लीज मत. मैंने कहा था— प्यार नहीं चाहती. सिर्फ सेक्स. बस इतना hi हो सकता है. कोई वादा नहीं, कोई कल नहीं. सिर्फ आज रात. सिर्फ जिस्म. अगर क़ुबूल नहीं कर सकते तो अभी रुक जाते हैं.”

उसने लम्बे वक़्त तक देखा, फिर धीरे सर हिलाया. “अभी के लिए क़ुबूल. लेकिन मत उम्मीद करो की मैं एहसास बंद कर दूँ.” फिर चूमा, इस बार नरम, प्यार भरा, फिर हाथ नीचे जाने लगे.

हाथों ने पीठ पर स्लाइड किया, रीढ़ की हड्डी के अलोंग, गांड तक पहुंचे. दोनों गांड के टुकड़ों को मज़बूती से पकड़ा, उँगलियाँ नरम, भरी गोश्त में धंस गयी. अम्मी ने छोटी सी be-ikhtiyar सांस छोड़ी जब वह मसलने लगा— धीमे, गहरे दबाव जो गांड को थोड़ा हिलाते थे.

ज़ोर से निचोड़ा, पंतय के ऊपर से टुकड़े अलग किये, फिर बाउंस बैक होने दिया. मेरा दिमाग घूम गया जलन और हैरत से.

यह हरामी कितना किस्मत वाला है जो अम्मी की बड़ी गांड के गोश्त को ऐसे निचोड़ रहा. वह गांड एक शाहकार थी— बेहद गोल, नामुमकिन नरम, वह मोती, मुलायम गांड जो बड़े मर्दों को पागल कर देती. हर तरफ से मोती: साइड से शेल्फ जैसी उभरी, पीछे से दो परफेक्ट, भरी गोल टुकड़े जो थोड़ी सी हरकत से हिलते.

चमड़ी नरम, गरम, रानों से मिलने पर हलके डिम्पल्स, और बीच का गहरा छेद किसी भी बहादुर मर्द के लिए जन्नत का वादा. कितने मर्द घुटने तक कर इस गांड में चेहरा दफना देंगे? कितने शादी का प्रपोजल दे देंगे अगर एक बार पकड़ सकें, वज़न हाथों में महसूस करें, धक्के से हिलते देख सकें? यह जादू था— भरी, रसीली, सबसे असली औरत वाली.

विजय की उँगलियाँ गोश्त में गायब, जैसे आता गोन्ध रहा हो, फैलाते और छोड़ते, हर निचोड़ से गांड के टुकड़ों में लहार.

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वह गांड पूजा के लायक थी; पकड़ने, थपड़ने, छोड़ने, भरने के लिए बानी. मर्द इस हक़ के लिए क़त्ल कर देंगे जो विजय के पास था— हाथ अम्मी की शानदार, मोती, परफेक्ट गांड से भरे.

विजय ने गले से गहरी आवाज़ निकली, तारीफ से भरी. “खुदा, शाहिदा… यह गांड असली नहीं लगती. इतनी बड़ी, इतनी नरम, इतनी भरी. पूरी ज़िन्दगी सिर्फ ऐसे पकड़ कर गुज़र सकता हूँ. देख कैसे हाथों में भर जाती— बहार निकल रही, हर निचोड़ पर हिल रही. इतनी शानदार मोती गांड कभी नहीं देखि.”

अम्मी ने कांपते हसी, आधी शर्म, आधी गरम. “तू पागल हो गया है इस पर.” “हाँ,” उसने बिना शर्म के क़बूल किया.

“मैं इस गांड के ख्वाब देखता था. जब तू चलती है कैसे हिलती, जब घर में टाइट स्कर्ट पहनती तो कैसे दिखती. यह जुर्म है कितनी परफेक्ट है. इतनी गोल, इतनी भरी… काटना चाहता हूँ, थपड मारना, इसमें हमेशा दफन होना.”

वह थोड़ा हिलती, पीछे उसके हाथों में धकेलती. “ऐसे बातें जारी रखेगा तो शायद सब करने दूँ.”

उसने फिर निचोड़ा, इस बार ज़ोर से, अंगूठों से राण और गांड के मिलने वाली लाइन पर. “वादा?”

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अम्मी की सांस रुक गयी. फिर अचानक थोड़ा अलग हुई, उलझी नज़र निघटस्तंड पर फ़ोन पर. “रुक… पहले एक कॉल करनी है. सिर्फ एक मिनट.”

