सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी - Page 11 - SexBaba
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सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी

अपडेट 76

सुप्रिया एक बस में बुर्का पहने बैठी थी. बहार से उसका चेहरा नहीं दिख रहा था था पर उसके चेहरे पर दहशत साफ़ झलक रही थी. और आखिर क्यों न झलके, पिछले एक घंटा उसके लिए किसी भनायक मूवी के दृश्यों से काम नहीं था. सुप्रिया सोचने लगी की वह आज यहाँ तक कैसे पहुंची थी.

विक्रम के कॉल करने के 15 मिनट बाद hi इक़बाल वहां मंदिर में उनके पास पहुंच गया था. जैसे hi इक़बाल वहां पंहुचा विक्रम उसे साड़ी सिचुएशन समझने लगा. सुप्रिया के दिमाग ने तोह काम करना hi बंद कर दिया था और उसे सही से समझ नहीं आ रहा था की वह लोग क्या बात कर रहे थे और आगे क्या होगा.

इक़बाल - सब्जी… भागना क्यों… आने दो जिसको आना है, मैं सब को देख लूंगा… मैडमजी के लिए तोह मैं किसी से भी भीड़ जायूँगा…

विक्रम - इक़बाल मुझे कोई शक नहीं इस बात का, पर 10 मुस्टंडो के आगे हम दोनों hi नहीं टिक पाएंगे. और उसके बाद वह सुप्रिया का क्या हाल करेंगे, तुम भी समझ सकते हो... मैं अपने लिए नहीं कह रहा, बस सुप्रिया के खातिर इस वक़्त यहाँ से निकल जाना hi बेहतर है...

इक़बाल के चेहरे पर उलझन और चिंता साफ़ दिख रही थी - पर सब्जी... वहां hi क्यों जाना? और आपको वहां के बारे में पता भी कैसे चला...

विक्रम ने उसके सवाल को अनसुना करते हुए पूछा - तुमने किसी और से तोह वहां का ज़िक्र नहीं किया न?

इक़बाल सीरियस होते हुए बोलै - नहीं सब्जी... कभी भी नहीं...

विक्रम - तोह बस फिर वही परफेक्ट जगह है. बस कुछ महीनो की बात है... जैसे hi सारा मामला ठंडा पड़ता है, मैं वहां आकर सुप्रिया को ले जायूँगा...

इक़बाल - सब्जी पर....

विक्रम - तुम hi मुझे बताया... क्या वहां कोई बहार वाला आकर तुम्हारी मर्ज़ी के बिना सुप्रिया को ले जा सकता है?

इक़बाल - नहीं सब्जी... वह तोह मुमकिन hi नहीं है...

विक्रम - तोह फिर सोच क्या रहे हो, तुम सुप्रिया को लेकर वहां निकलो... (विक्रम ने सुप्रिया की और देख कर उसे पुकारा) सुप्रिया... सुप्रिया सुनो...

सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया, जैसे किसी बुरे सपने से जाएगी हो - हाँ....

विक्रम - सुप्रिया... अपना फ़ोन दो मुझे... इक़बाल तुम भी अपने फ़ोन की सिम निकाल कर मुझे दो...

विक्रम सुप्रिया का फ़ोन लेकर उसके फ़ोन की सिम निकलने लगा और इक़बाल ने भी उसे अपने फ़ोन की सिम दे दी - मैं नहीं चाहता की तुम लोग वहां ट्रेस हो... इक़बाल तुम गाडी में वेट करो मैं 2 मं में सुप्रिया को लेकर आता हूँ...

इक़बाल - जी सब्जी...

विक्रम सुप्रिया के साथ अकेला वहां रह गया था, विक्रम ने प्यार से उसके दोनों गालो को पकड़ा - सुप्रिया... ी क्नोव ये तुम्हे अभी मुश्किल लग रहा होगा, पर इस समय तुम्हारा यहाँ से निकलना काफी ज़रूरी है...

सुप्रिया की आखें नाम थी, और होंठ काँप रहे थे - मुझे तोह कुछ समझ hi नहीं आ रहा... ये सब क्या हो रहा है... मैं ऐसे कैसे यहाँ से निकल जायु...

विक्रम - ट्रस्ट में सुप्रिया... मैंने भी नहीं सोचा था हम इस हालत में होंगे... पर अभी ये सब बात करने का फायदा नहीं है... हम जितनी देर करेंगे ईशा के लोगो को उतना hi टाइम मिलेगा तुम तक पहुंचने के लिए...

सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया - आप आ जायेंगे न... जैसे hi सब ठीक होगा?

विक्रम - हाँ बिलकुल... ये भी कोई पूछने की बात है...

सुप्रिया - और अतुल और बाकी सब? अगर ईशा ने उन्हें कुछ कर दिया तोह...

विक्रम - वह सब मैं संभल लूंगा... उसके लिए मेरा अभी घर पहुंचना बहुत ज़रूरी है...

सुप्रिया - और वहां कोई गड़बड़ हो गयी तोह मैं कैसे सम्भालूंगी?

विक्रम - बस जैसी भी सिचुएशन हो तुम बस उस हिसाब से अपने आप को एडजस्ट करती जाना... बाकी सब इक़बाल संभल लेगा... प्रॉमिस करो तुम घबरायोगी नहीं?

सुप्रिया ने धीरे से कहा - प्रॉमिस...

विक्रम - चलो अब अपने ासु पोचो और अपने आपको सम्भालो...

सुप्रिया और विक्रम बहार चलते हुए आये और सुप्रिया सिर्फ अपने हैंड बैग के साथ गाडी में बैठ गयी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे आज वह दुबारा विदा हो रही हो. जैसे hi वह गाडी में बैठी इक़बाल ने फर्राटे से गाडी चलनी शुरू कर दी.

सुप्रिया पीछे की सीट पर परेशान बैठी थी, तभी उसे कुछ सूझा - इक़बाल... एक बार आप विक्रम के ऑफिस की तरफ ले लेंगे क्या?

इक़बाल - मैडमजी पर... सब्जी ने बोलै है की सीधा लखनऊ से बहार निकलने के लिए...

सुप्रिया ने उससे प्यार से रिक्वेस्ट किया - बस एक बार... प्लीज...

इक़बाल - ठीक है मैडमजी... जैसा आप कहे...

इक़बाल ने गाडी मोड़ते हुए विक्रम के ऑफिस की तरफ कर ली. सुप्रिया बस वहां पहुंच कर अतुल से बात करना चाहती थी, और उसे जो कुछ हुआ उसके बारे में बताना चाहती थी. ऐसी अचानक गायब होने से पता नहीं अतुल उसके बारे में क्या सोचने वाला था. कुछ hi देर में गाडी विक्रम के ऑफिस के पास पहुंच रही थी, वहां पहले से नीचे काफी भीड़ इखट्टा थी.

भीड़ देख कर इक़बाल के माथे पर बल पड़ता जा रहा था - मैडमजी यहाँ कुछ गड़बड़ है... गाडी मोड़ लू क्या?

सुप्रिया - नहीं बस... थोड़ा सा और पास...

इक़बाल ने गाडी को थोड़ा और पास किया, और सुप्रिया ने अपना सर खिड़की से बहार निकल कर भीड़ में देखना शुरू किया. उसे वहां अतुल दिख गया! 4-5 हट्टे काटते लोग उसे पकड़ कर घेरे खड़े थे. और ऑफिस के बाकी लोग ये सब तमाशा देख रहे थे. थोड़ी देर पर दिशा भी कड़ी थी.

दिशा की नज़र भी सुप्रिया पर पड़ी, और वह तेज़ कदमो से उसकी और आयी.

जैसे hi दिशा उसकी खिड़की तक पहुंची, सुप्रिया के रुंधे हुए गले से थोड़ी सी आवाज़ निकली - दिशा... ये सब क्या... अतुल...

दिशा - सुप्रिया तुम बताया... ये सब क्या हो रहा है... ऐसा लग रहा है वह लोग तुम्हे ढून्ढ रहे है... क्या हुआ है?

शायद इतनी भीड़ में भी किसी ने दिशा को सुप्रिया से बात करते हुए देख लिया और उसकी और इशारा किया. वह 4-5 लोग अतुल को छोड़ते हुए उनकी गाडी की और चिल्लाते हुए झपटे.

आदमी - वह रही... वह रही... रोक उसे...

इक़बाल भी ज़ोर से चिल्लाया - मैडमजी!!! ये इसी तरफ आ रहे है... हमे निकलना होगा...

इक़बाल ने जल्दी से गाडी को रिवर्स में चलाया, और थोड़ा पीछे होते hi गाडी को उडाता हुआ वहां से निकलने लगा. सुप्रिया ने पीछे पलट कर देखा, कुछ लोग एक दूसरी गाडी में उनका पीछा करने लगे थे.

इक़बाल गुस्से और तनाव में बोलै - मैंने बोलै था न, यहाँ आना सही नहीं होगा...

सुप्रिया इक़बाल की ये हालत देख कर बुरी तरह घबरा गयी थी - अब क्या करेंगे इक़बाल...

इक़बाल अपनी आवाज़ में थोड़ी नरमी लाया - आप घबरायो नहीं...

इक़बाल एक के बाद एक मोड़ लेता हुआ वहां से तेज़ी से निकलने लगा. सुप्रिया को अब पीछे आती हुई गाडी तोह नहीं दिख रही थी, पर उसे पता था की वह ज्यादा दूर नहीं होंगे. थोड़ी देर बाद इक़बाल ने गाडी एक जगह लगायी.

सुप्रिया - यहाँ क्यों गाडी रोक दी...

इक़बाल - मैडमजी.. उन्हें इस गाडी का नंबर दिख गया है... हमे इसे यहीं छोड़ना होगा...

सुप्रिया - अब आगे क्या?

इक़बाल ने गाडी की डिक्की खोली और उसमे से एक काला बुर्का निकला - मैडमजी आप ये पेहेन लो... आपकी लाल साड़ी किसी का भी ध्यान खींच लेगी अपनी और. सुप्रिया ने जल्दी से काला बुर्का अपने कपड़ो के ऊपर डाला, वह ऊपर से नीचे तक इसमें धक् गयी थी, बस बहार से उसकी आँखें नज़र आ रही थी.

इक़बाल - और अपनी चप्पल भी उतार कर ये जूती पेहेन लीजिये... आपकी चप्पल कुछ ज्यादा hi चमकीली है...

सुप्रिया - ये मेरे आएगी भी?

इक़बाल - तरय तोह करिये....

इक़बाल ने झुक कर सुप्रिया को जूती पहननी शुरू करि, वह बड़ी मुश्किल से सुप्रिया के पैरो में फांसी. सुप्रिया बुर्क़े को सही से संभल नहीं पा रही थी, और वह बार बार उसकी आँखों पा आ रहा था- मुझे इसमें कुछ भी नहीं दिख रहा...

इक़बाल - आप बस मेरा हाथ पकड़ लो...

इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ कास के पकड़ लिया और वह उसे कहीं ले जाने लगा. सुप्रिया को सही से समझ नहीं आ रहा था की वह लोग कहाँ जा रहे थे. सुप्रिया बस इक़बाल का हाथ पकडे उसे साथ खींची जा रही थी, उसे इक़बाल पर पूरा भरोसा था.

कुछ hi देर में उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी बस अड्डे पर हो, और इक़बाल ने उसे धीरे से कहा - ये इस बस में छेड़ना है हमे, आप पहले छाड़िये..

सुप्रिया को सही से समझ नहीं आ रहा था पर इक़बाल ने उसकी कमर पकड़ते हुए उसे बस में ऊपर छडा दिया और फिर उसके पीछे आते हुए उसे एक खिड़की वाली सीट पर बिठा दिया और वह उसके साथ में बैठ गया. सुप्रिया को बुर्क़े की जाली से बस हल्का फुल्का hi दिख रहा था, बस जल्दी hi खचाखच भर गयी थी.

सुप्रिया आगे वाली सीट की रेलिंग को पकड़ कर कास के बैठी हुई थी, इक़बाल उससे ठीक सत्ता हुआ साथ में बैठा था. बस अब चलने को शुरू hi हुई थी की एक डैम से बहार कुछ शोर शराबा हुआ. 2-3 लोग कंडक्टर को धक्का देते हुए बस में छडे और इधर उधर देखने लगे.

कंडक्टर - क्या है ये सब

सुप्रिया के कानो में एक आदमी की आवाज़ आयी - ए... किसी लाल साड़ी वाली लड़की को देखा है यहाँ...

कंडक्टर - जो है तुम्हारे सामने है न...

आदमी ने एक और लाल साड़ी वाली औरत को देखते हुए कहा - ये वाली नहीं... थोड़ी जवान सी...

कंडक्टर - और तोह कोई नहीं...

आदमी ने सुप्रिया की और घूर कर देखा, सुप्रिया ने अपनी आँखें नीचे कर ली - और ये जो बुर्क़े वाली हैं? अपने बुर्क़े ऊपर करो...

शायद बस में सुप्रिया के इलावा भी 2-3 और औरते थी जिन्होंने बुर्का पहना हुआ था.

ये सुनते hi एक और आदमी बोल पड़ा - ये क्या बदतमीज़ी है... तुम हमारी औरतो के बुर्क़े उतारोगे...

ये सुन कर और भी लोग भड़क गए थे - हाँ.. अभी बुलायो हवलदार ko...haan हाँ... धक्के मारो इन्हे नीचे...

आदमी सब को भड़कते देख थोड़ा पीछे हट गया - ाचा ठीक है… अपना नंबर कंडक्टर को दे रहा हूँ, किसी के पास भी कोई खबर हो तोह इस नंबर पर कॉल करना… दस हज़ार इनाम मिलेगा…

वह आदमी कंडक्टर को अपना नंबर देने के बाद बस से नीचे उतर गए और बस चलने लगी. पर सुप्रिया का दिल अभी भी तेज़ तेज़ धड़क रहा था. अगर आज उसका बुर्का नीचे हो जाता तोह शायद.....

सुप्रिया ने पाया की टेंशन के मारे उसने इक़बाल का हाथ कास के पकड़ा हुआ था. इक़बाल उससे धीरे से फुसफुसाया - आप घबराये नहीं... बस हम निकल hi गए है यहाँ से...

सुप्रिया ने अपने हाथ की पकड़ ढीली करि, उसके हाथ पसीने से भरा हुआ था. बस अब फुल स्पीड चलने लगी थी और कुछ 15-20 मिनट बाद हाईवे की सड़क तक पहुंच गयी थी. सुप्रिया की आँखों में अभी भी दहशत सी hi थी, पर इतनी साड़ी भाग दौड़ के बाद वह बुरी तरह थक चुकी थी और उसकी आँखें बंद होने लगी थी.

धीरे धीरे उसका सर इक़बाल के कंधे पर लटक गया और उसकी आँख लग गयी.

पर सपने में उसे आराम कहाँ था. 5-7 मर्दो ने उसे घेरा हुआ है, और उसके हाथ और पेअर पकडे हुए है. कोई उसकी चूचियां चूस रहा है तोह कोई उसकी गांड दबा रहा था. सारे मर्दो ने अपने लुंड बहार निकाले हुए थे और वह उसके शरीर के अलग अलग हिस्सों पर छू रहे थे. एक एक करके सबने अपने लुंड उसके मुँह में डालने शुरू किये. और फिर एक मोटा सा लुंड उसके छेड़ में तेजी से घुस गया.

सुप्रिया चीखती हुई जाएगी, उसका चेहरा पसीनो से टर्र था. इक़बाल ने सुप्रिया को पकड़ते हुए पुछा - आप ठीक हो न...

सुप्रिया तेज़ सांस लेते हुए बोली - हाँ... कुछ नहीं... बस सपना था.. थोड़ी पानी मिलेगा क्या?

इक़बाल - हाँ बस अभी जैसी hi गाडी रूकती है... मैं पानी लेता हूँ...

साथ बैठे आदमी ने इक़बाल से पुछा हुआ - क्या हुआ? सब ठीक है....

इक़बाल - जी जी... बस आदत नहीं है इसको बस में सफर की... थोड़ा जी ख़राब है...

एक और औरत हस्ते हुए बोली - ाचा... हवाई जवाज में बैठे है क्या तेरी जोरू...

इक़बाल हस्ते हुए बोलै - हाँ अम्मा... एहि समाज लो... हवाई जहाज में hi बैठे है...

सब लोग हसने लगे पर सुप्रिया तोह जैसे अपनी उलझनों में खोयी हुई थी. उसने बुर्क़े की जाली से बहार की और देखा, बहार अब कोई शहर नहीं बल्कि जंगल सा था. अँधेरा भी होता जा रहा था. इतना अफरा तफरी में उसे तोह ये भी नहीं पुछा था की वह जा कहाँ रही थी.

बस में गाने चल रहे थे, शायद उसकी हालत पर हस्ते हुए:

भरम भाप के

शर्म धाप के

करम नाप के

भागा रे

करम नाप के

सुप्रिया ने अपना दिमाग बंद करने की कोशिश करि पर वह बंद hi नहीं हो रहा था. वह इक़बाल की और हुई और उससे हलके से पुछा - हम लोग कहाँ पहुंचने वाले है?

इक़बाल - बस अभी बरैली रुकेगी ये बस...

सुप्रिया - हम बरैली जा रहे है क्या?

इक़बाल - नहीं मैडमजी... मेरे गाँव जा रहे है... गाँव के नाम से आप परेशान मत होना... अब गाँव क्या और शहर क्या, सब कुछ मिल hi जाता है वहां भी...

सुप्रिया - बरैली से कितनी दूर है आपका गाँव?

इक़बाल - वहां से दो ढाई घंटे और आगे है... आप थक गए हो तोह रात कहीं रुक जायेंगे और फिर सुबह निकल लेंगे...

सुप्रिया - नहीं... मैं नहीं थकी...

इक़बाल - रात हो चली है... मेरा ख्याल से इतनी रात को वहां पहुंचना भी ठीक नहीं होगा... कहीं रुक hi लेंगे...

सुप्रिया - जैसा आप ठीक समझे...

लगभग 15-20 मिनट बाद बस रुकी और सुप्रिया और इक़बाल बस से नीचे उतर गए थे. अब सुप्रिया को शायद बुर्क़े से पहले से थोड़ा बेहतर दिखने लगा था. वह खुद से नीचे उतर पायी पर नीचे उतरने में उसका बुर्का थोड़ा सा ऊपर हो गया और उसकी लाल साड़ी चमक गयी.

एक औरत की आवाज़ आयी - आई.. इसने बुर्क़े के नीचे साड़ी पहनी है...

सुप्रिया बुरी तरह सकपका सी गयी और उसने जल्दी से अपना बुर्का नीचे किया.

इक़बाल - हाँ वह हमारे यहाँ पेहेनते है...

औरत - कहीं ये वह तोह नहीं जिसे वह लोग ढून्ढ रहे थे...

इक़बाल - अम्मा सठिया गयी हो क्या... चलो अपने काम से काम रखो..

इक़बाल ने फिर से सुप्रिया का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने साथ लेते हुए चलने लगा - आप घबराये नहीं... कुछ नहीं होगा...

आते जाते लोग बुर्का पहने हुए भी सुप्रिया को घूर रहे थे और कुछ तोह फब्तियां भी कास रहे थे - बुर्क़े के नीचे क्या है, बुर्क़े के नीचे… दिन में छुपायो, रात को दिखायो… हाथ इतने गोर गोर है, चूचियां कैसी होंगी इसकी… रात को तोह सब ऊपर से नीचे तक उतर जाता होगा…

ये सब सुन कर सुप्रिया की तोह हालत ख़राब होती जा रही थी और इक़बाल भी सिचुएशन को समझता हुआ किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू रख रहा था, उन सब लोगो की बातों की नज़र अंदाज़ करते हुए.

कुछ देर चलने के बाद वह लोग किसी बिल्डिंग के अंदर घुसे, शायद बस अड्डे के पास hi कोई सस्ता सा होटल था.

इक़बाल - एक रात के लिए कमरा चाहिए....

आदमी - 200 रूपए...

इक़बाल - हाँ... ये लो...

आदमी ने बुर्क़े में सुप्रिया की और देखते हुए कहा - मिया बीवी हो?

इक़बाल ने रूखी सी आवाज़ में कहा - हाँ....

आदमी - कहाँ जा रहे हो...

इक़बाल - आप से मतलब?

आदमी - ारी आजकल बड़े किस्से होते है न... भगा के ले जाते है बुर्क़े में...

इक़बाल - हम आपको वैसे लगते है क्या...

आदमी - नहीं नहीं... पर हमे तोह पूछना होता है न... आधार कार्ड वैगेरा कुछ है...

इक़बाल - आधार कार्ड कौन साथ में लेकर चलता है....

आदमी - हम्म्म... चलिए अपनी बेगम से बुलवा दीजिये ताकि हमे तस्सली हो जाए...

सुप्रिया ने सिचुएशन को समझते हुए अपनी आवाज़ थोड़ी कड़क करते हुए बोली - ये क्या तमाशा लगा रखा है... आपको मिया बीवी को कमरा देने में दिक्कत है तोह हम कहीं और चले जाते है... चलिए जी...

आदमी घबराहे हुए बोलै - ारी नहीं नहीं... बस वह मोहतरमा एक काण्ड हो गया था पीछे कहीं पर... कोई लड़की भगा लाया था... आप ये लीजिये कमरे की चाबी...

इक़बाल ने कमरे की चाबी ली और वह दोनों एक कमरे की और हो लिए. कमरे में घुसते hi इक़बाल ने लॉक लगाया और सुप्रिया ने अपने सर से बुर्का हटाया. इतना खराब सा कमरा होने के बावजूद उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने सालो बाद सांस ली हो.

सुप्रिया ने गहरी सांस ली - उफ्फ्फ... ऐसा लग रहा था जैसा दम घुट रहा हो अंदर...

इक़बाल ने एक पल के लिए सुप्रिया के मासूम से चेहरे की और देखा और फिर अपनी आँखें नीचे कर ली - आप आराम कीजिये... मैं कमरे में hi खाना ले ायूँगा…

सुप्रिया - पर इतना खर्चा कैसे...

इक़बाल - आप इस सब के बारे में मत सोचिये...

सुप्रिया ने कमरे में अंदर आकर देखा, कमरे में एक hi डबल बीएड था, उसकी भी चद्दर मैली सी थी. उसे तोह काफी महंगे महंगे होटल्स में ठहरने की आदत पद चुकी थी, और ये तोह... पर जो भी था, उसे फिलहाल तोह इसी में एडजस्ट करना पड़ेगा.

इक़बाल - मैं बहार से खाना लेकर आता हूँ… आप इतने हाथ मुँह धो लीजिये…

सुप्रिया एक डैम से घबरा सी गयी - यहाँ अकेले आपके बिना? होटल वाले कमरे में खाना नहीं पंहुचा सकते क्या?

इक़बाल - मैडमजी ये वैसा होटल नहीं है… मुझे लेकर hi आना होंगे… आप बेफिक्र रहिये मैं शुद्ध शाकाहारी खाना लेऊँगा…

सुप्रिया को खाने की चिंता नहीं थी, बस यहाँ अकेले रुकने की. कहीं इक़बाल के जाते hi कोई आ गया तोह? पर उसने किसी तरह से साहस बाँधा - ठीक है, पर आप जल्दी आना…

इक़बाल - बस यूँ गया और यूँ आया… आप कमरा बंद कर लेना और मेरे इलावा किसी के लिए मत खोलना…

सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया और इक़बाल के जाते hi कमरे का लॉक लगा दिया. अपने आप को अकेला पा कर वह बाथरूम में गयी, वह सुबह से अब तक टॉयलेट नहीं गयी थी. थोड़ी देर बाद वह अपना चेहरा धो कर बीएड पर बैठी थी. उसकी आँखें भरी हो चली थी, पूरे दिन की मानसिक और शारीरिक लड़ाई ने उसे थका दिया था.

पर तभी दरवाज़े पर ज़ोर ज़ोर से खटखटाने की आवाज़ आयी. सुप्रिया की आँख खुली और वह घबरा सी गयी. वह अपने आप को दरवाज़े के पास लायी, इस दरवाज़े में बहार की और देखने के लिए कोई ऑय होल नहीं था.

वह सोच hi रही थी की वह क्या करे की उसे बहार से इक़बाल की आवाज़ आयी - मैडमजी… मैं हूँ… खोलिये…

सुप्रिया ने रहत की सांस ली और इक़बाल के लिए दरवाज़ा खोल दिया. इक़बाल के हाथ में 2 प्लास्टिक बैग थे जिसके अंदर नेवसपपेर और प्लास्टिक की थैली में खाना पैक्ड था. और साथ hi पानी की बोतल भी.

इक़बाल को देख कर सुप्रिया ने चैन की सांस ली - काफी टाइम लग गया आपको…

इक़बाल - हाँ… थोड़ी भीड़ ज्यादा थी वहां… ये लीजिये, मैं आपके लिए ले आया हूँ…

सुप्रिया - आइये साथ में खा लेते है न…

इक़बाल - नहीं नहीं.. पहले आप खा ले… फिर मैं बाद में खा लूंगा…

सुप्रिया - आपने भी तोह सुबह से कुछ नहीं खाया है... साथ में कहते है नहीं तोह मैं भी नहीं खा रही...

इक़बाल सुप्रिया के इस लहज़े से थोड़ा सा हैरान हो गया, पर उसे अच्छा भी लगा - आप भी न... बिलकुल बच्चों की तरह ज़िद्द कर रही है... ाचा चलिए...

सुप्रिया - ज़िद्द नहीं है... बस जैसे आपको मेरी फ़िक्र है उसी तरह मुझे आपकी...

इक़बाल मुस्कुराते हुए बोलै - ठीक है... आपकी बात मान ली...

दोनों बिस्तर पर बैठ गए और इक़बाल ने नेवसपपेर को फैलते हुए खाना उस पर रख दिया. सुप्रिया और इक़बाल एक दुसरे के आमने सामने बैठे खाना खाने लगे. सुप्रिया को इतनी तेज़ भूक लगी थी की वह बिना कुछ कहे बस चुप चाप खाना खाये जा रही थी. एक hi प्लेट पर कहते हुए, बीच बीच में उनकी उंगलियां छु जाती, और सुप्रिया झट से अपना हाथ पीछे खींच लेती.

इक़बाल की नज़र कभी सुप्रिया के चेहरे की तरफ, कभी उसके खुले हुए बालों पर टिक जाती जो उसके गलो से लटक रहे थे. एक पल को इक़बाल के होठों पर हलकी सी मुस्कान आ गयी, पर उसने तुरंत hi अपना ध्यान प्लेट की तरफ कर लिया. सुप्रिया भी khate-khate जैसे उसकी नज़रों को अपने ऊपर महसूस कर पा रही थी.

सुप्रिया - क्या हुआ... आप रुक क्यों गए... खाइये न...

इक़बाल - कैसा लगा खाना आपको?

सुप्रिया - बहुत ाचा... आपको ाचा नहीं लगा क्या?

इक़बाल - आपको ाचा लगा तोह मुझे कैसे पसंद न आता...

अब सुप्रिया का पेट थोड़ा भर गया था और उसे फिर से आगे की चिंता सताने लगी थी - यहाँ से अब आगे कहाँ जायेंगे? आपका गाँव कहाँ है?

इक़बाल - आपने अमरोहा का नाम सुना है?

सुप्रिया ने दिमाग पर ज़ोर डाला - शायद... पक्का नहीं पता...

इक़बाल - दिल्ली से बहुत दूर नहीं है... बस उसी के पास मेरा गाँव है.. अब वैसे शायद उसे गाँव नहीं छोटा शहर hi कहेंगे...

सुप्रिया - वहां आप क्या बोलेंगे... मैं कौन हु?

इक़बाल - वहीँ सोच रहा हूँ... कुछ समझ hi नहीं आ रहा... मेरे ख्याल से तोह हमे वहां जाना hi नहीं चाहिए...

सुप्रिया थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली - क्यों आपको अपनी बीवी से डर लगता है, कहीं उन्हें कुछ ऐसा वैसा न लगे...

इक़बाल एक पल के लिए रुक गया और निगाहें नीचे कर ली - मैडमजी... शायद मैं आपको पहले खुल के नहीं बता पाया... वह वहां नहीं है?

सुप्रिया - तोह कहाँ है? अपने मायके गयी हैं क्या?

इक़बाल - नहीं... अब वह बस मेरी यादों में है... उसे गुज़रे हुए सालों हो चुके है और मैं तभी के बाद से कभी घर नहीं गया...

सुप्रिया एकदम से चौंकते हुए बोली - क्या!!?? पर आपने तोह कहा था...

इक़बाल - वह मेरे लिए तोह अभी भी वहीँ है...

सुप्रिया इक़बाल की आँखों में देख रही थी, जहाँ एक तूफ़ान सा आया हुआ था - कितने साल हो गए इस बात को?

इक़बाल - एहि कोई 20 साल...

सुप्रिया चौंक गयी - ओह्ह्ह.... बीस साल! वह तोह लगभग एक पूरी ज़िन्दगी हो जाती है... आप तभी से घर नहीं गए?

इक़बाल - जी हाँ... मेरे ख्याल से आपको वहां ले जाना सही नहीं होगा...

सुप्रिया - पर विक्रम ने कहा था...

इक़बाल की आवाज़ थोड़ी ुचि हो गयी - पर आप hi बताइये... वहां जा कर क्या बोलेंगे... आप मेरी हो कौन? मैं अपनी मालकिन को अपने साथ भगा लाया?

सुप्रिया एक डैम छुप पद गयी थी, फिर वह सोचते हुए बोली - आप ऐसा कीजिये... आप मुझे यहीं छोड़ कर अपने घर निकल जाइये... मैं सब मैनेज कर लुंगी अकेली...

इक़बाल - नहीं मैडमजी... मेरा वह मतलब नहीं था... मैं तोह बस आपके बारे में hi सोच रहा था...

सुप्रिया - मुझे भी समझ नहीं आ रहा मैं कहाँ जायु... मैं सोच रही हु की एक कॉल अपने घर झाँसी लगा लू क्या?

इक़बाल - सब्जी ने बोलै था की वह लोग वहां भी पहुंच गए होंगे... मेरे ख्याल से ये करना सही नहीं होगा...

सुप्रिया की हालत फिर से रोने वाली हो गयी थी - तोह आप hi बताइये मैं क्या करू? इससे तोह

इक़बाल - आप घबराइए नहीं, जब तक आप मेरे साथ है, मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगा... आप रोइये नहीं...

सुप्रिया ने अपने आप को संभाला और बिस्तर से नेवसपपेर और खाने की पन्नियों को समेटने लगी.

इक़बाल - ारी. आप ये सब छोड़िये... आप बस आराम कीजिये...

सुप्रिया - नहीं... इसमें क्या...

इक़बाल - आप काफी थक गयी होंगी... आप यहाँ ऊपर बिस्तर पर सो जाइये... मैं नीचे एक चद्दर बिछा कर सो जायूँगा...

सुप्रिया - ारी नहीं... ज़मीन पर कैसे सोयेंगे आप... मैं सो जाती हूँ नीचे...

इक़बाल - मैडमजी... आप मेरी बात मानिये... मुझे आदत है सख्त ज़मीन पर सोने की... मुझे ऐसे नींद नहीं आने वाली इस गद्दे पर...

सुप्रिया ने परेशान होते हुए इक़बाल की और देखा. उसे ाचा नहीं लग रहा था की इक़बाल इस तरह ज़मीन पर सोयेगा, पर साथ hi उन दोनों का इस छोटे से डबल बीएड पर सोना भी तोह कितना अजीब सा होगा. उसने न चाहते हुए भी हाँ में सर हिलाया.

थोड़ी देर बाद कमरे की लाइट बंद थी, सुप्रिया बिस्तर पर कम्बल ोड कर लेती थी, और इक़बाल ज़मीन पर नीचे. सुप्रिया को नींद नहीं आ रही थी, उसके दिमाग में एहि चल रहा था की इस समय विक्रम और अतुल कैसे होंगे, पता नहीं सब लोग उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे. वह कैसे यहाँ फास गयी थी इस जंजाल में. और आगे का रास्ता भी कुछ साफ़ नज़र नहीं आ रहा था.

सुप्रिया ने बीएड से नीचे झाँका तोह इक़बाल उससे पीठ करके लेता हुआ था. वह उसके लिए कितना कुछ कर रहा था, बिना झिझके अपना सब कुछ छोड़ कर उस यहाँ तक ले आया था. और अभी भी उसके आराम के लिए अपने आराम का त्याग कर रहा था. वह न होता तोह शायद वह अब तक कबकी उन लोगो के हाथ लग गयी होती.

सुप्रिया अपने खयालो से झूझती हुई जाने कब सो गयी. और शायद रात को hi सपने में उसे आगे का रास्ता थोड़ा सा समझ आया.

सुप्रिया जब उठी तोह सुबह हो चुकी थी और कमरे में बहार से रौशनी आ रही थी. सुप्रिया हड़बड़ा कर कड़ी हुई. इक़बाल अब नीचे नहीं लेता हुआ था, और उसने कमरे में इधर उधर देखा, वह वहां नहीं था. सुप्रिया थोड़ा सा घबराई पर फिर सुबह के सारे काम निपटताने के लिए वह बाथरूम में घुसी.

जब वह बहार निकली तोह इक़बाल जादुई तरीके से वापिस आ चूका था और बिस्तर पर बैठा हुआ था - गुड मॉर्निंग मैडमजी...

सुप्रिया ने मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया - गुड मॉर्निंग... कहाँ चले गए थे आप...

इक़बाल - बस नाश्ता लेने गया था... ये लीजिये गरम गरम समोसे और जलेबी...

सुप्रिया ने हलकी सी शिकायत भरी आवाज़ में कहा - आप मुझे जगा सकते थे जाने से पहले...

इक़बाल - बस मैं नहीं किया आपको जगाने का... आप सोती हुई इतनी अछि लग रही थी न...

सुप्रिया के चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान आ गयी - शुक्रिया...

वह बिस्तर पर बैठी और एक जलेबी उठा कर खाने लगी. कल से वह एक hi जोड़ी कपड़ो में थी, और उसके पास और कुछ भी नहीं था. पर वह लोग यहाँ ज्यादा समय नहीं रुक सकते थे.

सुप्रिया ने खाते खाते कहा - इक़बाल... मैंने सोचा है... हमे आपके घर hi चलना चाहिए...

इक़बाल - मैडमजी आप समझ क्यों नहीं रहे हो...

सुप्रिया - एक तोह आप मुझे मैडमजी बोलना बंद करिये आप... कोई भी सुनेगा तोह उसे कितना अजीब लगेगा... आप मुझे सुप्रिया बुला सकते हो...

इक़बाल - मैडमजी...

सुप्रिया ने उसे टोकते हुए कहा - फिर से वही...

इक़बाल - मैं कोशिश करूँगा... एकदम से तोह शायद नहीं हो पायेगा...

सुप्रिया - हाँ... पूरी कोशिश करनी पड़ेगी... चलिए अब बस यहाँ से निकलते है... सीधे आपके गाँव...

इक़बाल - मेरे ख्याल से हम लोग दिल्ली चलते है... वहीँ कहीं छुप जायेंगे...

सुप्रिया - ाचा यहाँ से तोह बहार निकलते है न...

इक़बाल ने हाँ में सर हिलाया और कुछ देर बाद सुप्रिया ने फिर से अपनी लाल साड़ी के ऊपर वह कला बुर्का दाल लिया था और वह दोनों कमरे से बहार निकल गए. इक़बाल थोड़ा आगे आगे और सुप्रिया उसके पीछे.

जैसी hi वह होटल के रिसेप्शन पर पहुंचे, उन्होंने देखा की 2 हट्टे काटते आदमी रिसेप्शन पर खड़े आदमी से तेज़ आवाज़ में बात कर रहे थे.

आदमी उसे अपने फ़ोन पर एक फोटो दिखते हुए - गौर से देख, देखा है इसे?

रिसेप्शन वाला आदमी - नहीं देखा भाई... बता तोह दिया...

आदमी - मेरा नंबर नोट कर, और कुछ भी अलग सा लगे तोह मुझे कॉल करियो...

आदमी ने मुद के इक़बाल की और देखा, जैसे उसे उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा हो. सुप्रिया ने भी उस आदमी की और देखा, ये वही आदमी था जो बस में उसे ढून्ढ रहा था. उसे देखते hi सुप्रिया की हालत ख़राब हो गयी और उसने अपनी मुट्ठी कास के बीच ली. उसने अपनी सांस बिलकुल रोक ली जैसे वह इंसान उसे उसकी साँसों से hi पहचान लेगा.

वह आदमी इक़बाल को एक नज़र देखते हुए वहां से बहार निकल गया. इक़बाल ने होटल वाले को पेमेंट करि और वह दोनों होटल से बहार आ गए.

सुप्रिया ने फुसफुसाते हुए कहा - ये लोग यहाँ तक कैसे पहुंच गए?

इक़बाल - पता नहीं मैडमजी...

सुप्रिया धीमी आवाज़ में पर गुस्से में बड़बड़ायी - मैंने कहा न मुझे मैडमजी मत बुलायो...

इक़बाल - जी...

सुप्रिया - बस हमे आपके घर की तरफ hi चलना चाहिए... हम लोग वहीँ सेफ रहेंगे...

इक़बाल - मुझे भी ऐसे hi लगता है... पर वहां...

