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आलिआ- अब क्या सोच रहे हो. जल्दी फैसला करो की क्या करना है.
मैं- तुम दोनों ने मुझे कंफ्यूज कर दिया और अब कहती हो की जल्दी फैसला करो. थोड़ा रुको मुझे फिर से ध्यान लगाना होगा. में एक बार कन्फर्म हो जाओ फिर hi आगे का सफर तय करेंगे.
सुरभि- ठीक है लेकिन जल्दी करो.
मैं- ठीक है. यही रुको में आता हु.
ये कहके मैंने उन दोनों को बही ऊपर छोड़ा और में उड़ता हुआ गया सीधे समुद्र की गहराई me.vo भी स्पीड से. जहा इस वक़्त हम थे वो जगह बरमूडा ट्रायंगल से थोड़ी सी दुरी पैर थी. और में पानी के अंदर से hi ाँस का पता लगाना छह रहा था ताकि कोई भी शक को गुंजाईश न रहे. समुद्र काफी जहर था में कब से नीचे जा रहा हु लेकिन अभी तक पंहुचा hi नहीं tha.jabki अच्छी खासी स्पीड से जा रहा था.
पानी के अंदर की दुनिआ बकै में काफी खूबसूरत होती है ये आज मुझे महसूस हो गया था. कितना सुन्दर दृश्य था. नीला पानी और उसमे तैरती फिश और बाकि के समुद्री जीव. उसकी सोभा और बड़ा रहे थे.
जैसे जैसे नीचे जा रहा था पानी का दबाव बढ़ता जा रहा था. मेरा सरीर भरी हॉट जा रहा था. जबकि पानी में चीज़े हलकी हो जाती है. लेकिन ज्यादा गहराई में जाने के बाद इसका उल्टा होता है.
खुद का सरीर hi अपना बजन नहीं उठा पता hai.vo तो अच्छा है की शक्तिया है वर्ण में तो आज गया था. में आराम से सास ले प् रहा था बिलकुल फिश की तरह. खैर जैसे तैसे में पहुंच hi गया जमीन पैर. समुद्र की गहराई में.
आँखे भी खोली नहीं जा रही थी मुझसे. लेकिन खोलना तो था hi. मैंने अपना संतुलन बनाया और में जमीन पैर बैठ गया. और अपनी आँखों को बंद करके ध्यान लगाने लगा. और ध्यान में जल ाँस को फिर से ढूंढ़ने लगा. लेकिन अब मुझे उनका बही एहसास नहीं हो रहा था जो पहले हुआ था. मतलब साफ़ था की उन दोनों का कहना सही था. ाँस यहाँ अब नहीं है. तो फिर कहा है.
अब ये सवाल जब मन में आया तो इसका जवाब भी आना चाहिए था लेकिन नहीं आया. मैंने अपनी तिरदये को खोला समुद्र देव का स्मरण किया और उनसे विनती की की मुझे जल ाँस तक पहुंचने का मार्ग दिखाए. और यही विनती में उनसे करता रहा और ध्यान लगता raha.lekin मुझे नहीं लग रहा था की समुद्र देव मेरी कोई भी सहायता करेंगे. ये सफर मुझे खुद hi तय करना पड़ेगा. इसलिए में अपने मंत्र का जाप करने लगा फिर से.
काफी देर तक में ध्यान में बैठा रहा. कब तक पता नहीं. तभी अचानक से मेरी आँख से एक रौशनी निकली जो बहुत छोटी सी थी लगभग आँख की hi साइज की. और वो मेरी आँख से निकल कर एक दूसरी दिशा में बढ़ने लगी. जैसे मुझे रास्ता दिखा रही हो. और ये देखकर मैंने अपनी आँखों को खोल लिया और उस रौशनी के पीछे पीछे जाने लगा तभी मैंने देखा की आलिआ और सुरभि भी एकदम मेरे पीछे पीछे hi आ रही है. ये देखकर में हैरान था की ये कब आई मेरे पास.
यही बात मैंने उनसे इशारे में पूछी तो उन्होंने भी इशारे से ध्यान करके बताया जिसका मतलब था की जब में ध्यान में बैठा था तब. और बाकि के जवाब में बाद में लेने वाला था उनसे. इस वक़्त आगे बढ़ना जरुरी था. और इसलिए में तेज़ गति से उस रौशनी के पीछे पीछे बढ़ने लगा और वो दोनों मेरे पीछे पीछे. हम कितने दूर तक चलते रहे पता नहीं. और कब तक ये भी कोई पता नहीं था. लेकिन इतना जरूर पता था की ये रौशनी हमें ाँस तक जरूर पंहुचा देगी.
