Romance भंवर (पूर्ण) - Page 3 - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

Update:-13

अपस्यु:- तो तू करना क्या चाहता है?

आरव:- मुझे तू बैकअप देता जा। टारगेट मुझे मिल गया है, एलिमिनेटर कैसे करना है वो मैं समझ लूंगा।

अपस्यु:- ठीक है लेकिन याद रहे किसी भी सूरत में कोई कड़ी मत छोड़ना। क्योंकि उसके 3 डीलर मारे जाएंगे तो वो कारण का पता जरूर लगाएगा।

आरव:- तू बस देखता जा, ये मैं कैसे करता हूं।

अपस्यु:- ठीक है तो तू कल से ही काम शुरू कर देना।

आरव:- मैं तो काम शुरू ही कर दूंगा लेकिन क्या तू तैयार है। नहीं, मतलब अभी तू पूरी तरह से ठीक भी नहीं हुआ है। तेरी हड्डी जुड़ने में वक़्त है अभी, ऐसी हालत में तू यहां अकेले सब कैसे करेगा। ऊपर से बॉथरूम आने पर क्या करेगा।

अपस्यु:- चिंता मत कर कल बहुत कुछ सुधार अा जाएगा।

अगले दिन तकरीबन सुबह के 8 बजे अपस्यु ने एक बार पुनः वहीं प्रक्रिया शुरू कर दी। लगभग आधे घंटे तक चली प्रक्रिया और उसके बाद अपस्यु बेहोश परा सोता रहा। इधर आरव अपना सामान पैक करके, वहीं लगे कई तरह के अभ्यास करने वाले मशीनों पर अपना अभ्यास कर, सारी क्षमता दर्ज करने लगा। लगभग 3 बजे दिन में अपस्यु भी उठ चुका था। खुद में वो पहले से बेहतर तो मेहसूस कर रहा था लेकिन अभी भी पूरी तरह से ठीक होने में वक्त लगता, खासकर उसकी टूटी पसलियां और हाथ-पाऊं की हड्डियां जुड़ने में अभी वक़्त था।

दोनों भाई आगे कि रणनीति पर चर्चा कर रहे थे, तभी उनके फ्लैट की घंटी बजी। फ्लैट की घंटी बजते ही दोनों भाई चौक्कना हो गए। दोनों की नजर एक साथ बाहर लगे कैमरे की स्क्रीन पर गई…. "ले अा गई तेरा हाल पूछने। लगता है तेरी वाली बीमारी इसे भी लग गई। पहले तू इसके घर में झांकता था अब ये तेरे घर"

अपस्यु:- जा, जाकर दरवाजा खोल।

आरव हंसते हुए उसके सर पर एक हाथ मारा और जाकर दरवाजा खोलने चला गया।… "स्वागत है जी आप का हमारे छोटे से गरीब खाने में"

साची मुस्कुराती हुई अंदर प्रवेश की और जैसे ही सामने हॉल का नजारा देख… "ओह माय गॉड… ये तो किसी ट्रेनिंग वर्क शॉप जैसा लग रहा है"

आरव:- हा हा हा, अंदर भी आओगी या फिर यहीं खड़ा रहना है।

साची पूरे हॉल का जायजा लेती हुई अाकर सोफे पर बैठ गई… "तुम्हारे घर और रहन-सहन को देख कर तो ऐसा लगता है कि कोई मालदार आसामी हो"

अपस्यु:- आरव चाई ला दे बनाकर। और बताओ साची कैसे आना हुआ।

साची:- अभी मै यहां भांगड़ा करूंगी और तुम ढोल पीटना डफर। तुम्हे देखने आयु हूं और खबर भी लेने।

अपस्यु:- देख तो ली अब खबर भी लेलो।

आरव, किचेन से ही.. साची डंडे से इसकी खबर लेना।

साची:- खबर तो तुम्हारी ही लेने अाई हूं आरव, वेदांता से सीधा फ्लैट में शिफ्ट कर दिए।

आरव:- घूम फिर कर सबका निशाना मैं ही बनता हूं। लो चाय लो। दरअसल बात कुछ यूं हुई की मै गया तो वेदांता ही था लेकिन थोड़े से चेकअप के बाद उन्होंने कुछ दवा लिखी। कमीनो ने ₹40000 जमा भी करवा लिए और आधे घंटे बाद कहते है "नॉर्मल चोट है, 2 हफ्ते में ठीक हो जाएगा। इन्हे घर लेे जा सकते है"।

साची:- चोट नॉर्मल कैसे हो गई। कमाल है हॉस्पिटल बदलते ही पूरा ज़ख्म का रंग-रूप ही बदल गया।

अपस्यु:- सरकारी हस्पताल वाले थे ना वो लोग। कोई भी रिपोर्ट बना देते हैं साची।

अभी साची चाय पी ही रही थी कि उसके सामने से आरव बैग टांगें निकालने लगा। आरव को जाते देख साची ने पूछ लिया कि आखिर वो किधर जा रहा है। आरव को निकालने के लिए बोलकर अपस्यु साची से कहता है…

"अभी जो तुमने मालदार आसामी बोला था ना, उन मालदार आसामी को भी जीने के लिए माल की जरूरत पड़ती है वहीं लाने जा रहा है"

साची:- कोई फैक्ट्री या मिल होगा उसी का कलेक्शन लेने जा रहा होगा।

अपस्यु:- हा हा हा.. नहीं ऐसा कोई मिल या फैक्ट्री नहीं है हमारे पास और ना ही करोड़ों संजोया हुआ है। ये सब कुछ, जो तुम देख रही हो वो हमारे बाबा का संजोया हुआ है। ले-दे कर आय के नाम पर दार्जलिंग में चाय का एक बागान है जिससे हर 3 महीने में 1.5 से 2 लाख रुपए मिल जाते हैं। वहीं हिसाब करके पैसे लेने जा रहा है।

साची:- पैसे अकाउंट पर भी तो मंगवा सकते हो, ऐसे हालात में तुम्हे छोड़ कर जाने की क्या जरूरत है।

अपस्यु:- पैसे के नाम पर बस ₹200 रुपया बचा है। वहां जबतक हिसाब नहीं करेंगे तो पता चलेगा कि जहां 1.5 या 2 लाख आने है वहां ₹50000 से ही संतोष करना होगा।

साची:- पैसों की जरूरत थी तो मुझ से मांग लेते, कुछ समय बाद चला जाता वो।

अपस्यु:- लो अभी मांग लिए जरूरत तो है ही। फिलहाल ₹20000 दे दो। पैसे आते ही लौटा दूंगा।

साची:- ठीक है कल सुबह मै देदुंगी। वैसे मानना पड़ेगा, पैसों का सही इस्तमाल किया है।

अपस्यु:- इस्तमाल नहीं उपयोग।

साची:- मतलब,

अपस्यु:- मतलब "इस्तमाल" शब्द उर्दू से लिया गया है और ये हिंदी भाषा का मूल शब्द नहीं है। "उपयोग" मूल शब्द है।

साची:- आरव ने सही ही बताया था।

अपस्यु:- क्या?

साची:- यही की गुरु जी के पास बैठ जाओ और ज्ञान की प्राप्ति होते रहेगी।

अपस्यु:- नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तुम साहित्य लेकर पढ़ रही थी तो मैं तुम्हारा ज्ञान बढ़ा रहा था।

साची:- अरे हां तुम उस दिन कैंटीन में इस बारे में कुछ बात कर रहे थे ना।

अपस्यु:- वो बात ऐसी है कि हम भी आप के ही सहपाठी हैं जी, और हमारा भी विषय साहित्य ही है।

साची:- ओह हो .. तभी हिंदी के ऊपर मुझे इतना लेक्चरर सुनाया जा रहा था।

अपस्यु, गहरी श्वास खींचते.. सुनाने को तो बहुत कुछ चाहता हूं..

कुछ पल के लिए दोनों के बीच की बातें थम गई और दोनों एक दूसरे को देखने लगते हैं। ये खामोशी जैसे अपने आप में ही एक शोर हो। साची अपने नजरें चुरा कर इधर-उधर देखने लगती है।

अपस्यु:- अब कॉलेज में कोई परेशानी तो नहीं।

साची:- नहीं, कोई परेशानी नहीं। थैंक यू सूूूूूूूू मच..... समस्या का समाधान हो गया। और हां मेरी मां ने भी तुम्हे खास तौर ओर धन्यवाद कहने को कहीं है।

अपस्यु:- स्वागत है जी आप का और आंटी को मेरे ओर से प्रणाम कहिएगा।

साची:- ठीक है अब मैं चलती हूं, रात को आऊंगी खाना लेकर।

अपस्यु, हसरत भरी नजरों से देखते बस "ठीक है" कहता है। दोनों की एक बार फिर नजरें मिलती है, कुछ पल की खामोशी और और फिर दोनों के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान। लेकिन इन पलों की शांति को भंग करने के लिए कॉल बेल बजने लगता है।

अपस्यु, अपने स्क्रीन पर एक बार फिर से देखते हुए… "साची मोबाइल वाला आया है, जरा डिलीवरी लेे लोगी क्या"..

साची:- तुमने कैसे ऐसी हालत में उसे जाने दिया..

अपस्यु:- तुम यहीं रुको मैं कुछ दिखता हूं।

अपस्यु ने पास पड़े रिमोट से ओपन का बटन प्रेस किया और दरवाजा खुल गया। कुछ ऐसी सेटिंग थी कि इधर दरवाजा खुला उधर हॉल के उस हिस्से में पर्दा डल जाता, जहां इनके सारे सामान परे हुए थे। वहीं परे माईक से अपस्यु उसे अंदर बुला कर डीलीवरी लेे लेता है।

उसके जाते ही साची, कमाल को व्यक्ति करने वाला अपना चेहरा बनती हुई.. "क्या बात है तुम्हारा फ्लैट तो पूरा डिजीटल ही है"। फिर उसके मोबाइल को ऑन करके अपना नंबर उसमे सेव करती हुई कहती है.. "कोई जरूरत हो तो कॉल कर लेना"… और वहां से चली जाती है।

अपस्यु गहरी सांसें लेता उसके बारे में ही सोचता रहा, कि तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी। अपस्यु जैसे ही उठता है दूसरी ओर से… "इस बार अपंग कर के जिंदा छोड़ा है, मेरे पैसे नहीं लौटाए तो जान से जाएगा"..

अपस्यु:- तुम्हे कुछ भी करने की जरूरत नहीं, तुम्हे तुम्हारे 110 करोड़ मिल जाएंगे।

जमील:- 240 करोड़।

अपस्यु:- तेरे बाप ने भी कभी इतने पैसे देखे है क्या। 6 साल की राजनीति और 52 साल की उम्र तक तूने और भूषण ने मिलकर 110 करोड़ अंदर किए और तुझे अब डबल से भी ज्यादा चाहिए। देख ऐसी स्तिथि उत्पन्न मत कर की मैंने जो मन बनाया है उसे मैं बदल लूं।

जमील:- क्या त्रिवेणी शंकर को पता है कि तूने ही उसके बेटे को मारा और जिसे वो ढूंढ़ रहा है वो तू ही है। साला बित्ते भर का होकर सबको नचाए है। अब मेरी बात ध्यान से सुन 150 करोड़ उसके और 110 करोड़ हमारे। कुल 260 करोड़ में से मैं सिर्फ 240 करोड़ मांग रहा। बाकी तू अपने पास रख, साथ में प्रोटेक्सन भी दूंगा और आगे हम दोनों मिलकर धमाल करेंगे।

अपस्यु:- 200 करोड़ में डील फाइनल करते हैं लेकिन मेरी एक शर्त है। जितने कम राजदार उतनी ही सुरक्षा। 100 करोड़ मै तेरे इंटरनैशनल अकाउंट में ट्रांसफर मारता हूं। मुझे जब लगेगा की तुमने मेरा काम कर दिया तो बाकी के 100 करोड़ तुझे कैश मिल जाएंगे। जगह और समय मै दोनों बता दूंगा साथ में आगे के हर काम में 20% की भागीदारी भी। बोल मंजूर है।

जमील:- नहीं, हिस्सेदारी आधा-आधा.. बाकी सभी शर्तों पर सहमति।

अपस्यु:- नहीं 20-80

जमील:- ना तेरी ना मेरी, चल 40 पर दिल लॉक कर।

अपस्यु:- सब्जी का भाव तोल मोल कर रहा है क्या? तुझे मैंने एक तस्वीर भेजी है देख उसे पहले..

जमील ने होम मिनिस्टर के साथ अपस्यु की तस्वीर को देखते हुए… "अबे तू उधर कैसे पहुंच गया"..

अपस्यु:- ध्यान से सुन मेरी बात, मेरे अंदर दम है और मैं कहीं भी पहुंच सकता हूं। ना तो तू उस लेवल का नेता है और ना ही तू उनके जितना मुझे प्रोटेक्सन दे सकता है। मैं बस उसे इतना ही कहूं ना कि हर महीने 20 करोड़ बस मेरे काम पर पर्दे डालने और प्रोटेक्सन के लिए, तो तू सोच ले क्या होगा। अब बोल मंजूर है डील या फिर सब कैंसल करूं।

जमील:- तू देखने में बस बच्चा लगता है लेकिन है हमारा बाप। मुझे सभी शर्तें मंजूर है तू बस पैसे तैयार रख। मैं सारे काम निपटा कर तुझे फोन करता हूं।

अपस्यु:- ठीक है तेरे कॉल का इंतजार रहेगा।

इधर कॉल डिस्कनेक्ट होते ही अपस्यु ने आरव से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन मजाल है कि कॉल लग जाए। भाई साहब का फोन लगातार 1 घंटे से बीजी बीजी बीजी…
 
Update:-14

इधर कॉल डिस्कनेक्ट होते ही अपस्यु ने आरव से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन मजाल है कि कॉल लग जाए। भाई साहब का फोन लगातार 1 घंटे से बीजी बीजी बीजी…

आरव अपने घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, रास्ते में परता हुआ उसके घर को देखते हुए एयरपोर्ट के ओर निकला। टैक्सी में बैठकर आरव लावणी के बारे में सोच कर मुस्कुराया और खुद से ही कहने लगा… "देखता हूं मेरी जानेमन क्या कर रही है".. फिर क्या था मिला दिया कॉल।

2 पूरी घंटी के बाद भी उसने कॉल नहीं उठाया। तीसरी घंटी में वो कॉल उठाती हुई पूछने लगी… "हां जी कौन"… उधर से आरव कहता है.. "जी हम आप के लवर बोल रहे हैं"।.. लवर का नाम सुनते ही वो हड़बड़ा गई, फोन हाथों से छूट कर नीचे गिरते-गिरते बचा। तभी बैकग्राउंड से आवाज़ अाई.. "किसका फोन है लावणी".. लावणी हड़बड़ाती हुई कहने लगी…. "सुषमा का फोन है मां".. और जल्दी से भागकर अपने कमरे में चली गई।

इधर आरव पीछे चल रही कहानी के मज़े ले रहा था… अपने कमरे में पहुंच कर लावणी फुसफुसाती हुई पूछने लगी… "तुम्हे मेरा नंबर कहां से मिला"

आरव:- बड़ा जल्दी समझ गई कि किसने कॉल किया है।

लावणी:- हद होती है किसी भी बात कि। पहले तुम ये बताओ कि मेरा नंबर कहां से मिला।

आरव:- किसी लड़की को लाइन मारने वाले लड़के के पास उसकी पूरी डिटेल होती है। तुम ना समझोगी, अभी बहुत कच्ची हो।

लावणी:- हां इसलिए दारू पीला कर पक्का बना रहे थे। तुम मिलो तो सही फिर बताती हूं।

आरव:- क्या बात है, मतलब काम निकल गया तो अब उल्टा हम ही दोषी हो गए.. क्यों?

