अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - SexBaba
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अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़

hotaks

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This Story is inspired By Ammi and uncle written by author Lucky2.

अध्याय 1

मैं साहिल हूँ। यह कहानी मेरी ज़िंदगी के उस मोड़ की है जब वक्त ने एक अजीब करवट ली थी। हम दिल्ली गए थे, मेरी अम्मी आयशा की कज़िन, सायमा, की शादी के लिए। सायमा अम्मी के मामा की बेटी थी, इसलिए यह एक बड़ा फैमिली इवेंट था।

घर से हम तीनों निकले थे—मैं, मेरी अम्मी, और मेरी नानी। मेरे अब्बू, फहद, को बिज़नेस के काम से रुकना पड़ा, इसलिए वह हमारे साथ नहीं आ सके। मैं कॉलेज में था, अपनी ही धुन में रहने वाला एक एवरेज सा लड़का। मीडियम हाइट, पतला सा जिस्म, और काले बाल जो अक्सर मेसी रहते थे, हवा में लहराते हुए। मेरा चेहरा अम्मी से ज़्यादा अब्बू से मिलता था। देखने में मैं मासूम लगता था, पर मेरे अंदर एक बेचैनी थी, एक तेज़ धड़कन जो हर नए तजुर्बे को तलाशती थी।

मैं साहिल हूँ, और यह वाकया मेरी अम्मी, आयशा, के उस जादुई रूप के इर्द-गिर्द बुना गया है जिसने मुझे पहली बार यह अहसास कराया कि कुदरत ने उन्हें किस कदर फुर्सत में तराशा था।

मेरी अम्मी की खूबसूरती सिर्फ एक बेटे की नज़र से ही नहीं, बल्कि किसी भी देखने वाले के लिए एक मदहोश कर देने वाला मंज़र थी। कॉलेज में होने के नाते, मैं औरों की नज़रों को पढ़ना सीख गया था, और अक्सर देखता था कि जब अम्मी कमरे में दाखिल होतीं, तो वक्त जैसे ठहर सा जाता। उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन और उस पर टिका वह चाँद सा गोल चेहरा किसी संगमरमर की मूरत जैसा लगता था। उनकी त्वचा का रंग इतना साफ और दूधिया सफेद था कि रोशनी जैसे उनसे टकराकर वापस लौटती थी।

उस दिन उन्होंने एक महीन कपड़े का सूट पहना था, जो उनके छरहरे मगर गठावदार बदन पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उभार अपनी एक अलग कहानी कह रहा था। उनकी पतली कमर जब चलने के दौरान हल्की सी बल खाती, तो उनके भरे हुए पुष्ट कूल्हे और पुष्ट सीना एक ऐसी लय पैदा करते थे जिसे अनदेखा करना नामुमकिन था। उनके काले घने बाल उनकी पीठ पर किसी नागिन की तरह लहरा रहे थे, और उनसे आती चमेली की भीनी खुशबू हवा में एक नशा सा घोल रही थी। मैं उनका बेटा था, उनसे बेइंतहा प्यार करता था, पर उस दिन मेरी आँखों में उनके लिए सिर्फ ममता नहीं, बल्कि उनकी बेपनाह खूबसूरती के लिए एक गहरी अचरज भरी कशिश थी।

मेरी अम्मी बहुत केयरिंग थीं, जिनकी दुनिया उनकी फैमिली के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। उनकी मुस्कुराहट ऐसी थी जो दिल को सुकून दे।

सफर की शुरुआत ही हंगामेदार रही। रेलवे स्टेशन पर जैसे इंसानों का समंदर उमड़ पड़ा था। अब्बू साथ नहीं थे, इसलिए नानी और अम्मी की ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर थी।

उस दिन सफर के लिए अम्मी ने एक ढीला-ढाला काला अबाया और चेहरे पर ब्राउन वेल (नकाब) पहना हुआ था। उनका पूरा जिस्म सिर से पैर तक ढका था। ऊपर से देखने पर सिर्फ एक स्याह साया नज़र आता, लेकिन अम्मी का वह अबाया उनकी बेपनाह खूबसूरती को छुपाने में नाकाम था।

उनका गोरा रंग अबाया के स्याह काले रंग के कॉन्ट्रास्ट में किसी जलते हुए दीये की तरह खिल उठा था। अबाया ने उनके जिस्म को ज़रूर ढका था, मगर उनके दूधिया सफेद हाथ जब अबाया की आस्तीनों से बाहर निकलते, तो काले कपड़े पर उनकी सफेदी किसी संगमरमर की तरह चमकती थी। नकाब के पीछे से उनकी बड़ी-बड़ी काली आँखें जब उठतीं, तो ऐसा लगता जैसे कोई गहरा राज़ बेपर्दा होने को हो।

चलते वक्त जब अबाया की ज़मीन चूमती हुई किनारियाँ हल्की सी ऊपर उठतीं, तो उनके नर्म और गोरे पैरों की एक छोटी सी झलक दिख जाती, जो काले अबाया के साथ एक कयामत सा कंट्रास्ट पैदा कर रही थी। वह झलक चीख-चीख कर बता रही थी कि उस काले लिबास के नीचे छिपा हुआ पूरा बदन किस कदर दूधिया और बेदाग होगा।

अबाया कितना भी ढीला क्यों न हो, जब हवा का कोई झोंका उनसे टकराता या वह मुड़तीं, तो कपड़े का खिंचाव उनके भरे हुए सीने और पुष्ट कूल्हों के कर्व को साफ़ बयां कर देता था।

जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी, कोच के दरवाजे पर चढ़ने वालों की एक अंधी दौड़ शुरू हो गई। स्टेशन का वह शोर-शराबा और धक्का-मुक्की किसी अनहोनी का इशारा दे रहे थे। भीड़ का फायदा उठाकर कुछ आवारा किस्म के लोग अम्मी के इर्द-गिर्द घेरा बनाने लगे। हालाँकि अम्मी उस ढीले-ढाले काले अबाया में पूरी तरह ढकी थीं, लेकिन उन भेड़ियों की भूखी नज़रें उस कपड़े के पार देख रही थीं। वे अम्मी के चलने की लय और अबाया के खिंचाव से उनके जिस्म के उतार-चढ़ाव का अंदाज़ा लगा रहे थे।

मैंने देखा कि कैसे एक हट्टे-कट्टे आदमी ने जानबूझकर अम्मी के बिल्कुल करीब आने की कोशिश की, उसकी नज़रें अम्मी के अबाया से ढके पुष्ट कूल्हों पर जमी हुई थीं। भीड़ के एक ज़ोरदार रेले ने अम्मी का संतुलन बिगाड़ दिया, और वह लड़खड़ाकर पीछे की ओर झुकीं।

"साहिल... बचा मुझे!" अम्मी की आवाज़ नकाब के पीछे से कांपती हुई और बेहद बेबस सी आई।

उसी पल, उस भीड़ का फायदा उठाकर एक गंदा हाथ बड़ी चालाकी से अम्मी के अबाया के ऊपर से ही उनकी सुडौल गाँड तक पहुँचा। उस शख्स ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई और अम्मी के भरे हुए कूल्हे को मजबूती से दबोचकर भींच दिया। अम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, वह बुरी तरह डर गईं और थरथराने लगीं। उस स्पर्श की दरिंदगी ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था।

"साहिल!" उन्होंने दहशत में मेरा नाम पुकारा।

मेरी रगों में खून खौल उठा। मैंने पलक झपकते ही अम्मी की कमर में अपना हाथ डाला और उन्हें अपनी ओर पूरी ताक़त से खींच लिया। मेरा हाथ उनके अबाया के कपड़े के ऊपर था, लेकिन उस ढीले लिबास के नीचे से भी मुझे उनकी पतली कमर की गोलाई और उनके दहकते बदन की तपिश का साफ़ अहसास हुआ। वह खौफ के मारे मुझसे पूरी तरह चिपक गईं। उनका अबाया से ढका हुआ भारी सीना मेरी छाती से ज़ोर से सट गया था। मैं उनकी तेज़ होती धड़कनों को अपने सीने पर महसूस कर सकता था, और उस पल उनकी बेबसी ने मेरे अंदर उन्हें बचाने के एक नए जुनून को जन्म दे दिया था।

जैसे ही भीड़ का एक और रेला आया, अम्मी पूरी तरह से मुझ पर ढह गईं। उनकी पूरी देह मेरे जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी कि उनके और मेरे बीच हवा की भी जगह नहीं बची थी। उस पल, पहली बार मुझे अपनी अम्मी के भरे हुए सीने का स्पर्श इतनी नज़दीकी से महसूस हुआ। अबाया के कपड़े के पीछे भी उनके उरोजों की नरमी और उनका उभार मेरी छाती पर दबाव बना रहा था। वह अहसास इतना नर्म और मखमली था कि मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंध गई। एक बेटे के तौर पर मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था, पर उस दबाव और उनके बदन की गर्मी ने मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी।

तभी पीछे से लोगों का एक ज़ोरदार धक्का लगा, जिसने अम्मी को मेरे और करीब धकेल दिया। वह इस कदर घबरा गईं कि उन्हें लगा जैसे उनका दम घुट जाएगा। अपनी स्थिति को समझने और भीड़ के बीच रास्ता देखने की जद्दोजहद में, उन्होंने आनन-फानन में अपने चेहरे से ब्राउन नकाब हटा दिया।

जैसे ही उन्होंने नकाब हटाया, ऐसा लगा मानो काली घटाओं के पीछे से अचानक पूरा चाँद निकल आया हो। उनका वह दूधिया सफेद चेहरा, पसीने की छोटी-छोटी बूंदों से चमकता हुआ, उन गंदी नीयत वाले लोगों के सामने बेपर्दा हो गया। उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में फैली दहशत और उनके गुलाबी लब, जो डर से कांप रहे थे, ने वहाँ मौजूद हर शख्स की साँसें थाम दीं।

स्टेशन की रोशनी में उनका चेहरा किसी दैवीय अप्सरा की तरह दमक रहा था। जो लोग अब तक सिर्फ अबाया के पीछे के जिस्म का अंदाज़ा लगा रहे थे, उनके सामने अब वह बेपनाह हुस्न साक्षात था। हर तरफ जैसे एक सन्नाटा सा छा गया, हर नज़र उनकी उस नूरानी खूबसूरती पर गड़ गई थी। अम्मी अपनी ही खूबसूरती से बेखबर, बस मेरी आँखों में अपनी जान की सलामती तलाश रही थीं, जबकि मैं उन्हें उस भीड़ की दरिंदा नज़रों से बचाने के लिए और कसकर अपने घेरे में ले चुका था।

नानी, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी पैनी समझ रखती थीं, तुरंत ताड़ गईं कि भीड़ की आड़ में क्या गंदा खेल खेला जा रहा है। उन्होंने देखा कि कैसे अम्मी बेबस होकर मुझ पर ढह गई हैं और उनका चेहरा बेपर्दा हो चुका है। अपनी उम्र की कमज़ोरी को दरकिनार करते हुए, वह फौरन अम्मी के पीछे आकर किसी ढाल की तरह खड़ी हो गईं।

नानी की आँखों में उस वक्त ममता नहीं, बल्कि एक शेरनी जैसा गुस्सा था।

उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ में उन आवारा लोगों को फटकारते हुए कहा:

"शर्म नहीं आती तुम लोगों को? डूब मरो कहीं! यह जो हरकतें कर रहे हो, याद रखना, तुम्हारे घर में भी माँ-बहनें और बेटियाँ होंगी। क्या उनके साथ भी यही तमाशा होते देखना चाहते हो? इंसानियत मर गई है क्या तुम सबकी?"

नानी की कड़क आवाज़ और उस फटकार में इतना दम था कि आस-पास के कुछ लोग शर्मिंदगी से नज़रें झुकाने लगे। उनका वह रौब देखकर जो हाथ अम्मी के मखमली बदन की टोह ले रहे थे, वे अचानक ठिठक कर पीछे हट गए।

नानी ने अम्मी का हाथ मज़बूती से पकड़ा और मेरी तरफ देखते हुए इशारा किया कि हम अंदर की तरफ बढ़ें। अम्मी अभी भी कांप रही थीं, उनका चेहरा मेरी छाती में छिपा हुआ था और उनके नर्म सीने का दबाव अभी भी मेरी धड़कनों को बेकाबू कर रहा था। नानी के पीछे से मोर्चा संभालने के बाद, मैंने भी पूरे ज़ोर से रास्ता बनाया और हम आखिरकार उस दरिंदा भीड़ को पीछे छोड़ते हुए ट्रेन के डिब्बे के अंदर दाखिल हो गए।

मुश्किल से हम डिब्बे के अंदर पहुँचे। अम्मी की साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं। जब वह अपनी सीट पर बैठीं। उनके चाँद से गोल चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं। उन्होंने अबाया को थोड़ा ढीला किया, जिससे उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन का वह गोरा हिस्सा अबाया के काले कॉलर से उभर कर सामने आ गया।

मैं उनके सामने बैठा, उन्हें देख रहा था। मेरे मन में उनके लिए कोई गलत विचार नहीं था, पर उस भीड़ भरे हादसे और अबाया के ऊपर से हुए उन स्पर्शों ने मेरे अंदर एक अजीब सी जागरूकता भर दी थी। मुझे अहसास हुआ कि मेरी अम्मी सिर्फ मेरी अम्मी नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत हैं जिनकी एक झलक, चाहे वह अबाया में ही क्यों न हो, ज़माने को बेताब कर देती है। उनकी वह मासूमियत और अबाया के पीछे छिपा वह कातिलाना बदन, दोनों मिलकर एक ऐसा जादू जगा रहे थे जिसने मुझे उस दिन पहली बार अपनी ही अम्मी को एक अलग नज़रिए से देखने पर मजबूर कर दिया।

अम्मी ने मेरी तरफ देखकर एक फीकी सी मुस्कान दी और कहा, "शुक्रिया साहिल, अगर तू नहीं होता तो आज पता नहीं क्या होता..."

उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ मेरे कानों में मिश्री की तरह घुली, और मैंने बस इतना सोचा कि मैं ता उम्र उनकी ढाल बनकर खड़ा रहूँगा।

ट्रेन की डिम लाइट और पहियों की गूँज के बीच, वह सफर मेरे वजूद में एक ऐसी हलचल मचा रहा था जिसे मैं चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था। मैं अम्मी के बिल्कुल बगल में सटकर बैठा था। नानी खिड़की वाली सीट पर गहरी नींद में थीं, उनकी हल्की खर्राटों की आवाज़ डिब्बे के सन्नाटे में घुल रही थी।

अम्मी का वह काला ढीला-ढाला अबाया अब हमारे बीच की दूरी को मिटाने में नाकाम साबित हो रहा था। ट्रेन की हर थरथराहट और हर मोड़ पर आने वाला झटका अम्मी के नर्म और गर्म जिस्म को मेरे शरीर से ज़ोर से टकरा देता था।

जब भी ट्रेन की रफ़्तार तेज़ होती, उनका भारी और सुडौल सीना मेरी बाँह से रगड़ खाता, जिससे मुझे उस मखमली दबाव का गहरा अहसास होता। उनके जिस्म की वह आग जैसी तपिश अबाया के कपड़े को पार कर मेरे जिस्म में उतर रही थी, जिससे मेरी नसों में एक अजीब सी बेचैनी दौड़ने लगी।

अबाया की आस्तीनों से बाहर झाँकते उनके दूधिया सफेद हाथ चांदनी में और भी हसीन लग रहे थे। उनसे आती लोशन और चमेली की मिली-जुली भीनी खुशबू मेरे नथुनों से टकराकर मेरे दिमाग में एक नशा सा घोल रही थी।

"बेटा, दिल्ली में बहुत मज़ा आएगा," अम्मी ने आहिस्ता से फुसफुसाकर कहा।

उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ और उनके लबों की गर्माहट मेरे कान के पास महसूस हुई, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखों में शादी की खुशी थी, पर मेरी नज़रें उनके उन गुलाबी होंठों और उस लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिक गई थीं जो नकाब हटने के बाद अब पूरी तरह नुमाया थी।

ट्रेन की एक ज़ोरदार वाइब्रेशन ने अम्मी को पूरी तरह मेरी तरफ धकेल दिया। उनका चौड़ा कूल्हा मेरी जांघ से ज़ोर से सटा और उनकी पतली कमर का झुकाव मेरे पर आ टिका। उस पल मुझे गहराई से अहसास हुआ कि मेरी अम्मी कितनी सेक्सी और दिलकश हैं। उनके बदन का हर कर्व, हर उभार एक कयामत था। मेरे अंदर कामुकता की एक तेज़ लहर उठी, जिसने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं।

पर जैसे ही यह ख्याल आया, मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंधी। 'यह क्या सोच रहा हूँ मैं? यह गुनाह है, महापाप है!' मैंने झटके से अपनी आँखें बंद कर लीं और उस ज़हरीले मगर मीठे ख्याल को झटकने की कोशिश की।

वह मेरी अम्मी थीं, मेरी जन्नत। लेकिन उनके बदन की वह छुअन और वह खुशबू मुझे बार-बार उसी दलदल की तरफ खींच रही थी। मैंने अपना सर उनके कंधे पर टिका दिया, पर ट्रेन की हर हरकत उनके नर्म गोश्त को मुझसे रगड़ रही थी, जो मुझे बार-बार यह याद दिला रहा था कि मेरी 'जन्नत' इस दुनिया की सबसे खूबसूरत और कशिश भरी औरत है। वह रात महज़ एक सफर नहीं, बल्कि मेरे अंदर शुरू होने वाले एक नए और खतरनाक अध्याय की पहली दस्तक थी।
 
Adhyay 1

Main Sahil hoon. Yeh kahani meri zindagi ke us mod ki hai jab waqt ne ek ajeeb karwat li thi. Hum Delhi gaye the, meri Ammi, Aisha ki cousin, Saima, ki shaadi ke liye. Saima Ammi ke mama ki beti thi, isliye yeh ek bada family event tha.

