दिव्यास्त्र.[The power of five elements] - Page 11 - SexBaba
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दिव्यास्त्र.[The power of five elements]

अपडेट 83



आलिआ- अब क्या सोच रहे हो. जल्दी फैसला करो की क्या करना है.

मैं- तुम दोनों ने मुझे कंफ्यूज कर दिया और अब कहती हो की जल्दी फैसला करो. थोड़ा रुको मुझे फिर से ध्यान लगाना होगा. में एक बार कन्फर्म हो जाओ फिर hi आगे का सफर तय करेंगे.

सुरभि- ठीक है लेकिन जल्दी करो.

मैं- ठीक है. यही रुको में आता हु.

ये कहके मैंने उन दोनों को बही ऊपर छोड़ा और में उड़ता हुआ गया सीधे समुद्र की गहराई me.vo भी स्पीड से. जहा इस वक़्त हम थे वो जगह बरमूडा ट्रायंगल से थोड़ी सी दुरी पैर थी. और में पानी के अंदर से hi ाँस का पता लगाना छह रहा था ताकि कोई भी शक को गुंजाईश न रहे. समुद्र काफी जहर था में कब से नीचे जा रहा हु लेकिन अभी तक पंहुचा hi नहीं tha.jabki अच्छी खासी स्पीड से जा रहा था.

पानी के अंदर की दुनिआ बकै में काफी खूबसूरत होती है ये आज मुझे महसूस हो गया था. कितना सुन्दर दृश्य था. नीला पानी और उसमे तैरती फिश और बाकि के समुद्री जीव. उसकी सोभा और बड़ा रहे थे.

जैसे जैसे नीचे जा रहा था पानी का दबाव बढ़ता जा रहा था. मेरा सरीर भरी हॉट जा रहा था. जबकि पानी में चीज़े हलकी हो जाती है. लेकिन ज्यादा गहराई में जाने के बाद इसका उल्टा होता है.

खुद का सरीर hi अपना बजन नहीं उठा पता hai.vo तो अच्छा है की शक्तिया है वर्ण में तो आज गया था. में आराम से सास ले प् रहा था बिलकुल फिश की तरह. खैर जैसे तैसे में पहुंच hi गया जमीन पैर. समुद्र की गहराई में.

आँखे भी खोली नहीं जा रही थी मुझसे. लेकिन खोलना तो था hi. मैंने अपना संतुलन बनाया और में जमीन पैर बैठ गया. और अपनी आँखों को बंद करके ध्यान लगाने लगा. और ध्यान में जल ाँस को फिर से ढूंढ़ने लगा. लेकिन अब मुझे उनका बही एहसास नहीं हो रहा था जो पहले हुआ था. मतलब साफ़ था की उन दोनों का कहना सही था. ाँस यहाँ अब नहीं है. तो फिर कहा है.

अब ये सवाल जब मन में आया तो इसका जवाब भी आना चाहिए था लेकिन नहीं आया. मैंने अपनी तिरदये को खोला समुद्र देव का स्मरण किया और उनसे विनती की की मुझे जल ाँस तक पहुंचने का मार्ग दिखाए. और यही विनती में उनसे करता रहा और ध्यान लगता raha.lekin मुझे नहीं लग रहा था की समुद्र देव मेरी कोई भी सहायता करेंगे. ये सफर मुझे खुद hi तय करना पड़ेगा. इसलिए में अपने मंत्र का जाप करने लगा फिर से.

काफी देर तक में ध्यान में बैठा रहा. कब तक पता नहीं. तभी अचानक से मेरी आँख से एक रौशनी निकली जो बहुत छोटी सी थी लगभग आँख की hi साइज की. और वो मेरी आँख से निकल कर एक दूसरी दिशा में बढ़ने लगी. जैसे मुझे रास्ता दिखा रही हो. और ये देखकर मैंने अपनी आँखों को खोल लिया और उस रौशनी के पीछे पीछे जाने लगा तभी मैंने देखा की आलिआ और सुरभि भी एकदम मेरे पीछे पीछे hi आ रही है. ये देखकर में हैरान था की ये कब आई मेरे पास.

यही बात मैंने उनसे इशारे में पूछी तो उन्होंने भी इशारे से ध्यान करके बताया जिसका मतलब था की जब में ध्यान में बैठा था तब. और बाकि के जवाब में बाद में लेने वाला था उनसे. इस वक़्त आगे बढ़ना जरुरी था. और इसलिए में तेज़ गति से उस रौशनी के पीछे पीछे बढ़ने लगा और वो दोनों मेरे पीछे पीछे. हम कितने दूर तक चलते रहे पता नहीं. और कब तक ये भी कोई पता नहीं था. लेकिन इतना जरूर पता था की ये रौशनी हमें ाँस तक जरूर पंहुचा देगी.

रौशनी आगे आगे और हम पीछे पीछे. कितनी hi झाड़ियों में से गुजर कर आगे बाद गए थे हम. जिनके आर पार भी नहीं दिख रहा था हमें. लेकिन हम जाते rahe.badte rahe.kabhi लेफ्ट तो कभी राइट कभी ऊपर तो कभी नीचे. और एक जगह पैर पहुंचकर रौशनी एक झड़ी में घुस गयी और उसके पीछे हम भी और जब हम उस झड़ी से बहार निकले तो हम हैरान थे क्युकी हम जमीन पैर पहुंच गए थे. ये क्या जगह थी पता नहीं. यहाँ पैर केवल इतना पानी था की हमारे पैरो के पंजे hi उसमे दुबे रहे बाकि का सरीर अब बहार tha.or चारो तरफ कमल के फूल लगे हुए थे. इतने घने की जमीन hi नहीं दिख रही थी.

आलिआ- ये कहा आगये हम.

मैं- सायद ाँस के नजदीक.

सुरभि- लेकिन यहाँ पैर ाँस कहा हो सकता है.

मैं- देखो कही पैर कुछ अलौकिक चमक उठ रही है क्या. चारो तरफ अच्छे से नजर दौड़ाओ.

हम सभी चारो तरफ देखने लगे. लेकिन प्रॉब्लम ये थी हर तरफ अलौकिक चमक दिखाई दे रही थी. अब इसमें से ाँस की चमक कोनसी है ये जानना बहुत hi मुश्किल काम था.

आलिआ- हर तरफ चमक उठ रही है. कहा है ाँस.

सुरभि- देखो जल ाँस है तो जल के अंदर hi होगा हम कितना hi ऊपर क्यों न देखते रहे हमें कुछ नहीं मिलेगा. हमें नीचे देखने की जरुरत है.

मैं- बिलकुल सही कहा तुमने और ऐसा करने के लिए हमें अपना रूप छोटा करना होगा. तो ऐसा करते है में छोटा होक नीचे जाऊंगा बाकि तुम दोनों ऊपर से हो देखोगी की कहा पैर वो पानी के नीचे हो सकता है.

आलिआ- ठीक है.

मैंने अपने हाथो को जोड़ा अपनी आँखों को बंद किया और अपने आकर को छोटा करने का आवाहन किया. और ऐसा करते hi मेरा रूप एक दम छोटा होगया. इतना छोटा की जहा पैर हमारे केवल पैरो के पंजे डूब रहे थे अब बही जगह मुझे किसी समुद्र से काम नहीं लग रही थी.

मैंने उस छोटे से समुद्र में तैरना सुरु किया वो भी उन्देर्वाटर. में नीचे नीचे hi तैर रहा था. लेकिन था तैरना बहुत मुश्किल हो रहा था. कमल की डंडियों की बजह से. वो मुझे इस वक़्त किसी बड़े पेड़ का तना लग रही थी. उनके पतों और जड़ो में मैं खो सा जाने लगा था. कभी कही पेअर फास्ट तो कही पैर हाथ. लेकिन बिना हार मने में आगे बढ़ता रहा. बही आलिआ और सुरभि भी पानी में ध्यान से देख रही थी कहा पैर हो सकता है ाँस. ये एक बड़ा अजीब सा मायाजाल था. जिसमे लगता है की सब कुछ अपने कण्ट्रोल में है लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है.

अब इसी जगह पैर हमें लग रहा है की कितना मुस्की होगा ाँस को ढूंढ़ना पानी भी इतना काम है. सब कुछ हमारे पक्ष में है. लेकिन असली टेंशन तो नीचे सुरु हुई. क्युकी में जनता था की ाँस नीचे hi मिलेगा और यहाँ पैर छोटा होक में आया तब से मुझे मेरे पेअर तक नहीं दिख रहे ाँस तो दूर की बात है. कभी मेरे हाथ किसी जगह छिप जाते तो कभी मेरे पेअर. ऐसे में ाँस को यहाँ धुन्द्पाना बहुत hi मुश्किल होता जा रहा था. हर बार की तरह.

में काफी आगे बढ़ता जा रहा था. लेकिन कमल के पत्तो और जड़ो की बजह से कुछ खास सफलता नहीं मिल प् रही थी. मन कर रहा था इन्हे हटा दू. लेकिन में ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिससे बाद में मुझे hi प्रॉब्लम हो.

इसी तरह में आगे बढ़ता गया. और तभी मेरा पेअर एक जड़ में बुरी तरह फास गया. मैंने उसे खींचने की कोसिस की लेकिन मेरा पेअर निकल hi नहीं रहा था. बहुत बुरी तरह मेरे पेअर को जकड लिया था उस जड़ ने. इसलिए में बापिस मुदा और उस जड़ के पास गया और उसे हाथो से हटाने लगा ताकि मेरा पेअर बहार निकल सके.

बहुत म्हणत लग रही थी जड़ को हटाने में. मेरे दोनों हाथ उस जड़ को खींच खींच कर उखड रहे थे ताकि पेअर आज़ाद हो सके. और आखिर कार मुझे सफलता मिल hi गयी. मेरा पेअर आज़ाद हो गया. और वो जड़ उस जगह से हैट गयी.

और जैसे hi जड़ उस जगह से हटी मुझे जमीन पैर कुछ दिखा. किसी सीप की तरह. " बही सीप जिसमे से मोती निकलते है" जानते hi होंगे आपलोग.

मेरे आकर के मुकाबले बहुत बड़ा सीप था वो. इसलिए में नीच गहराई में गया एक दम जमीन पैर. और मैंने जैसे hi बहा पेअर रखकर आजु बाजु देखा तो में हैरान था. क्युकी बहा पैर ऐसे कई सीप रखे हुए थे. उतने hi जितने कमल बहा लगे हुए थे. हर सीप के ऊपर एक कमल खिला हुआ था. और अब ये और मुश्किल होने वाला था.

लेकिन करना तो था hi. इसलिए मैं पहले सीप के पास गया और उसके ऊपर के ढक्कन को पकड़ कर खोलने की कोसिस की. लेकिन बहुत भरी था. और दूसरी बात की में पानी में खड़ा था इसलिए मेरा बैलेंस नहीं बन प् रहा tha.isliye मैंने तरकीब लगाई. और सीप के नीचे अपने पैरो को फसाया और फिर ऊपर के ढक्कन को खोलने की कोसिस की. तो काम बन गया. ढक्कन धीरे धीरे खुलने लगा और जैसे हो ढक्कन खुला उसमे से एक अलौकिक रोहणी बहार निकलने लगी. बहुत तेज़. और यहाँ में बहुत कुश हो गया क्युकी ये जल ाँस हो था इतना में दावे से कह सकता था.

इसलिए मैंने उसके ढक्कन को दोबारा बंद किया और उसको अपने हाथो में कास कर पकड़ लिया. क्युकी अगर ये यहाँ गम गया तो इसे फिर से ढूंढ़ने में बहुत समय जायेगा. क्युकी यहाँ पहले से hi बहुत सरे ऐसे सीप रखे हुए थे.

इसलिए मैंने अपने पैरो को उसके नीचे से निकला और उस सीप को अपने हाथो में पकड़ लिया. और फिर से अपनी आँखों को बंद करके खुद को बड़ा करने को कहा. और ऐसा कहते hi मेरा आकार फिर से पहले जैसा हो गया. और मुझे बड़ा देखकर वो दोनों भी जल्दी hi मेरे पास आगयी. उन्हें भी लगा की सायद ाँस मुझे मिल चूका है.

मैंने बड़ा होने के बाद अपने हाथो को ऊपर पानी से बहार निकला तो मेरे हाथ में वो सीप था. जो अच्छी बात थी.

आलिआ- इसके अंदर है क्या ाँस.

मैं- है.

सुरभि- ये तो सीप है न. जिसमे से मोती निकलते है.

मैं- है बही है.

सुरभि- तो खोलो इसे.

मैंने ये सुनने के बाद उसे अपने लेफ्ट हैंड में रखा और दाहिने हाथ से महादेव का नाम लेकर उसे खोला तो उसमे से बही रूहानी रौशनी चारो तरफ फैलने लगी.

सुरभि- कितना खूबसूरत है ये. इक दम मन को मोहलेने वाला.

आलिआ- सही कहा.

उसके बाद मैंने अपने दाहिने हाथ पैर उस सीप को पलटा दिया तो वो ाँस तैरकर मेरी हथेली में आज्ञा. और हम तीनो ने उसे प्रणाम किया और उसके बाद वो वैसे hi मेरे सरीर में बापिस से समां गया. और ऐसा होते hi मेरा पूरा सरीर एक दम पानी में बदल गया. पानी की एक आकृति में. जिसे देखकर वो दोनों हैरान थी. जब तक ाँस ने पुरे सरीर में अपनी जगह नहीं बना ली तब तक में बैसे hi इस्थिति में बना रहा. और जब ाँस पूरी तरह से समां गया तो मेरा सरीर फिर से पहले जैसा हो गया.

मैं- मिशन सक्सेसफुल रहा. हमें चार ाँस मिल गए.

सुरभि- बधाई हो भाई. अब आखिरी ाँस बचा है. और उसका पता है क्या आपके पास.

मैं- नहीं लेकिन मिल जायेगा. कोई न कोई संकेत जरूर देंगे वो. बस उसे समझने की जरुरत है.

आलिआ- सही कहा. अब हमें चलना चाहिए. पता नहीं घर पैर क्या हो रहा होगा. कही असुरो ने हमला न कर दिया हो.

मैं- तुम्हारा कहना सही है. चलो हाथ पकड़ो मेरा.

दोनों ने मेरा हाथ पकड़ा और अगले hi पल हम बहा से गायब हो गए. और सीधे पहुंचे अपने घर. जहा की हालत देख कर hi समाज में आरहा था की यहाँ कुछ तो गड़बड़ हुई है. वो भी भयानक वाली गड़बड़.

इसलिए हम जल्दी से घर के अंदर गए. जहा सभी मौजूद थे सिवाय प्राची के.

मैं- प्राची कहा है. सब ठीक तो है न.

ये सुनते hi सभी का ध्यान हमारी तरफ गया. और रेनू थे भाग कर मेरे गले लग गयी.

मैं- shan't हो जाओ क्या हुआ विस्तार से बताओ.

रेनू- वो जैसा तुमने कहा था बैसा hi हुआ. वो असुर आये थे यह पैर. और काफी ज्यादा संख्या में आये थे. मैंने और प्राची ने उन्हें रोकने की बहुत कोसिस और लगभग रोक भी लिया था. लेकिन पता नहीं क्या हुआ. अचानक से सरे असुर गायब हो गए. और उनके साथ प्राची भी गायब हो गयी. मुझे लगता है या तो वो उनके पीछे गयी है. जो संभव नहीं. और दूसरा वो असुर उसे अपने साथ ले गए है. क्युकी लड़ाई में हम काफी दूर दूर थे. और हमारे बीच में असुर hi असुर भरे पड़े थे. हम एक दूसरे को देख भी नहीं प् रहे थे. सायद उन्होंने प्राची को क़ैद कर लिया होगा किसी जादू बगेरा में. और फिर सरे बहा से गायब हो गए. तब से हम बहुत टेंशन में थे. तुम्हे बताना छह रहे थे. लेकिन मैंने सोचा तुम जब यहाँ आओगे तब hi बताना ठीक होगा. काम सेकम ाँस तो ले लोगे तुम. वर्ण उसे बही छोड़ कर फ़ौरन hi यहाँ आजाओगे.

ये सुनते hi मेरा सुरभि और आलिआ का एक साथ दिमाग फिर गया. हम तीनो एक दूसरे को शक्ल देख रहे थे. और हमारे हैरान होने के पीछे को बजह साफ़ थी की. अगला ाँस बायु का है. और प्राची बायु की प्रतीक है. और ाँस उसी को रास्ता सुझाएगा. जैसे यहाँ सुरभि को सुझाया. पहले तो ये की ाँस उस जगह नहीं दूसरी जगह है. और दूसरा ये की नीचे ढूंढ़ना पड़ेगा. ये छोटी छोटी बाटे उस समय पैर कोई नहीं सोचता है. लेकिन ये उन्ही की प्रतीक है इसलिए इन्हे वो सूझे. और आलिआ के टाइम भी ऐसा hi हुआ था. बस अग्नि के समय में अकेला गया था. रेनू उस समय मेरे साथ नहीं थी. क्युकी अग्नि का स्थान तय था. लेकिन बाकि ांसो का कुछ भी तय नहीं था. वो कही भी हो सकते है. ाक्ष बहुत बड़ा है. बैसे hi जल भी चारो तरफ फैला हुआ है. और धरती भी काफी बड़ी है. और बायु का तो कोई आकार hi नहीं है. वो कितनी बड़ी कितनी लुम्बी है इसका कोई आईडिया hi नहीं है. और यही मेरी सफलता की चाबी को असुर ले गए. लेकिन उन्हें इस बात की खबर कैसे लगी. की प्राची बायु की प्रतीक है. मई बे सायद परीलोक की लड़ाई में. जरूर प्राची ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन किया होगा. जिसके बिना पैर उन लोगो ने ये अंदाजा लगाया होगा.

लेकिन समस्या अब ये थी के में उसे धुंडु कहा और कैसे………



तो बे कॉन्टिनुए………………….
 
अपडेट 84



में टेंशन में था और बाकि सभी कुछ ज्यादा hi टेंशन में थे. कुछ सूझ नहीं रहा था की अब क्या करू में. और कैसे.

प्राची को ढूंढ़ने के अब केवल 2 रस्ते थे. पहला तो ये की में उससे संपर्क बनाऊ जो हो नहीं रहा था. और दूसरा ये की में उस जगह का पता लागू जहा ाँस हो सकता है. क्युकी असुर भी उसे बही ले जायेंगे सायद. अगर उन्हें कुछ पता होगा तो.

आलिआ- बैसे एक बात मुझे समाज में नहीं आरही है.

मैं- और बो क्या.

आलिआ- वो असुर जब इतने पावरफुल है तो उन्होंने हमारे जाने के बाद क्यों हमला किया पहले क्यों नहीं. हमें वो जाने hi नहीं देते. जल ाँस तक हमें पहुंचने क्यों दिया. और दूसरी बात ये की उन्हें ये कैसे पता चला की प्राची इस ाँस को ढूंढ सकती है.

मैं- ये सवाल तो मेरे मन में भी है. लेकिन इसका सिंपल सा जवाब भी है मेरे पास जो सायद सही हो या फिर गलत भी हो सकता है.

आलिआ- क्या बताओ मुझे.

मैं- सिंपल है उनलोगो ने हमारे जाने के बाद हमला इसलिए किया होगा क्युकी सायद वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते होंगे. उन्हें इस बात का विस्वास नहीं होगा की मेरे रहते वो प्राची को ले जा सकते है. जो सायद सही भी है. इसीलिए हमारे जाने के बाद आये वो. और इसमें एक और बात है. वो हैंपर नजर जमाये हुए थे. अगर प्राची हमारे साथ जाती तो फिर वो हैंपर हमला करते. लेकिन प्राची जब यही रुकी तब उनके लिए ये एक अच्छा मौका हो गया और उन्होंने हमला कर दिया. और रही बात प्राची के बारे में जानकारी की तो परीलोक में प्राची ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन किया था. सायद उसी से उन्हें अंदाजा लग गया होगा की ये बायु तत्त्व की प्रतीक है. क्युकी उसके अंदर बैसि hi शक्तिया है. और इसी से उन्होंने ये अंदाजा लगाया होगा. या फिर ऐसा भी हो सकता है की इस घर में दोबारा उनलोगो ने किसी असुर को भेज दिया हो किसी और भेष में हमारे ऊपर निगरानी रखने के लिए. ताकि हमारी जानकारी वो जूता सके. और जब उन्हें ये पता चला होगा की प्राची उस ाँस को ढूंढ सकती है तो ले गए वो उसे अपने साथ. या फिर ऐसा भी हो सकता है की हम फालतू में इतना सोच रहे है. सायद वो केवल मुझे गुमराह करने या फिर प्राची को आगे करके मुझसे वो ाँस प्राप्त करना छह रहे हो. और उन्हें अभी भी इस बात का अंदाजा बिलकुल न हो की प्राची ाँस को ढूंढ सकती है. इनमे से कुछ भी हो सकता है.