लावणी:- तुम्हे तो में जूते से मारूंगी आरव, बस मौका नहीं मिल रहा। तुम्हारे वजह से कितना डर-डर कर जीना पड़ रहा है पता है। मेरी तो सोचते ही रूह कांप जाती है कि अगर इस कांड के बारे में पापा और मम्मी को पता चला तो मेरा क्या होगा।

आरव:- अरे इतना डरती क्यों हो। इस परिस्थिति से निकलने के लिए वहीं डोज बनेगा, 180ml पियो और शान से जियो।

लावणी:- ज्यादा बकवास की ना करो, मैं तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगी आरव।

आरव:- इतना ही गुस्सा है तो बताओ कहां आना है निकाल लेना अपनी भड़ास।

लावणी:- ऊफ़ ओ !!! मुझे क्यों परेशान कर रहे हो। कोई काम है तो जल्दी बोलो, मां इधर ही नजर गड़ाए हुए हैं।

आरव:- चल झूठी। अभी तो अपनी मां से झूट बोलकर अपने कमरे में आई हो।

लावणी, चिढ़ती हुई कहने लगी… "देखो यदि मुझे परेशान किया ना तो मुझ से बुरा कोई ना होगा। चुपचाप फोन रख दो"।

आरव:- मुझ से इतनी ही चिढ़ है तो तुम्हारे पास भी लाल बटन है। इतनी बहस काहे कर रही हो। लेकिन… लेकिन… लेकिन … तुमने अगर अभी कॉल काटा तो एक बात याद रखना, जो बात मैं तुम्हे अभी बताने वाला हूं और तुम्हारे छोटे से रिक्वेस्ट पर उसे पूरा भी कर दूंगा। अगर तुमने कॉल डिस्कनेक्ट किया तो उसी काम के लिए तुम्हे पापड़ बेलने होंगे।

लावणी:- हो गई तुम्हारी बकवास खत्म.. बाय..

आरव हंसते हुए फोन को देखने लगा और खुद से ही कहने कहा… "लड़की में बहुत बदलाव अा गया है"। फिर गैलरी खोल कर कुछ तस्वीरें छांट ली। ये उसी दिन की तस्वीरें थी जिस दिन लावणी ने वोदका पिया था, और पीने के बाद आरव के गालों को चुमी थी।

इधर लावणी मोबाइल को हाथ में पकड़े बस इसी बात को सोच रही थी आखिर इसको मेरा नंबर कहां से मिला होगा। तभी एक के बाद एक व्हाट्स एप मैसेज आने शुरू हो गए। लावणी ने जब अपना एप खोला तो सबसे ऊपर में ही आरव के नाम से संदेश आने शुरू थे।… "इसका नंबर तो मेरे मोबाइल में भी सेव है"… फिर मैसेज ओपन की और सामने के स्क्रीन पर आए तस्वीरों को देखकर चौंकती हुई उसने वापस कॉल लगाया… "ये सब तस्वीरे तुम्हारे पास कैसे आए… कब खींची"

आरव:- ये डर भगाव दवा का असर था.. जब ये सरा कांड हो गया।

लावणी:- तुमने मेरे नशे का गलत फायदा उठाया..

आरव:- ओ मैडम जरा गौर से देखो, कौन किसको चूम रहा है। उल्टा जबरदस्ती तुमने मेरे साथ की और मुझे ही सुना रही हो।

मुद्दे पर वाद-विवाद होता रहा। कभी गुस्सा तो कभी मिन्नतें तो कभी ड्रामा ये सब बातों के दौरान चलता रहा। लेकिन आरव अपनी जिद पर अरा रहा… "तस्वीरें तभी डिलीट होंगी, जब वो फिर से होश में एक बार, ऐसे ही उसको चुम्मी देगी".. इसी बीच अपस्यु के कॉल भी उसे आते रहे लेकिन वो नजरअंदाज करता रहा।

लावणी से बात खत्म कर उसने सीधा फिर अपस्यु को कॉल मिलाया। अपस्यु ने अपने और जमील के बीच हुए बातचीत को बताते हुए पूछने लगा कि अब क्या करना चाहिए। आरव ने साफ कह दिया कि किसी के भी बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, योजना के अनुसार चलेंगे। यदि जमील ने काम कर दिया तो अच्छा वरना हम तो तयारी से निकले ही है।

आरव फ्लाइट बोर्ड करने निकल चुका था और इधर अपस्यु को थोड़ी चिंता भी सता रही थी। हालांकि विश्वास तो पूर्ण रूप से था किन्तु दिल नहीं मान रहा था कि आरव सब अकेले कैसे करेगा।

रात के लगभग 8 बजे की बात होगी, जब साची और लावणी उसके फ्लैट की बेल बजा रही थी। दरवाजा खुलते ही दोनों बहने अंदर अाई और फिर दरवाजा बंद। धीमी रौशनी पूरे हॉल में थी जो देखने पर ऐसा लग रहा था मानो लगभग अंधेरा ही है ये पूरी जगह।

साची, अपस्यु के पास बैठते ही सबसे पहले उसने ये अंधेरा कायम रहे की स्थिति के बारे में ही पूछी.. अपस्यु उसके बात पर हंसते हुए पूरे घर में उजाला कर दिया। पूरी रौशनी में जब लावणी ने उस हॉल को देखा तो वो भी साची की तरह ही दंग रह गई और जिज्ञासा वस चारो ओर घूमकर सब देखने लगी… "अपस्यु क्या मैं इन्हे छु कर देख सकती हूं"..

अपस्यु.. अरे वो कांच के नहीं है.. छु कर क्या मन हो तो 2-4 सामान पटक कर भी देखो, टूटेगा नहीं..

अपस्यु, लावणी के ओर मुड़ कर बात कर रहा था और साची अपस्यु को निहार रही थी। बात पूरी होने के बाद जैसे ही अपस्यु मुड़ा, साची अपनी नजरें चुराती हुई, अपने उंगली को बिस्तर पर गोल-गोल घुमती पूछने लगी.. "अभी तबीयत कैसी है तुम्हारी"

अपस्यु:- अभी कुछ घंटे पहले ही तो देखी थी, इतने समय में कितना सुधार होगा।

साची:- हां ये भी है…. (कुछ पल की खामोशी… और नजरों का मिलना और झुकना, फिर नजाकत के साथ कहना)… अब से हम दोस्त।

अपस्यु, साची के चेहरे को गौर से देखते हुए… "ये दिल में कुछ और, और दिखा कुछ और रहे हैं, मुझ से नहीं हो पाएगा"।

साची अपनी नजर चुराती हुई धीमे स्वर में बोली…. "खाना खा लो"

अपस्यु:- अभी भूख नहीं लगी है बाद में खा लूंगा…

साची:- अभी खाने में क्या परेशानी है…

अपस्यु, हंसते हुए:- इतनी जल्दी खाऊंगा तो रात को दोबारा भूख लग जाएगी।

साची:- थोड़ा एक्स्ट्रा खाना लाई हूं, बाद में भूख लगे तो खा लेना।

अपस्यु:- एक्स्ट्रा तो तब समझूंगा ना जब तुम मेरा डाइट जानती हो।

साची, मुस्कुराती हुई… अभी खाना खा लो, तो डाइट भी जान जाऊंगी।

अपस्यु, कुछ सोचते हुए कहने लगा… "नहीं तुम चली जाओ, मैं बाद में खा लूंगा"

साची उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती हुई कहने लगी… "खा लो मैं यहीं हूं"।

फिर से अपस्यु का यही जवाब आया,"मैं बाद में खा लूंगा"। किंतु इस बार साची उसे आंख दिखाती हुई कहने लगी… "बस कोई बहस नहीं, चुपचाप खाओ"… अपस्यु बेड को हल्का फोल्ड करते हुए टेक लगाया, तबतक साची ने आलू के पराठे थाली में लगा दिए। थोड़ी परेशानी के साथ वो अपना हाथ आगे बढ़ा कर निवाला लेने कि कोशिश करने लगा।

साची को समझ में आ गया कि क्यों अपस्यु उसे जाने के लिए कहा। वो अपनी परेशानी जाहिर नहीं होने देना चाह रहा था। साची उसकी कलाई पकड़ कर निवाला अपने हाथो में ली और अपस्यु के मुंह की ओर बढ़ा दी। दोनों एक दूसरे का चेहरा बड़े प्यार से देख रहे थे, मानो नजरें कुछ कह रही हो । और साची बिना पलकें झपकाए, नजरों से नजरें मिलाए अपस्यु के ओर निवाला बढ़ाए जा रही थी।

खामोशी के कुछ पल थे और दोनों बड़े सुकून से एक दूसरे को देखे जा रहे थे, तभी गले की खराश की आवाज़ ने दोनों का ध्यान भंग किया। दोनों ने जब लावणी को देखा तो हड़बड़ा गए और जो वो कर रही थी उसे देखकर तो साची शर्मा कर भाग ही गई। दरअसल साची जब बिना पलकें झपकाए अपस्यु को निवाला बढ़ा रही थी तब निवाला मुंह के बदले नीचे गिर रहा था। लावणी ने जब ऐसा होते देखा तो वो नीचे थाली लगा कर वहीं बैठ गई।
 
Update:-15

खामोशी के कुछ पल थे और दोनों बड़े सुकून से एक दूसरे को देखे जा रहे थे, तभी गले की खराश की आवाज़ ने दोनों का ध्यान भंग किया। दोनों ने जब लावणी को देखा तो हड़बड़ा गए और जो वो कर रही थी उसे देखकर तो साची शर्मा कर भाग ही गई। दरअसल साची जब बिना पलकें झपकाए अपस्यु को निवाला बढ़ा रही थी तब निवाला मुंह के बदले नीचे गिर रहा था। लावणी ने जब ऐसा होते देखा तो वो नीचे थाली लगा कर वहीं बैठ गई।

एक बार जो साची ने दौड़ लगाई फिर सीधा अपने कमने में जाकर रुकी। पीछे से लावणी भी पहुंची, कई बार उसके कमरे के दरवाजे को खटखटाई, आवाज़ भी दी किंतु साची समझती थी कि उसे लावणी के द्वारा छेड़ा जाना है इसलिए दरवाजे पर आकर सिर्फ इतना ही कही की आज दरवाजा नहीं खुलेगा।

काफी खुश लग रही थी और इसी खुशी को प्रत्यक्ष दर्शाती उसने सबसे पहले तो एक मधुर संगीत बजाया…

पल भर ठहर जाओ, दिल ये संभल जाए

कैसे तुम्हें रोका करूँ,

मेरी तरफ आता हर ग़म फिसल जाए

आँखों में तुम को भरूं, बिन बोले बातें तुमसे करूँ

गर तुम साथ हो, अगर तुम साथ हो..

फिर अपनी दोनों बाहें फैलाए गोल-गोल घुमाती वो बिस्तर पर जा गिरी। दोनों बाहें फैलाए, आखें खुली छत को निहारती, सासें मध्यम-मध्यम और अंदर एक खुशनुमा एहसास जिसमें वो अपस्यु के ख्यालों में डूबी रही। उसे याद करते-करते फिर दिल में मीठी चुभन का वो एहसास…. "उफ्फ !!! कितने प्यारे हो तुम"।

साची अपनी खुशी बांटना चाह रही थी और इसी क्रम में उसने अपना लैपटॉप खोला और एफबी में किसी को खुशी कि ढेर सारी स्माइली पोस्ट करके उसके संदेश वापस आने का इंतजार करने लगी।

तकरीबन 2 मिनट बाद… संदेश वापस आया…

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Crazy boy:- Kya baat hai, itni jyada khushi. Feeling horney kya ???

Unknown girl (Sachi ki fake id name):- nope duffer, I think I am in love ???

Crazy boy:- Oh my god !!! Waise ladke se hi pyar hua na ??

Unknown girl :- ????

Crazy Boy:- ???

Unknown Girl:- ????

Crazy Boy :- Ok Solly to humari unknown madam ko kisi se pyar ho gaya hai

Unknown Girl:- Yassssssssssss Woohooooooo.. ☺️☺️☺️ m very excited crazy boy..

Crazy Boy:- excited ho to X-chat karen kya (X-chat=sex chat)

Unknown Girl:- Huhhh !!! ???

Crazy Boy:- Ab kya hua ???

Unknown Girl:-Tumhare sath Q karun X-chat.

Crazy Boy:- Mere sath hi to karti thi tum X-chat. Bhul gayi kya.... "oh I am feeling horney, chalo kuch dhamal karte hain"

Unknown Girl:- Tab main relationship me nahi thi aur apni fantasy jine ke liye puri azad thi. Lekin ab main relation me hun.

Crazy Boy:- Hmmm !! Samjh gaya. Matlab tum mujhe bye-bye kahne aayi ho.

Unknown Girl:- kya main kewal X-chat hi tumhare sath karne aati thi aur bhi to baten hua karti thi..

Crazy Boy:- Kab ??? Upar ke chat dekh lo tum… jab bhi aayi ho bas itna hi… feeling horney.. feeling horney.. feeling horney… wo main hi to hun jisne har bar tumhare horney feeling ko apne typing ke dum par orgasms me badla hai.

Unknown Girl… Aukkat mat bhulo tum… virtual friend ho virtual friend ki tarah behave karo, jyada close hone ki jaroorat nahi hai.

Crazy Boy:- Anjaan hi sahi par 2 salon se lagatar hum jisse baat karte hain unke sath bounding ho hi jati hai. Sorry mujhe aaena dikhane ke liye. Tum ek raat aati aur 10 raten gayab ho jati, lekin main har raat tumhara jag kar intzar karta. Kewal is khyal se ki kahin main so gaya aur tum aa gayi, to jo ek mauka mila tha itne dino me, wo bhi hath se gaya aur na jane agla mauka kab mile. Thank you so much… Byeeeee..

