Adultery उल्टा सीधा - Page 5 - SexBaba
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Adultery उल्टा सीधा

अध्याय 22

तीनों दोस्त दौड़ते तो बेहद जोश में हैं पर आगे जाकर उनका जोश ठंडा हो जाता है जब सामने से देखते हैं उनकी माएं और बाकी औरतें सब साथ में खेत से वापिस आ रही हैं, जिन्हें देखते ही तीनों के चेहरे पर निराशा आ जाती है,

लल्लू: अरे यार आज देर हो गई,

भूरा: किस्मत ही खराब है भेंचो।

छोटू: कोई नहीं आज नहीं मिला मौका कल फिर मिलेगा, इतने दिन रुके एक दिन और सही।

भूरा: सही कह रहा है, चलो फिर घर चलते हैं, आगे सोचते हैं क्या करना है,

तीनों बापिस आते हैं तो देखते हैं छोटू के घर के बाहर चबूतरे पर उसके और लल्लू के दादा, यानि सोमपाल और कुंवर पाल खटिया पर बैठे हैं, उनके बगल में ही राजकुमार, भूरा का बाप और छोटू के चाचा संजय, और पापा सुभाष खड़े हैं, लल्लू का बाप मगन भी वहीं था, सब को साथ देख के वो तीनों भी वहीं पहुंच जाते हैं वहां पहले से ही कुछ बात चल रही थी,

सोमपाल: वैसे सही तो यही रहेगा कुंवर, अपने लंगोटिया को आखिरी विदाई दे आते हैं इसी बहाने गंगा भी नहा लेंगे।

कुंवरपाल: मेरा भी यही मत है,

राजकुमार: तो चलो चाचा तुम दोनों भी, मुझे तो जाना है ही अस्थियों को सिराने,

सुभाष: तो ऐसा करो न, कल मैं नाव निकाल रहा हूं सुबह, सब्जियां इकट्ठी हो गई हैं बहुत चाचा के जाने के बाद गए ही कहां हैं तो उसी में तुम लोग भी चल लेना।

संजय: पर एक नाव में सब लोग और सब्जियां कैसे जा पाएंगी।

सुभाष: अरे नहीं सत्तू भी जा रहा है अपनी नांव लेकर।

सोमपाल: वो सब ठीक है पर इतनी सब्जियों को वहां बाज़ार में लगाना और संभालना अकेले कैसे करोगे, संजय को भी ले जाओ।

सुभाष: नहीं बाबा, आज तो मैं ये मिलकर कोने वाले खेत में जुताई कर देंगे पर कल धान वाले खेत में पानी लगाना है वैसे भी देर हो गई है, तो संजय को वो करना जरूरी है,

संजय: पर भैया बाबा सही कह रहे हैं वहां संभालोगे कैसे?

सुभाष:अरे एक काम करता हूं छुटुआ और राजेश को ले जाता हूं ये लोग काम भी संभालेंगे और थोड़ा सीख भी जाएंगे।

राजकुमार: ये सही रहेगा।

ये सुनते ही छोटू का मुंह उतर गया कहां उसने क्या सोचा था और क्या हुआ, वैसे बेचारे के लिए लल्लू और भूरा को भी बुरा लगा पर कर क्या सकते थे, फैसला हो गया था, फिर पूरे दिन अगले दिन की तैयारियां होती रहीं छोटू और राजेश ने सब्जियां नाव पर लगाईं, नाव तैयार की और फिर सत्तू की नाव में भी सब्जियां चढ़ाई, पूरा दिन इसी मेहनत में बीत गया,

दूसरी ओर लल्लू चबूतरे से सीधा घर आया, तब तक उसकी मां लता भी आ चुकी थी, लता ने आते ही चूल्हे पर चाय चढ़ाई,

लता: ए लल्ला, तू तब तक भैंसों के नीचे से गोबर उठा कर डाल आ तब तक चाय भी उबल जाएगी।

लल्लू: ठीक है मां,

नंदिनी आंगन में झाड़ू लगा रही थी, इसी बीच लल्लू की नज़र नंदिनी से मिली और दोनों को ही वो पल याद आ गया जब नंदिनी नंगी लेटी थी और लल्लू उसे देख अपना लंड हिला रहा था, नंदिनी ने तुरंत अपनी नजरें फेर लीं हालांकि उसे भी ये सोच कर थोड़ा सा अजीब लगता था और थोड़ी उत्तेजना भी होती थी क्योंकि काफी समय से वो सत्तू से भी नहीं मिल पाई थी ऊपर से उसकी मां के बीच भी कुछ नहीं हुआ थापर वो उस पर ध्यान नहीं देती थी वहीं लल्लू का तो पेंट में तंबू बन जाता था पर उसे अपनी बहन के गुस्से से भी डर लगता था इसलिए उसने भी नज़र हटाई और काम पर लग गया, कुछ ही पलों में कुंवर पाल और मगन भी आ गए तो नंदिनी ने कुंवर पाल को अलग खाट पर चाय और परांठा दे दिया, जल्दी ही पूरा परिवार चाय नाश्ता कर रहा था,

लल्लू अपनी मां को चूल्हे पर चाय बनाते देख रहा था, उसका पल्लू कसा हुआ था जिससे उसका पेट और नाभी दिख रही थी उसके ब्लाउज़ में कसी हुई चूचियां, लता का बदन पसीने से चमक रहा था और उसे देख लल्लू की पेंट में हलचल हो रही थी।




हालांकि लता हमेशा से ही ऐसे ही रहती थी पर अब लल्लू की नज़र अपनी मां के लिए बदल जो गई थी,

अपनी मां को देखते हुए लल्लू के मन में बस यही खयाल चल रहे थे कि वो कैसे अपनी मां के करीब आए।

पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे पता था कि उसे धीरे धीरे ही आगे बढ़ना होगा। नंदिनी भी आज अपनी मां को ऐसे देख थोड़ा उत्तेजित हो रही थी, वैसे भी उन दोनों के बीच अब तक जो कुछ हुआ था उसके बाद ये स्वाभाविक था।

दूसरी ओर भूरा के यहां भी कुछ ऐसा ही हाल था, उसके जीजा उसकी बहन रानी को कुछ दिनों के लिए छोड़ गए थे। रानी भी अपनी मां की तरह ही सुंदर थी, शादी के बाद उसका बदन और भर गया था और अब तो दोनों मां बेटी में थोड़ा ही फर्क रह गया था, रत्ना को भी रानी के रुकने से आराम मिला था और अच्छा भी लग रहा था परिवार धीरे धीरे शोक से उभर रहा था। भूरा घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी मां सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़ में आंगन में नल चला रही है, भूरा मां को इस हाल में देख थोड़ा ठहर गया उसके कदम धीमे हो गए, वो धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा उसकी नजर कभी अपनी मां की कमर तो कभी उसके उभरे हुए चूतड़ों पर फिसल रही थी, उसके पैंट में तंबू बनने लगा था,




इसी बीच रानी उसकी बहन पीछे से आ रही थी और उसने भूरा को इस तरह मां को देखते हुए पाया तो उसने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, उसे भूरा का मां को यूं देखना बहुत अजीब लगा, इसलिए वो बोल पड़ी,

रानी: अरे भूरा क्या कर रहा है खड़े खड़े?

भूरा रानी की आवाज़ से चौंक गया, और तभी रत्ना भी उनकी ओर पलट गई।

भूरा: कुछ कुछ नहीं दीदी, मैं तो अभी आया था घर बस।

रत्ना: अरे रानी जा सबके लिए चाय तो रखदे बिटिया तब तक मैं नहा लेती हूं,

ये कह कर रत्ना अपना ब्लाउज़ के हुक खोलने लगी तो भूरा की नज़र उस पर ही जम गई, तो रानी ने उसे फिर टोका,

रानी: अरे अब जा बैठ जा कर अंदर भूरा, चाय बन जायेगी तो बुला लूंगी, मां को नहाना है।

भूरा के आगे अब और चारा नहीं था, वो हां दीदी बोल कर अंदर चला गया, और सोचने लगा आज दीदी ने सब खराब कर दिया अच्छा खासा मां को नहाना देखने को मिल सकता था, पर वो ये भी जानता की उसे संभाल कर रहना होगा नहीं तो लेने के देने पढ़ सकते हैं।

दिन बीत जाता है रात होती है, खाना खाने के बाद छोटू, राजेश, सुभाष और सोमपाल तैयारी कर के सब चबूतरे पर ही सोने चले जाते हैं क्योंकि रात में जल्दी ही निकलना था तो जिस जिस को जाना था सब चबूतरे पर ही सो रहे थे उधर राजकुमार और कुंवरपाल भी चबूतरे पर ही आ गए थे अपना समान लेकर,

बेचारा छोटू का मुंह छोटा सा होकर रह जाता है उसे लगा था कि आज कुछ मां के साथ हो सकता था पर आज तो उसे मौका ही नहीं दिया,

पुष्पा आज अकेली बिस्तर पर लेटी थी और करवटें बदल रही थी, वो छुपा रही थी पर छोटू की कमी उसे भी खल रही थी, उसकी उत्तेजना उसके बदन की प्यास दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी, पर वो जानती थी आज भी उसकी प्यास मिटने वाली नहीं थी, वैसे लगता था आज पूरे घर में ही सूखा था क्योंकि आज सुधा भी ऐसे ही सो रही थी, संजय को भी जल्दी उठ कर खेत में पानी लगाना था तो वो भी बाहर ही सबके साथ सो रहा था।

दूसरी ओर लता के लिए तो जैसे ये सब फायदे वाला हुआ क्योंकि कुंवरपाल के न होने से जैसे ही बच्चों के सोने का एहसास हुआ मगन कमरे में आ गया था और उसके साथ बिस्तर पर था, मगन ने धीरे धीरे लता के कपड़े उतारने शुरू किए कमरे में दिए की पीली रोशनी में लता का भरा बदन चमकने लगा, लता का ब्लाउज़ खोल कर मगन ने उसकी चूचियों को बाहर निकाल लिया और उन्हें मुंह लगा कर चूसने लगा, लता के मुंह से एक हल्की आह निकल गई।


आंगन में सो रहे लल्लू को अच्छे अच्छे सपने आ रहे थे पर तभी किसी कीड़े के काटने से उसकी आंख खुली, कीड़े ने जांघ पर काटा तो लल्लू उठ कर बैठ गया और जांघ को खुजलाने लगा, धीरे से उसकी आँखें खुली उसने अपने अगल बगल पड़े बिस्तर पर देखा तो उसे कुछ अजीब लगा क्योंकि बिस्तर तो खाली थे, तुरंत उसका माथा ठनका, उसे इतना तो समझ आता ही था कि उसके पापा मां के पास अंदर होंगे पर हैरानी वाली बात ये थी कि उसकी बहन नंदिनी का भी बिस्तर खाली था,

लल्लू को थोड़ा अजीब लगता है क्योंकि इस समय उसकी बहन कहां गई होगी, वो सोचता है शायद पेशाब करने गई होगी और ये सोच कर थोड़ी देर यूं ही आंखों को मलते हुए बैठा रहता है पर कुछ देर बाद भी जब नंदिनी नहीं आती तो लल्लू सोचने लगता है, और बिस्तर से उठ खड़ा होता है पर सावधानी से ताकि कोई आवाज़ न हो जिससे अंदर उसके मां पापा को कोई शक हो। वो उठ कर पहले दरवाजे के पास वाली नाली की ओर जाकर देखता है क्योंकि रात को पेशाब करने की जगह वही थी, पर वहां भी कोई नहीं होता उसका दिमाग जोरों से चलने लगता है वो बापिस आंगन में आता है और छप्पर की ओर बढ़ता है, छप्पर की टेक और रसोई की आड़ के लिए छप्पर के आगे एक कच्ची दीवार थी जिससे अंदर के कमरे का दरवाजा नहीं दिखता था, लल्लू आगे बढ़ता है और दीवार की ओट से देखता है तो उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं वो देखता है उसकी बहन नंदिनी किवाड़ की एक ओर झिरी में मतलब जहां दरवाज़ा जुड़ा होता है उसके ऊपर नीचे की जगह दरवाज़ा पुराना होने से खाली हो गई थी तो उसमें आंख लगा कर देख रही थी और उसका एक हाथ सलवार के ऊपर से ही उसकी जांघों के बीच चल रहा था, लल्लू का ये देख बुरा हाल हो जाता है,

कुछ देर तो वो यूं ही जम जाता है फिर सोचता है दीदी अंदर क्यों देख रही हैं वहां तो मां पापा चुदाई... इतना कह कर वो रुक जाता है, और धीरे धीरे आगे बढ़ता है, और दरवाज़े के पास पहुंच जाता है, नंदिनी को तो इसकी खबर भी नहीं होती उसका पूरा ध्यान अंदर होता है, लल्लू भी दरवाज़े के दूसरी ओर से बनी झिरी में झांक कर देखने लगा और उसने जो देखा उसे देख कर उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं, सामने कमरे में नीचे एक चादर बिछी थी कमरे में पीली रोशनी फैली थी दिए की और उस रोशनी में लल्लू ने देखा कि उसके पापा नीचे लेटे हुए हैं नीचे से पूरे नंगे होकर और उनके ऊपर उसकी मां लता बैठी है लता की साड़ी और पेटीकोट कमर पर इकट्ठा हैं और उसके गोल गोल मटके जैसे चूतड़ नंगे उसके सामने हैं चूतड़ों के बीच उसके पापा का काला मोटा लंड घुसा हुआ है और उसकी मां लता अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर पापा के लंड पर पटक रही है,






लल्लू को ठीक से उसकी मां के चूतड़ और उसकी चूत में अंदर बाहर होता लंड दिख रहा है क्योंकी उसके मां और पापा के पैर और पीठ दरवाज़े की ओर ही थे,

लल्लू ने हालांकि अपनी मां के चूतड़ों को देखा था और उन्हें सोच कर हिलाया भी था पर अभी उन्हें इस तरह से चुदवाते देख तो उसके होश ही उड़ गए थे, उसका बदन गर्मी से भरने लगा उसका लंड बिल्कुल कड़क हो गया उसके अंगोछे में, पहली बार अपनी मां और पापा की चुदाई देख रहा था, उसकी उत्तेजना की अभी कोई सीमा नहीं थी।

दूसरी तरफ नंदिनी का भी यही हाल था वो भी पहले से ही मां पापा की चुदाई देखते हुए उत्तेजित हो रही थी और अपनी चूत को सलवार के ऊपर से ही सहला रही थी, लल्लू ने कुछ देर अंदर देखा और फिर उसे अपनी बहन का खयाल आया जो अब भी उसके बगल में थी, उसने कमरे के अंदर से नज़र हटाई और अपनी बहन पर लगा दी, चांद की हल्की सी रोशनी में वो देख पा रहा था नंदिनी क्या कर रही है, लल्लू पर अब उत्तेजना का नशा चढ़ने लगा था वो अब सही गलत और मर्यादाओं के बारे में नहीं सोच रहा था, वो नंदिनी की ओर आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल पास जाकर उसने एक गहरी सांस ली जैसे आखिर बार सोच रहा हो आगे बढ़ने से पहले और फिर एक हाथ बढ़ाकर धीरे से नंदिनी की छाती पर रख दिया और बहुत हल्के से नंदिनी की भरी हुई चूची को सहलाने लगा।

नंदिनी को जैसे ही ये आभास हुआ तो उसने तुरंत पलट कर देखा और सामने देख कर अब वो चौंक गई, उसका दिल जोरों से धड़कने लगा वो जानती थी वो पकड़ी गई है पर फिर उसे यह जैसे ही एहसास हुआ कि लल्लू का हाथ उसकी छाती पर है उसने तुरंत उसे झटक दिया, लल्लू को नंदिनी की इस हरकत से हैरानी हुई और घबराहट भी, नंदिनी तुरंत दरवाजे के बाहर से अपने बिस्तर पर आ जाती है और तुरंत अपनी चादर से अपने आप को ढंक लेती है वो लल्लू का सामना नहीं करना चाहती थी वो जानती थी वो आज बुरी फंसी है उसके मां बाप की चुदाई देखते हुए उसके भाई ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया है, अब तक जिस पर वो धौंस दिखाती आई थी आज पहली बार उसका पलड़ा भारी था वो बस किसी तरह से उसका सामना नहीं करना चाहती थी।

लल्लू भी पीछे पीछे आया और उसने नंदिनी को चादर ओढ कर लेते देखा तो उसे हैरानी हुई उसने सोचा अभी उठाता हूं पर फिर उसने सोचा कि नहीं मुझे दिमाग से काम लेना होगा अभी मां पापा कभी भी बाहर आ सकते हैं और वो आ गए तो गड़बड़ हो जाएगी मुझे दीदी से अकेले में बात करनी होगी, लेकिन तब तक इस खड़े लंड का क्या करूं? उसने सोचा मुठिया लेता हूं पर न जाने क्यों उसने एक बार नंदिनी पर नज़र डाली और ये खयाल मुस्कुराते हुए दिमाग से निकाल दिया और लेट गया और कुछ सोचते हुए सो गया।

दूसरी भूरा के घर में भी सब सो रहे थे आज राजकुमार बाहर चबूतरे पर थे तो रत्ना अकेली सो रही थी उसके बगल के बिस्तर पर रानी सो रही थी बाकी दोनों लड़के आंगन में सो रहे थे, अचानक से रत्ना की नींद खुलती है और वो हांफते हुए उठ कर बैठ जाती है, उसने एक सपना देखा था उसका चेहरा पसीने से लतपथ था, वो नीचे से लोटा उठा कर पानी पीती है, पानी पी कर वो सोचने की कोशिश करती है उस बारे में जो उसने अभी सपने में देखा, क्या था ये, ये सब क्या हो रहा है, फिर वो खुद के सिर को झटक कर बापिस लेट जाती है और आंखें बंद करती है, पर उसे बापिस सपने के दृश्य दिखाई देने पड़ते हैं सपने में वो अपने घर के चबूतरे पर ठीक उसी खाट पर नंगी है और उसे फिर से उसी रात की तरह तीन लोग चोद रहे हैं पर इस बार ये तीन लोग उसके ससुर और उनके दोस्त नहीं हैं बल्कि भूरा और उसके दोस्त लल्लू और छोटू हैं रत्ना का मन सवालों से भर रहा है क्यों अपने ही बेटे और उसके दोस्तों के बारे में उसे ये सपना आ रहा है, क्या हो गया है मुझे इतना गंदा सपना,

ये सब सोचते हुए सो करवट बदलती है तो उसे अपनी जांघों के बीच थोड़ी चिकनाहट महसूस होती है वो तुरंत हाथ साड़ी और पेटीकोट के अंदर डाल कर देखती है तो पाती है कि उसकी चूत ओर जांघें उसके रस से गीली है, उसे खुद पर और गुस्सा आता है, कि उसने इतना बुरा सपना देखा और साथ ही उसे देख कर स्खलित भी हो गई, वो भी इतना रस तो शायद कभी नहीं निकला था उसका, उसके मन में सवाल ही सवाल घूमने लगते हैं वो लेट कर काफी देर इसी बारे में सोचने लगती है, काफी देर बाद उसकी नींद लगती है,




और नींद में उसे फिर से सपना आता है कि वो एक जगह बैठी है फिर उसे अपनी चूत में कुछ एहसास होता है तो वो नीचे देखती है और पाती है वो बिलकुल नंगी है और उसकी चूत में एक मोटा लंड घुसा हुआ है और जब वो चेहरा पीछे करके उसका चेहरा देखती है तो और हैरान रह जाती है वो और कोई नहीं बल्कि उसका बड़ा बेटा राजू था, तभी उसके कानो में एक आवाज पड़ती है जो रानी की है जो उसे बार बार मां मां कह के बुला रही है, वो इधर उधर देखती है तो पाती है कि उससे थोड़ी दूर उसे अपनी बेटी दिखती है पर ऐसी हालत में वो बिल्कुल नंगी है और अब तीन लोग उस एक साथ चोद रहे हैं, और वो तीनों रानी को चोदते हुए रत्ना की ओर देख मुस्कुरा रहे हैं, तीनों लोग उसके छोटू के पापा, चाचा और लल्लू के पापा हैं, रानी के मुंह से मां मां की आवाज़ निकल रही है, रत्ना अपनी बेटी को बचाने के लिए अपने बेटे के लंड से उठने की कोशिश करती है और उसकी आंख खुल जाती है, तो देखती है उसके सामने रानी है जो उसे मां मां करके बुला रही है।

रानी: अरे मां क्या हुआ, उठ जाओ सुबह हो गई, देखो कबसे आवाज लगा रही हूं।

रत्ना: हां आवाज क्या,

रत्ना को तब समझ आता है वो सपना देख रही थी।

रानी: लो मां चाय पिलो नींद खुल जाएगी

रत्ना: हां दे।

वो उठ कर चाय पीते हुए अपने सपनो के बारे में सोचने लगी।


जारी रहेगी
 
रानी: अरे मां क्या हुआ, उठ जाओ सुबह हो गई, देखो कबसे आवाज लगा रही हूं।

रत्ना: हां आवाज क्या,

रत्ना को तब समझ आता है वो सपना देख रही थी।

रानी: लो मां चाय पिलो नींद खुल जाएगी

रत्ना: हां दे।

वो उठ कर चाय पीते हुए अपने सपनो के बारे में सोचने लगी।



अध्याय 23
रत्ना चाय पीते हुए अपने अजीब और अश्लील सपनों के बारे में सोच रही थी उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसे सपने वो भी सुबह सुबह उसने क्यों देखे, उसका अंदविश्वासी स्वभाव उसे कुछ गलत की ओर इशारा कर रहा था वो इन सपनों को किसी अनहोनी का संकेत मान रही थी, और उससे कैसे बचा जाए वो सोच रही थी।

चाय खत्म कर वो बिस्तर से उठी और अपना ध्यान घर के कामों में लगाने की कोशिश करने लगी।

दूसरी ओर नाव वाले रात को ही निकल गए थे और भोर होते होते वो शहर के करीब पहुंच गए थे, सुभाष की नाव में थोड़ा सामान और सब आदमी लोग थे वहीं सत्तू की नाव में भी सब्जियां थी साथ ही सत्तू, उसकी मां झुमरी, राजेश और छोटू थे, राजेश और सत्तू मिलकर पतवार चला रहे थे वहीं छोटू नाव के किनारे लेटकर सो रहा था,



सत्तू: इसे देखो हमारी बाजू दुख गई चप्पू चलाते हुए और ये सेठ जी मजे की नींद ले रहे हैं।

रजनी: अरे सोने दे ना अब बस पहुंच ही गई।

राजेश: तभी तो ताई इसे उठाना पड़ेगा नहीं तो आलसी सोता ही रहेगा। ए छोटू उठ,

सत्तू: ये ऐसे नहीं उठेगा,

सत्तू ने फिर थोड़ा पानी हाथ में लिया और छोटू के ऊपर फेंका तो छोटू हड़बड़ा के उठा उसका चेहरा देख सत्तू और राजेश हंसने लगे।

कुछ ही देर में नाव शहर पहुंच चुकी थी, उन्हें अच्छे से बांध कर सारा सामान उतारा गया, अस्थियों को सिराने वाले जो लोग थे वो वहीं से बस अड्डे की ओर निकल गए बाकी लोग सब्जियों को बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी में भरकर मंडी की ओर चल पड़े,

मंडी में पहुंच कर सामान उतार कर अपनी अपनी दुकान सजाई गई, और फिर तब तक ग्राहकों का आना शुरू हो गया, सत्तू ने अपनी मां को दुकान पर बैठा दिया था और वो सब्जी तोलना, कट्टे खोलना आदि काम कर रहा था, वहीं सुभाष अपनी दुकान पर था और छोटू और राजेश दूसरे काम कर रहे थे।

सत्तू की दुकान पर थोड़ी भीड़ ज्यादा लग रही थी, कारण थी झुमरी, लोग झुमरी के भरे कामुक बदन को देख उसकी दुकान से सब्जियां खरीद रहे थे।



सत्तू भी खूब मेहनत कर जल्दी जल्दी अपना काम कर रहा था, दूसरी ओर सुभाष की भी अच्छी बिक्री हो रही थी, छोटू और राजेश उसका पूरा साथ दे रहे थे। बीच बीच में छुपकर सुभाष और झुमरी की आंख मिचौली भी चल रही थी, दोनों के बीच बने इस अनैतिक संबंध को करीब 2 वर्ष हो चले थे, सुभाष और झुमरी के पति अच्छे मित्र थे, झुमरी के पति के देहांत के बाद सुभाष ने जितनी हो सकी थी उतनी मदद की थी झुमरी और सत्तू की, झुमरी को भी धीरे धीरे सुभाष का सहारा भाने लगा था, झुमरी को जीवन में मर्द की कमी महसूस होने लगी तो उसने सबसे पहले सुभाष को खड़ा पाया और फिर धीरे धीरे दोनों करीब आने लगे और फिर एक दिन दोनों के बदन भी मिल गए। इस राज को दोनों के अलावा और कोई नहीं जानता था।

दूसरी ओर गांव में संजय खेत में पानी लगा रहा था सुबह से ही बादल छाए हुए थे, दोपहर का समय हो चला था, घर पर सुधा और पुष्पा ही थीं फुलवा सो रही थी,

सुधा: अरे जीजी किसी बालक को बुलाना पड़ेगा इनके लिए खाना पहुंचाना है।

पुष्पा: अरे हां, देवर जी भूखे होंगे,

सुधा: मैं देखती हूं भूरा या लल्लू हो तो बुला लाती हूं।

पुष्पा: अरे रहने दे जब तक उन्हें बुलाने जाएगी तब तक मैं ही दे आऊंगी। वैसे भी बादल हो रहे हैं।

सुधा: कह तो सही रही हो जीजी, तुम ही चली जाओ।

पुष्पा तुरंत एक पोटली में खाना बांधती है और घर से निकल जाती है आधे से ज्यादा रास्ता पर कर जाती है अब खेत बस दो खेत पार ही था लेकिन तभी अचानक बारिश आ जाती है बड़ी बड़ी बूंदें उसे भिगाने लगती हैं और कुछ ही कदम में वो भीग जाती है,

पुष्पा: अरे लो पूरी भीग गई बारिश भी थोड़ी देर बाद नहीं हो सकती थी क्या?

