Romance भंवर (पूर्ण) - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

hotaks

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हर मोड़- मोड़, हर डगर- डगर

भंवर है ये भंवर- भंवर....

कोई नोटों की कमाई में लिप्त है

कोई वोटों की दुहाई में संलिप्त है।

हर किसी कहानी कि बस एक दास्तां

जहां घिरे वहीं फसे, फसे तो बस फंसते रहे

फिर चाहे प्यार में फसे या परिवार में फसे

व्यापार में फसे या गलत कारोबार में फसे

हर मोड़- मोड़, हर डगर- डगर

भंवर है ये भंवर- भंवर....
 
Update-1

मैं पहली बार उसे देख रहा था। दिल में कुछ मीठा एहसास और मन में कतुहल सी थी। मेरा दिल बेईमान, नजरें उसपर से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी और मै बस उसे ही घुरे जा रहा था। शायद उसने ने भी मुझे पकड़ लिया लेकिन वो सामान्य रूप से ही अपना काम करती रही और काम ख़त्म होने के बाद चली गई।

उसके जाने के बाद भी, पता नहीं मैं कितनी देर तक उसे देखने की आश लगाए उस बालकनी में खड़ा रहा। फिर पीछे से आवाज़ आई, "चलो अपस्यु देर हो गई तो कैंटीन बंद हो जाएगी"

उस आवाज़ ने जैसे मेरा ध्यान भंग कर दिया हो, वहां से मै लौट तो आया किंतु मेरा हृदय वहीं रह गया। अब तो जैसे वो बालकनी ही मेरा पूरा संसार था। उसके देखने कि आश लिए मैं बालकनी में ही उसका इंतजार करता रहता। कभी एक क्षण तो कभी चंद मिनट कि वो झलकियां दिखा कर चली जाती।

मेरे बदले व्यव्हार को मेरा कमरा साझा करने वाला मेरा जुड़वा भाई आरव भी गौर कर रहा था किंतु वो भी अब तक इस मामले में मुझ से खुल कर बात नहीं कर रहा था। शायद उसे भी ज्ञात था कि इस उम्र का तकाजा ही यही है।

लगभग महीना समाप्त होने को आया था और मै आज भी बालकनी से चिपका उसी के दीदार में लगातार वहीं इंतजार करता रहता। अंत में एक दिन आरव ने ही अपनी चुप्पी तोड़ी…

"अपस्यु माजरा क्या है? घंटो यहीं बैठे रहते हो"

मैं (अपस्यु)- आरव, लगता है मेरा उस से कुछ पुराना नाता है। केवल उसी को देखने का मन करता है।

आरव:- "उसी को" मतलब किस को?

मै :- नाम तो नहीं मालूम लेकिन हां सामने के बंगलो की कोई लड़की है।

आरव:- ओह हो ! तो ऐसी बात है, अब आगे क्या?

मैं:- आगे क्या?

आरव:- वहीं तो मैं तुम से जानना चाह रहा हूं…. अब आगे क्या?

मै:- वहीं तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि मुझे कुछ पाता नहीं, अब आगे क्या करू?

आरव:- मैं तो केवल इतना ही कहूंगा कि आगे जो भी करना वो अपने पिछली ज़िन्दगी को याद रख कर ही करना। मैं मना तो नहीं कर रहा तुम्हे दिल लगाने के लिए लेकिन ये याद रखना भी जरूरी है कि हम इस शहर में अपनी मर्जी से आए नहीं अपितु लाए गए है।

आरव की बात सुनकर मैं खामोश हो गया और बालकनी से वापस अा कर अपने बिस्तर पर बैठ गया। आरव की बात सुनने के बाद एक पल में ही जैसे अब तक की सारी कहानी आंखों के सामने घूमती नजर आने लगी। मैं खामोश बैठा कई बातों का आकलन एक साथ करने लगा और मुझे इस तरह खामोश और उदास पा कर पहले आरव ने चिल्लाना शुरू किया और आगे मैंने भी पूरे जोश से उसका साथ दिया…

"हम मतवालों की टोली हैं, ना रुके है कभी, ना झुके हैं कभी और ना टूटे है कभी। मस्ती में आज फिर निकलेंगे मस्ताने दो, दीवाने दो।"

