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- Dec 5, 2013
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रत्ना खेत से हो आई थी उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था, बार बात उसे बस वो ही रात के सपने याद आ रहे थे, रानी के आने से उसे इतना सुकून मिल गया था कि घर के काम में हाथ बंट गया था, रानी अधिकतर काम सम्भाल लेती थी नहीं तो रत्ना से इस मनोदशा में क्या ही हो पाता।
अध्याय 29
रत्ना के लिए हर दिन मुश्किल होता जा रहा था, उन कामुक सपनों से वो परेशान होती जा रही थी, अभी भी चूल्हे के पास बैठी थी चाय चढ़ा कर अपने ही खयालों में डूबी हुई थी, इतने में पीछे से रानी चिल्लाई: अरे मां चाय निकल गई,
रानी की आवाज सुनकर रत्ना चौंकी और खयालों से निकली हड़बड़ा के और घबराहट के मारे उसने गर्म भगौना नंगे हाथों से ही पकड़ लिया और उसकी एक तेज़ चीख निकली, रानी दौड़ कर आई,
रानी: क्या हुआ मां, अरे दय्या मां तुम्हारा ध्यान कहां रहता है? नंगे हाथ से गरम भगोना पकड़ लिया देखो हाथ जला लिए। हे दैय्या।
रानी ने तुरंत दोनों हाथ पकड़ लिए रत्ना के वहीं रत्ना के हाथों में जलन से उसके आंसू निकल रहे थे, इतने में भूरा भी शोर सुनकर अंदर आया, और पूछा क्या हुआ?
रानी: मां ने गरम भगोना पकड़ लिया हाथ से उंगलियां जल गई हैं वो तो अच्छा हुआ भगोना गिरा नहीं, नहीं तो चाय गिर जाती तो और जल जाती।
भूरा: रुको मैं ठंडा पानी लाता हूं।
भूरा तुरंत भाग कर जाता है और ठंडा पानी लेकर आता है बाल्टी में,
भूरा: लो मां इसमें अपने हाथ डूबा कर रखो।
रत्ना बेटी और बेटे के कहे अनुसार ही तुरंत हाथ पानी में डाल लेती है उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था क्या हुआ है वो कुछ बोल नहीं पा रही थी ऊपर से हाथ में जलन और उसे परेशान कर रही थी, सभी उंगलियों में ऊपर की तरफ छाले पड़ गए थे,
कुछ देर बाद रानी बोली मां छाले बढ़ गए हैं, कुटिया में जाकर केलालाल को दिखा देते है दवाई लेनी पड़ेगी।
रत्ना: अरे इतना कुछ नहीं हुआ है हो जाएगा ठीक।
भूरा: नहीं मां जीजी सही कह रही है चलो दिखा लेते हैं।
रानी: भूरा तू यहीं रुक मैं लेकर जाती हूं मां को, चलो मां उठो जल्दी।
भूरा: ठीक है जीजी ले जाओ तुम।
रानी ने थोड़ा जोर जबरदस्ती की तो रत्ना को मानना ही पड़ा और दोनों घर से निकल गई, वहीं भूरा भी चिंतित था कि आए दिन उसके घर में किस तरह का संकट छाता जा रहा है,
रानी जल्दी ही रत्ना को लेकर केलालाल की कुटिया के बाहर पहुंच गई और आवाज़ लगाकर केलालाल को पुकारा,
रानी: बाबा ओह बाबा कहां हो,
केलालाल जो औषधि बनाने में व्यस्त थे तुरंत उठे और उस औषधि को एक ओर सरका दिया और उठ कर कुटिया के बाहर निकले उन्हें बाहर आते देख रत्ना ने रानी से अपने मुंह पर पल्लू करवा लिया।
केलालाल: अरे रानी बिटिया आई है, और बहू भी है, सब ठीक तो है न बिटिया?
रानी: कहां बाबा देखो न मां ने कैसे अपने हाथ जला लिए हैं,
रानी ने रत्ना के हाथ दिखाते हुए कहा,
केलालाल: अरे अरे ये तो छाले पड़ गए हैं, चलो जल्दी कुटिया में चल कर बैठो, अभी दवाई लगा देता हूं।
तीनों अंदर पहुंचे जहां रत्ना और रानी बैठ गए वहीं केलालाल डिब्बों में से कुछ निकालने लगे और निकालते हुए बोले:अरे पर ये हुआ कैसे बिटिया?
रानी: वो मां चाय बना रही थी, पर इनका ध्यान पता नहीं कहां था, मैने इन्हें दूर से बोला कि चाय निकल रही है तो इन्होंने बिना सोचे समझे ही नंगे हाथों से भगौना पकड़ लिया।
कैलालाल: अरे अरे बहू ध्यान रखना चाहिए न बेकार में इतना जला लिया। अब दिखा तो सही कितना जला है
केलालाल ने बैठते हुए कहा,
रानी: हाथ दिखाओ मां,
रत्ना ने अपने दोनों हाथ आगे कर केलालाल को दिखाए।

केलालाल: रानी बिटिया जरा बाहर से लोटा में पानी भर ले आ, और सुन शुद्ध पानी चाहिए लोटा धो लियो।
रानी: अभी लाई।
वो तुरंत उठ कर गई और केलालाल दो चूर्ण को मिश्रित करते हुए रत्ना की ओर देख कर बोला: बहू क्या अब भी तुझे वो सपने परेशान कर रहे हैं।
रत्ना ये बात सुन हैरान भी हुई पर उसे अच्छा भी लगा कि कोई उसकी परेशानी जानता है, रत्ना ने हां में सिर हिला दिया।
केलालाल: मतलब समस्या जितनी सोची थी उससे कहीं ज़्यादा गम्भीर है,
रत्ना का मन ये सुन कर घबराने लगता है।
रत्ना: फिर क्या करें अब बाबा हम तो परेशान हैं।
रत्ना सिर झुकाए हुए ही बोली,
केलालाल: घबराने की आवश्यकता नहीं है बहू, पर किस तरह के सपने आते हैं तू बता तो हम उसका उपाय ढूंढें।
रत्ना ये सुन कर सहम गई और कुछ नहीं कह पाई,
