Adultery उल्टा सीधा - Page 3 - SexBaba
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Adultery उल्टा सीधा

अध्याय 8
लता तुरंत उठ कर खड़ी हुई स्नान घर में घुस गई बिना नंदिनी से आंखें मिलाए, नंदिनी अभी हो कुछ हुआ और उसके बाद अपनी मां की प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश करने लगी। इसी बीच उसने अपनी टांगों के बीच हाथ लगाकर देखा तो सलवार को गीला पाया उसे बदलने का सोच कर वो भी उठ गई। आगे...

छोटू फुर्ती में लल्लू के घर से निकला था, दिमाग में भूचाल आया हुआ था कि अभी ताई के साथ क्या हुआ था ये सोच सोच कर उसका दिमाग घूम रहा था, इसी सोच विचार में खोया हुआ वो आगे बढ़ रहा था और तभी अचानक से कोई उसे पीछे से पकड़ के रोकता है तो वो होश में आकर पीछे देखता है तो पाता है लल्लू और भूरा थे, उन्हें देख कर तो छोटू का चेहरा सफेद पढ़ जाता है, अभी अभी जो इसकी मां के साथ करके आया था उसके बाद लल्लू का सामने पड़ जाना छोटू का दिल धड़कने लगता है।

लल्लू: क्यों बे कहां है सुबह से एक बार भी मिला नहीं अबतक।

भूरा: और क्या हुआ तुझे चाची कह रही थीं कि तेरी तबीयत ठीक नहीं है।

छोटू उनकी बात सुनकर खुद को थोड़ा शांत करता है फिर भी उसके मन में घबराहट अभी भी थी,

छोटू: कक्कुछ भी तो न नहीं, वो रात को थोड़ा चक्कर आ गए थे बस। और तुम्हें पता ही है घरवाले जरा सी बात को बड़ा बना लेते हैं।

लल्लू: साले मुट्ठी ही इतनी मारता है तू कमज़ोर हो गया है,

भूरा: सारा माल हिला कर निकाल देगा तो चक्कर तो आयेंगे ही।

छोटू: अरे नहीं यार ऐसा नहीं है, बस तुम लोगों के साथ ही तो करता हूं।

भूरा: झूठ बोल रहा है, ये अभी भी हिला कर आया है।

ये सुन तो छोटू सुन्न पड़ जाता है,उसे कुछ बोलते नहीं पड़ता,

लल्लू: क्यूं छोटू सही में?

भूरा: अरे तू खुद देख पसीना पसीना हो रखा है थका हुआ भी लग रहा है

तभी लल्लू उसे ध्यान से देखते हुए बोल पड़ता है: और तूने मेरा निक्कर क्यूं पहना है भेंचो?

छोटू ये सुन डर जाता है उसे लगता है कहीं सच बाहर न आ जाए, वैसे भी जिसके मन में कोई ऐसी बात होती है जिसके बाहर आने पर बड़े कांड हो जाएं उसके मन में हमेशा यही डर रहता है कि बात बाहर न आ जाए यही हाल छोटू का था, छोटू घबराया हुआ जरूर था पर उसका दिमाग भी तेज चलता था, और उसे ही चला कर उसने बड़ी सावधानी से सोच कर बोलना शुरू किया।

छोटू: अरे यार तुम लोग भी ना, मैं तो तुम दोनों को ही ढूंढ रहा था और ढूंढ़ते हुए तेरे घर पहुंचा, तू तो मिला नहीं पर ताई ने गेहूं साफ करवाने के लिए रोक लिया मुझे उसी से पसीना पसीना हो गया और फिर ताई ने मुझे दही दिया था पीने को वो मेरे पजामे पर गिर गया इसलिए तेरा निक्कर पहन लिया।

लल्लू और भूरा ये सुनकर हंसने लगे।

लल्लू: सही फंसा बेटा तू आज मां के चक्कर में। मां सुबह मुझे बोल ही रही थी मैं चुपचाप भाग आया था,

भूरा: छोटू बेचारा फंस गया तेरी वजह से, जो काम तुझे करना था छोटू ने किया।

भूरा ने हंस कर कहा, पर उसकी बातें सुन कर और ये सुन के वो काम छोटू को करना पड़ा था ये सोच कर छोटू के मन में तो लता का वो ही रूप सामने आ रहा था जो उसने अंत में देखा था जिसमें लता का चेहरा उसके रस में भीगा हुआ नज़र आ रहा था, वो जितना उस दृश्य को हटाने की कोशिश करता उतना उसकी आंखों के सामने वो दृश्य आ रहा था। फिर भी उसने किसी तरह बात को संभाला।

छोटू: अब तो कर दिया मैंने तुम लोग कहां जा रहे थे?

लल्लू: अरे हम तो तुझे ही ढूंढ रहे थे, और कहां जाएंगे। और सुन एक मस्त चीज़ मिली है चल तुझे दिखाते हैं।

छोटू: क्या?

भूरा: अरे चल तो सब पता चल जायेगा।

छोटू उनके साथ चल देता है तीनों दोस्त जल्दी ही नदी के किनारे होते हैं, और एक ओर पेड़ों की ओट में छिप कर बैठ जाते हैं, और फिर किसी खजाने की तरह लल्लू और भूरा उसे सत्तू के द्वारा दिए हुए पृष्ठ निकाल कर दिखाते हैं, छोटू भी उन पर बने हुए चित्रों को देख कर चौंक जाता है और बड़े ध्यान से आंखें बड़ी कर कर के उन्हें देखने लगता है, वो पहली बार ऐसा कुछ देख रहा था इसलिए हैरान होना स्वाभाविक ही था,

छोटू: ये तुम दोनों को कहां से मिले बे?

भूरा: मस्त हैं ना?

छोटू: हां पर आए कहां से?

लल्लू: सत्तू ने दिए हैं, उसे शहर में मिले थे किसी से।

छोटू: सही है यार पता नहीं था औरतें ऐसी फोटो भी खिंचवाती हैं।

भूरा: अरे ये अंग्रेजन हैं, वहां तो सब कुछ चलता है।

लल्लू: और का, सत्तू ने बोला है और भी बातें बताएगा साथ ही शायद और भी तस्वीरें हों उसके पास।

छोटू: मज़ेदार हैं यार। कैसी बातें?

भूरा: औरतों के बारे में,

छोटू: मतलब?

लल्लू और भूरा फिर मिलकर जो ज्ञान सत्तू ने उनके साथ सांझा किया था वो उसे छोटू तक भी पहुंचाते हैं, छोटू भी उनकी बातों को ध्यान से सुनता और समझता है, लल्लू और भूरा छोटू को अपनी बातों में और अपने साथ शामिल कर, जो सुबह हुआ था जब उन्होने छोटू की मां पुष्पा की गांड को नंगा देखा था उसकी ग्लानि को मिटाने की कोशिश कर रहे थे, वहीं छोटू के मन में अपना अलग डर और पछतावा था, वहीं भूरा भी मन ही मन में एक बात से व्यथित था जब से उसके मन में उसकी मां के लिए ही अलग तरह के विचार आए थे।

खैर इस तरह थोड़ा समय बीता तो फिर तीनों जानवरों के लेकर चराने के लिए निकल गए। पुष्पा, सुधा और रत्ना साथ में रत्ना के यहां बैठे हुए बातें कर रहे थे, कुछ ही देर में लता भी वहां आ गई, गांव की औरतों की किट्टी पार्टी तो होती नहीं थी और होती थी तो वो भी शायद ऐसे ही होती थी, दोपहर में जब किसी दिन समय खाली मिला तो किसी के घर बैठकर इधर उधर की बातें कर लीं, अपने दुख सुख बांट लिए, मज़ाक कर लिए, और दूसरी औरतों की बुराई यही सब होता था। ऐसे ही आज भी चारों एक साथ थीं।

खूब बातें चल रहीं थीं लता आज थोड़ा चुप ही थी, उसके दिमाग में तो वही सब चल रहा था, जो आज हुआ था, वहीं पुष्पा और सुधा भी एक दूसरे से नज़रें तो चुरा रहीं थी पर वो भी जानती थीं कि एक ही घर में रहना है तो चाहे अनचाहे बात तो करनी ही पड़ेगी, इसलिए जो हुआ उसको छोड़कर बाकी बातों पर बिल्कुल साधारण तरह से बातें कर रही थीं। इसी बीच बात छिड़ गई बच्चों की अब त्रिया चरित्र होता ही है कि पेट में कोई बात पचती नहीं, तो पुष्पा सुधा से भी नहीं पची और घर की बात है बाहर ना जाए ये बोलकर रत्ना और लता को सारी बात बता दी,

छोटू का नाम आने पर लता थोड़ी चौंकी ज़रूर पर जब उसने पूरी बात सुनी तो सोचने लगी कि एक चीज तो मैंने सोची ही नहीं थी कि जब छोटू का पजामा मैंने उतारा था तब उसका लंड पहले से ही खड़ा हुआ था, और वहां कुछ ऐसा भी नहीं हो रहा था जिससे लंड खड़ा हो, सिर्फ मैं ही थी वहां पर लंड तो तब खड़ा होता है जब कोई उत्तेजित करने वाली चीज देखी जाए, पर ऐसा कुछ नहीं था,

लता मन ही मन में गुणा भाग कर रही थी, और एक निष्कर्ष पर पहुंची, इसका मतलब ये सही है ज़रूर छुटुआ पर उदयभान की लुगाई ने कुछ किया है तभी उसका लंड ऐसे खड़ा था, और कितना बड़ा भी लग रहा था, नहीं तो इतनी सी उमर में ऐसी लंबाई, वो भी छुटूआ की जिसकी कद काठी इतनी ज्यादा भी नहीं है।

लता: हाय दैय्या और उसका रस हमने अपने ऊपर लिया और लिया तो लिया साथ में मैंने और नंदिनी ने चखा भी, कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए।

लता मन ही मन सोच कर घबराने लगी, इधर रत्ना के साथ तो कुछ नहीं हुआ था पर उसका डरने वाला स्वभाव था ही तो ये सुनकर तो उसके मन में भी डर बैठने लगा, उसे ये भी पता था कि उसका बेटा भूरा भी तो छोटू के साथ जंगल में गया था कहीं उसके साथ तो कुछ नहीं हुआ, वो भी मन में नई नई कहानियां गड़ने लगी।

शाम होने से पहले ही सारी औरतें घर को चल दीं, पर सबके मन में ही अपनी अपनी व्यथा थीं।

सूरज ढलने से पहले ही सारे घरों में खाना बन चुका था, आज छोटू भूरा और लल्लू भी भैंसों को चराकर जल्दी घर लौट आए थे, जैसा कि उन्हें समझाया गया था, रत्ना ने अपने दोनों बेटों और पति और ससुर को खाना खिला दिया था और खुद खाकर अब पटिया पर बैठे बैठे बर्तन माँझ रही थी, उसके मन में वही सब चल रहा था जो आज दोपहर में बातें हुई थीं, उसका मन अंदर ही अंदर घबरा रहा था, बर्तन माँझने के बाद रत्ना कमरे के अंदर गई और दिए की रोशनी में उसने अपनी टोटके वाली किताब निकाली और उसमें ऐसी परिस्थिति के लिए कोई उपाय ढूंढने लगी, काफी ढूंढने के बाद उसे एक उपाय मिला, जिसमें लिखा था कि अपने परिवार को भटकती आत्माओं से बचाने के लिए, अपने ही परिवार के गुजरे हुए पूर्वज जिनका निधन सबसे अंत में हुआ हो उनसे ही रक्षा करने के लिए पूजा करनी चाहिए।

पूजा की विधि: जिस मृत व्यक्ति की पूजा करनी है उनका रखा हुआ वस्त्र और गहने आदि जो भी मिल सकें उसे धारण कर, एक कटोरी में सरसों का तेल एक नींबू लेकर अपने सामने रखें और फिर आंखें बंद कर के उनकी आत्मा का आहवान करें और उन्हें अपनी मदद के लिए मन ही मन पुकारें, फिर आंखे खोल कर नींबू को तेल की कटोरी में डाल कर पुनः आंखे बंद कर उनसे रक्षा की प्रार्थना करें और फिर उठ जाएं और उस सरसों के तेल को लेकर परिवार के सभी सदस्यों के बिस्तर के चारों कोनों पर लगा दें, जिससे कोई भी बाहरी आत्मा से परिवार की रक्षा होगी ऐसा लगातार सात दिन करना होगा। परंतु यह सब कार्य रात्रि में सबके सोने के बाद ही करें।

रत्ना ये पढ़ मन ही मन खुश हो जाती है और सोचती है अभी समय है आज से ही शुरू कर देती हूं, पर किसकी पूजा करूं? सबसे आखिर में तो भूरा की दादी ही सिधारी हैं, सही है उन्हीं की करती हूं। वो तुरंत कमरे में रखा पुराना संदूक खोलने लगती है, और कुछ देर बाद उसे अपनी सास की एक पुरानी साड़ी नजर आती है, साड़ी के बाद वो बाकी कपड़े भी ढूंढती है पर उसे और कुछ नहीं मिलता ना ब्लाउज और न ही पेटीकोट। रत्ना सोचती है अरे उससे ही गलती हो गई महीने भर पहले ही उसने बाकी कपड़े खुद ही सफाई के दौरान फेंक दिए थे, पर कोई नहीं साड़ी से ही काम चलाना होगा।

साड़ी को रख वो बाहर आकर देखती है तो उसके दोनों बेटे और पति आंगन में सो रहे थे, वहीं उसके ससुर चबूतरे पर सोते थे, ताकि बहु आंगन में सो सके इसलिए या तो दरवाज़े के बाहर चबूतरे पर या छत पर ही सोते थे।

उसने दरवाजे पर झांक कर देखा तो ससुर प्यारेलाल भी से रहे थे। रत्ना ने सही समय जान कर जैसा जैसा लिखा था वैसे ही करने की ठानी और अपने कमरे में आकर सास की साड़ी उठाई, पर ब्लाउज और पेटीकोट नहीं था तो उसने सोचा थोड़ी देर की ही तो बात है सिर्फ साड़ी से ही काम चलाती हूं पर पूजा अच्छे से होनी चाहिए ये सोच उसने अपने सारे कपड़े उतार दिए और अपने बदन पर सिर्फ अपनी सास की साड़ी लपेट ली और फिर जैसे पूजा की विधि थी वैसे ही पूजा की और फिर तेल को लेकर आंगन में चारों खाट के चारों कोनों पर लगाया और फिर चुपके दबे पांव जाकर अपने ससुर की खाट के भी चारों पांओं पर लगा आई,

और फिर साड़ी को उतार कर अपने कपड़े पहन लेट गई,उसके मन में एक संतुष्टी हुई की अब उसके परिवार को उदयभान की लुगाई की आत्मा यदि कुछ करना चाहेगी तो उसकी सास की आत्मा उनकी रक्षा करेगी।

दूसरी ओर लता ने भी अपने यहां सबको खिला पिला दिया था, बस वो नंदिनी से थोड़ा आंखें चुरा रही थी, उसका सामना करने में लता को शर्म आ रही थी, वहीं नंदिनी तो आज जो कुछ हुआ उसे सोच सोच कर उत्तेजित हो रही थी वो अपनी मां के करीब जाने की उनसे बातें करने की कोशिश कर रही थी पर लता उससे दूर दूर रह रही थी। वहीं लता भले ही खुद को नंदिनी से दूर रख रही थी पर खुद को उत्तेजित होने से रोक नहीं पा रही थी, दोपहर को जो भी हुआ उसे सोच सोच कर उसका बदन गरम हो रहा था,उसकी चूत फिर से गीली महसूस हो रही थी, उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसा क्यूं हो रहा है, क्या ये सब उदयभान की लुगाई की वजह से है, उसी ने कुछ किया है जो मेरा बदन ऐसे तड़प रहा है, हो भी सकता है जब से छोटू का रस मेरे अंदर गया है एक आग सी अंदर भड़क गई है, कहीं नंदिनी को भी तो ऐसा ही नहीं लग रहा, हाय क्या करूं, कैसे बचूं, कैसे बचाऊं अपनी बिटिया को, मुझे तो उसके सामने जाने में भी शर्म आ रही है, पर कब तक उससे दूर रहूंगी।

लता ये सब सोचते हुए काम निपटा रही थी, वहीं नंदिनी सब को खाना परोस रही थी, खाना खाने के बाद मगन और कुंवरपाल खेत पर चल दिए क्योंकि गेहूं कट रहे थे और आधा खेत अभी भी बाकी था, तो सोचा कल दिन में धूप में काटने से अच्छा है अभी रात में ही ठंडा ठंडा निपटा लेते हैं। चांदनी रात थी तो अच्छा खासा उजाला भी होगा।

लता: अरे लल्लू को भी ले जाओ ना थोड़ी मदद हो जायेगी।

लल्लू का तो ये सुनकर मुंह बन गया, सोचने लगा मां ने फंसा दिया,

कुंवरपाल: अरे रहने दे बहू ये कहां रात भर जागेगा।

मगन: अरे नहीं पिताजी, दिन में कौनसा काम करता है ये, चल लल्लू उठा दरांती,

लल्लू अब क्या बोलता बाप को मना करने का मतलब था मार इसलिए जल भुन कर दरांती उठाई और चलने लगा, नंदिनी ने रात के लिए भी खाना बांध दिया था तीनों सारा सामान लेकर निकल लिए कुंवर पाल ने पीछे से आवाज लगाई: नंदिनी बिटिया, किवाड़ लगा ले।

नंदिनी भाग कर किवाड़ और उन पर कुंडी लगा आई अब घर में सिर्फ मां बेटी थे, रसोई का काम निपटा कर लता जब खाली हुई तो नंदिनी बोली: मां बिस्तर कहां लगाऊं? कमरे में सोना है या आंगन में।

नंदिनी की बात सुनकर अचानक से लता को एहसास हुआ कि घर पर रात भर सिर्फ वो और उसकी बेटी है और ये सोचकर ही उसके बदन में एक सिहरन सी हुई, उसे बदन में उत्तेजना होने लगी, वो मन ही मन विचार करने लगी कि ऐसा क्यूं हो रहा है मेरे साथ, क्यों मेरे मन में अपनी ही बिटिया के लिए ये सब खयाल आ रहे हैं,