सुप्रिया - पर वॉर कुछ नहीं... वहां मैं देख लुंगी सब...

इक़बाल और सुप्रिया फिर से एक बार बस अड्डे की तरफ चल पड़े. वह दोनों अमरोहा की और जाती हुई एक बस में छडे और इस बार सुप्रिया अपने खयालो में नहीं खोयी हुई थी बल्कि काफी सतर्क थी. बुर्क़े के अंदर से hi सब कुछ ध्यान से देखती हुई.

बस ने जल्दी hi चलना शुरू कर दिया और लगभग दो ढाई घंटे बाद इक़बाल ने बस कंडक्टर को बीच रास्ते बस रोकने के लिए कहा. सुप्रिया देख रही थी की यहाँ कोई बस स्टेशन तोह नहीं था पर शायद एहि उसके घर के सबसे पास की जगह थी.

सुप्रिया और इक़बाल बस से नीचे उतरे. इक़बाल ने वहीँ पास में एक रिक्शा वाले से बात करि और वह दोनों उस रिक्शा में बैठ गया. रिक्शा काफी सकदी सी थी, तोह वह दोनों एक दुसरे से चिपक कर बैठे थे. रिक्शा चलते हुए काफी हिल रही थी और सुप्रिया को ऐसा लग रहा था की कहीं वह गिर न जाये. उसने अपना एक हाथ पीछे ले जाते हुए लड़की के फत्ते को कास के पकड़ लिया.

रिक्शा वाला - बाबूजी... किसके घर जा रहे हो...

इक़बाल धीरे से बोलै - नक़वी साहब के यहाँ...

रिक्शा वाला - जी बाबूजी... आप उनके रिश्तेदार हो?

इक़बाल धीरे से बुदबुदाया - काका की आँखें ख़राब हो गयी है शायद...

रिक्शा वाला - कुछ कहा क्या?

इक़बाल - नहीं नहीं... चलिए...

रिक्शा पतली पतली गलियों के बीच में से होती हुई जा रही थी. ज्यादातर घर यहाँ पक्के hi थे, और वैसे नहीं जैसे सुप्रिया ने गाँव के नाम से सोचे थे. बस सड़क काफी ख़राब थी, बल्कि थी hi नहीं. लोग अपने घरो के बहार खड़े उन्हें hi घूर रहे थे, और कुछ बच्चे रिक्शा के साथ साथ चलते हुए सुप्रिया के बुर्क़े को छू रहे थे. इक़बाल ने उन्हें दांत के भगाया.

कुछ hi देर बाद रिक्शा एक बड़े से घर के सामने रुकी. शायद ये गाँव के सबसे बड़े घरो में से था. सुप्रिया को लगा की शायद वह गलत जगह आ गए है, इक़बाल का घर तोह इतना बड़ा नहीं हो सकता था.

पर इक़बाल ने सुप्रिया का हाथ पकड़ कर उसे वहीँ उतारा और रिक्शा वाले के पैसे दिए. सुप्रिया बहार से उस घर को देखने लगी. बड़ी, ऊँची, मजबूत दीवारें चरों और से घर को घेरे हुए थी, और उनका रंग हल्का पीला, धुप में सुनहरी तरह चमक रहा था. बहार के मैं दरवाज़ा किसी मजबूत लकड़ी से बना हुआ बड़ा और भरी था, जिस पर नकाशी के पैटर्न्स उकेरे हुए थे.

इक़बाल ने दरवाज़े पर हलके से खटखटाया और दरवाज़ा अपने आप hi खुल गया. इक़बाल ने कुछ कदम अंदर लिए और सुप्रिया भी उसके पीछे पीछे अंदर हो ली. अंदर कदम रखते hi एक विशाल सा आँगन दिखाई दिया. ानगर में पेड़ पौधे और फूल लगे हुए थे. घर की दीवारों पर जालीदार खिड़कियां थी. सुप्रिया को एकदम से लगा जैसे एक खिड़की में से कोई झाँक रहा हो.

इक़बाल ने घर का दरवाज़ा बंद कर दिया और कुण्डी लगा ली. और तभी एक बड़ी उम्र की औरत आँगन में बहार आयी और ज़ोर से बोली - कौन.....

इक़बाल - अम्मा जी... मैं...

उस औरत के कदम इक़बाल को देखते hi रुक से गए और उसका रंग उड़ गया, जैसे किसी भूत को देख लिया हो. फिर वह अपने आप को संभालती हुई इक़बाल की और दौड़ी - इक़बाल.... इक़बाल... तू आ गया... बीटा...

वह इक़बाल के सीने से चिपक गयी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. उसने आवाज़ सुन कर अंदर से दो और औरते बहार आयी. एक थोड़ी बड़ी, पर अम्मा जी से छोटी, और एक बहुत hi जवान सी प्यारी सी लड़की. सुप्रिया उन सब को बारी बारी देख रही थी. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने तोह इक़बाल से पुछा भी नहीं था की उसके घर में कौन कौन है.

अम्मी जी - रब्बू देख... देख कौन आया... हिना देख... तेरा चाचा आ गया...

शायद उस जवान सी लड़की का नाम हिना था, वह भी भागी भागी इक़बाल की तरफ गयी - चाचू....

इक़बाल की आँखों से भी आंसू बह रहे थे - ारी हिना... इतनी बड़ी हो गयी तू तोह... कितने साल की हो गयी... पहचान में hi नहीं आ रही...

हिना - आप तोह हम सबको भूल hi गए थे न.... अभी बस कुछ दिन पहले तोह मेरा उनीस्वा जन्मदिन गया है...

वह दोनों इक़बाल को घेरे खड़े थे और अम्मा जी उसके चेहरे को हाथ लगा कर छु रही थी, जैसे वह सच हो या कोई सपना. शायद किसी की नज़र सही से सुप्रिया पर पड़ी नहीं थी, सिवाए उस तीसरे औरत के.

अम्मी जी - रुबीना तू भी तोह मिल ले... तेरा देवर आ गया.

रुबीना - अम्मी जी... पर ये कौन है इसके साथ...

अम्मा जी का ध्यान अब जाकर बुर्का ओढे सुप्रिया पर गया - हाँ भाई... ये कौन है... किसको ले आया साथ में...

हिना सुप्रिया के पास पहुंच कर कड़ी हुई और उसे बारीकी से देखने लगी.

अम्मी जी - चुप क्यों कड़ी है... बोल... हिना, ज़रा इसका बुर्का ऊपर कर...

इससे पहले की हिना उसका बुर्का ऊपर करती, सुप्रिया ने खुद hi उसे ऊपर कर दिया और तीनो लोग उसकी सुन्दर प्यारी मासूम सी शकल को देखते रह गए थे. बुर्का हट्टे hi अंदर उसकी लाल साड़ी भी चमक रही थी. रुबीना और अम्मा जी एक डैम दांग खड़े सुप्रिया की और देख रहे थे.

अम्मी जी भड़कते हुए बोली - किसको ये ले आया... ये तोह हमारे यहाँ की लग भी नहीं रही है...

इससे पहले इक़बाल कुछ कहता उसकी भाभी ने उसे काट दिया - बोलो भी... इतना सालो बाद आये हो, और अपने साथ ये किसी उठा लाये...

अम्मी - कौन है ये चिनार... ये कोई रंडी बाजार तोह है नहीं की किसी को भी उठा लायो...

ये सब सुनते hi सुप्रिया की आँखें नीचे झुकी हुई थी, पता नहीं इक़बाल ने कुछ सोचा था या नहीं, या फिर उसे hi कुछ बोलना पड़ेगा.

इक़बाल - अम्मी जी कुछ भी बोलते हो आप....

अम्मी - ारी तोह बता न... तेरा भाई इसे काट के फेंक देगा... तुझे पता तोह है...

हिना जो सुप्रिया के पास कड़ी उसे बारीकी से देख रही थी, बोल पड़ी - चाचू... कहीं ये मेरी नयी चची तोह नहीं?

इक़बाल जल्दी से बोलै - नहीं नहीं...

पर सुप्रिया ने उसे बीच में रोकते हुए अपनी कांपती हुई आवाज़ में कहा - जी... मैं आपकी नयी.... चची hi हूँ...

इक़बाल ने एकदम से झटके से पलट कर सुप्रिया की और देखा, उसे तोह अब तक नहीं पता था वह क्या बोलने वाला था, पर मैडमजी ये क्या बोल बैठी थी.

अम्मी ने सुप्रिया को घूरा और फिर इक़बाल की और देखा - चची!!! चची है ये इसकी!! तूने फिर से... लाहौल!!!

अम्मी अपना सर पकड़ते हुए धम्म से आँगन में बिछी हुई एक चारपाई पर बैठ गयी.
 
अपडेट 78

हिना सुप्रिया को घर के अंदर ले आयी थी और इक़बाल, अम्मा जी और रुबीना अभी भी बहार घर के चौक में खड़े बहस कर रहे थे. सुप्रिया को अंदर बैठे सब कुछ साफ़ साफ़ तोह नहीं सुनाई दे रहा था पर इतना तोह साफ़ था की वह दोनों hi काफी नाराज़ थे इक़बाल पर.

हिना की चहकती हुई आवाज़ ने सुप्रिया का ध्यान अपनी और खींचा. वह उसके लिए पानी का एक ग्लास लेकर आयी - ये लीजिये चची जान... पानी पीजिये...

सुप्रिया ने एक दबी हुई मुस्करात के साथ उसके हाथ से पानी का गिलास लिए. स्टील का गिलास पकड़ते hi उसे पता चला की उसके हाथ कितनी बुरी तरह से काँप रहे थे.

हिना का ध्यान भी उसके हाथों पर गया - ारी... आपके हाथ क्यों काँप रहे है... पानी ज्यादा ठंडा है क्या?

सुप्रिया ने हिना की और गौर से देखा, उसके चेहरे और शरीर का रंग बेहद hi गोरा था. उसके फूले फूले गाल, और प्यारा सा चेहरा, उसे बिलकुल अपनी याद दिला रहा थे जब वह उसकी उम्र की थी.

सुप्रिया ने हिचकते हुए कहा - बहार वह लोग क्या बात कर रहे होंगे...

हिना ने कंधे उचकते हुए कहा - पता नहीं... मैं बहार गयी तोह मुझे बोहोत दांत पड़ेगी... पर मुझे तोह बस ये पता है की अब आप मेरी चची है...

हिना ने अपनी बाहें सुप्रिया के कंधो पर लपेट ली. अगर सुप्रिया हिना से किसी और माहौल में मिली होती तोह वह शायद उसकी इस क्यूट सी हरकत पर उसके गालों को खींच लेती. पर इस समय उसका मैं बहुत hi बेचैन सा हो रहा था. सुप्रिया ने भी उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए उसे हलके से हुग कर लिया.

पर बहार तोह कुछ अलग hi घमासान चल रहा था.

अम्मी जी नाराज़ होते हुए बोली - तूने फिर से ये सब करते हुए ज़रा भी न सोचा हमारे बारे में.... इससे तोह तू यहाँ न hi आता तोह ाचा था... एहि सोच लेते की मर गया है...

रुबीना - अम्मी जी क्या बोल रही हु आप... रोज़ रात को तोह इनका नाम लेकर रोटी रहती थी, और आज ये वापस आ गया है तोह ये सब बोल रहे हो... किसी को अपनी साथ hi तोह लेकर आया है न, तोह इसमें क्या है...

अम्मी - चल मुझे तोह न है.... तेरा hi खसम करेगा फसाद घर आकर...

रुबीना - हम्म्म.... इक़बाल कब हुआ तुम लोगो का निकाह...

इक़बाल धीरे से बोलै - बस अभी 2-3 दिन पहले hi...

रुबीना - और उससे पहले तुम लोगो के बीच में...

अम्मी जी - खुल के पूछ ले न जो पूछना चाहती है... ये पूछ रही है की तूने अब तक उस रंडी को छोड़ा या नहीं...

इक़बाल ने गुस्से में अम्मी को घूर में देखा, पर रुबीना ने इक़बाल को शांत होने का इशारा किया. इतने साल हो गए थे, पर शायद अभी भी इस घर में सिर्फ वही थी जो उसे समझती थी.

रुबीना - अम्मी जी… आप भी गज़ब करते हो… अब वह आपके घर की बहु है… उसके बारे में ऐसे क्यों बोल रही हो...

अम्मी - बताया, मैं अपने घर में भी न बोल सकू… ाचा ये तोह बता इसने लाल साड़ी क्यों पहने हुई है… तूने इनकी रस्मो के हिसाब से तोह शादी न कर ली… कहीं इस बार तू तोह न…

इक़बाल - अम्मी नहीं… ऐसा कुछ न है... तुम क्यों सोचो ये सब...

अम्मी - तू कर सके और हम सोच भी न सके…

रुबीना ने बीच में घुस कर बात को संभालना चाहा - इक़बाल तुम इनकी बातों को दिल से न लगाया… वह बस जानना चाहती है की पूरा मामला है क्या... हमे जल्दी से तुम्हारे भैया के लिए तैयार होना पड़ेगा न…

इक़बाल - अभी भी उनका वैसा hi मिज़ाज है क्या?

रुबीना - हाँ और क्या… अब तोह उनकी उम्र भी होने लगी है... वैसे तुम्हे बोहोत याद करते है पर बोलते नहीं… और है भी कौन उनका हाथ बताने को… ज़ीनत और सबा की शादी का सारा काम भी अकेले hi करना पड़ा था…

इक़बाल ने सवाल पुछा, पर शायद उसे इसका जवाब पहले से hi पता था - उन दोनों की शादी हो गयी?

रुबीना - और क्या, तुम्हारा तोह कोई अत पता था नहीं की तुम्हे खबर कर देते… और कब तक रुकते... उन दोनों की उम्र हो चली थी... अब तोह बस हिना hi बची है…

इक़बाल - हाँ... मैं समझ रहा हूँ...

रुबीना फुसफुसाते हुए बोली - वैसे उम्र में तोह ये तुमसे काफी छोटी लग रही है… कहाँ मिली ये तुम्हे… भगा के लाये हो न पिछली बार को तरह…

इक़बाल ने अपनी आँखें नीचे कर ली, वह अब क्या hi बोलता.

रुबीना उसे झेपते हुआ देख हस्ते हुए बोली - कोई मसला थोड़ी न है… मुझे तोह इसमें कोई बुराई नहीं लगती… अगर तुम दोनों एक दुसरे के साथ खुश हो तोह इसमें किसी को क्या दिक्कत होनी चाहिए…

इक़बाल हलके से बोलै - जी…

रुबीना - और अम्मी जी जो चाहे कहे, मैं जानती हु तुम्हारे भाई जान को भी इससे कोई दिक्कत नहीं होगी. आखिर हमारे घर आयी है, हमने किसी और के यहाँ भेजी तोह नहीं न… और फिर तुम भी आ गए हो, तोह उनको ाचा लगेगा, उन्हें भी सहारा मिल जायेगा…

इक़बाल - आपको लगता है...

रुबीना - पक्की तरह से तोह नहीं... पर उन्हें मनाया तोह जा hi सकता है...

इक़बाल - कैसे?

रुबीना ने अपना मुँह इक़बाल के कान के पास किया और कुछ बोलने लगी. इक़बाल जैसे जैसे उनकी बात सुन रहा था उसकी आँखें बड़ी होती जा रही थी, और वह ज़ोर ज़ोर से अपना सर न में हिला रहा था.

घर के अंदर हिना सुप्रिया से दोस्ती करने में लगी हुई थी. वह उससे सवाल पर सवाल कर रही थी और सुप्रिया जितना काम हो सके उतना बता रही थी.

हिना मासूमियत से बोली - आपका नाम बोहोत hi प्यारा है…

सुप्रिया ने हलके से सर हिला के कहा - शुक्रिया…

हिना - आप थैंक यू भी बोल सकती है मुझे, इतनी अछि नहीं पर थोड़ी बोहोत इंग्लिश तोह आती hi है मुझे…

सुप्रिया - ाचा… तुम पड़े करती हो क्या? कॉलेज में हो?

सुप्रिया का सवाल सुन कर हिना को तोह जैसे अपने बारे में बोलने का मौका hi मिल गया - यहाँ बिलकुल पास तोह कोई कॉलेज है नहीं, और अब्बू दूर जाने नहीं देते… तोह अभी बस कॉरेस्पोंडेंस से पड़े कर रही हूँ… आप मेरी मदद करेंगी पड़े में… मैं अभी अपनी किताबे लेकर आती हूँ…

इससे पहले की सुप्रिया उसे रोकती, हिना बिजली की स्पीड से वहां से भागती हुई गयी. सुप्रिया ने सोचा की वह भी शायद बिलकुल ऐसी hi चुलबुली सी थी जब उसकी भाभी शादी करके घर आयी थी.

तभी उसे सामने से इक़बाल आता दिखा, उसके चेहरे पर टेंशन दिखाई दे रही थी. उसने पास आकर धीरे से कहा - मैडमजी, ये आपने क्या बोल दिया बहार…

सुप्रिया - शहहह… मैंने कहा न मुझे मैडमजी न बुलायो अब… मुझे बस एक ये hi रास्ता सूझा तोह मैंने बोल दिया, और फिर कुछ hi दिनों की तोह बात है…

इक़बाल - पर… हम कुछ और भी तोह बोल सकते थे न…

सुप्रिया थोड़ा सा गुस्सा होते हुए बोली - आप तोह बिलकुल चुप चाप खड़े थे वहां… तोह मुझे hi बोलना पड़ा न… अगर आपको कुछ और समझ रहा था तोह आप बोल देते...

इक़बाल - पर अब उनकी नज़रो में तोह आप मेरी बीवी है न...

सुप्रिया - हमारे पास और कोई रास्ता था क्या? मुझे आप पर पूरा भरोसा है, तभी तोह आपके साथ यहाँ आ गयी, और ये सब बोलने की हिम्मत भी कर दी...

इक़बाल - आप समझ नहीं रही हैं…

सुप्रिया - तोह समझाइये न…

इक़बाल - यहाँ सब गाँव वाले मेरे बड़े भाई की बोहोत इज्जत करते है… बहुत रुतबा है उनका… उनकी बोहोत चलती है यहाँ...

सुप्रिया - शायद इसीलिए विक्रम से मुझे यहाँ आपके साथ भेजा है न…

इक़बाल - हाँ पर, इस तरह आपके हमारे घर में आना, इससे बहुत बातें बनेंगी, उनकी बोहोत बदनामी होगी, उन्हें बिलकुल ाचा नहीं लगेगा...

सुप्रिया परेशान होते हुए बोली - ओह… तोह फिर…

इक़बाल - पता नहीं बस अब क्या होगा उनके आने पर... क्या बोलेंगे वह... कहीं ज्यादा भड़क गए और कुछ उल्टा सीधा कर दिया तोह...

सुप्रिया - ऐसे कैसे भड़क जायेंगे... और क्या उल्टा सीधा करेंगे...

इक़बाल ने सुप्रिया के मुँह पर हाथ रख दिया - शहहह धीरे बोलिये… मैंने आपको कहा था न… हमे यहाँ आना hi नहीं चाहिए था...

सुप्रिया पैनिक में आ रही थी, इक़बाल के रूखी उंगलियां उसके होंठों पर लगती हुई उन्हें कुचल सी रही थी. इक़बाल ने एकदम से सुप्रिया की शकल पर उसे हो रही तकलीफ को पद लिया और अपने हाथ उसके होंठों से हटा लिए.

सुप्रिया - अब आप hi बताइये... क्या करे हम लोग...

इक़बाल - मैं कोशिश करूँगा बात सँभालने की... भाभी भी कोशिश करेंगी... पर...

सुप्रिया - पर क्या?

इक़बाल - मेरे ख्याल से हमे आज रात hi यहाँ से निकल जाना चाहिए. पर तब तक आप सबकी हाँ में हाँ मिलते रहना… किसी को नहीं लग्न चाहिए की कुछ गड़बड़ है...

सुप्रिया को कुछ समझ नहीं आ रहा था की इक़बाल इतना डरा हुआ क्यों था. उसने अपने होंठ अपने मुँह में दबाते हुए अपना सर हाँ में हिलाया.

उसे दूर से अम्मी जी आती हुई दिखी. अम्मी उन दोनों को बेहद पास बैठा देख बोली - ऐसा कर… गॉड में बैठ जा इसके… कोई लिहाज़ तोह है नहीं इसको…

इतने में रुबीना भी अंदर आ गयी और उसने इशारों में इक़बाल से पूछ लिया की उन दोनों की बात हो गयी थी या नहीं. रुबीना ने हिना को आवाज़ लगायी - हिनाआ….. हिनाआ… अपनी चची को अंदर लेकर जायो और अपने एक जोड़ी कपडे दे दो… थोड़े अचे से देना…

हिना दौड़ी दौड़ी आयी और सुप्रिया का हाथ पकड़ कर उसे नीचे hi के एक कमरे की और ले गयी. कमरे की दीवारों पर पुराण पेंट हो रखा था जो कई जगह से पपड़ी बन कर उतर रहा था. सारा फर्नीचर भी पुराण सा था.

हिना - चची जान ये है मेरा कमरा… कैसा लगा?

सुप्रिया ने किसी तरह से झूठी मुस्कराहट लेट हुए कहा - बहुत ाचा है… तुम्हे पूरा कमरा मिला हुआ है?

हिना - जी… मेरी दीदी लोगो के जाने के बाद मुझे भी कमरा मिल hi गया…

सुप्रिया - हम्म्म… ाचा...

हिना बोले जा रही थी - चाचू का कमरा ऊपर है… सालों से बंद पड़ा है… अभी आपको दिखने ले चलती हूँ… और मेरी दोस्त है नाज़, उससे भी मिलवायुंगी आपको…

हिना बस बोले hi जा रही थी की रुबीना दनदनाती हुई कमरे में घुसी - ारी ज़ाहिल लड़की, तूने अब तक कपडे नहीं निकले… जल्दी कर…

हिना छिड़ते हुए बोली - निकाल तोह रही हु अम्मी…

रुबीना ने खुद hi अलमारी खोल ली और उसमे कपडे देखने लगी. उसने एक सुन्दर सा सलवार सूट निकाल कर सुप्रिया के सामने लगाया.

हिना एकदम से बोल पड़ी - अम्मी वह वाला नहीं, वह मेरा…

पर फिर उसकी नज़र सुप्रिया के चेहरे पर पड़ी और वह अपनी नयी चची को मन कैसे कर देती - नहीं नहीं... कोई नहीं.. आप दे दो…

रुबीना - अपनी नयी चची को भी कपडे देने में दिक्कत हो रही है तुझे... वैसे भी ये तेरे थोड़ा ढीला आता है न, इसीलिए मैंने इसलिए चुना है…

हिना अपने मम्मो पर हाथ रख कर दबाते हुए बोली - आपका मतलब मेरे अभी भी छोटे है… अब तोह पहले से थोड़े बड़े हो गए हैं… देखो

रुबीना ने गहरी सांस ली - या खुदा, क्या करू इस लड़की का… कान खोल कर सुन ले… जब अब्बू आएंगे न तू उनसे कुछ नहीं कहेगी… बल्कि अंदर hi रहियो चची के साथ... बड़े लोगो की बातों में न पड़ियो…

हिना - हाँ ठीक है… इतनी भी नासमझ नहीं हु मैं… पर ऐसा क्यों बोल रही हो…

रुबीना ने अपनी आँख नाचते हुए कहा - तुझे शादी में जाने का बड़ा शौक है न… अब तेरे चाचा चची की शादी होगी यहाँ… तोह किसके मज़े आने वाले है?

हिना ये सुन कर बेहद hi खुश हो गयी - ारी वहहह… मैं तोह नए नए कपडे बनवायुंगी… और अपनी साड़ी सहेलियों को बुलायुंगी… सब देखे तोह मेरी हसीं सी चची को…

सुप्रिया को हिना की नासमझ बातों पर हसी भी आ रही थी और थोड़ी छिड़ भी हो रही थी. काश वह अपने इस बचपने वाले पल में वापस जा पाती. तोह वह कभी भी वह गलतियां न दोहराती जो उससे हुई थी. ये सोचते hi उसके दिल में एक तीस सी उठी, पता नहीं वह आज कैसे यहाँ तक पहुंच गयी थी.

रुबीना ने मीठी सी आवाज़ में कहा - सुप्रिया.. एहि नाम है न तुम्हारा…

सुप्रिया ने हलके से सर झुका के कहा - जी…

रुबीना - ये लड़की तोह तुम्हे पागल बना देगी… पर अभी तुम जल्दी से कपडे बदल लो और हाँ ये अपनी लाल साड़ी मुझे दे देना.. मैं संभल के रख लुंगी…

सुप्रिया ने फिर से सर हिला कर हाँ कहाँ.

रुबीना ने हिना का हाथ पकड़ते हुए उसे अपनी और खींचा - चल अब चची को कपडे बदलने दे… तू मेरे साथ चल...

रुबीना हिना को लेकर कमरे से निकल गयी और सुप्रिया उस कमरे में अकेले रह गयी थी. उसने कमरे की कुण्डी लगायी और कुछ पल के लिए अपना सर पकड़ कर बीएड पर बैठ गयी. वह फुट फुट कर रोना चाहती थी पर अब जैसे उसके आंसू भी सूखने लगे थे.

वह बीएड पर दो पल के लिए पीठ के बल लेट गयी. ऊपर पंखा घूम रहा था और उसके सर को और ज्यादा चक्र रहा था. काश उसके पास उसका फ़ोन होता, तोह वह विक्रम को कॉल कर लेती. पर शायद विक्रम ने ठीक hi किया था उससे फ़ोन लेकर.

सुप्रिया ने अपने आप को संभाला और अपनी साड़ी उतारने लगी. इस अनजान से घर में, कितना अजीब सा लग रहा था अपने कपडे उतारना. वह कल सुबह से नहायी नहीं थी और उसे अपने अंदर से बदबू आ रही थी, पर इस समय उसके अंदर हिम्मत नहीं थी की वह इसके बारे में पूछे.

उसने हिना के सूट को हैंगर से निकला और अपना पेटीकोट उतारने के बाद उसकी पजामी पेहेन ली. पजामी लम्बाई में उसके बिलकुल सही नाम की थी, और ढीली भी थी तोह उसे पेहेन्ने में कोई ख़ास दिक्कत नहीं हुई.

सुप्रिया ने अपना ब्लाउज उतारा और हिना की कुर्ती को ऊपर से पेहेनना शुरू किया. कुर्ती उसके बूब्स पर आ कर अटक गयी. हिना के बूब्स उसके बूब्स से शायद थोड़े से छोटे थे. सुप्रिया कुर्ती को पकडे उससे झूझती रही और उसे डैम लगा कर नीचे खींचतने की कोशिश करती रही.

आखिर कुर्ती नीचे हो hi गयी. सुप्रिया ने कमरे में रखे ड्रेसिंग के आईने में अपने आप को देखा, कुर्ती उसके शरीर पर एक डैम फांसी हुई थी और उसकी वजह से उसकी कमर और पतली लग रही थी और मम्मी बड़े. सुप्रिया ने बिस्तर पर राखी एक चुन्नी लेते हुए अपने मम्मी ढकने की कोशिश करि.

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सुप्रिया ने अपने हाथ हिलने की कोशिश करि और ऐसा लग रहा था की वह इस कुर्ती में जकड सी गयी थी. उसके ज़रा सा चलने पर उसके मम्मी ऊपर नीचे उछाल रहे थे. उफ्फ्फ, उसे आज थोड़ा धीरे hi चलना पड़ेगा.

तभी दरवाज़ा पर किसी के हाथ मारने की आवाज़ आयी. सुप्रिया जल्दी से बोली - 2 मिनट दीजिये…

वह जल्दी से बीएड पर पड़ी अपनी साड़ी, ब्लाउज और पेटीकोट समेटने लगी, और फिर उन्हें फोल्ड करके उठा लिया. सुप्रिया ने कुण्डी खोली, तोह सामने रुबीना hi थी.

रुबीना ने उसे ऊपर से नीचे देखा और मुस्कुरायी - मैश,.'… गज़ब लग रही हो…

सुप्रिया ने शर्म के मारे अपनी आँखें झुका ली.

रुबीना ने सुप्रिया का दुपट्टा पीछे से उठा कर उसका सर धक् दिया - बस ये ज़रा सर धक् लो, कहीं किसी की नज़र न लग जाये… आयो चलो खाना खा लेते है…

रुबीना सुप्रिया को साथ लेकर रसोई घर के पास ले आयी और बहार से आवाज़ लगायी - अम्मी जी.. इसका खाना लगा दिया क्या…

अम्मी बुदबुदाते हुए बहार आयी - हाँ अब तेरे इलावा इसकी भी नौकरानी बन गयी हूँ न मैं… आयी बड़ी ये महारानी बनने इस घर में…

अम्मी गुस्से में वहां से बहार की और चली गयी और सुप्रिया उनकी बातें सुनकर थोड़ा हिल सी गयी थी.

रुबीना ने सुप्रिया के कंधे को हलके से थपथपाया जैसे उसे शांत कर रही हो - तुम बैठो यहाँ, मैं लाती हूँ…

सुप्रिया वहीँ ज़मीन पर बिछी एक दरी पर बड़ी मुश्किल सी बैठ गयी. बैठने से जैसे सूट और भी फास गया था. रुबीना जल्द hi अपने साथ दो थाली ले आयी.

रुबीना ने एक थाली सुप्रिया के आगे राखी - ये लो…

सुप्रिया ने स्टील की थाली को घूरा, उसमे दो रोटी थी, सब्जी और दही. पता नहीं सब्जी वेग थी या नॉन वेग…

वह ये सोच hi रही थी की रुबीना फुसफुसा कर बोली - इक़बाल ने मुझे बता दिया था… बेफिक्र रहो… शाकाहारी hi है… काफी सोचता है तुम्हारे बारे में वह… वैसे तुम्हारे चेहरे का नूर देख कर दिख रहा है क्यों.

सुप्रिया रुबीना की और देख कर मुस्कुरायी और अपनी आँखें फिर से झुका ली.

रुबीना - तुम शर्माती बोहोत हो… हम दोनों को तोह आपस में काफी खुलना पड़ेगा… चलो धीरे धीरे हो जायेगा…

सुप्रिया इधर उधर देखते हुए बोली - हिना नहीं दिख रही… उसे खाना नहीं खाना?

रुबीना - उसके तोह पर hi निकल आये है… अपनी सहेलियों को बताने गयी है अपनी नयी चची के बारे में… बच के रहना उससे, तुम्हारे कान कुतर देगी…

सुप्रिया ने मुस्कुरा के खाना खाना शुरू किया. बैंगन की सब्जी थी और काफी अछि बानी थी. पर इस समय तोह उसे कुछ भी मिलता तोह ाचा hi लगता.

रुबीना ने छुपी को तोड़ते हुए पुछा - कहाँ से हो वैसे तुम?

सुप्रिया ek-do पल सोचा, जो उसे सबसे पहले सूजा उसने वही बोल दिया - कानपूर के पास से…

रुबीना ने उसकी और तीखी नज़रो से देखा, जैसे उसके अंदर झाँक रही हो - ाचा… ाचा है…

सुप्रिया ने भी हिम्मत करके पुछा - हिना आपकी एक लौटी बेटी है?

रुबीना - नहीं उसकी दो और बड़ी बहने है, उनकी शादी हो गयी…

सुप्रिया - ाचा… बस अब हिना रह गयी…

रुबीना - हाँ उसकी भी कर देंगे… इससे पहले की उस पर जवानी का भूत सवार हो…

सुप्रिया उसकी इस बात से थोड़ा शर्मिंदा सी हो गयी, जैसे रुबीना उसे hi ताना मार रही हो.

रुबीना समझ गयी की सुप्रिया को उसकी बात अछि नहीं लगी तोह वह हस्ते हुए बोली - तब तक तुम उसे सम्भालो… तुम वैसे तोह उम्र में उसकी भाभी या बड़ी बेहेन जैसी हो, तोह वह तुम्हारी सुन लेगी.

सुप्रिया धीरे से बोली - वैसे आप कहीं से तीन बच्चो की माँ तोह नहीं लगती हैं…

रुबीना हस्ते हुए बोली - अब तोह ये बदन हर तरफ से फ़ैल सा गया है, पर हाँ जवानी में देखती तुम मुझे, तुमसे भी ज्यादा सुन्दर थी मैं…

सुप्रिया - अभी भी मुझसे ज्यादा hi सुन्दर हो… अभी आपकी उम्र hi क्या होगी… 35-36…

रुबीना को और तेज़ हसी आ गयी - काश… तुम मज़ाक़ ाचा कर लेती हो… अब तोह चालीस पार हो चुकी हूँ… बंज़र ज़मीन हो गयी हु… पर तुम तोह अभी हरियाली बन्नो हो... वैसे तुम्हारी उम्र कितनी है...

सुप्रिया रुबीना के सामने घबरा सी रही थी और उसने झट से बोल दिया - मैं बस कल hi 26 की हुई हूँ...

ये बोलते hi सुप्रिया ने सोचा की वह कैसी मनहूस सी रात थिस बर्थडे वाली कृति के घर पर. एक दिन hi हुआ था, पर इतना कुछ हो गया था उस एक दिन में.

रुबीना ने हाथ हवा में मटकते हुए कहा - वाह्ह जी... तुम 26, तुम्हारे मियां जी 42... मालूम होता है तुम्हे अपने से बड़ी उम्र के मर्दो को रिझाना ाचा लगता है... वैसे तुम्हारे लोगो में नहीं मिला था कोई फ़साने के लिए...

सुप्रिया ने घूर कर रुबीना की और देखा, वह ये क्या बोले जा रही थी. वह शायद उतनी मीठी भी नहीं थी जितनी उसे लग रहा था. सुप्रिया उन्हें क्या hi सफाई देती, विक्रम भी तोह उससे काम से काम 10 साल बड़ा थे उम्र में.

रुबीना उसका उतरा हुआ चेहरा देख कर बोली - मेरी बातों को दिल से न लगाया... तुम तोह मेरी बेटी की उम्र की hi हो...

इससे पहले की सुप्रिया कुछ और बोलती, बहार से अम्मी तेज़ कदमो से चलते हुए आयी - हाय... हाय... रब्बू... पूरे मोहल्ले में खबर फ़ैल गयी दिखे है...

रुबीना - क्या कर रही हो अम्मी जी...

अम्मी - हाँ.... अभी तोह बात हुई मेरी बराबर में... पल्ली पार वाले लोगो को भी पता है... तू तैयार हो जा... अब्बास आता hi होगा... आज तोह फसाद हो कर hi रहेगा...

रुबीना ने जल्दी से खाने की प्लेट समिति और रसोई में जल्दी से राखी और बहार आ कर सुप्रिया को कहा - तुम जायो... हिना के कमरे में बैठो... और बहार नहीं आना जब तक मैं न बुलायु...

सुप्रिया बुरी तरह घबरा रही थी, पर उसने रुबीना की बात झट से मानी और हिना के कमरे में जल्दी से घुस गयी और दरवाज़ा बंद कर लिया. सुप्रिया का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, पता नहीं सब लोग इतना क्यों डरे हुए थे.

और कुछ hi मिनट बाद एक आदमी के ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आयी. इस भारी लकड़ी से बने दरवाज़े के बंद होने के बावजूद ये कड़क आवाज़ अंदर तक पहुंच रही थी. ये जरूर इक़बाल के बड़े भाई अब्बास की आवाज़ थी. सुप्रिया खिड़की के दरवाज़े से ओट लेकर बहार की और देखने लगी.

अब्बास - रुबिनाआ.... अम्मीी..... कहाँ मर गए सब....

एक आदमी तेज़ चलता हुआ उनके घर में घुसा. उसकी लम्बाई इक़बाल से थोड़ी सी छोटी थी, पर उसका शरीर हत्ता कट्टा था. उसके चेहरे पर छोटे छोटे गद्दे से हो रखे थे और वह उम्र में 50-55 का तोह काम से काम था hi.

अब्बास फिर से चिल्लाया - रुबिनाआ.....

रुबीना - हाँ जी.... आयी...

अब्बास - मैं ये क्या सुन रहा हूँ... इक़बाल घर वापस आ गया है....

रुबीना अपना सर झुकाते हुए बोली - जी... वह...

अब्बास - और तुम लोगो ने मुझे फ़ोन करने की भी ज़ेहमत नहीं उठायी... गैरो से पता चल रहा है मुझे की मेरे घर में क्या तमाशा हो रहा है...

अम्मी भी वहां आ गयी थी, और उसने आग में घी लगते हुए कहा - मैंने तोह बोलै था इसे... पर ये hi हमदर्द बन रही थी उसकी....

अब्बास - कहाँ है वह.... और उसके साथ कोई औरत भी आयी है?? ये क्या बूचड़खाना बना रखा है घर को... इक़बाल...

इक़बाल भी एक कमरे से निकलता हुआ बहार निकला, उसकी नज़र नीचे झुकी हुई थी - भाई जान...

अब्बास - एक तोह तुम सालो बाद यहाँ वापस आये हो... और इतने ज्यादा बेगैरत हो की खानदान का नाम फिर से ख़राब कर दिया...

इक़बाल सफाई देते हुए बोलै - भाई जान मैंने ऐसा कुछ नहीं...

अब्बास - एक लफ्ज़ नहीं निकालो मुँह से...