उसकी साड़ी पूरी गीली होकर उसके बदन से चिपक जाती है और वो किसी तरह से कपड़े और पोटली संभालते हुए मेढ़ पर आगे बढ़ती जाती है,

खेत पर पहुंच कर उसे संजय दिखता है जो, फावड़े से मेड काट रहा था, वो भी पूरा गीला था और सिर्फ अपने निक्कर को पहने हुए था, पुष्पा उसे देख उसकी ओर बढ़ जाती है, पुष्पा पास पहुंचने वाली होती है तो संजय उसे देखता है,

संजय: अरे भाभी तुम यहां क्या कर रही हो,

संजय उसे देखते हुए कहता है, पूरा बदन तर है, पल्लू गीला होकर एक ओर चिपक गया है जिससे उसका मांसल गोरा पेट और गहरी नाभी, और ब्लाउज़ के बीच से चूचियों की दरार दिख रही थी,

पुष्पा: अरे तुम्हारा खाना लेकर आई थी, पर रास्ते में ही मुई बारिश आ गई।

पुष्पा पास आते हुए कहती है, और फिर संजय के बगल की मेढ़ पर धम से बैठ कर हांफने लगती है,



संजय: अरे भाभी तुम भी न क्या ज़रूरत थी, किसी बच्चे के हाथों भेज देती या नहीं भी खाता तो क्या हो जाता आज।

संजय अपनी भाभी को देखते हुए बोला पर उसकी नजरें अपनी भाभी के बदन पर फिसल कर अपने आप जा रहीं थीं, पुष्पा का गोरा पेट, ब्लाउज में कसी हुई बड़ी बड़ी चूचियां, साड़ी में आकार दिखाती मोटी जांघें संजय के बदन में बारिश में भी गर्मी बढ़ाने लगे। वो ये तो हमेशा से देखता आया था कि उसकी भाभी सुंदर और कामुक हैं और अपनी शादी से पहले कई बार संजय ने पुष्पा के बारे में सोच कर हिलाया भी था पर शादी के बाद से उसने इन खयालों को मन से निकाल दिया था। क्योंकि उसे रिश्तों की और सम्मान की चिंता थी। पर आज पुष्पा को यूं देख उसके खयाल बापिस आ रहे थे।

पुष्पा: अरे नहीं सुबह से लगे हुए हो, भूख तो लगी होगी, और बादल हो रहे थे तो मैने सोचा मैं ही जल्दी दे आती हूं इसलिए आ गई।

संजय चलो कोई नहीं तुम उधर कोने के पेड़ के पास बैठो भाभी मैं अभी आया, संजय जैसे ही मुड़ता है, तो चौंक जाता है,

संजय: अरे तेरी, भाभी तुम यहीं रुकना और इस मेड को रोकना आगे मेढ़ कट गई है मैं बांधता हूं पर भाभी ध्यान से यहां से पानी न जा पाए आगे नहीं तो दूसरी फसल खराब हो जाएगी।

संजय ने आगे भागते हुए कहा, पुष्पा तुंरत फावड़े से मिट्टी दबाने लगी ताकि पानी उसे काट न सके, पर पानी का दबाव बढ़ता जा रहा था और मिट्टी कटती जा रही थी, पुष्पा ने फावड़ा छोड़ और हाथों से मिट्टी लगाने लगी पर उसके लगाते ही पानी तुरंत उसे बहा ले जाता ओर अगले पल ही सारी मिट्टी बह चली और पानी आगे बढ़ने लगा, पुष्पा ने सोचा देवर जी ने तो कहा था कि पानी आगे न जा पाए, अब क्या करूं, उसके दिमाग में एक उपाय आया और वो तुरंत आगे होकर खुद पानी के रास्ते में बैठ गई, उसके चौड़े चूतड़ों और भरे बदन ने रस्ते को घेर लिया और पानी रुक गया,

पुष्पा ने मन ही मन सोचा चलो पानी तो रुका कम से कम, थोड़ी देर में ही संजय आया और उसने पुष्पा को खुद को मेढ़ के बीच बैठे देखा तो हंसने लगा।

संजय: अरे भाभी तुम तो खुद ही बांध बन गई,

पुष्पा: क्या करती पानी रुक ही नहीं रहा था, तुमने ही कहा था पानी आगे न जा पाए।

संजय: चलो अच्छा किया अब उठ जाओ मैने आगे मेढ़ बांध दी है,

पुष्पा उठती है और मेढ़ से निकलने के लिए उसके किनारे पर पैर रखती है, पर उसका पैर फिसल जाता है और वो आगे की ओर गिरती है संजय उसे पकड़ने के लिए आगे कदम बढ़ाता है पर उसका पैर भी फिसल जाता है, अगले ही पल दोनों खेत में गिर जाते हैं, संजय नीचे होता है पुष्पा उसके ऊपर, दोनों के चेहरे बिल्कुल एक दूसरे के सामने, संजय के हाथ पुष्पा की नंगी कमर पर पुष्पा का बदन संजय के नंगे बदन पर, कुछ पल यूं ही रहता है दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हैं, पुष्पा को अपने देवर के बदन से चिपक कर बारिश में भी अपने बदन में गर्मी का एहसास होता है, संजय की भी उत्तेजना बढ़ने लगती है अपनी भाभी के बदन के एहसास से,

पुष्पा को जैसे होश आता है वो संजय के ऊपर से उठती है, दोनों ही थोड़ा असहज महसूस करते हैं

तुम्हारी साड़ी और कपड़े सब पर कीचड़ लग गया भाभी, संजय उठते हुए कहता है,

पुष्पा: देख लो सब तुम्हारे लिए खाना लाने का फल है, पुष्पा थोड़ा हंसकर असहजता को हटाने का प्रयास करती है,

संजय: इस मेहनत का फल तुम्हें जरूर मिलेगा, चलो मैं खाना खा लूंगा तुम अब घर जाकर नहा लेना नहीं तो बेकार में जाड़ा लग जाएगा।

संजय हंसते हुए मुड़ कर आगे की ओर बढ़ते हुए कहता है, और पोटली लेकर चलने लगता है,

पुष्पा: हां अब मेरे भी बस की नहीं है यहां रुकना।

पुष्पा हंसते हुए कहती है और घर की ओर बढ़ने लगती है,

संजय कोने वाले पेड़ की ओर जाने लगता है ताकि उसके नीचे बैठ कर कुछ खा सके, की तभी उसे अचानक से पुष्पा की चीख सुनाई देती है, वो पोटली और फावड़े को छोड़ भागता है अपने खेत के कोने में जाकर देखता है तो उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं वो देखता है उसकी भाभी नीचे जमीन पर गिरी हुई है पूरी कीचड़ में सनी हुई, और दर्द की आहें भर रही है और फिर उठने की कोशिश करती है।



संजय एक पल को तो बस ज्यों का त्यों रह जाता है, पर फिर तुरंत आगे बढ़ता है और पुष्पा को सहारा देकर उठाया। संजय का एक हाथ पुष्पा के हाथ पर था तो दूसरा उसके मखमली पेट पर।

संजय: अरे भाभी आराम से, लगी तो नहीं?

पुष्पा: नहीं ज़्यादा तो नहीं बस फिसल गई इसलिए चीख निकल गई।

संजय: अच्छा हुआ कि लगी नहीं, आओ चलो मेढ़ पर पानी से साफ कर लो खुद को,

संजय ने उसे आगे सहारा देते हुए कहा, उसका हाथ पुष्पा के मखमली पेट पर था और संजय को वो एहसास बहुत अच्छा लग रहा था उसकी उत्तेजना बढ़ रही थी उसका लंड भी सख़्त होने लगा था, पुष्पा को भी देवर के गठीले बदन का एहसास उत्तेजित कर रहा था, कुछ पल बाद दोनों ही मेढ़ के पास थे, संजय उसे सहारा देकर मेढ़ के बीच घुसा देता है, पुष्पा अपनी साड़ी और पेटीकोट को घुटनों तक उठाकर वहीं घुटनों पर बैठ जाती है और खुद को धोने लगती है,

संजय खड़ा होकर अपनी भाभी को देखता है, पुष्पा के गदराए बदन को, उसके मखमली मांसल पेट को, जिस पर वो पानी डालकर उसे साफ करती है, उसकी गोल गहरी कामुक नाभी को, ब्लाउज़ में से झांकता चूचियों की लकीर को, ये सब देख उसका लंड तन जाता है।

पुष्पा खुद को साफ कर लेती है और फिर बैठे हुए ही संजय की ओर देखती है और पाती है वो भी उसे टकटकी लगाए देख रहा है

पुष्पा को उसका देखना थोड़ा अलग लगता है, कुछ देर तक दोनों ही एक दूसरे की आंखों में देखते रहते हैं फिर पुष्पा खड़ी होती है, और संजय उसे हाथ देकर मेढ़ से बाहर निकालता है, दोनों कुछ नहीं बोलते, पुष्पा नीचे उतर कर अपने पल्लू को सही करती है और सीने पर डालती है, दोनों आगे चलने लगते हैं दोनों के बीच एक अजीब सी खामोशी है, चलते हुए पुष्पा का पैर एक बार फिर हल्का सा फिसलता है पर संजय तुरंत उसे पकड़ लेता है, संजय के हाथ उसके पेट और पीठ पर आ जाते हैं।

संजय: भाभी संभल के।

संजय उसकी आंखों में देखते हुए कहता है, पुष्पा भी उसकी आंखों में देख सिर हिलाती है, संजय अभी भी उसे ऐसे ही पकड़े हुए है, उसका हाथ अभी पुष्पा के पेट पर है, संजय को अचानक मन ही मन कुछ विचार आता है और वो अपना चेहरा आगे कर पुष्पा के होठों को अपने होंठों में भर लेता है और चूसने लगता है।

पुष्पा को संजय के इस कदम से झटका लगता है वो पीछे होने की कौशिश करती है पर संजय के हाथ उसकी पीठ और पेट पर कस जाते हैं एक हाथ उसके पेट की मखमली त्वचा को सहलाने लगता है, पुष्पा जो काफी दिनों से प्यासी थी, संजय की लगाई हुई इस चिंगारी से सुलगने लगती है और फिर अगले ही पल संजय का साथ देने लगती है, दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने लगते हैं संजय के हाथ पुष्पा की पीठ और पेट को मसलने लगते हैं, कुछ देर होंठो को चूसने के बाद दोनों के होंठ अलग होते हैं पर आग बढ़ चुकी होती है, संजय उत्तेजना से पागल हो कर पुष्पा के बदन को चूमने लगता है, पुष्पा भी उत्तेजना में सिहरने लगती है,

पुष्पा: आह देवर जी ओह हम्म

संजय होंठो के बाद चेहरे को और फिर गर्दन को चूमते हुए नीचे बढ़ता है, वो पल्लू को सीने से हटा कर नीचे कर देता है, और सीने को चूमने लगता है, फिर ब्लाउज़ के ऊपर से ही चूचियों को चूमते हुए नीचे बैठ जाता है, और फिर पुष्पा के मखमली पेट को चाटने चूमने लगता है और पुष्पा इस एहसास इस गर्मी से पिघलने लगती हैं,



पुष्पा: ओह आह देवर जीईईईई ओह।

संजय भी खुद को रोक नहीं पा रहा था पुष्पा के मखमली बदन का स्वाद लेने से, पुष्पा की चूचियां उत्तेजित होकर ब्लाउज में तन गई थीं और ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहीं थी,

संजय ने पुष्पा का पेट और कमर मसलते और चूमते हुए अपने हाथ ऊपर बढ़ाए और पुष्पा के ब्लाउज़ पर रख दिए और फिर धीरे से एक हुक खोल दिया और अगला खोलने लगा कि दोनों को दूसरे खेतों से आवाज़ सी आई किसी की तो दोनों तुरंत दूर हो गए, पुष्पा ने तुरंत अपना पल्लू ठीक से डाला और संजय भी इधर उधर देखने लगा, पुष्पा फिर तुरंत खेत से बिना कुछ बोले चल दी,

रास्ते भर पुष्पा के मन में जो कुछ हुआ उसके खयाल चल रहे थे उसकी चूत नम थी उसका बदन उत्तेजना में जल रहा था पर साथ ही वो जो हुआ उसके परिणाम और सही गलत सोच रही थी,

एक मन कह रहा था अच्छा हुआ जो वो लोग रुक गए और पाप नहीं हुआ, दूसरा मन कहता अपने बेटे से चुदने से बड़ा पाप क्या होगा, उसके मन में द्वंद चल रहा था। जल्दी ही वो घर पहुंच गई तो सुधा ने उसे गीला देखा और बोली: अरे जीजी तुम तो पूरी तर हो चलो जल्दी से खुद को सुखा लो नहीं तो बीमार पड़ जाओगी, चलो मैं सूखे कपड़े निकलती हूं तब तक तुम ये सब उतार दो, सुधा ने उसकी साथ कमरे में चलते हुए कहा, घर पर सिर्फ वो दोनों ही थीं, नंदिनी सिलाई सीखने गई थी और फुलवा रत्ना के यहां थी।

पुष्पा ने जल्दी से अपने गीले कपड़े उतारे और पूरी नंगी हो गई, और खुद को सूखे अंगोछे से पोंछने लगी, सुधा कपड़े निकाल कर अपनी जेठानी के नंगे बदन को देखने लगी, उसे देख उसे भी कुछ कुछ होने लगा,

पुष्पा ने भी सुधा को ऐसे देखते हुए पाया और बोली: क्या देख रही है, ऐसे?

सुधा के मन में भी न जाने क्या आया कि उसने भी आगे बढ़ कर पुष्पा के होंठो को चूसना शुरू कर दिया, पुष्पा हैरान रह गई ये सब बिलकुल वैसे ही हुआ जैसे अभी उसके और सुधा के बीच खेत में हुआ था, पहले पति और अब पत्नी, पुष्पा के मन में कई खयाल थे पर अभी सुधा के चुम्बन ने उन खयालों पर ध्यान ही नहीं देने दिया और वो भी सुधा के होंठों को उसका साथ देते हुए चूसने लगी।

सुधा के हाथ जेठानी के नंगे और हल्के गीले बदन पर फिरने लगे, उनके होंठ आपस में जुड़े हुए थे, पुष्पा भी अब जोश में थी और होंठों को चूसते हुए उसने सुधा के पल्लू को नीचे गिरा कर उसके ब्लाउज़ के हुक खोल दिए थे, कुछ पल बाद दोनों के होंठ अलग हुए पर गर्मी कम नहीं थी, होंठ अलग होते ही पुष्पा ने सुधा के ब्लाउज़ को उतार कर अलग फेंक दिया अब सुधा ऊपर से नंगी थी पर सुधा ने खुद अपनी साड़ी भी उतार दी उसके बदन पर बस एक पेटीकोट रह गया, सुधा पुष्पा के पीछे आई और पीछे से उसके चूचों को पकड़ कर मसलने लगी उनसे खेलने लगी,

पुष्पा के मुंह से सिसकियां निकलने लगी। सुधा चूचियों को मसलते हुए फिर से पुष्पा के आगे आई और फिर से दोनों के होंठ मिले,



दोनों फिर से एक दूसरे के होंठो को चूमने लगी और फिर थोड़ी देर बाद अलग होकर सुधा नीचे सरकने लगी और पुष्पा की मोटी चूचियों को मसलने और चूसने लगी,

पुष्पा: अह सुधा आह, ओह अच्छा लग रहा है,

पुष्पा उसके सिर को सहलाते हुए बोली,

सुधा तो भूखों की तरह अपनी जेठानी की चूचियों को चूस रही थी।

और पुष्पा जिसकी प्यास पहले ही बड़ी हुई थी और बढ़ रही थी।

चूचियों को जी भर के चूसने के बाद सुधा और नीचे सरकी और पुष्पा के पेट को चाटने लगी, पुष्पा को यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ देर पहले यही पेट उसका पति चाट रहा था और अब पत्नी चाट रही है, ये सोच कर उसकी उत्तेजना बढ़ रही थी, वहीं सुधा तो चाहती थी कि पुष्पा के बदन का कोई भी हिस्सा न रह जाए जिसे वो चाट न पाए, पुष्पा की नाभी में जीभ घुसाकर चूसने में सुधा को जैसे एक असीम आनंद मिला वहीं पुष्पा का बदन कांप कर रह गया,

सुधा: जीजी तुम्हारा बदन तो मक्खन है, इतना स्वाद है कि मन करता है चाटते जाओ,

सुधा ने उसकी नाभि से जीभ हटाते हुए कहा।

पुष्पा: आह तो खा जा ना आह,

पुष्पा ने अपनी टांगों को आपस में घिसते हुए कहा उसकी चूत गरम हो कर रस बहा रही थी, साथ ही बहुत खुजा रही थी अब उसकी चूत को भी कुछ सुकून चाहिए था, पुष्पा के लिए ये सहना मुश्किल होता जा रहा था, इसलिए वो अनजाने ही सुधा के सिर को पकड़कर नीचे अपनी टांगों के बीच ले जाने लगी, कुछ पल बाद सुधा का मुंह उसकी जेठानी की गीली चूत सामने था, सुधा जेठानी की चूत को ध्यान से देखने लगी और उसे चूत का गीलापन, उसके होंठों की चिकना हट अच्छी लगी, इससे आगे वो कुछ सोचती या करती, पुष्पा ने उसका मुंह अपनी चूत में घुसा दिया या यूं कहें कि अपनी चूत को सुधा के होंठों पर घिसने लगी। सुधा को अचानक झटका लगा उसके होंठों पर उसकी जेठानी की चूत का स्वाद आ रहा था, पर उसे जैसे इससे कोई परेशानी नहीं थी, जितनी गर्मी पुष्पा में थी उतनी ही सुधा में भी थी, सुधा ने भी स्वाभाविक ही अपनी जीभ निकाली और अपनी जेठानी की चूत चाटने लगी,



पुष्पा तो मानो जन्नत में पहुंच गई उसकी कमर और बदन मचल रहा था, वहीं सुधा को अपनी जेठानी की चूत मानो रस से भरा हुआ कोई फल लग रही थी जिस तरह वो उसे चाट रही थी,

पुष्पा: आह सुधा आह ऐसे ही चूस, खा जा मेरी चूत को, आह बहुत खुजली है इसमें।

पुष्पा की बातों ने सुधा का उत्साह और बढ़ा दिया और सुधा और लगन से अपनी जेठानी की सेवा करने लगी। और सेवा का फल भी उसे रस के रूप में जल्दी ही अपने मुंह में प्राप्त हुआ, पर सुधा उसे भी मलाई मान कर गटक गई, सुधा आज खुद को भी हैरान कर रही थी उसे भी नहीं पता था कि वो अंदर से इतनी प्यासी और उत्तेजना में जल रही है कि अपनी जेठानी की चूत से निकला रस भी उसने पी लिया,

पुष्पा बेजान सी होकर पीछे लेटी हुई थी और तेज तेज हाफ रही थी, सुधा भी उसके बगल में लेट गई, कुछ पल बाद पुष्पा को होश आया तो उसने बगल में लेटी अपनी देवरानी को देखा और उसे याद आया कि उसने कितनी अच्छी तरह अभी उसकी सेवा की थी, पुष्पा ने आगे बढ़ कर सुधा के होंठों को चूम लिया और बोली: आह आज तक ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ तूने तो मेरी जान ही निकाल दी थी।

सुधा: ऐसे कैसे जीजी, तुम्हारी जान में तो हमारी जान बसती है,

पुष्पा: अब मेरी बारी मैं भी तो स्वाद चख कर देखूं अपनी देवरानी का,

ये सुन कर सुधा के चेहरे की मुस्कान और बढ़ी हो गई, और उसके कुछ देर बाद ही



पुष्पा की जीभ सुधा की चूत पर चल रही थी या कहूं कि सुधा अपनी चूत को पुष्पा के मुंह पर घुस रही थी। और कुछ ही पलों में झड़ रही थी, उसका बदन अकड़ा और फिर वो भी थक कर नीचे गिर गई, तभी उन्हें दरवाज़े पर दस्तक सुनाई दी।

कुछ देर बाद दोनों आंगन में थी और बिल्कुल साधारण संस्कारी बहुएं लग रही थीं, फुलवा और नंदिनी घर आ चुके थे, सुधा चूल्हे पर चाय चढ़ा रही थी तो फुलवा रात के लिए चावल बीन रही थी, चाय लेकर सुधा भी पुष्पा के साथ बैठ गई दोनों के बीच एक रहस्य भरी मुस्कान तैर गई,

पुष्पा: क्यों मुस्कुरा रही हो देवरानी जी।

सुधा: कुछ सोच कर जेठानी जी?

पुष्पा: क्या सोच कर?

सुधा: यही कि इस चाय का स्वाद तुम्हारे रस जैसा नहीं है,

ये सुन पुष्पा शर्मा गई और बोली: वैसे ये बात तो मैं तेरे लिए भी कह सकती हूं।

पुष्पा ने चाय का घूंट भरते हुए कहा,

सुधा: अच्छा जीजी एक बात थोड़ी अजीब है।

पुष्पा: क्या?

सुधा: वैसे ये चूत को मूत्र द्वार कहते हैं और सब इसे गंदी और गलत चीज मानते हैं, पर आज चाटते हुए मुझे एक पल को भी ऐसा नहीं लगा कि मैं कुछ गलत या गंदा कर रहीं हूं।

पुष्पा: हां मेरे मन में भी एक भी बार जरा भी नहीं आया ये, शायद ये सब गलत हो।

सुधा: अब चाहे गलत हो या सही मैं तो तुम्हारा स्वाद चखती रहूंगी।

पुष्पा: तू भी मुझसे बच के नहीं रहेगी।

दोनों आपस में फुसफुसाते हुए खिल खिला रही थी।

दिन में लल्लू आंगन में बैठ कर रात के बारे में सोच रहा था कि कैसे उसने अपने मां पापा की चुदाई देखी थी साथ ही अपनी बहन को भी देखते हुए पकड़ा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इस बारे में अपनी बहन से बात करे जिससे उसे कुछ फायदा हो,

इतने में उसकी मां लता बाहर से आई और बोली: लल्ला बैठा है देख नहीं रहा बूंदे पड़ रही हैं कपड़े उतार ले,

और खुद आंगन में सूख रहे कपड़े उतारने लगती है, कपड़े उतारते हुए लता का पल्लू एक ओर को सरक जाता है जिससे उसका मांसल गोरा पेट उसकी नाभी और ब्लाउज़ में बंद बड़ी बड़ी चूचियां लल्लू के सामने आ जाती हैं,



लल्लू का लंड ये नज़ारा देख कड़क होने लगता है,

लता: अब बैठा क्या देख रहा है ले ये कपड़े ले जा और रख दे कमरे में,

लल्लू उठ कर जल्दी से कपड़े लेता है, और कमरे के अंदर जाता है दौड़ कर रख आता है, और बाहर आकर देखता है उसकी मां अभी भी आंगन में खड़ी है।

लल्लू: अरे मां क्यों वहां क्यों खड़ी हो भीग जाओगी आओ अंदर।

लता: अरे कितनी अच्छी बारिश हो रही है आज नहाऊंगी मैं तो बारिश में,

लल्लू: अरे वाह मां, फिर तो मैं भी नहाऊंगा,

लल्लू भी अपनी कमीज़ उतारते हुए बोला, लता ने भी अपनी साड़ी को खोलना शुरू कर दिया था और कुछ ही पलों में एक ओर टांग दिया, अब लता लल्लू के सामने पेटीकोट और ब्लाउज़ में खड़ी थी,



लता या गांव की कोई भी औरत ब्रा तो कभी कभी ही पहनती थी तो उस कारण से उसका ब्लाउज़ गीला होकर हल्का पारदर्शी हो गया था और उसकी चूचियों की हल्की झलक दिखा रहा था, ये देख तो लल्लू का और बुरा हाल हो रहा था।

वो सोचने लगा इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा मां के करीब आने का अभी घर पर भी कोई नहीं है, सिवाय हम दोनों के, और जब तक बारिश होगी कोई आने से भी रहा, ये सोचते हुए और बस एक निक्कर में लल्लू भी आंगन में जाकर बारिश में भीगने लगा, पर उसकी नजर अपनी मां के बदन पर बनी हुई थी,

लल्लू: मज़ा आ रहा है न मां बारिश में नहा कर।

लता: हां लल्ला मुझे बारिश हमेशा से ही पसंद रही है, बचपन में तो मैं बारिश में भीगते हुए खूब नाचती थी,

लल्लू: सच में मां तुम्हे इतना मज़ा आता है बारिश में?

लता: हां सच्ची।

लल्लू: तो मां अब भी नाचो न देखो कितनी अच्छी बारिश है।

लता: अभी न बाबा न अब इस उम्र में नाचना नहीं होगा, किसी ने देखा तो गांव भर में मजाक उड़ जाएगा।

लल्लू: अरे मां कौन उड़ाएगा मजाक हमारे अलावा कोई है यहां, और नाचने का उम्र से क्या लेना देना।

लता: अरे नहीं फिर भी अब नाचना नहीं होगा।

लल्लू: अरे क्यों नहीं होगा, मां नाचो न मैं भी साथ दूंगा तुम्हारा, नाचो ना, नाचो न।

लल्लू जिद करते हुए कहता है साथ ही लता जी कमर और पेट पकड़ कर उसे हिलाने लगता है।

लता: अरे लल्ला गिर जाऊंगी मैं आराम से तू तो बिल्कुल बावरा हो गया है अच्छा छोड़ मुझे करती हूं।

लल्लू अब भी उसे पकड़े हुए था और न चाहते हुए भी उसे छोड़ना पड़ता है।



लता भी अपने बचपन की याद करके धीरे धीरे बदन हिलाने लगती है उसे भी ये सब अच्छा लग रहा था भले ही लल्लू की ज़िद की वजह से पर वो अपने बचपन की याद को ताज़ा कर पा रही थी, वहीं लल्लू को अपनी मां का थिरकता बदन देख एक अलग ही आनंद आ रहा था, उसका लंड उसके निक्कर में कड़क हो चुका था जिसे उसने नीचे करके किसी तरह से छुपाया हुआ था

और लंड कड़क होने का कारण भी था उसकी मां अपने भरे बदन को जो पूरी तरह गीला था उसे उसके सामने थिरका रही थी,

लल्लू को लग रहा था जैसे वो किसी भरे बदन की फिल्मी हीरोइन को नाचते देख रहा है, सबसे बड़ी बात ये हीरोइन उसकी मां थी जिसे सिर्फ अभी वो ही देख रहा था, लल्लू को ये सोच बहुत अच्छा लग रहा था, वहीं लता लगातार नाच रही थी



लल्लू को अपनी मां का ये रूप बहुत भा रहा था कुछ देर और यूं ही नाचने के बाद लता हंसते हुए रुक कर बैठ गई।

लता: आह मैं तो थक गई, आखिर तूने अपनी ज़िद पूरी करवा ही ली।

लल्लू: जिद तो पूरी कराई मां। पर ये बताओ तुम्हे मज़ा आया कि नहीं?

लता: सच कहूं तो मज़ा तो आया, बचपन याद आ गया।

लल्लू: इसीलिए तो ज़िद की थी मां,

लता: हाय मेरा लल्ला कितनी फिकर करता है अपनी मां की, पर अब चल, और कपड़े बदल लेते हैं नहीं तो तबियत बिगड़ जाएगी

लल्लू: क्या इतनी जल्दी? थोड़ी देर और रुकते हैं न.

लता: हां अब बहुत हो गया, मैने तेरी बात मानी अब तू मेरी मान।

लल्लू: ठीक है मां चलते हैं, छप्पर के अंदर आकर लता लल्लू से कहती है तू ले ये अंगोछे से खुद को पौंछ कर साफ कर मैं तब तक कमरे से तेरी पेंट निकाल कर देती हूं।

लल्लू: ठीक है मां,

लता कमरे में चली जाती है और लल्लू अंगोछे से अपने बदन को पोंछने लगता है, वो अपने गीले निक्कर को उतारता है जिसके उतरते ही उसका खड़ा लंड उछल कर बाहर आ जाता है वो अपने निक्कर को पैरों से निकाल कर उतार देता है,

उसी समय लता उसके लिए सूखा पेंट लेकर कमरे के दरवाज़े तक आई थी, और उसकी नजर अंदर से ही बाहर पड़ती है सबसे पहले अपने बेटे के कड़क लंड पर, लता लल्लू का कड़क लंड देख कर ज्यों का त्यों रुक जाती है, वो देखती है उसके बेटे का लंड कितना मोटा और कड़क है, हाय मेरा लल्ला कितना बड़ा हो गया है बेटा भी और उसका लंड भी, उसे देख उसे अपनी जांघों के बीच एक हल्की सी खुजली महसूस होती है।

पर वो खुद के सिर को झटकती है और पीछे हो जाती है और आवाज़ देती है: लल्लू ले लल्ला अपनी पेंट,

और फिर कुछ पल बाद लल्लू की आवाज़ आती है,: लाओ मां,

लता कमरे से बाहर आती है तो देखती है लल्लू ने वो अंगोछा अपनी कमर पर बांध लिया था पर अब भी वो उसके उभार को अंगोछे के बीच साफ महसूद कर पा रही थी। लल्लू ने उसके हाथ से पैंट लिया और मूड कर जाते हुए लता ने एक बार फिर से उसके उभार पर नजर डाली और अंदर चली गई।

लता के मन में एक साथ कई विचार चल रहे थे, ये लल्लू का लंड कड़क क्यों था क्या वो उत्तेजित था पर अभी उत्तेजित क्यों घर में तो सिर्फ मैं और वो ही थे, क्या वो मुझे देख कर उत्तेजित हो रहा था, क्या अपनी मां को? लता अपना ब्लाउज़ खोलते हुए ये सोच रही थी, ब्लाउज उतार कर नीचे गिरा दिया और अपनी नंगी चूचियों को पौंछते हुए सोचने लगी, आखिर अपनी मां में मुझ बुढ़िया में उसे क्या मिलेगा ऐसा जो वो गर्म होगा मुझे देख कर, उसके हाथ उसकी चूचियां सुखाने की जगह दबाने लगे थे उसके बदन की गर्मी बढ़ रही थी, उसे अपनी चूत में भी खुजली हो रही थी,

क्या हो रहा है मुझे टांगों के बीच भी खुजली हो रही है जबकि रात को ही इसके पापा ने अच्छे से शांत की थी वो भी अपने बेटे के बारे में सोच कर, पहले छोटू के साथ वो सब और नंदिनी के साथ तो सारी हदें पार हो गई, और अब लल्लू, ये कहां जा रही हैं मैं, किस पाप के दलदल में गिरती जा रही हूं पर बदन को जैसे ये ही भा रहा है, गलत होकर भी अच्छा लग रहा है सब।

लल्लू: मां बारिश रुक गई।

लल्लू की आवाज़ ने उसे खयालों से निकाला और फिर सूखे कपड़े पहन कर वो कमरे से बाहर निकली, तो देखा लल्लू चूल्हे पर चाय चढ़ा रहा था,

लल्लू: मां चाय पियोगी आज मेरे हाथ की।

लता: हां बिल्कुल, बनाएगा तो क्यों नहीं।


लता ने लल्लू को देखते हुए कहा उसकी नजर अपने बेटे के लिए अब बदल चुकी थी।

जारी रहेगी।
 
अध्याय 24


बारिश की मंद-मंद बूंदें छप्पर की छत पर टपक रही थीं, और रत्ना उसकी ठंडी आहट को सुनते हुए गहरी सोच में डूबी थी। उसका मन उसके हाल के सपनों से भरा हुआ था—सपने जो उसे रातों को पसीने से तर-बतर कर देते थे।

छप्पर के नीचे पुरानी खाट पर बैठी, उसकी उंगलियां अनजाने में अपनी साड़ी के पल्लू को मरोड़ रही थीं। बारिश की हर बूंद उसके अंधविश्वासी स्वभाव को और गहरे में धकेल रही थी। क्या ये सपने कोई संकेत थे? क्या उसके ससुर प्यारेलाल की आत्मा उसे कुछ बताना चाहती थी, जिस रात उसने उनकी मृत्यु से पहले उनके साथ वो अनचाहा पल बिताया था? या फिर ये किसी और गहरे रहस्य की ओर इशारा था, जिसे वो समझ नहीं पा रही थी?