ये सब विचार करते हुए उसने कहा: आंगन में ही सोएंगे।

नंदिनी ये सुन आंगन में बिस्तर बिछाने लगी,

वैसे उत्तेजित तो नंदिनी भी हो रही थी, साथ में उत्साहित भी जबसे दोपहर में उसकी मां और उसके बीच जो हुआ था वो उसे भुला नहीं पा रही थी या कहें भुलाना ही नहीं चाह रही थी। ऐसी उत्तेजना तो उसे सत्तू के साथ होने पर भी नहीं होती थी, जैसी मां के साथ हुई थी।

जल्दी ही लता ने सारे काम निपटाए और कमरे के किवाड़ लगाकर बाहर के किवाड़ भी देखे कि बंद हैं कि नहीं और फिर वहीं किवाड़ के बगल से निकलती नाली पर अपनी साड़ी उठाकर बैठ गई और मूतने लगी, मूतते हुए उसका बड़ा मन हुआ कि अपनी चूत को छूकर थोड़ा सा सहला दे ताकि उसकी खुजली से थोड़ा उसे आराम मिले पर उसने खुद को रोका, अब वो कोई भी गलत कदम नहीं रखना चाहती थी।

मूतने के बाद लता आंगन में वापिस आई तो आंगन में बिस्तर देख कर थोड़ा सकुची क्योंकि नंदिनी ने सिर्फ एक ही बड़ी खाट बिछाई थी और उसी पर बिस्तर लगाकर एक ओर लेटी हुई थी, नंदिनी के साथ एक ही बिस्तर पर सोने का सोच कर लता सकुचाने लगी, ऐसा नहीं था कि वो और नंदिनी एक खाट पर कभी सोते नहीं थे बल्कि अक्सर ही ऐसा होता था, पर आज की बार अलग थी, आज जो कुछ हुआ उससे उनके रिश्ते में बदलाव आ गया था, लता बिस्तर के पास खड़ी होकर सोच में व्यस्त थी, तो नंदिनी ने उसे देखा और कहा: मां खड़ी क्यूं हो, आओ लेटो ना।

नंदिनी ने बिस्तर पर खाली जगह को थपथपा कर उसे दिखाते हुए कहा, लता अपने आप को एक नई नवेली दुल्हन की तरह महसूस कर रही थी जो कि बिस्तर के बगल में खड़ी सकुचाती है और उसका पति उसे बिस्तर पर आने के लिए कहता है, पर अभी अंतर इतना था कि ना तो वो नई नवेली दुल्हन थी बल्कि और न ही बिस्तर पर उसका पति, बल्कि बिस्तर पर तो उसकी खुद की जन्मी बिटिया थी पर लता उसके साथ सोने में भी झिझक रही थी। लता ने सोचा अगर अलग सोऊंगी तो बेकार में नंदिनी दस सवाल करेगी और फिर से दोपहर वाली बात आ जायेगी इससे अच्छा है चुपचाप सो ही जाती हूं।

हल्के कदमों से आगे बढ़ कर लता नंदिनी के बगल में बैठी तो नंदिनी उसे रोकते हुए बोली: अरे मां आज तुम्हें गर्मी नहीं लग रही का आज साड़ी पहन कर ही सोउगी?

लता के ऊपर एक और समस्या आ गई क्योंकि वो अक्सर सिर्फ पेटीकोट ब्लाउज में ही सोती थी, साड़ी पहनकर तभी सोती थी जब उसके ससुर घर में ही सोते थे या कोई अतिथि आया हो, पति और बच्चों के आगे तो साड़ी उतारकर ही सोती थी, अब नंदिनी ने जब ये पूछा तो उसके बदन में फिर से सिरहन हुई, उसे समझ नहीं आया कि नंदिनी की बात का क्या जवाब दे तो उसने खड़े होकर अपनी साड़ी को खोलना शुरू कर दिया, जैसे जैसे वो साड़ी खोल रही थी उसे उसकी चूत गीली होती महसूस हो रही थी, उसे लग रहा था जैसे उसका बदन फिर से कामाग्नि में जल रहा है।

नंदिनी बिस्तर पर लेटे हुए अपनी मां को साड़ी उतारते देख रही थी, चांद की दूधिया चांदनी में उसकी मां का गोरा बदन चमक रहा था, नंदिनी की आंखें अपने मां के बदन पर ही टिकी हुई थीं, उसे लग रहा था कि उसने आज से पहले अपनी मां के बदन पर कभी ध्यान ही नहीं दिया, कितना सुंदर और कामुक बदन है मां का, हर ओर से गदराया हुआ, फिर उसके मन में विचार आया कि पर उसे अपनी मां के बदन से ये आकर्षण क्यों हो रहा है, भले ही मां कितनी भी सुंदर क्यों न हो, पर मैं एक लड़की हूं और एक लड़की का आकर्षण तो लड़के से होना चाहिए पर मुझे ऐसा क्यूं हो रहा है?ये कुछ सवाल थे जिनका जवाब उसके पास नहीं था।।

कुछ ही पलों में लता की साड़ी उसके बदन से अलग हुई तो उसने साड़ी को बगल में ही रस्सी पर टांग दिया, और फिर बिना नंदिनी की ओर देखे खाट पर लेट गई और तुरंत आंखें मूंद लीं, वो किसी भी तरह से नंदिनी का सामना करने से बच रही थी।

नंदिनी तो पहले ही उसकी ओर करवट लेकर सो रही थी, उसने देखा की उसकी मां लेट कर तुरंत आंखें बंद कर सोने लगी है तो उसे कुछ ठीक नहीं लगा, वो चाह रही थी कुछ अलग हो, जो कुछ दोपहर में हुआ उसके बाद वो सब भुला कर सो तो नहीं सकती थी,पर उसे मां के गुस्सा होने का डर भी था,

वहीं लता ने सोचा था मैं सोने का नाटक करती हूं जल्दी ही ये भी सो जायेगी तो सब सही रहेगा। पर मन ही मन न जाने उसका मन भी चाह रहा था कि ये रात बस ऐसे ही न बीत जाए। नंदिनी ने कुछ सोचा और फिर अपना एक हाथ अपनी मां के नंगे पेट पर रख दिया, लता को जैसे ही पेट पर नंदिनी का हाथ महसोस हुआ उसके बदन में तरंगें उठने लगी, पर उसने खुद को संभाला और वैसे ही सोने का नाटक करने लगी, नंदिनी को भी अपने बदन में मां के पेट का स्पर्श पाकर एक अदभुत आनंद हुआ, उसके बदन में भी फिर से वही उत्तेजना होने लगी जो उसने दिन में महसूस की थी।

नंदिनी ने लता के चेहरे की ओर देखा तो पाया कि वो वैसे ही सो रही है, तो नंदिनी ने अपने हाथ को मां के चिकने पेट पर फिराना शुरू कर दिया, उसे अच्छा लग रहा था अपनी मां के चिकने पेट पर हाथ फिराकर, लता भी अपनी बिटिया के हाथ को अपने पेट पर चलता महसूस कर मन ही मन खुश हो रही थी पर बाहर से सोने का नाटक जारी था। पर उसकी सांसें गहरी होने लगीं थीं। नंदिनी भी देख रही थी कि कैसे उसकी मां की छाती ऊपर नीचे हो रही थी, उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को यूं ऊपर नीचे होते देख नंदिनी को अच्छा लग रहा था, नंदिनी का हाथ अब लता के पूरे नंगे पेट पर चल रहा था एक ओर से कमर से लेकर दूसरी ओर तक ऊपर ब्लाउज से लेकर पेटिकोट तक। कुछ देर तक वो यूं ही पेट को सहलाती रही फिर जब उसका सहलाने से मन भर गया तो उसने लता के पेट को हल्के हल्के मसलना शुरू कर दिया, अपनी मां के गदराए पेट की कोमल त्वचा को मसलने में उसे अच्छा भी लग रहा था,

वहीं लता को भी बेटी के द्वारा यूं मसले जाना अच्छा लग रहा था, जहां जहां नंदिनी के हाथ उसके पेट को मसलते मानो उस जगह से एक आनंद की तरंग उठती और पूरे बदन में उत्तेजना बनकर फैल जाती, सोने का नाटक करते रहना लता के लिए मुश्किल होता जा रहा था, नंदिनी लगातार उसके बदन को अपनी इच्छानुसार मसल रही थी उससे खेल रही थी। अपनी मां के बदन के साथ ऐसे छेड़ छाड़ करने में नंदिनी को बहुत मज़ा आ रहा था, लता को भी एक अदभुत आनंद मिल रहा था पर वो उसे मन में दबाए हुए सोने का नाटक कर रही थी, उसका एक मन कर रहा था कि अपनी बेटी से खुल कर अपने बदन को मसलवाए पर एक मां होने के नाते कैसे अपनी बेटी के आगे लाज शर्म को त्याग दे, कैसे समाज के बनाए हुए सारे नियमों को अपने बदन की आग में जला दे, कैसे अब तक मिले संस्कारों को मसल कर रख दे।

इसी बीच लता के पेट से नंदिनी का हाथ हट गया तो लता मन ही मन सोचने लगी कि क्या हुआ नंदिनी ने हाथ क्यों हटा लिया, हालांकि जहां शुरुआत में वो खुद यही चाह रही थी कि उसके और बेटी के बीच कुछ ना हो वो अभी बेटी का हाथ पेट पर से हटने से बेचैन होने लगी, उसे नंदिनी का हाथ हटना बिल्कुल भी नहीं भा रहा था, वो सोचने लगी कि ये क्या हो रहा है, नंदिनी ने हाथ क्यों हटा लिया, कहीं उसका मन तो नहीं बदल गया, कहीं मेरी ओर से कोई साथ ना मिलने की वजह से तो नहीं उसने खुद को अलग कर लिया, क्या पता उसे लग रहा हो मैं सो गई हूं, क्या करूं? आंख खोल कर देखूं? लता के मन में ऐसी ही कई सारे प्रश्न आने लगे साथ ही हर बढ़ते पल के साथ वो बेटी के स्पर्श के लिए तड़पने लगी।

नंदिनी इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं थी, खाट के बगल में रखे लोटे से पानी पीते हुए भी उसकी लगातार नजर अपनी मां के कामुक बदन पर ही थी, उसे मां का बदन ऐसा लग रहा था कि जिससे वो जितना भी खेल ले उसका मन नहीं भर रहा था, बिस्तर पर बैठी नंदिनी पानी से अपनी प्यास बुझा रही थी तो बगल में लेटी हुई उसकी मां बदन अंदर ही अंदर बदन की गर्मी से जल रही थी, पानी पीने के बाद नंदिनी ने दोबारा ध्यान अपनी मां पर दिया पर इस बार मां के बगल में लेटी नहीं बल्कि लता के पैरों की ओर बैठ कर वो उसके ऊपर झुक गई, इधर बेचैन लता को पहले खाट पर कुछ हरकत महसूस हुई और फिर उसे अगले ही पल अपने पेट पर हाथ का स्पर्श हुआ जिसे पाकर लता का बदन फिर से सिहर उठा, उसके बेचैन बदन को चैन मिला, पर अगले ही पल उसे हाथ के साथ ही कुछ और स्पर्श महसूस हुआ और जैसे ही उसे एहसास हुआ कि ये क्या है उसका पूरा बदन उत्तेजना में जल उठा, क्यूंकि नंदिनी ने अपनी मां के मक्खन जैसे पेट पर अपने होंठ लगा दिए थे और पेट को चाटने लगी, लता बेटी की इस हरकत से पागल होने लगी, उसके लिए सोने का नाटक करते रहना बहुत मुश्किल होने लगा, फिर भी बड़ी मुश्किल से लता ने खुद को संभाला,

नंदिनी को तो जैसे मां के जागने का कोई डर ही नहीं था या यूं कहें वो जानती थी कि उसकी मां जाग रही है, बस सोने का नाटक कर रही है, एक औरत होने के नाते नंदिनी लता की मनोदशा भी समझ रही थी और उसके बदन के इशारे भी, उसकी मां की तेज चलती हुई सांसें चेहरे के भाव सब बता रहे थे कि उसकी मां कितनी उत्तेजित है चाहे वो उसे छुपाने का कितना भी प्रयास कर रही थी, नंदिनी को इस खेल में भी मजा आ रहा था वो देखना चाहती थी कि उसकी मां कब तक सोने का नाटक करती रहेगी। अगली कुछ देर तक नंदिनी ने लता के पेट के हर हिस्से को खूब अच्छे से चाटा जितना भी पेट ब्लाउज और पेटीकोट नंगा था उसने कोई भी हिस्सा बिना चाटे नहीं छोड़ा। वहीं नीचे पड़ी हुई लता बेटी की हरकतों से तड़पती रही, उसकी उत्तेजना को वो कैसे संभाल रही थी वो खुद ही जानती थी,

नंदिनी को भी अपनी मां का पेट चाटने में ऐसा अद्भुत आनंद आ रहा था जिसे उसने आजतक महसूस नहीं किया था, उसकी खुद की उत्तेजना और बदन में गर्मी हद से ज्यादा बड़ गई थी, साथ ही उसकी चूत में इतनी खुजली हो रही थी कि उसके लिए सहना मुश्किल हो रहा था, साथ ही उसे इस के साथ साथ मूत भी आ रहा था, पर उसके लिए मां का पेट छोड़ना मुश्किल हो रहा था, पर कुछ पल बाद उससे सहना मुश्किल हो गया तो वो खाट से उठी और बाहर किवाड़ की ओर मूतने के लिए लपकी, और अपनी पजामी को खोल वहीं बैठ गई जहां कुछ देर पहले उसकी मां मूत कर गई थी, मूतने के बाद नंदिनी को थोड़ा आराम मिला, काफी देर से उसने मूत रोक कर रखा हुआ था, मूतने के बाद पजामी ऊपर कर वो बापिस खाट के पास आई और उसने फिर से अपनी मां पर नजर डाली तो देखा कि मां की सोने की स्थिति थोड़ी बदल गई थी पहले जो हाथ अगल बगल थे अब उनसे लता ने अपने सिर के ऊपर रख लिया था जिससे उसका माथा खासकर आंखें ढंक गई थी, शायद ये इसलिए था कि वो आंखे खोले भी तो नंदिनी को न दिखें।

नंदिनी बापिस खाट पर चढ़ कर बैठ गई और उसने दोबारा से हाथ अपनी मां के पेट पर रखा और वो फिर से पर पर हाथ चलाने लगी, उसने हाथ ऊपर की ओर चलाया तो उसका हाथ ब्लाउज के किनारे से लगा तो उसे कुछ अलग सा महसूस हुआ उसने तुरंत ब्लाऊज की ओर देखा तो उसकी आंखे फैल गई उसने तुरंत उंगली आगे कर के देखा तो पाया कि उसकी मां का ब्लाऊज खुला ही था जो की उसकी उंगली लगते ही अलग होने लगा, मतलब ब्लाउज के सारे बटन खुले हुए थे बस सिर्फ दोनों पट ऐसे रखे हुए थे जैसे कि ब्लाउज बंद हो, नंदिनी की तो ये जानकर आंखें और मुंह दोनों खुल गए। वो सोचने लगी कि अभी जाने से पहले जब वो मां का पेट चाट रही थी तो ब्लाउज के सारे बटन बंद थे उसे अच्छे से याद है मतलब मां ने मेरे पेशाब करने जाने पर ब्लाउज खोला है ये सोच कर ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई, वो सोचने लगी मां भी वही चाहती है बस शर्मा रही है, ये सोच उसने तुरंत ब्लाऊज के पाटों को फैला दिया और उसकी मां के बड़े बड़े नंगे चूंचे चांद की चांदनी में उसके सामने आ गए जिन पर उसने तुरंत ही अपने हाथ जमा दिए और उन्हें मसलने लगी, और उन्हें मसलते हुए अपनी मां के चेहरे के भावों को देखने लगी वो देख पा रही थी कि उसकी मां कितना प्रयास कर रही है कुछ भी न जताने का,

लता के लिए बहुत मुश्किल हो रहा था खुद को संभालना नंदिनी के हाथ ज्यों ज्यों उसकी चूचियों को मसल रहे थे वो पागल हो रही थी और फिर कुछ ऐसा हुआ कि उसका मुंह खुल गया और न चाहते हुए भी उसके मुंह से एक आह निकल गई और वो हुआ इसलिए क्योंकि नंदिनी ने अपनी मां की चूची को मुंह में जो भर लिया था, और चूसने लगी थी,

लता की आह ज़रूर निकली थी, पर नंदिनी का तो उस आह पर ध्यान ही नहीं गया उसका सारा ध्यान तो अपनी मां की मोटी मोटी चूचियों पर था, वो पागलों की तरह अपनी मां की चुचियों को चूसने में लगी हुई थी, उसकी मां भी उसकी हरकतों से पागल हो रही थी, नंदिनी को इस बात की और खुशी थी कि उसकी मां ने खुद से ब्लाउज खोला था ताकि वो उसकी चूचियों की पी सके, इस बात से उसे और जोश आ रहा था, और बदल बदल कर वो दोनों चुचियों को चूस रही थी, दोनों चूचियों को जी भर चूसने के बाद भी नंदिनी रुकी नहीं और फिर से लता के पेट को चाटने लगी हर ओर चूमती चाटती हुई वो पेटिकोट के ऊपर पहुंची और पेटीकोट के ऊपर से ही लता की नाभी को महसूस कर उसे चाटने लगी, क्योंकि लता साड़ी और पेटीकोट नाभी से ऊपर बांधती थी तो उसकी नाभी पेटिकोट के नीचे छिपी हुई थी, जिसे पेटिकोट के ऊपर से ही नंदिनी चूमने लगी,

ऐसा नहीं था कि नंदिनी ने ऐसा पहले कभी किया हो या उसे संभोग का कोई ज्ञान हो वो सब स्वभाविक ही किए जा रही थी, वैसे भी सम्भोग भी एक स्वाभाविक क्रिया है, जानवरों को कौन सिखाता है सब कुछ अपने आप होता चला जाता है, उसी प्रकार नंदिनी भी सब कुछ किए जा रही थी।