ये सरे जवाब सुनकर सभी का दिमाग जो पहले से बिगड़ा हुआ था और बिगड़ने लगा. वो अब और भी कंफ्यूज होने लगे की अब क्या किया जाये.

रेनू- देव तुम्हे फिर से कोसिस करनी चाहिए. सायद प्राची ने कोई सुराग छोड़ा हो जिसे तुम पद सको या फिर असुर तुमसे कोई कांटेक्ट करे. हमें कोसिस तो करनी hi होगी हम ऐसे नहीं बैठे रह सकते.

मैं- तुम्हारा कहना सही है. ठीक है में फिर से कोसिस करता हु. आप लोग यही बैठिये में कमरे में जेक करूँगा और ये कपडे भी चेंज करने है.

और थोड़ा फ्रेश भी होना है.

सुरभि- सीरियसली.

मैं- है यार कबसे रोक कर राखी है. समझा करो. में आता हु.

ये कहके में चला गया भाग कर अपने कमरे में. सबसे पहले तो बाथरूम में गया और हल्का हुआ. बहुत बढ़िया फील हुआ. उसके बाद मुँह हाथ धोये कपडे सरे उत्पाद दिए और बहार आकर दूसरे पहन लिए. और फिर वही नीचे बैठ कर ध्यान में बैठ गया. में जनता था मेरे सरे सवालो के जवाब जानने का यही एक मात्रा उपाय है.

में ध्यान में बैठा hi था की मेरे दिमाग में एक तरकीब आई. जिसे सोचकर मैंने अपना माथा पीट लिया की ये मुझे पहले क्यों नहीं सुझा. में भी दुफर हु एक no. का.

मैंने अपने हाथो को जोड़ा और पृथ्वी ाँस को याद kiya.or अपनी तिरदये को ओपन किया.

मैं- हे पृथ्वी ाँस कृपा कर मेरी सहायता कीजिये प्राची को ढूंढ़ने में. वो कहा है मुझे दिख नहीं रही है. अगर वो यही पृथ्वी पैर है तो कृपा कर मुझे उस िस्थान के बारे में बताये.

ये सुनते hi ाँस से एक छोटी सी रौशनी निकली और भाग गयी और मेरी तिरदये उसका पीछा करने लगी. वो जहा भी जाती में उसके पीछे. हलाकि थे हम कमरे में hi. लेकिन में बही बैठे बैठे सभी जगह देख रहा था. पृथ्वी ाँस प्राची को ढूंढ रही थी. अगर वो पृथ्वी पैर कही भी है तो तुरंत hi इसकी जानकारी मुझे मिल जनि थी.

और यही हुआ. वो रौशनी एक जगह आके रुक गयी. वो कोनसी जगह थी पता नहीं. लेकिन वो बही रुक कर रह गयी. हलाकि प्राची मुझे अभी भी नहीं दिखी लेकिन मुझे यकीन था की यही वो जगह है जहा प्राची हो सकती है.

मैं- क्या प्राची यही है. कृपा कर पूर्णरूप से संतुष्ट होने के बाद बताये मुझे.

ये सुनते hi वो रौशनी उस जगह के अंदर जाने लगी. तो उस पत्थर के अंदर एक गुफा बानी हुई थी उस गुफा में मुझे कोई नहीं दिख रहा था जबकि ऐसा संभव था की बहा सभी मौजूद हो.

वो रौशनी आगे बड़ी और एक जगह पैर रुक गयी और उस जगह पैर मुझे एक दूसरी रौशनी दिखाई दी. और वो रौशनी को देखते hi मुझे तुरंत hi ये एहसास हो गया की यही है प्राची. क्युकी वो रेगार्ड्स रौशनी प्राची की थी. में कन्फर्म था इसके बारे me.or मुझे अब एहसास भी होने लगा था की प्राची बही है बस मुझ दिखाई नहीं दे रही है.

अब बस ये पता लगाना था की ये जगह आखिर है कोनसी. और उसके लिए मुझे ज्यादा म्हणत नहीं करनी पड़ी मेरी तिरदये ने तुरंत hi उस जगह की पहचान करके मुझे बता दिया. वो जगह तिब्बत में कही पैर थी.

नहीं दूसरी तरफ अधीरा और उसके साथी प्राची के साथ थे. उन्होंने प्राची को अपनी माया से बेहोश कर रखा था.

डी1- हमें अब जल्दी hi ाँस की तलाश में जाना चाहिए. कही वो हमसे पहले बहा पहुंच गया तो साडी म्हणत पैर पानी फिर जायेगा.

डी2- मुझे तो ये समाज में नहीं हम यहाँ रुके क्यों hai.usne जल ाँस को प्राप्त कर लिया है और अब केवल बायु ाँस hi बचा हुआ है.

अधीरा- में तुम्हारी भावनाये समाज रहा हु मेरे मित्रों. लेकिन परेशान होने की जरुरत नहीं है. मुझे ज्ञात है की बायु ाँस कहा hai.or उस तक कैसे पहुंचना है. और रही बात यहाँ रुकने की तो में बस इन्तजार कर रहा हु उस लड़के का. ताकि वो यहाँ आये और फिर में यहाँ से निकलू.

डी1- उसके सामने कैसे निकलोगे

अधीरा- क्या तुम भूल गए हम्मे क्या योजना बनाई थी.

ये सुनते hi उसके दिमाग की बत्ती जल गयी.

डी1- माफ़ करना में भूल गया था. सही कहा तुमने उसे आजाने do.ek बार.

डी2- लेकिन अगर उसने तुम्हे रोक लिया तो क्या करेंगे हम.

अधीरा- में उसके सामने आने hi नहीं वाला हु. वो मुझे देख भी नहीं पायेगा. बस तुम अपना काम याद रखना. बाकि मुझपर छोड़ do.mujhe पता था की जल ाँस को वो आसानी से प्राप्त कर लेगा. इसलिए हमने उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया. लेकिन ये ाँस किसी भी हालत में उसके हाथ नहीं लगने देना है हमें.

डी2- सही कहा आपने. बैसे वो असुरो का क्या हुआ जो इन ाँस के बाद जागने वाले थे.

अधीरा- उनके बारे में गुरुदेव को ज्यादा जानकारी है. और जहा तक मेरे जानने का प्रश्न है तो है वो जाग गए होंगे. और गुरुदेव ने उन्हें अपने पास बुला भी लिया hoga.baise भी हमारी संख्या बहुत काम हो गयी है और ये जागने वाले असुर भी ज्यादा नहीं है. और वो हर असुर को क़ैद कर लेता है. ीये हमें कोई भी जोखिम नहीं लेना है. बस किसी तरह आखिरी बचे ाँस को हासिल करना है. उसके बाद उसे हम अपनी असली ताकत दिखाएंगे.

डी1- सही कहा शायद वो भूल गया है की हम क्या चीज़ है. और हमने देवताओ को कितनी बार परास्त करके अपना गुलाम बनाया है.

अधीरा- सही कहा.

अभी ये लोग बात hi कर रहे थे की इन्हे संकेत मिला देव के आने का. तो उन दोनों ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके गुफा के बहार का नजारा देखा. जहा उन्हें देव रेनू और आलिआ दिखाई दिए. एक साथ.

डी1- वो आगये है उसने पता लागलिया.

अधीरा- मुझे यकीन था इस बात का. अब में निकलता हु इसे लेके. बाकि तुम दोनों को पता है की क्या करना है.

डी2- हम संभल लेंगे. आप जाइये और उस ाँस को हासिल कीजिये. और है चूकना मत.

अधीरा- या तो जान से जाऊंगा या फिर ाँस लेके.

ये कहके अधीरा प्राची को लेके बहा से गायब hogya.or इस बात का पता देव एंड पार्टी को बिलकुल भी नहीं चला. लेकिन जल्दी hi चल जायेगा.

बही अधीरा के जाते hi ये दोनों असुर भी गायब हो गए. और उस गुफा में छिप गए.

बही देव एंड पार्टी बहार कड़ी हुई थी.

आलिआ- क्या तुम्हे यकीन है की वो यही है.

मैं- पूरा यकीन है. हमें जल्दी hi प्राची को छुड़ाना होगा. उससे पहले को वो यहाँ से भाग जाये

रेनू- सही कहा. चलो अंदर चलते है.

मैं- ठीक है.

ये कहके मैंने अपने हाथो को जोड़ा और थोड़ी देर बाद अपनी हथेलियों को उस जगह पैर किया जहा से रौशनी मुझे अंदर ले गयी थी. ऐसा करते hi हाथो से एक भयानक रौशनी निकली और उस जगह पैर टकराई और टकराते hi बहा भयानक विस्फोट हुआ. और बहा पैर एक रास्ता बन गया अंदर जाने का.

बही रेनू ने अपनी तलवार हाथ में ली और आलिआ ने अपनी छड़ी.

हम आगे बड़े और उस दरवाजे तक पहुंचे. बहा पहुंच कर आलिआ ने अपनी छड़ी से एक रौशनी को निकला और गुफा के अंदर छोड़ दिया. और उसके पीछे हम भी अंदर हो गए. वो रौशनी हमें उजाला कर रही थी और अंदर ले जा रही थी.

हम सावधानी से अंदर जा रहे थे ऊपर नीचे देखते हुए. हमें कोई नहीं दिख रहा था. लेकिन मुझे एहसास हो रहा था की यहाँ कोई और भी है बस वो सामने नहीं आरहा है

रेनू- क्या प्राची का एहसास हो रहा है तुम्हे देव. मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है.

आलिआ- सही कहा कुछ तो गड़बड़ जरूर है. यहाँ पैर.

मैं- सच कहु तो एहसास नहीं हो रहा है. और रही बात गड़बड़ की तो है यहाँ बहुत बड़ी गड़बड़ हो रही है.

हम ऐसे hi आगे बढ़ते रहे और आखिर कार पहुंच गए छोर तक झा इस गुफा का अंत हो गया जहा मुझे प्राची की रौशनी दिखी थी.

लेकिन हम हैरान थे की यहाँ पैर कोई नहीं था. न प्राची न कोई और.

आलिआ ने अपनी छड़ी को घुमाया और एक जादू किया उस जगह पैर. और ऐसा करते hi हमें दिखने लगा की यहाँ पैर क्या था पहले. साफ़ नहीं लेकिन इतना की समाज में आसके. किसी होलोग्राफिक प्रोग्राम की तरह.

हमने देखा की यहाँ पैर 4 जान थे एक लड़की जो यकीनन प्राची थी जो एक जगह पैर लेती हुई थी सायद बेहोश थी. और 3 आदमी. उसके बाद उनमे से एक आदमी उस लड़की को लेके यहाँ से चला गया और बाकि के दोनों भी गायब हो गए.

ये देख कर हम समाज गए की प्राची यहाँ नहीं है उसे कोई ले गया है अपने साथ

रेनू- ये एक जाल था हमारे लिए.

मैं- यकीनन जाल था ये. लेकिन जिसमे बिछाया है वो कहा है. अरे भाई जरा सामने तो आओ. चेहरा तो दिखा जाओ अपना.

मैंने काफी जोर से कहा ye.taki जो भी है वो सुन सके और सामने आसके.

और हुआ भी बैसा hi. मेरी आवाज सुनकर उनमे से एक सामने आज्ञा.

मैं- क्या बात है तुमने हमें फसा hi किया आखिर कार. बैसे कोण हो तुम.

डी2- तुम्हारी mout.bache.

मैं- मुझे तो ऐसा नहीं लगता है. बैसे मेरे साथी को कहा ले गया तुम्हारा साथी. कही उस ाँस की तलाश में तो नहीं.

डी2- बहुत खूब सही पहचाना वो बही गया है. और तुम चाहकर भी उसे रोक नहीं पाओगे क्युकी हम ऐसा होने नहीं देंगे.

ये सुनकर हम तीनो को हसी आगयी. और हमें हस्ता देख उसके चेहरे का रंग उड़ने लगा. उसे समाज में नहीं आरहा था की हम ऐसे है क्यों रहे है.

और उसका भेजा फिरने लगा और उसमे हैंपर अचानक से जम्प मार दी. और वो हमें क्रॉस करके सीधा गुफा को दीवार से जा टकराया और हम ऐसे hi हस्ते रहे. और ये सब उसके दिमाग के परे जा रहा था उसे समाज में नहीं आरहा था की ये सब आखिर हो क्या रहा है और कैसे…………

बाकि देखते है अगले अपडेट में की ये आखिर चक्कर क्या है……



तो बे कॉन्टिनुए……………….
 
अपडेट 85



हम हसे जा रहे थे और वो लगातार कंफ्यूज हो रहा था की ये आखिर चक्कर क्या है.

मैं- क्यों होश उड़द गए. तुम्हे क्या लगा हम इतनी आसानी से तुम्हारे जाल में फास जायेंगे. इतने बड़े बाले बेबकुफ़ नहीं है हम लोग जितना तुम हमें समझते हो.

डी2- बेबकुफ़ भले न हो लेकिन डरपोक जरूर हो. जो खुद यहाँ न आकर पानी परछाई को भेज दिया.

मैं- इसे डरपोक होना नहीं होशियार रहना कहते है. बैसे तुम्हारा दूसरा साथी कहा छिपा हुआ है. कही भाग तो नहीं गया तुम्हे अकेला छोड़ कर.

ये सुनकर रेनू और आलिआ दोनों hi हसने लगी

आलिआ- भाग hi गया होगा. क्युकी उसे भी पता है की अब यहाँ क्या होने वाला है.

ये सुनकर वो थोड़ा कंफ्यूज हुआ की आखिर क्या करने वाले है ये.

तभी मेरी आँखों से तीव्र ज्वाला निकली और सीधे उसके सीने से टकराई. और ऐसा होते hi उसका सरीर भयंकर पीड़ा से गुजरने लगा. उसका सारा सरीर जलने लगा था जिसका अंत केवल उसकी मृत्यु से hi होने वाला था. में ऐसे hi अग्नि उसपर बरसता रहा और अंत में इसका अंत हो हो गया उसी गुफा में. और में सूरे था की उसके साथी ने जरूर ये नजारा देखा होगा. और अगर नहीं देखा है तो अब तक वो सामने आजाता. लेकिन उसके न आने का एक hi मतलब था की वो भाग गया है यहाँ से.

उसके बाद हम तीनो अपने असली रूप में आगये. उसी गुफा में hi.

दरअशल यहाँ आने से पहले मुझे डाउट था की असुर कुछ तो प्लान बनाकर रखे होंगे मेरे लिए. इसलिए हमने अपने आप को किसी परछाई की तरह कर लिया था. जिससे उनके वरो का हम पैर कोई प्रभाव न पड़े. न hi उनकी माया का. बाकि हमारे प्रहार उनको असली के लगे. और हमने अपने असली रूप को बहार hi छोड़ दिया था गुफा के इन्तजार में. जैसे hi ये असुर मारा हम अपने असली रूप में आगये. बाकि मुझे तो लगा था यहाँ बहुत सरे असुर होंगे लेकिन यहाँ तो केवल 2 hi थे. मतलब साफ़ था की कुछ और प्लानिंग कर राखी इन दोनों ने. जो फ़ैल हो गयी पूरी तरह से. और अब उसके बारे में सोचने से कोई फायदा नहीं. इसलिए आगे बढ़ते है.

रेनू- तुम्हे पक्का पता है न की बायु ाँस यही है.

मैं- में पूरी तरह से सूरे हु की ाँस इसी पहाड़ में है. किसी और गुफा में.

आलिआ- लेकिन वो असुर प्राची को कहा लेके गया है. क्या उसे इस बात का अहसास नहीं हुआ की ाँस यही है…

मैं- सायद उसे हुआ हो. लेकिन उसने उसे प्राची का एहसास समझकर छोड़ दिया होगा. और वो इस वक़्त कहा गया है ये मुझे अच्छे से पता है. लेकिन उसे बहा कुछ नहीं मिलने वाला.

रेनू- लेकिन ये जगह है कोनसी. और यहाँ ाँस क्यों रहेगा

मैं- ये बही जगह है जहा बायु देव ने एक बार साडी बायु को रोक लिया था हनुमान जी को जब चोट लगी थी तब.

आलिआ- लेकिन इसका पता उनको क्यों नहीं है.

मैं- क्युकी ये बात केवल कुछ देवता hi जानते है. असली जगह कोनसी है ये किसी को भी पता नहीं है. सब अपनी अपनी कहानी बनाते है. और वो असुर भी प्राची को लेके ऐसे hi एक गुफा में गया hai.kyuki उसे लगता है की ाँस बहा मिलेगा.

रेनू- तुम्हे इस जगह की जानकारी कैसे मिली.

मैं- जब में प्राची को ढूंढ रहा था तब मुझे प्राची की जीवन ज्योति hi दिखी थी बस और कुछ नहीं. लेकिन उस ज्योति की लौ एक hi दिशा की तरफ जा रही थी. जैसे कोई हवा का झोका उस लग रहा हो और वो उस तरह मुद रही थी. अब सवाल ये था की इस गुफा में हवा आई कहा से. ये तो चारो तरफ से बंद है. यहाँ हवा का नमो निशान नहीं है. केवल असुर जिनके पास शक्तिया हो या फिर कोई देवता hi इस जगह पैर आकर जिन्दा रह सकते है. या कोई शक्तिशाली इंसान जैसे की हम. तो फिर मैंने उस लौ की दिशा में आगे बढ़कर देखा तो पत्थर hi पत्थर थे लेकिन थोड़े आगे जाने के बाद मुझे एक और गुफा दिखी. जो बहुत छोटी थी. और उसी जगह मुझे वो ाँस भी दिखा और फिर मेरी तिरदये ने मुझे इस जगह के बारे में बताया की ये आखिर कोनसी जगह है और यहाँ कोनसा महँ प्रसंग हुआ था पहले. जिसे जानकार में तुरंत समाज गया की ये ाँस यह क्यों है. जरा सोचो वो इस ाँस के कितने करीब थे लेकिन फिर भी उन्हें इस बात का आभाष नहीं हुआ.

आलिआ- इसे कहते है हाथ को आया और मुँह न लगा.

रेनू- सही कहा अब हमें चलना चाहिए इससे पहले की वो और असुरो को यहाँ ले आये.

मैं- सही कहा.

उसके बाद हमने अपने सरीर को फिर से परछाई में बदल लिया और उस गुफा के उस दिशा में आगे बाद गए जहा मुझे वो ाँस दिखा था. हम पथरो के आर पार आगे बड़े जा रहे the.vo भी आराम से. और थोड़े hi आगे जाने के बाद हम उस गुफा में पहुंच गए. जहा वो ाँस एक छोटा सा बवंडर बनाये हुए the.or इस बवंडर के ऊपर अपनी चमक बिखेर रहा था.

मैंने अपने हाथ की हथेली को बवंडर के नीचे किया और अपनी आँखों को बंद कर लिया और बायु देव का स्मरण करने लगा और साथ में गुरुदेव और महादेव का भी. और अपने हाथ को ऊपर की तरफ बढ़ाने लगा. मेरा हाथ धीरे धीरे ऊपर जाने लगा और आखिर कार मेरा हाथ ाँस को उस बवंडर से बहार निकल लाया और ऐसा करते hi बवंडर नहीं पैर समाप्त होगया. और वो ाँस को हमने प्रणाम किया और उसके बाद वो मेरे सरीर में सामने लगे बाकिओ की तरह. और मेरा सरीर अब बिलकुल हवा की तरह हो गया. जैसे में गायब होता था ठीक बैसा hi. और थोड़ी hi देर में सब नार्मल हो गया. और अब मेरे पास पांचो ाँस आचुके थे.

रेनू- बधाई हो भाई. लेकिन अब क्या करना है

मैं- पता नहीं. इसके आगे क्या होगा मुझे नहीं पता है. अब गुरुदेव hi को रास्ता दिखेंगे हमें.

अभी मैंने सिर्फ इतना hi कहा था की मुझे गुरुदेव की आवाज सुनाई दे गयी.

मैं- प्रणाम गुरुदेव.

गुरुदेव- आयुष्मान भाव वत्स. आज में बहुत कुश हुआ तुमने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया.

