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कुछ दिनों बाद पता चला कि मनीष को 5 साल के लिए फौरन एंबेसी में काम करने का मौका मिला है। हालांकि वहां परिवार लेे जाने का प्रावधान तो था किंतु मनीष के छोटे भाई राजीव के जिद के आगे किसी की नहीं चली… हालांकि पहले भी कभी किसी की नहीं चली। तो ये तय हुआ कि मनीष जाएगा विदेश और साची और अनुपमा जाएंगी राजीव के पास, जो कि दिल्ली के लोकसभा सचिवालय में एक उच्च अधिकारी थे और एक शानदार सरकारी बंगलो में पिछले 12 सालों से दिल्ली में रह रहे थे….
रविवार की वो सुबह थी जब राजीव अपने भाई को छोड़ने दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचा और वहां अपने भाई को विदा कर अपनी भाभी और भतीजी के साथ वापस अपने घर आता।
राजीव का परिवार पहले ही एयरपोर्ट पहुंच चुका था। राजीव थोड़े देर से निकला और अपने साथ एक लड़के को जबरदस्ती अपनी गाड़ी में बिठा कर एयरपोर्ट लेे जा रहा था। जब राजीव एयरपोर्ट पहुंचा तो उसके साथ वो लड़का भी था, उस लड़के को देख मनीष पूछने लगा… "ये लड़का कौन है राजीव"
राजीव उसका परिचय देते हुए कहने लगा…. "ये एक गंदी परवरिश का नतीजा है भैय्या जो किसी परिचय के लायक नहीं"…
इस तरह के जवाब सुन कर सभी चौंक गए। वैसे भी मनीष अब फौरन एंबेसी में काम करने वाला था तो उसे छोड़ने के लिए पुलिस के कुछ अधिकारी भी पहुंचे हुए थे ऊपर से राजीव का भी बहुत रसूख था। राजीव के ऐसे कथन सुनते ही पुलिस के एक अधिकारी ने, उस लड़के का कॉलर पकड़ कर पूछने लगा… "क्या किया है बे, जल्दी जवानी फुट रही है क्या?"
उस जगह पर तो मानो जैसे माहौल ही बन गया था। मौके की नजाकत को देखते हुए दूसरे पुलिस अधिकारी ने, उसे एयरपोर्ट सिक्योरिटी रूम में ले कर चला गया। वहां पहुंचते ही 2 पुलिस वालो ने तो उसे पहले 3-4 थप्पड़ मारा और फिर जा कर राजीव से पूछा कि "सर ये कौन है, और किया क्या है?"
तभी मनीष भी थोड़े गुस्से के लहजे में पूछने लगा… "राजीव बता इसने किया क्या है?"
राजीव:- भैय्या ये मेरे घर के सामने रहता है, नाम है आरव। इस कुत्ते के बच्चे ने पहले मुझे फिर हमारे खानदान के बारे में अपशब्द कहे और बदतमीजी कि सो अलग।
मनीष:- हद करते हो राजीव, नया खून थोड़ा बदतमीज होता ही है। मै तो इस बात से हैरान हू की तुम इसे यहां ले कर आए, एयरपोर्ट पर। मतलब यहां हमारी फैमिली मीटिंग हो रही है, एंबेसी के कई लोग पहुंचे हुए है और मेरा भाई एक ऐसे अनजान लड़के को हमारे बीच लेे आया जो बदतमीज और नासमझ है। वाह भाई वाह… मुझे नहीं लगता कि तुम से ज्यादा बेवकूफ भी कोई होगा।
राजीव:- आप जो भी कह लो भैय्या लेकिन मैं इतना बेवकूफ नहीं की आप ने जो कहा उस बात पर मैं ध्यान ना दू। ये अगर मेरे बारे में कुछ कहता तो मैं सह लेता या अपने स्तर से देख लेता। लेकिन इसने हमारे मां और बाबूजी के बारे में बुरा-भला कहा। मैं अपना आप खो चुका हूं और यदि मैं फैसला करूंगा तो पता नहीं मैं क्या कर बैठूं? पिछले 3 दिनों से मैं खून के घूंट पी कर बैठा हूं। मैंने अब इसे आप के हवाले कर दिया, आप ही फैसला करो। और यदि नहीं , अब भी आप को ये लगता है कि इसको यहां लाना मेरी गलती है तो मुझे क्षमा कर दीजिए और इसका फैसला मैं खुद ही कर दूंगा।
राजीव की बातें सुन कर मनीष का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुंच गया और वो आरव का कॉलर पकड़ कर पीटने लगा। मनीष का आपा खोते देख अनुपमा बीच बचाव में आई और आरव को अपने पीछे लेती हुई, राजीव को फटकार लगाते कहने लगी…. "देवर जी, ये क्या तमाशा है। यदि इस लड़के ने कुछ कहा था या किया था तो वहीं समझ लेते। इसे यहां लाकर पूरे परिवार और इतने लोगों के बीच तमाशा खड़ा करने की क्या जरूरत थी"।
अनुपमा की बातें सुन कर जैसे दोनों भाई को होश आया और राजीव शांत होते हुए कहने लगा…. "नहीं भाभी, मैं कहीं कुछ कर ना दू इसलिए इसका फैसला करने भैय्या के पास लेे आया"
तभी वहां खड़ा एक पुलिस अधिकारी कहने लगा:- "आप सब यहां से जाइए सर इसकी खबर तो अब हम लेंगे"
मनीष:- ऐसे चार्ज में अंदर करना की इसकी जवानी जेल में ही बीते और जब भी ये खुद को देखे तो इसे पछतावा हो कि, आखिर इसने हमसे पंगा ही क्यों लिया।
अब तक आरव जो चुप चाप सब सुन रहा था, अपनी जानदार आवाज़ में कहता है…. "ओ सर आप का भाई पागल है और उस समय जो मैंने इसे कहा था ना कोई गलत नहीं कहा था… अब तो मुझे यकीन हो गया है कि ये पूरा खानदान ही पागल है। और रही बात मेरी जवानी को जेल में सड़ाने कि तो इतनी औकात किसी कि नहीं"।
बड़ी तेजी में और बिल्कुल जोरदार आवाज के साथ आरव ने अपनी बात कह दी। फिर क्या था माहौल और भी ज्यादा गरम हो गया। वहां मौजूद पुलिस वालों ने मनीष और उसके परिवार को किसी तरह वहां से हटा कर बाहर भेजा और आरव को थाने ले आए।
अंततः मनीष अपने गंतव्य के लिए रवाना हो गया और और बाकी सारे लोग वापस घर को। एयरपोर्ट पर हुई गरमा-गरम बहस के बाद सब बिल्कुल शांत हो कर वापस लौट रहे थे। तभी इस शांति को अनुपमा भंग करती हुई राजीव से कहने लगी… "देवर जी आप ने जो एयरपोर्ट पर किया वो जरा भी समझदारी का काम नहीं था"
राजीव अनुपमा की बात को बीच में ही काटते हुए कहने लगा… "भाभी वो, उस लड़के ने"..