लता तो अपनी नाभी के कपड़े के ऊपर के चुम्बन से ही आहें भर रही थी, उसके बदन में एक करंट सा दौड़ रहा था जिसे वो पूरी तरह से महसूस नहीं कर पा रही थी क्योंकि बीच में पेटिकोट जो आ रहा था, लता ने अगले ही पल वो किया जो वो शायद कभी होश में करने का सोचती भी नहीं, पर अभी होश की जगह ही कहां थी अभी तो सिर्फ वासना का नशा था, और उसी नशे में बहकते हुए लता ने अपने कांपते हाथों से अपने पेटिकोट का नाड़े में लगी गांठ खोलदी, नंदिनी ने अपनी आंखों के सामने अपनी मां की उंगलियों को नाड़े को खोलते देखा तो नंदिनी के बदन में भी बिजली दौड़ गई उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी मां खुद से ये सब कर रही हैं, नाड़े की गांठ खुलते ही नंदिनी ने पेटिकोट को थोड़ा सा नीचे किया और उसके सामने उसकी मां की गहरी नाभी आ गई जिसे देखते ही नंदिनी ने अपने होंठ उस पर लगा दिए और अपनी जीभ उसके बीच में घुसा दी।

बिटिया के होंठ नाभी पर लगते ही और जीभ का नाभी की गहराई में स्पर्श होते ही लता की कमर झटके खाने लगी और कुछ पल के लिए ऊपर उठ गई, ये देख नंदिनी को बड़ा अच्छा महसूस हो रहा था कि वो अपनी मां को ऐसा आनंद दे पा रही है कि जिसे पाकर वो स्वयं पर भी नियंत्रण नहीं रख पा रही हैं,

वहीं लता का तो बुरा हाल था उसने आज तक ऐसा आनंद ऐसी उत्तेजना कभी महसूस नहीं की थी जो कि वो आज अपनी बेटी के साथ कर रही थी, उसे पता ही नहीं था कि संभोग में बिना लंड के चूत में घुसाए भी इतना मज़ा आ सकता है, उसकी चूत गीली होकर बार बार रो रही थी, उसकी चूत में मानों हज़ारों चीटियां अब रेंग रहीं थी, हर पल उसकी ये चूत की खुजली असहनीय होती जा रही थी,

नंदिनी अपनी जीभ को मां की नाभी में घुसा कर ऐसे चूस रही थी मानो उसने से रस निकल कर उसके मुंह में घुल रहा हो, और उसके पूरा बदन में उत्तेजना का नशा गोल रहा हो, लता को भी ऐसा ही लग रहा था जैसे उसकी बेटी की जीभ से उसकी नाभी में कुछ तरंगे निकल रहीं थी और वो तरंगें नाभी से सीधी उसकी चूत में जा रही थीं और उसकी चूत की खुजली को और बड़ा रहीं थीं। लता की चूत भी अब सेवा मांग रही थी चूचियों और पेट को मिले ध्यान ने उसकी निगोड़ी चूत को जला भुना दिया था। वहीं नंदिनी की जीभ से उसकी नाभी में ऐसी तरंगें उठ रहीं थी जो उसके पूरे बदन को कांपने पर मजबूर कर रही थी, लता की चूत में अब असहनीय खुजली होने लगी और उसी के चलते वो खाट पर पड़ी हुई तड़पने लगी उसके हाथ नंदिनी के सिर पर कस गए और वो उसके सिर को अपनी नाभी में दबाने लगी।

जबसे ये सब शुरू हुआ था तबसे पहली बार कोई हरकत लता ने की थी बेटी के सामने, नंदिनी को खुशी हुई कि उसने उसकी मां को नाटक छोड़ने पर मजबूर कर दिया, लता के दिमाग में तो अभी नाटक, शर्म, लाज कुछ भी नहीं था अभी तो उसे सिर्फ उसकी चूत की खुजली, चूत की प्यास पागल कर रही थी वो चाह रही थी जल्दी से उसे इस असहनीय पीढ़ा से राहत मिले, और इसी वश वो नंदिनी के सिर को नीचे की ओर धकेलने लगी, अपनी मां से नीचे की ओर का दबाब देख नंदिनी को समझ नहीं आया कि उसकी मां क्या चाहती है पर वो नीचे होने लगी, वैसे पता तो लता क्रो भी नहीं था कि वो क्या चाहती है वो तो बस इस असहनीय खुजली से राहत चाहती थी जो उसकी चूत में हो रही थी,

नंदिनी ने नाभी को छोड़ा और नीचे की ओर बढ़ी पर अपने साथ साथ मां का ढीला और खुला हुआ पेटिकोट भी सरकाने लगी, उसकी मां उसके सिर को नीचे की ओर दबा रही थी, जल्दी ही पेटीकोट और नंदिनी का सिर लता की चूत से नीचे था और नंदिनी के सामने उसका जन्म द्वार था, अपनी मां की चूत देख कर नंदिनी की आंखें फट हुईं, उसे यकीन नहीं हुआ कि वो सच में अपनी मां की चूत देख पा रही है, वही चूत जिससे सालों पहले निकल कर वो इस दुनिया में आई थी, उसने देखा कि उसकी मां की चूत कितनी गीली है और रस बहा रही है, लड़की होने के नाते वो जानती थी कि ये मूत नहीं है, कभी कभी उसकी चूत से भी ऐसा बहाव होता था, जब वो बहुत उत्तेजित होती थी तब। उसकी मां की कमर उसके नीचे मछली की तरह तड़प रही थी लता की कमर बार बार उठकर नीचे गिरती जैसे अक्सर चुदाई के दौरान उत्तेजित होने पर औरतें करती हैं, नंदिनी ने ऊपर से नीचे तक एक बार अपनी मां के तड़पते बदन को देखा और फिर उसके ऊपर से हट गई, एक हाथ से पेटिकोट को पकड़ा और उसे लता की टांगों में से निकाल दिया और अपनी मां को नीचे से पूर्ण नग्न कर दिया, पर लता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा उसे अभी सिर्फ़ अपनी चूत की बैचैनी से मतलब था। नंदिनी इतने पर भी नहीं रुकी और उसने ऊपर की ओर आकर लता की बाहों मे उलझे ब्लाउज को भी उतार दिया, और उसके लिए उसने एक गुड़िया की तरह अपनी मां के बदन की इधर उधर हिलाया और बाहों से ब्लाउज अलग कर दिया।

अब लता अपनी बेटी के सामने खाट पर बिल्कुल नंगी पड़ी तड़प रही थी, नंदनी ने बापिस उसकी टांगों के बीच जगह ली और उसकी दोनों टांगों को पकड़कर फैला दिया जिससे उसकी चूत और खुल कर सामने आ गई, नंदिनी को अपनी मां की चूत से एक अजीब सी सौंधी सी गंध आ रही थी जो उसके बदन को उत्तेजित कर रही थी। वो सोचते लगी ये कैसी गंध है मां की चूत की और ये ही सोच उसने अपना मुंह आगे किया और लता की चूत के पास नाक लेजाकर सूंघने लगी, अपनी मां की चूत की गंध सूंघकर उसके पूरे बदन में कंपन्न सा होने लगा,

वहीं नीचे लेटी लता की चूत पर ज्यों ही नंदिनी की गरम सांसे पड़ीं तो वो और तड़पने लगी, उसकी चूत की बैचैनी और बढ़ गई, उसे लगा इस बेचैनी से वो पागल हो जायेगी, वो चाहती थी कि उसकी बेटी उसकी चूत को भी कैसे भी करके शांत कर दे पर नंदिनी तो उसी तड़प और बढ़ा रही थी, इसी तड़प के चलते लता के हाथ फिर से नीचे आकर नंदिनी के सिर पर कस गए और इससे पहले नंदिनी कुछ करती या समझती लता ने उसका चेहरा अपनी चूत में दबा दिया नंदिनी के होंठ सीधे उसकी मां की चूत से लगे और लता होंठ लगते ही अपनी कमर को पागलों की तरह घुमा घुमा कर अपनी चूत को नंदिनी के होंठों पर घिसने लगी।

अब तक नंदिनी ही सारथी थी इस हवस के रथ की पर पहली बार लता ने आक्रामक होते हुए कमान अपने हाथों में ले ली।

नंदिनी को यूं तो अब तक हर चीज में मज़ा आ रहा था पर अपने होंठ मां की चूत से लगते ही वो परेशान होने लगी, उसके मन में घिन आने लगी क्यूंकि जहां से उसकी मां पेशाब करती है उसका मुंह वहां लगा था, भले ही वो हवस में कितनी भी आगे बढ़ गई हो पर अब तक उसने जो सीखा था समाज से उसे कैसे पल भर में भूल जाती, कि पेशाब की जगह गंदी होती है उसमें तो हाथ लगाने के बाद भी लोग हाथ धोते हैं और यहां उसका मुंह उसकी मां की चूत में घुसा हुआ था, वो छूटने की कोशिश करने लगी पर लता ने उसका सिर मजबूती से चूत में दबा रखा था। उसने घबरा कर अपना मुंह खोला कुछ बोलने के लिए तो उसकी मां की चूत का दाना उसके मुंह में घुस गया और उसकी जीभ से टकराया, जिससे नंदिनी को तो जैसे उल्टी जैसा मन हुआ और उसकी जीभ बाहर निकल आई।

इधर लता की कमर लगातार घूम रही थी तो नंदिनी की जीभ बाहर आते ही सीधा उसकी मां की चूत से टकराई और बाकी का काम लता की घूमती कमर ने कर दिया और लता की चूत बेटी की जीभ पर घिसने लगी,

इधर नंदिनी की तो हर चाल उल्टी ही पड़ रही थी, उसे अपनी जीभ पर मां की चूत का स्वाद महसूस हो रहा था कुछ ही पल बाद उसे आभास हुआ कि उसकी मां की चूत का स्वाद इतना बुरा नहीं जैसा उसे लग रहा था, और कुछ ही पलों में उसके अंदर की घिन फिर से हवस में बदल गई अब वो खुद से मां की चूत चाटने लगी क्योंकि उसे स्वयं को आनंद आ रहा था, वहीं लता तो और उत्तेजना के शिखर पर पहुंच गई, नंदिनी जिस तरह से मां की चूचियों और पेट को चाट रही थी अब उसकी चूत को भी चाटने लगी, और जितने अच्छे से वो चूत चाटती उसके स्वयं के बदन में उतनी उत्तेजना बढ़ती,

कुछ ही पलों में लता की आँखें ऊपर की ओर खिंच गईं, उसकी कमर बिस्तर से उठ कर धनुष की तरह तन गई, और झटके खानेलागी, एक पल को तो नंदिनी को डर लगा कि मां को कुछ हो तो नहीं गया पर उसने चूत पर जीभ चलाना जारी रखा, लता थरथराते हुए झड़ने लगी, उसने आज तक ऐसा स्खलन महसूस नहीं किया था जैसा आज कर रही थी उसे लग रहा था कि उसके बदन की सारी ऊर्जा आज चूत के रास्ते निकल जाएगी।

नंदिनी को अपनी जीभ पर मां की चूत का रस महसूस हो रहा था जिसे भी वो चाट गई क्यूंकि उसे उसका स्वाद पसंद आया और फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर लता के मूत की धार टकराई, उसे समझ नही आया ये क्या हो रहा है, लता की कमर झटके खा रही थी और झटके के साथ उसकी चूत से पेशाब की एक छोटी धार निकलती और नंदिनी के चेहरे और जीभ को भीगा जाती, दो चार बार ऐसा हुआ और फिर लता एक कटे पेड़ के समान धम्म से बिस्तर पर गिर पड़ी, और बिल्कुल बेहोश सी हो गई, नंदिनी अपनी मां को देखते हुए सुन्न बैठी थी उसे समझ नही आ रहा था कि आज उसने क्या क्या किया था बाकी सब तो छोड़ो अपनी ही मां की चूत को चाटा और अंत में उनके मूत को भी अपने मुंह में लिया,

ये सोच कर ही उसका हाथ खुद की चूत पर पहुंच गया वो अपने हाथ से अपनी चूत को मसलती हुई सोचने लगी कि क्या सच में आज उसने अपनी मां का मूत चख लिया, पर उससे भी बड़ी बात उसे ये सब गलत क्यूं नहीं लग रहा, अच्छा क्यूं लग रहा है। ये ही सोच उसने अपनी जीभ होंठों पर फिराई तो उसे अपनी मां के पेशाब का स्वाद मिला जिसे चख कर उसके बदन में बिजली दौड़ गई।

आगे अगले अध्याय में।
 
सभी पाठकों से क्षमा चाहूंगा, अभी तक तो हफ्ते में दो अध्याय पोस्ट कर ही रहा था पिछले हफ्ते से व्यस्तता और तबीयत दोनों ने ही घेर लिया इसलिए इस बार विलम्ब हो रहा है, जल्दी ही प्रयास करता हूं अगला अध्याय लिखने का तब तक संयम बनाए रखें।
 
अध्याय 9
ये सोच कर ही उसका हाथ खुद की चूत पर पहुंच गया वो अपने हाथ से अपनी चूत को मसलती हुई सोचने लगी कि क्या सच में आज उसने अपनी मां का मूत चख लिया, पर उससे भी बड़ी बात उसे ये सब गलत क्यूं नहीं लग रहा, अच्छा क्यूं लग रहा है। ये ही सोच उसने अपनी जीभ होंठों पर फिराई तो उसे अपनी मां के पेशाब का स्वाद मिला जिसे चख कर उसके बदन में बिजली दौड़ गई। आगे...

नंदिनी अपनी सोच में थी वहीं लता को तो लग रहा था वो जैसे मर चुकी है, उसकी जान ही चूत के रास्ते से निकल चुकी है, चंद्रमा की रोशनी में अपने आंगन में खाट पर बिल्कुल नंगी पड़ी हुई लता की आंखें बंद थीं, सांसें इतनी गहरी थी कि सीना हर बार दूध में आते हुए उबाल की तरह ऊपर उठता और फिर नीचे बैठ जाता, कुछ देर तक यूं ही लेटी रही, कुछ पल बाद आंखें खोलीं तो बेटी पर नजर पड़ी, नंदिनी की नजर भी अपनी मां के नंगे बदन पर थी और उसका हाथ उसकी जांघों के बीच था जो कि सलवार के ऊपर से ही उसकी चूत को मसल रहा था,

झड़ने के बाद लता तो थोड़ा शांत हो चुकी थी और एक बार फिर से उसे ग्लानि और संशय ने साथ ही अनेकों सवालों ने घेर लिया, वो सोचने लगी कि आज दिन से ही उसके साथ हो क्या रहा है, मैंने अपनी ही बेटी के साथ ये सब किया, उससे अपनी चूत चटवाई उसके मुंह पर मूता, कैसी पापिनी मां हूं मैं? आज तक ऐसा पाप ऐसी नीच हरकत किसी मां ने अपनी बेटी के साथ नहीं की होगी जैसी मैंने कर दी है,

इधर नंदनी इन सब से अलग थी उसका सारा ध्यान अपनी चूत की खुजली पर था जो मिटने का नाम नहीं ले रही थी, सलवार के ऊपर से सहलाने से बात न बनते देख नंदिनी खड़ी हुई और कुछ ही पलों में उसने अपनी सलवार को खोल कर टांगों से निकाल दिया और फिर बिस्तर पर चढ़ने को हुई तो उसने अपनी मां के बदन को देखा, और फिर कुछ सोच कर अपनी चड्डी और फिर सूट और समीज भी निकाल कर पूरी नंगी हो गई, अपनी मां की तरह उसके सामने नंगे होने पर नंदिनी के मन में उत्तेजना और बढ़ने लगी, वहीं लता जो कि अपनी ही उलझन में थी उसने ध्यान ही नहीं दिया कि उसकी बेटी भी उसी की तरह पूरी नंगी हो चुकी है, नंदिनी नंगी होकर बिस्तर पर अपनी मां के ऊपर लेट गई और जब लता को अपने बदन से नंदिनी के नंगे बदन का स्पर्श हुआ तब जाकर लता को ज्ञात हुआ कि नंदिनी नंगी है और ये सोच कर ही एक बार फिर से उसके बदन में बिजली दौड़ पड़ी, वहीं नंदिनी की उत्तेजना का तो अभी कोई सानी ही नहीं था, उसका पूरा बदन बिल्कुल मचल रहा था, इसी गर्मी को मिटाने के लिए वो अपने बदन को अपनी मां के बदन से घिसने लगी, अपनी टांगों को मां की टांगों में घिसने लगी और इसी घिसने और घिसाने के बीच एक ऐसी स्तिथि हुई कि दोनों मां और बेटी की चूत एक दूसरे से टकराई, जिनके टकराते ही दोनों के बदन में ऐसा करंट दौड़ा जैसे दो नंगी तारों को जोड़ने पर होता है,

एक पल को तो दोनों ज्यों की त्यों रुक गईं और उस अदभुत पल को अपने मन में समाने का प्रयास करने लगीं, पर नंदिनी की चूत की खुजली ने उसे ज्यादा देर रुकने नहीं दिया, उसकी कमर अपने आप हिलने लगी और दोनों की चूत आपस में रगड़ खाने लगी, उस रगड़ से जो मज़ा और उत्तेजना उत्पन्न हो रही थी, वो दोनों ने ही आज तक नहीं अनुभव की थी, ऐसा अदभुत आनंद भी होता है जगत में जिससे नंदिनी तो थी ही साथ ही लता जैसी औरत भी अज्ञात थी, बेटी की चूत की रगड़ पाते ही एक बार फिर से उसके मन के सारे विचार सारी ग्लानि धुआं हो गई,

इधर नंदिनी तो बिलकुल बावरी सी होकर अपनी चूत को अपनी मां की चूत से घिसने लगी, उसके हाथ मां की चुचियों पर कस गए, लता के हाथ भी स्वतह ही नंदिनी के गोल मटोल चूतड़ों पर कस गए,

लता के चेहरे के सामने उसकी बेटी का चेहरा था, लता ने अपनी बेटी के चेहरे पर हवस और आनंद के भाव देखे तो उसके मन को खुशी सी हुई, फिर उसने नंदिनी के तपते रसीले होंठों को देखा तो वो खुद को रोक नहीं पाई और अपने होंठों को उसके होंठों से मिला दिया,