रौशनी आगे आगे और हम पीछे पीछे. कितनी hi झाड़ियों में से गुजर कर आगे बाद गए थे हम. जिनके आर पार भी नहीं दिख रहा था हमें. लेकिन हम जाते rahe.badte rahe.kabhi लेफ्ट तो कभी राइट कभी ऊपर तो कभी नीचे. और एक जगह पैर पहुंचकर रौशनी एक झड़ी में घुस गयी और उसके पीछे हम भी और जब हम उस झड़ी से बहार निकले तो हम हैरान थे क्युकी हम जमीन पैर पहुंच गए थे. ये क्या जगह थी पता नहीं. यहाँ पैर केवल इतना पानी था की हमारे पैरो के पंजे hi उसमे दुबे रहे बाकि का सरीर अब बहार tha.or चारो तरफ कमल के फूल लगे हुए थे. इतने घने की जमीन hi नहीं दिख रही थी.
आलिआ- ये कहा आगये हम.
मैं- सायद ाँस के नजदीक.
सुरभि- लेकिन यहाँ पैर ाँस कहा हो सकता है.
मैं- देखो कही पैर कुछ अलौकिक चमक उठ रही है क्या. चारो तरफ अच्छे से नजर दौड़ाओ.
हम सभी चारो तरफ देखने लगे. लेकिन प्रॉब्लम ये थी हर तरफ अलौकिक चमक दिखाई दे रही थी. अब इसमें से ाँस की चमक कोनसी है ये जानना बहुत hi मुश्किल काम था.
आलिआ- हर तरफ चमक उठ रही है. कहा है ाँस.
सुरभि- देखो जल ाँस है तो जल के अंदर hi होगा हम कितना hi ऊपर क्यों न देखते रहे हमें कुछ नहीं मिलेगा. हमें नीचे देखने की जरुरत है.
मैं- बिलकुल सही कहा तुमने और ऐसा करने के लिए हमें अपना रूप छोटा करना होगा. तो ऐसा करते है में छोटा होक नीचे जाऊंगा बाकि तुम दोनों ऊपर से हो देखोगी की कहा पैर वो पानी के नीचे हो सकता है.
आलिआ- ठीक है.
मैंने अपने हाथो को जोड़ा अपनी आँखों को बंद किया और अपने आकर को छोटा करने का आवाहन किया. और ऐसा करते hi मेरा रूप एक दम छोटा होगया. इतना छोटा की जहा पैर हमारे केवल पैरो के पंजे डूब रहे थे अब बही जगह मुझे किसी समुद्र से काम नहीं लग रही थी.
मैंने उस छोटे से समुद्र में तैरना सुरु किया वो भी उन्देर्वाटर. में नीचे नीचे hi तैर रहा था. लेकिन था तैरना बहुत मुश्किल हो रहा था. कमल की डंडियों की बजह से. वो मुझे इस वक़्त किसी बड़े पेड़ का तना लग रही थी. उनके पतों और जड़ो में मैं खो सा जाने लगा था. कभी कही पेअर फास्ट तो कही पैर हाथ. लेकिन बिना हार मने में आगे बढ़ता रहा. बही आलिआ और सुरभि भी पानी में ध्यान से देख रही थी कहा पैर हो सकता है ाँस. ये एक बड़ा अजीब सा मायाजाल था. जिसमे लगता है की सब कुछ अपने कण्ट्रोल में है लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है.
अब इसी जगह पैर हमें लग रहा है की कितना मुस्की होगा ाँस को ढूंढ़ना पानी भी इतना काम है. सब कुछ हमारे पक्ष में है. लेकिन असली टेंशन तो नीचे सुरु हुई. क्युकी में जनता था की ाँस नीचे hi मिलेगा और यहाँ पैर छोटा होक में आया तब से मुझे मेरे पेअर तक नहीं दिख रहे ाँस तो दूर की बात है. कभी मेरे हाथ किसी जगह छिप जाते तो कभी मेरे पेअर. ऐसे में ाँस को यहाँ धुन्द्पाना बहुत hi मुश्किल होता जा रहा था. हर बार की तरह.
में काफी आगे बढ़ता जा रहा था. लेकिन कमल के पत्तो और जड़ो की बजह से कुछ खास सफलता नहीं मिल प् रही थी. मन कर रहा था इन्हे हटा दू. लेकिन में ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिससे बाद में मुझे hi प्रॉब्लम हो.