विजय ने भंव चढ़ाई, हाथ अभी भी कमर पर. “क्या हुआ? फिर परेशां लग रही हो.” उसने होंठ काटा, साफ़ उलझी. “मुझे शौहर को कॉल करना है. वह अभी हॉस्पिटल में है. उसकी आवाज़ सुन्नी है, रात भर ठीक है या नहीं. बिना जाने… यह नहीं कर सकती. प्लीज समझ.”

विजय ने लम्बे वक़्त तक देखा, फिर धीरे सर हिलाया. “बिलकुल. कॉल कर. मैं इंतज़ार करूँगा. जितना वक़्त लगे.”

यह मर्द उसके लिए इतना भूखा था, छोड़ने को इतना बेकरार, की यह देर उसके लिए सजा थी.

उसके जिस्म की हर लाइन से दीखता— जबड़ा बंद, हाथ मुठी, पंत में बड़ा उभार कपडे के खिलाफ दर्द से डाब रहा. वह उसे अभी झुकना चाहता था, अंदर घुसना, उस जिस्म में खुद को गम कर देना जिसके ख्वाब हफ़्तों से देख रहा था.

हर सेकंड बिना अंदर हुए उसके लिए दर्द था— सांसें टूटी हुई, आँखें काली और चमकती, लुंड कपड़ों के नीचे हिल रहा. वह भूखा था, बेचैनी से काँप रहा, लेकिन पीछे हटा, उसे जगह दी.

अम्मी ने शुक्रिया भरी नज़र दी. “शुक्रिया. यहाँ रुकना. जल्दी करुँगी— वादा.” वह बाथरूम की तरफ चली, और हर कदम पर गांड शानदार हिलती— टुकड़े भरी रोल करते, धीमे बाउंस, सफ़ेद पंतय बीच में थोड़ी धंसी, गहरा छेद साफ़.

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यह चल जादू थी, नाम भुला देने वाली.

वह बाथरूम में दाखिल हुई और दरवाज़ा आधा बंद किया, इतना खुला की आवाज़ साफ़ होटल की पतली दीवारों से गुज़र जाये.

मैं बहुत किस्मत वाला था. मेरी छुपी जगह— सर्विस कॉरिडोर में तंग ालकवे बिलकुल उनके कमरे के बहार— परफेक्ट एंगल देती थी. दीवारें कागज़ जैसी पतली; हर लफ्ज़, हर सांस जैसे पास खड़ा हूँ.

बाथरूम के खुले दरवाज़े के टुकड़े से अंदर का शानदार मंज़र दीखता: चमकती सफ़ेद मार्बल काउंटर, बड़ा मिरर जो सब रिफ्लेक्ट करता, नरम रेसेस्सेड लाइट्स जो गरम, क़रीबी रौशनी डालते.

मैं दीवार से चिपक गया, सांस रोक कर, हर हरकत अंदर होने वाली चीज़ पर कान लगाए.

अम्मी ने फ़ोन उठाया और नफीसा का नंबर डायल किया. दो घुंटी के बाद जुड़ गया. “नफीसा? मैं हूँ,” अम्मी ने फिसफिसाया, आवाज़ कांप रही. “बात करनी है.”

शाहिदा: (धीमी, फिसफिसाहट, साफ़ घबराई) नफीसा… हे… मैं हूँ. अभी फ्री हो? मुझे… सच में बात करनी है. कुछ हो रहा है और… समझ नहीं आता कैसे कहूँ. खुदा, हाथ कांप रहे हैं.

नफीसा: (हलके से हंसती) शाहिदा, बेबी, तू ऐसी आवाज़ में जैसे बेहोश होने वाली है. क्या हुआ? सांस ले. मुझे डरा रही है.

शाहिदा: (रुक रुक कर, आवाज़ पहात रही) मैं… सोच भी नहीं प् रही. गजेंद्र… उसको अचानक जाना पड़ा. काम का इमरजेंसी. बस सामान पैक किया और चला गया. अब मैं अकेली हूँ और… समझ नहीं आता क्या कर रही हूँ. कितनी बेवक़ूफ़ लग रही हूँ. इतनी उलझी.

नफीसा: आराम से, तू छोटी छिनाल. (मज़ाक़, प्यार भरा) फिर से ड्रामा में फँस गयी. बता क्या हो रहा. जानती है मैं तेरी गन्दी कहानियों के लिए हूँ.