उसके सपनों में भूरा, लल्लू, और छोटू का चेहरा था—उसके बेटे और उसके दोस्त, जो उसे नंगी हालत में चोद रहे थे। फिर वो दृश्य बदलता, और राजू—उसका बड़ा बेटा—उसकी चूत में लंड डाले हुए था, जबकि रानी मां-मां चीख रही थी, और तीन पुरुष उसे घेरे हुए थे। ये सब सोचकर रत्ना का बदन कांप उठता था, और साथ ही उसकी चूत में एक अनचाही गर्मी भी महसूस होती थी। वो जानती थी कि ये सपने इतने अश्लील और निंदनीय थे कि इन्हें किसी से साझा नहीं कर सकती। उसने मन ही मन सोचा, "क्या कोई टोटका है जो इन सपनों को दूर कर सके? क्या केलाबाबा की मदद ली जाए?" लेकिन डर था कि उन्हें कहूंगी क्या? जो देखा वो तो नहीं कह सकती। बारिश की बूंदों के साथ उसकी सोच भी बह रही थी, और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था।

दूसरी ओर शाम ढलते-ढलते बारिश की रफ्तार धीमी पड़ गई और आखिरकार थम गई। लता ने घर के लिए ताजी सब्जियां तोड़ने का फैसला किया और खेत की ओर चल पड़ी, जिससे लल्लू और नंदिनी को घर में अकेला समय मिल गया। नंदिनी का मन घबराया हुआ था। रात की घटना—जब लल्लू ने उसे मां-पापा की चुदाई देखते हुए पकड़ा था—उसके दिमाग में चक्कर काट रही थी। वो आंगन में खाट पर बैठी, अपने हाथों को सलवार के किनारे से मरोड़ रही थी, जबकि लल्लू भीतर से बाहर निकला और उसकी ओर देखने लगा।

लल्लू ने सोचा कि अगर वो नंदिनी को डराएगा या जोर-जबरदस्ती करेगा, तो सब बिगड़ सकता है। उसे प्यार से और समझदारी से कदम उठाने थे। वो धीरे से नंदिनी के पास जाकर बैठ गया और बोला, "दीदी, रात जो हुआ, उसके बारे में बात करना चाह रहा हूं, पर समझ नहीं आ रहा क्या बोलूं।" नंदिनी चुप रही, उसकी नजरें ज़मीन पर गड़ी थीं। लल्लू ने हिम्मत जुटाई और कहा, "वैसे जो तुम महसूस कर रही थी, मुझे भी होता है। कभी-कभी मेरे अंदर ऐसी उत्तेजना और गर्मी बढ़ जाती है कि काबू नहीं रहता।" नंदिनी ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली।

लल्लू ने आगे बढ़ते हुए कहा, "मुझे पता है तुम्हारे साथ भी रात वही हुआ होगा, तभी तुम मां-पापा की... चुदाई देख रही थी।" चुदाई शब्द बोलते वक्त उसकी आवाज में हल्की झिझक थी, ताकि नंदिनी की प्रतिक्रिया देख सके। नंदिनी ने उसकी आंखों में देखा और फिर नजरें नीचे कर लीं, उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।

लल्लू ने बात को और खोला, "शायद ये ही जवानी का जोश है। सच कहूं तो दीदी, मेरा तो हमेशा यही हाल रहता है। हर समय उत्तेजना बदन में महसूस होती है और नीचे तना हुआ रहता है।" उसने अपने लंड की ओर इशारा किया, जो निक्कर में साफ उभार बना रहा था।

नंदिनी ने पहली बार मुंह खोला, "तू इस बारे में किसी को कुछ कहेगा तो नहीं?" लल्लू के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई कि नंदिनी ने कुछ कहा।

वो बोला, "अरे नहीं दीदी, तुम्हारी और मेरी बात मैं क्यों कहूंगा किसी से? और हम भाई-बहन एक-दूसरे की परेशानी नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा, क्यों दीदी?"

नंदिनी थोड़ी असमंजस में बोली, "हां... सही कह रहा है।"

लल्लू ने मौके का फायदा उठाया, "अब देखो, मेरी परेशानी तो अब भी सिर उठाए हुए खड़ी है।" उसने अपने निक्कर में बने तंबू की ओर इशारा किया। नंदिनी की नजर उस उभार पर पड़ी, और वो हैरान रह गई। फिर सकुचाकर नजर हटा ली, लेकिन उसके बदन में एक सिहरन दौड़ गई। नंदिनी ने कहा, "तू ये सब क्या बातें कर रहा है? भाई-बहन को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए।" लल्लू जानता था कि नंदिनी को मनाना आसान नहीं होगा।

वो बोला, "अरे दीदी, फिर मैं ऐसी बातें किससे करूं? तुम भी मेरी तरह उत्तेजित थी, तभी तो उस दिन नंगी सो रही थी और फिर रात को मां-पापा को देख रही थी। अब तुमसे अच्छा कौन मेरी परेशानी समझेगा?" नंदिनी उसकी बातें सुनकर सकुचाई, क्योंकि लल्लू ने उसकी गलतियों को याद दिला दिया था और ये भी साफ कर दिया कि अभी उसका पलड़ा भारी था। नंदिनी ने धीरे से कहा, "हां, वो मैं मानती हूं। और तेरी बात समझती हूं।"

लल्लू ने मौका देखते हुए कहा, "अरे दीदी, तुम नहीं समझती, मैं इस वजह से कितना परेशान रहता हूं। लगता है तुम्हें दिखाना पड़ेगा तभी तुम मानोगी।" नंदिनी ने घबराते हुए कहा, "अरे नहीं भाई, उसकी कोई जरूरत न..." लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले लल्लू खड़ा हो गया, अपनी ओर मुंह करके निक्कर नीचे खिसका दिया, और अपना कड़क लंड बाहर निकाल लिया, जो नंदिनी के चेहरे के सामने झूलने लगा।

नंदिनी हैरान रह गई। उसकी नजर लल्लू के लंड पर टिक गई—मोटा आकार, गुलाबी-जामुनी टोपा, पीछे काली खाल, और उभरी हुई नसें। उसके बदन में बिजली दौड़ गई, और टांगों के बीच गीलापन महसूस हुआ। उस सुबह की झलक से अलग, आज वो इसे बारीकी से देख रही थी, हर हिस्से को अपनी आंखों में भर रही थी। लेकिन फिर उसे होश आया कि ये उसका भाई है। वो चेहरा घुमा ली और बोली, "ये तू क्या कर रहा है? इसे अंदर कर!"

लल्लू हंसते हुए बोला, "अरे दीदी, इतना शर्माओगी तो कैसे काम चलेगा? हमें भाई-बहन के साथ-साथ दोस्त भी बनना होगा।" नंदिनी ने चेहरा दूसरी ओर कर लिया, मन में द्वंद्व चल रहा था। एक ओर उसकी वासना जाग रही थी—जवान और गरम लड़की के सामने नंगा लंड, और पिछले दिनों सत्तू से दूर होने का असर।

दूसरी ओर सही-गलत का बोध उसे रोक रहा था। एक आवाज कह रही थी, "ये महापाप है, तेरा भाई है, समझदारी दिखाओ।" दूसरी आवाज गूंजी, "नीलम को सीख देती थी, अब खुद क्यों नहीं मानती? मां के साथ सबकुछ करने के बाद अब पाप पुण्य का डर?"

इतने में लल्लू ने उसका एक हाथ पकड़ा और अपने लंड पर रख दिया। उंगलियों पर लंड का स्पर्श होते ही नंदिनी के बदन में करंट दौड़ा। उसकी उत्तेजना कई गुना बढ़ गई। वो चेहरा फिर से लंड की ओर घुमा ली और उसे नशीली आंखों से देखने लगी। लल्लू ने अपना हाथ हटा लिया, लेकिन नंदिनी का हाथ वहीं रहा।

धीरे-धीरे उसने हाथ को आगे-पीछे करना शुरू कर दिया। लल्लू अपनी बहन की उंगलियों के स्पर्श से पागल हो रहा था, आंखें बंद कर आनंद में डूब गया।

नंदिनी ने एक पल लल्लू के आनंदमग्न चेहरे को देखा, और उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान खिल गई। उसकी खुद की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। वो खड़ी हो गई, लेकिन उसका हाथ लंड पर चलता रहा।

लल्लू ने आंखें खोली और अपनी बहन को खड़ी देखा। दोनों की आंखों में वासना साफ झलक रही थी। नंदिनी लल्लू के चेहरे पर बदलते भाव देखकर मन ही मन आनंदित हो रही थी। लल्लू समझ गया कि उसकी योजना कामयाब हो रही है। उसने हिम्मत दिखाई और अपना हाथ बढ़ाकर नंदिनी की कमर पर रख दिया, सूट के ऊपर से ही उसकी कमर और पीठ को सहलाने लगा।

नंदिनी की उत्तेजना हर पल बढ़ रही थी। वो पहली बार लंड को हाथ में ले रही थी। सत्तू के साथ उसके चक्कर थे, लेकिन इतनी दूर तक नहीं पहुंची थी। आज उसके हाथ में अपने सगे छोटे भाई का बड़ा लंड था। ये सोचकर उसकी चूत और गीली हो रही थी—पहले मां, अब भाई। सही-गलत का बोध धीरे-धीरे वासना के बादलों में खो गया। कुछ पल बाद दोनों के होंठ आपस में मिल गए, और उस मिलन की चिंगारी से उत्तेजना की आग जल उठी।

दोनों एक-दूसरे के होंठों को पागलों की तरह चूसने लगे। नंदिनी के चूसने में थोड़ा अनुभव था, जबकि लल्लू का जोश और उत्साह छलक रहा था। लल्लू अपनी बहन के रसीले होंठ चूसते हुए खुद को धन्य महसूस कर रहा था। उसकी उत्तेजना अब सीमा पार कर चुकी थी।

लंड पर नंदिनी का हाथ चल रहा था, और उसके हाथ नंदिनी की कामुक कमर और पीठ पर फिसल रहे थे। इसके लिए ये सब बहुत ज्यादा हो गया। नंदिनी ने अपने हाथ में लंड के ठुमके महसूस किए, और फिर उससे एक के बाद एक पिचकारी निकली—कुछ उसके हाथ को सना गई, कुछ जमीन पर गिरी। हांफते हुए दोनों के होंठ अलग हुए। लल्लू की आंखें बंद थीं, जबकि नंदिनी मुस्कुराते हुए कभी लंड, कभी अपने हाथ को देख रही थी।

कुछ पल बाद दोनों की सांसें सामान्य हुईं। लल्लू कुछ बोलने ही वाला था कि दरवाजे से लता की आवाज आई, "लल्ला, मैं आ गई!" नंदिनी तुरंत बोली, "धत्त, तेरी मां आ गई! जा, तू किवाड़ खोल, मैं ये साफ करती हूं।" लल्लू ने तुरंत अपना निक्कर ऊपर चढ़ाया, थोड़ी हालत सही की, और दरवाजे की ओर दौड़ पड़ा।

वहीं शहर में भी शाम होते होते आधी के करीब सब्जियां आदि बिक चुकी थी, और अभी सत्तू, उसकी मां झूमरी, छोटू, राजेश और सुभाष सब साथ में बैठ कर चाय की चुस्कियां लगा रहे थे।

सत्तू: पूरे दिन की मेहनत के बाद गरम चाय का मज़ा ही कुछ और है,

सुभाष: सही कहा लल्ला।

छोटू: पापा यहां कब तक का काम रह गया है और,

छोटू ने चाय सुड़कते हुए कहा,

सत्तू: क्यों छोटू उस्ताद एक दिन में ही गांव याद आ गया क्या?

राजेश: हां भैया इसे तो दोपहर में ही आ गया था।

सत्तू: अरे तुमने अभी शहर देखा नहीं है नहीं तो गांव को भूल जाओगे।

राजेश: सही में भैया?

सत्तू: और क्या, अरे चाचा अब कोई काम तो है नहीं तो मैं इन दोनों को घुमा लाता हूं थोड़ा शहर ? पहली बार आए हैं और शहर न देखें तो बेचारे मन ही मन दुखी होंगे।

सुभाष: अरे हां बिल्कुल, घूमेंगे तभी तो शहर के बारे में थोड़ा जानेंगे।

सुभाष ने हंसते हुए कहा, झुमरी भी चाय पीते हुए सबकी बातें सुन मुस्कुरा रही है,

सत्तू: तो क्या कहते हो दोनों चले?

छोटू को भी शहर देखने की उत्सुकता होती है और राजेश और छोटू दोनों साथ में कहते हैं चलो।

सुभाष: चलो तुम लोग घूम आओ तब तक मैं बचे एक दो बोरे अंदर गोदाम में रख दूंगा।

सत्तू: ठीक है चाचा, हम लोग आते हुए कुछ खाने के लिए ले आएंगे।

सत्तू राजेश और छोटू को लेकर निकल जाता है, सुभाष बचे हुए बोरे एक छोटी दुकान जो दो तीन घरों ने मिलकर किराए पर ले रखी थी सामान रखने के लिए उसमें रख देता है, झुमरी उसकी मदद करती है, दूसरी ओर सत्तू राजेश और छोटू को शहर घुमाता है दोनों पहली बार शहर की चकाचौंध देखकर आश्चर्यचकित थे, बड़ी बड़ी गाड़ियां, ऊंचे ऊंचे पक्के मकान, पक्की सड़क, अलग अलग तरह की दुकानें, शहर की औरतें और आदमी जिनकी वेशभूषा उनसे अलग जान पड़ रही थी, सत्तू एक ज्ञानी और अच्छे गुरु की तरह उन्हें सब कुछ बताता जा रहा था, शायद ये भी दिखा रहा था कि वो इस शहर को कितने अच्छे से जानता है।

अंधेरा हो चुका था सत्तू और छोटू और राजेश अभी तक शहर में घूम ही रहे थे वहीं गोदाम में एक अलग दृश्य चल रहा था, गोदाम के एक कोने में खाली बोरे बिछे हुए थे और उन पर सत्तू की मां झुमरी लेटी हुई थी, ब्लाउज़ खुला हुआ था और दोनों मोटी चूचियां ब्रा के बाहर थी जिन पर सुभाष के हाथ चल रहे थे, सुभाष उन्हें मसल रहा था।



झुमरी भी आंखें बंद कर अपनी चूचियों को मसलवाने का आनन्द ले रही थी और सुभाष के हाथों पर अपने हाथ रख उसका हौसला बढ़ा रही थी।

सुभाष: आह भाभी तुम्हारी इन चूचियों के तो हम हमेशा से ही दीवाने हैं आह इन्हे छूकर ऐसा लगता है मानो मक्खन की पोटलिया हैं।

सुभाष धीरे से फुसफुसाते हुए बोला।

झुमरी: उम्म तुमने ही दबा दबा कर इतनी बड़ी कर दी हैं कि सारे ब्लाउज़ कस के आते हैं।

सुभाष: अब हम मेहनत करें और फसल भी न बड़े तो किस बात के किसान हुए हम।

सुभाष ने हंसते हुए कहा। झुमरी पर इतनी भी जुताई मत करो न कि नई फसल उग जाए। भूलो मत ये खेत किसी और का है।

सुभाष: जानते हैं हमारे स्वर्गीय परम मित्र का है, पर अभी तो हमारे हवाले है, तो अब जुताई करें या बुवाई हमारे हाथ में हैं।

सुभाष ने झुमरी की साड़ी और पेटीकोट को उसकी कमर तक उठा दिया और झुमरी की नंगी गीली चूत उसके सामने आ गई जिसे वो अपनी उंगलियों से सहलाने लगा।

झुमरी: आह उम्म नहीं,

झुमरी उसकी हरकतों से सिसकते हुए बोली।

सुभाष: ऐसे कैसे नहीं भाभी, जुताई से पहले थोड़ा खेत को जांच तो लें कि कैसा हैं।

सुभाष ने अपनी उंगली झुमरी की चूत में उतारते हुए कहा।

झुमरी: आह आराम से,

कुछ पल यूं ही उंगली से झुमरी की चूत को छेड़ने के बाद सुभाष ने अपना पजामा नीचे खिसका कर उतार दिया और झुमरी की टांगों को फैलाते हुए उनके बीच आ गया, और फिर अपने लंड को पकड़ कर झुमरी की चूत पर लगाया तो झुमरी तड़प उठी।

सुभाष: डाल दूं? उसने झुमरी के तड़पते चेहरे को देख कर कहा।

झुमरी: हां जल्दी करो बच्चे आते ही होंगे। न जाने क्या मजा आता है यूं तड़पाने में।

सुभाष: ये ही तो मजा है भाभी, तुम्हारे चेहरे पर लंड की प्यास देख एक अलग सुख मिलता है।

झुमरी: आह जल्दी करो न।

सुभाष: फिर ये लो।

ये कह सुभाष अपना लंड झुमरी की चूत में घुसा देता है, झुमरी के मुंह से आह निकलती है और सुभाष झुमरी के पैरों को थाम कर धक्के लगा कर उसे चोदने लगता है।



इधर छोटू और सत्तू खाना लेकर चले आ रहे थे, मंडी के बाहर ही उन्हें राजेश मिलता है,

सत्तू: अरे तू गया नहीं अंदर?

राजेश: अरे भैया मैं भूल गया था, किस ओर से आएगी अपनी दुकान और किधर है, तो खो न जाऊं इसलिए रुक गया,

छोटू: अरे यार तू भी इसमें कहां खो जाएगा, बुद्धू, आ चल मैं दिखाता हूं रास्ता।

राजेश कुछ नहीं कहता और कुछ सोचते हुए आगे बढ़ जाता है गोदाम के बाहर ही उन्हें सुभाष और झुमरी मिलते हैं जो बैठ कर बातें कर रहे थे, फिर सब मिलकर खाना खाने लगते हैं, राजेश थोड़ा सोच में होता है।

गांव में अंधेरा होते तक संजय भी पानी लगा कर घर आता है, तब तक औरतों ने भैंसों और खाने पीने का सारा काम निपटा लिया था, संजय अंदर आकर नल पर हाथ पैर धोता है नीलम अपने पापा के लिए नल चलाती है, इसी बीच उसकी नजर एक बार पुष्पा से मिलती है जो चूल्हे के पास बैठी दूध उबाल रही थी, दोनों की नज़र मिलती है वैसे ही दोनों अपनी अपनी नजर फेर लेते हैं दोनों जानते थे आज खेत में जो हुआ वो उनके परिवार के लिए सही नहीं था, पुष्पा के मन में भी बहुत से विचारों का तूफान आया हुआ था एक ओर अपनी बहन जैसी देवरानी जिसके साथ आज उसने वो सब किया था जो कभी सोचा भी नहीं था, और फिर दोपहर में देवर के साथ जो हुआ वो, उसे समझ नहीं आ रहा था वो किसके साथ धोखा कर रही थी, देवरानी सुधा के साथ, देवर संजय के साथ या अपने पति सुभाष के साथ, अपने पति के साथ तो वो तभी धोखा कर चुकी थी जब बेटे के साथ सब कुछ किया था। उसे समझ नहीं आ रहा था उसके साथ हो क्या रहा है। खैर खाना पीना हो ही रहा था कि तभी रत्ना आई।

सुधा: अरे रत्ना जीजी, आओ आओ बैठो।

रत्ना: और सब काम निपट गए?

पुष्पा: हां सब निपट गया तुम बताओ, सब हो गया।

रत्ना: हां रानी संभाल लेती है अभी तो सब।

फुलवा: चल अच्छा है बिटिया है तो तुझे थोड़ा आराम मिल रहा है।

रत्ना: हां चाची ये तो है, अरे चाची मैं कह रही थी कि आज तुम हमारे यहां सो जाती तो, भूरा के पापा भी नहीं है और राजू खेत पर है, बस भूरा है वो भी अभी बालक है।

फुलवा: हां क्यों नहीं इसमें क्या संकोच की बात, और कोई चिंता की बात तो नहीं है न?

पुष्पा: हां जीजी सब ठीक है न?

रत्ना: हां बस थोड़े अजीब और डरावने सपने आते हैं।

सुधा: कैसे सपने जीजी?

रत्ना सोच कर बोलती है: थोड़े डरावने से आते हैं और अजीब से उन्हें समझाना मुश्किल है।

फुलवा: अच्छा कोई नहीं कल सुबह ही चल मेरे साथ बहू, झाड़ा लगवा लेंगे सब सही हो जाएगा।

रत्ना को भी फुलवा की बात ठीक लगी और सोच कर बोली: ठीक है चाची, कल चलते हैं।

कुछ ही देर में फुलवा रत्ना के साथ चली गई, और घर पर बाकी लोग भी खा पी कर सोने की तैयारी करने लगे,

संजय खाना खा चुका तो सुधा उसकी थाली लेने आई तो संजय बोला: सुनो आज घर पर कोई और नहीं है तो सोच रहा हूं मैं आंगन में सो जाता हूं।

सुधा: ठीक है नीलम भी कह रही थी उसे डर लग रहा है तो वो मेरे साथ कमरे में सो जाएगी।

संजय: भाभी से भी पूछ लो अगर उन्हें डर लगे तो उन्हें भी अपने पास ही सुला लेना।

पुष्पा: पूछा मैंने वो नहीं डरती बिल्कुल, वैसे भी कमरे को खाली नहीं छोड़ सकते।

संजय: हां चलो ठीक है जैसा तुम्हे सही लगे, मेरा बिस्तर ला दो।

सुधा: नीलाम ओह नीलम अपने पापा का बिस्तर लगा दे ज़रा।

नीलम: अभी लाई मां।

सब दूध वगैरह पी कर लेट चुके थे, और कुछ तो सो भी चुके थे, पर संजय की आँखों से नींद गायब थी, उसके सामने बार बार जो कुछ दोपहर को हुआ वो आ रहा था, उसकी भाभी का कामुक बदन, उनके होंठों का रस, उनके पेट का वो मखमली स्वाद ये सोच कर ही उसके बदन में अजीब सी सिहरन हो रही थी, उसका लंड भी अकड़ रहा था, पर साथ ही वो ये भी जानता था कि कोई भी गलत कदम उसके परिवार के लिए कितना बुरा हो सकता था, उसने फिर सोचा क्यों न अपनी गर्मी सुधा पर मिटा ली जाए जब तक जाऊंगा तो ये सब विचार ही नहीं आएंगे। ये सोच वो बिस्तर से उठा और अपने कमरे की ओर बढ़ा, कमरे के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर उसने अंदर झांका तो देखा कि नीलम और सुधा दोनों ही सो चुके थे और नीलम अपनी मां से चिपक कर सो रही थी, तो सुधा को जगाने का प्रयास भी करता तो नीलम का जागना तय था।

वो बापिस अपने बिस्तर पर आ गया एक बेचैनी सी उसके मन में हो रही थी, वो फिर से लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा, करीब एक घंटा बीत गया उसे करवट बदलते बदलते पर आज नींद उसकी आंखों से भाग रही थी, बार बार उसकी भाभी का बदन उसे सोने नहीं दे रहा था, वो एक बार फिर से उठा और अपने बिस्तर से उठ खड़ा हुआ, और धीरे धीरे कुछ सोचते हुए कदम बढ़ाने लगा, पद पर इस बार उसके कदम अपनी भाभी के कमरे की ओर बढ़ रहे थे,

धीरे धीरे वो कमरे के बाहर पहुंच गया और उसने हल्का सा दरवाज़ा धकेला तो उसे खुला पाया उसने दरवाज़े को थोड़ा सा और बड़ी सावधानी से खोला उतना की जितने से वो अंदर झांक सके, उसने सिर आगे कर अंदर झांका तो सामने के नज़ारे पर उसकी आँखें जमीं रह गईं,

दिए की हल्की रोशनी में उसने देखा कि उसकी भाभी पुष्पा दरवाज़े की ओर ही करवट लेकर सो रही है, पल्लू एक ओर को ढलका हुआ है जिससे उसका मखमली पेट, गोल गहरी नाभी दिखाई दे रही है, तभी हवा का एक झोंका आता है और पुष्पा के पल्लू को और हटा देता है जिससे उसका पेट और ब्लाउज में कसी बड़ी चूची उजागर हो जाती है,



वहीं वो उसके चेहरे को देखता है जिस पर कामुक भाव हैं उसका बदन भी ऐसे हिल रहा है ऐसे मचल रहा है जैसे सपने में ज़रूर कुछ कामुक घटना को देख रही है, सोते हुए ही पुष्पा अपने होंठों को हल्का सा काटती है, जिससे संजय को अंदाज़ा हो जाता है कि पुष्पा किस तरह का सपना देख रही है।

संजय दरवाजे से झांकते हुए ये सब देखता रहता है, वो अभी भी वहीं खड़ा है शायद मन में तय कर रहा है आगे क्या करना चाहिए, मन में खयाल आता है अपने बिस्तर पर बापिस चला जाए, पर सामने पुष्पा का बदन उसे जाने से रोक रहा है। संजय फिर से सोच में पड़ जाता है उसके कदम कुछ पीछे होते है पर फिर अगले ही पल वो कमरे के अंदर घुस जाता है और किवाड़ अंदर से बंद कर लेता है सावधानी से, धीरे से वो पुष्पा के पास आता है पुष्पा अभी भी सपनों की दुनिया में खोई हुई है, संजय पास आकर धीरे से है हाथ बढ़ाता है उसका हाथ आगे जाते हुए कांप रहा है थोड़ा आगे बढ़ा कर वो हाथ को बापिस खींच लेता है,

और अपने फैसले पर दोबारा सोचने लगता है, कुछ पल बाद फिर से हाथ बढ़ाता है और बहुत धीरे से पुष्पा का पल्लू पकड़ लेता है और उसके सीने और पेट से हटा देता है एक बार फिर से पुष्पा का पूरा पेट और ब्लाउज़ से झांकती उसकी चूचियां संजय की आंखों के सामने होती हैं वो पुष्पा के बगल में बिस्तर पर बहुत आराम से चढ़ जाता है और धीरे से अपने हाथ को पुष्पा के पेट पर रखता है, उसके पेट का स्पर्श पाते ही मानो संजय के बदन में बिजली दौड़ जाती है उत्तेजना की, वो अगले ही पल सब मर्यादा और डर भूलने लगता है और पुष्पा के ऊपर झुकता चला जाता है, उसके पेट को सहलाते हुए वो चूमने लगता है, और अपनी प्यास को पुष्पा के बदन से मिटाने की कोशिश करने लगत है।



पुष्पा जो कामुक सपने देख रही थी उसे ये भी सपने का हिस्सा ह

हिस्सा समझती है और संजय पुष्पा की ओर से विरोध न देख इसे आगे के लिए अच्छा संकेत समझता है और उत्तेजित होकर पुष्पा के मखमली पेट और कमर को मसलने लगता है जो पुष्पा की नींद की अवस्था के लिए भी थोड़ा ज़्यादा हो गया और पुष्पा की आंख खुल जाती है, वो चौंक कर देखती है और पाती है कि उसके बदन से कोई खेल रहा है और जैसे ही चेहरा दिखता है वो थोड़ा चौंकती है अपने देवर को देख कर।

वो पल भर के लिए सुन्न रह जाती है और समझ नहीं पाती क्या करे, उसका बदन उसकी उत्तेजना उसके देवर के द्वारा उसके बदन को मसले जाने पर कुछ अलग ही आनंद में मचलने लगते हैं, वो समझ नहीं पाती क्या करूं? रोकूं देवर को या नहीं, दिमाग कहता है रोक ले इस महापाप को होने से, इससे बहुत से रिश्ते पूरा परिवार बिखर सकता है, तो बदन और मन कह रहा था इतने दिनों से जो प्यासी है वो प्यास बुझा ले, कब तक तड़पाएगी खुद को।

पुष्पा कुछ सोच कर अपने हाथ बढ़ाती है और संजय का सिर अपने पेट पर पकड़ लेती है और उसे खींच कर ऊपर लाती है, अपने चेहरे के सामने, संजय पुष्पा को जागते हुए देखता है तो घबरा जाता है उसे सब खराब होता नज़र आने लगता है, पुष्पा उसकी आंखों में देख कर ना में सिर हिलाती है,

पुष्पा: देवर जी नहीं, जाओ यहां से।

संजय: भाभी मैं वो।

पुष्पा: सब के लिए यही अच्छा हो..