मैं- है गुरुदेव. ये आपके आसीर्बाद और मार्गदर्शन का hi कमाल है.

गुरुदेव- ये सब तो महादेव का आसीर्बाद है जो तुमपर बरसा है.

मैं- है गुरुदेव. अब क्या करना है मुझे गुरुदेव.

गुरुदेव- क्या तुम्हे नहीं पता.

मैं- नहीं.

गुरुदेव- फ़िलहाल कुछ नहीं करना है. सबसे पहले जाओ और प्राची को बचाओ और उसके बाद तुम पांचो मेरे आशाराम में आजाना बाकि में यही तुम्हे आगे का काम समझाऊंगा.

मैं- जैसी आपको आज्ञा गुरुवार.

उसके बाद उनकी आवाज आणि बंद हो गयी. और मैंने उन दोनों का हाथ पकड़ा और बहा से हम गायब हो गए. और सीधे पहुंचे प्राची को ढूंढ़ते हुए एक गुफा के बहार. अब मुझे इस बार प्राची को ढूंढ़ने में बिलकुल भी समय नहीं लगा. क्युकी बायु देव तो हर जगह है और उन्होंने मुझे तुरंत hi बता दिया को दोनों कहा है. ये जगह भी एक दिव्यस्थान hi था. यहाँ से भी कई कथाये जुडी होगी. जिसके बारे में फिलहाल बताने का समय नहीं था. मुझे अंदर जाना था.

मैं- तुम दोनों यही बहार रहो अगर वो यहाँ से बहार निकले तो उसे रोकलेना. में अंदर जाऊंगा.

रेनू- पक्का.

मैं- एक दम पक्का. और रुको जरा में अंदर जाने से पहले एक नमूना दिखा देता हु.

मैंने अपने हाथो को जोड़ा ओरअपनी आँखों कोबन्द किया. और प्राची के दिमाग से संपर्क साधा. और मुझे इसमें ज्यादा म्हणत नहीं करनी पड़ी. क्युकी जो शक्तिया पहले सीमित थी अब वो असीमित होने लगी थी. पांचो ाँस मिलकर मेरी उसमे मदद कर रहे थे.

मैंने परसाही के दिमाग से संपर्क किया और उसे होश में ले आया. क्युकी वो अभी तक बेहोश hi थी. वो असुर उसे आखिरी समय पैर hi होश में लता इससे पहले नहीं. ताकि प्राची कोई गड़बड़ न करे उसके काम में.

प्राची को होश में जैसे मैंने लाया. वो अपने आप को किसी और के साथ देखकर चोकने लगी. और वो कुछ करती उससे पहले hi मैंने उससे बात की.

मैं- प्राची shan't रहना में हु देव. और जो तुम्हे ले जा रहा है वो है अधीरा. बस बैसे hi बेहोशी का नाटक करती रहो में आरहा हु.

प्राची- ठीक है.

ये कहके उसने अपनी आखो को बंद कर लिया. और बापिस से बेहोश होने का नाटक करने लगी.

बही मैंने खुद को गायब किया और तेज़ी से अंदर घुस गया. मुझे सारा रास्ता पता था की वो कहा जा रहा है. ीये में बिना किसी दर के आगे बाद गया. और में अधीरा को पार करके सीधा उसके आगे जेक खड़ा होगया.

अधीरा जैसे hi मेरे करीब आया वो रुक गया. क्युकी वो आगे नहीं बाद प् रहा था. उसके सामने में हु ये उसे बी नहीं पता था. वो बार बार आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था लेकिन नाकाम हो रहा था.

अधीरा- कोण है जो मेरा मार्ग रोकने का दुस्साहस कर रहा है. सामने आओ मेरे.

वो ये कहके शांत हुआ और में उसके सामने आज्ञा. और एकदम से मुझे अपने सामने देखकर वो 4 कदम पीछे खिसक गया.

और तभी परसाही ने अपना नाटक बंद कर दिया और कड़ी होक वो अधीरा के पीछे कड़ी हो गयी. जिसे देखकर उसे और भी बड़ा झटका लगा

अधीरा- तुम यहाँ कैसे पहुंचे. तुम्हे रोका नहीं किसी ने.

मैं- कोण तुम्हारे वो दो चंगु मांगू. वो रोकेंगे मुझे. विचरण इसी कोसिस में एक मारा गया और दूसरा भाग गया बहा से. और अब तुम्हारी बरी है.

अधीरा- बचे सायद तुम जानते है की मैं कोण हु. इसी लिए ये बाटे कर रहे हो.

मैं- अच्छे से जनता हु तुम्हे पूर्व सम्राट अधीरा. तुम्हे क्या तुम्हारे पुरे खानदान की जानकारी है मुझे.

अधीरा- क्या बात है. तुमने उस ाँस को हासिल कर लिया लगता है.

मैं- क्या बात है. बिलकुल सही बात की है. लगता है काफी तज़ुर्बेकार हो

अधीरा- लेकिन वो तो यहाँ है तुम्हे कैसे मिल गया वो.

मैं- वो यहाँ कभी था hi नहीं. वो किसी और जगह था. और तुम विस्वास नहीं करोगे. तुम उस ाँस के इतने करीब थे जितने तुम अपने डिल के हो.

अधीरा- मतलब.

मैं- मतलब ये की ाँस बही था जहा तुमने प्राची को क़ैद कर रखा था और मेरे लिए उन दो नमूनों को छोड़ रखा था.

ये सुनते hi अधीरा की तो जैसे हवइया उड़द गयी चेहरे पैर से. उसे यकीन नहीं हुआ की इतने करीब था उसके ाँस.

अधीरा- तुम असत्य कह रहे हो. अगर बहा ाँस होता तो मुझे उसका एहसास हो जाता.

मैं- में भला असत्य क्यों कहूंगा. में अभी बही से आरहा हु उसे प्राप्त करके. बाकि मन्ना न मन्ना तुम्हारे ऊपर है.

ये सुनते hi उसने अपने होशोहवास खो दिए और तेज़ गुस्से से मेरी तरफ बढ़ने लगा. लेकिन जैसे hi आगे बड़ा मेरी आँखों से तीव्र ज्वाला निकली फिर से और उसको जलने लगी. वो चिल्लाने लगा जोर जोर से. बचाओ बचाओ बगेरा. लेकिन आज इसका अंत आज्ञा था. और थोड़ी hi देर में बहा सिर्फ अधीरा की अस्थिया बची हुई थी. जिन्हे उठाने वाला भी कोई नहीं था अभी. उसका बीटा था लेकिन वो कब आएगा पता नहीं.

.अधीरा के अंत के बाद मैं प्राची के करीब गया तो उसने मुझे गले लगा लिया. हम दोनों कसके गले लगे. जैसे वर्सो के बिछड़े आज मिले हो.

प्राची- मेरा डिल जनता था की तुम जल्दी hi आओगे.

मैं- आता कैसे नहीं मेरी जान को कोई ले जाये और में उसके लिए न आओ ऐसा कभी हो सकता है भला.

हम काफी देर तक ऐसे hi गले लगे रहे. और फिर अलग हुए. और फिर मैंने उसका हाथ पकड़ा और हम गुफा से बहार आगये. जहा आलिआ और रेनू दोनों hi प्राची के गले लग गयी.

रेनू- माफ़ करना प्राची में तुझे बचा न पाई

प्राची- कोई बात नहीं दीदी. होता है.

मैं- है अब बस करो हमें सुरभि को लेके गुरुदेव के पास जाना है इसलिए जल्दी करो.

प्राची- बहा क्यों जाना है.

मैं- रस्ते में बताता हु.

ये कहके मैंने दोनों का हाथ पकड़ा और प्राची ने रेनू का. और हम बहा से गायब हो गए. और एक hi झटके में घर पहुंच गए. और मैंने टेंशन हमारे सामने कड़ी थी. जिसपर मेरा ध्यान hi नहीं गया.

हम चारो एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे और सोच रहे थे की अब क्या होगा क्या किया जये…………



तो बे कॉन्टिनुए…………..……...
 
अपडेट 86



हम जैसे hi अपने घर पैर प्रगट हुए हमारे सामने वो दोनों खड़े हुए थे और हमारी किस्मत ख़राब जो उनकी आँखे उसी तरफ थी जिस तरफ हम एक दम से प्रगट हुए. और ये सीन देखकर उन दोनों की आँखे तो फटी की फटी रह गयी.

जी है आप सही समाज रहे है. ये चिराग और लकी hi थे. जो हमारे सामने hi खड़े हुए थे. और ये देखकर हम सभी ने अपना माथा पीट लिया.

रेनू- ये यहाँ कैसे

मैं- सॉरी में बताना भूल गया था. नहीं मैंने बताया था तुम्हे. की शाम को ये आने वाले है. और ये बात में पूरी तरह भूल गया वर्ण अपने कमरे में आता सीधा.

आलिआ- बहुत बढ़िया भुलक्कड़ होते जा रहे हो दिन बा din.ab इनको बताओ सब या मिटा दो इनके दिमाग से ये सब.

अभी हम धीरे धीरे बाटे hi कर रहे थे और वो दोनों हमें एक तक घूरे जा रहे थे.

मैं- अबे घूरना बंद करो. ये बताओ कब आये तुम दोनों.

चिराग- वो छोड़ ये बता की तू अचानक से कहा से प्रगट हुआ. ये क्या था.

लकी- है बे ये सब क्या था. तुम चारो कहा से प्रगट हुए हो. अभी यहाँ कोई नहीं था और अगले सेक् तुम लोग आगये

मैं- तुम दोनों को पक्का यकीन है की जो तुमने देखा वो सही है कोई भ्रम नहीं.

चिराग- अबे में दिन में सपने नहीं देखता. अब तू सच बता की ये सब क्या चक्कर है.

मैं- ठीक है शांति से बैठो और मेरी बात को सुनो. और मुझे ये वादा करो की इस बात को होने तक हो रखोगे. अपने शिव अपनी परछाई को भी नहीं बताना ये सभी बाटे.

लकी- डरा क्यों रहा हो. ऐसा क्या बात है जो किसी को नहीं बतानी है.

मैं- बही बता रहा हु. लेकिन पहले वादा करो.

चिराग- बस क्या इतना भी यकीन नहीं है हम पैर.

मैं- यकीन पूरा है लेकिन चेक करना पड़ता है की कही हसी मजाक में किसी के सामने न बक देना.

चिराग- है भाई हम मजाक में भी इसका जिक्र नहीं करेंगे. अब बता भी कितना सस्पेंस बना रहे हो.

मैं- ठीक है सुनो.

और उसके बाद साडी कहानी फिर से रिपीट की गयी उन दोनों के लिए. और उनको सुरु से एक एक बात मैंने बताई और जब यकीन न हुआ तो फिर से थोड़ा मैजिक करके दिखा दिया. और ये सब जानने के बाद बकै में दोनों काफी एक्सीटेंड हो गए. उन्हें यकीन होगया की में कोई सुपरहेरो बन गया हु. बिलकुल किसी हॉलीवुड की फिल्मो की तरह.

मैं- बस करो अब ये बात यही भूल जाऊ.

चिराग- सच कहु तो तुझ पैर मुझे पहले से hi शक था की तेरी सखियत साधारण नहीं है. जरूर कुछ है जो में नहीं जनता था. और जब आज तूने बताया तो मेरा शक एक दम सही निकल गया. और सच मान में ये जानकार बहुत कुश हु. और अब बकै में मैं चैन से रात को सो सकता हु. क्युकी मुझे यकीन है की तू हमें कुछ नहीं होने देगा.

लकी- that's ट्रू. बधाई हो भाई. और 2-2 शादियों के लिए एक्स्ट्रा बधाई और अब तुझे पार्टी देनी hi ोडेगी. वो भी अच्छी बलि. बस में और कुछ नहीं सुन्ना चाहता.

चिराग- ये कही न तूने मेरी पसंद वाली बात. सही है पार्टी तो बनती है बीआरओ.

मैं- जरूर दूंगा लेकिन अभी नहीं. अभी हमें कही जाना है. तुम लोग हो सके तो यही रुक जाना हमारे पीछे अगर कुछ हो तो सभी को सेफ रखने के लिए. या फिर सभी को अपने साथ ले जाओ. क्युकी हमें नहीं पता है हमें लौटने में कितना टाइम लगेगा.

चिराग- कोई बात नहीं. आंटी आप सभी चलिए हमारे घर

लकी- नहीं मेरे घर चलिए आंटी.

दादू- क्या सिर्फ आंटी को hi लेजाना है मुझे नहीं.

चिराग- आपको तो स्पेशल तरीके से ले जाऊंगा में.

माँ- बीटा हम किसी को तकलीफ नहीं दे सकते और बैसे भी ऐसे अचानक से घर छोड़ कर जाना अजीब लगेगा सभी को और हो सकता है हमारी बजह से तुम सभी पैर भी कोई मुसीबत आजाये. इसलिए हम यही ठीक है. बाकि जो होगा देखा जायेगा.

मां- बिलकुल सही कहा. बीटा तुम लोग बिलकुल भी टेंशन न लो. हम हैंडल कर लेंगे. चाहिए तो तुम लोग घूमने आसक्ति हो जब मन करे.

ये बात सभी को सही लगी और मुझे भी. लेकिन एक दर भी था की कही कोई मुसीबत न आजाये. इसलिए मैं घर से बहार गया

और अपने दोनों हाथो को जोड़कर खड़ा हो गया और बाकि सभी मुझे देखने लगे.

मैंने पांचो तत्वों को मिलाया और अपने हाथो को हवा में कर दिया ऊपर की तरफ और पांचो तत्वों से मिलकर एक शक्तिशाली कवच घर के चारो तरफ बनने लगा और साथ में लकी और चिराग के घर पैर भी और बाकि सभी घर के लोगो के ऊपर bhi.jaise माँ ममी मां दादू चिराग और लकी और बाकि सभी पैर भी. और आम लोगो पैर फिलहाल कोई संकट नहीं था असली संकट इस वक़्त परिवार पैर था इसलिए उन्हें सुरक्षित करना ज्यादा जरुरी था. कुछ hi देर में सरे कवच बन कर रेडी हो गए. और किसी को दिखे भी नहीं. उन्हें लगा ोाता नहीं में क्या कर रहा hi हाथो को ऊपर करके. सिवाय हम पांचो के किसी को कुछ नहीं दिख रहा था ये पक्का था.

उसके बाद मैंने अपनी आँखों को खोला और बापिस से सभी के पास आज्ञा.

मैं- आप सभी फ़िलहाल सुरक्षित है. कोई भी बुरी शक्ति अंदर नहीं आसक्ति. बस आप लोग सावधान रहना.

माँ- हम ध्यान रखेंगे. अब तुम लोग जाओ गुरुदेव इन्तजार कर रहे होंगे तुम सभी का.

मैं- ठीक कहा आपने.

उसके बाद मैंने सभी बड़ो का आशीर्वाद लिया और हम पांचो ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और अगले hi पल सबको bye बोलके हम बहा से गायब हो गए.

और गुरुदेव के आश्रम की तरफ बढ़ने लगे.

बही दूसरी तरफ शुक्राचार्य और मेधावी अपने सर को पीर रहे थे की इतनी आसानी से उनकी साडी योजना बिफल कैसे हो गयी.

शुक्राचार्य- मैंने तुम पैर विस्वास करके गलत किया मेधावी. तुम्हारी साडी योजना धरी को धरी रह गयी.

मेधावी- में अपनी गलती मानता हु गुरुवार. मैंने उसके बारे में जितना सुना जितना देखा उसी हिसाब से योजना बनाई थी और वो सफल भी रही कुछ हद तक. लेकिन उसके हाथ वो बायु ाँस लग गया और पांचो ांसो की शक्तिया एक होजाने के कारण वो पिताजी को मारने में सफल रहा. वर्ण पिताजी उसे बही परास्त कर देते.

शुक्राचार्य- ये बात सही है. लेकिन अब हम क्या करे. क्युकी अब दिव्यास्त्र संपन्न हो चूका है और अब उसका कोई भी छह कर भी कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा.

मेधावी- ये बात में जनता हु. लेकिन गुरुदेव अब आप hi कोई रास्ता निकललिये उसको परास्त करने का. हम और कई क्रोरो वर्ष प्रतीक्षा कर लेंगे दिव्यस्त्र के पुनः जागने का. परन्तु ऐसे हार नहीं मान सकते है.

शुक्राचार्य- अब केवल एक hi रास्ता बचा है अपनी पूरी ताकत के साथ उसपर हमला करने का. और तुम्हे कालकूट तो याद hi होगा.

मेधावी- आपने कालकूट कहा क्या अभी.

शुक्राचार्य- है मैंने उसी का नाम लिया है. अब नहीं हमारी आखिरी उम्मीद है.

मेधावी- क्या उसपर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा. आखिर वो महादेव का ाँस है.

शुक्राचार्य- कालकूट का प्रभाव तो महादेव पैर भी पड़ा था. अगर वो उसे अपने गले में नहीं रोकते तो समस्त संसार का विनाश हो जाता क्युकी सारा संसार उन्ही के अंदर समाया हुआ है. खास कर विष्णु. और उन्हें भी बहुत पीड़ा हुई थी उसे ग्रहण करने में. फिर ये मात्रा उनका ाँस है. मुझे भरोसा है की इसपर भी उस कालकूट का कोई न कोई खतरनाक प्रभाव जरूर पड़ेगा जो हमारे हिट में होगा. और अगर उसपर न भी पड़ा तब भी उसके परिवार जो उसकी कमजोरी है उनपर तो पड़ेगा hi और उनपर तो बहुत प्रभाव पड़ेगा

मेधावी- आपका कथन उचित है गुरुदेव. परन्तु ये हमें कहा से मिल सकता है.

शुक्राचार्य- हमें कही जाने की जरुरत नहीं है. ये मेरे पास पहले से है. जब कुछ बुँदे पृथ्वी पैर गिरी थी उसकी जिसे सपा और बाकि के जीवो ने ग्रहण कर लिया था. तब उन्ही सब में मैं भी एक था. उस समय में भी एक सर्प के रूप में उसे ग्रहण कर रहा था. और मैंने उसे अपने पास सुरक्षित रखा है किसी खास मौके के लिए. और लगता है की आज वो मौका आज्ञा है

ये सुनकर मेधावी तो बिलकुल शोक रह गया. उसे इस बात का बिलकुल भी अंदाजा नहीं था की गुरुदेव के पास कालकूट भी है.

मेधावी- आपके पास ये था और हमें कभी उसको जानकारी hi मिली.

शुक्राचार्य- क्युकी मैंने इसे राज hi रखा हुआ है. इस बात को केवल महादेव hi जानते है. और किसी को इसकी जानकारी बिलकुल भी नहीं है.

मेधावी- फिर तो हमें बिलकुल भी समस्या नहीं होनी चाहिए उस देव को झुकाने के लिए. में अपने समस्त साथियो को यहाँ बुलाता हु. देव पैर हमला करने के लिए.

शुक्राचार्य- ये जानते हुए भी की वो तुम्हे पल भर में परास्त कर सकता है.

मेधावी- तो क्या हुआ गुरुदेव में युद्ध में अपने प्राण गाबयुंगा. और आज नहीं तो कल हमें ये करना hi padega.usse मुकाबला. तो फिर आज क्यों नहीं.

शुक्राचार्य- जोश होना अच्छी बात है. लेकिन जरा सोचो अगर तुम समस्त असुर प्रजाति को बहा ले जाओगे तो सभी अपने प्राणो से हाथ धो बैठेंगे. और असुर प्रजाति का विनाश हो जायेगा जो में किसी भी कीमत पैर नहीं होने दे सकता.

मेधावी- तो फिर क्या करना चाहते है आप.

शुक्राचार्य- मुझे कुछ समय दो सोचने के liye.e जल्द hi इसका हल तुम्हे बताऊंगा.

मेधावी- जैसा आप कहे गुरुवार.

उसके बाद इनकी मीटिंग यही ख़त्म हो गयी. और दोनों अपने अपने जगह बापिस लौट गए.

बही देव एंड पार्टी गुरुदेव के आशाराम पहुंच चुकी थी.

जहा गुरुदेव ने उन्हें बढ़िया स्नान करने को कहा और होने बत्रा भी बदलने को कहा. जैसा पिछली बार करवाया था. और सभी ने बैसा hi किया और उस दिन गुरुदेव ने केवल विश्राम करने को कहा. और कल बाकि की जानकारी देने को कहा. जिसे सुनकर बाकि सभी बही घूमने फिरने लगे.