रुबीना बीच में बोली - अब वह बोलेगा नहीं तोह बताएगा कैसे...

अब्बास गुस्से में रुबीना पर भड़का - तुम क्यों उसकी वकालत कर रही हो...

रुबीना - नहीं बस इतना कहना चाहती हूँ की आपका भाई आया है दस साल बाद... फिर से वह गलती न दोहराये... और अबकी बार गया तोह शायद आप दोनों एक दुसरे को फिर से देख भी न पायो...

रुबीना की बात सुन कर अब्बास का गुस्सा तोह काम नहीं हुआ पर उसकी आवाज़ कुछ पल के लिए रुक गयी. इक़बाल कुछ बोलने को हुआ था पर रुबीना ने उसे इशारे से छुप करा दिया, जैसे वह अब्बास को सोचने का मौका दे रही हो.

अम्मी भी अब रुबीना की तरफ हो ली - हाँ बीटा... आया तोह दस साल बाद है...

अब्बास ने रुबीना की और देखा - बुलायो ज़रा उस लड़की को जिसे ये साथ लाया है...

रुबीना - मैं लाती हु उसे...

इक़बाल बोलने को हुआ - भाभी....

पर फिर छुप हो गया. रुबीना ने हलके से कमरे का दरवाज़ा खोलते हुए सुप्रिया को कहा - सुनो... आ जायो बहार...

सुप्रिया अपना सर झुकाये रुबीना के साथ बहार आ गयी. अब्बास तब तक एक खाट पर बैठ गया था. वह दोनों जाकर अब्बास के सामने कड़ी हो गयी, और अब्बास उन दोनों को घूरे जा रहा था.

रुबीना - जी... ये है... सुप्रिया....

ये नाम सुनकर अब्बास ने अपना मुँह बिचकाया और इक़बाल की और देखा. वह शायद अपने दिल में आ रहे अल्फ़ाज़ अंदर दबा के रह गया.

कुछ देर सोचने के बाद उसने रुबीना की और देखा और बोलै - मैं इमाम साहब से आज hi बात करता हूँ... तुम इन दोनों के निकाह की तैयारी शुरू करो... पर तब तक ये दोनों बिलकुल अलग रहेंगे...

उसके ये बोलते hi सुप्रिया ने बुरी तरह चौंकते हुए इक़बाल की और देखा और फिर रुबीना की और. उस दोनों के hi सर झुके हुए थे. अब्बास ये क्या बोल रहे थे, निकाह! और वह भी उसका और इक़बाल का!

सुप्रिया ने अब्बास की और देखा पर वह तब तक खड़ा हो कर, अपने हाथ पीछे बाँध कर घर के बहार की और चलने लगा था.
 
अपडेट 78

रात का खाना हो चूका था और सुप्रिया और हिना साथ में उसके कमरे में बिस्तर पर बैठे थे. दिन से लेकर अब तक सुप्रिया अकेले में एक मिनट भी इक़बाल से बात नहीं कर पायी थी. इक़बाल के भाई जान तोह बस अपना फरमान सुना कर वहां से चले गए थे, पर उससे जो तूफ़ान सुप्रिया के अंदर चल रहा था उन्हें इसका ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था.

हिना की खुशमिजाज़ आवाज़ ने सुप्रिया का ध्यान अपनी और खींचा - चची आप यकीं नहीं करेंगी मुझे कितना ाचा लग रहा है आपके आने से... आप तोह बस अब रोज़ रात मेरे साथ hi सोना...

अभी सुप्रिया को उनके घर आये 24 घंटे भी नहीं हुए थे और ये लड़की तोह बस सुप्रिया की दीवानी सी हो गयी थी.

सुप्रिया - हम्म्म... हाँ...

हिना - आप हमेशा hi इतना काम बोलते हो या बस मेरे साथ...

सुप्रिया थोड़ा सा मुस्कुरायी - नहीं बस तुम्हारे साथ...

हिना का मुँह बन गया पर उसने देखा की सुप्रिया की मुस्कराहट बढ़ती जा रही थी - मजाक कर रहे हो न आप मेरे साथ...

सुप्रिया हस्ते हुए - है है है तुम बहुत प्यारी हो... ाचा चलो अब सो जाये अगर तुम्हारी बातें ख़तम हो गयी हो तोह...

हिना - जी चची… आपकी बात मैं कैसे मन कर सकती हूँ...

हिना कड़ी हो कर एक ताला लेकर अपने कमरे के दरवाज़े पर लगाने लगी. सुप्रिया को उसका ये करना थोड़ा अजीब सा लगा - ये.... ताला क्यों लगा रही हो?

हिना ने कंधे उचकाए - अम्मी कहती है... की मुझे ताला लगा कर सोना चाहिए... कभी नहीं लगा होता तोह वह बहुत दांती है मुझे... आप hi पूछना न उनसे की ऐसा क्यों करवाती है मुझसे...

सुप्रिया - हाँ ठीक है... मैं पूछूँगी उनसे...

सुप्रिया गौर से देखने लगी की हिना ताले की चाबी कहाँ रख रही थी. इक़बाल ने बोलै था की उन्हें आज रात hi यहाँ से निकलना होगा. और आज दिन में जो हुआ उसके बाद तोह उसका भी एहि मैं था. जो होगा फिर बहार देखा जायेगा.

हिना ने कमरे की बत्ती बंद करि पर बिस्तर पर आ कर लेट गयी. सुप्रिया भी उसके ठीक बराबर में लेती हुई थी. पर नींद अभी उससे कोसो दूर थी. मानसिक खयालो के ेलवार सुप्रिया की टाइट कुर्ती उसे चैन से लेटने भी कहाँ दे रही थी.

कुछ देर बाद इक़बाल छत से नीचे दबे पाँव आया और हिना के कमरे की तरफ बढ़ने लगा, पर तभी उसने वहां सामने अपने भाई जान अब्बास को खड़ा देखा. अब्बास हिना के कमरे की खिड़की से अंदर झाँक रहा था.

अब्बास ने भी इक़बाल को आते देख लिया और वह अपने हाथ पीछे बाँध कर टहलने लगा और फिर इक़बाल की और देखते हुए बोलै - इक़बाल... कहाँ सो रहे हो तुम आज रात...

इक़बाल - भाई जान वह... मैंने अपना कमरा खोला था पर अभी यहाँ अंदर काफी धुल और घुटन सी हो रही है... तोह सोचा एहि नीचे सो जायु...

अब्बास - हाँ... अम्मी के कमरे में सो जायो तुम... कल साफ़ कर लेना अपना कमरा...

इक़बाल - आप यहाँ नीचे... आप तोह ऊपर सोते है न...

अब्बास आँखें चुराते हुए बोलै - हाँ वह अम्मी से मश्वरा करने आया था की किस किस को निकाह में बुलाना है...

इक़बाल दबी हुई आवाज़ में बोलै - भाई जान एक बात बोलू... आप बुरा न मन्ना...

अब्बास उसकी घबराई हुई शकल देख कर और भी सख्त सा हो गया - बोलो... अभी भी इतना घबराते हो...

इक़बाल - बस वह... खैर... मैं कह रहा था की ये निकाह की क्या जरूरत है... भाभी ने बताया होगा आपको...

अब्बास - देखो... मैं सीढ़ी बात करता हूँ... मुझे तुम पर भरोसा नहीं है... एक तोह पता नहीं तुम इसे कहाँ से भगा के लाये हो... निकाह किया भी है या नहीं... और किया भी है किस तरह से... फिर गाँव में हमारी भी कुछ इज़्ज़त बची रहे या नहीं...

इक़बाल अपने अंदर थोड़ी हिम्मत लाने की कोशिश कर रहा था - पर भाई जान... दुबारा निकाह करना भी तोह सही नहीं होगा...

अब्बास इक़बाल को आँखें दिखते हुए बोलै - अब तुम हमें सिखाओगे की क्या सही है और क्या गलत...

इक़बाल - नहीं भाई जान... वह बस...

अब्बास - देखो... ये लड़की यहाँ इस घर में बिना निकाह के नहीं रह सकती, ये हराम है... अगर तुम्हे निकाह करने से कोई दिक़्क़त है तोह मुझे इससे निकाह करना पड़ेगा...

इक़बाल ने एक डैम से सर उठा कर अब्बास की और देखा और जल्दी से बोलै - नहीं नहीं भाई जान... ऐसा कुछ नहीं है... मुझे निकाह करने में कोई दिक़्क़त नहीं है...

अब्बास - हम्म्म... ठीक है... कल आप आ रही है... और फिर मैंने इमाम साब से भी बात कर ली है... तीन दिन बाद जुम्मे के दिन hi सब कर देंगे...

इक़बाल चौंकते हुए - इतनी जल्दी??

अब्बास - बर्खुदार, तुम्हे जड़ी नहीं है क्या? कहीं तुम दोनों के बीच जिस्मी तालुकात तोह नहीं...

इक़बाल ने अपने हाथ न में हिलाते हुए कहा - नहीं भाई जान... ऐसा कुछ नहीं भी नहीं...

अब्बास ने अपना मुँह बनाते हुए कहा - हम्म्म... चलो कल बात करते है अब... सो जायो जाकर...

अब्बास वहां से चलता हुआ सीढ़ियों से ऊपर की और चला गया. उसके ऊपर जाते hi इक़बाल ने कमरे के बहार बैठक वाली जगह पर एक खाट बिछा ली और उसपर लेट गया. उसे भी सब सोच कर नींद कहाँ आ रही थी. धीरे धीरे रात का सन्नाटा बढ़ता जा रहा था और बस बहार से कुत्तो के भौकने की आवाज़ आ रही थी.

शायद कुछ hi देर में उसकी आँख लग भी जाती पर उसे ऐसे लगा की कोई उसे बुला रहा हो - chhh...chhh छह... छह...

इक़बाल ने कमरे की और देखा और उसे खिड़की में से झांकती हुई सुप्रिया दिखाई दी. वह जल्दी से उसकी और खड़ा हुआ - मैडमजी... क्या हुआ...

सुप्रिया धीमी आवाज़ में बोली - श... थोड़ा धीरे.. कोई जग जायेगा... आपने कहा था न... रात को यहाँ से निकलना है...

इक़बाल - हाँ मैडमजी... पर इतनी रात में... बहार काफी अँधेरा होगा... और इस समय कोई बस भी नहीं मिलेगी... फटफटिया का इंतज़ाम भी नहीं हो पाया...

सुप्रिया ने उसकी तरफ देख कर गुहार लगायी - कोई नहीं... पैदल चल लेंगे... बस यहाँ से निकल जाये...

इक़बाल - ठीक है मैडमजी... जैसा आप कहे...

इक़बाल उसका दरवाज़ा खोलने की और बड़ा पर वह अंदर से बंद था. सुप्रिया ने उसे इशारे से रुकने के लिए कहा और फिर अँधेरे में चाबी ढूंढ़ने लगी. उसे चाबी मिल गयी और उसने धीरे से ताला खोला और फिर कमरे की कुण्डी.

सुप्रिया बहार आ गयी और इक़बाल उसके ठीक सामने खड़ा था. सुप्रिया का दिल डर के मारे ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, और उसे ऐसा लग रहा था की इक़बाल का भी एहि हाल था. इक़बाल ने हलके से सर हिला के सुप्रिया की और देखा जैसे पूछ रहा हो की वह तैयार थी क्या. सुप्रिया ने भी उसकी और सर हिला दिया.

दोनों दबे पाँव बहार बैठक से होते हुए, बांस के लटकते हुए पर्दो को हटा के बहार ानगर में निकले और फिर दरवाज़े की और. इक़बाल ने दरवाज़े का ताला खोला और बहार की और निकला, सुप्रिया उसके ठीक पीछे. इक़बाल ने दरवाज़े को बहार से बंद कर दिया.

दोनों अँधेरे में तेज़ तेज़ कदम रखते हुए चलने लगे. रात का सन्नाटा सुप्रिया की बेचैनी को और भी बड़ा रहा था. उन्होंने एक गली पार कर ली और फिर दूसरी. पर तभी उनके सामने एक कुत्तो का झुण्ड दिखाई दिया. वह सुप्रिया और इक़बाल को देख कर उनकी और ज़ोर ज़ोर से भौकने लगे और उनकी और लपके.

सुप्रिया बुरी तरह डर गयी और चीखती हुई इक़बाल से लिपट गयी. उसने जैसे hi अपना हाथ ऊपर करके इक़बाल के गले में डाला उसे एक चर्रर्र की सी आवाज़ सुनाई दी, उसकी कुर्ती एक साइड से पूरी तरह उधड़ गयी थी. इक़बाल ने भी सुप्रिया को जकड़ते हुए अपने हाथ उसकी कमर पर रख दिए.

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सुप्रिया ने झट से अपना हाथ इक़बाल के गले से हटते हुए उससे एक कदम पीछे हुई और वह अपना हाथ उस जगह पर ले गयी. फटी हुई कुर्ती में से वह अपनी ब्रा की स्ट्राप को महसूस कर पा रही थी.

इक़बाल कुत्ते को उनसे दूर भागने लगा पर शोर होने से आस पास के घर के लोगो की आवाज़ आणि शुरू हो गयी थी.

इक़बाल जल्दी से बोलै - मैडमजी... चलिए जल्दी इनके बीच में से निकल लेते है... घबराइए नहीं...

सुप्रिया परेशान होते हुए बोली - नहीं इक़बाल... मेरी कुर्ती फैट गयी है... हमे वापस जाना होगा...

एक घर के अंदर से आवाज़ आयी - कौन है बहार...

इक़बाल घबराते हुए बोलै - चलिए फिर जल्दी...

लोगो के आने से पहले वह दोनों जल्दी से वापस अपने घर की भागे, do-teen कुत्ते उनके पीछे पीछे. कुछ hi पल बाद वह गली के अंदर मुद गए थे और जल्द hi वापस इक़बाल के घर के बहार खड़े थे. इक़बाल ने आहिस्ता से दरवाज़ा खोला और वह दोनों घर के अंदर आ गए जहाँ अभी भी सन्नाटा था.

सुप्रिया के चेहरे पर मायूसी साफ़ दिखाई दे रही थी. इक़बाल ने धीरे से घर की कुण्डी लगायी और वह दोनों वापस बैठक की और आ गए.

इक़बाल धीरे से बोलै - माफ़ कीजिये मैडमजी...

सुप्रिया नीचे देख रही थी - नहीं... इसमें आपकी क्या गलती... इससे पहले कोई जग जाये मैं वापस कमरे में जाती हूँ...

सुप्रिया हिना के कमरे में घुस गयी और उसने कमरे की कुण्डी और ताला लगा दिया. इक़बाल बैठक में बहार खड़ा हुआ था, उसे अभी भी घर के बहार कुत्तो का शोर सुनाई दे रहा था. आज रात यहाँ से निकला नामुमकिन था, और अगर भाई जान को इस बारे में ज़रा भी पता चल गया तोह शायद क़यामत hi आ जाये.

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सुबह सुप्रिया की आँख हिना के चीखने से खुली - चची... ये क्या हुआ... आपकी कुर्ती कैसे फैट गयी...

सुप्रिया ने आँख मलते हुए हिना की और देखा - ओह्ह्ह.... मुझे नहीं पता... शायद कुछ ज्यादा hi टाइट थी...

हिना की चीख सुन कर बहार से रुबीना की आवाज़ आयी - हिनाआ... क्या हुआ...

हिना जल्दी से दरवाज़ा खोलने के लिए कड़ी हुई, और दरवाज़ा खोते hi वह अपनी अम्मी को बताने लगी - अम्मी... चची की कुर्ती फैट गयी...

रुबीना हैरान होते हुए बोली - हेंनन... कुर्ती फैट गयी... कैसे...

रुबीना कमरे में अंदर घुसी और सुप्रिया की और देखने लगी, सच में उसकी करती तोह फटी हुई थी. सुप्रिया उसकी नज़र अपनी कमर पर देख कर अपने आप को ढकने की कोशिश करने लगी.

रुबीना ने हिना की और देखा - चल तू बहार जा... मैं देख लुंगी... जल्दी से जाकर नाहा ले... तेरी फूफा आने वाली होंगी...

हिना नाक सड़ते हुए बोली - फूफा!!! वह क्यों आ रही है सुबह सुबह...

रुबीना - मैंने बोलै था न कल... तेरे चाचा चची की शादी के लिए...

हिना - ओह ाचा.... हम्म... थोड़ी देर और सो लू?

रुबीना - सुन ले... वह तुझे ऐसे देखेंगी न तोह तुझे पता hi है कैसा केहर आ जायेगा...

हिना मान मारते हुए बहार की और चली गयी, और रुबीना का ध्यान फिर से सुप्रिया की और गया.

रुबीना हस्ते हुए बोली - क्या हुआ... रात को देवर जी कमरे में घुस गए थे क्या...

सुप्रिया झेपते हुए बोली - नहीं.... पता नहीं कैसे... कल भी काफी फांसी हुई सी लग रही थी...

रुबीना - हम्म्म... तुम्हारे बब्बे हिना से बड़े है न... पर कुर्ती का ऐसे फैट जाना.... चलो कोई नहीं, फिलहाल के लिए अपनी एक कुर्ती दे देती हूँ, वह थोड़ी ढीली आएगी, और बाद में हिना की कुछ कुर्ती ढीली कर दूंगी... या ऐसा करते है दर्ज़ी के यहाँ चलते है...

सुप्रिया हलके से बोली - जी...

रुबीना उसे टोकते हुए बोली - जी भाभी बोलना सीख लो अब...

सुप्रिया हिचकिचाते हुए बोली - भाभी... वह मुझे... नहाना था...

सुप्रिया को ये बोलने में काफी शर्म सी आ रही थी, पर वह दो दिन से नहीं नहायी थी और उसे अपने अंदर से काफी बदबू आने लगी थी, और रास्ते की धुल धक्कड़ और पसीनो ने उसके शरीर को बेहाल कर दिया था.

रुबीना - हाँ हाँ... मैं बस तौलिया और कपडे लायी और फिर तुम्हे घुसल खाने ले कर चलती हूँ...

सुप्रिया बीएड पर उठ के बैठ गयी और बीएड पर पड़ी हुई चिकनी सी करण्डी को अपने ऊपर लपेट लिया. खिड़की से उसे इक़बाल का चेहरा भी दिखाई दिया जो खड़ा हुआ बस इधर उधर देख रहा था.

तभी अम्मी की आवाज़ आयी - इक़बायल... यहाँ क्यों खड़ा है... जा देख ज़रा... तेरे भाई को कोई मदद तोह न चाहिए...

इक़बाल - जी अम्मी...

अम्मी - और रुबीना... ये रात को ताला न लगाया था क्या... अब्बास बड़बड़ा रहा था सुबह...

रुबीना की आवाज़ कहीं दूर या ऊपर से आयी - अम्मी जी मैंने तोह लगाया था ताला...

अम्मी - तोह क्या भूत आके खोल गया...

इक़बाल का चेहरा खिड़की से गायब हो गया, और सुप्रिया का मुँह फिर से लटक गया था. कल रात को उनकी यहाँ से निकलने की कोशिश नाकामयाब हुई थी, और अब ऐसा लग रहा था की और लोग यहाँ आ रहे थे, जिससे यहाँ से निकलने बेहद hi नामुमकिन हो जायेगा. उसे इक़बाल को बोल कर किसी भी तरह विक्रम तक ये खबर पहुचानी hi होगी.

जल्द hi रुबीना वापस कमरे में आ गयी थी - पता नहीं ये लड़की क्या करती है... खैर... सुप्रिया आयो ज़रा... मैं तुम्हे लेकर चालू...

सुप्रिया हलके से सर हिलाते हुए बिस्तर से कड़ी हुई, अभी भी करण्डी को लपेटे हुए था.

रुबीना - ारी.. इसको कहाँ लेकर जायेगी घुसल में... यहीं छोड़ दू...

सुप्रिया - पर वह... मेरी कुर्ती...

रुबीना - कोई घबराने की बात नहीं है... तुम्हारे जेठ जी और इक़बाल दोनों hi घर में नहीं है... और वैसे भी इक़बाल से तोह तुम क्या hi शरमाओगी...

सुप्रिया अपने चेहरे पर एक नर्वस सी झूठी मुस्कान लायी. रुबीना उसे बहार ले जाते हुए आँगन में लायी और वहां साइड में भी एक घुसल खाना बना था, जिसमे दो दरवाज़े थे. दीवारे ीठों की थी और उन पर कोई प्लास्टर नहीं हुआ था.

रुबीना ने इशारे से कहा - ये नहाने का, और ये बाकी दुसरे कामो का... ये लो कपडे और तौलिया, जब बहार आयो तोह सर धक् के आना...

सुप्रिया - जी...

रुबीना ने फिर से टोका - जी भाभी! चलो कोई अब दो दिन में पक्की तरह से भाभी बन जयुंगी...

सुप्रिया ने आँखें झुका ली और वह घुसल खाने में अंदर घुस गयी. घुसल खाने में ऊपर छत नहीं थी, जिससे सुप्रिया को काफी अजीब सा लग रहा था. वहां एक पुराणी सी बाल्टी और मग्गा रखा हुआ था.

सुप्रिया ने टूटी को घुमाया और बाल्टी में पानी को भरने लगी. सुप्रिया ने ऊपर की और देखा, ऊपर बस आसमान नज़र आ रहा था. दीवारें काफी ुचि थी तोह सुप्रिया घर की ऊपर वाली मज़िल को नहीं देख पा रही थी. इसी से उसे तस्सली हुई की वहां से भी उसे कोई नहीं देख पायेगा. सुप्रिया ने झिझकते हुए धीरे धीरे अपने कपडे धीरे धीरे उतारने शुरू किये. कुर्ती तोह उतारते उतारते और भी फैट गयी. फिर पयजामि, फिर और उसकी ब्रा और आखिर में अंडरवियर.

सुप्रिया को सब कुछ काफी गन्दा सा लग रहा था, उसे इस तरह के बाथरूम में होने की आदत नहीं थी. पर उसके पास उपाय hi क्या था. उसने एक गहरी सांस भरी और पानी का मग्गा उठाते हुए अपने चेहरे पर डाला. पर ठंडा था और वह काँप उठी, पर उसने जल्दी से एक और मग्गा उठा कर डाला. वहीँ एक साबुन की टिक्की राखी, उसने उसे उठाया और अपने शरीर पर मलने लगी. उसे कल के सारे मेल को अपने शरीर से हटाने था.

सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली थी और वह एक के बाद एक मग्गा पानी अपने ऊपर डालने लगी. उसे अब पहले से थोड़ा बेहतर लग रहा था. नाहा कर उसने अपने शरीर को एक पतले से तौलिये से सूखने लगी. और उसके बाद रुबीना के दिए हुए कपडे पेहेन्ने लगी. चड्डी और ब्रा काफी घिसी हुई सी थी, शायद वह नयी नहीं थी. सुप्रिया को ये सोचते hi गन्दा सा लगने लगा. न चाहते हुए भी उसने उन्हें पेहेन लिया और फिर ऊपर से रुबीना की ढीली सी कुर्ती और पजामी.

सुप्रिया ने तौलिया से अपना सर ढाका और घुसल खाने का दरवाज़ा खोला. वह जल्दी से वापस हिना के कमरे की और जाने लगी. अम्मी जी वहीँ आँगन में बैठी थी और वह सुप्रिया को घूर कर देख रही थी. सुप्रिया उन्हें अनदेखा करते हुए जल्दी से घर के अंदर घुस गयी.

रुबीना हिना के कमरे में बैठी हुई एक कुर्ती को ढीला कर रही थी - आ गयी तुम... ठीक से नाहा पायी...

सुप्रिया - जी.. शुक्रिया भाभी...

उसे भाभी बोलते hi अजीब सा लग रहा था. भाभी बोलने का मतलब था वह इक़बाल को अपना शौहर कबूल कर रही थी?

रुबीना मुस्कुराते हुए बोली - ये हुई न बात... चलो अपने बाल सूखा के बना लो... और फिर बहार नाश्ता करने आ जाना...

रुबीना के कमरे से जाते hi सुप्रिया अपने बाल तौलिये से सूखने लगी और फिर एक कंघी से उसने बनाने लगी. वह थोड़ी देर बाद बहार रसोई घर की तरफ आ गयी. रुबीना ने तब तक सबके लिए नाश्ता लगा दिया था. अम्मी और हिना भी वहीँ बैठी थी.

हिना - अम्मी... फुफु तोह अभी तक नहीं आयी... आपने बोलै था वह बस आ रही है...

रुबीना - आ जाएँगी... अब इतनी उतावली क्यों हो रही है...

हिना - नहीं... मुझे बता देना जब वह आएँगी तोह मैं अपनी सहेली के यहाँ चली जयुंगी...

रुबीना - अपनी चची को यहाँ छोड़ कर? वैसे वह शाम तक आएँगी... मैंने तोह बस तुझे उठाने के लिए बोलै था... अभी तोह मुझे तेरी चची को रफ़ीक़ चाचा के यहाँ लेकर जाना है और फिर थोड़े कपडे दिलवाने है...

हिना चहकते हुए बोली - मैं भी चालू साथ में...

रुबीना - तू क्या करेगी चल कर...

हिना - अम्मी... मुझे भी ले चलिए न... प्लीज...

रुबीना - ाचा ठीक है... अम्मी जी... मुझे ज़रा इसे बाजार तक लेकर जाना पड़ेगा कपडे दिलवाने के लिए...

अम्मी ताना मारते हुए बोली - हाँ ले जा... ये तोह ऐसी hi यहाँ नंगी चली आयी तोह अब कपडे भी हमे hi दिलवाने पड़ेंगे...

सुप्रिया को ये सुन कर काफी ख़राब सा लगा पर वह चुप चाप अपना खाना कहती रही.

अम्मी - सुन.... सब पूछेंगे इसके नाम क्या है... तोह क्या बोलेगी? शाम के लिए भी तोह तैयार रहियो... इसका नाम सुनकर कहीं बतंगड़ न बन जाये...

रुबीना सोचते हुए बोली - नाम.... शबनम कैसा रहेगा...

हिना - की कितना गन्दा नाम है...

रुबीना - तोह फिर?

हिना - सफीना... ये कैसा रहेगा...

अम्मी - अरे लड़की तेरेको बड़े चटक मटक नाम सूझे हैं...

सुप्रिया को अजीब सा लग रहा था की वह लोग उसका hi नाम बदलने की बात कर रहे थे और कोई उससे hi नहीं पूछ रहा था.

रुबीना सुप्रिया की शकल पड़ते हुए बोली - सुप्रिया घबरायो नहीं.... बस ये बहार वालो के लिए होगा... हम तोह तुम्हे सुप्रिया hi बुलाएँगे...

सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया - जी भाभी...

नाश्ता ख़तम होने के बाद हिना और रुबीना तैयार होने चली गयी और थोड़ी देर बाद रुबीना एक थैला ले कर नीचे आ गयी. सुप्रिया एक कुर्सी पर बैठी कुछ सोच hi रही थी की उसे एहसास हुआ की रुबीना और अम्मी उसके ठीक पीछे खड़े है.

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रुबीना - आयो सुप्रिया.... चलते है... (और फिर वह हिना के कमरे की और देख कर चिल्लाई) और कितना सजेगी... तेरी शादी थोड़ी न है...

हिना - आयी अम्मी....

अंदर से हिना एक चटक सा लाल सूट पेहेन कर बहार निकली. उसे देखते hi अम्मी जी चिल्लाई - ये देखो... ये तोह लगे है खुद hi अपने ब्याह में जा रही है... रब्बू देख लियो भाई... दो जवान लड़कियों को साथ लेकर जा रही है...

रुबीना - अम्मी जी आप फ़िक्र मत हो... मैं बस थोड़ी देर में आयी...

रुबीना ने हिना के गाल पर प्यार से हलके से चांटा मारा और फिर वह उन दोनों के लेकर बहार की और चल दी. दिन की रौशनी में सुप्रिया को गाँव की गलियां और साफ़ दिखाई दे रही थी. पतली से गली के दोनों तरफ नाला सा था और हर जगह कूड़ा करकट. इधर उधर के लोग सुप्रिया को घूर रहे थे और उसने अपना मुँह चुन्नी से धक् लिया. कुछ लोग रुबीना को दुआ सलाम कर रहे थे, और रुबीना भी उन्हें आदाब करते हुए निकल रही थी.

हिना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी और उसने अपनी चची का हाथ कास के पकड़ा हुआ था. वह हर जगह के बारे में सुप्रिया को बताये जा रही थी. वह लोग शायद उसी जगह से सामने से निकली जहाँ से कल रात सुप्रिया वापस मुद गयी थी.

Ek-do गली और पार करके एक बाजार सा शुरू हो गया था. बाजार शुरू होते hi रुबीना एक दर्ज़ी की दुकान में घुस गयी, और हिना और सुप्रिया उसके पीछे पीछे. अंदर एक सफ़ेद टोपी पहने हुए बूढ़ा सा आदमी था, शायद एहि रफ़ीक़ चाचा थे.

रुबीना - चाचा जान सलाम वालेकुम...

रफ़ीक़ - वालेकुम... सब खैरियत रुबीना बेटी...

रुबीना - जी.. सब खैरियत है...

रफ़ीक़ ने उसके पीछे हिना और सुप्रिया की और देखा और फिर रुबीना की तरफ - मैंने सुना इक़बाल वापिस आ गया...

रुबीना - जी...

रफ़ीक़ ने सुप्रिया की और घूरा - और अपने साथ किसी को लाया है...

रुबीना - नहीं चाचा... ये तोह बस लोग ऐसे hi अफवाह फैला रहे है... कल मेरी दूर की बेहेन भी आयी है न... इसलिए...

रफ़ीक़ - अच्छा ाचा... ये क्या है तुम्हारी दूर की बेहेन... क्या नाम है तुम्हारा बीटा?

रुबीना - जी... इसका नाम सुप... इमम्म.. सफीना है...

रफ़ीक़ - सफीना... बहुत hi प्यारा नाम है...

सुप्रिया ने सर हिलाते हुए धीरे से शुक्रिया कहा.

रफ़ीक़ - कैसे आना हुआ फिर आज...

रुबीना - ये कुछ कपडे हैं... इस ज़रा सफीना के नाम के कर देंगे... नए hi है... बस थोड़ा सा इसके नाप का करना है इन्हे...

रफ़ीक़ ने थैले में से कपडे निकलने शुरू करे - हाँ हाँ क्यों नहीं... ारी ये तोह तुम्हारा लेंघा है...

रुबीना हस्ते हुए बोली - आपकी नज़र बड़ी तेज़ है अब भी...

रफ़ीक़ के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कराहट आ गयी - मैं अपने बनाये कपडे कभी नहीं भूलता... आयो बेटी यहाँ अंदर आ जायो मैं ज़रा नाम ले लू...

रफ़ीक़ ने एक लकड़ी का फटता ऊपर किया और सुप्रिया काउंटर के दूसरी और अंदर हो ली.

हिना - अम्मी... बहार नाज़ कड़ी है... मैं ज़रा उससे बात कर लू...

रुबीना - हाँ चल... मुझे भी उससे पूछना था कुछ... चाचा में दो मिनट में आयी...

सुप्रिया अकेली वहां अंदर रह गयी थी और रफ़ीक़ दूसरी और से अपना इंच टेप लेकर आया. वह मुस्कुराता हुआ सुप्रिया के पास पंहुचा और एक एक करके उसके नाप लेने लगा. गले का नाप, कंधो का, बाहों की मोटाई, हाथ की लम्बाई... और तभी सुप्रिया की कुर्ती की ब्याह थोड़ी सी ऊपर हो गयी और उसकी कलाई पर बंधा धागा दिखने लगा, जिस पर रफ़ीक़ की नज़र भी चली गयी.

सुप्रिया एक डैम घबरा सी गयी पर रफ़ीक़ इस बारे में कुछ बोलै नहीं - बेटी... ज़रा हाथ ऊपर करो... छाती का नाप लेना है...

सुप्रिया ने अपने हाथ ऊपर किया और रफ़ीक़ ने अपना एक हाथ में इंच टेप पकडे सुप्रिया के पीछे ले गया और फिर दुसरे हाथ से पकड़ते हुए उसे आगे लेकर आया. फिर उसने इंच टेप को सुप्रिया की पीठ पर चिपकते हुए आगे की और खींचा और सुप्रिया के मम्मो पर खींचते हुए इंच टेप से उसके मम्मो को कास के दबा दिया.

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ऐसा करते hi सुप्रिया की हलकी सी अह्ह्ह्ह निकल गयी और रफ़ीक़ के चेहरे पर एक गन्दी सी मुस्कान आ गयी - चौंतीस... बड़ा उम्दा साइज है...

तभी रुबीना वापस दूकान में घुसी - चाचा... हो गया सब...

रफ़ीक़ - हाँ बेटी बस... हो hi गया...

रफ़ीक़ आखिरी मैप के बहाने नीचे झुका और उसने सुप्रिया के पैरो पर हलके से हाथ फेरा. सुप्रिया उसके ऐसा करने से एक डैम से हिल गयी.

रफ़ीक़ बनते हुए बोलै - क्या हुआ बेटी... सब ठीक....

सुप्रिया - जी... कुछ नहीं... शायद चींटी थी नीचे...

रफ़ीक़ - हाँ आज कल काफी चीटियां हो रही है... रुबीना बीटा... तोह कब तक चाहिए तुम्हे ये सब...

रुबीना - इनमे से 2-3 आज रात तक दे देना और बाकी कल तक....

चाचा - ारी इतनी जल्दी कैसे हो पायेगा...

रुबीना - वह मुझे नहीं पता, आप कहेंगे तोह मैं इनको भेज दूंगी बात करने...

चाचा - ारी नहीं बीटा... इस सब में अब्बास मियां को कहाँ दाल रही हो... मैं करवाता हूँ आज hi...

रुबीना - चलिए फिर... आ जायो सफीना... खुदा हाफिज चाचा...

वह दोनों दूकान से नीचे उतर गए थे, पर सुप्रिया समझ गयी थी की उसके हाथ का ये लाल धागा उसकी पहचान ज़ाहिर कर रहा था. उसने धीरे धीरे अपने हाथ के धागे को अपने नाख़ून से काटना शुरू किया और फिर उसे वहीँ कहीं बाजार में गिरा दिया.

सुप्रिया ने देखा हिना गायब हो गयी थी - हिना कहाँ गयी...

रुबीना ने गहरी सांस ली - ारी क्या बतायु इस लड़की का... उसकी दोस्त शहनाज़... नाज़ बोलते है वैसे उसे... वह मिल गयी थी, तोह वह अब उसके साथ बाजार घूम रही है...

सुप्रिया - हम लोग अब कहाँ जा रहे है?

रुबीना - तुम्हारे लिए छड़ी लेने... मेरे पास नयी छड़ी नहीं थी तुम्हे सुबह देने के लिए....

सुप्रिया शरमाते हुए बोली - कोई बात नहीं...

रुबीना - दूसरो की छड़ी बनियान नहीं पेहेन्ने चाहिए... आयो...

रुबीना उसे बाजार की गलियों में से ले जाते हुए एक दुकान पर ले गयी, जहाँ दो मर्द बैठे थे. एक थोड़े उम्र का और एक थोड़ा जवान सा. दुकान पर ढेर साड़ी ब्रा और पंतय तंगी हुई या नीचे राखी हुई थी. ासुप्रिया शर्म के मारे अपने आँखें नहीं उठा पा रही थी. शादी से पहले वह ये सब शॉपिंग अपनी भाभी से करवा लेती थी, और शादी के बाद अतुल से, या फिर मॉल में से. उसे पहली बार इस तरह की दूकान से ये शॉपिंग करनी पद रही थी.

रुबीना शायद इन लोगो को भी अचे से जानती थी, पर सुप्रिया तोह अब सब कुछ सुन्ना बंद सा हो गया था. दूकान वाला सुप्रिया की और घूरता हुआ एक के बाद एक ब्रा और पंतय निकाले जा रहा था.

रुबीना ने सुप्रिया की और देखते हुए कहा - ये वाली कैसी है....

सुप्रिया के गले से आवाज़ hi नहीं निकल रही थी, उसने धीरे से कहा - जो आपके ठीक लगे...

रुबीना - शहर से ाचा माल नहीं आया दिखे...

दूकान वाला - आप... यहाँ कहाँ लोगो को ज्यादा कुछ चाहिए हॉवे...

रुबीना - चलो ाचा ये सब दे दो... पैसे ठीक लगा लेना...

दूकान वाला - आप तोह ऐसे hi ले जायो... बाद में हिसाब कर लेंगे...

रुबीना - न... हिसाब तोह मैं अभी कार्की जयुंगी...

रुबीना ने उन्देर्गर्मेन्ट्स के पेमेंट कर दी और वह सब सामान लेकर घर की और चलने लगे. रास्ते में रुबीना सुप्रिया से धीरे से बोली - देखो... दो दिन बाद तुम्हारा निकाह है... और कुछ चाहिए तोह बता दो...

सुप्रिया को ये सुनते hi गन्दा सा लग रहा था - जी नहीं... और तोह कुछ भी नहीं...

रुबीना - मेक उप.... लाली लिपिस्टिक... पाउडर... तेल... वह सब तोह घर पर है मेरे पास... गहने भी घर से कर देंगे... बाकी सब तुम्हारे जेठ जी और इक़बाल देख लेंगे... खाने का... सवजत... और बाकी सब...