और कई अरसे बाद हमारी वहीं ज़हरीली हसी चारो ओर गूंज रही थी। लगभग रात के 11 बज रहे थे, हम दोनों भाई पूरे जोश के साथ रात्रि भ्रमण को निकाल पड़े। "डेविल ब्रदर्स" की फटफती यानी कि बुलेट अपने शानदार आवाज़ के साथ सड़क पर उतर चुकी थी।

फिर तो पुराना माहौल बन सा गया था.. दोनों भाई ने 2-2 पेग लगाया और काफी मस्ती के बाद अपने आशियाने कि ओर लौटने लगे। घर के नुक्कड़ पर हमारी फतफटी रुकी और जमाने बाद हमने अपना अपना पान लगवाया।

पान खाते हुए मैंने आरव को फ्लैट जाने के लिए बोल दिया और खुद पैदल ही वहां से लौटने लगा। अब इसे किस्मत कहूं या इत्तेफ़ाक, लेकिन कभी- कभी कुछ ऐसी घटना हो जाती है जो उम्मीद से परे होता है।

घर लौटने के क्रम में मुझे वो सामने से आती हुई दिखी। शायद वो खाना खाने के बाद टहलने निकली थी, उसके साथ कोई और भी थी किंतु उसपर ध्यान देना मैंने जरूरी नहीं समझा और उसी को एकटक निहारता रहा।

दिल का आलम तो पूछिए मत अंदर जो हो रहा था वो बयान नहीं किया जा सकता था। अजीब सी बेचैनी और दिल जोरों से धड़क रहा था। वो जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी मेरी धड़कने वैसे वैसे तेज हो रही थी। मेरे कदम जो अपने फ्लैट के ओर तेजी से बढ़ रहे थे वो मानो वहीं जम गए थे।

वो अपनी चाल से आगे बढ़ती मेरे करीब, और करीब पहुंच रही थी। उफ्फ…… ! जब वो मेरे करीब से गुजरी…… मैं बिल्कुल सुन पड़ गया.. अजीब मनोदशा जो आज से पहले मैंने कभी अनुभव ना किया हो। जैसे मैं किसी भंवर में हूं और उसमे फंसता चला जा रहा हूं….
 
Update:-2

कॉलेज से लौट कर जैसे ही साची घर के अंदर पहुंची, अपना बस्ता हॉल में लगे डायनिंग टेबल के ऊपर रख कर सीधी अपने मा के गोद में अपना सर रख कर वो फूट- फुट कर रोने लगी। अनुपमा मिश्रा (साची की मां) को कुछ भी समझ में नहीं आया कि ये हो क्या रहा है और इधर साची लगातार रोए ही जा रही थी।

किसी तरह अनुपमा ने उसे शांत करा कर उस से रोने का कारण पूछा। तब साची सिसकती हुई किसी तरह बोली कि वो परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाई है। एक ही वक़्त पर अनुपमा मिश्रा को दूसरा झटका लगा था क्योंकि साची फेल होने वाली छात्रा तो कभी नहीं रही।

अब अनुपमा को समझते देर न लगी कि उसकी बेटी को शायद उसके फेल होने का गहरा सदमा लगा है और इसलिए वो इतनी व्याकुलता से रो रही है। अनुपमा ने उसे सांत्वना दिया और हौसले से काम लेने के लिए कहने लगीं लेकिन साची थी कि उसे रह रह कर रोना अा रहा था।

सांझ तक पापा मनीष मिश्रा भी लौट आए जो कि एक जिलाधिकारी थे। यूं तो साची अपने पिता के सम्मुख नहीं गई किंतु उसके बारे में अनुपमा ने सारी बात बता दी। मनीष की तो जान बसती थी अपनी पुत्री में इसलिए वो सारे काम छोड़ कर सीधा अपने बेटी के कमरे में गया, पीछे-पीछे अनुपमा भी पहुंची..

मनीष, साची के सिर पर अपना हाथ फेरते उस से पूछने लगा… "क्या हुआ मेरे शेर को, वो आज ऐसे लोमड़ी क्यों बन गई"

अनुपमा:- अरे ! ये कैसी मिसाल है?

मनीष मुस्कुराते हुए कहा… "कुछ नहीं बस माहौल हल्का कर रहा था, वैसे तुम बता रही थी कि साची तुम से लिपट कर खूब रोई, लगता है पापा के लिए आंसू ही नहीं बचे इसलिए तो ये रो नहीं रही"..