बही शुक्राचार्य अपने आश्रम में सभी बातो पैर विचार कर रहे थे और सोच रहे थे की क्या किया जाये. कैसे देव को रोका जाये. हलाकि एक उपाय उनके पास था. लेकिन वो इसे सबसे आखिरी में आजमाना चाहते थे. उससे पहले अगर उन्हें कोई और तरीका मिल जाता है तो वो उसे पहले आजमाना चाहते थे. ऐसे hi घूमते फिरते उन्हें एक उपाय सुझा और उन्होंने उसका संकल्प नहीं ले लिया. और उसे सुबह ब्रह्म मुहूर्त में आजमाना का सोचा. ये आईडिया देव के लिए था लेकिन वो एक यज्ञ करने जा रहे थे. जो अगर सफल हुआ तो यकीनन देव का कोई न कोई तोड़ उन्हें मिल जाने वाला था. और इस यज्ञ का सुझाव उनके पास था लेकिन उन्हें असुरो पैर भरोषा था की सायद वो किसी एक ाँस को तो हासिल कर hi सकते है. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने ये अभी करने का फैसला लिया.

अब देखते है क्या होता है इस यज्ञ में और क्या ये सफल हो पता है भी या नहीं.



तो बे कॉन्टिनुए……………….
 
अपडेट 87



नेक्स्ट डे हम सभी प्रातः काल में उठे स्नान बगेरा किया और रेडी होक आश्रम के बहार यज्ञ बेदी के पास पहुंच गए. जहा गुरुदेव हमारा इन्तजार कर रहे थे.

गुरुदेव- वत्स तुमने सभी ांसो को प्राप्त कर लिया और इसके लिए में बहुत कुश हु. लेकिन ये सिर्फ आधा काम है. बाकि का आधा अब सुरु होगा. तुम्हारे पास अब ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली अस्त्र है. तुम इसे विनाश और निर्माण दोनों कार्य आसानी से कर सकते हो. और में प्रार्थना करूँगा की ऐसी इस्थिति कभी न आये जब तुम्हे विनाश करना पड़े. ये समस्त ब्रह्माण्ड अपने आप में संतुलित है. अगर इससे जरा सी भी छेड़ छड़ की जाएगी तो समस्त लोकों में प्रलय के आसार बनने लगेंगे. इसलिए मेरा ये सुझाव है की इस ब्रह्माण्ड से कोई भी छेड़ छड़ कभी मत करना जैसा है वैसे hi चलने देना. ये दिव्यास्त्र तुम्हे असीमित शक्तिया प्रदान करेगा. लेकिन जब तुम उन शक्तियों का सही इस्तेमाल करोगे तब तुम एक योद्धा कहलाओगे. और जैसा मैंने अभी तक देखा है तुमने बखूबी इसका इस्तेमाल किया है. जिसे देखकर में चिंता मुक्त हु. मुझे पूर्ण विस्वास है की तुम मुझे निराश नहीं करोगे.

मैं- में वचन देता hi गुरुदेव. ऐसा पल कभी नहीं आएगा जब आपको मुझसे निराश होना पड़े. और कभी अगर ऐसा समय आ भी गया तो वो मेरा अंतिम समय होगा. क्युकी आपको अगर निराश कर दिया तो मेरे जीवन का कोई महत्व नहीं रह जायेगा.

गुरुदेव- मुझे तुमसे ऐसी hi अपेक्षा है वत्स. तो. अब हम इस दिव्यस्त्र को एक रूप देने जा रहे है. जिसके लिए हमें यज्ञ करना होगा उसमे आहुति डालनी होगी. और आहुति होगी इन ांसो की. समझ रहे हो न मेरी बात.

मैं- आप बस कहते जाइये गुरुदेव.

गुरुदेव- ठीक है. बैठो अपना आसान ग्रहण करो.

उसके बाद हम पांचो अपनी अपनी जगहों पैर बैठ गए और गुरुदेव होनी जगह पैर. उन्होंने मंत्रोचारण सुरु किया और यज्ञकुंड में अग्नि जलाई. और ढेर सरे मंत्रो का उच्चारण किया. एक के बाद एक आहुतिया डाली. और करीब 2 घंटे के बाद उन्होंने पृथ्वी देवी के नाम की आहुति डाली. और उसके बाद मुझसे पृथ्वीजन्स को बहार निकाल कर इस यज्ञ कुंड में डालने को कहा.

तो मैंने अपने हाथो को जोड़ा अपनी आँखे बंद की पृथ्वी ाँस का ाबहन किया और ऐसा करते hi वो मेरे सरीर से बहार निकल कर मेरी हथेली में आगये और मैंने उन्हें यज्ञ कुंड में विसर्जित कर दिया. और फिर एक के बाद एक मैंने पांचों ांसो को यज्ञ कुंड में दाल दिया जैसा गुरुदेव ने कहा. और उसके बाद गुरुदेव ने और मंत्रो का उच्चारण किया और फिर एक अंतिम आहुति यज्ञ कुंड में डाली. और जैसे hi आखिरी आहुति कुंड में गयी. उसके बाद कुंड से िल तेज़ प्रकाश चारो दिशाओ में फैलने लगा और हम सभी अपने हाथो को जोड़ कर उसे देखते रहे. और थोड़ी hi देर में उस प्रकाश के साथ एक बहुत hi दिव्या और अलौकिक अस्त्र यानि की बही दिव्यस्त्र उस कुंड से बहार निकलने लगा. जिसकी चमक hi बता रही थी की ये कितना दिव्या और शक्तिशाली है. पांचो ांसो के नाम पैर पांच मड़ई लगी हुई थी उसमे.

जिसे देखकर आँखों में चमक आजाये.

हम सभी बहुत कुश थे इसे देखकर.

गुरुदेव- वत्स अपने हाथो को आगे करो और इस दिव्यास्त्र को ग्रहण करो.

मैंने गुरुदेव की आवाज सुनकर अपने हाथो को आगे किया और ऐसा करते hi दिव्यास्त्र तुरंत hi मेरे हाथो में आज्ञा. और मेरे हाथो में आते hi चारो तरफ एक तेज़ रौशनी फिर से फ़ैल गयी. रौशनी इतनी तेज़ थी की न hi मुझे कोई देख प् रहा था और न hi में किसी को देख प् रहा था. और थोड़ी hi देर में वो रौशनी बापिस से उसी दिव्यास्त्र में समां गयी. और जब बाकिओ ने मुझे देखा तो एकदम हैरान रह गए सभी.

रेनू- भाई अच्छे लग रहे हो.

मैं- क्यों पहले क्या बेकार लगता था.

प्राची- जरा अपने आप को देखो तो सही.

और ये सुनकर मैंने खुद को देखा तो मैं हैरान था. क्युकी मेरे सरीर पैर एक योद्धा जैसे वस्त्र आगये थे. सरीर पैर एक बहुत hi बजनदार कवच जिसने गर्दन से लेके मेरे पैरो तक मुझे धक् लिया था पूरी तरह से. सिर्फ मेरा चेहरा पूरा बहार निकला हुआ था. बाकि का सरीर अब कवच के अंदर था. लेकिन क्या डिज़ाइन थी कवच की बकै में. इसे फील करके एक बहुत hi अद्भुत और रोमांचक अनुभव हो रहा था मुझे.

मैं- गुरुदेव ये कवच ये कहा से आया

गुरुदेव- वत्स ये कवच तुम्हे इस दिव्यास्त्र ने प्रदान किया है. ये कवच अवैध है. इसे केवल तीन ास्त्रो को छोड़ कर और कोई सा अस्त्र नहीं भेद सकता. और जानते हो वो कोनसे है.

मैं- नहीं गुरुदेव.

गुरुदेव- सुदर्शन चक्र, ब्रह्मास्त्र, और महादेव का त्रिशूल.

इनके आल्वा इस कवच को कोई अस्त्र नहीं भेद सकता.

मैं- ये बहुत hi कमाल का है. परन्तु गुरुदेव इसे में उतारू कैसे. घर और सलग में तो ऐसे नहीं जा सकता न.

ये सुनकर गुरुदेव के साथ बाकि सभी हसने लगे.

गुरुदेव- वत्स इसे उतरने की जरुरत नहीं पड़ेगी. तुम बस मन में सोचना और ये गायब हो जायेगा. चाहो तो एक बार प्रयास करके देख लो.

मैंने गुरुदेव की बात मानी और अपनी आँखों को बंद करके दिव्यस्त्र से प्रार्थना की ये कवच गायब हो जाये और जब में कही तब आये. और ऐसा कहते hi मेरे वो वस्त्र बापिस आगये जो मैंने पहले पहने हुए थे और वो कवच गायब हो गया.

मैं- ये तो बकै में कमाल है.

गुरुदेव- ये तो कुछ भी नहीं है वत्स. अब तुम एक प्रकार से अजर हो गए हो. तुम्हे परास्त करने के लिए स्वयं त्रिदेव को hi आना पड़ेगा. जो की ाची बात है. बस अपने जीवन को सफल बनाओ और इन शक्तियों का सही दिशा में प्रयोग करो.

मैं- में अपनी जान लगा दूंगा गुरुदेव.

गुरुदेव- तो अब एक और काम बाकि है.

मैं- क्या गुरुदेव.

गुरुदेव- तुम्हारे साथियो में शक्ति का बिभाजन.

मैं- ये कैसे होगा गुरुदेव.

गुरुदेव- आप सभी एक साथ दिव्यस्त्र को पकड़ ले अपने दाहिने हाथ से. और फिर एक साथ अपने अपने ांसो के नाम लेना. याद रहे एक साथ. जैसे देव तुम पृथ्वी, ॉलीअ आकाश, प्राची बायु, रेनू अग्नि और सुरभि तुम जल. बस फिर देखना क्या होता है.

हमने बैसा hi किया और सभी ने अपने दाहिने हाथ से दिव्यस्त्र को पकड़ लिया. और उसके बाद हमने अपनी आँखों को बंद किया और फिर मैंने काउंट किया.

मैं- सभी 3 बोलने पैर अपने अपने ाँस का नाम लेंगे ठीक है.

सभी ठीक है.

मैं- तो रेडी 1,2,3 जो.

और हमने एक साथ अपने अपने ांसो के नाम लिए.

और उसके बाद फिर से चारो तरफ रौशनी फ़ैल गयी. और थोड़ी hi देर में गायब हो गयी. और जब रौशनी गायब हुई तो मेरे साथ बाकिओ के सरीर पैर भी अब कवच आचुके थे. और उनके हाथो में एक एक हथियार भी थे.

जैसे की.

मेरे हाथो में बही दिव्यस्त्र था.

आलिआ के हाथो में उसकी छड़ी जो पहले से थी लेकिन अब वो पहले से ज्यादा शक्तिशाली हो गयी थी. और पहले उसके सरीर पैर सफ़ेद कपडे रहते थे जो परियो की निशानी होती है. लेकिन अब उसके सरीर पैर एक मजबूत कवच था जिसमे वो किसी वारियर से काम नहीं लग रही थी. बल्कि ये कहना गलत होगा की साडी लड़किया वारियर क्वीन लग रही थी. और बहुत hi डेंजरस भी.

प्राची रेनू और सुरभि के हाथो में एक एक चमचमाती तलवार जिसका साइज भी कमाल का था और दिखने में भी शानदार थी. ये अस्त्र इनको शक्तियों के प्रतीक थे जिनमे उसी ाँस से जुडी हुई शक्तिया thi.jo मंत्र गुरुदेव ने इन्हे पहले दिए थे जिस बजह से ये शक्तिया जाग जाती थी. लेकिन अब इन्हे उस मंत्र की जरुरत नहीं थी. अब ये इनके अंदर हमेशा के लिए रहेगी. और जब भी इन्हे उसकी जरुरत होगी ये इसी बेष में दुबारा आजायेगी मेरी तरह.

यही साडी जानकारी गुरुदेव ने फिर इन सभी को दी.

जिसे सुनकर बाकि सभी कुश हो गयी.

उसके बाद गुरुदेव ने हमारे शक्ति परिक्षण करवाए बहुत सरे. हमने एक एक करके अपनी बहुत सी शक्तियों के परिक्षण किये. और शाम तक यही सब चलता रहा.

बही इंद्रदेव इस सब से कुश थे और दूसरी तरफ जो हो रहा उससे परेशां.

इंद्रदेव- गुरुदेव ये शुक्राचार्य किसके लिए यज्ञ कर रहे और इसका क्या परिणाम होगा.

गुरु बृहस्पति- इंद्रा शुक्राचार्य महादेव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ कर रहे है. और अगर ये यज्ञ सफल होगया तो महादेव उन्हें मनचाहा वरदान देने को विवश वो जायेंगे. और तू. जानते हो की वो क्या मांगेंगे.

ये सुनके इंद्रा के साथ बाकि सरे देवता भी परेशान हो गए. उन्हें समाज में नहीं आरहा था की अब इस यज्ञ को कैसे खंडित किया जाये.

इंद्रदेव- गुरुदेव इस यज्ञ में विघ्न कैसे डाला जाये. ताकि ये कभी सफल न हो पाए.

गुरु बृहस्पति- इंद्रा तुम जानते हो की शुक्राचार्य जब चाहे तब महादेव को प्रसन्न कर सकते है. उन्हें तपस्या करने की जरुरत नहीं पड़ती है. और यही वो अभी कर रहे है. और इस यज्ञ को रोकना न मुमकिन है. और मेरा सुझाव है की जो हो रहा है उसे होने दो.

इंद्रदेव- ये आप कैसी बात कर रहे है गुरुदेव. इसका परिणाम जानते हुए भी. अगर महादेव को शुक्राचार्य ने अर्णव से युद्ध करने भेज दिया तो क्या हो सकता है ये हम सोच भी नहीं सकते है. इसलिए हमें इसे रोकना हो होगा.

गुरु बृहस्पति- इंद्रा तुम इसे रोकने का प्रयास कर सकते हो. लेकिन इसका परिणाम में जनता हु इसलिए तुम्हे कुछ भी करने से रोक रहा हु. तुम अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करके भी उनके करीब नहीं पहुंच paoge.kyuki उन्होंने अपने चारो तरफ एक घेरा बना लिया ताकि उनके यज्ञ में कोई भी विघ्न न पंहुचा पाए.

इंद्रदेव- तो क्या इसे रोकने का कोई तरीका नहीं है.

गुरु बृहस्पति- मेरे हिसाब से तो नहीं. है अगर ब्रह्मदेव और विष्णु भगवन कोई उपाय तुम्हे बता दे तो अलग बात है. इसलिए शीघ्र hi उनके पास जाओ.

इंद्रदेव- आपका सुझाव उत्तम है. में अभी जाता हु.

ये कहके इंद्रदेव तुरंत hi सबसे पहले वैकुण्ठ चले गए. क्युकी उन्हें यकीन था की सायद विष्णु भगवन कोई न कोई रास्ता उन्हें जरूर बताएँगे.

इंद्रदेव ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या भी बताई.

विष्णुजी- इंद्रा तुम्हारा व्याकुल होना पूरी तरह से जायज़ है परन्तु हम इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकते है. क्युकी तुम्हे सायद ज्ञात नहीं है. परन्तु शुक्राचार्य के पास वरदान है को वो जब चाहे महादेव का आवाहन कर सकते है. और अगर इस दौरान उन्हें कोई रोकने का प्रयास करेगा तो वो उसी अग्नि में जल कर भस्म हो जायेगा. भले hi वो अमर hi क्यों न हो. और देव गुरु बृहस्पति ने तुम्हे सही सुझाव दिया है की जो हो रहा है उसे होने दो. महादेव सब अच्छा hi करेंगे. तुम उन पैर विस्वास रखो.

इंद्रदेव- प्रभु मुझे उन पैर पूर्ण विस्वास है परन्तु शुक्राचार्य पैर नहीं. अगर उन्होंने देव का अंत करने का कोई उपाय महादेव से मांग लिया फिर क्या होगा. अभी तक की साडी म्हणत पैर पानी फिर जायेगा.

विष्णुजी- हम इसके परिणामों से अच्छी तरह से परिचित है इंद्रा. परन्तु ये जो हो रहा है यही नियति का विधान है. और उसके हिसाब से अर्णव को अपने एक आखिरी परीक्षा में अब्बल होना है. क्युकी फिलहाल अरनव का कोई तोड़ नहीं है. और अगर ऐसे में असुर उससे युद्ध करेंगे तो निश्चित hi उनकी हार होगी जो सही नहीं है. युद्ध बराबरी से होना चाहिए. यही सिद्धांत सदियों से चला आरहा है.

इंद्रदेव- परन्तु प्रभु आप भी ये जानते है की असुर कभी भी इस नीति का इस्तेमाल नहीं करते है. उनको वरदान मिल जाये फिर वो निर्दोषों और मासूमो पैर अत्याचार करना प्रारम्भ कर देते है वो नहीं देखते की सामने वाले पैर उनके सामान hi शक्तिया है या नहीं. फिर जब उनपर ये संकट आया तो हम क्यों ऐसा कर रहे है.

विष्णुजी- क्युकी इंद्रा अगर हम भी उनकी तरह hi साडी नीतियों का निरादर करने लगे तो हम्मे और उनमे फर्क कैसे रहेगा. आप जो बात कर रहे है वो असुर प्रवृति को दर्शा रहा है. आप भूले नहीं की आप एक देवता hai.asur नहीं. और असुर जो भी करते है वो उनकी प्रवृति है. और वो उसका पालन करते है. फिर हम कैसे अपनी प्रवृति को छोड़ सकते है.

ये सुनकर इंद्रदेव इक दम से खामोश रह गए. क्युकी विष्णु भगवन की बातो में सच्चाई थी. परन्तु अर्णव से लागब उन्हें ये बात न मैंने पैर विवश कर रहा था. जिसे प्रभु ने अच्छे से भाप liya.or फिर वो बोले.

विष्णुजी- इंद्रा तुम्हारी चिंता का एक उपाय है. और अगर इसमें सफल रहे तो में खुद जेक उनका यज्ञ विफल करूँगा.

ये सुनकर इंद्रदेव को ऐसा लगा जैसे सूखे रेगिस्तान में उन्हें ठंडा सीतल जल मिल गया हो.

इंद्रदेव- क्या उपाय प्रभु.

विष्णुजी- इंद्रा तुम अर्णव के पास जाओ और उसे ये साडी परिस्थिति बताओ और अगर वो कहे की है शुक्राचार्य का ये यज्ञ बिफल कार्डो तो में ऐसा करूँगा. उसे ये बताना की शुक्राचार्य उसकी मृत्यु के लिए महादेव को प्रसन्न मर रहे है उसको शक्तियों का तोड़ ढूंढ़ने के लिए. और अगर वो मान जाये तो मुझसे कहना में तुरंत hi उनका यज्ञ बिफल कर दूंगा.

ये सुनके इंद्रदेव के चेहरे पैर एक जीत वाली मुस्कान आगयी. क्युकी उन्हें पूरा विस्वास था की अर्णव जरूर कहेगा यज्ञ बिफल करने के लिए.

और यही आशा लेके और प्रभु को प्रणाम करके वो बहा से चले गए सीधे गुरुदेव परसुराम जी के आश्रम की तरफ

अब देखते है देव क्या फैसला करता है इस यज्ञ को लेके……



तो बे कॉन्टिनुए………………..
 
अपडेट 88

इंद्रदेव देव के पास आने के लिए निकल चुके थे. और बही देव और बाकि सभी फिलहाल विश्राम कर रहे थे. दिन भर काफी म्हणत जो की थी सभी ने. इसलिए थोड़ा थक से गए थे. उतने नहीं मामूली से. तभी मुझे गुरुदेव की आवाज आई जो मुझे बुला रहे थे. तो में भाग कर उनके पास गया. और में क्या देखता हु. बहा पैर गुरुदेव के साथ कोई और भी थे. और में उन्हें देखकर hi पहचान गया की ये कोण हो सकते है. क्युकी उनकी छबि और उनका तेज़ hi ऐसा था जिसे देखकर केवल एक hi फीलिंग आती है. की है यही है सरे देवताओ के राजा देवराज इंद्रा.

उनके सर का मुकुट और सरीर पैर कई प्रकार क्र आभूषण उनकी पर्सनालिटी का वर्णन कर रहे थे.

( सॉरी फॉर इंग्लिश वर्ड. मुझे हिंदी वाला याद नहीं आया इस वक़्त इसलिए यही लिख दिया)

मैं उनके समीप गया और उन्हें दंडवत प्रणाम किया.

मैं- धन्य भाग मेरे जो आज स्वयं देवराज इंद्रा मुझे दरशन देने आये hai.pranam इंद्रदेव.