Ghar se hum teeno nikle the—main, meri Ammi, aur meri Nani. Mere Abbu, Fahad, ko business ke kaam se rukna pada, isliye woh humare saath nahi aa sake. Main college mein tha, apni hi dhun mein rehne wala ek average sa ladka. Medium height, patla sa jism, aur kaale baal jo aksar messy rehte the, hawa mein lehraate huye. Mera chehra Ammi se zyada Abbu se milta tha. Dekhne mein main masoom lagta tha, par mere andar ek bechaini thi, ek tez dhadkan jo har naye tajurbe ko talashti thi.

Main Sahil hoon, aur yeh waqya meri Ammi, Aisha, ke us jaadui roop ke ird-gird buna gaya hai jisne mujhe pehli baar yeh ahsaas karaya ki kudrat ne unhe kis kadar fursat mein tarasha tha.

Meri Ammi ki khoobsurati sirf ek bete ki nazar se hi nahi, balki kisi bhi dekhne wale ke liye ek madhosh kar dene wala manzar thi. College mein hone ke naate, main auron ki nazron ko padhna seekh gaya tha, aur aksar dekhta tha ki jab Ammi kamre mein dakhil hotin, to waqt jaise thehar sa jata. Unki lambi surahidaar gardan aur us par tika woh chaand sa gol chehra kisi sangmarmar ki moorat jaisa lagta tha. Unki twacha ka rang itna saaf aur doodhiya safed tha ki roshni jaise unse takrakar waapas laut-ti thi.

Us din unhone ek maheen kapde ka suit pehna tha, jo unke charhare magar gathavdar badan par is kadar chipka tha ki unke jism ka har ubhaar apni ek alag kahani keh raha tha. Unki patli kamar jab chalne ke dauran halki si bal khati, to unke bhare huye pusht koohey aur pusht seena ek aisi lay paida karte the jise andekha karna namumkin tha. Unke kaale ghane baal unki peeth par kisi naagin ki tarah lehra rahe the, aur unse aati chameli ki bheeni khushboo hawa mein ek nasha sa ghol rahi thi. Main unka beta tha, unse beintehaan pyaar karta tha, par us din meri aankhon mein unke liye sirf mamta nahi, balki unki bepanaah khoobsurati ke liye ek gehri achraj bhari kashish thi.

Meri Ammi bahut caring thin, jinki duniya unki family ke ird-gird hi ghoomti thi. Unki muskurahat aisi thi jo dil ko sukoon de.

Safar ki shuruat hi hungamedar rahi. Railway station par jaise insaano ka samandar umad pada tha. Abbu saath nahi the, isliye Nani aur Ammi ki zimmedari mere kandhon par thi.

Us din safar ke liye Ammi ne ek dheela-dhala kaala abaya aur chehre par brown veil (naqab) pehna hua tha. Unka poora jism sir se pair tak dhaka tha. Oopar se dekhne par sirf ek siyah saaya nazar aata, lekin Ammi ka woh abaya unki bepanaah khoobsurati ko chhupane mein naakaam tha.

Unka gora rang abaya ke siyah kaale rang ke contrast mein kisi jalte huye diye ki tarah khil utha tha. Abaya ne unke jism ko zaroor dhaka tha, magar unke doodhiya safed haath jab abaya ki aasteenon se baahar nikalte, to kaale kapde par unki safedi kisi sangmarmar ki tarah chamakti thi. Naqab ke peeche se unki badi-badi kaali aankhein jab uthtin, to aisa lagta jaise koi gehra raaz beparda hone ko ho.

Chalte waqt jab abaya ki zameen choomti hui kinariyaan halki si oopar uthtin, to unke narm aur gore pairon ki ek chhoti si jhalak dikh jaati, jo kaale abaya ke saath ek qayamat sa contrast paida kar rahi thi. Woh jhalak cheekh-cheekh kar bata rahi thi ki us kaale libaas ke neeche chhipa hua poora badan kis kadar doodhiya aur bedaag hoga.

Abaya kitna bhi dheela kyun na ho, jab hawa ka koi jhonka unse takrata ya woh mudtin, to kapde ka khichav unke bhare huye seene aur pusht koohon ke curve ko saaf bayan kar deta tha.

Jaise hi train platform par aakar ruki, coach ke darwaje par chadhne waalon ki ek andhi daud shuru ho gayi. Station ka woh shor-sharaba aur dhakka-mukki kisi anhoni ka ishaara de rahe the. Bheed ka fayda uthakar kuch aawara kism ke log Ammi ke ird-gird ghera banane lage. Halaanki Ammi us dheele-dhale kaale abaya mein poori tarah dhaki thin, lekin un bhediyon ki bhookhi nazrein us kapde ke paar dekh rahi thin. Ve Ammi ke chalne ki lay aur abaya ke khichav se unke jism ke utaar-chadhav ka andaaza laga rahe the.

Maine dekha ki kaise ek hatte-katte aadmi ne jaan-boojhkar Ammi ke bilkul kareeb aane ki koshish ki, uski nazrein Ammi ke abaya se dhake pusht koohon par jami hui thin. Bheed ke ek zordaar rele ne Ammi ka santulan bigaad diya, aur woh ladkhadakar peeche ki ore jhukin.

"Sahil... bacha mujhe!" Ammi ki aawaaz naqab ke peeche se kaanpti hui aur behad bebas si aayi.

Usi pal, us bheed ka fayda uthakar ek ganda haath badi chaalaki se Ammi ke abaya ke oopar se hi unki sudaul gaand tak pahuncha. Us shakhs ne koi hichkichahat nahi dikhayi aur Ammi ke bhare huye koohey ko mazbooti se dabochkar bheenjh diya. Ammi ke munh se ek dabi hui cheekh nikli, woh buri tarah darr gayi aur thartharane lagin. Us sparsh ki darindagi ne unhe andar tak hila diya tha.

"Sahil!" Unhone dahshat mein mera naam pukara.

Meri ragon mein khoon khaul utha. Maine palak jhapakte hi Ammi ki kamar mein apna haath daala aur unhe apni ore poori taaqat se kheench liya. Mera haath unke abaya ke kapde ke oopar tha, lekin us dheele libaas ke neeche se bhi mujhe unki patli kamar ki golayi aur unke dehakte badan ki tapish ka saaf ahsaas hua. Woh khauf ke maare mujhse poori tarah chipak gayin. Unka abaya se dhaka hua bhaari seena meri chaati se zor se sat gaya tha. Main unki tez hoti dhadkanon ko apne seene par mehsoos kar sakta tha, aur us pal unki bebasi ne mere andar unhe bachane ke ek naye junoon ko janm de diya tha.

Jaise hi bheed ka ek aur rela aaya, Ammi poori tarah se mujh par dha gayi. Unki poori deh mere jism se is kadar chipki hui thi ki unke aur mere beech hawa ki bhi jagah nahi bachi thi. Us pal, pehli baar mujhe apni Ammi ke bhare huye seene ka sparsh itni nazdeeki se mehsoos hua. Abaya ke kapde ke peeche bhi unke urojhon ki narmi aur unka ubhaar meri chaati par dabaav bana raha tha. Woh ahsaas itna narm aur makhmali tha ki mere zehan mein ek bijli si kaundh gayi. Ek bete ke taur par maine kabhi aisa nahi socha tha, par us dabaav aur unke badan ki garmi ne mere andar ek ajeeb si sihran paida kar di thi.

Tabhi peeche se logon ka ek zordaar dhakka laga, jisne Ammi ko mere aur kareeb dhakel diya. Woh is kadar ghabra gayin ki unhe laga jaise unka dam ghut jayega. Apni sthiti ko samajhne aur bheed ke beech raasta dekhne ki jad-do-jahad mein, unhone aanan-faanan mein apne chehre se brown naqab hata diya.

Jaise hi unhone naqab hataya, aisa laga maano kaali ghataon ke peeche se achanak poora chaand nikal aaya ho. Unka woh doodhiya safed chehra, pasine ki chhoti-chhoti boondon se chamakta hua, un gandi niyat waale logon ke saamne beparda ho gaya. Unki badi-badi aankhon mein faili dahshat aur unke gulaabi lab, jo darr se kaanp rahe the, ne wahan maujood har shakhs ki saansein thaam din.

Station ki roshni mein unka chehra kisi daiviye apsara ki tarah damak raha tha. Jo log ab tak sirf abaya ke peeche ke jism ka andaaza laga rahe the, unke saamne ab woh bepanaah husn saakshaat tha. Har taraf jaise ek sannaata sa chha gaya, har nazar unki us noorani khoobsurati par gad gayi thi. Ammi apni hi khoobsurati se bekhabar, bas meri aankhon mein apni jaan ki salaamati talaash rahi thin, jabki main unhe us bheed ki darinda nazron se bachane ke liye aur kaskar apne ghere mein le chuka tha.

Nani, jo umra ke is padaav par bhi apni paini samajh rakhti thin, turant taad gayin ki bheed ki aad mein kya ganda khel khela ja raha hai. Unhone dekha ki kaise Ammi bebas hokar mujh par dha gayi hain aur unka chehra beparda ho chuka hai. Apni umra ki kamzori ko dar-kinaar karte huye, woh foran Ammi ke peeche aakar kisi dhaal ki tarah khadi ho gayin.

Nani ki aankhon mein us waqt mamta nahi, balki ek sherni jaisa gussa tha.

Unhone zordaar aawaaz mein un aawara logon ko fatkaarte huye kaha: "Sharm nahi aati tum logon ko? Doob maro kahin! Yeh jo harkatein kar rahe ho, yaad rakhna, tumhare ghar mein bhi maa-behenein aur betiyan hongi. Kya unke saath bhi yehi tamasha hote dekhna chahte ho? Insaaniyat mar gayi hai kya tum sabki?"

Nani ki kadak aawaaz aur us fatkaar mein itna dam tha ki aas-paas ke kuch log sharmindagi se nazrein jhukane lage. Unka woh raub dekhkar jo haath Ammi ke makhmali badan ki toh le rahe the, ve achanak thithak kar peeche hat gaye.

Nani ne Ammi ka haath mazbooti se pakda aur meri taraf dekhte huye ishaara kiya ki hum andar ki taraf badhein. Ammi abhi bhi kaanp rahi thin, unka chehra meri chaati mein chhipa hua tha aur unke narm seene ka dabaav abhi bhi meri dhadkanon ko bekaaboo kar raha tha. Nani ke peeche se morcha sambhaalne ke baad, maine bhi poore zor se raasta banaya aur hum aakhirkar us darinda bheed ko peeche chhodte huye train ke dibbe ke andar dakhil ho gaye.

Mushkil se hum dibbe ke andar pahunche. Ammi ki saansein abhi bhi ukhdi hui thin. Jab woh apni seat par baithin, unke chaand se gol chehre par pasine ki nanhin boondein chamak rahi thin. Unhone abaya ko thoda dheela kiya, jisse unki lambi surahidaar gardan ka woh gora hissa abaya ke kaale collar se ubhar kar saamne aa gaya.

Main unke saamne baitha, unhe dekh raha tha. Mere mann mein unke liye koi galat vichaar nahi tha, par us bheed bhare haadse aur abaya ke oopar se huye un sparshon ne mere andar ek ajeeb si jaagrookta bhar di thi. Mujhe ahsaas hua ki meri Ammi sirf meri Ammi nahi, balki ek aisi aurat hain jinki ek jhalak, chahe woh abaya mein hi kyun na ho, zamaane ko betaab kar deti hai. Unki woh masoomiyat aur abaya ke peeche chhipa woh kaatilana badan, dono milkar ek aisa jaadu jaga rahe the jisne mujhe us din pehli baar apni hi Ammi ko ek alag nazariye se dekhne par majboor kar diya.

Ammi ne meri taraf dekhkar ek feeki si muskurahat di aur kaha, "Shukriya Sahil, agar tu nahi hota to aaj pata nahi kya hota..."

Unki woh shahad si meethi aawaaz mere kaanon mein mishri ki tarah ghuli, aur maine bas itna socha ki main ta-umra unki dhaal bankar khada rahunga.

Train ki dim light aur pahiyon ki goonj ke beech, woh safar mere wajood mein ek aisi halchal macha raha tha jise main chaahkar bhi daba nahi pa raha tha. Main Ammi ke bilkul bagal mein satkar baitha tha. Nani khidki waali seat par gehri neend mein thin, unki halki kharraton ki aawaaz dibbe ke sannaate in ghul rahi thi.

Ammi ka woh kaala dheela-dhala abaya ab humare beech ki doori ko mitane mein naakaam saabit ho raha tha. Train ki har thartharahat aur har mod par aane wala jhatka Ammi ke narm aur garm jism ko mere shareer se zor se takra deta tha.

Jab bhi train ki raftaar tez hoti, unka bhaari aur sudaul seena meri baanh se ragad khaata, jisse mujhe us makhmali dabaav ka gehra ahsaas hota. Unke jism ki woh aag jaisi tapish abaya ke kapde ko paar kar mere jism mein utar rahi thi, jisse meri nason mein ek ajeeb si bechaini daudne lagi.

Abaya ki aasteenon se baahar jhaankte unke doodhiya safed haath chandni mein aur bhi haseen lag rahe the. Unse aati lotion aur chameli ki mili-juli bheeni khushboo mere nathuno se takrakar mere dimaag mein ek nasha sa ghol rahi thi.

"Beta, Delhi mein bahut maza aayega," Ammi ne aahista se fusfusakar kaha.

Unki woh shahad si meethi aawaaz aur unke labon ki garmahat mere kaan ke paas mehsoos hui, jisse mere ronte khade ho gaye. Unki aankhon mein shaadi ki khushi thi, par meri nazrein unke un gulaabi hothon aur us lambi surahidaar gardan par tik gayi thin jo naqab hatne ke baad ab poori tarah numaya thi.

Train ki ek zordaar vibration ne Ammi ko poori tarah meri taraf dhakel diya. Unka chauda koohey meri jaangh se zor se sata aur unki patli kamar ka jhukav mere par aa tika. Us pal mujhe gehraayi se ahsaas hua ki meri Ammi kitni sexy aur dilkash hain. Unke badan ka har curve, har ubhaar ek qayamat tha. Mere andar kaamukta ki ek tez lahar uthi, jisne mere dil ki dhadkanein bekaaboo kar din.

Par jaise hi yeh khayal aaya, mere zehan mein ek bijli si kaundhi. 'Yeh kya soch raha hoon main? Yeh gunaah hai, mahapaap hai!' Maine jhatke se apni aankhein band kar lin aur us zahreele magar meethe khayal ko jhatakne ki koshish ki.

Woh meri Ammi thin, meri jannat. Lekin unke badan ki woh chhuan aur woh khushboo mujhe baar-baat usi daldal ki taraf kheench rahi thi. Maine apna sar unke kandhe par tika diya, par train ki har harkat unke narm gosht ko mujhse ragad rahi thi, jo mujhe baar-baar yeh yaad dila raha tha ki meri 'jannat' is duniya ki sabse khoobsurat aur kashish bhari aurat hai. Woh raat mahaz ek safar nahi, balki mere andar shuru hone waale ek naye aur khatarnak adhyay ki pehli dastak thi.
 
अध्याय 2

रात के दस बज रहे थे। ट्रेन की पीली डिम लाइटों ने डिब्बे के भीतर एक धुंधला और कामुक सा माहौल बना दिया था। सोने की तैयारी हो रही थी, और अम्मी अपनी नीचे वाली बर्थ पर अपना बैग टटोल रही थीं। नानी पहले ही चादर ओढ़कर सुस्ताने लगी थीं।

अम्मी ने बैग से अपनी नीले रंग की रेशमी नाइटगाउन निकाली। अम्मी ने उसे हाथ में लिया, तो उनके दूधिया सफेद हाथ उस नीले रंग के साथ एक गजब का कंट्रास्ट बना रहे थे। वह रात के इस पहर में भी बला की खूबसूरत लग रही थीं।

अम्मी: (धीरे से, नकाब को संभालते हुए) "साहिल... बेटा, सुन तो?"

मैं: (लेटे-लेटे, आवाज़ में थोड़ा आलस भरते हुए) "जी अम्मी, क्या बात है? अब तो सोने का वक्त है।"

अम्मी: (अपनी नाइटगाउन की तरफ इशारा करते हुए) "मुझे कपड़े बदलने हैं... वॉशरूम तक चलना पड़ेगा। पर मुझे बहुत डर लग रहा है। वो स्टेशन वाले लोग... मैंने देखा है, वो अभी भी वहीं गेट के पास खड़े बीड़ी पी रहे हैं।"

मैं: (थोड़ा हिचकिचाते हुए, एक टीनएजर की तरह) "अरे अम्मी, आप भी न! अब मैं क्या साथ चलूँ? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि इतना बड़ा लड़का अपनी अम्मी को कपड़े बदलवाने ले जा रहा है? आप नानी को बोल लो।"

अम्मी: (आँखों में गहरी मिन्नत और थोड़ा डर समेटे) "नहीं बेटा, नानी थक गई हैं। और वो लोग... उनकी नज़रें बहुत गंदी हैं। तू बस दरवाज़े के बाहर खड़ा रह जाना, मुझे लगेगा कि तू पास है तो सुकून रहेगा। प्लीज, मेरा प्यारा बेटा है न?"