केला: बिना जाने हम कुछ नहीं कर पाएंगे बहू।
रत्ना: बाबा बहुत गंदे सपने आते हैं मैं बता नहीं सकती।
ये सुनकर केलालाल के कान खड़े हो गए और तुरंत अपना दिमाग दौड़ाने लगे,
केला: सुन बहू अभी बिटिया है तो तू मैं जानता हूं नहीं बता पाएगी ऐसा कर सूरज ढलने के समय आना अकेले तब आराम से तेरी परेशानी सुन लूंगा और उसका उपाय भी खोज लूंगा।
रत्ना ने ये सुना तो थोड़ी घबराई तो पर सिर्फ सिर हिला दिया इतने में ही रानी भी आ गई थी लोटा लेकर, जिसे केलालाल ने लिया और उसका पानी मिला कर एक गाढ़ा मिश्रण बनाया और रानी को एक डिब्बे में दे दिया और कहा कि ये उंगलियों पर लगाती रहे, दवाई लेकर मां बेटी वहां से चल दी वहीं उन्हें जाते देखते हुए केला के मुंह पर मुस्कान थी और उसकी नज़र रत्ना के मोटे चूतड़ों पर थी।
सुबह जब से खेत से झुमरी घर आई थी उसके मन में बहुत से विचार घूम रहे थे, जो कुछ राजेश के साथ हुआ उसे लेकर उसके मन में चिंता थी, कैसे एक उसके बेटे से भी छोटे लड़के ने उसे मजबूर कर दिया था और कैसे वो उसके बदन के साथ खेला था, एक ओर जहां उसे इस बात से बुरा लग रहा था वहीं यही बात उसे कहीं न कहीं उत्तेजित भी कर रहा था, की बेटे से छोटे लड़के के हाथों अपना बदन मसलवाना और उसका वो उसके होंठों को चूसना और अंत में वो उसका लड़क गर्म लंड ये सोच कर वो उत्तेजित हो रही थी, उसकी चूत नम हो रही थी, पर वो बार बार इन विचारों को सिर से झटक कर काम में लगने की कोशिश कर रही थी, दूसरी वजह ये भी थी कि राजेश के साथ ने उसे गरम तो कर दिया था पर उसे ठंडा होने का मौका नहीं मिला था, सुभाष की चुदाई उसे संतुष्ट कर देती थी इसलिए उसका बदन और प्यासा था,
वहीं उसका बेटा सत्तू अभी भी घोड़े बेच कर सो रहा था, उसकी यही दिनचर्या होती थी शहर में खूब मेहनत करके आता था फिर अगले दो तीन दिन अपनी नींद पूरी करता था, झुमरी भी बेटे का परिश्रम देखती थी और इसलिए उसे खूब सोने देती थी। झुमरी ने घर का काम निपटा लिया था अब नहाने की तैयारी कर रही थी झाड़ू को एक ओर रख कर उसने कमरे में झांका तो सत्तू अभी भी सो रहा था, झुमरी बाहर आई और अपनी साड़ी को उतार कर एक ओर टांग दिया और फिर नल चला कर बाल्टी भर ली फिर अपना ब्लाउज़ भी उतार दिया और सिर्फ पेटीकोट में बैठ गई, नल के पास और ठंडे पानी से अपने गरम बदन को शांत करने लगी,
इसी दौरान सत्तू की नींद अचानक खुल गई। रात भर की थकान उतर चुकी थी, लेकिन शरीर अभी भी भारी था। उसने आँखें मलीं, एक लंबी जम्हाई ली और बिस्तर से उठकर कमरे के बाहर आया।
जैसे ही वो दरवाज़े से बाहर निकला, उसके पैर वहीं ठिठक गए।
सामने नल के पास उसकी माँ झुमरी पीठ करके बैठी हुई थी। सिर्फ एक पतला सा सफेद पेटीकोट उसके निचले बदन पर लिपटा हुआ था — वो भी पानी से इतना भीग चुका था कि अब वो कपड़ा उसके मोटे, भारी-भारी चूतड़ों से चिपककर दूसरी त्वचा बन गया था। दोनों गोल-गोल, मांसल नितंब साफ़-साफ़ उभरे हुए थे, जैसे दो तरबूज उसके पेटीकोट में बंधे हो। झुमरी लोटे से अपने गरम बदन पर ठंडा पानी डाल रही थी जो पेटीकोट के पतले कपड़े को और भी पारदर्शी बना रहा था। वहीं झुमरी अपना हाथ पीछे लाकर अपनी पीठ मल रही थी।

ये दृश्य देख कर सत्तू का मुंह सूख गया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
पहले तो उसका दिमाग पूरी तरह से चक्कर में आ गया। वो एक कदम पीछे हट गया, दीवार से लगकर खड़ा हो गया। उसके सीने में तेज तेज धक धक होने लगी,
“अरे... ये... ये मेरी माँ है...धत्त क्या देख रहा हूँ मैं...?”
मन में ग्लानि की लहर उठी। “नहीं... नहीं देखना चाहिए... ये गलत है... बहुत गलत...” उसने आँखें बंद कर लीं, सिर हिलाया, जैसे खुद को रोकना चाह रहा हो।
पर... उसका मन न माना।
लंड तो पहले ही पैंट के अंदर सख्त होकर तन गया था।
धीरे-धीरे उसकी आँखें फिर से खुल गईं। सिर हल्का-हल्का बाहर निकालकर वो फिर से उसी दृश्य को घूरने लगा।
गीले पेटीकोट में लिपटे हुए उसके चूतड़, पानी की बूँदों से चमकता हुआ उसका बदन, हर बार जब झुमरी हाथ हिलाती तो वो मोटे चूतड़ हल्के-हल्के लहराते। जैसे कोई नरम, रसीला मांस का पहाड़ हो,
सत्तू के दिमाग में द्वंद्व चल रहा था।
एक तरफ ग्लानि चीख रही थी — “ये तेरी माँ है रे हरामी... तू क्या सोच रहा है?”
दूसरी तरफ कामुकता का शैतान फुसफुसा रहा था — “फिर भी... कितनी लजीज... कितनी मोटी... कितनी रसीली गांड है माँ की... देख... पानी कैसे उसके चूतड़ों के बीच से बह रहा है... पेटीकोट भी ज़्यादा कुछ छिपा नहीं पा रहा है...