इसी तरह में आगे बढ़ता गया. और तभी मेरा पेअर एक जड़ में बुरी तरह फास गया. मैंने उसे खींचने की कोसिस की लेकिन मेरा पेअर निकल hi नहीं रहा था. बहुत बुरी तरह मेरे पेअर को जकड लिया था उस जड़ ने. इसलिए में बापिस मुदा और उस जड़ के पास गया और उसे हाथो से हटाने लगा ताकि मेरा पेअर बहार निकल सके.
बहुत म्हणत लग रही थी जड़ को हटाने में. मेरे दोनों हाथ उस जड़ को खींच खींच कर उखड रहे थे ताकि पेअर आज़ाद हो सके. और आखिर कार मुझे सफलता मिल hi गयी. मेरा पेअर आज़ाद हो गया. और वो जड़ उस जगह से हैट गयी.
और जैसे hi जड़ उस जगह से हटी मुझे जमीन पैर कुछ दिखा. किसी सीप की तरह. " बही सीप जिसमे से मोती निकलते है" जानते hi होंगे आपलोग.
मेरे आकर के मुकाबले बहुत बड़ा सीप था वो. इसलिए में नीच गहराई में गया एक दम जमीन पैर. और मैंने जैसे hi बहा पेअर रखकर आजु बाजु देखा तो में हैरान था. क्युकी बहा पैर ऐसे कई सीप रखे हुए थे. उतने hi जितने कमल बहा लगे हुए थे. हर सीप के ऊपर एक कमल खिला हुआ था. और अब ये और मुश्किल होने वाला था.
लेकिन करना तो था hi. इसलिए मैं पहले सीप के पास गया और उसके ऊपर के ढक्कन को पकड़ कर खोलने की कोसिस की. लेकिन बहुत भरी था. और दूसरी बात की में पानी में खड़ा था इसलिए मेरा बैलेंस नहीं बन प् रहा tha.isliye मैंने तरकीब लगाई. और सीप के नीचे अपने पैरो को फसाया और फिर ऊपर के ढक्कन को खोलने की कोसिस की. तो काम बन गया. ढक्कन धीरे धीरे खुलने लगा और जैसे हो ढक्कन खुला उसमे से एक अलौकिक रोहणी बहार निकलने लगी. बहुत तेज़. और यहाँ में बहुत कुश हो गया क्युकी ये जल ाँस हो था इतना में दावे से कह सकता था.
इसलिए मैंने उसके ढक्कन को दोबारा बंद किया और उसको अपने हाथो में कास कर पकड़ लिया. क्युकी अगर ये यहाँ गम गया तो इसे फिर से ढूंढ़ने में बहुत समय जायेगा. क्युकी यहाँ पहले से hi बहुत सरे ऐसे सीप रखे हुए थे.
इसलिए मैंने अपने पैरो को उसके नीचे से निकला और उस सीप को अपने हाथो में पकड़ लिया. और फिर से अपनी आँखों को बंद करके खुद को बड़ा करने को कहा. और ऐसा कहते hi मेरा आकार फिर से पहले जैसा हो गया. और मुझे बड़ा देखकर वो दोनों भी जल्दी hi मेरे पास आगयी. उन्हें भी लगा की सायद ाँस मुझे मिल चूका है.
मैंने बड़ा होने के बाद अपने हाथो को ऊपर पानी से बहार निकला तो मेरे हाथ में वो सीप था. जो अच्छी बात थी.
आलिआ- इसके अंदर है क्या ाँस.
मैं- है.
सुरभि- ये तो सीप है न. जिसमे से मोती निकलते है.
मैं- है बही है.
सुरभि- तो खोलो इसे.
मैंने ये सुनने के बाद उसे अपने लेफ्ट हैंड में रखा और दाहिने हाथ से महादेव का नाम लेकर उसे खोला तो उसमे से बही रूहानी रौशनी चारो तरफ फैलने लगी.
सुरभि- कितना खूबसूरत है ये. इक दम मन को मोहलेने वाला.
आलिआ- सही कहा.
उसके बाद मैंने अपने दाहिने हाथ पैर उस सीप को पलटा दिया तो वो ाँस तैरकर मेरी हथेली में आज्ञा. और हम तीनो ने उसे प्रणाम किया और उसके बाद वो वैसे hi मेरे सरीर में बापिस से समां गया. और ऐसा होते hi मेरा पूरा सरीर एक दम पानी में बदल गया. पानी की एक आकृति में. जिसे देखकर वो दोनों हैरान थी. जब तक ाँस ने पुरे सरीर में अपनी जगह नहीं बना ली तब तक में बैसे hi इस्थिति में बना रहा. और जब ाँस पूरी तरह से समां गया तो मेरा सरीर फिर से पहले जैसा हो गया.