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इधर उसने बाय कहा और उधर साची अपनी लैपी बंद करती हुई कहने लगी… "हुंह, बड़ा आया"… और फिर आराम से लेट कर, अपस्यु को याद करती, सात रंग के सपनों में खो गई।

जब से सुबह हुई, वो चहकती हुई इधर से उधर कर रही थी। कान बस अपनी मां के उस आवाज़ को सुनने के लिए तरस रहे थे जब अनुपमा उससे कहती की "बेटा उसे भी खाना देकर अा"…

इंतजार के बाद वो वक़्त भी अा ही गया जब अनुपमा उसे टिफिन देती हुई बोली… "जा उसे भी खाना दे अा"… अभी के लिए तो वो अपनी बाहर की उड़ान को अपने दिखावे के चादर तले ढक कर रखी थी, लेकिन जैसे ही वो अपार्टमेंट के लिफ्ट में पहुंची, बाहर से भी उतावली नजर आने लगी।

चहकती हुई वो अपस्यु के फ्लैट के ओर बढ़ रही थी, किंतु दरवाजे के निकट पहुंचने से पहले उसने एक बार फिर अपने अपने ऊपर एक दिखावा का चादर चढ़ाया और अपने हाव भाव को ठीक करती वो बेल बजाने लगी। दरवाजा खुला और साची अंदर।

दरवाजे के पास ही खड़ी होकर उसने एक पूरी नजर अपस्यु को देखा। उसका दिल किया की अभी उसके बगल में लेट कर उसे बाहों में भर लूं, लेकिन खुद के अंदर की झिझक और पहले अपस्यु के पहल के इंतजार ने उसके भावनाओ को बांधे रखा।

लेकिन वो होता है ना.. मन में किसी के लिए प्यार बसा हो या फिर नफरत चेहरे से समझ में आ ही जाती है, ठीक वही हो रहा था साची के साथ। लाख वो खुद के बंधे रखी थी किंतु उसके चेहरे की रौनक आज इतनी अलग थी कि अपस्यु दूर से ही उसे भांप गया।

एक बार फिर नजरों से नजरें मिलनी शुरू हुई लेकिन इस बार अपस्यु ने साची को यह कहकर जाने के लिए बोल दिया कि उसके कॉलेज जाने में देरी हो रही है। साची यूं तो जाना नहीं चाहती थी लेकिन रुक भी नहीं सकती थी। क्या कहती, तुम मुझे पसंद हो और मुझे तुम्हे छोड़ कर जाने का मन नहीं। दुविधा और विरोधाभास के साथ साची केवल ये सोच कर निकल गई की शाम को अाकर अच्छे से मिलूंगी।

साची के जाते ही अपस्यु, आरव से बात करना शुरू कर दिया। मामला ये था कि जब साची पहुंची उससे थोड़े समय पहले ही आरव ने कॉल लगाया था। अभी वो अपस्यु से उसके तबीयत की जानकारी लिया ही था कि साची अा गई जिस वजह से दोनों को बीच में ही बात रोकनी परी।

आरव:- कहे भगा दिया इतनी जल्दी बेचारी को..

अपस्यु:- कुत्ता कहीं का, तुझे जरा भी संस्कार नहीं। क्या तुझे पाया नहीं की, दूसरों की ना तो बातें सुनी जाती है और ना ही वो क्या कर रहे है उसे देखने में कोई रुचि होनी चाहिए। साला मनहूस कहीं का, मेरी खुशियों पर ग्रहण लगाए बैठा है। चुपचाप वहीं रुक और इंतजार कर, मैं किसी को कॉल करूंगा तो वो तुम्हारे पास 120 करोड़ पहुंचा देगा। फिर आगे क्या करना है वो मैं तुम्हे बाद ने बताऊंगा। चल अब फोन रख।

यदि बात करते-करते बातों में अचानक बदलाव अा जाए फिर चाहे बदलवा नफरत भड़ा हो या प्यार भड़ा, ये संकेत होता है कि कुछ गड़बड़ है। फिर उनके अपने डिकोडिंग के तरीके थे, जैसे कि अपस्यु का कहना .. "दूसरों की बातें सुनना और उनको देखने में रुचि दिखाना".. मतलब ये था कि कोई देख भी रहा है और सुन भी रहा है।

और बस संकेत को समझते ही आरव तुरंत ही कॉल डिस्कनेक्ट कर सीधा बाथरूम पहुंच गया और कानों में एयरपो्ट लगाकर अपस्यु को कॉल मिलाया और साथ ही अपना मैसेंजर खोल लिया….

अपस्यु:- 2 लोग तुझे देख और सुन रहे है।

आरव संदेश भेजते हुए… "ठीक है, लोकेशन बता"

अपस्यु:- एक तेरे लेफ्ट विंडो से 22 डिग्री नॉर्थ.. तकरीबन 400 मीटर की दूरी पर, पहाड़ पर बने एक झोपड़ी से नजर दिए है। दूसरा वेस्ट में, तकरीबन 500 मीटर की दूरी पर, एक हॉल्ट स्टेशन की छत से तुझ पर नजर बनाए है। दोनों के

स्नाइपर रायफल वैपन ड्रागुनोव एस वी डी 7.62।

आरव:- ठीक है होलोग्राम इमेज क्रिएट कर, बाकी मैं इनका बंदोबस्त करता हूं।

अपस्यु:- वैसे कौन सा वैपन तुझे वहां डिलीवर हुआ है?

आरव:- SVLK-14S “Twilight” .408 Cheytac और एक Glock 17 Pistol

अपस्यु:- ठीक है तू चकमा देकर बाहर निकल वहां से, लेकिन याद रखना की उस रिजॉर्ट के कुछ लोग उनके खबरी भी हो सकते है। बाकी मै पूरी नजर बनाए हुए हूं।

आरव:- ठीक है भाई, अब तू बस देखता जा…

अपस्यु वहां पर लगातार नजर बनाए हुए था। आरव के कहे अनुसार अपस्यु ने होलोग्राम इमेज क्रिएट कर सब सेट कर चुका था। आरव अपने साथ लाए रिफ्लेक्टर डिवाइस को वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) से कनेक्ट कर दिया। अब आरव का प्रतिबिंब पूरे कमरे में इधर से उधर भटक रहा था। इधर बाथरूम में ही आरव ने अपने हुलिया में थोड़ा बहुत बदलाव किया और रेंगते हुए दरवाजे से बाहर निकला।

आरव सबको चकमा दे कर बाहर आ चुका था। उसने किराए की कार को स्टार्ट किया और बड़े ही सावधानी से ठीक उस शूटर के लोकेशन के पीछे पहुंच गया जो पहाड़ पर बने एक झोपड़ी से उसपर नजर दिए हुए था… आरव अब घूमकर ठीक उसके झोपड़ी के पीछे पहुंच चुका था और फुर्ती दिखाते हुए पीछे से ही झोपड़ी के अंदर प्रवेश किया..

जबतक वो शूटर स्कोप से अपनी नजर हटा कर हरकत में आया, तबतक आरव की पिस्तौल उसके कनपटी पर लग चुकी थी। आरव ने उसे कुछ ना बोलने का इशारा कर, उसके जेब से फोन लिया और उस पर चल रहे कॉल को डिस्कनेक्ट कर दिया।

शूटर:- तुम्हे क्या लगता है उन्हें पता नहीं चला होगा। मैंने कोई आवाज़ नहीं की पर तुम जो ये तोड़ते-फोड़ते अंदर घुसे हो, क्या उसकी आवाज़ उन तक नहीं पहुंची होगी…

तभी सायलेंसर में दबी गोली चलने की आवाज और आरव हंसता हुआ… "जब जान पर बन आती है तो ऐसे ही कहानियां बनने लगते है। जब उनसब का नंबर भी अा ही रहा है, तो मुझे क्यों इस बात की फ़िक्र की उन्हे शक हुआ या नहीं हुआ। उन्हें पता चला या नहीं चला.. ट्रिगर दबाव खेल खल्लास, अब अगले का नंबर आने दो"
 
Update:-16

तभी सायलेंसर में दबी गोली चलने की आवाज और आरव हंसता हुआ… "जब जान पर बन आती है तो ऐसे ही कहानियां बनने लगते है। जब उनसब का नंबर भी अा ही रहा है, तो मुझे क्यों इस बात की फ़िक्र की उन्हे शक हुआ या नहीं हुआ। उन्हें पता चला या नहीं चला.. ट्रिगर दबाव खेल खल्लास, अब अगले का नंबर आने दो"

"अबे !!! पूरा कान सुन कर दिया। तू चाहता क्या है"… थोड़ा डर और गुस्से के बीच, निकली उस शूटर की आवाज़।

आरव:- आज मेरा मूड बहुत अच्छा है इसलिए तुझे मारने से पहले सोचा तुझ से कुछ बाते कर लूं। वैसे नाम क्या है तुम्हारा और शूटिंग में कौन से झंडे गाड़े है वो बता।

शूटर:- मेरा नाम वीरभद्र सिंह है, उदयपुर से हूं। मैंने शूटिंग में प्रशिक्षण लिया है और ये मेरा पहला काम था। लेकिन मैं अभी ये सोच कर परेशान हूं की तू वहां भी है और यहां भी, ये कैसे संभव हुआ।

आरव अपना पिस्तौल पीछे कमर में खोंसकर उसेके सिर पर एक हाथ मारते बोला… "अभी मैं बात करना चाह रहा हूं ना, तो मेरे बातों का बस जवाब दे। गोली मार दी हुई होती, तो साले सस्पेंस में ही मर जाता"

मौका अच्छा था, वीरभद्र ने जैसे ही देखा पिस्तौल उसने पीछे रख लिया, फुर्ती दिखाते उसने अपनी पिस्तौल निकाल ली और सर पर तानने की नाकाम कोशिश। जैसे ही वो अपना हाथ घुमाकर आगे के ओर लाया, आरव ट्रिगर में फंसे उंगली को हल्का ऊपर की ओर मोड़ दिया, दूसरे हाथ से एक धारदार खंजर उसके गले पर रखकर…

"अभी मैं अपना हाथ का दवाब थोड़ा और बढ़ा दूं, तो एक तरफ तेरी ट्रिगर दबाने वाली उंगली ऐसे टूट जाएगी की फिर तू नकारा हो जाएगा। और कहीं ये वाले हाथ का दवाब बढ़ा दिया तो तेरे आगे स्वर्गवासी का टाइटल लग जाएगा। जल्दी बता कौन सा ऑप्शन तुझे पसंद आया"

वीरभद्र:- इनमें से कोई नहीं। बात करते हैं ना।

आरव उसके हाथ से पिस्तौल लेकर इतने तेजी के साथ पिस्तौल के एक-एक पुर्जे को अलग किया कि वीरभद्र अपनी आंखें चौड़ी कर बस देखता ही रह गया। उसने अपने दोनो हाथ जोड़ कर उसे नमन करते हुए पूछा… "देखने में लड़के जितने और अंदर ऐसी क्षमता। आज से आप मेरे गुरु और मैं आप का चेला, प्रभु।

आरव:- अब जाकर तूने कुछ ऐसा कहा जो मेरे कानो को पसंद आया है। अब जरा जल्दी-जल्दी में बक की तुझे यहां किसने भेजा और तुझे कौन सा काम सौंपा गया था?

वीरभद्र:- मुझे और मेरे साथ एक और शूटर, जिसे मैं जानता नहीं, उसे विधायक भूषण जी ने भेजा है। मेरा काम बस आप के कमरे में नजर बनाए रखना था और पल-पल की खबर विधायक जी को देनी थी।

आरव:- पल-पल की खबर.. अबे ये बता तू पल-पल की खबर के लिए ये फोन लाइन हमेशा चालू रखेगा, तो तेरी फोन कि बैट्री ना डिस्चार्ज होगी। और क्या वो इतना फुर्सत में है कि पूरा दिन तुझे सुनता रहेगा।

वीरभद्र अपना फोन बाहर निकाला और साथ में बैग खोलकर बैट्री चार्ज करने की व्यवस्था दिखाते हुए कहने लगा.. "भाई 5 पॉवरबैंक अपने साथ लाया हूं और उधर विधायक चाचा थोड़े ना कान लगा कर सुन रहे हैं। वहां एक लड़का है जो हमेशा हमे सुनता रहता है। कोई इमरजेंसी वाली बात हो तो वो विधायक चाचा से बता देता है"।

आरव:- वह !! शाबाश !! क्या उम्दा टेक्नोलॉजी है। वैसे ये विधायक, चाचा कब से हो गए रे।

वीरभद्र:- वो मेरे दूर के रिश्तेदार हैं और उन्होंने ही मेरे प्रशिक्षण का पूरा खर्चा उठाया था।

आरव:- मदर*** हरामि.. मतलब तुझे शूटर बनाया उसने और कुछ पढ़ाई लिखाई भी करवाई है या नहीं।

वीरभद्र:- अरे पढ़ाई लिखाई करके क्या करेंगे गुरुदेव। अंत में तो पैसे ही कमाने है, और देखो, इस काम के लिए उन्होंने मुझे 1 लाख रुपए भी दिए है।

आरव:- हम पंछी एक ही वृक्ष के है बस डाल अलग-अलग। अच्छा सुन तुझे कभी ये नहीं लगा कि तू अपने ज़िन्दगी में कुछ अच्छा भी कर सकता था।

वीरभद्र:- मै इससे भी अच्छा क्या करता?

आरव:- साले पूरा गोबर ही हो। अबे 1 लाख के लिए यहां अा गया और मैंने तुझे गोली मार दी होती तो क्या वो 1 लाख अपने छाती पर लाद कर ले जाता। तुझे इतनी भी समझ नहीं की वो तुझे मारने के लिए यहां भेजा है।

वीरभद्र:- अपने को काम चाहिए बस, इतना नहीं सोचता। आपने धोका दिया वरना मेरे निशाने पर तो पहले आप ही थे। अब बताओ की कौन मरता और कौन मारता।

आरव:- बस बहुत हुआ.. तुझ से बात करूंगा तो मेरा भेजा फ्राई हो जाएगा। ये बता मेरे लिए काम करेगा।

वीरभद्र:- आप मुझे गद्दारी करने के लिए कह रहे है।

आरव:- मैंने गोली चलाई और तू मर गया यानी तेरी पिछली जिंदगी भी उसी के साथ मर गई। अब मैंने तुझे जिंदगी बक्शी तो इस हिसाब से तू किसका वफादार हुआ।

वीरभद्र:- हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं। बिल्कुल गुरुदेव अब से मेरी वफादारी आपकी, जबतक की मैं मर ना जाऊं।

आरव:- फ़िक्र मत कर तुझे हम मरने नहीं देंगे। अच्छा ये बता तूने अबतक कोई मज़े किए हैं कि ना किए।

वीरभद्र:- कैसे मज़े..

आरव:- अरे वही छोड़े, लड़कियों के साथ मज़े..

वीरभद्र शर्माते हुए… जी नहीं गुरुदेव अब तक तो मैंने किसी को छुआ तक नहीं

आरव:- पहले तो तू ये गुरुदेव बुलाना बंद कर, मेरा नाम आरव है। और हां आज रात तू तैयार रहना..