अम्मी का वह नर्म और शहद जैसा लहजा सुनकर मेरा सारा विरोध पिघल गया। मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ कि मेरी इतनी हसीन अम्मी खुद को सुरक्षित रखने के लिए मेरे सहारे की तलाश में हैं।

मैं: (नीचे उतरते हुए) "ठीक है, चलिए। घबराइए मत, मैं हूँ न।"

अम्मी के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आई। वह आगे बढ़ीं और मैं उनके पीछे। गलियारे के तंग रास्ते में जब वह चल रही थीं, तो उनका ढीला-ढाला काला अबाया उनके सुडौल कूल्हों की हरकत के साथ लहरा रहा था। उनकी चमेली की भीनी खुशबू उस बंद गलियारे में एक नशा सा घोल रही थी।

जैसे ही हम वॉशरूम के करीब पहुँचे। वही हट्टे-कट्टे लोग, जिन्होंने स्टेशन पर अम्मी को छेड़ा था, गेट के पास झुंड बनाकर खड़े बीड़ी पी रहे थे। बीड़ी का कड़वा धुआँ और उनकी दरिंदा नज़रें जैसे ही अम्मी पर पड़ीं, वे आपस में फुसफुसाने लगे। उनकी आँखें अम्मी के हाथ में दबी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन को देख रही थीं, जैसे वे अंदाज़ा लगा रहे हों कि उस अबाया के नीचे क्या-क्या छिपा है।

अम्मी ने डर के मारे मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया। उनके नर्म और गर्म पंजों की पकड़ मेरे जिस्म में एक करंट की तरह दौड़ी। उन्होंने खुद को मेरे और करीब कर लिया, जिससे उनका उभरा हुआ सीना मेरी बाँह से रगड़ खाने लगा। उस पल, मुझे अपनी मर्दानगी का अहसास हुआ और साथ ही अम्मी के उस कातिलाना बदन की छुअन ने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं। मैंने उन लोगों को घूरकर देखा और अम्मी को वॉशरूम के दरवाज़े तक ले गया।

जैसे ही अम्मी ने वॉशरूम का भारी लोहे का दरवाज़ा खोला, अंदर से आती एक तेज़ और सड़ांध भरी बदबू ने उनका स्वागत किया। सफ़ाई की कमी और फिनाइल की तीखी गंध ने उनके चेहरे पर शिकन ला दी। अम्मी हमेशा से नज़ाकत और सफ़ाई की आदी रही थीं, और ट्रेन के उस गंदे टॉयलेट को देखकर उनकी आँखों में घिन और बेबसी साफ झलक रही थी।

उन्होंने अपनी नाक पर नाइटगाउन रखा और अंदर की तंग जगह का मुआयना किया। वहाँ न तो कपड़े टांगने की कोई साफ जगह थी और न ही हुक पर भरोसा किया जा सकता था। वह वापस मुड़ीं और मेरी आँखों में झांकते हुए धीरे से फुसफुसायीं।

अम्मी: (नाक सिकोड़ते हुए) "उफ़, साहिल... कितनी गंदी जगह है! यहाँ तो अपना बैग या कपड़े रखना भी मुश्किल है। सब गीला और गंदा पड़ा है।"

मैं: (उनकी परेशानी समझते हुए) "हाँ अम्मी, ट्रेन के टॉयलेट ऐसे ही होते हैं। आप जल्दी से बदल लीजिए, मैं बाहर ही खड़ा हूँ।"

अम्मी: (हिचकिचाते हुए, अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मेरी तरफ बढ़ाते हुए) "बेटा, तू ज़रा ये पकड़। मैं अंदर जाकर पहले अपना अबाया उतारती हूँ, फिर तू मुझे ये पकड़ा देना। यहाँ कहीं भी रखने की जगह नहीं है, मेरा नया गाउन गंदा हो जाएगा।"

मैंने अम्मी के हाथ से वह नीला रेशमी कपड़ा थाम लिया। उस सिल्क की छुअन इतनी नर्म और चिकनी थी, जैसे अम्मी की अपनी त्वचा।

मुझे अच्छी तरह याद था कि आज सफर के लिए अम्मी ने अबाया के नीचे अपना वह खूबसूरत पीला सूट पहना था। वह सूट काफी तंग था और उसके बाजू नहीं थे—एक स्लीवलेस फिटिंग वाला कुर्ता जो उनके बदन से चिपक कर उनके हर कर्व को उभार देता था।

जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा आधा बंद किया और अंदर की कुंडी लगाई, मुझे अहसास हुआ कि कुछ ही पलों में वह उस भारी काले अबाया को उतार देंगी और उनके उस दूधिया सफेद बदन पर सिर्फ वह तंग पीला कपड़ा रह जाएगा।

मेरे हाथ में उनका नाइटगाउन था। अम्मी अंदर थीं, और मैं बाहर खड़ा उस बंद दरवाज़े के पीछे होने वाली हर सरसराहट को महसूस कर रहा था। मुझे पता था कि जब वह हाथ बाहर निकालेंगी, तो उनके नंगे और गोरे कंधे उस पीले कपड़े के कंट्रास्ट में किसी बिजली की तरह चमकेंगे।

पास खड़े वही आवारा लोग अभी भी तिरछी नज़रों से हमें देख रहे थे, पर मेरा पूरा ध्यान उस दरवाज़े की दरार पर था, जहाँ से अम्मी की गर्माहट और उनकी साँसों की आवाज़ मुझ तक पहुँच रही थी।

ट्रेन ने अचानक एक ज़ोरदार झटका लिया, ठीक उसी पल जब अम्मी ने अपना काला अबाया उतारकर दरवाज़े की कुंडी हल्की सी खोली थी। उनका इरादा बस इतना था कि वह एक हाथ बाहर निकालकर मुझे अबाया पकड़ा दें और मुझसे वह नीली सिल्क की नाइटगाउन ले लें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।

उस झटके से दरवाज़ा अम्मी के हाथ से छूट गया और पूरी तरह पीछे की ओर खुल गया। अंदर का नज़ारा बिजली की तरह उन आवारा लोगों और मेरी आँखों के सामने कौंध गया।

अबाया के बिना, अम्मी उस तंग और स्लीवलेस पीले सूट में किसी जलपरी की तरह लग रही थीं। वह कुर्ता उनके बदन से इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उतार-चढ़ाव नुमाया हो रहा था। उस चटक पीले रंग के साथ उनकी दूधिया सफेद त्वचा का कंट्रास्ट इतना तीखा था कि देखने वाले की आँखें चुंधिया जाएँ। उनके गोरे, सुडौल और नंगे कंधे रोशनी में संगमरमर की तरह चमक रहे थे।

चूँकि उन्होंने दुपट्टा नहीं लिया था, उनके गर्व से भरे पुष्ट स्तन उस तंग कपड़े के नीचे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। उनकी पतली कमर और वहाँ से नीचे की ओर बढ़ते चौड़े कूल्हों के कर्व ने एक ऐसी कामुक लय बनाई थी जिसे देखकर कोई भी अपना आपा खो दे। उनके मखमली और गोरे हाथ हवा में आधे खुले हुए थे, और उनके चेहरे पर अचानक आई उस आफत की वजह से गहरी दहशत थी।

वहाँ खड़े उन रऊडी लोगों की आँखों में जैसे हवस का लावा उबल पड़ा। अम्मी की उस नूरानी और कामुक छवि को अचानक अपने सामने पाकर वे अपनी औकात भूल गए।

उनमें से एक हट्टा-कट्टा शख्स, जो बीड़ी पी रहा था, आगे बढ़ा और अम्मी के उस बेपर्दा हुस्न को अपनी गंदी नज़रों से ऊपर से नीचे तक चाटते हुए बड़े भद्दे लहजे में बोला:

"वाह भाई! क्या माल छिपा रखा था काली चादर में... मैडम, अकेले-अकेले बड़ी मुश्किल हो रही होगी। कहो तो अंदर आकर चेंज करने में आपकी थोड़ी मदद कर दें?"

उसकी बात सुनकर पीछे खड़े उसके साथियों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और एक ने लंबी सीटी बजाई। उनकी वह भद्दी हँसी और सीटियाँ उस खामोश गलियारे में ज़हर की तरह घुल गईं। अम्मी का गोरा चेहरा शर्म और खौफ से एकदम लाल पड़ गया। वह अपने दोनों हाथों से अपने भरे हुए सीने को ढंकने की कोशिश करने लगीं, लेकिन उस छोटे से बाथरूम में उनकी बेबसी साफ़ दिख रही थी।

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कान में गरम तेल डाल दिया हो। मेरी अम्मी, जो मेरी नज़र में पवित्रता की मूरत थीं, उनके उस कातिलाना और सेक्सी रूप का इस तरह सरेआम मज़ाक उड़ते देख मेरा खून खौल उठा। एक तरफ तो अम्मी के उस अर्धनग्न और मोहक बदन की छुअन और दृश्य ने मेरे टीनएज दिमाग में एक करंट पैदा कर दिया था, और दूसरी तरफ उन लोगों की ज़ुबान ने मेरी मर्दानगी को ललकारा था।

मेरा खून खौल उठा था। उन बदतमीजों की सीटी और वह भद्दा जुमला मेरे कानों में शीशे की तरह चुभ रहा था। मैंने जैसे ही अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और उन दरिंदों की तरफ एक कदम बढ़ाया, अम्मी ने फुर्ती से अपना गोरा और रेशमी हाथ बाहर निकाला और मेरी बाजू थाम ली।

अम्मी: (धीमी और कांपती हुई आवाज़ में) "साहिल... नहीं बेटा! पागल मत बन। तू चुपचाप यहाँ खड़ा रह, बस।"

उनकी आँखों में गहरी दहशत थी। उन्होंने जल्दी से अपना काला अबाया मेरे हाथों में थमाया और बदले में अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मुझसे ले ली। वह इतनी डरी हुई थीं कि उन्हें होश ही नहीं था कि वह किस हाल में सबके सामने खड़ी हैं। जैसे ही वह मुड़ीं ताकि वापस उस तंग बाथरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर सकें, उन्होंने अनजाने में उन आवारा लोगों को अपनी खूबसूरती का वह हिस्सा दिखा दिया जिसे अब तक सिर्फ अबाया के काले पर्दे ने छुपा रखा था।

जैसे ही अम्मी मुड़ीं, उस तंग पीले सूट का पिछला हिस्सा पूरी तरह नुमाया हो गया। उस कुर्ते की गर्दन पीछे से बहुत गहरी थी, जो उनकी दूधिया सफेद और चिकनी पीठ को लगभग आधा नंगा कर रही थी। उनकी रीढ़ की हड्डी के पास की वह गहरी ढलान और उस पर चमकता पसीना किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने के लिए काफी था।

लेकिन असली कयामत तो नीचे थी। वह पीला सूट उनके सुडौल कूल्हों पर इस कदर चिपका हुआ था कि उनकी गाँड का हर उतार-चढ़ाव साफ़ नज़र आ रहा था। चलते वक्त जब उनके कदम डगमगाए, तो उनके उन मखमली और पुष्ट नितंबों में एक ऐसी लचक पैदा हुई जिसे देखकर वहाँ खड़े उन रऊडी लड़कों की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह नंगी गोरी पीठ और उसके नीचे उस पीले कपड़े में कैद वह कातिलाना उभार... वह नज़ारा किसी के भी ज़हन में आग लगाने के लिए काफी था।

उनमें से एक ने अपनी बीड़ी का धुआँ हवा में छोड़ते हुए एक और गंदी आवाज़ निकाली।

"उफ़... पीछे का मंज़र तो सामने से भी ज़्यादा ज़ालिम है! यार, ऐसी 'जन्नत' तो मैंने आज तक नहीं देखी।"

अम्मी ने हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद किया। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी। एक तरफ उन लोगों की बदज़ुबानी पर मेरा गुस्सा और दूसरी तरफ अपनी ही अम्मी के उस बेपनाह सेक्सी और छुपे हुए रूप का साक्षात दर्शन—मैं एक ऐसे भंवर में फँस गया था जहाँ 'पाप' और 'हकीकत' के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही थी।

बाथरूम के अंदर से कपड़ों की सरसराहट की आवाज़ आ रही थी, और मैं बाहर खड़ा उनके उस दूधिया बदन और उस गहरी गर्दन वाले पीले सूट की यादों से जूझ रहा था।

माहौल पल भर में तनावपूर्ण से खौफनाक हो गया। उन आवारा लड़कों की टोलियों ने बड़ी चालाकी से घेराबंदी कर ली थी। दो लड़के मेरे दाएं-बाएं आकर खड़े हो गए, जिससे मैं उनके बीच सैंडविच की तरह फंस गया। उनमें से एक, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और मुँह से बीड़ी की बदबू आ रही थी, उसने बड़े हक के साथ अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया—जैसे हम पुराने दोस्त हों।

उसने अपना मुँह मेरे कान के बिल्कुल करीब लाया और अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा कि सिर्फ मैं सुन सकूँ। उसकी आवाज़ में एक नशीली और गंदी तारीफ घुली हुई थी।

"अबे ओ छोटे... सच बता, ये तेरी अम्मी ही हैं? कसम खुदा की, कोई देख ले तो यकीन न करे। जिस तरह का इनका दूधिया बदन है और वो पीला तंग कुर्ता, ये तो 25 की भी नहीं लगतीं। ऐसी कयामत चीज़ घर में छुपाकर रखी है तूने?"

उसकी बातों ने मेरे ज़हन में एक साथ कई भावनाओं का विस्फोट कर दिया—एक तरफ अम्मी के उस कातिलाना हुस्न का सरेआम ज़िक्र सुनकर मुझे घिन आ रही थी, तो दूसरी तरफ उनकी सेक्सी इमेज का यह खौफनाक सच मुझे अंदर तक हिला रहा था।

तभी मेरी नज़र गैलरी के दूसरे छोर पर पड़ी। दो और लड़के वहाँ दीवार से टिक कर खड़े हो गए थे, उन्होंने हमारा रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। अब न तो कोई उधर से आ सकता था और न ही हम वहाँ से भाग सकते थे। नानी अपनी सीट पर सो रही थीं और इस खतरे से बिल्कुल बेखबर थीं।

अचानक मुझे अपनी सुरक्षा की भी उतनी ही फिक्र होने लगी जितनी अम्मी की। मैं सिर्फ एक कॉलेज जाने वाला पतला-दुबला लड़का था, और वे चार हट्टे-कट्टे रऊडी लड़के थे। मुझे समझ आ गया कि वे सिर्फ अम्मी के उस मखमली बदन को निहारने नहीं आए थे, उनके इरादे बहुत खतरनाक थे।

बाथरूम के अंदर से अम्मी के कपड़ों की सरसराहट आ रही थी। मुझे अहसास हुआ कि जब वह उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में बाहर निकलेंगी, तो वह उन भेड़ियों के लिए और भी आसान शिकार बन जाएँगी। उस रेशमी और पारदर्शी कपड़े में उनके भरे हुए सीने और चौड़े कूल्हों का उभार उन लोगों को और भी पागल कर देगा।

मेरी हथेलियाँ पसीने से भीग गई थीं। मैं उन दो लड़कों के बीच फंसा हुआ था, और सामने खड़े दो और लड़के मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे, जैसे वे किसी बड़ी वारदात की तैयारी में हों। उस बंद और घुटन भरी गैलरी में, अम्मी की सुरक्षा अब पूरी तरह मेरी हिम्मत और समझदारी पर टिकी थी, पर मेरा खुद का दिल खौफ और एक अजीब सी उत्तेजना के बीच बुरी तरह धड़क रहा था।

"देख छोटे, हम बस मैडम से थोड़ी जान-पहचान करना चाहते हैं, तू बीच में मत आना," कंधे पर हाथ रखे हुए शख्स ने दबाब बढ़ाते हुए कहा।

अम्मी को अब किसी भी पल बाहर आना था, और मुझे पता था कि उनका वह गोरा हुस्न इन चार भूखे भेड़ियों के सामने तमाशा बनने वाला है। क्या मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त बचा पाऊँगा? या उनकी वह कातिलाना खूबसूरती हमें किसी बड़ी मुसीबत में झोंक देगी?
 
अध्याय 2

रात के दस बज रहे थे. ट्रैन की पीली डिम लिघ्तों ने डिब्बे के भीतर एक धुंधला और कामुक सा माहौल बना दिया था. सोने की तयारी हो रही थी, और अम्मी अपनी नीचे वाली बर्थ पर अपना बैग टटोल रही थी. नानी पहले hi चादर ओढ़कर सुस्ताने लगी थी.

अम्मी ने बैग से अपनी नीले रंग की रेशमी निघटजोन निकली. अम्मी ने उसे हाथ में लिया, तोह उनके दूधिया सफ़ेद हाथ उस नीले रंग के साथ एक गजब का कंट्रास्ट बना रहे थे. वह रात के इस पहर में भी बाला की खूबसूरत लग रही थी.

अम्मी: (धीरे से, नक़ाब को सँभालते हुए) "साहिल... बीटा, सुन तोह?"

मैं: (Lete-lete, आवाज़ में थोड़ा आलस भरते हुए) "जी अम्मी, क्या बात है? अब तोह सोने का वक़्त है."

अम्मी: (अपनी निघटजोन की तरफ इशारा करते हुए) "मुझे कपडे बदलने हैं... वाशरूम तक चलना पड़ेगा. पर मुझे बहुत डर लग रहा है. वह स्टेशन वाले लोग... मैंने देखा है, वह अभी भी वहां गेट के पास खड़े बीड़ी पी रहे हैं."

मैं: (थोड़ा हिचकिचाते हुए, एक तीनगर की तरह) "अरे अम्मी, आप भी न! अब मैं क्या साथ चलूँ? लोग देखेंगे तोह क्या सोचेंगे की इतना बड़ा लड़का अपनी अम्मी को कपडे बदलवाने ले जा रहा है? आप नानी को बोल लो."

अम्मी: (आँखों में गहरी मिन्नत और थोड़ा डर समेटे) "नहीं बीटा, नानी थक गयी हैं. और वह लोग... उनकी नज़रें बहुत गन्दी हैं. तू बस दरवाज़े के बहार खड़ा रह जाना, मुझे लगेगा की तू पास है तोह सुकून रहेगा. प्लीज, मेरा प्यारा बीटा है न?"

अम्मी का वह नरम और शहद जैसा लहजा सुनकर मेरा सारा विरोध पिघल गया. मुझे अंदर hi अंदर एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ की मेरी इतनी हसीं अम्मी खुद को सुरक्षित रखने के लिए मेरे सहारे की तलाश में हैं.

मैं: (नीचे उतारते हुए) "ठीक है, चलिए. घबराइए मत, मैं हूँ न."

अम्मी के चेहरे पर एक रहत भरी मुस्कान आयी. वह आगे बढ़ी और मैं उनके पीछे. गलियारे के तंग रस्ते में जब वह चल रही थी, तोह उनका dheela-dhala कला आबय उनके सुडौल कूल्हों की हरकत के साथ लहरा रहा था. उनकी चमेली की भीनी खुशबु उस बंद गलियारे में एक नशा सा घोल रही थी.

