अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - Page 5 - SexBaba
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अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़

This Story is inspired By Ammi and uncle written by author Lucky2.

अध्याय 1

मैं साहिल हूँ। यह कहानी मेरी ज़िंदगी के उस मोड़ की है जब वक्त ने एक अजीब करवट ली थी। हम दिल्ली गए थे, मेरी अम्मी आयशा की कज़िन, सायमा, की शादी के लिए। सायमा अम्मी के मामा की बेटी थी, इसलिए यह एक बड़ा फैमिली इवेंट था।

घर से हम तीनों निकले थे—मैं, मेरी अम्मी, और मेरी नानी। मेरे अब्बू, फहद, को बिज़नेस के काम से रुकना पड़ा, इसलिए वह हमारे साथ नहीं आ सके। मैं कॉलेज में था, अपनी ही धुन में रहने वाला एक एवरेज सा लड़का। मीडियम हाइट, पतला सा जिस्म, और काले बाल जो अक्सर मेसी रहते थे, हवा में लहराते हुए। मेरा चेहरा अम्मी से ज़्यादा अब्बू से मिलता था। देखने में मैं मासूम लगता था, पर मेरे अंदर एक बेचैनी थी, एक तेज़ धड़कन जो हर नए तजुर्बे को तलाशती थी।

मैं साहिल हूँ, और यह वाकया मेरी अम्मी, आयशा, के उस जादुई रूप के इर्द-गिर्द बुना गया है जिसने मुझे पहली बार यह अहसास कराया कि कुदरत ने उन्हें किस कदर फुर्सत में तराशा था।

मेरी अम्मी की खूबसूरती सिर्फ एक बेटे की नज़र से ही नहीं, बल्कि किसी भी देखने वाले के लिए एक मदहोश कर देने वाला मंज़र थी। कॉलेज में होने के नाते, मैं औरों की नज़रों को पढ़ना सीख गया था, और अक्सर देखता था कि जब अम्मी कमरे में दाखिल होतीं, तो वक्त जैसे ठहर सा जाता। उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन और उस पर टिका वह चाँद सा गोल चेहरा किसी संगमरमर की मूरत जैसा लगता था। उनकी त्वचा का रंग इतना साफ और दूधिया सफेद था कि रोशनी जैसे उनसे टकराकर वापस लौटती थी।

उस दिन उन्होंने एक महीन कपड़े का सूट पहना था, जो उनके छरहरे मगर गठावदार बदन पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उभार अपनी एक अलग कहानी कह रहा था। उनकी पतली कमर जब चलने के दौरान हल्की सी बल खाती, तो उनके भरे हुए पुष्ट कूल्हे और पुष्ट सीना एक ऐसी लय पैदा करते थे जिसे अनदेखा करना नामुमकिन था। उनके काले घने बाल उनकी पीठ पर किसी नागिन की तरह लहरा रहे थे, और उनसे आती चमेली की भीनी खुशबू हवा में एक नशा सा घोल रही थी। मैं उनका बेटा था, उनसे बेइंतहा प्यार करता था, पर उस दिन मेरी आँखों में उनके लिए सिर्फ ममता नहीं, बल्कि उनकी बेपनाह खूबसूरती के लिए एक गहरी अचरज भरी कशिश थी।

मेरी अम्मी बहुत केयरिंग थीं, जिनकी दुनिया उनकी फैमिली के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। उनकी मुस्कुराहट ऐसी थी जो दिल को सुकून दे।

सफर की शुरुआत ही हंगामेदार रही। रेलवे स्टेशन पर जैसे इंसानों का समंदर उमड़ पड़ा था। अब्बू साथ नहीं थे, इसलिए नानी और अम्मी की ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर थी।

उस दिन सफर के लिए अम्मी ने एक ढीला-ढाला काला अबाया और चेहरे पर ब्राउन वेल (नकाब) पहना हुआ था। उनका पूरा जिस्म सिर से पैर तक ढका था। ऊपर से देखने पर सिर्फ एक स्याह साया नज़र आता, लेकिन अम्मी का वह अबाया उनकी बेपनाह खूबसूरती को छुपाने में नाकाम था।

उनका गोरा रंग अबाया के स्याह काले रंग के कॉन्ट्रास्ट में किसी जलते हुए दीये की तरह खिल उठा था। अबाया ने उनके जिस्म को ज़रूर ढका था, मगर उनके दूधिया सफेद हाथ जब अबाया की आस्तीनों से बाहर निकलते, तो काले कपड़े पर उनकी सफेदी किसी संगमरमर की तरह चमकती थी। नकाब के पीछे से उनकी बड़ी-बड़ी काली आँखें जब उठतीं, तो ऐसा लगता जैसे कोई गहरा राज़ बेपर्दा होने को हो।

चलते वक्त जब अबाया की ज़मीन चूमती हुई किनारियाँ हल्की सी ऊपर उठतीं, तो उनके नर्म और गोरे पैरों की एक छोटी सी झलक दिख जाती, जो काले अबाया के साथ एक कयामत सा कंट्रास्ट पैदा कर रही थी। वह झलक चीख-चीख कर बता रही थी कि उस काले लिबास के नीचे छिपा हुआ पूरा बदन किस कदर दूधिया और बेदाग होगा।

अबाया कितना भी ढीला क्यों न हो, जब हवा का कोई झोंका उनसे टकराता या वह मुड़तीं, तो कपड़े का खिंचाव उनके भरे हुए सीने और पुष्ट कूल्हों के कर्व को साफ़ बयां कर देता था।

जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी, कोच के दरवाजे पर चढ़ने वालों की एक अंधी दौड़ शुरू हो गई। स्टेशन का वह शोर-शराबा और धक्का-मुक्की किसी अनहोनी का इशारा दे रहे थे। भीड़ का फायदा उठाकर कुछ आवारा किस्म के लोग अम्मी के इर्द-गिर्द घेरा बनाने लगे। हालाँकि अम्मी उस ढीले-ढाले काले अबाया में पूरी तरह ढकी थीं, लेकिन उन भेड़ियों की भूखी नज़रें उस कपड़े के पार देख रही थीं। वे अम्मी के चलने की लय और अबाया के खिंचाव से उनके जिस्म के उतार-चढ़ाव का अंदाज़ा लगा रहे थे।

मैंने देखा कि कैसे एक हट्टे-कट्टे आदमी ने जानबूझकर अम्मी के बिल्कुल करीब आने की कोशिश की, उसकी नज़रें अम्मी के अबाया से ढके पुष्ट कूल्हों पर जमी हुई थीं। भीड़ के एक ज़ोरदार रेले ने अम्मी का संतुलन बिगाड़ दिया, और वह लड़खड़ाकर पीछे की ओर झुकीं।

"साहिल... बचा मुझे!" अम्मी की आवाज़ नकाब के पीछे से कांपती हुई और बेहद बेबस सी आई।

उसी पल, उस भीड़ का फायदा उठाकर एक गंदा हाथ बड़ी चालाकी से अम्मी के अबाया के ऊपर से ही उनकी सुडौल गाँड तक पहुँचा। उस शख्स ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई और अम्मी के भरे हुए कूल्हे को मजबूती से दबोचकर भींच दिया। अम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, वह बुरी तरह डर गईं और थरथराने लगीं। उस स्पर्श की दरिंदगी ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था।

"साहिल!" उन्होंने दहशत में मेरा नाम पुकारा।

मेरी रगों में खून खौल उठा। मैंने पलक झपकते ही अम्मी की कमर में अपना हाथ डाला और उन्हें अपनी ओर पूरी ताक़त से खींच लिया। मेरा हाथ उनके अबाया के कपड़े के ऊपर था, लेकिन उस ढीले लिबास के नीचे से भी मुझे उनकी पतली कमर की गोलाई और उनके दहकते बदन की तपिश का साफ़ अहसास हुआ। वह खौफ के मारे मुझसे पूरी तरह चिपक गईं। उनका अबाया से ढका हुआ भारी सीना मेरी छाती से ज़ोर से सट गया था। मैं उनकी तेज़ होती धड़कनों को अपने सीने पर महसूस कर सकता था, और उस पल उनकी बेबसी ने मेरे अंदर उन्हें बचाने के एक नए जुनून को जन्म दे दिया था।