मैं- मिशन सक्सेसफुल रहा. हमें चार ाँस मिल गए.
सुरभि- बधाई हो भाई. अब आखिरी ाँस बचा है. और उसका पता है क्या आपके पास.
मैं- नहीं लेकिन मिल जायेगा. कोई न कोई संकेत जरूर देंगे वो. बस उसे समझने की जरुरत है.
आलिआ- सही कहा. अब हमें चलना चाहिए. पता नहीं घर पैर क्या हो रहा होगा. कही असुरो ने हमला न कर दिया हो.
मैं- तुम्हारा कहना सही है. चलो हाथ पकड़ो मेरा.
दोनों ने मेरा हाथ पकड़ा और अगले hi पल हम बहा से गायब हो गए. और सीधे पहुंचे अपने घर. जहा की हालत देख कर hi समाज में आरहा था की यहाँ कुछ तो गड़बड़ हुई है. वो भी भयानक वाली गड़बड़.
इसलिए हम जल्दी से घर के अंदर गए. जहा सभी मौजूद थे सिवाय प्राची के.
मैं- प्राची कहा है. सब ठीक तो है न.
ये सुनते hi सभी का ध्यान हमारी तरफ गया. और रेनू थे भाग कर मेरे गले लग गयी.
मैं- shan't हो जाओ क्या हुआ विस्तार से बताओ.
रेनू- वो जैसा तुमने कहा था बैसा hi हुआ. वो असुर आये थे यह पैर. और काफी ज्यादा संख्या में आये थे. मैंने और प्राची ने उन्हें रोकने की बहुत कोसिस और लगभग रोक भी लिया था. लेकिन पता नहीं क्या हुआ. अचानक से सरे असुर गायब हो गए. और उनके साथ प्राची भी गायब हो गयी. मुझे लगता है या तो वो उनके पीछे गयी है. जो संभव नहीं. और दूसरा वो असुर उसे अपने साथ ले गए है. क्युकी लड़ाई में हम काफी दूर दूर थे. और हमारे बीच में असुर hi असुर भरे पड़े थे. हम एक दूसरे को देख भी नहीं प् रहे थे. सायद उन्होंने प्राची को क़ैद कर लिया होगा किसी जादू बगेरा में. और फिर सरे बहा से गायब हो गए. तब से हम बहुत टेंशन में थे. तुम्हे बताना छह रहे थे. लेकिन मैंने सोचा तुम जब यहाँ आओगे तब hi बताना ठीक होगा. काम सेकम ाँस तो ले लोगे तुम. वर्ण उसे बही छोड़ कर फ़ौरन hi यहाँ आजाओगे.
ये सुनते hi मेरा सुरभि और आलिआ का एक साथ दिमाग फिर गया. हम तीनो एक दूसरे को शक्ल देख रहे थे. और हमारे हैरान होने के पीछे को बजह साफ़ थी की. अगला ाँस बायु का है. और प्राची बायु की प्रतीक है. और ाँस उसी को रास्ता सुझाएगा. जैसे यहाँ सुरभि को सुझाया. पहले तो ये की ाँस उस जगह नहीं दूसरी जगह है. और दूसरा ये की नीचे ढूंढ़ना पड़ेगा. ये छोटी छोटी बाटे उस समय पैर कोई नहीं सोचता है. लेकिन ये उन्ही की प्रतीक है इसलिए इन्हे वो सूझे. और आलिआ के टाइम भी ऐसा hi हुआ था. बस अग्नि के समय में अकेला गया था. रेनू उस समय मेरे साथ नहीं थी. क्युकी अग्नि का स्थान तय था. लेकिन बाकि ांसो का कुछ भी तय नहीं था. वो कही भी हो सकते है. ाक्ष बहुत बड़ा है. बैसे hi जल भी चारो तरफ फैला हुआ है. और धरती भी काफी बड़ी है. और बायु का तो कोई आकार hi नहीं है. वो कितनी बड़ी कितनी लुम्बी है इसका कोई आईडिया hi नहीं है. और यही मेरी सफलता की चाबी को असुर ले गए. लेकिन उन्हें इस बात की खबर कैसे लगी. की प्राची बायु की प्रतीक है. मई बे सायद परीलोक की लड़ाई में. जरूर प्राची ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन किया होगा. जिसके बिना पैर उन लोगो ने ये अंदाजा लगाया होगा.
लेकिन समस्या अब ये थी के में उसे धुंडु कहा और कैसे………
तो बे कॉन्टिनुए………………….