जैसे hi हम वाशरूम के करीब पहुंचे, वही hatte-katte लोग, जिन्होंने स्टेशन पर अम्मी को छेड़ा था, गेट के पास झुण्ड बनाकर खड़े बीड़ी पी रहे थे. बीड़ी का कड़वा धुवां और उनकी दरिंदा नज़रें जैसे hi अम्मी पर पड़ी, वे आपस में फुसफुसाने लगे. उनकी आँखें अम्मी के हाथ में दबी उस नीली सिल्क की निघटजोन को देख रही थी, जैसे वे अंदाज़ा लगा रहे हों की उस आबय के नीचे kya-kya छिपा है.

अम्मी ने डर के मारे मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया. उनके नरम और गर्म पंजो की पकड़ मेरे जिस्म में एक करंट की तरह दौड़ी. उन्होंने खुद को मेरे और करीब कर लिया, जिससे उनका उभरा हुआ सीना मेरी बाण से रगड़ खाने लगा. उस पल, मुझे अपनी मर्दानगी का एहसास हुआ और साथ hi अम्मी के उस क़ातिलाना बदन की छुअन ने मेरे दिल की धड़कें बेकाबू कर दी. मैंने उन लोगों को घूरकर देखा और अम्मी को वाशरूम के दरवाज़े तक ले गया.

जैसे hi अम्मी ने वाशरूम का भारी लोहे का दरवाज़ा खोला, अंदर से आती एक तेज़ और सड़ांध भरी बदबू ने उनका स्वागत किया. सफाई की कमी और फिनाइल की तीखी गंध ने उनके चेहरे पर शिकन ला दी. अम्मी हमेशा से नज़ाकत और सफाई की आदि रही थी, और ट्रैन के उस गंदे टॉयलेट को देखकर उनकी आँखों में घिन और बेबसी साफ़ झलक रही थी.

उन्होंने अपनी नाक पर निघटजोन रखा और अंदर की तंग जगह का मुआयना किया. वहां न तोह कपडे टांगने की कोई साफ़ जगह थी और न hi हुक पर भरोसा किया जा सकता था. वह वापस मुड़ी और मेरी आँखों में झांकते हुए धीरे से फुसफुसाई.

अम्मी: (नाक सिकोड़ते हुए) "उफ़, साहिल... कितनी गन्दी जगह है! यहाँ तोह अपना बैग या कपडे रखना भी मुश्किल है. सब गीला और गन्दा पड़ा है."

मैं: (उनकी परेशानी समझते हुए) "हाँ अम्मी, ट्रैन के टॉयलेट्स ऐसे hi होते हैं. आप जल्दी से बदल लीजिये, मैं बहार hi खड़ा हूँ."

अम्मी: (हिचकिचाते हुए, अपनी नीली सिल्क की निघटजोन मेरी तरफ बढ़ाते हुए) "बीटा, तू ज़रा ये पकड़. मैं अंदर जाकर पहले अपना आबय उतरती हूँ, फिर तू मुझे ये पकड़ा देना. यहाँ कहीं भी रखने की जगह नहीं है, मेरा नया गाउन गन्दा हो जायेगा."

मैंने अम्मी के हाथ से वह नीला रेशमी कपडा थाम लिया. उस सिल्क की छुअन इतनी नरम और चिकनी थी, जैसे अम्मी की अपनी त्वचा. मुझे अच्छी तरह याद था की आज सफर के लिए अम्मी ने आबय के नीचे अपना वह खूबसूरत पीला सूट पहना था. वह सूट काफी तंग था और उसके बाज़ू नहीं the—ek स्लीवलेस फिटिंग वाला कुरता जो उनके बदन से चिपक कर उनके हर चउरवे को उभार देता था.

जैसे hi अम्मी ने दरवाज़ा आधा बंद किया और अंदर की कुण्डी लगायी, मुझे एहसास हुआ की कुछ hi पलों में वह उस भारी काळा आबय को उतार देंगी और उनके उस दूधिया सफ़ेद बदन पर सिर्फ वह तंग पीला कपडा रह जायेगा.

मेरे हाथ में उनका निघटजोन था. अम्मी अंदर थी, और मैं बहार खड़ा उस बंद दरवाज़े के पीछे होने वाली हर सरसराहट को महसूस कर रहा था. मुझे पता था की जब वह हाथ बहार निकलेंगी, तोह उनके नंगे और गोर कंधे उस पीले कपडे के कंट्रास्ट में किसी बिजली की तरह चमकेंगे.

पास खड़े वही आवारा लोग अभी भी तिरछी नज़रों से हमें देख रहे थे, पर मेरा पूरा ध्यान उस दरवाज़े की दरार पर था, जहाँ से अम्मी की गर्माहट और उनकी साँसों की आवाज़ मुझ तक पहुँच रही थी.

ट्रैन ने अचानक एक ज़ोरदार झटका लिया, ठीक उसी पल जब अम्मी ने अपना कला आबय उतारकर दरवाज़े की कुण्डी हलकी सी खोली थी. उनका इरादा बस इतना था की वह एक हाथ बहार निकल कर मुझे आबय पकड़ा दें और मुझसे वह नीली सिल्क की निघटजोन ले लें. लेकिन किस्मत को कुछ और hi मंज़ूर था.

उस झटके से दरवाज़ा अम्मी के हाथ से छूट गया और पूरी तरह पीछे की ओरे खुल गया. अंदर का नज़ारा बिजली की तरह उन आवारा लोगों और मेरी आँखों के सामने कौंध गया.

आबय के बिना, अम्मी उस तंग और स्लीवलेस पीले सूट में किसी जलपरी की तरह लग रही थी. वह कुरता उनके बदन से इस कदर चिपका था की उनके जिस्म का हर utaar-chadhaw नुमाया हो रहा था. उस चटक पीले रंग के साथ उनकी दूधिया सफ़ेद त्वचा का कंट्रास्ट इतनी तीखा था की देखने वाले की आँखें चुंधिया जाएं. उनके गोर, सुडौल और नंगे कंधे रौशनी में संगमरमर की तरह चमक रहे थे.

चूँकि उन्होंने दुपट्टा नहीं लिया था, उनके गर्व से भरे पुष्ट स्तन उस तंग कपडे के नीचे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे. उनकी पतली कमर और वहां से नीचे की ओरे बढ़ते चौंड़े कूल्हों के चउरवे ने एक ऐसी कामुक ले बनायीं थी जिसे देखकर कोई भी अपना आप खो दे. उनके मखमली और गोर हाथ हवा में आधे खुले हुए थे, और उनके चेहरे पर अचानक आयी उस आफत की वजह से गहरी दहशत थी.

वहां खड़े उन रोदय लोगों की आँखों में जैसे हवस का लावा उबाल पड़ा. अम्मी की उस नूरानी और कामुक छवि को अचानक अपने सामने पाकर वे अपनी औकात भूल गए.

उनमें से एक hatta-katta शख्स, जो बीड़ी पी रहा था, आगे बढ़ा और अम्मी के उस बेपर्दा हुस्न को अपनी गन्दी नज़रों से ऊपर से नीचे तक चाटते हुए बड़े भद्दे लहजे में बोलै:

"वह भाई! क्या माल छिपा रखा था काली चादर में... मैडम, akele-akele बड़ी मुश्किल हो रही होगी. कहो तोह अंदर आकर चेंज करने में आपकी थोड़ी मदद कर दें?"

उसके बात सुनकर पीछे खड़े उसके साथियों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और एक ने लम्बी सीटी बजायी. उनकी वह भद्दी हंसी और सीटियां उस खामोश गलियारे में ज़हर की तरह घुल गयी. अम्मी का गोरा चेहरा शर्म और खौफ से एकदम लाल पद गया. वह अपने दोनों हाथों से अपने भरे हुए सीने को ढंकने की कोशिश करने लगी, लेकिन उस छोटे से बाथरूम में उनकी बेबसी साफ़ दिख रही थी.

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कान में गरम तेल दाल दिया हो. मेरी अम्मी, जो मेरी नज़र में पवित्रता की मूरत थी, उनके उस क़ातिलाना और सेक्सी रूप का इस तरह सरेआम मज़ाक उड़ते देख मेरा खून खौल उठा. एक तरफ तोह अम्मी के उस अर्धनग्न और मोहक बदन की छुअन और दृश्य ने मेरे टीनएज दिमाग में एक करंट पैदा कर दिया था, और दूसरी तरफ उन लोगों की ज़ुबान ने मेरी मर्दानगी को ललकारा था.

मेरा खून खौल उठा था. उन बद्तमीज़ों की सीटी और वह भद्दा जुमला मेरे कानों में शीशे की तरह चूब रहा था. मैंने जैसे hi अपनी मुट्ठियां भींची और उन दरिंदों की तरफ एक कदम बढ़ाया, अम्मी ने फुर्ती से अपना गोरा और रेशमी हाथ बहार निकला और मेरी बाजू थाम ली.

अम्मी: (धीमी और कनपटी हुई आवाज़ में) "साहिल... नहीं बीटा! पागल मत बन. तू चुपचाप यहाँ खड़ा रह, बस."

उनकी आँखों में गहरी दहशत थी. उन्होंने जल्दी से अपना कला आबय मेरे हाथों में थमाया और बदले में अपनी नीली सिल्क की निघटजोन मुझसे ले ली. वह इतनी दरी हुई थी की उन्हें होश hi नहीं था की वह किस हाल में सबके सामने कड़ी हैं. जैसे hi वह मुड़ी ताकि वापस उस तंग बाथरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर सकें, उन्होंने अनजाने में उन आवारा लोगों को अपनी खूबसूरती का वह हिस्सा दिखा दिया जिसे अब तक सिर्फ आबय के काळा परदे ने छुपा रखा था.

जैसे hi अम्मी मुड़ी, उस तंग पीले सूट का पिछले हिस्सा पूरी तरह नुमाया हो गया. उस कुर्ते की गर्दन पीछे से बहुत गहरी थी, जो उनकी दूधिया सफ़ेद और चिकनी पीठ को लगभग आधा नंगा कर रही थी. उनकी रीढ़ की हड्डी के पास की वह गहरी ढलान और उस पर चमकता पसीना किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने के लिए काफी था.

लेकिन असली क़यामत तोह नीचे थी. वह पीला सूट उनके सुडौल कूल्हों पर इस कदर चिपका हुआ था की उनकी गांड का हर utaar-chadhaw साफ़ नज़र आ रहा था. चलते वक़्त जब उनके कदम डगमगाए, तोह उनके उन मखमली और पुष्ट नितम्बों में एक ऐसी लचक पैदा हुई जिसे देखकर वहां खड़े उन रोदय लड़कों की आँखें फटी की फटी रह गयी. वह नंगी गोरी पीठ और उसके नीचे उस पीले कपडे में क़ैद वह क़ातिलाना उभार... वह नज़ारा किसी के भी ज़ेहन में आग लगाने के लिए काफी था.

उनमें से एक ने अपनी बीड़ी का धुवां हवा में छोड़ते हुए एक और गन्दी आवाज़ निकली.

"उफ़... पीछे का मंज़र तोह सामने से भी ज़्यादा ज़ालिम है! यार, ऐसी 'जन्नत' तोह मैंने आज तक नहीं देखि."

अम्मी ने हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद किया. मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था की मुझे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी. एक तरफ उन लोगों की बदज़ुबानी पर मेरा गुस्सा और दूसरी तरफ अपनी hi अम्मी के उस बेपनाह सेक्सी और छुपे हुए रूप का साक्षात् darshan—main एक ऐसे भंवर में फँस गया था जहाँ 'पाप' और 'हक़ीक़त' के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही थी.

बाथरूम के अंदर से कपड़ों की सरसराहट की आवाज़ आ रही थी, और मैं बहार खड़ा उनके उस दूधिया बदन और उस गहरी गर्दन वाले पीले सूट की यादों से जूझ रहा था.

माहौल पल भर में तनावपूर्ण से खौफनाक हो गया. उन आवारा लड़कों की टोलियों ने बड़ी चालाकी से घेराबंदी कर ली थी. दो लड़के मेरे dayein-baayein आकर खड़े हो गए, जिससे मैं उनके बीच सैंडविच की तरह फँस गया. उनमें से एक, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और मुंह से बीड़ी की बदबू आ रही थी, उसने बड़े हक़ के साथ अपना हाथ मेरे कंधे पर रख diya—jaise हम पुराने दोस्त हों.

उसने अपना मुंह मेरे कान के बिलकुल करीब लाया और अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा की सिर्फ मैं सुन सकूँ. उसकी आवाज़ में एक नशीली और गन्दी तारीफ घुली हुई थी.

"अबे ो छोटे... सच बता, ये तेरी अम्मी hi हैं? कसम खुदा की, कोई देख ले तोह यकीन न करे. जिस तरह का इनका दूधिया बदन है और वह पीला तंग कुरता, ये तोह 25 की भी नहीं लगती. ऐसी क़यामत चीज़ घर में छुपकर राखी है तूने?"

उसकी बातों ने मेरे ज़ेहन में एक साथ कई भावनाओं का विस्फोट कर diya—ek तरफ अम्मी के उस क़ातिलाना हुस्न का सरेआम ज़िक्र सुनकर मुझे घिन आ रही थी, तोह दूसरी तरफ उनकी सेक्सी इमेज का यह खौफनाक सच मुझे अंदर तक हिला रहा था.

तभी मेरी नज़र गैलरी के दुसरे छोर पर पड़ी. दो और लड़के वहां दीवार से टिक कर खड़े हो गए थे, उन्होंने हमारा रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था. अब न तोह कोई उधर से आ सकता था और न hi हम वहां से भाग सकते थे. नानी अपनी सीट पर सो रही थी और इस खतरे से बिलकुल बेखबर थी.

अचानक मुझे अपनी सुरक्षा की भी उतनी hi फ़िक्र होने लगी जितनी अम्मी की. मैं सिर्फ एक कॉलेज जाने वाला patla-dubla लड़का था, और वे चार hatte-katte रोदय लड़के थे. मुझे समझ आ गया की वे सिर्फ अम्मी के उस मखमली बदन को निहारने नहीं आये थे, उनके इरादे बहुत खतरनाक थे.

बाथरूम के अंदर से अम्मी के कपड़ों की सरसराहट आ रही थी. मुझे एहसास हुआ की जब वह उस नीली सिल्क की निघटजोन में बहार निकलेंगी, तोह वह उन भेड़ियों के लिए और भी आसान शिकार बन जाएँगी. उस रेशमी और पारदर्शी कपडे में उनके भरे हुए सीने और चौंड़े कूल्हों का उभार उन लोगों को और भी पागल कर देगा.

मेरी हथेलियां पसीने से भीग गयी थी. मैं उन दो लड़कों के बीच फंसा हुआ था, और सामने खड़े दो और लड़के मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे, जैसे वे किसी बड़ी वारदात की तयारी में हों. उस बंद और घुटन भरी गैलरी में, अम्मी की सुरक्षा अब पूरी तरह मेरी हिम्मत और समझदारी पर तिकी थी, पर मेरा खुद का दिल खौफ और एक अजीब सी उत्तेजना के बीच बुरी तरह धड़क रहा था.

"देख छोटे, हम बस मैडम से थोड़ी jaan-pehchan करना चाहते हैं, तू बीच में मत आना," कंधे पर हाथ रखे हुए शख्स ने दबाब बढ़ाते हुए कहा.

अम्मी को अब किसी भी पल बहार आना था, और मुझे पता था की उनका वह गोरा हुस्न इन चार भूखे भेड़ियों के सामने तमाशा बनने वाला है. क्या मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त बचा पाउँगा? या उनकी वह क़ातिलाना खूबसूरती हमें किसी बड़ी मुसीबत में झोंक देगी?
 
अध्याय 3

बाथरूम के भीतर से कपड़ों की सरसराहट थमी और कुंडी खुलने की आवाज़ आई। अम्मी ने अपना एक सफेद हाथ बाहर निकाला ताकि मुझसे वह काला अबाया वापस ले सकें और उसे अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन के ऊपर पहन सकें। वह अंदर की गंदगी और बदबू से इतनी परेशान थीं कि जल्द से जल्द बाहर निकलना चाहती थीं।

मगर जैसे ही दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, उन भेड़ियों में से एक अपनी जगह से उछला और दरवाज़े के पास जा पहुँचा।

उस शख्स ने अपनी गंदी नज़रों को अम्मी के उस नीले रेशमी लिबास पर गड़ा दिया, जो उनके बदन से चिपक कर उनके पुष्ट सीने और कूल्हों की नुमाइश कर रहा था। वह बड़े बेशर्म लहजे में मुस्कुराते हुए बोला:

"अरे मैडम, इतनी जल्दी क्या है? अंदर बड़ी घुटन है, आप बाहर ही आ जाइए और आराम से यहीं अपना अबाया पहन लीजिए। हमें भी तो ज़रा कुदरत का यह नूरानी बदन जी भर के देखने दीजिए। हम बस आपको ठीक से देखना चाहते हैं, कोई गुनाह तो नहीं कर रहे!"