सुप्रिया का दिल बैठा जा रहा था, यहाँ तोह शादी की जी तोड़ तैयारी हो रही थी - जी....

रुबीना ने सुप्रिया की और देखा - क्या हुआ... तुम खुश नहीं लग रही...

सुप्रिया - जी बस वह....

रुबीना - अपने घर वालो की याद आ रही है? देखो अगर भाग के आये तोह वह ऐसे तोह मानेंगे नहीं... एक बार शादी और बच्चा हो जाये... फिर चले जाना उनके सामने माफ़ी मांगने... अपना पोता पोती देख कर सब मान hi जायेंगे...

बच्चे का नाम सुनकर तोह सुप्रिया और भी परेशान सी हो गयी. वह आगे के बारे में सोचते हुए किसी तरह से घर पहुंची. रुबीना उसे अकेला छोड़ कर घर के बाकी कामो में लग गयी. थोड़ी देर बाद हिना भी घर आ गयी थी और वह सुप्रिया से बातें बनाने लगी.

अगर अभी सुप्रिया परेशान थी तोह उसे अंदाज़ा नहीं था की शाम को अभी फुफु नाम की क्या नयी बाला आने वाली थी.

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शाम जैसे जैसे होती आयी, सब लोग जल्दी जल्दी घर की सफाई में लगे थे. सुप्रिया भी जितना हो सके उनका हाथ बता रही थी. हिना ने उसे फुफु के बारे में थोड़ा सा बता दिया था, वह उसके अब्बा की छोटी बहिन थी, पर इक़बाल से बड़ी थी. वह पास के hi एक गाँव में रहती थी, और अम्मी ने सुबह hi उन्हें इक़बाल के आने की खबर कर दी थी. शायद सबने उनके डर के मारे से उन्हें बहुत ज्यादा नहीं बताया था.

शाम होते होते फिर से सुप्रिया की घबराहट बढ़ती जा रही थी. सुप्रिया बहार बैठक में hi बैठी थी जब घर के दरवाज़े की ज़ोर से खुलने की आवाज़ आयी और एक बड़ी उम्र की औरत दनदनाती हुई अंदर घुसी, एहि हिना की फुफु थी. उनके ठीक पीछे इक़बाल उनका सामान लेकर घर में घुस रहा था.

फुफु का मुँह बुरी तरह से गुस्से में था और उसने बैठक में आते हुए सुप्रिया पर एक नज़र डाली और फिर अम्मी के कमरे में घुस गयी. अंदर से उन दोनों के ज़ोर ज़ोर से रोने और चीखने की आवाज़ आ रही थी. सुप्रिया तोह घबरा hi गयी थी, पर रुबीना ने नीचे आ कर उसका हाथ पकड़ कर उसे हिना के कमरे में बिठा दिया.

थोड़ी देर बाद फुफु कमरे से बहार आयी - वह रुबीना भाभी वह... इक़बाल के आते hi आप अपनी बहिन को ले आयी यहाँ ब्याहने के लिए...

रुबीना थोड़ी चौंकी, उसने अम्मी को सुबह hi सबको ये कहानी बोलने के लिए कह दिया था पर उसे ये यकीं नहीं था की अम्मी अपनी बेटी को भी ये झूठी कहानी कह देंगी.

रुबीना - जी आप वह....

फुफु - न... मुझे न पट्टी पादयो... इतनी क्या आग लगी थी... इक़बाल के लिए तोह मैं एक से बढ़कर एक लड़की लेकर देती... उसे किसी जवान लड़की से hi शादी करनी थी तोह मेरी भतीजी है, वह बस अभी 18 की पूरी हुई है... तुम्हारी बहिन तोह काम से काम 22-23 की तोह होगी...

रुबीना - आप थोड़ा शांत हो जाये... मैं शरबत ले कर आती हूँ...

फुफु - शरबत पिलायो अपनी बेहेन को... हम तोह यहाँ आये है बस अपनी बेज़्ज़ती करवाने... बस अपनी अम्मी के खातिर, कहीं तुम और तुम्हारी बेहेन उन्हें घर से न निकल दे...

फुफु गुस्से में एक कुर्सी पर बैठ गयी. हिना एक शरबत का गिलास लेकर आ गयी और उन्हें पकड़ा दिया, और उन्होंने वह उसके हाथ से ले भी लिया. वह हिना को गौर से देखने लगी.

फुफु - अब इसकी भी तोह उम्र हो गयी है... बीसवे में लग गयी ये... इसका ब्याह तोह हमारे यहाँ करवा देना... या इसे भी अपने मायके भेज डौगी...

रुबीना - जैसा आप कहेंगे आप... ये आपकी ये तोह बच्ची है...

हिना छिड़ते हुए बोली - मुझे न करनी अभी शादी वादी... अभी तोह मेरी उम्र hi क्या है... पड़ना है मुझे आगे...

फुफु को और गुस्सा आ गया - देखो कैसे इसे भी सीखा रखा है अभी फुफु पर आग बरसाना... पहले तोह न थी ये ऐसी...

रुबीना - हिना... तू अंदर जा... सफीना के पास... आप आप भड़को नहीं... अब जैसा आप बोलोगे वैसा होगा...

काफी देर तक रुबीना फुफु को शांत करने में लगी रही, उनका गुस्सा धीरे धीरे उतर रहा था पर पूरी तरह गया नहीं था. रुबीना ने चुपके से सुप्रिया का रात का खाना हिना के हाथों उसके कमरे में hi भिजवा दिया ताकि वह फुफु के सामने न आये.

पर फुफु को भी ये बात दिख गयी थी - तुम्हारी बेहेन ने तोह पर्दा किया हुआ लगता है... बहार hi न आ रही कमरे से... मैं कौनसा उसे खा जयुंगी...

रुबीना - नहीं बस उसकी थोड़ी तबियत खराब है...

फुफु - हाँ हमारे आते hi उसकी तबियत भी ख़राब हो गयी... इससे अछि तोह इक़बाल की पहली बीवी थी, चाहे हमारे यहाँ की नहीं थी, पर बात तोह अचे से करती थी...

रुबीना ने देखा की इक़बाल ने ये बात सुन ली थी और वह चुप चाप छत पर निकल गया था. उसे जाते देख रुबीना बोली - आप उसका जिक्र न करे तोह बेहतर होगा...

फुफु ने हाथ मटकाये - चलो... जैसे तुम लोग ठीक समझो... पर जैसे तुमने कहा बाकी सब मेरे हिसाब से होगा...

रुबीना - जी...

फुफु - हम्म्म.... तोह ऐसा करते है... तुम मोहल्ले की औरतो को बोल देना... कल सुबह पहले तोह दूध दुहाई और फिर बाद में गरम सिकाई....

रुबीना ने ये सुनते hi मुँह बनाया - आप ये सब रिवाज़ तोह पुराने हो गए... करने जरूरी है क्या...

फुफु - लो जी... इसमें क्या पुराण और नया... बस दो hi तोह करने के लिए बोल रही हूँ… सारे तोह नहीं… अम्मी आप hi बोलो...

अम्मी कूदते हुए बोली - मेरी कौन सुने है... जैसे मर्ज़ी कर लो...

रुबीना - आज कल ये सब नहीं होता अब...

अम्मी - क्यों अभी कुछ महीने पहले पडोसी की बहु ने किया है...

फुफु - देखो रुबीना... पहली वाली तोह भगा लाया था... अब दूसरी वाली तोह में हमारे अरमान पूरे करने दो... गाँव के रिवाज़ भूल जाओगे नहीं तोह...

रुबीना समझ गयी थी की वह ये जुंग नहीं जीतने वाली थी. सुप्रिया को ये सब समझाना थोड़ा सा मुश्किल होगा, पर शायद उसे फिलहाल कुछ न बताना hi बेहतर होगा.

आज रात तोह फूफा ठीक हिना के कमरे के बहार खाट पर सो रही थी, तोह इक़बाल और सुप्रिया का निकलने के बारे में सोचना भी नामुमकिन था.

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सुबह होते hi सब जल्दी जग गए थे और घर में चहल पहल सी हो राखी थी.

रुबीना होने के कमरे में एक ड्रेस लेकर घुसी - सफीना... ये लो...

सुप्रिया उसके इस तरह अपने आप को सफीना बुलाने से थोड़ा हैरान थी, पर फिर रुबीना धीरे से बोली - कोशिश कर रही हु की अगले 1-2 दिन तुम्हे इसी नाम से बुलायु ताकि किसी के सामने गलती न हो जाये... जल्दी से नाहा के तैयार हो जायो... और ये पेहेन लेना...

सुप्रिया को ये पूछते हुए भी डर सा लग रहा था - जी.. कुछ ख़ास है क्या आज...

रुबीना - हाँ... कुछ गाँव के रिवाज़ रस्मे है... वही पूरी करनी है...

सुप्रिया - कैसी रस्मे?

रुबीना - वह मैं तुम्हे सब बता दूंगी... अभी जाकर तैयार हो जायो...

सुप्रिया कपडे ले कर नहाने घुसी और आज कल से थोड़ी जल्दी नाहा के तैयार हो कर वापस कमरे में आ गयी. उसने एक हलके गुलाबी रंग का सूट पहना हुआ था और सूट की फिटिंग होने के बाद वह उसके ऊपर एक डैम अचे से आ रहा था.

रुबीना वहीँ कमरे में थी और वह उसे कानो में झुमके पहनाने लगी और फिर उसके गले में एक पलटा सा नेकलेस दाल दिया. वह उसके बाल ठीक कर hi रही की थी फुफु कमरे में घुसी और सुप्रिया की और देखने लगी. रुबीना ने जल्दी से चुन्नी ले कर सुप्रिया का सर धक् लिया.

फुफु - हम्म्म... दोनों बहने यहाँ हो....

रुबीना - जी आप... बस अभी 10-15 मिनट में चलते है...

फुफु ने सुप्रिया की और बारीकी से देखा - हम्म... वैसे मन्ना तोह पड़ेगा खूबसूरत तोह बोहोत हो तुम... नूर सा टपक रहा है चेहरे से...

ये सुनते hi सुप्रिया ने शर्म से अपना चेहरा झुका लिया.

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फुफु - पर इसे पहले नहीं देखा... और रुबीना... ये क्या रिवाज़ हुआ इसे निकाह से पहले hi यहाँ बुलाने का... बड़े नए खलयात के हो रहे हो तुम...

रुबीना - जी वह फुफु... अभी हाल में काफी बुरा हुआ है बेचारी के साथ... इस वालिद चल बेस... और सुटली माँ ने बड़े ज़ुल्म किये इस पर... उसने तोह घर से इसे निकाल hi दिया था... तोह मैं इस यहाँ ले आयी... और जिस दिन इसके पाँव इस घर में पड़े उसी दिन इक़बाल भी वापिस आ गया, तभी मैंने तय किया की इसका निकाह इक़बाल से hi होगा...

फुफु ने ये कहानी सुनते हुए अपने मुँह पर हाथ रख लिया - ारी बच्ची... माफ़ करना मुझे... तेरे साथ तोह काफी बुरा हुआ है.... चलो ाचा है इक़बाल आ गया नहीं तोह तुम हिना की चची नहीं छोटी अम्मी बन जाती... क्यों भाई रुबीना...

रुबीना ने किसी तरह अपने चेहरे पर मुस्कराहट राखी - जी...

फुफु - चलो आ जायो फिर... हो गए हो तैयार तोह...

रुबीना - हाँ बस दो मिनट और...

फुफु बहार की और गयी और रुबीना ने फुसफुसा के सुप्रिया को कहा - सुप्रिया... जैसे मैं कहूं वैसे वैसे करती जाना... घबराना नहीं.... थोड़ा अजीब लगेगा पर इसमें डरने की कोई बात नहीं है... मुझपर भरोसा रखना... ठीक है न...

सुप्रिया - जी... आप जैसा कहे...

रुबीना सुप्रिया को लेकर बहार आयी और तब तक अम्मी और फुफु भी बहार खड़े थे. हिना भी तैयार सी कड़ी थी, पर उसे देख रुबीना ने कहा - हिना... मैंने तुझे रात को hi बोल दिया था, तू नहीं आ सकती... इसमें बस शादी शुदा औरते जा सकती है...

हिना ने गुस्से में अपना पेअर पटका - अम्मी ये क्या बात हुई...

फुफु हस्ते हुए बोली - आने दे न... ये भी सीख लेगी कुछ...

रुबीना - नहीं... ये न आये तोह बेहतर होगा...

शायद पहली बार हिना को अपनी अम्मी से ज्यादा फुफु अछि लगी थी, पर वह बेबस होती हुई गुस्से में अपने कमरे में घुस गयी, और ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर दिया.

रुबीना ने बाकी सब को देखते हुए कहा - कोई नहीं चलो... उसे बाद में मन लुंगी...

वह लोग बहार निकले तोह आस पास की चार पांच औरते भी साथ हो ली. और इतने में सामने से रुबीना की सबसे बड़ी बेटी ज़ीनत भी रिक्क्षे से उतरती हुई दिखी. रुबीना ने उसे देखते hi मुँह सा बनाया, शायद वह नहीं चाहती थी ज़ीनत इतनी जल्दी यहाँ पहुंचे.

फुफु उसे ताना मारते हुए बोली - बड़ी जल्दी पहुंच गयी तू… और छोटी वाली कहाँ है…

रुबीना - वह नहीं आ पायेगी… वह पेट से है… आखरी महीने में…

फुफु - बढ़िया है… शादी के नौ महीनो के अंदर hi बच्चा… लगता है पहली रात में जैम के छोड़ दिया था दूल्हे राजा ने..

ज़ीनत ने जल्दी से अपना सामान घर में रखा और वह भी बाकी सब औरतो के साथ चल पड़ी. वह और उसकी अम्मी रास्ते में कुछ खूसस फुसर कर रहे थे. जल्द hi वह लोग एक छोटी सी पुराणी सी मस्जिद के आगे रुके.

फुफु - यहीं है क्या मुल्ला जी की मस्जिद…

अम्मी - तुझे याद न...

फुफु - मैं कौनसा रोज़ रोज़ यहाँ आयु... इतना सालो बाद आयी हूँ...

रुबीना उनकी भीड़ में आगे को हो गयी और वहां एक आदमी से बात करने लगी. फिर उसने सबको अपने साथ आने का इशारा किया और वह लोग पीछे की तरफ चले गए. वहां पीछे एक @@ खूटे से बंधा हुआ खड़ा हुआ था.

सुप्रिया को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वह लोग उसे यहाँ क्यों लाये थे और ये सब क्या हो रहा था. पर हाँ कुछ तोह अजीब सा लग रहा था.

फुफु - चल दुल्हन.. अब तू ज़रा इस @@ को दुहा दे..

सुप्रिया को समझ नहीं आया फुफु क्या बोल गयी थी - जी.. क्या करना है मुझे?

फुफु - इस @@ का दूध निकालना है तुझे…

रुबीना सुप्रिया के पास आयी और उसके कंधे पर हाथ रखा - सफीना… ये @@ है न… इमम्म… तुम्हे इसका लुंड हिला के इसका झाग निकलना है….

ये सुनते hi सुप्रिया एक डैम पीछे कूद hi पड़ी थी बस रुबीना ने उसे कसके पकड़ा हुआ था. सुप्रिया बुरी तरह कांपते हुए बोली - क्या… क्या कहा आपने?

फुफु - तेरे कान ख़राब है क्या...

रुबीना ने उसका एक हाथ कसके पकड़ा हुआ था, और उसकी बेटी ने उसका दूसरा हाथ, कहीं वह भाग hi न जाये - सफीना सुनो मेरी बात… कुछ नहीं होगा… बस उसे थोड़ा सा हिलना है और वह जल्दी से झाड़ जायेगा…

पर सुप्रिया ने अपने आप को ज़ोर के खींचा और वह ज़मीन पर पीछे जा गिरी. सुप्रिया डर के मारे काँप रही थी, वह यहाँ से भागना चाहती थी पर उसके पेअर डर के मारे अकड़ से गए थे. उसकी सांसें भरी हो गयी थी.

फुफु भड़कते हुए बोली - ारी इतना क्या घबराना… शादी के बाद अपने शौहर का भी तोह पकड़ेगी hi… और अगर ये न कर पाए तोह फिर दूसरा तरीका भी है...

सुप्रिया ने एकदम से पुछा - कैसा दूसरा तरीका...

फुफु - अंदर चल के मुल्ला जी का लुंड घिस दे...

रुबीना ने फुफु को घूर कर देखा जैसे उन्हें छुप होने के लिए बोल रही हो. पर सुप्रिया की तोह आँखों में अब दहशत सी नाच रही थी.

बाकी औरते फुसफुसाने लगी - न जी... इससे तोह ाचा है की इस @@ का hi लुंड घिस दू...

रुबीना ने सुप्रिया की आँखों में आखें डाली और बड़े आराम से उसका हाथ पकड़ कर उसे ज़मीन से उठाया. वह सुप्रिया को धीरे @@ के पास ले आयी. सुप्रिया अपने आप को पीछे खींच रही थी पर इस बार उसके ठीक पीछे ज़ीनत थी, जो उसे पीछे होने से रोक रही थी.

रुबीना - सफीना... बस दो मिनट का खेल है... हो जायेगा..

रुबीना ने सुप्रिया का हाथ पकड़ते हुए उसे थोड़ा नीचे झुकाया और उसका हाथ @@ की लुंड की और ले गयी. सुप्रिया यहाँ से बच के नहीं भाग सकती थी, उसने बस डर के मारे अपनी आँखें बंद कर ली.

उसकी उंगलियां किसी चिकनी सी चीज़ से टकराई और उसे @@ की तेज़ खुरखुराहट की आवाज़ आयी. उसने झट से अपनी ऊँगली पीछे खींच ली. पर रुबीना ने उसका हाथ ज़रा सा और आगे करा और अब लुंड उसकी हथेली को छू रहा था.

रुबीना ने धीरे से सुप्रिया के कान में कहा - जितनी जल्दी तुम ये करोगी उतनी hi जल्दी ये सब ख़तम हो जायेगा…

रुबीना ने अपना हाथ सुप्रिया हाथ के ऊपर रखा और उसकी उंगलियां बंद करने लगी. लुंड अब सुप्रिया के हाथ के अंदर था और @@ थोड़ा सा इधर उधर होने लगा था.

उनके झुण्ड में से एक औरत हस्ते हुए बोली - शादी के बाद भी भाभी इसके हाथ में लुंड पकड़वाएंगी क्या…

इस पर सब ज़ोर से हसने लगे और कोई और बोलै - आज कर तोह रही है भाभी इसे तैयार अपने असली घोड़े के लिए…

उन सब में एक थोड़ी सी जवान लड़की बोली - मुझे तोह घोड़े का hi पकड़वाया था…

शायद इस लड़की की अभी शादी हुई थी, पहली वाली औरत फिर से बोली - जो घोड़े का पकडे उन्हें @@ मिले और जो @@ का पकडे उन्हें घोड़े…

भाभी सुप्रिया का हाथ लुंड पर धीरे धीरे चलवाने लगी थी. लुंड काफी बड़ा और मोटा था और सुप्रिया का पूरा हाथ उसे नहीं पकड़ पा रहा था पर जितना भी था वह शायद @@ के लिए तोह काफी था…

अम्मी - थोड़ा पीछे रहियो… कहीं लात न मार दे…

फूफा - तोह नीच बैठ जायो न इसके… इसका पानी सर पर गिरवा लो तोह शादी के बाद मज़े hi मज़े मिले है…

रुबीना चुटकी लेते हुए बोली - आपको बोहोत सब के बारे में आप…

फूफा छिड़ते हुए बोली - न हमने तोह बस सुना है… और हमने न सर पर गिरवाया… तभी तोह भुगते है…

औरत - रुबीना… बता दे अपनी बेहेन को की इक़बाल का लुंड इसके जितना hi बड़ा है ताकि उसे अभी से आदत हो जाये…

दूसरी औरत - रुबीना को कैसे पता होगा…

औरत मुस्कुराते हुए - सबको सब पता हॉवे… और रुबीना तोह…

अम्मी बीच में बोली - क्यों ये सब फालतू बात बोलो… रुबीना.. इससे बोल जल्दी जल्दी हाथ चला लेगी…

रुबीना ने सुप्रिया के हाथ पर से अपनी पकड़ हलकी करि और सुप्रिया अपना हाथ और तेज़ी से चलने लगी. ऐसे झुके झुके उसकी पीठ दर्द करने लगी थी और वह बस अब ये जल्दी से पूरा करना चाहती थी. चिकने से लुंड पर उसकी हाथ फिसले जा रहा था.

@@ का एक्ससिटेमेंट भी शायद बढ़ता जा रहा था और उसकी तेज़ सांसें भरते हुए रेंकने की आवाज़ आ रही थी. फिर कुछ hi पल बाद उसने अपनी एक टांग थोड़ी सी ऊपर उठायी और एक तेज़ धार के साथ अपना सारा माल ज़ोर से निकल दिया. सुप्रिया का हाथ भी उसका गरम माल बहार आते हुए महसूस कर पा रहा था.

उसका पानी इतनी तेज़ ज़मीन पर छिड़का की थोड़ा सा उछाल कर सुप्रिया के माथे पर आ गिरा. सुप्रिया जल्दी से लुंड को छोड़ कर कड़ी हुई. लुंड तोह अभी भी बहे जा रहा था.

फुफु - तूने तोह बड़ी जल्दी झाड़ा दिया इसे... मैंने तोह सुना है कई बार आधा घंटा भी लग जाता है... चल तू बेहद खुशकिस्मत है… तेरे सर पर कुछ छीट आ hi गयी…

सुप्रिया ने ये सुनते hi अपना मुँह बनाया और वह अपना हाथ अपने सर की उसे साफ़ करने के लिए ले गयी पर इतने में रुबीना ने उसका हाथ रोक दिया - हो जायेगा साफ़, तुम हाथ मत लगाया… ज़ीनत तू कर दे…

उसकी बेटी ने एक रुमाल लेकर सुप्रिया के माथे और सर से छीटे साफ़ कर दी. सुप्रिया ने अपनी अकड़ी हुई पीठ पर हाथ रखा, पता नहीं इन लोगो ने उससे आज क्या hi करवा दिया था. उसने अपने आप से बहुत hi घिन्न सी आ रही थी. रुबीना उसे पास hi में एक नलके पर ले गयी और उसके हाथ धुलवाने लगी.

रुबीना धीरे से बोली - शुक्र है तुमने सही से कर लिया…

सुप्रिया भड़कते हुए बोली - पर ये सब क्या बकवास था…

रुबीना - शहहह थोड़ा धीरे बोलो… मैं समझती हूँ तुम शहर से हो… पर ये गाँव का रिवाज़ है… अगर फुफु बुरा मान गयी तोह वह 2 के बदले 4 न करवा दे…

सुप्रिया ने परेशान होते हुए रुबीना की और देखा - अभी दूसरा भी बाकी है? उसमे क्या करना है?

रुबीना ने गहरी सांस ली - इसके जितना बुरा नहीं है… बस थोड़ा सा दर्द हो सकता है…

सुप्रिया ये सुनते hi घबराने सी लगी थी. पर ज़ीनत उनके पास आ कर कड़ी हो गयी - चची जान आप डरिये मत… इतना भी दर्द नहीं होता… बल्कि ाचा लगता है…

वह सब लोग सुप्रिया को लेकर एक दूसरी जगह गए. ये शायद उनमे से किसी औरत का घर था. रुबीना ने 4-5 पुड़िया निकाल कर एक औरत को दी. वह एक चूल्हे पर पानी गरम कर रही थी और उसने पुड़िया का सारा सामान उस बर्तन में दाल दिया. पूरे घर में एक अलग सी खुशबु आने लगी थी.

फुफु - चलो अब शुरू करे.. वैसे तोह ये भाभी करती है… पर तुम तोह इसकी बेहेन भी हो…

रुबीना अकड़ कर बोली - तोह क्या हुआ… ये मेरी दूर की बेहेन है… पर बहभी तोह मैं इसकी असली और एक लौटी hi हूँ… मुझसे इसका हक़ कोई नहीं चीन सकता…

फुफु - चलो ठीक है… आप hi कर लो…

सुप्रिया को एक कुर्सी पर बिठा दिया गया और उसकी पेट से लेकर टांगो तक एक कपडा बिछा दिया गया. सुप्रिया की टेंशन फिर से बढ़ती जा रही थी. इन रिवाज़ों के नाम पर पता नहीं उसके साथ आज क्या क्या होने वाला था.

रुबीना उसके सामने ज़मीन पर एक पटरे पर बैठ गयी - सफीना… तुम अपनी टाँगे खोलो और अपने पयजामा का नाडा ढीला कर दो…

सुप्रिया बोहोत घबरा रही थी पर अब उसकी लड़ने की हिम्मत जवाब दे चुकी थी. उसने ठीक वैसे hi किया जैसे रुबीना ने उसे कहा. रुबीना ने कपडे के अंदर से हाथ डालते हुए सुप्रिया का पायजामा और पंतय नीचे खींच ली. सुप्रिया एकदम घबरा सी गयी और उसने कुर्सी के साइड को कास के पकड़ लिया.

रुबीना उसकी आँखों में देखते हुए उसे धीरज बंधा रही थी. एक औरत ने रुबीना के हाथ में एक लेप सा दिया.

रुबीना - सफीना… अब मैं अपना मुँह कपडे के अंदर करुँगी… और ये लेप लगयूंगी… बस तुम बैठी रहना…

फुफु - ारी ऐसे बोल रही हो इसे जैसे इसने कभी सुना hi न हो इस बारे में…

सुप्रिया की छाती सांस लेते हुए ऊपर नीचे हो रही थी. रुबीना ने कपडे को थोड़ा सा ऊपर किया और अपना सर सुप्रिया की टांगो के बीच में कर लिया.

फुफु - देखो पहले वाले में तुमने मरद को ख़ुशी तब… अब इस वाले से तुम्हारी ख़ुशी का इंतज़ाम होगा… समझी…

कपडे के अंदर रुबीना की उंगलियां सुप्रिया की छूट तक पहुंची और उसने लेप को छूट के बहार से लगाना शुरू किया. सुप्रिया किसी तहा अपने आपको कुर्सी पर जकड़े हुए थी. तभी रुबीना ने अपनी ऊँगली उसकी छूट में हलके से घुसा दी और वह ठंडा ठंडा लेप उसे जलन मारने लगा.

सुप्रिया ने अपने दांत पीसे - अह्ह्ह्हह… उफ्फ्फ… सससससस….

ज़ीनत और दूसरी जवान औरत ने अपने हाथ सुप्रिया के कंधे पर रखते हुए उसे बिठाये रखा.

फुफु - रुबीना… महसूस करके बता… अभी इसकी सील टूटी तोह न है…

रुबीना की आवाज़ टांगो के बीच से आयी - सील क्यों टूटी हुई होगी आप… और वैसे भी ऐसे छू कर नहीं पता चलता…

फुफु कूदते हुए बोली - सब पता चल जाता है…

रुबीना ने एक बार फिर से सुप्रिया के छूट के अंदर ऊँगली डाली और लेप लगाया और साथ hi कुछ महसूस करने की कोशिश की. उसे जो महसूस होना चाहिए था, वह महसूस सा नहीं हुआ.

पर वह फिर भी बोलो - सब ठीक है आप…

फुफु ने रहत की सांस ली - चलो खुदा का खैर है… अब मटके में पानी ले आयी… छूट सिकाई के लिए…

सुप्रिया चौंकते हुए बोली - छूट सिकाई?

फुफु - तेरी बहिन तोह सच में पता नहीं कौनसी दुनिया में रह रही थी! तभी मैं कह रही थी की हिना को भी ये सब देखने दे… कुछ सीखेगी hi...

रुबीना ने अपना मुँह बहार निकला - सफीना, बस ये गरम मटका तुम्हारी टांगो के बीच में रख देंगे और बस तुम्हे बैठे रहना है…

सुप्रिया पूछना चाहती थी की उससे क्या होगा पर उसे डर लग रहा था. एक औरत ने बोलकर सब समझा hi दिया - इससे जो धुँआ से तेरी छूट का छेड़ सिकुड़ जायेगा..

सुप्रिया के मुँह से एकदम से भोलेपन से निकल गया - उससे क्या होगा…

औरते उसकी बात सुनकर ज़ोर ज़ोर से हसने लगी, रुबीना भी अपनी हसी नहीं रोक पायी थी. फिर आखिर कार किसी की हसी रुकी तोह वह बोली - उससे तुझे और तेरे मरद दोनों को अपनी पहली रात में बहुत मज़ा आएगा… जब उसका सख्त लोढ़ा तेरी बंद छूट में घुसेगा न तोह वह जन्नत की परियों को भूल जायेगा…

दूसरी औरत - क्या पता उसे छूट नहीं गांड में डालने में मज़ा आता हो तोह…

फुफु हस्ते हुए - वह छेड़ तोह पहले से hi बंद होगा इसका… चलो कोई नहीं वह भी खोल देगा इक़बाल अचे से…

सुप्रिया ने ये सब सुनकर अपना थूक अंदर गतका, उसकी हालत ख़राब होने लगी थी. रुबीना ने एक पटतरा सुप्रिया के पैरो के बीच में रखा और फिर उस पर एक गरम गरम मटका जिसमे अभी वह खौलता हुआ पानी डाला गया था.

रुबीना ने मटका का ऊपर का ढक्कन हटा दिया और एक डैम तेज़ी से धुंआ सुप्रिया की छूट की तरफ ऊपर उड़ने लगा. उस पानी में शायद जो चूरन मसाले मिलाये गए थे, उससे वह धुंआ और भी तीखा सा हो गया था. जैसे hi धुंआ सुप्रिया की छूट और उस पर लगे लेप से छुआ, सुप्रिया को ऐसा लगा जैसे कोई वहां उसकी छूट को काट रहा हो.

सुप्रिया दर्द में चीख उठी - अह्हह्ह्ह्ह …. अह्ह्ह…..

ज़ीनत उसे दिलासा देते हुए बोली - बस शुरू में थोड़ा दर्द होगा… फिर बाद में ाचा लगेगा…

दूसरी लड़की जिसकी अभी शादी हुई भी बोल पड़ी - हाँ सच्ची... बाद में तोह बिलकुल जन्नत जैसा लगता है...

फुफु - हाँ भाई.. इन नयी नवेलियों से सुन ले… हमे तोह याद न अब की कैसा लगता था… पर हाँ शादी के बाद चुदाई जैम के हुई थी…

सब फूफा की बात सुनकर हसने लगे. सुप्रिया के चेहरे पर भी एक दबी हुई सी मुस्कान आ गयी. शायद उसके पास शायद इस मीठे से दर्द को स्वीकार करने के इलावा कोई विकल्प बचा नहीं था, और वह हल्का सा सरक के कुर्सी पर नीचे हो गयी जिससे उसकी छूट मटके के धुंए के ठीक ऊपर हो गयी. उफ्फ्फ्फ़.... कैसा दर्द था ये....
 
अपडेट 79

रात को जब सुप्रिया जब आखिर कर हिना के कमरे में पहुंची तोह वह बुरी तरह थकी हुई थी, मानसिक और शारीरिक टारे. इतना तोह शायद वह अपनी पहली (असली) शादी पर भी नहीं थकी थी. बिस्तर पर गिरते hi उसकी आँखें बंद होने लगी थी और आज के दिन जो कुछ हुआ वह उसकी आँखों के सामने घूमने लगा था.

दिन में करीब एक घंटा तोह वह उसी भट्टी के ऊपर बैठी हुई थी. मटके से निकलते धुंए ने उसके नीचे की हिस्से को पानी पानी कर दिया था. सुप्रिया बैठी कसमसा रही थी, उसकी जांघें धुंए के पानी से भीगी पड़ी थी और खुली हुई छूट में कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था. सच hi कह रही थी ज़ीनत, बाद में तोह ऐसा लग रहा था जैसे धुआं hi उसकी छूट में ऊँगली दाल कर उसे हस्तमैथुन सा करा रहा हो. अगर इतनी औरते आस पास न बैठी होती तोह शायद सुप्रिया अपनी छूट को छूने पर मजबूर हो जाती.

सुप्रिया अपने आप को किसी तरह से संभाले बैठी hi थी की एक औरत बोली - दीदी… इसकी बुर्र को भी गांजा करना है क्या…

सुप्रिया उनके बीच बैठे अब उनकी बातें समझने लगी थी. वह लोग बिना किसी शर्म के उसकी छूट के बाल हटाने की बात कर रहे थे.

औरत - इस उस्तरे से दो मिनट में हटा दूंगी…

फुफु ने बैठे हुए अपने मुँह पर हाथ रखा हुआ था - मैं क्या बोलू… रुबीना भाभी से पूछ लो… जैसे वह कहे...

रुबीना - नहीं नहीं… वह सब नहीं करना…

औरत - आदमी लोगो को ाचा लगता है वहां बिलकुल साफ़ चिकना हो तोह…

रुबीना - वह तोह अपनी अपनी पसंद है… किसी को जंगल ाचा लगे है… अगर काट डौगी तोह फिर एक रात में वापस कैसे ऊगा डौगी…

औरत - ठीक है फिर इक़बाल से hi पूछ लो की उसे कैसा पसंद है….

रुबीना उससे मजाक करती हुई बोली - हाँ हाँ तू बेशरम बांके जा उसके सामने और पूछ ले… हो सके तोह अपनी छूट भी मरवा ाइयो साथ में...

ये सुनते hi उस औरत के गाल शर्म से लाल हो गए - मैं तोह बस… पूछ hi तोह रही थी...

फुफु बीच में बोली - चल ठीक है… रहने दे… अब यहाँ का काम पूरा हो गया हो तोह घर चले? वहां भी बोहोत से काम पड़े है...

रुबीना - जी आप… हम लोग चलते है और ज़ीनत इसे ले आएगी...

फुफु, रुबीना और बाकी सब वहां से घर की और चले गए और बस ज़ीनत और सुप्रिया वहां रह गए. ज़ीनत से सुप्रिया की टांगो के बीच से उस मटके को हटाया.

ज़ीनत - चची जान... मैं बहार इंतज़ार करती हूँ... आप कपडे पेहेन कर आ जायो...

सुप्रिया की ज़ीनत की और देखा, वह बिलकुल अपनी माँ की हूबहू कॉपी थी. ठीक उसकी जैसी नाक और होंठ, वही कद काठी, बस अभी वह रुबीना से थोड़ी सी पतली थी. ज़ीनत भी सुन्दर hi थी, पर इन तीनो में हिना hi सबसे सुन्दर और गोरी थी. पता नहीं वह किस पर गयी थी. ज़ीनत उसकी hi उम्र की होगी और उसके मुँह से चची जान सुनकर सुप्रिया को काफी अजीब और गन्दा सा लग रहा था. अगर उसने कुछ नहीं किया तोह कल उसका निकाह इक़बाल से हो जायेगा, ये सोचते hi सुप्रिया को काफी घिन्न सी आने लगी.

सुप्रिया ने अपनी हाथ से अपनी छूट महसूस की, वह एक घंटे से धुंए से सिकने के बाद ऐसा लग रहा था की उसका छूट का द्वार और भी छोटा सा हो गया हो, साथ hi उसका बहार का हिस्सा काफी मुलायम सा महसूस हो रहा था. पर अभी ये सब सोचने का समय नहीं था, सुप्रिया ने जल्दी से अपने कपडे पहने और बहार की और आयी.

ज़ीनत उसे अपने साथ लेते हुए अपने घर की तरफ ले चली. घर पास में hi था, 4-5 घर छोड़ कर. उनके घर के बहार इस समय काफी लोग अंदर बहार जा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे हलवाई भरी भरी कड़ाई और सामान उठा कर छत पर जा रहे थे, हर जगह फूल और झालर लटकाई जा रही थी, और अंदर बैठक में काफी साड़ी औरते भैठि थी.

फुफु सुप्रिया को आते देख बोली - सफीना... आजा बेटी... चल मेहँदी लगवा ले...

सुप्रिया उनके पास पहुंची तोह फुफु ने उसे ज़रा सा भी चैन नहीं लेने दिए और सीधे उसे नीचे दरी पर बिठा दिया, और एक मेहँदी वाली को सुप्रिया के हाथों और पैरों पर मेहँदी लगेंगे के लिए बोल दिया. मेहँदी वाली सुप्रिया की हथेलियों पर और हाथ के बीचे, कलाई पर, और पैरो पर बड़ी नज़ाकत से मेहँदी लगाने लगी. शायद अगर ये सुप्रिया के लिए ख़ुशी का समय होता तोह वह इस मेहँदी की अछि सी सराहना कर पाती. पर अभी तोह सब कुछ उसे बुरी तरह परेशान कर रहा था.

मेहँदी लगने के बाद ज़ीनत ने उसे हिना के कमरे में बिठा दिया, ताकि वह अकेले बैठ कर अपनी मेहँदी सूखा सके. बहार से सुप्रिया को कई साड़ी आवाज़ें आ रही थी, हिना और ज़ीनत की नोक झोंक की, फुफु सब पर अपना रॉब जताते हुए की, रुबीना की, और पता नहीं किस किस की. कुछ देर बाद थोड़ी आवाज़ें काम हुई, लगता है सब लोग रसोई घर की तरफ हो गए थे.