नंदिनी तो हर क्रिया प्रतिक्रिया के लिए तैयार थी, जैसे ही उसकी मां के होंठों ने उसके होंठों को स्पर्श किया वो भी उसके होंठों पर टूट पड़ी, अब दोनों मां बेटी हर तरह से एक दूसरे के बदन से खेल रहे थे, होंठ मिले हुए थे, नंदिनी के हाथ मां की चुचियों को मसल रहे थे तो लता के बेटी के चूतड़ों को, वहीं दोनों की चूत भी आपस में रगड़ रहीं थीं, जल्दी ही दोनों की चूत की और बदन की रगड़न से एक ऐसी ऊर्जा निकली जिसने दोनों के ही बदन को उनके चरमसुख के शिखर पर चढ़ा दिया, और दोनों ही एक साथ स्खलित होनें लगी, दोनों की आहें एक दूसरे के मुंह में घुट गई, और जब झड़ने के बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो दोनों बुरी तरह से हाँफ रहे थे, ऐसा स्खलन मां बेटी दोनों ने ही कभी अनुभव नहीं किया था, उनके स्खलन का वेग ऐसा था कि झड़ने के बाद दोनों ही नही हिलीं और उसी तरह से सो गईं।

इधर छोटू के यहां भी रात होने तक सारे काम निपट चुके थे, फुलवा ने पुड़िया वाले बाबा के कहे अनुसार अपनी बहु पुष्पा को समझा दिया था कि उसे हफ्ते भर तक छोटू के साथ ही सोना था साथ ही पुड़िया बाबा द्वारा दी हुई दवाई भी उसे दूध में मिला कर पिला दी गई थी, पुष्पा और सुधा के बीच भी बात चीत हो रही थी, उतनी खुल कर नहीं पर काम की तो हो ही रही, एक ओर छोटू को दुख था कि अब चाचा चाची की चुदाई रात को देखना मुश्किल था क्योंकि एक तो मां के साथ सोना था ऊपर से कल रात की घटना के बाद अगर किसी ने उसे दोबारा देख लिया तो इस बार बात नहीं संभाल पाएगा, फिर उसने सोचा कि अभी कुछ दिन शांत ही रहे तो बढ़िया है, ये हफ्ता उसे ऐसे ही बिताना चाहिए,

ये ही सोच कर वो खाट पर लेट गया, कुछ देर बाद सारा काम खतम करके पुष्पा भी आ गई,

पुष्पा: ए लल्ला थोड़ा उधर हो जगह बना हमारे लिए।

छोटू: अरे मां बेकार में तुम परेशान हो रही हों, खाट छोटी है हम दोनों लोग नहीं सो पायेंगे।

पुष्पा: अरे लल्ला, सोना तो पड़ेगा ही, बाबा ने कहा है तो।

छोटू: मैं नहीं मानता बाबा की बात मां,

पुष्पा: धत्त चुप कर, अभी अम्मा सुन लेंगी न तो घर सिर पर उठा लेंगी।

छोटू को भी मां की बात ही सही लगी वो अभी और कुछ नहीं झेलना चाहता था, इसलिए एक ओर को सरक गया, और जगह बनाई, वैसे तो पुष्पा भी जानती थी की बचपन की बात अलग थी पर अब छोटू भी बढ़ा हो गया है तो दोनों के लिए उस खाट पर जगह पर्याप्त नहीं थी, पर सास को मना करना या उनके आदेश के विपरीत जाना, ऐसे उसके संस्कार नहीं थे, तो वो भी जितनी जगह थी उसमें ही खाट पर लेट गई, पुष्पा पीठ पर लेटी तो छोटू उसकी ओर करवट लेकर लेटा था, बाकी लोग भी लेट चुके थे और सोने भी लगे थे, छोटू ने थोड़ा ठीक से लेटने के लिए अपना एक पैर मां के पैरों पर चढ़ा कर रख दिया और एक हाथ उसके पेट पर, और सोने की कोशिश करने लगा, पुष्पा ने भी अपना हाथ छोटू की पीठ पर रख लिया ताकि दोनों ही आराम से सो सकें।

छोटू आंखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगा तो आंखें बंद करने के कुछ ही देर बाद उसकी आंखों के सामने लता ताई के साथ जो कुछ हुआ वो याद आने लगा वो अपना सिर झटक कर सोने की कोशिश करने लगा पर जितना उस सोच को हटाने की कोशिश करता उतना भयंकर रूप रख कर वो उसके दिमाग से खेलती, ये सब सोचते हुए कब उसका लंड बिल्कुल कड़क हो गया उसे ज्ञात ही नहीं हुआ, वो तो जब उसके लंड का टोपा उसकी मां की कमर से चुभा तो उसे ये अंदाजा हुआ कि उसके लंड की हालत क्या है, वो तो बिल्कुल सहम गया, छोटू ने सोचा भी नहीं था कि मां के साथ सोने पर ये परेशानी हो सकती है उसने तुरंत अपनी कमर पीछे कर ली, और खुद को शांत करने की कोशिश करने लगा, अपनी मां के बारे में तो कोई गलत विचार उसके मन में कभी नहीं आए थे, तो इसलिए उनके बगल में लेट कर लंड खड़ा होना बहुत ही हैरानी की बात थी, छोटू खुद को मन ही मन गालियां देने लगा कोसने लगा कि आखिर उसे अपने ही लंड पर नियंत्रण क्यूं नहीं है, पर जितना ही वो खुद को कोस रहा था उसका लंड और कठोर होता जा रहा था उसे बदन में एक अलग ही गर्मी सी लग रही थी, लंड में भी लग रहा था एक अलग ही खिंचाव सा था आज जैसा उसे पहले अनुभव नहीं हुआ था, लंड हर पल के साथ ठुमके मार रहा था, इतना कड़क और उत्तेजित तो जब मुठियानें जाता था तब भी नहीं होता था जितना आज हो रहा था, छोटू को ये ही बात समझ नहीं आ रही थी कि आज उसे ये हो क्या रहा था।

वैसे इस समय दोष छोटू का भी नहीं था कहीं कहीं भाग्य भी अपने खेल दिखाता है और ऐसा ही कुछ छोटू के साथ हो रहा था, खेल क्या था इसे जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं जब फुलवा और छोटू पुड़िया बाबा की कुटिया में गए थे और जब बाबा ने कालीचरण को दो पुड़िया दी थीं एक उसकी सम्भोग की ताकत बढ़ाने के लिए और एक छोटू के लिए, तो गलती से कालीचरण ने पुड़िया बदल कर अपनी वाली छोटू को दे दी थी और खुद छोटू की पुड़िया ले गया था, अब छोटू पर उसी पुड़िया का असर हो रहा था जो कि पुष्पा ने उसे दूध में घोल कर पिला दी थी, बाबा की पुड़िया थी भी असरदार जो बुड्ढों के मुरझाए लंड में ताकत भर देती थी वो छोटू के जवान लंड पर क्या असर कर रही होगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।

बेचारा छोटू इस परेशानी को झेल रहा था, वो सारे जतन करके देख रहा था कभी कुछ और सोचने की कोशिश करता तो कभी खुद को कोसता पर कोई भी उपाय काम नहीं कर रहा था, अंत में उसने एक उपाय सोचा कि चुपचाप जाकर हिला कर आ जाता हूं तभी शांति मिलेगी, ये सोच कर उसने चुप चाप उठने की कोशिश की, और खाट से खड़ा हुआ और चुपके से जैसे ही आगे बढ़ने को हुआ उसका हाथ उसकी मां ने पकड़ लिया, और छोटू सहम गया, वो समझा आज पकड़ा गया अब क्या बोलूं,

पुष्पा: कहां जा रहा है,

छोटू: वो वो कहीं नहीं मां, मैं तो, बस वो।

पुष्पा: क्या मैं तो कर रहा है,

छोटू कुछ सोचता है और बोल पड़ता है: मां वो गर्मी लग रही है, इसलिए उठ गया।

पुष्पा: अब गर्मी तो है ही लल्ला, एक काम कर अपनी कमीज और पजामा उतार के सो जा,

छोटू: अरे उनसे उतारने से कुछ नहीं होगा।

पुष्पा: तू भी ना बिल्कुल जिद्दी है ना खुद सोएगा न मुझे सोने देगा, चुपचाप उतार और सो।

पुष्पा ने थोड़ा सख्ती में कहा तो छोटू को चुपचाप बात माननी पड़ी पर समस्या ये थी कि कपड़े उतारे तो कैसे कच्छे में उसका तना लंड तो उसकी मां के सामने आ जाएगा।

वो ये सब सोच ही रहा था की पुष्पा बोली: तू लेट चुपचाप से मैं पेशाब करके आती हूं,

और वो उठ कर नाली की ओर चली गई

छोटू की जान में जान आई, पुष्पा के जाते ही उसने अपने कपड़े उतारे और सिर्फ कच्छे में आ गया, जिसमे उसका तना लंड लिपिस्टिक के पेड़ की तरह खड़ा हुआ था, वो तुरंत खाट पर लेटा, पहले पीठ पर लेटा तो उसका लंड सीधा ऊपर की ओर था और उसे लगा ऐसे तो मां उसके लंड को देख ही लेंगी, इसलिए वो अंदर की ओर करवट कर के और एक हाथ अपने सिर के नीचे और दूसरा अपने लंड के ऊपर रख कर लेट गया ताकि उसका लंड ढंक जाए, और आंखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगा,

पुष्पा जल्दी ही पेशाब कर के आई, और छोटू को कपड़े उतार सोते देखा तो उसके मासूम चेहरे को देख कर हर मां की तरह उसे भी अपने बेटे पर लाड़ आया, खाट पर लेटने से पहले उसने सोचा कि सच में गर्मी तो बहुत है, उसने नजर घुमा कर आस पास देखा तो सब सो रहे थे, फुलवा और नीलम एक साथ सोते थे, वहीं दूसरी खाट पर उसके पति सो रहे थे, राजेश वैसे तो आंगन में ही सोता था पर आज गर्मी की वजह से अपने दादा के साथ बाहर चबूतरे पर सो रहा था,

पुष्पा ने फिर अपनी साड़ी को भी उतार कर खाट के एक ओर रख दिया और पेटीकोट और ब्लाऊज पहन कर बिस्तर पर एक ओर करवट कर के लेट गई, क्योंकि करवट लेकर लेटने पर ही दोनों के लिए पर्याप्त जगह हो रही थी, लेट कर उसने अपना हाथ पीछे किया और छोटू का हाथ पकड़ कर प्यार से अपने पेट पर रख लिया पर सिर्फ प्यार के कारण से नहीं बल्कि ये सोच कर भी कि दोबारा कहीं छोटू उठ कर जाए तो उसे पता चल जाए, अब छोटू के साथ परेशानी हो गई जिस हाथ से उसने अपना लंड छुपा रखा था वो अब उसकी मां के पेट पर था, वो सोया नहीं था बस सोने की कोशिश कर रहा था, अपनी मां के पेट का स्पर्श पाकर उसके बदन में फिर से एक और उत्तेजना की लहर दौड़ गई, उसका लंड और तन्ना गया, और वो अपने आप को कोसने लगा, इसी दौरान पुष्पा और अच्छे से लेटने के लिए पीछे की ओर सरक गई जिससे उसका बदन छोटू के बदन से चिपक गया,

अब परिस्थिति कुछ ऐसी थी, कि छोटू सिर्फ अपने कच्छे में लेटा था और उसके आगे उससे बदन से सट कर उसकी मां ब्लाउज और पेटीकोट में थी, छोटू का हाथ मां के पेट पर था, जैसे ही बदन से बदन चिपका छोटू ने सोचा आज तो मारा गया, अब मां को मेरे खड़े लंड का पता चल जायेगा क्योंकि पीछे होने से अब उसका लंड सीधा पुष्पा के चूतड़ों में चुभ रहा था पेटिकोट के ऊपर से ही, छोटू ने तो अपनी जान बचाने के लिए जो एक आखिरी उपाय सूझा उसे ही अपना लिया और आंखें बंद कर सोने का नाटक करने लगा,

इधर पुष्पा को भी चूतड़ों में कुछ चुभता हुआ लगा तो वो सोचने लगी क्या चुभ रहा है, उसके मन में एक पल को भी नहीं आया कि ये बेटे का लंड हो सकता है, क्योंकि ऐसा कभी विचार ही उसके मन में नहीं आया था, उसके लिए तो छोटू अभी भी बच्चा ही था और बच्चों की नून्नू थोड़े ही चुभती है, और बिना सोचे विचारे ही यूं ही पुष्पा ने अपना हाथ पीछे किया ये जानने के लिए कि आखिर ये क्या है ताकि उसे हटा सके, और ऐसा ही सोच कर पुष्पा ने अपना हाथ पीछे कर उसे पकड़ लिया, कच्छे के ऊपर से ही पकड़ कर पुष्पा को ज्यों ही एहसास हुआ कि ये क्या है तो वो बिल्कुल हैरान हो गई, उसने सोचा भी नहीं था कि उसके बेटे का लंड ऐसा हो सकता है इतना बड़ा, कड़क, हाय दैय्या क्या हुआ है इसके नुन्नू को, और फिर जैसे ही उसे ये विचार आया कि उसने उसे पकड़ रखा है उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया, और तुरंत आगे हाथ कर जो अनुभव किया वो सोचने लगी,

हाय दैय्या ये सब क्या हो रहा है, लल्ला की नुन्नि इतनी बड़ी, अरी नुन्नी कहां वो तो अच्छा खासा लंड है, इतना कड़क इतना बड़ा कैसे हो गया, उसे अपने बदन में भी एक उत्तेजना का संचार होता हुआ अनुभव हो रहा था, अपनी चूत में भी नमी आती हुई लगी, पर पुष्पा ने अपना ध्यान इन सब से हटा कर इस पर लगाया कि ऐसा क्यूं हो रहा है,

ये सब सोचते समय उसके चूतड़ों पर छोटू का लंड दोबारा से चुभने लगा था और पुष्पा को हर पल मुश्किल होता जा रहा था।

लल्ला का लंड इस समय इतना कड़क क्यों है, इसके पापा का तो तब होता है जब वो उत्तेजित होते हैं, तो इसका मतलब लल्ला भी उत्तेजित है, पर यहां तो मेरे अलावा कौन है, क्या लल्ला मेरे बारे में गलत विचार करता है फिर खुद ही जवाब देने लगी, नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता, लल्ला अपनी मां के बारे में ऐसा नहीं सोच सकता, वहीं छोटू आंखें बंद किए ज्यों का त्यों लेटा हुआ था और तनिक भी नहीं हिल रहा था उसे डर लग रहा था कि कहीं थोड़ा भी हिला तो उसके सोने का नाटक पकड़ा जाएगा, एक पल को उसे झटका लगा था जब उसकी मां ने उसके लंड को पकड़ा था तबसे ही वो और डर गया था क्योंकि मां को पता चल गया था कि उसका लंड खड़ा है,

इधर पुष्पा अपना पूरा दिमाग लगा रही थी और सारा गणित लगा रही थी कि ऐसा क्यूं हो रहा है, क्या ये उदयभान की लुगाई का असर है, हां ज़रूर उस कलमुही ने ही कुछ किया है मेरे लल्ला के साथ, ना जाने कब पीछा छोड़ेगी नासपीटी, हां पक्का उसी का किया धरा है नहीं तो सोते हुए वो भी अपनी मां के बगल में बेटे का लंड क्यों खड़ा होगा, ऊपर से इतना कड़क है इतना गरम है ये जरूर कोई काली शक्ति के कारण से है, पर क्या करूं? अम्मा को जगाऊं? नहीं नहीं बेकार में वो पूरा घर जगा देंगी, पर अम्मा ने कहा था कि उन्हें बाबा ने बताया है, कि शादी से पहले मां ही बेटे की रक्षक होती है तो मुझे ही लल्ला की रक्षा करनी होगी, पर कैसे, मैं तो कुछ जानती नहीं साथ सोने को कहा था वो कर ही रही हूं और क्या कर सकती हूं, शायद जिस अंग पर वो अपना काला जादू दिखा रही है मुझे उसे ही बचाना चाहिए, अभी पूरा बदन तो ठीक है बस लल्ला का लंड ही कुछ असाधारण तरीके से कठोर हो रखा है इसलिए जरूर इस पर ही उस चुड़ैल का असर है, मुझे कुछ भी करके उसे अपने लल्ला से दूर करना होगा।

पर करूं कैसे? कुछ सोच पुष्पा, क्या कर सकती है तू अभी, सोच सोच,

वैसे उसका असर लल्ला के लंड पर है ना तो मुझे लल्ला के लंड पर अपना अधिकार दिखा कर उसे भगाना होगा, पर मैं मां होकर अपने बेटे के लंड पर कैसे अधिकार जाता सकती हूं?