आलिआ- अब क्या सोच रहे हो. जल्दी फैसला करो की क्या करना है.
मैं- तुम दोनों ने मुझे कंफ्यूज कर दिया और अब कहती हो की जल्दी फैसला करो. थोड़ा रुको मुझे फिर से ध्यान लगाना होगा. में एक बार कन्फर्म हो जाओ फिर hi आगे का सफर तय करेंगे.
सुरभि- ठीक है लेकिन जल्दी करो.
मैं- ठीक है. यही रुको में आता हु.
ये कहके मैंने उन दोनों को बही ऊपर छोड़ा और में उड़ता हुआ गया सीधे समुद्र की गहराई me.vo भी स्पीड से. जहा इस वक़्त हम थे वो जगह बरमूडा ट्रायंगल से थोड़ी सी दुरी पैर थी. और में पानी के अंदर से hi ाँस का पता लगाना छह रहा था ताकि कोई भी शक को गुंजाईश न रहे. समुद्र काफी जहर था में कब से नीचे जा रहा हु लेकिन अभी तक पंहुचा hi नहीं tha.jabki अच्छी खासी स्पीड से जा रहा था.
पानी के अंदर की दुनिआ बकै में काफी खूबसूरत होती है ये आज मुझे महसूस हो गया था. कितना सुन्दर दृश्य था. नीला पानी और उसमे तैरती फिश और बाकि के समुद्री जीव. उसकी सोभा और बड़ा रहे थे.
जैसे जैसे नीचे जा रहा था पानी का दबाव बढ़ता जा रहा था. मेरा सरीर भरी हॉट जा रहा था. जबकि पानी में चीज़े हलकी हो जाती है. लेकिन ज्यादा गहराई में जाने के बाद इसका उल्टा होता है.
खुद का सरीर hi अपना बजन नहीं उठा पता hai.vo तो अच्छा है की शक्तिया है वर्ण में तो आज गया था. में आराम से सास ले प् रहा था बिलकुल फिश की तरह. खैर जैसे तैसे में पहुंच hi गया जमीन पैर. समुद्र की गहराई में.
आँखे भी खोली नहीं जा रही थी मुझसे. लेकिन खोलना तो था hi. मैंने अपना संतुलन बनाया और में जमीन पैर बैठ गया. और अपनी आँखों को बंद करके ध्यान लगाने लगा. और ध्यान में जल ाँस को फिर से ढूंढ़ने लगा. लेकिन अब मुझे उनका बही एहसास नहीं हो रहा था जो पहले हुआ था. मतलब साफ़ था की उन दोनों का कहना सही था. ाँस यहाँ अब नहीं है. तो फिर कहा है.
अब ये सवाल जब मन में आया तो इसका जवाब भी आना चाहिए था लेकिन नहीं आया. मैंने अपनी तिरदये को खोला समुद्र देव का स्मरण किया और उनसे विनती की की मुझे जल ाँस तक पहुंचने का मार्ग दिखाए. और यही विनती में उनसे करता रहा और ध्यान लगता raha.lekin मुझे नहीं लग रहा था की समुद्र देव मेरी कोई भी सहायता करेंगे. ये सफर मुझे खुद hi तय करना पड़ेगा. इसलिए में अपने मंत्र का जाप करने लगा फिर से.
काफी देर तक में ध्यान में बैठा रहा. कब तक पता नहीं. तभी अचानक से मेरी आँख से एक रौशनी निकली जो बहुत छोटी सी थी लगभग आँख की hi साइज की. और वो मेरी आँख से निकल कर एक दूसरी दिशा में बढ़ने लगी. जैसे मुझे रास्ता दिखा रही हो. और ये देखकर मैंने अपनी आँखों को खोल लिया और उस रौशनी के पीछे पीछे जाने लगा तभी मैंने देखा की आलिआ और सुरभि भी एकदम मेरे पीछे पीछे hi आ रही है. ये देखकर में हैरान था की ये कब आई मेरे पास.
यही बात मैंने उनसे इशारे में पूछी तो उन्होंने भी इशारे से ध्यान करके बताया जिसका मतलब था की जब में ध्यान में बैठा था तब. और बाकि के जवाब में बाद में लेने वाला था उनसे. इस वक़्त आगे बढ़ना जरुरी था. और इसलिए में तेज़ गति से उस रौशनी के पीछे पीछे बढ़ने लगा और वो दोनों मेरे पीछे पीछे. हम कितने दूर तक चलते रहे पता नहीं. और कब तक ये भी कोई पता नहीं था. लेकिन इतना जरूर पता था की ये रौशनी हमें ाँस तक जरूर पंहुचा देगी.
