अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - Page 4 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़

अध्याय 11

कमरे में सुबह की पहली किरण जब पर्दा चीरकर अंदर आई, तो मैंने आँखें खोलीं। मैं सारी रात बेचैन होकर सोया था।

अम्मी मेरे बगल वाले बेड पर नहीं थीं। वह कमरे में आईने के सामने खड़ी थीं, उनकी पीठ मेरी तरफ थी। आईने में उनका चेहरा साफ़ दिख रहा था, और उनका पूरा ध्यान अपने होठों पर था। वह एक छोटे से ब्रश से अपने होठों पर चमकता हुआ लिप ग्लॉस लगा रही थीं। उन्होंने अपने होठों को थोड़ा सा 'O' शेप में बनाकर ग्लॉस लगाया और फिर उन्हें आपस में दबाकर फैलाया।

वह हल्दी के लिए तैयार थीं। उन्होंने एक खूबसूरत, बसंती पीले रंग का जॉर्जेट का सूट पहना हुआ था। कमीज़ हल्की थी, जिस पर सफेद चिकनकारी का काम था। कमीज़ उनकी कमर पर कसी हुई थी और नीचे उनके हिप्स के गिर्द एक नज़ाकत से फैल जाती थी।

उनके जॉर्जेट का दुपट्टा उनके कंधों पर लापरवाही से टिका हुआ था। उसकी ना तो कोई पिन लगी थी, ना ही कोई तह जमी हुई थी; बस वह उनके जिस्म की हरकत के साथ लहरा रहा था। दुपट्टे का एक छोर उनकी पीठ पर नीचे तक जा रहा था, और दूसरा उनके सीने के ऊपर से होता हुआ उनके हाथ तक। जब वह लिप ग्लॉस लगाने के लिए थोड़ा आगे झुकीं, तो दुपट्टा कंधे से हल्का सा सरका, उनकी गोरी, मुलायम कॉलरबोन और कंधे की गोलाई को बे-पर्दा कर गया।

उनका दुपट्टा उनके सीने पर ऐसे इकट्ठा था कि उनकी दोनों छातियाँ उस कपड़े के नीचे से और भी भरी हुई और गोल लग रही थीं। जॉर्जेट की कमीज़ उनकी ब्रा की कप-लाइन को हल्के से हाईलाइट कर रही थी।

उन्होंने अपने गीले बालों का जूड़ा बनाया हुआ था, जिससे पानी की कुछ बूंदें उनकी गर्दन पर फिसल रही थीं। जूड़े में लगा ताज़ा मोगरे का गजरा, उनके बदन से आ रही साबुन और इत्र की महक में मिलकर एक नशीली खुशबू बना रहा था। कानों में सोने की झुमके, गले में एक पतली सी चेन और हाथों में काँच की पीली-हरी चूड़ियाँ। वह बेहद ताज़ा, भीगी हुई और कातिल लग रही थीं।

उन्हें इस तरह देखकर, कल रात का सारा शक धुआँ बनकर उड़ गया। यह मेरी अम्मी नहीं थीं; यह एक औरत थी, पूरी की पूरी, जिसे मैं आज पहली बार देख रहा था। विशाल क्या, कोई भी उन्हें देखता तो दीवाना हो जाता। यह सोच मेरे सीने से बोझ बनकर नहीं, बल्कि एक अजीब सी गर्माहट बनकर उठी, जो मेरे पूरे बदन में फैल गयी।

वह आईने में मेरा अक्स देखकर पलटीं।, उनके होंठों पर एक गहरी मुस्कान थी। "उठ गया, साहिल? ऐसे क्या घूर रहा है?"

मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। "सॉरी, अम्मी… वह… आप..." अल्फ़ाज़ मेरे गले में ही फंस गए।

"मैं क्या?" उन्होंने अपनी एक आइब्रो उठाते हुए पूछा। उनकी आवाज़ में वही रोज़ की ममता थी, लेकिन आज उसमें एक अलग सी खनक थी, एक शरारत। "बहुत अच्छी लग रही हूँ?"

"आप… कयामत लग रही हैं," लफ़्ज़ मेरे मुँह से फिसल गए।

यह सुनकर उनके गाल लाल हो गए। वह सच में शर्मा गई। "बदमाश। चल, मस्का मत लगा। सब मेहमान नीचे इंतज़ार कर रहे हैं। जल्दी से नहा ले।"

मैं बस हाँ में सिर हिला सका।

"और सुन," वह मेरे बेड के पास आकर, थोड़ा झुकीं। उनके गजरे और उनके जिस्म की महक ने मुझे घेर लिया। अचानक मेरी नज़र सामने की तरफ गई, तो मेरा गला ही सूख गया। मेरी आँखों के सामने अम्मी के दोनों मम्मे 75% से ज़्यादा दिख रहे थे। उनके बीच की घाटी, उनकी सुडौलता... फिर मैंने जबरदस्ती अपनी आँखें फेर लीं, क्योंकि मुझे नीचे कुछ तनाव बढ़ता हुआ महसूस हुआ।

"तू भी वह पीले रंग का कुर्ता पहन लेना।"

सुबह की उस खामोशी में फोन की बीप किसी धमाके जैसी लगी। अम्मी का ध्यान उस तरफ हुआ। मेरी निगाह वापस से अम्मी की तरफ मुड़ी ताकि मैं उन्हें फिर से देख सकूँ, लेकिन अम्मी अब नाइटस्टैंड पर रखे फोन की तरफ बढ़ीं। और जब उन्होंने कॉल करने वाले का नाम देखा, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। थोड़े से संकोच के साथ उन्होंने अपना फोन उठाया।

अम्मी कुछ टाइप करने लगीं, उन मैसेजेस का जवाब दे रही थीं।

------------------

विशाल: गुड मॉर्निंग आयशा जी।

आयशा : गुड मॉर्निंग।

विशाल: सारी रात आपकी याद आती रही, सो ही नहीं पाया।

आयशा (डरते हुए): क्यों?

विशाल: बस अपने हाथों में वह नरमी महसूस कर रहा था।

आयशा : मैं समझी नहीं।

विशाल: आपके मम्मों की...

आयशा (शर्माते हुए): विशाल जी, ऐसी बातें मत कीजिए।

विशाल: आप तो मेरी गर्लफ्रेंड हैं, भूल गईं? हमारा करार हुआ था, याद है?

आयशा (डरते हुए): याद है।

विशाल: तो मेरी गर्लफ्रेंड से एक गुज़ारिश है—आज मैं हल्दी के फंक्शन में आ रहा हूँ। मैं आपके मम्मों की खूबसूरती को देखना चाहता हूँ। मुझे वे दोनों पूरी तरह नज़र आने चाहिए, अपनी गुलाबी नप्पल्स के साथ।

आयशा के ज़हन में जैसे एक ज़लज़ला आ गया था। विशाल की उस बेबाक और गंदी मांग ने उनकी रूह को अंदर तक कंपा दिया था। उन्होंने फोन को सीने से सटा लिया, जैसे वह उन शब्दों को अपने दिल के अंदर ही दफ़न कर देना चाहती हों।

उनके मन में विचारों का एक हिंसक बवंडर उठ खड़ा हुआ:

"या अल्लाह, यह शख्स किस मिट्टी का बना है? हल्दी का पाक मौका, घर में मेहमानों की चहल-पहल, और यह मुझसे मेरे जिस्म की नुमाइश की मांग कर रहा है? 'गुलाबी टिप्स'... क्या उसे ज़रा भी अंदाज़ा है कि वह एक माँ से, एक इज़्ज़तदार बीवी से क्या कह रहा है?"

आयशा : "मेरा बस चले तो मैं अभी इसका नंबर ब्लॉक कर दूँ और घर के दरवाज़े इसके लिए बंद कर दूँ। लेकिन सायमा... । अगर मैंने इसकी बात नहीं मानी, तो यह उस बच्ची की ज़िंदगी तबाह कर देगा। आज वह मम्मे देखना चाहता है, कल वह इससे भी आगे बढ़ेगा।"

आयशा की साँसें तेज़ हो गईं और उनकी आँखों से एक गर्म आँसू ढलकर उनके गालों पर आ गिरा।

आयशा के दिमाग में भले ही खौफ और नफरत का तूफान था, लेकिन उनके जिस्म ने एक बिल्कुल अलग और विश्वासघाती प्रतिक्रिया दी।

आयशा ने महसूस किया कि विशाल के मैसेज पढ़ते ही उनके पुष्ट मम्मों में एक सिहरन सी दौड़ गई। वे उभार, जिन्हें विशाल ने अपनी हथेलियों में भींचा था, अचानक और भी भारी महसूस होने लगे। उनके निप्पल्स, जिन्हें विशाल ने 'गुलाबी टिप्स' कहकर संबोधित किया था, वे पीले सूट के अंदर अपने आप सख्त होने लगे। यह एक ऐसी शर्मनाक सनसनी थी जिसे वह रोकना चाहती थीं, लेकिन उनका बदन उनके काबू से बाहर था।

आयशा ने आईने के सामने खड़े होकर अपने उस पीले रेशमी सूट को देखा जिसे उन्होंने हल्दी के फंक्शन के लिए चुना था। सूट का गला थोड़ा गहरा था, जो उनकी दूधिया गर्दन और छाती के ऊपरी हिस्से को बेबाक तरीके से दिखा रहा था।

सूट के पतले कपड़े के नीचे उनके भारी मम्मे अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे। विशाल के शब्दों का जादू या खौफ इतना गहरा था कि आयशा को महसूस हुआ जैसे उनके निप्पल्स कपड़े को फाड़कर बाहर निकलना चाहते हों। वह सख्त होकर सूट की सतह पर साफ उभर आए थे, जो किसी भी देखने वाले के लिए एक खुला निमंत्रण हो सकता था।

आयशा (हांफते हुए मन में): "तौबा... यह बदन तो जैसे मेरा रहा ही नहीं। अभी तो उसने सिर्फ मैसेज किया है और मेरी यह हालत है? अगर उसने सच में सबके सामने अंदर झांका, तो मैं खुद को कैसे संभालूँगी? ये उभार... ये निप्पल्स... जैसे उसकी पुकार का इंतज़ार कर रहे हों। मैं एक गुनहगार माँ हूँ, जो अपनी बच्ची को बचाने के बहाने अपने ही जिस्म की इस गद्दारी का लुत्फ़ उठा रही है।"

आयशा काँपते हाथों से दुपट्टे को सीने पर ओढ़ने की कोशिश की, ताकि उन सख्त होते निप्पल्स की नुमाइश को रोका जा सके, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सी 'लज़्ज़त' उन्हें यह एहसास दिला रही थी कि आज का दिन उस के वजूद को पूरी तरह बदल देने वाला है।

आयशा की साँसें अचानक तेज़ और गर्म हो गईं।

विशाल की वह "गर्लफ्रेंड" वाली बात उनके ज़हन में एक कड़वे नशे की तरह उतर रही थी। उन्हें याद आया कि कैसे उसकी उंगलियां उनके नंगे पेट पर रेंग रही थीं, और उस याद मात्र से ही उनकी पैंटी के अंदर एक हल्की सी नमी महसूस होने लगी।

वह जितनी शिद्दत से विशाल से नफरत करना चाहती थीं, उनका बदन उतनी ही शिद्दत से उस 'हैवान' की यादों को सहेज रहा था।

उन्हें अपनी ही इस 'गद्दार' देह से खौफ आने लगा, जो एक तरफ इज़्ज़त की दुहाई दे रही थी और दूसरी तरफ विशाल की उस ज़हरीली वासना की खुमारी में डूबती जा रही थी।

------------

चैट के बाद मैंने अम्मी को अपना फोन वापस उन्हीं मम्मों के बीच में रखते हुए देखा। मेरे मन में आया कि काश मैं वह फोन होता, तो उन्हें महसूस कर पाता। अम्मी की सांसें तेज़ चल रही थीं और उनके गाल पूरी तरह से लाल हो चुके थे। फिर अम्मी कुछ सोचती हुई मेरी तरफ मुड़ीं, "जल्दी तैयार होकर आ जाना," वह कहती हुई कमरे से बाहर निकल गईं।

मेरे मन में ख्याल आया—क्या मैसेज आया था? किसका था? अब्बू का? पहले तो अम्मी ठीक से चैट कर रही थीं, पर अंत में उनका चेहरा पूरा लाल क्यों हो गया? उनकी आँखों में खौफ दिख रहा था।

मैं तैयार होकर नीचे, आँगन की तरफ बढ़ा। ढोलक की थाप और औरतों के गाने की आवाज़ तेज़ हो रही थी। आँगन को गेंदे के फूलों से सजाया गया था। हर तरफ पीला रंग बिखरा हुआ था। पर मेरी निगाहें बस एक ही चेहरे ढूँढ़ रही थीं।

और फिर वह मुझे दिखीं।

वह दुल्हन के पास बैठी थीं, उनके हाथ में हल्दी की कटोरी थी। वह हंस रही थीं, किसी बात पर उन्होंने दुल्हन की नाक पर शरारत से हल्दी लगा दी। उनका चेहरा खुशी से तमतमा रहा था। इस भीड़ में वह सबसे अलग, सबसे हसीन लग रही थीं।

-------------

इससे पहले आयशा ने सायमा को दिलासा देते हुए कहा था कि विशाल अब उसे परेशान नहीं करेगा और उसे अपनी शादी का आनंद लेना चाहिए।

जब सायमा ने हैरानी से पूछा कि यह कैसे मुमकिन हुआ, तो आयशा ने झूठ का सहारा लेते हुए कहा, "मैंने उसे सिक्युरिटी में जाने की धमकी दी है, तो वह कुछ पैसे लेकर वे तस्वीरें और वीडियो डिलीट करने को तैयार हो गया है।"

सायमा ने घबराते हुए पूछा, "कितने पैसे?"

आयशा ने उसकी आँखों में देखते हुए शांति से जवाब दिया, "दस लाख, पर तू फिक्र मत कर, मैं सब संभाल लूँगी।"

हल्दी की रस्म के बीच आयशा की हंसी के पीछे एक गहरा दर्द और समझौता छिपा था। वह जानती थीं कि विशाल को दस लाख की नहीं, बल्कि उनके इस मखमली जिस्म की भूख थी। सायमा के चेहरे पर आई मुस्कान आयशा के लिए एक मरहम जैसी थी, लेकिन उनका अपना दिल अभी भी उस खौफनाक 'करार' के बोझ तले दबा था।

-----------

पीले रेशमी सूट में आयशा का हुस्न कहर ढा रहा था। जब वह झुककर दुल्हन को हल्दी लगा रही थीं, तो उनका गहरा गला उनके भारी और पुष्ट मम्मों की एक झलक दे जाता था। वह बार-बार अपने दुपट्टे को सँभालने की कोशिश कर रही थीं।

वहीं पर मेरी नानी खड़ी थीं, नौकर को कुछ समझा रही थीं। उन्होंने मुझे देखते ही अपने पास बुलाया।

"साहिल! इधर आ। सुबह से देख रही हूँ, कुछ खाया है या बस हवा में ही उड़ रहा है?" उनकी आवाज़ में वही हमेशा वाली फिक्र थी।

"नहीं नानी, बस अभी..."

"बस बस, रहने दे," उन्होंने मेरी बात काट दी। "चल, बैठ यहाँ।" उन्होंने खुद एक प्लेट में गरमा-गरम पूरी और आलू की सब्ज़ी रखी। "यह ले, चुपचाप खत्म कर।"

मैं उनकी बात टाल नहीं सका और एक कुर्सी पर बैठ गया। मैं नाश्ता कर ही रहा था कि एक साया मेरे ऊपर झुका।

"क्या बात है, साहिल! बड़े हैंडसम लग रहे हो पीले कुर्ते में," एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।

मैंने पलट कर देखा। विशाल। वह भी एक पीला कुर्ता पहने हुए था। लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके साथ दो औरतें थीं जिनके हाथ में खूबसूरत सजाई हुई थालियाँ थीं, जिन पर पीले रेशम के कपड़े थे।

"आप यहाँ?" मैं थोड़ा हैरत से पूछा।

"मैं तो दूल्हे का दोस्त हूँ। अकरम की तरफ से शगुन की हल्दी लेकर आया हूँ," उसने मुस्कुराते हुए कहा।

वैसे, तेरी अम्मी कहाँ हैं?"

उसके मुँह से 'तेरी अम्मी' सुनना मुझे अजीब सा लगा। जैसे यह उसके लिए बस एक नाम था, जबकि मेरे लिए वह मेरी पूरी दुनिया थीं, और अब... एक उलझन भी।

"वह... वहीं हैं, दुल्हन के पास," मैंने दूर इशारा करते हुए कहा।

विशाल की नज़र मेरे इशारे के साथ उस तरफ घूमी, और अम्मी को देखते ही उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गयी। "अच्छा... तो आयशा जी यहाँ हैं," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो।

"मैं बस आयशा जी को हल्दी देकर आता हूँ," वह यह कहता हुआ अम्मी की तरफ चल दिया। और मैं वहीं कुर्सी पर बैठा, अपने हाथ में पूरी का निवाला लिए, उसे देखता रहा। एक अनजान आदमी, जो अब अनजान नहीं लग रहा था, मेरी अम्मी की तरफ जा रहा था, बराबरी के हक से।

प्लेट में रखा पूरी का निवाला वहीं छोड़कर एक झटके से मैं खड़ा हुआ, नानी की आवाज़: 'अरे क्या हुआ?' पीछे कहीं दबकर रह गई। मैं तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा।

मेरा हर कदम ढोलक की बढ़ती हुई थाप के साथ उठ रहा था। लोग, गाने, फूलों की महक, कुछ भी मुझे महसूस नहीं हो रहा था। मेरी आँखें बस दो लोगों पर टिकी थीं - विशाल की चौड़ी पीठ, और उसके आगे, भीड़ में चाँद की तरह चमकती मेरी अम्मी।

विशाल अम्मी के पास सीधा नहीं गया। वह जाकर उनसे थोड़ी दूर खड़ा हो गया, जबकि उसके साथ आईं दो औरतें आगे बढ़ीं। मैं भी उनके पीछे खड़ा हो गया, जहाँ से मैं सब साफ़-साफ़ देख सकता था।

एक अधेड़ उम्र की औरत, जो शायद दूल्हे की चाची या ताई थी, आगे बढ़ी। "आयशा बेटी, हम अकरम की तरफ से शगुन की हल्दी लाये हैं।"

अम्मी, जो दुल्हन से हँसकर कुछ कह रही थीं, उनकी आवाज़ सुनकर पलटीं। उनके चेहरे पर एक मेहमान नवाज़ मुस्कान आ गई।

"आइए, आइए, चाची जी। हम आपका ही इंतज़ार कर रहे थे," उन्होंने उठते हुए कहा। उनकी निगाहें एक पल के लिए पीछे खड़े विशाल पर गईं और फिर फौरन हट गईं।

विशाल वहीं खड़ा रहा, उसके हाथ उसके कुर्ते की जेब में थे, और उसकी निगाहें अम्मी पर गड़ी हुई थीं। वह उन्हें इस तरह देख रहा था जैसे भीड़ में और कोई न हो। बेशर्मी से। हक से।

औरतें रस्म पूरी कर रही थीं। हल्दी की कटोरी एक हाथ से दूसरे हाथ में दी जा रही थी। ढोलक बज रही थी। गीत गाए जा रहे थे। लेकिन उस शोर में, एक खामोश खेल चल रहा था।

अम्मी ऐसे अनजान बन रही थीं जैसे उन्हें विशाल की नज़रों का एहसास ही न हो। वह चाची-जी से हंस-हंस कर बातें कर रही थीं, लेकिन मैं देख सकता था कि उनके सांस लेने की रफ्तार थोड़ी तेज़ हो गई थी। उनके गालों पर एक हल्की सी लाली दौड़ गई थी, जिसे वह अपने बिखरे हुए बालों की लटों के पीछे छुपाने की कोशिश कर रही थीं।

रस्म के तौर पर, अम्मी ने कटोरी से थोड़ी सी हल्दी अपनी उंगलियों पर ली। दुल्हन ने शर्माकर अपनी बाहें आगे कीं। हल्दी लगाने के लिए अम्मी को थोड़ा आगे झुकना पड़ा। औरतें उनके गिर्द घेरा बनाए खड़ी थीं, लेकिन विशाल ठीक सामने, उस घेरे के पीछे खड़ा था।

विशाल ने अचानक कहा, "एक मिनट रुकिए, मुझे यह रस्म कैप्चर करने दीजिए।" यह कहते हुए उसने अपना फोन बाहर निकाला। अम्मी ने उसकी तरफ देखा।

----------

जैसे ही आयशा ने विशाल की आवाज़ सुनी, उनकी उंगलियों में फँसी हल्दी वहीं जम गई। विशाल ने फोन का कैमरा बिल्कुल उस एंगल पर सेट किया था जहाँ से आयशा के झुकने की वजह से उनके पुष्ट मम्मों की गहराई और उनके पीले सूट के अंदर की हलचल साफ़ नज़र आ रही थी।

भीड़ को लग रहा था कि वह रस्म की तस्वीर ले रहा है, लेकिन आयशा जानती थीं कि उसके लेंस की नज़र कहाँ है।

आयशा (मन में): "या अल्लाह, यह सबके सामने क्या कर रहा है? सब देख रहे हैं... पर कोई नहीं जानता कि इस कैमरे के पीछे इसकी नीयत क्या है। मेरे मम्मे... मेरा यह बदन... आज एक खिलौना बनकर रह गया है।"