अम्मी यह सुनकर सन्न रह गईं। उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। उन्होंने घबराकर दरवाज़ा ज़ोर से बंद करने की कोशिश की, ताकि वह उन वासना से भरी नज़रों से बच सकें।

मगर वह आदमी शातिर था। जैसे ही अम्मी ने पल्ला खींचा, उसने फुर्ती से अपना भारी जूता दरवाज़े की दरार में फँसा दिया। लोहे का दरवाज़ा उसके पैर से टकराकर रुक गया और बंद नहीं हो सका। अम्मी ने अंदर से पूरी ताक़त लगाई, लेकिन उस हट्टे-कट्टे मर्द के पैर के सामने उनकी नर्म बाहें बेबस थीं।

"प्लीज... दरवाज़ा छोड़ो! साहिल! देखो ये क्या कर रहे हैं!" अम्मी की आवाज़ में रोनी सी चीख थी।

साहिल अम्मी की तरफ बढ़ने की कोशिश करने लगा और चिल्लाया, "मेरी अम्मी को छोड़ दो!" उसे पकड़े हुए एक शख्स ने उसके पेट में घूँसा जड़ दिया और बोला, "ज्यादा बहादुर मत बन।"

साहिल दर्द से दोहरा हो गया, लेकिन फिर भी अम्मी की ओर बढ़ने की कोशिश करता रहा। उसे फिर से पेट में एक और घूँसा पड़ा।

उस शख्स ने दरवाज़े पर अपना हाथ टिका दिया और झुककर अंदर झाँकने की कोशिश करने लगा, जहाँ अम्मी उस पारदर्शी नीली सिल्क में अपनी इज़्ज़त बचाने की जद्दोजहद कर रही थीं। उसने बड़े इत्मीनान से कहा:

"अरे मैडम, घबराती क्यों हैं? आप ज़रा बाहर तो आइए। देखिए, आपका लाडला बेटा भी तो यहीं बाहर खड़ा है। हम कोई पराये थोड़े ही हैं, बस आपकी इस कातिलाना खूबसूरती के कायल हो गए हैं।"

"ज़रा ये दरवाज़ा खोलिए, देखिए, आपका बेटा आपको पुकार रहा है, शायद वह भी अपनी अम्मी को देखना चाहता है।"

मैं उन दो लड़कों के बीच जकड़ा हुआ था, मेरे पेट में असहनीय दर्द हो रहा था। मैं दर्द और अपमान के मारे रो रहा था, तभी एक लड़के ने कहा, "अगर तुमने ज़बान खोली तो अंजाम बुरा होगा," और इतना कहते ही उसने एक रामपुरी चाकू निकाला और मेरी गर्दन पर टिका दिया।

मेरी आँखों के सामने मेरी अम्मी, जो मेरी दुनिया थीं, उस तंग नाइटगाउन में कांप रही थीं। उनके मखमली और भरे हुए अंगों का उभार उस नीले कपड़े के नीचे साफ़ झलक रहा था, जिसे वे दरिंदे अपनी नज़रों से नोच रहे थे।

मुझे अपनी सुरक्षा का भी डर था, पर अम्मी की वह बेबसी देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था। वह दरवाज़ा अब खुला हुआ था, और उन लोगों की पहुँच और अम्मी के दूधिया बदन के बीच अब सिर्फ चंद इंच का फासला बचा था।

"छोड़ दो उन्हें... प्लीज," मेरे मुँह से बस एक कमज़ोर सी आवाज़ निकली, जिसे उन लोगों ने एक ज़ोरदार ठहाके के साथ उड़ा दिया।

अम्मी की आँखें मुझसे मदद मांग रही थीं, और मैं अपनी ही अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को सरेआम नीलाम होते देख रहा था।

जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा बंद करने की आखिरी कोशिश की, उस शख्स ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी।

उसने झटके से अम्मी का वह गोरा और नर्म हाथ पकड़ा और उन्हें बाहर की तरफ खींच लिया। वह ज़ोर इतना ज़बरदस्त था कि अम्मी खुद को संभाल नहीं पाईं और सीधे उस दरिंदे की बाहों में जा गिरीं।

वह आदमी करीब 5 फीट 8 इंच का था, जिसका रंग गहरा सांवला और बदन गठा हुआ था। उसने सिर्फ एक काली बनियान और ट्राउजर पहन रखा था, जिससे उसकी पसीने से तरबतर बाहें और चौड़ा सीना साफ़ दिख रहा था। जब अम्मी का दूधिया सफेद और कोमल बदन उस काले बनियान वाले शख्स के सीने से टकराया, तो वह नज़ारा किसी भी देखने वाले की धड़कन रोक देने के लिए काफी था।

अम्मी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में उसके हाथों में कैद थीं। झटके की वजह से उनका संतुलन बिगड़ गया था और उनके भरे हुए सीने का उभार उस आदमी की सख्त छाती से ज़ोर से सट गया था। सिल्क का वह पतला कपड़ा उन दोनों के जिस्म की गर्मी को एक-दूसरे तक पहुँचा रहा था। अम्मी का वह नूरानी और सेक्सी रूप उस सांवले शख्स की गिरफ्त में और भी ज़्यादा नाजुक और कीमती लग रहा था।

उस शख्स ने अपनी मज़बूत बाहें अम्मी की पतली कमर के गिर्द लपेट लीं, उसकी उंगलियाँ उस नीले रेशम के ऊपर से अम्मी की मखमली त्वचा को महसूस कर रही थीं।

"उफ़... मैडम, आप तो वाकई रुई की तरह नर्म हैं। इतनी जल्दी क्या थी अंदर भागने की? देखिए, अब तो आप खुद ही हमारी बाहों में आ गईं।"

उसने अम्मी के गोरे और नंगे कंधों के पास झुककर एक गहरी साँस ली, जैसे वह उनके बदन की खुशबू को अपने अंदर उतार लेना चाहता हो। अम्मी की आँखें दहशत से फटी रह गई थीं, उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे और वह अपनी जान बचाने के लिए उस शख्स के सीने पर अपने दोनों गोरे हाथ रखकर उसे पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी को एक अजनबी, गंदे आदमी की बाहों में इस तरह अर्धनग्न और बेबस हालत में। उन दो लड़कों ने मुझे अभी भी जकड़ रखा था। मेरे अंदर एक तरफ तो अम्मी को बचाने का पागलपन सवार था, और दूसरी तरफ उनके उस कातिलाना और कामुक बदन की यह नुमाइश मुझे सुन्न कर रही थी।

अम्मी की वह नीली नाइटगाउन उनके सुडौल कूल्हों पर थोड़ी ऊपर चढ़ गई थी, जिससे उनके गोरे पैरों की सफेदी उस अंधेरी गैलरी में चमक रही थी।

वह शख्स अब धीरे-धीरे अपना हाथ उनके कूल्हों की तरफ नीचे ले जा रहा था, और उसके साथियों की गंदी हँसी पूरे डिब्बे में गूँज रही थी।

"साहिल! बचा मुझे... साहिल!" अम्मी की वह बेबस पुकार सीधे मेरे कलेजे को चीर गई। पर फिर अम्मी की निगाह मेरी तरफ गई और उन्होंने देखा कि मेरी गर्दन पर एक रामपुरी चाकू टिका हुआ है। फिर वह अपनी हालत भूल गईं और गिड़गिड़ाते हुए बोलीं, "मेरे बेटे को छोड़ दो, मैं आपकी हर बात मानूँगी।"

वहाँ कोई नहीं था जो हमारी मदद कर सके। नानी सो रही थीं, और रास्ता उन रऊडी लड़कों ने ब्लॉक कर रखा था। मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त को उन गंदे हाथों में बिखरते देख रहा था।

उस सांवले, काली बनियान वाले शख्स की गिरफ्त अम्मी की मखमली कमर पर और मज़बूत हो गई। अम्मी खौफ के मारे पत्थर बन चुकी थीं, उनकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं और साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं, जिससे उनकी नीली सिल्क की नाइटगाउन उनके भरे हुए सीने पर ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रही थी।

उस सांवले शख्स ने कहा, "वह तो तुम मानोगी ही मेरी जान।"

उस शख्स ने अपनी नज़रों को अम्मी की लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिकाया, जहाँ पसीने की एक नन्हीं बूंद चमक रही थी। उसने अपना गंदा मुँह झुकाया और अपनी जीभ अम्मी की उस सफेद गर्दन पर फेर दी।

वह शख्स: (हवस भरी आवाज़ में चाटते हुए) "उफ़... कितनी मीठी है तू! कसम से, चीनी जैसी सफेदी और शहद जैसी मिठास।"

अम्मी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें ज़ोर से बंद कर लीं और उनके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। वह घिनौना स्पर्श उनके नर्म त्वचा पर किसी ज़हर की तरह लग रहा था।

वह शख्स: "डर मत जान... हम कुछ नहीं करेंगे। हम बस तुझे अच्छी तरह से देखना चाहते हैं। इतना कातिलाना हुस्न खुदा ने सिर्फ पर्दों में छुपाने के लिए थोड़े ही बनाया है।"

यह कहते हुए, उसने अम्मी को झटके से ट्रेन के टॉयलेट वाले कॉरिडोर के बीच में धकेल दिया, जहाँ रोशनी थोड़ी ज़्यादा थी। उसने अम्मी को बीच में खड़ा कर दिया ताकि वह एक तमाशा बन जाएँ। अब घेराबंदी ऐसी थी कि अम्मी का नूरानी बदन हर तरफ से देखा जा सकता था।

सामने का मंज़र: दो लड़के अम्मी के ठीक सामने खड़े थे, उनकी भूखी नज़रें अम्मी के नीले रेशमी गाउन के नीचे छिपे उनके पुष्ट स्तनों और उनके मखमली पेट के उभारों को ताक रही थीं। अम्मी ने अपने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए थे, मगर वह रेशमी कपड़ा इतना पतला था कि उनकी बेबसी छिप नहीं पा रही थी।

पीछे का मंज़र: बाकी के दो लड़के (जिन्होंने मुझे पकड़ रखा था) अम्मी की पीठ की तरफ थे। उन्हें अम्मी की वह नंगी गोरी पीठ और उस तंग नाइटगाउन में कैद उनके सुडौल कूल्हों का पूरा नज़ारा मिल रहा था।

मैं अपनी अम्मी को इस तरह चार दरिंदों के बीच एक खिलौने की तरह नुमाइश बनते देख रहा था। मेरे कंधे पर रखा वह हाथ अब और नीचे सरक रहा था, जैसे वह मुझे डरा रहा हो। अम्मी उस नीली सिल्क में किसी अप्सरा जैसी लग रही थीं, पर उनकी आँखों में जो बेबसी थी, उसने मेरा कलेजा छलनी कर दिया था।

उन लड़कों की गंदी फुसफुसाहट और उनकी सीटियाँ उस बंद गलियारे में गूँज रही थीं। वे अम्मी के बदन के एक-एक हिस्से पर गंदे कमेंट्स कर रहे थे।

"देख भाई, क्या सुडौल बनावट है... पीछे से तो एकदम कयामत लग रही है!" एक ने अम्मी के कूल्हों की तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने न चाहते हुए भी उस तरफ देखा, अम्मी की नाइटी उनके कूल्हों से चिपकी हुई थी और उनके उभारों को साफ़ बयां कर रही थी। मेरे साथ वाला लड़का बोला, "क्या मस्त गांड है, आज तो मारने का मज़ा आ जाएगा।"

अम्मी रो रही थीं, उनका चेहरा लाल पड़ गया था और वह बस दीवार से सटकर खुद को छोटा करने की कोशिश कर रही थीं। पर वह तंग नाइटगाउन उनके हर कामुक कर्व को धोखेबाज़ की तरह ज़माने के सामने पेश कर रहा था। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था, बस अपनी ही अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को इन भेड़ियों की नज़रों से नीलाम होते देख रहा था।

उस काली बनियान वाले शख्स ने अम्मी की पतली कमर पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली, उसकी उंगलियाँ नीले सिल्क के कपड़े को मरोड़ते हुए अम्मी के नर्म त्वचा में धंस रही थीं।

उसने अम्मी के कान के पास झुककर अपनी भारी और घिनौनी आवाज़ में आदेश दिया:

"चल अब धीरे से घूम जा... ताकि सबको अच्छे से तू नज़र आ सके। आगे का नज़ारा तो देख लिया, अब ज़रा पीछे की वह कातिलाना ढलान भी दिखा दे सबको।"

अम्मी पत्थर की मूरत बन गई थीं। उनकी आँखों से आँसू बहकर उनके दूधिया गालों पर लुढ़क रहे थे। उन्होंने इनकार में धीरे से सिर हिलाया, उनकी रूह कांप रही थी। पर उस काली बनियान वाले दरिंदे को 'ना' सुनने की आदत नहीं थी।

उसने अम्मी को कंधे से पकड़ा और ज़ोर का झटका देकर उन्हें गोल घुमा दिया। अम्मी की नीली सिल्क की नाइटगाउन हवा में एक लहर की तरह लहराई, जिससे उनके गोरे और सुडौल पैरों की सफेदी घुटनों तक नुमाया हो गई।

अब अम्मी की पीठ उस काली बनियान वाले शख्स की तरफ थी, और उनके शरीर का पिछला हिस्सा पूरी तरह उसके सामने था। उस डीप नेक नाइटगाउन में अम्मी की नंगी सफेद पीठ किसी संगमरमर की सिल्ली की तरह चमक रही थी। रीढ़ की हड्डी के पास जो पसीने की चमक थी, वह रोशनी में किसी हीरे जैसी लग रही थी। मगर उस भेड़िये की नज़रें तो नीचे टिकी थीं, जहाँ वह रेशमी कपड़ा अम्मी के पुष्ट कूल्हों पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म की हर लचक साफ़ दिखाई दे रही थी।

इस घुमाव के कारण, अम्मी का सामने का पूरा हिस्सा अब मेरी और मेरे साथ खड़े उन दो रऊडी लड़कों की तरफ हो गया था। उस तंग और झीने नीले रेशमी कपड़े के नीचे अम्मी के रसीले और भरे हुए मम्मे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। वे कयामत ढा रहे थे। उन दोनों लड़कों की आँखें हवस से फैल गईं और वे अम्मी के उस बेपनाह और कामुक हुस्न को एक-टक निहारने लगे। अम्मी ने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने दूधिया हाथों से अपने सीने को ढंकने की नाकाम कोशिश करने लगीं, पर उनकी बेबसी उस पारदर्शी कपड़े के आर-पार साफ़ झलक रही थी।

अम्मी ने शर्म के मारे अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया था, पर उनका वह कातिलाना बदन अब सबके लिए एक खुली किताब बन चुका था।

एक लड़का: (सीटी बजाते हुए) "वाह भाई! क्या गज़ब की बनावट है। कसम से, ऐसी सुडौल गाँड तो मैंने आज तक नहीं देखी। ये पीला सूट उतारकर इस नीले रेशम में तो मैडम एकदम परी लग रही हैं।"

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी को एक बाज़ारू चीज़ की तरह गोल-गोल घूमते हुए। मेरा दिल चीख रहा था, पर उन दो लड़कों ने मुझे अपनी गिरफ्त में इस कदर जकड़ रखा था कि मैं हिल भी नहीं पा रहा था। एक तरफ अम्मी की वह बेबसी और दूसरी तरफ उनके उस सेक्सी और कामुक रूप की यह नुमाइश मेरे किशोर मन में एक ऐसा तूफ़ान खड़ा कर रही थी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था।

वह सांवला शख्स अब अम्मी की पीठ पर अपनी उंगलियाँ फेर रहा था, जैसे वह उस दूधिया सफेदी का अंदाज़ा लगा रहा हो। अम्मी की सिसकियाँ तेज़ हो गई थीं, और वह उस तंग बाथरूम के दरवाज़े की चौखट को अपनी मखमली उंगलियों से ज़ोर से पकड़े हुए थीं, जैसे वही उनका आखिरी सहारा हो।

वही काली बनियान वाला सांवला शख्स, अम्मी के मखमली और पुष्ट बदन को अपनी गिरफ्त में लिए हुए एक शैतानी मुस्कान के साथ खड़ा था। फिर उसने अम्मी के कूल्हों पर धक्का मारा, अम्मी की आँखें डर से फैल गईं क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि उन्होंने अभी अपनी गांड के बीच क्या महसूस किया है।

उनके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली, "नहीं!"

तभी मुझे जकड़े हुए उस राजू नाम के लड़के ने अपनी लार टपकाते हुए सलीम की तरफ देखकर आवाज़ लगाई।

राजू: "ओ सलीम भाई! ज़रा इसके हाथ तो ऊपर करवाओ। इस हूर की परी ने अपने मर्मरी हाथों से अपने रसीले मम्मे ढंक रखे हैं। बाहर से उभार तो दिख रहा है, पर ढंग से दीदार नहीं हो पा रहा। ज़रा पर्दा तो हटाओ!"

राजू की बात सुनकर सलीम ज़ोर से ठहाका मारकर हँसा, उसकी गंदी हँसी उस तंग गलियारे में ज़हर की तरह गूँजी। उसने अम्मी के गोरे और कांपते हुए कन्धों पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली।

सलीम: (कमीनी मुस्कान के साथ) "अच्छा! तो हमारे राजू भाई को मम्मे देखने हैं? क्यों बे, क्या अभी से दूध पीने का मन कर रहा है क्या? बड़े रसीले और भरे हुए लग रहे हैं न इस नीली सिल्क के नीचे?"

सलीम ने फिर मेरी तरफ एक हिकारत भरी नज़र डाली, जैसे वह मुझे नीचा दिखाना चाहता हो।

सलीम: "क्यों छोटे? तूने तो अपनी अम्मी का दूध पिया ही होगा यहाँ से? अब ज़रा अपने भाईयों को भी तो देखने दे कि कुदरत ने इन्हें कितना सुडौल और भारी बनाया है!"