अनुपमा, मनीष की बातों से चिढ़ती हुई कहने लगी… "ये कैसी बातें कर रहे हैं आप। यहां बेटी परेशान है और आप है कि बेतुकी बात कर रहे हैं। मुझे यहां चिंता खाए जा रही है….

मनीष:- तुम बेकार में चिंता कर के दिल कि मरीज मत हो जाना क्योंकि शायद ये बॉटल साची अपने बैग में ही भूल गई थी इसलिए अभी नहीं रोई…

अब तक साची जो अपना सिर झुकाए नीचे परी थी वो अपना सिर उठा कर पापा के हाथ में परी ग्लिसरीन की सिसी को देखने लग जाती है…. जैसे ही उसने ये देखा, जल्दी से उठ खड़ी हुई और अपने स्कूटी की चाभी लेे कर बाहर भागी… और जाते जाते कहने लगी "पापा मुझ से इतनी जल्दी पीछा छुड़ाना आप के लिए मुश्किल होगा"…

इस से पहले की अनुपमा कुछ कह पाती या समझ पाती साची फुर्र हो चुकी थी और मनीष अपनी जगह पर बैठ कर हंस रहा था। अनुपमा इस बार गुस्से से मनीष की ओर देखती है…. मनीष को लगा कि अब ज्यादा देर यदि बात को राज रखा गया तो कहीं अनुपमा ना कोई ड्रामा शुरू कर दे इसलिए वो राज से पर्दा उठाते हुए कहने लगा… "तुम ऐसे हैरान मत हो, साची जन बुझ कर फेल हुई है"

अनुपमा:- जान बूझ कर ! लेकिन क्यों?

मनीष:- शायद उसमे हमारी बात सुन ली थी कि ग्रेजुएशन बाद उसके लिए लड़का भी ढूंढना है।

अनुपमा अपने सिर पर हाथ मरती:- क्या करूं मैं इस लड़की का? पढ़ लिख कर कहो कुछ बन जा तो कहती है मै अपनी मा की तरह गृहणी बनूंगी मुझे प्रतियोगिता परीक्षा के नाम पर सिर दर्द नहीं पालना और जब शादी की बात सोच रहे हैं तो ऐसी हरकते। मनीष ये आप के कारण ही इतनी बिगड़ गई है।

इतना कह कर अनुपमा खामोश हो गई और मनीष की ओर देखने लगी। मनीष भी अनुपमा की आंखों में देखने लगा। दोनों एक दूसरे की आंखों में कुछ देर तक देखते रहे और फिर दोनों हसने लगे। थोड़े खिंचा तानी के बाद माहौल थोड़ा रोमांटिक हो चला था और दोनों सुकून से एकांत का आनंद लेने लगे।

इधर साची सांझ को जो निकली तो सीधा रात को घर पहुंची। जैसे ही हॉल में वो पहुंची मनीष और अनुपमा भी वहीं बैठे थे। हालांकि इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं था, साची को पूर्वानुमान था कि उसके माता पिता हॉल में बैठे होंगे और उस पर तगड़े तानों की बौछार करने वाले हैं। फिर भी इस मेलो ड्रामा से बचने के लिए साची चुप-चाप अपने कमरे के ओर खिसकने लगी लेकिन तभी अनुपमा जोर से कहती है… "सोच रही है मेलो ड्रामा से कैसे बचुं… हां … भाग रही है, चल इधर अा"

"पता नहीं कौन देवता पूजती है मेरी मां, मेरी हर बात का ज्ञान इन्हे कैसे हो जाता है"… इतना सोचती हुई वो अपने मां से कहती है… "बिल्कुल नहीं मेरी प्यारी मां, कहिए ना क्या बात है?"

अनुपमा गंभीर होती हुई कहने लगी… "इतना मस्का लगाने की जरूरत नहीं है, आज का तेरा नाटक देख कर हमने तेरी शादी तय कर दी है।"

साची बड़ी अदा से इठलाती हुई कहने लगी….. "देदो, मेरे उनकी तस्वीर देदो…. आज रात उसे मैं अपने सिरहने तले रख कर उन्ही के सपने देखूंगी"

अनुपमा, साची को धीमे से धक्का देती हुई कहने लगी… "हट नौटंकी… कभी कभी मैं सोच में पड़ जाती हूं कि तुझ में किस के गुण अा गए?"