------------

उधर जैसे ही सायमा ने विशाल की आवाज़ सुनी, उसकी साँसें थम गईं। मन ही मन उसने सोचा, "हर फंक्शन में इसका आना ज़रूरी है क्या?" फिर डरते हुए सायमा ने अपनी निगाह विशाल की तरफ की, लेकिन उसने देखा कि विशाल का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। वह तो उसकी खाला को देख रहा था। उसकी निगाह का पीछा करते हुए सायमा की निगाह भी अपनी खाला की तरफ मुड़ी।

आयशा खाला का चेहरा झुका हुआ था और उनके हाथ मेहंदी लगा रहे थे, लेकिन उनके सूट के सीने का गला पूरा खुला हुआ था और उनके मम्मे पूरी तरह से नंगे नज़र आ रहे थे। सायमा का भी यह नज़ारा देखकर मुँह सूख गया। तभी विशाल की निगाह उसकी तरफ मुड़ी; उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

सायमा और आयशा, दोनों को एक साथ बेबस देखकर उसके मन में हवस का एक नया तूफान उठ खड़ा हुआ।

विशाल के विचार:

"कितना कातिल नज़ारा है... एक तरफ आयशा का यह भरा हुआ दूधिया बदन है जो मेरे कैमरे के इशारे पर झुकने को मजबूर है, और दूसरी तरफ यह सहमी हुई सायमा। क्यों न इन दोनों को एक ही खेल का हिस्सा बना दिया जाए? पहले इन दोनों को आपस में ही एक-दूसरे के करीब लाऊँगा। इस छोटी वाली को ऐसा मजबूर करूँगा कि यह खुद अपने हाथों से अपनी खाला के इस मखमली जिस्म को सहलाए, उनके इन पुष्ट मम्मों को चूमे और चाटे। जब दोनों शर्म और मजबूरी की आग में झुलस रही होंगी, तब मज़ा दोगुना हो जाएगा।"

उसने कैमरे का लेंस थोड़ा और ज़ूम किया, जहाँ आयशा के वक्षों का उतार-चढ़ाव साफ़ दिख रहा था, और फिर एक तिरछी नज़र सायमा के खौफज़दा चेहरे पर डाली।

"एक बार ये दोनों इस जाल में आ गईं, फिर एक ही सेज पर इन दोनों को एक साथ भुगतूँगा। . दोनों का गोरा बदन जब मेरे सामने बेपर्दा होगा, तब असली रंग जमेगा। अभी तो बस शुरुआत है, इस शादी के खत्म होने तक मैं इन दोनों को अपनी उंगलियों पर नचा कर रख दूँगा।"

विशाल ने अपने होठों पर जीभ फेरी और अपनी आँखों की उस गंदी चमक को कैमरे के पीछे छुपाते हुए एक और क्लिक किया। सायमा उसका वह चेहरा देखकर अंदर तक कांप गई, क्योंकि वह भांप चुकी थी कि इस दरिंदे की नज़रें अब सिर्फ उसकी खाला पर ही नहीं, बल्कि उन दोनों की इज़्ज़त पर एक साथ मंडरा रही हैं।

---------

अम्मी का दिल ज़ोर से धड़का। विशाल ने इशारे से अम्मी को और थोड़ा नीचे झुकने का संकेत दिया। अम्मी ने अपनी नज़रें झुका लीं, उनकी पलकें डर और शर्म से काँप रही थीं। उनके भारी वक्ष उस गहरे गले के सूट में जैसे और भी उभर आए थे, और विशाल के कैमरे के सामने उनकी 'गुलाबी युक्तियों' की बनावट उस महीन कपड़े के नीचे साफ़ झलक रही थी।

विशाल ने एक कुटिल मुस्कान के साथ फोन का बटन दबाया। फ्लैश की वह तेज़ रोशनी अम्मी की आँखों में नहीं, बल्कि उनके सीने पर जैसे किसी कोड़े की तरह पड़ी।

विशाल ने बड़ी बेशर्मी से कहा, "ठीक से रिकॉर्ड नहीं हो रहा है आयशा जी, आप थोड़ा और झुककर हल्दी लगाइए और अच्छे से लगाइए। मुझे यह सीन यादगार के तौर पर कैप्चर करना है।"

आयशा उसकी मांग को अच्छी तरह समझ गई थीं। इस बार उन्होंने और गहरा झुकते हुए दुल्हन के हाथों पर हल्दी लगानी शुरू की। उनके झुकने की वजह से उनके दोनों भारी मम्मे सूट के गले से बाहर की ओर छलक आए थे, और उस महीन पीले कपड़े के नीचे उनकी गुलाबी युक्तियाँ बिल्कुल साफ़ नुमाया हो रही थीं।

जैसे ही आयशा और ज़्यादा झुकीं, उनके बदन की वह 'गद्दार' सिहरन एक बार फिर लौट आई। विशाल ने अपना कैमरा ज़ूम किया ताकि वह आयशा के पुष्ट वक्षों के बीच की उस गहरी घाटी और उन सख्त हो चुकी युक्तियों को करीब से देख सके।

अम्मी (मन में): "या अल्लाह, मैं कितनी गिर गई हूँ। सबके सामने, अपनों के बीच... मैं इस दरिंदे को अपने जिस्म की नुमाइश करा रही हूँ। मेरे मम्मे इस ठंडी हवा और उसकी गंदी नज़र के सामने जैसे और भी बेबाक हो रहे हैं। क्या किसी ने देख तो नहीं लिया?"

विशाल ने रिकॉर्डिंग जारी रखी और एक हाथ से इशारे से उन्हें थोड़ा और रुकने को कहा। आयशा का चेहरा शर्म से दहक रहा था, लेकिन उनके जिस्म पर छा रही वह नमी और साँसों की गर्मी यह बता रही थी कि डर के साथ-साथ एक अनचाही वासना की लहर भी उनके अंदर दौड़ रही है।

वह एक ज़हरीले करार की गुलाम बन चुकी थीं, जहाँ हर रस्म उनके जिस्म की एक नई नीलामी थी। विशाल के चेहरे पर एक सुकून था—उसने जो माँगा था, आयशा ने भरी महफिल में उसे पेश कर दिया था।

---------------

ज़्यादातर लोग हल्दी की रस्म के जश्न में डूबे थे और कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा था, लेकिन विशाल का कैमरा और उसकी नज़रें सिर्फ उन्हीं उभारों पर टिकी थीं।

भीड़ की आवाज़ें आयशा के कानों में धुंधली हो रही थीं।

उस भीड़भाड़ वाले कमरे की गर्मी और हल्दी की खुशबू के बीच, माहौल अचानक मेरे लिए भारी हो गया। विशाल जिस तरह से फोन पकड़े हुए था, उसका एंगल सामान्य नहीं था। जब मैं उसके करीब पहुँचा, तो मुझे उसके फोन की स्क्रीन साफ़ नज़र आई। वह अम्मी के चेहरे की नहीं, बल्कि उनके गहरे गले से छलकती उन भारी मम्मों की वीडियो बना रहा था।

अम्मी उस वक्त पूरी तरह नीचे झुकी हुई थीं। पीले सूट का वह गला उनके वजूद का सबसे निजी हिस्सा बेपर्दा कर रहा था। उस महीन कपड़े के खिंचाव की वजह से उनके निप्पल्स के उभार इतने साफ़ थे कि कोई भी उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि अम्मी, जो हमेशा अपनी ओढ़नी सँभाल कर रखती थीं, आज इस कदर लापरवाह कैसे हो गईं। क्या उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनका यह दूधिया बदन इस वक्त महफिल की नुमाइश बना हुआ है?

विशाल के चेहरे की दरिंदगी देखकर मेरा खून खौल उठा, लेकिन साथ ही एक अजीब सी घबराहट ने मुझे जकड़ लिया। वह अपनी जीभ को अपने होठों पर फेर रहा था, जैसे वह उस मंज़र को अभी ही चख लेना चाहता हो। उसकी आँखों में एक अजीब सी हवस थी, जो अम्मी के उन पुष्ट उभारों को ज़ूम करके देख रही थी।

विशाल के बगल में खड़े होकर, उस स्क्रीन पर अम्मी के उस प्रतिबंधित हिस्से को देख मेरा अपना शरीर भी अकड़ने लगा। एक तरफ गुस्से की आग थी और दूसरी तरफ वह नज़ारा, जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था।

अम्मी ने दुल्हन की बांहों पर हल्दी मल दी, और फिर, बहुत धीरे से, जैसे उन्हें कोई जल्दी ना हो, वह सीधी हुईं। उन्होंने दुपट्टे को एक झटका नहीं दिया। बड़ी नज़ाकत से, एक-एक करके उसकी सिलवटें ठीक कीं, और उसे वापस अपने सीने पर इस तरह सेट किया कि सब कुछ ढक गया।

उन्होंने एक बार भी विशाल की तरफ नहीं देखा। लेकिन उन्हें देखने की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्हें पता था कि वह देख रहा था।

अम्मी ने अपनी पीली उंगलियों को देखा और मुस्कुराकर पीछे हट गईं, चाची-जी को आगे आने का इशारा करते हुए। अब दूल्हे की चाची जी और दूसरी औरतें आगे बढ़ आईं और बारी-बारी से दुल्हन को हल्दी लगाने लगीं। रस्म जारी थी, ढोलक और गानों का शोर और बढ़ गया था।

अम्मी अब रस्म के घेरे से बाहर आकर, किनारे पर खड़ी औरतों के झुंड में शामिल हो गईं। वह एक रिश्तेदार से हंस कर बात कर रही थीं। उनका रुख अभी भी उसी तरफ था जहाँ विशाल खड़ा था। और विशाल अभी भी वहीं था, जैसे ज़मीन से जुड़ गया हो। उसकी निगाहें अम्मी पर टिकी थीं।

वह इंतज़ार कर रहा था। और आखिरकार, अम्मी ने उसकी तरफ देखा।
 
इस बार उन्होंने नज़रें नहीं चुरायीं। भीड़ और शोर के बीच, उन दोनों ने एक खामोश आँगन बना लिया था। मैंने देखा, विशाल ने धीरे से अपनी एक आइब्रो उठाई। एक खामोश सवाल। 'यह जो ... यह मेरे लिए था, ना?'

अम्मी की आँखें एक पल के लिए हैरत से फैलीं। उन्होंने एक छोटा सा, ना मानने वाला इशारा किया, लेकिन उनके होठों के कोने पर दबी हुई मुस्कुराहट उनका झूठ पकड़ रही थी।

उसी मुस्कुराहट को देखकर विशाल के चेहरे पर जीत की चमक आ गई। उसके होंठ हिले। बिना आवाज़ के, उसने हर लफ़्ज़ को आहिस्ता से तराशा।

"मस्त"

अम्मी ने एक तेज़ सांस अंदर खींची, जो उनकी सहेली से की जा रही बात के बीच में ही अटक गई। उनकी एक हाथ की मुट्ठी कस गई, और दूसरा हाथ अनजाने में उनके दिल पर चला गया, जैसे उसकी धड़कन को काबू करने की कोशिश कर रही हों। लाली की एक गहरी लहर उनके गालों से होती हुई उनकी गर्दन तक उतर आई। उन्होंने फौरन अपनी नज़रें विशाल से हटा लीं, जैसे उस लफ़्ज़ की आग उन्हें झुलसा देगी।

लेकिन इससे पहले कि वह पूरी तरह पलटतीं, उन्होंने अपने अंगूठे से अपने नीचे वाले होंठ को बहुत धीरे से, एक लंबे, सोच-समझ कर किए गए अंदाज़ में छुआ। यह एक हल्का इशारा था, लेकिन इसमें एक पूरी कहानी थी। एक इकरार था।

उस दूरी से, विशाल ने इसे ज़रूर देखा होगा। वह उसके लफ़्ज़ का जवाब था। उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट फैली।

मेरा मन किया कि मैं चीख पड़ूँ, जाकर विशाल का गिरेबान पकड़ लूँ। लेकिन मैं बस वहाँ खड़ा, अपनी ही बेबसी पर जल रहा था।

रस्म खत्म होते ही ढोलक की आवाज़ बंद हो गई और नानी ने ऊँची आवाज़ में ऐलान किया, "चलिए सब लोग खाने के लिए आ जाइये! खाना तैयार है!"
 
Adhyay 11

Kamre mein subah ki pehli kiran jab parda cheerkar andar aayi, to maine aankhein kholin. Main saari raat bechain hokar soya tha.

Ammi mere bagal wale bed par nahin theen. Woh kamre mein aaine ke saamne khadi theen, unki peeth meri taraf thi. Aaine mein unka chehra saaf dikh raha tha, aur unka poora dhayan apne hothon par tha. Woh ek chhote se brush se apne hothon par chamakta hua lip gloss laga rahi theen. Unhone apne hothon ko thoda sa 'O' shape mein banakar gloss lagaya aur phir unhein aapas mein dabakar phailaya.

Woh haldi ke liye taiyaar theen. Unhone ek khoobsurat, basanti peele rang ka georgette ka suit pehna hua tha. Kameez halki thi, jis par safed chikankari ka kaam tha. Kameez unki kamar par kasi hui thi aur neeche unke hips ke gird ek nazakat se phail jaati thi.

Unke georgette ka dupatta unke kandhon par laparwahi se tika hua tha. Usaki na to koi pin lagi thi, na hi koi tah jami hui thi; bas woh unke jism ki harkat ke sath lahra raha tha. Dupatte ka ek chhor unki peeth par neeche tak ja raha tha, aur doosra unke seene ke oopar se hota hua unke hath tak. Jab woh lip gloss lagane ke liye thoda aage jhukeen, to dupatta kandhe se halka sa sarka, unki gori, mulayam collarbone aur kandhe ki golai ko be-parda kar gaya.

Unka dupatta unke seene par aise ik इकट्ठा tha ki unki donon chhatiyan us kapde ke neeche se aur bhi bhari hui aur gol lag rahi theen. Georgette ki kameez unki bra ki cup-line ko halkey se highlight kar rahi thi.

Unhone apne geele baalon ka jooda banaya hua tha, jisse paani ki kuchh boondein unki gardan par fisal rahi theen. Joode mein laga taza mogre ka gajra, unke badan se aa rahi sabun aur itra ki mehak mein milkar ek nasheeli khushboo bana raha tha. Kanon mein sone ke jhumke, gale mein ek patli si chain aur hathon mein kaanch ki peeli-hari choodiyan. Woh behad taza, bheeghi hui aur kaatil lag rahi theen.

Unhein is tarah dekhkar, kal raat ka saara shak dhuan bankar ud gaya. Yeh meri ammi nahin theen; yeh ek aurat thi, poori ki poori, jise main aaj pehli baar dekh raha tha. Vishal kya, koi bhi unhein dekhta to deewana ho jata. Yeh soch mere seene se bojh bankar nahin, balki ek ajeeb si garmahat bankar uthi, jo mere poore badan mein phail gayi.

Woh aaine mein mera aks dekhkar palteen, unke hothon par ek gehri muskaan thi. "Uth gaya, Sahil? Aise kya ghoor raha hai?"

Main hadbada kar uth baitha. "Sorry, ammi… woh… aap..." Alfaaz mere gale mein hi phans gaye.

"Main kya?" Unhone apni ek eyebrow uthate hue poochha. Unki aawaz mein wahi roz ki mamta thi, lekin aaj usmein ek alag si khanak thi, ek shararat. "Bahut acchhi lag rahi hoon?"

"Aap… kayamat lag rahi hain," lafz mere munh se fisal gaye.

Yeh sunkar unke gaal laal ho gaye. Woh sach mein sharma gayeen. "Badmaash. Chal, maska mat laga. Sab mehmaan neeche intezaar kar rahe hain. Jaldi se naha le."

Main bas haan mein sir hila saka.

"Aur sun," woh mere bed ke paas aakar, thoda jhukeen. Unke gajre aur unke jism ki mehak ne mujhe gher liya. Achanak meri nazar saamne ki taraf gayi, to mera gala hi sookh gaya. Meri aankhon ke saamne ammi ke donon mamme 75% se zyaada dikh rahe the. Unke beech ki ghaati, unki sudaul_ta... phir maine zabardasti apni aankhein pher leen, kyunki mujhe neeche kuchh tanav badhta hua mehsoos hua.

"Tu bhi woh peele rang ka kurta pehn lena."

Subah ki us khamoshi mein phone ki beep kisi dhamake jaisi lagi. Ammi ka dhayan us taraf hua. Meri nigah wapas se ammi ki taraf mudi taki main unhein phir se dekh sakoon, lekin ammi ab nightstand par rakhe phone ki taraf badheen. Aur jab unhone call karne wale ka naam dekha, to unke chehre par ek ajeeb si sihran daud gayi. Thode se sankoch ke sath unhone apna phone uthaya. Ammi kuchh type karne lageen, un messages ka jawab de rahi theen.

-----------

Vishal: Good morning Ayesha ji.

Ayesha: Good morning.

Vishal: Saari raat aapki yaad aati rahi, so hi nahi paya.

Ayesha (darte hue): Kyun?

Vishal: Bas apne hathon mein woh narmi mehsoos kar raha tha.

Ayesha: Main samjhi nahin.

Vishal: Aapke mammon ki...

Ayesha (sharmate hue): Vishal ji, aisi baatein mat kijiye.

Vishal: Aap to meri girlfriend hain, bhool gayeen? Hamara karar hua tha, yaad hai?

Ayesha (darte hue): Yaad hai.

Vishal: To meri girlfriend se ek guzarish hai—aaj main haldi ke function mein aa raha hoon. Main aapki mammon ki khoobsurati ko dekhna chahta hoon. Mujhe we donon poori tarah nazar aane chahiye, apni gulaabi nipples ke sath.

Ayesha ke zahan mein jaise ek zalzala aa gaya tha. Vishal ki us bebaak aur gandi maang ne unki rooh ko andar tak kampa diya tha. Unhone phone ko seene se sata liya, jaise woh un shabdon ko apne dil ke andar hi dafan kar dena chahti hon.

Unke man mein vicharon ka ek hinsak bawandar uth khada hua:

"Ya ,.', yeh shakhs kis mitti ka bana hai? Haldi ka paak mauka, ghar mein mehmaanon ki chahal-pahal, aur yeh mujhse mere jism ki numaish ki maang kar raha hai? 'Gulaabi tips'... kya use zara bhi andaza hai ki woh ek maa se, ek izzatdaar biwi se kya keh raha hai?"

Ayesha: "Mera bas chale to main abhi iska number block kar doon aur ghar ke darwaze iske liye band kar doon. Lekin Saima... . Agar maine iski baat nahi maani, to yeh us bacchi ki zindagi tabah kar dega. Aaj woh mamme dekhna chahta hai, kal commits isse bhi aage badhega."

Ayesha ki saansein tez ho gayeen aur unki aankhon se ek garm aansu dhalkar unke galon par aa gira.

Ayesha ke dimag mein bhale hi khauf aur nafrat ka toofan tha, lekin unke jism ne ek bilkul alag aur vishwasghati pratikriya di.

Ayesha ne mehsoos kiya ki Vishal ke message padhte hi unke pusht mammon mein ek sihran si daud gayi. We ubhaar, jinhein Vishal ne apni hatheliyon mein bheencha tha, achanak aur bhi bhaari mehsoos hone lage. Unke nipples, jinhein Vishal ne 'gulaabi tips' kehkar sambodhit kiya tha, we peele suit ke andar apne aap sakht hone lage. Yeh ek aisi sharmnaak sansani thi jise woh rokna chahti theen, lekin unka badan unke kabu se baahar tha.

Ayesha ne aaine ke saamne khade hokar apne us peele reshmi suit ko dekha jise unhone haldi ke function ke liye chuna tha. Suit ka gala thoda gehra tha, jo unki doodhiya gardan aur chhaati ke oopri hisse ko bebaak tareeke se dikha raha tha.

Suit ke patle kapde ke neeche unke bhaari mamme apni maujoodgi ka ehsaas kara rahe the. Vishal ke shabdon ka jadoo ya khauf itna gehra tha ki Ayesha ko mehsoos hua jaise unke nipples kapde ko faadkar baahar nikalna chahte hon. We sakht hokar suit ki satah par saaf ubhar aaye the, jo kisi bhi dekhne wale ke liye ek khula nimantran ho sakta tha.

Ayesha (hanfte hue man mein): "Tauba... yeh badan to jaise mera raha hi nahi. Abhi to usne sirf message kiya hai aur meri yeh halat hai? Agar usne sach mein sabke saamne andar jhaanka, to main khud ko kaise sambhaloongi? Ye ubhaar... ye nipples... jaise uski pukaar ka intezaar kar rahe hon. Main ek gunahgaar maa hoon, jo apni bacchi ko bachane ke bahane apne hi jism ki is gaddari ka lutf utha rahi hoon."

Ayesha kaanpte hathon se dupatte ko seene par odhne ki koshish ki, taki un sakht hote nipples ki numaish ko roka ja sake, lekin andar hi andar ek ajeeb si 'lazzat' unhein yeh ehsaas dila rahi thi ki aaj ka din us ke wajood ko poori tarah badal dene wala hai.

Ayesha ki saansein achanak tez aur garm ho gayeen.

Vishal ki woh "girlfriend" wali baat unke zahan mein ek kadwe nashe ki tarah utar rahi thi. Unhein yaad aaya ki kaise uski ungliyan unke nange pet par reng rahi theen, aur us yaad maatra se hi unki panty ke andar ek halki si nami mehsoos hone lagee.

Woh jitni shiddat se Vishal se nafrat karna chahti theen, unka badan utni hi shiddat se us 'haivan' ki yaadon ko sahej raha tha.

Unhein apni hui is 'gaddar' deh se khauf aane laga, jo ek taraf izzat ki duhai de r

ahi thi aur doosri taraf vishal ki us zahreeli vasna ki khumari mein doobti ja rahi thi.