जैसे ही भीड़ का एक और रेला आया, अम्मी पूरी तरह से मुझ पर ढह गईं। उनकी पूरी देह मेरे जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी कि उनके और मेरे बीच हवा की भी जगह नहीं बची थी। उस पल, पहली बार मुझे अपनी अम्मी के भरे हुए सीने का स्पर्श इतनी नज़दीकी से महसूस हुआ। अबाया के कपड़े के पीछे भी उनके उरोजों की नरमी और उनका उभार मेरी छाती पर दबाव बना रहा था। वह अहसास इतना नर्म और मखमली था कि मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंध गई। एक बेटे के तौर पर मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था, पर उस दबाव और उनके बदन की गर्मी ने मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी।

तभी पीछे से लोगों का एक ज़ोरदार धक्का लगा, जिसने अम्मी को मेरे और करीब धकेल दिया। वह इस कदर घबरा गईं कि उन्हें लगा जैसे उनका दम घुट जाएगा। अपनी स्थिति को समझने और भीड़ के बीच रास्ता देखने की जद्दोजहद में, उन्होंने आनन-फानन में अपने चेहरे से ब्राउन नकाब हटा दिया।

जैसे ही उन्होंने नकाब हटाया, ऐसा लगा मानो काली घटाओं के पीछे से अचानक पूरा चाँद निकल आया हो। उनका वह दूधिया सफेद चेहरा, पसीने की छोटी-छोटी बूंदों से चमकता हुआ, उन गंदी नीयत वाले लोगों के सामने बेपर्दा हो गया। उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में फैली दहशत और उनके गुलाबी लब, जो डर से कांप रहे थे, ने वहाँ मौजूद हर शख्स की साँसें थाम दीं।

स्टेशन की रोशनी में उनका चेहरा किसी दैवीय अप्सरा की तरह दमक रहा था। जो लोग अब तक सिर्फ अबाया के पीछे के जिस्म का अंदाज़ा लगा रहे थे, उनके सामने अब वह बेपनाह हुस्न साक्षात था। हर तरफ जैसे एक सन्नाटा सा छा गया, हर नज़र उनकी उस नूरानी खूबसूरती पर गड़ गई थी। अम्मी अपनी ही खूबसूरती से बेखबर, बस मेरी आँखों में अपनी जान की सलामती तलाश रही थीं, जबकि मैं उन्हें उस भीड़ की दरिंदा नज़रों से बचाने के लिए और कसकर अपने घेरे में ले चुका था।

नानी, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी पैनी समझ रखती थीं, तुरंत ताड़ गईं कि भीड़ की आड़ में क्या गंदा खेल खेला जा रहा है। उन्होंने देखा कि कैसे अम्मी बेबस होकर मुझ पर ढह गई हैं और उनका चेहरा बेपर्दा हो चुका है। अपनी उम्र की कमज़ोरी को दरकिनार करते हुए, वह फौरन अम्मी के पीछे आकर किसी ढाल की तरह खड़ी हो गईं।

नानी की आँखों में उस वक्त ममता नहीं, बल्कि एक शेरनी जैसा गुस्सा था।

उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ में उन आवारा लोगों को फटकारते हुए कहा:

"शर्म नहीं आती तुम लोगों को? डूब मरो कहीं! यह जो हरकतें कर रहे हो, याद रखना, तुम्हारे घर में भी माँ-बहनें और बेटियाँ होंगी। क्या उनके साथ भी यही तमाशा होते देखना चाहते हो? इंसानियत मर गई है क्या तुम सबकी?"

नानी की कड़क आवाज़ और उस फटकार में इतना दम था कि आस-पास के कुछ लोग शर्मिंदगी से नज़रें झुकाने लगे। उनका वह रौब देखकर जो हाथ अम्मी के मखमली बदन की टोह ले रहे थे, वे अचानक ठिठक कर पीछे हट गए।

नानी ने अम्मी का हाथ मज़बूती से पकड़ा और मेरी तरफ देखते हुए इशारा किया कि हम अंदर की तरफ बढ़ें। अम्मी अभी भी कांप रही थीं, उनका चेहरा मेरी छाती में छिपा हुआ था और उनके नर्म सीने का दबाव अभी भी मेरी धड़कनों को बेकाबू कर रहा था। नानी के पीछे से मोर्चा संभालने के बाद, मैंने भी पूरे ज़ोर से रास्ता बनाया और हम आखिरकार उस दरिंदा भीड़ को पीछे छोड़ते हुए ट्रेन के डिब्बे के अंदर दाखिल हो गए।

मुश्किल से हम डिब्बे के अंदर पहुँचे। अम्मी की साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं। जब वह अपनी सीट पर बैठीं। उनके चाँद से गोल चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं। उन्होंने अबाया को थोड़ा ढीला किया, जिससे उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन का वह गोरा हिस्सा अबाया के काले कॉलर से उभर कर सामने आ गया।

मैं उनके सामने बैठा, उन्हें देख रहा था। मेरे मन में उनके लिए कोई गलत विचार नहीं था, पर उस भीड़ भरे हादसे और अबाया के ऊपर से हुए उन स्पर्शों ने मेरे अंदर एक अजीब सी जागरूकता भर दी थी। मुझे अहसास हुआ कि मेरी अम्मी सिर्फ मेरी अम्मी नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत हैं जिनकी एक झलक, चाहे वह अबाया में ही क्यों न हो, ज़माने को बेताब कर देती है। उनकी वह मासूमियत और अबाया के पीछे छिपा वह कातिलाना बदन, दोनों मिलकर एक ऐसा जादू जगा रहे थे जिसने मुझे उस दिन पहली बार अपनी ही अम्मी को एक अलग नज़रिए से देखने पर मजबूर कर दिया।

अम्मी ने मेरी तरफ देखकर एक फीकी सी मुस्कान दी और कहा, "शुक्रिया साहिल, अगर तू नहीं होता तो आज पता नहीं क्या होता..."

उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ मेरे कानों में मिश्री की तरह घुली, और मैंने बस इतना सोचा कि मैं ता उम्र उनकी ढाल बनकर खड़ा रहूँगा।

ट्रेन की डिम लाइट और पहियों की गूँज के बीच, वह सफर मेरे वजूद में एक ऐसी हलचल मचा रहा था जिसे मैं चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था। मैं अम्मी के बिल्कुल बगल में सटकर बैठा था। नानी खिड़की वाली सीट पर गहरी नींद में थीं, उनकी हल्की खर्राटों की आवाज़ डिब्बे के सन्नाटे में घुल रही थी।

अम्मी का वह काला ढीला-ढाला अबाया अब हमारे बीच की दूरी को मिटाने में नाकाम साबित हो रहा था। ट्रेन की हर थरथराहट और हर मोड़ पर आने वाला झटका अम्मी के नर्म और गर्म जिस्म को मेरे शरीर से ज़ोर से टकरा देता था।

जब भी ट्रेन की रफ़्तार तेज़ होती, उनका भारी और सुडौल सीना मेरी बाँह से रगड़ खाता, जिससे मुझे उस मखमली दबाव का गहरा अहसास होता। उनके जिस्म की वह आग जैसी तपिश अबाया के कपड़े को पार कर मेरे जिस्म में उतर रही थी, जिससे मेरी नसों में एक अजीब सी बेचैनी दौड़ने लगी।