शाहिदा: (अभी भी टालती, आवाज़ कांप रही) नहीं, यह उससे भी बुरा है. मैं घर पर नहीं. कहीं और हूँ. और यहाँ एक मर्द… अभी बहार इंतज़ार कर रहा है. बाथरूम में छुपी हूँ जैसे बेवक़ूफ़. बहुत गुनाह महसूस हो रहा. हुसैन याद आ रहा, गजेंद्र… यहाँ क्या कर रही हूँ मैं?

नफीसा: (नरम लेकिन मज़बूत) शाहिदा, रुक. मेरे साथ सांस ले. अंदर… बहार. तू सेफ है, मुझसे बात कर रही. अब धीरे बता कहाँ है और यह मर्द कौन. अब ताल मत, ठीक?

शाहिदा: (लम्बे वक़्त चुप, सांस तेज़) ठीक… ठीक. मैं होटल में हूँ. बहुत शानदार वाला. विजय के साथ. यह अमीर आदमी है जिससे मिला. सच में अमीर. गजेंद्र गया और विजय… बस आ गया. बहुत ाचा है, नफीसा. चीज़ें खरीदता, ख्याल रखता. लेकिन अब… बहार बाथरूम के दरवाज़े पर इंतज़ार कर रहा और मैं… लगता है वह चाहता है… समझ रही न.

नफीसा: (हंसती) ओह मेरा खुदा, तू पूरी छिनाल. (दोस्ताना, मज़ाक़) बाथरूम में छुपी जब अमीर मर्द छोड़ने का इंतज़ार कर रहा? क्लासिक शाहिदा. पूरा बता. क्या हो रहा सच में?

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शाहिदा: (आवाज़ छोटी, शर्मिंदा) प्लीज जज मत… मैं बहुत उलझी हूँ. वह मुझे छू रहा, चुम रहा… और मैंने दिया. लेकिन अब ज़्यादा चाहता है. मुझे छोड़ना चाहता है, नफीसा. यहाँ. और मैं… नहीं जानती करना चाहिए या नहीं. बता सच… क्या विजय को मुझे छोड़ने दूँ?

नफीसा: (ज़ोर से हंसती, फिर सीरियस) रुक— तू सच पूछ रही? “क्या उसको छोड़ने दूँ?” लड़की, सीरियस है? तू होटल के बाथरूम में छुपी है जब अमीर लुंड बहार इंतज़ार कर रहा और मुझसे इजाज़त मांग रही? तू पूरी रंडी है, शाहिदा. बिलकुल रंडी और तू जानती है.

शाहिदा: (चुपके, क़ुबूल करते हुए लेकिन कांप रही) …जानती हूँ. मैं रंडी हूँ. हुसैन को गजेंद्र के साथ धोका दिया… और अब यह. लेकिन नफीसा… मैं अभी भी गजेंद्र से बहुत प्यार करती हूँ. उसने मुझे ऐसे एहसास दिए जो किसी ने नहीं. अगर यह सब बर्बाद कर दे तो? मैं डर्टी हूँ.

नफीसा: (उत्साहित, आवाज़ गरम लेकिन मज़बूत) ओह हनी, गजेंद्र से प्यार? प्यारा. लेकिन उसने तुझे छोड़ दिया, याद है? काम का इमरजेंसी मेरी गांड— वह गया. तू रंडी है, शाहिदा. हमेशा थी. तुझे लुंड चाहिए. तू उसकी प्यासी है. ज़्यादा सोचना बंद कर और विजय को तुझे पागल करने दे. वह अमीर है, यहाँ है, और तू पहले से गीली सोच कर. जानती हूँ तू है.

शाहिदा: (अभी मन करती, आवाज़ रुक रुक) नहीं… जल्दी है. गजेंद्र वापस आ सकता है. नहीं करना चाहिए. शायद घर चली जॉन…

नफीसा: (ज़ोर डालते, एक्ससिटेड) सिर्फ एक बार तरय कर! चल न, छिनाल. सिर्फ एक बार दुसरे मर्द के साथ. महसूस कर कितना अलग है. गजेंद्र ने अच्छा छोड़ा, ठीक, लेकिन विजय अमीर— स्टैमिना सोच, पैसा, कैसे फैलाएगा. तू वैसे भी रंडी है. एक और लुंड से क्या फ़र्क़? बाद में शुक्रिया देगी.

शाहिदा: (धीमी हसी, अभी उन्सुरे) नफीसा… तू नामुमकिन है. जानती हूँ मैं रंडी हूँ… लेकिन गुनाह लगता. गजेंद्र का चेहरा याद आ रहा.