उसकी साँसें भारी हो गईं। लंड अब पूरी तरह खड़ा होकर पैंट में तनाव महसूस करा रहा था। हाथ खुद-ब-खुद पैंट के ऊपर चला गया, लेकिन उसने रोका। फिर भी नजर हट नहीं पा रही थी।
झुमरी अभी भी अनजान थी। वो बस ठंडे पानी से अपना गरम-गरम बदन शांत कर रही थी... और उसके बेटे का लंड उसके मोटे गीले चूतड़ों को देखकर और भी ज़्यादा सख्त होता जा रहा था।
सत्तू वहीं खड़ा रहा... ग्लानि और लालच के बीच फँसा हुआ... लेकिन आँखें माँ के उस नंग-धड़ंग, गीले, मांसल बदन से हट ही नहीं पा रही थीं। तभी झुमरी के हाथ से लोटा फिसल कर गिर गया और सत्तू तुरंत अंदर की ओर भागा और बिस्तर पर लेट गया और सोने का नाटक करने लगा, उसका लंड बिलकुल तन कर खड़ा था जिसे उसने एक ओर करवट लेकर ढंक लिया आंखें बंद होते ही उसके सामने उसकी मां का दृश्य आने लगा। और वो बेचारा उन विचारों से लड़कर उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करने लगा। झुमरी नहा कर धुला हुआ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर कमरे में घुसी तो अपने बेटे को अब भी सोता हुआ पाया, वो साड़ी निकाल कर लपेटने लगी, और साड़ी पहन कर उसे आवाज़ दी।
दूसरी ओर फुलवा के यहां भी नहाने धोने का कार्यक्रम चल रहा था मर्द लोग नाश्ता करके नहा धोकर निकल गए थे वहीं अब औरतों की बारी थी, फुलवा भी कहीं बाहर ही गांव में किसी के यहां गई थी, नीलम घर पर ही थी और उसकी नज़र बार बार अपनी मां और ताई पर घूम रही थी जो काम करते हुए बातें कर रही थी, खैर बातें करते हुए काम निपटा कर पुष्पा नल के पास जा बैठी नहाने के लिए, उसने अपना पेटीकोट और ब्लाउज खोल दिया और पटिया पर बैठ कर अपनी एड़ी घिसने लगी,
पुष्पा: मेरी तो एड़ी भी फटने लगी हैं री सुधा।
सुधा: अरे कोई बात नहीं जीजी मैं घी से मालिश कर दूंगी तो सही हो जाएगी,
पुष्पा: वाह कितनी अच्छी है तू, तेरे जैसी देवरानी किसी को न दे।
सुधा: अरे ऐसा क्यों बोल रही हो जीजी,
पुष्पा: अरे मुझे दे दी है तो और किसी को क्यों मिले?
सुधा: जीजी तुम भी न कुछ भी बोलती हो।
नीलम बैठी हुई अपनी ताई और मां की बातें सुन रही थी, अब उनके बीच का राज पता लगने के बाद नीलम को भी अपनी मां और ताई की जोड़ी अलग और अच्छी लगने लगी थी, तभी उसे पुष्पा ने पुकार,
पुष्पा: अरे बिटिया सुन इधर आ पीठ मल दे थोड़ी।
नीलम ये सुन कर उठी पर उसके मन में हिचकिचाहट और एक अजीब सी घबराहट हो रही थी, ऐसा नहीं था कि पहली बार उसे उसकी ताई, मां या अम्मा ने ऐसा करने को बोला था पर आज जब वो सब जानती थी और उसकी नज़र बदल गई थी तो उसे अपनी ताई की नंगी पीठ को छूना थोड़ा अजीब लग रहा था
पुष्पा: अरे खड़ी क्या है बिटिया जल्दी आ।
नीलम: हां ताई आई,
ये कह नीलम आगे बढ़ी और पुष्पा के पीछे जा कर बैठ गई और झिझकते हुए अपना हाथ पुष्पा की नंगी पीठ पर रखा, और पुष्पा के नंगे बदन को छूते ही उसे बदन में एक सिहरन सी महसूस हुई, उसका हाथ धीरे धीरे पुष्पा की पीठ पर चलने लगा,

पुष्पा लगातार सुधा से बातों में लगी हुई थी, वहीं नीलम सोच रही थी कि उसकी ताई की पीठ कितनी चिकनी है, कितनी मुलायम और मखमली, तभी उसकी नजर गीले पेटीकोट में से झांकते हुए पुष्पा के चूतड़ों पर भी पड़ी जो पेटीकोट के गीले होने से हल्के हल्के नज़र आ रहे थे, उन्हें देख नीलम के बदन में कुछ होने लगा जिसे उसके लिए शब्दों में बताना मुश्किल था,
नीलम सोचने लगी कि ताई के चूतड़ कितने भरे भरे हैं इन्हें दबाने में कितना मज़ा आएगा, वो ये सोच कर रोमांचित होने लगी, पर साथ ही झिझकने भी लगी,
इसी बीच उसके कानों में नंदिनी के शब्द गूंजने लगे कि उसे खुद को बदलना होगा अगर सच में जीवन में मजे लेना चाहती है तो उसे खुद के बनाए इस कवच से बाहर निकलना होगा, नीलम सोचने लगी वैसे भी यूं दबे दबे रहने से भी क्या फायदा? आज उसने थोड़ी हिम्मत दिखाई थी तो उसे अपनी सहेली के साथ कितना मज़ा आया था और क्या पता वैसा ही मज़ा उसे घर में मिल जाए तो? ये सोच कर ही उसका बदन मचलने लगा, वहीं वो सोचने लगी ताई और मां भी बहुत कामुक है ये तो मैं देख चुकी हूं बस मुझे भी उनकी इसी कामुकता को इसी गर्मी को हवा देनी होगी। ये सोचते हुए नीलम अपने अंदर एक आत्मविश्वास महसूस करने लगी। उसने अपने हाथ को पुष्पा की पीठ पर नीचे की ओर बढ़ाने लगी, वो हाथ पीठ पर फिराते हुए थोड़ा नीचे ले जाने लगी और पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी ताई के चूतड़ों का माप लेने लगी

पुष्पा को भी नीलम का स्पर्श आज थोड़ा अलग लग रहा था पर वो सुधा से बातचीत में इतना ध्यान नहीं दे रही थी, पर नीलम के हाथ जब उसे पेटीकोट के ऊपर से अपने चूतड़ों पर फिसलते हुए महसूस हुए तो उसे थोड़ा अजीब तो लगा पर उसने कुछ कहा नहीं, वहीं नीलम आज पहली बार हिम्मत कर रही थी और उस हिम्मत के फल के रूप में उसकी ताई के मोटे मोटे तरबूज उसके हाथ में थे, पर कुछ देर बाद ही उसे हटना पड़ा क्योंकि उसकी मां भी नहाने के लिए आ गई थी, और वो उठकर एक ओर को जा कर बैठ गई, पर उसकी नज़रें बार बार पुष्पा और सुधा के बदन को देख रही थी,
एक पेड़ के नीचे बैठ कर सोमपाल और कुंवरपाल बातें कर रहे थे, कुंवरपाल ने तंबाकू बनाई और सोमपाल की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा: भेंचोद समझ नहीं आता आखिर प्यारे के साथ हुआ क्या?