अबाया की आस्तीनों से बाहर झाँकते उनके दूधिया सफेद हाथ चांदनी में और भी हसीन लग रहे थे। उनसे आती लोशन और चमेली की मिली-जुली भीनी खुशबू मेरे नथुनों से टकराकर मेरे दिमाग में एक नशा सा घोल रही थी।

"बेटा, दिल्ली में बहुत मज़ा आएगा," अम्मी ने आहिस्ता से फुसफुसाकर कहा।

उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ और उनके लबों की गर्माहट मेरे कान के पास महसूस हुई, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखों में शादी की खुशी थी, पर मेरी नज़रें उनके उन गुलाबी होंठों और उस लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिक गई थीं जो नकाब हटने के बाद अब पूरी तरह नुमाया थी।

ट्रेन की एक ज़ोरदार वाइब्रेशन ने अम्मी को पूरी तरह मेरी तरफ धकेल दिया। उनका चौड़ा कूल्हा मेरी जांघ से ज़ोर से सटा और उनकी पतली कमर का झुकाव मेरे पर आ टिका। उस पल मुझे गहराई से अहसास हुआ कि मेरी अम्मी कितनी सेक्सी और दिलकश हैं। उनके बदन का हर कर्व, हर उभार एक कयामत था। मेरे अंदर कामुकता की एक तेज़ लहर उठी, जिसने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं।

पर जैसे ही यह ख्याल आया, मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंधी। 'यह क्या सोच रहा हूँ मैं? यह गुनाह है, महापाप है!' मैंने झटके से अपनी आँखें बंद कर लीं और उस ज़हरीले मगर मीठे ख्याल को झटकने की कोशिश की।

वह मेरी अम्मी थीं, मेरी जन्नत। लेकिन उनके बदन की वह छुअन और वह खुशबू मुझे बार-बार उसी दलदल की तरफ खींच रही थी। मैंने अपना सर उनके कंधे पर टिका दिया, पर ट्रेन की हर हरकत उनके नर्म गोश्त को मुझसे रगड़ रही थी, जो मुझे बार-बार यह याद दिला रहा था कि मेरी 'जन्नत' इस दुनिया की सबसे खूबसूरत और कशिश भरी औरत है। वह रात महज़ एक सफर नहीं, बल्कि मेरे अंदर शुरू होने वाले एक नए और खतरनाक अध्याय की पहली दस्तक थी।
वाह!
 
अध्याय 2

रात के दस बज रहे थे। ट्रेन की पीली डिम लाइटों ने डिब्बे के भीतर एक धुंधला और कामुक सा माहौल बना दिया था। सोने की तैयारी हो रही थी, और अम्मी अपनी नीचे वाली बर्थ पर अपना बैग टटोल रही थीं। नानी पहले ही चादर ओढ़कर सुस्ताने लगी थीं।

अम्मी ने बैग से अपनी नीले रंग की रेशमी नाइटगाउन निकाली। अम्मी ने उसे हाथ में लिया, तो उनके दूधिया सफेद हाथ उस नीले रंग के साथ एक गजब का कंट्रास्ट बना रहे थे। वह रात के इस पहर में भी बला की खूबसूरत लग रही थीं।

अम्मी: (धीरे से, नकाब को संभालते हुए) "साहिल... बेटा, सुन तो?"

मैं: (लेटे-लेटे, आवाज़ में थोड़ा आलस भरते हुए) "जी अम्मी, क्या बात है? अब तो सोने का वक्त है।"

अम्मी: (अपनी नाइटगाउन की तरफ इशारा करते हुए) "मुझे कपड़े बदलने हैं... वॉशरूम तक चलना पड़ेगा। पर मुझे बहुत डर लग रहा है। वो स्टेशन वाले लोग... मैंने देखा है, वो अभी भी वहीं गेट के पास खड़े बीड़ी पी रहे हैं।"

मैं: (थोड़ा हिचकिचाते हुए, एक टीनएजर की तरह) "अरे अम्मी, आप भी न! अब मैं क्या साथ चलूँ? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि इतना बड़ा लड़का अपनी अम्मी को कपड़े बदलवाने ले जा रहा है? आप नानी को बोल लो।"

अम्मी: (आँखों में गहरी मिन्नत और थोड़ा डर समेटे) "नहीं बेटा, नानी थक गई हैं। और वो लोग... उनकी नज़रें बहुत गंदी हैं। तू बस दरवाज़े के बाहर खड़ा रह जाना, मुझे लगेगा कि तू पास है तो सुकून रहेगा। प्लीज, मेरा प्यारा बेटा है न?"

अम्मी का वह नर्म और शहद जैसा लहजा सुनकर मेरा सारा विरोध पिघल गया। मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ कि मेरी इतनी हसीन अम्मी खुद को सुरक्षित रखने के लिए मेरे सहारे की तलाश में हैं।

मैं: (नीचे उतरते हुए) "ठीक है, चलिए। घबराइए मत, मैं हूँ न।"

अम्मी के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आई। वह आगे बढ़ीं और मैं उनके पीछे। गलियारे के तंग रास्ते में जब वह चल रही थीं, तो उनका ढीला-ढाला काला अबाया उनके सुडौल कूल्हों की हरकत के साथ लहरा रहा था। उनकी चमेली की भीनी खुशबू उस बंद गलियारे में एक नशा सा घोल रही थी।

जैसे ही हम वॉशरूम के करीब पहुँचे। वही हट्टे-कट्टे लोग, जिन्होंने स्टेशन पर अम्मी को छेड़ा था, गेट के पास झुंड बनाकर खड़े बीड़ी पी रहे थे। बीड़ी का कड़वा धुआँ और उनकी दरिंदा नज़रें जैसे ही अम्मी पर पड़ीं, वे आपस में फुसफुसाने लगे। उनकी आँखें अम्मी के हाथ में दबी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन को देख रही थीं, जैसे वे अंदाज़ा लगा रहे हों कि उस अबाया के नीचे क्या-क्या छिपा है।

अम्मी ने डर के मारे मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया। उनके नर्म और गर्म पंजों की पकड़ मेरे जिस्म में एक करंट की तरह दौड़ी। उन्होंने खुद को मेरे और करीब कर लिया, जिससे उनका उभरा हुआ सीना मेरी बाँह से रगड़ खाने लगा। उस पल, मुझे अपनी मर्दानगी का अहसास हुआ और साथ ही अम्मी के उस कातिलाना बदन की छुअन ने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं। मैंने उन लोगों को घूरकर देखा और अम्मी को वॉशरूम के दरवाज़े तक ले गया।

जैसे ही अम्मी ने वॉशरूम का भारी लोहे का दरवाज़ा खोला, अंदर से आती एक तेज़ और सड़ांध भरी बदबू ने उनका स्वागत किया। सफ़ाई की कमी और फिनाइल की तीखी गंध ने उनके चेहरे पर शिकन ला दी। अम्मी हमेशा से नज़ाकत और सफ़ाई की आदी रही थीं, और ट्रेन के उस गंदे टॉयलेट को देखकर उनकी आँखों में घिन और बेबसी साफ झलक रही थी।

उन्होंने अपनी नाक पर नाइटगाउन रखा और अंदर की तंग जगह का मुआयना किया। वहाँ न तो कपड़े टांगने की कोई साफ जगह थी और न ही हुक पर भरोसा किया जा सकता था। वह वापस मुड़ीं और मेरी आँखों में झांकते हुए धीरे से फुसफुसायीं।

अम्मी: (नाक सिकोड़ते हुए) "उफ़, साहिल... कितनी गंदी जगह है! यहाँ तो अपना बैग या कपड़े रखना भी मुश्किल है। सब गीला और गंदा पड़ा है।"