नफीसा: (बेशरम, आवाज़ नीचे और गन्दी) गुनाह? गुनाह को छोड़. बता— विजय का लुंड गजेंद्र से बड़ा है? मोटा है? बहार दरवाज़े पर सख्त है? सोच उसके नीचे सिंक पर झुकाई, धक्के मारता जब तू बेकरार छोटी रंडी की तरह कराह रही. तुझे इस्तेमाल होना पसंद है, शाहिदा. जब गजेंद्र ने पहले हुसैन के पीछे छोड़ा था तब पसंद आया था. यह वही है. सिर्फ बेहतर. अमीर. जा ले वह लुंड, बेबी. उसे भरने दे. बेट तू मेरी बात सुन कर टपक रही है.

शाहिदा: (चौंक कर, सांस रूकती) नफीसा! ओह मेरा खुदा… कैसे बोल रही? तू कितनी बेशरम! मैं… यकीन नहीं होता तूने कहा. दिल अब तेज़ धड़क रहा…

नफीसा: (शरारती हंसती) मेरी रंडी. देखा? तू पहले से गरम है. लड़ना बंद कर. बहार जा, टॉवल गिरा, और विजय को तेरी छूट बर्बाद करने दे. बाद में हर तफ्सील बता. साइज, कितना ज़ोर से छोड़ता, कितनी बार झड़वाया—

[Achanak bathroom ke darwaze par mazboot thapki.]

विजय: (धुंधला लेकिन साफ़, गहरी आवाज़, बेकरार) शाहिदा? बेबी, बहुत देर हो गयी. बहार आ. मैं इंतज़ार कर रहा.

शाहिदा: (तेज़ फिसफिसाहट, घबराई) ओह टट्टी— वह थपकी दे रहा! नफीसा, वह बिलकुल यहाँ—

[Usne jaldi phone kaan se hataya lekin poora band nahi kiya. Line judi rahi. Rustling sunai di jab usne darwaza khola. Vijay ne turant dhakka diya.]

विजय: (अंदर आते, आवाज़ भूखी) वहां थी तू… अब.

शाहिदा: (चौंक कर, आवाज़ कांप रही) विजय— रुक, एक सेकंड—

[Phone ab uske seene se chipka, lekin judi. Nafisa ki awaaz dheemi lekin saaf sunai de rahi thi line par.]

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नफीसा: (ज़ोर से, फिकरमंद लेकिन मज़ा लेते हुए) Hello? शाहिदा? जान? क्यों नहीं जवाब दे रही? क्या वह अंदर आ गया? क्या वह अभी तुझे छोड़ रहा है? शाहिदा! बात कर न! तू रंडी, फ़ोन मत काट बिना बताये—

[Call halki si judi rahi jab Shahida ki saansein tez hone lagi.]

नफीसा: (लाइन पर hi, धीमे से हँसते हुए) ओह मेरा खुदा… सच में कर रही है न तू? अच्छी लड़की. मज़े ले उस अमीर लुंड के, रंडी. बाद में कॉल करना… या मत करना. मुझे पता है तू बहुत बिजी होगी छुड़वाने में.

वह बाथरूम का दरवाज़ा धीरे से खोला और अंदर आया, बेचैन और लगभग पागल सा. सीना ऊपर नीचे हो रहा था, आँखें अम्मी पर जैसे शिकार को पकड़ लिया हो. “शाहिदा… अब और बर्दाश्त नहीं होता. प्लीज.”

मुझे भी वही जल्दी थी. मेरा लुंड दर्द कर रहा था सख्त होकर, इंतज़ार से धड़क रहा. मैं इंतज़ार नहीं कर सकता था अम्मी को फिर चुड़ते देखने का— देखने का उसका जिस्म किसी और मर्द को ले रहा, उसकी कराहें टाइल्स पर गूँज रही.

अम्मी ने जल्दी कॉल काट दी और उसकी तरफ मुड़ी. “मैंने अभी अपने शौहर से बात की. वह ठीक है— आराम से सो रहा. नर्स ने कहा वह स्टेबल है.”

विजय ने सर हिलाया, लेकिन नज़र तेज़ थी. “तू अभी भी परेशां लग रही है. क्यों? मुझसे बात कर.”

वह रुक गयी, आँखें ज़मीन पर. दिल के अंदर वह नहीं चाहती थी एक से ज़्यादा मर्द उसके शौहर के बहार उसको छोड़ें. गजेंद्र पहला और आखरी गलती था— या वह खुद से ऐसा कहती थी.

अम्मी ने उसके पंत से लुंड बहार निकला और सहलाने लगी. उसका लुंड बहुत बड़ा था.