पुष्पा इतना ही बोल पाती है कि संजय अपने होंठों को उसके होंठों पर रख देता है और चूसने लगता है, पुष्पा थोड़ा मचलती है पर वो बिना फिक्र के अपनी भाभी के होंठों को चूसने लगता है, कुछ ही पलों में संजय को हैरानी होती है। जब पुष्पा उसका साथ देने लगती है, पुष्पा भी उतनी ही उत्तेजित थी शायद ज़्यादा संजय को रोकने की कोशिश उसकी आखिरी कोशिश साबित होती है खुद को रोकने की भी और अब वो भी खुल कर संजय का साथ दे रही होती है, संजय अपनी भाभी का साथ पाकर और मस्त हो जाता है और उसके रसीले होंठों का रस दोपहर के बाद दोबारा पीने लगता है।

कुछ देर बाद होंठ अलग होते हैं दोनों हाँफ रहे होते हैं पर उत्तेजना कम नहीं होती, संजय पुष्पा की गर्दन को चूमते हुए नीचे सरकता है और पुष्पा के ब्लाउज में से झांकती मोटी चूचियों के बीच अपना मुंह घुसा कर चाटने लगता है।



पुष्पा: आह देवर जी उम्म आह

संजय: अहम्म भाभी उम्म।

संजय पुष्पा के बदन को लगातार चाटते हुए आहें भरते हुए कहता है, साथ ही उसके हाथ ब्लाउज के ऊपर से ही पुष्पा की मोटी और कोमल चूचियों को दबा रहे थे,

दोनों की उत्तेजना की सीमा नहीं थी, पुष्पा को तो जैसे ऐसा लग रहा था जैसे कितने समय की प्यास आज मिट रही थी, बदन की गर्मी को संजय का साथ मिटा रहा था, वहीं संजय तो अपनी भाभी का बदन पाकर जन्नत में था, और उसके कामुक बदन को भोग रहा था,

चूचियों के बाद संजय नीचे सरकता है और अपने होंठ पुष्पा के पेट पर रख लेता है और पागलों की तरह उसे चाटने चूमने लगता है, उसके हाथ पुष्पा की केले के तने जैसी जांघों पर घूमने लगते हैं और वो धीरे धीरे से पुष्पा की साड़ी और पेटीकोट को ऊपर सरकाने लगता है और घुटनों के ऊपर ले आता है, पुष्पा की गोरी टांगें और जांघों का कुछ हिस्सा दिए की रोशनी में चमकने लगता है, पुष्पा के मुंह से लगातार सिसकियां निकल रही है उसके हाथ लगातार संजय के सिर और पीठ पर चल रहे हैं।

पुष्पा: आह संजय, ओह देवर जी ऐसे ही आह।

संजय तो जैसे सब कुछ भूल चुका था उसे अभी बस अपनी भाभी का कामुक बदन नज़र आ रहा था, जिसका स्वाद वो लेने की हर पूरी कोशिश कर रहा था, कभी उसके पेट को चाटता तो कभी नाभी में जीभ डाल कर चूसता तो कभी उसके पेट की मखमली त्वचा को अपने चेहरे पर महसूस करता।



उसके नीचे पड़ी पुष्पा उसकी हरकतों से मचल रही थी, संजय की उत्तेजना अब बढ़ती जा रही थी पर वो पुष्पा के बदन को बहुत धीरज के साथ भोग रहा था, मानो उसके एक एक अंग का स्वाद लेना चाहता हो।

पेट को चूसते हुए ही उसके हाथ पुष्पा की साड़ी में चलने लगे और उसने जल्दी ही पुष्पा की साड़ी को बिस्तर के नीचे फेंक दिया अब पुष्पा नीचे सिर्फ पेटीकोट में थी और वो भी उसकी जांघों में इक्कठा हो रखा था।

बाहर दिन में हुईं बारिश के कारण मौसम ठंडा था, ठंडी हवा चल रही थी, पर कमरे के अंदर उतनी ही गर्मी हो रही थी,दोनों बदन मिल कर गर्मी को और बढ़ा रहे थे,

संजय ने हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया और खुद भी ऊपर आया और एक बार फिर से पुष्पा के होंठों को चूसने लगा वहीं उसके हाथ पुष्पा के ब्लाउज़ के बटनों को खोलने लगे, जल्दी ही सारे बटन खुल गए तो संजय ने अपने होंठ अलग किए और फिर नीचे सरक कर अपने चेहरे को पुष्पा की छाती के सामने लाया और फिर धीरे से दोनों पाटों को अलग किया तो पुष्पा की मोटी और बड़ी चूचियां उसके सामने आ गईं जिन्हें देख उसकी आँखें चौड़ी हो गईं उसने कुछ ही पलों में ब्लाउज़ को भी उसके बदन से अलग कर नीचे साड़ी के पास फेंक दिया,

पुष्पा के बदन पर सिर्फ पेटीकोट था जो उसकी जांघों तक सिमटा हुआ था, पुष्पा के नंगे चूचों को देख कर संजय भूखे की तरह उन पर टूट पड़ा और मसलते हुए उन्हें चूसने लगा, पुष्पा उसकी हर हरकत से मछली की तरह मचल रही थी, कभी चूची को चूसता तो कभी पेट को चाटता वहीं उसके हाथ पुष्पा के पेट से लेकर जांघों और फिर उसकी चूत के आस पास घूम रहे थे जिससे पुष्पा और मचल रही थी।



पुष्पा के बदन से खेलते हुए ही संजय ने अपने कपड़े निकालने भी शुरू कर दिए और जल्दी ही पूरा नंगा हो गया था, उसका लंड बिलकुल अकड़ कर खड़ा था और पुष्पा के नंगे बदन को देख देख ठुमके मार रहा था, खुद नंगा होकर संजय ने पुष्पा के पेटीकोट को भी उसके बदन से दूर कर दिया, अब दोनों देवर भाभी नंगे थे एक दूसरे के सामने एक ही बिस्तर पर, दोनों के ही साथी इस बात से अनजान थे,

संजय की पत्नी तो उनसे कुछ दूर दूसरे कमरे में आराम से सो रही थी इस बात से बेखबर कि उसका पति और उसकी जेठानी एक ऐसे रास्ते पर थे जो उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल सकता था, वहीं उनसे मीलों दूर पुष्पा का पति सुभाष मंडी में गोदाम के बाहर बोरे बिछा कर सो रहा था उसके साथ उनका बेटा छोटू और संजय का बेटा राजेश भी था, सब लोग कमरे में चल रहे काम के खेल से अनजान हो कर सो रहे थे।

संजय ने फिर अपने लंड को पकड़ा और पुष्पा की टांगों को फैलाकर उनके बीच जगह ली, और अपने लंड को पुष्पा की चूत पर रखा, पुष्पा की गरम गीली चूत पर लंड का स्पर्श होते ही दोनों के मुंह से आह निकल गई,

संजय: आह भाभी मैंने इस पल के बारे में न जाने कितनी बार सोचा है,

पुष्पा: क्या सच में तुम पहले से ये सब करना चाहते थे मेरे साथ?

संजय: हां भाभी जबसे तुम ब्याह के घर में आई तब से ही, पर संस्कारों और मर्यादा के चलते ये सब छुपा कर रखा हमेशा हमेशा खुद को रोक लिया,

संजय अपने लंड को पुष्पा की चूत पर घिसते हुए कहता है।

पुष्पा: अब आह अब रुकने की जरूरत नहीं है देवर जी, आह घुसा दो और पूरी कर लो अपनी इच्छा,

संजय: हां भाभी अब नहीं रुकूंगा।

ये कह संजय क़मर को झटका देता है और उसका लंड पुष्पा की गरम चूत में समा जाता है, दोनोके मुंह से गरम आहें निकलने लगती हैं, दोनों इस अदभुत पल के अहसास को इस आनंद को अपने अंदर समाने लगते हैं, इस अनैतिक संबंध की सोच इस वर्जित संबंध का अहसास उन्हें और उत्तेजित कर रहा था, संजय धीरे धीरे पुष्पा की चूत में धक्के लगाने लगता है पुष्पा हर धक्के पर सिसकने लगती है, हर पल के साथ संजय के धक्कों की गति बढ़ती जाती है, और कुछ ही देर में संजय ताबड़तोड़ धक्कों के साथ अपनी भाभी को चोद रहा था, पुष्पा की लगातार आहें और सिसकियां निकल रही थी



पुष्पा कभी उत्तेजित होकर अपनी चूचियां मसलती तो कभी संजय का हाथ पकड़ कर उसे थोड़ा धीरे करने को कहती पर संजय तो जैसे एक अलग ही दुनिया में था, इतना उत्तेजित वो कभी नहीं हुआ था, ऐसा आनंद उसे कभी नहीं आया था जो उसे अपनी भाभी की चूत में मिल रहा था, वो चाहता भी तो अब खुद को नहीं रोक सकता था, उसकी कमर मशीन की तरह आगे पीछे हो रही थी और उसका लंड उसकी भाभी की चूत में अंदर बाहर हो रहा था,

शहर में सुभाष और छोटू चैन से सो रहे थे इस बात से बेखबर होकर कि गांव में उनकी पत्नी और मां नंगी होकर, उनके भाई या चाचा से चुद रही थी। शहर में भी ऐसा नहीं था जो हर कोई सो रहा था, संजय जहां गांव में जाग रहा था तो उसका बेटा राजेश भी सो नहीं पा रहा था, उसे नींद नहीं आ रही थी, उसकी आंखों के सामने कुछ दृश्य बार बार आ रहे थे, वो दृश्य पुराने नहीं थे बल्कि आज शाम के ही थे जब वो छोटू और सत्तू शहर घूम कर बापिस आ रहे थे तो सत्तू और छोटू खाना लेने के लिए ढाबे पर रुक गए थे और वो मंडी में चला आया था, उसने इधर उधर देखा तो उसे अपने ताऊ यानि सुभाष और सत्तू की मां झुमरी कहीं नहीं दिखाई दी वो गोदाम के पास पहुंचा तो देखा कि उसके किवाड़ लगे हुए थे, पर उसे अंदर से हल्की हल्की आवाज़ आ रही थी, राजेश ने पास जाकर किवाड़ को ध्यान से देखा तो उसे एक छोटा सा छेद दिखा,उसने इधर उधर नज़र दौड़ाई की कोई उसे देख तो नहीं रहा और फिर अपनी आंख उस छेद पर लगा दी और जो उसे अंदर दिखा उसे देख वो चौंक गया। अंदर उसके ताऊजी सत्तू की मां को नीचे लिटाकर चोद रहे थे। ये सब देख राजेश तब से सोच में था उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे, क्या किसी को बताए इस बारे में, क्या सत्तू को? नहीं नहीं गड़बड़ हो जाएगी, क्या छोटू को? पर कैसे? साथ ही उसका जवान बदन ये नज़ारा सोच सोच कर उत्तेजित भी हो रहा था।

इधर गांव में संजय के धक्के बिल्कुल लगभग बेकाबू हो गए थे और वो गुर्राते हुए पुष्पा की चूत में झड़ रहा था, पुष्पा भी इस तगड़ी चुदाई के दौरान झड़ चुकी थी, और अभी अपनी चूत में अपने देवर के रस को भरता हुआ महसूस कर रही थी, संजय झड़ने के बाद पुष्पा के ऊपर ही पसर गया और कुछ देर यूं ही लेटा रहा और जब पुष्पा ने उससे कहा वो दब रही है तो वो उसके ऊपर से हटा और उसका लंड भी पुष्पा की चूत से निकल गया, दोनों लेट कर हांफने लगे। धीरे धीरे शांत होने पर दोनों के अब दिमाग में चलने लगा कि उन्होंने अभी क्या किया है, और ग्लानि के भाव आने लगे, अक्सर ऐसा होता है वासना के बादल हटने पर सच्चाई की धूप अक्सर ग्लानि की गर्मी में लोगों को जलाती है। यही दोनों के साथ हो रहा था।

संजय ने पुष्पा की ओर देखा तो वो छत की ओर खुली आंखों से देखे जा रही थी, उसकी मोटी चूचियां उसकी सांसों के साथ ऊपर नीचे हो रहीं थीं, संजय ने उसकी ओर करवट ली और अपना हाथ उसने पुष्पा के पेट पर रखा, जिसे रखते ही पुष्पा ने उसे अपने ऊपर से झटक दिया, जिससे संजय को हैरानी हुई।

पुष्पा: अब जाओ संजय।


पुष्पा बिना उसकी ओर देखे बोली, संजय को भी यही सही लगा, अभी इस हालत में उसे अकेला ही छोड़ देना सही होगा, संजय उठा और अपने कपड़े पहन कर बाहर से किवाड़ भिड़ा कर चला गया, पुष्पा अभी भी छत की ओर देखे जा रहीथी और फिर अचानक उसके होंठों पर एक शरारती मुस्कान तैर गई।

जारी रहेगी।
 
मित्रों एक हफ्ते थोड़ा व्यस्त हूं तो अगला अध्याय दोनों ही कहानियों पर थोड़ा देर से आयेगा बीच में समय मिला तो अवश्य कोशिश करूंगा।

बहुत बहुत धन्यवाद
 
अध्याय 25
पुष्पा बिना उसकी ओर देखे बोली, संजय को भी यही सही लगा, अभी इस हालत में उसे अकेला ही छोड़ देना सही होगा, संजय उठा और अपने कपड़े पहन कर बाहर से किवाड़ भिड़ा कर चला गया, पुष्पा अभी भी छत की ओर देखे जा रहीथी और फिर अचानक उसके होंठों पर एक शरारती मुस्कान तैर गई। अब आगे...

अगली सुबह गांव में पक्षियों की चहचहाहट के साथ दिन की शुरुआत हुई। सूरज की पहली किरणें धीरे-धीरे खेतों पर पड़ रही थीं, और गांव के लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो गए थे। कुछ लोग हाथ में लोटा लिए नहाने जा रहे थे, तो कुछ खेतों की ओर बढ़ रहे थे। उसी बीच लता, रत्ना, पुष्पा और सुधा—चारों औरतें—हाथ में लोटा लिए बातें करती हुई नल की ओर चल पड़ीं।



उनकी बातें मज़ाकिया थीं—किसी की सास की शिकायत से लेकर गांव की नई-नई खबरों तक—पर रत्ना और खासकर पुष्पा के मन में अंदर ही अंदर एक अजीब-सी बेचैनी चल रही थी। रत्ना के सपनों का बोझ और पुष्पा की रात की घटना—दोनों अपने-अपने द्वंद्व में डूबी थीं, पर चेहरों पर मुस्कान बनाए रखी। जल्दी ही चारों ने नल से हाथ धोकर अपने-अपने घरों की ओर रुख किया, और दिन की दिनचर्या शुरू हो गई।

रत्ना के घर में माहौल सामान्य था, लेकिन उसका मन आज भी अशांत था। रात को उसने फिर से वही सपना देखा था—जिसमें वो और उसकी बेटी रानी नंगी थीं, भूरा और राजू उसे चोद रहे थे, और राजकुमार रानी को। ये सपने उसे अंदर से खाए जा रहे थे। वो समझ नहीं पा रही थी कि ये अंधविश्वास है या कोई संकेत।

इसी बीच रानी ने उसकी तंद्रा तोड़ी, "मां, जब तक भूरा और राजू आएं, तुम नहा लो। मैं चाय चढ़ा देती हूं।"

रत्ना ने सिर हिलाया और नहाने के लिए साड़ी उतारकर नल की ओर चल दी, सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में।

भूरा और लल्लू साथ में शौच से लौट रहे थे। भूरा ने बात शुरू की, "वैसे छुटुआ के बिना अजीब लगता है न?"

लल्लू, जो अपनी सोच में डूबा था—नंदिनी के साथ कल की घटना और उनकी आंखमिचौली—ध्यान वापस लाते हुए बोला, "हां यार, हम हर काम साथ में ही करते हैं न इसलिए।"

उसके दिमाग में नंदिनी के स्पर्श और उनके चूमने का आनंद घूम रहा था, हालांकि कल शाम के बाद उन्हें अकेला वक्त नहीं मिला था।

भूरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "पर न जाने कब हम लोग साथ में वो करेंगे जो सोचा है।" लल्लू एक पल के लिए असहज हुआ, मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो, लेकिन फिर हंसते हुए बोला, "हां यार, उसी पल की तो राह देख रहा हूं।"

तीनों दोस्तों—भूरा, लल्लू और छोटू—ने मिलकर अपनी मांओं को चोदने की योजना बनाई थी, लेकिन लल्लू अभी नंदिनी के साथ हुए अपने अनुभव को साझा करने के लिए सहज नहीं था। बातों-बातों में दोनों घर की ओर बढ़े।

भूरा अपने घर में घुसा और नल के पास अपनी मां रत्ना को देखकर ठिठक गया। रत्ना झुकी हुई नल चला रही थी, उसका ब्लाउज और पेटीकोट में लिपटा हुआ बदन—चौड़े चूतड़ उभरे हुए, कमर की कामुक सिलवटें—भूरा के सामने था। उसका लंड तुरंत सिर उठाने लगा। वो दरवाजे के पास रुककर इस नजारे को देखने लगा, उसकी सांसें तेज हो रही थीं।



रत्ना अभी भी सपनों में खोई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये सपने क्यों आते हैं—क्या ये उसकी वासना है या किसी बुरी आत्मा का प्रभाव? इसी बीच रानी बाहर आई और चिल्लाई, "मां ओ मां? ये क्या कर रही हो?"

रत्ना चौंकी, "हैं? का क्या हुआ?" रानी हंसी, "अरे नल चलाए जा रही हो, पर नीचे बाल्टी तो लगाओ, खाली ही चला रही हो!" रत्ना का ध्यान टूटा, और वो रुक गई।

रानी की आवाज सुनकर भूरा भी सावधान हो गया और बिना मां की ओर देखे घर में घुस गया, ताकि रानी को शक न हो।

लल्लू के घर में माहौल साधारण था, लेकिन हवा में एक अनकही उत्तेजना थी। नंदिनी और लल्लू एक-दूसरे से नजरें मिला रहे थे, जैसे नए-नए प्रेमी हों। नंदिनी को भी इस आंखमिचौली में मजा आ रहा था, और उसका दिल तेज धड़क रहा था। लता बीच-बीच में अपने बेटे को देख रही थी। जब से उसने लल्लू का लंड देखा था, वो ख्याल उसके दिमाग में घूम रहा था। वो जानती थी कि ये गलत है, लेकिन उसकी ममता और उत्तेजना के बीच एक अजीब सा संघर्ष चल रहा था।

फुलवा के घर पर भी चाय की चुस्कियां चल रही थीं। जो भी घर पर थे, वो अपने-अपने काम में लगे थे, लेकिन हवा में एक तनाव था। पुष्पा अपने देवर संजय से आंखें नहीं मिला रही थी, रात की घटना—उनकी चुदाई—उसके दिमाग में घूम रही थी। संजय अपनी भाभी के बदन को छुप-छुपकर देख रहा था, उसकी चाहत और ग्लानि के बीच झूल रहा था। सुधा और बाकी लोग इस सब से अनजान थे।

सुधा ने पूछा, "ठीक से सोईं अम्मा तुम उनके यहां?"

फुलवा हंसी, "हां, हम तो ठीक से सोएं, हमें किसका डर?"

नीलम ने पूछा, "और रत्ना ताई?" फुलवा बोली, "उसको मन में डर बैठ गया है, बोला है आज उसे झाड़ा लगवाने ले जाऊंगी।"

पुष्पा ने सहमति दी, "हां अम्मा, बेचारी को आराम मिल जाए तो अच्छा है।"

शहर

शहर में मंडी में सुबह का समय शुरू हो चुका था। लोग अपने-अपने काम में लगे थे। राजेश काम करते हुए बीच-बीच में झुमरी और सुभाष को ताक रहा था, कल शाम की घटना—उनकी चुदाई—उसके दिमाग में थी। छोटू मंडी में आने-जाने वाली औरतों को देख रहा था, और सत्तू का ध्यान भी इसी ओर था। मंडी में सुबह और शाम को ही ज्यादा भीड़ होती थी, लेकिन 10 बजे तक ग्राहक कम हो गए थे।

सत्तू ने अपनी मां से कहा, "मां, अब काम भी कम है, तुम जाकर दवाई क्यों नहीं ले आती अपनी?"

झुमरी ने टालमटोल की, "मैं अकेली कैसी जाऊंगी?"

सत्तू बोला, "अब दुकान छोड़ मैं नहीं जा सकता, एक काम करो, छोटू या राजेश में से किसी को ले जाओ।"

झुमरी ने कहा, "अरे छोड़, दवाई की जरूरत नहीं है मुझे।"

सत्तू ने सख्ती से कहा, "मां उल्टी बात मत करो, अब आई हो शहर तक तो ले लो दवाई, नहीं तो फिर तुम्हारा रक्तचाप बढ़ जाता है। तुम बैठो, अभी आया।"

सत्तू तुरंत उठा और सुभाष को बताने गया। सुभाष ने कहा, "हां, भेज दे, अभी इतना काम भी नहीं है।"

सत्तू ने पूछा, "तो बताओ, तुम दोनों में से कौन जाएगा मां के साथ?"

छोटू बोला, "भैया, मैं चला तो जाऊं, लेकिन पहली बार आया हूं, बस का रास्ता नहीं पता।" सत्तू हंसा, "तू छोड़, तू बावरा है। राजेश, तू चल, मैं तुझे सब समझा देता हूं।" राजेश ने हामी भरी और सत्तू की बात ध्यान से सुनी।

कुछ देर बाद राजेश और झुमरी बस अड्डे पर खड़े थे। अस्पताल शहर के दूसरी ओर था, इसलिए उन्हें बस से जाना था।

दोनों बस का इंतजार कर रहे थे। राजेश झुमरी के साथ चलते हुए थोड़ा असहज था, क्योंकि उसकी नजरें अनजाने में झुमरी के बदन पर चली जाती थीं—उसकी साड़ी में लिपटी कमर और चूचियों का उभार, कल उसे उसने जिस तरीके से देखा था अपने ताऊ के साथ वो सब दिमाग में घूम रहा था। झुमरी को इसकी भनक नहीं थी, वो बस अपने रक्तचाप की दवा के बारे में सोच रही थी।

बस में सवार होते ही राजेश और झुमरी को भीड़ का सामना करना पड़ा। सुबह का समय था, और शहर की सड़कों पर लोग अपने-अपने कामों की ओर दौड़ रहे थे।

बस में जगह की कमी थी, सीट तो दूर की बात, खड़े होने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ी। किसी तरह दोनों आगे बढ़े और बस के बीच में जाकर खड़े हो गए। झुमरी आगे थी, और राजेश उसके ठीक पीछे खड़ा था। अगले अड्डे पर बस रुकी, और भीड़ और बढ़ गई। धक्का-मुक्की में राजेश पीछे से झुमरी से चिपक गया, जबकि झुमरी को भी मजबूरी में पीछे की ओर झुकना पड़ा। उसने चेहरा घुमा कर राजेश को देखा और हल्के गुस्से से बोली, "आराम से खड़ा है न लल्ला?"

राजेश ने तुरंत जवाब दिया, "हां ताई, ठीक से खड़ा हूं।"

इसी बीच एक जोर का धक्का आया। खुद को और झुमरी को गिरने से बचाने के चक्कर में राजेश का हाथ अनजाने में झुमरी की कमर पर चला गया, और उसने उसे सहारा देने के लिए पकड़ लिया। झुमरी को ये अजीब नहीं लगा; उसने सोचा शायद भीड़ की वजह से ऐसा हुआ, और वो ऐसे ही खड़ी रही।

लेकिन राजेश के लिए ये स्पर्श एकदम अलग था। जैसे ही उसके हाथों में झुमरी की कामुक कमर का स्पर्श हुआ, कल शाम के दृश्य—गोदाम में सुभाष और झुमरी की चुदाई—उसके दिमाग में फिर से कौंध गए। ये सब सोचते हुए और झुमरी के इतने करीब होने से उसके बदन में सनसनी दौड़ गई। पैंट के अंदर उसका लंड कड़क होने लगा और कुछ ही पलों में पूरी तरह तन गया।

अगला धक्का आते ही झुमरी को अपने चूतड़ों के बीच कुछ चुभने का आभास हुआ। वो हैरान रह गई और समझ गई कि ये क्या है। उसने तुरंत पलट कर देखा, और उसकी नजरें राजेश की नजरों से टकराईं। लेकिन शर्मिंदगी में उसने तुरंत चेहरा आगे कर लिया। राजेश का हाथ अभी भी उसकी कमर पर था, और बस के हिलने-डुलने के साथ उसका लंड झुमरी के चूतड़ों में चुभ रहा था। राजेश ने जब झुमरी की ओर से कोई विरोध नहीं देखा, तो उसकी हिम्मत बढ़ गई।

उसने अपना चेहरा झुमरी के चेहरे के पास लाया और फुसफुसाते हुए बोला, "ताई, मज़ा आ रहा है ना, शहर में घूमने में?"

झुमरी इस बात से हैरान थी—एक ओर उसका लंड उसके चूतड़ों में बार-बार चुभ रहा था, और दूसरी ओर राजेश इतने बेशर्मी से बात कर रहा था, मानो कुछ हो ही नहीं रहा हो।

इसी बीच राजेश थोड़ा सा पीछे हिला और फिर अपने लंड को झुमरी के चूतड़ों की दरार के बीच सटा दिया। झुमरी की आंखें चौड़ी हो गईं। ये सब उसके लिए बहुत ज्यादा हो गया। गुस्से से उसने राजेश को देखा और धीरे से फुसफुसाई, "राजेश, ये क्या कर रहा है तू, नाशपीटे!" साथ ही उसने गुस्से में राजेश का हाथ अपनी कमर से झटक दिया।

झुमरी के गुस्से से राजेश एक पल के लिए घबरा गया और चुप हो गया। लेकिन कुछ देर सोचने के बाद उसने फिर हिम्मत जुटाई और दोबारा अपना हाथ झुमरी की कमर पर रख दिया। झुमरी ने गुस्से से उसे देखा, लेकिन इससे पहले कि वो कुछ बोलती, राजेश ने उसके कान में फुसफुसाया, "कल शाम को गोदाम में अच्छे से आराम किया था ना ताई? ताऊजी के साथ?"