वीरभद्र:- किसलिए गुरुदेव.. अरे माफ़ करना. किसलिए आरव.. किसी को मारना है क्या…

आरव:- नहीं रे भोले.. तुझे मज़े के लिए तैयार रहने कह रहा हूं। फिलहाल चल जरा उस दूसरे शूटर से भी हाय-हेल्लो कर आते हैं।

वहां से निकलने से पहले आरव ने वीरभद्र से कॉल लगवाया और बहाने बनवाते हुए कहलवा दिया कि, "बिल्कुल सुदूर इलाका है नेटवर्क आते जाते रहता है, अपने लोकेशन पर हूं और मेरे ठीक सामने टारगेट है"। फिर वहां से निकलकर वो लोग चढ़े उस हल्ट स्टेशन की छत पर।

ये वाला शूटर थोड़ा अनुभवी और ढिट भी था। तकरीबन 22 हत्याएं कर चुका था और जमील का खास पंटर था। आरव ने उसे 10 करोड़ के डील पर सेट किया और 5 करोड़ एडवांस में दे दिए। चूंकि इस शूटर पर यकीन नहीं किया जा सकता था इसलिए आरव ने चुपके से उसके गन में एक छोटा सा जीपीएस यंत्र और साथ में एक माइक्रोफोन चिपकाकर वीरभद्र के साथ वापस लौट आया।

रिजॉर्ट लौटकर वीरभद्र कुछ सोचते हुए आरव से कुछ पूछने कि कोशिश करता है लेकिन आरव उसे चुप रहने का इशारा कर अपने साथ लाए कुछ यंत्र बैग से निकालने लगा। बिल्कुल छोटे और मक्खी के अाकर का माइक्रो डिवाइस जो देखते ही देखते उड़ कर वहां से गायब हो गई और थोड़े देर बाद तकरीबन 50 से ऊपर वैसी ही मक्खियां वापस लौट आई जिसे आरव ने एक छोटे से बॉक्स में पैक करके चार्ज होने के लिए छोड़ दिया।

ये वही डिवाइस थे जो अपस्यु के वीपीएन से कनेक्ट था और पूरे चप्पे चप्पे पर वो इसी से नजर बनाए हुए था। आरव डिस्चार्ज हुए डिवाइस को चार्ज में लगा चुका था और उसकी जगह बैकअप डिवाइस छोड़ चुका था।

आरव:- हां भाई वीरे अब बताइए क्या पूछ रहे थे।

वीरभद्र:- भाई यही सब पूछने कि कोशिश कर रहा था कि आप कर क्या रहे हो।

आरव:- कुछ नहीं बस मक्खियां उड़ाने का शौक है वहीं पूरा कर रहा था। चल अब जरा तफरी कर आया जाए। और हां साथ में वो दूसरा बैग भी लेे लेना।

वीरभद्र:- इसमें क्या है आरव..

आरव:- कुछ और छोटे बड़े कीड़े, इन्हे जरा बाहर इनकी सही जगह छोड़ आऊं।

आरव वीरभद्र के साथ निकाल गया। इधर अपस्यु भी थोड़ा निश्चिंत मेहसूस करते हुए अपने बदन की जांच करके देखने लगा। पसलियां जुड़ना शुरू हो चुकी थी। हाथ की हड्डी भी लगभग जुड़ने को अाई थी। दिक्कत बस पाऊं की हड्डियों में था, शायद पाऊं की हड्डी जुड़ने में अभी कुछ दिन और लगने वाले थे।

लगभग सुबह के 11 बजे होंगे जब सभी न्यूज चैनल के ब्रेकिंग न्यूज में एक ही समाचार अा रहा था… "नागपुर के पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री त्रिवेणी शंकर का हार्ट अटैक से निधन, पूरे देश में सोक कि लहर"… अपस्यु इस खबर को देख कर मुस्कुराया… "वह रे पैसा तू कुछ भी करवा सकता है".. अपस्यु इस खबर पर मुस्कुरा ही रहा था कि तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी… "मुझे उम्मीद ही थी इसकी"

अपस्यु, अपना कॉल उठाते… "जी सर मैंने खबर देख लिया, लेकिन अभी तक वन डाउन ही हुआ है, दूसरे की खबर कब सुना रहे"…

जमील:- दूसरा कोई राह चलता आदमी नहीं है, उदयपुर का सीटिंग एमएलए और राजस्थान का शिक्षा मंत्री है, थोड़ा वक़्त चाहिए होगा इसके लिए।

अपस्यु:- चलो ठीक है दिया वक़्त, लेकिन ये तो बताओ कि उस पूर्व केंद्रीय मंत्री को उड़ाया कैसे।

जमील:- देख छोटे ये धंधे के राज तो मैं अपनी बीवी को नहीं बताता इसलिए इसका जवाब मै नहीं दे सकता। बस तू काम होने से मतलब रख। जो जिस हैसियत का है, उसकी मौत उतने ही सन्नाटे में, बिना किसी शक के होगा।

अपस्यु:- चलो नहीं पूछता मैं धंधे कि बात लेकिन जल्दी से बचा काम कर दो और अपने पैसे लेकर जाओ।

जमील:- देख अब हम पार्टनर हो गए हैं तो एक दूसरे पर भरोसा करते आना चाहिए इसलिए मैं चाहता हूं कि तू वो बाकी के पैसे मुझे देदे।

अपस्यु:- हाम्म, ठीक है कुछ वक़्त दो मै इसपर सोच कर बताता हूं।

अपस्यु उससे बात ख़त्म कर जोर जोर हंसने लगा और फिर पूरी ताकत झोंक दी अपनी आवाज़ में….

व्यापार में फसे या गलत कारोबार में फसे

जहां घिरे वहीं फसे, फसे तो बस फंसते रहे

हर मोड़- मोड़, हर डगर- डगर


भंवर है ये भंवर- भंवर....
 
Update:-17

अपस्यु जमील से बात करने के बाद सीधा आरव से संपर्क किया। दोनों के बीच पूरी योजना पर पुनर्विचार होने लगा, जिसका मुख्य बिंदु था सिटिंग एमएलए और शिक्षा मंत्री भूषण, जिसके कत्ल के बाद भारत की सभी सुरक्षा एजेंसी उनके कातिलों के पीछे लग जाती। फिर चाहे कातिल कितने भी शातिर क्यों ना हो गुत्थी तो वो सुलझा ही लेते। इसी चिंता को दूर करते आरव ने आश्वासन दिया कि "मारना तो उसे होगा ही लेकिन हम तक कोई पहुंच ना पाए इस बात का पूरा इंतजाम हो गया है"। अपस्यु ने उसे अपना ध्यान रखने के लिए बोलकर फोन काट दिया और खुद पर ही नाराजगी जताने लगा।

कुछ देर बाद जमील के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए, अपस्यु ने उसे इंदौर भोपाल के हाईवे के बीच स्थित एक लोकेशन से कल ही अपने पैसे उठवा लेेने के लिए बोल दिया, हालांकि जमील को उस जगह के बारे पहले से सब पता था। सारी बातें तय ही गई और पैसे उठने में लिए अगली सुबह के 10 बजे का मुहूर्त निकला।

तकरीबन 3 बजे साची और लावणी अपने कॉलेज से लौट रही थी। साची बीती रात तो लावणी से बच गई, सुबह भी इतनी जल्दी में निकले की लावणी कुछ पूछ ना पाई, लेकिन अभी वक़्त भी सही था और मौका भी। क्योंकि अभी स्कूटी से भाग कर जाती कहां.. लावणी, साची की छेड़ती हुई पूछने लगी… "क्यों दीदी तो तुम्हे तुम्हारा बॉयफ्रेंड मिल ही गया"

साची:- मुझे तो लगता है मुझे से पहले तूने बाजी मारी है। तुम्हारी बात तो किस तक भी पहुंच गई।

लावणी (हे भगवान, लगता है उस आरव के बच्चे ने दीदी को भी तस्वीरें दिखा दी क्या)… हुंह ! कोई कुछ भी कहेगा और आप मान लोगी क्या?

साची:- अच्छा जी !! किसी के कहने पर मैं क्यों मानु, मुझे तो तुमने ही बताया था..

लावणी (मैंने बताया था, लेकिन कब। कहीं दोबारा तो मैंने 180ml तो नहीं चढ़ा लिया था.. नाना कुछ तो गड़बड़ है)

साची:- क्यों क्या हो गया मेरी भूटकी को, दोबारा से चुम्मिं के ख्यालों में डूब गई क्या? वैसे मैं बता दूं कि चुम्मी का ख्याल भी आए ना तो मत करना क्योंकि आरव अभी दार्जिलिंग गया हुआ है।

लावणी:- दीदी तुम मेरी कसम खाकर कहो तो, मैंने ऐसा भी कुछ तुम्हे बताया था।

साची:- ओह मतलब बताया नहीं लेकिन किया तो है ना।

पूरे रास्ते साची तो स्कूटी से नहीं भागी लेकिन लावणी की छिलाई जरूर चालू रही। इधर साची अंदर से खुश होती खुद से ही कहने लगी.. "मुझे छेड़ने चली थी, ऐसा घुमाया की चक्कर में उलझ कर रह गई"… दोनों बहने घर पहुंची। लावणी तो पूरे रास्ते आरव को ही कोसती अाई क्योंकि उसी के वजह से उसे गलतफहमी हुई और नतीजा पूरे रास्ते उसे साची को झेलना पड़ा, जिसका बदला वो लेना चाहती थी।

वहीं साची जब से पहुंची तब से बस घड़ी ही देख रही थी कि कब आधे घंटे बीते और वो अपस्यु से मिलने चली जाए। खैर उसकी मुराद भी पूरी हुई और अनुपमा खुद सामने से उसे टिफिन देती हुई अपस्यु के पास भेज दी। बड़ी ही उत्सुकता के साथ वो अपस्यु से मिलने पहुंची। लेकिन जब वो पहुंची तब उसका उत्सुकता से खिला चेहरा अपस्यु के मुरझाए चेहरे को देख कर उतर गया।

साची उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर उसे धीमे से सहलाती हुई पूछने लगी.. "क्या हुआ"

अपस्यु अपने चेहरे पर झूठी मुस्कान लाते हुए..… "कुछ भी तो नहीं हुआ। तुम सुनाओ कैसा रहा आज कॉलेज'।

साची:- कॉलेज में क्या होना था, वहीं बस पढ़ाई-लिखाई और क्या?

अपस्यु:- कोई नया दोस्त नहीं मिला..

साची:- नया दोस्त, पुराना दोस्त वो सब देख लेना जब तुम कॉलेज आओगे, अभी बस मुझे इतना जानना है कि तुम्हारा ये चेहरा, इत्तु सा क्यों हो गया है?

अपस्यु कुछ पल खामोश रहा फिर कहने लगा… "कुछ नहीं बस ऐसे ही कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था"।

साची:- ऐसा ही होता है जब पास में कोई ना हो और पूरा दिन अकेले रहो। ऊपर से ये घर में सिनेमा हॉल जितना बड़ा स्क्रीन तो लगा रखा है लेकिन ये नहीं की कोई मूवी ही चला कर देख लो।

अपस्यु गहरी श्वास लेता थोड़ा सा टिक कर बैठा और अपने चिंता से भरे चेहरे के भावनाओ को बदलते हुए, थोड़ा जिंदादिली के साथ कहने लगा…. "माफ़ करना मैं जरा इधर-उधर के ख्यालों में डूबा हुआ था इसलिए थोड़ा चिंतित सा हो गया था लेकिन अब सब ठीक है"..

साची:- ये हुई ना बात.. चलो अब खाना खा लो…

अपस्यु:- ना मै खाना नहीं खाऊंगा। फ्रिज में जूस रखा है वो ही पी लूंगा।

साची:- काहे, इतना बुरा लगा मेरे घर का खाना?

अपस्यु इस बार साची के आखों में आखें डाल कर शरारत भाड़ी नजरों से देखते हुए…. तुम्हारे घर के खाने का टेस्ट, सुनिए मिस यदि आप ने कल खिलाया होता तो ना मैं वो आलू के पराठे टेस्ट करता… सब तो को लावणी बीन कर ले गई।

साची, अपस्यु की इस बात पर उसे धीरे में मारती हुई पूछने लगी…. झूठे, सच-सच बताओ की मेरे जाने के बाद तुमने खाना नहीं खाया था।

अपस्यु:- खाया था साची, मैंने झूठ कहा था और बहुत टेस्टी भी बना था ।

साची:- चलो मुंह खोलो..

एक बार फिर साची निवाला लेकर तैयार थी। साची के हाथ में निवाला देखकर पहले अपस्यु हंसा और फिर उसे देख कर साची भी हसने लगी। फिर साची ने एक-एक करके निवाला उसके मुंह में खिलाती रही। इसबार वो निवाला बड़े ध्यान से उसके मुंह में डाल रही थी और बीच-बीच में उसके चेहरे को भी निहार रही थी।

जब भी दोनों कि नजरें मिलती दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते। किंतु अभी 8-10 निवाला ही मुंह में गया होगा की अपस्यु की भावनाएं उसके आखों से बाहर आने लगीं। उसकी मां की यादें हर निवाले के साथ इतनी तेज हो रही थी कि भावनाएं बाहर अा ही गई।

साची, अपने हाथों से उसके आंसू पोछती कहने लगी….. खाते वक़्त रोते नहीं। वरना खाना शरीर में नहीं लगेगा। साची का ये अपनापन देखकर, अपस्यु खुद को रोक नहीं पाया और साची को गले लगाकर वो खुल कर रोया। कुछ देर तक रोने के बाद जब मन का विकार कुछ निकला तो उसे एहसास हुआ कि वो साची के गले लगे है। वो सॉरी कहते हुए उससे अलग हुआ। दोनों के बीच कुछ गुमसुम सी बातें होती रहीं, कुछ दबे से एहसास और खामोशी ही खामोशी चारों ओर। बस हृदय से हृदय के बीच भावनाओ का साझा हो रहा था।

इधर आरव

शाम के 4 बज चुके थे। आरव अपने बैग की सभी डिवाइस अपस्यु के मार्क लोकेशन पर लगा चुका था। काम समाप्त होने के बाद वीरभद्र ने पूछा.. "अब क्या करना है आरव"। इसपर आरव कुटिल मुस्कान देते हुए कहने लगा… "अब चलकर जरा शिकार करते हैं और तेरे लिए कुछ मज़े का प्रबंध भी करते हैं"। वीरभद्र शर्माते हुए उसे कहने लगा… "लगता है आज मेरा जीवन सफल हो जाएगा। वरना जब से उमंगे जगी है अपने हाथ से ही खुद को संतुष्ट करता हूं"… आरव उसकी बात सुन कर हंसने लगा और दोनों चल दिए रिजॉर्ट के पब में।

पब में पहुंचते ही वहां के माहौल को देख वीरभद्र की आखें खुली की खुली रह गई। "आरव ये क्या बवाल है भाई"।

आरव:- इसे ज़िन्दगी जीना कहते हैं मेरे दोस्त। गम भुलाओ, पियो-पिलाओ और टल्ली होकर झुमो नाचो मौज मनाओ।