अम्मी यह सुनकर शर्म और ज़िल्लत से जैसे ज़मीन में गड़ गईं। उनके दूधिया गाल खौफ और अपमान से लाल पड़ गए थे। उन्होंने अपने दोनों हाथों को अपने भरे हुए सीने पर और भी ज़ोर से भींच लिया, जिससे उनकी नीली सिल्क की नाइटगाउन उनके उरोजों की गोलाई पर और भी ज़्यादा तन गई।

सलीम ने अम्मी के दोनों हाथों को झटके से उनके सिर के ऊपर उठा दिया। इस हरकत ने अम्मी के नीले रेशमी लिबास को उनके जिस्म पर और भी ज़्यादा तान दिया। हाथ ऊपर होने की वजह से उनका भरा हुआ सीना और भी बाहर की तरफ उभर आया, जैसे वह उस पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब हो।

उस नीली सिल्क के पारदर्शी खिंचाव के नीचे अम्मी के कठोर और उभरे हुए निप्पल्स साफ़ नज़र आने लगे, जो डर और ठंड की वजह से और भी नुमाया हो गए थे।

अम्मी का वह रसीला और पुष्ट उभार अब सीधे मेरी और उस राजू की नज़रों के सामने था। राजू की आँखों में हवस की चमक बढ़ गई और वह अम्मी के उन मखमली मम्मों को अपनी गंदी नज़रों से टटोलने लगा। अम्मी की आँखें शर्म के मारे बंद थीं, और उनका गोरा चेहरा ऊपर की तरफ खिंच गया था, जिससे उनकी सुराहीदार गर्दन और भी लंबी और दिलकश लग रही थी।

सलीम, जो अम्मी के पीछे खड़ा था, उनकी उन नंगी कलाइयों को ऊपर थामे हुए था। अम्मी की वह नंगी सफेद पीठ उस डीप नेक नाइटगाउन में पूरी तरह बेपर्दा थी। सलीम ने अपनी हवस भरी निगाहें उस संगमरमर जैसी पीठ पर गड़ाईं और अपना गंदा मुँह नीचे झुकाया।

सलीम ने अपनी जीभ अम्मी की उस दूधिया सफेद और चिकनी पीठ पर फेर दी। उसने उनकी रीढ़ की हड्डी के पास चमकते पसीने को चाटते हुए एक गहरी आवाज़ निकाली।

सलीम: "उफ़... खुदा की कसम! कितनी चिकनी और गरम पीठ है तेरी। मन करता है बस यहीं पिघल जाऊँ।"

अम्मी के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी। वह अपने हाथ छुड़ाने के लिए छटपटाईं, जिससे उनके उभरे हुए सीने की हरकत और भी तेज़ हो गई और उस नीले रेशम के नीचे उनके मखमली अंगों की लचक ने राजू और उसके साथी को पागल कर दिया।

राजू: (लार टपकाते हुए) "भाई! क्या गज़ब की चीज़ है। इसके मम्मे तो एकदम कयामत हैं। देख तो सही कैसे ऊपर-नीचे हो रहे हैं!"

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी के उस बेपनाह और सेक्सी बदन को इस तरह सरेआम नीलाम होते हुए। उनके उठे हुए निप्पल्स और वह नंगी गोरी पीठ... वह नज़ारा किसी भी मर्द के होश उड़ा देने के लिए काफी था, पर एक बेटे के तौर पर मेरी रूह इस ज़िल्लत से छलनी हो रही थी। अम्मी बस बेबसी में अपना सिर हिला रही थीं, और उनकी सिसकियाँ उस खौफनाक रात की खामोशी को चीर रही थीं।

उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ को समेटा और कांपते हुए लबों से विनती की।

अम्मी: (रुँधे हुए गले से) "खुदा के वास्ते... अब तो जाने दो। देख लिया न तुमने... अब बस करो, हमें अपनी सीट पर जाने दो।"

उनकी आवाज़ में इतनी बेबसी थी कि कोई पत्थर दिल भी पिघल जाए, मगर उन भेड़ियों पर हवस का भूत सवार था। सलीम एक बार फिर अम्मी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अम्मी की आँखों में आँखें डालीं और बड़े इत्मीनान से अपना काला हाथ उठाया।

उसने अपनी उंगलियाँ अम्मी के उन गुलाबी और कांपते हुए होंठों पर रख दीं।

सलीम: (फुसफुसाते हुए) "अभी कहाँ जान... अभी तो पार्टी शुरू हुई है। ज़रा ठहरो तो सही, इतनी जल्दी भी क्या है?"

उसकी उंगलियाँ अम्मी के मखमली लबों पर रेंग रही थीं। अम्मी ने खौफ के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं, और उनके गोरे गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गई।

सलीम: "बस थोड़ा सा टच करने दो... कसम से, अपनी इन आँखों पर यकीन नहीं होता कि खुदा ने किसी को इतना दूधिया और बेदाग गोरा भी बनाया होगा। मन करता है बस इस सफेदी को चख लूँ।"

यह कहते हुए उसने अपना दूसरा हाथ अम्मी के नंगे और सुडौल कंधे पर रख दिया। वह हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगा, उस नीली सिल्क की नाइटगाउन के कॉलर की तरफ, जहाँ से अम्मी के भरे हुए सीने की गहरी ढलान शुरू होती थी।

अम्मी का पूरा बदन थर-थर कांप रहा था। उनका वह कातिलाना बदन उस तंग नीले लिबास में हर धड़कन के साथ उभरकर सामने आ रहा था।

बाकी लड़के: (पीछे से देखते हुए) "हाँ भाई, ज़रा देख तो सही... ये रंग असली है या कोई जादू है! ऐसी मखमली काया तो सिर्फ ख्वाबों में होती है।"

मैं अपनी अम्मी को इस तरह नीलाम होते देख रहा था। मेरे कंधे पर रखा हाथ अब मुझे और ज़ोर से भींच रहा था।

मेरी नज़रें अम्मी के उस उभरे हुए सीने और सलीम के काले हाथों पर टिकी थीं। एक तरफ अम्मी की इज़्ज़त का सवाल था, और दूसरी तरफ उनकी वह बेपनाह और सेक्सी खूबसूरती जो इस वक्त पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा थी।
 
अध्याय 3

बाथरूम के भीतर से कपड़ों की सरसराहट थमी और कुण्डी खुलने की आवाज़ आयी. अम्मी ने अपना एक सफ़ेद हाथ बहार निकला ताकि मुझसे वह कला आबय वापस ले सकें और उसे अपनी नीली सिल्क की निघटजोन के ऊपर पहन सकें. वह अंदर की गन्दगी और बदबू से इतनी परेशां थीं की जल्द से जल्द बहार निकलना चाहती थीं.

मगर जैसे hi दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, उन भेड़ियों में से एक अपनी जगह से उछला और दरवाज़े के पास जा पहुंचा.

उस शख्स ने अपनी गन्दी नज़रों को अम्मी के उस नीले रेशमी लिबास पर गदा दिया, जो उनके बदन से चिपक कर उनके पुष्ट सीने और कूल्हों की नुमाइश कर रहा था. वह बड़े बेशर्म लहजे में मुस्कुराते हुए बोलै:

"अरे मैडम, इतनी जल्दी क्या है? अंदर बड़ी घुटन है, आप बहार hi आ जाइये और आराम से यहीं अपना आबय पहन लीजिये. हमें भी तोह ज़रा कुदरत का यह नूरानी बदन जी भर के देखने दीजिये. हम बस आपको ठीक से देखना चाहते हैं, कोई गुनाह तोह नहीं कर रहे!"

अम्मी यह सुनकर सन्न रह गयीं. उनके चेहरे का रंग सफ़ेद पद गया. उन्होंने घबराकर दरवाज़ा ज़ोर से बंद करने की कोशिश की, ताकि वह उन वासना से भरी नज़रों से बच सकें.

मगर वह आदमी शातिर था. जैसे hi अम्मी ने पल्ला खींचा, उसने फुर्ती से अपना भारी जूता दरवाज़े की दरार में फंसा दिया. लोहे का दरवाज़ा उसके पेअर से टकराकर रुक गया और बंद नहीं हो सका. अम्मी ने अंदर से पूरी ताक़त लगायी, लेकिन उस hatte-katte मर्द के पेअर के सामने उनकी नरम बाहें बेबस थीं.

"प्लीज... दरवाज़ा छोडो! साहिल! देखो ये क्या कर रहे हैं!" अम्मी की आवाज़ में रोनी सी चीख थी.

साहिल अम्मी की तरफ बढ़ने की कोशिश करने लगा और चिल्लाया, "मेरी अम्मी को छोड़ दो!" उसे पकडे हुए एक शख्स ने उसके पेट में घूँसा जड़ दिया और बोलै, "ज़्यादा बहादुर मत बन."

साहिल दर्द से दोहरा हो गया, लेकिन फिर भी अम्मी की ओरे बढ़ने की कोशिश करता रहा. उसे फिर से पेट में एक और घूँसा पड़ा.

उस शख्स ने दरवाज़े पर अपना हाथ टिका दिया और झुककर अंदर झाँकने की कोशिश करने लगा, जहाँ अम्मी उस पारदर्शी नीली सिल्क में अपनी इज़्ज़त बचने की जद्दोजहद कर रही थीं. उसने बड़े इत्मीनान से कहा:

"अरे मैडम, घबराती क्यों हैं? आप ज़रा बहार तोह आइये. देखिये, आपका लाडला बीटा भी तोह यहीं बहार खड़ा है. हम कोई पराये थोड़े hi हैं, बस आपकी इस कातिलाना ख़ूबसूरती के कायल हो गए हैं."

"ज़रा ये दरवाज़ा खोलिये, देखिये, आपका बीटा आपको पुकार रहा है, शायद वह भी अपनी अम्मी को देखना चाहता है."

में उन दो लड़कों के बीच जकड़ा हुआ था, मेरे पेट में असहनीय दर्द हो रहा था. में दर्द और अपमान के मारे रो रहा था, तभी एक लड़के ने कहा, "अगर तुमने ज़बान खोली तोह अंजाम बुरा होगा," और इतना कहते hi उसने एक रामपुरी चाकू निकला और मेरी गर्दन पर टिका दिया.

मेरी आँखों के सामने मेरी अम्मी, जो मेरी दुनिया थीं, उस तंग निघटजोन में काँप रही थीं. उनके मखमली और भरे हुए अंगों का उभार उस नीले कपडे के नीचे साफ़ झलक रहा था, जिसे वे दरिंदे अपनी नज़रों से नोच रहे थे.

मुझे अपनी सुरक्षा का भी डर था, पर अम्मी की वह बेबसी देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था. वह दरवाज़ा अब खुला हुआ था, और उन लोगों की पहुँच और अम्मी के दूधिया बदन के बीच अब सिर्फ चाँद इंच का फैसला बचा था.

"छोड़ दो उन्हें... प्लीज," मेरे मुंह से बस एक कमज़ोर सी आवाज़ निकली, जिसे उन लोगों ने एक ज़ोरदार ठहाके के साथ उदा दिया.

अम्मी की आँखें मुझसे मदद मांग रही थीं, और में अपनी hi अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को सरेआम नीलाम होते देख रहा था.

जैसे hi अम्मी ने दरवाज़ा बंद करने की आखिरी कोशिश की, उस शख्स ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी.

उसने झटके से अम्मी का वह गोरा और नरम हाथ पकड़ा और उन्हें बहार की तरफ खींच लिया. वह ज़ोर इतना ज़बरदस्त था की अम्मी खुद को संभल नहीं पायीं और सीधे उस दरिंदे की बाहों में जा गिरीं.

वह आदमी करीब 5 फ़ीट 8 इंच का था, जिसका रंग गहरा सांवला और बदन गाथा हुआ था. उसने सिर्फ एक काली बनियान और ट्रॉउज़र पहन रखा था, जिससे उसकी पसीने से तरबतर बाहें और चौड़ा सीना साफ़ दिख रहा था. जब अम्मी का दूधिया सफ़ेद और कोमल बदन उस काले बनियान वाले शख्स के सीने से टकराया, तोह वह नज़ारा किसी भी देखने वाले की धड़कन रोक देने के लिए काफी था.

अम्मी उस नीली सिल्क की निघटजोन में उसके हाथों में क़ैद थीं. झटके की वजह से उनका संतुलन बिगड़ गया था और उनके भरे हुए सीने का उभार उस आदमी की सख्त छाती से ज़ोर से सात गया था. सिल्क का वह पतला कपडा उन दोनों के जिस्म की गर्मी को ek-dusre तक पहुंचा रहा था. अम्मी का वह नूरानी और सेक्सी रूप उस सांवले शख्स की गिरफ्त में और भी ज़्यादा नाज़ुक और कीमती लग रहा था.

उस शख्स ने अपनी मज़बूत बाहें अम्मी की पतली कमर के गिर्द लपेट लीन, उसकी उँगलियाँ उस नीले रेशम के ऊपर से अम्मी की मखमली त्वचा को महसूस कर रही थीं.

"उफ़... मैडम, आप तोह वाक़ई रुई की तरह नरम हैं. इतनी जल्दी क्या थी अंदर भागने की? देखिये, अब तोह आप खुद hi हमारी बाहों में आ गयीं."

उसने अम्मी के गोर और नंगे कन्धों के पास झुककर एक गहरी सांस ली, जैसे वह उनके बदन की खुशबु को अपने अंदर उतार लेना चाहता हो. अम्मी की आँखें दहशत से फटी रह गयी थीं, उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे और वह अपनी जान बचने के लिए उस शख्स के सीने पर अपने दोनों गोर हाथ रखकर उसे पीछे ढलने की नाकाम कोशिश कर रही थीं.

में यह सब देख रहा tha—apni अम्मी को एक अजनबी, गंदे आदमी की बाहों में इस तरह अर्धनग्न और बेबस हालत में. उन दो लड़कों ने मुझे अभी भी जकड रखा था. मेरे अंदर एक तरफ तोह अम्मी को बचने का पागलपन सवार था, और दूसरी तरफ उनके उस कातिलाना और कामुक बदन की यह नुमाइश मुझे सुन्न कर रही थी.

अम्मी की वह नीली निघटजोन उनके सुडौल कूल्हों पर थोड़ी ऊपर चढ़ गयी थी, जिससे उनके गोर पैरों की सफेदी उस अँधेरी गैलरी में चमक रही थी.

वह शख्स अब dheere-dheere अपना हाथ उनके कूल्हों की तरफ नीचे ले जा रहा था, और उसके साथियों की गन्दी हंसी पूरे डिब्बे में गूँज रही थी.

"साहिल! बचा मुझे... साहिल!" अम्मी की वह बेबस पुकार सीधे मेरे कलेजे को चीयर गयी. पर फिर अम्मी की निगाह मेरी तरफ गयी और उन्होंने देखा की मेरी गर्दन पर एक रामपुरी चाकू टिका हुआ है. फिर वह अपनी हालत भूल गयीं और गिड़गिड़ाते हुए बोलीं, "मेरे बेटे को छोड़ दो, में आपकी हर बात मानूंगी."

वहां कोई नहीं था जो हमारी मदद कर सके. नानी सो रही थीं, और रास्ता उन रोदय लड़कों ने ब्लॉक कर रखा था. में अपनी अम्मी की इज़्ज़त को उन गंदे हाथों में बिखरता देख रहा था.

उस सांवले, काली बनियान वाले शख्स की गिरफ्त अम्मी की मखमली कमर पर और मज़बूत हो गयी. अम्मी खौफ के मारे पत्थर बन चुकी थीं, उनकी आँखें फटी की फटी रह गयी थीं और सांसें tez-tez चल रही थीं, जिससे उनकी नीली सिल्क की निघटजोन उनके भरे हुए सीने पर zor-zor से upar-neeche हो रही थी.

उस सांवले शख्स ने कहा, "वह तोह तुम मानोगी hi मेरी जान."

उस शख्स ने अपनी नज़रों को अम्मी की लम्बी सुराहीदार गर्दन पर टिकाया, जहाँ पसीने की एक नन्ही बूँद चमक रही थी. उसने अपना गन्दा मुंह झुकाया और अपनी जीभ अम्मी की उस सफ़ेद गर्दन पर फेर दी.

वह शख्स: (हवस भरी आवाज़ में चाटते हुए) "उफ़... कितनी मीठी है तू! कसम से, चीनी जैसी सफेदी और शहद जैसी मिठास."

अम्मी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गयी. उन्होंने अपनी आँखें ज़ोर से बंद कर लीन और उनके मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली. वह घिनौना स्पर्श उनकी नरम त्वचा पर किसी ज़हर की तरह लग रहा था.

वह शख्स: "डर मत जान... हम कुछ नहीं करेंगे. हम बस तुझे अच्छी तरह से देखना चाहते हैं. इतना कातिलाना हुस्न खुदा ने सिर्फ पार्डन में छुपाने के लिए थोड़े hi बनाया है."

यह कहते हुए, उसने अम्मी को झटके से ट्रैन के टॉयलेट वाले कॉरिडोर के बीच में ढेल दिया, जहाँ रौशनी थोड़ी ज़्यादा थी. उसने अम्मी को बीच में खड़ा कर दिया ताकि वह एक तमाशा बन जाएं. अब घेराबंदी ऐसी थी की अम्मी का नूरानी बदन हर तरफ से देखा जा सकता था.

सामने का मंज़र: दो लड़के अम्मी के ठीक सामने खड़े थे, उनकी भूकी नज़रें अम्मी के नीले रेशमी गाउन के नीचे छिपे उनके पुष्ट स्तनों और उनके मखमली पेट के उभारों को टाक रही थीं. अम्मी ने अपने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए थे, मगर वह रेशमी कपडा इतना पतला था की उनकी बेबसी छिप नहीं प् रही थी.

पीछे का मंज़र: बाकी के दो लड़के (जिन्होंने मुझे पकड़ रखा था) अम्मी की पीठ की तरफ थे. उन्हें अम्मी की वह नंगी गोरी पीठ और उस तंग निघटजोन में क़ैद उनके सुडौल कूल्हों का पूरा नज़ारा मिल रहा था.

में अपनी अम्मी को इस तरह चार दरिंदों के बीच एक खिलौने की तरह नुमाइश बनते देख रहा था. मेरे कंधे पर रखा वह हाथ अब और नीचे सरक रहा था, जैसे वह मुझे डरा रहा हो. अम्मी उस नीली सिल्क में किसी अप्सरा जैसी लग रही थीं, पर उनकी आँखों में जो बेबसी थी, उसने मेरा कलेजा छलनी कर दिया था.

उन लड़कों की गन्दी फुसफुसाहट और उनकी सीटियां उस बंद गलियारे में गूँज रही थीं. वे अम्मी के बदन के ek-ek हिस्से पर गंदे कमैंट्स कर रहे थे.

"देख भाई, क्या सुडौल बनावट है... पीछे से तोह एकदम क़यामत लग रही है!" एक ने अम्मी के कूल्हों की तरफ इशारा करते हुए कहा. में ने न चाहते हुए भी उस तरफ देखा, अम्मी की निघ्त्य उनके कूल्हों से चिपकी हुई थी और उनके उभारों को साफ़ बयां कर रही थी. मेरे साथ वाला लड़का बोलै, "क्या मस्त गांड है, आज तोह मारने का मज़ा आ जायेगा."