रौशनी आगे आगे और हम पीछे पीछे. कितनी hi झाड़ियों में से गुजर कर आगे बाद गए थे हम. जिनके आर पार भी नहीं दिख रहा था हमें. लेकिन हम जाते rahe.badte rahe.kabhi लेफ्ट तो कभी राइट कभी ऊपर तो कभी नीचे. और एक जगह पैर पहुंचकर रौशनी एक झड़ी में घुस गयी और उसके पीछे हम भी और जब हम उस झड़ी से बहार निकले तो हम हैरान थे क्युकी हम जमीन पैर पहुंच गए थे. ये क्या जगह थी पता नहीं. यहाँ पैर केवल इतना पानी था की हमारे पैरो के पंजे hi उसमे दुबे रहे बाकि का सरीर अब बहार tha.or चारो तरफ कमल के फूल लगे हुए थे. इतने घने की जमीन hi नहीं दिख रही थी.
आलिआ- ये कहा आगये हम.
मैं- सायद ाँस के नजदीक.
सुरभि- लेकिन यहाँ पैर ाँस कहा हो सकता है.
मैं- देखो कही पैर कुछ अलौकिक चमक उठ रही है क्या. चारो तरफ अच्छे से नजर दौड़ाओ.
हम सभी चारो तरफ देखने लगे. लेकिन प्रॉब्लम ये थी हर तरफ अलौकिक चमक दिखाई दे रही थी. अब इसमें से ाँस की चमक कोनसी है ये जानना बहुत hi मुश्किल काम था.
आलिआ- हर तरफ चमक उठ रही है. कहा है ाँस.
सुरभि- देखो जल ाँस है तो जल के अंदर hi होगा हम कितना hi ऊपर क्यों न देखते रहे हमें कुछ नहीं मिलेगा. हमें नीचे देखने की जरुरत है.
मैं- बिलकुल सही कहा तुमने और ऐसा करने के लिए हमें अपना रूप छोटा करना होगा. तो ऐसा करते है में छोटा होक नीचे जाऊंगा बाकि तुम दोनों ऊपर से हो देखोगी की कहा पैर वो पानी के नीचे हो सकता है.
आलिआ- ठीक है.
मैंने अपने हाथो को जोड़ा अपनी आँखों को बंद किया और अपने आकर को छोटा करने का आवाहन किया. और ऐसा करते hi मेरा रूप एक दम छोटा होगया. इतना छोटा की जहा पैर हमारे केवल पैरो के पंजे डूब रहे थे अब बही जगह मुझे किसी समुद्र से काम नहीं लग रही थी.
मैंने उस छोटे से समुद्र में तैरना सुरु किया वो भी उन्देर्वाटर. में नीचे नीचे hi तैर रहा था. लेकिन था तैरना बहुत मुश्किल हो रहा था. कमल की डंडियों की बजह से. वो मुझे इस वक़्त किसी बड़े पेड़ का तना लग रही थी. उनके पतों और जड़ो में मैं खो सा जाने लगा था. कभी कही पेअर फास्ट तो कही पैर हाथ. लेकिन बिना हार मने में आगे बढ़ता रहा. बही आलिआ और सुरभि भी पानी में ध्यान से देख रही थी कहा पैर हो सकता है ाँस. ये एक बड़ा अजीब सा मायाजाल था. जिसमे लगता है की सब कुछ अपने कण्ट्रोल में है लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है.
अब इसी जगह पैर हमें लग रहा है की कितना मुस्की होगा ाँस को ढूंढ़ना पानी भी इतना काम है. सब कुछ हमारे पक्ष में है. लेकिन असली टेंशन तो नीचे सुरु हुई. क्युकी में जनता था की ाँस नीचे hi मिलेगा और यहाँ पैर छोटा होक में आया तब से मुझे मेरे पेअर तक नहीं दिख रहे ाँस तो दूर की बात है. कभी मेरे हाथ किसी जगह छिप जाते तो कभी मेरे पेअर. ऐसे में ाँस को यहाँ धुन्द्पाना बहुत hi मुश्किल होता जा रहा था. हर बार की तरह.
में काफी आगे बढ़ता जा रहा था. लेकिन कमल के पत्तो और जड़ो की बजह से कुछ खास सफलता नहीं मिल प् रही थी. मन कर रहा था इन्हे हटा दू. लेकिन में ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिससे बाद में मुझे hi प्रॉब्लम हो.