इंद्रदेव ने मेरे पास आकर मुझे अपने हाथो से उठाया और खड़ा किया.

इंद्रदेव- विजय भाव पुत्र. हम प्रसन्न हुए. और पुत्र भले hi हम आज पहली बार मिल रहे हो. परन्तु मेरी नजर हमेशा तुमपर रहती थी. और अभी तक तुमने जिस तरह से असुरो का विनाश किया है उसे देखकर मुझे तुमपर कितना गर्व होता था में उसे ब्यक्त नहीं कर सकता.

ये सब सुनके में शोक था की क्या ये सच है. इंद्रदेव मेरे ऊपर नजर जमाये रहते थे.

गुरुदेव- वत्स इंद्रदेव सत्य कह रहे है. कई बार इन्होने तुमपर आने वाली मुसीबतो को टाला भी था. ये एक तरह से तुम्हारी रक्षा करते थे. ताकि कोई असुर तुम्हारे करीब न पहुंच पाए. और तुम्हे याद होगा. जब पहली बार उस जंगल में तुम्हारा सामना उन चार असुरो से हुआ था. तब तुम्हारे मन से जो आवाज आई थी वो इंद्रदेव की hi थी. उन्ही ने तुम्हारा मार्गदर्शन किया था. और इस हिसाब से ये तुम्हारे पहले गुरु है.

.ये सुनके मेरे सामने पूरा फ्लैशबैक चल गया जब मुझे वो आवाज आई थी जिसने मुझे ध्यान करने को कहा था. मुझे लगा था की वो आवाज मेरे अंतर्मन की थी लेकिन आज पता चला की ये तो जीते जागते देवराज की आवाज थी.

मैं- आपने सत्य कहा गुरुदेव उस हिसाब से ये मेरे पहले गुरु है जिन्होंने मुझे अपनी शक्ति का इस्तेमाल करना बताया और मेरी रक्षा भी की. और आज ये बात जानकार में बकै में धन्य हो गया गुरुदेव.

मैंने ये कहके उन्हें फिर से प्रणाम किया तो उन्होंने मुझे रोक लिया और फिर वो बोले.

इंद्रदेव- पुत्र में तुम्हारे गुरुदेव का पद नहीं ले सकता. मैंने जो भी अभी तक किया वो इसलिए क्युकी मुझे तुममे होने पुत्र की छबि दिखाई देती है. और उसी रिश्ते से मैंने ये सब किया. तुम्हारे असली गुरुदेव तो यही है. जिनके बराबर महँ इस समस्त ब्रह्माण्ड में और कोई नहीं है. और सत्य कही तो ये गुरुदेव वाला पत्र मेरे लिए है hi नहीं.

ये कहके वो मुस्कुराने लगे. और में भी.

फिर गुरुदेव बोले.

गुरुदेव- देवराज आज आपका यहाँ आगमन कैसे हुआ.

इंद्रदेव- है इन सब में मुख्या बात तो बतानी रह hi गयी. दरअशल एक नया सकत ाँ पड़ा है. शुक्राचार्य महादेव के लिए यज्ञ कर रहे है. और अगर वो यज्ञ सफल हो गया तो वो महादेव से कुछ भी वरदान मांग लेंगे. और आप तो जानते hi है की उन्हें इस समय किसकी सबसे अधिक छह है. मुझे बस यही दर लग रहा है की महादेव उन्हें देव को परास्त करने का कोई अचूक उपाय न दे दे. वर्ण अभी तक की साडी म्हणत पैर पानी फिर जायेगा. अब आप hi कोई उपाय बताये गुरु परसुराम.

ये सुनकर तो मेरे चेहरे की हवइया hi उड़द गयी. की ऐसा भी संभव है.

मैं- गुरुदेव. क्या महादेव ऐसे एक यज्ञ से उन्हें दर्शन दे देते है.

गुरुदेव- है वत्स. बहुत पहले उन्होंने ये वरदान लिया था महादेव से की जब भी उन्हें महादेव की मदद की जरुरत होगी. तब बे एक यज्ञ करके महादेव के दर्शन प्राप्त कर लेंगे और उनसे जो मदद चाहिए वो प्राप्त कर लेंगे. लेकिन इस यज्ञ की कुछ सीमायें है. ये यज्ञ पुरे काल में केवल एक बार hi किया जा सकता है. हमारे चार काल है सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलयुग. अभी तक तीनो कालो में जब भी जरुरत पड़ी है उन्हें तब उन्होंने इस यज्ञ को 1-1 बार संपन्न करके महादेव से सहायता प्राप्त की है. और अब उनकी ये आखिरी सहायता होगी महादेव से. और मन्ना पड़ेगा उन्होंने क्या वक़्त चुना है.

इंद्रदेव- और गुरुवार आपको ये भी पता होगा को इसे खंडित नहीं किया जा सकता है.

गुरुदेव- है मुझे ज्ञात है.

परन्तु आपके यहाँ आने का मकसद में अभी भी नहीं समाज प् रहा हु देवराज.

इंद्रदेव- गुरुदेव दरअशल यही समस्या लेके में नारायण भगवन के पास गया था. और उन्होंने मेरी समस्या को समझा और मुझे एक उपाय बताया है. उन्होंने कहा है की अगर अर्णव ये कहे की जा इस यज्ञ को बिफल कर दो. तो बे स्वयं जाकर इस यज्ञ को बिफल कर देंगे. और उसके साथ उन्होंने मुझे कुछ और बाटे भी बताई जो में आपको बताता हु.

उसके बाद बहा की पूरी वार्ता इंद्रदेव ने विगत बार सुना दी गुरुदेव और मुझे. जिसे सुनने के बाद में इतना तो जान गया था की इस यज्ञ के संपन्न होते hi बहुत hi भीषण संकट आएगा मेरे ऊपर.

गुरुदेव- उन्होंने सही कहा है इंद्रदेव. तो वत्स तुम क्या कहते हो. क्या हमें उनके यज्ञ को बिफल करना चाहिए. या नहीं करना चाहिए.

मैं- गुरुदेव ये फैसला लेने मैं सक्षम नहीं हु. परन्तु एक बात है जो मैंने सभी बीएड और पुर्नो में पड़ी है. वो ये की यज्ञ को बिफल करना त्रिदेवो का अपमान करना जितना बड़ा पाप है.

और रही बात इस यज्ञ को बिफल करने की तो में इसे बिफल करने के लिए न hi किसी से कहूंगा और न hi खुद कोसिस करूँगा. भले hi इसका परिणाम मेरी मृत्यु hi क्यों न हो.

और विष्णु भगवन ने भी सही कहा है. शुरू से लेकर अभी तक वो मेरे सामने जरा भी नहीं टिक पाए है. और उस हिसाब से उन्हें एक मौका तो मिलना hi चाहिए. जिसमे उनका सामना उनके hi बराबर शक्तिशाली शत्रु से हो.

और में आपकी ये बात भी मंटा हु की अगर उनको ऐसा मौका मिलेगा तो वो कभी भी इस यज्ञ को पूर्ण नहीं होने देते. लेकिन नारायण भगवन की बात भी सही है. अगर हमने उस यज्ञ को बिफल किया तो उनमे और हम्मे फर्क क्या रहेगा.

बैसे भी हम सभी एक hi पंचतत्वों से बने है. हम में जरा भी अंतर नहीं है. हम सभी एक hi है. हमें दुसरो से कोई बात अलग करती है. तो वो है हमारा आचरण और हमारे संस्कार. अगर आपका आचरण अच्छा है तो आप देवता कहलायेंगे. और अगर बुरा है तो आप असुर कहलायेंगे. बाकि सब कुछ एक जैसा है हम सभी में.

हम स्वयं और अपने परिवार की रक्षा के लिए किसी भी हद से गुजर जाते है. मैंने भी अभी तक कई असुरो का बढ़ किया है. और असुरो ने भी अभी तक कई युद्ध लाडे है जिनमे कई हत्याय की है. इस हिसाब से हम दोनों एक जैसे है. परन्तु फिर भी कुछ ऐसा है जो हमें अलग बनता है. और वो है हमारा आचरण. मैंने असुरो का वध सबकी रक्षा करने के लिए किये है समाज कल्याण के लिए किये. और असुरो ने जो भी हत्या या वध लिए है वो केवल स्वयं के फायदे के लिए किये hai.or सभी पैर राज करना और अपना वर्चस्प कायम करना. अगर में ऐसा होता तो अभी तक समस्त संसार मेरे सामने घुटने टेके देता. लेकिन में ऐसा नहीं हु. और न hi कभी ऐसा हो सकता हु.

और इस हिसाब से में यही कहूंगा की में नहीं चाहता की उनके यज्ञ को बिफल किया जाये. फिर भले hi उनको मेरी शक्तियों का तोड़ hi क्यों न मिल जाये इस यज्ञ से. फिर भी में इस संसार की भलाई के लिए जो आवश्यक होगा वही करूँगा भले इसमें मेरे प्राण hi क्यों न चले जाये.

इतना कहकर में shan't हो गया. और एक लुम्बी सास ली. और तब मुझे एहसास हुआ की मैंने अभी किसको भासन सुना रहा था. जिनके सामने बड़े से बड़े ज्ञानी लोग भी हार मान जाते है.

मैं- मुझे शमा करे गुरुदेव और इंद्रदेव. में कुछ ज्यादा hi बोल गया. अगर किसी बात का बुरा लगा हो तो फिर से में शमा मांगता हु.

गुरुदेव- वत्स तुमने जो भी कहा hai.us बात का हमें जरा भी बुरा नहीं लगा. बल्कि तुमने तो एक ऐसी सचाई हमारे सामने राखी है. जिसके बारे में आजकल कोई सोचता भी नहीं है. सब बही करते है जिसमे उनका हिट उन्हें दिखाई देता है. और तुम्हारे ऐसे वचह्न सुनकर मुझे तुमपर कितना गर्व हो रहा है में व्यक्त नहीं कर सकता. जीते रहो वत्स जीते रहो.

इंद्रदेव- पुत्र गुरुवार का कथा. सत्य है. में केवल इस किये चिंतित था क्युकी इस यज्ञ के परिणाम के रूप में कही हम सभी तुम्हे खो न दे. और ये दर अभी भी बना हुआ है. लेकिन तुमने जो अपना फैसला सुनाया है उसे सुनकर में अत्यधिक प्रसन्न हु. और मुझे भी गर्व है तुमपर पुत्र. बाकि अब जो होगा अच्छा hi होगा.

गुरुदेव- सही कहा आपने देवराज. महादेव सब अच्छा करेंगे.

उसके बाद इंद्रदेव बहा से चले गए सीधे वैकुण्ठा. और में और बाकि सभी बही पैर रह गए.

इंद्रदेव ने बहा पहुंच कर उन्हें प्रणाम किया और अर्णव का फैसला उन्हें बता दिया. जिसे सुनकर वो भी अत्यधिक प्रसन्न हुए.

विष्णुजी- में जनता था की अर्णव यही फैसला करेगा. और उसने बिलकुल सही फैसला किया है. और अब मुझे लगता है की आपकी समस्या का भी निबरण कुछ हद तक हो गया होगा इंद्रा.

इंद्रदेव- प्रभु समस्या तो बही की बही है. है लेकिन इसका सामना करने की शक्ति जरूर मुझमे आगयी है जो पहले नहीं थी. अर्णव की बाटे सुनकर मेरे अंदर एक नया जोश आज्ञा है. और में इसे कायम रखने की पूरी कोसिस करूँगा.

विष्णुजी- बहुत अच्छे इंद्रा. अब सब कुछ महादेव पैर छोड़ दो. जो हो रहा है उसे होने दो. सब अच्छा hi होगा.

इंद्रदेव- जैसी आपकी आज्ञा प्रभु.

ये कहके वो उन्हें प्रणाम करके बहा से चले गए. और विष्णु भगवन फिर से अपने ध्यान में बैठ गए.

बही शुक्राचार्य का यज्ञ अब समाप्ति को तरफ बाद गया था बस कुछ और आहुति दाल कर ये यज्ञ संपन्न हो जाने वाला था. और इस समय की प्रतीक्षा सभी कर रहे थे की क्या होगा क्या कहेंगे शुक्राचार्य महादेव से.

बही देव को भी इसकी टेंशन थी. लेकिन वो इस मामले में कुछ भी नहीं करना चाहता था फिलहाल उसे भरोषा था की महादेव जो भी करेंगे उसमे समस्त संसार की भलाई hi छिपी हुई होगी.

और आखिर कार वो समय ाही गया जब यज्ञ संपन्न हुआ और यज्ञ कुंड से साक्षात महादेव प्रगट हुए शुक्राचार्य के सामने.

जिन्हे देखकर शुक्राचार्य ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया.

महादेव- उठिये शुक्राचार्य और कहिये की किस उद्देस्य के लिए आपने मुझे बुलाया है.

शुक्राचार्य- महादेव आप तो सब जानते hi है. आपके ाँस ने समस्त दिव्यास्त्र को प्राप्त कर लिया है. और अब हम छह कर भी उसका मुकाबला नहीं कर सकते hai.us विशाल शक्ति के सामने हम नहीं टिक सकते. तो हम पैर कृपा करे और मुझे कोई ऐसा उपाय या मार्ग बताये जिससे हम देव का सामना भी कर पाए और उस दिव्यस्त्र को पुनः प्राप्त करने का प्रयास भी कर paye.aapki बड़ी कृपा होगी हैंपर.

महादेव- शुक्राचार्य वो दिव्यस्त्र आपको समर्पित किया गया था. परन्तु आपने उसे गलत हाथो में दे दिया. जिसके पश्चात उसने इसका इस्तेमाल हमेशा बुरे कार्यो के लिए hi किया और यही बजाज थी को दिव्यस्त्र आपसे रूत गया. और जब वो जागृत हुए तो उसने आपको नहीं अर्णव को अपना पता बताया. जिस बजह से अर्णव उसे प्राप्त करने में सफल रहा. जबकि इस दौरान आपके पास भी मौका था उसे पुनः हासिल करने का. और अब आप चाहते है की आपको एक और मौका दिया जाये. परन्तु क्यों? आप मुझे एक बजह बताये की ये दिव्यस्त्र आपको क्यों पुनः मिल जाये.

ये सुनके शुक्राचार्य एक दम से समूचा gaye.or सोचने लगे. और फिर बोले.

शुक्राचार्य- महादेव इस बार में इस दिव्यास्त्र को किसी और के हाथो में नहीं सोपूँगा. बल्कि स्वयं hi इसका इस्तेमाल करूँगा. भले hi असुर मुझे प्रिये है लेकिन मैंने इस अस्त्र को तारकासुर के हाथों में देने का परिणाम देखा है. इसलिए अबकी बार में इसे किसी के भी हाथो में नही दूंगा. और रही बात इस बालक की तो. भले hi वो आपका ाँस है. परन्तु रहता कलयुग में है. और इस बात की भी सम्भावना है की आगे चलकर वो इस दिव्यस्त्र का गलत इस्तेमाल करे.

महादेव- तो क्या आप इसका इस्तेमाल संसार की भलाई के लिए करना चाहते है. आपके सरे विचारो से में भली भाटी परिचित हु. भले hi आप इसे किसी और हाथो में न दे परन्तु आप इसका इस्तेमाल करेंगे असुरो की विजय के लिए hi. तो फिर क्यों आपको ये दिव्यास्त्र दिया जाये.

ये सुनके फिर से शुक्राचार्य चुप हो गए. और कुछ सोच कर बोले.

शुक्राचार्य- महादेव में और कोई बात इस संदर्व में नहीं कह सकता हु. बस इतना hi कहूंगा की आपने मेरी मदद का वरदान दिया है मुझे. और में चाहता हु की आप मेरी मदद करे उस दिव्यस्त्र को पुनः प्राप्त करने में. भले hi कोई भी रास्ता क्यों न अपनाना पड़े.

ये सुनकर महादेव मुस्कुरा गए. और फिर बोले.

महादेव- हम जानते थे तुम आखिर में यही कहोगे. अब चुकी वरदान दिया है तो में इसे निभाउंगा भी. तो सुनो.

उस दिव्यास्त्र को प्राप्त करने का एक तरीका है को अर्णव इसे स्वयं आपको सूप दे. जो बो करेगा नहीं. आप कई वर्षो तक उससे युद्ध hi क्यों न करते रहे.

परन्तु वो कभी भी आपको ये दिव्यास्त्र नहीं सौपेगा.

और आप इसे जबरदस्ती उससे छीन भी नहीं सकते है. क्युकी अगर ऐसा किया तो दिव्यास्त्र पुनः अर्णव के पास चला जायेगा और कोई शक्ति उसे रोक नहीं पायेगी.

लेकिन इस सब में एक रास्ता है. वो ये की अगर अर्णव की मृत्यु हो जाती है और दिव्यस्त्र के बिभाजन होने से पूर्व आपने उसे अपने हाथो में धारण कर लिया तो फिर वो आपका हो जायेगा. परन्तु ये याद रखे की बिभाजित होने में पल भर का समय लगेगा. और इसी पल भर के समय में आपको दिव्यस्त्र को अपने हाथो में धारण करना होगा. अगर आप चूक गए तो फिर में भी कुछ नहीं कर पाउँगा.

और ये कैसे होगा तो में आपको बता देता हु. में उन पंच तत्वों को अपनी शक्ति से रोक लूंगा अगर आप ने उन्हें धारण किया तो. अगर किसी और ने किया तो वो ाँस नहीं रुकेंगे. केवल आपके लिए में उस दिव्यस्त्र को विभाजित नहीं होने दूंगा.

ये सुनकर शुक्राचार्य एक दम से कुश हो गए. परन्तु एक समस्या अभी भी उनके सामने थी. जिसके लिए वो फिर बोले.

शुक्राचार्य- प्रभु ये सब तो ठीक है परन्तु हम उसे पराजित कैसे करे. उसके पास अथाह शक्तिया है. और मेरा कोई भी असुर उसका सामना नहीं कर सकता. और में युद्ध करता नहीं. तो फिर उसे हम परास्त कैसे करेंगे. ताकि उसकी मृत्यु हो सके. और में उसे धारण कर सकू.

महादेव- वो मेरा ाँस है इसलिए मेरी शक्तिया उसे केवल हानि पहुंचा सकती है उसका वध नहीं कर सकती.

न hi संसार की दूसरी कोई और शक्ति. जहा पंचमहाभूत उपस्थित रहेंगे बहा अर्णव का अंत मुमकिन नहीं है. और इस ब्रह्माण्ड में ऐसी केवल एक hi जगह है जहाँ ये पंच तत्त्व बहुत hi अलप मात्रा में उपस्थित रहते है. उस जगह पैर इन पंचतत्वो का निवास है लेकिन बहा के प्रभाव से वो तत्त्व ज्यादा शक्तिशाली नहीं रहते है उस जगह पैर. और आप ये भली भाटी जानते है की ऐसी कोनसी जगह है.

अगर कोई भी अर्णव को उस जगह ले जाता है और उससे बहा पैर युद्ध करता है तो अर्णव की शक्तिया उस जगह के प्रभाव से कमजोर पद जाएँगी और फिर आप आसानी से उसे परास्त कर पाएंगे. और सायद उसका वध भी.

और इसके आल्वा कोई शक्ति कोई िस्थान नहीं जो उसको हानि पंहुचा सके. कालकूट भी नहीं. अब आपको फैसला करना है.

ये कहके महादेव अंतर्ध्यान हो गए. और शुक्राचार्य ने उन्हें प्रणाम किया और उसके बाद अपनी सोच में डूब गए की आखिर कैसे देव को उस जगह लेन पैर मजबूर किया जाये.

बाकि देखते है की अब क्या होता है….


तो बे कॉन्टिनुए………………..
 
अपडेट 89

शुक्राचार्य अपनी योजनाओ पैर काम कर रहे थे. उन्हें देव की एक कमजोर कड़ी मिल चुकी थी. बही इंद्रदेव अपना सर पकड़ कर बैठे थे. उन्हें जो उम्मीद थी महादेव से वो सब बेकार गयी. क्युकी उन्होंने देव की कमजोरी जो बतादि शुक्राचार्य ko.or इंद्रदेव जानते थे की शुक्राचार्य किसी न किसी तरह देव को उस जगह ले जाने में कामयाब जरूर हो जायेंगे.

बही गुरुदेव भी परेशान थे की अब देव को कैसे बताया जाये. लेकिन बताना जरुरी भी था. इसलिए उन्होंने सभी को अपने पास बुलाया.