साची:- वो तय करना मेरा काम नहीं वो आप दोनों मिल कर तय करो। फिलहाल मेरी सजा बताओ।

मनीष:- साची बेटा मस्ती बहुत हो गई लेकिन ये जान बूझ कर फेल होना, मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। कोई समस्या है तो हम बैठ कर बात कर सकते थे लेकिन ये सब….

साची जो अब तक अपनी मां के गले पड़ी थी अब अपने पापा के गले लगती हुई कहने लगी…. "आई एम सो सॉरी पापा, मुझे लगा यदि मैंने जल्दी-जल्दी ग्रेजुएशन भी कर लिया तो कहीं आप लोग मेरी शादी ना करवा दो.. इसलिए ऐसा किया"

मनीष:- तुम ने हम से कहा कि तुम्हे प्रतियोगिता परीक्षाओं में कोई रुचि नहीं। हमने कभी कोई जोर जबरदस्ती की इस मामले में.. कभी नहीं। फिर तुम ने कहा कि तुम्हे साहित्य में रुचि है और तुम साहित्य से अपना ग्रेजुएशन करना चाहती हो.. हमने ये भी मान लिया… लेकिन आज जो हुआ उस से मेरा दिल टूटा है क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य तो केवल शिक्षा पाना था, ना कि शिक्षा के माध्यम से किसी के अंदर नौकर बन कर उसकी नौकरी करना.. फिर तुम्हारा जान बूझ कर फेल होना बिल्कुल अनुचित है और शिक्षा के साथ बेईमानी भी…

साची जो मज़ाक-मज़ाक में कर चुकी थी, उसका अभी उसे दिल से अफसोस हो रहा था। अपने पापा के सामने खड़ी हो कर उसने अपने दोनो कान पकड़ लिए और शांत खड़ी हो गई… इस बार सच में उसके आंखों में आंसू थे जो उसकी आंखों से बह रहे थे।

अनुपमा "हाय मेरी बच्ची" कहती उसे खुद में समेट ली और उसके आंसू पोंछती हुई कहने लगी…. "तू जानती है तुझ में सब से बेस्ट क्या है"

साची:- क्या?

अनुपमा:- दुनिया में बहुत कम ऐसे बच्चे होते हैं जो अपने माता पिता से झुटे मुंह ही माफी मांग ले.. दिल से माफी मग्नी तो दूर की बात है… इसलिए तू मेरा बेस्ट बच्चा है।

मनीष:- हा हा हा… ये बात बिल्कुल सही कही अनुपमा… यहां तक कि मुझे याद नहीं कि तुमने अपने गलती के लिए मुझे से कभी माफी मांगी हो?

अनुपमा:- साची बेटा जरा किचेन से मेरी बेलन तो लेे अा…

और फिर तीनों हसने लगे। साची अपने मां के गोद में ही सिर डाले वहीं बात करते- करते सो गई… सुबह जब उसकी आंख खुली तो उसने देखा उसके मम्मी पापा दोनों सोफे पर ही लेटे हैं… साची उन दोनों का चेहरा देख कर थोड़ा मुस्कुराई और फिर धीमे से सॉरी कह कर एक सेल्फी लेे ली।

कुछ दिनों बाद पता चला कि मनीष को 5 साल के लिए फौरन एंबेसी में काम करने का मौका मिला है। हालांकि वहां परिवार लेे जाने का प्रावधान तो था किंतु मनीष के छोटे भाई राजीव के जिद के किसी की नहीं चली… हालांकि पहले भी कभी किसी की नहीं चली। तो ये तय हुआ कि मनीष जाएगा विदेश और साची और अनुपमा जाएंगी राजीव के पास, जो कि दिल्ली के लोकसभा सचिवालय में एक उच्च अधिकारी थे और एक शानदार सरकारी बंगलो में पिछले 12 सालों से दिल्ली में रह रहे थे….
 
Update:-3

कुछ दिनों बाद पता चला कि मनीष को 5 साल के लिए फौरन एंबेसी में काम करने का मौका मिला है। हालांकि वहां परिवार लेे जाने का प्रावधान तो था किंतु मनीष के छोटे भाई राजीव के जिद के आगे किसी की नहीं चली… हालांकि पहले भी कभी किसी की नहीं चली। तो ये तय हुआ कि मनीष जाएगा विदेश और साची और अनुपमा जाएंगी राजीव के पास, जो कि दिल्ली के लोकसभा सचिवालय में एक उच्च अधिकारी थे और एक शानदार सरकारी बंगलो में पिछले 12 सालों से दिल्ली में रह रहे थे….