अरे पर मां से ज्यादा अधिकार और किसका होता है बेटे पर, और कौनसा तू ये काम ऐसे ही कर रही है तू तो अपने बेटे कि रक्षा करने के लिए कर रही है और एक मां बेटे के लिए किसी भी हद तक जा सकती है, ये सोच कर और अपने मन को ढाढस बंधा कर अपना हाथ पीछे किया और फिर से छोटू के लंड को पकड़ लिया,

छोटू तो अपनी मां की हरकत से बिक्कुल सुन्न पड़ गया, उसे समझ नहीं आया कि उसकी मां उसका लंड क्यों पकड़ रही है,

पुष्पा ने जैसे ही दोबारा से लुंड को छुआ तो उसके बदन में भी तरंगें उठने लगी। पर उन को दबाते हुए पुष्पा आगे का सोचने लगी, कि क्या करे, अभी तो उसने अपने बेटे का लंड कच्छे के ऊपर से ही छुआ था और लंड उसके हाथों में ठुमके मारने लगा,

छोटू से तो संभाले वैसे ही नहीं संभल रहा था वो बस आंखे बंद किए सोने का नाटक करते हुए अपनी जान बचाने की प्रार्थना कर रहा था,

पुष्पा ने अपने हाथ में अपने बेटे का लंड फूलता और ठुमकता हुआ महसूस किया तो उसका बदन भी मचलने लगा, पुष्पा को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे, वहीं मन ही मन उसे बेटे का लंड पकड़ना अच्छा लग रहा था, लंड को ठुमकते पाकर वो मन ही मन सोचने लगी: देखो तो कलमुही ने कैसा जादू किया है कैसे हाथ में ठुमक रहा है, हाय मेरे लल्ला को मुझे बचाना होगा,ये सोच कर वो सीधी लेट गई क्यूंकि हाथ पीछे किए हुए लगातार उसके हाथ में भी दर्द हो रहा था, अब तक जहां उसकी पीठ छोटू से लग रही थी अब उसकी कमर छोटी की ओर हो गई,

पुष्पा ने कच्छे के ऊपर से ही छोटू के लंड को थामें रखा, वो मन में सोचने लगी: छोटू को ऐसे शांति नहीं मिलेगी, इसके लंड को शांत करना पड़ेगा, नहीं तो लल्ला पूरी रात इसी तरह तड़पता रहेगा,

पुष्पा ने छोटू के लंड के ठुमके महसूस करते हुए सोचा, फिर सोचने लगी मैं कैसे कर सकती हूं, पर मुझे ही करना होगा, ये सोच पुष्पा ने अपने चेहरे को थोड़ा सा उठाया और नीचे की ओर देखते हुए दोनों हाथों को छोटू के कच्छे की ओर ले गई और छोटी के कच्छे को पकड़कर नीचे करते हुए उसके लंड को बाहर निकाल लिया,

लंड कच्छे से बाहर आते ही झूलने लगा, वहीं छोटू को कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या हो रहा है उसकी मां ये सब क्या कर रही है, पुष्पा तो चांद की रोशनी में बेटे के लंड को बस टक टकी लगा कर देखती ही रह गई, इतना कड़क और लंबा मोटा लंड है उसके बेटे का अह्ह उसके मुंह से अपने आप निकल गई, वो सोचने लगी कब बेटा इतना बड़ा हो गया पता ही नहीं चला, पुष्पा के हाथ ने छोटू के लंड को थाम लिया, बेटे के नंगे लंड को छूते ही पुष्पा को उसकी गर्मी का एहसास हुआ और उसके स्वयं के बदन में बिजली दौड़ गई, उसकी चूत में खुजली होने लगी, उसका बदन उत्तेजना से भर गया, एक पल को तो वो बहकने लगी,

पुष्पा : अरे ये मुझे क्या हो रहा है, ये मेरा बेटा है मुझे उसके साथ ऐसा नहीं महसूस होना चाहिए, मुझे तो इसकी बुरी आत्मा से रक्षा करनी है, ऐसा सोच कर वो अपनी उत्तेजना को दबाने का प्रयास करने लगी,

वहीं छोटू को जैसे ही अपने लंड पर अपनी मां की उंगलियों का स्पर्श प्राप्त हुआ उसके पूरे बदन में बिजली दौड़ गई, उसे लगा कि उसकी जान ही निकल जायेगी, इतना उत्तेजित तो वो लता ताई के सामने भी नही हुआ था जितना अभी था, उत्तेजना के मारे उसके लंड पर रस की बूंदें उभार आईं, जो कि चांदनी में चमकने लगी, जिस पर पुष्पा की भी नजर पड़ी तो उसने बिना सोचे ही अपने अंगूठे को छोटू के लंड के टोपे पर फिरा दिया, उसे पोछने के लिए, पर ये हरकत छोटू के लिए असहनीय हो गई और अगले ही पल छोटू का बदन थरथराने लगा उसकी कमर झटके खाने लगी,


इससे पहले पुष्पा कुछ समझ पाती कि क्या हो रहा है छोटू का लंड पिचकारी छोड़ने लगा और पिचकारी सीधी उसके बदन पर गिरने लगी कोई पेट पर गिरती तो कोई ब्लाउज पर और कोई पेटिकोट पर, कुछ देर में छोटू का झड़ना खत्म हुआ तब तक उसके लंड ने अच्छे से मां के बदन को रंग दिया था।

जारी रहेगी।।
 
अध्याय 10

इससे पहले पुष्पा कुछ समझ पाती कि क्या हो रहा है छोटू का लंड पिचकारी छोड़ने लगा और पिचकारी सीधी उसके बदन पर गिरने लगी कोई पेट पर गिरती तो कोई ब्लाउज पर और कोई पेटिकोट पर, कुछ देर में छोटू का झड़ना खत्म हुआ तब तक उसके लंड ने अच्छे से मां के बदन को रंग दिया था। आगे..

पुष्पा अपने बेटे के लंड को थामें ज्यों की त्यों पड़ी थी और अभी जो हुआ उसे समझने का प्रयास कर रही थी, उसके बदन पर उसके बेटे के लंड की मलाई लगी हुई थी और जहां जहां उसके बदन पर उसके बेटे के लंड का रस लगा हुआ था उस जगह मानो उसका बदन जल सा रहा था,

छोटू तो आंखें मूंदे डर के मारे लेटा हुआ था उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी मां ने उसके लंड को अपने हाथ में लिया और फिर हिलाया भी पर उसके आगे क्या हुआ उसके बाद उसने अपना रस मां के बदन पर गिरा दिया अब मां ज़रूर बहुत गुस्से में होगी, छोटू बेटा आज तो तू गया आज तेरा आखिरी दिन समझ। जहां छोटू डर से सहमा हुआ था वहीं उसकी मां अलग दुविधा में थी, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि बेटे के साथ सोना इतना मुश्किल होने वाला था और उसे ये सब करना पड़ेगा जिसकी कल्पना भी एक मां नहीं कर सकती।

पर वास्तविकता तो ये थी कि उसके हाथ में उसके बेटे का कड़क तन्नाया लंड था, उसके बदन पर उसके लंड का रस था,

पुष्पा इन्हीं सब विचारों में खोई थी उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे, फिर उसके मन में विचार आया चलो कम से कम इसका रस तो निकला अब आराम से सो पाएगा, पर फिर खुद ही अपने हाथ में उसका लंड महसूस कर हैरान हो गई,

हाय दईया पर इसका लंड तो अब भी बिल्कुल वैसे ही कड़क है रस निकलने के बाद भी कोई असर नहीं हुआ, इसके पापा का तो रस निकलने के बाद ढीला हो जाता है पर इसका क्यों नहीं हो रहा, अब तो मुझे पक्का विश्वास होता जा रहा है लल्ला के ऊपर उस चुड़ैल का साया है नहीं तो ऐसा क्यों होता।

पुष्पा ये सोच घबराने लगी और आगे क्या करे ये सोचने लगी, कुछ तो करना पड़ेगा ही मैं अपने लल्ला को उसके चंगुल में नहीं रहने दे सकती, वो भले ही चुड़ैल सही पर वो एक मां से नहीं जीत सकती,

मन में ऐसा विचार कर पुष्पा ने खुद को संभाला और फिर धीरे धीरे उसका हाथ दोबारा से बेटे के लंड को मुठियाने लगा,


छोटू जो कि डर से अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रहा था वो अचानक अपनी मां की इस हरकत से अचम्भे में पड़ गया उसे तो लगा था कि उसकी मां उसे मारेगी पीटेगी गालियां देगी पर यहां तो उसकी मां अब भी उसका लंड मुठिया रही थी, वो सोचने लगा आज उसके साथ भाग्य है, लगता है मां उसे नहीं मारेगी बल्कि मां के मन में कुछ और ही चल रहा है,

क्या मां को मेरा लंड अच्छा लग गया है क्या वो मेरा लंड देख कर खुद को नियंत्रित नहीं कर पा रही हैं,


नहीं नहीं मेरी मां ऐसी औरत तो नहीं है, कितनी संस्कारी हैं कोई भी काम ऐसा नहीं करती जो गलत हो तो अपने ही बेटे के साथ ऐसा क्यों करेंगी, अह्ह्ह्ह पर मां का हाथ लंड पर कितना अच्छा लग रहा है अह्ह्ह्ह अपने हाथ से हिलाने से तो हजार गुना ज्यादा अच्छा है ये अनुभव। अभी ये सोचने से कि मां ये सब क्यों कर रही हैं उससे अच्छा है कि जो कर रही हैं उसका आनंद लूं, शायद ही कभी ऐसा जीवन में दोबारा संयोग बने, ये सोच छोटू भी अपने लंड पर अपनी मां के हाथ का आनंद लेने लगा,

पुष्पा अपने आप को शांत करते हुए छोटू का लंड मुठिया रही थी मन में यही सोच रही थी कि किसी भी प्रकार से अपने लल्ला को उस चुड़ैल से बचाना है, पर धीरे धीरे उसके बदन पर भी उत्तेजना चढ़ती जा रही थी, जैसे जैसे वो अपने बेटे का लंड मुठिया रही थी उसके बदन में गर्मी बढ़ती जा रही थी, उसकी चूत में खुजली होने लगी थी उसकी चूचियां तन कर मानो ब्लाउज में छेद करने को तैयार थीं, इसी बीच उसके मन में उसके बदन पर पड़े छोटू के लंड रस का विचार आया तो वो उसे पोंछने का सोचने लगी और उसने अपना दूसरा हाथ अपनी गर्दन पर रखा जहां छोटू के लंड ने पिचकारी मारी थी, जैसे ही उसकी उंगलियों ने बेटे के गाढ़े वीर्य को छुआ तो उसके बदन में सिरहन सी हुई, इस विचार से कि उसकी उंगलियों पर उसके बेटे का वीर्य है,

पुष्पा ने इस विचार को थोड़ा दबाया और अपनी गर्दन से छोटू के रस को उंगलियों से पोंछने लगी साथ ही एक हाथ छोटू के लंड पर भी लगातार चल रहा था, रस को पोंछते हुए पुष्पा का बदन हर पल के साथ उत्तेजित होता जा रहा था, उसे लग रहा था मानो छोटू के वीर्य में कुछ जादू है जो उसके बदन को उत्तेजित कर रहा है, उसकी गर्मी को भड़का रहा है उसके बदन में एक प्यास जगा रहा है और हो भी ऐसा ही रहा था, उसकी चूत भी नम होकर पानी बहाने लगी थी, चूचियां बिल्कुल तनी हुई थीं जो कि ब्लाउज के ऊपर से ही पता चल रही थीं,

गर्दन से वीर्य पोंछने के बाद पुष्पा ने अपने पेट पर हाथ लगाया और पेट पर हाथ फिराते हुए वीर्य को पोंछने लगी, पर उसकी उत्तेजना इतनी बढ़ गई कि उसने धीरे धीरे वीर्य को पोंछने की जगह उसे अपने पेट पर ही मलना शुरू कर दिया, और ये वो बिना सोचे ही करने लगी, हर बढ़ते पल के साथ उसकी उत्तेजना और बढ़ रही थी, वो अपने बदन और मन से नियंत्रण खोने लगी, अचानक से उसे विचार आया कि ये क्या कर रही है पुष्पा बेटे के वीर्य को पोंछने की जगह उसे अपने बदन पर मल रही है, ये सोच कर तो वो और गरम हो गई और स्वयं को रोकने की जगह वो खुल कर छोटू के वीर्य को अपने पेट पर मलते हुए मसलने लगी, साथ ही हर पल के साथ और उत्तेजित होती जा रही थी,

छोटू के लंड पर उसकी पकड़ और बढ़ती जा रही थी पेट पर वीर्य मलने के बाद उसने अपने ब्लाउज पर लगे वीर्य को भी उंगलियों से बटोरा और उसे अपनी छाती और गर्दन पर लगाने लगी, बेटे के लंड रस को पुष्पा ऐसे बदन से मल रही थी जैसे औरतें महंगी क्रीम भी नहीं मलती होंगी।

छोटू भी अलग आनंद में था और हो भी क्यूं ना उसकी मां उसका लंड पकड़ कर मुठिया रही थी, वो तो छोटू सोने का नाटक कर रहा था नहीं तो मां को अपने रस को बदन पर मलते देखता तो आंखें फटी की फटी रह जाती।


पुष्पा के लिए हर आने वाला पल उसकी गर्मी बढ़ा रहा था और उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल होता जा रहा था, उसकी चूत में मानों हज़ारों चीटियां रेंग कर उसे तड़पा रहीं थी, उसकी चूचियां ऐसे अकड़ गई थीं मानों ब्लाउज में छेद करके बाहर निकल आएंगी, अपनी गर्दन पर रस मलते हुए उसका हाथ थोड़ा नीचे आया और वो ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी चूचियों को हल्का हल्का मसलने लगी, पर ज्यों ज्यों वो चुचियों को मसलती वो उतना ही और स्पर्श के लिए तड़प उठती, उसका मसलना उसके अंदर की आग को शांत करने की जगह और भड़का रहा था।

इसी तड़पन में पुष्पा ने बिना विचारे ही एक कदम उठाया और अपने ब्लाउज के बटन खोलने लगी, एक एक करके बटन अलग होते गए और कुछ ही पलों में उसका ब्लाउज खुल चुका था। पर ब्लाउज खोलते हुए भी पुष्पा ने एक ग्रहणी की मुख्य विशेषता का परिचय दिया और वो थी बहुकार्यन, एक ही साथ कई कार्य करने की खास शक्ति एक नारी में होती है और पुष्पा भी अभी वही कर रही थी, भले ही वो अपने ब्लाउज के बटन खोल रही थी पर उसने अपना हाथ छोटू के लंड से तनिक भी नहीं हटाया बल्कि उसे लगातार मुठियाती रही।

ब्लाउज खुलने के बाद पुष्पा ने दोनों पाटों को अलग किया और चांदनी में उसकी उन्नत चूचियां बाहर आ गईं जिन्हें बारी बारी पकड़ कर वो मसलने लगी, उसने खुद को किसी तरह सिसकियां लेने से रोका, अच्छा था छोटू की आंखें बंद थी नहीं तो इतनी पास से अपनी मां की मोटी मोटी चूचियों को देख कर न जाने उसका क्या हाल होता,

पर हाल तो पुष्पा का खराब हो रहा था चुचियों को नंगा कर मसलने के बाद भी उसके बदन में तडपन और बढ़ती जा रही थी उसकी चूत की खुजली उसे तड़पा रही थी, पर वो क्या करे उसकी समझ नहीं आ रहा था चुचियों की तडपन संभाले या चूत की खुजली, लल्ला के लंड को भी नहीं छोड़ सकती थी या कहें तो छोड़ना ही नहीं चाहती थी,

इसका जवाब खुद ही उसे मिल गया पर अगले ही पल वो खुद को मना करने लगी, मन में एक द्वंद होने लगा, सही और हवस में, संस्कार और उत्तेजना में,

बुद्धि और बदन में, और अंत में बदन के सुख के आगे बुद्धि को हार स्वीकार करनी पड़ी और पुष्पा ने अपने ब्लाउज से हाथ उठाया और उससे छोटू का एक हाथ जो कि उसने अपनी कमर पर रखा हुआ था उसे उठाकर अपनी एक चूची पर रख दिया,

चूची पर हाथ का स्पर्श होते ही पुष्पा का बदन पूरा एक पल के थरथरा गया, और अब तो जो भी विचार उसे रोक रहे थे सब धुआं हो गए,

छोटू ने अनुभव किया कि मां उसका हाथ पकड़ रही हैं और फिर उसका हाथ उठाकर कहीं रखा किसी मुलायम सी चीज पर और फिर अगले ही पल छोटू को जैसे ही समझ आया ये क्या है वो तो अंदर तक हिल गया उसकी आंखें झट से खुल गईं, और खुल कर फटी की फटी रह गईं, उसने देखा कि उसके चेहरे के सामने ही उसकी मां का ब्लाऊज खुला हुआ है उनकी दोनों मोटी चूचियां बाहर हैं और एक पर उसका हाथ है ये विचार आते ही उसका पूरा बदन सिहर गया उसका लंड पुष्पा के हाथ में झटके मारने लगा, अब छोटू को भी खुद पर काबू करना मुश्किल होने लगा, जो कि स्वाभाविक ही था जब पुष्पा जैसी परिपक्व औरत खुद पर नियंत्रण नहीं कर पा रही थी तो किशोर अवस्था का छोटू ऐसी परिस्थिति में वो भी दवाई के असर के साथ खुद को कैसे संभाले?