तभी अनुपमा गुस्सा दिखाती हुई कहने लगी… "बीच में मत टोकिये देवर जी, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई… यदि कोई हमारे बारे में कुछ गलत करता है या कहता है तो क्या उस बात को आप भरी सभा में उठाएंगे, ताकि जो लोग कुछ नहीं भी जानते हो वो भी जान जाए। आप दोनों भाई ऐस बर्ताव कर रहे थे जैसे कोई गली का आम आदमी करता हो। ना अपनी मर्यादा याद रही और ना ही अपने पोस्ट कि गरिमा। बेवकूफ आदमी, किसी बात का ख्याल ही नहीं रहा। आखिर उसने कहा ही क्या था, जो आप यदि फैसला करते तो उस बच्चे की जान ले लेते और दूसरे ने तो बिना पूरी बात जाने ही उसे जिंदगी भड़ जेल में सड़ाने के आदेश दे दिया….
"मैं बताती हूं बड़ी मां"… पीछे से राजीव की बड़ी बेटी लावणी कहने लगी… "हुआ ये था बड़ी मां कि ये और इसका एक भाई दोनों हमारे सामने के अपार्टमेंट में रहते है। बात 3 दिन पहले की है, जब रात को पापा और मैं टहलने के लिए निकले थे और उसी वक़्त ये लड़का दारू पी कर चला अा रहा था"…
अनुपमा:- हूं !! फिर क्या हुआ?
लावणी:- तो हुआ ये कि वो आते-आते पापा से टकरा गया। इस पर पापा बोले कि "देख कर चलो बेटा। तुम इतनी रात को नशे में घर कैसे जाओगे, तुम्हारी मां कुछ कहेगी नहीं क्या तुम्हे"? इस पर उस लड़के ने बड़ी बदतमीजी से कहा "मेरी मां कुछ भी कहे, तू काहे मेरा बाप बनने की कोशिश कर रहा है"। फिर क्या था इसी बात पर बहस शुरू हो गई। इसी दौरान बोलते-बोलते वो ये बोल गया कि "तेरी मां ने केवल 2 ही बच्चे जने, लगता है तेरे पापा में कुछ कमी थी इसलिए तेरी मां को सिर्फ 2 ही मौके मिले। वरना उस वक़्त के लोग तो बच्चों कि लाइन लगा देते थे"।
अनुपमा:- हरामजादे कहीं के !!! देवर जी आप ने उस लड़के के बारे में एयरपोर्ट पर सही ही बताया था। ऐसे गंदी परवरिश वाले लड़कों को तो जेल में सड़ना ही अच्छा है। मरने दो साले को।
बातों के दौरान ही सब घर पहुंचे और फिर बाकी बचे परिवार के लोगों से मेल मिलाप शुरू होने लगा। इधर आरव को जब पुलिस थाने ले कर पहुंची…. और उस पर क्या क्या चार्ज लगाए ये सोच ही रही थी कि तभी वहां सुप्रीम कोर्ट का एक वकील पहुंच गया।
और वो भी कोई ऐसा वैसा वकील नहीं, बल्कि अपने एक सलाह का मेहनताना लाखों में लेने वाला वकील। उस वकील को देख कर ही पूरे थाने के होश उड़ गए। अब चूंकि आरव को बड़े अधिकारियों ने गिरफ्तार किया था इसलिए तुरंत ही उन अधिकारियों तक सूचना पहुंची, और वो अधिकारी खुद भी भागे-भागे उस थाने में पहुंचे।लेकिन उस वकील के आने के बाद आरव को ना छोड़ने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
आरव जब थाने से निकला तो वो बस यही सोच रहा था कि आज हुई घटना यदि अपस्यु को पता चली तो ना जाने क्या होगा। इन्हीं उधेड़बुन में जब आरव घर पहुंचा, तब उसने अपस्यु को बालकनी में पाया जो बालकनी से खड़ा हो कर साची को निहार रहा था….