-------

Chat ke baad maine ammi ko apna phone wapas unhi mammon ke beech mein rakhate hue dekha. Mere man mein aaya ki kash main woh phone hota, to unhein mehsoos kar pata. Ammi ki saansein tez chal rahi theen aur unke gaal poori tarah se laal ho chuke the. Phir ammi kuchh sochti hui meri taraf mudeen, "Jaldi taiyaar hokar aa jana," woh kehti hui kamre se baahar nikal gayeen.

Mere man mein khayal aaya—kya message aaya tha? Kiska tha? Abbu ka? Pehle to ammi theek se chat kar rahi theen, par ant mein unka chehra poora laal kyun ho gaya? Unki aankhon mein khauf dikh raha tha.

Main taiyaar hokar neeche, aangan ki taraf badha. Dholak ki thaap aur auraton ke gaane ki aawaz tez ho rahi thi. Aangan ko gende ke phoolon se sajaya gaya tha. Har taraf peela rang bikhra hua tha. Par meri nigahein bas ek hi chehre dhoondh rahi theen.

Aur phir woh mujhe dikheen.

Woh dulhan ke paas baithi theen, unke hath mein haldi ki katori thi. Woh hans rahi theen, kisi baat par unhone dulhan ki naak par shararat se haldi laga di. Unka chehra khushi se tamtama raha tha. Is bheed mein woh sabse alag, sabse haseen lag rahi theen.

------

Isse pehle Ayesha ne Saima ko dilasa dete hue kaha tha ki Vishal ab use pareshan nahin karega aur use apni shaadi ka aanand lena chahiye.

Jab Saima ne hairani se poochha ki yeh kaise mumkin hua, to Ayesha ne jhooth ka sahara lete hue kaha, "Maine use security officer mein jaane ki dhamki di hai, to woh kuchh paise lekar we tasveerein aur video delete karne ko taiyaar ho gaya hai."

Saima ne ghabrate hue poochha, "Kitne paise?"

Ayesha ne uski aankhon mein dekhte hue shanti se jawab diya, "Das lakh, par tu fikr mat kar, main sab sambhal loongi."

Haldi ki rasm ke beech Ayesha ki hansi ke peechhe ek gehra dard aur samjhauta chhipa tha. Woh jaanti theen ki Vishal ko das lakh ki nahi, balki unke is makhmali jism ki bhookh thi. Saima ke chehre par aayi muskaan Ayesha ke liye ek marham jaisi thi, lekin unka apna dil abhi bhi us khaufnaak 'karar' ke bojh tale daba tha.

--------

Peele reshmi suit mein Ayesha ka husn kahar dha raha tha. Jab woh jhukkar dulhan ko haldi laga rahi theen, to unka gehra gala unke bhaari aur pusht mammon ki ek jhalak de jata tha. Woh baar-baar apne dupatte ko sambhalne ki koshish kar rahi theen.

Wahin par meri naani khadi theen, naukar ko kuchh samjha rahi theen. Unhone mujhe dekhte hi apne paas bulaya.

"Sahil! Idhar aa. Subah se dekh rahi hoon, kuchh khaya hai ya bas hawa mein hi ud raha hai?" Unki aawaz mein wahi hamesha wali fikr thi.

"Nahin naani, bas abhi..."

"Bas bas, rehne de," unhone meri baat kaat di. "Chal, baith yahan." Unhone khud ek plate mein garma-garam poori aur aaloo ki sabzi rakhi. "Yeh le, chupchap khatam kar."

Main unki baat taal nahin saka aur ek kursi par baith gaya. Main nashta kar hi raha tha ki ek saaya mere oopar jhuka.

"Kya baat hai, Sahil! Bade handsome lag rahe ho peele kurte mein," ek jaani-pehchani aawaz aayi.

Maine palat kar dekha. Vishal. Woh bhi ek peela kurta pehne hue tha. Lekin woh akela nahin tha. Uske sath do auratein theen jinke hath mein khoobsurat sajai hui thaaliyan theen, jin par peele resham ke kapde the.

"Aap yahan?" Main thoda hairat se poochha.

"Main to doolhe ka dost hoon. Akram ki taraf se shagun ki haldi lekar aaya hoon," usne muskuraate hue kaha.

"Waise, teri ammi kahan hain?"

Uske munh se 'teri ammi' sunna mujhe ajeeb sa laga. Jaise yeh uske liye bas ek naam tha, jabki mere liye woh meri poori duniya theen, aur ab... ek uljhan bhi.

"Woh... wahin hain, dulhan ke paas," maine door ishara karte hue kaha.

Vishal ki nazar mere ishare ke sath us taraf ghoomi, aur ammi ko dekhte hi uski aankhon mein ek ajeeb si chamak aa gayi. "Acchha... to Ayesha ji yahan hain," usne dheere se kaha, jaise khud se baat kar raha ho.

"Main bas Ayesha ji ko haldi dekar aata hoon," woh yeh kehta hua ammi ki taraf chal diya. Aur main wahin kursi par baitha, apne hath mein poori ka niwala liye, use dekhta raha. Ek anjaan aadmi, jo ab anjaan nahin lag raha tha, meri ammi ki taraf ja raha tha, barabari ke hak se.

Plate mein rakha poori ka niwala wahin chhodkar ek jhatke se main khada hua, naani ki aawaz: 'Are kya hua?' peechhe kahin dabkar reh gayi. Main tezi se uske peechhe chal pada.

Mera har kadam dholak ki badhti hui thaap ke sath uth raha tha. Log, gaane, phoolon ki mehak, kuchh bhi mujhe mehsoos nahin ho raha tha. Meri aankhein bas do logon par tikee theen - Vishal ki chaodi peeth, aur uske aage, bheed mein chaand ki tarah chamakti meri ammi.

Vishal ammi ke paas seedha nahin gaya. Woh jaakar unsein thodi door khada ho gaya, jabki uske sath aayeen do auratein aage badheen. Main bhi unke peechhe khada ho gaya, jahan se main sab saaf-saaf dekh sakta tha.

Ek adhed umra ki aurat, jo shayad doolhe ki chachi ya tai thi, aage badhi. "Ayesha beti, hum Akram ki taraf se shagun ki haldi laaye hain."

Ammi, jo dulhan se hanskar kuchh keh rahi theen, unki aawaz sunkar palteen. Unke chehre par ek mehmaan nawaz muskaan aa gayi.

"Aaiye, aaiye, chachi ji. Hum aapka hi intezaar kar rahe the," unhone uthate hue kaha. Unki nigahein ek pal ke liye peechhe khade vishal par gayeen aur phir fauran hat gayeen.

Vishal wahin khada raha, uske hath uske kurte ki jeb mein the, aur uski nigahein ammi par gadi hui theen. Woh unhein is tarah dekh raha tha jaise bheed mein aur koi na ho. Besharmi se. Hak se.

Auratein rasm poori kar rahi theen. Haldi ki katori ek hath se doosre hath mein di ja rahi thi. Dholak baj rahi thi. Geet gaye ja rahe the. Lekin us shore mein, ek khamosh khel chal raha tha.

Ammi aise anjaan ban rahi theen jaise unhein vishal ki nazron ka ehsaas hi n ho. Woh chachi-ji se hans-hans kar baatein kar rahi theen, lekin main dekh sakta tha ki unke saans lene ki raftaar thodi tez ho gayi thi. Unke galon par ek halki si laali daud gayi thi, jise woh apne bikhre hue baalon ki laton ke peechhe chhupane ki koshish kar rahi theen.

Rasm ke taur par, ammi ne katori se thodi si haldi apni ungliyon par lee. Dulhan ne sharmakar apni baahein aage keen. Haldi lagane ke liye ammi ko thoda aage jhukna pada. Auratein unke gird ghera banaye khadi theen, lekin vishal theek saamne, us ghere ke peechhe khada tha.

Vishal ne achanak kaha, "Ek minute rukiye, mujhe yeh rasm capture karne dijiye." Yeh kehte hue usne apna phone baahar nikala. Ammi ne uski taraf dekha.

--------

Jaise hi Ayesha ne vishal ki aawaz suni, unki ungliyon mein phansi haldi wahin jam gayi. Vishal ne phone ka camera bilkul us angle par set kiya tha jahan se Ayesha ke jhukne ki wajah se unke pusht mammon ki gehrai aur unke peele suit ke andar ki halchal saaf nazar aa rahi thi.

Bheed ko lag raha tha ki woh rasm ki tasveer le raha hai, lekin Ayesha jaanti theen ki uske lens ki nazar kahan hai.

Ayesha (man mein): "Ya ,.', yeh sabke saamne kya kar raha hai? Sab dekh rahe hain... par koi nahin jaanta ki is kamre ke peechhe iski neeyat kya hai. Mere mamme... mera yeh badan... aaj ek khilona bankar reh gaya hai."

-------------

Udhar jaise hi Saima ne vishal ki aawaz suni, uski saansein tham gayeen. Man hi man usne socha, "Har function mein iska aana zaroori hai kya?" Phir darte hue Saima ne apni nigah vishal ki taraf ki, lekin usne dekha ki vishal ka dhayan uski taraf nahin tha. Woh to uski khala ko dekh raha tha. Uski nigah ka peechha karte hue Saima ki nigah bhi apni khala ki taraf mudi.

Ayesha khala ka chehra jhuka hua tha aur unke hath mehndi laga rahe the, lekin unke suit ke seene ka gala poora khula hua tha aur unke mamme poori tarah se nange nazar aa rahe the. Saima ka bhi yeh nazara dekhkar munh sookh gaya. Tabhi vishal ki nigah uski taraf mudi; uski aankhon mein ek ajeeb si chamak thi.

Saima aur Ayesha, donon ko ek sath bebas dekhkar uske man mein havas ka ek naya toofan uth khada hua.

Vishal ke vichar:

"Kitna kaatil nazara hai... ek taraf Ayesha ka yeh bhara hua doodhiya badan hai jo mere camere ke ishare par jhukne ko majboor hai, aur doosri taraf yeh sahmi hui Saima. Kyun na in donon ko ek hi khel ka hissa bana diya jaye? Pehle in donon ko aapas mein hi ek-doosre ke kareeb launga. Is chhoti wali ko aisa majboor karoonga ki yeh khud apne hathon se apni khala ke is makhmali jism ko sehlaye, unke in pusht mammon ko choome aur chaate. Jab donon sharm aur majboori ki aag mein jhulash rahi hongi, tab maza doguna ho jayega."

Usne camere ka lens thoda aur zoom kiya, jahan Ayesha ke vakshon ka utar-chhadav saaf dikh raha tha, aur phir ek tirchhi nazar Saima ke khaufzada chehre par daali.

"Ek baar ye donon is jaal mein aa gayeen, phir ek hi sej par in donon ko ek sath bhugtoonga. Donon ka gora badan jab mere saamne beparda hoga, tab asli rang jamega. Abhi to bas shuruat hai, is shaadi ke khatam hone tak main in donon ko apni ungliyon par nacha kar rakh doonga."

Vishal ne apne hothon par jeebh pheri aur apni aankhon ki us gandi chamak ko camere ke peechhe chhupate hue ek aur click kiya. Saima uska woh chehra dekhkar andar tak kaamp gayi, kyunki woh bhaamp chuki thi ki is darinde ki nazarein ab sirf uski khala par hi nahin, balki un donon ki izzat par ek sath mandra rahi hain.

----------

Ammi ka dil zor se dhadka. Vishal ne ishare se ammi ko aur thoda neeche jhukne ka sanket diya. Ammi ne apni nazarein jhuka leen, unki palkein dar aur sharm se kaamp rahi theen. Unke bhaari vaksh us gehrai wale suit mein jaise aur bhi ubhar aaye the, aur vishal ke camere ke saamne unki 'gulaabi yuktiyon' ki banawat us maheen kapde ke neeche saaf jhalak rahi thi.

Vishal ne ek kutil muskaan ke sath phone ka button dabaya. Flash ki woh tez roshni ammi ki aankhon mein nahin, balki unke seene par jaise kisi kode ki tarah padi.

Vishal ne badi besharmi se kaha, "Theek se record nahin ho raha hai Ayesha ji, aap thoda aur jhukkar haldi lagaiye aur accchhe se lagaiye. Mujhe yeh scene yaadgar ke taur par capture karna hai."

Ayesha uski maang ko acchhi tarah samajh gayi theen. Is baar unhone aur gehra jhukte hue dulhan ke hathon par haldi lagani shuru ki. Unke jhukne ki wajah se unke donon bhaari mamme suit ke gale se baahar ki ore chhalak aaye the, aur us maheen peele kapde ke neeche unki gulaabi yuktiyan bilkul saaf numaya ho rahi theen.

Jaise hi Ayesha aur zyaada jhukeen, unke badan ki wa 'gaddar' sihran ek baar phir laut aayi. Vishal ne apna camera zoom kiya taki woh Ayesha ke pusht vakshon ke beech ki us gehri ghaati aur un sakht ho chuki yuktiyon ko kareeb se dekh sake.

Ammi (man mein): "Ya ,.', main kitni gir gayi hoon. Sabke saamne, apnon ke beech... main is darinde ko apne jism ki numaish kara rahi hoon. Mere mamme is thandi hawa aur uski gandi nazar ke saamne jaise aur bhi bebaak ho rahe hain. Kya kisi ne dekh to nahin liya?"

Vishal ne recording jaari rakhi aur ek hath se ishare se unhein thoda aur rukne ko kaha. Ayesha ka chehra sharm se dehak raha tha, lekin unke jism par chha rahi woh nami aur saanson ki garmi yeh bata rahi thi ki dar ke sath-sath ek anchaahi vasna ki lahar bhi unke andar daud rahi hai.

Woh ek zahreeli karar ki gulaam ban chuki theen, jahan har rasm unke jism ki ek naye neelami thi. Vishal ke chehre par ek sukoon tha—usne jo maanga tha, Ayesha ne bhari mehfil mein use pesh kar diya tha.

Zyaadatat log haldi ki rasm ke jashn mein doobe the aur koi is baat par dhayan nahin de raha tha, lekin vishal ka camera aur uski nazarein sirf unhi ubhaaron par tikee theen.

Bheed ki aawazein Ayesha ke kaanon mein dhundhli ho rahi theen.

--------------

Us bheedbhad wale kamre ki garmi aur haldi ki khushboo ke beech, mauhol achanak mere liye bhaari ho gaya. Vishal jis tarah se phone pakde hue tha, uska angle samanya nahin tha. Jab main uske kareeb pahuncha, to mujhe uske phone ki screen saaf nazar aayi. Woh ammi ke chehre ki nahin, balki unke gehre gale se chhalakti un bhaari mammon ki video bana raha tha.

Ammi us waqt poori tarah neeche jhuki hui theen. Peele suit ka woh gala unke wajood ka sabse niji hissa beparda kar raha tha. Us maheen kapde ke khinchav ki wajah se unke nipples ke ubhaar itne saaf the ki koi bhi unhein anndekha nahin kar sakta tha. Mujhe yakeen nahin ho raha tha ki ammi, jo hamesha apni odhni sambhal kar rakhti theen, aaj is kadar laparwah kaise ho gayeen. Kya unhein andaza nahin tha ki unka yeh doodhiya badan is waqt mehfil ki numaish bana hua hai?

Vishal ke chehre ki darindagi dekhkar mera khoon khaul utha, lekin sath hi ek ajeeb si ghabrahat ne mujhe jakad liya. Woh apni jeebh ko apne hothon par pher raha tha, jaise woh us manzar ko abhi hi chakh lena chahta ho. Uski aankhon mein ek ajeeb si havas thi, jo ammi ke un bhaari ubhaaron ko zoom karke dekh rahi thi.

Vishal ke bagal mein khade hokar, us screen par ammi ke us pratibandhit hisse ko dekh mera apna shareer bhi akadane laga. Ek taraf gusse ki aag thi aur doosri taraf woh nazara, jisne mujhe andar tak hila kar rakh diya tha.

Ammi ne dulhan ki baanhon par haldi mal di, aur phir, bahut dheere se, jaise unhein koi jaldi na ho, woh seedhi hueen. Unhone dupatte ko ek jhatka nahin diya. Badi nazakat se, ek-ek karke uski silwatein theek keen, aur use wapas apne seene par is tarah set kiya ki sab kuchh dhak gaya.

Unhone ek baar bhi vishal ki taraf nahin dekha. Lekin unhein dekhne ki zaroorat hi nahin thi. Unhein pata tha ki woh dekh raha tha.

Ammi ne apni peeli ungliyon ko dekha aur muskuraakar peechhe hat gayeen, chachi-ji ko aage aane ka ishara karte hue. Ab doolhe ki chachi ji aur doosri auratein aage badh aayeen aur baari-baari se dulhan ko haldi lagane lageen. Rasm jaari thi, dholak aur gaanon ka shore aur badh gaya tha.

Ammi ab rasm ke ghere se baahar aakar, kinare par khadi auraton ke jhund mein shaamil ho gayeen. Woh ek rishtedar se hans kar baat kar rahi theen. Unka rukh abhi bhi usi taraf tha jahan vishal khada tha. Aur vishal abhi bhi wahin tha, jaise zameen se jud gaya ho. Uski nigah_ein ammi par tikee theen.

Woh intezaar kar raha tha. Aur aakhirkaar, ammi ne uski taraf dekha.

Is baar unhone nazarein nahin churayeen. Bheed aur shore ke beech, un donon ne ek khamosh aangan bana liya tha. Maine dekha, vishal ne dheere se apni ek eyebrow uthai. Ek khamosh sawaal. 'Yeh jo ... yeh mere liye tha, na?'

Ammi ki aankhein ek pal ke liye hairat se phaileen. Unhone ek chhota sa, na maanne wala ishara kiya, lekin unke hothon ke kone par dabi hui muskaan unka jhooth pakad rahi thi.

Usi muskaan ko dekhkar vishal ke chehre par jeet ki chamak aa gayi. Uske honth hile. Bina aawaz ke, usne har lafz ko aahista se tarasha.

"Mast"

Ammi ne ek tez saans andar kheenchi, jo unki saheli se ki ja rahi baat ke beech mein hi atak gayi. Unki ek hath ki mutthi kas gayi, aur doosra hath anjaane mein unke dil par chala gaya, jaise uski dhadkan ko kabu karne ki koshish kar rahi hon. Laali ki ek gehri lahar unke galon se hoti hui unki gardan tak utar aayi. Unhone fauran apni nazarein vishal se hata leen, jaise us lafz ki aag unhein jhulsa degi.

Lekin isse pehle ki woh poori tarah palat_teen, unhone apne angoothe se apne neeche wale honth ko bahut dheere se, ek lambe, soch-samajh kar kiye gaye andaaz mein chhua. Yeh ek halka ishara tha, lekin ismein ek poori kahaani thi. Ek ikraar tha.

Us doori se, vishal ne ise zaroor dekha hoga. Woh uske lafz ka jawab tha. Uske chehre par ek muskaan phaili.

Mera man kiya ki main cheekh padoon, jaakar vishal ka girebaan pakad loon. Lekin main bas wahin khada, apni hi bebasi par jal raha tha.

Rasm khatam hote hi dholak ki aawaz band ho gayi aur naani ne oonchi aawaz mein elaan kiya, "Chaliye sab log khaane ke liye aa jaiye! Khaana taiyaar hai!"
 
अध्याय 12

सायमा के मन में विचारों का एक तूफान उठ खड़ा हुआ था। वह अंदर तक हिल चुकी थी और अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं कर पा रही थी।

उसके मन में उठते सवाल:

"या अल्लाह, यह क्या हो रहा है? क्या खाला को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि वह क्या कर रही हैं? उनका पूरा बदन, उनके मम्मे इस तरह सबके सामने नुमाया हो रहे हैं... क्या उन्हें सच में नहीं दिख रहा कि वह कितना ज़्यादा बदन दिखा रही हैं? क्या वह सच में इतनी बेखबर हैं?

और वह विशाल... वह दरिंदा! वह सरेआम कैमरे से यह सब रिकॉर्ड कर रहा है और खाला चुपचाप सब सह रही हैं। खाला को तो पता होना चाहिए था! मैंने खुद उन्हें विशाल की गंदी नीयत और उसकी घिनौनी फितरत के बारे में आगाह किया था, उसे दूर रहने की चेतावनी दी थी। तो फिर आज वह उसके सामने इस तरह बेबस क्यों हैं?

ऐसा लग रहा था मानो विशाल इस पूरे सीन का डायरेक्टर बना बैठा हो। वह जिस तरह से हुक्म चला रहा था—'थोड़ा और झुककर हल्दी लगाइए'… और खाला उसकी हर बात मानकर और गहरा झुकती जा रही थीं… यह क्या है? क्या विशाल अब मुझे छोड़ने के लिए खाला को निशाना बना रहा है? क्या उसका अगला निशाना मेरी अज़ीज़ खाला हैं ताकि वह मुझे बख्श दे, या फिर वह हम दोनों की ज़िंदगी तबाह करना चाहता है?"