सोमपाल ने तंबाकू उठाकर दांतों के नीचे दबाई और मुंह बनाते हुए बोला: मुझे तो लगता है ग्लानि भाव में आकर आत्महत्या तो नहीं करली उसने, धतूरा वगैरह खा लिया हो क्या पता?
कुंवरपाल: हो सकता है, वैसे बुरा तो मुझे भी बहुत लगा था कि रत्ना बहू के साथ वो सब किया।
सोमपाल: बुरा मैं तो आजतक तबसे उसके सामने नहीं गया हूं। डर भी लगा रहता है कि कहीं उसने किसी को बता दिया तो हमारा क्या होगा?
कुंवरपाल: धत्त वो किसी को नहीं बताएगी।
सोमपाल: तुझे ऐसा क्यों लगता है?
कुंवरपाल: अरे सोच अगर हमें मर्द होते हुए इतना डर है तो वो तो बहू है उसका क्या होगा। दूसरी बात कि उसके खुद के ससुर के साथ संबंध होना और फिर ससुर का अचानक गुजर जाना, बहुत सवाल उठेंगे उस पर।
सोमपाल: अरे हां यार तभी वो भी बिल्कुल चुप है।
कुंवरपाल: बोलने में उसका ही नुकसान है।
सोमपाल: वैसे अब जब सोचता हूं और ईमानदारी से कहूं तो है बड़ी कमसिन, उस रात मज़ा तो बहुत आया था।
कुंवरपाल: अरे बुढ़ापे में उल्टी ही बात करियो तू।
सोमपाल: अच्छा सही सही बता तुझे मज़ा नहीं आया?
इस बात पर कुंवर पाल चुप हो गया,
सोमपाल: बालपन से जानता हूं तुझे बुड्ढे, तेरी ठरक कितनी है सब जानता हूं,
कुंवरपाल: अरे है तो क्या करूं? साले तेरे पास तो जुगाड़ है हम तो खाली हैं।
सोमपाल: जुगाड़ है कैसा जुगाड़ है?
कुंवरपाल: क्यों भौजी नहीं है?
सोमपाल: वो इस उमर में हाथ भी नहीं लगाने देती एक बार कोशिश की तो बरस पड़ी उल्टा बोली इस उमर में ये सब हरकतें अच्छी लगती हैं क्या।
कुंवरपाल: अरे ये भेंचोद सब उमर के पीछे पड़े रहते हैं उमर हो गई तो क्या हुआ लोड़ा तो अब भी खड़ा होता है।
सोमपाल: वही तो पर ये बात तेरी भौजी माने तो।
कुंवरपाल: वैसे अगर सोचा जाए तो एक जगह काम बन सकता है पर खतरा भी है
सोमपाल: कहां? और क्या खतरा है?
कुंवरपाल: वहीं रत्ना बहू।
सोमपाल: ससुरे बावरा हो गया है तू? बड़ी मुश्किल से एक बार फंद छूटा और तू चूतियों वाली बात कर रहा है।
कुंवरपाल: अरे अभी समझाया तो कि वो किसी को कहेगी नहीं तो अपना फायदा ही है, और उसे भी डर होगा कि हम लोग किसी को न कुछ कहें तो मानेगी भी जल्दी।
सोमपाल: जो भी हो मुझे फिर भी ठीक नहीं लग रहा!
कुंवरपाल: अभी थोड़ी देर पहले खुद ही बोल रहा था न कि मज़ा तो आया था पर जरा सा खतरा दिखा तो गांड लुप लुप करने लगी तेरी।
सोमपाल: बात वो नहीं है देख उसके साथ एक बार किया और प्यारे चल बसा, मुझे तो लगता है हमें उससे दूर ही रहना चाहिए।
कुंवरपाल को भी सोमपाल की ये बात सही लगी और बोला: फिर और क्या करें हिलाते रहें बस।
सोमपाल: अरे तालाब में और भी मछलियां हैं ये नहीं तो कोई और सही।
कुंवरपाल: पर अब स्वाद तो किसी बहू का ही चखना है, गरम बहू में जो मज़ा है वो किसी में नहीं।
सोमपाल: फिर किस पर नज़र है तेरी?
कुंवरपाल: अरे कितनी बहुएं हैं गांव में कोई भी मिल जाए।
कुंवरपाल ने बात पलटते हुए कहा,
सोमपाल: हां ये भी सही कहा।
दोनों कुछ देर यूं ही बैठ कर बातें करते रहे वहीं उनके मन में बहुत से विचार घूम रहे थे।
आज तीनों दोस्तों की तिगड़ी एक साथ निकली थी पशुओं को चराने। पशु जहां एक ओर चर रहे थे वहीं ये तीनों पेड़ की छांव में बैठ कर गप्पें मार रहे थे, छोटू शहर की कहानियां बताने में लगा हुआ था और भूरा और लल्लू ध्यान से सुन भी रहे थे, भूरा के चेहरे पर थोड़ी चिंता नज़र आ रही थी,
लल्लू: अरे तुझे क्या हुआ तेरा मुंह क्यों बना है?
भूरा: अरे यार सुबह ही मां के हाथ जल गए,
छोटू: हैं? कैसे?