रविवार की वो सुबह थी जब राजीव अपने भाई को छोड़ने दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचा और वहां अपने भाई को विदा कर अपनी भाभी और भतीजी के साथ वापस अपने घर आता।

राजीव का परिवार पहले ही एयरपोर्ट पहुंच चुका था। राजीव थोड़े देर से निकला और अपने साथ एक लड़के को जबरदस्ती अपनी गाड़ी में बिठा कर एयरपोर्ट लेे जा रहा था। जब राजीव एयरपोर्ट पहुंचा तो उसके साथ वो लड़का भी था, उस लड़के को देख मनीष पूछने लगा… "ये लड़का कौन है राजीव"

राजीव उसका परिचय देते हुए कहने लगा…. "ये एक गंदी परवरिश का नतीजा है भैय्या जो किसी परिचय के लायक नहीं"…

इस तरह के जवाब सुन कर सभी चौंक गए। वैसे भी मनीष अब फौरन एंबेसी में काम करने वाला था तो उसे छोड़ने के लिए पुलिस के कुछ अधिकारी भी पहुंचे हुए थे ऊपर से राजीव का भी बहुत रसूख था। राजीव के ऐसे कथन सुनते ही पुलिस के एक अधिकारी ने, उस लड़के का कॉलर पकड़ कर पूछने लगा… "क्या किया है बे, जल्दी जवानी फुट रही है क्या?"

उस जगह पर तो मानो जैसे माहौल ही बन गया था। मौके की नजाकत को देखते हुए दूसरे पुलिस अधिकारी ने, उसे एयरपोर्ट सिक्योरिटी रूम में ले कर चला गया। वहां पहुंचते ही 2 पुलिस वालो ने तो उसे पहले 3-4 थप्पड़ मारा और फिर जा कर राजीव से पूछा कि "सर ये कौन है, और किया क्या है?"

तभी मनीष भी थोड़े गुस्से के लहजे में पूछने लगा… "राजीव बता इसने किया क्या है?"

राजीव:- भैय्या ये मेरे घर के सामने रहता है, नाम है आरव। इस कुत्ते के बच्चे ने पहले मुझे फिर हमारे खानदान के बारे में अपशब्द कहे और बदतमीजी कि सो अलग।

मनीष:- हद करते हो राजीव, नया खून थोड़ा बदतमीज होता ही है। मै तो इस बात से हैरान हू की तुम इसे यहां ले कर आए, एयरपोर्ट पर। मतलब यहां हमारी फैमिली मीटिंग हो रही है, एंबेसी के कई लोग पहुंचे हुए है और मेरा भाई एक ऐसे अनजान लड़के को हमारे बीच लेे आया जो बदतमीज और नासमझ है। वाह भाई वाह… मुझे नहीं लगता कि तुम से ज्यादा बेवकूफ भी कोई होगा।

राजीव:- आप जो भी कह लो भैय्या लेकिन मैं इतना बेवकूफ नहीं की आप ने जो कहा उस बात पर मैं ध्यान ना दू। ये अगर मेरे बारे में कुछ कहता तो मैं सह लेता या अपने स्तर से देख लेता। लेकिन इसने हमारे मां और बाबूजी के बारे में बुरा-भला कहा। मैं अपना आप खो चुका हूं और यदि मैं फैसला करूंगा तो पता नहीं मैं क्या कर बैठूं? पिछले 3 दिनों से मैं खून के घूंट पी कर बैठा हूं। मैंने अब इसे आप के हवाले कर दिया, आप ही फैसला करो। और यदि नहीं , अब भी आप को ये लगता है कि इसको यहां लाना मेरी गलती है तो मुझे क्षमा कर दीजिए और इसका फैसला मैं खुद ही कर दूंगा।

राजीव की बातें सुन कर मनीष का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुंच गया और वो आरव का कॉलर पकड़ कर पीटने लगा। मनीष का आपा खोते देख अनुपमा बीच बचाव में आई और आरव को अपने पीछे लेती हुई, राजीव को फटकार लगाते कहने लगी…. "देवर जी, ये क्या तमाशा है। यदि इस लड़के ने कुछ कहा था या किया था तो वहीं समझ लेते। इसे यहां लाकर पूरे परिवार और इतने लोगों के बीच तमाशा खड़ा करने की क्या जरूरत थी"।