वीरभद्र:- भाई लेकिन वो मेरे पास पैसे नहीं है।

आरव:- पागल है क्या, उस जमील के शूटर मुन्ना को जब मैं 10 करोड़ दे सकता हूं तो अब तो तू मेरा वफादार है.. पैसे की कोई चिंता नहीं करने का। तू यहां आराम से मौज कर और अपने मस्ती के लिए कोई पार्टनर ढूंढ़ ले।

वीरभद्र:- आरव सारी बातें तो सही है पर किसी लड़की को उस बात के लिए कैसे कहूं.. शुरवात कहां से करूंगा और क्या डायरेक्ट बोल दु।

आरव एक सिगरेट जलते हुए….. ना मुन्ना ना, तुझे कुछ करना नहीं है बस यहां टल्ली हो कर पी, डांस फ्लोर पर जा और अपनी मस्ती में बस पैसे लुटा.. आगे तुझे कुछ करना नहीं है।

आरव अपनी बात ख़त्म कर एक कॉकटेल बनवाया और उसे बड़े इत्मीनान से सिप-सिप में एन्जॉय करते हुए पीने लगा। इधर वीरभद्र विशकी के चार बड़े पेग लगा कर डांस फ्लोर पर चढ़ गया। जैसा आरव ने बताया था, वीरभद्र ठीक वैसे ही पैसे लुटाते हुए डांस करने लगा।

एक सोची समझी रणनीति जिसमें वीरभद्र के हाथों पैसे लूटवाकर, रिजॉर्ट के उन लोगों को यकीन दिला देना जों जमील के लिए काम करता था…., यही वो लड़का है जो पैसों की डील करने आया है और पहले जिसने कमरा बुक किया वो कोई और था जिसे मुआयने के लिए पहले भेजा गया था।

आरव का काम हो चुका था। एक कॉकटेल वो वहीं पी चुका था और 2 पेग अपने कमरे में मंगवा लिया और वहीं बैठकर सिप-सिप में पीते हुए बस कल के बारे में सब प्लान करने लगा। सभी मोहरों की चाल चली जा चुकी थी। इस खेल के सारे प्यादों की मात हो चुकी थी, बचे थे तो सिर्फ महारथी.. जमील और भूषण।

ऐसा नहीं था कि वो लोग केवल इस बात को लेकर चल रहे थे कि उन्हें इंदौर पहुंचना है और बस आरव को मार कर पैसे ले आने है। उनके जहन में 2 बातें थी पहली यह की लड़का सेंट्रल होम मिनिस्टर के संपर्क में है मतलब कोई बड़ा खिलाड़ी है। साथ ही साथ त्रिवेणी शंकर को जो झांसा दे सकता है मतलब चालाकी में लोमड़ी का भी बाप होगा। बस इन्हीं सब बातों पर आकलन करते हुए जमील और भूषण ने यही फैसला लिया की "जो भी हो वो उनके बताए ठिकाने से तो, कभी पैसे लेने नहीं जाने वाला"
 
Update:-18(A)

ऐसा नहीं था कि वो लोग केवल इस बात को लेकर चल रहे थे कि उन्हें इंदौर पहुंचना है और बस आरव को मार कर पैसे ले आने है। उनके जहन में 2 बातें थी पहली यह की लड़का सेंट्रल होम मिनिस्टर के संपर्क में है मतलब कोई बड़ा खिलाड़ी है। साथ ही साथ त्रिवेणी शंकर को जो झांसा दे सकता है मतलब चालाकी में लोमड़ी का भी बाप होगा। बस इन्हीं सब बातों पर आकलन करते हुए जमील और भूषण ने यही फैसला लिया की "जो भी हो वो उनके बताए ठिकाने से तो, कभी पैसे लेने नहीं जाने वाला"

रात का वक़्त था और माहौल बड़ा रंगीन। वीरभद्र को रास्ता क्या बताया आरव ने, वो तो पूरा जंग जीत आया। लौटते वक़्त वो किसी विदेशी लड़की के साथ कमरे में लौटा। आरव एक नजर उस विदेशी लड़की को देखा, और दूसरी नजर वीरभद्र को। हैरानी के कारण उसने अपना आंख मिजा और पुनः देखा….

आरव:- अबे वीरे ये क्या बवाल उठा लाया है तू?

इस से पहले की वीरभद्र कुछ बोलता वही लड़की बोलने लगी:- hello I am Lita Smirnov. M not "bhawal".. I am hot patakha.

आरव:- russian mal… wowww.. Do you know Hindi?

लिटा:- हां थोडा थोडा…

आरव:- तेरी तो निकाल पड़ी वीरे, वैसे कितने में सेट किया।

वीरभद्र, अपनी जगह पर थोड़ा हिलते-डुलते :- मुझे कुछ भी पता ना गुरुदेव, ये तो बस आप की ही माय थी। आप ने जैसा बताया वैसा मैं करता गया और ये मेरे साथ चली अाई।

लिटा:- hi hi hi, u guys are very funny and I drspirate for threesome.

आरव:- Nope, you guys carryon.

विदेशी बाला वो भी रशियन। जब वो वीरभद्र के शर्ट खींच कर बिस्तर तक लेे जा रही थी, वो तो पूरी तरह अंदर से हिल गया। वीरभद्र अभी संभला भी ना था कि तब तक लिटा ने….. मुंह बंद, अति उन्नोमदन वाला एक जोरदार चुम्मा वीरभद्र के होटों पर चिपकाती हुई होंठ से लेकर जीभ तक चूस कर रसोभोर कर दी।

आरव उसकी हालत देखकर हंस रहा था और साथ में अपने कानो में हेडसेट लगा कर मुन्ना को सुन भी रहा था। वीरभद्र की हालत इस वक़्त किसी शर्माए लड़की जैसी थी और लिटा एक उतावला लड़का।

लिटा जब उसके होंठ को काटती हुई, अपने हाथ नीचे ले जाकर उसके लिंग को अपने मुट्ठी ने भरकर भिंची, तब तो वो चिहुंक सा गया और अपनी आखें बंद कर, बस तेज-तेज सासें निकालने लगा। लिटा उसे धक्के देकर बिस्तर पर पटक दी और बड़ी ही तेजी में उसके बेल्ट खोलती पैंट का बटन खोल दी। और एक बार ने ही चड्डी सहित उसके पैंट को नीचे खींच कर निकाल दी।

दोनों अपने ही रासलीला में लीन हो गए। आरव वहीं उनके बिस्तर के कुछ दूरी से, सोफे पर बैठा बस हर हरकत पर नजर बनाए हुए था। इसी क्रम में लावणी का फोन आरव के पास आया।

लावणी:- तुम दूर होकर भी मुझे इतना परेशान क्यों कर रहे हो?

आरव:- मैंने परेशान किया तुम्हे। उल्टा तुम मेरे ख्वाबों के अाकर…

इतना ही उसने बोला कि बीच में ही लावणी टपक पड़ी:- तुम घटिया इंसान, तुम्हारी सोच ही गंदी है। वैसे मैंने फैसला कर लिया…

आरव:- सच… तो बोल दो जल्दी से… आई लाबू..

लावणी:- हुंह !! जाओ मुंह धोकर आओ अपना.. मैं और तुम्हे लव यू कहूं, पॉसिबल ही नहीं। मैंने बस तुम्हे वो देने का फैसला कर लिया है…

आरव:- वो मतलब क्या? अपना दिल देने का फैसला..

लावणी:- नहीं, गालों पर…

लावणी जैसे ही "गालों पर" बोल रही थी तभी रासलीला के कार्यकर्म में लिटा, वीरभद्र को लिटाकर, उसके लिंग को ऐसे चूसी कि उससे बर्दास्त ना हुआ और अपने चरोत्कर्ष पर पहुंच कर उसने सब गीला-गीला कर दिया। ज्यादा जोश में था शायद इसलिए 2 मिनट में ही ढेर हो गया। और इसी बीच जब वो चरमोत्कर्ष पर था तब उसने जोर से आवाज़ निकाला, जिसे लावणी ने भी सुना…

लावणी बोलते बोलते चुप हो गई और इधर से आरव हंसते हुए… "क्या हुआ लावणी आगे भी तो बोलो"।

लावणी:- ना, वो बैकग्राउंड साउंड क्या था पहले वो बताओ?

आरव:- वो तो मैं तुम्हारी याद में, एक अबला पुरुष की कहानी देख रहा था जो एक सुंदर और हॉट माल के साथ सेक्स करने गया लेकिन 2 मिनट में ही खाली हो गया।

लावणी:- छी !! .. और इतना कह कर फोन काट दी। इधर आरव हंसते-हंसते वीरभद्र की ओर देखने लगा। बेचारा शर्माकर तकिए से अपना मुंह ढक लिया। लेकिन लिटा कहां रुकने वाली थी। वो तो पूरे जोश में थी। उसने पुनः उसके लिंग के साथ खेलना शुरू की और उसे उत्साहित करने में लग गई।

तकरीबन रात के 10.30 बजे होंगे जब पहले वीरभद्र के मोबाइल पर कॉल आया। लेकिन वीरभद्र इस वक़्त मिशनरी पोजीशन में लीन, इतना जोरदार आंनद उठा रहा था कि वो कॉल क्या उठाएगा। आरव तुरंत चौकन्ना हुआ और हेडसेट पर पूरा ध्यान लगाया। दूसरी ओर से कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था।

आरव को पक्का यकीन था कि मुन्ना और उनके बीच कुछ तो बात चल रही होगी। फिर धीमा आवाज़ सुनाई दिया ऐसा की मानो कहीं दूर से अा रहा हो.. फिर पास आते गया… और आवाज़ साफ होती गई।

…… ठीक है भाई…… लेकिन करना क्या होगा….… ओह .... हां .. हां.. हां…..ठीक है भाई लेकिन मैं क्या कह रहा था कि आप किसी को नहीं भेजिए। यहां मैं और वो लड़का है ना दोनों मिलकर आसानी से संभाल लेंगे… हां .. हां.. नहीं वो छोटा सा तो लड़का है और साला सौकीन भी, अभी लगा है किसी विदेशी लड़की के साथ…. ठीक है भाई…. ठीक…

आरव के लिए कुछ भी समझ पाना मुश्किल था क्योंकि वो एक तरफ की आवाज़ ही सुन रहा था। लेकिन जिस तरह से वो मुन्ना उससे बात कर रहा था, आरव को शक हो गया कि कुछ तो गड़बड़ हैं।

आरव सीधा पहुंचा वीरभद्र के पास और उसके पीछे एक लात मारी .. वो पीछे मुड़ कर देखा और लिटा के ऊपर से हट गया। आरव लिटा को कुछ पैसे देते हुए वहां से जाने के लिए बोल दिया और वीरभद्र को मुंह धोकर आने के लिए बोला।

वीरभद्र छोटा सा मुंह बनाए अपना मुंह धोकर वापस आया… "क्या है यार, इससे अच्छा तो गोली मार देते, ऐसे वक़्त में कोई दुश्मन भी परेशान नहीं करता"..

आरव:- तू बकवास बंद कर और भूषण को फोन लगा जल्दी।

आरव के कहने पर वीरभद्र ने भूषण से संपर्क किया। कुछ देर इंतजार के बाद भूषण लाइन पर आया और वीरभद्र से केवल इतना कहा कि "मुन्ना जैसे बोले वैसा करना है".. और इतना कह कर फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। वीरभद्र के कॉल से तो कुछ भी पता नहीं चला और आरव को मुन्ना कि एकतरफा बात खाए जा रही थी। रह-रह कर उसके कानों में मुन्ना कि वही बात गूंज रही थी… "आप किसी को नहीं भेजिए"..

वो बस इस "किसी को नहीं भेजिए" को ही आकलन कर रहा था। कहीं ना कहीं उसे लग रहा था कि ये लोग यहां अपनी तादात तो बढ़ाने कि बात कर रहे थे लेकिन भूषण नहीं अा रहा। आरव इस वक़्त मुन्ना से केवल इसलिए नहीं बात करना चाहता था क्योंकि की वो उसे परख रहा था कि 'वो खुद आता है सबकुछ बताने या हार कर उसे है जाना होगा'।

शायद आरव का समय देना सही था। तकरीबन 10.45 पर मुन्ना का ही कॉल अा जाता है और वो मिलना चाह रहा था। आरव के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान अा जाती है और जुबान से यही निकलता है… "वाह रे पैसा"

आरव, वीरभद्र को साथ नहीं लेता ताकि रिजॉर्ट में छुपे खबरी को लगना चाहिए कि डील करने वाला लड़का अपने कमरे में ही है और वो मुन्ना से मिलने पहुंच जाता है। मुन्ना उससे मिलकर बताता है….. "रिजॉर्ट के कुछ खबरियों ने जमील को सूचना दी थी कि "वो लड़का पक्का अय्याश है और यहां पार्टी कर रहा है"। इसी बात को ध्यान में सोचकर जमील ने तुम्हे मारकर सारे पैसे वहां लेे आने के लिए बोल रहा था"।

आरव:- सिर्फ इतनी सी बात तो नहीं हो सकती।

मुन्ना:- हर खबर की एक कीमत होती है.. और ये खबर तो शायद तुम्हारे लिए बहुत बड़ी होगी।
 
Update:-18(B)

आरव:- सिर्फ इतनी सी बात तो नहीं हो सकती।

मुन्ना:- हर खबर की एक कीमत होती है.. और ये खबर तो शायद तुम्हारे लिए बहुत बड़ी होगी।

आरव:- मुंह खोलो..

मुन्ना:- मुझे ऐसा क्यों लगता है कि मैं एक पिंजरे में फंसे तोते से बात कर रहा हूं जिसकी गर्दन किसी भी वक़्त मरोड़ी जा सकती है।

आरव:- अपना मुंह खोलो मुन्ना..