मैं: (उनकी परेशानी समझते हुए) "हाँ अम्मी, ट्रेन के टॉयलेट ऐसे ही होते हैं। आप जल्दी से बदल लीजिए, मैं बाहर ही खड़ा हूँ।"

अम्मी: (हिचकिचाते हुए, अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मेरी तरफ बढ़ाते हुए) "बेटा, तू ज़रा ये पकड़। मैं अंदर जाकर पहले अपना अबाया उतारती हूँ, फिर तू मुझे ये पकड़ा देना। यहाँ कहीं भी रखने की जगह नहीं है, मेरा नया गाउन गंदा हो जाएगा।"

मैंने अम्मी के हाथ से वह नीला रेशमी कपड़ा थाम लिया। उस सिल्क की छुअन इतनी नर्म और चिकनी थी, जैसे अम्मी की अपनी त्वचा।

मुझे अच्छी तरह याद था कि आज सफर के लिए अम्मी ने अबाया के नीचे अपना वह खूबसूरत पीला सूट पहना था। वह सूट काफी तंग था और उसके बाजू नहीं थे—एक स्लीवलेस फिटिंग वाला कुर्ता जो उनके बदन से चिपक कर उनके हर कर्व को उभार देता था।

जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा आधा बंद किया और अंदर की कुंडी लगाई, मुझे अहसास हुआ कि कुछ ही पलों में वह उस भारी काले अबाया को उतार देंगी और उनके उस दूधिया सफेद बदन पर सिर्फ वह तंग पीला कपड़ा रह जाएगा।

मेरे हाथ में उनका नाइटगाउन था। अम्मी अंदर थीं, और मैं बाहर खड़ा उस बंद दरवाज़े के पीछे होने वाली हर सरसराहट को महसूस कर रहा था। मुझे पता था कि जब वह हाथ बाहर निकालेंगी, तो उनके नंगे और गोरे कंधे उस पीले कपड़े के कंट्रास्ट में किसी बिजली की तरह चमकेंगे।

पास खड़े वही आवारा लोग अभी भी तिरछी नज़रों से हमें देख रहे थे, पर मेरा पूरा ध्यान उस दरवाज़े की दरार पर था, जहाँ से अम्मी की गर्माहट और उनकी साँसों की आवाज़ मुझ तक पहुँच रही थी।

ट्रेन ने अचानक एक ज़ोरदार झटका लिया, ठीक उसी पल जब अम्मी ने अपना काला अबाया उतारकर दरवाज़े की कुंडी हल्की सी खोली थी। उनका इरादा बस इतना था कि वह एक हाथ बाहर निकालकर मुझे अबाया पकड़ा दें और मुझसे वह नीली सिल्क की नाइटगाउन ले लें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।

उस झटके से दरवाज़ा अम्मी के हाथ से छूट गया और पूरी तरह पीछे की ओर खुल गया। अंदर का नज़ारा बिजली की तरह उन आवारा लोगों और मेरी आँखों के सामने कौंध गया।

अबाया के बिना, अम्मी उस तंग और स्लीवलेस पीले सूट में किसी जलपरी की तरह लग रही थीं। वह कुर्ता उनके बदन से इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उतार-चढ़ाव नुमाया हो रहा था। उस चटक पीले रंग के साथ उनकी दूधिया सफेद त्वचा का कंट्रास्ट इतना तीखा था कि देखने वाले की आँखें चुंधिया जाएँ। उनके गोरे, सुडौल और नंगे कंधे रोशनी में संगमरमर की तरह चमक रहे थे।

चूँकि उन्होंने दुपट्टा नहीं लिया था, उनके गर्व से भरे पुष्ट स्तन उस तंग कपड़े के नीचे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। उनकी पतली कमर और वहाँ से नीचे की ओर बढ़ते चौड़े कूल्हों के कर्व ने एक ऐसी कामुक लय बनाई थी जिसे देखकर कोई भी अपना आपा खो दे। उनके मखमली और गोरे हाथ हवा में आधे खुले हुए थे, और उनके चेहरे पर अचानक आई उस आफत की वजह से गहरी दहशत थी।

वहाँ खड़े उन रऊडी लोगों की आँखों में जैसे हवस का लावा उबल पड़ा। अम्मी की उस नूरानी और कामुक छवि को अचानक अपने सामने पाकर वे अपनी औकात भूल गए।

उनमें से एक हट्टा-कट्टा शख्स, जो बीड़ी पी रहा था, आगे बढ़ा और अम्मी के उस बेपर्दा हुस्न को अपनी गंदी नज़रों से ऊपर से नीचे तक चाटते हुए बड़े भद्दे लहजे में बोला:

"वाह भाई! क्या माल छिपा रखा था काली चादर में... मैडम, अकेले-अकेले बड़ी मुश्किल हो रही होगी। कहो तो अंदर आकर चेंज करने में आपकी थोड़ी मदद कर दें?"

उसकी बात सुनकर पीछे खड़े उसके साथियों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और एक ने लंबी सीटी बजाई। उनकी वह भद्दी हँसी और सीटियाँ उस खामोश गलियारे में ज़हर की तरह घुल गईं। अम्मी का गोरा चेहरा शर्म और खौफ से एकदम लाल पड़ गया। वह अपने दोनों हाथों से अपने भरे हुए सीने को ढंकने की कोशिश करने लगीं, लेकिन उस छोटे से बाथरूम में उनकी बेबसी साफ़ दिख रही थी।

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कान में गरम तेल डाल दिया हो। मेरी अम्मी, जो मेरी नज़र में पवित्रता की मूरत थीं, उनके उस कातिलाना और सेक्सी रूप का इस तरह सरेआम मज़ाक उड़ते देख मेरा खून खौल उठा। एक तरफ तो अम्मी के उस अर्धनग्न और मोहक बदन की छुअन और दृश्य ने मेरे टीनएज दिमाग में एक करंट पैदा कर दिया था, और दूसरी तरफ उन लोगों की ज़ुबान ने मेरी मर्दानगी को ललकारा था।

मेरा खून खौल उठा था। उन बदतमीजों की सीटी और वह भद्दा जुमला मेरे कानों में शीशे की तरह चुभ रहा था। मैंने जैसे ही अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और उन दरिंदों की तरफ एक कदम बढ़ाया, अम्मी ने फुर्ती से अपना गोरा और रेशमी हाथ बाहर निकाला और मेरी बाजू थाम ली।

अम्मी: (धीमी और कांपती हुई आवाज़ में) "साहिल... नहीं बेटा! पागल मत बन। तू चुपचाप यहाँ खड़ा रह, बस।"

उनकी आँखों में गहरी दहशत थी। उन्होंने जल्दी से अपना काला अबाया मेरे हाथों में थमाया और बदले में अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मुझसे ले ली। वह इतनी डरी हुई थीं कि उन्हें होश ही नहीं था कि वह किस हाल में सबके सामने खड़ी हैं। जैसे ही वह मुड़ीं ताकि वापस उस तंग बाथरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर सकें, उन्होंने अनजाने में उन आवारा लोगों को अपनी खूबसूरती का वह हिस्सा दिखा दिया जिसे अब तक सिर्फ अबाया के काले पर्दे ने छुपा रखा था।

जैसे ही अम्मी मुड़ीं, उस तंग पीले सूट का पिछला हिस्सा पूरी तरह नुमाया हो गया। उस कुर्ते की गर्दन पीछे से बहुत गहरी थी, जो उनकी दूधिया सफेद और चिकनी पीठ को लगभग आधा नंगा कर रही थी। उनकी रीढ़ की हड्डी के पास की वह गहरी ढलान और उस पर चमकता पसीना किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने के लिए काफी था।