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एक प्रेमी तो सिर्फ एक छोटी सी गलती लगती थी, जो कभी इक़रार कर के तौबा कर सकती थी. लेकिन दो? यह हद्द पार कर जाता था, कुछ जो वापस नहीं आता, जिससे वह सच में गुमराह महसूस करती थी.

यह ख्याल उसको खा रहा था— उसके ज़मीर को छेड़ रहा, याद दिलाता कितनी दूर गिर गयी है. वह सिर्फ गजेंद्र से छुड़वाना चाहती थी, गुनाह को एक शख्स तक सीमित रखना चाहती थी, एक कमज़ोरी. लेकिन दरवाज़ा खुल गया, अब बंद नहीं हो रहा था.

वह खुद को बार बार दोष देती— गजेंद्र को अंदर आने दिया, ज़्यादा मज़ा लिया, रोक सकती थी लेकिन नहीं रोका. अब विजय से दो मर्द हो गए, और गुनाह गले तक आ गया था.

विजय: (आवाज़ धीमी, भूखी, मुस्कुराते) आखिरकार. बहुत देर कर दी, बेबी. देख तेरी हालत… यह छोटी पीली पंतय तेरी मोती गांड को जकड रही, और यह नीली ब्लाउज तेरे चूचियों को मुश्किल से संभल रही. फ़क, तू कितनी सेक्सी है. लेकिन अब इंतज़ार ख़तम.

शाहिदा: (घबराहट में, पीछे हैट कर जब तक गांड मार्बल काउंटर से न टकराये, आवाज़ कांप रही) विजय… मैं अभी भी डर्टी हूँ. अभी क्या चाहता है? क्या हम… धीरे शुरू करें? जैसे पहले?

विजय: (मुस्कराहट बड़ी, हाथ बढ़ा कर कमर पकड़ी, उसे खुद से चिपकाया) धीरे? नहीं, शाहिदा. आज रात तेरी छूट नहीं. मैं तेरी गांड मरना चाहता हूँ. यहीं. अभी. अपना लुंड तेरी इस बड़ी, रसीली _ गांड में गहरा डालना चाहता हूँ.

शाहिदा: (आँखें फैली, मुँह खुला, सच्चा शॉक) K-kya?! मेरी… मेरी गांड? विजय, नहीं! पागल हो गए हो? सोचा था नार्मल चाहिए… जैसे कोई मर्द चाहता है. वहां नहीं! मैंने कभी… नहीं कर सकती!

विजय: (शांत लेकिन तेज़, हाथ नीचे गांड के टुकड़ों पर दबाते हुए पंतय के ऊपर) हाँ कर सकती है. और करेगी. सुन बेबी. मैंने बहुत औरतों को छोड़ा… लेकिन कभी किसी _ औरत की गांड नहीं मारी. कभी नहीं. मुझे वह ताक़त चाहिए. एक फख्र वाली, खूबसूरत _ बीवी जैसे तू को झुककर उसकी सबसे टाइट, सबसे हराम छेद देना. तेरा शौहर हुसैन जान दे दे अगर जाने तो, सही? और तेरी यह बड़ी गांड… फ़क, इतनी मोती और नरम गांड कभी नहीं मिली. मुझे चाहिए. उसे फैला कर अपना बनाना है.

शाहिदा: (थोड़ा गुस्से में, सीने पर हल्का धक्का, आवाज़ ऊँची) विजय, ऐसे बात मत कर! जैसे कोई… जीत का मामला हो. मैं तेरी ट्रॉफी नहीं. और मेरी गांड तेरे “अपने” करने के लिए नहीं. मैं तैयार नहीं. बहुत ज़्यादा है. प्लीज, सिर्फ… मेरी छूट, ठीक? या इंतज़ार करें. मैं अंदर साफ़ नहीं हूँ, विजय. कुछ तैयार नहीं किया. दर्द होगा. नहीं चाहती.

विजय: (अभी भी निचोड़ता, गांड के टुकड़ों को गहरा मस्सगे देते, आवाज़ मानाने वाली और नरम) चल न, शाहिदा. मुझसे झूठ मत बोल. तू बड़ी हो. ले सकती है. पहले धीरे जाऊंगा. रिलैक्स कर. तू पहले से गीली है— बू आ रही है. मुझे यह एक चीज़ दे दे. सोच कितनी ताक़त महसूस होगी जब मैं तेरी यह कुंवारी जैसी _ गांड में घुसूंगा. कितना ाचा लगेगा मेरा लुंड इन बड़े टुकड़ों के बीच गायब होते हुए. तू इसके लिए बानी है, बेबी. यह गांड छोड़ने के लिए बानी है.