मुन्ना:- तुम हारे हुए खिलाड़ी हो और यदि मैंने तुम्हारा साथ दिया तो फिर ये पैसा किस काम का, जिससे मेरी जान ही चली जाए और घूम फिर कर वो पैसा उन्हीं के पास पहुंच जाए।

आरव:- तो तुम क्या चाहते हो।

मुन्ना:- अब आए हो सही मुद्दे पर। मैं चाहता हूं कि तुम मुझ से सौदा कर लो।

आरव:- बोलो, मैं सुन रहा हूं।

मुन्ना:- तुम मुझे 150 करोड़ देदो और अपनी जान बचा लो।

आरव:- 200 करोड़ दिए.. अब उनकी बात बताओ और अपनी योजना।

मुन्ना:- जमील बहुत खुश था क्योंकि कल जमील और भूषण की बैठक सेंट्रल होम मिनिस्टर के साथ होनी है। वो लोग कुछ उनके फायदे की बात करेंगे और बदले में दिल्ली के अंदर एक टारगेट को उड़ाने वाले है जिसके लिए उन्हें होम मिनिस्टर का साथ चाहिए।

आरव:- ये सारी बातें जमील ने तुम्हे बताई।

मुन्ना:- तुम्हे क्या लगा तुम कोई झुनझुना मेरे रायफल में लगाकर चले जाओगे और मुझे पता ना चलेगा। मेरी जान (उसकी स्नाइपर रायफल) के ऊपर परा एक निशान जब मुझे खटकता है फिर तो तुमने उसपर ना जाने क्या-क्या चिपका कर गए थे। तुमने उतना ही सुना जितना मैंने तुम्हे सुनाया। फिर सोचा थोड़ा इंतजार कर लूं, देखूं तुम आगे क्या करते हो। हालांकि खिलाड़ी तो तुम सही हो पर खेल गलत आदमी के साथ रहे हो।

आरव:- तू काहे मेरा बाप बनने की कोशिश कर रहा है। भाई थोड़ा शॉर्ट में निपटा ना।

मुन्ना:- जानते हो एक शूटर की सबसे खास बात क्या होती हैं धैर्य… वो पूरे माहौल का मुआयना करता है, हवा का रुख परखता है उसकी गति को महसूस करता है। फिर किसी मेहबूबा कि तरह अपने रायफल को बड़े प्यार से हाथ लगता है और बहुत ही नाजो से वो ट्रिगर दबाता है। तब कहीं जाकर एक सही निशाना लगता है।

आरव:- हम्म्म…

मुन्ना:- देख भाई मुझे पता है कि तू उसका गेम बजाना चाहता है और वो तुम दोनों भाइयों का। हालांकि तुमने जमील को अच्छा ऑफर दिया था लेकिन मुझे पता था वो रहेगा भूषण के साथ ही.. क्योंकि जमील तो केवल मुखड़ा है और भूषण चाह लेे तो किसी को भी उसकी जगह लाकर बिठा दे। और तेरी परेशानी भी मैं जान रहा हूं कि क्या है….

आरव अपना खंजर निकाल कर उसके गले पर थोड़ा दवाब बना कर रखते हुए कहने लगा…

" साले तू कोई बाबा है क्या जो प्रवचन पर प्रवचन दिए जा रहा है। चुतिय एक बात कहने में 10 मिनट लगा रहा है। तू जानता भी है हमारा टारगेट कौन है।मदर** कब से देख रहा हूं बकवास पर बकवास किए जा रहा है। तुझे 150 करोड़ चाहिए थे 200 करोड़ दिए। अब जितना मैं पूछूं बस उतना ही जवाब दे। ये लवादा-लहसुन किया ना तो यहीं छिल दूंगा। चल अब बता कि तू क्या जानता है सेंट्रल मिनिस्टर के साथ के मीटिंग के बारे में"।

मुन्ना:- चाकू तो हटा साले.. खून तो निकाल दिया अब क्या गला कटेगा।

आरव:- चल बोल जल्दी।

मुन्ना:- मेरा एक खबरी है उसी ने बताया कि जमील और भूषण बात कर रहे थे कि "मिनिस्टर साहब फोन पर कोई वैसी बात नहीं कर सकते इसलिए उन्होंने बिना कुछ सुने सीधा कह दिया कि कल मेरे फार्म हाउस अाकर मिलो"..

आरव:- अब ये बता कि तू मेरी जान कैसे बचाएगा..

मुन्ना:- अपने पास एक पंटर की गैंग है जिसे बड़ा नाम करना है। इधर जमील को मैं जैसे ही बोलूंगा की मुझे पैसा मिल गया है तो जमील और भूषण एक ही जगह पर एक साथ मिल जाएंगे, वो भी बिना किसी सरकारी आदमी के। वहां उन्हें वो पंटर टपका देगा और पुलिस इन्वेस्टिगेशन में वो लोग फंस जाएंगे।

आरव:- चुत्तिए और वो पंटर पहले तेरा नाम बकेगा और फिर तू मेरा।

मुन्ना:- नहीं ऐसा नहीं होगा क्योंकि जो मेरा नाम जानता होगा उसे हम वहीं टपका देंगे। हम तक पहुंचने वाली सभी कड़ी ही खत्म।

आरव:- अबे लेकिन तू तो बता रहा था कि कल वो मीटिंग करेंगे दिल्ली में, फिर ये सब कैसे होगा। जब वो मिनिस्टर से मिल लेगा और उसे पूरा मामला पता चल गया तो बिना किसी बात के एक और राजदार बढ़ेगा और फिर उसे भी पैसे खिलाओ।

मुन्ना:- कमाल है .. तुझे तेरे भाई की चिंता नहीं की यदि वो होम मिनिस्टर से मिल लिया तो पहले तेरा भाई ही टपक जाएगा।

आरव:- तू पागल है क्या और फिर से बकवास शुरू कर दिया। वैसे तू इतना ही चिंता में है, तो मै तुझे बता दूं कि वो किस्मत के साथ पैदा हुआ है मरने वालों में से नहीं। अब तू बकवास ना कर और ये बता कि फायदा क्या होगा जब वो दोनो मिनिस्टर से मिल ही लेगा।

मुन्ना:- इसलिए तो उनको आज रात ही टपका देना है..

आरव:- कैसे.. 11.30 अभी हो रहे है। यहां से इंदौर पहुंचने में 1 घंटा.. वहां क्या एयरपोर्ट पर तेरा बाप बैठा है जो उदयपुर कि स्पेशल फ्लाइट चलाएगा।

मुन्ना:- मेरा बाप स्पेशल फ्लाइट तो नहीं पर हेलीकॉप्टर जरूर भेज देगा पर उसके लिए थोड़ा ड्रामा लगेगा।

आरव:- इंप्रेसिव .. चल जल्दी से काम पर लग जा…

पूरी योजना तय हो गई और मुन्ना लग काम पर। सबसे पहले वीरभद्र रिजॉर्ट के बाहर आया, वो भी आरव का सरा सामान लेकर। रिजॉर्ट वालों को लगा कि डील करने वाला लड़का रात को कहीं निकाल रहा है। और जैसा की उम्मीद थी इसकी खबर भूषण को लग गई। कुछ ही समय बाद मुन्ना और वीरभद्र को कॉल आए जिसमे आरव की जानकारी ली गई। दोनों ने एक ही बात बताया.. "अपना बैग लेकर निकला है".. इसके बाद तो भूषण ने दोनों को कहा कि "देखो क्या कर रहा है और बताते रहो"

सब प्लान के मुताबिक हो रहा था। लगभग 5 मिनट बाद दोनों ने खबर दी कि वो किसी से मिलकर एक बैग ले रहा है। भूषण ने सीधा गोली मारने का आदेश दिया और बैग को अपने कब्जे में करने के लिए कहा।

उधर भूषण का आदेश और इधर दो गोलियों की चलने कि आवाज़। लगभग 15 मिनट बाद वीरभद्र और मुन्ना दोनों एक ही जगह पर खड़े होकर भूषण को बताया कि उन्होंने बैग कब्जे में ले लिया है। इतना सुनने के बाद तो जैसे भूषण नाचने ही लगा हो। उसने तुरंत वीडियो कॉल लगाया और नीचे धूल में परे पहले आरव की लाश देखी, फिर बैग खोल कर दिखाने कहा। भूषण जब सब तरह से सुनिश्चित हो गया, तब उसने अपना पावर इस्तमाल कर एक हैलीकॉप्टर उस लोकेशन पर भिजवा दिया।

रात के लगभग 1 बजे उस लोकेशन पर हेलीकॉप्टर पहुंच चुकी थी। आरव की लाश को यहां छोड़ा नहीं जा सकता था, यह बोलकर उन लोगों ने आरव की लाश को अपने साथ लेते चले। लेकिन वीडियो कॉल के बाद और हेलीकॉप्टर आने से पहले मुन्ना ने अपने कहे अनुसार सरा मामला सेट कर लिया था। इस छोटी गैंग को 50 करोड़ पहले ही ऑफर कर दिए गए थे जिसकी पेशकी उन्हें मुन्ना के घर से 1 करोड़ के रूप में मिल चुकी थी।
 
Update:-18(C)

हेलीकॉप्टर सीधा उदयपुर के किसी एक होटल के हेलीपैड पर उतरी। आरव की लाश के साथ दोनों बाहर अा गए और हेलीकॉप्टर पुनः उड़ चली। उस जगह पर पहले से कुछ लोग इंतजार कर रहे थे। वो लोग जमील और पैसों के बैग के साथ लेकर निकल गए और वीरभद्र को लाश ठिकाने लगा कर घर लौट जाने के लिए बोल दिया।

वीरभद्र, आरव को हिलाते हुए कहा.. उठ जाओ भाईजी। आरव उठकर जल्दी से अपना एयरपोड कान में लगाया.. और कान में लगाते ही अपस्यु ने उसे जो सुनाया। मामला ये नहीं था कि आरव ने अपस्यु से बात नहीं की, बल्कि उसने सारी डिवाइस पैक कर के बैग में रख दिया और अपस्यु कुछ भी देख नहीं पा रहा था।

आरव ने सबसे पहले सभी वाचिंग डिवाइस को सक्रिय किया और कपड़े बदलने लगा। एक एयरपोड अपने कान में डाला और दूसरा वीरभद्र को दे दिया। अब तीनों एक ही लाइन पर कनेक्ट थे।

अपस्यु:- आरव कितना अम्मिनेशन है तुम्हारे पास।

आरव:- 4 मैग्जीन पिस्तौल के और 12 मैग्जीन स्नाइपर के।

अपस्यु:- ठीक है, अपनी स्नाइपर वीरभद्र को देदो और तुम पिस्तौल और खंजर से लैस हो जाओ। वीरे तुम्हे मैं जहां बताऊंगा वहां जाकर पोजीशन लेे लेना और आरव को बैकअप देना। आरव तुम छिपो ऊपर कोई अा रहा है।

आरव पानी टंकी के पीछे तुरंत ही छिप गया। ऊपर 2 लोग आए और वीरभद्र से लाश के बारे में पूछने लगे। वीरभद्र ने उन्हें बोल दिया कि लाश ठिकाने लगा दिया है, किंतु उन्हें देखना था कि आखिर लाश कहां ठिकाने लगाए है। वीरभद्र ने छत के नीचे इशारा करते हुए बताया कि लाश यहां है।

दोनों अपने कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़े फिर कुछ सोच कर वापस चले गए और जाते-जाते वीरभद्र को अपने घर वापस लौटने के लिए बोल गए। उनके जाते ही आरव बाहर निकला। अपस्यु उन्हें रास्ता बताता गया और वो दोनों उसी के इशारे पर चलते-चलते एक खंडहर हो चुके किले के पास पहुंचे, जो किसी वीराने में थी।

अपस्यु चारो ओर का जायजा लेने के बाद वीरभद्र को दक्षिण दिशा से उस खंडहर के ऊपर चढ़ने का रास्ता बताया और आरव को पश्चिम के ओर से बाहर निकालने वाले रास्ते के पास की दीवार के पीछे जाकर छिपने के लिए बोल दिया।

थोड़े ही देर में दोनो अपनी अपनी जगह लेे चुके थे। इधर अंदर मुन्ना की लाश नीचे परी हुई थी और वहां पूरे 20 लोग थे, जिसमे जमील और भूषण भी था। अपस्यु दोनों को अपना पोजिशन होल्ड करने और आरव को स्मोक बॉम्ब निकाल कर तैयार रहने के लिए कहा।

अपस्यु अंदर के माहौल को थोड़ा नजदीक से समझने की कोशिश करने लगा। कुछ ही देर में उनकी आवाज़ भी आनी शुरू हो गई जिसे तीनों सुन सकते थे।

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अंदर भूषण कह रहा था… "जमील कैसे कैसे गद्दार तूने पाल रखे थे, ये तो सारा पैसा लेकर हमे ही टपकाने चला था"

जमील:- क्या वो वीरभद्र भी इसके साथ मिला होगा?

भूषण:-पता नहीं, लेकिन यदि मिला होगा तो उसे भी इसी के पास पहुंचा देंगे। आज से मुन्ना की जगह इस रफीक को देदे। आखिर इसी ने तो सारी सच्चाई बताई है और हां साथ में 2 करोड़ भी दे देना इनका इनाम।

जमील:- नेता जी । इसे साथ रखने में खतरा है। साला पूरा एडा है, ये सीधा मारना जानता है सफाई से काम करना नहीं।

भूषण:- तो काम सिखाओ इसे। आखिर इसने अपनी वफादारी दिखाई है। सबको ऊपर बढ़ने का हक है।

जमील:- जैसा कहो नेता जी, चलो रे पंटर लोग अपना अपना हिस्सा लेकर जाओ।

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अपस्यु:- आरव अभी वक़्त है, वीरभद्र के शूट करते ही 5 स्मोक बॉम्ब, 4 बॉम्ब चारो कोने और एक बीच में। वीरभद्र सरप्राइज देने का टाइम अा गया, लगभग 30 मीटर की दूरी पर है दोनों। पहली गोली भूषण और दूसरी गोली जमील… कोई चूक ना हो और बिना समय लिए दोनों को गोली मारना।… मेरे गिनती खत्म होते ही दोनों एक साथ.. 3… 2… 1… अभी।

वीरभद्र ने बिना समय लिए पहली गोली चला दी, और सीधे जाकर लगी भूषण के सीने में… भूषण और जमील बात कर ही रहे थे और इसी बीच भूषण को गोली सीधा उसके सीने में लगी। इससे पहले की जमील को कुछ समझ आता 3 सेकंड के अंतर में दूसरी गोली और जमील के सिर में एक छेद बनाती गोली जमीन में।

वहां मौजूद लोग, इससे पहले कि यहां-वहां देखकर गोली चलाने वाले को ढूंढते, वहां धुआं ही धुआं हो गया था। कुछ समझ में ना आने की स्तिथि में वो लोग अंधाधुन फायरिंग करने लगे। आरव बाहर ही खड़ा था और अंदर की फायरिंग खत्म होने का इंतजार कर रहा था।

इधर वीरभद्र को दिशा मिल रहा था और वो धुएं के अंदर ही एक-एक करके टपकना शुरू कर चुका था। 20 में से 8 लोग मारे जा चुके थे। रफीक बचे लोगों को दीवार कि आड़ में छिपने के लिए जोर से चिल्लाया। …"मादर*** तू जो कोई भी है आज बचके ना जा पायेगा"…

"बचना तो तुझे है, फालतू में इनलोगो के चक्कर में तू भी मारा जाएगा"… आरव जोर से ठहाके लगाकर कहने लगा और जब उसकी आवाज़ बंद हुई उसी के चंद पलों के अंदर, एक दर्दनाक चिंख़ निकली और उसके एक आदमी का गला आरव ने रेत दिया।

उसकी चीख सुनकर एक पंटर बावरा हो कर चिल्लाते हुए उसी ओर भागा जिस ओर से चिल्लाने कि आवाज़ अा रही थी। जैसे ही वो अपने आवरण (कवर) से बाहर आया, अपस्यु ने दिशा बताया और वीरभद्र ने उसकी चीख को मौत की सिसकियों में बदल दिया।

धुवां जब तक छंटा तब उस जगह पर केवल रफीक और उसका 2 साथी बचा था जो दीवार कि आड़ लिए अपनी जान बचा रहा था। आरव उस जगह के बिल्कुल मध्य में खड़ा होकर ललकारने लगा…. "क्या हुआ बे बच्चे, मूत तो ना निकल गई"..