भीड़ के शोर के बीच सायमा का दम घुट रहा था। इन अनगिनत खौफनाक ख्यालों ने उसे अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया था, और वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी खाला को इस दलदल से कैसे बचाए।

----------

उधर टेंट के ठीक पीछे, जहाँ महफ़िल का शोर थोड़ा कम था, विशाल एक खंभे की ओट में खड़ा था। उसके होंठों पर वही शातिर और घिनौनी मुस्कान तैर रही थी। उसने अपनी जेब से फोन निकाला और स्क्रीन ऑन की। उसकी उंगलियाँ तेज़ी से गैलरी की तरफ बढ़ीं, जहाँ अभी-अभी रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरें सेव हुई थीं।

उसने वीडियो प्ले किया। स्क्रीन पर आयशा का वही बसंती पीले सूट वाला रूप उभर आया। जब वह दुल्हन को हल्दी लगाने के लिए नीचे झुकी थीं, तो गहरे गले से छलकते उनके भारी और पुष्ट मम्मों का वह लाजवाब नज़ारा कैमरे ने पूरी तरह कैद कर लिया था। विशाल ने वीडियो को पॉज़ किया और ज़ूम करके उस महीन जॉर्जेट के कपड़े के नीचे पूरी तरह सख्त हो चुकी उनकी 'गुलाबी टिप्स' की बनावट को देखने लगा।

"उफ़... क्या चीज़ है," विशाल ने दबी आवाज़ में अपनी जीभ को होठों पर फेरते हुए बुदबुदाया। "भरी महफ़िल में सबके सामने जो मज़ा इसने मुझे दिया है, उसकी तो कोई कीमत ही नहीं है। ज़रा सा हुक्म क्या चलाया, यह तो पूरी की पूरी न्यौछावर हो गई।"

फिर उसने अगली तस्वीर पर स्वाइप किया। उस फोटो में आयशा का चेहरा झुका हुआ था, उनकी आँखें शर्म और खौफ से काँप रही थीं, लेकिन उनका गोरा, दूधिया सीना पूरी तरह बेपर्दा होकर कैमरे के लेंस के सामने छलक रहा था। विशाल की आँखों में हवस की आग और गहरी हो गई। उसे याद आने लगा कि कैसे उसने आयशा के उन उभारों को अपनी हथेलियों में भींचा था और कैसे आज उसके सिर्फ एक मैसेज मात्र से आयशा का पूरा बदन उसकी उंगलियों पर नाचने को मजबूर हो गया था।

तस्वीरों को एक-एक करके देखते हुए वह अपनी ही जीत के नशे में डूबता जा रहा था। वह जानता था कि उसने एक तीर से दो शिकार कर लिए हैं—एक तरफ आयशा जैसी इज़्ज़तदार औरत उसके जाल में तड़प रही थी, और दूसरी तरफ सहमी हुई सायमा।

-----------

साहिल टेंट के कोने में खड़ा अपनी ही उंगलियों को चटका रहा था। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था, लेकिन सीने के अंदर एक भयानक आग सुलग रही थी। विशाल के फोन की स्क्रीन पर उसने जो देखा था, वह मंज़र उसकी आँखों के सामने से हट ही नहीं रहा था।

उसके मन में विचारों का एक हिंसक बवंडर उठ खड़ा हुआ:

"या अल्लाह... यह मैंने क्या देख लिया? क्या वह सच में मेरी अम्मी थीं? जो अम्मी घर की चारदीवारी में अपने दुपट्टे का एक कोना भी खिसकने पर उसे हड़बड़ाकर सँभालती थीं, आज वह इस भरे बाज़ार में, पूरी महफ़िल के सामने इस कदर लापरवाह कैसे हो गईं? क्या उन्हें ज़रा भी एहसास नहीं था कि उनका वह गहरा गला, उनके वे पुष्ट और भारी मम्मे पूरी तरह से छलक रहे थे?

और वह विशाल... वह कमीना सरेआम कैमरे का लेंस उनके सीने पर टिकाए खड़ा था, और अम्मी... अम्मी उसके इशारों पर और ज़्यादा झुकती जा रही थीं! जैसे वह कोई रस्म नहीं, बल्कि विशाल के हुक्म की तामीर कर रही हों। जब उसने कहा कि 'थोड़ा और झुकिए', तो अम्मी ने बिना किसी ऐतराज़ के अपने उस हिस्से को उसके कैमरे के सामने और ज़्यादा परोस दिया। क्यों? ऐसा क्या है उस शख्स के पास कि अम्मी उसके सामने इस कदर बेबस, इस कदर लाचार नज़र आ रही हैं?

सबसे ज़्यादा जो बात मुझे अंदर ही अंदर काट रही है, वह है उनका वह आख़िरी इशारा। जब सब कुछ खत्म हो गया, तो अम्मी ने नज़रें चुराने के बजाय सीधे विशाल की तरफ देखा। विशाल ने आँख उठाई और अम्मी ने ना में सिर हिलाया... लेकिन वह मुस्कान! उनके होठों के कोने पर वह दबी हुई, गद्दार मुस्कान साफ़ कह रही थी कि जो कुछ भी हुआ, वह सिर्फ उन दोनों के बीच का एक खेल था। और फिर... अपने अंगूठे से अपने नीचे वाले होंठ को उस तरह छूना... वह कोई अनजाने में की गई हरकत नहीं थी। वह एक इकरार था, एक मुकम्मल गवाही थी कि अम्मी को पता था कि उनके बदन की नुमाइश हो रही है, और वह इसका लुत्फ़ उठा रही थीं।

एक तरफ मेरा खून खौलता है कि मैं जाकर उस विशाल का गला घोंट दूँ, उसका फोन छीनकर टुकड़े-टुकड़े कर दूँ... लेकिन दूसरी तरफ, अम्मी के उस भीगे, मादक रूप को देखकर मेरे अपने बदन में एक शर्मनाक अकड़न पैदा हो रही है। मैं अपनी ही अम्मी को एक बेटे की नज़र से नहीं, बल्कि एक औरत की नज़र से देख बैठा हूँ। यह कैसी गद्दारी है? मैं उस दरिंदे से नफ़रत करूँ, या अपनी अम्मी की इस छुपी हुई हवस पर रोऊँ?"

भीड़ के बीच खड़ा साहिल अपनी मुट्ठियाँ भींचे खड़ा था। खाने की तरफ बढ़ती भीड़ और ढोलक की थम चुकी थाप के बीच, वह खुद को एक ऐसे अंधेरे कुएँ में गिरता हुआ महसूस कर रहा था, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।

----------

भीड़ हिली और आँगन के दूसरे हिस्से में लगे बुफे की तरफ बढ़ चली। बिरयानी की खुशबू, कबाबों के सिकने की महक और कोरमे का मसालेदार अरोमा हवा में घुल गया। अम्मी भी दूसरे रिश्तेदारों के साथ बुफे की ओर बढ़ चलीं। मैं भी उस भीड़ का हिस्सा था। मगर मैं लास्ट में था। मैंने प्लेट उठाई और उसमें खाना लिया।

फिर मैंने अम्मी को ढूँढा। वह नानी और अपने कुछ दूर के रिश्तेदार औरतों के साथ एक गोल टेबल पर बैठ चुकी थीं। मैं तेज़ी से उनकी तरफ गया और उनके बगल वाली खाली कुर्सी पर बैठ गया। अम्मी ने मुझे देखा तो वह मुस्कुरा दीं। "आ गया? कुछ और लाऊँ तेरे लिए?"

"नहीं, मैं ले लूँगा," मैंने कहा और उनके करीब बैठा रहा।

हम सब खाना खा रहे थे और साथ में बातें भी कर रहे थे। नानी मुझे छेड़ रही थीं, मौसी कुछ पूछ रही थीं। अम्मी भी इस सब में शामिल थीं। विशाल अपनी अलग टेबल पर, अपने लोगों के साथ बैठा था। सब कुछ नॉर्मल था।

तभी एक मौसी ने अम्मी से कहा, "आयशा, ज़रा गुलाब जामुन तो लाना, खत्म हो गए हैं।"

"मैं लाता हूँ," मैं फौरन उठा।

"तू बैठ," अम्मी ने मेरा हाथ दबा कर कहा। "मैं देखती हूँ।" और वह उठकर चली गईं।

मैं उन्हें जाते हुए देखता रहा। वह किचन के पास, कैटरिंग वालों से बात कर रही थीं। वह अकेली थीं। एक पल के लिए। और शायद विशाल को बस उसी एक पल का इंतज़ार था।

मैंने देखा, वह अपनी टेबल से प्लेट लेकर उठा और ऐसे चलने लगा जैसे उसे भी गुलाब जामुन लेना हो।

वह अम्मी के पास पहुँचा। अम्मी ने उसे देखा तो चौंक गईं। उसने अम्मी से कुछ कहा।

--------------

अम्मी के पास आकर वह बोला, "आप गुलाब जामुन खा रही हैं? मेरा तो कुछ और ही खाने का दिल कर रहा है।"

विशाल ने जब यह बात कही, तो उसके चेहरे पर एक बेहद अर्थपूर्ण और गंदी मुस्कान थी। वह अम्मी के इतने करीब खड़ा हो गया था कि उसका कंधा अम्मी की बाजू से लगभग छू रहा था। अम्मी के हाथ में गुलाब जामुन की प्लेट थी, लेकिन विशाल की आँखों में कुछ और ही पक रहा था। उसकी नज़रें अम्मी के चेहरे पर नहीं, बल्कि अभी भी उनके पुष्ट मम्मों की उस गहराई पर जमी हुई थीं जो झुकने की वजह से और भी ज़्यादा स्पष्ट हो गई थीं।

अम्मी का हाथ रुक गया। गुलाब जामुन की मिठास जैसे उनके हलक में ही कड़वी हो गई। उन्हें बखूबी समझ आ गया था कि विशाल के 'कुछ और खाने' से क्या मतलब है। वह उनके दूधिया बदन और उन गुलाबी युक्तियों की बात कर रहा था, जिन्हें उसने अभी कुछ देर पहले अपने कैमरे में कैद किया था।

अम्मी (धीमी आवाज़ में, घबराते हुए): "विशाल जी… यहाँ सब लोग हैं… आप क्या बोल रहे हैं?"

विशाल ने प्लेट से एक चम्मच उठाया और हवा में घुमाते हुए अम्मी के कान के पास झुककर फुसफुसाया, "लोग तो जश्न मना रहे हैं आयशा जी, लेकिन मेरा असली जश्न तो आपकी इन 'नसों' के बीच छिपा है। ये गुलाब जामुन तो फीके हैं, असली रस तो आपके इस मखमली वजूद में भरा है।"

विशाल ने बड़ी चालाकी से अपने हाथ की कोल्ड ड्रिंक का गिलास थोड़ा सा टेढ़ा किया और गहरा लाल शर्बत सीधे अम्मी के मखमली पैरों और उनकी सैंडल पर गिरा दिया।

"ओह! आई एम सो सॉरी, आयशा जी, कितनी बड़ी गलती हो गई मुझसे," विशाल ने बनावटी अफसोस जताते हुए कहा। इससे पहले कि अम्मी कुछ समझ पातीं, वह अपनी प्लेट नीचे रखकर उनके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया।

उसने अपनी जेब से एक रेशमी रूमाल निकाला और अम्मी के पैरों को साफ करने लगा। उसका हाथ जानबूझकर अम्मी की पिंडलियों और टखनों को छू रहा था। अम्मी हड़बड़ा गईं और पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन विशाल ने पूरी मज़बूती से उनका पैर पकड़ लिया।

विशाल (नीचे से ऊपर देखते हुए, धीमी और भारी आवाज़ में): "हिलिए मत आयशा जी, दाग गहरा है...।"

आस-पास के लोगों को लगा कि वह एक सज्जन की तरह सफाई कर रहा है, लेकिन अम्मी को उसकी अगली फुसफुसाहट ने अंदर तक कंपा दिया।

विशाल: "अब ज़रा धीरे से नीचे झुकिए... जैसे आप हल्दी लगा रही थीं। मुझे वो नज़ारा एक बार फिर करीब से देखना है। अपने इन मम्मों को मेरी आँखों के सामने लाइए।"

मैंने देखा कि अम्मी ने 'ना' में सिर हिलाया, उनके चेहरे पर घबराहट थी। वह इधर-उधर देख रही थीं।

फिर अम्मी ने एक आखिरी बार भीड़ की तरफ देखा।

उन्होंने काँपते हुए अपने हाथों को अपने घुटनों पर रखा और धीरे-धीरे नीचे झुकने लगीं। जैसे-जैसे वह झुकीं, उनका पीला सूट एक बार फिर उनके भारी और पुष्ट वक्षों के दबाव से तन गया। विशाल की आँखें उनके ब्लाउज के उस गहरे छेद में गड़ गईं, जहाँ से उनके नंगे मम्मों की गोलाई और वे सख्त गुलाबी युक्तियाँ बिल्कुल साफ़ नज़र आ रही थीं।

अम्मी की साँसें तेज़ हो गई थीं, और उनका चेहरा शर्म की आग में दहक रहा था।

यह सब बीस सेकंड में हो गया। बीस सेकंड में मेरा सुकून, मेरा भरोसा, सब कुछ बिखर गया।

विशाल ने अम्मी पर एक जीत भरी निगाह डाली और वहाँ से चला गया।

और मैं अपनी कुर्सी पर बैठा, प्लेट में रखी बिरयानी को देखता रहा, जो अब राख जैसी लग रही थी। उनके बीच की वह खामोश ज़बान, अब आवाज़ बन चुकी थी। और उस आवाज़ ने मेरे कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया था।

अम्मी टेबल पर वापस आईं। उनके हाथ में गुलाब जामुन का बड़ा बाउल था। उनका चेहरा ऐसा शांत था जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने बाउल टेबल पर रखा और मेरी तरफ देखे बिना अपनी कुर्सी पर बैठ गईं।

"ले साहिल, खा," उन्होंने बाउल मेरी तरफ सरकाते हुए कहा। उनकी आवाज़ नॉर्मल थी, लेकिन उसके पीछे की कपकपी मैं साफ़ सुन सकता था।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मेरी नज़र अभी भी प्लेट पर ही टिकी थी।

"क्या हुआ? खा ना," उन्होंने धीरे से पूछा, सिर्फ इतना कि मैं ही सुन सकूँ।

उनका स्पर्श, जो हमेशा मुझे सुकून देता था, आज आग जैसा लगा।

"कुछ नहीं अम्मी… भूख नहीं है," मैंने रूखे से जवाब दिया।

टेबल पर एकदम सन्नाटा छा गया। नानी, मौसी, सब मुझे हैरानी से देखने लगे। अम्मी का चेहरा सफेद पड़ गया। उनकी आँखों में दुख, घबराहट और एक अनकहा सवाल थे।

इससे पहले कि कोई कुछ कहता, मेहमानों के जाने का सिलसिला शुरू हो गया। विशाल और उसके साथ आए लोग भी विदा लेने के लिए उठ खड़े हुए।

जाते-जाते विशाल नानी के पास आदाब करने आया। फिर वह अम्मी के सामने खड़ा हुआ। "नानी जी, आपकी मेहमान-नवाजी याद रहेगी। हर चीज़... बहुत खूबसूरती से अरेंज की गई थी, बार-बार देखने का दिल करता है।" उसने आखिरी लफ़्ज़ कहते हुए एक पल के लिए अम्मी के मम्मों की तरफ देखा।

विशाल के लहजे में जो शातिरपन था, उसने अम्मी के शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। नानी तो उसकी तारीफ सुनकर मुस्कुरा रही थीं, लेकिन अम्मी जानती थीं कि 'खूबसूरती से अरेंज' की गई चीज़ों से उसका असली मतलब क्या था। उसकी आँखें एक पल के लिए उनके पुष्ट मम्मों पर ठहरीं, जैसे वह उस नज़ारे को अपने दिमाग की गैलरी में हमेशा के लिए सेव कर रहा हो।

अम्मी ने घबराहट में अपना दुपट्टा और ऊपर खींचने की कोशिश की, लेकिन विशाल की वह आखिरी चुभती हुई नज़र उनके सूट के कपड़े को चीरती हुई उनके सख्त हो चुके निप्पल्स को छू गई।

विशाल (धीमी आवाज़ में, सिर्फ अम्मी को सुनाई दे): "जल्द मिलेंगे आयशा जी... अपनी 'यादगार' चीज़ों को सँभाल कर रखिएगा।"

अम्मी कुछ बोल न सकीं, उनका गला सूख चुका था। विशाल एक विजयी मुस्कान के साथ मुड़ा और महफिल से बाहर निकल गया, लेकिन वह अपने पीछे अम्मी के बदन पर अपनी हवस की एक ऐसी छाप छोड़ गया जिसे वह चाहकर भी नहीं धो सकती थीं।

मैं यह सब देखता रहा। मेरा खून खौल रहा था। जैसे ही विशाल मेरी तरफ हाथ मिलाने के लिए बढ़ा, मैं बिना कुछ कहे वहाँ से उठ गया और सीधा अपने कमरे की तरफ चल दिया।

घर धीरे-धीरे खाली हो गया। शोर कम हो गया, लेकिन मेरे अंदर का तूफान बढ़ता जा रहा था।

कुछ देर बाद, दरवाज़े पर दस्तक हुई। "साहिल?" अम्मी की आवाज़ थी।

मैंने जवाब नहीं दिया।

दरवाज़ा धीरे से खुला। वह अंदर आईं और मेरे बेड के पास आकर बैठ गईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन मैंने अपना हाथ खींच लिया।

"साहिल, क्या बात है बेटा?" उनकी आवाज़ में दर्द था। "तुम मुझसे इस तरह नाराज़ क्यों हो? मैंने कुछ किया क्या?"

मैंने आँखें खोलीं और उनके चेहरे को देखा। वह मासूमियत से भरा चेहरा... क्या यह सब एक धोखा था?

"मैं थक गया हूँ, अम्मी," मैंने बे-रुखी से कहा। "सोना है।"

उनके चेहरे पर छाई उम्मीद बुझ गई। उन्होंने एक ठंडी सांस भरी। "ठीक है," वह धीरे से बोलीं और उठकर अपने बेड की तरफ चली गईं।

मैं करवट लेकर उन्हें ही देखता रहा। वह अपने बेड पर बैठ गईं, उनकी पीठ मेरी तरफ थी। एक पल के लिए कमरे में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज़ थी। और फिर... एक हल्की सी 'बज़' की आवाज़ हुई।

अम्मी ने फोन देखा। मैं उनका चेहरा नहीं देख पा रहा था, लेकिन उनके कंधों के हल्के से कांपने से मैं समझ गया कि वह मुस्कुरा रही हैं। उनकी उंगलियाँ बड़ी तेज़ी से फोन पर चैट कर रही थीं। हर 'टैप' की आवाज़ मेरे दिल पर हथौड़े की तरह लग रही थी।

कुछ मिनट बाद उन्होंने फोन रख दिया। "मैं ज़रा फ्रेश होकर आती हूँ," उन्होंने कहा और फोन को साइड टेबल पर चार्जिंग के लिए रख दिया।

वह उठ कर अटैच्ड वॉशरूम में चली गईं। यह मेरा मौका था।

मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, लेकिन मेरे जिस्म में एक अजीब सी फुर्ती आ गई थी। मैं बेड से उतरा और उनके फोन के पास गया। स्क्रीन अंधेरी थी। मैं जानता था कि अम्मी लॉक के लिए एक सिंपल सा पैटर्न इस्तेमाल करती हैं— L शेप का।

मेरी उंगलियाँ कांप रही थीं जब मैंने स्क्रीन पर वही 'L' बनाया।

एक 'क्लिक' की आवाज़ हुई। फोन अनलॉक हो गया।

मैंने फौरन व्हाट्सएप खोला। सबसे ऊपर 'विशाल' का नाम था। मैंने चैट खोली। ऊपर उसकी डिस्प्ले पिक्चर थी और नीचे मैसेजेस का सिलसिला था।

विशाल: हाय आयशा जी। कैसी हो?

आयशा: हेलो। ठीक हूँ।

विशाल: ऐसे ही बैठा था, तो सोचा, आपको याद कर लूँ।

आयशा: ओह्ह...

विशाल: और बताओ। क्या कर रही हो अभी…?

आयशा: कुछ नहीं। मैं भी बस बैठी हूँ...

विशाल: नाइस... एक बात कहूँ...? आप बुरा तो नहीं मानोगी?

आयशा: बताओ क्या बात है…

विशाल: हल्दी में आप बहुत कमाल लग रही थीं, आयशा जी… दुल्हन से ज़्यादा तो आप ब्यूटीफुल लग रही थीं…

आयशा: बस बस हाँ... झूठी तारीफें नहीं...

विशाल: सच बोल रहा हूँ… माँ कसम...

आयशा: ओववव... थैंक्स...

विशाल: अरे... थैंक्स किस लिए?....

आयशा: सच बोलने के लिए...

विशाल: मुझे आपका थैंक्स बोलना चाहिए...

आयशा: किस बात का?

विशाल: मेरी बात मानने के लिए। कसम से, आपके मम्मों को ऐसा देखकर कलेजा मुँह को आ गया।

विशाल: आपकी पिक्स और वीडियो बहुत अच्छी आई हैं… आपको बाद में दिखाऊँगा… एक एल्बम बनाऊँगा…

विशाल: क्या हुआ? आप मेरी बात का जवाब नहीं दे रही हैं। यकीन नहीं होता तो पिक्स भेजूँ, या उसे वेडिंग व्हाट्सएप ग्रुप में सेंड करूँ?

आयशा: नहीं...

विशाल: अरे... आप क्यों शरमा रही हैं? आप मेरी फेवरेट हो...

आयशा: बस बस... विशाल जी...

विशाल: सच बोल रहा हूँ… पता है हल्दी के वक्त जब आपका दुपट्टा नीचे फिसल गया था... मेरी सांस ही अटक गई थी... वह नज़ारा पूरी ज़िंदगी याद रहेगा मुझे...

विशाल: आपकी क्लीवेज पर जो काला तिल था... उसे देखकर मेरा दिल इतना ज़ोर से धड़क रहा था... मानो कहीं फट ना जाए... और ऊपर से आपके वे दो गुलाबी नुकीले... ऐसा लग रहा था वे मेरे इंतज़ार में खड़े थे…

विशाल: मेरी गर्लफ्रेंड रिस्पॉन्स नहीं कर रही, क्या शरमा गई? आपको याद है ना हमारा वादा?