फिर भूरा उन्हें सारी बात बताता है,
लल्लू: भेंचो कुछ तो है तेरे घर में एक के बाद एक कांड हो रहे हैं।
भूरा: वही तो यार कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं
छोटू: मैं बताऊं क्या करना है?
जारी रहेगी
अध्याय 29
रत्ना के लिए हर दिन मुश्किल होता जा रहा था, उन कामुक सपनों से वो परेशान होती जा रही थी, अभी भी चूल्हे के पास बैठी थी चाय चढ़ा कर अपने ही खयालों में डूबी हुई थी, इतने में पीछे से रानी चिल्लाई: अरे मां चाय निकल गई,
रानी की आवाज सुनकर रत्ना चौंकी और खयालों से निकली हड़बड़ा के और घबराहट के मारे उसने गर्म भगौना नंगे हाथों से ही पकड़ लिया और उसकी एक तेज़ चीख निकली, रानी दौड़ कर आई,
रानी: क्या हुआ मां, अरे दय्या मां तुम्हारा ध्यान कहां रहता है? नंगे हाथ से गरम भगोना पकड़ लिया देखो हाथ जला लिए। हे दैय्या।
रानी ने तुरंत दोनों हाथ पकड़ लिए रत्ना के वहीं रत्ना के हाथों में जलन से उसके आंसू निकल रहे थे, इतने में भूरा भी शोर सुनकर अंदर आया, और पूछा क्या हुआ?
रानी: मां ने गरम भगोना पकड़ लिया हाथ से उंगलियां जल गई हैं वो तो अच्छा हुआ भगोना गिरा नहीं, नहीं तो चाय गिर जाती तो और जल जाती।
भूरा: रुको मैं ठंडा पानी लाता हूं।
भूरा तुरंत भाग कर जाता है और ठंडा पानी लेकर आता है बाल्टी में,
भूरा: लो मां इसमें अपने हाथ डूबा कर रखो।
रत्ना बेटी और बेटे के कहे अनुसार ही तुरंत हाथ पानी में डाल लेती है उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था क्या हुआ है वो कुछ बोल नहीं पा रही थी ऊपर से हाथ में जलन और उसे परेशान कर रही थी, सभी उंगलियों में ऊपर की तरफ छाले पड़ गए थे,
कुछ देर बाद रानी बोली मां छाले बढ़ गए हैं, कुटिया में जाकर केलालाल को दिखा देते है दवाई लेनी पड़ेगी।
रत्ना: अरे इतना कुछ नहीं हुआ है हो जाएगा ठीक।
भूरा: नहीं मां जीजी सही कह रही है चलो दिखा लेते हैं।
रानी: भूरा तू यहीं रुक मैं लेकर जाती हूं मां को, चलो मां उठो जल्दी।
भूरा: ठीक है जीजी ले जाओ तुम।
रानी ने थोड़ा जोर जबरदस्ती की तो रत्ना को मानना ही पड़ा और दोनों घर से निकल गई, वहीं भूरा भी चिंतित था कि आए दिन उसके घर में किस तरह का संकट छाता जा रहा है,
रानी जल्दी ही रत्ना को लेकर केलालाल की कुटिया के बाहर पहुंच गई और आवाज़ लगाकर केलालाल को पुकारा,
रानी: बाबा ओह बाबा कहां हो,
केलालाल जो औषधि बनाने में व्यस्त थे तुरंत उठे और उस औषधि को एक ओर सरका दिया और उठ कर कुटिया के बाहर निकले उन्हें बाहर आते देख रत्ना ने रानी से अपने मुंह पर पल्लू करवा लिया।
केलालाल: अरे रानी बिटिया आई है, और बहू भी है, सब ठीक तो है न बिटिया?
रानी: कहां बाबा देखो न मां ने कैसे अपने हाथ जला लिए हैं,
रानी ने रत्ना के हाथ दिखाते हुए कहा,
केलालाल: अरे अरे ये तो छाले पड़ गए हैं, चलो जल्दी कुटिया में चल कर बैठो, अभी दवाई लगा देता हूं।
तीनों अंदर पहुंचे जहां रत्ना और रानी बैठ गए वहीं केलालाल डिब्बों में से कुछ निकालने लगे और निकालते हुए बोले:अरे पर ये हुआ कैसे बिटिया?
रानी: वो मां चाय बना रही थी, पर इनका ध्यान पता नहीं कहां था, मैने इन्हें दूर से बोला कि चाय निकल रही है तो इन्होंने बिना सोचे समझे ही नंगे हाथों से भगौना पकड़ लिया।
कैलालाल: अरे अरे बहू ध्यान रखना चाहिए न बेकार में इतना जला लिया। अब दिखा तो सही कितना जला है
केलालाल ने बैठते हुए कहा,
रानी: हाथ दिखाओ मां,
रत्ना ने अपने दोनों हाथ आगे कर केलालाल को दिखाए।

केलालाल: रानी बिटिया जरा बाहर से लोटा में पानी भर ले आ, और सुन शुद्ध पानी चाहिए लोटा धो लियो।
रानी: अभी लाई।
वो तुरंत उठ कर गई और केलालाल दो चूर्ण को मिश्रित करते हुए रत्ना की ओर देख कर बोला: बहू क्या अब भी तुझे वो सपने परेशान कर रहे हैं।
रत्ना ये बात सुन हैरान भी हुई पर उसे अच्छा भी लगा कि कोई उसकी परेशानी जानता है, रत्ना ने हां में सिर हिला दिया।
केलालाल: मतलब समस्या जितनी सोची थी उससे कहीं ज़्यादा गम्भीर है,
रत्ना का मन ये सुन कर घबराने लगता है।
रत्ना: फिर क्या करें अब बाबा हम तो परेशान हैं।
रत्ना सिर झुकाए हुए ही बोली,
केलालाल: घबराने की आवश्यकता नहीं है बहू, पर किस तरह के सपने आते हैं तू बता तो हम उसका उपाय ढूंढें।
रत्ना ये सुन कर सहम गई और कुछ नहीं कह पाई,
केला: बिना जाने हम कुछ नहीं कर पाएंगे बहू।
रत्ना: बाबा बहुत गंदे सपने आते हैं मैं बता नहीं सकती।