सभी बहा आये और बैठ गए तब गुरुदेव ने बोलना सुरु किया.

गुरुदेव- शुक्राचार्य का यज्ञ सफल हो गया है. और न चाहते हुए भी महादेव को उनकी सहायता करनी पड़ी है.

मैं- कैसी सहायता गुरुदेव.

गुरुदेव- महादेव ने उन्हें तुम्हारी कमजोर कड़ियों के बारे में बता दिया है. जो की एक जगह है. जहा तुम्हारी शक्तिया कमजोर पद जाती है.

ये सुनके हम सभी चौक गए की ऐसा कैसे संभव है.

मैं- गुरुदेव ये कैसे संभव है. जहा तक में जनता हु जहा भी पंचतत्व रहेंगे बहा दिव्यस्त्र की शक्तियों को कोई छू नहीं सकता. और इस ब्रह्माण्ड में ऐसी जगह है hi नहीं जहा ये पंचतत्व निबास नहीं करते है. फिर ऐसी कोनसी जगह के बारे महादेव ने बताया है उन्हें.

गुरुदेव- तुम्हारा कहना उचित है वत्स. ऐसी जगह इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं जहा ये तत्त्व उपस्थित न रहते हो. लेकिन ऐसी जगह जरूर है जहा ये तत्त्व काम मात्रा में उपस्थित रहते हो. और उस जगह के प्रभाव से और शक्तिशाली नहीं हो पते है. वो जगह उन्हें कमजोर बनती है. और जितनी बे तत्त्व उस जगह पैर उपस्थित रहते है वो शैतानी शक्तियों में परिवर्तित हो जाते है. क्युकी बहा उन्ही का वर्चस्प है. अगर तुम उस जगह पैर जाते हो तो बहा के प्रभाव से तुम्हारी शक्तिया काम होने लगेगी. और शक्तियों का बुरा प्रभाव किसी और पैर नहीं तुम्हारे ऊपर hi पड़ेगा.

ये सुनके में चौका और अगले hi पल मुझे एक बात याद आई और मुझे लगा की कही इसका कनेक्शन उसी से तो नहीं है.

मैं- गुरुदेव क्या वो जगह पातळ लोक है.

ये सुनके गुरुदेव के चेहरे पैर एक मुस्कान आगयी. और फिर वो बोले.

गुरुदेव- बहुत अच्छे वत्स. बिलकुल सही अनुमान लगाया है. वो जगह पातळ लोक hi है. जहा अच्छे निवास नहीं करती है. बहा जितनी भी शक्तिया जाती है. वो सभी बहा के प्रभाव से बुरी बन जाती है. और तुम्हारे अंदर अच्छे कूट कूट कर भरी है. इसलिए तुम्हारी शक्तिया बहा कमजोर पद जाएँगी. और यही महादेव ने शुक्राचार्य को बताया है.

मैं- तो क्या इस लिए बहा के असुर मेरे सुरक्षा कवच को तोड़ कर घर में घुस गए the.kyuki उनके अंदर बहा की शक्तिया थी.

गुरुदेव- बिलकुल सही कहा तुमने. इसी लिए उनके ऊपर तुम्हारी शक्तियों का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा और वो आसानी से तुम्हारे कवच में घुस प् रहे थे.

ये सुनके मुझे सब समाज में आज्ञा की आखिर बहा के असुर क्यों इतने तेज़ और शक्तिशाली थे और क्यों अधीरा. उन्हें लेके आया था. सायद वो ये बात जानते थे. लेकिन इतनी अच्छी तरह से नहीं. और अब तो उन्हें बढ़िया कन्फर्मेशन भी मिल चूका है. तो अब वो अपनी साडी योजना उसी हिसाब से आगे बढ़ाएंगे.

मैं- अब मेरे लिए क्या आदेश है गुरुवार.

गुरुदेव- बस इतना की. उस जगह पैर जितना हो सके खुद को जाने से rokana.asur अपना संपूर्ण बल लगा देंगे तुम्हे बहा ले जाने के लिए. और तुम्हे केवल तब hi उनके पीछे बहा तक जाना है जब तक उसके आल्वा कोई और उपाय न हो. और है एक और बात. महादेव ने शुक्राचार्य को एक और वरदान दिया है. जिसके तहत अगर तुम्हारी मृत्यु हो जाती है और उसके अगले hi पल शुक्राचार्य उस दिव्यास्त्र को बिभाजित होने से पूर्व अपने हाथो में धारण कर लेते है तो फिर दिव्यास्त्र उन्ही का हो जायेगा और बिभाजित नहीं होगा. इसलिए अपने आप को मरने से बचाना भी तुम्हारे लिए अब जरुरी है. फिर चाहे तुम्हारे सामने वो कोई भी चौँठी क्यों न पेश करे. तुम समाज रहे हो न मेरी बात को.

मैं- है गुरुवार में अच्छे से समाज गया हु. में पूरी कोसिस करूँगा की आपके द्वारा कहे गए बचने पैर खरा उतर सकू. और इस दिव्यस्त्र को उनके हाथो में न लगने दू.

गुरुदेव- बहुत अच्छे वत्स. मुझे तुमसे यही उम्मीद है. विजयी भाव.

हम सभी ने गुरुदेव को प्रणाम किया और खड़े हो गए.

गुरुदेव- वत्स अब तुम सभी अपने घर जाओ.

मैं- जैसा आप कहे गुरुवार.

उसके बाद हम सभी बहा से उड़द गए घर की तरफ. और हमारे जाते hi गुरुदेव बहा से निकल गए कैलाश पर्वत के लिए. महादेव से बात करने. और बही इंद्रदेव भी कैलाश के लिए निकल चुके थे.

जल्दी hi गुरुदेव और बाकि के देवता कैलाश पहुंच गए जहा महादेव अपने ध्यान में बैठे हुए थे. सभी में उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपनी आँखे खोलने के लिए विनती की. तो महादेव ने अपनी आँखों को खोल लिया. और सभी को देखकर बोले.

महादेव- कहिये आपलोगो का यहाँ कैसे आना हुआ.

इंद्रदेव- महादेव ये क्या कर दिया आपने. शुक्राचार्य को साडी कमजोरिया बता दी और साथ में ये भी की उनके लिए आप दिव्यस्त्र को बिभाजित नहीं होने देंगे. ऐसा क्यों किया अपने.

महादेव- देवराज हम विनाश थे हमने उन्हें वरदान दिया था और उसकी पूर्ति करना आवश्यक था. और उस हिसाब से उन्होंने जो भी जानना चाहा मुझे वो बताना पड़ा उन्हें.

गुरुदेव- महादेव अब इस समस्या का कोई समाधान भी बताइये हमें. ताकि हम अरनव की मदद कर सके. असुर उसे किसी भी तरह बहा ले जाने में कामयाब हो जायेंगे ये आप भी जानते है. और फिर बहा क्या होगा ये हम सभी से बेहतर जानते है आप. कृपा कर इस अनर्थ को होने से रोकिये.

महादेव- परसुराम जी इसका कोई उपाय नहीं है. अब सब कुछ अर्णव पैर hi निर्भर करता है. अगर वो उस जगह जाता है तो उसे अपनी शक्ति और चतुराई से बहा से बहार भी निकलना होगा. ताकि दिव्यास्त्र उनके हाथो में न lage.or आप मेसे कोई भी उसकी सहायता भी नहीं कर सकता है. उसे अपनी सहायता स्वयं hi करनी पड़ेगी. और याद है मैंने कहा था की ऐसे कार्यो में कई बलिदान देने पड़ते है. और अर्णव के बलिदान देने का समय अब आज्ञा है. जल्द hi सभी ये समाज जायेंगे.

इंद्रदेव- महादेव किस प्रकार का बलिदान देना होगा अर्णव को.

महादेव- हमने कहा न की जल्द hi आप लोग जान जायेंगे. बस देखते जाइये.

गुरुदेव- महादेव अर्णव ने अभी तक हमें निराश नहीं किया है. उसने हर वो कार्य किया जो उसे करना था. बल्कि बहुत अच्छी तरह से उस कार्य को संपन्न किया है उसने. तो क्या ये बलिदान दें क्या जरुरी है. क्या हम सभी उसकी मदद नहीं कर सकते है. आखिर ये हमारा भी कर्त्तव्य बनता है. वो जो भी कर रहा है वो समाज कल्याण के लिए hi कर रहा है अपने स्वार्थ के लिए तो नहीं कर रहा है.

महादेव- आपका कथन सत्य है परसुराम. और हम आपसे सहमत भी है. और रही बात अर्णव की सहायता करने की तो मत भूलिए की वो शिवांश hai.or पंचतत्वो का राजा भी. वो अपनी रक्षा करना स्वयं जनता है. और अपने शत्रु को परास्त करना भी. आप hi ने उसे शिक्षित किया है. और आप hi का विस्वास डगमगा रहा है. मुझे ऐसे अपेक्षा नहीं है आपसे.

गुरुदेव- ये सत्य है महादेव परन्तु क्या करे एक लगाव सा जो हो गया है उससे. और ये सभी देवता भी इसी लिए यहाँ आये है इन्हें दिव्यस्त्र की नहीं बल्कि अर्णव की चिंता है.

ये सुनकर महादेव के चेहरे पैर एक मुस्कान आगयी और उसी मुस्कान के साथ वो बोले.

महादेव- आप सभी का लगाव hi अर्णव का असली कवच है जो उसकी रक्षा अभी तक हर खतरे से करता आया है. और आगे भी करता रहेगा. बाकि भविष्य में जो होना है उसे उसके हाल पैर छोड़ दे. अर्णव के कर्म hi उसे विजयी या ाविजयी का रास्ता दिखाएंगे. आप सभी बस इन्तजार करे.

इतना कहकर महादेव ने अपनी आँखे पुनः बंद कर ली. वो भी क्या करे बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन ये समय सही नहीं था. इसलिए अपनी आँखों को बंद करके ध्यान में बैठ गए. और बाकि सभी उन्हें प्रणाम करके बहा से चले गए.

बही मैं और बाकि सभी घर पहुंच गए थे. जहा सभी हमें नए अवतार में देखकर बहुत कुश थे. माँ ने हम सबकी आरती उतारी और बहुत साडी बलए की हमारी. और उसके बाद हमें घर में प्रवेश करने दिया. अंदर आते hi हम सभी अपने नार्मल कपड़ो में आगये और दिव्यस्त्र अंतर्ध्यान हो गया. जब मुझे उसकी आवश्यकता होगी तब वो आजायेगा बस याद करने से.

हमें आने में रात हो गयी थी इसलिए हमने डिनर फिनिश किया और अपने अपने कमरों में चले गए. तब मुझे याद आया की कल तो रक्षाबंधन है. और मैंने अभी तक उन दोनों के लिए कोई गिफ्ट भी नहीं लिया है. और अभी काफी लेट हो गया है सरे मॉल बगेरा भी बंद हो गए होंगे.

ये सोचकर मुझे समाज में आया की सॉलिड वाट लगेगी मेरी कल. हलाकि में जादू से कुछ भी माँगा सकता था लेकिन उसकी इतनी एहमियत कहा. जो खुद जेक उनके लिए खरीदने में है.

इसलिए मैंने सोचा कल hi जेक उनके लिए गिफ्ट्स ले आऊंगा. अब जो होगा सो देखा जायेगा.

यही सोचकर में सो गया.

बही रात में शुक्राचार्य मेधावी के साथ साडी योजनाए बना रहे थे की कैसे करना है कब करना है साडी रणनीति तैयार कर रहे थे. उन्होंने सोच लिया था की देव को पाताललोक कैसे लाया जा सकता है. उसका रास्ता उन्हें मिल गया था. मेधावी ने भी सभी असुरो को एकजुट कर लिया था. जिनमे अग्नि बायु जल और ाक्ष वाले असुर भी शामिल थे. उनकी मृत्यु दिव्यास्त्र से hi हो सकती है ये बात सभी जानते थे. लेकिन चांस सभी को लेना था. क्युकी उन्हें पता था की एक बार दिव्यस्त्र गुरुदेव के हाथ में आज्ञा फिर गुरुदेव उन्हें फिर से जीवित कर सकते है. और बैसे भी गुरुदेव के पास मृत संजीवनी भी है. जिससे वो जब चाहे अपने किसी भी असुर को जीवनदान दे सकते है. और यही वो मैंने ताकत है जिसके दम पैर असुर इतना उछालते है.

लेकिन अगर किसी तरह असुरो का सरूर hi नस्ट हो जाये तो फिर संजीवनी भी उन्हें जीवित नहीं कर सकती. लेकिन इस जगह दिव्यास्त्र काम आता है. वो उन सभी पंचतत्वो से पुनः सरीर का निर्माण करके उसकी आतम को उसमे धारण करवा कर जीवित कर सकते है. और इसी लिए शुक्राचार्य हाथ धो कर इस अस्त्र के पीछे पड़े हुए है. क्युकी ये शक्ति अमरता के वरदान से काम नहीं hai.unke असुरो के लिए. और इसी लिए सरे देवता भी देव का पूरा साथ दे रहे थे अब तक. बाकि देखते है इस सब में किसकी विजय होती है और कैसे.

बही नेक्स्ट डे देव अपने रूटीन से उठा अपनी एक्सरसाइज की ध्यान लगाया और फिर रेडी हो गया शॉपिंग पैर जाने के लिए. बही सुबह से हो घर में चहल पहल सुरु हो गयी थी. आज रक्षाबंधन जो था. दोनों बहने सज्मे में ब्यस्त थी. और प्राची और आलिआ अपने भाइयो को मिस कर रही थी जो थे hi नहीं. तभी घर की दुर्बल बजी और मैंने जेक दरवाजा खोला तो सामने चिराग और लकी खड़े हुए थे एक दम रेडी टिप टॉप बनकर.

मैंने दोनों को गले लगाया और उनके हालचाल पूछे.

और उन्हें अंदर ले आया.

सभी लोग अब नीचे आचुके थे. सुबह के 9 बजे रहे थे और राखी बांधने का टाइम भी जो गया था तो चारो लड़किया नीचे आचुकी थी. सुरभि और रेनू के हाथ में थाली थी और आलिआ और प्राची खली हाथ. उनके चेहरे पैर एक फीकी मुस्कान थी जो ये बता रही थी को ये दोनों कितना मिस कर रही है अपने भाइयो को. लेकिन इनकी किस्मत hi ऐसी की दोनों का कोई भाई नहीं था. और माँ ये बात इन्हे देखकर hi समाज गयी. तो उन्होंने चिराग और लकी से इस बारे में बात की. और दोनों को कोई ऐतराज नहीं था. पहले दोनों उनकी भाबिया बनने वाली थी और अब उनकी बहने. और फिर यही बात माँ ने सबके सामने आलिआ और प्राची से कही. जिसे सुनकर उन दोनों की असली मुस्कान बहार निकल आयी. और उस मुस्कान में दोनों कितनी प्यारी लग रही थी ये बताने की मुझे जरुरत भी नहीं है. जस्ट फील आईटी.

उसमे बाद दोनों ने अपनी थालिया सजाई और बही पैर एक साथ हमारा राखी का प्रोग्राम आगे बढ़ने लगा. मुझे लकी और चिराग और मां. हम चारो को हमारी बहने राखी बांध रही थी.

मुझे सुरभि और रेनू ने. और उसी समय आलिआ ने चिराग और प्राची ने लकी को और माँ ने मां को. फिर आलिआ ने लकी और प्राची ने चिराग को. और आखिर में रेनू और सुरभि ने भी उन दोनों को राखी बांध दी. और मिठाई खिला दी. और अब आई गिफ्ट देने की बरी तो. मेरे पास तो कुछ भी नहीं था. इसलिए मैंने अपने हाथ खड़े कर दिए. बही चिराग लकी और मां गिफ्ट लाये थे. लेकिन प्रॉब्लम यहाँ हुई की वो दोनों 2-2 गिफ्ट hi लाये थे जो उन दोनों ने आलिआ और प्राची को दे दिए. जबकि वो लाये रेनू और सुरभि के लिए थे. और ये बात जानकार उन दोनों ने वो गिफ्ट्स रेनू और सुरभि को दे दिए. और कहा की हमारा गिफ्ट तो यही है की हमें आज एक साथ 2-2 भाई मिल गए.

मैं- I'm सॉरी में तो कुछ भी नहीं ले पाया तुम दोनों के लिए. लेकिन शाम तक ले आऊंगा

इसपर उन दोनों ने कोई ऐतराज नहीं जताया. उसके बाद हम सबने मिलकर बढ़िया खाना खाया और अपने डे को हैप्पी डे में बदला. खाने के बाद हम तीनो यानि की में लकी और चिराग तीनो hi निकल गए मॉल के लिए. ताकि कुछ गिफ्ट्स लेके आसके. इन सबके लिए. मुझे केवल 2 गिफ्ट्स लेने थे और इन दोनों को 2-2 मतलब 4. और 2 गिफ्ट्स ये आलरेडी देके आई थे. मतलब टोटल हुए 6. बिचारो को साडी पॉकेटमनी इसी में जाने वाली थी. और अच्छी बात ये थी की इसमें वो दोनों बहुत कुश थे. उन्हें पॉकेट मनी जाने का गम नहीं बल्कि 4 बहने मिलने की कृषि थी जो उनके चेहरों पैर साफ़ झलक रही thi.kyuki ये भी इकलौते थे. इनकी कोई बहने नहीं थी.

शाम तक माथापच्ची करने के बाद मैंने दोनों के लिए गिफ्ट्स ले लिए. बकै में बहुत म्हणत हुई इस काम में. और उन दोनों ने भी दोनों के लिए गिफ्ट्स ले लिए थे. हमने बही रेस्टोरेंट में कॉफ़ी बगैर पी और फिर घूमते घंटे आराम से घर पहुंच गए. और उन सभी को उनके गिफ्ट्स दे दिए. जिसे देखकर वो और भी ज्यादा कुश हो गयी. ऐसे hi हमारा टाइम निकल गया. उसके बाद हमने रात में डिनर किया और डिनर के बाद में दोनों को उनके घर छोड़ने चला गया. दोनों को उनके घर छोड़ा दोनों aunty's से मिला उनका आसीर्बाद लिया और घर बापिस लौट आया. और आज काफी थक गए थे इस लिए बीएड पैर फिरते hi नींद आगयी. और इसी तरह आने वाले कुछ दिन बहुत hi शांति और प्रेम से गुजर गए. हमारे ऊपर संकट मंडरा रहा था जिसे हम महसूस कर सकते थे. लेकिन में इसमें अपना कीमती समय जाया नहीं करना चाहता था. ये समय दोबारा नहीं आने वाला था इसलिए में उसे फुल एन्जॉय कर रहा था. और मैंने सोच लिया था की जब असुर सामने आएंगे तब देखूंगा की क्या करना है क्या नहीं. और मैंने एक अंतिम फैसला भी कर लिया था. जो मेरी आखिरी उम्मीद था. दिव्यास्त्र को असुरो के हाथो में जाने से रोकने के लिए. बाकि में सोच रहा था की ये करने का मौका कभी न आये. लेकिन अगर आज्ञा तो में पीछे नहीं हटूंगा.

बाकि देखते है की क्या होता है…..


तो बे कॉन्टिनुए………………..
 
अपडेट 90



शुक्राचार्य अपनी योजनाए बना चुके थे और अब था उन्हें आजमाने का वक़्त. जिसके लिए अग्नि वायु और जल के असुरो को पृथ्वी पैर भेज दिया गया था. नहीं बाकि की सेना को पाताललोक भेज दिया था. क्यों असली लड़ाई तो बही होने वाली थी. आकाश के असुर आकाश तक hi सीमित थे. वो पृथ्वी पैर फिलहाल नहीं आसक्ति थे. लेकिन आकाश में अपने कदमो को आगे बड़ा सकते थे. सब कुछ सही तरीके से अभी तक चल रहा था.

बही मुझे रात से hi कुछ अजीब से एहसास होने लगे थे. जिनका मतलब में अच्छे से समाज रहा था. मुझे लगने लगा था की जल्द hi असुर अपना वॉर करने वाले hai.raat जैसे तैसे काट गयी. और सुबह में अपने रूटीन से उठा एक्सरसाइज की ध्यान लगाया और रेडी होक नीचे पंहुचा तो पाया की बहा कोई नहीं है. मैंने माँ को आवाज लगा. लेकिन कोई जवाब नहीं आया. मैंने बाकिओ को आवाज लगाई तो रेनू सुरभि प्राची और आलिआ चारो नीचे आगयी. लेकिन दादू माँ ममी और मां इनमे से कोई बहार नहीं आया. मुझे कुछ गड़बड़ लग रही थी.