अम्मी रो रही थीं, उनका चेहरे लाल पद गया था और वह बस दीवार से सत्कार खुद को छोटा करने की कोशिश कर रही थीं. पर वह तंग निघटजोन उनके हर कामुक चउरवे को धोकेबाज़ की तरह ज़माने के सामने पेश कर रहा था. में चाहकर भी कुछ नहीं कर प् रहा था, बस अपनी hi अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को इन भेड़ियों की नज़रों से नीलाम होते देख रहा था.

उस काली बनियान वाले शख्स ने अम्मी की पतली कमर पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली, उसकी उँगलियाँ नीले सिल्क के कपडे को मरोड़ते हुए अम्मी के नरम त्वचा में धंस रही थीं.

उसने अम्मी के कान के पास झुककर अपनी भारी और घिनौनी आवाज़ में आदेश दिया:

"चल अब धीरे से घूम जा... ताकि सबको अच्छे से तू नज़र आ सके. आगे का नज़ारा तोह देख लिया, अब ज़रा पीछे की वह कातिलाना ढलान भी दिखा दे सबको."

अम्मी पत्थर की मूरत बन गयी थीं. उनकी आँखों से आंसू बहकर उनके दूधिया गालों पर लुढ़क रहे थे. उन्होंने इंकार में धीरे से सर हिलाया, उनकी रूह काँप रही थी. पर उस काली बनियान वाले दरिंदे को 'न' सुनने की आदत नहीं थी.

उसने अम्मी को कंधे से पकड़ा और ज़ोर का झटका देकर उन्हें गोल घुमा दिया. अम्मी की नीली सिल्क की निघटजोन हवा में एक लहार की तरह लहराई, जिससे उनके गोर और सुडौल पैरों की सफेदी घुटनों तक नुमाया हो गयी.

अब अम्मी की पीठ उस काली बनियान वाले शख्स की तरफ थी, और उनके शरीर का पिछले हिस्सा पूरी तरह उसके सामने था. उस डीप नैक निघटजोन में अम्मी की नंगी सफ़ेद पीठ किसी संगमरमर की सिल्ली की तरह चमक रही थी. रीढ़ की हड्डी के पास जो पसीने की चमक थी, वह रौशनी में किसी हीरे जैसी लग रही थी. मगर उस भेड़िये की नज़रें तोह नीचे तिकी थीं, जहाँ वह रेशमी कपडा अम्मी के पुष्ट कूल्हों पर इस कदर चिपका था की उनके जिस्म की हर लचक साफ़ दिखाई दे रही थी.

इस घुमाव के कारण, अम्मी का सामने का पूरा हिस्सा अब मेरी और मेरे साथ खड़े उन दो रोदय लड़कों की तरफ हो गया था. उस तंग और झीने नीले रेशमी कपडे के नीचे अम्मी के रसीले और भरे हुए मम्मी अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे. वे क़यामत ध रहे थे. उन दोनों लड़कों की आँखें हवस से फैल गयीं और वे अम्मी के उस बेपनाह और कामुक हुस्न को ek-tak निहारने लगे. अम्मी ने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद कर लीन और अपने दूधिया हाथों से अपने सीने को ढंकने की नाकाम कोशिश करने लगीं, पर उनकी बेबसी उस पारदर्शी कपडे के aar-paar साफ़ झलक रही थी.

अम्मी ने शर्म के मारे अपना चेहरे दीवार की तरफ कर लिया था, पर उनका वह कातिलाना बदन अब सबके लिए एक खुली किताब बन चूका था.

एक लड़का: (सीटी बजाते हुए) "वह भाई! क्या गज़ब की बनावट है. कसम से, ऐसी सुडौल गांड तोह मैंने आज तक नहीं देखि. ये पीला सूट उतारकर इस नीले रेशम में तोह मैडम एकदम पारी लग रही हैं."

में यह सब देख रहा tha—apni अम्मी को एक बाज़ारू चीज़ की तरह gol-gol घुमते हुए. मेरा दिल चीख रहा था, पर उन दो लड़कों ने मुझे अपनी गिरफ्त में इस कदर जकड रखा था की में हिल भी नहीं प् रहा था. एक तरफ अम्मी की वह बेबसी और दूसरी तरफ उनके उस सेक्सी और कामुक रूप की यह नुमाइश मेरे किशोर मैं में एक ऐसा तूफ़ान खड़ा कर रही थी जिसे में समझ नहीं प् रहा था.

वह सांवला शख्स अब अम्मी की पीठ पर अपनी उँगलियाँ फेर रहा था, जैसे वह उस दूधिया सफेदी का अंदाज़ा लगा रहा हो. अम्मी की सिसकियाँ तेज़ हो गयी थीं, और वह उस तंग बाथरूम के दरवाज़े की चौखट को अपनी मखमली उँगलियों से ज़ोर से पकडे हुए थीं, जैसे वही उनका आखिरी सहारा हो.

वही काली बनियान वाला सांवला शख्स, अम्मी के मखमली और पुष्ट बदन को अपनी गिरफ्त में लिए हुए एक शैतानी मुस्कान के साथ खड़ा था. फिर उसने अम्मी के कूल्हों पर धक्का मारा, अम्मी की आँखें डर से फैल गयीं क्यूंकि उन्हें अहसास हो गया था की उन्होंने अभी अपनी गांड के बीच क्या महसूस किया है.

उनके मुंह से एक लम्बी सिसकी निकली, "नहीं!"

तभी मुझे जकड़े हुए उस राजू नाम के लड़के ने अपनी लार टपकते हुए सलीम की तरफ देखकर आवाज़ लगायी.

राजू: "ो सलीम भाई! ज़रा इसके हाथ तोह ऊपर करवाओ. इस हूर की पारी ने अपने मरमरी हाथों से अपने रसीले मम्मी ढँक रखे हैं. बहार से उभार तोह दिख रहा है, पर ढंग से दीदार नहीं हो प् रहा. ज़रा पर्दा तोह हटाओ!"

राजू की बात सुनकर सलीम ज़ोर से ठहाका मारकर हंसा, उसकी गन्दी हंसी उस तंग गलियारे में ज़हर की तरह गूंजी. उसने अम्मी के गोर और कांपते हुए कन्धों पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली.

सलीम: (कमीनी मुस्कान के साथ) "अच्छा! तोह हमारे राजू भाई को मम्मी देखने हैं? क्यों बे, क्या अभी से दूध पीने का मैं कर रहा है क्या? बड़े रसीले और भरे हुए लग रहे हैं न इस नीली सिल्क के नीचे?"

सलीम ने फिर मेरी तरफ एक हिकारत भरी नज़र डाली, जैसे वह मुझे नीचे दिखाना चाहता हो.

सलीम: "क्यों छोटे? तूने तोह अपनी अम्मी का दूध पिया hi होगा यहाँ से? अब ज़रा अपने भाइयों को भी तोह देखने दे की कुदरत ने इन्हें कितना सुडौल और भारी बनाया है!"

अम्मी यह सुनकर शर्म और ज़िल्लत से जैसे ज़मीन में गड गयीं. उनके दूधिया गाल खौफ और अपमान से लाल पद गए थे. उन्होंने अपने दोनों हाथों को अपने भरे हुए सीने पर और भी ज़ोर से भींची लिया, जिससे उनकी नीली सिल्क की निघटजोन उनके उरोजों की गोलाई पर और भी ज़्यादा तन गयी.

सलीम ने अम्मी के दोनों हाथों को झटके से उनके सर के ऊपर उठा दिया. इस हरकत ने अम्मी के नीले रेशमी लिबास को उनके जिस्म पर और भी ज़्यादा तान दिया. हाथ ऊपर होने की वजह से उनका भरा हुआ सीना और भी बहार की तरफ उभर आया, जैसे वह उस पतले कपडे को फाड़कर बहार आने को बेताब हो.

उस नीली सिल्क के पारदर्शी खिंचाव के नीचे अम्मी के कठोर और उभरे हुए निप्पल्स साफ़ नज़र आने लगे, जो डर और ठण्ड की वजह से और भी नुमाया हो गए थे.

अम्मी का वह रसीला और पुष्ट उभार अब सीधे मेरी और उस राजू की नज़रों के सामने था. राजू की आँखों में हवस की चमक बढ़ गयी और वह अम्मी के उन मखमली मम्मों को अपनी गन्दी नज़रों से टटोलने लगा. अम्मी की आँखें शर्म के मारे बंद थीं, और उनका गोरा चेहरे ऊपर की तरफ खिंच गया था, जिससे उनकी सुराहीदार गर्दन और भी लम्बी और दिलकश लग रही थी.

सलीम, जो अम्मी के पीछे खड़ा था, उनकी उन नंगी कलाइयों को ऊपर थामे हुए था. अम्मी की वह नंगी सफ़ेद पीठ उस डीप नैक निघटजोन में पूरी तरह बेपर्दा थी. सलीम ने अपनी हवस भरी निगाहें उस संगमरमर जैसी पीठ पर गड़ाईं और अपना गन्दा मुंह नीचे झुकाया.

सलीम ने अपनी जीभ अम्मी की उस दूधिया सफ़ेद और चिकनी पीठ पर फेर दी. उसने उनकी रीढ़ की हड्डी के पास चमकते पसीने को चाटते हुए एक गहरी आवाज़ निकली.

सलीम: "उफ़... खुदा की कसम! कितनी चिकनी और गरम पीठ है तेरी. मैं करता है बस यहीं पिघल जाओं."

अम्मी के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी. वह अपने हाथ छुड़ाने के लिए छटपटायीं, जिससे उनके उभरे हुए सीने की हरकत और भी तेज़ हो गयी और उस नीले रेशम के नीचे उनके मखमली अंगों की लचक ने राजू और उसके साथी को पागल कर दिया.

राजू: (लार टपकते हुए) "भाई! क्या गज़ब की चीज़ है. इसके मम्मी तोह एकदम क़यामत हैं. देख तोह सही कैसे upar-neeche हो रहे हैं!"

में यह सब देख रहा tha—apni अम्मी के उस बेपनाह और सेक्सी बदन को इस तरह सरेआम नीलाम होते हुए. उनके उठे हुए निप्पल्स और वह नंगी गोरी पीठ... वह नज़ारा किसी भी मर्द के होश उदा देने के लिए काफी था, पर एक बेटे के तौर पर मेरी रूह इस ज़िल्लत से छलनी हो रही थी. अम्मी बस बेबसी में अपना सर हिला रही थीं, और उनकी सिसकियाँ उस खौफनाक रात की ख़ामोशी को चीयर रही थीं.

उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ को समेटा और कांपते हुए लबों से विनती की.

अम्मी: (रुंधे हुए गले से) "खुदा के वास्ते... अब तोह जाने दो. देख लिया न तुमने... अब बस करो, हमें अपनी सीट पर जाने दो."

उनकी आवाज़ में इतनी बेबसी थी की कोई पत्थर दिल भी पिघल जाये, मगर उन भेड़ियों पर हवस का भूत सवार था. सलीम एक बार फिर अम्मी के सामने आकर खड़ा हो गया. उसने अम्मी की आँखों में आँख डाली और बड़े इत्मीनान से अपना कला हाथ उठाया.

उसने अपनी उँगलियाँ अम्मी के उन गुलाबी और कांपते हुए होंठों पर रख दिन.

सलीम: (फुसफुसाते हुए) "अभी कहाँ जान... अभी तोह पार्टी शुरू हुई है. ज़रा ठहरो तोह सही, इतनी जल्दी भी क्या है?"

उसकी उँगलियाँ अम्मी के मखमली लबों पर रेंग रही थीं. अम्मी ने खौफ के मारे अपनी आँखें बंद कर लीन, और उनके गोर गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गयी.

सलीम: "बस थोड़ा सा टच करने दो... कसम से, अपनी इन आँखों पर यकीन नहीं होता की खुदा ने किसी को इतना दूधिया और बेदाग़ गोरा भी बनाया होगा. मैं करता है बस इस सफेदी को चख लून."

यह कहते हुए उसने अपना दूसरा हाथ अम्मी के नंगे और सुडौल कंधे पर रख दिया. वह हाथ dheere-dheere नीचे की ओरे सरकने लगा, उस नीली सिल्क की निघटजोन के कालर की तरफ, जहाँ से अम्मी के भरे हुए सीने की गहरी ढलान शुरू होती थी.

अम्मी का पूरा बदन thar-thar काँप रहा था. उनका वह कातिलाना बदन उस तंग नीले लिबास में हर धड़कन के साथ उभरकर सामने आ रहा था.

बाकी लड़के: (पीछे से देखते हुए) "हाँ भाई, ज़रा देख तोह सही... ये रंग असली है या कोई जादू है! ऐसी मखमली काय तोह सिर्फ ख्वाबों में होती है."

में अपनी अम्मी को इस तरह नीलाम होते देख रहा था. मेरे कंधे पर रखा हाथ अब मुझे और ज़ोर से भींची रहा था.

मेरी नज़रें अम्मी के उस उभरे हुए सीने और सलीम के काले हाथों पर तिकी थीं. एक तरफ अम्मी की इज़्ज़त का सवाल था, और दूसरी तरफ उनकी वह बेपनाह और सेक्सी ख़ूबसूरती जो इस वक़्त पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा थी.
 
आईटी सिम्स रीडर्स अरे नॉट लिकिंग थे स्टोरी सो फार, सो ी मिगहत स्टॉप राइटिंग फुरदर ों थिस.
 
अध्याय 4

सलीम अब धीरे-धीरे अपना हाथ उनके मखमली गले से नीचे उतार रहा था, और अम्मी बस 'साहिल' का नाम जपने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही थीं।

उस बंद और घुटन भरी गैलरी में वक्त जैसे थम सा गया। अम्मी की तेज़ होती साँसें उस नीली सिल्क की नाइटगाउन के नीचे एक तूफ़ान की तरह उठ और गिर रही थीं। सलीम की आँखों में हवस की सुर्ख़ी उतर आई थी, अब पूरी तरह बेखौफ हो चुका था।

उसने अपना काला हाथ धीरे से अम्मी की गर्दन से नीचे उतारा और बिना किसी हिचकिचाहट के उसे सीधे अम्मी के भरे हुए और पुष्ट सीने पर रख दिया।

जैसे ही सलीम की हथेलियाँ उस नीले रेशमी कपड़े के ऊपर से अम्मी के नर्म और मांसल उभार से टकराईं, अम्मी के मुँह से एक ऐसी सिसकी निकली जो दर्द और बेइंतहा शर्म का मिला-जुला शोर थी। उस नीली सिल्क की पतली परत के नीचे अम्मी का वह दूधिया बदन इतना कोमल था कि उस शख्स की उंगलियाँ उनके मखमली त्वचा में धंसती चली गईं।

उसने अपने हाथ की पकड़ मज़बूत की और अम्मी के उस गर्व से भरे उरोज को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। अम्मी का पूरा शरीर एक झटके के साथ कमान की तरह मुड़ गया। उनके गुलाबी होंठ थरथराने लगे और उन्होंने अपनी दोनों आँखें इतनी ज़ोर से मींच लीं कि उनके पलकों के कोनों से आँसू छलक पड़े।

उस मंज़र को देखकर पीछे खड़े रऊडी लड़कों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुँच गया।

सलीम: "वाह राजू! क्या नर्म और गरम माल है! कसम से, इस दूधिया सफेदी का अहसास तो मखमल से भी ज़्यादा कीमती लग रहा है।"

उनमें से एक ने सीटी बजाई, जबकि दूसरा अम्मी की पतली कमर और पीछे के उन सुडौल कूल्हों को देखकर अपनी ज़ुबान लबों पर फेर रहा था।

अम्मी का वह नूरानी चेहरा अब खौफ और जिल्लत से काला पड़ रहा था। वह सलीम के सीने पर अपने गोरे हाथ रखकर उसे दूर धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सलीम की ताक़त के सामने उनकी नज़ाकत हार रही थी। उनके उभरे हुए सीने का वह हिस्सा, जिसे सलीम ने दबोच रखा था, उस नीले कपड़े के खिंचाव की वजह से और भी ज़्यादा नुमाया हो गया था।

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी के उस कातिलाना और सेक्सी बदन को इस तरह सरेआम कुचले जाते हुए। मेरे कंधे पर रखा हाथ अब मुझे और ज़ोर से दबा रहा था, जैसे वह मुझे इस 'तमाशे' का गवाह बनने पर मजबूर कर रहा हो। एक तरफ अम्मी की वह सिसकियाँ मेरा दिल चीर रही थीं, और दूसरी तरफ उनके उस बेपनाह हुस्न की यह नग्न और दर्दनाक नुमाइश मेरे टीनएज दिमाग को सुन्न कर रही थी।

अम्मी का वह नीला रेशमी गाउन अब उनके जिस्म की हर हरकत के साथ उनके चौड़े कूल्हों और स्तनों के उभार को और भी साफ़ दिखा रहा था।

सलीम अब दूसरे हाथ से अम्मी की कमर को सहलाते हुए नीचे की तरफ बढ़ रहा था, और अम्मी बस बेबसी में अपना सिर दीवार पर टिकाए हुए सिसक रही थीं।

अम्मी की सिसकियाँ अब एक बेबस इल्तजा में बदल चुकी थीं। उनकी आँखों से बहते आँसू उनके दूधिया गालों को भिगो रहे थे। उस सांवले शख्स का हाथ अभी भी अम्मी के भरे हुए सीने पर अपनी पकड़ बनाए हुए था, और नीली सिल्क की नाइटगाउन के नीचे अम्मी का वह मखमली बदन खौफ से थरथरा रहा था।

अम्मी: (आसमान की तरफ नज़रें उठाकर, सुबकते हुए) "या अल्लाह... मेरी इज़्ज़त की हिफाज़त कर! किसी फरिश्ते को भेज दे मौला... रहम कर!"

उनकी इस तड़प भरी आवाज़ पर वे आवारा लड़के और भी ज़ोर से हँसने लगे। सलीम अम्मी के गोरे चेहरे के और करीब आया, उसके चेहरे पर एक दरिंदा मुस्कान थी।

सलीम: "यहाँ कोई फरिश्ता नहीं आएगा जान, यहाँ बस हम हैं और तेरा यह कातिलाना बदन..."

अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बगल वाले कंपार्टमेंट का भारी लोहे का दरवाज़ा एक धमाके के साथ खुला। ट्रेन के शोर के बीच वह आवाज़ किसी गर्जना जैसी थी।

सामने एक सिख सज्जन खड़े थे—कद 6 फीट 2 इंच, चौड़ा सीना, और बदन पर सिक्युरिटी की रौबदार वर्दी। उनकी आँखों में बिजली सी चमक थी । वर्दी पर लगे सितारे डिम लाइट में चमक रहे थे। उन्होंने एक पल में उस पूरे मंज़र को अपनी पैनी नज़रों से नाप लिया—अम्मी का वह नीला रेशमी लिबास जो बेतरतीब हो चुका था, उनके नंगे सफेद कंधे, उनकी सिसकियाँ, और उन भेड़ियों के गंदे हाथ।

जैसे ही उन्होंने देखा कि एक गंदा हाथ अम्मी के पुष्ट सीने को दबोचे हुए है, उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने अपनी भारी, रोबीली आवाज़ में दहाड़ मारी, जिससे पूरा गलियारा कांप उठा।

सिख ऑफिसर: ( सिक्युरिटीिया कड़क आवाज़ में) "ओए! ये क्या बदतमीज़ी हो रही है यहाँ?! हाथ हटा पीछे!"

उनकी वह आवाज़ किसी फरिश्ते की दस्तक से कम नहीं थी। अम्मी की आँखों में उम्मीद की एक किरण जागी। सलीम, जो अभी तक शेर बना हुआ था, उस 6 फीट 2 इंच के वर्दीधारी को देखकर एकदम से जम गया। उसका हाथ अम्मी के नर्म उरोज से झटके के साथ पीछे हटा, जैसे किसी ने उसे बिजली का झटका दे दिया हो।

बाकी के तीन लड़के, जो मुझे घेरे हुए थे और अम्मी की पीछली बनावट और कूल्हों का नज़ारा ले रहे थे, उनके चेहरे का रंग फक पड़ गया। वे फौरन मुझसे दूर हट गए।

सिख ऑफिसर: (आगे बढ़ते हुए) "क्या समझ रखा है? ये ट्रेन है या तुम्हारा घर? ज़रा पीछे हटो सब के सब, वरना अभी ऐसी जगह मारूँगा कि सारी जवानी भूल जाओगे!"

अम्मी फौरन उस सांवले शख्स की गिरफ्त से छूटीं और लड़खड़ाती हुई मेरी तरफ भागीं। उन्होंने अपना ढीला-ढाला अबाया मेरे हाथ से झपटा और उसे अपनी नीली नाइटगाउन के ऊपर लपेट लिया, ताकि उनका वह बेपनाह और सेक्सी बदन दोबारा पर्दों में छिप सके।

उनका पूरा वजूद अभी भी कांप रहा था, और मैं उन्हें सहारा देते हुए उस ऑफिसर के पीछे खड़ा हो गया।

सलीम की हिमाकत अभी कम नहीं हुई थी। अपनी सांवली और पसीने से तरबतर देह को सिकोड़ते हुए उसने उस 6 फीट 2 इंच के सिख ऑफिसर की आँखों में आँखें डालने की जुर्रत की। उसे लगा कि शायद पैसा या रसूख इस वर्दी को झुका देगा।

सलीम: (हिकारत भरी और धौंस वाली आवाज़ में) "ओए सरदार साहब! आप बीच में मत पड़ें। अपनी ड्यूटी करो और किनारे हो जाओ। आपको आपका 'मेहनताना' मिल जाएगा, बस हमें अकेला छोड़ दो। आप शायद जानते नहीं कि हम किसके आदमी हैं… शहर के बड़े-बड़े अफसरों को रोज़ 'हफ्ता' देते हैं हम। आप जैसे कितनों को जेब में रखते हैं।"

यह सुनते ही अम्मी, जो अभी-अभी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन को अपने काले अबाया में छुपा पाई थीं, खौफ के मारे फिर से कांपने लगीं। उन्हें लगा कि शायद यह सिक्युरिटी वाला भी उन गुंडों से मिल जाएगा।

मगर उस ऑफिसर के चेहरे पर जो गुस्सा उतरा, वह किसी जलजले से कम नहीं था। उनकी आँखों में खून उतर आया। जैसे ही 'हफ्ते' का ज़िक्र हुआ, उन्होंने बिजली की फुर्ती से अपना भारी हाथ हवा में लहराया।

"चटाक!"

एक ज़ोरदार तमाचा सलीम के गाल पर पड़ा, जिससे उसका सिर घूम गया। अभी वह खुद को संभाल भी नहीं पाया था कि ऑफिसर का एक वज्र जैसा घूँसा सीधे उसके पेट में धंसा।

सरताज सिंह: (दहाड़ते हुए) "हफ्ता देगा मुझे? कुत्ते की औलाद! मुझे खरीदेगा तू?"

उन्होंने सलीम का कॉलर पकड़ा और उसे दीवार से दे मारा। उनकी आवाज़ पूरे डिब्बे में गूँज रही थी, जिससे सोए हुए मुसाफिरों की भी आँखें खुलने लगीं।

सरताज सिंह: "ध्यान से सुन ले... सरताज नाम है मेरा! सरताज सिंह! तेरी और तेरे बाप की क्या, किसी की भी इतनी औकात नहीं कि सरताज सिंह को अपनी उंगली पर नचा सके। वर्दी पर दाग लगाने की बात करता है, साले, तेरी खाल उधेड़ दूँगा यहीं!"

बाकी के तीन लड़के, अब अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने लगे। ऑफिसर का वह रौब देखकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी।

सरताज सिंह: "ओए! तुम तीनों भी इधर आओ! लाइन में लगो वरना रेल की पटरी पर तुम्हारी हड्डियाँ गिनूँगा आज!"

अम्मी ने डर और राहत के मिले-जुले अहसास में मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। उनके दूधिया सफेद हाथ अभी भी पसीने से भीगे हुए थे। वह उस 6 फीट 2 इंच के 'फरिश्ते' के पीछे दुबक गई थीं, जिनका नाम 'सरताज' वाकई उनके लिए उस वक्त खुदा का भेजा हुआ सिर का ताज साबित हो रहा था।

सरताज सिंह ने मुड़कर एक नज़र अम्मी के उस नूरानी मगर सहमे हुए चेहरे पर डाली। उनकी नज़रों में हवस नहीं, बल्कि एक रक्षक वाली हमदर्दी थी।

सरताज सिंह: "बहन जी, आप घबराइए मत। जब तक सरताज ज़िंदा है, कोई आपकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। बेटा, अपनी अम्मी को लेकर अंदर जा, मैं इन कुत्तों का हिसाब यहीं चुकता करता हूँ।"

अम्मी की आँखों में शुक्रगुज़ारी के आँसू आ गए। उन्होंने अपने भारी सीने पर अबाया को और कस लिया, जैसे वह उस गंदी छुअन की यादों को मिटा देना चाहती हों, और हम धीरे-धीरे उस गलियारे से निकलने लगे।

दहशत और अफरातफरी के उस माहौल में सरताज सिंह का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने बिजली की फुर्ती से अपनी कमर से चमड़े की भारी बेल्ट निकाली और दूसरी तरफ अपनी सरकारी रिवॉल्वर निकालकर उन चारों दरिंदों पर तान दी।

"कटाक... सड़ाक!"

बेल्ट की हर गूँज के साथ उन चारों रऊडी लड़कों की चीखें डिब्बे की दीवारों से टकरा रही थीं। सरताज सिंह उन्हें जानवरों की तरह पीट रहे थे। सलीम, जिसने अम्मी के मखमली बदन को छुआ था, अब फर्श पर पड़ा रहम की भीख मांग रहा था।

इसी बीच, अम्मी शुक्रगुज़ारी और घबराहट के आलम में दोबारा गलियारे की तरफ आईं। वह उस फरिश्ते का शुक्रिया अदा करना चाहती थीं, जिसने उनकी इज़्ज़त बचाई थी। पर जल्दबाजी और घबराहट में वह अपना काला अबाया पहनना भूल गईं। काला अबाया अभी भी उनके हाथ में था।

जब अम्मी ने देखा कि सरताज सिंह बेतहाशा उन लोगों को मार रहे हैं और वे चारों खून से लथपथ होकर तड़प रहे हैं, तो उनकी ममता और रहमदिली जाग उठी। उन्हें लगा कि शायद वे आज ज़िंदा नहीं बचेंगे।

अम्मी: (हाथ जोड़कर, कांपती हुई आवाज़ में) "सरदार साहब... बस कीजिए! खुदा के वास्ते इन्हें छोड़ दीजिए। ये मर जाएंगे... बहुत हो गया, प्लीज इन्हें माफ़ कर दीजिए!"

अम्मी जब बोल रही थीं, तो उनके पुष्ट सीने की हरकत और उनकी वह शहद जैसी मीठी आवाज़ उस तनावपूर्ण माहौल में एक अजीब सी नरमी घोल रही थी। सरताज सिंह ने हाथ रोका और अपनी गहरी नज़रों से एक बार अम्मी को ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी नज़रों में उन भेड़ियों जैसी हवस तो नहीं थी, पर वह भी एक मर्द थे और अम्मी का वह नीला रेशमी हुस्न उनके सामने पूरी तरह बेपर्दा था।

सरताज सिंह ने अपनी रिवॉल्वर वापस होलस्टर में डाली और हाँफते हुए अम्मी की तरफ देखा।

सरताज सिंह: "बहन जी, आप बहुत भोली हैं। ये कुत्ते इसी लायक हैं। अगर आज मैं नहीं आता, तो ये आपकी इस कीमती इज़्ज़त और आपके इस मासूम वजूद के साथ क्या करते, आपको अंदाज़ा भी नहीं है।"

उन चारों लड़कों ने अम्मी के पैरों की तरफ हाथ फैलाए, "मैडम, हमें बचा लो... साहब हमें मार डालेंगे! माफ़ कर दो मैडम!"

अम्मी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने मेरी तरफ देखा और फिर सरताज की तरफ। उन्हें अभी भी अहसास नहीं था कि वह महज़ एक तंग नाइटगाउन में खड़ी हैं, जिसमें उनकी सुडौल काया का एक-एक हिस्सा नुमाया हो रहा है।

सरताज सिंह: (थोड़ा धीमे स्वर में) "ठीक है, आपकी खातिर इन्हें छोड़ रहा हूँ। पर ओए! तुम चारों... अगले स्टेशन पर तुम सिक्युरिटी के हवाले होगे। अगर किसी ने हिलने की कोशिश की, तो सीधे गोली मारूँगा।"

अम्मी की आँखों में शुक्रगुज़ारी के आँसू थे और उनका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उस खौफनाक मंज़र से बाहर निकलने के बाद, सरताज सिंह उनके लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं थे। वह धीरे-धीरे सरताज के और करीब गईं, ताकि उनका शुक्रिया अदा कर सकें।

अम्मी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में थीं, जो उनके भरे हुए बदन से चिपक कर उनके हर कर्व को नुमाया कर रही थी। उनके एक हाथ में वह काला अबाया मुड़ा हुआ रखा था, जिसे वह घबराहट में पहनना भूल गई थीं।

उस नीले रेशमी लिबास के नीचे अम्मी का दूधिया सफेद और सुडौल जिस्म रोशनी में किसी संगमरमर की मूरत जैसा दमक रहा था। उनके नंगे गोरे कंधे और पुष्ट सीने का उभार उस तंग कपड़े के खिंचाव की वजह से साफ़ नज़र आ रहा था।

अम्मी: (रुँधे हुए गले और शहद जैसी मीठी आवाज़ में) "सरदार साहब... आपने आज मुझ पर बहुत बड़ा अहसान कर दिया है। अगर आप न होते, तो पता नहीं मेरा क्या होता। मैं आपकी बहुत शुक्रगुज़ार हूँ... ताउम्र आपकी इस मदद को याद रखूँगी।"

अम्मी जब सरताज के इतने करीब खड़ी थीं, तो उनकी चमेली वाली खुशबू और उनके बदन की तपिश उस 6 फीट 2 इंच के गठीले ऑफिसर तक पहुँच रही थी। अम्मी का वह कातिलाना और सेक्सी हुस्न उस वक्त अपने पूरे शबाब पर था, और कोई भी आम मर्द होता तो उनकी उस नूरानी सफेदी और सुडौल बनावट को देखकर अपना ईमान खो देता।

मगर सरताज सिंह की शख्सियत कुछ और ही मिट्टी की बनी थी। उन्होंने अम्मी की तरफ देखा, पर उनकी नज़रों में उन भेड़ियों जैसी कोई हवस या गंदी चमक नहीं थी। उनके लिए अम्मी की वह बेपनाह खूबसूरती महज़ एक औरत की इज़्ज़त थी जिसे बचाना उनका फर्ज़ था। उनकी नज़र एकदम साफ़ और भाई जैसी थी।

सरताज सिंह: (नर्मी और भारी आवाज़ में) "बहन जी, बहनें कभी भाई को थैंक्स नहीं बोलतीं। ये मेरा फर्ज़ था।"

तभी सरताज की नज़र अम्मी के उन भरे हुए और मखमली अंगों पर पड़ी, जो उस पतली नाइटगाउन की वजह से पूरी तरह बेपर्दा हो रहे थे। अम्मी अपनी भावुकता में भूल गई थीं कि वह किस हाल में खड़ी हैं। सरताज ने बड़े सम्मान के साथ अपना हाथ आगे बढ़ाया और अम्मी के हाथ से वह काला अबाया ले लिया।

उन्होंने बिना किसी गंदी नीयत के, उस अबाया को खोला और बड़े ग्रेस के साथ अम्मी के सामने वाले हिस्से पर डाल दिया, ताकि उनका वह पुष्ट सीना और मखमली बदन दोबारा ढका जा सके।

सरताज सिंह: (नज़रें झुकाते हुए) "आप अंदर जाइए और इसे पहन लीजिए।"

अम्मी को अचानक अहसास हुआ कि वह किस हाल में थीं। उनका चेहरा शर्म से लाल हो गया, जैसे कश्मीर का सेब हो। उन्होंने जल्दी से उस अबाया को अपने नूरानी जिस्म पर लपेट लिया।

सरताज के उस एक कदम ने अम्मी के दिल में उनके लिए इज़्ज़त और भी बढ़ा दी थी। मैं अपनी अम्मी को उस फौलादी मर्द के साये में सुरक्षित महसूस करते देख रहा था, और मुझे अहसास हुआ कि असली मर्दानगी सिर्फ ताक़त में नहीं, बल्कि नज़र की पाकीज़गी में होती है।

अम्मी, सरताज सिंह की उस दरियादिली और पाकीज़ा नज़र से इस कदर मुतासिर थीं कि उनके चेहरे पर शर्म और शुक्रगुज़ारी का एक अजब सा मिला-जुला रंग था। वह तेज़ी से वापस उस तंग टॉयलेट की तरफ मुड़ीं ताकि अपना काला अबाया ढंग से पहन सकें। उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में उनका सुडौल और दूधिया बदन जिस तरह नुमाया हो रहा था, उसे अब वह दोबारा पर्दों में छुपा लेना चाहती थीं।

जब तक अम्मी अंदर गईं, गलियारे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। बस ट्रेन के पहियों की गूँज और पटरियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

कुछ ही मिनटों में जब अम्मी अपना अबाया ठीक से लपेटकर और अपना नूरानी चेहरा नकाब से ढंककर बाहर आईं, तो नज़ारा बदल चुका था। सरताज सिंह, वहाँ से जा चुका था। वह उन चारों लहूलुहान दरिंदों को उनके कॉलर से घसीटते हुए अगले कंपार्टमेंट की तरफ ले गया था।

अम्मी की आँखें गलियारे में उस 'फरिश्ते' को तलाश रही थीं, पर वहाँ अब सिर्फ बीड़ी की बुझती हुई गंध और उन गुंडों के संघर्ष के निशान बाकी थे।

अम्मी: (धीमी और हैरान आवाज़ में) "साहिल... कहाँ गए सरदार साहब? मैं तो उन्हें ठीक से दुआ भी नहीं दे पाई।"

मैं: "अम्मी, वह उन्हें अगले डिब्बे की तरफ ले गए। शायद सिक्युरिटी चौकी या अगले स्टेशन पर हैंडओवर करने के लिए।"

अम्मी वहीं खड़ी रह गईं। उनके भरे हुए सीने पर रखा हाथ उनकी तेज़ धड़कनों को थामने की कोशिश कर रहा था। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि इस ज़माने में कोई मर्द इतना निस्वार्थ भी हो सकता है। सरताज सिंह ने अम्मी के उस कातिलाना और सेक्सी हुस्न को इतने करीब से देखा था, मगर उनकी नज़रों में रत्ती भर भी लालच या हवस नहीं थी।

उन्होंने बिना किसी उम्मीद या 'उल्टे सीधे' इरादे के एक अजनबी औरत की इज़्ज़त के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।

अम्मी वापस अपनी बर्थ की तरफ चलने लगीं। अबाया के ढीले कपड़ों के नीचे अभी भी उनका वह नीला रेशमी गाउन उनके जिस्म की तपिश को समेटे हुए था। उनके चलने के अंदाज़ में अब एक अलग सा सुकून था, जैसे उन्हें अहसास हो गया हो कि दुनिया में अगर भेड़िये हैं, तो सरताज सिंह जैसे रखवाले भी हैं।

अम्मी: (मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए) "साहिल, आज अल्लाह ने हमारी सुन ली। ऐसे नेक इंसान बहुत कम मिलते हैं जो बिना किसी मतलब के किसी की ढाल बन जाएं।"

मैं अम्मी को देख रहा था। अबाया के उस काले पर्दे के पीछे छिपा उनका वह मखमली और बेपनाह खूबसूरत जिस्म अब सुरक्षित था। उस रात के हादसे ने अम्मी के वजूद में एक नई गरिमा भर दी थी, और मेरे टीनएज दिमाग को यह सिखा दिया था कि असली ताकत किसी को 'पाने' में नहीं, बल्कि किसी की 'हिफाज़त' करने में होती है।

हम अपनी सीटों पर लौट आए, जहाँ नानी अभी भी बेखबर सो रही थीं।
 
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