तभी एक बड़ी सी परत में लड्डू लिए, इक़बाल उस कमरे में घुसा. सुप्रिया को वहां देख कर उसके कदम एक डैम से रुक गए और उसने अपनी आँखें नीचे कर ली.

सुप्रिया के पास शायद एहि मौका था विक्रम से बात करने का. उसने धीमी आवाज़ में पर परेशानी के साथ कहा - इक़बाल... आपकी बात हुई क्या विक्रम से...

इक़बाल - नहीं मैडमजी... मैंने उन्हें कॉल लगाया था पर उनका फ़ोन बंद आ रहा था...

सुप्रिया - आप फिर से तरय करो न... कल हम लोगो की शादी हो जाएगी... मुझे किसी भी हाल में यहाँ से निकलना होगा...

इक़बाल थोड़ा झुंझलाते हुए बोलै - मैडमजी मैं सुबह से कई बार कोशिश कर चूका हूँ पर लगता है उन्होंने अपना फ़ोन बंद कर दिया है...

सुप्रिया ने इक़बाल को घूरा और थोड़ा गुस्सा होते हुए बोली - वह तोह दिख hi रहा है की कितनी कोशिश कर रहे हो आप...

इक़बाल - मैं समझा नहीं मैडमजी... आप क्या कहना छह रही हैं...

सुप्रिया - शादी के लड्डू लेकर घूम रहे हो... आपके तोह मैं में ख़ुशी के मारे लड्डू फुट रहे होंगे न... की आपकी शादी मुझसे होने वाली है...

इक़बाल ने तुरंत hi अपना सर ना में हिलाया - मैडमजी आप ऐसा क्यों कह रही है... मैं तोह ऐसा कुछ सोच भी नहीं सकता...

सुप्रिया की आवाज़ और कठोर और तीखी हो गयी - बस बस रहने दो... मुझे सब समझ आ रहा है... सुबह से बस तुम्हारे बारे में hi सुन रही हूँ औरतो से... की तुम शादी के बाद मेरे साथ...

इक़बाल ने किसी तरह अपने गुस्से पर कण्ट्रोल रखा हुआ था - मैडमजी औरते कुछ भी कहे... आप जानती है की मेरी नियत साफ़ है...

सुप्रिया - ठीक है अगर नियत साफ़ है न तोह आप hi इस शादी के लिए मन कर दो...

इक़बाल के चेहरा गुस्से से कापने लगा और उसने धड़ से लड्डू का थाल ज़मीन पर रखा - मैडमजी आप बहुत बोल लिए... मैं आपकी लिए hi इतने दिनों से भाग दौड़ में लगा हूँ... और यहाँ आने के लिए भी मैंने आपको बोहोत मन किया था... पर आपने मेरी एक न सुनी...

सुप्रिया ने पहली बार इक़बाल को इतने गुस्से में देखा था, पर अभी उसका भी गुस्सा काम नहीं हुआ था - पता नहीं कहाँ फास गयी मैं... मुझे क्या पता था ये सब हो जायेगा... मैं एक शादी शुदा लड़की हूँ...

इक़बाल ने उसकी बात को बीच में काटते हुए कहा - आप मेरा मुँह न hi खुलवाए तोह बेहतर होगा... अगर आप शादी शुदा है तोह विक्रम सब्जी आपके है कौन... आपके शौहर तोह है नहीं वह... क्या ताल्लुक़ात है आपके उनके साथ? और वहां जमा मस्जिद में क्या करने गयी थी आप...

सुप्रिया उसकी बात सुनकर एक डैम सन्न सी रह गयी. आज तक कभी इक़बाल ने उससे इस तरह से बात नहीं की थी.

इक़बाल - दरअसल आपने जो वहां जमा मस्जिद में किया था, उसके बाद तोह मुझे ऐसा लगता है की आप किसी की बीवी हो भी नहीं... खैर आपको अगर सबको सब सच बताना है तोह आप खुद बता सकती हो, मुझे इसमें बीच में न घसीटिये...

इक़बाल गुस्से में वहां से चला गया. सुप्रिया बस स्तब्ध सी बैठी रह गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था की वह क्या करे. शायद इक़बाल को गुस्सा दिलाकर उसने अपना आखिरी सहारा भी खो दी थी.

बाकी पूरे दिन जो कुछ संगीत जैसा होता रहा सुप्रिया अपने मुरझाये हुए चेहरे के साथ उसमे शामिल होती रही. एक दो बार उसे हिना और ज़ीनत ने टोका तोह वह अपने चेहरे पर एक झूठी सी मुस्कराहट ले आयी. रात को अब वह बस कमरे में बिस्तर पर लेती थी. कमरा काफी लोगो के खचाखच भरा था, कुछ औरते बिस्तर पर उसके साथ सो रही थी और कुछ ज़मीन पर गद्दा बिछा कर.

बस रात के अँधेरे में उसके आंसू और मैं की सिसकियों को न कोई देख सकता था और न hi सुन्न सकता था.

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सुबह होते hi घर में फिर से अफरा तफरी मच गयी थी, और लोग जल्दी से नाहा के तैयार होना शुरू हो गए थे. रुबीना ने अपना भारी सा लेंघा और गहने हिना के कमरे की अलमारी में रख दिए थे. सुप्रिया अभी भी कल की बात को लेकर काफी उदास थी और वह नाहा के बहार निकली.

वह कमरे में सर पर तौलिया लपेटे पहुंची hi थी की उसे वहीँ बिस्तर पर चहकती हुई हिना बैठी दिखाई दी.

हिना - चची जान... गुड मॉर्निंग...

सुप्रिया ने उसे मुस्कुरा के कहा - गुड मॉर्निंग...

हिना ने अपने हाथ में एक बंद कागज़ लहराया - मेरे पास आपके लिए कुछ है...

सुप्रिया - क्या... अब आज सुबह सुबह पड़े की बातें लेकर मत बैठ जाना...

हिना - नहीं... चाचू ने मुझे एक ख़ुफ़िया काम दिया है... आप तक ये चिट्ठी पहुंचने का...

सुप्रिया ने हाथ आगे करके कागज़ उसके हाथ से लेने की कोशिश करि - लायो फिर...

हिना ने अपना हाथ पीछे खींच लिया - नहीं.... पहले बताया की अगर मैं ये दे दूंगी... तोह मुझे क्या मिलेगा...

सुप्रिया - क्या चाहिए आपको...

हिना - हम्म्म... अभी तोह कुछ दिमाग में नहीं आ रहा... पर एक उधार रहा आप पर...

सुप्रिया - ाचा बाबा... अब दिखायो भी...

हिना हस्ते हुए बोली - ओह हो... कितनी बेसब्री हो रही है आपको... जरूर चाचू का लव लेटर हो...

सुप्रिया ने त्योरियां छेड़ते हुए उसकी और देखा - तुम्हे बड़ा पता है इस सब के बारे में... लायो भी अब...

हिना ने लेटर सुप्रिया के सामने किया और सुप्रिया ने झट से उसकी उँगलियों के बीच से उसे खींच लिया. सुप्रिया लेटर को खोल कर पड़े ने लगी.

मैडमजी,

कल जो कुछ भी मेरी जुबां से निकल गया, उस पर मैं शर्मिंदा हूँ. मुझे आपसे इस तरह बात बिलकुल नहीं करनी चाहिए थी. शायद उस वक़्त मैं अपने जज़्बात पर काबू नहीं रख पाया... पर आपको दुःख पहुँचाने का कभी मेरा इरादा नहीं था. आप मुझे माफ़ कर दीजिये.

मैं समझ सकता हूँ की आप किस कश्मकश से गुज़र रही हैं. आपके दिल की तकलीफ मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ, और दिल से चाहता हूँ की काश मैं आपका दर्द काम कर सकता. आप सिर्फ मेरी ज़िम्मेदारी नहीं हैं, मैडमजी… आप मेरी दुआओं का हिस्सा बन चुकी हैं.

आप बेफिक्र रहिये, आप मेरे साथ मेहफ़ूज़ रहेंगी. और अगर आप कल सबके सामने सच कह दे, तोह भी मैं आपके साथ खड़ा रहूँगा. दुनिया चाहे मेरे खिलाफ हो जाए, पर मैं कभी आपके खिलाफ नहीं हो पाउँगा.

इक़बाल

सुप्रिया ने चिट्ठी को एक बार पड़ा और फिर दूसरी बार. उसे नहीं पता था की इक़बाल इतने अचे से अपनी दिल की बात लिख भी सकता था. वह उसके शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश कर hi रही थी की उसे याद आया की हिना उसके ठीक सामने बैठी थी.

सुप्रिया ने चिट्ठी को फोल्ड करते हुए अपने हाथ में रखा और फिर हिना से पुछा - तुमने तोह नहीं पड़ा न इसे...

हिना ने मासूमियत से कहा - नहीं... चाचू ने बोलै था की सीधे आपको देना है... पर आप पड़वायो न मुझे... जरूर कुछ रोमांटिक सा लिखा होगा...

सुप्रिया के चेहरे पर एक बड़ी सी स्माइल आ गयी, एक नकली स्माइल नहीं बल्कि एक असली शर्मीली सी स्माइल - नहीं... ऐसा कुछ नहीं... तुम इतनी सीढ़ी नहीं हो जितनी दिखती हो...

हिना भी ज़ोर से है पड़ी - अब तोह आपके साथ hi रहूंगी तोह आप भी जान जाओगे मुझे...

सुप्रिया - ाचा चलो मुझे अब तैयार होना है... तुम भी तैयार हो जायो...

हिना - ठीक है...

हिना कमरे से बहार निकली और सुप्रिया कमरे की कुण्डी लगा कर उस चिट्ठी को हिना की अलमारी में कहीं छुपा दिया. पता नहीं वह क्यों वह चिट्ठी पद कर अब तैयार होना चाहती थी इस शादी के लिए. उसने वह भारी सा लेंघा पेहेनना शुरू किया. लेंघा हल्का सा पिंक था और हल्का सा लाल. सुप्रिया ने लेंगे को अपने ऊपर दाल कर अपने आप को आईने में देखा. अगर ये रुबीना का लेंघा था तोह इतना पुराण होने के बाद भी काफी मॉडर्न सा hi था, और अब तोह ठीक उसकी फिटिंग का था.

तभी दरवाज़े पर खटखाने की आवाज़ हुई और सुप्रिया ने जाकर दरवाज़ा खोला. बहार रुबीना थी और सुप्रिया को देखती रह गयी.

रुबीना - मैश,.'... तुम पर तोह ये गज़ब लग रहा है...

सुप्रिया ने शरमाते हुए अपनी आँखें झुकाई.

रुबीना - लायो मैं ठीक कर देती हूँ... और बाकी गहने वैगेरा भी पहना देती हूँ...

ज़ीनत और हिना भी कमरे में घुस गयी थी और तीनो माँ बेटी मिल कर सुप्रिया को तैयार करने लगी. उसके गालों पर मेक उप लगते हुए, उसे गहने पहनते हुए.

रुबीना - ये लो सफीना... ये नाथ भी पेहेन लो...

सुप्रिया ने एक डैम चौंकते हुए कहा - मेरी नाक छिड़ी हुई नहीं है...

रुबीना - कोई नहीं... इसमें ये क्लिप है... पर वह तेहेर जाएगी वहां... हमारे यहाँ ये पेहेनना जरूरी होता है...

रुबीना के सुप्रिया को नाथ पहना दी, और सुप्रिया ने अपने आप को शीशे में देखा. उसके गाल बिलकुल गुलाबी हो रखे थे और आखें सुरमई... वह अपने आप को पहचान भी नहीं पा रही थी.

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हीना - चची... आप तोह बस गज़ब लग रही हो... चाचू तोह आपको बस देखते hi रह जायेंगे...

ज़ीनत हस्ते हुए बोली - बस देखते hi नहीं... वह तोह अपना काबू hi न खो बैठे कहीं...

हीना - क्या मतलब तेरा?

ज़ीनत - कुछ नहीं... तू अभी बच्ची है.. तू नहीं समझेगी...

रुबीना - ारी.. तुम लोग भी जल्दी से तैयार हो जायो... 12 बजने को आये है... इमाम साहब भी आते होंगे... मैंने अपने कमरे में तुम लोगो का सामान निकल दिया था...

हिना - जी अम्मी...

हिना और ज़ीनत वहां से भागते हुए चले गए और सिर्फ रुबीना और सुप्रिया कमरे में रह गए.

रुबीना - सुप्रिया... तुम बोहोत सुन्दर लग रही हो... कल कुछ हुआ था क्या, तुम्हारा मुँह उतरा हुआ था... खुदा तुम्हे आगे ढेर साड़ी खुशियां दे...

सुप्रिया ने हलके से कहा - जी नहीं कुछ नहीं... बस वह थक गयी थी...

रुबीना - मुझे पता है तुम्हे हम लोगो के रिवाज़ कुछ अजीब से हैं, पर चलो बस आज निकाह हो जायेगा... निकाह में लोग जैसे कहे वैसे वैसे करती जाना... मैं अपने वालिद से बात कर ली है और वह निकाह में तुम्हारे बाप का फ़र्ज़ ऐडा करेंगे...

सुप्रिया ने हाँ में सर हिलाया और आईने में अपने आप को देख कर आँखें नीचे झुका ली.

रुबीना ने हलके से उसके माथे को चूमा - खुदा तुम्हे ढेर साड़ी खुशियां दे शादी के बाद...

शादी के बारे में सुनकर सुप्रिया के मैं में घबराहट बढ़ती सी जा रही थी. तभी बहार से फुफु की आवाज़ आयी - रुबीना... देख ज़रा आकर... ये इक़बाल तोह तैयार हुआ नहीं अब तक...

रुबीना बड़बड़ाते हुए बहार गयी - ओफ्फो... अब इसे क्या हुआ... मैं आती हूँ...

सुप्रिया निर्वसली वहीँ बैठी रही, उसे बहार की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

रुबीना इक़बाल से बोल रही थी - सफीना तोह तैयार हो गयी, तुम क्यों ऐसे खड़े हो...

इक़बाल हैरान होते हुए बोलै - वह तैयार हो गयी...

रुबीना - और क्या... वैसे औरते मर्दो से ज्यादा वक़्त लेती है... पर यहाँ तोह उल्टा hi हो रहा है... चलो जल्दी से तैयार हो कर आयो... तुम्हारे भाई जान इमाम साहब को लेने hi गए है...

इक़बाल को अभी भी अपने कानो पर यकीं सा नहीं हो रहा था, पर रुबीना की बात सुनकर वह भी ऊपर अपने कमरे में तैयार होने चला गया.

कुछ hi देर बाद घर में शोर मच गया था की इमाम साहब आ गए थे. रुबीना दौड़ी दौड़ी सुप्रिया के कमरे में आयी और उसका सर धक् दिया और उसका हाथ पकड़ कर उसे बहार की और ले आयी. दूसरी और से इक़बाल भी सर पर गुलाब और झालर का सेहरा बांधे नीचे आ रहा था.

सुप्रिया को बैठक में एक गद्दे पर बिठा दिया था और साथ काफी साड़ी औरते बैठ गयी. उसके ठीक सामने दो औरतो ने एक सफ़ेद चद्दर को पकडे हुए था, जैसे वह उसके और इक़बाल के बीच एक पर्दा कर रही हो. पर उसे उस बारीक सी चद्दर के पीछे सेहरा बांधे इक़बाल नज़र आ रहा था. सुप्रिया ने अपनी आँखें नीचे झुका ली.

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सुप्रिया की दिल की धड़कन बेहद तेज़ हो गयी और उसे कुछ भी सुनाई देना बंद सा हो गया. कुछ आवाज़ें सी आ रही थी पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. कुछ hi पल बाद फुफु ने उसे हल्का सा हिलाया.

फुफु - सफीना... तुझसे पूछ रहे है इमाम साहब...

सुप्रिया एक डैम चौंकते हुए बोली - क्या???

फुफु - ारी... तस्सककक... बोल तुझे निकाह क़बूल है...

सुप्रिया की सांसें तेज़ हो गयी, उसका सर बुरी तरह चक्र सा रहा था, उसके मुँह से हलके से आवाज़ निकली - क़बूल है...

सब लोग ख़ुशी से तालियां बजने लगे और लोग एक दुसरे को मुबारक बाद देने लगे. सामने का सफ़ेद पर्दा नीचे किया गया और इमाम साहब ने एक किताब सी सुप्रिया के आगे कर दी और उस पर उसे दस्तखत करने के लिए कहा. सुप्रिया को उर्दू में लिखा हुआ कुछ भी समझ नहीं आ रहा था पर उसने एक रफ़ से सिग्नेचर उस पर कर दिए.

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इमाम - अब आप दोनों का निकाह हो गया है... और ये आपके शौहर है... आपको इनकी हर बात और जरूरतों का ख्याल रखना होगा... और इक़बाल मियां आपको इनका ख्याल रखना होगा...

सुप्रिया ने अपने झुकी हुई आँखों से इक़बाल की और देखने की कोशिश की, पर उसे इक़बाल का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था. बस एहि सब था क्या? क्या उनका निकाह हो भी गया था? अब क्या सच में वह इक़बाल की बीवी बन गयी थी? इतने सारे लोगो के बीच उसकी हिम्मत hi नहीं हुई की वह इस निकाह के लिए मन कर दे.

रुबीना ने सहारा दे कर सुप्रिया को खड़ा किया. अब्बास ने लोगो को शादी की दावत में शरीक होने का इशारा किया. सब लोग खाने की और बड़े, पर रुबीना सुप्रिया को लेकर कमरे के अंदर आ गयी.

फुफु ने अंदर आ कर पूछा - इसे क्यों यहाँ ले आयी... इसे भी तोह भूक लगी होगी...

रुबीना - नहीं आप... इसका थोड़ा जी मचल रहा है...

फुफु हस्ते हुए - अभी से जी मचल रहा... लगता है रात को hi अपनी भूक मिटाएगी...

रुबीना - आप... आप भी न... अब तोह ये आपके घर की बहु है...

फुफु ने गहरी सांस ली - हाँ... वैसे बोहोत hi खूबसूरत लग रही है तू... मैं देख रही थी की कैसे सारे मर्दो की नज़र बस तुझ पर hi थी... इक़बाल काफी खुशकिस्मत है जो उसे तू मिली है...

रुबीना - चलिए आप... हम लोग खाना खा लेते है... मैं हिना को इसके पास बैठने के लिए बोलती हूँ...

शाम होते होते निकाह भी निकाह की दावत hi चल रही थी. सारे मर्द ऊपर छत पर थे, और औरते नीचे. गाँव के काफी सारे लोग वहां आये हुए थे. अब्बास और इक़बाल तोह थे hi, साथ में रफ़ीक़ चाचा - जो दर्ज़ी थे, जुनैद - जो ब्रा पंतय की शॉप के मालिक का बीटा था, फुफु के शौहर और बाकी गाँव के कुछ और लोग.

रफ़ीक़ मटन कहते कहते बोलै - अब्बास मियां... क्या दावत दी है आपने... और भी बस 2 hi दिन के इंतज़ाम में...

अब्बास ने हलके से मुस्कुरा के अपना सर झुकाया - रफ़ीक़ चाचा... बस खुदा की मर्ज़ी थी तोह हो गया सब...

जुनैद वहां सबसे उम्र का था, एहि कोई 20-22 साल का. वह इक़बाल की तरफ देखते हुए मजाक में बोलै - आज रात तोह इक़बाल चाचू सुहागरात बनाएंगे...

एक और आदमी - हाँ भाई... चलने का इंतज़ाम करो... इक़बाल भी उतावला hi हो रहा होगा...

इक़बाल ये सुन कर एक दबी हुई हसी लिए अपना मुँह झुकाये खड़ा था.

जुनैद - वैसे चाचू... मेरे hi दुकान से ब्रा पंतय ली थी... अगर आपको रात को अछि लगे तोह मुझे बता देना... मैं और भिजवा दूंगा घर पर... क्यूंकि वह वाली तोह फैट hi जानी है आज रात...

अब्बास उसे टोकते हुए बोलै - जुनैद... क्या बोल रहे हो... तुम्हारी चची जैसी है वह... थोड़ा तोह लिहाज़ करो...

जुनैद के चेहरे पर अभी भी मुस्कराहट थी, उसने अपनी आँखें झुका ली - माफ़ कीजिये... बस मजाक hi कर रहा था...

रफ़ीक़ कुछ सोचते हुए बोलै - वैसे एक बात कहु इक़बाल मियां... बुरा मत मन्ना...

इक़बाल - जी कहिये न....

रफ़ीक़ - तुम तोह बरसो यहाँ से गायब थे, और तुम्हारे भाई जान दिन रात घर और घरवालों को संभाले चल रहे थे... और अब तुम पता नहीं किसे यहाँ ले आये और शादी करवा ली...

फूफा जी - क्या बोल रहे हो चाचा... सफीना तोह रुबीना की बेहेन है न...

रफ़ीक़ के चेहरे पर एक हसी सी थी - आपने पहले कभी सुना था क्या इस लड़की के बारे में...

फूफा जी - नहीं.... सुना तोह नहीं था...

इक़बाल - रफ़ीक़ चाचा... आप सफीना के बारे में ये सब क्यों बोल रहे है... आप अपनी बात पूरी करिये न...

रफ़ीक़ - हाँ ये भी सही है... तोह मैं कह रहा था की छोटे भाई होने के नाते तुम्हारा भी तोह कुछ फ़र्ज़ है अपने बड़े भाई जान की तरफ... या नहीं?

इक़बाल - जी बिलकुल है...

रफ़ीक़ - तोह फिर... गाँव के पुराने रिवाज़ भूल गए तुम... पहली रात का हक़ तोह सबसे बड़े को मिलता है...

इक़बाल की आँखों में गुस्सा आना शुरू हो गया था - रफ़ीक़ चाचा... ये रिवाज़ तोह बहुत पुराण हो गया है... ये तोह किसी ने भी नहीं किया... यहाँ तक की जब रुबीना भाभी की शादी हुई थी, तब अब्बू भी जिन्दा hi थे...

रफ़ीक़ - शहर में बड़ी जुबान खुल गयी है तेरी... देख तोह सही अपने भाई जान को और उनके बारे में भी तोह कुछ सोच...

इक़बाल का मुँह एक डैम से बंद हो गया. उसने अब्बास की और देखा, उसकी आँखों में एक अलग सी चमक आ गयी थी, और वह एक गहरी सोच में पड़ा था.

रफ़ीक़ - और मैं कौनसा कह रहा हूँ की वह तेरी बीवी नहीं है... मैं तोह बस अब्बास को उसका हक़ दिलाना चाहता हूँ...

इतने में बीच में फूफा जी बोल पड़े - ारी अगर उस रिवाज़ के हिसाब से चले तोह हक़ अब्बास मियां का नहीं घर के बड़े दामाद का होगा... तोह पहली रात का मौका मुझे मिलना चाहिए...

इक़बाल ने एक डैम से पलट कर फूफा की और देखा. ऐसा लग रहा था की सुप्रिया के बारे में सोच कर सबके मुँह से लार टपक रही थी और लुंड खड़े होते जा रहे थे.

रफ़ीक़ आग में घी डालने की कोशिश कर रहा था - जनाब... ये तोह उनके घर की बहु है... तोह हक़ तो अब्बास का hi बनता है...

रफ़ीक़ और फूफा के बीच बहस सी शुरू हो गयी थी. और इक़बाल बस उन्हें देखता रह गया था.

जुनैद भी बीच में कूद कर सबको भड़का रहा था - मैं तोह कहता हो की आप सब मिल कर पहली रात मन लो... और भी मज़ा आ जायेगा उसे...

शोर नीचे तक पहुंचने लगा था. एक औरत ऊपर सीढ़ियों से उतारते हुए आयी और हाँफते हुए बोली - रुबीना भाभी... फुफु... ऊपर तोह बहस सी हो गयी है... आप जाकर सम्भालिये ज़रा...

फुफु - हम क्यों मर्दो के बीच में कूड़े... हुआ क्या है...

औरत - वह लोग... सफीना की नाथ उतराई के बारे में बात कर रहे है... की उसके साथ पहली रात कौन बनाएगा...

रुबीना ने ज़ोर से चौंकते हुए कहा - क्या!!!

औरत - जी भाभी...

रुबीना ने फुफु और अम्मी की और देखा और आँखों hi आँखों में वह तीनो समझ गए थे की माज़रा क्या था. पर उनकी हिम्मत hi नहीं हो रही थी ऊपर जाने की.

कुछ देर बाद रात होने लगी थी और एक एक करके लोग नीचे उतरने लगे. रफ़ीक़ चाचा जब उतरे तोह उन्होंने अंदर औरतो की तरफ झाँका, उनके चेहरे पर एक अजीब से मुस्कान थी, जैसे वह अपने काम में सफल हो गए हो.

पर अब्बास, फूफा जी और इक़बाल अभी भी ऊपर छत पर hi थे. रुबीना और फुफु ऊपर की और बड़े. ऊपर आकर उन्होंने देखा की तीनो के चेहरे तमतमाए हुए थे और वह चुप चाप खड़े थे.

रुबीना ने फुफु की और देखा की वही कुछ बोले, और फुफु अपनी रोबदार आवाज़ में बोली - ये क्या तमाशा लगा रखा है आप लोगो ने... शादी के दिन ये सब...

फूफा जी - तुम बीच में क्यों पद रही हो... ये हम लोगो का मामला है...

फुफु - मामला हमारा नहीं है... आप मेरे साथ घर चलिए... और जो बेहूदा से ख्वाब आप देख रहे हो न... उन्हें देखना बंद करो...

फुफु ने घूर कर पहुपा जी की और देखा, और शायद वह उससे डर गए. वह गुस्से में नीचे की और बड़े. फुफु उनके ठीक पीछे पीछे.

रुबीना ने इक़बाल को इशारा किया - इक़बाल तुम भी नीचे जायो...

इक़बाल - पर भाभी...

रुबीना - मेरी बात समझो... तुम नीचे जायो...

इक़बाल उनकी बात सुनकर नीचे की और हो लिया. उसके जाने के कुछ देर बाद रुबीना हलके से बोली - जी सुनिए... मुझे आपके बीच में बोलना तोह नहीं चाहिए पर...

अब्बास झल्ला कर बोलै - जब बोलना नहीं चाहिए तोह छुप रह न...

रुबीना - पर आप समझिये न... ये उनकी रात है...

अब्बास - तुम औरते पुराने रिवाज़ करो तोह ठीक है... और हम मर्द लोग जब अपने रिवाज़ के बारे में बात करे तोह तुम्हे दिक्कत है...

रुबीना - जी मैं बस ये कहना छह रही थी की आपकी भी एक बेटी की शादी होनी बाकी है... अगर उसके साथ कोई ऐसे करे तोह...

अब्बास ने गुस्से में आते हुए रुबीना के गाल पर एक ज़ोर का चांटा मारा - मेरी बेटी के बारे में मत बोल... सुप्रिया मेरी बेटी नहीं है....

रुबीना ने अपना सर झुका लिया और धीरे से बोली - उनकी पहली रात हो जाने दीजिये... अभी आपका इलाज भी तोह चल रहा है... आप क्यों अपनी बेज़्ज़ती करवाना चाहते है नयी बहु के सामने... आपको पता है की आपका...

इससे पहले रुबीना अपनी बात पूरी करती अब्बास ने उसका गाला पकड़ते हुए उसे एक और चांटा लगाया - तेरी इतनी हिम्मत...

रुबीना चुप चाप कड़ी उसके हाथ को अपनी गर्दन पर महसूस कर रही थी. वह अब्बास को पीछे करने की कोशिश नहीं कर रही थी, बस उसने अपनी आखें अब्बास की आँखों में डाले राखी. अब्बास की आँखों में गुस्सा तेज़ था पर उसने कुछ सेकंड बाद रुबीना को पीछे धकेल दिया.

अब्बास नफरत भरी आँखों से रुबीना को देखते हुए बोलै - जा उसे मन लेने दे उसकी सुहागरात...
 
अपडेट 80

रात हो चली थी, रुबीना नीचे बैठक में आयी और वहां सुप्रिया को हिना और ज़ीनत के साथ बैठे देखा. वह दोनों सुप्रिया से हसी मजाक कर रही थी और सुप्रिया की आँखें झुकी हुई और उसके चेहरे पर एक दबी हुई सी मुस्कान थी.

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ऊपर जो कुछ हुआ था शायद रुबीना उसे अपने ज़हन से निकाल चुकी थी, वह उन दोनों को प्यार से डांटे हुए बोली - बस भी करो... चची को आराम भी करने दो...

ज़ीनत एक तिरछी मुस्कान के साथ बोली - हाँ... आखिर उन्हें अभी तोह पूरी रात जागना है... चल हिना, आराम करने दे इन्हे... जब तक आराम मिलता है...

हिना बे भोलेपन से पूछा - तू ऐसे क्यों बोल रही है की पूरी रात जागना है?

ज़ीनत - जब तेरी शादी होगी न तब तुझे पता चलेगा...

दोनों बहने लड़ते हुए हिना के कमरे में घुस गयी. वहीँ पीछे अम्मी जी भी बैठी हुई थी, उनका चेहरा उतरा हुआ था. घर से बाकी सब लोग जा चुके थे, फुफु भी.

रुबीना ने उनकी और देखते हुए बोलै - अम्मी जी... मैं इसे इक़बाल के कमरे में छोड़ के आ जायु? ये भी थक गयी होगी, ऊपर सो जाएगी.

अम्मी ने उसकी और नहीं देखा, पर उसकी आवाज़ में एक हसी सी थी - ज़ीनत सही तोह बोले है, ऊपर जाकर कौनसा सोने को मिलेगा... पूरी रात कुटाई hi होनी है...

ये सुनते hi सुप्रिया थोड़ा सेहम सी गयी. वैसे भी ऊपर से चीख चिल्लाने की आवाज़ ने उसे पहले से hi थोड़ा डरा दिया था. पर उसके बाद हिना और ज़ीनत ने उसका मूड थोड़ा हल्का कर दिया था.

रुबीना ने उनकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया - सुप्रिया... आयो मेरे साथ...

अम्मी जी पीछे से बोली - सुन ऋ... एक पोते का मुँह तोह दिखा दियो तू... शायद इसीलिए ज़िंदा हूँ अब तक...

रुबीना ने हस्ते हुए कहा - आप जाने देंगी तब तोह दिखाएगी न पोते का मुँह... ारी मैं तोह भूल hi गयी थी... एक मिनट...

रुबीना जल्दी से रसोई घर में गयी और कुछ मिनट बाद वहां से एक स्टील का गिलास अपने हाथ में लेकर आयी. सुप्रिया की नज़र गिलास पर पड़ी, शायद उसे पता था इसमें क्या है. वह ये सब पहले एक बार देख चुकी थी. पर कितना अलग था वह सब तब. उस समय भी वह काफी नर्वस थी, पर एक नयी जिंदगी शुरू करने के लिए एक्ससिटेड भी थी. आज तोह बस एक अलग सा डर hi था इस माहौल में.

रुबीना ने हलके से सुप्रिया का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ ऊपर ले जाने लगी. सुप्रिया पहली बार ऊपर के माले पर जा रही थी. वहां ऊपर के माले पर तीन दरवाज़े थे और रुबीना पहले दो पार करके उसे तीसरे पर ले आयी. एक छोटा सा कमरा था जो फूलो से सजा हुआ था. दीवारों पर पिंक सा रंग किया हुआ था, जो शायद आज कल में hi हुआ था, और उसकी वजह से कमरे में एक स्मेल सी थी. एक पुराण सा पलंग और उस पर मैट्रेस्स तोह नहीं पर पुराने से गद्दे बिछे हुए थे, और उस पर एक चद्दर भी नहीं बिछी थी. बिस्तर एक कोने से सत्ता हुआ था और उसके ठीक ऊपर एक पुराणी सी खिड़की भी थी.

रुबीना ने सुप्रिया को सहारा देते हुए बिस्तर पर बिठाया. रुबीना थोड़ी दूर जमीन पर कड़ी थी.

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रुबीना उसे प्यार से देखते हुए बोली - बहुत hi हसीं लग रही हो... तुमने मेरा लेंघा पहना हुआ है तोह मुझे मेरी शादी की रात याद आ गयी...

सुप्रिया शर्म के मारे कुछ बोल hi नहीं पा रही थी.

रुबीना - ये दूध का गिलास रखा है... मैं इक़बाल को बोल दूंगी की वह पी ले... तुम घबरा तोह नहीं रही...

सुप्रिया ने हलके से कहा - थोड़ा सा... भाभी मैं अपनी नाथ उतार दू क्या...

रुबीना - नहीं नहीं.. उसे आकर उतारने दो न सब कुछ.... वैसे मैंने पहले कुछ नहीं कहा... पर जब मैं वहां नीचे लेप लगा रही थी तोह मुझे ऐसा लगा की तुम पहले hi सब कर चुकी हो...

सुप्रिया ने एकदम से कहा - नहीं.... ऐसा कुछ नहीं... वह तोह बस साइकिल से लग गयी थी वहां...

रुबीना - ओह्ह्ह ाचा... तोह तुम्हारी पहली बार hi होगा ये सब...

सुप्रिया की छाती डर के मारे ऊपर नीचे हो रही थी - जी....

रुबीना - डरो मत... मैं उसे समझा दूंगी की आराम से करे... वह थोड़ा ज्यादा hi बेकाबू हो जाता है ये सब करते हुए...

ये पहली बार नहीं था की सुप्रिया ने इक़बाल के बारे में ये सुना था. करुणा भी तोह एहि बोलती थी, और फिर उसने अपनी आखों से करुणा के साथ उसे सब करते देखा था. करुणा का नाम दिमाग में आते hi वह फिर से लखनऊ के बारे में सोचने लगी.

रुबीना - क्या सोच रही हो... वैसे मैंने सामने वाली अलमारी में तुम्हारे लिए कुछ रोज़ मर्रा के कपडे रख दिए हैं... जब ये लेंघा उतारो तोह उन्हें पेहेन लेना... मतलब सुबह तक... रात को तोह शायद कुछ न पेहेन्ने को मिले...

बिना कपड़ो के इक़बाल के सामने... ये दृशय सोचते hi सुप्रिया बुरी तरह शर्मा सी गयी और उसके गाल लाल हो गए.

रुबीना उसकी शर्म को समझ गयी थी - चलो... अब तोह सुबह hi बात करुँगी... नहीं तोह तुम शर्माती रहोगी... मैं इक़बाल को भेजती हूँ...

रुबीना कमरे के बहार चली गयी और उसने दरवाज़ा बहार से बंद कर दिया. सुप्रिया कमरे में इधर उधर देखने लगी. ऊपर हलके से पंखा घूम रहा था और वह काफी पुराण और गन्दा सा लग रहा था. उसे इक़बाल पर पूरा भरोसा था, पर अब तोह शायद वह दोनों पति पत्नी थे. कहीं उसने उस पर अपना हक़ जाता लिया तोह? ये सोचते hi सुप्रिया काँप सी गयी.

थोड़ी देर में हलके से दरवाज़ा खुला और सुप्रिया ने डर के मारे अपने लेंगे को कास के पकड़ लिया. इक़बाल ने अंदर आते हुए दरवाज़े बंद कर लिया और कुण्डी लगा ली. सुप्रिया सब कुछ गौर से देख रही थी और उसके पसीने निकलने शुरू हो गए थे.

इक़बाल ने सुप्रिया की और नहीं देखा और वह कमरे में राखी अलमारी की तरफ बाद गया. उसने अलमारी खोल के अपना ऊपर का कोट उतारा और उसे अंदर रख दिया. अलमारी बंद करने के बाद वह एक सफ़ेद कुर्ते और पायजामा में खड़ा इधर उधर देख रहा था, उसे भी शायद समझ नहीं आ रहा था की वह क्या बोले या कहाँ बैठे.

जैसे hi उसने सुप्रिया की और देखा और उन दोनों की नज़रें मिली, सुप्रिया ने अपनी आखें झुका ली और अपने दोनों हाथ एक दुसरे से कास के पकड़ लिए.

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इक़बाल अपना गाल साफ़ करते हुए बोलै - ुहहममम... मैडमजी... माफ़ कीजिये ये कमरा ऐसे पुराण सा है... मुझे पता है आपके लायक नहीं है...

सुप्रिया ने धीरे से कहा - कोई नहीं... जैसा है... ठीक है...

इक़बाल उसकी प्यारी सी आवाज़ सुन कर थोड़ा सा खुश सा हुआ - आपको मेरी चिट्ठी मिल गयी थी...

सुप्रिया - जी... शुक्रिया... वह सब लिखने के लिए...

इक़बाल - नहीं नहीं... मैं आपसे फिर से माफ़ी माँगना चाहता हूँ... कल मैंने आप पर बेफिज़ूल hi गुस्सा किया...

सुप्रिया की आवाज़ में काफी नरमी थी - और कितनी बार माफ़ी मांगेंगे आप...

इक़बाल ने अपनी गहरी सी आवाज़ में कहा - जब तक आप मुझे माफ़ नहीं कर देती तब तक...

सुप्रिया उसकी आँखें अपने ऊपर महसूस कर पा रही थी, उसकी उंगलियां और मैं दोनों hi बेचैन से हो रहे थे. वह उसे कैसे बोले की वह उसकी और ऐसे न देखे.

सुप्रिया की आँखें अभी भी झुकी हुई थी - माफ़ तोह कर दिया था... तभी तोह शायद...