पुष्पा की आँखें बंद थी वो छोटू के हाथ को अपनी चूची पर रख कर उसका स्पर्श महसूस कर अंदर ही अंदर सिहर रही थी, इसी बीच उसे महसूस हुआ कि छोटू की उंगलियां उसकी चूची पर कस गईं, और मानो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो उत्तेजना से होश खो बैठेगी,

छोटू ने भी सब सोच विचार त्याग दिए और अपनी मां की मोटी मस्त मांसल कोमल चूची पर ध्यान लगाया और उसे मसलने लगा, इस एहसास से ही वो बावरा सा होने लगा, पहली बार वो जीवन में किसी चूची को दबा रहा था वो भी अपनी मां की पपीते जैसी चूचियों को, ये विचार कर ही उसका पूरा बदन मचलने लगा, उसकी कमर खुद ब खुद हिलने लगी और वो पुष्पा की मुट्ठी को मानो धीरे धीरे चोदने लगा, अपने हाथों में मां की चूची उसे मानो माखन की पोटली जैसी लग रही थी, इतना कोमल एहसास, अःह्ह्ह्ह्ह, वो बार बार अपनी उंगलियों से माखन की पोटली को आटे की तरह गूंथने लगा, साथ ही उसकी नजर कभी मां की दूसरी चूची पर रहती

पुष्पा के लिए तो अब उत्तेजना इतनी हो गई थी कि उसके लिए अब खुद को रोकना संभव नहीं हो रहा था, बेटे दारा चूची के मर्दन ने तो उसकी आग को कुछ ज़्यादा ही भड़का दिया था, उसने अपना हाथ छोटू के हाथ के ऊपर से हटा दिया और नीचे कर अपने पेट को मसलने लगी, छोटू ने मां का हाथ हटने के बाद भी अपनी मां की चूची को दबाना जारी रखा, पुष्पा का हाथ छोटू के लंड पर लगातार चल रहा था पर छोटू एक बार स्खलित हो चुका था साथ ही दवाई का असर भी था इसीलिए वो मां की चूची को मसलने के बाद भी टिका हुआ था,

अब छोटू को जब ये पता चल गया था कि उसकी मां जान कर ये सब उसके साथ कर रही है तो उसके मन में भी विश्वास बढ़ा, उसे लगने लगा कि मां अब उसपर गुस्सा नहीं करेगी, तो उसने अपना दूसरा हाथ भी सिर के नीचे से निकाला और उसे पुष्पा की गर्दन के नीचे से निकालते हुए दूसरी ओर ले गया और गर्दन के बगल से निकालते हुए दूसरी चूची पर रख दिया, अब छोटू के दोनों हाथ उसकी मां की दोनों चुचियों पर थे, और इस अनुभव से वो पागल सा होने लगा, और दोनों चुचियों को उत्तेजना के वेग में आते हुए मसलने लगा,

दूसरी चूची पर भी बेटे का हाथ पाकर तो पुष्पा का बदन डोलने लगा, उसकी कमर भी धीरे धीरे ऊपर नीचे होने लगी,

जो हाथ उसका पेट पर था वो सरकते हुए नीचे जाने लगा और कब पेटिकोट के ऊपर से वो अपनी चूत को सहलाने लगी उसे खुद पता ही नहीं चला, वो तो बस अपने बदन की गर्मी को कम करने के लिए सारे जतन कर रही थी,

चूत पर अपनी उंगलियों का स्पर्श होते ही पुष्पा के पूरे बदन में बिजली दौड़ गई, उसका बदन कांपने लगा यहां तक कि छोटू के लंड पर भी उसकी पकड़ ढीली हो गई, जो मां अपने बेटे को हवस और उत्तेजना के जादू से बचाना चाहती थी वो स्वयं ही उस जादू के आगे बेवश हो कर अपने बदन की उत्तेजना और हवस शांत करने का भरसक प्रयास करने लगी,

सीना और उठकर छोटू के हाथों में समाने लगा, तपते होंठ कांपने लगे,

छोटू के हाथ लगातार मां की चुचियों का मर्दन कर रहे थे वहीं छोटू की आंखें अपनी मां के सुंदर चेहरे पर टिकी थीं, चांद की चांदनी में वो मां के मुखड़े पर बदलते भावों को साफ देख पा रहा था, तपते होंठों का कंपन जिन पर बार बार पुष्पा की जीभ आती और उन्हें नम करने का प्रयास करती, छोटू से ये देख कर स्वयं पर से नियंत्रण खो गया और उसने ऐसा कदम उठा लिया जो होश में वो कभी उठाने की कल्पना भी नहीं कर सकता था, छोटू ने अपना चेहरा आगे बढ़ा कर अपने होंठ अपनी मां के रसीले कामुक तपते होंठो से मिला दिए, और जोश में आते हुए उन्हें चूसने लगा, पुष्पा को भी जैसे ही होंठों पर बेटे के होंठों का स्पर्श हुआ उसके पहले से तपते बदन में मानो और गर्मी भर गई, और उसके होंठ अपने आप खुल गए और स्वयं को अचम्भित करते हुए वो भी अपने बेटे के होंठों को चूसने लगी, छोटू तो अपनी मां का साथ पाकर फूला नहीं समा रहा था और पागलों की तरह उनके होंठों को चूस रहा था, पुष्पा भी वासना में इस कदर डूब गई की अपने ही बेटे के साथ प्रेमी की तरह चुम्बन कर रही थी, छोटू मां के होंठों को चूमते हुए उसकी दोनों चूचियों को लगातार मसल रहा था, साथ ही उसका लंड जो कि पुष्पा की मुठ्ठी से आज़ाद हो चुका था उसे अपनी कमर हिला हिला कर पुष्पा के नंगे पेट पर घिस रहा था।

पुष्पा का हाथ जो छोटू के लंड से खाली हुआ था वो भी सीधा उसकी जांघों के बीच पहुंचा और सीधा पेटिकोट पर पड़ा और अगले ही पल वो पेटिकोट को ऊपर खींचने लगी, पेटीकोट को अगले ही पल ऊपर खींचते हुए पुष्पा ने अपने हाथ को पेटिकोट के अंदर जांघो के बीच घुसाया और अपनी नंगी चूत पर अपनी उंगलियों का स्पर्श कराया, और गीली चूत को तुरंत ही घिसने लगी,

चूत को स्पर्श मिलते ही पुष्पा का बदन ऐंठने लगा उसकी कमर ऊपर नीचे होने लगी, उसका सीना भी अकड़कने लगा, उसके होंठों की पकड़ छोटू को अपने होंठों पर बढ़ती हुई महसूस हुई और जिससे उसे भी और जोश मिला और वो भी अपनी कमर आगे पीछे कर अपने लंड को पुष्पा की कमर और गांड पर घिसने लगा,

पुष्पा की चूत से उंगलियों का परिचय होते ही चूत ने उंगलियों के लिए चूत की चासनी परोस दी, और पुष्पा कांपते हुए स्खलित होने लगी, वो तो अच्छा था उसके होंठ छोटू के होंठों से बंद थे नहीं तो उसकी सिसकियां बाहर चबूतरे तक सुनाई देती,

छोटू ने भी अपनी मां को स्खलित होते महसूस किया तो उसके मन में भी ये विचार आया कि उसकी मां उसकी वजह स्खलित हो रही है, और बस इतना काफी था उसे भी उसके चरम पर पहुंचाने के लिए,

दोनों मां बेटे एक दूसरे के होंठों को चूसते हुए स्खलित हो रहे थे, और दोनो के ही जीवन का ये सबसे ताकतवर स्खलन था, छोटू के लंड ने पिचकारी मार कर पुष्पा के पेट और कमर को रस से रंग दिया, वहीं पुष्पा का रस भी पेटिकोट और उसकी उंगलियों पर था और अपनी अलग कहानी कह रहा था, स्खलित होने के बाद दोनों के होंठ अलग हुए, पुष्पा को तो लग रहा था उसके बदन में जान ही नहीं बची, उसके मन में बहुत से विचार चल रहे थे पर उन पर ध्यान देने की शक्ति नहीं मिल पा रही थी, वहीं छोटू तो अपनी मां से चिपक कर सो भी चुका था, पुष्पा के बदन से जैसे ही हवस रस बन कर चूत की मोरी से निकली तो वास्तविकता का साफ पानी दिखने लगा,


पुष्पा का तो सिर चकराने लगा ये सोच कर कि उसने आज क्या महापाप कर दिया, अपने ही बेटे के साथ ऐसी हरकत, उसे खुद से घिन आने लगी, उसने एक नजर छोटू पर डाली पर वो सो चुका था, पुष्पा के मन में एक साथ लाख विचार आने लगे, एक पल सोचती कि कैसी मां है तू, तो अगले पल सोचती मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं मेरे जैसी पापी को तो मर जाना चाहिए, पर इतनी हिम्मत भी उसमें नहीं थी, तभी उसे अपनी कमर से कुछ नीचे सरकने का आभास हुआ तो उसे याद आया कि छोटू का रस उसकी कमर और पेट पर अब भी है वो तुरंत उठी और खाट से उतर कर नीचे बैठ गई, उसने तुरंत सिरहाने से अपनी साड़ी उठाई और अपने पेट कमर और बदन को पोंछने लगी और खुद को कोसते हुए उसकी आंखों में पानी आ गया, खुद को मन ही मन गालियां देते हुए, अपने आप पर घिन करते हुए वो खुद को पोंछ रही थी, आंखों से लगातार अश्रु धारा बह रही थी, खाट के नीचे बैठे हुए कुछ देर रोती रही, फिर खुद को समझाया, अपने कपड़े सही किए, छोटू का कच्छा भी लंड पर चढ़ाया और फिर साड़ी बांधी पर उसका मन फिर से छोटू के बगल में सोने को नहीं मान रहा था इसलिए वो एक चादर को जमीन पर ही बिछा कर लेट गई और सोचते सोचते उसकी आंख लग गई।

सुबह तड़के ही फुलवा की हमेशा की तरह आंख खुल गई और उठते ही अपने पूर्वजों और पृथ्वी को प्रणाम कर वो बिस्तर से उठी और उठ कर ज्यों ही नित क्रिया के लिए वो आगे बढ़ती उसकी नजर छोटू की खाट पर पड़ी और फिर बगल में सोती हुई पुष्पा पर, पुष्पा को नीचे सोते देख फुलवा का पारा चढ़ने लगा, इस बहुरिया से एक काम नहीं होता बाबा ने बोला था साथ सोने को पर ये महारानी नीचे सो रही हैं, ऊपर से अगर कोई कीड़ा मकोड़ा काट ले तो और आफत, सोचते हुए फुलवा सीधा पुष्पा की ओर बढ़ गई, और उसके पास जाकर उसे हिलाकर जगाया तो पुष्पा चौंकते हुए उठी,

फुलवा: ए बहू नीचे क्यों सो रही है, लल्ला की साथ सोने को कहा था ना,

पुष्पा: आएं? का? मैं? अम्मा?

पुष्पा तो समझ नही पा रही थी क्या बोले वो गहरी नींद से उठी थी, जो कि फुलवा भी समझ रही थी इसलिए फुलवा ने सोचा अभी रहने देती हूं दिन में बात करती हूं इससे,

फुलवा: चल ऊपर सो जा खाट पर।

पुष्पा भी फुलवा की बात मान तुरंत ऊपर लेट कर सो गई।

फुलवा ने सोचा चलो ये अभी समय है बाबा का बताया हुआ टोटका भी करना है ये सोच वो कमरे की ओर बढ़ गई।

अभी ठीक से सुबह भी नहीं हुई थी कि गांव के सम्मान नीय पुड़िया बाबा यानी केलालाल जी अपनी कुटिया से निकल कर लपक कर चले जा रहे थे, कदमों में तेजी साफ दर्शा रही थी कि कहीं जाने की जल्दी थी, लपक कर चलते हुए वो जल्दी ही नदी की ओर पहुंचे फिर एक पेड़ की आड़ में झांक कर देखा पर सामने देख कर थोड़े निराश हुए फिर मन में कुछ और सोचा और दबे पांव आगे बढ़ते हुए पेड़ों की ओट लेकर आगे बढ़े और फिर एक जगह जाकर रुक गए और फिर एक पेड़ से बड़ी सावधानी से इधर उधर देखते हुए आगे छुप कर देखने लगे और जो दृश्य सामने देखा उसे देख कर उनकी आंखें चौड़ी हो गई,

सामने थी बिल्कुल नंगी फुलवा पानी से भीगी हुई, उसका भरा बदन देख बाबा की सांसें भारी होने लगीं, ऊपर से नीचे तक बाबा फुलवा के बदन को निहारने लगे, सांवले सुडौल कंधों के नीचे पपीते से भी बड़ी बड़ी चूचियां थीं, पपीता क्या तरबूज भी कह सकते थे, गीली होकर चांद की हल्की रोशनी में दोनों चूचियां कार की बत्ती की तरह चमक रहीं थी, चूचियों के नीचे मांसल हल्का बाहर को निकला हुआ पेट जिसके बीच गहरी बड़ी नाभी थी और उसके नीचे झांटों का झुरमुट।

फुलवा का कामुक बदन बच्चे से बूढ़े किसी के भी लंड को उठाने लायक था और उसकी स्वीकृति खुद बाबा का लंड उनकी धोती के अंदर से दे रहा था, जिसे धोती के ऊपर से ही मसलते हुए वो मन ही मन बोले: अःह्ह्ह्ह् फुलवा रानी इस उमर में भी क्या जलवे हैं तेरे, अह्ह्ह्ह मज़ा आ गया, झूठ का टोटका बताना सफल हो गया,

बाबा ये सब सोच ही रहे थे कि फुलवा घूम गई और बाबा को फुलवा के मटके के आकार के चूतड़ आ गए जिन्हें देख बाबा ने अपना लंड बाहर निकाल लिया, और उसे देख सहलाने लगे।

फुलवा बाबा के कहे अनुसार अनुष्ठान करने लगी, पहले पेड़ की पूजा की फिर बाबा के कर अनुसार पेड़ की जड़ में झुककर माथा टेका और वैसे ही मंत्र पढ़ने लगी, झुकने से उसके चूतड़ खुल कर उसकी गांड के छेद और बालों से भरी चूत के दर्शन होने लगे, जिन्हें देख बाबा की बैचैनी और बढ़ गई और उन्होंने अपने कड़क होते लंड को धोती के बाहर निकाल लिया, फुलवा वैसे ही झुकी हुई बाबा ने जो मंत्र बताया था वो जपने लगी, बाबा उसे देखते हुए अपना लंड हिलाने लगे, तभी आंख के कोने से बाबा को कुछ दिखा और उन्होंने तुरंत उस ओर देखा तो चौंक गए, एक साया जिसने अपने को गमछे से ढंक रखा था फुलवा की ओर बढ़ रहा था, बाबा को उसका चेहरा नहीं दिख रहा था, क्योंकि चेहरे पर गमछा बंधा था धीरे धीरे वो साया फुलवा की ओर बढ़ने लगा पर फुलवा तो इस सब से बेखबर होकर मंत्र जपने में लगी हुई थी, बाबा की सांसें तेज़ हो रही थी ये सोच कर कि ये कौन है और क्या करने वाला है, वो साया धीर से फुलवा के ठीक पीछे पहुंच गया और बाबा ने देखा कि फुलवा के पीछे घुटनो पर बैठ भी गया, पर बाबा को सिर्फ उसकी पीठ दिख रही थी इसलिए बाबा ने तुरंत अपनी जगह किसी तरह बदली और आहिस्ता आहिस्ता वो एक तरफ आ गए और देखा तो चौंक गए वो साया फुलवा के बिल्कुल पीछे बैठ कर उसके चूतड़ों को निहारते हुए अपना लंड बाहर निकाल कर सहला रहा है, उसका लंड भी बिल्कुल कड़क है इसी बीच वो थोड़ा सा आगे सरकता है साथ ही अपने लंड पर थूक लगाता है, और फिर बाबा को अचंभित करते हुए वो साया अपने लंड को पकड़ कर उसका टोपा फुलवा की बालों भरी चूत के मुहाने पर लगाता है और फिर इससे पहले बाबा या स्वयं फुलवा कुछ कर पाते या उसे रोकते वो फुलवा की कमर थाम कर एक जोरदार धक्का लगाता है और अपना लंड फुलवा की चूत में ठूंस देता है,

जिसके साथ ही फुलवा की एक तेज़ चीख जंगल में गूंज जाती है वो तुरंत अपना चेहरा घुमा कर पीछे देखने की कोशिश करती है तो उसे गमछे में लिपटा एक चेहरा दिखता है और वो सिर्फ उसकी आंखें देख पाती है, वो अगले ही पल उठने का प्रयास करती है पर उस साए के सख्त हाथ उसकी कमर को थाम कर उसे वैसे ही रोक कर रखते हैं वो अपना लंड बाहर खींचता है और फिर से जड़ तक ठूंस देता है और ऐसे ही करते हुए फुलवा को चोदने लगता है, फुलवा के मुंह से हर धक्के पर आह्ह्ह्ह्ह निकलने लगती है, बाबा भी अपने सामने फुलवा की चुदाई देख कुछ नहीं कर पाते बल्कि अपना लंड हिलाने लगते हैं, वो साया लगातार तगड़े धक्कों से फुलवा की परिपक्व चूत को चोदने लगता है,

फुलवा को जवानी से अधेड़ उमर तक खूब चोदा था पर नाती पोता बढ़े होने लगे तो उसने स्वयं ही ये सब कम कर दिया था, उसके पति सोमपाल तो अभी भी उसे कभी कभी पकड़ लेते थे पर वो ही समाज का और उमर का उलाहना देकर टाल देती थी, इसलिए आज जब अचानक से इतने दिनो से सूखी चूत में लंड का प्रवेश हुआ तो उसे आरंभ में तकलीफ हुई पर अब लगातार लंड के घर्षण ने उसकी चूत की मांसपेशियों को जाग्रत कर दिया और उसकी चूत भी अब गीली होने लगी और अपने पानी से उस अनजान साए के लंड को चुपड़ने लगी,

चूत के गीले होने से लंड और अच्छे से अंदर बाहर होने लगा, और न चाहते हुए भी फुलवा को इतने दिनों बाद चुदाई का आनंद आने लगा, बदन में इतनी तरंगे उठने लगीं, उसके मुंह से न चाहते हुए भी आह्ह्ह्ह अअह्ह्ह्ह की कामुक आहें निकलने लगी,

वहीं वो साया तो उसकी कमर थामे लगातार दनादन धक्के लगा रहा था हर पल के साथ उसके धक्कों की गति और बढ़ती जा रही थी,

और कुछ ही पलों में वो साया गुर्राने लगा और उसने अपना लंड जड़ तक फुलवा की चूत में गाड़ दिया और फिर अपना रस छोड़ने लगा,

फुलवा ने भी जब अपनी चूत की वर्षों से सूखी माटी पर रस की बारिश होती देखी वो भी एक अनजान मर्द के लंड से तो इस विचार को वो भी संभाल नहीं पाई और उस साए के साथ ही स्खलित होने लगी, अपना रस फुलवा की चूत में भरने के बाद उस अनजान साए ने अपना लंड उसकी चूत से निकाला और फिर कुछ ही पलों में पेड़ों के पीछे गायब हो गया, फुलवा को जब तक होश आया तब तक तो वो गायब हो चुका था वहीं बाबा के लिए भी उसकी गति का पीछा करना असंभव ही था, और वो भी तब था न जब वो पीछा करते वो खुद पेड़ के तने से टिके हुए थे और अपने लंड की पिचकारी घास पर छोड़ रहे थे, अपने लंड से रस निचोड़ने के बाद बाबा का दिमाग चलने लगा और वो तुरंत वहां से निकल लिया लपकते हुए, ये सोचते हुए कि निकल ले बेटा नहीं तो फुलवा ने या किसी और ने तुझे इस ओर देख लिया तो बिना मजे लिए ही तू फंस जायेगा।


फुलवा कुछ पल वैसी ही पड़ी रही चूत से अनजान मर्द का रस बह कर बाहर टपक रहा था, वैसे तो इस उमर में चूत में रस गिराने से कोई खतरा नहीं था पिछले साल से ही उसके मासिक धर्म आने बंद हो गए थे, पर सूखी चूत पर अचानक से हुई बारिश ने उसके मन को भी भीगा कर रख दिया था, अपने आप को संभालने के बाद फुलवा ने मंत्रों को पूरा किया, और फिर पेड़ की ओट में कपड़े पहनकर घर की ओर चल दी,

जारी रहेगी।
 
अध्याय 11
फुलवा कुछ पल वैसी ही पड़ी रही चूत से अनजान मर्द का रस बह कर बाहर टपक रहा था, वैसे तो इस उमर में चूत में रस गिराने से कोई खतरा नहीं था पिछले साल से ही उसके मासिक धर्म आने बंद हो गए थे, पर सूखी चूत पर अचानक से हुई बारिश ने उसके मन को भी भीगा कर रख दिया था, अपने आप को संभालने के बाद फुलवा ने मंत्रों को पूरा किया, और फिर पेड़ की ओट में कपड़े पहनकर घर की ओर चल दी, अब आगे...