लेकिन असली कयामत तो नीचे थी। वह पीला सूट उनके सुडौल कूल्हों पर इस कदर चिपका हुआ था कि उनकी गाँड का हर उतार-चढ़ाव साफ़ नज़र आ रहा था। चलते वक्त जब उनके कदम डगमगाए, तो उनके उन मखमली और पुष्ट नितंबों में एक ऐसी लचक पैदा हुई जिसे देखकर वहाँ खड़े उन रऊडी लड़कों की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह नंगी गोरी पीठ और उसके नीचे उस पीले कपड़े में कैद वह कातिलाना उभार... वह नज़ारा किसी के भी ज़हन में आग लगाने के लिए काफी था।

उनमें से एक ने अपनी बीड़ी का धुआँ हवा में छोड़ते हुए एक और गंदी आवाज़ निकाली।

"उफ़... पीछे का मंज़र तो सामने से भी ज़्यादा ज़ालिम है! यार, ऐसी 'जन्नत' तो मैंने आज तक नहीं देखी।"

अम्मी ने हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद किया। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी। एक तरफ उन लोगों की बदज़ुबानी पर मेरा गुस्सा और दूसरी तरफ अपनी ही अम्मी के उस बेपनाह सेक्सी और छुपे हुए रूप का साक्षात दर्शन—मैं एक ऐसे भंवर में फँस गया था जहाँ 'पाप' और 'हकीकत' के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही थी।

बाथरूम के अंदर से कपड़ों की सरसराहट की आवाज़ आ रही थी, और मैं बाहर खड़ा उनके उस दूधिया बदन और उस गहरी गर्दन वाले पीले सूट की यादों से जूझ रहा था।

माहौल पल भर में तनावपूर्ण से खौफनाक हो गया। उन आवारा लड़कों की टोलियों ने बड़ी चालाकी से घेराबंदी कर ली थी। दो लड़के मेरे दाएं-बाएं आकर खड़े हो गए, जिससे मैं उनके बीच सैंडविच की तरह फंस गया। उनमें से एक, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और मुँह से बीड़ी की बदबू आ रही थी, उसने बड़े हक के साथ अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया—जैसे हम पुराने दोस्त हों।

उसने अपना मुँह मेरे कान के बिल्कुल करीब लाया और अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा कि सिर्फ मैं सुन सकूँ। उसकी आवाज़ में एक नशीली और गंदी तारीफ घुली हुई थी।

"अबे ओ छोटे... सच बता, ये तेरी अम्मी ही हैं? कसम खुदा की, कोई देख ले तो यकीन न करे। जिस तरह का इनका दूधिया बदन है और वो पीला तंग कुर्ता, ये तो 25 की भी नहीं लगतीं। ऐसी कयामत चीज़ घर में छुपाकर रखी है तूने?"

उसकी बातों ने मेरे ज़हन में एक साथ कई भावनाओं का विस्फोट कर दिया—एक तरफ अम्मी के उस कातिलाना हुस्न का सरेआम ज़िक्र सुनकर मुझे घिन आ रही थी, तो दूसरी तरफ उनकी सेक्सी इमेज का यह खौफनाक सच मुझे अंदर तक हिला रहा था।

तभी मेरी नज़र गैलरी के दूसरे छोर पर पड़ी। दो और लड़के वहाँ दीवार से टिक कर खड़े हो गए थे, उन्होंने हमारा रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। अब न तो कोई उधर से आ सकता था और न ही हम वहाँ से भाग सकते थे। नानी अपनी सीट पर सो रही थीं और इस खतरे से बिल्कुल बेखबर थीं।

अचानक मुझे अपनी सुरक्षा की भी उतनी ही फिक्र होने लगी जितनी अम्मी की। मैं सिर्फ एक कॉलेज जाने वाला पतला-दुबला लड़का था, और वे चार हट्टे-कट्टे रऊडी लड़के थे। मुझे समझ आ गया कि वे सिर्फ अम्मी के उस मखमली बदन को निहारने नहीं आए थे, उनके इरादे बहुत खतरनाक थे।

बाथरूम के अंदर से अम्मी के कपड़ों की सरसराहट आ रही थी। मुझे अहसास हुआ कि जब वह उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में बाहर निकलेंगी, तो वह उन भेड़ियों के लिए और भी आसान शिकार बन जाएँगी। उस रेशमी और पारदर्शी कपड़े में उनके भरे हुए सीने और चौड़े कूल्हों का उभार उन लोगों को और भी पागल कर देगा।

मेरी हथेलियाँ पसीने से भीग गई थीं। मैं उन दो लड़कों के बीच फंसा हुआ था, और सामने खड़े दो और लड़के मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे, जैसे वे किसी बड़ी वारदात की तैयारी में हों। उस बंद और घुटन भरी गैलरी में, अम्मी की सुरक्षा अब पूरी तरह मेरी हिम्मत और समझदारी पर टिकी थी, पर मेरा खुद का दिल खौफ और एक अजीब सी उत्तेजना के बीच बुरी तरह धड़क रहा था।

"देख छोटे, हम बस मैडम से थोड़ी जान-पहचान करना चाहते हैं, तू बीच में मत आना," कंधे पर हाथ रखे हुए शख्स ने दबाब बढ़ाते हुए कहा।

अम्मी को अब किसी भी पल बाहर आना था, और मुझे पता था कि उनका वह गोरा हुस्न इन चार भूखे भेड़ियों के सामने तमाशा बनने वाला है। क्या मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त बचा पाऊँगा? या उनकी वह कातिलाना खूबसूरती हमें किसी बड़ी मुसीबत में झोंक देगी?
बहुत खूब!
 
अध्याय 3

बाथरूम के भीतर से कपड़ों की सरसराहट थमी और कुंडी खुलने की आवाज़ आई। अम्मी ने अपना एक सफेद हाथ बाहर निकाला ताकि मुझसे वह काला अबाया वापस ले सकें और उसे अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन के ऊपर पहन सकें। वह अंदर की गंदगी और बदबू से इतनी परेशान थीं कि जल्द से जल्द बाहर निकलना चाहती थीं।

मगर जैसे ही दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, उन भेड़ियों में से एक अपनी जगह से उछला और दरवाज़े के पास जा पहुँचा।

उस शख्स ने अपनी गंदी नज़रों को अम्मी के उस नीले रेशमी लिबास पर गड़ा दिया, जो उनके बदन से चिपक कर उनके पुष्ट सीने और कूल्हों की नुमाइश कर रहा था। वह बड़े बेशर्म लहजे में मुस्कुराते हुए बोला:

"अरे मैडम, इतनी जल्दी क्या है? अंदर बड़ी घुटन है, आप बाहर ही आ जाइए और आराम से यहीं अपना अबाया पहन लीजिए। हमें भी तो ज़रा कुदरत का यह नूरानी बदन जी भर के देखने दीजिए। हम बस आपको ठीक से देखना चाहते हैं, कोई गुनाह तो नहीं कर रहे!"