शाहिदा: (शिकायत ज़्यादा, आवाज़ परेशां और झिझक भरी, अभी भी पाक बनने की कोशिश) नहीं, मेरी बात सुन! सच में तैयार नहीं. ज़िन्दगी में कभी गांड नहीं छुड़वाई— कभी नहीं! गजेंद्र ने कभी माँगा भी नहीं. मैं वैसी औरत नहीं. और अंदर… साफ़ नहीं है, विजय. क्या पता कुछ हो जाये? सच बोल रही हूँ. मैं अच्छी औरत हूँ. सिर्फ गजेंद्र के साथ गलती की क्योंकि… उसने मुझे ख़ास महसूस करवाया. लेकिन यह? यह गन्दा है. नहीं कर सकती.

विजय: (अँधेरे से हँसते, एक हाथ गांड पर, दूसरा थोड़ी उठा कर आँखों में देखता) सच में? कभी नहीं? कितना प्यारा. लेकिन मैंने होटल की कैमरा फुटेज देखि, शाहिदा. कल रात वाली रूम की. तू चार हाथों पर थी गजेंद्र के लिए. उसने तेरी गांड को कच्चा छोड़ा जब तू रंडी की तरह कराह रही थी. मैंने सिक्योरिटी फीड पर पूरा देखा जब तुझे यहाँ लाने से पहले. तू ने उसको पहले hi गांड दे दी. तो मेरे सामने पाक बनने का नाटक बंद कर. मुझे बिलकुल पता है तू कैसी छिनाल है.

शाहिदा: (पूरा शॉक, चेहरा लाल, पीछे हैट कर, आवाज़ पहात रही) तू… तू क्या?! कैमरा?! हे खुदा, विजय… तूने वह देखा? वह प्राइवेट था! मुझे पता नहीं था कैमरा है! कैसे कर सकता है… बहुत शर्मिंदा हूँ. इतना नंगा महसूस हो रहा. प्लीज डिलीट कर दे. प्लीज! अब डर लग रहा. क्या पता कोई और देख ले? क्या पता हुसैन को पता चले?

विजय: (उसे वापस खींच कर, आवाज़ शांत और तसल्ली देने वाली) आराम से, बेबी. सिर्फ मेरे पास है. कोई और नहीं देखेगा. लेकिन वह देख कर इतना गरम हुआ की और ज़्यादा चाहता हूँ. अब झूठ बंद. तू पाक नहीं. अब तू मेरी छोटी _ छिनाल है.

शाहिदा: (अभी भी डर्टी, फिसफिसाते, आँखें बड़ी) लेकिन… अगर मैं तेरे लुंड पर टट्टी कर दूँ तो? बहुत डर लग रहा, विजय. अंदर खली नहीं. हो सकता है. तुझे घिन नहीं आणि चाहिए. क्या कंडोम है? प्लीज बता कंडोम है. काम से काम वह तो.

विजय: (धीमे हँसते, बिलकुल नाराज़ नहीं, हाथ गांड को और मसलते) कंडोम? गांड के लिए? नहीं बेबी. कुछ बीच में नहीं चाहिए. और अगर तू मेरे लुंड पर टट्टी कर दे तो कोई बात नहीं. हम बाथरूम में हैं, शाहिदा. अगर टट्टी आने लगे तो कर दे. यहाँ hi. मेरे लुंड पर अगर हो जाये. बाद में शावर में सब साफ़ कर देंगे. सच बोल रहा हूँ. मुझे असली तू चाहिए— गन्दी, गन्दगी वाली, सच्ची. कुछ नकली नहीं. इतना चाहता हूँ तेरी यह बड़ी _ गांड.

शाहिदा: (घिन से, चेहरा सिकुड़ता, सीने पर धक्का लेकिन कमज़ोर) िक्ख, विजय! कितना गन्दा! कैसे इतनी आसानी से बोल देता है? सच में चाहता है मैं… टट्टी तेरे ऊपर कर दूँ? यह बहुत घिनौनी बात है. सोच कर hi उलटी आती है. तू सच में इतना ज़िद्दी है मेरी गांड के लिए?