आयशा: ओह्ह... इतना गौर से कौन देखता है?....

विशाल: जो चीज़ होश उड़ा दे, उसे गौर से ही देखा जाता है।

आयशा: बदतमीज़।

विशाल: तमीज़ से ही तो कह रहा हूँ। उस पीले रंग में आप... आग लग रही थीं। बिल्कुल। हाथों पर हल्दी... और आँखों में वह चमक...

विशाल: तो... शाम को क्या कर रही हो?

आयशा: प्री-वेडिंग पार्टी मान लो। बहुत सारे गेस्ट्स... रिलेटिव्स... दावत... फन...

विशाल: कूल... और आप क्या पहनोगी?....

आयशा: एक बहुत सुंदर डिज़ाइनर मरून और गोल्ड सलवार-सूट है।

विशाल: मरून... नहीं। ब्लैक पहनो और उसके नीचे लाल अंडरगारमेंट्स |

आयशा: ब्लैक? शादी के फंक्शन में? लोग क्या कहेंगे?

विशाल: लोग तो कहते रहेंगे। लेकिन ब्लैक में... आप जो लगोगी... सोच कर ही...

आयशा: सोचकर क्या?

विशाल: सोच कर ही गर्मी बढ़ रही है। ब्लैक आपके गोरे जिस्म पर अलग ही चमकेगा।

आयशा: तुम्हारी बातें ना...

विशाल: प्लीज आयशा जी, मेरी बात मान लो... और दो-तीन पिक भी शेयर कर दीजिएगा…

विशाल: उसमें काला तिल और गुलाबी टिप्स वाली ज़रूर हों…

आयशा: देखती हूँ।

विशाल: 'देखती हूँ' नहीं... 'भेजूँगी' कहो।

आयशा: ज़िद्दी हो।

विशाल: सिर्फ आपके लिए। इंतज़ार करूँगा, आयशा।

आयशा: चलो... बहुत काम है... गुड आफ्टरनून।

मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। हाथ अब भी कांप रहे थे, लेकिन अब सिर्फ घबराहट से नहीं... गुस्से और एक अजीब सी घिन से। हर लफ़्ज़, हर इमोजी... "ब्लैक पहनो और उसके नीचे लाल अंडरगारमेंट्स"... "तिल है"...”ऊपर से आपके वे दो गुलाबी नुकीले”... "दुपट्टा"... मेरे कानों में हथौड़ों की आवाज़ बज रही थी।

ऊपर पुरानी चैट के मैसेजेस भी थे। मैं उन्हें पढ़ने ही वाला था कि बाथरूम से आवाज़ आई। मैंने जल्दी से फोन को वापस चार्जिंग पर लगाया और स्क्रीन को लॉक करके अंधेरा कर दिया—बिल्कुल वैसा ही, जैसा उन्होंने छोड़ा था।

मैं तेज़ी से पलटकर अपने बिस्तर पर लेट गया और चादर को अपने ऊपर खींच लिया, पीठ उनकी तरफ करके। आँखें ज़ोर से बंद कर लीं, जैसे मैं सोया हुआ था, जैसे मैंने कुछ नहीं देखा। पर अब नींद और सुकून मेरी ज़िंदगी से कोसों दूर जा चुके थे।

तभी... शॉवर की आवाज़ बंद हो गई। एकदम खामोशी छा गई। कुछ पल बाद वॉशरूम के दरवाज़े के खुलने की 'क्लिक' की आवाज़ आई। मैं सांस रोके लेटा रहा। मुझे उनके कदमों की नर्म आवाज़ आई। फिर कमरे में उनके परफ्यूम, साबुन और शैम्पू की मिली-जुली महक फैल गई। वही महक जो बचपन से मुझे दुनिया की सबसे महफूज़ जगह लगती थी। आज... आज उस महक में मुझे धोखे की एक अजीब सी चुभन महसूस हो रही थी।

बाथरूम के बंद दरवाजे के पीछे, आयशा आईने के सामने खड़ी खुद को निहार रही थीं। बाहर शादी का शोर था, लेकिन उनके दिमाग में विशाल के उन मैसेजेस का शोर उससे कहीं ज्यादा तेज था।

"कितना शातिर है वह... जब मैंने उसके मैसेज का फौरन जवाब नहीं दिया, तो उसने अपनी असली औकात दिखा दी। 'यकीन नहीं होता तो पिक्स भेजूँ, या उसे वेडिंग व्हाट्सएप ग्रुप में सेंड करूँ?'—यह धमकी नहीं, सीधा खंजर था जो उसने मेरी इज़्ज़त पर चलाया है।"

आयशा का हाथ अनजाने में उनके पुष्ट मम्मों पर चला गया, जिन्हें वह दुपट्टे से छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

"वह दरिंदा महफिल में सबके सामने मेरे जिस्म की नुमाइश कराता रहा और मैं एक कठपुतली की तरह झुककर उसे नज़ारे देती रही। और अब वह उन वीडियो और तस्वीरों का इस्तेमाल मुझे पूरी तरह अपना गुलाम बनाने के लिए कर रहा है। वह मुझे याद दिला रहा है कि मैं अब सिर्फ एक माँ या बीवी नहीं हूँ, बल्कि उसकी वह 'गर्लफ्रेंड' हूँ जिसे वह जब चाहे बेपर्दा कर सकता है।"

उन्होंने कांपते हाथों से अपने चेहरे पर पानी के छींटे मारे, पर विशाल की बातें किसी उनके ज़हन से नहीं उतर रही थीं।

आईने में अपनी अक्स को देखते हुए उनके मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ:

आयशा ने धीरे से अपने कुर्ते का गला थोड़ा नीचे किया और उस काले तिल को देखा जिसे विशाल 'क्लीवेज' की गहराई में ढूंढ चुका था। उनका चेहरा शर्म से तमतमा उठा।

"बदतमीज़... कितनी गहराई से उसने मेरे बदन को टटोला है। 'गुलाबी नुकीले'... या अल्लाह, उसने उन हिस्सों का नाम लिया जिन्हें एक औरत अपने शौहर के अलावा किसी को नहीं दिखाती।“

"काला रंग... वह जानता है कि काले लिबास में मेरा गोरा जिस्म और भी निखरेगा। वह चाहता है कि मैं शाम को उसके लिए एक तोहफे की तरह सजकर जाऊँ। क्या मुझमें इतनी भी हिम्मत नहीं कि मैं उसे मना कर दूँ? क्या मैं सच में उसकी जागीर बनती जा रही हूँ?"

आयशा के दिमाग में विशाल की वह आखिरी शर्त किसी बिजली की तरह कौंध गई। उसने न सिर्फ काला सूट पहनने को कहा था, बल्कि एक ऐसी मांग भी रख दी थी जिसने आयशा के तन-बदन में आग लगा दी थी।
 
आयशा के दिमाग में विशाल की वह आखिरी शर्त किसी बिजली की तरह कौंध गई। उसने न सिर्फ काला सूट पहनने को कहा था, बल्कि एक ऐसी मांग भी रख दी थी जिसने आयशा के तन-बदन में आग लगा दी थी।

आयशा के विचार:

"काला सूट... और उसके नीचे लाल अंडरगारमेंट्स। वह जानता है कि काले महीन कपड़े के नीचे लाल रंग की वह चमक कितनी उत्तेजक लगेगी। उसने साफ लफ्जों में हुक्म दिया है कि उसे मेरे गोरे बदन पर वे 'लाल पट्टियाँ' और 'लाल लेस' देखनी हैं। यह सिर्फ एक फरमाइश नहीं थी, यह उसकी ज़िद थी कि मैं पूरी तरह उसकी पसंद के सांचे में ढल जाऊं।"

"लाल रंग... खतरे का रंग, हवस का रंग। जब मैं वह काला पारदर्शी सूट पहनूँगी और उसके नीचे से वे लाल सुर्ख अंडरगारमेंट्स झलकेंगे, तो विशाल की नज़रें मुझे कच्चा चबा जाएंगी। वह चाहता है कि मैं अंदर से बाहर तक उसकी दी हुई पहचान में रहूँ।

उसे मेरे उन मम्मों पर वह लाल रंग देखना है, जो उसके हिसाब से 'गुलाबी टिप्स' के साथ मिलकर कहर ढाएगा।"

उनकी रूह कांप उठी, पर साथ ही उनके जिस्म में एक अजीब सी बेताबी दौड़ गई।

जैसे-जैसे वह विशाल की बातों को याद कर रही थीं, उन्हें महसूस हुआ कि उनके भारी मम्मे एक बार फिर भारी और सख्त होने लगे हैं। आईने में उन्हें साफ़ दिख रहा था कि उनके निप्पल्स कपड़े के ऊपर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।

"मेरा यह बदन... यह क्यों उसकी गंदी बातों पर इस कदर महक उठता है? वह मुझे डरा रहा है, मुझे ब्लैकमेल कर रहा है, और मेरा जिस्म उसकी अगली मांग का इंतज़ार कर रहा है। क्या मैं सच में शाम को वह काला सूट पहनूँगी? क्या मैं उसे वे तस्वीरें भेजूँगी जो उसने माँगी हैं?"

"अगर फहद को पता चला कि उनकी बीवी एक गैर मर्द को अपनी 'गुलाबी टिप्स' दिखाने का वादा कर रही है, तो वह तो जीते जी मर जाएंगे। लेकिन अगर मैंने विशाल को खुश नहीं रखा, तो सायमा की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी। मुझे यह गुनाह करना ही होगा… सायमा के लिए, या शायद अपनी उस दबी हुई चाहत के लिए, जो विशाल ने जगा दी है।"

आयशा ने गहरी सांस ली और अपने चेहरे पोंछ लिया। उनकी आँखों में अब एक अजीब सी चमक थी—एक ऐसा फैसला जो शर्मनाक था, पर अटल था।
 
अध्याय 12

Sayma ke mann mein vicharon ka ek toofan uth khada hua tha. Vah andar tak hil chuki thi aur apni aankhon par yaqeen nahi kar pa rahi thi.

Uske mann mein uthte sawal:

"Ya ,.', yeh kya ho raha hai? Kya Khala ko zara bhi andaza nahi hai ki vah kya kar rahi hain? Unka poora badan, unke mamme is tarah sabke saamne numayan ho rahe hain... kya unhein sach mein nahi dikh raha ki vah kitna zyada badan dikha rahi hain? Kya vah sach mein itni bekhabar hain?

Aur vah Vishal... vah darinda! Vah sareaam camere se yeh sab record kar raha hai aur Khala chupchap sab sah rahi hain. Khala ko toh pata hona chahiye tha! Maine khud unhein Vishal ki gandi niyat aur uski ghinooni fitrat ke baare mein aagah kiya tha, use door rahne ki chetavni di thi. Toh phir aaj vah uske saamne is tarah bebas kyun hain?

Aisa lag raha tas mano Vishal is poore scene ka director bana baitha ho. Vah jis tarah se hukm chala raha tha—'thoda aur jhukkar haldi lagaiye'… aur Khala uski har baat maankar aur gehra jhukti ja rahi thi… yeh kya hai? Kya Vishal ab mujhe chhodne ke liye Khala ko nishana bana raha hai? Kya uska agla nishana meri azeez Khala hain taki vah mujhe bakhsh de, ya phir vah hum dono ki zindagi tabah karna chahta hai?"

Bheed ke shor ke beech Sayma ka dam ghut raha tha. In anginath khaufnak khayalon ne use andar se poori tarah tod diya tha, aur vah samajh nahi pa rahi thi ki apni Khala ko is daldal se kaise bachaye.

--------------

Udhar tent ke theek peeche, jahan mehfil ka shor thoda kam tha, Vishal ek khambhe ki oat mein khada tha. Uske honton par vahi shatir aur ghinooni muskaan tair rahi thi. Usne apni jeb se phone nikala aur screen on ki. Uski ungliyan tezi se gallery ki taraf badhein, jahan abhi-abhi record kiye gaye video aur tasveerein save hui thi.

Usne video play kiya. Screen par Aisha ka vahi basanti peele suit wala roop ubhar aaya. Jab vah dulhan ko haldi lagane ke liye neeche jhuki thi, toh gehre gale se chhalkate unke bhaari aur pusht mammon ka vah lajawab nazara camere ne poori tarah qaid kar liya tha. Vishal ne video ko pause kiya aur zoom karke us maheen georgette ke kapde ke neeche poori tarah sakht ho chuki unki 'gulabi tips' ki banawat ko dekhne laga.

"Uff... kya cheez hai," Vishal ne dabi aawaz mein apni jeeb ko honton par pherte hue budbudaya. "Bhari mehfil mein sabke saamne jo maza isne mujhe diya hai, uski toh koi keemat hi nahi hai. Zara sa hukm kya chalaya, yeh toh poori ki poori nyauchhavar ho gayi."

Phir usne agli tasveer par swipe kiya. Us photo mein Aisha ka chehra jhuka hua tha, unki aankhein sharm aur khauf se kaamp rahi thi, lekin unka gora, doodhiya seena poori tarah beparda hokar camere ke lens ke saamne chhalak raha tha. Vishal ki aankhon mein havas ki aag aur gehri ho gayi. Use yaad aane laga ki kaise usne Aisha ke un ubharon ko apni hatheliyon mein bheencha tha aur kaise aaj uske sirf ek message maatr se Aisha ka poora badan uski ungliyon par naachne ko majboor ho gaya tha.

Tasveeron ko ek-ek karke dekhte hue vah apni hi jeet ke nashe mein doobta ja raha tha. Vah jaanta tha ki usne ek teer se do shikar kar liye hain—ek taraf Aisha jaisi izzatdar aurat uske jaal mein tadap rahi thi, aur doosri taraf sahmi hui Sayma.

-------------

Sahil tent ke kone mein khada apni hi ungliyon ko chatka raha tha. Uska dimag sunn ho chuka tha, lekin seene ke andar ek bhayanak aag sulag rahi thi. Vishal ke phone ki screen par usne jo dekha tha, vah manzar uski aankhon ke saamne se hat hi nahi raha tha.

Uske mann mein vicharon ka ek hinsak bavandar uth khada hua:

"Ya ,.'... yeh maine kya dekh liya? Kya vah sach mein meri Ammi thi? Jo Ammi ghar ki chardivari mein apne dupatte ka ek kona bhi khisakne par use hadbadakar sambhalti thi, aaj vah is bhare bazaar mein, poori mehfil ke saamne is kadar laparwah kaise ho gayi? Kya unhein zara bhi ehsaas nahi tha ki unka vah gehra gala, unke ve pusht aur bhaari mamme poori tarah se chhalak rahe the?

aur vah Vishal... vah kameena sareaam camere ka lens unke seene par tikaye khada tha, aur Ammi... Ammi uske isharon par aur zyada jhukti ja rahi thi! Jaise vah koi rasm nahi, balki Vishal ke hukm ki tameer kar rahi hon. Jab usne kaha ki 'thoda aur jhukiye', toh Ammi ne bina kisi aitraaz ke apne us hisse ko uske camere ke saamne aur zyada paros diya. Kyun? Aisa kya hai us shakhs ke paas ki Ammi uske saamne is kadar bebas, is kadar laachar nazar aa rahi hain?

Sabse zyada jo baat mujhe andar hi andar kaat rahi hai, vah hai unka vah aakhiri ishaara. Jab sab kuch khatm ho gaya, toh Ammi ne nazrein churane ke bajay seedhe Vishal ki taraf dekha. Vishal ne aankh uthai aur Ammi ne naa mein sir hilaya... lekin vah muskaan! Unke honton ke kone par vah dabi hui, gaddar muskaan saaf kah rahi thi ki jo kuch bhi hua, vah sirf un dono ke beech ka ek khel tha. Aur phir... apne angoothe se apne neeche wale hont ko us tarah chhoona... vah koi anjaane mein ki gayi harkat nahi thi. Vah ek ikraar tha, ek mukammal gavahi thi ki Ammi ko pata tha ki unke badan ki numaish ho raha hai, aur vah iska lutf utha rahi thi.

Ek taraf mera khoon khaultha hai ki mein jaakar us Vishal ka gala ghont doon, uska phone chheenkar tukde-tukde kar doon... lekin doosri taraf, Ammi ke us bheege, maadak roop ko dekhkar mere apne badan mein ek sharmnaak akdan paida ho rahi hai. Mein apni hi Ammi ko ek bete ki nazar se nahi, balki ek aurat ki nazar se dekh baitha hoon. Yeh kaisi gaddari hai? Mein us darinde se nafrat karoon, ya apni Ammi ki is chhupi hui havas par roon?"

Bheed ke beech khada Sahil apni mutthiyan bheencha khada tha. Khaane ki taraf badhti bheed aur dholak ki tham chuki thaap ke beech, vah khud ko ek aise andhere kuan mein girta hua mehsoos kar raha tha, jahan se baahar nikalne ka koi raasta nahi tha.

------------

Bheed hili aur aangan ke doosre hisse mein lage buffet ki taraf badh chali. Biryani ki khushboo, kababon ke sikne ki mehak aur korme ka masaledar aroma hava mein ghul gaya. Ammi bhi doosre rishtedaron ke sath buffet ki ore badh chalin. Mein bhi us bheed ka hissa tha. Magar mein last mein tha. Maine plate uthai aur usmein khaana liya.

Phir maine Ammi ko dhoondha. Vah nani aur apne kuch door ke rishtedar auraton ke sath ek gol table par baith chuki thin. Mein tezi se unki taraf gaya aur unke bagal wali khaali kursi par baith gaya. Ammi ne mujhe dekha toh vah muskura deen. "Aa gaya? Kuch aur laoon tere liye?"

"Nahi, mein le loonga," maine kaha aur unke qareeb baitha raha.

Hum sab khaana kha rahe the aur sath mein baatein bhi kar rahe the. Nani mujhe chhed rahi thin, mausi kuch pooch rahi thin. Ammi bhi is sab mein shaamil thin. Vishal apni alag table par, apne logon ke sath baitha tha. Sab kuch normal tha.

Tabhi ek mausi ne Ammi se kaha, "Aisha, zara gulaab jamun toh laana, khatm ho gaye hain."

"Mein laata hoon," mein fauran utha.

"Tu baith," Ammi ne mera hath daba kar kaha. "Mein dekhti hoon." Aur vah uthkar chali gayin.

Mein unhein jaate hue dekhta raha. Vah kitchen ke paas, catering walon se baat kar rahi thin. Vah akeli thin. Ek pal ke liye. Aur shayad Vishal ko bas usi ek pal ka intezar tha.

Maine dekha, vah apni table se plate lekar utha aur aise chalne laga jaise use bhi gulaab jamun lena ho.

Vah Ammi ke paas pahuncha. Ammi ne use dekha toh chauk gayin. Usne Ammi se kuch kaha.

Ammi ke paas aakar vah bola, "Aap gulaab jamun kha rahi hain? Mera toh kuch aur hi khaane ka dil kar raha hai."

Vishal ne jab yeh baat kahi, toh uske chehre par ek behad arthpoorn aur gandi muskaan thi. Vah Ammi ke itne qareeb khada ho gaya tha ki uska kandha Ammi ki baju se lagbhag chhoo raha tha. Ammi ke hath mein gulaab jamun ki plate thi, lekin Vishal ki aankhon mein kuch aur hi pak raha tha. Uski nazrein Ammi ke chehre par nahi, balki abhi bhi unke pusht mammon ki us gehrai par jami hui thin jo jhukne ki wajah se aur bhi zyada spasht ho gayi thin.

Ammi ka hath ruk gaya. Gulaab jamun ki mithaas jaise unke halak mein hi kadvi ho gayi. Unhein bakhubi samajh aa gaya tha ki Vishal ke 'kuch aur khaane' se kya matlab hai. Vah unke doodhiya badan aur un gulabi yuktiyon ki baat kar raha tha, unhein usne abhi kuch der pehle apne camere mein qaid kiya tha.

Ammi (dheemi aawaz mein, ghabrate hue): "Vishal ji… yahan sab log hain… aap kya bol rahe hain?"

Vishal ne plate se ek chammach uthaya aur hava mein ghumate hue Ammi ke kaan ke paas jhukkar phusphusaya, "Log toh jashn mana rahe hain Aisha ji, lekin mera asli jashn toh aapki in 'nason' ke beech chhipa hai. Yeh gulaab jamun toh pheeke hain, asli ras toh aapke is makhmali vajood mein bhara hai."

Vishal ne badi chaalaki se apne hath ki cold drink ka gilaas thoda sa tedha kiya aur gehra laal sharbat seedhe Ammi ke makhmali pairon aur unki sandal par gira diya.

"Oh! I am so sorry, Aisha ji, kitni badi galti ho gayi mujhse," Vishal ne banawati afsos jatate hue kaha. Isse pehle ki Ammi kuch samajh paatin, vah apni plate neeche rakhkar unke pairon ke paas ghutnon ke bal baith gaya.

Usne apni jeb se ek reshmi roomal nikala aur Ammi ke pairon ko saaf karne laga. Uska hath jaanboojhkar Ammi ki pindliyon aur takhnon ko chhoo raha tha. Ammi hadbada gayin aur peeche hatne ki koshish ki, lekin Vishal ne poori mazbooti se unka pair pakad liya.

Vishal (neeche se oopar dekhte hue, dheemi aur bhaari aawaz mein): "Hiliye mat Aisha ji, daag gehra hai...।"

Aas-paas ke logon ko laga ki vah ek sajjan ki tarah safai kar raha hai, lekin Ammi ko uski agli phusphusahat ne andar tak kampa diya.

Vishal: "Ab zara dheere se neeche jhukiye... jaise aap haldi laga rahi thin. Mujhe vo nazara ek baar phir qareeb se dekhna hai. Apne in mammon ko meri aankhon ke saamne laiye."