अम्मी यह सुनकर सन्न रह गईं। उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। उन्होंने घबराकर दरवाज़ा ज़ोर से बंद करने की कोशिश की, ताकि वह उन वासना से भरी नज़रों से बच सकें।

मगर वह आदमी शातिर था। जैसे ही अम्मी ने पल्ला खींचा, उसने फुर्ती से अपना भारी जूता दरवाज़े की दरार में फँसा दिया। लोहे का दरवाज़ा उसके पैर से टकराकर रुक गया और बंद नहीं हो सका। अम्मी ने अंदर से पूरी ताक़त लगाई, लेकिन उस हट्टे-कट्टे मर्द के पैर के सामने उनकी नर्म बाहें बेबस थीं।

"प्लीज... दरवाज़ा छोड़ो! साहिल! देखो ये क्या कर रहे हैं!" अम्मी की आवाज़ में रोनी सी चीख थी।

साहिल अम्मी की तरफ बढ़ने की कोशिश करने लगा और चिल्लाया, "मेरी अम्मी को छोड़ दो!" उसे पकड़े हुए एक शख्स ने उसके पेट में घूँसा जड़ दिया और बोला, "ज्यादा बहादुर मत बन।"

साहिल दर्द से दोहरा हो गया, लेकिन फिर भी अम्मी की ओर बढ़ने की कोशिश करता रहा। उसे फिर से पेट में एक और घूँसा पड़ा।

उस शख्स ने दरवाज़े पर अपना हाथ टिका दिया और झुककर अंदर झाँकने की कोशिश करने लगा, जहाँ अम्मी उस पारदर्शी नीली सिल्क में अपनी इज़्ज़त बचाने की जद्दोजहद कर रही थीं। उसने बड़े इत्मीनान से कहा:

"अरे मैडम, घबराती क्यों हैं? आप ज़रा बाहर तो आइए। देखिए, आपका लाडला बेटा भी तो यहीं बाहर खड़ा है। हम कोई पराये थोड़े ही हैं, बस आपकी इस कातिलाना खूबसूरती के कायल हो गए हैं।"

"ज़रा ये दरवाज़ा खोलिए, देखिए, आपका बेटा आपको पुकार रहा है, शायद वह भी अपनी अम्मी को देखना चाहता है।"

मैं उन दो लड़कों के बीच जकड़ा हुआ था, मेरे पेट में असहनीय दर्द हो रहा था। मैं दर्द और अपमान के मारे रो रहा था, तभी एक लड़के ने कहा, "अगर तुमने ज़बान खोली तो अंजाम बुरा होगा," और इतना कहते ही उसने एक रामपुरी चाकू निकाला और मेरी गर्दन पर टिका दिया।

मेरी आँखों के सामने मेरी अम्मी, जो मेरी दुनिया थीं, उस तंग नाइटगाउन में कांप रही थीं। उनके मखमली और भरे हुए अंगों का उभार उस नीले कपड़े के नीचे साफ़ झलक रहा था, जिसे वे दरिंदे अपनी नज़रों से नोच रहे थे।

मुझे अपनी सुरक्षा का भी डर था, पर अम्मी की वह बेबसी देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था। वह दरवाज़ा अब खुला हुआ था, और उन लोगों की पहुँच और अम्मी के दूधिया बदन के बीच अब सिर्फ चंद इंच का फासला बचा था।

"छोड़ दो उन्हें... प्लीज," मेरे मुँह से बस एक कमज़ोर सी आवाज़ निकली, जिसे उन लोगों ने एक ज़ोरदार ठहाके के साथ उड़ा दिया।

अम्मी की आँखें मुझसे मदद मांग रही थीं, और मैं अपनी ही अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को सरेआम नीलाम होते देख रहा था।

जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा बंद करने की आखिरी कोशिश की, उस शख्स ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी।

उसने झटके से अम्मी का वह गोरा और नर्म हाथ पकड़ा और उन्हें बाहर की तरफ खींच लिया। वह ज़ोर इतना ज़बरदस्त था कि अम्मी खुद को संभाल नहीं पाईं और सीधे उस दरिंदे की बाहों में जा गिरीं।

वह आदमी करीब 5 फीट 8 इंच का था, जिसका रंग गहरा सांवला और बदन गठा हुआ था। उसने सिर्फ एक काली बनियान और ट्राउजर पहन रखा था, जिससे उसकी पसीने से तरबतर बाहें और चौड़ा सीना साफ़ दिख रहा था। जब अम्मी का दूधिया सफेद और कोमल बदन उस काले बनियान वाले शख्स के सीने से टकराया, तो वह नज़ारा किसी भी देखने वाले की धड़कन रोक देने के लिए काफी था।

अम्मी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में उसके हाथों में कैद थीं। झटके की वजह से उनका संतुलन बिगड़ गया था और उनके भरे हुए सीने का उभार उस आदमी की सख्त छाती से ज़ोर से सट गया था। सिल्क का वह पतला कपड़ा उन दोनों के जिस्म की गर्मी को एक-दूसरे तक पहुँचा रहा था। अम्मी का वह नूरानी और सेक्सी रूप उस सांवले शख्स की गिरफ्त में और भी ज़्यादा नाजुक और कीमती लग रहा था।

उस शख्स ने अपनी मज़बूत बाहें अम्मी की पतली कमर के गिर्द लपेट लीं, उसकी उंगलियाँ उस नीले रेशम के ऊपर से अम्मी की मखमली त्वचा को महसूस कर रही थीं।

"उफ़... मैडम, आप तो वाकई रुई की तरह नर्म हैं। इतनी जल्दी क्या थी अंदर भागने की? देखिए, अब तो आप खुद ही हमारी बाहों में आ गईं।"

उसने अम्मी के गोरे और नंगे कंधों के पास झुककर एक गहरी साँस ली, जैसे वह उनके बदन की खुशबू को अपने अंदर उतार लेना चाहता हो। अम्मी की आँखें दहशत से फटी रह गई थीं, उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे और वह अपनी जान बचाने के लिए उस शख्स के सीने पर अपने दोनों गोरे हाथ रखकर उसे पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी को एक अजनबी, गंदे आदमी की बाहों में इस तरह अर्धनग्न और बेबस हालत में। उन दो लड़कों ने मुझे अभी भी जकड़ रखा था। मेरे अंदर एक तरफ तो अम्मी को बचाने का पागलपन सवार था, और दूसरी तरफ उनके उस कातिलाना और कामुक बदन की यह नुमाइश मुझे सुन्न कर रही थी।

अम्मी की वह नीली नाइटगाउन उनके सुडौल कूल्हों पर थोड़ी ऊपर चढ़ गई थी, जिससे उनके गोरे पैरों की सफेदी उस अंधेरी गैलरी में चमक रही थी।

वह शख्स अब धीरे-धीरे अपना हाथ उनके कूल्हों की तरफ नीचे ले जा रहा था, और उसके साथियों की गंदी हँसी पूरे डिब्बे में गूँज रही थी।

"साहिल! बचा मुझे... साहिल!" अम्मी की वह बेबस पुकार सीधे मेरे कलेजे को चीर गई। पर फिर अम्मी की निगाह मेरी तरफ गई और उन्होंने देखा कि मेरी गर्दन पर एक रामपुरी चाकू टिका हुआ है। फिर वह अपनी हालत भूल गईं और गिड़गिड़ाते हुए बोलीं, "मेरे बेटे को छोड़ दो, मैं आपकी हर बात मानूँगी।"

वहाँ कोई नहीं था जो हमारी मदद कर सके। नानी सो रही थीं, और रास्ता उन रऊडी लड़कों ने ब्लॉक कर रखा था। मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त को उन गंदे हाथों में बिखरते देख रहा था।

उस सांवले, काली बनियान वाले शख्स की गिरफ्त अम्मी की मखमली कमर पर और मज़बूत हो गई। अम्मी खौफ के मारे पत्थर बन चुकी थीं, उनकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं और साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं, जिससे उनकी नीली सिल्क की नाइटगाउन उनके भरे हुए सीने पर ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रही थी।

उस सांवले शख्स ने कहा, "वह तो तुम मानोगी ही मेरी जान।"

उस शख्स ने अपनी नज़रों को अम्मी की लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिकाया, जहाँ पसीने की एक नन्हीं बूंद चमक रही थी। उसने अपना गंदा मुँह झुकाया और अपनी जीभ अम्मी की उस सफेद गर्दन पर फेर दी।

वह शख्स: (हवस भरी आवाज़ में चाटते हुए) "उफ़... कितनी मीठी है तू! कसम से, चीनी जैसी सफेदी और शहद जैसी मिठास।"

अम्मी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें ज़ोर से बंद कर लीं और उनके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। वह घिनौना स्पर्श उनके नर्म त्वचा पर किसी ज़हर की तरह लग रहा था।