इसलिए में सबसे पहले माँ के कमरे के पास गया उनका दरवाजा खटखटाया. तो दरवाजा अंदर से लॉक था. मैंने उन्हें आवाज लगाई लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया. तो मैंने दिव्यास्त्र का आवाहन किया और में एक दम से गायब होक दरवाजे के आरपार चला गया और अंदर से दरवाजा खोल दिया. और जब कमरे में देखा तो पाया की माँ बिस्टेर पैर सो रही है. वो भी इतनी देर तक. ये साकेत अच्छे नहीं थे.

मैं जल्दी से बिस्टेर के पास गया. और माँ को हिलाया. लेकिन no रिस्पांस. मैंने उन्हें सीधा किया तो में क्या देखता हु. उनके चेहरे से बहुत सारा झाग निकल रहा है. और न hi उनकी सास चल रही है न उनकी डिल की धड़कने चल रही है.

ये सब देखकर में एकदम से जमीन पैर गिर गया. और मुझे ऐसे गिरते देख वो चारो मेरे पास आगयी. और जब उन्होंने माँ की हालत को देखा तो उनके भी होश उड़द गए.

आलिआ जल्दी से बहार भागी और ममी के कमरे में घुस गयी. सुरभि मां के और प्राची दादू के. उन्हें देखना था की बाकि सभी सही है या नहीं. मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था लेकिन कुछ तो करना था. इसलिए मैंने माँ के सर पैर हाथ रखा और जानने की कोसिस करने लगा की आखिर यहाँ हुआ क्या है.

और हाथ रखते hi में अचानक से रात में उस समय पहुंच गया जब ये सब सुरु हुआ था. माँ गहरी नींद में सो रही थी. तभी माँ को प्यास लगी और उन्होंने बही रखा हुआ पानी का गिलास उठाया और उसमे से पानी पी लिया और बापिस से सो गयी. और थोड़ी hi देर में माँ का सरीर अपने आप हिलने लगा जिससे उन्हें बहुत तकलीफ हो रही थी. और मेरे देखते hi देखते उनके मुँह से झाग निकल आया और उनके प्राण बही निकल गए.

ये सीन देखकर मेरी आँखों से ासु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. और कही न कही मुझे ऐसा होने की आशंका भी थी. की असुर ऐसा hi कोई घटिया रास्ता अपनाएंगे.

लेकिन फिलहाल मुझे पता करना था की ये आखिर कैसे हुआ. तो मैंने कमरे को स्कैन किया तो में देखकर हैरान था. घर के पानी के पाइप में पानी की जगह एक कला तरल पदार्थ बह रहा था. ये पदार्थ आखिर था क्या ये जानने के लिए मैंने अपनी आँखों को बंद करके अपनी तिरदये से उसे देखा तो में देखकर हैरान था की ये कैसे संभव हो सकता है. ये जो भी था. बहुत hi खतरनाक था. इसका कोई इलाज नहीं. और पल भर में बस मौत hi आणि है. ये था कालकूट की एक सबसे छोटी बून्द. जिसने पल भर में पुरे पानी को ज़हरीला कर दिया था.

मुझे समाज में नहीं आरहा था की ये सब कब किया गया होगा और कैसे. तो मैंने सोचा इसका पीछा करना चाहिए. तो मैंने अपना साइज छोटा किया और एक पानी के पाइप में घुस गया. जो हमारे बोरबेल से आता है. और इसका कनेक्शन टंकी से था. लेकिन जिस तरफ से पंज आया था वो इसका दूसरा छोर था. जो बोर की तरफ जारहा था. मैंने तेज़ी से उसका पीछा किया तो में बोर तक पहुंच गया.

मेरा अंदाजा सही था ये कला पानी बोर से hi आरहा था. इसलिए में तेज़ी से नीचे जाने लगा. मुझे देखना था की ये धुआँ कोण निकाल रहा है. और जैसे hi में नीचे पंहुचा. मतलब की पूरा नीचे नहीं. बहा तक जहा तक पानी भरा हुआ था. तो बहा पैर एक नाग महाराज तैर रहे थे. जो पानी में अपना ज़हर फैला रहे थे. मैंने उनका असली रूप देखने के लिए अपने तिरदये को ओपन किया तो मेरे सामने गुरु शुक्राचार्य थे. मतलब की इन्हिने ये विश फैलाया है. यकीन नहीं हो रहा था मुझे अपनी आँखों पैर. ये इतना कैसे गिर सकते है. एक दिव्यास्त्र के लिए.

इसके बाद वो बहा से उसी पानी के रस्ते से नीचे जमीन में चले गए. और मैंने भी उनके पीछे पीछे बही चला गया.

पानी काफी गहरा था. लेकिन वो आसानी से उसमे जा रहे थे. और में भी उनके पीछे पीछे चला जा रहा. आगे चलकर एक छोर आया जहा से आगे जाने का कोई रास्ता नहीं था. बहा पैर पथरो से पानी रिस रहा था. तो शुक्राचार्य ने फिर से अपना रूप बदला और वो एक सूक्ष्म जीव बन गए और जहा से पानी रिस रहा था उसी रस्ते में बापिस से घुस गए. और में भी उनके पीछे पीछे उसी अपने साइज को बहुत hi सूक्ष्म करके उसके पीछे पीछे चला गया.

काफी लुम्बा रास्ता तय करने के बाद हम एक नदी से बहार निकल आये. जहा शुक्राचार्य ने अपना असली रूप लिया और फिर बहा से गायब हो गया.

और ये देखकर में हैरान रह गया. ये बात मुझे भी समाज में नहीं आई की ऐसा कैसे हो गया और क्यों. अगर शुक्राचार्य गायब हो सकते थे तो वो उसी पानी के बोर मेसे hi क्यों नहीं हो गए. यहाँ तक क्यों आये वो.

मेरे मन में ये सवाल आया. और इसका जवाब भी मुझे तुरंत hi मिल गया. बो भी मेरे सामने.

मेरे सामने जहा से शुक्राचार्य गायब हुए थे. बहा पैर उनके जाने के बाद हवा में अपने आप कुछ लिखने लगा. जिसे मैंने पड़ना सुरु किया.

" में जनता हु तुम यहाँ तक जरूर पहुंच जाओगे देव. इसीलिए तुम्हारे लिए मैंने यहाँ एक सन्देश छोड़ा है. जो ये है की. अगर तुम अपने परिवार वालो को फिर से जीवित देखना चाहते हो, जो तुम बकै में चाहते HI हो. तो पाताललोक आजाओ और दिव्यस्त्र को मुझे सोप दो. में वचन देता हु की तुम्हारी माता और तुम्हारे बाकि के परिवार के सरीर से इस कालकूट को में बापिस से खींच लूंगा और वो सभी फिर से जिन्दा हो जाएँगी. और अगर उन्हें जीवित नहीं देखना चाहते हो तो तुम्हारी मर्ज़ी. लेकिन है ये तो केवल शुरुवात है. शाम तक ये ज़हर पूरी पृथ्वी पैर में फैला दूंगा अगर तुमने यहाँ आने का जल्दी HI निर्णय नहीं लिया था. समस्त पृथ्वी बसी ऐसे HI तड़प तड़प कर मर जायेंगे वो भी तुम्हारी आँखों के सामने और तुम इसे रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर पाओगे. न HI वो दिव्यस्त्र. अगर तुम इस ज़हर को अपने अंदर सामने की कोसिस करोगे. तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी और ये मेरे लिए और भी अच्छी बात है. इसकिये अब फैसला तुम्हे करना है.."

ये सब पढ़कर मेरा दिमाग घूम गया. मुझे समाज में नहीं आरहा था की में क्या करू. इनकी चौँठी को स्वीकार करके बहा जाऊ या यही रहकर सबकी रक्ष के इंतजाम करू. ये पागल हो गए है और ऐसा करने में इन्हे जरा भी देर नहीं लगेगी ये बात में समाज गया था. इसलिए मुझे जो भी करना था जल्दी hi करना था. यही सोच कर मैंने अपनी आँखों को खोल लिया और अब में करंट सिचुएशन में आज्ञा था. जहा माँ बेजान बिस्तर पैर लेती हुई थी. और बाकि चारो मुझे धयान से उठाने का प्रयास कर रही थी.

मैंने अपनी आँखो को खोला और उनकी तरफ देखा. वो चारो रो रही थी. हम सभी के ासु रुकने का. नाम नहीं ले रहे थे. मुझे अब कुछ करना था. जो बहुत hi खतरनाक हो सकता था मेरे लिए. लेकिन मुझे ये करना था किसी भी हालत में.

इसलिए मैंने फिर से माँ के सर पैर हाथ रखा और अपनी आँखों को बंद किया. और महादेव का नाम लेकर उस ज़हर को माँ के सरीर से निकलना सुरु किया. मेरी तिरदये ज़हर को माँ के सरीर के हर कोने से खींच कर मेरे अंदर खींचने लगी थी. ज़हर पुरे सरीर में फ़ैल चूका था. लेकिन इसे निकलना जरुरी था. तभी कुछ हो सकता था. थोड़ी hi देर में माँ के सरीर का सारा ज़हर मेरे अंदर आचुका था. और माँ का सरीर जो नीला पद गया था. अब फिर से अपने असली रंग में लौटने लगा था. और शुक्राचार्य की बाटे औंकार मुझे यकीन हो गया था की कोई भी मारा नहीं है अभी. क्युकी मरे हुए इंसान को ज़िंदा करना आसान नहीं है. सायद ये सब मुझे डरने के लिए था. बाकि तो महादेव की मर्ज़ी. मुझसे जो हो सकता था वो मुझे करना था.

माँ के बाद में ममी के कमरे में गया और उनके सरीर से भी मैंने ज़हर को धीरे धीरे निकाल लिया. और फिर ऐसे hi दादू और मां के सरीर से भी. और ज़हर वाला पानी हमने भी पिया था लेकिन उसका असर हम पैर नहीं हुआ था. इसलिए मुझे उम्मीद थी की में इसे सेहन कर सकता हु. और इसीलिए मैंने सारा ज़हर अपने अंदर समां. लिया.

और अब असली परेशानी सुरु हुई. ज़हर मेरे दिमाग पैर सीधा असर कर रहा था. में कंसन्ट्रेट नहीं कर प् रहा था. मेरा सरीर नीला पड़ने लगा था. लिखे पूरा सरीर. और ज़हर को काबू करने के लिए मुझे कंसंट्रेशन की सख्त जरुरत थी. लेकिन में नहीं कर प् रहा था. मेरी आँखों से मुझे धुंदला दिखना भी सुरु हो गया था. मेरे हाथ पेअर जाम होने लगे थे. थोड़ा बहुत ज़हर तो में झेल सकता था लेकिन इतना नहीं. और ये उसी का परिणाम था.

इसलिए अब इस सिचुएशन से केवल महादेव hi मेरी सहायता क्र सकते थे.

इसलिए में बही नीचे बैठ गया. वो चारो मुझे सँभालने की कोसिस कर रही थी. में बैठ नहीं प् रहा था. इसलिए प्राची ने मुझे पीछे लुड़कने से पकडे हुए था. और आगे से रेनू ने मुझे संभाला हुआ था. आलिआ मेरी गार्डन को पकडे हुए थे. जो बार बार लटक रही थी. और सुरभि इन सबकी मदद कर रही थी.

मुझे अभी भी होश था. इसलिए मैंने अपनी आँखों को बंद किया जो अपने आप hi बंद हो गयी थी. और बंद होते hi मैंने मन में अपने मंत्र का जाप करना सुरु किया. मेरा अंतर्मन बहुत hi मुश्किल में था. उसे तिरदये तक पहुंचने का रास्ता नहीं मिल रहा था. मेरे अंदर हमेशा जो उजाला रहता था वो अब अन्धकार में बदलने लगा था. लेकिन में जनता था की यही एक रास्ता है मेरे ठीक होने का. और में बही कर रहा था.

मैं लगातार मंत्र का जाप कर रहा था मन में. मेरे होंठ काँप रहे थे. आवाज निकलना बंद हो गयी थी.

में पूरी तरह से खो गया था अपने ध्यान में. या में सो गया था पता नहीं. तभी मेरे मन में एक छोटी सी लौ जलनि सुरु hui.or उसके जलते hi मुझमे एक दम से जान बापिस आने लगी. इस लौ के उजाले में मन को रास्ता मिल गया. और मेरा कंसंट्रेशन फिर से बापिस आने लगा. और जैसे थी तिरदये ओपन हुई. उसके बाद तो जैसे अंदर उजाले की भरमार होने लगी. सारा अन्धकार पल भर में गायब होने लगा. और मेरी हालत ठीक होने लगी. जैसे मुझे फिर से होश आज्ञा हो. और ऐसा होते hi. में अपने ध्यान को फिर से आगे बढ़ाने laga.or ज़हर को सरीर में नुकसान करने से रोकने लगा. और ज़हर को खींच कर एक जगह पैर एकता करने लगा. मेरे सरीर का रंग धीरे धीरे नार्मल होने लगा. जिसे देखकर बाकि सभी की चिंता मिटने लगी. और उन सभी के ासु साफ़ होकर चेहरे पैर मुस्कान बापिस आने लगी.

अब मुझे ये समाज में नहीं आरहा था की इस ज़हर का में करू क्या. इसे होने अंदर रखना घातक हो सकता है. बहुत hi घातक. और बहार रखना उससे भी घातक. में इसे गले में नहीं रोकना चाहता था. वर्ण लोग मेरी तुलना महादेव से करने लगेंगे जो में नहीं चाहता था. तभी मैंने सोचा इसे फिलहाल अंदर रखना hi बेहतर है. बाकि बाद में देखूंगा. इसलिए मैंने पुरे ज़हर को अपने दाहिने पेअर के अंगूठे में स्टोर कर किया. और उसके असर से मेरा पूरा अंगूठा नीला पद गया था. लेकिन ये सही जगह थी. इससे ये किसी की नजरो में hi नहीं आएगा. बाकि सभी जगह ये किसी न किसी को दिख hi जायेगा. और ऐसा करते hi मैंने अपनी आँखों को खोल लिया. और आँखे खोलते hi वो चारो मुझसे लिपट गयी.

मैंने उन्हें सांत्वना दी की सब ठीक हो जायेगा.

और में खड़ा हो गया.

मैं- सुनो काम अभी सुरु हुआ है. आप सभी अपने अपने ांसो के स्थान पैर पहुंचे जल्दी और बहा पैर ये ध्यान रखे की कोई भी ये ज़हर फैला न पाए. अगर किसी तरह फैला भी दे तो. आपको अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने से इस ज़हर को फैलने से रोका है. याद रहे आप उसे अपने सरीर के अंदर मत लेना. जैसे पानी में फैले तो. उतने पानी को एक साथ करना और अपनी शक्तियों से उसे रोके रखना फैलने मत देना. समझ गयी सभी.

ये सुनके उन्होंने अपनी गार्डन हिलाई.

मैं- और है आप सभी का इन्तजार बहा पैर वो अमर वाले असुर कर रहे होंगे इसलिए सावधान रहना और उन्हें खुद पैर हावी नहीं होने देना है. वो हो सकता है ज़हर को फ़ैलाने की पूरी कोसिस करेंगे लेकिन तुम्हे बैसा नहीं होने देना है.

आलिआ- सबसे पहले एक काम करो. इन अमर असुरो को परलोक भेज दो. ताकि यहाँ का संकट हैट जाये. हम चारो मिलकर ब्बि उनका सामना नहीं कर पाएंगे. बस उन्हें रोक सकते है वो भी ज्यादा देर तक नहीं. लेकिन तुम्हारे पास दिव्यस्त्र है जो उनकी कमजोरी है. तो उसका इस्तेमाल करो और ख़त्म कर दो सबको. उसके बाद आगे की सोचेंगे.

ये सुनके मैं हैरान था की ऐसा मैंने क्यों नहीं सोचा.

मैं- सही कहा. ये मैंने क्यों नहीं सोचा. फालतू में उनको इतना भाव क्यों देना.

रेनू- देव माँ और बाकिओ का क्या होगा. क्या वो उठेंगी

ये सुनते hi में शांत हो गया.

लेकिन बोलना भी था मुझे इसलिए हिम्मत करके बोल उठा.

मैं- मुझे नहीं पता है. बस यकीन रखो सब ठीक हो जायेगा. महादेव सब ठीक करेंगे.

उसके बाद हम सभी एक साथ अपने दिव्यास्त्र वाले रूप में आगये. उसके बाद मैंने दिव्यस्त्र से विनती की उन सभी असुरो का स्थान बताने की. जो आपकी शक्तियों से अमर बनने का ढोंग कर रहे है. 5 तो मेरी क़ैद में hi थे. बाकि के बहार घूम रहे थे.

तो मुझे सबसे पहले बायु बालो का पता मिला. और में उड़द गया तुरंत hi. वो और कही नहीं. मेरे घर के ऊपर hi उड़द रहे थे. मुझपर नजर रखने के लिए. और जैसे hi मुझे उन्होंने ऊपर आते देखा सबकी हालत बिगड़ने लगी. और वो भागने का प्रयास करने लगे. तो मैंने दिव्यस्त्र को आगे कर दिया. और ऐसा करते hi वो जहा थे बही के होक रह गए. वो बायु थे जिन्हे कोई क़ैद नहीं कर सकता था. लेकिन बायु देव ऐसा कर सकते है. और बही यहाँ हुआ. वो चारो जिन्दा थे लेकिन केवल आँखों से. उनका बाकि का सरीर बेजान हो गया था.

में उनके करीब गया और उनसे कहा.

मैं- बहुत हो गया तुम सभी का. अब फिर से हमेशा के लिए सोने का वक़्त आज्ञा है. आखिरी समय माहादेव का स्मरण कर लो. सायद मोक्ष मिल जाये.

ये कहके मैंने अपने मन में बही सोचा और दिव्यस्त्र ने उसके अगले hi पल अपने अंदर से कुछ निकला नहीं. बल्कि उन सभी की शक्तियों को अपने अंदर खींच लिया. और शक्तिया जाते hi वो अपने असली रूप में आज्ञा. जो बेजान जमीन पैर गिरने लगा था. लेकिन यहाँ भी इनकी किस्मत ख़राब की ये मेरे कवच से जा टकराई और पल भर में जल कर रख हो गए.

इसके बाद मैंने प्राची को बुलाया और उससे कहा की उसका रास्ता अब साफ़ है. नजर रखो.

और में बाद गया जल असुरो की तरफ. वो भी सेहर की झील में रुके हुए थे. जहा से सरे सेहर को पानी सप्लाई होता है. और अपने आदेश का इन्तजार कर रहे थे. और जैसे hi मैं पानी में गिरा उन सभी को पानी के अंदर hi बहुत hi बड़े बड़े बिजली के झटके लगने लगे. और ऐसा होना लाजमी भी था. उनके बस प्राण नहीं निकल रहे थे. बाकि तकलीफ उन्हें फुल हो रही थी. और मैंने फिर से मन में सोचा और दिव्यस्त्र ने इन सभी को भी शक्तिया चीन ली अपने अंदर. और उसके बाद का काम बिजली ने कर दिया. बिजली ने उन्हें पानी के अंदर hi जला कर रख कर दिया. जो मुमकिन नहीं था. इसलिए बिजली ने उन्हें पानी से ऊपर हवा में उछाला और बही पैर उनका काम ख़तम.

अब बरी थी अग्नि ाँस की. और बहा जाने से पहले मैंने सुरभि को बुलाया और नजर रखने को कहा.

और में निकल गया अग्नि ाँस की तलाश में. जिन्होंने इस वक़्त सेहर की एक फैक्ट्री को जलाया हुआ था. और खुद बहार भीड़ में दर्शक बने खड़े होक तमाशा देख रहे थे. मैं नीचे नहीं गया. ऊपर hi रहा और बही से दिव्यस्त्र ने उनकी शक्तिया खींच ली. जिसके बाद वो बही भीड़ में hi बेजान होक गिर गए. और किसी का ध्यान भी नहीं गया उन पैर. बेचारे इतने खतरनाक असुर और इतनी आसानी से मारे जा रहे थे. और फिर गया में आकाश में. पैर अगेन बहा जाने से पहले रेनू को यह बुला लिया और इस आग को शांत करने को कहा. रेनू बही भीड़ में कड़ी हुई और पल भर में साडी आग को बही के बही शांत कर दिया. और उस आग से उन अग्नि असुरो के सरीर को पल भर में भस्म कर दिया.