घर की ओर कदम बढ़ाते हुए फुलवा के मन में विचारों का सैलाब आया हुआ था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया, और कौन था वो अज्ञात साया जिसने उसके साथ ये किया, उसने तो किसी को बताया भी नहीं था इस टोटके के बारे में, सिर्फ बाबा को पता था, तो क्या बाबा ने ये सब?

ये सोच फुलवा के कदम रुक गए और वो खेत की एक मेढ़ पर बैठ गई और सोचने लगी।

नहीं नहीं, बाबा ऐसा कभी नहीं कर सकते वैसे भी उसकी उमर बाबा जितनी तो नहीं लग रही थी, जो भी था बाबा से जवान ही था पर कौन था सबसे बड़ा सवाल ये है, कीड़े पड़ें उस हरामी को न जाने क्या मिला मुझ बुढ़िया के साथ ये सब करके उसे, इस उमर में आकर मेरा मुझे खराब कर गया, पूरा जीवन सिर्फ अपने पति के साथ बिताया मैंने, और किसी को छूना तो दूर उस नज़र से देखा भी नहीं, और इस उमर पर आकर ये सब, हाए दईया कहीं वो मेरी बदनामी न कर दे, बैठे हुए ही फुलवा को अपनी चूत से उसका रस अब भी रिसता हुआ महसूस हुआ, तो फुलवा उठी और खेत के अंदर की ओर चलने लगी साथ ही मन में सोच रही थी: हरामजादा अपना पानी भी अंदर गिरा गया, वो तो अच्छा है अब गाभिन नहीं हो सकती नहीं तो क्या ही मुंह दिखाती मैं किसी को,

खेत के अंदर जाकर एक घनी सी जगह देख कर फुलवा ने अपनी साड़ी को पकड़ कर कमर तक उठाया और नीचे बैठ गई और उसके रस को अपनी चूत से निकालने की कोशिश करने लगी, फुलवा अपनी उंगलियों को अपनी चूत में डाल कर रस को बाहर पोंछने की कोशिश करने लगी, और उंगलियों को चूत में चलाते हुए फुलवा के बदन में फिर से वही तरंगें उठने लगीं जो कि तब उठ रही थी जब वो अनजान साया उसे चोद रहा था, जिन्हें फुलवा अपने ही आप से छुपाने की कोशिश कर रही थी पर अभी दोबारा से चूत में उंगलियों ने उसे बापिस उसी मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया,

अह्ह्ह्ह कमीने ने वर्षों की बुझी हुई आग को भड़का दिया है, अह्ह्ह्ज मैं तो भूल ही गई थी कि चुदाई में ऐसा आनंद आता है, पूरा बदन झूम सा रहा है, फिर खुद ही अपनी उंगलियों को चूत से बाहर झटकते हुए मन ही मन बोली: छी छी ये मैं क्या सोच रही हूं, एक तो इतना बुरा हुआ और मैं उसमें अपने बदन के आनंद की बात सोच रही हूं, फिर मन से दूसरी आवाज़ आई कि खुद से ही झूठ कैसे बोलेगी फुलवा? झूठ कैसा झूठ।

अगर ये झूठ नहीं है और तुझे बुरा लग रहा था तो तूने उसे रोका क्यों नहीं?

रोकती कैसे वो तो अचानक से आकर धक्के लगाने लगा,

फिर भी तो रोक सकती थी, और सबसे बड़ी बात इतना ही बुरा लगा था तो इतने वर्षों बाद चूत ने पानी क्यों छोड़ दिया,

ये सोच कर तो फुलवा खुद से ही हार गई, और सोचने लगी सच तो ये ही है कि वो जो भी था उसने ऐसा सुख दिया जो की न जाने कब से मेरी चूत को नहीं मिला था तभी तो खुश होकर चूत ने पानी बहा दिया, अःह्ह्ह्ह्ह अपनी चूत पर तो मैंने ध्यान देना ही छोड़ दिया था ये सोच कर कि इस उमर में ये सब नहीं होता, पर उस साए ने तो जैसे मुझे दोबारा जवान कर दिया,

ये सोचते हुए फुलवा की उंगलियां बापिस उसकी चूत की गली में घुस गईं और शोर मचाने लगीं, और तब तक अंदर बाहर होती रहीं जब तक एक बार फ़िर से फुलवा की चूत ने पानी नहीं बहा दिया,

सुबह रोज के समय से ही लता की नींद खुली और आंखों को मलते हुए उठी और फिर जैसे ही खुद पर ध्यान गया तो चौंक गई खुद को नंगा पाकर फिर रात की सारी बातें ताजा होने लगीं और उसका सिर भारी होने लगा, बगल में सोती हुई बेटी के नंगे बदन पर निगाह डाली और सोचने लगी कि क्या होता जा रहा है ये मेरे साथ, क्यों मैं स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाती, क्यों अपनी ही बेटी के साथ ये सब हरकतें करती हूं, इतनी गर्मी क्यों आ रही है मेरे बदन में, ऐसा तो रंडियां भी नहीं करती होंगी जैसा मैं कर रही हूं, अपनी ही बेटी से अपनी चूत चटवाई, अपनी बेटी के मुंह पर मैंने मूता, छी छी छी एक मां इससे नीच काम और क्या कर सकती है,

लता अपनी बेटी के सोते हुए चेहरे को देखते हुए सोचने लगी, लता ने अपनी बेटी के नंगे बदन को ऊपर से नीचे तक निहारा और एक बात उसके मन में आई कि जिससे भी बेटी ब्याह करेगी उसका तो जीवन ही सफल हो जाएगा, इतना सुंदर और कामुक बदन है मेरी बिटिया का, सुंदर चेहरा, पतली कमर, इतने मोटे मोटे चूचे और फिर नीचे इतनी लुभावने गोल मटोल चूतड़।

ये सब सोचते हुए उसे फिर से अपने बदन में कुछ कुछ होने लगा और वो बेटी की ओर आकर्षित होने लगी तो बीच में ही उसने खुद को रोका और तुरंत बिस्तर से उठ गई और सोचने लगी कि अपनी इस गर्मी का मुझे कुछ करना ही पड़ेगा, आज रात ही नंदिनी के पापा से शांत करवाऊंगी।

वो अपने कपड़े पहनते हुए सोचने लगी, पर अभी नंदिनी को कैसे जगाऊं, अगर उठेगी तो मैं इसका सामना कैसे करूंगी, समझ नहीं आ रहा आंख भी कैसे मिलाऊंगी, सो भी तो नंगी रही है, कुछ समझ नहीं आ रहा।

कुछ सोचते हुए उसने शौच पर जाने वाला लोटा उठाया और आंगन के कोने में दरवाजे की ओर जाकर आवाज़ लगाने लगी: नंदिनी ए नंदिनी उठ जा, उठ सुबह हो गई।

कई बार आवाज़ लगाने पर नंदिनी की नींद हल्की खुली तो उसने सिर उठा कर देखा, आंखें अब भी आधी खुली आधी बंद थीं, लता ने जैसे ही देखा कि नंदिनी की नींद खुल गई है वो तुरंत घूम गई और दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाते हुए बोली: उठी जा मैं जा रहीं हूं खेत ठीक है।

इतना कह कर वो दरवाज़ा खोल कर और बाहर से ही कुंडी लगा कर चली गई, इधर उसने ये देखा ही नहीं कि नंदिनी तो बापिस सो चुकी थी , उसने पलभर को सिर उठा कर भले ही देखा था पर नींद में होने के कारण बापिस सो गई।

लता अपने घर से सीधा पहले रत्ना के यहां गई, और फिर पुष्पा के घर की ओर आई तो दरवाजे पर ही उसे सुधा और पुष्पा दोनों मिल गए तो फिर चारों की टोली हाथों में लोटा लिए चल पड़ी खेतों की ओर।

बीती रात एक और के लिए काफी भारी पड़ी थी और वो था लल्लू, जिस लल्लू का काम में पल भर को मन नहीं लगता था उस लल्लू को सारी रात खेत काटना पड़ा था तो मन ही मन भुनता हुआ और नींद से लड़ता हुआ मन मारकर काम में लगा रहा था। पर खेत था कि खतम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, अभी भी थोड़ा हिस्सा बचा था, लल्लू को तो अब झपकियां आने लगी थीं, लल्लू को झपकी आते देख उसके दादा को उस पर दया आ गई और वो बोले: ए ललुआ अब थोड़ा ही रह गया है, जा तू घर हम लोग कर लेंगे,

मगन: अरे बापू तुम ही इसे चढ़ाए हो सिर पर, हम दोनों लोग भी तो लगे हुए हैं रात से ही ये तो जवान है हमें थकना चाहिए या इसे?

कुंवरपाल: अरे उसे झपकी आ रही हैं, कहीं दरांती गलत लग गई तो कट जायेगा।

मगन: अच्छा लल्लू फिर एक काम कर घर जा और अपनी मां से चाय बनवा ला, हमारी सुस्ती भी थोड़ी दूर हो जायेगी, क्यों बापू?

कुंवरपाल: हां ये ठीक रहेगा।

लल्लू की इतनी हिम्मत तो होती नहीं थी कि अपने बाप के आगे कुछ बोल सके तो जैसा बाप ने कहा वैसे ही ठीक है कह कर चल दिया तो पीछे से मगन ने सावधान भी कर दिया।

मगन: और सुन सीधा घर जा और घर से यहां लौट, अपने यारों के पास रुकना नहीं।

ये सुन तो लल्लू अंदर तक जल भुन गया, एक ही तो उम्मीद थी उसे, उसने सोचा था कि अभी सबसे पहले खेतों में छुपकर बैठूंगा और सुबह सुबह ही किसी के मस्त चूतड़ों के दर्शन हो जायेंगे तो कम से कम रात का दुख कम हो जायेगा पर उसके बाप ने उससे ये सुख भी छीन लिया, मन ही मन अपने भाग्य को कोसता हुआ वो घर की ओर चलने लगा और ये सब कम नहीं था कि उसके जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए उसे रास्ते में ही भूरा मिल गया,

भूरा: अरे मैं तेरे घर ही आ रहा था, चल चलते हैं, खेतों की ओर।

लल्लू: तू ही जा मुझे काम है,

लल्लू मुंह बनाते हुए बोला,

भूरा: ऐसा क्या काम है सुबह सुबह?

लल्लू: तेरी गांड मारनी है बोल मरवाएगा?

लल्लू अपना गुस्सा भूरा पर निकालते हुए बोला,

भूरा: तू मरा गांड भेंचों अपनी, बिना बात के नखरे कर रहा है लुगाई की तरह।

ये कह भूरा भी गुस्से से आगे बढ़ गया उसे छोड़ कर और लल्लू अपने घर की ओर।

भूरा भिनभिनाता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, साला अपने आप को समझता क्या है, बिना बात के मुझपर भड़क रहा था, गांड मराए चूतिया साला। भूरा आगे एक मोड पर पहुंचा जहां उसके सामने दो रास्ते कट रहे थे एक रास्ता था उस खेत का जहां गांव की औरतों को वो छोटू और लल्लू देखते थे और एक रास्ता था उस खेत का जहां उसने और लल्लू ने पुष्पा चाची की मोटी गांड पहली बार देखी थी, किस ओर चला जाए वो इस पर विचार करने लगा, और कुछ सोच विचार के बाद वो एक रास्ते पर मुड़ गया और थोड़ा आगे चलने के बाद इधर उधर देख कर एक अरहर के खेत में घुस गया, और फिर सावधानी से आगे बढ़ते हुए वहीं पहुंच गया जहां उसने पहली बार पुष्पा चाची की गांड का अदभुत दृश्य देखा था,

बिलकुल मेढ़ के किनारे पहुंच कर भूरा ने सावधानी से झाड़ियों को थोड़ा हटा कर देखा तो सामने का दृश्य देख कर उसकी आँखें फैल गईं। उसका मन खुशी से फूल उठा क्यूंकि आज उसे छप्पर फाड़ के जो मिला था, कहां वो पुष्पा चाची की गांड देखने की इच्छा से आया था और कहां आज उसके सामने चार चार औरतें अपनी साड़ी कमर पर चढ़ाए अपने चूतड़ दिखा कर उसके सामने बैठी थीं, उसका लंड तो तुरंत ही तन गया, और चारों की गांड एक से बढ़कर एक थी, भूरा को तो अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हो रहा था, उसने खुद को समझाया कि भूरा ये सपना नहीं है तू सो नहीं रहा बल्कि तेरे भाग्य जागे हैं, तुंरत भूरा ने अपना पजामा नीचे कर के अपने तने हुए लंड को बाहर निकाला और उसे मुठियाते हुए सामने के दृश्य पर नज़र गढ़ा दी,

अह्ह्ह्ह क्या दृश्य है, एक से बढ़कर एक गांड, अह्ह्ह्ह पर ये हैं कौन, ये दूसरे नंबर वाली तो पुष्पा चाची हैं उनकी गांड को मैं नहीं भूल सकता, तभी उनमें से एक औरत हंसी तो उसकी हंसी सुनकर तो भूरा तुरंत समझ गया कि ये तो सुधा चाची हैं, अह्ह्ह सुधा चाची की गांड भी बड़ी मस्त है पुष्पा चाची से छोटी भले ही है पर बिल्कुल गोल मटोल है,

इतने में पुष्पा के दूसरी ओर बैठी औरत कुछ बोली तो भूरा चौंक गया क्योंकि वो तो लल्लू की मां यानी लता थी, भूरा थोड़ा सकुचा फिर सोचने लगा कि जब छोटू की मां की देख सकता हूं तो उस चूतिया लल्लू की मां की क्यों नहीं, साला अच्छा हुआ नहीं आया नहीं तो अपनी मां की गांड देख कर पागल हो जाता, वैसे लता ताई की गांड है भी पागल करने वाली, चूतड़ देखो कैसे मोटे मोटे हैं, लगता है ताई ने खूब मरवाई है,

अपनी दोस्तों की मां के बारे में ऐसी बातें सोच कर उसे बहुत उत्तेजना हो रही थी साथ ही उसे अच्छा भी लग रहा था, इसी बीच उसके कंधे पर एक हाथ पड़ा जिससे वो चौंक गया, उसने तुरंत पलट कर देखा और सामने वाले चेहरे को देख कर तो उसकी गांड और फट गई, सामने सत्तू था जो उसे देख कर उससे फुसफुसाते हुए बोला: क्यों बे किसके बिल देख कर अपना बीन बजा रहा है?

अब भूरा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले उसके तो गले से आवाज नहीं निकल रही थी वो सोच रहा था कि अगर सत्तू ने छोटू या लल्लू को ये बात बतादी कि मैं उनकी मांओं की गांड देख कर मुठ मार रहा था तो दोनों मेरी जान ले लेंगे। अब क्या होगा?

सत्तू: अरे गूंगा हो गया क्या? बहुत टेम हो गया मुझे भी ये खेल खेले हुए चल आज फिर से देख लेते हैं,

ये कहकर सत्तू ने भूरा को बगल किया और खुद भी उसके बगल में झुककर उसकी तरह सिर निकाल कर सामने देखने लगा,

सत्तू: अरे भेंचो, ये तो गजब की पिक्चर है बे,

सत्तू फुसफुसाते हुए बोला साथ ही अपने पजामे को खिसका कर अपना लंड भी बाहर निकाल लिया और उसे मुठियाने लगा,

भूरा को सत्तू पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था कि साला कहां से आ गया अच्छा खासा देखते हुए हिला रहा था,

पर बेचारा कर भी क्या सकता था सत्तू उससे बड़ा था लड़ भी नहीं सकता था ऊपर से उसने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था वो तो बस मन ही मन ये मन ये मना रहा था कि सत्तू को ये पता न चले कि ये औरतें कौन हैं नहीं तो उसका मरना तय है।

सत्तू: अह्ह एक से एक मटके हैं ये तो, बिलकुल सही जगह ढूंढी है तूने,

भूरा से भी और रुका नहीं गया और उसने सोचा अब फंस तो गया ही हूं थोड़ा इसका साथ देता हूं क्या पता बच जाऊं। ये सोच भूरा भी वापस अपनी जगह आकर देखने लगा,

भूरा: हैं न सत्तू भैया एक से बढ़कर एक।

भूरा थोड़ी चापलूसी करते हुए सत्तू को अपनी ओर करने के लालच में बोला।

सत्तू: हां यार, एक से बढ़कर एक, ये कोने वाली की तो बिलकुल कसी हुई गांड है पर बाहर को निकली है ज़रूर घोड़ी बन कर चुदती होगी खूब।

भूरा समझ गया ये सुधा की बात कर रहा है।

भूरा: अरे पर ये कैसे कह सकते हो भाई?

सत्तू: अरे लल्ला ये ही तो हमारा हुनर है, और बताऊं उसके बगल वाली की गांड बड़ी है पर इसकी चुदाई कम हुई है।

भूरा: अरे भाई तुम तो जादूगर हो।

भूरा पुष्पा चाची के बारे में सुनते हुए मन ही मन खुश होते हुए बोला

सत्तू अपनी प्रशंसा सुन कर खुश होते हुए बोला: ये तीसरी वाली सबसे मोती गांड वाली इसकी चुदाई भी काफी समय से नहीं हुई है पर ये मरवाती बड़ी मस्त होगी।

भूरा: भाई ये तुम सच कह रहे हो?