वह शख्स: "डर मत जान... हम कुछ नहीं करेंगे। हम बस तुझे अच्छी तरह से देखना चाहते हैं। इतना कातिलाना हुस्न खुदा ने सिर्फ पर्दों में छुपाने के लिए थोड़े ही बनाया है।"

यह कहते हुए, उसने अम्मी को झटके से ट्रेन के टॉयलेट वाले कॉरिडोर के बीच में धकेल दिया, जहाँ रोशनी थोड़ी ज़्यादा थी। उसने अम्मी को बीच में खड़ा कर दिया ताकि वह एक तमाशा बन जाएँ। अब घेराबंदी ऐसी थी कि अम्मी का नूरानी बदन हर तरफ से देखा जा सकता था।

सामने का मंज़र: दो लड़के अम्मी के ठीक सामने खड़े थे, उनकी भूखी नज़रें अम्मी के नीले रेशमी गाउन के नीचे छिपे उनके पुष्ट स्तनों और उनके मखमली पेट के उभारों को ताक रही थीं। अम्मी ने अपने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए थे, मगर वह रेशमी कपड़ा इतना पतला था कि उनकी बेबसी छिप नहीं पा रही थी।

पीछे का मंज़र: बाकी के दो लड़के (जिन्होंने मुझे पकड़ रखा था) अम्मी की पीठ की तरफ थे। उन्हें अम्मी की वह नंगी गोरी पीठ और उस तंग नाइटगाउन में कैद उनके सुडौल कूल्हों का पूरा नज़ारा मिल रहा था।

मैं अपनी अम्मी को इस तरह चार दरिंदों के बीच एक खिलौने की तरह नुमाइश बनते देख रहा था। मेरे कंधे पर रखा वह हाथ अब और नीचे सरक रहा था, जैसे वह मुझे डरा रहा हो। अम्मी उस नीली सिल्क में किसी अप्सरा जैसी लग रही थीं, पर उनकी आँखों में जो बेबसी थी, उसने मेरा कलेजा छलनी कर दिया था।

उन लड़कों की गंदी फुसफुसाहट और उनकी सीटियाँ उस बंद गलियारे में गूँज रही थीं। वे अम्मी के बदन के एक-एक हिस्से पर गंदे कमेंट्स कर रहे थे।

"देख भाई, क्या सुडौल बनावट है... पीछे से तो एकदम कयामत लग रही है!" एक ने अम्मी के कूल्हों की तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने न चाहते हुए भी उस तरफ देखा, अम्मी की नाइटी उनके कूल्हों से चिपकी हुई थी और उनके उभारों को साफ़ बयां कर रही थी। मेरे साथ वाला लड़का बोला, "क्या मस्त गांड है, आज तो मारने का मज़ा आ जाएगा।"

अम्मी रो रही थीं, उनका चेहरा लाल पड़ गया था और वह बस दीवार से सटकर खुद को छोटा करने की कोशिश कर रही थीं। पर वह तंग नाइटगाउन उनके हर कामुक कर्व को धोखेबाज़ की तरह ज़माने के सामने पेश कर रहा था। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था, बस अपनी ही अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को इन भेड़ियों की नज़रों से नीलाम होते देख रहा था।

उस काली बनियान वाले शख्स ने अम्मी की पतली कमर पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली, उसकी उंगलियाँ नीले सिल्क के कपड़े को मरोड़ते हुए अम्मी के नर्म त्वचा में धंस रही थीं।

उसने अम्मी के कान के पास झुककर अपनी भारी और घिनौनी आवाज़ में आदेश दिया:

"चल अब धीरे से घूम जा... ताकि सबको अच्छे से तू नज़र आ सके। आगे का नज़ारा तो देख लिया, अब ज़रा पीछे की वह कातिलाना ढलान भी दिखा दे सबको।"

अम्मी पत्थर की मूरत बन गई थीं। उनकी आँखों से आँसू बहकर उनके दूधिया गालों पर लुढ़क रहे थे। उन्होंने इनकार में धीरे से सिर हिलाया, उनकी रूह कांप रही थी। पर उस काली बनियान वाले दरिंदे को 'ना' सुनने की आदत नहीं थी।

उसने अम्मी को कंधे से पकड़ा और ज़ोर का झटका देकर उन्हें गोल घुमा दिया। अम्मी की नीली सिल्क की नाइटगाउन हवा में एक लहर की तरह लहराई, जिससे उनके गोरे और सुडौल पैरों की सफेदी घुटनों तक नुमाया हो गई।

अब अम्मी की पीठ उस काली बनियान वाले शख्स की तरफ थी, और उनके शरीर का पिछला हिस्सा पूरी तरह उसके सामने था। उस डीप नेक नाइटगाउन में अम्मी की नंगी सफेद पीठ किसी संगमरमर की सिल्ली की तरह चमक रही थी। रीढ़ की हड्डी के पास जो पसीने की चमक थी, वह रोशनी में किसी हीरे जैसी लग रही थी। मगर उस भेड़िये की नज़रें तो नीचे टिकी थीं, जहाँ वह रेशमी कपड़ा अम्मी के पुष्ट कूल्हों पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म की हर लचक साफ़ दिखाई दे रही थी।

इस घुमाव के कारण, अम्मी का सामने का पूरा हिस्सा अब मेरी और मेरे साथ खड़े उन दो रऊडी लड़कों की तरफ हो गया था। उस तंग और झीने नीले रेशमी कपड़े के नीचे अम्मी के रसीले और भरे हुए मम्मे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। वे कयामत ढा रहे थे। उन दोनों लड़कों की आँखें हवस से फैल गईं और वे अम्मी के उस बेपनाह और कामुक हुस्न को एक-टक निहारने लगे। अम्मी ने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने दूधिया हाथों से अपने सीने को ढंकने की नाकाम कोशिश करने लगीं, पर उनकी बेबसी उस पारदर्शी कपड़े के आर-पार साफ़ झलक रही थी।

अम्मी ने शर्म के मारे अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया था, पर उनका वह कातिलाना बदन अब सबके लिए एक खुली किताब बन चुका था।

एक लड़का: (सीटी बजाते हुए) "वाह भाई! क्या गज़ब की बनावट है। कसम से, ऐसी सुडौल गाँड तो मैंने आज तक नहीं देखी। ये पीला सूट उतारकर इस नीले रेशम में तो मैडम एकदम परी लग रही हैं।"

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी को एक बाज़ारू चीज़ की तरह गोल-गोल घूमते हुए। मेरा दिल चीख रहा था, पर उन दो लड़कों ने मुझे अपनी गिरफ्त में इस कदर जकड़ रखा था कि मैं हिल भी नहीं पा रहा था। एक तरफ अम्मी की वह बेबसी और दूसरी तरफ उनके उस सेक्सी और कामुक रूप की यह नुमाइश मेरे किशोर मन में एक ऐसा तूफ़ान खड़ा कर रही थी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था।

वह सांवला शख्स अब अम्मी की पीठ पर अपनी उंगलियाँ फेर रहा था, जैसे वह उस दूधिया सफेदी का अंदाज़ा लगा रहा हो। अम्मी की सिसकियाँ तेज़ हो गई थीं, और वह उस तंग बाथरूम के दरवाज़े की चौखट को अपनी मखमली उंगलियों से ज़ोर से पकड़े हुए थीं, जैसे वही उनका आखिरी सहारा हो।

वही काली बनियान वाला सांवला शख्स, अम्मी के मखमली और पुष्ट बदन को अपनी गिरफ्त में लिए हुए एक शैतानी मुस्कान के साथ खड़ा था। फिर उसने अम्मी के कूल्हों पर धक्का मारा, अम्मी की आँखें डर से फैल गईं क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि उन्होंने अभी अपनी गांड के बीच क्या महसूस किया है।

उनके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली, "नहीं!"