वह आगे नहीं बोल पायी, पर शायद बोलने की जरूरत भी नहीं थी, इक़बाल समझ गया था - मैडमजी... आप बेफिक्र रहिये... आप मेरे लिए किसी अमानत की तरह मेहफ़ूज़ रहेंगी... मैं कोशिश करता रहूँगा की विक्रम जी का फ़ोन लग जाये... हो सके तोह लखनऊ भी चला जायूँगा...

सुप्रिया ने एकदम से हाथ आगे बड़ा कर कहा - नहीं प्लीज... मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर मत जाइएगा... फिलहाल तोह नहीं...

और फिर एकदम से उसने अपना हाथ वापस खींचते हुए अपनी गॉड में रख लिया. इक़बाल बिस्तर के थोड़ा पास आया, सुप्रिया के मैं का डर बाद रहा सा रहा था, कहीं वह बिस्तर पर उसके साथ तोह नहीं आने वाला था. इक़बाल एकदम से ज़मीन पर बैठा और बिस्तर के नीचे से एक गद्दा बहार खींचा. सुप्रिया ये देख कर हैरान सी रह गयी.

इक़बाल - मैडमजी... आप आराम से सो जाइये... मैं यहाँ नीचे गद्दा बिछा कर सो जायूँगा...

सुप्रिया ने हलके से हाँ में सर हिलाया.

इक़बाल - अगर आपको कोई दिक्कत न हो तोह मैं लाइट बंद कर दू?

सुप्रिया - जी.. बस मैं ये गहने उतार दू...

इक़बाल - हाँ बिलकुल, कोई जल्दी नहीं है...

सुप्रिया धीरे धीरे अपने सारे गहने उतारने लगी. उसके माथे का हार, उसके गले का हार, उसकी नाथ, उसके भरी भरी कंगन... उसने सब को उतार दिया. और इस सब में उसके सर का घूँघट भी नीचे हो गया था.

सुप्रिया ने सारे गहने इक़बाल की और सरकाये, और इक़बाल ने उन्हें उठाते हुए अलमारी में रख दिए. इक़बाल लाइट के स्विच तक पंहुचा और सुप्रिया की और देखने लगा. सुप्रिया ने उसे कहा - लाइट बंद कर दीजिये न...

इक़बाल ने अपनी गलती रीलीज़ करते हुए एक झटके में लाइट बंद कर दी. पर अंधेरे में भी सुप्रिया ऐसा महसूस कर रही थी की इक़बाल उसकी और hi देख रहा था. उसे अँधेरे में इक़बाल की छवि दिखाई दी, जो ज़मीन पर नीचे लेट गयी. सुप्रिया भी उस भारी से लेंगे को पहने बिस्तर पर लेट गयी. इक़बाल के सामने कपडे बदलने का तोह सवाल hi नहीं होता था.

उसे वहां लेते लेते अपनी पहली सुहाग रात याद आ गयी. कैसे उसने सोचा था की वह उस रात कुछ नहीं करेगी, पर कैसे अतुल उस पर चढ़ hi गया था, पर उसे कभी तृप्त नहीं कर पाया था.

रात का गहरा अँधेरा और सन्नाटा बढ़ता जा रहा था और आखिर कर उसकी आँख लग hi गयी.

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सुबह सुप्रिया को इक़बाल की हलकी सी आवाज़ ने जगाया - मैडमजी... मैडमजी....

सुप्रिया ने अपनी आखें मीचते हुए बोलै - क्या हुआ... अभी क्या टाइम हुआ है...

जैसे वह भूल hi गयी थी की वह कहाँ थी.

इक़बाल - मैडमजी... सुबह की ,,., का वक़्त हो गया है... मैं बहार की और जा रहा हूँ... आप कमरा बंद कर लीजिये...

सुप्रिया एकदम से उठ बैठी, ये कोई बुरा सपना नहीं था, वह इस समय यहाँ थी, इक़बाल के घर में, उसके बिस्तर पर, उसकी बीवी बन चुकी थी. सुप्रिया ने हाँफते हुए इक़बाल को देखा, अभी भी कमरे में अंधेरा सा hi था.

इक़बाल - मैं कमरा खुला नहीं छोड़ना चाहता था की कहीं कोई आपको परेशान करने न आ जाये...

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, वह उसके बेहद पास था, शायद उसे जगाने के लिए - हाँ... मैं बंद करती हूँ... शुक्रिया...

सुप्रिया बिस्तर से उठी और इक़बाल के पीछे पीछे दरवाज़े तक आयी. इक़बाल ने हलके से कुण्डी और दरवाज़ा खोला और बहार आ गया. सुप्रिया ने उसके पीछे से कमरे की कुण्डी लगा दी और अपनी पीठ वहीँ दीवार पर लगा कर कड़ी हो गयी. उसे अपनी किस्मत पर यकीं hi नहीं आ रहा था.

कुछ पल सुप्रिया ने वहीँ खड़े खड़े कमरे में इधर उधर देखा. इक़बाल अपना गद्दा बिस्तर के नीचे सरका चूका था. उसका कल रात का कुरता पयजामा एक कोने में पड़े थे. क्या इक़बाल ने उसके सोते हुए कमरे में अपने कपडे उतार कर बदले थे? फिर सुप्रिया ने सोचा की अगर बदले भी थे तोह क्या, ये उसका hi तोह कमरा था. कितनी शराफत थी उसमे की वह रात को बिना सुप्रिया के कहे चुप चाप नीचे ज़मीन पर सो गया था.

कल दिन से ये भरी सा लेंघा पहने पहने सुप्रिया के कंधे भी दर्द करने लगे थे. सुप्रिया को याद आया की रुबीना उसके लिए अलमारी में कपडे छोड़ कर गयी थी. उसने अलमारी खोली और वहीँ सामने एक लेडीज कपड़ो का ढेर फोल्डेड रखा था. वह उसमे से एक सलवार सूट छटने लगी. एक हलके बैंगनी रंग का सूट उसे ाचा लगा और वह अपना भरी लेंघा उतार कर उसे पेहेन्ने लगी.

लेंघा उतारते hi सुप्रिया को चैन सा आया और वह अपने अकड़े को कंधो को थोड़ा घूमने लगी. फिर उसे याद आया वह अभी सिर्फ एक ब्रा में इक़बाल के कमरे में कड़ी थी. उसने जल्दी से अपना सूट पेहेनना शुरू किया. बहार उजाला हो गया, पर शायद अभी सिर्फ 7 hi बजे थे. पर आस पास के घरो से काफी शोर आना शुरू हो गया तोह ऐसा लग रहा था की 7 नहीं 9 बज गए हो.

सुप्रिया को बहार निकलना अजीब सा लग रहा था पर उसने अपना सर ढाका और हिम्मत करके बहार की और आ गयी.

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शुक्र है उसे वहां बहार कोई नहीं दिखा. पर दुसरे घर की छत दिखाई दे रही थी, और वहां खड़े कुछ लोग उसकी और hi देख रहे थे. सुप्रिया जल्दी से नीचे की और बड़ी. उसे ऊपर से घुसल खाना भी दिखा, और ये यकीन हो गया की ऊपर से कोई किसी को नहाते हुए तोह नहीं देख सकता था.

वह जल्दी से सीढ़ियों से नीचे पहुंची. हिना का कमरा बंद था, शायद वह अभी भी सो रही थी. शायद अम्मी जी अभी भी अपने कमरे में थी और रुबीना रसोई घर में. सुप्रिया भी रसोई घर की तरफ हो ली.

सुप्रिया रसोई घर में रुबीना को देख कर अंदर घुस गयी और उसने हलके से कहा - गुड मॉर्निंग...

उसे नहीं पता था की यहाँ गुड मॉर्निंग कैसे बोलते थे.

रुबीना उसकी और देख कर मुस्कुरायी - गुड मार्निंग... इतना तोह सीखा hi दिया है मेरी बेटी ने मुझे...

सुप्रिया - मैं कुछ मदद कर दू आपकी...

रुबीना - नहीं नहीं... अभी नहीं... इसका भी वक़्त आएगा... ाचा ये बताया... कल रात कैसी गयी... अम्मी जी का तोह मुँह बना हुआ है सुबह से कुछ सोच कर...

सुप्रिया - क्या सोच कर...

रुबीना - देखो मुझे तोह सोने के बाद कुछ पता नहीं चलता पर वह कह रही थी की रात को तुम्हारे कमरे से कोई आवाज़ नहीं आयी... बस सन्नाटा hi था...

सुप्रिया ने अपनी आँखें झुका ली, उसे नहीं पता था की अब ये सब भी लोग ध्यान देने वाले थे - जी... वह... काफी थक गयी मैं... तोह सो गयी....

रुबीना - ाचा... मैं समझ सकती हूँ.... कोई नहीं... थोड़ा तोह कुछ किया hi होगा... एक दुसरे को चूमना... या कुछ और....

सुप्रिया नीचे hi देखती रही.

रुबीना - मेरी बन्नो... इतना शर्माने से काम नहीं चलेगा....

सुप्रिया कुछ न बोल कर भी उन्हें कुछ भी समझने देना चाहती थी - जी... आप समझ लो बस अब...

सुप्रिया शरमाते हुए नीचे देखने लगी.

रुबीना उसके कंधे पकड़ कर मुस्कुरायी - तुम्हारी ये हाय न... उफ़... कातिल है... और वैसे ये सलवार तोह तुम पर क्या जैम रहा है... मैंने ये हिना के लिए खरीदा था...

सुप्रिया - ओह ाचा.... आप उसके लिए hi रख लेते न फिर इसे...

रुबीना - फ़िक्र मत करो... मैं तुम्हारे जेठ जी को बोल दूंगी, वह शहर से और सलवार ले आएंगे... हिना के लिए भी और तुम्हारे लिए भी.... और इस बार किसी और दर्ज़ी के यहाँ जायेंगे... तुम बेफिक्र रहना...

सुप्रिया ने हलके से मुस्कुरा के सर हिला दिया.

रुबीना - बस तुम्हारे जेठ जी और इक़बाल आते hi होंगे नाश्ते के लिए, मैं प्लेट लगा के दे दूंगी, तुम परोस देना...

सुप्रिया - अम्मी जी?

रुबीना - उनका खाना मैं उनके कमरे में पंहुचा दूंगी... तुम अभी वहां मत जाना...

सुप्रिया ने बहार देखा और अब्बास और इक़बाल दोनों आकर रसोई घर के बहार बैठ गए थे. रुबीना ने दो प्लेट में खाना लगा कर सुप्रिया को दिया. कटोरी में कुछ non-veg भी था, पर सुप्रिया को नहीं मालूम था की वह क्या है. सुप्रिया प्लेट लेकर बहार की और गयी और झुक कर उनके सामने खाना परोस दिया.

जैसे hi उसकी नज़रे इक़बाल से मिली उन दोनों के छेहरो पर एक दबी हुई सी मुस्कान आ गयी.
 
अपडेट 81

सुबह से शाम ढल आयी थी और न जाने क्यों सुप्रिया बेसब्री से इक़बाल के लौटने का इंतज़ार कर रही थी. पिछले एक हफ्ते में उसकी ज़िन्दगी में इतनी हलचल हो गयी थी की वह सात दिन एक साल जैसे लगने लगे थे. लेकिन आज का दिन थोड़ा अलग था, बिलकुल शांत, बिना किसी ड्रामा या टेंशन के. उससे ऐसा लग रहा था जैसे कितनो दिनों बाद आज उसकी थकान और चिंता का बोझ थोड़ा सा काम हुआ हो.

शादी के ज़्यादातर मेहमान कल रात hi वापस चले गए थे. रुबीना की बेटी ज़ीनत भी आज अपने घर चली गयी थी. अब तोह बस घर के लोग hi रह गए थे.

सुबह से रुबीना ने सुप्रिया को किसी काम के करीब भी नहीं जाने दिया. हिना के पास बिठा कर उसने कह दिया था की जब तक सुप्रिया के हाथों की मेहँदी का रंग फीका न हो जाए, तब तक उससे कोई काम नहीं करवाएगी. अम्मी जी को यह बात शायद पसंद नहीं आयी, लेकिन रुबीना के सामने उनकी चलती कहाँ थी.

दिन भर घर में रह कर सुप्रिया को कई नयी बातें पता चली. अब्बास का एक कारखाना था जहाँ लकड़ी का सामान बनता था. वहां मज़दूर भी काम करते थे पर अब्बास खुद भी काफी काम करता, और अब इक़बाल भी उसका हाथ बता रहा था. काफी म्हणत का काम था और पूरे दिन के बाद अच्छी खासी थकान हो जाती थी.

शाम ढलते hi अब्बास और इक़बाल वापस आ गए. सुप्रिया, सर ढके, हिना के साथ बैठक में बैठी थी. उसने देखा इक़बाल के कपडे धुल मिटटी से भरे हुए थे. उसने एक नज़र सुप्रिया की तरफ डाली और सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ चल दिया.

तभी रुबीना रसोई से निकल कर बोली - जा, ऊपर चली जा… देख ले उसे कुछ चाहिए तोह नहीं.

सुप्रिया को अजीब लगा, ऐसा सीधे इक़बाल के पीछे जाना थोड़ा असहज लग रहा था. पर वह रुबीना की बात को ताल भी नहीं पायी. सीढ़ियां चढ़ कर जब वह कमरे के बहार पहुंची तोह देखा दरवाज़ा आधा खुला था. वह सीधा अंदर चली गयी.

अंदर घुसते hi उसने देखा इक़बाल ने शर्ट उतार राखी थी. उसकी नंगी छाती देखते hi सुप्रिया झिझक गयी, तुरंत पलट गयी और आँखें बंद कर ली.

सुप्रिया - सॉरी… मुझे खटखटा के अंदर आना चाहिए था…

इक़बाल ने जल्दी से कुरता पेहेनते हुए कहा - कोई नहीं मैडमजी… मैंने पेहेन लिया है अब…

इक़बाल ने कमरे की और देखा, ऐसा लग रहा था की काफी कुछ बदल सा गया था कमरे में, बिस्तर पर चद्दर चड्ढी हुई थी, बिखरा हुआ सामान गायब था, थोड़ी साफ़ सफाई भी हो राखी थी.

इक़बाल - ये सब आपने किया…

सुप्रिया उसकी और मुड़ी और मुस्कुराते हुए बोली - हाँ…

इक़बाल - और चद्दर कहाँ से मिली?

सुप्रिया - वह मैंने रुबीना... मेरा मतलब भाभी से मांग ली थी...

ये सुनते hi इक़बाल का चेहरा थोड़ा सीरियस हो गया - आप मुझे बोल देती... मैं ये सब आकर कर देता घर आने के बाद... आपको करने की क्या ज़रुरत थी… और चद्दर चाहिए थी तोह आप मुझसे मांग लेती...

सुप्रिया के चेहरे की मुस्कराहट गायब होने लगी थी, वह झिझकते हुए बोली - वह... मैंने सोचा आप थके हुए आओगे दिन भर के काम से... तोह मैं कर देती हूँ... बस...

इक़बाल का गुस्सा थोड़ा बाद सा रहा था - नहीं... वह तोह ठीक है... पर यहाँ मेरा काफी सारा सामान रखा हुआ था... अब अगर मुझे वह चाहिए होगा तोह मैंने कैसे ढूंढूंगा...

सुप्रिया सफाई देते हुए बोली - मैंने बस अलमारी में रख दिया है... मिल जायेगा...

इक़बाल - अलमारी में!! आप वहां न रखे तोह बेहतर होगा...

सुप्रिया का मुँह उतर गया, उसे लगा था की इक़बाल उसके कमरे साफ़ करने से खुश होगा पर वह तोह उस पर भड़क सा रहा था. वह थोड़ा उदास और थोड़ा गुस्सा होते हुए बोली - ठीक है... मैं सब सामान वापिस रख दूंगी जहाँ रखा था… आप फ़िक्र मत कीजिये…

इक़बाल ने उसकी आवाज़ सुन कर चुप हो गया, जैसे उसे समझ आ रहा हो के वह ज़्यादा रियेक्ट कर गया. पर इससे पहले वह कुछ और कहता, सुप्रिया रूठते हुए बोली - अभी मैं नीचे जा रही हूँ, भाभी को लगा था की यहाँ मेरी ज़रुरत होगी, पर लगता है ऐसा नहीं है...

इक़बाल ने हवा में अपना हाथ ऊपर किया सुप्रिया को रोकने के लिए पर सुप्रिया तब तक मुद चुकी थी और वह कमरे से जल्दी से बहार निकल गयी. सुप्रिया की आँखें हलकी सी गीली हो गयी थी और वह जल्दी से नीचे रसोई घर की तरफ आ गयी, जहाँ अंदर रुबीना रोटियां बना रही थी.

रुबीना ने बिना मुड़े उसका लटका हुआ चेहरा और नाम आँखें पद ली थी. वह कुछ पल बाद उसने मजाकिया लहजे में कहा - क्या हुआ... सैयां जी से लड़ाई हो गयी क्या?

सुप्रिया की आँखें हलके से रुबीना की तरफ उठी और उसके मैं में ख्याल आया, वह ये क्या कर रही थी, वह इक़बाल की बातों पर इतना क्यों बुरा मान रही थी. वह उसका था hi कौन, वह तोह बस यहाँ कुछ दिनों के लिए बस आश्रय ले रही थी.

सुप्रिया ने हलकी सी आवाज़ में कहा - नहीं... ऐसा कुछ नहीं...

रुबीना मुस्कुराते हुए बोली - उसे तुम्हारा कमरा साफ़ करना पसंद नहीं आया...

रुबीना को तोह जैसे इक़बाल के बारे में हर चीज़ पता थी, उसकी पसंद नापसंद, वह क्या कहेगा, वह क्या करेगा... सुप्रिया ने अब तक उन दोनों के बीच ज्यादा बात होते तोह नहीं देखा था.. पर न जाने कैसे रुबीना को सब पता था...

रुबीना - कोई नहीं... उसने गुस्सा जरूर किया होगा... पर उसे ाचा भी लगा होगा...

सुप्रिया - आपको कैसे पता...

रुबीना - बस पता है... तुम ऐसा करना जिस दिन वह घर में हो... उसके साथ मिल कर कमरा साफ़ कर लेना...

सुप्रिया अपना सर न में हिलाते हुए बोली - हम्म्म... मैं क्यों करू... उन्हें करना है तोह वह कर लेंगे...

रुबीना हस्ते हुए - ाचा ठीक है... पर ज्यादा खींचना मत इस लड़ाई को... या उसे बोलू की तुम्हे अचे से मन ले आज रात को...

सुप्रिया के गाल लाल हो गए - नहीं नहीं... आप ऐसा कुछ मत करना...

इतने में अब्बास और इक़बाल बहार आ कर बैठ गए थे और हिना भी कुछ पल बाद रसोई घर में आ कर सुप्रिया के साथ कड़ी हो गयी. जैसे hi रुबीना ने खाने की प्लेट लगा कर दी, सुप्रिया ने एक प्लेट हिना को पकड़ा दी और उसे इक़बाल को परोसने का इशारा किया. सुप्रिया ने जाकर अब्बास के सामने प्लेट रख दी और हिना ने इक़बाल के.

सुप्रिया महसूस कर पा रही थी की इक़बाल उसकी और hi देख रहा था, जैसे उससे पूछ रहा हो की वह उससे नाराज़ थी क्या. सुबह जब उन दोनों की आँखें मिली थी और एक हलकी सी मुस्कान के साथ एक दुसरे को देखा था, शायद उस एक पल ने इक़बाल का पूरा दिन रोशन कर दिया था. लेकिन अब सुप्रिया के चेहरे पर जो नाराज़गी थी, वह उसे बेचैन सी कर रही थी.

सुप्रिया जल्दी से वापस रसोई घर में आ गयी, और उसने और रोटियां हिना के हाथों hi बहार भिजवाई. रसोई की खिड़की से सुप्रिया को दिख रहा था की इक़बाल अपनी गर्दन हलकी सा उचका कर, अंदर झाँकने की कोशिश कर रहा था, जैसे बस सुप्रिया की एक झलक पाना चाहता हो. सुप्रिया के होंठों पर अनजाने hi पर एक बोहोत hi हलकी सी मुस्कान खिल गयी, पर तुरंत hi उसने आँखें चुराते हुए अपना ध्यान वापस रुबीना की और कर दिया.

इक़बाल और अब्बास थोड़ी देर बाद खाना खा कर वहां से उठ गए थे, और हिना ने उनकी झूठी प्लेट उठा दी. तब तक रुबीना ने उन सबका खाना भी लगा दिया था, और वह तीनो बहार बैठ कर खाने लगे. हिना की बक बक तोह ख़तम hi नहीं हो रही थी. वह अपने फर्स्ट ईयर के फर्स्ट टर्म के एग्जाम के बारे में बात करे जा रही थी.

सुप्रिया का ध्यान उसकी और नहीं था. वह फिर से अपनी पुराणी ज़िन्दगी की यादों में खो सी गयी थी. अतुल के साथ का जीवन, विक्रम के साथ का प्यार... और पता नहीं क्या क्या यादें उसे घेरे हुए थी. खाना ख़तम होते होते 9 बज चुके थे और अँधेरा हो चला था. रुबीना ने सुप्रिया को फिर से किसी काम को हाथ नहीं लगाने दिया और उसे सीधे ऊपर अपने कमरे की और जाने को बोलै.

सुप्रिया की घबराहट फिर से बढ़ने लगी, एक बार फिर से रात को इक़बाल के साथ कमरे में रात गुज़ारना, कितना अजीब सा लगेगा. पर वह और कर भी क्या सकती थी. वह धीमे धीमे कदमो से ऊपर की और आयी.

इक़बाल के कमरे तक पहुंचने में उसे रुबीना के कमरे को पार करके जाना पड़ता था, और उनके कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था. सुप्रिया वहां जान बूझ कर तोह नहीं देख रही थी, पर उसे अंदर कमरे में पलंग पर अब्बास लेता हुआ दिखाई दिया. उसने जल्दी से अपनी नज़रें झुका ली और इक़बाल के कमरे की और बाद गयी.

पता नहीं बीच वाले कमरे में क्या था, पर उस पर ताला लगा हुआ था. इस बार उसने अपने कमरे पर पहुंच कर ज़ोर से खटखटाया. अंदर से इक़बाल की आवाज़ आयी - आ जाइये...

सुप्रिया दरवाज़ा को खोलते हुए अंदर आयी, इक़बाल पलंग पर बैठा हुआ था, पर वह सुप्रिया को देखते hi जल्दी से खड़ा हो गया.

सुप्रिया ने उसे खड़ा होते देख कहा - कोई नहीं... आप बैठे रहिये...

इक़बाल - नहीं... आप बैठिये...

सुप्रिया ने अंदर आते हुए अपने पीछे कमरे का दरवाज़ा बंद किया. सुप्रिया चुप चाप बिस्तर की तरफ आयी, कल से उसे ये कमरा थोड़ा बेहतर लग रहा था पर अभी भी काफी कुछ सफाई होनी बाकी थी. इक़बाल ने बिस्तर के नीचे से अपना गद्दा बहार खींचा और वह उस पर लेटने की तैयारी करने लगा. सुप्रिया भी बिस्तर पर बैठ चुकी थी, अभी भी वह फूलो से सजा हुआ था जिनकी पत्तिया पलग पर गिरी हुई थी.

इक़बाल - मैडमजी… मैं बत्ती बुझा दू?

सुप्रिया ने धीरे से कहा - हाँ… अगर आपको नींद आ रही है तोह बुझा दो…

इक़बाल को समझ नहीं आया की सुप्रिया को भी नींद आ रही थी या नहीं, पर उसने कमरे की लाइट ऑफ कर दी और ज़मीन पर बिछे गद्दे पर आकर लेट गया. सुप्रिया भी अँधेरे में बिस्तर पर दूसरी और करवट कर के लेट गयी. रात के अँधेरे में लेते लेते उसके मैं में कई अजीब से ख्याल आने लगते थे, और वह उन्हें अपने दिमाग से निकलने की कोशिश कर रही थी.

लेते लेते काफी देर हो चुकी थी, और वह गहरी नींद में जा hi रही थी की उसे ऐसा लगा की जैसे उसके पैरो पर कुछ छू रहा हो, शायद किसी की उंगलियां!! सुप्रिया बुरी तरह काँप उठी, उफ्फ्फ, इक़बाल की इतनी हिम्मत, की दूसरी hi रात को उसने उसे छूने की हिम्मत कर डाली.

वह गुस्से में बीएड पर बैठी और उसकी नज़र बीएड के नीचे के हिस्से पर गयी, पर वहां किसी का हाथ नहीं था, और इक़बाल तोह अभी भी ज़मीन पर दूसरी और मुँह फेरे सो रहा था. तभी उसे फिर से बीएड पर कुछ महसूस हुआ! अँधेरे में उसे साफ़ तोह नज़र नहीं आ रहा था पर शायद कोई छोटा जानवर या कीड़ा था.

सुप्रिया चीखती हुई बिस्तर से नीचे कुड़ी और इक़बाल की पीठ पर जाकर चिपट गयी - अह्हह्ह्ह्ह.....

इक़बाल हड़बड़ाते हुआ मुदा और सुप्रिया डर के मारे उसे कास के पकड़ लिया, उसके मम्मी इक़बाल की छाती पर चिपकते हुए.

इक़बाल - मैडमजी... क्या हुआ...

सुप्रिया ने अपनी आँखें डर के मारे मीचि हुई थी - वह ऊपर बीएड पर... कुछ है...

सुप्रिया बिलकुल इक़बाल से चिपकी हुई थी, और इक़बाल के हाथ भी सुप्रिया की पीठ और कमर पर जाने अनजाने आ गए थे.

इक़बाल - क्या है बीएड पर....

सुप्रिया डरते हुए बोली - पता नहीं मुझे...

इक़बाल ने खड़े होते हुए कमरे की लाइट जलाई, बिस्तर पर सच में एक बड़ी सी छिपकली बैठी हुई थी. सुप्रिया भी कड़ी हो गयी, और जैसे hi उसने छिपकली को देखा वह डर के मारे इक़बाल के पीछे जा कर कड़ी हो गयी.

इक़बाल को थोड़ी सी हसी आ गयी - ारी मैडमजी आप इतना क्यों डर रही है... बस छिपकली hi तोह है... मैं अभी इसे भगा देता हूँ...

उसकी हलकी सी हसी सुनकर सुप्रिया को थोड़ा गुस्सा आ गया - मैंने कहा था न की इस कमरे को साफ़ करने की जरूरत है... पता नहीं कौन कौन से जानवर है यहाँ...

इक़बाल छिपकली को भागने के लिए बीएड पर आगे बड़ा पर वह जल्दी से बीएड से हटकर दीवार पर चढ़ गयी. सुप्रिया की चीख फिर से निकल गयी.

इक़बाल ने फिर से छिपकली को पकड़ना चाहा पर वह जल्दी से भागते हुए अलमारी के पीछे चिप गयी.

इक़बाल - मैडमजी... आप घबराइए नहीं... चली गयी है वह... आप सो जाइये...

सुप्रिया ने सर हिलाया - नहीं नहीं... मैं यहाँ नहीं सो सकती... वह फिर से आ गयी तोह...

इक़बाल - नहीं आएगी मैडमजी...

सुप्रिया गुस्से में बोली - आपको कैसे पता की नहीं आएगी...

इक़बाल - ाचा आप बैठिये तोह सही...

इक़बाल ने सुप्रिया के कंधे पर हाथ रखते हुए उसे बीएड पर बिठाया. सुप्रिया डर के मारे इधर उधर देख रही थी.

सुप्रिया - आप ऐसा करिये... आप बीएड पर सो जाइये... और मैं नीचे...

इक़बाल - पर नीचे भी तोह आ hi सकती है न छिपकली...

सुप्रिया ने परेशान होते हुए इक़बाल को देखा.

इक़बाल - आप घबराइए नहीं... कल सफाई कर देंगे कमरे की...

सुप्रिया का घबराइए हुआ मैं थोड़ा शांत हो रहा था, उसने अपनी बड़ी बड़ी आँखों से इक़बाल की और देखा - पक्का?

इक़बाल - पक्का.... अब आप सो जाइये...

सुप्रिया - हम्म्म... नहीं.... ऐसे करिये आप वहां दीवार की और सो जाइये... और मैं यहाँ दूसरी और...

इक़बाल ने चौंकते हुए सुप्रिया की और देखा - मैं यहाँ ऊपर बिस्तर पर...

शायद इस समय डर के मारे सुप्रिया अपने शब्दों का मतलब नहीं समझ पा रही थी - तोह क्या हुआ? आप उस साइड सो रहे होंगे और मैं इस साइड... इतना बड़ा तोह है बीएड की हम दोनों सो जाये...

इक़बाल - हाँ पर....

सुप्रिया - प्लीज बस आज रात की तोह बात है... नहीं तोह मैं जागती hi रहूंगी पूरी रात...

इक़बाल ने हलके से कहा - ठीक है...

सुप्रिया ने नीचे से इक़बाल का तकिया और चद्दर उठायी और उसे बिस्तर पर दूसरी और रख दिया. सुप्रिया बिस्तर पर लेट गयी और इक़बाल से मुँह फेर लिया, पर ऐसा करने से उसकी गांड इक़बाल की तरफ हो गयी और उसकी कुर्ती थोड़ा ऊपर.

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इक़बाल बिस्तर पर दूसरी और आया और लेट गया. उन दोनों के बीच करीब 2-3 फ़ीट का फासला था और वह दोनों एक दुसरे की शकल देख पा रहे थे. सुप्रिया ने फिर से अपना चेहरा फेर लिया और आप को चद्दर से पूरी तरह धक् लिया. उसने इक़बाल को बिस्तर पर ऊपर लेटने को तोह बोल दिया था, पर कितना अजीब सा लग रहा था, अब वह उसकी और देख पा रहा था, और शायद देख भी रहा था.

सुप्रिया चाहती तोह नहीं थी की कमरे की लाइट ऑफ हो पर शायद इक़बाल की नज़रो से खुद को छुपाने के लिए शायद एहि तरीका था. उसने हलके से कहा - इक़बाल... आप लाइट ऑफ कर देंगे क्या?

इक़बाल - जी...

इक़बाल खड़ा हुआ और कमरे की बत्ती फिर से बुझा दी और वह अँधेरे में फिर से बीएड के कोने में जाकर लेट गया. अँधेरे में भी उसे सुप्रिया दिखाई दे रही थी, और चद्दर में लिप्त हुआ उसका शरीर. पीछे से उसकी उभरती हुई गांड. कुछ hi देर पहले सुप्रिया के मम्मी उसकी छाती से चिपके हुए थे. सुप्रिया की मदमस्त जवानी के बारे में सोचते hi उसका लुंड थोड़ा थोड़ा हरकत में आने लगा.

इक़बाल ने एक गहरी सांस ली और अपने हाथ अपने लुंड पर रखा. उसका बहुत मैं कर रहा था की वह अपना लुंड हिला ले, पर शायद मैडमजी को इसका एहसास हो जाये.

दूसरी और सुप्रिया ने भले hi इक़बाल से मुँह फेरा हुआ था पर उसकी आँखें पूरी तरह से खुली हुई थी और उसके चूचे बिलकुल सख्त खड़े थे. उसकी टांगो के बीच एक अजीब सी बेचैनी और तड़प थी, और वह वहां हाथ लगा कर उसे शांत करना चाहती थी. पर उसे भी डर था की कहीं इक़बाल उसे ये सब करते न देख ले. उसने चद्दर के अंदर अपना हाथ अपनी जाँघों के बीच फसाया, और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करि.

उसकी बस एहि प्राथना थी की बस अब आज रात की उसे भी परेशान न करे.

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सुबह होते hi उसे फिर से इक़बाल की आवाज़ ने जगाया. शायद वह रोज़ सुबह 5 बजे जग जाता था नमाज़ पड़ने. सुप्रिया एकदम से बिस्तर से नहीं उठी और बीएड पर चुप चाप लेती रही. इक़बाल कुछ देर बाद बहार चला गया था. सुप्रिया का हाथ अभी भी उसकी जाँघों के बीच hi था और पूरी रात एक करवट में लेते लेते उसका बदन अकड़ सा गया था.

उसने महसूस किया की उसकी चड्ढी में हल्का सा गीलापन भी था. उफ्फ्फ... पता नहीं वह इतनी बेचैन सी क्यों हो रही थी कल रात. अभी भी बहार अँधेरा hi था, और वह कुछ देर और बिस्तर पर लेती रही.

थोड़ी रौशनी होने के बाद वह कड़ी हुई और अपने कपडे लेते हुए नीचे घुसल खाने की और गयी. ये भी एक अलग hi सर दर्दी थी. वह जल्दी से नहाने घुसी और नहाते हुए उसके हाथ बार बार उसकी छूट की और जा रहा थे. वहां मसलना उसे बहुत hi ाचा सा लग रहा था. पर किसी तरह उसने अपने आप पर काबू पाया.

जैसे hi वह नाहा कर निकली, उसे बहार आँगन में इक़बाल दिखाई दिया. दोनों की नज़रें कुछ पल के लिए मिली और फिर वह नीचे की और देखने लगे. सुप्रिया जल्दी से हिना के कमरे की और बड़ी और वहां तैयार होने लगी. हिना अभी भी सोई पड़ी थी.

कुछ देर बाद रुबीना भी वहां हिना को जगाने के लिए पहुंच गयी - उफ्फ्फ क्या करू इस लड़की का... मेरी नाक कटायेगी ये एक दिन जब इसकी शादी हो जाएगी...

सुप्रिया ने धीरे से कहा - सोने दीजिये न... सोती हुई कितनी प्यारी लग रही है...

रुबीना ने मुस्कुरा के उसकी और देखा और चुटकी लेते हुई बोली - तुम बताया... कल रात नींद पूरी हुई या नहीं... आँखें देख कर तोह नहीं लग रहा...

सुप्रिया ने अपनी आँखें झुका ली - नहीं... अछि नींद आयी थी...

रुबीना - हाँ... कुछ शोर शराबा हुआ था... उसके बाद एक डैम चुप्पी... मैं सोच रही थी की कहीं ज्यादा ज़ोर से अंदर तोह नहीं घुसा दिया था?

रुबीना की बातें सुन कर सुप्रिया शर्म से ज़मीन में गड़े जा रही थी. रुबीना तोह ये भी नहीं सोच रही थी की उसकी बेटी वहीँ सो रही थी.

सुप्रिया - नहीं ऐसा कुछ नहीं... वह बस एक छिपकली आ गयी थी मेरे ऊपर...

रुबीना के चेहरे पर एक चांट सी मुस्कान थी - ाचा... तोह छिपकली नाम रख दिया है क्या उसका... कितनी बड़ी छिपकली थी?

रुबीना ने अपने हाथ से इशारा किया - इतनी बड़ी.... और इतनी मोती...

सुप्रिया तोह अभी भी छिपकली की hi बात कर रही थी, पर रुबीना शायद किसी और की - हाँ... काफी बड़ी थी, पर वह सब नहीं जो आप सोच रही हैं... सच में छिपकली hi थी...

रुबीना हस्ते हुए - ाचा जी... हमे भी पराया सा कर दिया की कुछ बता नहीं रही हो...

सुप्रिया के मुँह से निकल गया - कुछ होगा तोह मैं सच में बता दूंगी...

ये बोलते hi सुप्रिया के मैं में एक चिंगारी सी जग गयी. उफ्फ्फ्फ़ क्या बोल रही थी वह... कुछ होगा तोह वह जरूर बताएगी... क्या होगा... और क्यों होगा... कुछ नहीं होगा उन दोनों के बीच...

रुबीना थोड़ा सा संजीदा हो गयी - सुप्रिया... एक बात पूछू तुमसे...

सुप्रिया - हाँ पूछिए न...

रुबीना - दो रात हो गयी... तुम्हारे और इक़बाल के बीच चल क्या रहा है... वह तुमसे नाराज़ है क्या... या तुम उससे?

सुप्रिया - भाभी ऐसा कुछ नहीं, जैसा आप सोच रही हैं...

रुबीना - तुम्हे भी तोह नीचे एक अलग सी जलन महसूस हो रही होगी... उस लेप से... उससे तोह अचे अचे पिघल जाते है...

सुप्रिया के गाल लाल हो गए, शायद उसे अब समझ आ रहा था की वह पिछले 2-3 दिनों से इतना गरम क्यों महसूस कर रही थी... वह लेप उसकी छूट में एक चिंगारी सा लगा रहा था...

रुबीना बोलती गयी - और जहाँ तक मुझे पता है... इक़बाल भी काम नहीं इन सब चीज़ो में...

सुप्रिया - भाभी...

अब तोह जैसे सुप्रिया बहुत hi स्वाभाविक तौर पर रुबीना को भाभी बुला पा रही थी.

रुबीना - मेरी बात सुनो... तुम दोनों का ham-bistar होना बोहोत जरूरी है... नहीं तोह...

तभी हिना की जागने की आवाज़ ने उन दोनों का ध्यान अपनी और खींचा - अम्मी... चची... इतना शोर कई मचा रखा है...

रुबीना उस पर भड़कते हुए बोली - शहज़ादी जी... उठ जाइये अब... और मेरा हाथ बताइये...

हिना फिर से धम्म से बिस्तर पर लेट गयी और अपना मुँह धक् लिया.