Maine dekha ki Ammi ne 'na' mein sir hilaya, unke chehre par ghabrahat thi. Vah idhar-udhar dekh rahi thin.

Phir Ammi ne ek aakhiri baar bheed ki taraf dekha.

Unhone kaampte hue apne haathon ko apne ghutnon aur dheere-dheere neeche jhukne lagin. Jaise-jaise vah jhukin, unka peela suit ek baar phir unke bhaari aur pusht vakshon ke dabav se tan gaya. Vishal ki aankhein unke blouse ke us gehre chhed mein gad gayin, jahan se unke nange mammon ki golai aur ve sakht gulabi yuktiyan bilkul saaf nazar aa rahi thin.

Ammi ki saansein tez ho gayi thin, aur unka chehra sharm ki aag mein dehak raha tha.

Yeh sab bees second mein ho gaya. Bees second mein mera sukoon, mera bharosa, sab kuch bikhar gaya.

Vishal ne Ammi par ek jeet bhari nigah dali aur vahan se chala gaya.

An mein apni kursi par baitha, plate mein rakhi biryani ko dekhta raha, jo ab raakh jaisi lag rahi thi. Unke beech ki vah khamosh zaban, ab aawaz ban chuki thi. Aur us aawaz ne mere kaanon mein pighla hua sheesha daal diya tha.

Ammi table par vaapas aayin. Unke hath mein gulaab jamun ka bada bowl tha. Unka chehra aisa shaant tha jaise kuch hua hi na ho. Unhone bowl table par rakha aur meri taraf dekhe bina apni kursi par baith gayin.

"Le Sahil, kha," unhone bowl meri taraf sarkaate hue kaha. Unki aawaz normal thi, lekin uske peeche ki kapkapi mein saaf sun sakta tha.

Maine koi jawab nahi diya. Meri nazar abhi bhi plate par hi tiki thi.

"Kya hua? Kha na," unhone dheere se poocha, sirf itna ki mein hi sun sakoon.

Unka sparsh, jo hamesha mujhe sukoon deta tha, aaj aag jaisa laga.

"Kuch nahi Ammi… bhookh nahi hai," maine rookhe se jawab diya.

Table par ekdam sannata chha gaya. Nani, mausi, sab mujhe hairani se dekhne lage. Ammi ka chehra safed pad gaya. Unki aankhon mein dukh, ghabrahat aur ek ankaha sawal the.

Isse pehle ki koi kuch kahta, mehmaanon ke jaane ka silsila shuru ho gaya. Vishal aur uske sath aaye log bhi vida lene ke liye uth khade hue.

Jaate-jaate Vishal nani ke paas aadaab karne aaya. Phir vah Ammi ke saamne khada hua. "Nani ji, aapki mehman-nawazi yaad rahegi. Har cheez... bahut khoobsurati se arrange ki gayi thi, baar-baar dekhne ka dil karta hai." Usne aakhiri lafzh kahte hue ek pal ke liye Ammi ke mammon ki taraf dekha.

Vishal ke lehje mein jo shatirpan tha, usne Ammi ke shareer mein ek siharan paida kar di. Nani toh uski tareef sunkar muskura rahi thin, lekin Ammi jaanti thin ki 'khoobsurati se arrange' ki gayi cheezon se uska asli matlab kya tha. Uski aankhein ek pal ke liye unke pusht mammon par thehrein, jaise vah us nazare ko apne dimag ki gallery mein hamesha ke liye save kar raha ho.

Ammi ne ghabrahat mein apna dupatta aur oopar kheenchne ki koshish ki, lekin Vishal ki vah aakhiri chubhti hui nazar unke suit ke kapde ko cheerti hui unke sakht ho chuke nipples ko chhoo gayi.

Vishal (dheemi aawaz mein, sirf Ammi ko sunai de): "Jald milenge Aisha ji... apni 'yaadgar' cheezon ko sambhaal kar rakhiyega."

Ammi kuch bol na sakin, unka gala shookh chuka tha. Vishal ek vijayi muskaan ke sath muda aur mehfil se baahar nikal gaya, lekin vah apne peeche Ammi ke badan par apni havas ki ek aisi chhaap chhod gaya jise vah chahkar bhi nahi dho sakti thin.

Mein yeh sab dekhta raha. Mera khoon khaul raha tha. Jaise hi Vishal meri taraf hath milane ke liye badha, mein bina kuch kahe vahan se uth gaya aur seedha apne kamre ki taraf chal diya.

Ghar dheere-dheere khaali ho gaya. Shor kam ho gaya, lekin mere andar ka toofan badhta ja raha tha.

Kuch der baad, darwaze par dastak hui. "Sahil?" Ammi ki aawaz thi.

Maine jawab nahi diya.

Darwaza dheere se khula. Vah andar aayin aur mere bed ke paas aakar baith gayin. Unhone mera hath pakadna chaaha, lekin maine apna hath kheench liya.

"Sahil, kya baat hai beta?" unki aawaz mein dard tha. "Tum mujhse is tarah naraaz kyun ho? Maine kuch kiya kya?"

Maine aankhein kholin aur unke chehre ko dekha. Vah maasoomiyat se bhara chehra... kya yeh sab ek dhokha tha?

"Mein thak gaya hoon, Ammi," maine be-rukhi se kaha. "Sona hai."

Unke chehre par chhai umeed bujh gayi. Unhone ek thandi saans bhari. "Theek hai," vah dheere se bolin aur uthkar apne bed ki taraf chali gayin.

Mein karvat lekar unhein hi dekhta raha. Vah apne bed par baith gayin, unki peeth meri taraf thi. Ek pal ke liye kamre mein sirf hamari saanso ki aawaz thi. Aur phir... ek halki si 'buzz' ki aawaz hui.

Ammi ne phone dekha. Mein unka chehra nahi dekh pa raha tha, lekin unke kandhon ke halke se kaampne se mein samajh gaya ki vah muskura rahi hain. Unki ungliyan badi tezi se phone par chat kar rahi thin. Har 'tap' ki aawaz mere dil par hathode ki tarah lag rahi thi.

Kuch minute baad unhone phone rakh diya. "Mein zara fresh hokar aati hoon," unhone kaha aur phone ko side table par charging ke liye rakh diya.

Vah uth kar attached washroom mein chali gayin. Yeh mera mauka tha.

Mera dil zoron se dhadak raha tha, lekin mere jism mein ek ajeeb si phurti aa gayi thi. Mein bed se utra aur unke phone ke paas gaya. Screen andheri thi. Mein jaanta hoon ki Ammi lock ke liye ek simple sa pattern istemaal karti hain— L shape ka.

Meri ungliyan kaamp rahi thin jab maine screen par vahi 'L' banaya.

Ek 'click' ki aawaz hui. Phone unlock ho gaya.

Maine fauran WhatsApp khola. Sabse oopar 'Vishal' ka naam tha. Maine chat kholi. Oopar uski display picture thi aur neeche messages ka silsila tha.

Vishal: Hi Aisha ji. Kaisi ho?

Aisha: Hello. Theek hoon.

Vishal: Aise hi baitha tha, toh socha, aapko yaad kar loon.

Aisha: Ohhh...

Vishal: Aur batao. Kya kar rahi ho abhi…?

Aisha: Kuch nahi. Mein bhi bas baethi hoon...

Vishal: Nice... Ek baat kahoon...? Aap bura toh nahi manogi?

Aisha: Batao kya baat hai…

Vishal: Haldi mein aap bahut kamaal lag rahi thin, Aisha ji… Dulhan se zyada toh aap beautiful lag rahi thin…

Aisha: Bas bas haan... jhoothi tareefein nahi...

Vishal: Sach bol raha hoon… maa kasam...

Aisha: Ohhhh... thanks...

Vishal: Are... thanks kis liye?....

Aisha: Sach bolne ke liye...

Vishal: Mujhe aapka thanks bolna chahiye...

Aisha: Kis baat ka?

Vishal: Meri baat maanne ke liye. Kasam se, aapke mammon ko aisa dekhkar kaleja munh ko aa gaya.

Vishal: Aapki pics aur video bahut acchi aayin hain… aapko baad mein dikhaunga… ek album banaunga…

Vishal: Kya hua? Aap meri baat ka jawab nahi de rahi hain. Yaqeen nahi hota toh pics bhejoon, ya use wedding WhatsApp group mein send maroon?

Aisha: Nahi...

Vishal: Are... aap kyun sharma rahi hain? Aap meri favorite ho...

Aisha: Bas bas... Vishal ji...

Vishal: Sach bol raha hoon… pata hai haldi ke vaqt jab aapka dupatta neeche phisak gaya tha... meri saans hi atak gayi thi... vah nazara poori zindagi yaad rahega mujhe...

Vishal: Aapki cleavage par jo kaala til tha... use dekhkar mera dil itna zor se dhadak raha tha... mano kahin phat na jaaye... aur oopar se aapke ve do gulabi nukeele... aisa lag raha tha ve mere intezar mein khade the…

Vishal: Meri girlfriend response nahi kar rahi, kya sharma gayi? Aapko yaad hai na hamara vada?

Aisha: Ohhh... itna gaur se kaun dekhta hai?....

Vishal: Jo cheez hosh uda de, use gaur se hi dekha jaata hai.

Vishal: Badtameez.

Vishal: Tameez se hi toh kah raha hoon. Us peele rang mein aap... aag lag rahi thin. Bilkul. Haathon par haldi... aur aankhon mein vah chamak...

Vishal: Toh... shaam ko kya kar rahi ho?

Aisha: Pre-wedding party maan lo. Bahut saare guests... relatives... daawat... fun...

Vishal: Cool... aur aap kya pehnogi?....

Aisha: Ek bahut sundar designer maroon aur gold salwar-suit hai.

Vishal: Maroon... nahi. Black pehno aur uske neeche laal undergarments।

Aisha: Black? Shaadi ke function mein? Log kya kahenge?

Vishal: Log toh kahte rahenge. Lekin black mein... aap jo lagogi... soch kar hi...

Aisha: Sochkar kya?

Vishal: Soch kar hi garmi badh rahi hai. Black aapke gore jism par alag hi chamkega.

Aisha: Tumhari baatein na...

Vishal: Please Aisha ji, meri baat maan lo... aur do-teen pic bhi share kar dijiyega…

Vishal: Usmein kaala til aur gulabi tips vaali zaroor hon…

Aisha: Dekhti hoon.

Vishal: 'Dekhti hoon' nahi... 'bhejongi' kaho.

Aisha: Ziddi ho.

Vishal: Sirf aapke liye. Intezar karunga, Aisha.

Aisha: Chalo... bahut kaam hai... good afternoon.

Mera dimag sunn ho gaya tha. Hath ab bhi kaamp rahe the, lekin ab sirf ghabrahat se nahi... gusse aur ek ajeeb si ghin se. Har lafzh, her emoji... "Black pehno aur uske neeche laal undergarments"... "til hai"... "oopar se aapke ve do gulabi nukeele"... "dupatta"... mere kaanon mein hathodon ki aawaz baj rahi thi.

Oopar purani chat ke messages bhi the. Mein unhein padhne hi wala tha ki bathroom se aawaz aayi. Maine jaldi se phone ko vaapas charging par lagaya aur screen ko lock karke andhera kar diya—bilkul vaisa hi, jaisa unhone chhoda tha.

Mein tezi se paltkar apne bister par let gaya aur chadar ko apne oopar kheench liya, peeth unki taraf karke. Aankhein zor se band kar leen, jaise mein soya hua tha, jaise maine kuch nahi dekha. Par ab neend aur sukoon meri zindagi se koson door ja chuke the.

Tabhi... shower ki aawaz band ho gayi. Ekdam khamoshi chha gayi. Kuch pal baad washroom ke darwaze ke khulne ki 'click' ki aawaz aayi. Mein saans roke leta raha. Mujhe unke kadmon ki narm aawaz aayi. Phir kamre mein unke perfume, sabun aur shampoo ki mili-juli mehak phail gayi. Vahi mehak jo bachpan se mujhe duniya ki sabse mahfooz jagah lagti thi. Aaj... aaj us mehak mein mujhe dhokhe ki ek ajeeb si chubhan mehsoos ho rahi thi.

Bathroom ke band darwaze ke peeche, Aisha aayine ke saamne khadi khud ko nihar rahi thin. Baahar shaadi ka shor tha, lekin unke dimag mein Vishal ke un messages ka shor usse kahin zyada tez tha.

"Kitna shatir hai vah... jab maine uske message ka fauran jawab nahi diya, toh usne apni asli aukat dikha di. 'Yaqeen nahi hota toh pics bhejoon, ya use wedding WhatsApp group mein send maroon?'—yeh dhamki nahi, seedha khanjar tha jo usne meri izzat par chalaya hai."

Aisha ka hath anjaane mein unke pusht mammon par chala gaya, unhein vah dupatte se chhupane ki nakaam koshish kar rahi thin.

"Vah darinda mehfil mein sabke saamne mere jism ki numaish karata raha aur mein ek kathputli ki tarah jhukkar use nazare deti rahi. Aur ab vah un video aur tasveeron ka istemaal mujhe poori tarah apna gulaam banane ke liye kar raha hai. Vah mujhe yaad dila raha hai ki mein ab sirf ek maa ya beevi nahi hoon, balki uski vah 'girlfriend' hoonise vah jab chahe beparda kar sakta hai."

Unhone kaampte haathon se apne chehre par paani ke chheente maare, par Vishal ki baatein kisi unke zahan se nahi utar rahi thin.

Aayine mein apni aks ko dekhte hue unke mann mein vicharon ka bavandar uth khada hua:

Aisha ne dheere se apne kurte ka gala thoda neeche kiya aur us kaale til ko dekha jise Vishal 'cleavage' ki gehrai mein dhoondh chuka tha. Unka chehra sharm se tamtama utha.

"Badtameez... kitni gehrai se usne mere badan ko tatola hai. 'Gulabi nukeele'... ya ,.', usne un hisson ka naam liya unhein ek aurat apne shauhar ke alawa kisi ko nahi dikhati।"

"Kaala rang... vah jaanta hai ki kaale libaas mein mera gora jism aur bhi nikhrega. Vah chahta hai ki mein shaam ko uske liye ek tohfe ki tarah sajkar jaoon. Kya mujhmein itni bhi himmat nahi ki mein use mana kar doon? Kya mein sach mein uski jaageer banti ja rahi hoon?"

Aisha ke dimag mein Vishal ki vah aakhiri shart kisi bijli ki tarah kaundh gayi. Usne na sirf kaala suit pehnne ko kaha tha, balki ek aaisi maang bhi rakh di thi jisne Aisha ke tan-badan mein aag laga di thi.

Aisha ke vichar:

"Kaala suit... aur uske neeche laal undergarments. Vah jaanta hai ki kaale maheen kapde ke neeche laal rang ki vah chamak kitni uttejak lagegi. Usne saaf lafzhon mein hukm diya hai ki use mere gore badan par ve 'laal pattiyan' aur 'laal lace' dekhni hain. Yeh sirf ek farmaish nahi thi, yeh uski zid thi ki mein poori tarah uski pasand ke saanche mein dhal jaoon."

"Laal rang... khatre ka rang, havas ka rang. Jab mein vah kaala paardarshi suit pehnungi aur uske neeche se ve laal surkh undergarments jhalakenge, toh Vishal ki nazrein mujhe kaccha chaba jaangi. Vah chahta hai ki mein andar se baahar tak uski di hui pehchaan mein rahoon.

Use mere un mammon par vah laal rang dekhna hai, jo uske hisab se 'gulabi tips' ke sath milkar qahar dhayega."

Unki rooh kaamp uthi, par sath hi unke jism mein ek ajeeb si betabi daud gayi.

Jaise-jaise vah Vishal ki baaton ko yaad kar rahi thin, unhein mehsoos hua ki unke bhaari mamme ek baar phir bhaari aur sakht hone lage hain. Aayine mein unhein saaf dikh raha tha ki unke nipples kapde ke oopar apni maujoodgi darj kara rahe the.

"Mera yeh badan... yeh kyun uski gandi baaton par is kadar mehak uthta hai? Vah mujhe dara raha hai, mujhe blackmail kar raha hai, aur mera jism uski agli maang ka intezar kar raha hai. Kya mein sach mein shaam ko vah kaala suit pehnungi? Kya mein use ve tasveerein bhejongi jo usne maangi hain?"

"Agar Fahad ko pata chala ki unki beevi ek gair mard ko apni 'gulabi tips' dikhane ka vada kar rahi hai, toh vah toh jeete ji mar jaayenge. Lekin aur maine Vishal ko khush nahi rakha, toh Sayma ki zindagi barbaad ho jaayegi. Mujhe yeh gunaah karna hi hoga… Sayma ke liye, ya shayad apni us dabi hui chaahat ke liye, jo Vishal ne jaga di hai."

Aisha ne gehri saans le aur apne chehre ponch liya. Unki aankhon mein ab ek ajeeb si chamak thi—ek aisa faisla jo sharmnaak tha, par atal tha.
 
अध्याय 13

अम्मी आईने के सामने खड़ी हो गईं। उनकी पीठ मेरी तरफ थी। वह बिल्कुल सफेद, मोटे रोएँ वाले टेरीक्लॉथ के बाथरोब में लिपटी थीं। बेल्ट कमर पर ढीला सा बंधा था, बस नाम की एक गिरह थी। कपड़ा उनके गीले जिस्म से चिपक गया था, खासकर उनके कंधों के उभार और कमर के हल्के से कर्व पर, जिससे उनके जिस्म का सांचा साफ़ नज़र आ रहा था।

कमरे की हल्की रोशनी उनकी गीली त्वचा पर पड़ रही थी, जो अभी भी गर्म पानी से गुलाबी हो रही थी। लेकिन मेरी नज़र उनके काले, गीले बालों पर ठहर गई थी, जिन्हें उन्होंने एक तरफ कर रखा था। पानी की मोटी-मोटी बूंदें उनके बालों के सिरों से टपक रही थीं। एक बूंद उनकी गर्दन के 'नेप' में एक पल के लिए ठहरती और फिर उनकी स्पाइन की लकीर पर एक चमकदार रास्ता बनाती हुई बाथरोब के कपड़े में समा जाती।

यह मंज़र इतना घरेलू था, इतना जाना-पहचाना... लेकिन आज, विशाल के शब्दों के बाद, यह दुनिया का सबसे गैर और सबसे बेचैन कर देने वाला मंज़र लग रहा था।

फिर उन्होंने अलमारी खोली और हैंगर्स को अपने हाथों से खिसकाने लगीं, जैसे कुछ ढूँढ रही हों।

मेरा दिल डूब रहा था। मैं बस दुआ कर रहा था… 'प्लीज... अम्मी... मरून सूट... प्लीज वह मरून सूट निकालें…'

अम्मी ने एक हैंगर निकाला। उस पर एक जोड़ा लटक रहा था और वह काला था। एक चमकदार, गहरा काला सूट।

उन्होंने उस काले सूट को एक पल के लिए अपने बाथरोब के ऊपर ही, अपने जिस्म के सामने, लगाकर देखा। आईने में उनका अक्स... एक ऐसी औरत थी जिसे मैं नहीं जानता था।

यह फैसला हो चुका था। वह उस 'विशाल' के लिए पहन रही थी।

फिर वह वापस से अलमारी में कुछ ढूँढने लगीं। मेरा दिल बैठा जा रहा था; क्या अम्मी लाल अंडरगारमेंट्स ढूँढ रही हैं? क्या वह विशाल की इतनी गुलाम हो गई हैं कि उसकी हर बात मानेंगी?

अम्मी ने छुपाकर कुछ निकाला और काले सूट के नीचे छुपा लिया। मैं देख नहीं पाया कि वह क्या था।

अम्मी पलटीं और सूट को अपने हाथ में लेकर वापस वॉशरूम की तरफ चली गईं। दरवाज़ा उनके पीछे बंद हुआ और हल्की सी 'क्लिक' की आवाज़ ने उनके इरादे पर मोहर लगा दी।

मैंने अपनी आँखें सख्ती से बंद कर लीं। मेरा खून जो कुछ देर पहले खौल रहा था, अब बिल्कुल ठंडा पड़ गया था—बिल्कुल बर्फ की तरह। शाम की पार्टी अब एक जश्न नहीं, एक सज़ा बनने वाली थी।

मैं भागकर अम्मी का फोन देखने गया, लेकिन वह वहाँ नहीं था, जहाँ पहले पड़ा था।

कमरे में फिर वही खामोशी छा गई, लेकिन इस बार यह खामोशी चुभने वाली थी। हर सेकंड एक घंटे जैसा लग रहा था। मैं बस उनके बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।

----------------

वॉशरूम के अंदर की हवा अभी भी गर्म भाप और साबुन की खुशबू से भारी थी। आयशा ने अपना बाथरोब उतारा और उसे हुक पर टांग दिया। उनका दूधिया बदन उस नमी में और भी चमक रहा था।

तभी आयशा के मोबाइल पर एक हल्की सी आवाज़ हुई, जैसे कोई नया मैसेज आया हो। सन्नाटे में हुई उस ज़रा सी आवाज़ से भी आयशा का दिल दहल गया। उसने डरते हुए, कांपते हाथों से अपना मोबाइल उठाया। स्क्रीन की रोशनी में एक नाम चमक रहा था—विशाल।

उस मैसेज को खोलते ही आयशा के माथे पर पसीना आ गया। उसमें विशाल की तरफ से एक शर्त लिखी थी:

विशाल: "अगर आप आज मेरी फरमाइश पूरी करेंगी, तभी आप मेरे मोबाइल में से सायमा की तीन तस्वीरें डिलीट करवा पाएंगी। लेकिन याद रहे, आज की आपकी तस्वीरों में मेरी पसंद के कुछ खास तत्व होने चाहिए..."