अनुपमा की बातें सुन कर जैसे दोनों भाई को होश आया और राजीव शांत होते हुए कहने लगा…. "नहीं भाभी, मैं कहीं कुछ कर ना दू इसलिए इसका फैसला करने भैय्या के पास लेे आया"

तभी वहां खड़ा एक पुलिस अधिकारी कहने लगा:- "आप सब यहां से जाइए सर इसकी खबर तो अब हम लेंगे"

मनीष:- ऐसे चार्ज में अंदर करना की इसकी जवानी जेल में ही बीते और जब भी ये खुद को देखे तो इसे पछतावा हो कि, आखिर इसने हमसे पंगा ही क्यों लिया।

अब तक आरव जो चुप चाप सब सुन रहा था, अपनी जानदार आवाज़ में कहता है…. "ओ सर आप का भाई पागल है और उस समय जो मैंने इसे कहा था ना कोई गलत नहीं कहा था… अब तो मुझे यकीन हो गया है कि ये पूरा खानदान ही पागल है। और रही बात मेरी जवानी को जेल में सड़ाने कि तो इतनी औकात किसी कि नहीं"।

बड़ी तेजी में और बिल्कुल जोरदार आवाज के साथ आरव ने अपनी बात कह दी। फिर क्या था माहौल और भी ज्यादा गरम हो गया। वहां मौजूद पुलिस वालों ने मनीष और उसके परिवार को किसी तरह वहां से हटा कर बाहर भेजा और आरव को थाने ले आए।

अंततः मनीष अपने गंतव्य के लिए रवाना हो गया और और बाकी सारे लोग वापस घर को। एयरपोर्ट पर हुई गरमा-गरम बहस के बाद सब बिल्कुल शांत हो कर वापस लौट रहे थे। तभी इस शांति को अनुपमा भंग करती हुई राजीव से कहने लगी… "देवर जी आप ने जो एयरपोर्ट पर किया वो जरा भी समझदारी का काम नहीं था"

राजीव अनुपमा की बात को बीच में ही काटते हुए कहने लगा… "भाभी वो, उस लड़के ने"..

तभी अनुपमा गुस्सा दिखाती हुई कहने लगी… "बीच में मत टोकिये देवर जी, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई… यदि कोई हमारे बारे में कुछ गलत करता है या कहता है तो क्या उस बात को आप भरी सभा में उठाएंगे, ताकि जो लोग कुछ नहीं भी जानते हो वो भी जान जाए। आप दोनों भाई ऐस बर्ताव कर रहे थे जैसे कोई गली का आम आदमी करता हो। ना अपनी मर्यादा याद रही और ना ही अपने पोस्ट कि गरिमा। बेवकूफ आदमी, किसी बात का ख्याल ही नहीं रहा। आखिर उसने कहा ही क्या था, जो आप यदि फैसला करते तो उस बच्चे की जान ले लेते और दूसरे ने तो बिना पूरी बात जाने ही उसे जिंदगी भड़ जेल में सड़ाने के आदेश दे दिया….

"मैं बताती हूं बड़ी मां"… पीछे से राजीव की बड़ी बेटी लावणी कहने लगी… "हुआ ये था बड़ी मां कि ये और इसका एक भाई दोनों हमारे सामने के अपार्टमेंट में रहते है। बात 3 दिन पहले की है, जब रात को पापा और मैं टहलने के लिए निकले थे और उसी वक़्त ये लड़का दारू पी कर चला अा रहा था"…

अनुपमा:- हूं !! फिर क्या हुआ?

लावणी:- तो हुआ ये कि वो आते-आते पापा से टकरा गया। इस पर पापा बोले कि "देख कर चलो बेटा। तुम इतनी रात को नशे में घर कैसे जाओगे, तुम्हारी मां कुछ कहेगी नहीं क्या तुम्हे"? इस पर उस लड़के ने बड़ी बदतमीजी से कहा "मेरी मां कुछ भी कहे, तू काहे मेरा बाप बनने की कोशिश कर रहा है"। फिर क्या था इसी बात पर बहस शुरू हो गई। इसी दौरान बोलते-बोलते वो ये बोल गया कि "तेरी मां ने केवल 2 ही बच्चे जने, लगता है तेरे पापा में कुछ कमी थी इसलिए तेरी मां को सिर्फ 2 ही मौके मिले। वरना उस वक़्त के लोग तो बच्चों कि लाइन लगा देते थे"।