तभी मुझे जकड़े हुए उस राजू नाम के लड़के ने अपनी लार टपकाते हुए सलीम की तरफ देखकर आवाज़ लगाई।

राजू: "ओ सलीम भाई! ज़रा इसके हाथ तो ऊपर करवाओ। इस हूर की परी ने अपने मर्मरी हाथों से अपने रसीले मम्मे ढंक रखे हैं। बाहर से उभार तो दिख रहा है, पर ढंग से दीदार नहीं हो पा रहा। ज़रा पर्दा तो हटाओ!"

राजू की बात सुनकर सलीम ज़ोर से ठहाका मारकर हँसा, उसकी गंदी हँसी उस तंग गलियारे में ज़हर की तरह गूँजी। उसने अम्मी के गोरे और कांपते हुए कन्धों पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली।

सलीम: (कमीनी मुस्कान के साथ) "अच्छा! तो हमारे राजू भाई को मम्मे देखने हैं? क्यों बे, क्या अभी से दूध पीने का मन कर रहा है क्या? बड़े रसीले और भरे हुए लग रहे हैं न इस नीली सिल्क के नीचे?"

सलीम ने फिर मेरी तरफ एक हिकारत भरी नज़र डाली, जैसे वह मुझे नीचा दिखाना चाहता हो।

सलीम: "क्यों छोटे? तूने तो अपनी अम्मी का दूध पिया ही होगा यहाँ से? अब ज़रा अपने भाईयों को भी तो देखने दे कि कुदरत ने इन्हें कितना सुडौल और भारी बनाया है!"

अम्मी यह सुनकर शर्म और ज़िल्लत से जैसे ज़मीन में गड़ गईं। उनके दूधिया गाल खौफ और अपमान से लाल पड़ गए थे। उन्होंने अपने दोनों हाथों को अपने भरे हुए सीने पर और भी ज़ोर से भींच लिया, जिससे उनकी नीली सिल्क की नाइटगाउन उनके उरोजों की गोलाई पर और भी ज़्यादा तन गई।

सलीम ने अम्मी के दोनों हाथों को झटके से उनके सिर के ऊपर उठा दिया। इस हरकत ने अम्मी के नीले रेशमी लिबास को उनके जिस्म पर और भी ज़्यादा तान दिया। हाथ ऊपर होने की वजह से उनका भरा हुआ सीना और भी बाहर की तरफ उभर आया, जैसे वह उस पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब हो।

उस नीली सिल्क के पारदर्शी खिंचाव के नीचे अम्मी के कठोर और उभरे हुए निप्पल्स साफ़ नज़र आने लगे, जो डर और ठंड की वजह से और भी नुमाया हो गए थे।

अम्मी का वह रसीला और पुष्ट उभार अब सीधे मेरी और उस राजू की नज़रों के सामने था। राजू की आँखों में हवस की चमक बढ़ गई और वह अम्मी के उन मखमली मम्मों को अपनी गंदी नज़रों से टटोलने लगा। अम्मी की आँखें शर्म के मारे बंद थीं, और उनका गोरा चेहरा ऊपर की तरफ खिंच गया था, जिससे उनकी सुराहीदार गर्दन और भी लंबी और दिलकश लग रही थी।

सलीम, जो अम्मी के पीछे खड़ा था, उनकी उन नंगी कलाइयों को ऊपर थामे हुए था। अम्मी की वह नंगी सफेद पीठ उस डीप नेक नाइटगाउन में पूरी तरह बेपर्दा थी। सलीम ने अपनी हवस भरी निगाहें उस संगमरमर जैसी पीठ पर गड़ाईं और अपना गंदा मुँह नीचे झुकाया।

सलीम ने अपनी जीभ अम्मी की उस दूधिया सफेद और चिकनी पीठ पर फेर दी। उसने उनकी रीढ़ की हड्डी के पास चमकते पसीने को चाटते हुए एक गहरी आवाज़ निकाली।

सलीम: "उफ़... खुदा की कसम! कितनी चिकनी और गरम पीठ है तेरी। मन करता है बस यहीं पिघल जाऊँ।"

अम्मी के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी। वह अपने हाथ छुड़ाने के लिए छटपटाईं, जिससे उनके उभरे हुए सीने की हरकत और भी तेज़ हो गई और उस नीले रेशम के नीचे उनके मखमली अंगों की लचक ने राजू और उसके साथी को पागल कर दिया।

राजू: (लार टपकाते हुए) "भाई! क्या गज़ब की चीज़ है। इसके मम्मे तो एकदम कयामत हैं। देख तो सही कैसे ऊपर-नीचे हो रहे हैं!"

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी के उस बेपनाह और सेक्सी बदन को इस तरह सरेआम नीलाम होते हुए। उनके उठे हुए निप्पल्स और वह नंगी गोरी पीठ... वह नज़ारा किसी भी मर्द के होश उड़ा देने के लिए काफी था, पर एक बेटे के तौर पर मेरी रूह इस ज़िल्लत से छलनी हो रही थी। अम्मी बस बेबसी में अपना सिर हिला रही थीं, और उनकी सिसकियाँ उस खौफनाक रात की खामोशी को चीर रही थीं।

उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ को समेटा और कांपते हुए लबों से विनती की।

अम्मी: (रुँधे हुए गले से) "खुदा के वास्ते... अब तो जाने दो। देख लिया न तुमने... अब बस करो, हमें अपनी सीट पर जाने दो।"

उनकी आवाज़ में इतनी बेबसी थी कि कोई पत्थर दिल भी पिघल जाए, मगर उन भेड़ियों पर हवस का भूत सवार था। सलीम एक बार फिर अम्मी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अम्मी की आँखों में आँखें डालीं और बड़े इत्मीनान से अपना काला हाथ उठाया।

उसने अपनी उंगलियाँ अम्मी के उन गुलाबी और कांपते हुए होंठों पर रख दीं।

सलीम: (फुसफुसाते हुए) "अभी कहाँ जान... अभी तो पार्टी शुरू हुई है। ज़रा ठहरो तो सही, इतनी जल्दी भी क्या है?"

उसकी उंगलियाँ अम्मी के मखमली लबों पर रेंग रही थीं। अम्मी ने खौफ के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं, और उनके गोरे गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गई।

सलीम: "बस थोड़ा सा टच करने दो... कसम से, अपनी इन आँखों पर यकीन नहीं होता कि खुदा ने किसी को इतना दूधिया और बेदाग गोरा भी बनाया होगा। मन करता है बस इस सफेदी को चख लूँ।"

यह कहते हुए उसने अपना दूसरा हाथ अम्मी के नंगे और सुडौल कंधे पर रख दिया। वह हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगा, उस नीली सिल्क की नाइटगाउन के कॉलर की तरफ, जहाँ से अम्मी के भरे हुए सीने की गहरी ढलान शुरू होती थी।

अम्मी का पूरा बदन थर-थर कांप रहा था। उनका वह कातिलाना बदन उस तंग नीले लिबास में हर धड़कन के साथ उभरकर सामने आ रहा था।

बाकी लड़के: (पीछे से देखते हुए) "हाँ भाई, ज़रा देख तो सही... ये रंग असली है या कोई जादू है! ऐसी मखमली काया तो सिर्फ ख्वाबों में होती है।"

मैं अपनी अम्मी को इस तरह नीलाम होते देख रहा था। मेरे कंधे पर रखा हाथ अब मुझे और ज़ोर से भींच रहा था।

मेरी नज़रें अम्मी के उस उभरे हुए सीने और सलीम के काले हाथों पर टिकी थीं। एक तरफ अम्मी की इज़्ज़त का सवाल था, और दूसरी तरफ उनकी वह बेपनाह और सेक्सी खूबसूरती जो इस वक्त पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा थी।
शानदार लेखन!
 
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