इसी तरह में आगे बढ़ता गया. और तभी मेरा पेअर एक जड़ में बुरी तरह फास गया. मैंने उसे खींचने की कोसिस की लेकिन मेरा पेअर निकल hi नहीं रहा था. बहुत बुरी तरह मेरे पेअर को जकड लिया था उस जड़ ने. इसलिए में बापिस मुदा और उस जड़ के पास गया और उसे हाथो से हटाने लगा ताकि मेरा पेअर बहार निकल सके.
बहुत म्हणत लग रही थी जड़ को हटाने में. मेरे दोनों हाथ उस जड़ को खींच खींच कर उखड रहे थे ताकि पेअर आज़ाद हो सके. और आखिर कार मुझे सफलता मिल hi गयी. मेरा पेअर आज़ाद हो गया. और वो जड़ उस जगह से हैट गयी.
और जैसे hi जड़ उस जगह से हटी मुझे जमीन पैर कुछ दिखा. किसी सीप की तरह. " बही सीप जिसमे से मोती निकलते है" जानते hi होंगे आपलोग.
मेरे आकर के मुकाबले बहुत बड़ा सीप था वो. इसलिए में नीच गहराई में गया एक दम जमीन पैर. और मैंने जैसे hi बहा पेअर रखकर आजु बाजु देखा तो में हैरान था. क्युकी बहा पैर ऐसे कई सीप रखे हुए थे. उतने hi जितने कमल बहा लगे हुए थे. हर सीप के ऊपर एक कमल खिला हुआ था. और अब ये और मुश्किल होने वाला था.
लेकिन करना तो था hi. इसलिए मैं पहले सीप के पास गया और उसके ऊपर के ढक्कन को पकड़ कर खोलने की कोसिस की. लेकिन बहुत भरी था. और दूसरी बात की में पानी में खड़ा था इसलिए मेरा बैलेंस नहीं बन प् रहा tha.isliye मैंने तरकीब लगाई. और सीप के नीचे अपने पैरो को फसाया और फिर ऊपर के ढक्कन को खोलने की कोसिस की. तो काम बन गया. ढक्कन धीरे धीरे खुलने लगा और जैसे हो ढक्कन खुला उसमे से एक अलौकिक रोहणी बहार निकलने लगी. बहुत तेज़. और यहाँ में बहुत कुश हो गया क्युकी ये जल ाँस हो था इतना में दावे से कह सकता था.
इसलिए मैंने उसके ढक्कन को दोबारा बंद किया और उसको अपने हाथो में कास कर पकड़ लिया. क्युकी अगर ये यहाँ गम गया तो इसे फिर से ढूंढ़ने में बहुत समय जायेगा. क्युकी यहाँ पहले से hi बहुत सरे ऐसे सीप रखे हुए थे.
इसलिए मैंने अपने पैरो को उसके नीचे से निकला और उस सीप को अपने हाथो में पकड़ लिया. और फिर से अपनी आँखों को बंद करके खुद को बड़ा करने को कहा. और ऐसा कहते hi मेरा आकार फिर से पहले जैसा हो गया. और मुझे बड़ा देखकर वो दोनों भी जल्दी hi मेरे पास आगयी. उन्हें भी लगा की सायद ाँस मुझे मिल चूका है.
मैंने बड़ा होने के बाद अपने हाथो को ऊपर पानी से बहार निकला तो मेरे हाथ में वो सीप था. जो अच्छी बात थी.
आलिआ- इसके अंदर है क्या ाँस.
मैं- है.
सुरभि- ये तो सीप है न. जिसमे से मोती निकलते है.
मैं- है बही है.
सुरभि- तो खोलो इसे.
मैंने ये सुनने के बाद उसे अपने लेफ्ट हैंड में रखा और दाहिने हाथ से महादेव का नाम लेकर उसे खोला तो उसमे से बही रूहानी रौशनी चारो तरफ फैलने लगी.
सुरभि- कितना खूबसूरत है ये. इक दम मन को मोहलेने वाला.
आलिआ- सही कहा.
उसके बाद मैंने अपने दाहिने हाथ पैर उस सीप को पलटा दिया तो वो ाँस तैरकर मेरी हथेली में आज्ञा. और हम तीनो ने उसे प्रणाम किया और उसके बाद वो वैसे hi मेरे सरीर में बापिस से समां गया. और ऐसा होते hi मेरा पूरा सरीर एक दम पानी में बदल गया. पानी की एक आकृति में. जिसे देखकर वो दोनों हैरान थी. जब तक ाँस ने पुरे सरीर में अपनी जगह नहीं बना ली तब तक में बैसे hi इस्थिति में बना रहा. और जब ाँस पूरी तरह से समां गया तो मेरा सरीर फिर से पहले जैसा हो गया.