रफीक:- साला इतना ही बड़ा मर्द है तो…. (इतना कहते वक़्त उसने अपने एक आदमी को इशारों में दीवार से छिपकर ही थोड़ा आगे जाकर बाहर निकालने वाले रास्ते तक पहुंचने का इशारा किया)… अपने उस स्निपर को ….

अभी इतना ही कह रहा था कि इशारा मिलने पर जो आदमी रेंगता हुआ बाहर निकालने वाले रास्ते के ओर जा रहा था उसका हाथ थोड़ा दिखा और वीरभद्र ने ऐसी गोली मेरी की वो चिल्लाने लगा।

आरव:- देख बेटा ये तो चीटिंग है। या तो तू बात कर ले या यहां से भाग ले।

रफीक:- अच्छा सुन मेरे पास तेरे लिए एक बंपर ऑफर है।

आरव जहां था वहीं बैठते हुए….. "ठीक है बोल मैं सुन रहा हूं"

रफीक:- यहां पर बहुत सारे डॉलर परे हुए हैं। तूने ज्यादा से ज्यादा कितने की सुपारी ली होगी, 10 करोड़ की। यहां पर 100 करोड़ से भी ऊपर है। पूरा तेरा बस उसमे से कुछ मुझे देदेना।

आरव:- चल ठीक है डील मंजूर। तू और बचा हुए तेरा एक साथी, बिना हथियार के बाहर अा..…

रफीक:- ना मैं नहीं आऊंगा कहीं तेरा शूटर ने मुझे गोली मार दी तो।

आरव:- फिर क्या करे रफीक बेटा, तू ही बता दे।

रफीक:- तू ही अा जा मेरे पास, देख हमदोनो ने अपने हथियार तेरे ओर फेंक दिए।

आरव हंसते हुए "चल ठीक है कहा"… और क़दमों की थाप धीरे-धीरे रफीक के ओर बढ़ने लगी। जैसे ही रफीक को लगा कि आरव दीवार के किनारे पर पहुंच चुका है वो और उसका आदमी, अपना गन ताने बाहर आया.. और तभी गोली चली। एक ही सेकंड के अंदर, रफीक और उसका साथी ढेर। दरअसल जो आगे जा रहा था वो वीरभद्र था और आरव पीछे खड़ा बस उनके बाहर निकालने का इंतजार कर रहा था।

आरव टूट कर जैसे चुड़ हो चुका था। उसने वीरभद्र को सबकी गिनती करने बोल दिया और साथ में यह भी की किसी में अगर जान बाकी है तो बेजान कर दे। आरव जहां था वहीं पहले लड़खड़ा कर बैठ गया। उसकी हालत ऐसी थी मानो अंदर कोई जान ना बचा हो। फिर धीरे-धीरे उसका बदन बेजान सा हो कर जमीन पर गिर गया।

दोनों बाहें फैलाए उसने अपनी आंखें मूंद ली और आशुओं की एक धारा चेहरे पर एक रेखा बनाती, धीरे-धीरे टपकने लगी। शायद जो इस वक़्त आरव मेहसूस कर रहा था वहीं अपस्यु भी। वो भी अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा अपनी आखें मुंदे बस आशुओं की एक धारा बहा रहा था।
 
Update:-19

दोनों बाहें फैलाए उसने अपनी आंखें मूंद ली और आशुओं की एक धारा चेहरे पर एक रेखा बनाती, धीरे-धीरे टपकने लगी। शायद जो इस वक़्त आरव मेहसूस कर रहा था वहीं अपस्यु भी। वो भी अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा अपनी आखें मुंदे बस आशुओं की एक धारा बहा रहा था।

थोड़ी देर बाद वीरभद्र अपनी गिनती पूरी कर आया और साथ में 2 लोग बेचारे तड़प रहे थे, उनकी तड़प को भी शांत कर आया। जब वो वापस लौटा तब आरव को इस हाल में देखकर, वो जोड़-जोड़ से चिल्लाने लगा…. "गुरुदेव अभी तो हम मिले थे, इतनी जल्दी निकल लिए"…

वीरभद्र का चिल्लाना सुनकर आरव खुद को ठीक करता हुआ उठ खड़ा हुआ, उधर अपस्यु ने जब चिल्लाना सुना तो वो भी चिंतित होकर आरव-आरव करने लगा।

आरव:- कुछ नहीं हुआ ठीक हूं मैं।

अपस्यु:- फिर वो चिल्लाया क्यों?

आरव:- अरे कुछ नहीं बस कुछ याद आ गया था.. जैसे तुझे आया होगा।

अपस्यु:- हम्मम !! वो तो ठीक है लेकिन इतना बड़ा रायता जो फैला दिए हो उसका क्या?

अराव:- बेकार की चिंता कर रहा है। अब तू सो जा और सुबह उठ कर न्यूज देख लेना। मैं यहां अब सब पैक कर रहा हूं। कल मिलते हैं भाई।

अपस्यु:- जल्दी अा जा… तेरे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा।

आरव ने कॉल काटा और वहां से सब समेटना शुरू किया। वीरभद्र भी उसके इस काम में मदद करने लगा। सब कुछ समेट कर आरव जबतक पैक कर रहा था, वीरभद्र ने पैसों से भड़ा बैग उसके पास पटकते हुए…. "आरव, सारे पैसे यहीं रह गए। डॉलर, रुपया, सब…. और इस पैसे के लिए ये सब लड़-भीड़ कर मर गए… हा हाहाहा"

आरव:- पैसा यहीं छोड़ दे वीरे। ये "ब्लड मनी" है। यह पैसा हमेशा अपने पीछे एक जहरीली खुशबू छोड़ता है। हम इसे यहां से ले गए ना तो इसकी जहरीली खुशबू सूंघते ना जाने कितने हमारे पीछे अा जाए।

वीरभद्र:- क्या मतलब पैसा यहीं छोड़ दे? अरे इतना सरा रुपया है। कोई पागल ही इसे छोड़ सकता है।

आरव:- तू वहां से किसी लाश का फोन उठा कर दे मुझे। तुझे अभी समझ नहीं आएगा कि इन पैसों को क्यों नहीं ले जा सकते।

वीरभद्र के तो आंखों में जैसे रुपया ही छप गया हो। इतना सरा रुपया देख कर तो वो होश में ही नहीं था। हां मन डोल तो उसका पूरा रहा था लेकिन इंसान बेईमान नहीं था। आरव ने जैसा कहा उसने फोन लाकर दे दिया, और एक बैग जिसमे केवल डिवाइस थी और कपड़े, वो लेकर उस खंडहर के बाहर अा गया।

आरव ने उदयपुर एसपी के लैंडलाइन पर कॉल लगाया, थोड़ा इंतजार और थोड़े बहाने के बाद एसपी फोन लाइन पर अा गए थे। आरव ने ज्यादा बात को ना घुमाते हुए सीधा कह दिया… "राज्य के शिक्षा मंत्री यहां फसे है और गैंगस्टर अंधाधुन गोलीबारी कर रहे है" ... इतना सुनते ही एसपी साहब के होश उड़ गए।

एसपी :- कौन हो तुम और कहां से बोल रहे हो?

आरव:- मैं पूरी जानकारी तभी दूंगा जब कॉन्फ्रेंस में सिटी पुलिस कमिश्नर भी होंगे।

इतना बड़ा बॉम्ब फटा था, सिटी कमिश्नर को तुरंत लाइन पर लेते हुए एसपी पूछने लगे…. "सर है लाइन पर, अब पूरी बात बताओ"

आरव:- एक ही बात बार-बार कहनी पड़ेगी क्या, सुन नहीं रहे कितनी भीषण गोलीबारी हो रही है। लोगों के मरने और चिंखने की आवाजें नहीं सुनाई दे रही क्या?

एसपी:- सर हमे वहीं चलना चाहिए।

कमिश्नर:- ठीक है, सभी को अलर्ट करो और पूरी फोर्स को पहुंचने बोलो। सुनो तुम जो कोई भी हो, हमे वहां का पता बताओ और वहीं रुकना।

आरव:- मैं बस पता बता कर निकल रहा हूं। मुझे नहीं मारना इस गोलीबारी में।

आरव ने पता बताया और दोनों, वीरभद्र और आरव वहां से निकल गए। कुछ दूर आगे चलकर दोनों ने अपने कपड़े बदले और पहने हुए कपड़े को वहीं जलाकर जॉगिंग करते हुए निकाल गए।

रास्ते में ही सामने से एसपी साहब की जीप आ रही थी, जो बिना रुके सीधे स्पॉट की ओर निकल गई। एसपी, कमिश्नर से… "लगता है कॉलर यही दोनों थे"… कमिश्नर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया…. "इतना चालक कॉलर मैंने आज तक नहीं देखा। जल्दी चलो वरना हम से पहले कहीं फोर्स ना पहुंच जाए"।

कमिश्नर और एसपी तुरंत मौके पर पहुंचे। वहां का नजारा देखकर दोनों को बहुत ज्यादा अचरज नहीं हुआ बस उनकी नजरें अपने काम की चीज ढूंढ़ने में लगी हुई थी। उन्हें ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी, क्योंकि सरा पैसा सामने ही परा था।

एसपी:- जितना बड़ा कांड उतनी ही बड़ी क़ीमत।

कमिश्नर:- कुछ पैसे यहीं छोड़ कर बाकी सरा पैसा जल्दी से जीप में छिपाओ।

एसपी, पैसे को जीप में रखने के बाद वापस आकर… "क्या लगता है ये कॉलर कोई अतंकवादी था"

कमिश्नर:- आईपीएस किसने बनाया तुम्हे। ये कोई निजी मामला लगता है। बहुत ही चालाकी से या तो सबको लड़ाया है या पैसे के चक्कर में सबको यहां बुला कर साफ़ कर दिया। उधर देखो वो स्मोक बॉम्ब, आया कुछ समझ में।

एसपी:- पैसे तो मिल ही गए हैं, और वो लड़का अतंकवादी भी नहीं तो ज्यादा सोचना क्या है क्लोज करते हैं सर केस। आप जाइए यहां का पंचनामा करने में शायद काफी वक़्त लग जाए।

कमिश्नर भूषण को एक लात मारकर:- हां कौन सा साला ये समाजसेवक था जो इसके लिए भागदौड़ करे। जगह ऐसा हो जाना चाहिए कि एनएसए, सीबीआई या फिर रॉ अा जाए, सब को बस अपनी ही कहानी के सबूत मिले। लग जाओ काम पर और एक अच्छी कहानी बनाओ जो पुलिस की इमेज को ऊंचा करे और हां यहां की पूरी टीम को 2 लाख का बोनस भी दे देना।

एसपी साहब जुट गए वहां अपने पैसे बचाने में, इधर आरव और वीरभद्र दोनों जॉगिंग करते हुए आगे बढ़ने लगे। सहर के थोड़े बाहर ही उन्हें एक ऑटोवाला भी मिल गया और दोनों सीधा बस स्टैंड पहुंच गए। एक चाय की टपरी से दोनों ने चाय लिया और वीरभद्र चुस्की लेते हुए…

वीरभद्र:- गुरुदेव आप से बहुत कुछ सीखा है मैंने। कभी कोई काम परे तो याद जरूर कीजिएगा।

आरव:- बस कर यार, तू मुझ से बड़ा दिखता है। मत कह गुरुदेव। अच्छा सुन यहां कौन कौन है तेरा।

वीरभद्र:- मां और छोटी बहन।

आरव:- ठीक है कुछ दिन यहीं रुक फिर सबको लेकर दिल्ली आ जाना। मेरे पास तेरे लिए बहुत से काम है।

वीरभद्र खुश होते हुए…. क्या बात कर रहे हो गुरुदेव, जल्दी मिलता हूं फिर।

आरव, वीरभद्र को अलविदा कहकर वापस लौट आया। इधर आरव से बात समाप्त करने के बाद अपस्यु के आखों में नींद कहां थी। उसकी नजर तो बस टीवी पर टिकी थी और न्यूज चैनल को बार-बार बदल रहा था।

इसी क्रम में कब उसे नींद अा गई उसे पता भी नही चला। सुबह जब आंख खुली और नजर टीवी पर गई तब उसका पूरा ध्यान न्यूज पर ही केन्द्रित हो गया। अभी की सुर्खियों में बस भूषण ही छाया हुआ था। और जो खबर निकालकर अा रही थी, उसे बड़े ही नाटकीय ढंग से आपसी मुठभेड़ का नाम दे दिया गया था। नाटकीय इसलिए क्योंकि हत्या के आरोपी गैंग, मौके पर ही पुलिस मुठभेड़ का शिकार हो गई और इसके बाकी साथियों की तलाश में जुटी है पुलिस।

अब कहीं जाकर चैन की सासें ली अपस्यु ने। इधर खबर सुनकर अपस्यु मुस्कुराया तो उधर सामने से उसकी खुशी चली आईं। आरव बैग पटक कर सीधा अपस्यु के पास पहुंचा और गले लग गया। दोनों भाई थोड़े खुश और आखें थोड़ी नम थी।

कुछ देर के बातचीत के बाद आरव वहां से उठा और जल्दी-जल्दी तैयार हों होकर निकलने लगा। अपस्यु उसकी हरकत को हैरानी से देखते हुए पूछा… "अबे ओ निशाचर, अब ये बन-ठन के कहां निकालने के तैयारी में है?

आरव:- तेरा तो मामला सेट हो गया, मेरा क्या? मैं चला कॉलेज, 3 दिनों से लावणी की सूरत नहीं देखी।

अपस्यु, हंसते हुए…. जा, तेरा मुंह तोड़ने के इंतजार में ही बैठी होगी।

आरव:- मुंह क्या पूरी हड्डियां तोड़ दे बस दिल ना तोड़े।

आरव बिल्कुल फ्रेश होकर निकला और उसकी फटफटी सीधा जाकर पार्किंग में रुकी। अब कभी वो कॉलेज आया हो तो ना पता हो कि कौन सी क्लास कहां है। उसे तो अपना विषय तक याद ना था कि वो किस विषय से स्नातक (ग्रेड्यूशन) कर रहा है, लावणी के विषय की जानकारी तो दूर की बात थी।

ढूंढते-ढूंढते लावणी तो नहीं मिली लेकिन साची जरूर मिल गई। कैंटीन में अकेली बैठी वो कहीं खोई सी थी। आरव चुटकी बजाकर उसका ध्यान अपनी ओर खींचता… "क्या हुआ मिस किन ख्यालों में खोई हुई है"..