अनुपमा:- हरामजादे कहीं के !!! देवर जी आप ने उस लड़के के बारे में एयरपोर्ट पर सही ही बताया था। ऐसे गंदी परवरिश वाले लड़कों को तो जेल में सड़ना ही अच्छा है। मरने दो साले को।

बातों के दौरान ही सब घर पहुंचे और फिर बाकी बचे परिवार के लोगों से मेल मिलाप शुरू होने लगा। इधर आरव को जब पुलिस थाने ले कर पहुंची…. और उस पर क्या क्या चार्ज लगाए ये सोच ही रही थी कि तभी वहां सुप्रीम कोर्ट का एक वकील पहुंच गया।

और वो भी कोई ऐसा वैसा वकील नहीं, बल्कि अपने एक सलाह का मेहनताना लाखों में लेने वाला वकील। उस वकील को देख कर ही पूरे थाने के होश उड़ गए। अब चूंकि आरव को बड़े अधिकारियों ने गिरफ्तार किया था इसलिए तुरंत ही उन अधिकारियों तक सूचना पहुंची, और वो अधिकारी खुद भी भागे-भागे उस थाने में पहुंचे।लेकिन उस वकील के आने के बाद आरव को ना छोड़ने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

आरव जब थाने से निकला तो वो बस यही सोच रहा था कि आज हुई घटना यदि अपस्यु को पता चली तो ना जाने क्या होगा। इन्हीं उधेड़बुन में जब आरव घर पहुंचा, तब उसने अपस्यु को बालकनी में पाया जो बालकनी से खड़ा हो कर साची को निहार रहा था….
 
Aisa lagta hai ki kai logon ko devnagri font me padhne me pareshani hoti hai... Is par apne vichar jaroor dijiyega kyonki mujhe koi pareshani nahi kisi bhi font me likhne me.

ऐसा लगता है कि बहुत से लोगों को देवनागरी लिपि में लिखे जने से पढ़ने में परेशानी होती है। इस पर अपने विचार जरूर दीजियेगा... मैं किसी भी लिपि में आसानी से अपडेट दे सकता हूं।
 
नहीं नहीं मेरी कोई माया नहीं है बस यह है कि लिख देता हूं। मेरे लिखे को पसंद करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया बाकी अभी तो ए स्टोरी शुरुआत हुई है बहुत कुछ होना बाकी है साथ बनाए रखिएगा।

धन्यवाद
 
देखते रहिए कौन-कौन से राज हैं, कौन-कौन से नटखट और कौन-कौन गुस्से वाला है... लेकिन केवल इतना ही कहूंगा कि कुछ भी पहले से सोच कर ना पढ़े, क्योंकि कहानी किस वक्त क्या मोड़ लेगी यह तो मुझे भी नहीं पता।

जुड़े रहने के लिए धन्यवाद अपनी कीमती राय देना ना भूलिएगा।
 
पहला कोट तो बिल्कुल सही है... इस बात से तो मैं भी इनकार नहीं करूंगा और कुछ अपडेट बाद ऐसी राई सबकी होगी कि गडरिया देने में दोनों पार्टियों में से कोई कम नहीं है।

अभी तो केवल नाम ही लिखा है नाम से कैसे कैरक्टराइजेशन हो सकता है कि वह खतरनाक है या फिर खरगोश या फिर लोमड़ी या फिर कुछ और अभी दो लावणी के विषय में चर्चा होना बाकी है।

यहां हम किसी से कम नहीं वाला सीन है अब देखिए आगे क्या होता है यह तो वक्त ही बताएगा। हां लेकिन आपके इस प्यारे से कमेंट का शुक्रिया। ऐसे ही हौसला अफजाई करते रहिएगा।
 
आपने पहले अपडेट को गौर नहीं किया अपस्यू की जितनी भी प्रतिक्रिया होगी वह एक महीने बाद की होगी क्योंकि वह 1 महीने तक लगातार बालकनी से चिपक कर आप तो जानते हैं किसके इंतजार में वह खड़ा रहेगा।

जी धन्यवाद लिपि के विषय में जानकारी देने के लिए मैं आगे से देवनागरी में ही जारी रखूंगा।
 
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