विजय: (नरम आवाज़, अभी भी गांड के टुकड़ों को धीरे चक्कर लगते, उसे धीरे से गले लगते) हे… हे, मुझे देख. मैं ज़िद्दी नहीं. मैं तेरे लिए पागल हूँ. इस जिस्म के लिए. तू कितनी खूबसूरत है, शाहिदा. यह बड़े नरम टुकड़े, यह पतली कमर, जब तू घबराती है तो लाली… सब पसंद है. बहुत धीरे जाऊंगा, वादा. सिर्फ सुपारी पहले. फिर इंच इंच. तू भरी महसूस करेगी, लेकिन ाचा. जितनी देर तू कहे रुक जाऊंगा. लेकिन जानता हूँ तू ले सकती है. गजेंद्र को तो ले लिया. अब मुझे ले. तुझे रानी जैसा महसूस करवाऊंगा… जब अंदर की छिनाल को छोडूंगा.

शाहिदा: (अभी भी झिझक लेकिन उसके बाहों में पिघलती, आवाज़ छोटी) मैं… नहीं जानती. डर लग रहा. लेकिन… ठीक है. तेल. शेल्फ पर मस्सगे का तेल है. अगर करना है… तो वह उसे कर.

विजय: (मुस्कुराते, माथा चूम कर) अच्छी लड़की. जा कर ला दे मेरे लिए.

[Ammi mudi, ungliyon par khadi hokar, peeli panty gaand par kasi hui jab woh glass shelf se chhota body oil ka bottle uthati hai. Use sharm se dete hue. Phir bina sochay aage badh kar use zor se gale lagaya, chehra uske seene mein chhupa liya.]

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विजय: (बाहों में जकड कर, एक हाथ तेल हाथ में डालता, दूसरा गांड के टुकड़ों पर रगड़ता, धीरे गहरा मस्सगे) बस यह, बेबी. मुझे गले लगा. महसूस कर सुरक्षित. मैं यहीं हूँ. बहुत नरम रहूँगा. पहले धीरे चक्कर… ऐसे hi. महसूस कर मेरे उँगलियाँ कैसे तेल तेरी खूबसूरत बड़ी गांड पर फैला रही? कितनी नरम… कितनी गरम. तू परफेक्ट है, शाहिदा. जल्दी नहीं करूँगा. पूरी रात लगेगी अगर ज़रूरत पड़े. तू मेरी अच्छी लड़की है आज रात. मेरी सेक्सी _ रानी जिसकी सबसे मोती गांड मैंने छुई. रिलैक्स… सांस ले… मुझे धीरे से खोलने दे. तुझे पसंद आएगा. वादा.

शाहिदा: (उसके सीने में बुदबुदाते, आवाज़ अभी कांप रही लेकिन हाथों के नीचे पिघलती) विजय… तू मुझे बहुत घबरा रहा है… लेकिन… ऐसे hi बात करते रहो. प्लीज. बस… बहुत धीरे. सच में धीरे.

विजय: (गहरा मस्सगे जारी, उँगलियाँ पीली पंतय के किनारे के नीचे, आवाज़ धीमी और तसल्ली देने वाली) करूँगा, बेबी. बहुत धीरे. इंच इंच. जब तक यह बड़ी गांड पूरी मेरी न हो जाये. तू अभी से बहुत अच्छा कर रही है…

विजय ने वह छोटा तेल का बोतल उठाया जो अम्मी ने पहले शेल्फ पर इशारा किया था. उसे उठा कर देखा, आँखें काली. “मुड़ी. जब तू गांड मरवाने को राज़ी हुई, तो यहीं बाथरूम में करेंगे. इस तरह बिस्तर की चादर ख़राब नहीं होगी अगर गन्दगी हो जाये.”

मुझे बिलकुल समझ आया क्यों बाथरूम चुना— स्मार्ट और गन्दा दोनों. गांड चुदाई में हमेशा गन्दगी का खतरा होता; तेज़ चुदाई में टट्टी निकल सकती, ख़ास कर जब अम्मी इतनी ढीली हो चुकी थी.

बाथरूम की टाइल्स होसे से साफ़ हो जाती, ड्रेन वही था, होटल के मेहेंगे बिस्तर पर दाग या सबूत छोड़ने की ज़रूरत नहीं.

अम्मी धीरे से मिरर की तरफ मुड़ी. उन्होंने सफ़ेद पंतय के किनारे में उँगलियाँ डाली और टांगों से नीचे किया, नरम से बहार निकाली. फिर दोनों हाथों से पीछे जा कर गांड के टुकड़े फैलाये, अपना टाइट पुकेरेद गांड का छेद पूरा विजय को— और मेरे छुपने के नज़र को— नंगा कर दिया.