ये सुनते ही झुमरी का सिर घूम गया। उसकी आंखें बड़ी हो गईं, और उसे समझ नहीं आया कि ये क्या हुआ और अब क्या करे। उसकी दुनिया पल भर में उलट गई। वो चुपचाप खड़ी रही, मन में शर्मिंदगी और डर का मेल था।



आगे दवाई लेने से लेकर वापस आने तक झुमरी ने राजेश से एक शब्द नहीं बोला। उसका चेहरा उतरा हुआ था, जैसे कोई भारी बोझ उस पर डाल दिया गया हो।

वहीं राजेश के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी—वो खुद को इस हिम्मत के लिए शाबाशी दे रहा था। दोनों दवाई लेकर शाम तक मंडी में वापस आ गए।

सत्तू ने अपनी मां का चेहरा देखा और चिंता से पूछा, "अरे मां, क्या हुआ? कुछ परेशान लग रही हो?"

झुमरी ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ नहीं लल्ला, शायद थकावट की वजह से लग रहा होगा।"

सत्तू ने कहा, "कोई बात नहीं, काम खत्म हो चुका है, थोड़ी देर में निकल लेंगे गांव के लिए। क्यों चाचा?" सुभाष ने हामी भरी, "हां और क्या, बस खाली बोरे इकट्ठे करो और सब लपेटो।"

राजेश और छोटू तुरंत काम में जुट गए, जबकि सत्तू और सुभाष भी मदद करने लगे। झुमरी को बार-बार राजेश की नजरें अपने ऊपर महसूस हो रही थीं, और उसकी चिंता बढ़ती जा रही थी। राजेश मन ही मन सोच रहा था कि आज उसने हिम्मत दिखाई, और अब झुमरी उसके वश में लग रही थी। बस अब उसे समझदारी से आगे बढ़ना था।

अंधेरा होने तक मंडी का काम खत्म हो गया, और दो नावें गांव की ओर चल पड़ीं। एक नाव में सुभाष और छोटू थे, जबकि दूसरी में झुमरी, सत्तू और राजेश। हर नाव के लिए दो चप्पू चलाने वालों की जरूरत थी, और राजेश ने खुद कहा था कि वो सत्तू के साथ जाएगा। नाव में झुमरी राजेश से नजरें बचाने की कोशिश कर रही थी, उसका मन अशांत था। वो सत्तू के साथ बातें कर रही थी, लेकिन उसकी नजरें बार-बार राजेश की ओर चली जाती थीं, जो चप्पू चलाते हुए उसे देख रहा था।

सत्तू ने बात शुरू की, "मां, दवाई ले ली ना? अब ठीक लग रहा है?"

झुमरी ने हल्का सा सिर हिलाया, "हां लल्ला, ठीक है।" लेकिन उसका मन कहीं और था। राजेश की शरारती मुस्कान और उसकी बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं। नाव की हल्की लहरों के साथ उसकी चिंता भी बढ़ रही थी, और वो सोच रही थी कि इस घटना का क्या हश्र होगा।

राजेश, दूसरी ओर, मौके की तलाश में था, लेकिन अभी चुपचाप चप्पू चलाता रहा, अपने अगले कदम की योजना बनाते हुए।

दूसरी ओर गांव में, नहा-धोकर रत्ना और फुलवा केला बाबा की झोपड़ी की ओर चल पड़ीं। सुबह की ठंडी हवा और खेतों की सोंधी महक उनके साथ थी, लेकिन रत्ना के मन में भारीपन था। फुलवा ने उसे हौसला देते हुए कहा, "तू घबरा मत बहू, एक बार झाड़ा लग जाएगा तो सब सही हो जाएगा।"

रत्ना ने थकी आवाज में जवाब दिया, "ऐसा ही हो चाची, मेरा तो सिर घूमता रहता है सोच-सोच कर।"

दोनों जल्दी ही केला बाबा की झोपड़ी में पहुंच गईं। रत्ना ने उनके सामने आते ही पल्लू कर लिया, सम्मान और डर के मिश्रण में।

केला बाबा ने फुलवा को देखा और पूछा, "क्या हुआ अम्मा, बताओ?"

फुलवा ने जवाब दिया, "अरे बाबा, ये बहुरिया को रात को अजीब-अजीब सपने आते हैं, जबसे राजकुमार के बाबा सिधारे हैं।"

केला बाबा ने रत्ना की ओर देखा और पूछा, "अच्छा बहू, किस तरह के सपने? कुछ बता सकती हो?"

रत्ना ने धीरे से कहा, "हर बार अलग-अलग तरह के होते हैं, ऐसे जो सच्चाई से बिल्कुल उलट हैं। सपनों से फिर घबराहट होने लगती है और नींद भी नहीं आती।" उसने अपने सपनों का असली विवरण छिपा लिया, शर्मिंदगी और डर के मारे।

केला बाबा ने गंभीरता से कहा, "अच्छा, वैसे अभी तुम्हारे घर में एक मृत्यु हुई है, वो भी अकाल मृत्यु। तो कभी-कभी उनकी आत्माएं हमें सपनों में संकेत देती हैं, जैसे उनकी कुछ आखिरी इच्छाएं जो अधूरी रह गई हों।"

ये सुनकर रत्ना थोड़ी डर गई और मन ही मन सोचने लगी—क्या प्यारेलाल की आत्मा सचमुच उसे कुछ कहना चाहती है?

फुलवा ने पूछा, "तो ऐसे में हमें क्या करना चाहिए बाबा?"

केला बाबा बोले, "कोशिश तो ये करनी चाहिए कि जो आत्मा चाह रही है, वो करो और उसकी इच्छा पूरी करो।"

रत्ना ने घबराते हुए पूछा, "बाबा, और वो पूरी न हो सके तो?"

केला बाबा ने शांत स्वर में कहा, "कोई घबराने की बात नहीं है बहू, सपने ही तो हैं। मैं एक पुड़िया देता हूं, सोने से पहले ले लेना तो नींद आ जाएगी।"

फुलवा ने जोड़ा, "एक बार झाड़ा भी लगादो बाबा।"

केला बाबा ने सहमति दी, "ठीक है, अभी लगा देता हूं।"

झाड़ा लगवाकर दोनों घर की ओर चल पड़ीं। फुलवा ने रत्ना को दिलासा दिया, "परेशान मत हो बहू, अब सब ठीक हो जाएगा।"

रत्ना ने ऊपरी मन से कहा, "हां अम्मा," लेकिन उसके मन में वही सवाल घूम रहे थे—क्या प्यारेलाल की अधूरी वासना उसके सपनों में दिख रही है? ये सोचते हुए वो घर पहुंची। फुलवा थोड़ी देर उसके पास बैठी और फिर अपने घर चली गई, छोड़कर रत्ना को अपने विचारों के साथ अकेला।

फुलवा के घर में सुबह का माहौल सामान्य था। सब लोग नहा-धोकर अपने काम पर निकल गए थे। फुलवा रत्ना के घर के लिए चली गई थी, संजय खेतों की ओर चला गया था, और नीलम सिलाई सीखने चली गई थी।

घर पर अब सिर्फ सुधा और पुष्पा—दोनों देवरानी-जेठानी—ही थीं। सुधा हमेशा की तरह चुलबुली थी, लेकिन पुष्पा थोड़ी चुपचाप थी। उसका मन रात की घटना—संजय के साथ चुदाई—से भरा था। उसे ग्लानि हो रही थी कि वो अपनी देवरानी सुधा के साथ धोखा कर रही है। वो सोच में डूबी घर के काम निपटा रही थी।

सुधा ने उसकी इस हालत को देखा और चेहरे पर एक शरारती मुस्कान लाकर दबे पांव उसके पीछे गई। उसने पुष्पा के पेट को हाथों से पकड़ा और उसकी गर्दन को चूमने लगी। पहले तो पुष्पा चौंकी, लेकिन फिर समझ गई कि सुधा है। सुधा के स्पर्श से उसके बदन में सिहरन दौड़ गई, और आंखें हल्की-हल्की बंद हो गईं। वो सुधा के स्पर्श का आनंद लेने लगी।



पुष्पा का दिमाग तेजी से चल रहा था, और तभी उसे एक योजना सूझी। उसने पलट कर सुधा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। दोनों के बीच एक कामुक और जोशीला चुम्बन शुरू हो गया। दोनों एक-दूसरे के होंठों को प्यासे की तरह चूसने लगीं।




पुष्पा के हाथ सुधा के बदन पर चल रहे थे और उसके कपड़ों को खोल रहे थे। सुधा पुष्पा की आक्रामकता से हैरान थी, लेकिन उसे मजा भी आ रहा था। कुछ ही देर में सुधा आंगन में बिल्कुल नंगी खड़ी थी। पुष्पा ने उसके होंठों को छोड़ा और उसकी चूचियों पर टूट पड़ी।

सुधा के लिए ये एक नया एहसास था—आंगन में खुले में नंगी होना उसे उत्तेजित कर रहा था, और पुष्पा की चूसाई उसे और गर्म कर रही थी। चूचियों के बाद सुधा ने पुष्पा को अलग किया और अब खुद पुष्पा के कपड़े उतारने लगी। कुछ पलों में पुष्पा भी नंगी हो गई। सुधा ने भी पुष्पा की चूचियों पर हमला बोला और उन्हें चूसने लगी। पुष्पा आंखें बंद कर सुधा के चेहरे और पीठ को सहला रही थी।

सुधा ने अपनी जेठानी की चूचियों को मन भर के चूसा और फिर नीचे सरककर उसके पेट और नाभि को चूसने लगी। पुष्पा "आह सुधा, ओह" की आवाजें निकालने लगी। सुधा ने अपनी जीभ पुष्पा की नाभि में डाली, और पुष्पा का बदन अकड़ गया। कुछ देर में पुष्पा आंगन की जमीन पर लेट गई।

सुधा उसके टांगों के बीच थी और पुष्पा की चूत को चाट रही थी। दोनों इससे पहले भी एक-दूसरे के बदन से खेल चुकी थीं, इसलिए अब और अनुभव के साथ मज़ा ले रही थीं। पुष्पा जल्दी ही सुधा की जीभ से स्खलित हो गई और हांफने लगी।

कुछ पल सांस लेने के बाद पुष्पा ने सुधा को पलटकर लिटा लिया। अब उसका दिमाग शांत था, और उसने सुधा के लिए एक योजना बनाई। उसने झुककर सुधा की चूची को चूसना शुरू किया और एक हाथ से दबाने लगी। सुधा "आह" की आवाजें निकालने लगी। पुष्पा ने चूची को मुंह से निकाला और दोनों चूचियों को मसलते हुए धीरे से बोली, "आह सुधा, हम लोग ये क्यों करते हैं? एक-दूसरे की चूत चाटना, चूची चूसना, ये सब कितना गलत है।"

सुधा, जो पहले से उत्तेजित थी, बोली, "आह मज़ा आता है जीजी, ऐसा आनंद मिलता है।"

पुष्पा ने कहा, "तुझे इस गंदे काम में मज़ा आता है? सच कहूं तो मुझे भी आता है। इसका मतलब हम दोनों गंदी औरतें हैं।"

सुधा ने हां में सिर हिलाया, "आह हां जीजी, हम दोनों आह गंदी हैं।"

पुष्पा ने नाभि में जीभ डालते हुए कहा, "गंदी नहीं, सिर्फ गंदी नहीं हो सकती, हमें तो कुछ और ही कहना चाहिए।"

सुधा ने उत्तेजित होकर कहा, "हम्म सही में हम दोनों बहुत गंदी हैं।" पुष्पा ने पूछा, "तुझे पता है हम कैसी औरतें हैं सुधा?"

सुधा ने जिज्ञासा से पूछा, "कैसी जीजी?"

पुष्पा ने धीरे से कहा, "चुदक्कड़ औरतें हैं हम सुधा, तू और मैं चुदक्कड़ हैं। हमारी चूतें प्यासी और गरम ही रहती हैं।"

सुधा ने सहमति में कहा, "आह जीजी सही कह रही हो, हम दोनों चुदक्कड़ हैं। हमारी चूत की खुजली नहीं मिटती, तभी तो देखो कैसे आंगन में एक-दूसरे के साथ मिटा रहे हैं।"

पुष्पा ने नाभि चूसते हुए पूछा, "आह सुधा, तू और मैं चुदक्कड़ प्यासी गर्म चूत वाली हैं। तुझे ऐसा ही बनना था या तुझे संस्कारी सीधी बनना है?"

सुधा ने जवाब दिया, "आह जीजी, मुझे गंदी ही बनना है। सीधेपन में ऐसा मज़ा नहीं, मुझे तो गंदी चुदक्कड़ औरत ही रहना है।"

पुष्पा ने पूछा, "आह अभी जितनी गंदी है, उतनी गंदी या इससे भी ज्यादा गंदी?"

सुधा मचलते हुए बोली, "हां जीजी, इससे भी गंदी, बहुत गंदी, जितनी गंदी बन सकती हूं उतनी बनूंगी।"

पुष्पा ने चूत के पास चूमते हुए कहा, "क्या तू ऐसी बनेगी जिसकी कोई सीमा न हो, जो कुछ भी कर सके, बस उसकी चूत की खुजली मिटाना ही जरूरी हो?"

सुधा ने जवाब दिया, "हां जीजी, बिल्कुल ऐसी ही, और सिर्फ मैं नहीं, तुम्हें भी वैसा ही बनाऊंगी।"

पुष्पा ने कहा, "आह हां सुधा, हम दोनों ऐसी चुदक्कड़ औरतें जो किसी भी हद को पार कर जाएंगी अपनी चूत के सुख के लिए, सही-गलत कुछ नहीं सोचेंगी। क्या हम दोनों ऐसी बनेगीं?"

सुधा ने उत्साह से कहा, "अहम्म हां जीजी, ऐसी ही बनेगीं—चुदक्कड़, गंदी, प्यासी औरतें।"

पुष्पा ने चूत को तड़पाते हुए पूछा, "देख ले, फिर ये तो नहीं होगा कि बाद में पछतावा हो कि हमने ये गलत किया?"

सुधा ने कहा, "नहीं आह जीजी, कोई पछतावा नहीं होगा, बस चूत की प्यास बुझाएंगे।"

ये कहकर सुधा ने पुष्पा का सिर अपनी चूत में दबा दिया। पुष्पा ने जीभ निकालकर चाटना शुरू कर दिया। सुधा की सिसकियां गूंजने लगीं, और कुछ देर में वो फिर स्खलित हो गई। लेकिन पुष्पा ने उसे नहीं छोड़ा और लगातार चाटती रही, जिससे सुधा फिर उत्तेजना में जलने लगी।

पुष्पा ने कुछ देर बाद सुधा की चूत को चाटा और फिर उठकर उसकी टांगों में अपनी टांगें फंसा ली। वो आगे झुकी, ताकि दोनों की चूतें एक-दूसरे से छू रही हों और चेहरे आमने-सामने हों।

पुष्पा ने सुधा के होंठ चूसे और कमर हिलानी शुरू की, जिससे चूतें आपस में घिसने लगीं। दोनों को एक अद्भुत आनंद मिला। सुधा और पुष्पा एक-दूसरे की आंखों में देख रही थीं।

पुष्पा ने कहा, "आह हैं न हम गंदी चुदक्कड़ और प्यासी औरतें?"

सुधा ने जवाब दिया, "हां जीजी, हम हैं। आह ऐसा मज़ा चुदक्कड़ औरतें ही तो करती हैं।"

पुष्पा ने कहा, "आह चुदक्कड़ है तो और भी बहुत कुछ है जो हम कर सकते हैं।"

सुधा ने उत्सुकता से पूछा, "और क्या जीजी? बताओ क्या करेंगे हम?"

पुष्पा ने कहा, "चूत की प्यास सिर्फ चाटने से नहीं बुझती मेरी चुदक्कड़ देवरानी, इसके लिए मोटे लंड से इसकी पिटाई भी जरूरी है।"

सुधा ने सहमति में कहा, "हां जीजी, अह सच में, बिना लंड के चूत की प्यास नहीं बुझती, मुझे भी रोज लंड की जरूरत पड़ती है।"

पुष्पा ने पूछा, "आह तो तू रोज चुदवाती है अपनी चूत को मोटे लंड से?"

सुधा बोली, "हां जीजी, रोज। जिस रात नहीं चुदवाती, उस रात तड़पती रहती हूं, जैसे आज रात में नहीं चुदवाया, तो देख ही रही हो मेरी हालत।"

पुष्पा ने कहा, "आह होगी ही, हम दोनों की चूत इतनी प्यासी जो रहती हैं। आह क्या इनकी प्यास सिर्फ एक लंड से बुझ सकती है?"

सुधा थोड़ी सकुचाई, लेकिन पुष्पा ने उसे प्रोत्साहित किया।

सुधा बोली, "नहीं जीजी, आह इसीलिए तो हमारी चूत प्यासी रहती हैं, और हम एक-दूसरे की प्यास बुझा रहे हैं।"

पुष्पा ने कहा, "सोच इससे भी गंदा कुछ हो तो, इससे भी गंदा करें हम दोनों?"

सुधा ने उत्साह से पूछा, "जैसे क्या जीजी?"

पुष्पा ने कहा, "सोच अभी मेरी चूत की जगह लंड होता किसी मर्द का, तेरे पति के अलावा, और तेरी चूत को भेद रहा होता।"

सुधा एक पल को कांप गई, लेकिन पुष्पा की बातों से उत्तेजना बढ़ गई। पुष्पा ने पूछा, "बता, चुदवाएगी पराए नए लंड से?"

सुधा ने कहा, "आह हां जीजी, अगर मोटा लंड मेरी चूत की प्यास बुझाएगा तो जरूर चुदवाऊंगी।"

पुष्पा ने कहा, "बिल्कुल बुझाएगा मेरी चुदक्कड़ देवरानी। किसका लंड लेना चाहेगी तू, बिना शर्म के?"

सुधा बोली, "आह जीजी, बस लंड दमदार होना चाहिए, किसी का भी हो, चुदवा लूंगी।"

पुष्पा ने कहा, "अच्छा तो आंखें बंद कर और सोच।"

सुधा ने आंखें बंद कीं। पुष्पा ने अपनी उंगलियों से सुधा की चूत को छूते हुए कहा, "सोच, अभी तेरे ऊपर एक मर्द है, उसका बदन तेरे नंगे बदन को ढके हुए है, उसका लंड तेरी चूत के ऊपर है, तेरी प्यासी गरम चूत को छू रहा है।"

सुधा तड़पते हुए "आह हां जीजी" कहने लगी। पुष्पा ने पूछा, "तू लेगी गैर मर्द का मोटा लंड अपनी चूत में?"

सुधा ने कहा, "हां जीजी, मैं लूंगी अपनी प्यासी गरम चूत में।"

पुष्पा ने कहा, "आह ये लंड, ये गरम मोटा लंड तेरे जेठ जी का है सुधा, जो तेरी चूत को छू रहा है। बता, अब क्या करेगी?"

सुधा अपने जेठ का नाम सुनकर कांप गई, लेकिन वर्जित उत्तेजना ने उसे रोकने नहीं दिया। वो बोली, "ओह जीजी, अह जेठ जी का मोटा लंड, आह लूंगी मैं अपनी चूत में।"

पुष्पा ने कहा, "तो मांग अपने जेठ जी से अपनी चूत में लंड मांग, बता तेरी चूत को लंड की कितनी जरूरत है।"

सुधा ने चिल्लाया, "आह हां जेठ जी, ओह चोदो मुझे, आह घुसा दो अपना लंड अपनी बहू की चूत में, आह चोद-चोद के मेरी चूत की खुजली मिटा दो।"

पुष्पा ने सुधा की चूत में उंगलियां डाल दीं और अंदर-बाहर करने लगी। सुधा वर्जित काल्पनिक चुदाई के आनंद में डूब गई, आंखें मूंदकर सोच रही थी कि उसके जेठ का लंड उसकी चूत में है। कुछ देर बाद वो इतने वेग से स्खलित हुई कि एक पल को बेहोश-सी हो गई।

पुष्पा ने उंगलियां निकाल लीं, और दोनों लेटकर सांसें बटोरने लगीं। शांत होने पर सुधा को ख्याल आया कि उसने जेठ के बारे में सोचकर स्खलित हुई। दोनों की आंखें मिलीं, और चेहरों पर मुस्कान आ गई।

लेकिन दोनों को इस बात का इल्म नहीं था कि एक साया उन्हें देख रहा था, जो तुरंत घर से बाहर निकल गया।


जारी रहेगी
 
अध्याय 26


किवाड़ों को ज्यों का त्यों ढंककर नीलम आगे बढ़ गई। अभी जो उसने देखा, वो उसके दिमाग को हिला रहा था। उसकी मां सुधा और ताई पुष्पा—दोनों बिल्कुल नंगी, एक-दूसरे के बदन से खेलते हुए—ये दृश्य उसकी आंखों के सामने से हट नहीं रहा था। उसने उनकी बातें तो नहीं सुनी थीं, लेकिन वो नजारा ही काफी था। रजनी आज घर पर नहीं थी, इसलिए नीलम तुरंत वापस घर आई थी और इस अनपेक्षित दृश्य को देखकर अंदर तक हिल गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे या कहां जाए। चलते-चलते वो गांव के बाहर नदी की ओर पहुंची और किनारे पर बैठ गई।

नदी की लहरों को देखते हुए नीलम अपने विचारों में डूब गई। उसे गुस्सा होना चाहिए था अपनी मां और ताई पर, जो इस पाप में लिप्त थीं, लेकिन गुस्सा नहीं आ रहा था। उसके अंदर एक अजीब सा अहसास था, जिसे वो समझ नहीं पा रही थी। उसके बदन में एक गर्मी का एहसास हो रहा था, और वो किसी से इस बारे में बात करना चाहती थी, लेकिन किससे? उसकी इकलौती सहेली नंदिनी से उसका झगड़ा हो रखा था। वो नंदिनी के बारे में सोचने लगी—उसने उससे झगड़ा क्यों किया? क्या इसी वजह से उसकी मां और ताई ये सब कर रही थीं? तो फिर नंदिनी गलत कैसे हुई? इसी बीच उसे अपने कंधे पर एक हाथ का स्पर्श हुआ। उसने नजर उठाई, और सामने रानी थी—भूरा और राजू की बड़ी बहन।

नीलम ने चौंककर कहा, "अरे रानी जीजी?" रानी ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा, "अरे तू यहां अकेली बैठकर क्या कर रही है?" नीलम ने झेंपते हुए जवाब दिया, "कुछ नहीं जीजी, खाली थी तो मन हुआ नदी किनारे बैठने का।" रानी उसके बगल में बैठते हुए बोली, "तू हमेशा से ही ऐसी रही है—अकेली, चुपचाप सी।" नीलम ने हल्का सा मुस्कुराकर कहा, "वो तो बस ऐसे ही जीजी।"



रानी ने बात को आगे बढ़ाया, "और मुझे पता है, तेरा और तेरी सहेली का झगड़ा हो गया है, उससे भी बोलचाल बंद है।" नीलम ने सहमति में सिर हिलाया, "हां जीजी, बस वो तो ऐसे ही।" रानी ने उसे समझाते हुए कहा, "अरे पागल, ये सब झगड़ा-वगैरा छोड़। प्यार से रहो आपस में, क्योंकि ये दिन ही याद आएंगे। अभी कुछ दिन बाद तुम दोनों ब्याह कर चली जाओगी, फिर सोचोगी कि काश झगड़े में समय न बिताना था।" नीलम रानी की बात सुनकर सोच में पड़ गई।

नीलम ने कहा, "ये तो है जीजी, लेकिन क्या करूं, वो मुझसे बिल्कुल उलट है। जो मैं करती हूं, वो उसका बिल्कुल उलटा करती है, इसलिए झगड़ा हो जाता है।" रानी हंसी, "अरे पागल, तुझसे अलग है तो ही तो दोस्ती है। सोच, बिल्कुल तेरे जैसी होती तो मजा आता अपनी छाया से दोस्ती करने में?" नीलम हंसने लगी और बोली, "नहीं जीजी, बिल्कुल भी नहीं।" रानी ने कहा, "वही तो। वैसे भी सच कहूं, ब्याह के बाद ये दिन ही याद आते हैं। ससुराल की जिम्मेदारी और दुनियादारी में फिर अपने लिए सोचने का समय नहीं मिलता।"

नीलम ने मज़ाकिया लहजे में पूछा, "अच्छा, आपको भी समय नहीं मिलता क्या जीजी?" रानी ने हंसते हुए जवाब दिया, "समय, सांस लेने की फुर्सत भी नहीं मिलती।" नीलम ने छेड़ते हुए कहा, "अच्छा, क्यों? जीजाजी छोड़ते नहीं क्या?" रानी हंसी, "धत्त, तू भी नंदिनी जैसी हो गई है उसके साथ रहकर। वैसे अच्छा है, ऐसी मज़ाक करती हुई अच्छी लगती है तू।" नीलम ने उत्सुकता से पूछा, "वैसे जीजी, बताओ ना, क्या-क्या करते हैं जीजाजी पूरी रात?" रानी ने शरारत से कहा, "धत्त, तुझ पर नंदिनी का असर बहुत हो गया है।"

नीलम ने जिद की, "अरे बढ़ा मन है जीजी जानने का, बताओ न।" रानी ने कहा, "अच्छा, सच में मन है? सुन पाएगी तू?" नीलम ने हामी भरी, "क्यों सुनने में क्या है?" रानी ने शर्त रखी, "शर्माएगी तो नहीं?" नीलम बोली, "नहीं शर्माऊंगी, अब बताओ ना।" रानी ने कहा, "अच्छा चल, मैं बताऊंगी, लेकिन मेरी एक शर्त है—जैसा मैं बताऊं, उसी भाषा में मुझसे बात करनी होगी, बिना शर्माए।" नीलम ने सोचा और बोली, "ठीक है जीजी, सुनाओ।"

रानी ने शुरू किया, "तो सुन, रात में क्या-क्या होता है। तेरे जीजा बिस्तर पर मुझे लिटाते हैं, और अपने होंठों को मेरे होंठों पर रख देते हैं, और अच्छे से चूसते हैं। उसके बाद मेरे ब्लाउज के हुक खोलते हैं और मेरी चूचियों को नंगा करते हैं, उन्हें अपने हाथों में लेकर दबाते हैं, मसलते हैं।" रानी ये कहते हुए खुद अंदर से उत्तेजित होने लगी। अपने संभोग के छुपे पलों को नीलम के साथ बांटने से उसे एक अलग अहसास हो रहा था।



नीलम गरम होती हुई बोली, "अच्छा फिर?" उसकी चूचियां कड़क रही थीं, और वो थूक गटकते हुए आगे बढ़ी, "फिर?" रानी ने कहा, "फिर चूचियों को मसलते हुए वो मेरा पेट और नाभि चाटते हैं, मेरी नाभि में अपनी जीभ घुसाकर चाटते हैं।" ये कहते हुए रानी की आह निकल गई, और नीलम का गला सूख गया। नीलम ने फिर पूछा, "फिर?" रानी बोली, "फिर वो मेरी चूचियों को मुंह में भरकर जी भर के चूसते हैं, बदल-बदल कर। आह, इतना मज़ा आता है कि बस बताए नहीं बनता।" नीलम ने कहा, "आह अच्छा।"

रानी ने आगे बढ़ाया, "फिर वो मेरे हाथ में अपना वो पकड़ा देते हैं, उसका कड़क अहसास आह..." नीलम ने उत्सुकता से पूछा, "वो? क्या जीजी?" रानी ने सांस लेकर कहा, "उनका कड़क मोटा लंड। उसकी गर्मी आह, लगता है मानो हाथ में कोई गरम सरिया पकड़ लिया हो। उसे छूते ही मेरी टांगों के बीच खुजली बढ़ जाती है, पानी बहने लगता है।" ये सुनते हुए रानी की चूत गीली हो गई, और नीलम अपनी टांगों को घिसकर शांत होने की कोशिश कर रही थी।

रानी ने कहा, "और फिर मैं उस कड़क गर्म लंड को सहलाती हूं, उसे हाथों से पुचकारती हूं, जैसे किसी सफर से पहले घोड़े को या जुताई से पहले बैल को तैयार करते हैं।" नीलम के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे, वो बस सुन रही थी। रानी ने जारी रखा, "और फिर वो अपना लंड मेरी चूत के मुहाने पर रखते हैं, जो कब से उनके लंड के लिए तड़पती होती है। उनका लंड महसूस कर तो चूत पानी बहाने लगती है, और फिर एक धक्का लगाकर वो लंड को अंदर घुसा देते हैं।" नीलम ने फुसफुसाते हुए कहा, "आह जीजी।" उसे खुद को रोकना मुश्किल हो रहा था।