मैं- मिशन सक्सेसफुल रहा. हमें चार ाँस मिल गए.
सुरभि- बधाई हो भाई. अब आखिरी ाँस बचा है. और उसका पता है क्या आपके पास.
मैं- नहीं लेकिन मिल जायेगा. कोई न कोई संकेत जरूर देंगे वो. बस उसे समझने की जरुरत है.
आलिआ- सही कहा. अब हमें चलना चाहिए. पता नहीं घर पैर क्या हो रहा होगा. कही असुरो ने हमला न कर दिया हो.
मैं- तुम्हारा कहना सही है. चलो हाथ पकड़ो मेरा.
दोनों ने मेरा हाथ पकड़ा और अगले hi पल हम बहा से गायब हो गए. और सीधे पहुंचे अपने घर. जहा की हालत देख कर hi समाज में आरहा था की यहाँ कुछ तो गड़बड़ हुई है. वो भी भयानक वाली गड़बड़.
इसलिए हम जल्दी से घर के अंदर गए. जहा सभी मौजूद थे सिवाय प्राची के.
मैं- प्राची कहा है. सब ठीक तो है न.
ये सुनते hi सभी का ध्यान हमारी तरफ गया. और रेनू थे भाग कर मेरे गले लग गयी.
मैं- shan't हो जाओ क्या हुआ विस्तार से बताओ.
रेनू- वो जैसा तुमने कहा था बैसा hi हुआ. वो असुर आये थे यह पैर. और काफी ज्यादा संख्या में आये थे. मैंने और प्राची ने उन्हें रोकने की बहुत कोसिस और लगभग रोक भी लिया था. लेकिन पता नहीं क्या हुआ. अचानक से सरे असुर गायब हो गए. और उनके साथ प्राची भी गायब हो गयी. मुझे लगता है या तो वो उनके पीछे गयी है. जो संभव नहीं. और दूसरा वो असुर उसे अपने साथ ले गए है. क्युकी लड़ाई में हम काफी दूर दूर थे. और हमारे बीच में असुर hi असुर भरे पड़े थे. हम एक दूसरे को देख भी नहीं प् रहे थे. सायद उन्होंने प्राची को क़ैद कर लिया होगा किसी जादू बगेरा में. और फिर सरे बहा से गायब हो गए. तब से हम बहुत टेंशन में थे. तुम्हे बताना छह रहे थे. लेकिन मैंने सोचा तुम जब यहाँ आओगे तब hi बताना ठीक होगा. काम सेकम ाँस तो ले लोगे तुम. वर्ण उसे बही छोड़ कर फ़ौरन hi यहाँ आजाओगे.
ये सुनते hi मेरा सुरभि और आलिआ का एक साथ दिमाग फिर गया. हम तीनो एक दूसरे को शक्ल देख रहे थे. और हमारे हैरान होने के पीछे को बजह साफ़ थी की. अगला ाँस बायु का है. और प्राची बायु की प्रतीक है. और ाँस उसी को रास्ता सुझाएगा. जैसे यहाँ सुरभि को सुझाया. पहले तो ये की ाँस उस जगह नहीं दूसरी जगह है. और दूसरा ये की नीचे ढूंढ़ना पड़ेगा. ये छोटी छोटी बाटे उस समय पैर कोई नहीं सोचता है. लेकिन ये उन्ही की प्रतीक है इसलिए इन्हे वो सूझे. और आलिआ के टाइम भी ऐसा hi हुआ था. बस अग्नि के समय में अकेला गया था. रेनू उस समय मेरे साथ नहीं थी. क्युकी अग्नि का स्थान तय था. लेकिन बाकि ांसो का कुछ भी तय नहीं था. वो कही भी हो सकते है. ाक्ष बहुत बड़ा है. बैसे hi जल भी चारो तरफ फैला हुआ है. और धरती भी काफी बड़ी है. और बायु का तो कोई आकार hi नहीं है. वो कितनी बड़ी कितनी लुम्बी है इसका कोई आईडिया hi नहीं है. और यही मेरी सफलता की चाबी को असुर ले गए. लेकिन उन्हें इस बात की खबर कैसे लगी. की प्राची बायु की प्रतीक है. मई बे सायद परीलोक की लड़ाई में. जरूर प्राची ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन किया होगा. जिसके बिना पैर उन लोगो ने ये अंदाजा लगाया होगा.
लेकिन समस्या अब ये थी के में उसे धुंडु कहा और कैसे………
तो बे कॉन्टिनुए………………….