दूसरी तरफ, विशाल की नज़रें लगातार अपने मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी हुई थीं। जैसे ही स्क्रीन पर 'ब्लू टिक' चमका और उसे यकीन हो गया कि आयशा ने उसका संदेश पढ़ लिया है, उसके होठों पर एक शातिर मुस्कान तैर गई। उसने कुछ सेकंड का इंतज़ार किया, ताकि शब्दों का खौफ आयशा के ज़हन में पूरी तरह उतर जाए, और फिर बिना देर किए उसने उस मैसेज को 'डिलीट फॉर एवरीवन' कर दिया।

वह बेहद चालाक था; उसने अपनी ब्लैकमेलिंग और उस गंदी मांग का एक भी सबूत आयशा के पास नहीं छोड़ा था। अब उस चैट बॉक्स में सिर्फ एक खाली जगह थी, लेकिन आयशा के दिल में वो खौफनाक शर्त हमेशा के लिए छप चुकी थी।

आयशा ने कांपते हाथों से अलमारी से निकाला हुआ वह लाल रेशमी लिबास उठाया—वही लाल अंडरगारमेंट्स, जिनका हुक्म विशाल ने दिया था।

जैसे ही उन्होंने वे लाल सुर्ख कपड़े अपने बदन पर चढ़ाए, उन्हें महसूस हुआ कि यह सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि विशाल की हवस की ज़ंजीरें हैं। उन्होंने आईने की तरफ देखा और अपने ही अक्स को देखकर उनके हाथ ठिठक गए।

आईने में एक ऐसी औरत खड़ी थी जिसे आयशा खुद पहचान नहीं पा रही थी। वह गहरा लाल रंग उनके गोरे जिस्म पर किसी आग की तरह दहक रहा था। उस लाल ब्रा के टाइट कप्स उनके सुडौल और पुष्ट मम्मों को ऊपर की ओर धकेल रहे थे, जिससे उनकी क्लीवेज की गहराई और भी साफ़ और गहरी नज़र आ रही थी। विशाल के शब्दों की याद मात्र से उनके निप्पल्स उस रेशमी कपड़े के नीचे सख्ती से उभर आए थे, जो साफ़ तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।

आयशा के विचार:

"या अल्लाह, मैं क्या कर रही हूँ? काले सूट के नीचे यह लाल रंग... यह तो किसी दुल्हन की सेज का लिबास लग रहा है।"

उन्होंने अपने हाथ अपनी कमर पर रखे। वह लाल लेस वाली पैंटी उनके कूल्हों पर बिल्कुल फिट बैठी थी, जो उनके जिस्म के हर मोड़ को बेबाक बना रही थी। उन्हें याद आया कि विशाल ने कहा था कि उसे वह काला तिल और वे गुलाबी युक्तियाँ देखनी हैं।

आयशा ने आईने के और करीब जाकर अपने उन सख्त होते उभारों को छुआ। उनके बदन में एक सिहरन दौड़ गई—यह डर था या उस दरिंदे की फरमाइश पूरी करने का एक अनचाहा रोमांच? उनकी साँसें तेज़ थीं और आईने पर जमी धुंध उनकी गर्म आहों से और भी गहरी हो रही थी।

"मैं उसकी गुलाम बन चुकी हूँ। आज रात यह लाल और काला रंग मेरी इज़्ज़त का कफ़न बनेगा, या फिर उस हैवान की भूख का सामान। पर अब पीछे मुड़ने का रास्ता बंद हो चुका है।"

उन्होंने गहरी साँस ली और अपने कांपते हाथों से वह काला सूट उठाया, जो बाहर उस लाल रंग के साथ मिलकर एक जानलेवा मंज़र बनाने के लिए तैयार था।

आज, पहली बार, आयशा ने खुद को अपनी नज़रों से नहीं, बल्कि विशाल की भूखी नज़रों से देखा। आईने में कैद उनका अक्स किसी शरीफ खानदान की बहू का नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत का लग रहा था जिसने खुद को किसी के हवाले कर दिया हो।

उनकी नंगी, गोल और चिकनी जांघें उस सुर्ख लाल कच्ची में कैद थीं, जिसका बारीक फीता उनकी गोरी रंगत पर किसी गहरे जख्म की तरह उभर रहा था। वह लाल रंग उनके जिस्म की सफेदी को और भी ज्यादा भड़काऊ बना रहा था।

उन्होंने अपना हाथ अपने गोरे, नंगे और चिकने पेट पर फेरा, जो नहाने के बाद भी अभी हल्का सा नम और मखमली महसूस हो रहा था

उनकी नज़रें ऊपर उठीं और अपने सुडौल मम्मों पर जाकर ठहर गईं, जो उस तंग लाल ब्रा में बुरी तरह भींचे हुए थे। ब्रा का कप छोटा होने की वजह से उनके पुष्ट उभार ऊपर से छलकने को बेताब थे। विशाल की 'गुलाबी टिप्स' वाली बात याद आते ही, वे हिस्से उस रेशमी कपड़े को फाड़कर बाहर निकलने की जद्दोजहद करने लगे।

आयशा ने आईने के करीब जाकर अपनी उन सख्त होती युक्तियों को देखा जो लाल कपड़े के ऊपर अपनी नुकीली मौजूदगी दर्ज करा रही थीं। उन्हें महसूस हुआ जैसे विशाल वहीं खड़ा उनके इस कातिल बदन को टटोल रहा हो। शर्म की एक लहर उनके पूरे वजूद में दौड़ गई, लेकिन साथ ही उनके जिस्म की वह विश्वासघाती सिहरन उन्हें यह एहसास दिला रही थी कि आज वह पूरी तरह से विशाल के उस ज़हरीले जाल में फंस चुकी हैं।

उनका यह दूधिया बदन अब उस काले और लाल लिबास के पीछे उसकी अगली घिनौनी फरमाइश का इंतज़ार कर रहा था।

फिर आयशा ने वह काला सूट पहना। अब आयशा को काले सूट में फोटो खींचनी थी, जिसमें उनके निप्पल्स साफ़ दिखाई दें। उनके हाथ में मोबाइल था।

वह आईने की ओर देखते हुए नीचे की तरफ झुकीं। उन्होंने खुद को गौर से देखा; उनके मम्मे जो लाल ब्रा में कैद थे, उनके निप्पल्स अभी साफ़ दिखाई नहीं दे रहे थे। वह और ज़्यादा झुकीं, और इस बार उनके दोनों मम्मे सूट के गले से नीचे की ओर झूल गए।

उस गहरे काले गले के अंदर, लाल ब्रा की पट्टी के ऊपर से उनकी सख्त और नुकीली युक्तियाँ साफ़ दिखाई देने लगीं, जो पूरी तरह से कड़क हो चुकी थीं।

आयशा ने मोबाइल का कैमरा ऑन किया और उसे अपने सीने के करीब ले आईं। काले और पारदर्शी कपड़े के नीचे उस सुर्ख लाल ब्रा का कंट्रास्ट इतना भड़काऊ था कि आयशा का अपना जी घबराने लगा। जैसे ही वह और नीचे झुकीं, उनके भारी और पुष्ट मम्मों का भार सूट के गले पर पड़ा, जिससे वह और भी गहरा हो गया।

अब आईने में उन्हें वह नज़ारा दिख रहा था जिसकी विशाल ने मांग की थी। लाल कपड़े की महीन परत के नीचे से उनके सख्त निप्पल्स किसी पत्थर की तरह उभरे हुए थे, जो काले सूट की सतह पर भी अपनी छाप छोड़ रहे थे। आयशा ने महसूस किया कि उनके जिस्म की गर्मी उस बाथरूम की भाप से ज़्यादा तेज़ हो गई है।

आयशा (हांफते हुए मन में): "यह तस्वीर... अगर मैंने यह क्लिक कर दिया, तो मेरे पास वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं बचेगा। विशाल इसे देखते ही पागल हो जाएगा। मेरे ये मम्मे, जो इस लाल और काले जाल में फंसे हैं, आज एक गुनहगार की तरह उसकी अदालत में पेश होने जा रहे हैं।"

उन्होंने कांपती उंगलियों से स्क्रीन पर फोकस किया। फ्लैश की रोशनी सीधे उनके उभरे हुए वक्षों पर पड़ी, जिससे वे और भी चमकदार और उत्तेजक नज़र आने लगे। एक तरफ समाज की शर्म थी और दूसरी तरफ गहरा काला और सुर्ख लाल समझौता। आयशा ने अपनी आँखें बंद कीं और 'क्लिक' की आवाज़ के साथ अपने वजूद की सबसे बड़ी नुमाइश विशाल के लिए कैद कर ली।

कुछ मिनट बाद... दरवाज़ा फिर से खुला। मैंने अपनी पलकों को फिर से एक लकीर जितना खोला।

अम्मी बाहर निकलीं। और एक पल के लिए, मेरी सांस रुक गई। बाथरोब जा चुका था। अब उनके जिस्म पर एक गहरा शाही काला शरारा सूट था।

यह नर्म, मुलायम, हाई-क्वालिटी शिफॉन था। एक ऐसा कपड़ा जो पानी की तरह बहता था और हवा की हर हरारत पर लहराता था। कमीज़ लंबी थी। और उनके जिस्म पर बिल्कुल ही परफेक्ट लग रही थी, ना बहुत ढीली, ना बहुत ही टाइट।

कमीज़ उनके सीने पर से फिसलती हुई, कमर के पास से गुज़रती और फिर उनके कूल्हों पर एक नर्म, बहते हुए पर्दे की तरह गिरती थी।

उस शिफॉन की कमीज़ के अंदर उनके सीने का मंज़र जैसे एक बिल्कुल साफ़ और बेबाक ऐलान था। उनके सीने का उभार बहुत प्रोमिनेंट लग रहा था। वह राउंड थे। बिल्कुल साफ़, सख्त गोलाई में, जैसे किसी ने संगतराशी की हो। और वह भरे-भरे और मज़बूत लग रहे थे। उनमें नरमी या ढीलेपन का कोई एहसास नहीं था।

और उनकी कमीज़ उस सख्त, गोल शक्ल पर किसी रंग की तरह चिपक गई थी। खासकर उनके उभार के सबसे ऊंचे हिस्से पर, शिफॉन बिल्कुल कसकर बैठा था। और वहाँ से, कमीज़ आज़ादी से नीचे गिरती थी। यह उनके जिस्म से फिसलती हुई, उनके कूल्हों से गुज़रती और सीधी नीचे... उनके घुटनों से भी नीचे... उनकी पिंडलियों के बीच तक जाती थी।

उसका गला काफी गहरा और खुला हुआ था—एक पारंपरिक 'लो-नेक', जो पूरी तरह से भारी, सुनहरे ज़रदोजी के काम से लदा था। वह भारी-भरकम कढ़ाई उस बेहद हल्के और महीन शिफॉन पर एक अजीब सा वज़न डाल रही थी, जिसकी वजह से वह लिबास उनके कॉलरबोन (हंसली की हड्डी) पर बिल्कुल टिक गया था। और पीठ... पीठ पूरी तरह से अनावृत थी, एक गहरे डीप-नेक के साथ

आस्तीनें भी उसी शीयर शिफॉन की थीं। वह उनकी बाज़ुओं पर एक काले धुएँ की परत की तरह लिपटी थीं, जिससे उनकी गोरी रंगत हल्की सी झलक रही थी। आस्तीनों का किनारा, उनकी कलाइयों पर, गले की तरह ही, भारी सुनहरे काम के 'कफ्स' में खत्म होता था।

और उनके शरारा बॉटम का निचला हिस्सा कमीज़ के नीचे से नज़र आ रहा था। यह एक इंतहाई चौड़ा और भारी घेर था। उसमें कई परतें थीं, जो उसे एक वज़न और लहर दे रही थीं।

और बिल्कुल नीचे, उस पूरे घेर के दामन पर, वही सुनहरा काम किया गया था—एक मोटी, चमकदार पट्टी जो उनके हर कदम पर चमक उठती थी।

वह आईने के सामने स्टूल पर बैठ गईं। और उसने अपनी जूलरी का डिब्बा खोला।

पहले उन्होंने सोने की पतली नाज़ुक चूड़ियाँ उठायीं। उन्होंने अपने हाथ को थोड़ा ऊपर उठाया—वही हाथ जिन पर कल की मेहंदी का गहरा, स्याही-मायल लाल रंग अब भी रचा हुआ था। उन्होंने उस शीयर, काली आस्तीन को, जो सुनहरे कफ पर खत्म होती थी, थोड़ा पीछे सरकाया। उनकी गोरी, नर्म कलाई नज़र आने लगी।

खन्न...खन्न…एक-एक करके, चूड़ियाँ अपनी कलाई पर चढ़ाईं। सोना उस मेहंदी लगी, गोरी त्वचा पर अजीब तरह से चमक रहा था। शीशे में उनकी निगाहें अपने हाथ पर ही टिकी थीं। हर 'खनक' की आवाज़ उस खामोश कमरे में एक ऐलान की तरह गूँज रही थी। यह मेरी अम्मी की चूड़ियों की आवाज़ थी... लेकिन आज यह मुझे किसी बेड़ी की आवाज़ लग रही थी।

चूड़ियाँ पहनकर, उन्होंने आस्तीन को ठीक कर लिया। सोना उस सुनहरे कफ के नीचे छुप गया। ऐसा ही रिचुअल उन्होंने दूसरे हाथ में भी दोहराया।

फिर वह आईने के करीब झुकीं। उन्होंने अपने गीले बालों को, जो अब तक थोड़े सूख गए थे, अपने मेहंदी-रचे हाथों में समेटा। उन्होंने उसे मरोड़ा... सख्ती से, एक-दम टाइट... और उन्हें ऊपर उठाकर, अपने सिर के पीछे एक साफ़-सुथरा, ऊँचा जूड़ा बना दिया।

जूड़ा बनाकर, उन्होंने डिब्बे में वापस हाथ डाला और एक सोने का हार निकाला। वही नफीस सा हार जो अब्बू ने उन्हें दिया था। उन्होंने उसे अपने बंद, सुनहरे काम वाले गले के ठीक नीचे पहना। सोने की पतली सी लकीर उस भारी, सुनहरे काम के नीचे अलग से चमक रही थी।

फिर उन्होंने आईने में अपनी आँखों में देखते हुए, कपड़े के एक सिरे को अपनी ठुड्डी के नीचे लाया। उनकी हरकत में एक अजीब सा सुकून था। जैसे यह उनके जिस्म का, उनकी फितरत का एक हिस्सा हो।

उन्होंने कपड़े को खींचा… ज़्यादा नहीं, बस इतना कि वह उनके चेहरे के हर नक़्श के गिर्द कस जाए।

पहले उन्होंने उसे अपने माथे की लकीर पर बिठाया, अपने बालों की जड़ों को उस काले साये के नीचे दफ़न करते हुए।

फिर कपड़ा उनके गालों से सरकता हुआ नीचे आया, उनकी गोरी, नर्म खाल को ढांपता हुआ।

उनकी गर्दन, जो एक पल पहले उस सोने के हार के नीचे बे-पर्दा थी, अब पूरी तरह उस काले हिजाब में छुप चुकी थी।

उनका जुड़ा... उनके बाल... उनकी गर्दन की नज़ाकत... सब कुछ। सब उस एक काले कपड़े के पर्दे के पीछे गुम हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे आईने में उनका चेहरा, उनके जिस्म से अलग हो गया हो।

फिर उन्होंने दूसरा सिरा ला कर उसे पहले वाले पर रखा, और फिर अपने ज़ेवरों के डिब्बे से एक छोटी सी, चमकती हुई पिन निकाली। अपनी ठुड्डी के बिल्कुल नीचे, जहाँ दोनों सिरे मिल रहे थे, उन्होंने पिन को कपड़े की तहों में घुसा दिया।

एक हल्की सी 'क्लिक' की आवाज़ आई। एक ताले की आवाज़।

अब आईने में जो औरत थी, उसका चेहरा काले फ्रेम में कैद था। सर से... गर्दन तक, वह एक पाक-साफ़, बा-पर्दा औरत बन चुकी थीं। एक ऐसी औरत जिसे कोई गैर-मर्द बुरा न कह सके।

"लेकिन उस पर्दे के ठीक नीचे... शिफॉन की उसी काली कमीज़ के अंदर लाल रंग के कपड़े छुपे हुए थे। वही गुनाह। यह पर्दा एक धोखा था। एक सरासर झूठ।"

फिर उन्होंने मेकअप बैग से लिपस्टिक निकाली। एक गहरा, महीन रंग। उन्होंने उसे घुमाकर खोला। उनकी लाल-रंगीन उंगलियाँ उस सोने के लिपस्टिक केस पर अजीब लग रही थीं।

आईने के बिल्कुल करीब जाकर, उन्होंने अपने होठों को हल्का सा खोला। और बिल्कुल एहतियात से, जैसे कोई फ़नकार हो, उन्होंने उस रंग को अपने होठों पर भरा। पहले ऊपरी होंठ... फिर निचला।

रंग बहुत गहरा था। उनकी गोरी रंगत और काले वेल के बीच, वह दो गहरे, रंगीन होंठ... एक वादा लग रहा था।

उन्होंने अपने होठों को एक-दूसरे पर दबाया। एक हल्की सी, 'स्मैक' की आवाज़ आई।

तैयारी... मुकम्मल हो चुकी थी।

और मैं एक कायर की तरह सोने का नाटक करता रहा। कुछ देर बाद वह उठीं और मेरे बिस्तर के पास आयीं। उनके परफ्यूम की महक और भी गहरी हो गई।

"उठ," उनकी आवाज़ आई। नर्म, बिल्कुल हमेशा जैसी। "कब तक सोता रहेगा? शाम हो गई है। दावत के लिए तैयार नहीं होना?"

मैं आँखें मलते हुए बिस्तर पर बैठ गया और उनकी ओर देखा। यह मेरी अम्मी नहीं थीं, आयशा थीं।

वह मुस्कुराईं और कहा, "चल, जल्दी से उठ और तैयार हो जा। मैं ज़रा नीचे सायमा के पास जा रही हूँ, देखती हूँ कुछ काम है या नहीं।"

"ठीक है," मैं बेड से उठते हुए बोला।

"सुनो," उन्होंने कहा।

मैं रुका और उनकी तरफ देखा।

"मैं… ठीक लग रही हूँ?" उन्होंने थोड़ा सा घूमते हुए, अपने सूट को देखते हुए पूछा।

मेरा दिल किया मैं उन्हें बता दूँ कि मैं सब जानता हूँ। कि यह सवाल मेरे लिए नहीं, बल्कि उस विशाल के लिए है।

"हाँ," मैंने बिना किसी जज़्बात के कहा। "ठीक लग रही हैं।"

मेरा जवाब सुन कर उनके चेहरे पर एक पल की मायूसी आई, जैसे वह किसी और तारीफ की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन उन्होंने फौरन खुद को संभाल लिया।

"अच्छा, जल्दी आना," कहकर वह कमरे के दरवाज़े की तरफ मुड़ीं।

मैं उन्हें जाते हुए देखता रहा। फिर, दरवाज़े तक पहुँचने से ऐन पहले, वह रुकीं। उन्होंने अपना फोन उठाया।
 


अम्मी इन उन्देर्गर्मेन्ट्स.





आल इमेजेज अरे कलेक्टेड फ्रॉम वेब .
 
अध्याय 13

अम्मी आईने के सामने कड़ी हो गयीं. उनकी पीठ मेरी तरफ थी. वह बिलकुल सफ़ेद, मोठे रोएं वाले टेररयस्लोथ के बाथरोब में लिपटी थीं. बेल्ट कमर पर ढीला सा बंधा था, बस नाम की एक गिरह थी. कपडा उनके गीले जिस्म से चिपक गया था, खासकर उनके कन्धों के उभार और कमर के हलके से चउरवे पर, जिससे उनके जिस्म का साँचा साफ़ नज़र आ रहा था.

कमरे की हलकी रौशनी उनकी गीली त्वचा पर पद रही थी, जो अभी भी गर्म पानी से गुलाबी हो रही थी. लेकिन मेरी नज़र उनके काले, गीले बालों पर ठहर गयी थी, जिन्हें उन्होंने एक तरफ कर रखा था. पानी की moti-moti बूँदें उनके बालों के सिरों से टपक रही थीं. एक बूँद उनकी गर्दन के 'नेप' में एक पल के लिए ठहरती और फिर उनकी स्पाइन की लकीर पर एक चमकदार रास्ता बनाती हुई बाथरोब के कपडे में समां जाती.

यह मंज़र इतना घरेलु था, इतना jaana-pehchana... लेकिन आज, विशाल के शब्दों के बाद, यह दुनिया का सबसे ग़ैर और सबसे बेचैन कर देने वाला मंज़र लग रहा था.

फिर उन्होंने अलमारी खोली और हैंगर्स को अपने हाथों से खिसकने लगीं, जैसे कुछ ढून्ढ रही हों.

मेरा दिल डूब रहा था. मैं बस दुआ कर रहा था… 'प्लीज... अम्मी... मैरून सूट... प्लीज वह मैरून सूट निकालें…'

अम्मी ने एक हेंगर निकाला. उस पर एक जोड़ा लटक रहा था और वह काला था. एक चमकदार, गहरा काला सूट.

उन्होंने उस काले सूट को एक पल के लिए अपने बाथरोब के ऊपर hi, अपने जिस्म के सामने, लगाकर देखा. आईने में उनका अक्स... एक ऐसी औरत थी जिसे मैं नहीं जानता था.

यह फैसला हो चूका था. वह उस 'विशाल' के लिए पहन रही थीं.