विजय तुरंत घुटनों पर बैठ गया पीछे. वह बिलकुल पास झुका, नाक छेद से लगभग छूती, और गहरी सांस ली. “ममम…”

अम्मी सांस रोकी और थोड़ा पीछे हटने की कोशिश. “विजय, मत… ऐसे नहीं. प्लीज.”

वह नहीं हिला. “बू आ रही है गन्दी, शाहिदा. मुझे पसंद है. यह तेरी गांड की असली बू— आज से नहायी नहीं, कच्ची और फिटरी. नशा करने वाली. चाहता हूँ जुबां यहीं दाल कर हमेशा रखूँ.”

अम्मी की आवाज़ छोटी और शर्मिंदा. “आज नहायी नहीं… पूरा दिन दौड़ती रही. माफ़ करना अगर बुरी बू है.”

वह फिर गहरी सांस ली, लगभग कराह कर. “माफ़ी मत मांग. यह बू परफेक्ट है. सबसे अच्छी तरह गन्दी. यह तू है— बिना फ़िल्टर, गन्दी, औरत वाली. ज़्यादातर औरतें साबुन और खुशबू से छुपाती हैं. तू नहीं छुपाई. इसलिए और गरम लग रही.”

कई लम्बी मिनट तक उसने गांड की पूजा नाक से की— सूंघा, रगड़ा, पुकेरेद रिंग पर धीमे चुम्बन दिए— फिर अम्मी मुड़ी, घुटनों पर बैठ गयी, और उसका लुंड मुँह में ले लिया.

वह जोश से चूसती रही, सर आगे पीछे, गाल अंदर, जुबां सर पर घूमती जब हाथ नीचे से सेहला रहा था. विजय ऊपर से कराह रहा, उँगलियाँ बालों में, रदम गाइड कर रहा.

फिर वह कड़ी हुई, पलटी, काउंटर पर थोड़ा झुक गयी, हाथ मार्बल पर टिका. विजय पीछे खड़ा हुआ, उसके तेल वाले गांड के छेद पर मोटा सर रखा. वह धीरे से आगे धकेला.

आसानी से अंदर गया— अम्मी का गांड का छेद पहले से ढीला और त्रिनेड था गजेंद्र के कई बार छोड़ने से. गजेंद्र का बड़ा लुंड ने उसे हर रात फैलाया, टाइट रिंग को खोला, मसल्स को सिखाया रिलैक्स और क़ुबूल करना बिना दर्द. जो पहले मुश्किल था अब आसान और खुला— छेद ने विजय के लुंड को लगभग भूखे से निगल लिया, दीवारें जकड रही स्नूज लेकिन बिना विरोध.

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विजय गहरी कराह जब पूरा अंदर तक गया. “फ़क… तू पीछे से इतनी खुली हुई है. इतनी आसानी से अंदर जा रहा. गजेंद्र ने सच में इस गांड पर काम किया था, न?”

उसका लुंड बड़ा था— मोटा, नसें भरा, लम्बाई पूरी भरने लायक— लेकिन गजेंद्र जितना भयानक नहीं. गजेंद्र का हर बार हद्द तक फैलता, गपिंग और दर्द छोड़ता. विजय का इम्प्रेससिवे, संतुष्ट करने वाला, ज़्यादा आराम से फिट, अंदर तक जब तक हिप्स उसकी नरम गांड के टुकड़ों से न चिपके.

अभी खड़े खड़े, वह गांड में गहरे, मुस्तक़िल धक्के मरने लगा. हाथ कमर पर जकड़े, हर धक्के में उसे पीछे खींच कर लुंड पर बिठा रहा. चमड़ी की थापक मार्बल दीवारों पर गूँज रही— गीली, ताल वाली, बेहया. उसकी बड़ी गांड हर टक्कर पर भरी हुई हिल रही, टुकड़े हिलते उछलते जब वह अंदर बहार.

अम्मी ज़ोर से कराह रही, आवाज़ बाथरूम में गूँज रही. “अह्ह्ह… विजय… इतना गहरा जा रहा… हाँ… बिलकुल ऐसे hi…”

वह धक्के तेज़ करता रहा, हिप्स ज़ोर से आगे, तेज़. “ले, शाहिदा. हर फूकिंग इंच ले इस खूबसूरत मोती गांड में. तू इसके लिए बानी है.”

उसकी कराहें और ऊँची, बिना रोक टोक, कमरा भर रही जब वह खड़े खड़े उसकी गांड मार रहा, लुंड गहरा ढीली, खुली गांड में, तेल से हर स्लाइड चमकती और गीली.
 
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