रानी ने नीलम की हालत देखी और समझ गई कि वो भी उत्तेजित है। उसने कहा, "चल, बहुत हो गया, अब और नहीं कह सकती मैं।" नीलम ने सहमति में कहा, "हां जीजी, सच में।" दोनों कुछ पल शांत बैठीं, अपनी उत्तेजना को शांत करने की कोशिश करती रहीं। फिर रानी ने सुझाव दिया, "चल, उधर ईख वाले खेत पर चलें? बहुत दिन हो गए, गन्ने खाएंगे, मस्ती करेंगे।" नीलम ने हामी भरी, "हां चलो जीजी।" दोनों उठकर रानी के पिता के ईख वाले खेत की ओर बढ़ गईं, जो नदी के पास ही था।

दूसरी ओर, नीलम की सहेली नंदिनी भी पीछे नहीं थी। मगन खेत पर निकल गया था, और लता आंगन में बैठकर कपड़े धो रही थी, जबकि घर के अंदर नंदिनी और लल्लू—दोनों भाई-बहन—अपने उत्तेजित पलों में डूबे हुए थे। उनके होंठ आपस में मिले हुए थे, और दोनों एक-दूसरे के होंठों को प्यास और उत्तेजना से चूस रहे थे। नंदिनी ने सूट-सलवार पहना हुआ था, जिसमें उसकी कमर और चूचियों का आकार हल्का उभर रहा था, वहीं लल्लू के बदन पर सिर्फ पजामा था, ऊपर से नंगा था।



दोनों की उत्तेजना हर पल के साथ बढ़ रही थी। लल्लू के हाथ अपनी बड़ी बहन के बदन पर घूमने लगे। उसने धीरे से नंदिनी के सूट को ऊपर उठाया और अपना हाथ अंदर डालकर उसकी नरम, मखमली पेट को सहलाने लगा। इस स्पर्श से नंदिनी की सांसें तेज हो गईं, और वो और उत्तेजित हो उठी। लल्लू का हाथ उसके पेट से लेकर कमर और पीठ तक फिर रहा था, उसकी कोमल त्वचा का एहसास उसे अपार आनंद दे रहा था। नंदिनी के बदन में एक सिहरन दौड़ रही थी, और वो अपने भाई के स्पर्श से खुद को रोक नहीं पा रही थी।

कुछ पल बाद दोनों के होंठ अलग हुए, और हल्की-हल्की सांसों के साथ वे एक-दूसरे की आंखों में देखने लगे। लल्लू ने फुसफुसाते हुए कहा, "आह दीदी, तुम्हारे होंठ कितने स्वादिष्ट हैं।" नंदिनी ने घबराते हुए अपनी सांसें संभालते हुए कहा, "चुप कर, मां सुन लेंगी।" लेकिन उसकी आवाज में उत्तेजना साफ झलक रही थी। लल्लू का हाथ अभी भी उसकी कमर पर था, और वो धीरे-धीरे उसे सहलाता रहा, मानो उसकी हर हरकत से नंदिनी को और गर्म करता हो।

नंदिनी का मन द्वंद्व में था। एक ओर उसकी वासना जाग रही थी—लल्लू का स्पर्श, उसकी नंगी छाती, और उनके बीच की निषिद्ध लालसा—लेकिन दूसरी ओर उसे डर था कि लता उन्हें पकड़ लेगी। फिर भी, वो अपने भाई के करीब आने से खुद को रोक नहीं पा रही थी। लल्लू ने हिम्मत जुटाई और अपने हाथ को और ऊपर ले गया, नंदिनी के सूट के नीचे से उसकी चूचियों के पास पहुंचने की कोशिश की। नंदिनी ने हल्का सा विरोध किया, "लल्लू, रुक जा, अगर मां..." लेकिन उसकी आवाज में दृढ़ता नहीं थी, और लल्लू ने उसका विरोध नजरअंदाज कर दिया।

वह नंदिनी के सूट को और ऊपर खिसकाया और अपनी उंगलियों से उसकी चूचियों को हल्के से छुआ। नंदिनी की सांसें और तेज हो गईं, और उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। लल्लू ने अपनी उंगलियों को धीरे-धीरे नंदिनी की चूचियों पर फिराया, जो ब्रा के अंदर से भी साफ महसूस हो रही थीं। "आह दीदी, तुम्हारा बदन कितना नरम है," लल्लू ने फुसफुसाया, और उसकी आवाज में एक भूख थी। नंदिनी का मन अब पूरी तरह वासना के हवाले हो चुका था। उसने लल्लू के कंधों को पकड़ा और उसे अपने और करीब खींच लिया, मानो वो अब इस पल को पूरी तरह जीना चाहती हो। लल्लू ने इसका फायदा उठाया और नंदिनी के सूट को पकड़ कर उतार दिया,

नंदिनी: धत्त ये क्या किया।

नंदिनी इतना बोल पाई कि लल्लू ने फिर से उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए और चूसने लगा, नंदिनी की उत्तेजना भी कम नहीं थी वो भी अपने भाई का तुरंत ही साथ देने लगी उसे बाहों में भरते हुए,



दोनों एक बार फिर से एक दूसरे के होंठों का रस पीने लगे, लेकिन तभी बाहर से लता की आवाज आई, "लल्ला, नंदिनी, क्या कर रहे हो दोनों और कपड़े हो तो धुलने वाले तो दो जल्दी!" दोनों एक पल के लिए सन्न रह गए। नंदिनी ने तुरंत अपने सूट को उठाया और पहन लिया और चेहरा संभाला, जबकि लल्लू ने जल्दी से अपने पजामे को ठीक किया और अपने कड़क लंड को नीचे की ओर दबाया। नंदिनी ने फुसफुसाया, "जल्दी कर, मां को शक न हो," और दोनों ने हड़बड़ी में कमरे से बाहर निकलकर आंगन में आ गए। लता ने उन्हें देखा और बोली कपड़े नहीं है तो दोनों ने ना में सिर हिला दिया, लता ने कुछ नहीं कहा और कपड़े धोने लगी लेकिन उसकी नजरों में एक हल्की शंका थी, जो शायद उसकी छठी इंद्रिय थी।

इस बीच, नंदिनी और लल्लू की आंखें बार-बार मिल रही थीं, और दोनों के चेहरों पर एक गुप्त मुस्कान थी। लता ने कपड़े धोते हुए कहा, "क्या हो गया तुम दोनों को, चेहरा लाल क्यों है?" नंदिनी ने हंसते हुए कहा, "कुछ नहीं मां, बस थोड़ी गर्मी लग रही है।" लल्लू ने भी हामी भरी, लेकिन उसके मन में नंदिनी के स्पर्श का आनंद और अगले मौके की उम्मीद जिंदा थी। लता ने शक की नजर से दोनों को देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा और काम में लग गई।

दोपहर ढल चुकी थी, और रानी जहां नीलम के साथ नदी किनारे थी, वहीं घर पर सिर्फ रत्ना और भूरा मौजूद थे। राजू खेत पर काम कर रहा था। रत्ना अपने विचारों में डूबी थी, केला बाबा की बातें—आत्मा की अधूरी इच्छाएं—उसके दिमाग में गूंज रही थीं। वो चूल्हे पर दूध चढ़ाकर उसके सामने बैठी थी, आग की लपटें उसके चेहरे पर उजाला डाल रही थीं। उधर, भूरा आंगन में नल के बगल में नहा रहा था, पानी की धार उसके बदन पर बह रही थी। रत्ना को अपनी सुध नहीं थी; उसका ध्यान सपनों और प्यारेलाल की मौत से जुड़े रहस्यों में उलझा हुआ था।

इसी बीच भूरा की नजर रत्ना पर पड़ी, और वो चौंक गया। रत्ना की साड़ी का पल्लू लकड़ियों के साथ चूल्हे में चला गया था, और आग ने उसे जकड़ लिया था।



भूरा चीखा, "मां!" इस आवाज से रत्ना को होश आया। उसने साड़ी को देखा और डर से चिल्लाने लगी। भूरा ने फुर्ती दिखाई और पास में रखी पानी की बाल्टी लेकर उसकी ओर दौड़ा। रत्ना घबराहट में साड़ी खोलने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसका पैर फंस गया, और वो गिर पड़ी। उसकी साड़ी और जलने लगी, लेकिन भूरा ने तुरंत बाल्टी का पानी उस पर उड़ेल दिया। लपटें शांत हो गईं, लेकिन रत्ना का पूरा बदन भीग गया।

भूरा ने बाल्टी एक ओर रखी और अपनी मां को उठाया। रत्ना की आंखों से आंसू बह रहे थे, उसका पल्लू पूरी तरह जल चुका था। भूरा ने उसे शांत करने की कोशिश की, "मां, चुप हो जाओ, अब सब ठीक है।" रत्ना बुरी तरह घबराई हुई थी और भूरा के गले से चिपक गई। भूरा ने उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा, "मां, सब ठीक है, कुछ नहीं हुआ। रोना बंद करो और शांत हो जाओ। चलो, दूसरे कपड़े पहन लो, ये भीग गए हैं और साड़ी भी जल गई है।"

रत्ना थोड़ा शांत हुई और भूरा से अलग हो गई। भूरा ने चूल्हे से दूध उतारा और एक ओर रख दिया। उसने कहा, "मां, ये साड़ी उतार दो, भीग गई है और जल भी गई है। दूसरी पहन लो।" रत्ना ने धीरे-धीरे साड़ी उतारी, और उसके बदन पर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज रह गया। भूरा ने उसे कमरे के अंदर ले जाया और बोला, "लो मां, तुम अब कपड़े पहन लो। मैं तब तक नहा लेता हूं, देखो पूरा भीग गया हूं। ज्यादा सोचो मत।"

रत्ना के दिमाग में बाबा की बातें और अभी का हादसा एक साथ जुड़ गए। उसे लग रहा था कि ये सब उसी वजह से हो रहा है—क्या ये उसके सपनों और ससुर की मौत से जुड़ा है? ये सोचकर उसका मन घबराने लगा। रत्ना गीले कपड़ों में खड़े होकर ये सब सोच रही थी।



भूरा जाने को हुआ, लेकिन रत्ना ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, "लल्ला, मुझे घबराहट हो रही है, अभी मत जा।" भूरा ने समझाया, "वो तो ठीक है मां, पर अभी तुम्हें बुखार हुआ था। अगर गीले कपड़े पहने रहोगी तो फिर से हो जाएगा।" रत्ना ने कहा, "वो मैं बदल लूंगी, तू बस यहीं रह।" भूरा ने हामी भरी, "ठीक है, मैं नहीं जा रहा, यहीं हूं। तुम परेशान मत हो।"

भूरा वहीं खड़ा हो गया। रत्ना ने दरवाजा बंद किया और धीरे-धीरे अपने ब्लाउज के हुक खोलने लगी। भूरा ये देखकर हैरान रह गया। पहले तो उसके मन में सिर्फ चिंता थी, लेकिन अब वासना के भाव लौटने लगे। रत्ना के हाथ धीरे-धीरे हुक खोलते गए, और एक-एक करके सारे हुक खुल गए। भूरा अपनी सांसें रोककर अपनी मां की ओर देख रहा था। रत्ना ने अपने ब्लाउज के पाटों को पकड़ा और बोली, "लल्ला, उधर घूम जा।" भूरा ने वैसे ही किया, लेकिन उसका ध्यान मां से हट नहीं रहा था। वो सोच रहा था कि उसके पीछे मां नंगी हो रही है, और ये ख्याल उसके लंड को कच्छे में तनाव देने लगा।

इसी बीच रत्ना की एक हल्की चीख निकली। भूरा ने तुरंत मुड़कर देखा और सामने का नजारा देखकर वहीं जम गया। रत्ना के हाथ से सूखा पेटीकोट छूटकर नीचे गिर गया था, और वो अपने बेटे के सामने पूरी नंगी खड़ी थी। उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां, मखमली सपाट पेट, गोल गहरी नाभी, और हल्के बालों से सजी चूत—सब भूरा के सामने था। भूरा का लंड बिल्कुल अकड़ गया, अपनी मां को इस तरह देखकर। वहीं रत्ना भी सुन्न पड़ गई। शर्म के मारे उसे जमीन में धंसने का मन हो रहा था। उसका पेटीकोट नीचे पड़ा था, लेकिन उसका बदन मानो जड़ हो गया। कुछ पल कमरे में सन्नाटा रहा। रत्ना की आंखें शर्म से नीचे थीं, जबकि भूरा की नजरें उसके बदन पर टिकी थीं।

रत्ना ने धीरे से आंखें उठाई, और पहली नजर उसकी भूरा के कच्छे पर पड़ी, जहां तंबू बना हुआ था। भूरा के कच्छे में तनाव देखकर रत्ना का दिमाग तेजी से चलने लगा। उसे अपने सपने याद आए—कैसे उसके बेटे और उनके दोस्त उसे चोद रहे थे। कहीं ये उसी सपने से जुड़ा तो नहीं है? इधर भूरा ने अपनी मां के शर्म और घबराहट भरे चेहरे को देखा, और वासना को भूलकर आगे बढ़ा। उसने झुककर पेटीकोट उठाया और रत्ना के हाथ में थमा दिया, फिर बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया।

हाथ में पेटीकोट पाकर रत्ना को थोड़ा होश आया। उसने फुर्ती दिखाते हुए पेटीकोट पहना और जल्दी से ब्लाउज भी पहन लिया। फिर साड़ी उठाकर कमरे से बाहर निकल गई; वो ज्यादा देर अकेले नहीं रहना चाहती थी। बाहर आकर उसने देखा कि भूरा पटिया पर नहीं था। वो सोचने लगी, "ये गीला होकर कहां चला गया?" वो आगे बढ़ी और भैंसों के बंधने वाली जगह की ओर देखने लगी। उसे हल्की-हल्की आवाजें सुनाई दीं। रत्ना आगे बढ़ी और भूसा की बोरियों के पीछे चारे के ढेर पर भूरा को बैठा देखा।

रत्ना कुछ बोलने से पहले ही उसकी नजर भूरा पर पड़ी, जो कुछ कर रहा था। भूरा का कच्छा घुटनों पर था, और वो एक हाथ से अपने लंड को थामे अपनी मां के नंगे बदन को याद करते हुए हाथ को लंड पर चला रहा था। उसके मुंह से बहुत हल्की-हल्की "मां-मां" की आहें निकल रही थीं। रत्ना का मुंह सूख गया। उसकी नजरें भूरा के लंड पर टिक गईं। इसी बीच भूरा ने एक गहरी सांस ली, और उसके लंड से एक पिचकारी निकली, जो रत्ना के पास गिरी। रत्ना तुरंत चौंककर पीछे हटी और कमरे में भाग गई, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

शाम हो चुकी थी, और शहर से लोग लौट आए थे। राजेश, छोटू और सुभाष के आने से उनके घर में चहल-पहल हो गई थी। दोनों शहर के किस्से बड़े चाव से सुना रहे थे—मंडी की भीड़, शहर की चकाचौंध, और नई चीजें। नीलम बार-बार अपनी मां और ताई को देख रही थी, और सोच रही थी कि देखो, दोनों कितनी संस्कारी लग रही हैं। इन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता कि ये उस तरह के काम में भी लिप्त होंगी।

सत्तू घर आकर थककर सो गया था, लेकिन झुमरी के मन में राजेश नाम की परेशानी घूम रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। राजेश का व्यवहार और उसकी बातें—कल शाम की गोदाम की घटना का उल्लेख—उसके दिमाग में अटका हुआ था। वो सोच रही थी कि आगे क्या होगा, और उसका मन घबराहट से भर गया था।

जारी रहेगी।

 
सज्जनपुर की कहानी में 12वा अध्याय पोस्ट किया है पेज संख्या 16 पर पढ़ कर प्रतिक्रिया अवश्य दें बहुत बहुत धन्यवाद
 
शाम हो चुकी थी, और शहर से लोग लौट आए थे। राजेश, छोटू और सुभाष के आने से उनके घर में चहल-पहल हो गई थी। दोनों शहर के किस्से बड़े चाव से सुना रहे थे—मंडी की भीड़, शहर की चकाचौंध, और नई चीजें। नीलम बार-बार अपनी मां और ताई को देख रही थी, और सोच रही थी कि देखो, दोनों कितनी संस्कारी लग रही हैं। इन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता कि ये उस तरह के काम में भी लिप्त होंगी।



सत्तू घर आकर थककर सो गया था, लेकिन झुमरी के मन में राजेश नाम की परेशानी घूम रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। राजेश का व्यवहार और उसकी बातें—कल शाम की गोदाम की घटना का उल्लेख—उसके दिमाग में अटका हुआ था। वो सोच रही थी कि आगे क्या होगा, और उसका मन घबराहट से भर गया था।



अध्याय 27


सोमपाल के यहां शाम का खाना बन चुका था और धीरे धीरे सब लोगों को परोसा जा रहा था सुधा और पुष्पा खाना बना रही थी तो नीलम सब को परोसती जा रही थी, पुष्पा रोटियां सेक रही थी और सुधा बेलती जा रही थी, संजय बीच बीच में पुष्पा से नज़रें मिलाने की कोशिश कर रहा था पर पुष्पा उसकी ओर देख नहीं रही थी, जल्दी ही सब खा चुके थे और खाना भी बन चुका था, जिस जिस ने खा लिया वो अपने काम पर लग चला था या तो बिस्तर पर या भैंस वगैरह को अंदर बांधने पर,

पुष्पा : सुधा तू बासन समेट मैं ये बचा हुआ आटा और रोटियां भैंस की नांद में डाल आऊं।

सुधा: ठीक है जीजी,

पुष्पा उठ कर प्लेट लेकर आंगन के बाहर वाले छप्पर में जहां भैंस वगैरह रात को बंधती थी वहां जाकर वो आटा और रोटियां चारा में मिला कर जैसे ही अंदर आने के लिए घूमी उसका पल्लू किसी ने पकड़ लिया और अगले ही पल दो हाथ उसकी कमर पर कस गए, वो चिल्लाने ही वाली थी कि उसकी नजर उस व्यक्ति के चेहरे पर पड़ी और वो चुप हो गई,

संजय: भाभी मैं हूं।

संजय ने फुसफुसाते हुए कहा, जहां संजय और पुष्पा थे उनके और आंगन के बीच बस एक कच्ची दीवार थी जिसका फायदा उठा कर संजय ने पुष्पा को दबोच लिया था,

पुष्पा: छोड़ो मुझे देवर जी,

पुष्पा ने थोड़ी सख्ती से कहा,

संजय: छोड़ने के लिए थोड़े ही पकड़ा है,

ये कह संजय ने पुष्पा को पीछे दीवार से सटा दिया,

पुष्पा: छोड़ो मुझे, कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगा, उन्मम्म।

पुष्पा ने चिंता जताते हुए कहा पर बात पूरी होते ही संजय ने अपने होंठों को पुष्पा के होंठों से मिला दिया, और चूसने लगा, पुष्पा विरोध करने की कोशिश करने लगी पर उसका विरोध संजय की वासना के आगे ढेर हो गया,



संजय के होंठ जहां उसकी भाभी के रसीले होंठों का पान कर रहे थे तो उसके हाथ पुष्पा की मादक कमर को मसल रहे थे, देवर के इस स्पर्श से पुष्पा भी पिघलने लगी तभी उसके दिमाग में पकड़े जाने का खयाल कौंधा और उसने तुरंत संजय को धक्का दिया, अचानक मिले धक्के से संजय की पकड़ भी ढीली हो गई और वो पीछे हो गया, पुष्पा तुरंत भाग गई, संजय के चेहरे पर मुस्कान थी वहीं कहीं न कहीं पुष्पा भी अंदर आते हुए मन ही मन मुस्कुरा रही थी, एक साथ बहुत से खयाल उसके मन में चल रहे थे पर उसका बदन उस स्पर्श से मचल रहा था,

सुधा: जीजी चलो खाना खा लेते हैं,

सुधा की आवाज़ से जैसे वो बापिस वास्तविकता में आई, और दोनों देवरानी जेठानी साथ में खाना खाने लगीं, बाकी सब अपने अपने बिस्तर पर थे, ये दोनों कमरे में बैठ कर खा रही थी अकेले। खाते हुए पुष्पा के मन में अभी भी बहुत से विचार घूम रहे थे, सुधा ने उसकी ओर देखा और बोली: क्या सोच में हो जीजी?

पुष्पा: कुछ भी तो नहीं,

सुधा: वैसे मुझे पता है तुम क्या सोच रही हो,

पुष्पा: क्या?

सुधा: दिन में जो हमने बातें की उस बारे में सोच रही हो न, वैसे सच कहूं तो मेरे मन में भी तब दे वहीं सब घूम रहा है, हम लोग सच में बहुत गंदे हो गए हैं,

पुष्पा: गंदे कैसे?

सुधा: अच्छा भूल गई दोपहर में कितनी गंदी बातें कर रही थी, मुझे भाई साहब के साथ सोच रही थी,

सुधा थोड़ा धीमी आवाज़ में बोली वैसे तो उनके पास कोई नहीं था फिर भी सुधा ने आवाज़ धीमी करके बोला,

पुष्पा: अच्छा गंदी थी तो तुझे मज़ा नहीं आया करने में?

सुधा मुस्कुराती है और कहती है: मज़ा तो आया पर अजीब लग रहा है पता है फिर तब से भाई साहब के सामने जाने में थोड़ा अजीब लग रहा है।

पुष्पा: अरे अभी से अजीब तब कैसा लगेगा जब उनका लंड तेरी चूत को चीरते हुए अंदर घुसेगा।

पुष्पा के अंदर जो उत्तेजना थोड़ी देर पहले सुधा के पति ने भरी थी वही उत्तेजना से गर्म होकर वो उसे शब्दों में उतार कर सुधा को बोलने लगी,

वहीं सुधा ने जब पुष्पा के मुंह से ये सुना तो उसका मुंह खुल गया एक गर्मी उसके बदन में फैल गई, साथ ही उसे अपनी योनि में शहद घुलता हुआ महसूस हुआ,

सुधा: अरे जीजी तुम भी न अब बस भी करो,

पुष्पा: अच्छा ठीक है तुझे नहीं अच्छा लगता तो नहीं बोलती। पुष्पा ये कह चुपचाप बैठ कर खाने लगी, सुधा भी चुप थी, कुछ देर तक पूरी खामोशी रही, फिर सुधा खुद ही बोली: अच्छा जीजी बोलो, पर सिर्फ मेरी ही नहीं अपनी भी बताओ, तुम्हारी चूत में किसका लंड घुसेगा,

सुधा एक शैतानी मुस्कान के साथ बोली, पुष्पा सुधा की बात सुन कर मुस्कुराई और फिर अपना मुंह सुधा के कान के पास लाकर फुसफुसा कर बोली: देवर जी का, मोटा लंड उनकी चुदक्कड़ भाभी की चूत को अच्छे से धक्के मार मार कर भर देगा।

और इतना कहने के बाद उसने सुधा के कान के निचले हिस्से को चूमा और फिर पीछे हो गई, सुधा का पूरा बदन उत्तेजना में जलने लगा, पुष्पा ये कह कर उठ कर बाहर चली गई सुधा वहीं बैठी बैठी अपने बदन की गर्मी में जलने लगी जिसकी चिंगारी पुष्पा ने लगाई थी, उसकी आंखे कल्पना करने लगी अपने पति और अपने जेठानी को एक साथ वहीं एक ओर उसकी आंखों में उसके और जेठ की भी कल्पना की छवि उभर रही थी,

बाहर से पुष्पा की आवाज़ आई तो जाकर वो कल्पना से बाहर निकली और बर्तनों को उठा कर कमरे से बाहर निकल गई उसका पूरा बदन उत्तेजना में जल रहा था, बर्तन वगैरह धोने के बाद सारे काम निपट चुके थे, और सब अपने अपने बिस्तर पर पहुंच चुके थे,

छोटू बड़ी बेसब्री से बिस्तर पर अपनी मां का इंतजार कर रहा था आज दो रातों बाद वो उसके पास सोने वाला था उसे तो ये रातें महीनों से कम नहीं लगी थी, उसका लंड इंतज़ार में तन कर खड़ा था, उसके लिए एक एक पल महीनों जैसा बीत रहा था, तभी दरवाज़ा खुलता है और पुष्पा अंदर आकर दरवाज़ा बंद कर लेती है उसकी आँखें छोटू से मिलती हैं जो उसे कामुकता से देख रहा था, पुष्पा भी उत्तेजित थी उसे भी अपने बेटे को अपनी प्रतीक्षा करते देख एक रोमांच सा महसूस होता है उसका बदन आने वाले सुख के आभास में मचलने लगता है,

छोटू से और सब्र नहीं होता और वो बिस्तर से कूद पड़ता है और आगे बढ़ कर वो अपनी मां को बाहों में भर लेता है, और उसके होंठों से अपने होंठ मिला देता है, पुष्पा भी तुरंत बेटे का साथ देने लगती है, छोटू के हाथ भी तुरंत पुष्पा के ब्लाउज पर चलने लगते हैं उसके अंदर की बेसब्री साफ दिखाई दे रही थी, कुछ पल बाद ही पुष्पा का ब्लाउज़ खुला होता है उसकी चूचियां कामुक तरीके से झांक रही होती हैं, छोटू पुष्पा के होंठों को छोड़ता है और नीचे सरक कर बैठ जाता है और उसकी चूचियों को थोड़ा और तरसाते हुए पुष्पा के पेट और नाभि को चूमने लगता है,



अपनी मां के मादक पेट और कमर को चूमते हुए वो उसकी रसभरी नाभि में भी जीभ घुसाता है, वहीं बढ़ती उत्तेजना के साथ पुष्पा से अपनी चूचियों की तड़प बर्दाश्त नहीं होती और वो खुद उन्हें दोनों हाथों से मसलने लगती है,

पुष्पा: आह ओह मेरे लाल आह खा जाएगा आह आज अपनी मां का बदन,

छोटू भी कुछ उसी तरह से प्रतिक्रिया दे रहा था जैसे वो अपनी मां का मादक बदन खा ही जाना चाहता हो,

छोटू: आह मां तुम्हारा बदन इतना मीठा और कोमल है बिल्कुल मलाई जैसा मन करता है खा ही जाऊं, आह दो रात तड़पा हूं आज अच्छे से चखूंगा।

छोटू ये कहते हुए ऊपर उठता है और एक चूची को मुंह में भर लेता है, और पुष्पा के मुंह से आह निकल जाती है,

दूसरी ओर सुधा तो आज लग रहा था कि छोटू से भी ज़्यादा बेसब्री में थी, पुष्पा की बातों का असर उस पर ऐसा हुआ था कि कमरे के अंदर घुसते ही उसने दरवाज़ा बंद किया और अपनी साड़ी उतार फेंकी और बिस्तर पर चढ़ गई, और संजय को चूमने लगी, संजय भी अपनी पत्नी के इस तरह से उस पर टूट पड़ने से हैरान हुआ पर उसे कोई परेशानी नहीं थी वो वैसे ही पुष्पा के साथ हुए उस घटना क्रम के बाद उत्तेजित था, वो भी तुरंत साथ देने लगा, करीब 10 मिनट बाद ही दृश्य बदल चुका था और सुधा अपने पति के लंड पर सवार होकर उत्तेजना की ऊंचाइयों की सैर कर रही थी,



सुधा को हाल ही में संजय ने कभी इतना उत्तेजित नहीं देखा था वहीं पुष्पा आंखें बंद करके अपने पति के लंड पर कूद रही थी पर तभी उसकी आंखों के सामने उसके जेठ का चेहरा आ जाता है और उसके मन में ये खयाल की वो अपने जेठ के लंड पर उछल रही है ये खयाल आते ही उसका बदन कांपने लगता है, थरथराते हुए झड़ने लगती है, उसकी कमर झटके खाने लगती है और यही संजय को भी झड़ने पर मजबूर कर देता है, और वो अपनी पत्नी की चूत में स्खलित होने लगता है,

दोनों शांत होकर बिस्तर पर गिर जाते हैं हांफते हुए, सुधा को एक ग्लानि भाव हो रहा था पर वो पुष्पा की बातों को और अपने जेठ की छवि को अपने मन से निकाल नहीं पा रही थी वहीं संजय भी अपनी भाभी पुष्पा के बारे में सोच रहा था,

दोनों के लिए ही ये रात कुछ नई कहानी बुन कर लाई थी जिसमें वो साथ होते हुए भी साथ नहीं थे,

दूसरी ओर सुभाष दिन भर की थकान के बाद आराम से सो रहा था, इस बात से बेखबर कि जहां उसके भाई की पत्नी उसके बारे में सोच कर स्खलित हो रही थी वहीं उसकी खुद की पत्नी उसके बेटे के साथ थी अंदर कमरे में थी छोटू बिस्तर के नीचे खड़ा होकर अपनी मां की कामुक गरम तपती हुई चूत में लंड की मशीन चला रहा था, साथ ही उसकी चूचियों को मसल रहा था,



पुष्पा के मुंह से लगातार आहें निकल रही थी आज वो कुछ ज़्यादा ही उत्तेजित हो रही थी कुछ हाल ही के घटनाक्रम से और कुछ उसके बेटे की चुदाई से,

पुष्पा: ओह मेरे लाल आह मेरे राजा आह चोद अपनी मां को आह अपनी रंडी चुदक्कड़ मां को जी भर के चोद,

छोटू अपनी मां के मुंह से ये सब सुन और उत्तेजित होते हुए उस चोदने लगा

छोटू: आह हां मां चोद रहा हूं तुम्हे मेरी चुदक्कड़ मां आह तुम मेरी चुदक्कड़ मां हो आह मेरी प्यारी मां,

पुष्पा: आह नहीं लाल प्यारी नहीं आह रंडी बोल आह अपने बेटे का लंड लेने वाली रंडी आह।

छोटू: ओह हां मेरी रंडी मां ओह आह मां मेरी रंडी मां आह आह आह छोटू ये कहते हुए और उत्तेजित हो गया और तेजी से पुष्पा की चूत में धक्के लगाने लगा वहीं पुष्पा भी छोटू के तेज धक्कों से अपने चरम पर पहुंच गई और झड़ने लगी, छोटू भी और पल रुक नहीं पाया और अपनी मां की चूत को अपने रस से भरने लगा एक के बाद एक धार छोड़ते हुए, कुछ पल बाद दोनों ही हांफते हुए एक दूसरे के बगल में लेट गए और एक दूसरे की बाहों में सो गए।

लल्लू के घर में भी सब खा पी कर अपने अपने बिस्तर पर लेट चुके थे, कुंवरपाल हमेशा की तरह बाहर चबूतरे पर सो रहे थे, घर में आंगन में ही सबकी खाट लगी थी नींद किसी की आंखों में नहीं थी पर सब कोई सोने का नाटक कर रहा था कुछ देर बाद ही मगन उठा और उसने बगल की खाट पर लेटी हुई अपनी पत्नी को हल्का सा हिलाया जिससे लता भी जाग गई, और फिर एक एक करके दोनों पति पत्नी कमरे में चले गए, और उनके जाते ही कुछ पल बाद ही लल्लू ने आंखें खोल ली और चुपचाप इधर उधर देखा फिर उठ कर बैठ गया, और दबे पांव उतर कर नंदिनी की खाट के पास आया, और उसे हल्का सा हिलाने लगा: जीजी, ओह जीजी सो गई क्या?