आरव को देख कर साची मुस्कुराई और पूछने लगी… "कब पहुंचे आरव"

आरव:- आज ही सुबह पहुंचा हूं साची। लेकिन तुम कहां गुम हो।

साची थोड़ा गुस्सा दिखाते हुई:- सुबह गई थी तुम्हारे भाई से मिलने, आधे घंटे बेल बजती रही लेकिन दरवाजा तक नहीं खोला।

आरव:- ओह तो इसलिए कैंटीन में बैठ कर सोच रही की उसका दरवाजा कैसा खुलवाया जाए।

साची:- हट बदमाश, ऐसा नहीं है। मेरी छोड़ो तुम आज ही पहुंचे और अा गए सीधा कॉलेज?

आरव:- अपनी जानेमन को ढूंढ रहा हूं, वो तो मिल ना रही, और यहां तुम मिल गई।

साची अपनी आखें दिखाती:- ज्यादा चू-चपर वाली बातें की ना तो मैं तुम्हारा जुबान कतर दूंगी?

आरव अपने हाथ जोड़ उसके सामने खड़ा हो गया…. "भूल हो गई, क्षमा माते। अब जरा लावणी का पता बता दीजिएगा।

साची जोर से हंसती हुई… अभी वो हिस्ट्री की क्लास में होगी।

आरव तेजी से वहां से निकला पर जाते-जाते कहता गया…. मैं तुम्हारी जगह होता ना तो अब तक क्लास बंक कर के पहुंच चुका होता खबर लेने की आखिर सुबह दरवाजा क्यों नहीं खोला? और हां 2 बातें.. पहली ये की मेरे अपार्टमेंट में प्रवेश के लिए 2 मुख्य द्वार हैं, और दूसरी ये की अपनी स्कूटी लिए जाना।

आरव तो वहां से लावणी के लिए निकल गया लेकिन जाते-जाते साची को उपाय बताते चला गया। बिना देर किए साची भी निकली, मस्त अपनी स्कूटी से, होटों पर गीत गुनगुनाए…. "तेरी गलियां…गलियां तेरी, गलियां……. मुझको भावें गलियां, तेरी गलियां"
 
Update:-20

आरव तो वहां से लावणी के लिए निकल गया लेकिन जाते-जाते साची को उपाय बताते चला गया। बिना देर किए साची भी निकली, मस्त अपनी स्कूटी से, होटों पर गीत गुनगुनाए…. "तेरी गलियां…गलियां तेरी, गलियां……. मुझको भावें गलियां, तेरी गलियां"

साची गीत गुनगुनाती हुई मस्त अपने रास्ते चली जा रही थी और इसी चक्कर में वो भूल ही गई की दूसरी गली से अपार्टमेंट में जाना है। जैसे ही वो अपार्टमेंट के गेट पर पहुंची, सुलेखा बाहर के दरवाजे पर खड़ी गाय को रोटी डाल रही थीं।

साची मुड़ कर जैसे ही अपने घर के ओर देखी, उसकी धड़कने हो गई तेज और वो स्कूटी को पूरे स्पीड से गली के मोड़ तक लेे गई। इधर सुलेखा को भी ऐसा लगा कि उसने साची को देखा, लेकिन जबतक वो उसे पूरा पहचान पाती, स्कूटी नजरों से इतनी दूर हो गई की मन में बस शंका ही रह गया… "ये सांची है या कोई और"..

साची जैसे ही मोड़ पर मुड़ी, अपनी स्कूटी किनारे खड़ी करके अपने छाती पर हांथ रख कर अपनी श्वास को सामान्य करने लगी।….. "बच गई साची, वरना छोटी मां ने तो पकड़ ही लिया था"…. अब काहे कोई गीत साची के होटों पर आए। बचे रास्ते बस इतना ही ख्याल रहा की "बच गई आज तू"

किंतु जैसे ही अपस्यु ने दरवाजा खोला और उसके चेहरे का दीदार हुआ, उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ अाई… "हाय !! आज कितना मस्त दिख रहा है। दिल करता है लिपट जाऊं। कंट्रोल, कंट्रोल, कंट्रोल"….

साची वहीं दरवाजे के पास ही खड़ी अपनी मुट्ठी भींचकर, आखें मूंदे बस खुद के भावनाओ पर संयम करने की कोशिश करने लगी। किंतु जब फिर से आखें खोल कर उसे देखी…. "आह्हह ! लगता है आज कोई पागलपन ना हो जाए"

ये इश्क की मुश्क, कितना भी संयम रखो दिख ही जाता है। अपस्यु भी साची के इस मुस्कान को मेहसूस कर रहा था… "क्या हो गया, वहीं खड़े

-खड़े किस सोच में डूब गई"।

साची मुस्कुराती हुई "कुछ नहीं" बोली और अाकर अपस्यु के पास बैठ गई। शायद वो बात करने के लिए कुछ शब्द ढूंढ रही थी, किंतु नजर बार-बार अपस्यु के चेहरे को ही देखने कि कोशिश कर रही थी, जिसे वो काबू करने में लगी थी।

अपस्यु:- हेल्लो मिस, क्या हुआ? आज आप बड़ी खुश नजर आ रही है?

साची:- खुश तो मैं इसलिए हूं क्योंकि छोटे पापा आज मुझे स्कूटी दिलवा रहे हैं (झुट)। और हां मैं तुमसे नाराज हूं..

अपस्यु:- नाराज, वो क्यों भला…

साची:- तुमने दरवाजा क्यों नहीं खोला सुबह। कितना बेकार लग रहा था बाहर खड़े रहकर बार-बार बेल बजाना।

अपस्यु:- हां, फिर तो तुम्हारी नाराजगी जायज है। मैं तुम्हारी जगह होता तो इतना कम गुस्सा कभी नहीं दिखता?

साची:- अच्छा !! तो फिर क्या करते?

अपस्यु:- वहीं सोच रहा हूं क्या कहानी बना दूं कि मैं क्या करता। क्योंकि कभी ऐसा मौका मिला ही नहीं। कभी कोई दोस्त हुआ ही नहीं जो मुझे इंतजार करवा सके।

थोड़ी सी मायूसी जो अपस्यु से चहेरे पर साफ झलक रही थी। साची उसे देखकर अपनी आखें शिकुड़ ली और चेहरे से बनावटी गुस्से कि अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) करती कहने लगी…. "हर वक़्त मुझे देख कर इमोशनल होने की जरूरत नहीं। चलो अब ये चेहरे के ज्योग्राफी को ठीक करो।

अपस्यु खुल कर हंसते हुए…. "मेरे तो पूरे शरीर का भूगोल बिगड़ा हुआ है, तुम्हे केवल चेहरे की पड़ी है"…

साची, अपने सिर पर हाथ रखती….. "मैं भी ना, बस अपनी ही बातें किए जा रही हूं, तुम्हारे बारे में पूछना ही भूल गई"।

अपस्यु:- कोई बात नहीं। लेकिन मैंने भी केवल इस वजह से ध्यान खींचा क्योंकि मुझे एक हेल्पिंग हैंड चाहिए और आरव गायब है।

साची, हंसती हुई:- हां जानती हूं कहां है वो।

अपस्यु:- कमाल है, मुझे पता नहीं और तुम्हे पूरी जानकारी हैं। कर क्या रहा था वो…

साची:- तुम्हे अभी एक हेल्पिंग हैंड चाहिए था ना, उसको देखे। आरव की डिटेल तुम उसी से लेते रहना।

अपस्यु:- हां ये भी ठीक है। हाथ के और शरीर के ऊपरी हिस्से के पालास्टर काट कर निकालने है। क्या तुम मदद कर सकती हो।

साची:- क्यों? प्लास्टर क्यों निकालनी है?

अपस्यु:- कुछ नहीं बस मुझे लगता है यह प्लास्टर जबरदस्ती का लगाया हुआ है। हाथ और पसलियों में केवल चोट था, कोई फ्रैक्चर नहीं।

साची:- तुम क्या डॉक्टर हो? अगर ऐसी बात है तो चलते है हॉस्पिटल। डॉक्टर से संपर्क करके ये प्लास्टर भी हटा देंगे।

अपस्यु:- मुझसे गलती हो गई, तुमसे कहना ही नहीं चाहिए था। मुझे आरव का ही इंतजार कर लेना था।

साची वहां पड़े प्लास्टर कटर को अपने हाथ में लेती हुई कहने लगी…. "हम भारतीयों को अपना काम निकलवाना अच्छे से आता है। कुछ हुआ नहीं की इमोशनल ड्रामा शुरू हो जाता है। हम लड़कियों का तो पता है, तुम लड़कों में भी होता है"…

साची भनभनाते हुई बांह के ओर से कटर लगा कर काटना शुरू की। पहले दाएं हाथ की फिर बाएं हाथ कि प्लास्टर को निकालकर अपस्यु को बैठने के लिए बोली। पीछे जाकर उसने गर्दन से कटर को लगाया और बीचोबीच काटती हुई चली गई। आगे से अपस्यु ने जैसे ही उस प्लास्टर को निकला, उसके पीठ पर खुरदरे कई ज़ख्म के निशान उभर कर सामने अा गए।

साची उन निशानों को बड़े ध्यान से देखते हुए उनपर अपनी उंगली चलाने लगी, मानो वो उस दर्द को जी रही हो। अपस्यु को पीठ पर गिरे उन आशुओं का भी अनुभव हुआ जो इस वक़्त साची के आखों से बहकर नीचे टपक रहे थे।

अपस्यु:- अब कौन इमोशनल हो रहा है साची।

साची अपने आंसू पोंछति…. "इतने गहरे ज़ख्मों के निशान देखकर किसी का भी रूह कांप जाए। अपस्यु ये निशान तो ऐक्सिडेंट के नहीं लगते। कैसे लगे ये ज़ख्म।

अपस्यु:- इसकी कहानी तो बड़ी ही हास्यप्रद है। एक बार मैं फुल तोड़ने के लिए ऊपर चढ़ा था और फिसल कर नीचे गिर गया। और नीचे ढेर सारे कंकड़ पत्थर थे।

साची:- ईईईईईईई !! यह हास्य घटना कैसे हुई जरा बताओगे।

अपस्यु:- कभी फुर्सत में बताऊंगा, कैसे ये घटना हास्य थी। फिलहाल एक काम और करोगी। थोड़ा कपड़ा भिंगो कर पीछे साफ कर दोगी।

साची ने मुस्कुरा कर हां कहा और कपड़े भिगो कर लेे अाई। पीछे साफ करने के बाद वो आगे आई। हालांकि अपस्यु आगे खुद साफ करना चाहता था लेकिन साची ने उसके होटों पर अपनी उंगली डाल कर उसे चुप करा दिया और बिस्तर पर लिटा दी।

पसलियों के ऊपरी हिस्से पर जमे खून के निशान साफ देखे जा सकते थे। साची अपने हाथ धीरे-धीरे उसके बदन पर फुराती, साफ करने लगी। किंतु इन हिस्सों में शायद अब भी दर्द हो रहा था और दर्द के कारण अपस्यु के मुंह से "आह" निकल गई।

साची अपना हाथ उसके बदन पर धीरे धीरे फिराती, उसके नजरों से नजरें मिला कर मुस्कुराती हुई देखती रही। इधर उसके हाथ चलते रहे और उधर दोनों मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखते रहे। तभी अचानक एक बार फिर अपस्यु के मुंह से दर्द भारी चिंखे निकलनी शुरू हुई, लेकिन वजह साची का हाथ लगाना नहीं बल्कि उसने पूरे बदन का ही भार उसके पसलियों पर अा गया था।

साची:- सॉरी सॉरी सॉरी… वो मैंने ध्यान ही नहीं दिया।

अपस्यु:- सॉरी कहने की कोई जरूरत नहीं। शायद बदन ने कुछ ज्यादा ही दर्द मेहसूस कर लिया इसलिए चींख़ निकल गई वरना मस्त वाली फीलिंग अा रही थी।

साची उसके मुंह पर कपड़ा मारती हुई … "धत"… कही और वहां से उठ कर भागने लगी। लेकिन अपस्यु ने उसका कलाई पकड़ कर जाने से रोक लिया। साची भी बिना कोई जोर लगाए नाटकीय रूप से बस दिखाती रही को वो हाथ छुड़ाने की कोशिश में है और बस इतना ही कहती रही…. "हाथ छोड़ो ना प्लीज जाना है"

अपस्यु:- थोड़ी देर और ठहर जाओ….

साची अपनी गर्दन घुमा कर, झुकी हुई पलकों को ऊपर उठा कर उसे देखती हुई बस अपने होटों को हिलाई…. "जाने दो ना बाद मे आती हूं"…

धड़कने दोनों की तेज थी, और गुदगुदी के मीठा एहसास सीने में कहीं उठ रहा था। अपस्यु ने "ठीक है" कहते हुए उसका हाथ छोड़ दिया, और वो दौड़ कर उसके कमरे से बाहर चली अाई। कमरे के बाहर आकर वहीं दीवार से वो चिपक गई। अपनी बढ़ी हुई गुदगुदाती धड़कनों को काबू करती, आखें मूंदकर बस वही पल याद कर रही थी जब अपस्यु ने उसका हाथ पीछे से पकड़ लिया।

साची ठंडी-ठंडी सासें लेती उसी दृश्य को अपने अंदर मेहसूस कर रही थी। इधर अपस्यु भी उसके जाते ही सिरहाने को अपने बाहों में भींच कर करवट बदल-बदल कर उसी के ख्यालों में खोन लगा। साची वहां से खिलखिलाती हुई निकली। चेहरा खिला, चाल में नजाकत और होटों पर मध्यम-मध्यम गुनगुनाए गीत…..

हवा के झोंके आज मौसमों से रूठ गए

गुलों की शोखियाँ जो भँवरे आके लूट गए

बदल रही है आज ज़िन्दगी की चाल ज़रा

इसी बहाने क्यूँ ना मैं भी दिल का हाल ज़रा

संवार लूं हाय सवार लूं

संवार लूं हाय सवार लूं…

लगभग 3.30 बजे दोपहर का समय, दिल्ली की वो गर्मी और ऐसे वातावरण में भी साची को सब खिला-खिला और खुशनुमा मेहसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था पूरा समा ही सुहाना हो और मौसम ने जैसे प्यार के तराने छेड़ दिए हों।

इन्हीं सब को मेहसूस करती होटों पर "सवार लूं"… वाला गीत गुनगुनाती वो स्कूटी चलाने लगी। लेकिन कहते हैं ना हर रंग में कोई ना कोई भंग पर ही जाता है। एक बार फिर वो अपनी गली के सामने वाले ही मुख्य द्वार से निकली और अचानक से बड़ी तेजी में ब्रेक लगाना पड़ गया क्योंकि स्कूटी के ठीक सामने खड़ी थी सुलेखा…

गरम मौसम, कहर बरसाती धूप और सामने सुलेखा जी अपनी आखें छोटी किए हुए। बस साची को ही घूर रही थी।
 
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