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सुबह के नाश्ते के बाद सुप्रिया जब ऊपर अपने कमरे में पहुंची तोह उसने देखा की इक़बाल वहीँ अंदर hi था. उसे तोह पता भी नहीं था की वह अभी तक घर में hi है. उसने कमरे का सारा सामान इधर उधर किया हुआ था. पलंग अब कमरे के बीच में था, और कुछ संदूक उस पर रखे हुए थे.

सुप्रिया - इक़बाल... ये क्या करने में लगे हो आप...

इक़बाल - आपने hi तोह कहा था मैडमजी... कमरा साफ़ करने के लिए... और फिर वह छिपकली भी तोह बहार भगाणी थी... वह कर दी है मैंने बहार

सुप्रिया तोह उसके बारे में भूल hi गयी थी - ाचा... शुक्रिया... बताइये... मैं भी कुछ मदद कर देती हु...

इक़बाल - नहीं नहीं... हो गया बस...

इक़बाल ने अपने दोनों हाथों से बड़ी आसानी से उस भरी लोहे की अलमारी को हिला दिया. सुप्रिया तोह बस देखती hi रह गयी थी. इक़बाल ने एक झाड़ू ली और अलमारी के बीच से सफाई करने लगा.

सुप्रिया उसके पास बड़ी - आप मुझे दे दो... मैं कर देती हूँ... आप थक गए होंगे...

सुप्रिया ने उसके हाथ से झाड़ू छीनी चाही पर उसका हाथ इक़बाल के हाथ से छुआ, और वह दोनों एक दुसरे के बेहद पास आकर खड़े हो गए.

इक़बाल - आप रहने दीजिये मैडमजी... आपके हाथ और कपडे गंदे हो जायेंगे... मैं कर लूंगा न...

सुप्रिया थोड़ा सा पीछे हैट गयी, और इधर उधर देखने लगी, ये सोचते हुए की वह क्या कर सकती थी. उसने देखा की ऊपर लटका हुआ पंखा काफी ज्यादा गन्दा था. उसने ज़मीन पर पड़े हुए एक कपडे को उठाया और पलंग पर खड़े होते हुए उस पर रखे संदूक पर कड़ी हो गयी. वह काफी ुचि हो गयी थी और उसका हाथ पंखे तक बस पहुंच hi रहा था, बस उसे थोड़ा सा और उचकना पद रहा था.

इक़बाल ने अपना सर घुमा कर सुप्रिया की और देखा - मैडमजी!! ये क्या कर रहे हो आप...

सुप्रिया - कुछ नहीं... बस थोड़ी सी सफाई...

इक़बाल - आप नीचे आयो... मैं कर दूंगा ये...

पर सुप्रिया उसकी बात कहाँ सुनने वाली थी - नहीं... मैं कर रही हूँ... बस हो जायेगा...

वह ज़रा सा और उचकी और संदूक थोड़ा सा सरक गया, उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरने को हुई. पर इक़बाल वहीँ खड़ा था, और वह सीधे उसकी बाँहों में जाकर गिरी. इक़बाल के हाथ उसके मम्मो से होते हुए उसकी कमर पर जाकर रुके.

सुप्रिया का एक हाथ इक़बाल की गर्दन पर था और वह उस पर झूल रही थी. दोनों के चेहरे एक दुसरे के बेहद पास.

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कुछ पल दोनों एक दुसरे को पकडे ऐसे hi देखते रहे, और फिर सुप्रिया अपना बैलेंस बनाते हुए कड़ी हुई. इक़बाल ने भी उस पर से अपना हाथ हटा लिया.

इक़बाल गुस्सा होते हुए बोलै - मैंने कहा था न... आप गिर जाएँगी... आप ये सब मुझे करने दो...

सुप्रिया को भी थोड़ा गुस्सा आ गया और बहार जाते हुए बोली - ठीक है आप hi कर लो...

वह जल्दी से सीढ़ियों से नीचे जाने लगी, और बीच सीढ़ियों में उसे अब्बास ऊपर आता दिखा. उसने जल्दी से अपना सर ढाका. अब्बास थोड़ा सा साइड हुआ और उसने सुप्रिया को नीचे जाने दिया. सुप्रिया उन पतली सी सीढ़ियों से उसे हल्का सा छूटे हुए नीचे की और निकल गयी.

सुप्रिया जाकर नीचे अंदर के कमरे में बैठ गयी, उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था. इक़बाल के हाथ अभी उसके मम्मो पर थे. उफ्फ्फ... पता नहीं वह इतना बेचैन क्यों होती जा रही थी. उसे किसी भी तरह से अपने मैं में आ रहे खयालो पर काबू पाना था. ाचा था की सामने हिना बैठी थी जिससे वह अपने मैं को भटका सकती थी.

वह बैठी हिना से बात hi रही थी की फिर से रुबीना वहां आयी और उसकी और देखा - अपनी चुन्नी ठीक कर लो... तुम्हारी घाटियां दिख रही है...

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सुप्रिया ने एक डैम से रीलीज़ किया की वह जिस तरह से बैठी थी उस में उसकी कुर्ती के अंदर उसके बूब्स साफ़ दिख रहे थे.

हिना को भी ये सुन कर हसी आ गयी और वह बोली - वैसे आप अंदर से काफी गोरी हो चची...

सुप्रिया ने अपनी आँखें मीच कर उसकी और देखा - चुप्प्प... ऐसी भी कोई बोलता है क्या अपनी चची के बारे में...

रुबीना ने हिना के कंधे पर एक हाथ मारा और हिना हसने लगी.

पता नहीं सुप्रिया कहाँ फस्ती जा रही थी इन रिश्तो में.... चची... भाभी... किसी की पत्नी...

_______________________________________

रात का खाना होते hi वह वापस इक़बाल और अपने कमरे में पहुंची. इक़बाल ने कमरा फिर से अचे से जच्चा दिया था, और अब तोह कमरा और भी साफ़ सुथरा लग रहा था.

इक़बाल ने सुप्रिया को देखते hi कहा - कैसा लग रहा है अब मैडमजी....

सुप्रिया ने धीमे से कहा - ाचा... ाचा लग रहा है...

इक़बाल - माफ़ कीजियेगा मैं थोड़ा गुस्सा हो गया था, बस आप वह गिर गयी थी न... और मुझे आपकी फिक्र....

सुप्रिया - हाँ... नहीं... मैं भी सॉरी हूँ... मुझे ऊपर नहीं छेड़ना चाहिए था...

इक़बाल ने पलंग के नीचे से अपना गद्दा खींचा - अह्ह्ह... चलिए मैं काफी थक गया हूँ... सो जाता हूँ... कल तोह दुगुना काम होगा कारखाने पर...

सुप्रिया ने उसे ज़मीन पर लेते हुए देखा... इतनी म्हणत के बाद वह ज़मीन पर सोने वाला था... वह थोड़ा सा हिचकिचाई, और फिर बोली - इक़बाल जी... सुनिए...

इक़बाल - जी मैडमजी...

सुप्रिया - उम्म्म.... आप नीचे कब तक सोयेंगे.... आप ऊपर hi सो जाइये न... आपको थोड़ी अछि नींद आ जाएगी....

इक़बाल - ारी... नहीं मैडमजी... यहाँ पर ठीक है...

सुप्रिया - नहीं... मैंने देखा था कैसे आप अपनी पीठ पकड़ रहे थे सुबह...

इक़बाल - ारी वह तोह बस ऐसे hi.... आप क्यों परेशान हो रही है... मैं सो जायूँगा नीचे...

सुप्रिया - मुझे कोई परेशानी नहीं होगी... आप उस कोने में... मैं इस कोने में... कल रात भी तोह सो hi गए थे न...

इक़बाल - मैडमजी... वह तोह...

सुप्रिया - प्लीज... आप मेरी बात मानिये... और वैसे भी रात को फर्श ठंडा होता है... आपकी तबियत ख़राब हो जाएगी...

सुप्रिया ने अपना हाथ आगे बड़ा कर इक़बाल की और किया उसे खड़ा करने के लिए. इक़बाल ने ऊपर सुप्रिया की और देखा और सुप्रिया का हाथ पकड़ते हुए खड़ा हो गया. सुप्रिया ने उसका तकिया और चद्दर पलंग पर ऊपर रख दिया. इक़बाल बिस्तर पर ऊपर आकर कोने में सीधा लेट गया.

सुप्रिया कमरे की बत्ती बंद करने की और गयी. उसे इक़बाल पर पूरा भरोसा था... वह कुछ ऐसा वैसा नहीं करने वाला था. पर अगर वह अपने मैं को टटोलती तोह क्या उसे अपने ऊपर भरोसा होता?
 
अपडेट 82

अगले दो हफ्ते कैसे निकल गए, सुप्रिया को खुद भी एहसास नहीं हुआ. धीरे धीरे वह इस नए माहौल को अपनाने सी लगी थी. जो रंगीन सपने उसने लंदन के लिए देखे थे, उनसे बिलकुल अलग, अब वह इस गाओं के घर में अपने आप को ढलने की कोशिश कर रही थी. हिना जैसे उसकी परछाई सी बन गयी थी और रुबीना उसका सुरक्षा कवच. दोनों से बात करके उसका दिन किसी तरह से पूरा हो जाता.

शाम होते होते रोज़ वही इक़बाल के आने का इंतज़ार. इक़बाल के चेहरे पर पूरे दिन की थकान, बिन कुछ कहे आँखों से पता नहीं कितना कुछ कहना, और फिर संकोच भरी रात में एक hi पलंग पर दोनों का सो जाना. Ek-do बार तोह सोते हुए सुप्रिया का पेअर इक़बाल के पैरो से टकरा जाता. पर ऐसा होते hi वह तुरंत अपना पेअर पीछे करते हुए अपनी चद्दर में छुपा लेती.

एक और भी बात थी इस घर में जो कुछ अजीब सी थी, इक़बाल की पहली बीवी की. पहले hi दिन सुप्रिया ने अम्मी जी की बातों में कुछ कड़वाहट सी सुनी थी उसकी पहली बीवी के बारे में, पर उसके बाद किसी ने उसके बारे में बात hi नहीं की थी, और ऐसा लगता था की न hi कोई करना चाहता था. Ek-do बार उसने रुबीना से इस बारे में बात भी छेड़ने की कोशिश करि, पर रुबीना बात को ताल देती. और दूसरी तरफ हिना को भी अपनी पहली चची के बारे में कुछ ख़ास याद नहीं था, बस सिवाए इसके की वह भी काफी सुन्दर hi थी.

उसने बहुत सावधानी से कमरे में राखी अलमारी भी खंगाल मारी थी, पर उसे वहां इक़बाल की बीवी से जुड़ा एक निशाँ भी नहीं मिला था. न कोई पुराण कपडा, न कोई फोटो, न कोई कागज़ात. सब कुछ थोड़ा अजीब सा hi था, पर फिर सुप्रिया सोचती की उस बात को 10 साल या शायद उससे भी ज्यादा हो चुके थे, और अम्मी जी ने उसकी साड़ी चीज़ी हटा दी हो? सुप्रिया सोचती की वह इक़बाल से इस बारे में बात छेड़ेगी, पर फिर उसे इतना थका हुआ देख कर उसकी हिम्मत hi नहीं होती. वैसे भी उसे क्या मतलब था इस सब से, वह तोह बस किसी भी तरह वापस विक्रम के पास जाना चाहती थी.

ऐसे hi एक रात हो चली थी, और सुप्रिया रात को अपने कमरे में पहुंची. इक़बाल बिना कुर्ते के बिस्तर पर बैठा था, और अपनी पीठ पर कुछ लगाने की कोशिश कर रहा था पर उसका हाथ वहां अचे से नहीं पहुंच रहा था. ऐसा नहीं था की सुप्रिया ने इक़बाल की पीठ को नहीं देखा था, कभी कभी उसकी आँख जल्दी खुल जाती तोह वह चुप चाप पलंग पर लेती हुई इक़बाल को अपने कपडे बदलते देखती, या कई बार वह बिना खटखटाये कमरे में घुस जाती तोह इक़बाल अपना कुरता पेहेन रहा होता.

सुप्रिया ने अपने गले को साफ़ करने की हलकी सी आवाज़ की - ुहममममम...

इक़बाल ने चौंकते हुए दरवाज़े की और देखा - मैडमजी... आ जाइये...

इक़बाल ने खड़े होते हुए अपना कुरता उठाया और उसे पेहेन्ने लगा. सुप्रिया आज बारीकी से उसकी और देख रही थी, उसकी छाती और बगल में बाल थे, और शायद कड़ी म्हणत वाला काम करने की वजह से उसका शरीर अछि तरह से गाथा हुआ था. वह अतुल से उसकी तुलना करने लगी, अतुल का पेट थोड़ा सा निकला हुआ था, बहुत ज्यादा नहीं, पर हल्का सा, और वह काफी सॉफ्ट गुदगुदा सा था. पर यहीं इक़बाल का पेट थोड़ा अंदर धसा हुआ एक डैम सख्त नज़र आ रहा था.

सुप्रिया ने अपनी नज़रें फेर ली, और ज़मीन पर पड़े हुए कुछ कपडे उठाने लगी. शायद सुबह जल्दी में उसने hi ज़मीन पर छोड़ दिए थे. इक़बाल अभी भी दर्द में हल्का सा करहा रहा था.

सुप्रिया ने उसकी और देखते हुए पुछा - क्या हुआ इक़बाल जी... आप ठीक तोह है न...

इक़बाल - कुछ नहीं मैडमजी... बस थोड़ी पीठ अकड़ी हुई है...

सुप्रिया - ाचा...

सुप्रिया ने सोचा की क्या उसे इक़बाल से पूछना चाहिए की वह उसकी पीठ पर वह दर्द की क्रीम लगा दे, पर फिर उसने हिचकते हुए नहीं पुछा.

इक़बाल - मैडमजी... मैं आपके लिए कुछ लाया था आज...

इक़बाल ने बीएड पर रखा एक अखबार का एक पन्ना सुप्रिया के सामने किया.

इक़बाल - आज मुझे चाय की दूकान पर दिखा ये, तोह मैंने सोचा की मैं आपके लिए ले लू...

सुप्रिया अखबार के पैन को पकड़ते हुए देखने लगी, ये शायद बीच का कोई पन्ना था. तभी उसकी नज़र एक फोटो पर गयी. ब्लैक एंड वाइट सही, पर इस फोटो में विक्रम और ईशा hi थे. सुप्रिया जल्दी से उस न्यूज़ आर्टिकल को पड़ने लगी.

आर्टिकल में ईशा और विक्रम का इंटरव्यू था, जिसमे उनके सामाजिक कार्यो के बारे में चर्चा थी. कैसे वह बच्चो और महिलाओं की मदद में कई संस्थानों को डोनेशन दे रहे है. और फिर अंत में विक्रम के चुनाव में खड़े होने का जिक्र था. शायद ये आर्टिकल बस एक पब्लिसिटी स्टंट था उन दोनों के लिए. सुप्रिया की नज़र फिर से फोटो पर गयी. विक्रम और ईशा साथ साथ खड़े थे और दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी. ईशा ने साड़ी पहनी हुई थी और विक्रम ने कुरता.

वह सब पड़ने के बाद सुप्रिया का चेहरा थोड़ा लटक सा गया. शायद ईशा और विक्रम के बीच सब ठीक हो चूका था, और विक्रम उसे अब तक भुला भी चूका होगा. इस सब में बस उसका hi तोह नुक्सान हुआ था. वह अपने घर परिवार से दूर यहाँ एक अजनबी इंसान के घर पर, उसके कमरे में थी. शायद उसकी बीवी भी बन चुकी थी. अतुल तोह अब उससे नफरत करता होगा, शायद उसके बारी घरवाले भी.

उसके खयालो को एक डैम से इक़बाल की आवाज़ ने भांग किया - मैडमजी... क्या हुआ... किस सोच में पद गयी आप...

सुप्रिया - उम्... कुछ नहीं....

इक़बाल - मैंने सब्जी को कॉल करने की कोशिश करि थी, पर उनका फ़ोन अभी भी बंद hi आ रहा है... मेरे ख्याल से वह चुनाव के काम में मशगूल होंगे... इसलिए...

सुप्रिया - पर कोई अपना फ़ोन तोह बंद नहीं कर देता न... और वह जानते थे की हम लोग कहाँ गए है... वह किसी तरह से कोई चिट्ठी तोह भेज hi सकते थे न...

इक़बाल थोड़ा सोचते हुए बोलै - आप कहे तोह मैं एक बार वहां हो आता हूँ...

सुप्रिया - नहीं नहीं... आप वहां फास गए तोह...

इक़बाल - आप फ़िक्र मत करो... मैं बहुत एहतियात से जायूँगा... अब तोह तीन हफ्ते होने को आये है... मामला थोड़ा ठंडा पड़ने लगा होगा...

सुप्रिया का दिल और दिमाग दोनों अलग अलग दिशा में जा रहे थे. उसका दिल कह रहा था की एक बार इक़बाल विक्रम से मिल आये और वह किसी तरह उसे यहाँ से निकाल दे तोह उसके लिए कितना ाचा होगा. पर दूसरी तरफ, उसे डर भी लग रहा था की कहीं इक़बाल वहां पकड़ा गया तोह वह यहाँ और भी बुरी तरह फास जाएगी.

सुप्रिया - आप कितने दिन में वहां हो कर आ जाओगे...

इक़बाल - बस एक दिन में मैडमजी... सुबह जायूँगा... और अगली सुबह तक वापिस...

सुप्रिया अपने दिल के हाथों मज़बूर होती जा रही थी - आप वहां जाकर किसी और से नहीं मिलना, वह जहाँ मैं रहती थी उसके आस पास तोह बिलकुल भी नहीं जाना. अपना मुँह धक् के रखना, और बस विक्रम से hi बात करना, किसी और पर बिलकुल भी भरोसा नहीं करना.

इक़बाल के चेहरे पर हलकी सी हसी आ गयी - मैडमजी... आप बेफिक्र रहिये... मुझे कुछ नहीं होगा... मैं कल भैया को बता देता हूँ और फिर परसो शहर के लिए निकल जायूँगा... आपके लिए वहां से कुछ लाना है क्या?

सुप्रिया - नहीं... उम्म्म... बस आप जल्दी से वापस आ जाना...

इक़बाल - जी मैं जल्दी से जल्दी वापस आ जायूँगा...

सुप्रिया - आपको अगर कुछ पैसे चाहिए तोह मेरे बैग में गहने रखे है... आप उन्हें बेच सकते है...

इक़बाल - ारी नहीं मैडमजी... आप क्या बोल रहे हो... आपके गहने बेचने का तोह मैं सोच भी नहीं सकता... सब हो जायेगा... आप फ़िक्र मत करो...

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, वह कितना कुछ कर रहा था उसके लिए, एक बार फिर से अपने आप को खतरे में दाल कर वह उसके लिए लखनऊ जाने को तैयार था.

सुप्रिया ने फिर से उसे दर्द में अपनी पीठ पकड़ते हुए देखा - इक़बाल जी... आप लेटिए... मैं आपकी पीठ पर दवाई लगा देती हूँ...

इक़बाल - आप रहने दीजिये मैडमजी... इतना कोई ज्यादा दर्द नहीं है... हो जायेगा ठीक...

सुप्रिया ने अपनी सॉफ्ट सी आवाज़ में कहते हुए उसकी आँखों में देखा - प्लीज... मानिये न मेरी बात...

इक़बाल - ारी.... चलिए ठीक है...

इक़बाल बिस्तर पर लेट गया और सुप्रिया उसके बराबर में बैठ गयी. उसने एक हाथ से इक़बाल का कुरता थोड़ा सा ऊपर किया और दुसरे हाथ में थोड़ी सी क्रीम ली. वह अपने कोमल हाथों से उसकी पीठ मसलने लगी. सुप्रिया का सॉफ्ट से हाथ जैसे hi इक़बाल की कमर पर पड़े उसका पूरे शरीर में एक चिंगारी सी दौड़ गयी. जैसे सारा दर्द छु मंतर हो गया हो.

सुप्रिया ने अपने दोनों हाथ इक़बाल के कुर्ते के अंदर दाल दिए थे और वह ऊपर तक उसकी पीठ मसल रही थी. पर साइड में बैठने के कारन उसके हाथ अचे से ऊपर तक नहीं जा पा रहे थे.

सुप्रिया - इक़बाल जी... मैं आपकी टांगो पर बैठ जायु एक बार... ताकि मेरा हाथ अचे से पहुंच पाए...

इक़बाल बेहद hi खुश हो गया - जी मैडमजी... जैसा आप चाहे...

इक़बाल बीएड पर साकार कर थोड़ा और ऊपर हो गया, और सुप्रिया उसकी गांड से थोड़ा सा नीचे उसकी जांघो पर बैठ गयी. सुप्रिया का वजन इक़बाल को महसूस तोह हो रहा था, पर वह उसे इतना ाचा लग रहा था, जैसे उसके पैरो का दर्द में ख़तम हो रहा हो.

सुप्रिया ने फिर से अपने दोनों हाथ इक़बाल के कुर्ते के अंदर डाले और आगे की और झुक कर उसकी पीठ अचे से मसलने लगी. उसे इक़बाल के शरीर का हर दिल, मास्सा और चोट का निशाँ महसूस होने लगा. उसके हाथ इक़बाल के कंधो तक पहुंच गए थे, और वह एक तरह से इक़बाल के ऊपर लेती hi हुई थी. इक़बाल का लुंड सुप्रिया को अपने ऊपर महसूस करते हुए कड़क होता जा रहा था, और उसके मुँह से हलकी हलकी आहें निकल रही थी. सुप्रिया के नाज़ुक से हाथ उसकी सख्त पीठ पर एक मरहम का काम कर रहे थे.

सुप्रिया भी ये सब कर करते करते खो सी गयी थी, और वह डैम लगते हुए हलकी हलकी आवाज़ रही थी - ममम... हहममम.. आह्ह्हम्म्म... ममममम...

सुप्रिया के हाथ इक़बाल की पीठ और गर्दन को हलके हलके मसल रहे थे. उसका पेट इक़बाल की गांड को छू रहा था.

इक़बाल की आहें और ज़ोर से निकल रही थी, उसका लुंड बहुत hi कड़क हो चूका था. उसका मैं कर रहा था की वह अभी पलट जाये और सुप्रिया अपने कोमल से हाथों से उसके लुंड को ज़ोर से रगड़ दे. ये सोचते hi उसके लुंड की नसे और भी तन गयी और वह अब ऐसे लेते नहीं रह सकता था. पर मैडमजी के साथ कुछ ऐसा करना भी तोह गलत होगा. उफ्फ्फ... इस समय उनकी गांड उसके पैरों पर थी - मैडमजी... यह.... आप थक गयी होंगी... थोड़ा आराम कर लीजिये...

सुप्रिया - आपका दर्द थोड़ा काम हुआ?

इक़बाल - हाँ... अह्ह्ह.... काफी काम हुआ... आपके हाथों में जादू सा hai...aahh...

सुप्रिया - ऐसा लग रहा है की आपको तोह अभी भी दर्द हो रहा है...

इक़बाल अब सुप्रिया को कैसे समझाता - नहीं मैडमजी... अह्ह्ह... आप हटिये तोह एक बार....

इक़बाल ने अपनी एक टांग सुप्रिया के नीचे से निकाली और सुप्रिया थोड़ा साइड हो गयी. इक़बाल बिस्तर से खड़ा हो गया और पायजामा में उसके बड़े लुंड का आकर साफ़ नज़र आ रहा था. इक़बाल का हाथ सीधे वहीँ चला गया और वह दर्द में झटपटा रहे अपने लुंड को मसलने लगा. सुप्रिया की नज़रे कुछ पल वही देखती रह गयी पर उसने एकदम से अपना मुँह फेर लिया.

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इक़बाल ने सुप्रिया को मुँह फेरते देख अपना हाथ वहां से हटा लिया - माफ़ कीजिये मैडमजी... वह लेते लेते थोड़ा अकड़ सा गया था...

सुप्रिया ने सहज होने की कोशिश करि पर वह सहज हो नहीं पा रही थी - हाँ... मैं समझ सकती हूँ...

उफ्फ्फ... वह दृश्य उसके दिमाग में अभी भी घूम रहा था. और फिर एकदम से उसका दिमाग उस पल पर गया जब इक़बाल ने अपना लुंड राहुल के मुँह में दाल दिया था. तब कितनी पास से उसने उसके विशाल से लुंड को देख था. वह उसके बारे में सोचते hi काँप उठी.

इक़बाल का लुंड बुरी तरह फड़क रहा था और उसे अभी अपनी पानी निकालना जरूरी था. पर यहाँ मैडमजी के सामने वह कैसे करेगा. वह तुरंत hi कमरे से बहार निकल गया पर उसे नीचे सीढ़ियों से आती हुई रुबीना दिखाई दी और वह वापिस अंदर आ गया.

सुप्रिया - क्या हुआ इक़बाल जी... आप एकदम से बहार की और गए और फिर एकदम से hi वापस आ गए...

इक़बाल से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ा - मैडमजी... उह्ह्ह... मैं क्या बोलू... इस वक़्त मेरा लुंड बेहद सख्त हो गया है और दर्द कर रहा है... मुझे इसे ढीला करना hi पड़ेगा... नहीं तोह पूरी रात नींद नहीं आएगी और ये बहुत दर्द करेगा... ये हो जायेगा तोह मेरी हफ़्तों से कैद तनाव काम हो जायेगा...

सुप्रिया उसके मुँह से ये सुन कर भौचक्की सी रह गयी थी - ओह्ह्ह... ाचा....

इक़बाल - आप अगर कुछ मिनट उधर मुँह फेर ले तोह मैं इसे रगड़ कर इसका पानी निकाल लू... मैं इस वक़्त नीचे नहीं जाना चाहता...

सुप्रिया का दिल ज़ोर से धड़क रहा था, वह इक़बाल को उसके hi घर में कुछ करने से कैसे मन कर देती, पर उसके कमरे में होते हुए वह ये सब करेगा!! कितना अजीब सा लगेगा.

इक़बाल - मैडमजी... आप मन करेंगी तोह कोई बात नहीं...

सुप्रिया जल्दी से बोली - नहीं नहीं... आप कर लीजिये... ये आपका hi कमरा है...

उसके हाँ करते hi इक़बाल का हाथ तुरंत hi उसके लुंड पर आ गया और वह उसे ज़ोर ज़ोर के मसलने लगा. उसने अपना पजामा और अंडरवियर उतारा और उसका काला लुंड हवा में सीधा खड़ा होकर झूलने लगा. उसके मोठे लुंड की नसे साफ़ दिखाई दे रही थी, और आगे की टोपी भी काफी ज्यादा बड़ी थी.

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सुप्रिया की आँखें फटी की फटी रह गयी और उसने अपना थूक अंदर जातक लिया. उसके शरीर के सारे छेड़ इस लुंड को देख कर घबरा से गए थे, और उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका गांड और छूट में कुछ अलग hi हरकत सी हो रही हो, जैसे वह डर के मारे और भी सिकुड़ गए हो.

इक़बाल की नज़र भी सुप्रिया को अपनी लुंड की और देखते हुए पड़ी, आज तक कोई लड़की या औरत नहीं थी जो उसका लुंड देख कर मदहोश सी न हो गयी हो. शायद मैडमजी का भी एहि हाल हो रहा था. पर उसे अपने लुंड की गर्मी निकालना जरूरी था, नहीं तोह रात को अगर वह बेकाबू हो गया तोह पता नहीं उसका लुंड मैडमजी का अनजाने में क्या हाल कर दे.

इक़बाल ने अपने दोनों हाथों से अपने लुंड को जकड़ा और उसे ज़ोर ज़ोर से हिलने लगा. उसने अपनी निगाहें ऊपर छत की और कर दी थी. सुप्रिया भी नज़रे फेरते हुए जल्दी से मुद गयी. उसे इक़बाल के अपने हाथों से लुंड घिसने की ज़ोर से आवाज़ आ रही थी. बीच बीच में इक़बाल ज़ोर की ाँहें भी ले रहा था.

सुप्रिया ने अपनी आँखों के कोने से एक नज़र पीछे देखा तोह इक़बाल अपने एक हाथ से अपना मोटा लुंड ज़ोर ज़ोर से हिला रहा था.

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सुप्रिया बेचैन होती जा रही थी, इक़बाल अपनी आग तोह शांत करने वाला था पर उसके अंदर जल रही आग का क्या. उसकी चूचियां बड़ी होती हुई उसकी छाती पर दबाव बानी रही थी, जैसे अभी उसके कपडे चीरते हुए बहार आ जाएँगी. वह पयजामि के ऊपर से hi अपनी छूट पर हाथ रख कर उसे फेरना चाहती थी, अपने मम्मो को दबाना चाहती थी. पर वह शायद इतनी बेहया नहीं हो सकती थी की किसी और मर्द के सामने अपने आप को छूने लग जाये.

इक़बाल की आहें तेज़ हो रही थी, और सुप्रिया ने फिर से पलट कर देखा. इक़बाल ने अपना कुरता भी उतार दिया था और वह पूरा नंगा खड़ा था. वह अपनी उँगलियों से अपने टट्टे दबा रहा था, जैसे अपने अंदर के पानी को पूरी तरह बहार निकालने के लिए उन्हें निचोड़ रहा हो.

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उसकी आँखें बंद हो चुकी थी, और वह बस अपने इस काम में बुरी तरह व्यस्त था. उसे इस हाल में देख कर सुप्रिया और हिम्मत करके उसे ये सब करते हुए देखने लगी. तब एक ज़ोर का फवररा बहार निकला और लगभग सुप्रिया के पैरो तक उसके पानी के छींटे आ पहुंचे.

सुप्रिया के मुँह से और ज़ोर की चीख निकल गयी, और इक़बाल की आँखें खुल गयी. उसने सुप्रिया को अपने लुंड की और घूरते हुए देखा और उसके चेहरे पर न जाने क्यों एक अलग सी मुस्कान आ गयी. सुप्रिया उसके पानी को ज़मीन पर गिरते हुए देख रही थी. तप तप तप तप... बस बेहटा hi जा रहा था. लुंड थोड़ा सा नीचे ढल गया था पर अभी भी उतना hi लम्बा था.

सुप्रिया ने अपना मुँह फेर लिया और सामने खिड़की की और देखने लगी. उसके पेअर और घुटने बुरी तरह काँप रहे थे.

इक़बाल तेज़ सांसें लेता हुआ बोलै - मैडमजी... ह्ह्हह्हआआ... हहहहह... ुह्ह्ह्ह... शुक्रिया... आपने मुझे ये करने दिया यहाँ....

सुप्रिया की घबराहट भरी आवाज़ बहार निकली - कोई नहीं...

इक़बाल - मैं अभी साफ़ किये देता हूँ सब... बस एक बार नीचे पेशाब कर आयु... ये सब करने के बाद मुझे पेशाब बहुत आता है...

इक़बाल अपने कपडे पहनता हुआ कमरे से बहार निकल गया. सुप्रिया ने मुद के देखा, ज़मीन पर कई जगह सफ़ेद चिप छिपा पानी फैला हुआ था, और खासकर जहाँ वह खड़ा ये सब कर रहा था, वहां तोह सबसे ज्यादा hi. इतना पानी शायद उसने आज तक किसी का निकलते हुए नहीं देखा था. और उसने तोह अब तक कई मर्दो का पानी अपने हाथों से निकाला हुआ था.

ये सोचते hi सुप्रिया ने अपनी आँखें अपने हाथों से बंद कर ली. उफ्फ्फ... क्या सोच कर उसने उसे ये सब यहाँ करने दिया. अब तोह पता नहीं वह इक़बाल का सामना भी कैसे कर पायेगी.

इक़बाल को आने में देर लग रही थी, और सुप्रिया को पूरे कमरे में एक अजीब सी स्मेल आ रही थी जो उसके अंदर कुछ अजीब सा कर रही थी. इक़बाल को न आता देख सुप्रिया ने वहीँ ज़मीन पर पड़ा एक कपडा लिया और खुद hi सब कुछ साफ़ करने में लग गयी.

2-3 मिनट बाद इक़बाल जैसे hi वापिस कमरे में घुसा वह तेज़ आवाज़ में बोलै - मैडमजी... ये क्या कर रहे हो आप... मैं कर दूंगा न... आप छोड़िये...

इक़बाल ने सुप्रिया के हाथ से वह गीला कपडा छीना.

सुप्रिया - हो hi गया था बस... मैंने सोचा की मैं साफ़ कर देती हूँ... आप से झुका नहीं जायेगा...

इक़बाल ने सुप्रिया को घूर कर देखा - अभी इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ हूँ मैडमजी... बस थोड़ा सा hi पीठ का दर्द है... बहुत डैम है अभी मुझ में...

इक़बाल और सुप्रिया एक दुसरे की आँखों में देख रहे थे, शायद सुप्रिया उसके शब्दों का मतलब अछि तरह समझती थी पर वह कुछ बोली नहीं. इक़बाल की शकल देखते hi उसे बस उसका वह मोटा कला लुंड दिखाई दे रहा था. पता नहीं करुणा या उसकी पहली बीवी इस लुंड को कैसे झेल पाती होगी.

इक़बाल - चलिए... सो जाते है... काफी देर हो गयी है...

सुप्रिया ने धीरे से सर हिलाया और वह पलंग पर आकर लेट गयी. बत्ती बंद हो गयी थी और इक़बाल और वह अलग अलग कोने में लेट गए थे. सुप्रिया का दिल और छूट दोनों लूप लूप कर रहे थे. उसने अपनी चद्दर को कास के अपने आप से लपेटे और अपना एक हाथ अपनी छाती के नीचे दबा कर सोने की कोशिश करने लगी. पता नहीं आज क्या hi हो गया था. बस उसके मैं में एक hi ख्याल था - बस अब किसी भी तरह से इक़बाल की बात विक्रम से हो जाये और वह यहाँ से हमेशा के लिए निकल जाये.
 
ी ऍम सॉरी फॉर थे डिले इन अपडेट. सम अर्जेंट वर्क इशू हप्पेनेड इन माय वर्कप्लेस एंड थे लास्ट तवो वीक्स हैवे बीन वैरी बिजी एंड तिरिंग. ी ऍम स्टिल राइटिंग थे नेक्स्ट अपडेट, बूत ऑब्वियस्ली पहले जॉब पर फोकस करना पड़ा. थैंक यू फॉर योर पेशेंस, ी विल लुक तो पोस्ट सून.
 
अपडेट 83

दुसरे दिन इक़बाल शहर जाने के लिए सुबह तैयार हो रहा था. सुप्रिया उसके साथ कमरे में hi कड़ी थी. उसके मैं में बेचैनी और पेट में घबराहट के मारे तितलियाँ सी मचल रही थी. पता नहीं वहां लखनऊ में क्या होने वाला था.

सुप्रिया ने धीरे से कहा - आप बिलकुल सावधान होकर रहना... और विक्रम के इलावा किसी से बात मत करना...

इक़बाल ने सुप्रिया की और बिना देखा कहा - जी मैडमजी...

सुप्रिया के मैं में जो था वह अपने आप को बोलने से रोक नहीं पायी - आप बस अपना ख्याल रखना, बाकि कुछ हो या न हो सब ठीक है...

इक़बाल के चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट आ गयी और उसने सुप्रिया की और देखा. सुप्रिया ने अपना चेहरा दूसरी और फेर लिया ताकि वह उसके चेहरे पर आ रहे भाव को न पद पाए.

इक़बाल - आप बेफिक्र रहिये... मैं बस यूँ गया और यूँ वापस आया... सब ठीक हो जायेगा...

पर उसके बोलने से सुप्रिया की फ़िक्र कहाँ काम होने वाली थी. सुप्रिया ने इक़बाल को उसका बैग थमाया, और वह उसे अपने कंधे पर टांगते हुए बहार की और निकल गया. सुप्रिया कुछ पल के लिए कमरे में hi कड़ी रह गयी. इक़बाल तब तक सीढ़ियों से नीचे आ गया था और उसने देखा की सुप्रिया उसके पीछे नहीं कड़ी थी.

उसने ऊपर की और देखा की उसे एक बार सुप्रिया की शकल दिख जाये, पर वह शायद अभी भी कमरे में hi थी. इतने में अब्बास ने बहार से इक़बाल को आवाज़ लगायी, वह उसे अपने स्कूटर पर बहार तक छोड़ कर आ रहा था.

इक़बाल बहार की और निकल गया, और सुप्रिया उसी पल छत की दीवार पर पहुंच कर उसे बहार जाते देख रही थी. उसका दिल न जाने क्यों बैठा सा जा रहा था, और बहुत सारे बुरे बुरे ख्याल मैं में आ रहे थे.

कुछ देर बाद, सुप्रिया नीचे आयी और सीधे रसोई में घुस गयी.

रुबीना ने उसका लटका हुआ चेहरा देखा और कुछ देर बाद धीरे से बोली - क्या हुआ... इतनी उदास क्यों हो... कल सुबह तक आ जायेंगे तुम्हारे मियां जी...

सुप्रिया ने अपने चेहरे के भाव को ठीक किया, आज तक वह अपनी फीलिंग्स को छुपाना नहीं सीख पायी थी - नहीं भाभी... ऐसा कुछ नहीं... बस थोड़ी तबियत ख़राब है...