फिर वह वापस से अलमारी में कुछ ढूंढ़ने लगीं. मेरा दिल बैठा जा रहा था; क्या अम्मी लाल उन्देर्गर्मेन्ट्स ढून्ढ रही हैं? क्या वह विशाल की इतनी गुलाम हो गयी हैं की उसकी हर बात मानेंगी?

अम्मी ने छुपाकर कुछ निकाला और काले सूट के नीचे छुपा लिया. मैं देख नहीं पाया की वह क्या था.

अम्मी पलटीं और सूट को अपने हाथ में लेकर वापस वाशरूम की तरफ चली गयीं. दरवाज़ा उनके पीच्चे बंद हुआ और हलकी सी 'क्लिक' की आवाज़ ने उनके इरादे पर मोहर लगा दी.

मैं ने अपनी आँखें सख्ती से बंद कर लीं. मेरा खून जो कुछ देर पहले खौल रहा था, अब बिलकुल ठंडा पद गया tha—bilkul बर्फ की तरह. शाम की पार्टी अब एक जश्न नहीं, एक सजा बनने वाली थी.

मैं भागकर अम्मी का फ़ोन देखने गया, लेकिन वह वहां नहीं था, जहां पहले पड़ा था.

कमरे में फिर वही खामोशी छ गयी, लेकिन इस बार यह खामोशी चुभने वाली थी. हर सेकंड एक घंटे जैसा लग रहा था. मैं बस उनके बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था.

वाशरूम के अंदर

की हवा अभी भी गर्म भाप और साबुन की खुशबू से भारी थी. ऐसा ने अपना बाथरोब उतारा और उसे हुक पर टांग दिया. उनका दूधिया बदन उस नमी में और भी चमक रहा था.

तभी ऐसा के मोबाइल पर एक हलकी सी आवाज़ हुई, जैसे कोई नया मैसेज आया हो. सन्नाटे में हुई उस ज़रा सी आवाज़ से भी ऐसा का दिल देहल गया. उसने डरते हुए, कांपते हाथों से अपना मोबाइल उतःया. स्क्रीन की रौशनी में एक नाम चमक रहा tha—Vishal.

उस मैसेज को खोलते hi ऐसा के माथे पर पसीना आ गया. उसमें विशाल की तरफ से एक शर्त लिखी थी:

विशाल: "अगर आप आज मेरी फरमाइश पूरी करेंगी, तभी आप मेरे मोबाइल में से सीमा की तीन तसवीरें डिलीट करवा पाएंगी. लेकिन याद रहे, आज की आपकी तस्वीरों में मेरी पसंद के कुछ ख़ास तत्त्व होने चाहिए..."

दूसरी तरफ, विशाल की नज़रें लगातार अपने मोबाइल की स्क्रीन पर तिकी हुई थीं. जैसे hi स्क्रीन पर 'ब्लू टिक' चमका और उसे यकीन हो गया की ऐसा ने उसका सन्देश पद लिया है, उसके होठों पर एक शातिर मुस्कान तैर गयी. उसने कुछ सेकंड का इंतज़ार किया, ताकि शब्दों का खौफ ऐसा के ज़हन में पूरी तरह उतर जाए, और फिर बिना देर किये उसने उस मैसेज को 'डिलीट फॉर एवरीवन' कर दिया.

वह बेहद चालाक था; उसने अपनी ब्लैकमेलिंग और उस गन्दी मांग का एक भी सबूत ऐसा के पास नहीं छोड़ा था. अब उस चाट बॉक्स में सिर्फ एक खाली जगह थी, लेकिन ऐसा के दिल इन वो खौफनाक शर्त हमेशा के लिए छाप चुकी थी.

ऐसा ने कांपते हाथों से अलमारी से निकाला हुआ वह लाल रेशमी लिबास utahaya—vahi लाल उन्देर्गर्मेन्ट्स, जिनका हुक्म विशाल ने दिया था.

जैसे hi उन्होंने वे लाल सुर्ख कपडे अपने बदन पर चढ़ाये, उन्हें महसूस हुआ की यह सिर्फ कपडा नहीं, बल्कि विशाल की हवस की ज़ंजीरें हैं. उन्होंने आईने की तरफ देखा और अपने hi अक्स को देखकर उनके हाथ ठिठक गए.

आईने में एक ऐसी औरत कड़ी थी जिसे ऐसा खुद पहचान नहीं प् रही थी. वह गहरा लाल रंग उनके गोर जिस्म पर किसी आग की तरह देहक रहा था. उस लाल ब्रा के टाइट कप्स उनके सुडौल और पुष्ट मम्मों को ऊपर की ओरे ढेलेल रहे थे, जिससे उनकी क्लीवेज की गहराई और भी साफ़ और गहरी नज़र आ रही थी. विशाल के शब्दों की याद मात्रा से उनके निप्पल्स उस रेशमी कपडे के नीचे सख्ती से उभर आये थे, जो साफ़ तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे.

ऐसा के विचार: "या ,.', मैं क्या कर रही हूँ? काले सूट के नीचे यह लाल रंग... यह तोह किसी दुल्हन की सेज का लिबास लग रहा है."

उन्होंने अपने हाथ अपनी कमर पर रखे. वह लाल लास वाली पंतय उनके कूल्हों पर बिलकुल फिट बैठी थी, जो उनके जिस्म के हर मोड़ को बेबाक बना रही थी. उन्हें याद आया की विशाल ने कहा था की उसे वह काला टिल और वे गुलाबी युक्तियाँ देखनी हैं.

ऐसा ने आईने के और करीब जाकर अपने उन सख्त होते उभारों को छुआ. उनके बदन में एक सिहरन दौड़ gayi—yeh दर था या उस दरिंदे की फरमाइश पूरी करने का एक अनचाहा रोमांच? उनकी सांसें तेज़ थीं और आईने पर जमी ढूंढ उनकी गर्म आहों से और भी गहरी हो रही थी.

"मैं उसकी गुलाम बन चुकी हूँ. आज रात यह लाल और काला रंग मेरी इज़्ज़त का कफ़न बनेगा, या फिर उस हैवान की भूख का सामान. पर अब पीछे मुड़ने का रास्ता बंद हो चूका है."

उन्होंने गहरी सांस ली और अपने कांपते हाथों से वह काला सूट उतःया, जो बाहर उस लाल रंग के साथ मिलकर एक जानलेवा मंज़र बनाने के लिए तैयार था.

आज, पहली बार, ऐसा ने खुद को अपनी नज़रों से नहीं, बल्कि विशाल की भूखी नज़रों से देखा. आईने में कैद उनका अक्स किसी शरीफ खानदान की बहु का नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत का लग रहा था जिसने खुद को किसी के हवाले कर दिया हो.

उनकी नंगी, गोल और चिकनी जांघें उस सुर्ख लाल कच्ची में कैद थीं, जिसका बारीक फीता उनकी गोरी रंगत पर किसी गहरे ज़ख्म की तरह उभर रहा था. वह लाल रंग उनके जिस्म की सफेदी को और भी ज़्यादा भड़काऊ बना रहा था.

उन्होंने अपना हाथ अपने गोर, नंगे और चिकने पेट पर फेरा, जो नहाने के बाद भी अभी हल्का सा नाम और मखमली महसूस हो रहा था.

उनकी नज़रें ऊपर उठीं और अपने सुडौल मम्मों पर जाकर ठहर गयीं, जो उस तंग लाल ब्रा में बुरी तरह भेंचे हुए थे. ब्रा का कप छोटा होने की वजह से उनके पुष्ट उभार ऊपर से छलकने को बेताब थे. विशाल की 'गुलाबी टिप्स' वाली बात याद आते hi, वे हिस्से उस रेशमी कपडे को फाड़कर बाहर निकलने की जद्दोजहद करने लगे.

ऐसा ने आईने के करीब जाकर अपनी उन सख्त होती युक्तियों को देखा जो लाल कपडे के ऊपर अपनी नुकीली मौजूदगी दर्ज करा रही थीं. उन्हें महसूस हुआ जैसे विशाल वही खड़ा उनके इस कातिल बदन को टटोल रहा हो. शर्म की एक लहार उनके पूरे वजूद में दौड़ गयी, लेकिन साथ hi उनकी जिस्म की वह विश्वासघाती सिहरन उन्हें यह एहसास दिला रही थी की आज वह पूरी तरह से विशाल के उस ज़हरीले जाल में फँस चुकी हैं.

उनका यह दूधिया बदन अब उस काले और लाल लिबास के पीछे उसकी अगली घिनौनी फरमाइश का इंतज़ार कर रहा था.

फिर ऐसा ने वह काला सूट पहना. अब ऐसा को काले सूट में फोटो खींचनी थी, जिसमें उनके निप्पल्स साफ़ दिखाई दें. उनके हाथ में मोबाइल था.

वह आईने की ओरे देखते हुए नीचे की तरफ झुकीं. उन्होंने खुद को गौर से देखा; उनके मम्मी जो लाल ब्रा में कैद थे, उनके निप्पल्स अभी साफ़ दिखाई नहीं दे रहे थे. वह और ज़्यादा झुकीं, और इस बार उनके दोनों मम्मी सूट के गले से नीचे की ओरे झूल गए.

उस गहरे काले गले के अंदर, लाल ब्रा की पट्टी के ऊपर से उनकी सख्त और नुकीली युक्तियाँ साफ़ दिखाई देने लगीं, जो पूरी तरह से कड़क हो चुकी थीं.

ऐसा ने मोबाइल का कैमरा ों किया और उसे अपने सीने के करीब ले आईं. काले और पारदर्शी कपडे के नीचे उस सुर्ख लाल ब्रा का कंट्रास्ट इतना भड़काऊ भ की ऐसा का अपना जी घबराने लगा. जैसे hi वह और नीचे झुकीं, उनके भारी और पुष्ट मम्मों का भार सूट के गले पर पड़ा, जिससे वह और भी गहरा हो गया.

अब आईने में उन्हें वह नज़ारा दिख रहा था जिसकी विशाल ने मांग की थी. लाल कपडे की महीन परत के नीचे से उनके सख्त निप्पल्स किसी पत्थर की तरह उभरे हुए थे, जो काले सूट की सतह पर भी अपनी छाप छोड़ रहे थे. ऐसा ने महसूस किया की उनके जिस्म की गर्मी उस बाथरूम की भाप से ज़्यादा तेज़ हो गयी है.

ऐसा (हाँफते हुए मन में): "यह तस्वीर... अगर मैंने यह क्लिक कर दिया, तोह मेरे पास वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं बचेगा. विशाल इसे देखते hi पागल हो जाएगा. मेरे ये मम्मी, जो इस लाल और काले जाल में फंसे हैं, आज एक गुनहगार की तरह उसकी अदालत में पेश होने जा रहे हैं."

उन्होंने काम्पटी उँगलियों से स्क्रीन पर फोकस किया. फ़्लैश की रौशनी सीधे उनके उभरे हुए वक्षों पर पड़ी, जिससे वे और भी चमकदार और उत्तेजक नज़र आने लगे. एक तरफ समाज की शर्म थी और दूसरी तरफ गहरा काला और सुर्ख लाल समझौता. ऐसा ने अपनी आँखें बंद कीं और 'क्लिक' की आवाज़ के साथ अपने वजूद की सबसे बड़ी नुमाइश विशाल के लिए कैद कर ली.

कुछ मिनट बाद... दरवाज़ा फिर से खुला. मैं ने अपनी पलकों को फिर से एक लकीर जितना खोला.

अम्मी बाहर निकलीं. और एक पल के लिए, मेरी सांस रुक गयी. बाथरोब जा चूका था. अब उनके जिस्म पर एक गहरा शाही काला शरारा सूट था.

यह नरम, मुलायम, high-quality शिफॉन था. एक ऐसा कपडा जो पानी की तरह बेहटा था और हवा की हर हरारत पर लहराता था. कमीज लम्बी थी. और उनके जिस्म पर बिलकुल hi परफेक्ट लग रही थी, न बहुत ढीली, न बहुत hi टाइट.

कमीज उनके सीने पर से फिसलती हुई, कमर के पास से गुज़रती और फिर उनके कूल्हों पर एक नरम, बहते हुए परदे की तरह गिरती थी.

उस शिफॉन की कमीज के अंदर उनके सीने का मंज़र जैसे एक बिलकुल साफ़ और बेबाक ऐलान था. उनके सीने का उभार बहुत प्रोमिनेन्ट लग रहा था. वह राउंड थे. बिलकुल साफ़, सख्त गोलाई में, जैसे किसी ने संगतराशी की हो. और वह bhare-bhare और मज़बूत लग रहे थे. उनमें नरमी या ढीलेपन का कोई एहसास नहीं था.

और उनकी कमीज उस सख्त, गोल शक्ल पर किसी रंग की तरह चिपक गयी थी. खासकर उनके उभार के सबसे ऊंचे हिस्से पर, शिफॉन बिलकुल कसकर बैठा था. और वहां से, कमीज आज़ादी से नीचे गिरती थी. यह उनके जिस्म से फिसलती हुई, उनके कूल्हों से गुज़रती और सीढ़ी नीचे... उनके घुटनों से भी नीचे... उनकी पिंडलियों के बीच तक जाती थी.

उसका गाला काफी गहरा और खुला हुआ tha—ek पारंपरिक 'low-neck', जो पूरी तरह से भारी, सुनहरे ज़रदोज़ी के काम से लड़ा था. वह bhaari-bharkam कढ़ाई उस बेहद हलके और महीन शिफॉन पर एक अजीब सा वज़न दाल रही थी, जिसकी वजह से वह लिबास उनके कलरबोने (हंसली की हड्डी) पर बिलकुल टिक गया था. और पीठ... पीठ पूरी तरह से अनावृत थी, एक गहरे deep-neck के साथ.

ास्टिनें भी उसी शेयर शिफॉन की थीं. वह उनकी बाज़ुओं पर एक काले धुएं की परत की तरह लिपटी थीं, जिससे उनकी गोरी रंगत हलकी सी झलक रही थी. ास्टिनों का किनारा, उनकी कलाइयों पर, गले की तरह hi, भारी सुनहरे काम के 'कुफ्फस' में ख़तम होता था.

और उनके शरारा बॉटम का निचला हिस्से कमीज के नीचे से नज़र आ रहा था. यह एक इंतहाई चौड़ा और भारी घेर था. उसमें कई परतें थीं, जो उसे एक वज़न और लहार दे रही थीं.

और बिलकुल नीचे, उस पूरे घेर के दामन पर, वही सुनहरा काम किया गया tha—ek मोती, चमकदार पट्टी जो उनके हर कदम पर चमक उठती थी.

वह आईने के सामने स्टूल पर बैठ गयीं. और उसने अपनी जेवेलरी का डिब्बा खोला.

पहले उन्होंने सोने की पतली नाज़ुक चूड़ियां उठायीं. उन्होंने अपने हाथ को थोड़ा ऊपर uthaya—vahi हाथ जिन पर कल की मेहँदी का गहरा, syaahi-maayal लाल रंग अब भी रचा हुआ था. उन्होंने उस शेयर, काली ास्तें को, जो सुनहरे कफ पर ख़तम होती थी, थोड़ा पीछे सरकाया. उनकी गोरी, नरम कलाई नज़र आने लगी.

Khann...khann…ek-ek करके, चूड़ियां अपनी कलाई पर चढ़ाईं. सोना उस मेहँदी लगी, गोरी त्वचा पर अजीब तरह से चमक रहा था. शीशे में उनकी निगाहें अपने हाथ पर hi तिकी थीं. हर 'खनक' की आवाज़ उस खामोश कमरे में एक ऐलान की तरह गूँज रही थी. यह मेरी अम्मी की चूड़ियों की आवाज़ थी... लेकिन आज यह मुझे किसी बेदी की आवाज़ लग रहा थी.

चूड़ियां पहनकर, उन्होंने ास्तें को ठीक कर लिया. सोना उस सुनहरे कफ के नीचे छुप गया. ऐसा hi रिचुअल उन्होंने दुसरे हाथ में भी दोहराया.

फिर वह आईने के करीब झुकीं. उन्होंने अपने गीले बालों को, जो अब तक थोड़े सूख गए थे, अपने mehendi-rache हाथों में समेटा. उन्होंने उसे मरोड़ा... सख्ती से, ek-dam टाइट... और उन्हें ऊपर उठाकर, अपने सर के पीछे एक saaf-suthra, ऊंचा जुड़ा बना दिया.

जुड़ा बनाकर, उन्होंने डिब्बे में वापस हाथ डाला और एक सोने का हार निकाला. वही नफीस सा हार जो अब्बू ने उन्हें दिया था. उन्होंने उसे अपने बंद, सुनहरे काम वाले गले के ठीक नीचे पहना. सोने की पतली सी लकीर उस भारी, सुनहरे काम के नीचे अलग से चमक रही थी.

फिर उन्होंने आईने में अपनी आँखों में देखते हुए, कपडे के एक सिरे को अपनी ठुड्डी के नीचे लाया. उनकी हरकत में एक अजीब सा सुकून था. जैसे यह उनके जिस्म का, उनकी फितरत का एक हिस्सा हो.

उन्होंने कपडे को खींचा… ज़्यादा नहीं, बस इतना की वह उनके चेहरे के हर नक़्श के गिर्द कास जाए.

पहले उन्होंने उसे अपने माथे की लकीर पर बिठाया, अपने बालों की जड़ों को उस काले साये के नीचे दफ़न करते हुए.

फिर कपडा उनके गालों से सरकता हुआ नीचे आया, उनकी गोरी, नरम खाल को ढाँपता हुआ.

उनकी गर्दन, जो एक पल पहले उस सोने के हार के नीचे be-parda थी, अब पूरी तरह उस काले हिजाब में छुप चुकी थी.

उनका जुड़ा... उनके बाल... उनकी गर्दन की नज़ाकत... सब कुछ. सब उस एक काले कपडे के परदे के पीछे गम हो गए. ऐसा लग रहा था जैसे आईने में उनका चेहरा, उनके जिस्म से अलग हो गया हो.

फिर उन्होंने दूसरा सिरा ला कर उसे पहले वाले पर रखा, और फिर अपने ज़ेवरों के डिब्बे से एक छोटी सी, चमकदार पिन निकाली. अपनी ठुड्डी के बिलकुल नीचे, जहां दोनों सिरे मिल रहे थे, उन्होंने पिन को कपडे की तहों में घुसा दिया.

एक हलकी सी 'क्लिक' की आवाज़ आयी. एक ताले की आवाज़.

अब आईने में जो औरत थी, उसका चेहरा काले फ्रेम में कैद था. सर से... गर्दन तक, वह एक paak-saaf, ba-parda औरत बन चुकी थीं. एक ऐसी औरत जिसे कोई ghair-mard बुरा न कह सके.

"लेकिन उस परदे के ठीक नीचे... शिफॉन की उसी काली कमीज के अंदर लाल रंग के कपडे छुपे हुए थे. वही गुनाह. यह पर्दा एक धोखा था. एक सरासर झूठ."

फिर उन्होंने मेकअप बैग से लिपस्टिक निकाली. एक गहरा, महीन रंग. उन्होंने उसे घुमाकर खोला. उनकी laal-rangeen उँगलियाँ उस सोने के लिपस्टिक केस पर अजीब लग रही थीं.

आईने के बिलकुल करीब जाकर, उन्होंने अपने होठों को हल्का सा खोला. और बिलकुल एहतियात से, जैसे कोई फनकार हो, उन्होंने उस रंग को अपने होठों पर भरा. पहले ऊपरी होठ... फिर निचला.

रंग बहुत गहरा था. उनकी गोरी रंगत और काले वैल के बीच, वह दो गहरे, रंगीन होठ... एक वादा लग रहा था.

उन्होंने अपने होठों को ek-doosre पर दबाया. एक हलकी सी, 'स्मैक' की आवाज़ आयी.

तैयारी... मुकम्मल हो चुकी थी.

और मैं एक कायर की तरह सोने का नाटक करता रहा. कुछ देर बाद वह उठीं और मेरे बिस्तर के पास आईं. उनके परफ्यूम की महक और भी गहरी हो गयी.

"उठ," उनकी आवाज़ आयी. नरम, बिलकुल हमेशा जैसी. "कब तक सोता रहेगा? शाम हो गयी है. दावत के लिए तैयार नहीं होना?"

मैं आँखें मलते हुए बिस्तर पर बैठ गया और उनकी ओरे देखा. यह मेरी अम्मी नहीं थीं, ऐसा थीं.

वह मुस्कुराईं और कहा, "चल, जल्दी से उठ और तैयार हो जा. मैं ज़रा नीचे सीमा के पास जा रही हूँ, देखती हूँ कुछ काम है या नहीं."

"ठीक है," मैं बीएड से उठते हुए बोलै.

"सुनो," उन्होंने कहा.

ी रुका और उनकी तरफ देखा.

"मैं… ठीक लग रही हूँ?" उन्होंने थोड़ा सा घुमते हुए, अपने सूट को देखते हुए पूछा.

मेरा दिल किया मैं उन्हें बता दूँ की मैं सब जानता हूँ. की यह सवाल मेरे लिए नहीं, बल्कि उस विशाल के लिए है.

"हाँ," मैंने बिना किसी जज़्बात के कहा. "ठीक लग रही हैं."

मेरा जवाब सुन कर उनके चेहरे पर एक पल की मायूसी आयी, जैसे वह किसी और तारीफ की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन उन्होंने फ़ौरन खुद को संभाल लिया.

"अच्छा, जल्दी आना," कहकर वह कमरे के दरवाज़े की तरफ मुड़ीं.

मैं उन्हें जाते हुए देखता रहा. फिर, दरवाज़े तक पहुँचने से ऐन पहले, वह रुकीं. उन्होंने अपना फ़ोन उतःया.
 
Back
Top