ये सुनकर केलालाल के कान खड़े हो गए और तुरंत अपना दिमाग दौड़ाने लगे,
केला: सुन बहू अभी बिटिया है तो तू मैं जानता हूं नहीं बता पाएगी ऐसा कर सूरज ढलने के समय आना अकेले तब आराम से तेरी परेशानी सुन लूंगा और उसका उपाय भी खोज लूंगा।
रत्ना ने ये सुना तो थोड़ी घबराई तो पर सिर्फ सिर हिला दिया इतने में ही रानी भी आ गई थी लोटा लेकर, जिसे केलालाल ने लिया और उसका पानी मिला कर एक गाढ़ा मिश्रण बनाया और रानी को एक डिब्बे में दे दिया और कहा कि ये उंगलियों पर लगाती रहे, दवाई लेकर मां बेटी वहां से चल दी वहीं उन्हें जाते देखते हुए केला के मुंह पर मुस्कान थी और उसकी नज़र रत्ना के मोटे चूतड़ों पर थी।
सुबह जब से खेत से झुमरी घर आई थी उसके मन में बहुत से विचार घूम रहे थे, जो कुछ राजेश के साथ हुआ उसे लेकर उसके मन में चिंता थी, कैसे एक उसके बेटे से भी छोटे लड़के ने उसे मजबूर कर दिया था और कैसे वो उसके बदन के साथ खेला था, एक ओर जहां उसे इस बात से बुरा लग रहा था वहीं यही बात उसे कहीं न कहीं उत्तेजित भी कर रहा था, की बेटे से छोटे लड़के के हाथों अपना बदन मसलवाना और उसका वो उसके होंठों को चूसना और अंत में वो उसका लड़क गर्म लंड ये सोच कर वो उत्तेजित हो रही थी, उसकी चूत नम हो रही थी, पर वो बार बार इन विचारों को सिर से झटक कर काम में लगने की कोशिश कर रही थी, दूसरी वजह ये भी थी कि राजेश के साथ ने उसे गरम तो कर दिया था पर उसे ठंडा होने का मौका नहीं मिला था, सुभाष की चुदाई उसे संतुष्ट कर देती थी इसलिए उसका बदन और प्यासा था,
वहीं उसका बेटा सत्तू अभी भी घोड़े बेच कर सो रहा था, उसकी यही दिनचर्या होती थी शहर में खूब मेहनत करके आता था फिर अगले दो तीन दिन अपनी नींद पूरी करता था, झुमरी भी बेटे का परिश्रम देखती थी और इसलिए उसे खूब सोने देती थी। झुमरी ने घर का काम निपटा लिया था अब नहाने की तैयारी कर रही थी झाड़ू को एक ओर रख कर उसने कमरे में झांका तो सत्तू अभी भी सो रहा था, झुमरी बाहर आई और अपनी साड़ी को उतार कर एक ओर टांग दिया और फिर नल चला कर बाल्टी भर ली फिर अपना ब्लाउज़ भी उतार दिया और सिर्फ पेटीकोट में बैठ गई, नल के पास और ठंडे पानी से अपने गरम बदन को शांत करने लगी,
इसी दौरान सत्तू की नींद अचानक खुल गई। रात भर की थकान उतर चुकी थी, लेकिन शरीर अभी भी भारी था। उसने आँखें मलीं, एक लंबी जम्हाई ली और बिस्तर से उठकर कमरे के बाहर आया।
जैसे ही वो दरवाज़े से बाहर निकला, उसके पैर वहीं ठिठक गए।
सामने नल के पास उसकी माँ झुमरी पीठ करके बैठी हुई थी। सिर्फ एक पतला सा सफेद पेटीकोट उसके निचले बदन पर लिपटा हुआ था — वो भी पानी से इतना भीग चुका था कि अब वो कपड़ा उसके मोटे, भारी-भारी चूतड़ों से चिपककर दूसरी त्वचा बन गया था। दोनों गोल-गोल, मांसल नितंब साफ़-साफ़ उभरे हुए थे, जैसे दो तरबूज उसके पेटीकोट में बंधे हो। झुमरी लोटे से अपने गरम बदन पर ठंडा पानी डाल रही थी जो पेटीकोट के पतले कपड़े को और भी पारदर्शी बना रहा था। वहीं झुमरी अपना हाथ पीछे लाकर अपनी पीठ मल रही थी।

ये दृश्य देख कर सत्तू का मुंह सूख गया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
पहले तो उसका दिमाग पूरी तरह से चक्कर में आ गया। वो एक कदम पीछे हट गया, दीवार से लगकर खड़ा हो गया। उसके सीने में तेज तेज धक धक होने लगी,
“अरे... ये... ये मेरी माँ है...धत्त क्या देख रहा हूँ मैं...?”
मन में ग्लानि की लहर उठी। “नहीं... नहीं देखना चाहिए... ये गलत है... बहुत गलत...” उसने आँखें बंद कर लीं, सिर हिलाया, जैसे खुद को रोकना चाह रहा हो।
पर... उसका मन न माना।
लंड तो पहले ही पैंट के अंदर सख्त होकर तन गया था।
धीरे-धीरे उसकी आँखें फिर से खुल गईं। सिर हल्का-हल्का बाहर निकालकर वो फिर से उसी दृश्य को घूरने लगा।
गीले पेटीकोट में लिपटे हुए उसके चूतड़, पानी की बूँदों से चमकता हुआ उसका बदन, हर बार जब झुमरी हाथ हिलाती तो वो मोटे चूतड़ हल्के-हल्के लहराते। जैसे कोई नरम, रसीला मांस का पहाड़ हो,
सत्तू के दिमाग में द्वंद्व चल रहा था।
एक तरफ ग्लानि चीख रही थी — “ये तेरी माँ है रे हरामी... तू क्या सोच रहा है?”
दूसरी तरफ कामुकता का शैतान फुसफुसा रहा था — “फिर भी... कितनी लजीज... कितनी मोटी... कितनी रसीली गांड है माँ की... देख... पानी कैसे उसके चूतड़ों के बीच से बह रहा है... पेटीकोट भी ज़्यादा कुछ छिपा नहीं पा रहा है...