हालांकि नंदिनी सोई नहीं थी उसे भी खबर थी कब उसके मां पापा उठ कर गए थे वो बस सोने का नाटक कर रही थी,

लल्लू: जीजी नाटक मत करो मुझे पता है तुम जाग रही हो,

लल्लू ने सूट के ऊपर से ही उसकी चूची को हल्के से दबाते हुए कहा तो नंदिनी तुरंत उठ कर बैठ गई और लल्लू बेशर्मी से उसकी ओर देख कर हंसने लगा,

नंदिनी: क्या परेशानी है तुझे सो नहीं सकता चुप चाप।

लल्लू: ये समय सोने का नहीं है मेरी प्यारी जीजी, ये तो बढ़िया चित्रहार देखने का समय है,

लल्लू ने बेशर्मी से मुस्कुराते हुए कहा,

नंदिनी: तू किसी दिन बुरा फंसवाएगा,

लल्लू: अच्छा सच्ची सच्ची बताओ तुम्हारा मन नहीं देखने का,

इस पर नंदिनी चुप हो गई और बिस्तर से उठ गई, दोनों दबे पांव चलते हुए कमरे के बाहर पहुंचे और फिर दरवाज़े की झिरी पर आंख लगा दी और अंदर का दृश्य देख कर दोनों के ही बदन में गर्मी बढ़ गई,

अंदर बिस्तर पर उनकी मां लता अपनी साड़ी को कमर पर तक उठा करके घोड़ी बनी हुई थी और उनके पीछे उनके पापा थे जो मां की कमर थामे पीछे से उनके चूतड़ों में धक्का लगा रहे थे,



दोनों ही कम से कम आवाज़ करने की कोशिश कर रहे थे, लल्लू ने अंदर देखते हुए ही नंदिनी की कमर पर हाथ चलाना शुरू कर दिया, नंदिनी ने उसका हाथ झटक दिया हालांकि उत्तेजना तो उसकी भी चरम पर थी पर वो जताना नहीं चाहती थी, लल्लू भी कहां हार मानने वाला था, उसने दोबारा से रख लिया और इस बार नंदिनी ने नहीं हटाया, लल्लू उसकी कमर सहलाते हुए अंदर देखने लगा, दोनों के चेहरे भी एक दूसरे के बगल में थे,

लल्लू: आह जीजी पापा मस्त चोद रहे हैं न मां को, देखो मां के चूतड़ कैसे लहरा रहे हैं,

लल्लू फुसफुसाते हुए नंदिनी के कान में बोला, उसकी इन बातों का असर नंदिनी पर भी हो रहा था पर उसने उसे हल्का सा मारा जैसे कह रही हो चुप रह,

लल्लू: पर एक कमी कर रहे हैं पापा,

लल्लू नंदिनी के सूट के अंदर हाथ घुसाते हुए उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा,

नंदिनी ने बिना सोचे समझे ही पूछ लिया: क्या?

जैसे ही उसे अपनी नंगी कमर पर लल्लू का हाथ महसूस हुआ,

लल्लू: पापा को मां को पूरा नंगा करके चोदना चाहिए, इतना सुंदर बदन है पूरा नंगा करके ही मजा लेना चाहिए।

नंदिनी इस बात पर कुछ नहीं बोली पर मन ही मन वो भी इस बात से सहमत थी,

लल्लू ने झिरी से अपनी आंख हटाई और नंदिनी के पीछे आ गया और सूट के अंदर ही ऊपर हाथ सरकाने लगा और पीछे से उसकी गर्दन चूमने लगा, नंदिनी अब उसे रोक नहीं रही थी वो बस अंदर देख रही थी लल्लू की हरकतों से गरम होते हुए, लल्लू के तो मजे ही मजे थे, उसके हाथ नंदिनी के संतरों तक पहुंच चुके थे और उसने उन्हें धीरे धीरे दबाना भी शुरू कर दिया था, अपनी बहन के चूचों का वो कोमल अहसास पाकर लल्लू का लंड लोहे जैसा हो गया था, जो पीछे से नंदिनी के चूतड़ों में चुभ रहा था, कुछ पल बाद ही नंदिनी ने चेहरा हटाया और उसकी ओर देख मुस्कुराई और उसके कान में फुसफुसा कर बोली अब अंदर देख, लल्लू ने नंदिनी के पीछे से हट कर झिरी पर दोबारा आंख लगाई और सामने का दृश्य देख कर हैरान और खुश हो गया, कमरे के अंदर उसकी मां बिस्तर के नीचे खड़ी थी उसकी साड़ी और सारे कपड़े भी नीचे पड़े थे और उसकी मां पूरी नंगी खड़ी थी लता के फैले हुए मोटे चूतड़ उनकी ओर थे वहीं उसके पापा बिस्तर पर थे और उसकी मां के होंठों को चूस रहे थे,



उसके पापा के हाथ मां की पीठ को सहलाते हुए नीचे सरक रहे थे और कुछ ही पलों में चूतड़ों को मसलने लगे, हालांकि लल्लू ने खेत में अपनी मां की गांड को कई बार देखा था पर इस तरह देखने का अलग ही एहसास था,

इसी बीच लल्लू को अपना पजामा नीचे खिसकता हुआ महसूस हुआ और अगले ही पल उसका पाजामा उसकी जांघो के नीचे था और फिर उसके लंड पर उसे अपनी बहन का हाथ महसूस हुआ, नंदिनी की उंगलियों ने उसके कड़क लंड को कस लिया, लल्लू ने किसी तरह खुद को आवाज़ करने से रोका, उसने पीछे मुड़ने की कोशिश की पर नंदिनी ने उसे मुड़ने नहीं दिया, लल्लू वापस अंदर देखने लगा वहीं नंदिनी पीछे से एक हाथ से उसके लंड को हिलाने लगी, पर उसकी खुद की चूत में खुजली तेज होती जा रही थी,

उसने लल्लू का एक हाथ पकड़ कर पीछे किया और अपनी चूत पर रख दिया सलवार के ऊपर ही, लल्लू भी अपनी बहन की चूत की गर्मी पाकर उसे उंगलियों से छेड़ने लगा सहलाने लगा, अब दोनों भाई बहन एक दूसरे को सुख दे रहे थे वहीं दोनों ही कमरे के अंदर भी देख रहे थे,

जहां अब नंगी लता बिस्तर पर लेटी थी और उसके पति मगन उसकी टांगों के बीच थे लंड चूत में था और दोनों हाथों से उसकी कामुक मादक कमर पकड़ कर अपना लंड तेजी से उसकी चूत में पेल रहे थे



लता किसी तरह अपनी आहें तेज होने से रोक रही थी, वहीं बाहर दोनों भाई बहन भी एक दूसरे को अपने अपने हाथों से चरम पर ले जा रहे थे,

अपनी मां की नाचती चूचियों और चुदाई देख कर लल्लू का बुरा हाल हो रहा था नंदनी के हाथ में उसका लंड झटके मार रहा था और फिर लल्लू का बदन अकड़ गया उसके पंजे कस गए, उसने मज़ा से आंखे मूंद लीं और वो झड़ने लगा, एक के बाद एक पिचकारी नंदिनी की मुट्ठी को सनाने लगी और मुट्ठी से टपक कर रस नीचे गिरने लगा, झड़ने के बाद लल्लू शांत हुआ तो नंदिनी ने अपना हाथ हटाया, लल्लू ने पजामा ऊपर चढ़ा लिया और अब खुद नंदिनी को आगे कर उसके पीछे आ गया, नंदिनी ने अपना चेहरा झिरी पर लगा दिया और अंदर देखने लगी, लल्लू ने पीछे से एक हाथ उसकी चूचियों पर रखा दूसरे हाथ को उसकी सलवार में घुसा कर कच्छी के ऊपर से उसकी चूत मसलने लगा, नंदिनी उसके हाथों में मचलते हुए अंदर देखने लगी तभी उसे सामने अपनी मां का बदन अकड़ते हुए दिखा और वो स्खलित होने लगी, उसकी मां के स्खलित होते ही उसके पापा ने भी अपना लंड लता की चूत से निकाला तो नंदिनी की नज़र अपने पापा के लंड पर पड़ी जो बिल्कुल अकड़ा और फूला हुआ था और झटके खा रहा था, अपने पापा का लंड देख कर नंदिनी के बदन में अलग प्रकार की सिहरन होने लगी और वो अगले ही पल कांपते हुए झड़ने लगी, उसका बदन लल्लू की बाहों में ढीला पड़ गया, वहीं उसी समय मगन का लंड भी फूल कर एक के बाद वो धार छोड़ने लगा जो लता के पेट और चूचियों को भिगाने लगी,

झड़ने के बाद नंदिनी और लल्लू ने तुरंत कपड़े ठीक किए और अपने अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए और सोने का नाटक करने लगे वहीं थोड़ी देर बाद लता और मगन भी आकर सो गए।

इसी समय रत्ना अचानक से उठी थी, चेहरे पर चिंता थी बदन पसीने से भीगा था सांसे तेज हो रही थी,



उसने फिर से वैसा ही सपना देखा था जो उसे परेशान कर रहे थे कई दिनों से, इस बार भी वही सपना जिसमें वो बिल्कुल नंगी थी और नदी के किनारे लेटी थी ठंडा रेत उसकी पीठ पर महसूस हो रहा था और उसके ऊपर एक मर्द था जिसका मोटा लंड उसकी चूत में घुसा हुआ था वो झुक कर उसकी मोटी मोटी चूचियों को चूस रहा था, और फिर तभी चूचियों को मुंह से निकाल कर वो अपना चेहरा ऊपर करता है और रत्ना को उसका चेहरा दिखता है वो चेहरा भूरा का था, और उसे देखते ही रत्ना की नींद खुल जाती है, बिस्तर पर बैठे हुए वो सपने के बारे में सोचने लगती है ऐसे सपने उसे क्यों आ रहे हैं बार बार, उसका अंधविश्वासी मन इनके पीछे के कारणों को समझने का प्रयास करता है, तभी उसका ध्यान एक चीज पर जाता है, वो अपना हाथ जांघों के बीच लगा कर देखती है उसकी चूत गीली थी, और अपनी उंगलियां लगाते ही उसके बदन में बिजली दौड़ जाती है वो तुरंत उंगलियां हटा लेती है, बगल वाली खाट पर ही रानी सो रही थी वो एक बार उसके चेहरे को देखती है और दोबारा से लेट जाती है सोने की कोशिश में, हजारों खयाल मन में लिए।

गांव में अगली सुबह होती है, धूप की पहली किरण जब तक गांव की मिट्टी को छूती तब तक तो गांव में सब उठ चुके थे, केला बाबा जंगल से वापस अपनी कुटिया की ओर लौट रहे थे उनके मन में निराशा थी, मन में पिछले दिनों की बातें घूम रही थी उनके खुद के राज़ जो उन्हें डरा भी रहे थे और परेशान भी कर रहे थे,

बात वहां से शुरू होती है जबसे बाबा ने फुलवा को उस टोटके के बारे में बताया था तो उनके मन में अपना ही उल्लू सीधा करने की लालसा थी, सोचा था कि कुछ नहीं तो सुबह सुबह फुलवा के नंगे बदन के दर्शन हो जाया करेंगे। इसी सोच में टोटका बताने के अगले दिन ही वो सुबह सुबह जंगल में पहुंच गए और छुप कर इधर उधर देखने लगे थोड़ा इधर उधर देखने के बाद ही उन्हें फुलवा नज़र आ जाती है

उनके कहे अनुसार ही बिल्कुल नंगी, गीला बदन वो पेड़ की तरफ़ बढ़ रही होती है,



उसके नंगे बदन और थिरकते चूतड़ों को देख कर केला का केला कड़क होने लगता है, केला मन में सोचते हैं: हाय इस उमर में भी फुलवा का बदन कमाल का है, इस उम्र के पड़ाव में भी फुलवा के बदन ने अपनी कामुकता नहीं खोई है,

फुलवा आगे बढ़ी, केलालाल के बताए पेड़ के पास पहुंची। फिर झुक गई… और और झुक गई। उसके मोटे चूतड़ फैल गए, चूत के गुलाबी होंठ खुलकर चमक उठे, जैसे कोई रसीली अमरूद फटकर तैयार हो। वो दृश्य देख केलालाल का दिल धड़कने लगा। पेड़ के पीछे छिपे-छिपे उन्होंने धोती खोली, कड़क लंड बाहर निकाला और मुट्ठी में भर हिलाने लगे। “आह्ह… फुलवा… तेरी चूत कितनी गीली लग रही है!”

लेकिन तभी… एक साया!

पीछे से, शॉल ओढ़े कोई काला साया फुलवा के ठीक पीछे आ खड़ा हुआ। फुलवा को तो खबर ही नहीं थी। साया ने उसे झटके से पकड़ा, लंगोट खोली और… एक ही धक्के में अपना मोटा-मोटा लंड फुलवा की चूत में घुसेड़ दिया! फुलवा की चीख निकली— “आआह्ह…” लेकिन साया ने उसका मुंह दबाया और जोर-जोर से पेलने लगा। उसके हर धक्के पर फुलवा के चूतड़ लहरा रहे थे, दूधिया स्तन झूल रहे थे, चूत से चिकचिक की आवाज़ गूंज रही थी। केलालाल बस देखते रह गए। उनका लंड हाथ में था, लेकिन हिलाने की हिम्मत नहीं। गुस्सा, जलन, हवस—सब एक साथ उबल पड़ा। वो साया फुलवा को जंगली जानवर की तरह चोद रहा था। फिर अचानक झड़ गया—फुलवा की चूत में गरम-गरम वीर्य की धार उड़ेल दी और फुर्ती से जंगल में गायब!

केलालाल दौड़ नहीं पाए। उम्र ने उन्हें धीमा कर दिया था। वो बस लौट आए अपनी कुटिया में। रात भर मलाल हुआ— “मेरा बिछाया जाल… किसी और ने फुलवा की चूत मार ली! मेरी योजना… सब बर्बाद!”

अगले कई दिन यही नौटंकी चली। रोज़ सुबह केलालाल छिपकर देखते। रोज़ वही साया आता, फुलवा को पेड़ के पास चोदता… और केलालाल का गुस्सा बढ़ता जाता। आखिरकार एक दिन उन्होंने ठान लिया— “इस साए को खत्म करना होगा! नहीं तो फुलवा कभी मेरे लंड के नीचे नहीं आएगी!”

पूरे दिन जंगल में घूमे। जहरीले पत्ते चुनें—लाल नागफनी, काला धतूरा, मौत का फूल। रात भर चूल्हे पर पकाया, चूर्ण तैयार किया। ऐसा जहरीला कि एक कण भी मुंह में गया तो प्राण निकल जाएं। सुबह होते ही केलालाल की आंखों में चमक थी। “आज तेरा काल है, साए!”

सुबह हुई। फुलवा आई, नंगी, झुकी। साया आया, चोदा, झड़ा और भागा। लेकिन इस बार केलालाल ने जगह बदल ली थी। वो साए के रास्ते पर छिपे थे। जैसे ही साया सामने से गुजरा—केलालाल ने झटके से चूर्ण उसके मुंह पर फेंक दिया!

“उफ्फ…!” साया ने चीखा। कुछ पल बाद आंखें लाल, सांस फूलने लगी। वो गिर पड़ा। केलालाल ने झुककर चेहरा देखा… और तो और… प्यारेलाल!

“अरे… प्यारेलाल? तू…?” केलालाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। प्यारेलाल की आंखों में मौत उतर चुकी थी। कुछ ही पलों में प्राण निकल गए। जंगल में सन्नाटा छा गया।

केलालाल भागे। कुटिया में घुसकर कांपते हुए बैठ गए। लेकिन कुछ घंटों बाद गांव में हल्ला मच गया— “प्यारेलाल की लाश जंगल में! नदी किनारे!”

उस दिन के बाद फुलवा जंगल नहीं आई। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं… आज भी नहीं। केलालाल रोज़ सुबह जाते, छिपकर देखते, लेकिन फुलवा का नंगा बदन अब दिखता ही नहीं।

अपनी कुटिया में बैठे उनके मन में सिर्फ एक ही ख्याल था— “अच्छा खासा चुदाई का मौका था… बेचारा प्यारेलाल बेकार में मर गया… और मैं अब भी तड़प रहा हूं। फुलवा की वो चूत… वो चूतड़… कब मिलेंगे?”

अब केलालाल कुछ नया प्रबंध सोचने लगे। क्योंकि हवस अभी बाकी थी… और फुलवा का बदन अभी भी उनके सपनों में नाच रहा था, चूत फैलाकर, चूतड़ हिलाकर, जैसे वो उन्हें चिढ़ा रही हो,

केलालाल सोचने लगे कि क्या फायदा मेरे इतना ज्ञानी होने का जो एक चूत न मिल पाए मुझे, कुछ न कुछ करना होगा मुझे।



जारी रहेगी।
 
अब केलालाल कुछ नया प्रबंध सोचने लगे। क्योंकि हवस अभी बाकी थी… और फुलवा का बदन अभी भी उनके सपनों में नाच रहा था, चूत फैलाकर, चूतड़ हिलाकर, जैसे वो उन्हें चिढ़ा रही हो,

केलालाल सोचने लगे कि क्या फायदा मेरे इतना ज्ञानी होने का जो एक चूत न मिल पाए मुझे, कुछ न कुछ करना होगा मुझे।



अध्याय 28


सत्तू घर आकर थककर सो गया था, लेकिन झुमरी के मन में राजेश नाम की परेशानी घूम रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। राजेश का व्यवहार और उसकी बातें—कल शाम की गोदाम की घटना का उल्लेख—उसके दिमाग में अटका हुआ था। वो सोच रही थी कि आगे क्या होगा, और उसका मन घबराहट से भर गया था।

अगली सुबह झुमरी जल्दी उठ गई। रात भर उसकी आँखों में नींद नहीं थी। राजेश के शब्द बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे — “कल शाम को गोदाम में अच्छे से आराम किया था ना ताई? ताऊजी के साथ?” उसका दिल धड़क रहा था। उसे लगा कि आज ही सुभाष से मिलकर सारी बात बतानी होगी, वरना राजेश कुछ भी कर सकता है।

वो हाथ में लोटा लेकर खेतों की ओर निकल पड़ी। सुभाष से मिलने का पुराना ठिकाना था — उनके खेतों के पीछे वाला अरहर का खेत। फसल लंबी थी, बाहर से कोई देख नहीं सकता था। झुमरी तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी, मन ही मन मना रही थी कि सुभाष जल्दी आ जाए।

खेत में पहुँचकर वो इधर-उधर देखने लगी। तभी अचानक किसी ने पीछे से उसकी कमर पकड़ ली। दो मजबूत हाथ उसकी कमर पर कस गए। झुमरी चौंक गई, उसकी जान में जान आई। “आ गया सुभाष,” मन ही मन सोचते हुए वो मुस्कुराई। लेकिन दूसरे हाथ ने भी कमर थाम ली और पीछे से पूरी तरह चिपक गया। झुमरी को एहसास हुआ — ये सुभाष नहीं है

झुमरी का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने तुरंत खुद को छुड़ाने की कोशिश की — “राजेश! ये क्या कर रहा है तू? छोड़ मुझे!”

राजेश उसे कस के बाहों में जकड़ लेता है और कान में फुसफुसाता है, “ताई चुपचाप खड़ी रहो और मेरा साथ दो, वही तुम्हारे लिए अच्छा होगा।”

झुमरी उसकी धमकी से सहम जाती है। राजेश के हाथ झुमरी के बदन पर फिसलने लगते हैं।

झुमरी: आह लल्ला ये गलत है लल्ला ऐसा मत कर, मैं रिश्ते में तेरी ताई लगती हूं तू मुझे ताई कहता है न मत कर ये पाप लल्ला।

राजेश कुछ नहीं कहता और हाथों को रत्ना की कमर और पेट पर चलाते हुए उसके गले को चूमता है। झुमरी का डर से बुरा हाल होता है।



झुमरी: लल्ला तू तो कितना समझदार है तू खुद देख मैं उमर में तेरी मां सुधा से भी बड़ी हूं तेरी ताई पुष्पा से भी और तू मेरे साथ ये कर रहा है ये गलत है लल्ला।

राजेश: आह ताई तुम्हारा बदन कितना मस्त है आह भरा हुआ और कामुक ओह।

झुमरी: मत कर लल्ला ये सब गलत है तू समझ क्यों नहीं रहा।

राजेश: देखो ताई मुझे सही गलत मत बताओ, सोचो तुम्हारी और ताऊ की बात गांव में फैल गई तो सही होगा या गलत?

वहीं ये सुनते ही झुमरी की सांस अटक गई। उसका चेहरा और पीला पड़ गया। राजेश की ये धमकी उसके दिल में चुभ गई। वो मन ही मन सोचने लगी — “नहीं… किसी को पता नहीं चलना चाहिए… नहीं तो मैं बर्बाद हो जाऊंगी… सत्तू का क्या होगा… गांव में रहने लायक नहीं बचूंगी… नहीं… नहीं… मुझे राजेश को अपने काबू में रखना होगा… चाहे कुछ भी करना पड़े…”

राजेश ने उसका पल्लू नीचे सरका दिया। उसका ब्लाउज और नंगी कमर-पेट सामने आ गया। झुमरी अब विरोध नहीं कर रही थी। उसने ठंडे दिमाग से फैसला कर लिया — “किसी तरह इसका पानी निकलवा दूँ… तो ये शांत हो जाएगा…”

राजेश उसकी गर्दन को चूम रहा होता है और फिर उसके चेहरे को अपनी ओर घुमा कर उसके होंठों से अपने होंठ मिला देता है। झुमरी एक पल को उसे धकेलने की सोचती है पर अपनी बात याद आते ही उसका साथ देने लगती है। राजेश के हाथ उसके पेट और बदन को मसल रहे होते हैं। झुमरी का साथ पाकर राजेश मन ही मन खुश होता है, झुमरी के होंठों को अच्छे से चूसने लगता है। वहीं झुमरी जो मन ही मन राजेश को अपने काबू में लेने की सोच रही थी, राजेश की हरकतों से खुद भी उत्तेजित होने लगती है। अपने बेटे से भी छोटे लड़के के साथ ये करने का एहसास उसे गरम कर देता है।



राजेश बाहर से सख्त बन रहा था, लेकिन अंदर से थोड़ा घबराया हुआ था। वो रात भर सोचता रहा था कि कैसे झुमरी को काबू में लाएगा। सुबह से ही उसने झुमरी के घर पर नजर रखी थी और जैसे ही वो निकली, उसका पीछा किया था। अब जो हो रहा था, वो सब वैसा ही था जैसा उसने सोचा था। लेकिन झुमरी का ये अचानक साथ देना उसे और उत्तेजित कर रहा था।

उसे पता था झुमरी ताई इतनी जल्दी काबू में नहीं आने वाली, उसकी धमकी का असर झुमरी पर अच्छे से हुआ था, उसका लंड कड़क हो कर पीछे से झुमरी के चूतड़ों में चुभ रहा था, जो कहीं न कहीं झुमरी को भी उत्तेजित कर रहा था, दोनों के होंठ अलग होते हैं और राजेश हांफते हुए कहता है

राजेश: आह मज़ा आ गया ताई, ओह तुम्हारे होंठ बहुत रसीले हैं,

झुमरी कुछ नहीं कहती और शर्मा जाती है, राजेश को झुमरी का शर्माना बहुत भाता है वो उसके चेहरे और सीने को चूमते हुए नीचे बैठ जाता है

राजेश झुमरी की कमर को पकड़े हुए नीचे बैठ जाता है और उसके मखमली पेट को चाटने लगता है। उसकी जीभ नाभि के गड्ढे में घुसती है और चूसने लगती है। झुमरी का बदन सिहर उठता है। उसकी आंखें बंद हो जाती हैं, लेकिन मन में द्वंद्व चल रहा है — “क्या कर रही हूं मैं? ये मुझसे इतना छोटा है और मैं गरम हो रही हूं… पर अगर मैंने इसे शांत नहीं किया तो सारा राज खुल जाएगा।”

झुमरी ने फैसला कर लिया। वो राजेश को अपने काबू में लेने के लिए उसका साथ देने लगी। उसने हल्की सी आह भरी और कामुक आवाज में बोली, “आह लल्ला… तेरा मुंह कितना गरम है… मेरे पेट को ऐसे ही चाट… आह… ।”

राजेश को ये सुनकर और जोश आया। वो और तेजी से पेट चाटने लगा।



राजेश ने झुमरी का पेट और नाभि चाटते हुए ऊपर देखा और मुस्कुराया, “ताई, तुम्हारा पेट कितना मीठा है… आह… मैं तो खा ही जाऊँगा…”

झुमरी ने मन ही मन सोचा — “अब जल्दी से इसका पानी निकाल दूँ…” वो नीचे बैठ गई, राजेश के सामने घुटनों पर। उसने राजेश की पैंट के ऊपर से ही उसके लंड को सहलाना शुरू कर दिया। राजेश का लंड पहले से ही कड़क था। झुमरी ने पैंट का बटन खोला, चैन नीचे खींची और लंड बाहर निकाल लिया।

झुमरी ने गर्म लंड को हाथ में थामा और हिलाने लगी। “आह लल्ला… कितना मोटा और गर्म है तेरा हथियार… आह… तू तो बहुत बड़ा हो गया है…”

राजेश बाहर से सख्त दिख रहा था, लेकिन अंदर से थोड़ा घबराया हुआ था। उसने रात भर सोचा था कि कैसे बात करेगा, क्या करेगा। लेकिन अब झुमरी का हाथ उसके लंड पर चल रहा था। वो भी निचे घुटनों पर बैठ गया उसके हाथ झुमरी के ब्लाउज़ के ऊपर पहुंच गए वो झुमरी की मोटी चूचियों को दोनों हाथों से दबाने लगा।

झुमरी के बदन में भी सिहरन होने लगी राजेश के हाथों से चूचियों को दबवाने पर अभी उसके लिए राजेश का पानी निकालना जरूरी था, इसलिए वो कामुक स्वर में बोली, “आह लल्ला… मेरी चूचियों को दबा रहा है… आह… तुझे ताई की चूचियाँ पसंद हैं न… दबा… जोर से दबा…”

राजेश की सांसें तेज हो गईं। झुमरी ने अपनी गति बढ़ाई, लंड को तेजी से हिलाने लगी। “आह लल्ला… … आह… तू जल्दी से झड़ जा… अपनी ताई की मुट्ठी में अपना रस निकाल दे…”

राजेश का बदन अकड़ने लगा। उसने झुमरी की चूचियों को और जोर से दबाया। झुमरी ने लंड को और तेज हिलाया और फुसफुसाया, “आह लल्ला… झड़ जा… अपनी ताई के हाथ में झड़ जा… आह…”

राजेश एक जोरदार झटके के साथ झड़ गया। उसके लंड से एक के बाद एक गर्म धारें निकलीं, झुमरी की उंगलियों और हाथ को सना दिया। राजेश हाँफते हुए झुक गया। झुमरी ने हाथ से रस पोंछा और राजेश को देखा।

राजेश ने घबराते हुए कहा, “ताई… मैं… मैं…”

झुमरी ने उसे शांत करते हुए कहा, “चुप रह लल्ला… अब शांत हो गया न? अब किसी को कुछ मत बताना… समझे?”