और में निकल गया पृथ्वी से बहार. जहा वो दोनों असुर बस मेरा hi वेट कर रहे थे. पृथ्वी से बहार निकलते hi उन्होने एकदम से मेरे ऊपर कोई जाल जैसा फेक दिया. जिसने मुझे जकड लिया. मैंने अपने हाथ पैरो का इस्तेमाल किया लेकिन काम नहीं बना तो. दिव्यस्त्र का इस्तेमाल करना पड़ा. और दिव्यास्त्र ने इतनी तेज़ कम्पन्न से साउंड वेव्स निकलना सुरु किया की उसके प्रभाव से वो जाल थोड़ी hi देर में टूट कर बिखर गया. स्पेस में साउंड नहीं होता है. लेकिन अगर हो जाये तो तबाही ला सकता है. और इसी लिए बहा साउंड नहीं होता है.

उस साउंड वेव्स की चपेट में वो दोनों भी आगये. और उछाल कर दूर का गिरे. और उठकर संभल पते उससे पहले hi दिव्यस्त्र ने अपना काम कर दिया. पल भर में उनके बेजान सरीर स्पेस में तैरने लगे. और अगला काम किया मेरे तिरदये ने. पल भर दोनों के सरीर को रख में बदल दिया. अब नाचे थे मेरे क़ैद वाले असुर तो मैंने अपनी आँखों को बंद किया और दिव्यस्त्र से आवाहन किया उनको नस्ट करने का. और उसमे बाद उन को बहार निकलने की भी जरुरत नहीं पड़ी. दिव्यास्त्र ने उन्हें उनकी क़ैद में hi नस्ट कर दिया.

अब सरे अमर असुर ख़त्म हो चुके थे. और अब बरी थी इन सबके गुरु की जो मेरा इन्तजार पाताललोक में कर रहे थे.

लेकिन बहा जाऊ या नहीं यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम मेरे सामने थे. डिल कह रहा था की जाऊ और दिमाग कह रहा था की न जाओ. क्युकी अब यहाँ की सिचुएशन संभल चुकी थी. इसलिए में बहा न जाऊ. लेकिन फिर से बिगड़ने में समय नहीं लगेगा ये मेरा डिल कह रहा था. और माँ और बाकि सभी को भी ठीक करना था. जिसके बारे में केवल शुक्राचार्य hi जानते थे. इसलिए मुझे बहा जाना hi चाहिए. और अगर उन्होंने पूरी पिथवी पैर ज़हर छोड़ दिय तो पता नहीं में उसे रोक पाउँगा भी या नहीं. इसलिए सब ठट्यौ पैर सोचने के बाद मैंने बहा जाने का निर्णय लिया. और में आगे बड़ा hi था की मुझे गुरुदेव की आवाज सुनाई दी.

अब देखते है की गुरुदेव क्या कहते है देव से. और देव क्या करेगा गुरुदेव की बातो को सुनकर……………..



तो बे कॉन्टिनुए……………….
 
आपने सही कहा अपनी बूढी का इस्तेमाल hi देव को आगे बढ़ने में मदद कर सकता है. बाकि असुर तो पूरी कोसिस में है की देव की लीला यही समाप्त कर दे अब देखना ये है की असुर कितने कामयाब होते है और देव कैसे इन मुस्किलो का सामना करता है.

एंड थैंक्स फॉर थी कॉम्पलिमेंट बीआरओ... अपना साथ ु hi बनाये रखे.....

कीप सपोर्टिंग.........
 
अपडेट 91



गुरुदेव की आवाज सुनकर में रुक गया. तो उन्होंने मुझे पीछे मुड़ने को कहा और जब में मुदा तो वो मेरे सामने खड़े हुए थे. मैंने उन्हें बही पैर प्रणाम किया.

गुरुदेव- विजय भाव वत्स. सफलता तुम्हारे कदम चूमे. तुम्हे कोई भी परास्त नहीं कर पाए.

मैं- धन्यबाद गुरुदेव. आपके आसीर्बाद की मुझे सख्त जरुरत थी

गुरुदेव- में जनता था इसीलिए तो यहाँ आया हु.

मैं- गुरुदेव मेरी माँ ममी और बाकि का क्या होगा. क्या वो जीवित हो सकते है अब

गुरुदेव- तुम अपनी तरफ से जितनी कोसिस कर सकते थे तुमने की है वत्स. अब निराश मत हो. महादेव पैर भरोसा रखो वो जो भी करेंगे वो अच्छा hi होगा.

मैं- इसी के भरोसे तो में अभी तक जीवित खड़ा हुआ हु. वर्ण मेरे प्राण तो कबके निकल गए होते.

गुरुदेव- ऐसा नहीं कहते बचे. सब ठीक हो जायेगा.

मैं- में बस यही सुन्ना चाहता था. अब मुझे जाना होगा गुरुदेव. शुक्राचार्य के पास.

गुरुदेव- में तुमसे कुछ मांगना चाहता हु वत्स.

ये सुनके मेरे कान एक दम से खड़े हो गए. और मैंने गुरुदेव की तरफ देखा.

मैं अपने घुटनो पैर अपने हाथो को जोड़ कर बैठ गया.

मैं- आज्ञा करे गुरुदेव.

गुरुदेव- वत्स में चाहता हु तुम किसी भी हालत में इस दिव्यस्त्र को शुक्राचार्य के हाथ नहीं लगने दो. फिर चाहे इसके लिए तुम्हे कुछ भी क्यों न करना पड़े. तुम वो करो. परन्तु ये दिव्यस्त्र उनके हाथो में नहीं लग्न चाहिए. और हो सके तो जीवित लौटने का प्रयास करना vats.mujhe वचह्न दो वत्स की तुम मेरे बचने का पालन करोगे. में तुमसे अपनी गुरुदक्षिणा में ये वचन चाहता हु.

ये सुनके मैंने उनकी तरफ देखा तो उनका चेहरा एक दम सख्त बना हुआ था. जैसे वो जान गए थे की मेरे बहा जाने पैर क्या होने वाला है.

मैंने अपनी आँखों को बंद किया और एक लुम्बी सास छोड़ी और फिर आँखों को खोल कर उन्हें देखा और फिर बोलना सुरु किया.

मैं- गुरुदेव आपके द्वारा कहे गए हर वचन का में पालन करूँगा. ये मेरा वचन है aapko.me दिव्यस्त्र को शुक्राचार्य के हाथो में नहीं लगने दूंगा फिर चाहे इसके लिए मुझे अपने प्राणो का बलिदान hi क्यों न देना पड़े. ये दिव्यस्त्र या तो मेरे पास hi रहेगा या फिर से इस ब्रह्माण्ड में विलीन हो जायेगा.

गुरुदेव- मुझे तुमसे यही उम्मीद है वत्स. अगर तुमने अपना ये वचन निभाया तो तुम गुरु दक्षिणा के बंधन से मुक्त हो जाओगे. अब उठो और विनाश कर दो उन सभी असुरो का जो आपने आप को भगवन से बड़ा समझने लगे है. और अपनी कीर्ति को विश्व में फैला दो.

विजयी भाव वत्स………..

ये कहके वो गायब हो गए में अपनी मुंडी को नीचे hi करके बैठा रहा. और फिर मुंडी को ऊपर करके में खड़ा हुआ. और अपने दिव्यास्त्र को अपने हाथो में पकड़ा और उसे गौर से देखा और उससे मुझे पातळ लोक ले चलने को कहा.

और ऐसा कहते hi में बहा से गायब हो गया. और सीधा निकला पाताललोक में. जहा का वातावरण बकै में काफी भयानक था. चारो तरफ से मनहूसियत की गंध आरही थी. दीवारों पैर अजीब से जानवर चिपके हुए थे जो मुझे अपना खाना बनाने के लिए बेकरार दिख रहे थे. लेकिन में उनसे बिना डरे आगे बढ़ता गया. और थोड़ा आगे चलने पैर मुझे दो असुर दिखाई दिए जो मुझे देखकर खड़े हो गए. और फिर हस्ते हुए मेरी तरफ आये.

ा1- तो ये वो बचा है. बिचारा आज मोक्ष को प्राप्त हो जायेगा. आप बचे हमारे साथ. गुरुदेव तुम्हारा इन्तजार कर रहे है.

ये कहके वो आगे चलने लगे और में उनके पीछे पीछे.

में चारो तरफ का माहौल देख रहा था. जहा सभी असुरो के मुँह से कार टपक रही थी मुझे देखकर. पता नहीं ये यहाँ कैसे रहते है. अच्छा है की ये पृथ्वी पैर नहीं है. वर्ण एक रात में hi पृथ्वी को पाताललोक बना देंगे.

खैर वो दोनों मुझे एक महल के अंदर ले गए जिसके बहार भरी मात्रा में असुर खड़े हुए थे. होने हथियारों के साथ. और महल क्र अंदर एक बचा सिंघासन पैर बैठा हुआ था. जिसे देखकर hi में समाज गया की ये मेधावी hi हो सकता है. और उसी के बाजु में शुक्राचार्य बैठे हुए थे. जिनके चेहरे पैर एक विजयी मुस्कान थी. और ऐसी hi मुस्कान बहा मौजूद हर किसी के मुख पैर बानी हुई थी.

ब्रह्मिन होने के नाते मैंने शुक्राचार्य को प्रणाम किया.

शुक्राचार्य- बहुत hi अच्छा निर्णय लिया है तुमने देव यहाँ आकर. अब बिना समय को बर्बाद किये दिव्यस्त्र को मेरे हवाले कर दो. और में तुम्हे वो औसधि का नाम बताऊंगा जिससे तुम अपने परिवार को पुनः जीवित कर सकते हो. उनके सरीर से ज़हर तो तुम निकाल hi चुके हो. जिसे देखकर बकै में मुझे बहुत हैरानी हुई थी. की इतना ज़हर ग्रहण करने के बाद भी तुम जीवित बच गए. लेकिन कैसे बचे ये मुझसे बेहतर तुम जानते hi हो. और अगर मैंने और ज्यादा मात्रा में ज़हर फैला दिया तो तुम भी उसे नहीं रोक पाओगे.

ये सुनके मेरे चेहरे पैर एक मुस्कान आगयी. और में बोलै उन्हें.

मैं- आप एक गुरु है और एक ब्राह्मण भी. फिर भी असत्य बोलते हुए आपको जरा भी लज्जा नहीं आती. आएगी भी कैसे. जब सांगत hi ख़राब हो तो बचे को दोष देना अज्ञानता होती है. आप असुरो के गुरु नहीं. बल्कि असुर आपके गुरु बन गए है. आपको इन्हे शिक्षा देनी थी लेकिन अब ये आपको सीख्शा देते है. आपको इन्हे बदलना था लेकिन उन्होंने आपको बदल दिया. और आज सारा संसार आपको स्मरण भी नहीं करता है. केवल आपके इस फैसले की बजह से.

ये सुनके उनका चेहरा एक दम से उतर गया. और उनके चेहरे पैर गुस्से के भाव आने लगे. जो आज फटने वाला था.

शुक्राचार्य- है तुम्हारी बातो में बहुत सच्चाई है देव. असुर hi अब मेरी पहचान है. लेकिन मैंने ये खुद नहीं चुनी थी. बल्कि मुझे चुनने पैर मजबूत किया था. उन देवताओ ने. जिन्होंने मुझे नहीं मेरे भाई को अपना गुरु बना लिया था. और मुझे दर दर की ठोकर खाने को विवस कर दिया था. उस समय असुरो ने मेरा साथ दिया था. और फिर मैंने प्राण लिया था की इनके लिए जो भी सही होगा में वो करूँगा में फिर चाहे वो स्वयं भगवन के खिलाफ hi क्यों न ho.or मुझे गर्व है की मैंने अपने प्राण को बखूबी निभाया है अभी तक.

मैं- गुस्से और जलन ने आपको अँधा बना दिया है. आप देव गुरु इसलिए नहीं चुने गए थे क्युकी आप उसके काबिल नहीं थे. आप में कुछ कमिया थी जो आज सबके सामने है स्वयं आपके भी. फिर भी आपने अभी तक सत्य को स्वीकार नहीं किया है.

ये सब सुनके मेधावी को मिर्ची लग गयी और वो अपने सिंघसन से खड़ा हो गया और बोलै.

मेधावी- सावधान देव. तुम हमारे गुरु का अपमान कर रहे हो. जो हम कटाई वर्दास्त नहीं करेंगे. ये मेरी अंतिम चेतावनी है तुम्हारे लिए. इसलिए अच्छा होगा की चुपचाप दिव्यस्त्र को गुरुदेव को सौंप दो और निकल जाओ यहाँ से. वर्ण में भी फिर कुछ नहीं कर पाउँगा. क्युकी यहाँ मौजूद हर सख्स तुम्हारा खून पीने के लिए बेकाबू हो रहा है.

मैं- है में जनता हु ये बात बहुत अच्छे से. लेकिन अफ़सोस लगता नहीं की आज इनमे से किसी का भी ये स्वप्न सच होगा. और रही बात दिव्यास्त्र को सपने की तो भूल जाओ इसे. में यहाँ इसे सपने नहीं आया हु. बल्कि एक अंतिम चेतावनी देने आया हु सभी को. की अभी समय है सुधर जाओ. वर्ण बाद में मुझे नहीं लगता की में कुछ कर पाउँगा तुम सबकी भलाई के लिए.

ये सुनकर शुक्राचार्य का चेहरा गुस्से से लाल होने लगा और बाकि के असुर हसने लगे वो भी जोर जोर से. जैसे मैंने कोई जोके सुनाया हो उन्हें.

तभी शुक्राचार्य ने जोर से चिल्ला कर सभी को shan't करवाया और मुझसे बोले.

शुक्राचार्य- क्या ये तुम्हारा आखिरी फैसला है.

मैं- है

शुक्राचार्य- सोच लो.

मैं- सोच लिया. में जनता हु आपके पास अब कालकूट नहीं बचा है. जितना था वो सब आप मेरे परिवार के ऊपर इस्तेमाल कर चुके हो. और अब आपके पास केवल एक hi रास्ता है मुझे यहाँ से जाने दो. वर्ण यहाँ तांडव सुरु हो जायेगा. जिसमे किसी और का नहीं बल्कि आपका और आपके प्रिये इन असुरो का विनाश hi होगा.

.ये सुनके उनके चेहरे पैर एक मुस्कान आगयी और फिर वो होने सभी असुरो से बोले.

शुक्राचार्य- मेरे सिसयो जरा इस बालक को बताओ की असुरो से टकराने का क्या अंजाम होता है. इसे असुरो की असली ताकत को दिखाओ.

ये सुनते hi बहा मौजूद असुर मुझे सीरियस देखने लगे और मेरी तरफ बढ़ने काज चारो तरफ से. मुझे एक घेरे में बंद कर लिया था उन सभी ने.

और में जनता था की अब मुझे क्या करना है. मैंने दिव्यस्त्र का ाबहन किया और ऐसा करते hi मेरे हाथो में वो आज्ञा और आते hi इतनी भयंकर रौशनी पैदा की जिसमे लगभग सभी अंधे hi हो गए. और यही वो मौका था जिसका मुझे लाभ उठाना था. किसी को कैच भी नहीं दिख रहा था. और इसी मौके का फायदा उठा कर मैंने दिव्यास्त्र की विनाश करि शक्तियों का आव्हान किया और बहा मौजूद हर असुर के ऊपर उनका प्रयोग. दिव्यस्त्र ने अपने अंदर से आग का ऐसा मिक्सर निकला जिसमे पूरा का पूरा महल hi पिघलने लगा. और बहा मौजूद सरे असुर इस अग्नि में जलने लगे. चारो तरफ से चीखो के शिव कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. तभी शुक्राचार्य ने अपने कमंडल से जल निकाल कर उसपर कोई मंत्र पड़ा और उसे महल में छोड़ दिया. और ऐसा करते hi जो रौशनी उत्पन्न हुई थी वो नहीं पैर समाप्त हो गयी. और अब सभी असुरो को दिखने लगा की ये अग्नि कहा से आरही है. और वो उसकी उलटी दिशा में भागने लगे. और तभी शुक्राचार्य ने अपने हाथो से एक पानी की लहर को निकलना सुरु किया और पानी पड़ते hi आग ठंडी पड़ने लगी. ये सब इस जगह का असर था जो उनके जादू इस अस्त्र पैर भरी पद रहे थे. ये बात सभी अच्छे से जानते थे.

जैसे hi आग निकलना बंद हुआ तो बहा पैर असुरो की संख्या आधी से भी काम रह गयी थी. और ये देखकर मेधावी को गुस्सा आज्ञा और और वो बही से उड़ता हुआ मेरे तरफ आया उसके हाथो में एक तलवार थी. और उसने मुझे पैर उसका वार कर दिया. लेकिन अस्त्र ने उसे रोक दिया. उसके बाद मैंने अस्त्र से एक तलवार बनने को कहा और ऐसा कहते hi वो एक तलवार में बदल गया. और फिर शुरू हुआ मेरा और मेधावी का युद्ध. बाकि सभी केवल तमाशा देख रहे थे. मेधावी एक चपल तलवार बाज़ था. मेरे हर वॉर को वो अच्छे से जनता था. इसलिए उसे रोक दे रहा था. और उसमे वरो को में. लेकिन वो बाहत तेज़ी से हमला कर रहा था. मेरी नजर यहाँ के प्रभाव से कमजोर पड़ने लगी थी. और मेरी स्पीड भी. जिसकी बजह से वो मुझपर भरी पड़ने लगा था. न चाहते हुए भी. और यही मौका देखकर मेधावी ने बड़ी होशियारी से

मेरे सरीर पैर कुछ खास जगहों पैर तलवार चला दी. जिस बजह से मेरा खून निकलने लगा. और मेरा सरीर और कमजोर पड़ने लगा. एक बार मेरे राइट हैंड पैर था जिस बजह से मेरा हाथ आप आसानी से मूव नहीं कर प् रहा था. और मेधावी एक के बाद एक वॉर मुझाएर करते hi जा रहा था. और बार बार अधीरा का नाम ले रहा था. और कह रहा था की ये उनके लिए hi है. बाकि बचे असुर ये सब तमाशा देख कर कृषि मन रहे थे. और शुक्राचार्य के चेहरे पैर भी एक कुटिल मुस्कान आ गयी थी मेरी हार देख कर.

तभी मौका देखकर मेधावी ने मुझे एक किक मरी जिससे में थोड़ी दूर जेक गिरा. और मुझे सँभालने का थोड़ा मौका मिल गया.

मैं- कराहते हुए. आह्ह्ह्ह अपने बाप का बदला ले रहे हो. बिचारा उसे पता भी नहीं चला की कब उसका सरीर रख में बदल गया. और मुझे उम्मीद है तुमने उनकी अस्थिया उठा ली होगी बहा से. वर्ण बेचारे को शांति नहीं मिलेगी. क्यों उठा ली थी न.

ये सुनके उसका चेहरा देखने लायक था. किसी रट हुए बचे की तरह हो गया था. और ये सब सुनके वो और भड़क गया जो में चाहता था. और वो तेज़ी से मेरी तरफ दौड़ते हुए आया. और जैसे hi उसने मेरी गार्डन पैर तलवार चलने के लिए उठाई उसी समय में घूम गया और उसका निशाना चूक गया. और वो कुछ करता उसके पहले hi मेरी तलवार उसके सीने में घुस गयी और आर पार निकल गयी. और आगे कोई और कुछ समझता उससे पहले hi मैंने तलवार को ऊपर की तरफ सरका दिया. वो भी पूरी ताकत से. जिससे सीने से लेकर उसकी खोपड़ी तक का हिस्सा दो भागो में बात गया. और ये सब इतनी जल्दी हुआ की किसी को कुछ समझने का मौका hi नहीं मिला. और सभी को दिखा तो बस मेधावी का सरीर जो जमीन पैर बेजान पड़ा हुआ था. और इतना खून बहा रहा था जितना कोई सोच भी नहीं सकता था.

बहा मौजूद सभी की आँखे फटी की फटी रह गयी. किसी को विस्वास नहीं हो रहा था की उनका रहा इतनी बुरी मौत मारा जायेगा. और इतना वक़्त काफी था मेरे जख्मो को भरने के लिए. शुक्राचार्य की आँखों से ासु निकल आये थे ये सीन देखकर. और बाकि सभी की फैट कर हाथ में आगयी थी. की अब क्या होने वाला है ये सोच कर hi सबकी धड़कने बढ़ने लगी थी.



तो बे कॉन्टिनुए……………….
 
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