उसकी साँसें भारी हो गईं। लंड अब पूरी तरह खड़ा होकर पैंट में तनाव महसूस करा रहा था। हाथ खुद-ब-खुद पैंट के ऊपर चला गया, लेकिन उसने रोका। फिर भी नजर हट नहीं पा रही थी।
झुमरी अभी भी अनजान थी। वो बस ठंडे पानी से अपना गरम-गरम बदन शांत कर रही थी... और उसके बेटे का लंड उसके मोटे गीले चूतड़ों को देखकर और भी ज़्यादा सख्त होता जा रहा था।
सत्तू वहीं खड़ा रहा... ग्लानि और लालच के बीच फँसा हुआ... लेकिन आँखें माँ के उस नंग-धड़ंग, गीले, मांसल बदन से हट ही नहीं पा रही थीं। तभी झुमरी के हाथ से लोटा फिसल कर गिर गया और सत्तू तुरंत अंदर की ओर भागा और बिस्तर पर लेट गया और सोने का नाटक करने लगा, उसका लंड बिलकुल तन कर खड़ा था जिसे उसने एक ओर करवट लेकर ढंक लिया आंखें बंद होते ही उसके सामने उसकी मां का दृश्य आने लगा। और वो बेचारा उन विचारों से लड़कर उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करने लगा। झुमरी नहा कर धुला हुआ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर कमरे में घुसी तो अपने बेटे को अब भी सोता हुआ पाया, वो साड़ी निकाल कर लपेटने लगी, और साड़ी पहन कर उसे आवाज़ दी।
दूसरी ओर फुलवा के यहां भी नहाने धोने का कार्यक्रम चल रहा था मर्द लोग नाश्ता करके नहा धोकर निकल गए थे वहीं अब औरतों की बारी थी, फुलवा भी कहीं बाहर ही गांव में किसी के यहां गई थी, नीलम घर पर ही थी और उसकी नज़र बार बार अपनी मां और ताई पर घूम रही थी जो काम करते हुए बातें कर रही थी, खैर बातें करते हुए काम निपटा कर पुष्पा नल के पास जा बैठी नहाने के लिए, उसने अपना पेटीकोट और ब्लाउज खोल दिया और पटिया पर बैठ कर अपनी एड़ी घिसने लगी,
पुष्पा: मेरी तो एड़ी भी फटने लगी हैं री सुधा।
सुधा: अरे कोई बात नहीं जीजी मैं घी से मालिश कर दूंगी तो सही हो जाएगी,
पुष्पा: वाह कितनी अच्छी है तू, तेरे जैसी देवरानी किसी को न दे।
सुधा: अरे ऐसा क्यों बोल रही हो जीजी,
पुष्पा: अरे मुझे दे दी है तो और किसी को क्यों मिले?
सुधा: जीजी तुम भी न कुछ भी बोलती हो।
नीलम बैठी हुई अपनी ताई और मां की बातें सुन रही थी, अब उनके बीच का राज पता लगने के बाद नीलम को भी अपनी मां और ताई की जोड़ी अलग और अच्छी लगने लगी थी, तभी उसे पुष्पा ने पुकार,
पुष्पा: अरे बिटिया सुन इधर आ पीठ मल दे थोड़ी।
नीलम ये सुन कर उठी पर उसके मन में हिचकिचाहट और एक अजीब सी घबराहट हो रही थी, ऐसा नहीं था कि पहली बार उसे उसकी ताई, मां या अम्मा ने ऐसा करने को बोला था पर आज जब वो सब जानती थी और उसकी नज़र बदल गई थी तो उसे अपनी ताई की नंगी पीठ को छूना थोड़ा अजीब लग रहा था
पुष्पा: अरे खड़ी क्या है बिटिया जल्दी आ।
नीलम: हां ताई आई,
ये कह नीलम आगे बढ़ी और पुष्पा के पीछे जा कर बैठ गई और झिझकते हुए अपना हाथ पुष्पा की नंगी पीठ पर रखा, और पुष्पा के नंगे बदन को छूते ही उसे बदन में एक सिहरन सी महसूस हुई, उसका हाथ धीरे धीरे पुष्पा की पीठ पर चलने लगा,

पुष्पा लगातार सुधा से बातों में लगी हुई थी, वहीं नीलम सोच रही थी कि उसकी ताई की पीठ कितनी चिकनी है, कितनी मुलायम और मखमली, तभी उसकी नजर गीले पेटीकोट में से झांकते हुए पुष्पा के चूतड़ों पर भी पड़ी जो पेटीकोट के गीले होने से हल्के हल्के नज़र आ रहे थे, उन्हें देख नीलम के बदन में कुछ होने लगा जिसे उसके लिए शब्दों में बताना मुश्किल था,
नीलम सोचने लगी कि ताई के चूतड़ कितने भरे भरे हैं इन्हें दबाने में कितना मज़ा आएगा, वो ये सोच कर रोमांचित होने लगी, पर साथ ही झिझकने भी लगी,
इसी बीच उसके कानों में नंदिनी के शब्द गूंजने लगे कि उसे खुद को बदलना होगा अगर सच में जीवन में मजे लेना चाहती है तो उसे खुद के बनाए इस कवच से बाहर निकलना होगा, नीलम सोचने लगी वैसे भी यूं दबे दबे रहने से भी क्या फायदा? आज उसने थोड़ी हिम्मत दिखाई थी तो उसे अपनी सहेली के साथ कितना मज़ा आया था और क्या पता वैसा ही मज़ा उसे घर में मिल जाए तो? ये सोच कर ही उसका बदन मचलने लगा, वहीं वो सोचने लगी ताई और मां भी बहुत कामुक है ये तो मैं देख चुकी हूं बस मुझे भी उनकी इसी कामुकता को इसी गर्मी को हवा देनी होगी। ये सोचते हुए नीलम अपने अंदर एक आत्मविश्वास महसूस करने लगी। उसने अपने हाथ को पुष्पा की पीठ पर नीचे की ओर बढ़ाने लगी, वो हाथ पीठ पर फिराते हुए थोड़ा नीचे ले जाने लगी और पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी ताई के चूतड़ों का माप लेने लगी

पुष्पा को भी नीलम का स्पर्श आज थोड़ा अलग लग रहा था पर वो सुधा से बातचीत में इतना ध्यान नहीं दे रही थी, पर नीलम के हाथ जब उसे पेटीकोट के ऊपर से अपने चूतड़ों पर फिसलते हुए महसूस हुए तो उसे थोड़ा अजीब तो लगा पर उसने कुछ कहा नहीं, वहीं नीलम आज पहली बार हिम्मत कर रही थी और उस हिम्मत के फल के रूप में उसकी ताई के मोटे मोटे तरबूज उसके हाथ में थे, पर कुछ देर बाद ही उसे हटना पड़ा क्योंकि उसकी मां भी नहाने के लिए आ गई थी, और वो उठकर एक ओर को जा कर बैठ गई, पर उसकी नज़रें बार बार पुष्पा और सुधा के बदन को देख रही थी,
एक पेड़ के नीचे बैठ कर सोमपाल और कुंवरपाल बातें कर रहे थे, कुंवरपाल ने तंबाकू बनाई और सोमपाल की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा: भेंचोद समझ नहीं आता आखिर प्यारे के साथ हुआ क्या?