राजेश ने सिर हिलाया। झुमरी उठी, अपने कपड़े ठीक किए और जल्दी से वहाँ से निकल गई। उसके मन में अब नई चिंता थी — राजेश को काबू में रखना होगा, लेकिन उसका अपना बदन भी इस स्पर्श से गरम हो चुका था।

राजेश वहीं बैठा रह गया, सांसें संभालते हुए। उसकी योजना कामयाब हो गई थी, लेकिन अब आगे क्या होगा, ये सोचकर वो भी थोड़ा घबराया हुआ था। उसने अपनी पैंट पहनी और वो भी पीछे की तरफ से खेत से बाहर निकल गया।

दूसरी ओर राजेश की बहन नीलम भी सुबह सुबह ही लोटा लेकर निकली थी और उसकी समझ नहीं आ रहा था क्या करे, एक ओर वो नंदिनी से बात करना चाहती थी, पर समझ नहीं आता था कैसे शुरूआत करे साथ ही उसकी मां और ताई के बीच के वो दृश्य बार बार उसकी आंखों के सामने घूम जाते वो सिहर उठती, फिर उसे रानी की कही हुई बात याद आई और उन्हें ही सोच कर उसने फैसला किया कि वो नंदिनी से जाकर बात करेगी और सुबह ही नंदिनी के दरवाज़े पर जा लगी, जैसे ही वो पहुंची तो लता बाहर ही निकल रही थी,

नीलम: प्रणाम ताई।

लता: खुश रह मेरी लाली, जुग जुग जियो, जल्दी तेरा एक राजकुमार से ब्याह हो।

नीलम: अरे ताई तुम भी,

लता: जा नंदिनी सो ही रही है अभी उठा ले और खेत जाओ तो सांकर लगा जाना।

नीलम लता की बात सुन कर अंदर चलीं जाती है और लता लोटा लेकर अपनी मंडली की ओर, मदन और लल्लू भी खेत के लिए निकल गए थे, नीलम अंदर पहुंची तो पाया नंदिनी आंगन में खाट पर सो रही थी,

नीलम उसके पीछे खाट पर चढ़ कर बैठ जाती है और उसे हिलाकर जगाती है पर नंदिनी नहीं जागती और सीधा होकर सो जाती है



नीलम: अरे बाबा इस लड़की की नींद तो देखो, पता नहीं रात को कौन सा काम करती है जो अभी तक सो रही है इतनी गहरी नींद में।

नीलम एक दो बार आवाज और देती है पर नंदिनी टस से मस नहीं होती, नीलम हार कर अपनी सहेली के चेहरे को देखती है जो सोते हुए बहुत सुंदर लग रहा था,

कुछ भी हो जैसी भी है कुतिया है तो बहुत सुंदर, नीलम मन ही मन सोचती है और मैं इस से लड़ने चली थी, पर आज इसे मनाने आई हूं तो इसकी नींद नहीं खुल रही,

नीलम सोचने लगती है उनके बीच की लड़ाई के बारे में क्यों हुई थी और जब अब सोचती है तो उसे लगता है कि वो बेकार में ही नंदिनी पर बरस पड़ी थी, इस दुनिया में कौन है जो इस बदन की प्यास से नहीं परेशान? अपनी मां और ताई को साथ में वो सब करते देखा था तब से उसके विचार बदल गए थे, और वो खुद सोचने लगी थी कि अगर ये सब इतना ही गलत होता तो सब इसके पीछे क्यों पागल होते, और क्या वो खुद ये नहीं चाहती क्या जब नंदिनी ने उसे छुआ था उसे अच्छा नहीं लगा था, पर अभी के लिए नीलम ने ये विचार दिमाग से निकाले

नीलम शरारत भरी मुस्कान के साथ अपने चेहरे को नंदिनी के चेहरे के करीब लाई। सोती हुई नंदिनी का चेहरा इतना निष्पाप और सुंदर लग रहा था कि नीलम का दिल धड़कने लगा। वो धीरे से झुकी और अपने होंठ नंदिनी के रसीले होंठों पर रख दिए। एक हल्का, नरम चुम्बन। नंदिनी की नींद में भी होंठ हल्के से हिले, लेकिन वो जागी नहीं।

नीलम ने फिर से झुककर एक और चुम्बन लिया, इस बार थोड़ा लंबा। नंदिनी के होंठों की कोमलता और गर्मी उसे अजीब सा रोमांच दे रही थी। ठीक उसी पल नंदिनी की नींद टूटी और उसके मुंह से अनजाने में निकल गया — “लल्लू… रहने दे… मानेगा नहीं तू?”

नीलम चौंक गई। उसकी आँखें फैल गईं। “लल्लू?” उसके दिमाग में सवालों का तूफान उठ गया। नंदिनी की आँखें भी धीरे-धीरे खुलीं। पहले तो वो नींद की धुंध में थी, लेकिन जैसे ही सामने नीलम का चेहरा दिखा, वो पूरी तरह जाग गई।

दोनों एक पल के लिए सुन्न रह गईं। नंदिनी को तुरंत समझ आ गया कि जिसने उसे चूमा, वो नीलम थी। अब बात को कैसे ढकें, कुछ समझ नहीं आ रहा था। नंदिनी ने बिना सोचे-समझे तुरंत अपना हाथ बढ़ाया, नीलम के गाल को पकड़ा और उसे अपनी ओर खींच लिया। अगले ही पल उसके होंठ नीलम के होंठों से जा टकराए।

ये चुम्बन पहले तो सिर्फ बचाव के लिए था, लेकिन जैसे ही दोनों के होंठ मिले, नंदिनी की उत्तेजना जाग उठी। नीलम भी पीछे नहीं हटी। बल्कि वो भी नंदिनी का पूरा साथ देने लगी।



दोनों की उंगलियाँ एक-दूसरे के चेहरे और बालों में फंस गईं। होंठ एक-दूसरे को चूसने लगे — पहले धीरे-धीरे, फिर प्यास और जोश के साथ।

नीलम की सांसें तेज हो गईं। नंदिनी की जीभ उसके होंठों के बीच सरक आई, और नीलम ने भी उसका स्वागत किया। दोनों की जीभें आपस में उलझ गईं, एक-दूसरे का रस चखने लगीं। नंदिनी का एक हाथ नीलम की पीठ पर फिसल गया और उसे और करीब खींच लिया। नीलम भी नंदिनी की कमर को पकड़कर उसके बदन से चिपक गई।

दोनों के होंठ अलग नहीं हो रहे थे। चुम्बन और गहरा, और जोशीला होता जा रहा था। नंदिनी के मुंह से एक हल्की सी सिसकी निकली, जो नीलम के मुंह में घुट गई। नीलम का बदन भी गर्म होने लगा। दोनों सहेलियाँ, जो कल तक एक-दूसरे से नाराज थीं, आज एक-दूसरे के होंठों में खोई हुई थीं।

कुछ पल बाद दोनों की सांसें हाँफने लगीं। होंठ अभी भी जुड़े हुए थे, लेकिन अब धीरे-धीरे अलग होने लगे। दोनों की आँखें खुलीं। नंदिनी और नीलम एक-दूसरे को देख रहे थे — शर्म, उत्तेजना और पुरानी दोस्ती का एक अजीब सा मिश्रण उनके चेहरों पर था।

नंदिनी ने धीरे से फुसफुसाया, “नीलम…”

नीलम ने जवाब में बस मुस्कुराकर नंदिनी के होंठों को एक बार फिर हल्का सा चूम लिया।

नंदिनी: हाय मेरी लाडो… आखिर आ ही गई मेरे पास।

नंदिनी ये कहते हुए खुशी से भर गई। उसकी आँखों में चमक आ गई और वो तुरंत आगे बढ़कर नीलम को जोर से गले लगा लिया। दोनों बचपन की सहेलियाँ थीं — एक-दूसरे को इतना प्यार करती थीं कि झगड़ा होने पर भी दिल टूट जाता था। नीलम को पास देखकर नंदिनी का मन एकदम हल्का हो गया।

नीलम भी नंदिनी की गर्म बाहों में समा गई और धीरे से बोली, “हाँ री… तुझसे और देर नाराज़ नहीं रह पाई।”

नंदिनी ने उसे और कसकर गले लगाया, “मैं हूँ ही इतनी अच्छी… हिहीही।”

नीलम हँसते हुए बोली, “है तो… बहुत अच्छी है मेरी सहेली।”

नंदिनी ने थोड़ा पीछे हटकर नीलम की आँखों में देखा और शरारत से पूछा, “तो अब तो मुझे सुधारने की कोशिश नहीं करेगी न?”

नीलम ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “नहीं री… अब तो मैं खुद बिगड़ने आई हूँ। खूब बिगड़ूँगी। बता… बिगाड़ेगी मुझे?”

नंदिनी की आँखों में एक चमक आ गई। वो खिलखिलाकर बोली, “अरे नेकी और पूछ-पूछ! पहले बता… माँ खेत गई हैं न?”

नीलम ने सिर हिलाया, “हाँ… गई हैं।”

नंदिनी ने नीलम का हाथ पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “तो आ जा मेरी जान…”

ये कहते हुए नंदिनी ने अपना सूट पकड़कर एक ही झटके में ऊपर की ओर खींच लिया। सूट उसके सिर से निकलकर एक तरफ गिर गया और फिर सलवार को भी नाडा खोल कर निकाल दिया। अब नंदिनी सिर्फ ब्रा और कच्छी में खड़ी थी — उसकी गोरी, मोटी चूचियाँ ब्रा में कसी हुई थीं, और उसकी कमर की नरम त्वचा चमक रही थी।

फिर नंदिनी ने नीलम की ओर हाथ बढ़ाया। नीलम ने भी कोई विरोध नहीं किया। नंदिनी ने उसका सूट भी धीरे-धीरे ऊपर खींचा। नीलम ने हाथ उठाकर मदद की और फिर उसकी सलवार भी उसके पैरों से निकल गई। कुछ ही पलों में नीलम भी सूट उतारकर सिर्फ ब्रा और कच्छी में खड़ी हो गई। दोनों सहेलियाँ अब एक-दूसरे के सामने लगभग नंगी थीं।

नंदिनी ने नीलम को अपनी ओर खींचा। दोनों की आँखें एक-दूसरे में गड़ गईं। नंदिनी ने धीरे से नीलम के गाल को छुआ और फिर आगे झुककर उसके होंठों को अपने होंठों में ले लिया।

चुम्बन शुरू हुआ — पहले तो नरम और प्यार भरा, लेकिन जैसे ही दोनों की सांसें मिलीं, वो गहरा और जोशीला हो गया। नंदिनी की जीभ नीलम के होंठों के बीच सरक गई। नीलम ने भी मुंह खोलकर उसका स्वागत किया। दोनों की जीभें आपस में उलझ गईं, एक-दूसरे का रस चखने लगीं।



नीलम का एक हाथ नंदिनी की पीठ पर फिसल गया और उसे और करीब खींच लिया। नंदिनी का हाथ नीलम की कमर पर था, जो धीरे-धीरे ऊपर सरककर ब्रा के नीचे तक पहुँच गया। दोनों की सांसें तेज हो गईं। होंठ अलग नहीं हो रहे थे। चुम्बन और गहरा होता जा रहा था।

कुछ पल बाद दोनों की सांसें हाँफने लगीं। होंठ अभी भी जुड़े हुए थे, लेकिन अब धीरे-धीरे अलग होने लगे। दोनों की आँखें खुलीं। नंदिनी और नीलम एक-दूसरे को देख रहे थे — शर्म, उत्तेजना और पुरानी दोस्ती का एक अनोखा मिश्रण उनके चेहरों पर था।

नंदिनी ने धीरे से फुसफुसाया, “नीलम…”

नीलम ने जवाब में बस मुस्कुराकर नंदिनी के होंठों को एक बार फिर हल्का सा चूम लिया। फिर उसकी आँखों में शरारत और प्यास दोनों चमक उठी। वो धीरे से बोली, “मुझे तेरे दद्दू पीने हैं…”

ये कहते हुए नीलम ने ब्रा के ऊपर से ही नंदिनी की भरी हुई चूचियों को दोनों हाथों से पकड़ लिया और धीरे-धीरे मसलने लगी। नंदिनी के मुंह से एक हल्की सी सिसकी निकली। नीलम की उंगलियाँ ब्रा के कपड़े के ऊपर से ही चूचियों की नरमाई और गर्मी महसूस कर रही थीं।

नंदिनी ने कामुक मुस्कान के साथ कहा, “तो पी ले मेरी जान… आज तेरे लिए सब कुछ खुला है।”

उसने तुरंत पीछे हाथ ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा ढीली हो गई और नंदिनी ने उसे एक झटके में उतारकर अलग फेंक दिया। अब उसकी नंगी, गोल और रसीली चूचियाँ — संतरे जैसी आकृति वाली, गुलाबी निप्पलों वाली — पूरी तरह नीलम के सामने थीं।

नीलम की आँखें चमक उठीं। वो तुरंत झुक गई और एक चूची को मुंह में भर लिया। उसने जोर से चूसना शुरू कर दिया, जैसे बहुत दिनों की प्यास बुझा रही हो। दूसरी चूची को हाथ से मसलते हुए उसकी उंगलियाँ निप्पल को हल्के से नोच रही थीं।

नंदिनी सिहर उठी, “आह्ह… नीलम… ओह मेरी लाडो… आह… इतना जोर से चूस… आह… तेरी जीभ कितनी गर्म है…”

नीलम ने चूची मुंह से निकालकर दूसरी चूची को मुंह में ले लिया। वो चूसते हुए बोल रही थी, “आह… तेरी चूचियाँ कितनी मीठी हैं… आह… मैं तो इन्हें खा ही जाऊँगी आज…”

नंदिनी के हाथ नीलम की पीठ पर घूम रहे थे। वो उसकी पीठ को सहला रही थी और बीच-बीच में नीलम के बालों को पकड़कर उसे और गहराई में दबा रही थी। “आह… चूस मेरी जान… आह… तेरी सहेली की चूचियाँ तुझे बहुत पसंद हैं न… आह… चूस… और जोर से…”

कुछ देर तक नीलम दोनों चूचियों को बारी-बारी चूसती रही। नंदिनी की सांसें तेज हो चुकी थीं और उसकी चूत पहले से ही गीली होने लगी थी।

फिर नंदिनी ने नीलम को धीरे से पीछे धकेला। नीलम लेट गई। नंदिनी मुस्कुराते हुए बोली, “अब मेरी बारी…” और नीलम के ऊपर झुकी।



उसने नीलम की ब्रा को भी उतार फेंका। नीलम की चूचियाँ बाहर आ गईं। नंदिनी तुरंत उन पर टूट पड़ी। एक चूची को मुंह में भरकर जोर-जोर से चूसने लगी, दूसरी को हाथ से मसल रही थी। नीलम की आहें निकलने लगीं, “आह… नंदिनी… ओह… आह… चूस मेरी चूचियाँ… आह… बहुत अच्छा लग रहा है…”

नंदिनी चूसते हुए बोली, “तेरी चूचियाँ भी कितनी रसीली हैं… आह… मैं भी इन्हें खा जाऊँगी आज…”

नीलम: ओह आह खा जा आह्ह्ह्ह मां बहुत मज़ा आ रहा है।

नंदिनी बदल बदल कर सहेली की चूचियों को चूस रही थी।

चूचियों को अच्छे से चूसने के बाद नंदिनी नीचे सरक गई। उसने नीलम के पेट को चाटना शुरू किया, फिर गहरी नाभि में जीभ डालकर चूसने लगी। नीलम मचलने लगी, “आह… नंदिनी… आह… मेरी नाभि… ओह… गुदगुदी हो रही है।

नंदिनी को नीलम का कोमल मखमली बदन चाटने में बहुत मज़ा आ रहा था, आज नीलम के इस तरह खुलने और सामने आने से वो बहुत खुश थी। उसकी नाभि को और पेट को अच्छे से चाटने के बाद वो नीचे सरकी और नंदिनी ने नीलम की कच्छी में उंगलियाँ फँसाई और उसे नीचे सरका दिया। नीलम की नंगी, गीली चूत अब उसके सामने थी। नंदिनी ने बिना रुके अपने होंठ नीलम की चूत से लगा दिए और चाटने लगी।

नीलम पागल सी हो गई, “आह्ह… नंदिनी… आह… चाट मेरी चूत… आह… जीभ अंदर डाल… ओह… मैं तेरी गंदी सहेली हूँ… आह… चाट… खा जा मेरी चूत को…”

नंदिनी पूरी शिद्दत से चाट रही थी। उसकी जीभ नीलम की चूत के होंठों को अलग करके अंदर घुस रही थी, कभी निप्पल जैसी छोटी गाँठ को चूस रही थी। नीलम की कमर उठ-उठकर नंदिनी के मुंह से चिपक रही थी। कुछ ही देर में नीलम का बदन अकड़ गया और वो जोर से झड़ गई — उसके रस की धार नंदिनी के मुंह में और चेहरे पर गिरने लगी। नंदिनी ने सारा रस चाट लिया और मुस्कुराते हुए ऊपर आई।

नीलम हाँफते हुए कुछ पल लेटी रही। फिर उसकी आँखों में नई चमक आई। उसने सोच लिया था — अब वो पहले की तरह किसी भी चीज में पीछे नहीं रहेगी।

उसने नंदिनी को लिटाया और खुद उसके टांगों के बीच बैठ गई। नंदिनी की चूत उसके सामने थी। नीलम ने झुककर होंठ लगा दिए और चाटना शुरू कर दिया। नंदिनी सिसकने लगी, “आह… नीलम… आह… चाट मेरी चूत… आह… बहुत अच्छा सीख रही है तू मेरी कुतिया आह… ओह… ओह मेरी चुद्दो सहेली… आह…”

नीलम भी पूरी लगन से चाट रही थी। कुछ देर बाद नंदिनी भी झड़ गई — उसके रस से नीलम का मुँह भीग गया।

दोनों सहेलियाँ अब पूरी तरह उत्तेजित थीं। नीलम ने नंदिनी की टांगों में अपनी टांगें फँसाईं। दोनों की चूतें एक-दूसरे से सट गईं। वो कमर हिलाने लगीं — चूतें आपस में घिसने लगीं। दोनों आहें भरते हुए गंदी बातें करने लगीं।



नीलम: “आह… नंदिनी… तेरी चूत मेरी चूत से घिस रही है… आह… कितनी गीली है तेरी… हम दोनों चुदक्कड़ सहेलियाँ हैं… आह…”

नंदिनी: “हाँ मेरी जान… आह… हम दोनों की चूतें प्यासी हैं… आह… घिस… और जोर से घिस… आह… हम गंदी सहेलियां हैं… चूत चाटने वाली… आह… चुदवाने वाली…”

दोनों की कमर तेजी से हिल रही थी। चूतें एक-दूसरे से रगड़ खा रही थीं। आहें और सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं। कुछ ही देर में दोनों एक साथ झड़ गईं — उनके रस एक-दूसरे की चूत पर फैल गए।

दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे की बाहों में लिपटकर लेट गईं। उनके चेहरों पर संतोष और नई दोस्ती नई कामुकता की मुस्कान थी।

नीलम फिर जल्दी से उठी और बोली: चल अब जल्दी से कपड़े पहन ले ताई आती ही होंगी।

नंदिनी: हां उनके बारे में तो मैं भूल ही गई।

दोनों जल्दी जल्दी कपड़े पहनती हैं, और कपड़े पहन कर सांकर लगा कर खेत की ओर निकल जाती हैं शौच के लिए, रस्ते में नीलम कुछ सोचते हुए कहती है: अच्छा एक बात पूछूं?

नंदिनी: हां पूंछ न।

नीलम: अभी जब हम बात नहीं कर रहे थे तो कुछ हुआ है क्या तेरे साथ?

नंदिनी: न नहीं तो तू ऐसा क्यों बोल रही है?

नीलम: जब मैने तेरे होंठों को चूमा तो तूने बोला लल्लू रहने दे, तो तूने लल्लू का नाम क्यों लिया, वो तुझे चूमता है क्या?

नीलम के इस सवाल से नंदिनी चौंक गई, उसे लगा था नीलम उस बारे में भूल जाएगी, पर अब नंदिनी को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले,

नंदिनी: अरे वो तो नींद में निकल गया होगा क्या पता।

नीलम ने कुछ सोचा और बोली: तुझे में बालपन से जानती हूं,और बता सकती हूं तू कब झूठ बोल रही है, और तू अभी झूठ ही बोल रही है,

नंदिनी ने ये सुन आंखें झुका ली, उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे। इतने दिनों बाद उसके और नीलम के बीच सब सही हुआ था और अब फिर से इस झूठ की वजह से कहीं नीलम गुस्सा न हो जाए, नंदिनी ने गहरी सांस ली और बोली: अगर बताउंगी तो मुझे गलत तो नहीं समझेगी।

नीलम ने उसकी ओर देखा और बोली: समझूंगी नहीं मैं पहले से ही तुझे गलत समझती हूं।

नीलम मुस्कुराते हुए बोली तो नंदिनी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई, नंदिनी अच्छा तो सुन, इसके बाद खेत पहुंचने तक नंदिनी उसे सब कुछ बता देती है अपने और अपनी मां के बारे में और फिर कैसे लल्लू ने उसे चुदाई देखते हुए पकड़ा और उनके बीच तबसे जो जो हुआ वो सब, रस्ते भर नीलम शांत हो कर सुन रही थी

नंदिनी: ये सब हुआ है यार अब बता तू चुप क्यों है कुछ बोल?

नीलम अपनी सलवार सरका कर बैठ गई और उसे भी बैठने का इशारा किया, नंदिनी भी नीचे बैठ गई,

नीलम: तू और ताई? ये कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? और लल्लू छोटू और भूरा राजेश ये तो सब हैं ही ऐसे इन लोगों से तो और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं।

नंदिनी: हां यार सब होता गया अच्छा लगता गया और मैं खुद को रोक नहीं पाईं और न मां भी, उन्होंने एक दो बार कोशिश भी की, पर अभी जबसे भूरा के बाबा खत्म हुए है तबसे कुछ नहीं हुआ हमारे बीच। बता न तुझे मैं गलत लग रही हूं न?

नीलम: नहीं पागल कोई गलत नहीं है, शायद ये बदन की प्यास है ही ऐसी चीज कि इसके सुख के आगे और कुछ दिखाई ही नहीं देता।

नंदिनी ने ये सुनकर उसे हैरानी से देखा और बोली: तो बावरी हो गई है क्या कैसे बोल रही है,

नीलम: मुझे भी तुझे कुछ बताना है वैसे।

नंदिनी: हां बता न,

नीलम: पहली बात तो ये कि तेरी बात सुनकर मेरी फिर से गीली हो गई है तो मुझे नहीं पता तूने गलत किया या सही पर जो किया मज़ेदार किया।

ये सुन नंदिनी मुस्कुरा उठी और फिर उसे ध्यान आया तो बोली: ये पहली थी तो दूसरी बात क्या थी।

इस पर नीलम ने उसे गंभीरता से आंखों में देखा और बोली: मैने भी कुछ ऐसा ही देखा है।

इसके बाद उसने अपनी मां और ताई के बीच जो होते देखा वो सब नंदिनी को बता दिया, नीलम की बात पूरी होते ही नंदिनी के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी,

नंदिनी: अरे यार गजब की बात बताई है तूने तो, मतलब दोनों चाचियां मिलकर मजे करती हैं, वैसे दोनों हैं भी एक से बढ़कर एक, मुझे मौका मिले तो मैं तो कूद पड़ूंगी दोनों के ऊपर।

नीलम: धत्त कुतिया एक मेरी मां है और एक ताई।

नंदिनी: मैने अपनी मां को नहीं छोड़ा तेरी मां और ताई को कैसे छोड़ दूं,

नंदिनी हंसते हुए बोली,

नीलम: कमीनी है तू भी पूरी।

नंदिनी: अच्छा बता न तूने क्या सोचा फिर आगे?

नीलम: मैं क्या सोचूं इसमें, मैने उन्हें देखा और तुझे बता दिया।

नंदिनी: तो तू कोशिश नहीं करेगी?

नीलम: कैसी कोशिश?

नंदिनी: उनके साथ ये सब करने की?

नीलम: हट पागल है क्या मेरे बस की नहीं है।

नंदिनी: अरे देख तू फिर से वैसे ही बातें करने लगी, थोड़ी देर पहले बोल रही थी कि बिगड़ूंगी, ऐसे बिगड़ेगी?

नीलम ने कुछ सोचा और बोली: फिर क्या करूं तू बता?

नंदिनी: अरे कल्पना कर सोच तू और तेरी मां, तेरी जीभ तेरी मां की चूत में या तेरी मां या ताई की जीभ तेरी चूत, दोनों पूरी नंगी हो कर तेरे सामने हैं तू उनका बदन चाट रही है। अरे सोच कितना कुछ कर सकती है। बता तुझे अच्छा नहीं लगेगा,

ये सुन कर नीलम मुस्कुराई और बोली: तू सच में मुझे बिगाड़ देगी।

नंदिनी: अरे असली मज़ा बिगड़ने में ही है मेरी जान।

नंदिनी पानी से अपने चूतड़ों को धोते हुए बोली

दोनों सहेलियां बातें करते हुए घर की ओर चल दी।

वहीं अपनी कुटिया में केलालाल छोटी सी ओखली में कुछ कूट रहे थे, चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी,

बहुत हो गई शराफ़त अब मैं भी दिखाऊंगा कि ये केलालाल क्या कर सकता है, केलालाल पीसते हुए धीमी आवाज़ में बोले।

नीलम जब से घर आई थी अपनी मां और ताई को अलग नजर से देख रही थी, नंदिनी की बातें उसके दिमाग में घूम रही थी, पुष्पा और सुधा के कामुक और भरे बदन को देख कर वो सोच रही थी वैसे सच में मां और ताई हैं तो बड़ी मस्त, और नंगी तो बहुत गजब लगती हैं नीलम के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

रत्ना खेत से हो आई थी उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था, बार बात उसे बस वो ही रात के सपने याद आ रहे थे, रानी के आने से उसे इतना सुकून मिल गया था कि घर के काम में हाथ बंट गया था, रानी अधिकतर काम सम्भाल लेती थी नहीं तो रत्ना से इस मनोदशा में क्या ही हो पाता।


जारी रहेगी
 
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