रुबीना ने फ़िक्र दिखते हुए कहा - क्या हुआ?? कहीं तुम्हारा महीना तोह नहीं आ गया... तुम जाकर बैठ जायो... हिना के पास पद है, मैं उसे बोलती हूँ....

सुप्रिया - नहीं नहीं भाभी... वह तोह मैंने ले लिए थे हिना से... बस थोड़ा मैं सा ख़राब था आज...

रुबीना - ओह ाचा? ये तोह और भी अछि बात है... इक़बाल ने इतनी जल्दी खुशखबरी दे दी...

सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो गए है - आप गलत समझ रही है... ऐसा कुछ नहीं...

रुबीना - तुम दोनों के बीच सब हो रहा है न? अब तक मुझे या अम्मी जी को आवाज़ को कुछ आयी नहीं...

सुप्रिया सोचने लगी उफ्फ्फ पता नहीं ये सब कैसे टाक लगाए बैठे थे उसके और इक़बाल के बीच सब होने का. वह पता नहीं कब तक झूठ बोलती रहेगी - जी... वह...

रुबीना - कोई दिक्कत हो रही है क्या? तुम्हे या उसे?

सुप्रिया सर झुका कर नीचे की और देखने लगी.

रुबीना - तुमने उसका लुंड देखा है अब तक? कितना बड़ा और मोटा है?

सुप्रिया रुबीना के मुँह से ये सुनते hi छौंक सी गयी - आपको कैसे पता?

रुबीना के चेहरे पर एक मुस्कराहट सी आ गयी - इसका मतलब देखा तोह है तुमने... घबरा रही हो क्या? मैं समझ सकती हूँ, इतना बड़ा देख कर कोई भी घबरा जाये... शुरू में थोड़ा दर्द होगा, पर फिर एक बार वह अंदर चला जायेगा न तोह इतना मज़ा आएगा, तुम सोच भी नहीं सकती... मेरी मानो तोह अपने आप को और उसको इतना मत इंतज़ार करवायो...

एकदम से हिना रसोई में घुसी और भोलेपन से पूछी - किसको इंतज़ार करवा रही है चची....

रुबीना फिर से अपने काम में लगते हुए बोली - कुछ नहीं... तू क्यों बड़े लोगो की बातों में घुसती है...

हिना - आप पता नहीं मुझे कब तक बच्ची समझते रहोगे... मुझे भी सब पता है...

रुबीना - ाचा जी... इतनी बड़ी हो गयी है तू... फिर तोह तेरी शादी की बात आगे बदनी hi पड़ेगी...

हिना का मुँह बन गया- अम्मी!!! शादी का तोह नाम hi न लो... मैं तोह बस ये पूछने आयी थी की मैं नाज़ के साथ बाजार तक हो आयु?

रुबीना - नहीं... इतनी बड़ी घोड़ी हो गयी है... और पूरे गाँव में नंगे सर घूमती फिरती है अपनी उस दोस्त के साथ... किसी दिन नाक कटवायेगी मेरी...

हिना - अम्मी प्लीज... जाने दो न... चची आप hi कुछ बोलिये न...

रुबीना - चची को इसमें न घसीटो... जायो उनके साथ बैठ कर पदों...

हिना गुस्से में पेअर पटकते हुए रसोई से बहार गयी और रुबीना ने सुप्रिया को उसके साथ जाने का इशारा किया. सुप्रिया हिना के कमरे में उसके साथ बैठ गयी. हिना का मैं पड़े में तोह लग नहीं रहा था, पर सुप्रिया किसी तरह से उसे पड़ने की कोशिश कर रही थी. पर उसके मैं में काफी बेचैनी चल रही थी. वह एहि सोच रही थी की इक़बाल कहाँ तक पंहुचा होगा, क्या उसकी बात विक्रम से हो गयी होगी.

रात होते होते उसने जैसे हर एक मिनट का हिसाब लगा लिया था, इक़बाल लखनऊ पहुंच गया होगा और उसकी विक्रम से बात भी कबकी हो गयी होगी. अब तोह वापिस आने की बस में छेड़ने वाला hi होगा.

उसे खयालो में खोया हुआ देख रुबीना ने कहा - सुप्रिया... तुम ऐसा करो, ऊपर अपने कमरे में चली जायो... और अचे से कुण्डी लगा के सो जाना. ठीक है?

सुप्रिया - जी भाभी...

रुबीना - और सुबह तक किसी के लिए भी दरवाज़ा मत खोलना... समझ गयी न... चाहे कोई भी तुम्हारा दरवाज़ा खटखटा रहा हो...

सुप्रिया ने मासूमियत से पुछा - पर कोई दरवाज़ा क्यों खटखटाएगा...

रुबीना - तस्सककक... तुम भी न... हिना के साथ बैठते बैठते उसके जैसी बाते करने लगी हो... बस जैसा मैंने कहा वैसा करना... अब जायो...

सुप्रिया ऊपर अपने कमरे पहुंच गयी और उसने कुण्डी लगा ली. आज की रात वह इस कमरे में अकेले बिताने वाली थी. जबसे वह यहाँ आयी थी ये उसकी पहली रात होने वाली थी जब वह अकेले सोने वाली थी. उसे डर सा लग रहा था, और जाने क्यों मैं में ख्याल सा आ रहा था की काश इक़बाल यहाँ होता. उफ्फ्फ, पता नहीं वह उसके बारे में इतना क्यों सोच रही थी.

नीचे, अब्बास खाने के लिए बैठा और रुबीना उसे खाना परोसने लगी. वह खाना परोस कर वहीँ उसके पास बैठ गयी और उसकी और पंखे से हवा करने लगी.

अब्बास खाना कहते कहते बीच में बोलै - आज सुप्रिया नहीं दिख रही...

रुबीना - वह अपने कमरे में गयी है...

अब्बास - इतनी जल्दी? सब खैरियत तोह है...

रुबीना - जी वह... हाँ बस उसकी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है...

अब्बास - ाचा, क्या हुआ?

रुबीना - हाँ बस ऐसे hi... आज पहली बार इक़बाल से अलग है न... शायद इसलिए...

अब्बास एक डैम छुप सा हो गया और फिर धीरे से बोलै - उसने कुछ बताया? इक़बाल और उसके बीच सब हो गया?

रुबीना थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली - जी...... शायद अभी तोह नहीं...

ये सुनते hi अब्बास के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ गयी - मुझे लगा hi था... अब बूढ़ा हो चला है इक़बाल भी... इतनी जवान गोरी बीवी ले तोह आया, पर उससे संभल नहीं रही है... काम करते हुए भी अब बुरी तरह हांफ जाता है...

रुबीना - अभी तोह शादी हुई, कुछ वक़्त तोह दीजिये दोनों को...

अब्बास - और कितना वक़्त दे उसे? पूरे गाँव भर में चर्चा होती रहती है उसकी बीवी के बारे में...

रुबीना - कैसी चर्चा... और क्यों चर्चा करते है? वह तोह घर से निकलती भी नहीं है...

अब्बास - घर से नहीं निकलती है तोह क्या... लोगो को सब दीखता नहीं है क्या... जितने मुँह उतनी बातें... कोई काम नहीं है... जुनैद तोह हरामियों की तरह उसके बारे में बात करता है... और रफ़ीक़ चाचा भी काम नहीं है...

रुबीना के चेहरे पर परेशानी बढ़ती जा रही थी - आप छोड़िये न ये सब बातें... दुनिया तोह बोलती hi है...

अब्बास कुछ सोचते हुए - मैं जाकर उससे बात करता हूँ आज, पता करता हूँ माज़रा क्या है...

रुबीना एक डैम छौंक सी गयी - किस्से? सुप्रिया से?

अब्बास - हाँ और किस्से? मुझे कुछ तोह गड़बड़ लग रही है...

रुबीना - पर.... इक़बाल को तोह आ जाने दीजिये... उसकी गैर मज़ूदगी में उससे बात करना ठीक नहीं होगा...

अब्बास - क्यों ठीक नहीं होगा? हमारे घर में रह रही है...

रुबीना - पर... आप सोचिये ज़रा... आप उसके लिए न मेहरम है... उसके कमरे में ऐसे जाना...

अब्बास का गुस्सा बढ़ता जा रहा था और उसने रुबीना को घूर कर देखा. वह अपने हाथ का निवाला प्लेट पर फेंका और खड़ा होकर वहां से चला गया. रुबीना को पता था अब्बास का मैं बुरी तरह मचल रहा था आज रात, पर उसे किसी भी तरह आज रात सुप्रिया को सुरक्षित रखना था.

____________________________________

देर रात हो चली थी, और सुप्रिया अपने कमरे में अकेले बिस्तर पर लेती थी. उसके पैरो से खुद से आवाज़ होती तोह वह थोड़ा घबरा सा जाती. आज कितने दिनों बाद उसने अपने आप को बिलकुल अकेले पाया था. दो रात पहले इस कमरे में जो कुछ हुआ था उसे सोचते hi उसके अंदर गर्माहट सी पैदा होने लग गयी थी.

सुप्रिया ने धीरे धीरे अपनी पयजामि के ऊपर से अपने आप को छूना शुरू किया. उसका दूसरा हाथ उसके मम्मो पर घूम रहा था. अपने आप को छूटे hi उसके अंदर जैसी कोई चिंगारी सी जाग गयी थी.

सुप्रिया हलकी हलकी आहें लेते हुए अपने जिस्म को छूने लगी - उम्म्म... ममम... महहहह....

कुर्ती के ऊपर से hi सुप्रिया अपनी सख्त चूचियां को महसूस कर पा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह कपड़ो को चीयर कर बहार आ जाएँगी. सुप्रिया उन्हें हलके हलके अपनी उँगलियों से दबाने लगी, पर वह छोटी होने की जगह और बड़ी होती जा रही थी. सुप्रिया की भारी सांसें उसके मम्मो को और बड़ा कर रही थी, ऐसा लग रहा था की उसकी तंग कुर्ती किसी भी पल फट जाएगी.

सुप्रिया अपने आप को काबू में नहीं रख पा रही थी, उसने कुछ पल और ऐसे hi अपने आप से खेलने के बाद अपनी कुर्ती को ऊपर खींचा और उतार फेका. उसने अंदर एक पिंग ब्रा पहनी हुई थी, जिसमे उसके बड़े बड़े मम्मी किसी तरह से कैद थे.

सुप्रिया ने नीचे गीला पैन होना शुरू हो गया था और उसने अपने कांपते हुए हाथ ब्रा के ऊपर से अपने मम्मो पर रखे, और उन्हें दबाने लगी. पहले आराम आराम से फिर और ज़ोर से. बारी बारी दोनों मम्मो को. उसकी पतली उंगलियां उसके कोमल से गोर मम्मो को नोच सी रही थी. जैसे वह चाहती हो कोई उसके साथ ये सब करे.

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सुप्रिया की गर्मी बढ़ती जा रही थी, उसने अपने ब्रा का स्ट्राप साइड किया और उसकी एक चूची बहार आ गयी. सुप्रिया उसे हलके हलके मसलने लगी, और धीरे धीरे खींचने लगी. काश वह अपने मम्मो को अपने मुँह में दाल पाती, या फिर कोई और उसके साथ ये कर पाटा.

सुप्रिया ने अपनी उंगलियां अपने मुँह में दाल दी और अपने आँखें बंद करके उन्हें चूसने लगी. उसके मुँह का थूक उसकी उँगलियों को अचे से गीला कर चुकी थी. सुप्रिया अपने मम्मो को अपनी मुट्ठी में बार बार भींच कर अचे से दबा रही थी.

सुप्रिया - उफ्फ्फ... ममममम..... आअह्ह्ह्ह....

सुप्रिया ने अपने पयजामि का नाडा ढीला किया और अपनी पजामी को नीचे सरका दिया. उसने नीचे एक लाल चड्डी पहने हुई थी, जो उसकी गोरी जाँघों का रंग और भी निखार रही थी.

सुप्रिया ने अपना हाथ अपने अंडरवियर में घुसा दिया और अपनी छूट के बहार ऊँगली रखते हुए वहां आराम से मसलने लगी. थोड़ा पानी पहले hi बहार बह चूका था, पर अभी उसकी गर्मी शांत नहीं हुई थी. सुप्रिया का हाथ अपने आप hi ज़ोर ज़ोर से उसकी छूट को मसलने लगा. अभी भी बस बहार बहार से.

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सुप्रिया के मुँह से थोड़ी और ज़ोर से आवाज़ निकल रही थी और उसने अपना मुँह अपने हाथ से धक् लिया. उसका पूरा शरीर पसीने में टर्र होने लगा था और बिस्तर की चद्दर हर जगह से भीग रही थी.

सुप्रिया ने अपनी ब्रा को खींचते हुए उतार फेका और साथ hi अपनी पंतय को भी. अब वह पूरी तरह से नंगी हो कर बीएड पर अपने आप को हर जगह मसल रही थी. उसने अपनी दो उंगलियां अपनी छूट में घुसा दी, पर वह भी उसे शांत नहीं कर पा रही थी.

उसने अपने छूट मसलते हुए अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया, जैसे किसी अद्रशय से लुंड को अपने छूट में घुसने का निमंत्रण दे रही हो. और फिर तेज़ी से अपनी गांड को ऊपर नीचे करते हुए अपनी छूट मसलने लगी. उसका दूसरा हाथ अभी भी उसके मम्मो को नोच रहा था.

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सुप्रिया - अह्ह्ह... उफ्फ्फ.... मममम.....

उसे बहुत मुश्किल हो रही थी अपनी आवाज़ काबू में रखने में. तभी उसे ऐसा लगा की बहार दरवाज़े पर हलकी सी आवाज़ हुई हो. वह अपने चरम पर पहुंच hi गयी थी और उत्साह और डर के मारे एक तेज़ फुव्वारे की तरह उसका सारा पानी बहार निकल गया. चद्दर अब अछि तरह भीग चुकी थी.

बहार फिर एक हलकी सी आवाज़ हुई. सुप्रिया डर के मारे अपनी आवाज़ को बंद करने की कोशिश कर रही थी. क्या वह इतनी तेज़ आवाज़ कर रही थी की बहार कोई आ गया था? उसने जल्दी से रात के अँधेरे में बिस्तर को टटोलते हुए अपने कपडे ढूढ़ने शुरू किये.

उसके हाथ में सिर्फ उसकी पजामी आयी, पंतय नहीं, और उसके उसे जल्दी से पेहेन लिया. और फिर अपनी ब्रा और कुर्ती को भी. झड़ने के बाद उसे एक अजीब सा एहसास हो रहा था. वह इस कमरे में, इस बीएड पर यहाँ झाड़ गयी थी, जहाँ इक़बाल उसके साथ सोता था. उफ्फ्फ्फ़.... वह इतनी गरम कैसे हो गयी थी आज, उसे अपने आप पर काबू रखना चाहिए था.

अभी रात को लाइट जलना ठीक नहीं होगा, उसने तय किया की वह सुबह होते hi चद्दर बदल देगी. पर पता नहीं वह इसको अब धोएगी कैसे. सुप्रिया अपनी और से हट कर पलंग के दूसरी और लेट गयी, जहाँ इक़बाल सोता था.

बहार से आवाज़ आणि बंद हो गयी थी और सुप्रिया चुप चाप आँखें बंद करके लेट गयी. उसके नीचे का हिस्सा अभी भी गीला था, और पजामी भी थोड़ी बहुत गीली हो चुकी थी. पर जो कुछ हुआ उससे एक अजीब से सुख की अनुभूति हो रही थी.

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सुबह उठते hi सुप्रिया ने बिस्तर से गन्दी चद्दर को हटाया और एक नयी चद्दर बिछा ली. वह जल्दी से नीचे नहाने घुस गयी, शायद आज सबसे पहले. और फिर सुबह hi चौक में कपडे धोने में लग गयी.

रुबीना उसे कपडे धोते देख उसकी तरफ दौड़ी आयी - ारी सुप्रिया... ये क्या कर रही हो... छोडो ये सब... मैं कर दूंगी...

सुप्रिया - नहीं भाभी... मैं कर लुंगी...

रुबीना - इतनी बड़ी चद्दर धोने में क्यों लगी हो सुबह सुबह... ये तोह हम धोबन को दे देते न....

सुप्रिया - कोई बात नहीं भाभी... आज मुझे करने दे... अगली बार उसे दे देंगे...

रुबीना चद्दर को गौर से देखने लगी - कुछ गिर गया था क्या इस पर?

सुप्रिया - नहीं... बस थोड़ी गन्दी हो गयी थी...

रुबीना - रात नींद ठीक से तोह आयी न? डर तोह नहीं लगा इक़बाल के बिना?

सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी और नीचे देखने लगी - बस थोड़ा सा.... पर नींद ठीक आयी...

रुबीना - ाचा... ये जल्दी से कर लो.... फिर मेरे पास आ कर बैठना... ठीक है?

सुप्रिया - जी...

रुबीना वहां से चली गयी और सुप्रिया एक चौकी पर बैठ कर चद्दर और अपने और इक़बाल के बाकी कपड़ो को धोने लगी. उसने कभी इस तरह से कपडे धोये नहीं थे, पर हाँ अपनी मम्मी और फिर यहाँ रुबीना भाभी को ये करते जरूर देखा था.

कपडे धोते धोते वह बुरी तरह थक गयी थी और उसने किसी तरह से सारे कपडे सुखाये. उसके मैं में अभी भी इक़बाल का hi ख्याल चल रहा था. उसे अब तक घर पहुंच जाना चाहिए था.

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वह कपडे सूखा hi रही थी की अब्बास बहार की और जा रहा था, और उसने सुप्रिया को घूर कर देखा. सुप्रिया ने जैसे hi देखा की इक़बाल उसे घूर रहा है, उसने जल्दी से अपना सर अपने दुपट्टे से धक् लिया और अंदर की और चली गयी.

रुबीना रसोई में नहीं थी, और सुप्रिया उसे ढूँढ़ते ढूँढ़ते ऊपर उसके कमरे में पहुंची. अब तक वह उनके कमरे में ज्यादा बार नहीं आयी थी. उनके कमरे में पलंग और बाकी सामान उसके कमरे से कहीं ाचा था. रुबीना वहीँ कमरे की सफाई करने में लगी थी.

रुबीना ने जैसे hi उसे आते देखा वह अपना काम छोड़ कर उसके पास आ गयी - सुप्रिया... आयो... बैठो यहाँ...

रुबीना ने सुप्रिया का हाथ पकड़ते हुए उसे पलंग पर बिठाया - मैं तोह ये पूछना भूल hi जाती हूँ - कैसी हो तुम? कैसा लग रहा है यहाँ सब?

सुप्रिया - जी.. सब ठीक है... ाचा hi है...

रुबीना - तुम एक बड़े शहर में रहती थी न... तोह यहाँ थोड़ी दिक्कत तोह महसूस होती होगी...

सुप्रिया - जी... वह...

रुबीना - तुम मुझसे खुल कर बात कर सकती हो... घबरायो नहीं...

सुप्रिया - हाँ... एक बड़े शहर में hi रहती थी... पर यहाँ भी सब ठीक hi है...

रुबीना - और वहां तुम इक़बाल से कैसी मिली?

सुप्रिया को समझ नहीं आ रहा था वह क्या कहे, वह रुबीना को सच तोह बिलकुल नहीं बता सकती थी - बस वह... हम लोग... आस पास hi रहते थे...

रुबीना - तोह तुमने कैसे तय किया की तुम्हे इक़बाल के साथ रहना है... उसके साथ घर से भाग जाना है... तुम अचे घर से लगती हो... तुम्हारे घरवाले तोह काफी परेशान होंगे न तुम्हारे लिए...

सुप्रिया की आँखें नीचे झुकी हुई थी - बस सब हो गया... पता नहीं कैसे... और मैं यहाँ आ गयी...

रुबीना उसकी असहजता को महसूस कर पा रही थी - ाचा ठीक है... परेशान मत हो... तुम जानती थी इक़बाल के बारे में यहाँ आने से पहले?

सुप्रिया - उम्म्म... नहीं... ज्यादा तोह कुछ नहीं...

रुबीना को थोड़ी सी हसी आ गयी - फिर भी आ गयी उसके साथ... लगता है काफी प्यार है तुम दोनों में...

सुप्रिया बिलकुल चुप रही, उसे समझ नहीं आया की वह क्या बोले.

रुबीना - पर अब क्या हो रहा है? तुम दोनों एक क्यों नहीं हो पा रहे हो... तुम समझ रही हो न मैं क्या पूछ रही हु?

सुप्रिया के गले से आवाज़ hi नहीं निकल रही थी - जी...

रुबीना - आज सुबह उस चद्दर पर दाग देख कर मैं सब समझ गयी थी... तुम्हारे भी मैं तोह बहुत कर रहा है... क्या इक़बाल की तरफ से कोई दिक्कत? देखो खुल के बात नहीं करोगी तोह कैसे काम चलेगा... अगर ऐसे hi सब चलता रहा तोह तुम दोनों के लिए hi ाचा नहीं होगा...

सुप्रिया ने छौंकते हुए पुछा - ाचा नहीं होगा मतलब?

रुबीना - तुम्हारे निकाह को फ़स्ख़ किया जा सकता है... मतलब की ख़तम...

सुप्रिया - ाचा....

रुबीना - तुमने कहा था की तुमने पहले ये सब नहीं किया है?

सुप्रिया शर्म से पानी पानी हो रही थी, पर उसे कुछ तोह बोलना hi था - नहीं... बस शायद इसीलिए घबराहट सी है... और फिर उनका काफी बड़ा भी है...

रुबीना - ाचा.. तोह तुमने देखा तोह है काम से काम...

सुप्रिया ने आँखें फिर से झुका ली और इस बात तोह उठाने की हिम्मत hi नहीं हो रही थी.

रुबीना - देखो... तुम्हारी अम्मी तोह है नहीं यहाँ... तोह मैं तुम्हे सब समझती हूँ... अपनी बेटियों को भी मैंने सब समझाया था... तुम भी उनके जैसी hi हो...

रुबीना - तुम्हे मैं एक तेल की शीशी दूंगी.... पहले तुम उसके लुंड पर अचे से मसल देना... उससे अंदर जाने में थोड़ी आसानी होगी... ठीक है...

सुप्रिया गहरी सांस लेते हुए सब सुन रही थी.

रुबीना - अगर वह लुंड चूसने के लिए कहे तोह मन मत करना... मर्दो को बहुत ाचा लगता है... देखो पहली बात तोह दर्द होगा hi, मेरी मानो तोह धीरे धीरे करने की जगह उससे कहना की एक बार में hi सीधे अंदर दाल दे... एक बार के लिए तोह चीखोगी पर फिर सब ाचा लगने लगेगा...

सुप्रिया - जी... पर उनका इतना बड़ा अंदर कैसे जायेगा...

सुप्रिया को इस बारे में सोचते hi डर सा लगने लगा था, और पता नहीं वह इस बारे में पूछ भी क्यों रही थी.

रुबीना - हाँ... थोड़ी दिक्कत होगी... पर सच मानो एक बार सब हो जायेगा न... तुम्हे बहुत ाचा लगेगा... मैं दर्द की दवा दे दूंगी... पर तुम लोग जल्द hi इस काम को पूरा करो... वही ाचा होगा सबके लिए...

सुप्रिया ने एक गहरी सांस ली, और उसके नाख़ून चद्दर पर गड्ड गए थे सब कुछ सोचते हुए hi - जी... वह आये नहीं अभी तक... आप उन्हें कॉल करके पूछ लेंगी क्या...

रुबीना - तुम्हारे पास फ़ोन नहीं है न... तोह तुम मेरा फ़ोन इस्तेमाल कर सकती हो... तुम्ही कॉल करलो उसे...

रुबीना ने अपना पुराण सा मोबाइल फ़ोन सुप्रिया के सामने किया और उसे कमरे में अकेला छोड़ कर बहार निकल आयी. सुप्रिया ने घबराते हुए इक़बाल के नंबर पर कॉल लगाया पर वह आउट ऑफ़ रीच आ रहा था. शायद वह अभी भी बस में था.

बस वह अब घर आ जाये और उसे यहाँ से निकलने का रास्ता मिल जाये.
 
अपडेट 84

शाम होने को आयी थी और इक़बाल अब तक घर नहीं पंहुचा था. सुप्रिया की बेचैनी हर मिनट के साथ बढ़ती जा रही थी और उसके मैं में बुरे बुरे ख्याल चल रहे थे. कहीं लखनऊ में इक़बाल पकड़ा तोह नहीं गया था. या कहीं वह उसे यहाँ छोड़ कर भाग तोह नहीं गया था? वह कोशिश करती के दिमाग में से इस खयालो को निकाल दे, पर वह रह रह कर उसे सत्ता रहे थे.

वह रसोई घर में रात के खाने में रुबीना का हाथ बता रही थी की काम करते करते उसके आँखों से एक ासु बह कर नीचे टपका.

रुबीना को उसकी हालत ख़राब होती दिख रही थी - क्या हुआ... इतनी परेशान क्यों हो रही हो... वह आ जायेगा... कहीं फास गया होगा...

सुप्रिया ने हलके से रट रट कहा - और वह नहीं आये तोह?

तभी घर के दरवाज़े के आँगन में एक आवाज़ सी हुई, और सुप्रिया जल्दी से बहार की और भागी. उसका दिल बुरी तरह हलचल कर रहा था, और उसे वहां सामने इक़बाल दिखाई दिया. उसे देख कर उसकी जान में जान वापस आयी, पर साथ hi ऐसा लग रहा था की जैसे वह अभी बेहोश हो कर गिर न जाये. उसके ठीक पीछे रुबीना उसे थामे हुए कड़ी थी.

इक़बाल हिना से बात कर रहा था, हिना शायद उससे पूछ रही थी की चाचू उसके लिए शहर से क्या लेकर आये थे. और इक़बाल उसे छिड़ा रहा था.

तभी रुबीना ने उनकी और ज़ोर से आवाज़ लगायी - इक़बाल.... कहाँ रह गए थे... न कोई कॉल न खबर... देख ज़रा इस लड़की का क्या हाल हो रखा है...

इक़बाल और हिना एक डैम छुप से गए, और इक़बाल सुप्रिया के मुरझाये हुए चेहरे की और देखने लगा. सुप्रिया की आँखें लाल थी, और ऐसा लग रहा था की जैसे वह अभी फुट फुट कर रोने लगेगी.

रुबीना ने हलके से सुप्रिया की पीठ पर हाथ फेरा - जा तू ऊपर चली जा... और इक़बाल तुम भी...

सुप्रिया जल्दी से सीढ़ियां छड्ड कर अपने कमरे में पहुंच गयी, ताकि कोई उसे रट न देख सके. अंदर पहुंच कर उसके आंसू बहे जा रहे थे. कुछ देर बाद इक़बाल भी वहां पंहुचा और बिना खटखटाये अंदर आ गया. उसके हाथ में दो बड़े बड़े कपडे के थैले थे. उसे अंदर आते देख सुप्रिया ने अपना मुँह फेर लिया ताकि वह उसे रट न देख पाए.

इक़बाल ने हलके से कहा - आप ठीक तोह है...

सुप्रिया ने सुबकते हुए कहा - हाँ... मैं ठीक हूँ...

इक़बाल - लग तोह नहीं रहा...

सुप्रिया - आप कहाँ रह गए थे... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था... बस बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे...

इक़बाल - ओह ाचा... हाँ वह मैं शहर में थोड़ी खरीदारी कर रहा था... आपके लिए...

सुप्रिया - आप भाभी को एक कॉल या मैसेज hi कर देते की आप कब तक आओगे... खरीदारी जरूरी थी या वापस आना... पता नहीं आपको की आप कहाँ गए थे...

इक़बाल - जी.. हाँ शायद मैसेज तोह दाल hi देना चाहिए था....

सुप्रिया ने अपने आंसू पोछे और अपने आप को नार्मल करने की कोशिश करि. और फिर वह सवाल पूछ डाला जो सुबह से पूछने को बेताब थी - आप वहां विक्रम से मिल पाए थे क्या...

इक़बाल - जी वह... मैं क्या बोलू... समझ hi नहीं आ रहा...

सुप्रिया - बताइये न... वहां क्या हुआ? आप उनसे नहीं मिल पाए?

इक़बाल - मैं दिन से उनके ऑफिस के बहार hi खड़ा था, और जैसे hi वह बहार निकले मैं उनसे बस कुछ पालो के लिए बात कर पाया...

सुप्रिया के अंदर थोड़ी सी उम्मीद जगी और उसकी आँखों में फिर से एक चमक आ गयी - क्या कहा उन्होंने... मेरे बारे में बात हुई क्या?

इक़बाल - जी... उन्होंने मुझे पहचानने से मन कर दिया... और बोलै की...

सुप्रिया के चेहरे का रंग फिर से बदल गया - और क्या बोलै?

इक़बाल चुप हो गया और नीचे की और देखने लगा.

सुप्रिया - प्लीज जल्दी बताइये न... मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ...

इक़बाल - उन्होंने कहा.... की वह किसी सुप्रिया को नहीं जानते... और शायद मुझे कोई गलत फेहमी हुई है...

सुप्रिया बुरी तरह छौंकते हुए बोली - क्या!!!! ऐसा कैसे कह सकते हो वह!!

इक़बाल - शठ.... थोड़ा धीरे... कहीं बहार कोई सुन न ले...

सुप्रिया की सांस उखड रही थी, और ऐसा लग रहा था की पूरा कमरा घूम रहा हो - पर विक्रम.... विक्रम ऐसा कैसे बोल सकते है...

इक़बाल - वह सब तोह मुझे नहीं पता... बस जो कहा वह बता रहा हूँ आपको...

सुप्रिया बिस्तर पर बैठ गयी, उसकी आँखें सामने देख रही थी पर नहीं भी देख रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था की विक्रम ऐसा कैसा बोल सकते थे. वह तोह उससे बेइंतेहा प्यार करते थे. कहीं कोई ग़लतफहमी तोह नहीं हुई?

सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा - उनके साथ कोई और भी था क्या वहां...

इक़बाल - आप ये पूछ रही है...

सुप्रिया - नहीं क्या पता वह बस किसी के डर से ये बोल रहे हो...

इक़बाल - जी... उनके साथ एक लड़की थी वहां...

सुप्रिया ने सोचा की क्या पता उस समय ईशा विक्रम के साथ कड़ी हो - लड़की या एक औरत? कोई 35-40 साल की, थोड़ी मोती पर बहुत ज्यादा नहीं...

इक़बाल - जी नहीं... ऐसी तोह नहीं थी वह... पतली सी जवान लड़की थी कोई, और वह विक्रम की गाडी में पीछे उनके साथ बैठ गयी थी... पर पता नहीं कौन थी वह...

सुप्रिया का दिल बुरी तरह बैठ चूका था, विक्रम शायद उसे भुला कर एक नयी लड़की को अपने जाल में फसा चूका था. इस बार उसकी आँखों से ासु नहीं बस एक नफरत की ज्वाला सी जल रही थी. वह कितनी बड़ी बेवक़ूफ़ थी जो विक्रम के प्यार में पद कर उसने अपनी पूरी जिंदगी तबाह कर दी. यहाँ वह कितनी बेसब्री से विक्रम का इंतज़ार कर रही थी और विक्रम ने कितनी आसानी से उसे भुला दिया.

सुप्रिया के शरीर पलंग पर जैम सा गया था, उसकी आँखों के सामने अँधेरा सा छाने लगा था. सुप्रिया को पता भी नहीं चला पर वह पलंग पर पीछे गिर गयी थी. इक़बाल हड़बड़ाते हुए उसकी और भागा पर वह शायद बेहोश हो चुकी थी.

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जब सुप्रिया की आँख खुली तोह उसके माथे पर एक गीली पट्टी थी और उसके बराबर में हिना बैठी हुई थी.

सुप्रिया को आँख खोलते देख, हिना ने ज़ोर से आवाज़ लगायी - चची को होश आ गया....

रुबीना शायद कमरे के बहार hi कड़ी थी और वह तुरंत अंदर आ गयी और हिना की और घूर कर देखा, जैसे उसे धीरे बोलने के लिए इशारा कर रही हो.

इक़बाल भी कमरे के दरवाज़े पर hi खड़ा था और सुप्रिया की और देख रहा था.

रुबीना आकर सुप्रिया के पास बैठ गयी - ये लो... पानी पियो...

रुबीना ने सुप्रिया को थोड़ा सा सहारा दिया और उसे बिस्तर पर तक लगा कर बिठा दिया. वह उसे अपने हाथ से पानी पिलाने लगी.

सुप्रिया का सर अभी चक्र सा रहा था - पता नहीं क्या हुआ... एक डैम से सब अँधेरा सा हो गया था...

रुबीना - अब कैसा महसूस कर रही हो....

सुप्रिया - उम्म्म... थोड़ा ठीक....

रुबीना - हिना.... जा ज़रा चची के लिए नीचे से फल ले आ...

हिना फौरन कड़ी हो कर नीचे की और भाग पड़ी. उसके जाते hi इक़बाल ने दो तीन कदम और अंदर की और ले लिए थे.

रुबीना - मैंने कहा था न सुबह की इतना काम मत करो.... अब देखो तुम्हारे मियां जी बोल रहे है की मेरे जाते hi मेरी फूल से बीवी से इतना काम करवा दिया की वह बेहोश हो गयी... कुछ खाने को भी नहीं दिया...

इक़बाल बोलने को हुआ था की रुबीना ने उसे हाथ से इशारा करके चुप कर दिया.

सुप्रिया अपने चेहरे पर एक झूठी सी मुस्कराहट लायी - ऐसा कुछ नहीं... बस पता नहीं कैसे चक्कर सा आ गया...

रुबीना - अम्मी जी को तोह लगा की उन्हें खुशखबरी सुनने को मिलेगी... पर उन्हें समझाना पड़ा की बस तुम्हे थोड़ा बुखार है...

रुबीना ने इक़बाल और सुप्रिया दोनों की और देखा - अब बस जल्दी से उन्हें खुशखबरी दे hi दो.... वह अपने पोते का मुँह देखना चाहती है...

सुप्रिया कुछ बोलती इससे पहले हिना नीचे से एक सेब काट कर ले आयी थी. वह सुप्रिया के पास बैठ कर उसे सेब खिलने लगी. सुप्रिया का मैं तोह काफी टूटा हुआ सा था, पर वह हिना को मन नहीं कर पायी. कुछ देर बाद हिना और रुबीना, वहां से नीचे चले गए और कमरे में बस इक़बाल और सुप्रिया रह गए.

इक़बाल ने दरवाज़े पर कुण्डी लगायी - आप अब कैसा महसूस कर रही है...

सुप्रिया ने मरी हुई सी आवाज़ में कहा - ठीक हु...

इक़बाल - माफ़ कीजिये आपको ये सब मेरे मुँह से सुन्नी पड़ी...

सुप्रिया - इसमें आपकी क्या गलती है...

इक़बाल - आप सो जाइये... हम लोग कल बात करते है... मैं आपके लिए जो सामान लाया था वह भी तोह आपको दिखाना है...

सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया और इक़बाल ने कमरे की लाइट ऑफ कर दी. वह बिस्तर पर आकर लेट गया. सुप्रिया भी फिर से थोड़ा नीचे सरक गयी और उसने अपने आप को चद्दर से धक् लिया. उसका दिमाग तोह जैसे काम करना hi बंद हो गया था. कुछ भी सोचने की शक्ति hi चली गयी हो जैसे. और जैसे hi पुराने ख्याल मैं में आने लगे, उसकी हलकी हलकी सुबकियां निकलने लगी. वह चीखना चाहती पर उसकी आवाज़ hi नहीं निकल रही थी.

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कुछ देर ऐसे hi वह हलकी हलकी आवाज़ में रोटी रही, तभी उसके कंधे पर इक़बाल का हाथ पड़ा जिससे वह एक डैम से छौंक गयी.

इक़बाल - आप ज्यादा मत सोचिये... सो जाइये... सब ठीक हो जायेगा...

सुप्रिया पलंग पर लेते हुए इक़बाल की और मुड़ी, अँधेरे में उसका चेहरा साफ़ तोह नज़र नहीं आ रहा था पर वह उसे देख पा रही थी. वह उससे बहुत दूर नहीं लेता था आज.

सुप्रिया ने हलके से कहा - क्या ठीक हो जायेगा? मैं तोह कहीं की नहीं रही....

उसका रोना अब फिर से हल्का सा तेज़ हो गया था.

इक़बाल ने उसके हाथ को हलके से पकड़ते हुए कहा - आप फिक्र मत कीजिये... मैं हूँ न आपके लिए...

सुप्रिया को इस समय रोने के लिए एक कांडा चाहिए था, और वह सरक कर इक़बाल की और नज़दीक हो गयी. और फिर अपना मुँह उसके सीने में छुपा लिया. वह उसके सीने पर मुँह लगाए रोने लगी थी, और इक़बाल के हाथ उसकी बाहों को पकडे हुए उसके अपने पास खींच रहे थे.

इक़बाल ने उस पर पूरा हक़ जताते हुए उसकी टांगो पर अपनी टाँगे रख दी और वह पूरी तरह से इक़बाल के नीचे समां गयी. इक़बाल का भार उसके भारी दुखी मैं को हल्का सा कर रहा था, और काफी देर सुप्रिया ऐसे hi इक़बाल में समाये रोटी रही, और उसे पता hi नहीं चला की कब उसकी आँख लग गयी थी.
 
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