सोमपाल ने तंबाकू उठाकर दांतों के नीचे दबाई और मुंह बनाते हुए बोला: मुझे तो लगता है ग्लानि भाव में आकर आत्महत्या तो नहीं करली उसने, धतूरा वगैरह खा लिया हो क्या पता?
कुंवरपाल: हो सकता है, वैसे बुरा तो मुझे भी बहुत लगा था कि रत्ना बहू के साथ वो सब किया।
सोमपाल: बुरा मैं तो आजतक तबसे उसके सामने नहीं गया हूं। डर भी लगा रहता है कि कहीं उसने किसी को बता दिया तो हमारा क्या होगा?
कुंवरपाल: धत्त वो किसी को नहीं बताएगी।
सोमपाल: तुझे ऐसा क्यों लगता है?
कुंवरपाल: अरे सोच अगर हमें मर्द होते हुए इतना डर है तो वो तो बहू है उसका क्या होगा। दूसरी बात कि उसके खुद के ससुर के साथ संबंध होना और फिर ससुर का अचानक गुजर जाना, बहुत सवाल उठेंगे उस पर।
सोमपाल: अरे हां यार तभी वो भी बिल्कुल चुप है।
कुंवरपाल: बोलने में उसका ही नुकसान है।
सोमपाल: वैसे अब जब सोचता हूं और ईमानदारी से कहूं तो है बड़ी कमसिन, उस रात मज़ा तो बहुत आया था।
कुंवरपाल: अरे बुढ़ापे में उल्टी ही बात करियो तू।
सोमपाल: अच्छा सही सही बता तुझे मज़ा नहीं आया?
इस बात पर कुंवर पाल चुप हो गया,
सोमपाल: बालपन से जानता हूं तुझे बुड्ढे, तेरी ठरक कितनी है सब जानता हूं,
कुंवरपाल: अरे है तो क्या करूं? साले तेरे पास तो जुगाड़ है हम तो खाली हैं।
सोमपाल: जुगाड़ है कैसा जुगाड़ है?
कुंवरपाल: क्यों भौजी नहीं है?
सोमपाल: वो इस उमर में हाथ भी नहीं लगाने देती एक बार कोशिश की तो बरस पड़ी उल्टा बोली इस उमर में ये सब हरकतें अच्छी लगती हैं क्या।
कुंवरपाल: अरे ये भेंचोद सब उमर के पीछे पड़े रहते हैं उमर हो गई तो क्या हुआ लोड़ा तो अब भी खड़ा होता है।
सोमपाल: वही तो पर ये बात तेरी भौजी माने तो।
कुंवरपाल: वैसे अगर सोचा जाए तो एक जगह काम बन सकता है पर खतरा भी है
सोमपाल: कहां? और क्या खतरा है?
कुंवरपाल: वहीं रत्ना बहू।
सोमपाल: ससुरे बावरा हो गया है तू? बड़ी मुश्किल से एक बार फंद छूटा और तू चूतियों वाली बात कर रहा है।
कुंवरपाल: अरे अभी समझाया तो कि वो किसी को कहेगी नहीं तो अपना फायदा ही है, और उसे भी डर होगा कि हम लोग किसी को न कुछ कहें तो मानेगी भी जल्दी।
सोमपाल: जो भी हो मुझे फिर भी ठीक नहीं लग रहा!
कुंवरपाल: अभी थोड़ी देर पहले खुद ही बोल रहा था न कि मज़ा तो आया था पर जरा सा खतरा दिखा तो गांड लुप लुप करने लगी तेरी।
सोमपाल: बात वो नहीं है देख उसके साथ एक बार किया और प्यारे चल बसा, मुझे तो लगता है हमें उससे दूर ही रहना चाहिए।
कुंवरपाल को भी सोमपाल की ये बात सही लगी और बोला: फिर और क्या करें हिलाते रहें बस।
सोमपाल: अरे तालाब में और भी मछलियां हैं ये नहीं तो कोई और सही।
कुंवरपाल: पर अब स्वाद तो किसी बहू का ही चखना है, गरम बहू में जो मज़ा है वो किसी में नहीं।
सोमपाल: फिर किस पर नज़र है तेरी?
कुंवरपाल: अरे कितनी बहुएं हैं गांव में कोई भी मिल जाए।
कुंवरपाल ने बात पलटते हुए कहा,
सोमपाल: हां ये भी सही कहा।
दोनों कुछ देर यूं ही बैठ कर बातें करते रहे वहीं उनके मन में बहुत से विचार घूम रहे थे।
आज तीनों दोस्तों की तिगड़ी एक साथ निकली थी पशुओं को चराने। पशु जहां एक ओर चर रहे थे वहीं ये तीनों पेड़ की छांव में बैठ कर गप्पें मार रहे थे, छोटू शहर की कहानियां बताने में लगा हुआ था और भूरा और लल्लू ध्यान से सुन भी रहे थे, भूरा के चेहरे पर थोड़ी चिंता नज़र आ रही थी,
लल्लू: अरे तुझे क्या हुआ तेरा मुंह क्यों बना है?
भूरा: अरे यार सुबह ही मां के हाथ जल गए,
छोटू: हैं? कैसे?
फिर भूरा उन्हें सारी बात बताता है,
लल्लू: भेंचो कुछ तो है तेरे घर में एक के बाद एक कांड हो रहे हैं।
भूरा: वही तो यार कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं
छोटू: मैं बताऊं क्या करना है?
जारी रहेगी






