सत्तू: तुझे विश्वास न हो तो जाकर पूछ के देख ले.

सत्तू गंदी हंसी हंसता हुआ फुसफुसाया, भूरा को भी उसकी बात पर हंसी आ गई,

भूरा: नहीं भाई मुझे अपनी गांड नहीं तुड़वानी।

सत्तू: तो फिर शांत रह और सुन अह्ह्ह्ह चौथी वाली की गांड बड़ी मस्त है। सबसे ज्यादा मुझे ये हो अच्छी लगी

भूरा: क्यों भाई इसमें ऐसा क्या खास है?

सत्तू: अरे इसके चूतड़ देख बिल्कुल मिले हुए हैं गांड की दरार बैठने के बाद भी ठीक से नहीं दिख रही, ऐसी औरतों के छेद बड़े कसे हुए होते हैं लंड सटा सट जाता है अंदर।

भूरा: तुम्हें तो सब पता है सत्तू भाई। लगता है बहुत खेले खाए हो।

सत्तू: अरे खेले खाए हम कहां खेली खाई तो ये ही है कोने वाली, ये जरूर कई लंड ले चुकी है ऐसी औरतें कभी एक लंड से संतुष्ट नहीं होतीं। ये भी कई लौड़ों की सवारी करती होगी।

भूरा ने भी चौथी औरत पर अपना ध्यान लगाया और सोचने लगा सच में इसके चूतड़ बड़े मजेदार हैं न ज़्यादा छोटे और न ज़्यादा बड़े, बिल्कुल गोल मटोल और भरे हुए। उसकी गांड पर ध्यान लगाते हुए भूरा लंड को मसलने लगता है और सत्तू की कही बात सोचने लगता है कि कैसे लंड उसकी चूत में जाता होगा सटा सट।

इसी बीच सुधा फिर से कुछ बोली जो कि उन्हें ठीक से सुनाई नहीं दिया पर उसके बाद ही वो चौथी औरत जिसकी गांड देख कर वो लंड हिला रहा था वो भी हंसी और उसकी हंसी सुनकर तो भूरा के कान खड़े हो गए, उसका लंड उसके हाथ से छूट गया क्योंकि इस आवाज को वो बहुत अच्छे से पहचानता था ये किसी और की नहीं बल्कि उसकी मां रत्ना की आवाज़ थी,

भूरा का तो सिर चकराने लगा, जिसके लिए वो लंड हिला रहा था वो उसकी मां है, अपनी मां की गांड को देख कर मैं उत्तेजित हो रहा था, उसके मन में बार बार सत्तू की वो बात घूमने लगी कि इसकी चूत में लंड बड़ा मस्त जाता है, सटा सट।साथ ही ऐसी औरतें एक लंड से संतुष्ट नहीं होतीं है।

भूरा के लिए और सहना मुश्किल हो गया और उसके लंड के लिए भी,क्योंकि उसका लंड ठुमके मारते हुए पिचकारी छोड़ने लगा और झाड़ियों को गीला करने लगा, सत्तू ने भी ये देखा और बोला: अबे कहां अपना पानी इन झाड़ियों पर बहा रहा है, गांव में इतनी मस्त घोड़ियां हैं इनकी सवारी कर।

भूरा से कुछ कहते नहीं बना वो बस एक के बाद एक पिचकारी मारता रहा, स्खलन के बाद भूरा की सांसें धीरे हुई तो दिमाग घूमने लगा, उसे समझ नहीं आ रहा था वो क्या कर रहा है और ये क्या हो रहा है, पर उसने स्वयं को संभाला और सोचा अभी सबसे ज़रूरी ये है कि सत्तू को ये न पता चले कि ये औरते कौन हैं इसीलिए दिमाग लगाते हुए वो तुरंत उठा और सत्तू को पकड़ कर बाहर खींचने लगा,

सत्तू ने उसे इशारे में पूछा क्या हुआ तो उसने उसे चुपचाप बाहर आने का इशारा किया सत्तू भी अपना पजामा ऊपर करते हुए उसके पीछे पीछे खेत की दूसरी ओर चल दिया।

सत्तू: अरे क्या हुआ इतना मस्त दृश्य छोड़ कर उठा लाया।

भूरा: अरे इसी समय जिसका खेत है वो भी आता है एक दो बार तो मैं भी पकड़ने से बचा हूं

सत्तू: चल ठीक है, वैसे भी जो देखना था वो देख लिया।

भूरा: हां हां, अब मैं चलता हूं,

सत्तू: अरे रुक तो तुझे पता है ये औरतें कौन हैं यार बड़ी मस्त हैं।

भूरा ये सुन घबरा जाता है फिर संभालते हुए कहता है: ये ये ये तो पिछले मोहल्ले से आती हैं कौन हैं ये तो नहीं पता।

सत्तू: अच्छा लगता है पिछले मोहल्ले में चक्कर काटने पड़ेंगे। तभी काम बनेंगे।

इतने में दोनों अरहर के खेत से बाहर आ चुके थे, पर भूरा ये निश्चित कर लेना चाहता था कि जब तक औरतें घर तक न पहुंच जाएं, इसीलिए वो बातें बनाते हुए बोला: अरे सत्तू भाई ये औरतों को पटाने का हुनर मुझे भी सिखा दो।

सत्तू: अच्छा, बेटा तुम भी मजे लेना चाहते हो।

भूरा: हां भाई चलो नदी किनारे आराम से बातें करेंगे।

सत्तू: अरे वाह तू तो काफी गंभीर है भूरा सीखने के लिए।

भूरा: हां भाई मुझे अपना चेला बना लो।

सत्तू: चल फिर चेले, आज तुझे चुदाई का ज्ञान देता हूं।

सत्तू और भूरा नदी की ओर बढ़ जाते हैं।

खेत से बाहर निकलते हुए रत्ना ने पुष्पा से कहा,

रत्ना: ए पुष्पा रानी, का हुआ आज बड़ी चुप्पी साधी हुई है,

सुधा: हां और लता दीदी भी कहां बोल रही हैं कुछ।

सुधा और रत्ना ने लता और पुष्पा की चुप्पी देख कर आखिर पूछ ही लिया क्योंकि काफी देर से वो दोनों ही बातें किए जा रहीं थी,

पुष्पा: अरे वो कुछ नहीं वो तो बस थोड़ा सिर भारी था इसलिए।

लता: हां मुझे भी थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही इसलिए।

रत्ना: लगता है दोनों को ही अच्छी रगड़ाई की जरूरत है,

रत्ना और सुधा मजाक बनाते हुए हंसने लगीं तो चाहे अनचाहे भी पुष्पा और लता उनका साथ देने लगीं,

पुष्पा के मन में तो जो कुछ रात को हुआ वो किसी फिल्म की तरह चल रहा था, और जितना वो उसके बारे मे सोच रही थी उसका मन बैठा जा रहा था, वो स्वयं को इस समय दुनिया की सबसे गंदी और नीच औरत मान रही थी जो कि अपनी कोख से जन्मे बेटे के साथ ऐसी हरकतें करती है, उसे स्वयं से घिन आ रही थी।

ऐसा ही कुछ हाल लता का था वो भी उसी मनोदशा से गुज़र रही थी जो कि पुष्पा की थी।

लल्लू भारी कदमों से चलता हुआ अपने घर पहुंचा तो देखा कि किवाड़ पर बाहर से कुंडी लगी है, उसने सोचा शायद मां शौच पर गई हैं, इसलिए कुंडी खोल कर वो अंदर आया, नींद से उसकी आंखें भारी हो रहीं थी, घर में घुसने पर वो आंगन की ओर आया और देखा खाट अब भी पड़ी है तो वो उसकी ओर बढ़ा और कुछ कदम बढ़ाते ही रुक गया, उसकी नींद से भरी हुई आंखें अचानक से खुली की खुली रह गईं, सीने में तेजी से धक धक होने लगी, और आखें खाट पर जम सी गईं। बिस्तर पर अपनी बड़ी बहन को बिल्कुल नंगा देख उसे विश्वास नहीं हुआ कि वो सच में ये सब देख रहा है कि ये सपना है, पर ये सपना तो बिलकुल नहीं था, उसकी आंखो के सामने उसकी बड़ी बहन बिल्कुल नंगी हो कर सो रही थी, पहले प्रतिक्रिया तो उसकी यही हुई जो हर भाई की होनी चाहिए और उसने तुरंत अपनी आंखें हटा लीं,

उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी बहन ऐसे क्यों सो रही है, कोई नंगा भी सोता है क्या?

कहीं कुछ हो तो नहीं गया उसे कोई दिक्कत या परेशानी तो नहीं हो गई, ये सोचते हुए उसने बापिस अपनी आँखें बिस्तर पर डालीं और दो कदम बढ़ाते हुए खाट के बिल्कुल बगल में पहुंच गया, उसने नंदिनी का चेहरा देखा वो तो बड़े आराम से सो रही थी, धीरे धीरे लल्लू की आंखें नीचे की ओर फिसलने लगीं, सुराई दार गर्दन से होते हुए वो उसके सीने पर पड़ी और फिर नंदिनी की मोटी मोटी चुचियों पर जो कि उसकी हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रहीं थीं, अपनी बहन की चूचियों को देख कर लल्लू का तो मुंह सूखने लगा, पहली बार वो नंगी चूचियां देख रहा था और वो भी अपनी बहन की, कितनी सुंदर और मोटी हैं, उसके मन में अपने ही खयाल आने लगे, दीदी की चूची तो फोटो वाली लड़की से भी अच्छी और बड़ी हैं, देखो कैसे ऊपर नीचे हो रही हैं, अगले ही पल लल्लू खुद को कोस भी रहा था कि अपनी बहन को ऐसे उसे नहीं देखना चाहिए, पर आंखे थीं हटने का नाम नहीं ले रहीं थी। पर हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और इसकी भी हो रही थी, उसे पता भी नहीं चला था कि उसका लंड उसके पजामे में पूरी तरह तन चुका था,

चूचियों को देखते हुए उसकी नज़रें नीचे आई तो अपनी बहन की गोरी कमर, सपाट पेट और उसके बीच गोल नाभी को देखा जो कि तालाब में कमल के समान सुन्दर लग रही थी, कुछ पल वो बस नाभी और उसकी सुंदरता को ही निहारता रहा, और फिर कुछ पल बाद उसकी नजर उसकी बहन की जांघों के बीच पहुंची, बिल्कुल चिकनी उसकी चूत देख कर तो लल्लू का बदन सिहर गया, बीच में एक हल्की सी लम्बी दरार थी जो कि लग नहीं रहा था आज तक खुली थी, ये देख तो लल्लू का हाथ अपने आप उसके लंड पर पहुंच गया और पजामे के ऊपर से ही उसे सहलाने लगा, वो धीरे धीरे भूलने लगा कि जिसे वो देख रहा है वो उसकी बड़ी बहन है बल्कि उसे तो सामने लेटी हुई एक कमसिन जवान नंगी लड़की दिख रही थी, इसी बीच नंदिनी ने दूसरी ओर करवट ले ली और लल्लू के लिए एक बार बाजी और पलट दी, लल्लू के सामने उसकी बहन के गोल मटोल चूतड़ आ गए, और उन्हें देख कर तो उसका लंड भी पजामे में ठुमक कर सलामी देने लगा, ऐसी मस्त गांड देख लल्लू अंदर तक हिल गया, हालांकि उसने गांव की कई औरतों की और फिर पुष्पा चाची की बड़ी सी फैली हुई गांड भी हाल ही में देखी थी, पर अपनी सगी बहन की गोल मटोल गांड के आगे उसे वो सब फीकी लगीं, कितने मोटे और गोल मटोल चूतड़ थे कि दरार को भी ढंक रहे थे,

लल्लू की तो सांसें ऊपर नीचे होने लगी थीं कहां वो छूपके खेत में दूसरी औरतों के चूतड़ देखता था और कहां अपनी ही जवान कामुक बहन का नंगा बदन उसके सामने था, एक ओर उसका मन कह रहा था कि ये सब गलत है ये तेरी बहन है बापिस मुड़ जा, वहीं दूसरा मन कह रहा था कि ऐसा मौका नहीं मिलेगा, बहन है तो क्या हुआ है तो लड़की ही और वो भी इतनी कामुक लड़की, वैसे भी किसी को कौन सा पता चला रह है, अपनी बहन का कामुक बदन देख कर वो खुद को रोक नहीं पा रहा था, अपने आप से ही लड़ाई चल रही थी कभी कदम पीछे रखता तो फिर बापिस रख लेता,

धीरे धीरे वासना ने उसकी बुद्धि पर नियन्त्रण कर लिया और वो पजामे के ऊपर से लंड मसलते हुए नंदिनी के नंगे बदन को अच्छे से निहारने लगा, उसका बड़ा मन होने लगा कि वो अपनी बहन के मखमली चूतड़ों को छुए पर इतना साहस नहीं हो रहा था, पर हर पल बढ़ती उत्तेजना ने उसके डर को कम कर दिया और उसने अपना हाथ आगे बढ़ाना शुरू कर दिया, ज्यों ज्यों उसका हाथ आगे बढ़ रहा था कांप रहा था कुछ ही पलों में उसका हाथ नंदिनी के कोमल गोल मटोल चूतड़ के करीब था, और वहीं रुक गया,

एक बार फिर से अंदर से आवाज आई कि लल्लू अभी भी समय है रुक जा ये पाप मत कर, अपनी सगी बहन के साथ ये सब करना महापाप है,

वहीं वासना ने भी उसे समझाया कि देख ले लल्लू सामने इतनी कामुक लड़की लेटी है आज तक तूने कभी ऐसा दृश्य नहीं देखा और न जाने कभी मौका मिले न मिले, भूलजा ये तेरी बहन है, और बस इसके मखमली बदन को देख, कितना कोमल है कितना सुंदर और कामुक है, इस मौके को अगर जाने दिया तो जीवन भर पछताएगा।

ये ही बात सोच कर बहुत सावधानी से लल्लू बहुत हल्के से अपना हाथ अपनी बहन के नंगे चूतड़ पर रख देता है, और स्पर्श होते ही उसके बदन में ऊर्जा का संचार सा हो जाता है उसे एक झटका सा महसूस होता है, उसका लंड इतना कड़क हो चुका था जितना आज तक नहीं हुआ था और पजामे में दुखने लगता है,

लल्लू का मुंह सूखने लगता है बार बार वो अपनी जीभ से होंठों को गीला करता है, साथ ही लंड की पीड़ा हर पल के साथ बढ़ती जा रही थी, वो बिना कुछ सोचे अपने पजामे को नीचे सरकाता हैं और अपने लंड को बाहर निकाल लेता है, लंड भी नंदिनी का बदन देख फुंकारने लगता है, लल्लू एक हाथ धीरे धीरे लंड पर चलाना शुरू कर देता है, वहीं दूसरा हाथ भी बहुत धीरे से नंदिनी के चूतड़ों पर फिराने लगता है पर बेहद सावधानी से, ऐसी उत्तेजना उसने आज तक महसूस नहीं की थी, अपनी बहन के चूतड़ों के स्पर्श मात्र से उसे लगता है जैसे उसका रस उसके लंड में भरने लगा है,

और होता भी कुछ ऐसा ही है, उसकी उत्तेजना बिल्कुल चरम पर होती है और वो कुछ बार मुठियांने पर ही स्खलन के करीब पहुंच जाता है, आनंद में उसकी आंखें बंद होने लगती हैं चेहरा ऊपर हो जाता है, एक हाथ को अपनी बहन के चूतड़ों पर फिराते हुए वो अपने स्खलन की ओर बढ़ने लगता है,

इसी पल नंदिनी की आंख भी खुलती है उसे अपने चूतड़ पर किसी का स्पर्श महसूस होता है तो वो गर्दन घुमा कर देखती है और अपने भाई को इस अवस्था में देख कर चौंक जाती है और तुरंत उठ कर बैठ जाती है, और कुछ करती या बोलती तब तक देर हो जाती है और लल्लू का लंड पिचकारी मारना शुरू कर देता है, और पहली पिचकारी सीधी उसके चेहरे से टकराती है तो दूसरी उसकी गर्दन पर और फिर तीसरी उसकी चूचियों पर,

नंदिनी आंखे फाड़े बुत सी बनी हुई देखती रहती है और उसका भाई उसे अपने रस में रंगता रहता है, झड़ने के बाद लल्लू हांफता हुआ अपनी आंखें खोलता है तो सामने का दृश्य देख उसके पैरों से धरती खिसक जाती है, सामने अपनी बड़ी बहन के जागा हुआ और अपने रस में सना हुआ देख लल्लू को अपना आखिरी समय लगने लगता है, झड़ने के बाद उत्तेजना का जादू वैसे भी सिर से उतर गया था और सच्चाई का बादल उसके सिर पर फट चुका था, अपने जीवन में वो शायद ही इतना डरा हो,

नंदिनी को तो विश्वास नहीं हो रहा था कि ये हुआ क्या है, उसके ऊपर उसके भाई का रस है, उसका भाई उसे देख कर अपना लिंग हिला रहा था। नंदिनी पल भर में ही गुस्से से भर गई,

नंदिनी: कुत्ते क्या कर रहा है तू ये।

लल्लू: दीदी वो दीदी मैं

लल्लू को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले, तो वो पजामा ऊपर चढ़ाता है और बाहर की ओर भागता है, नंदिनी बस गुस्से में उसे देखती रहती है, लल्लू किवाड़ के पास भाग कर पहुंचता है और उसी समय लता भी किवाड़ से अंदर घुसती है और दोनों आपस में टकरा जाते हैं, क्योंकि लल्लू की गति तेज होती है तो वो लता के ऊपर गिर पड़ता है जिससे लता भी पीछे गिर जाती है।

लता: अःह्ह्ह्, है हाय दैय्या मार डाला, ओह मेरी कमर गई, ऊंट कहीं का,

लल्लू तुरंत उठता है अपनी मां के ऊपर से और घबरा कर उसे भी उठने की कोशिश करने लगता है,

लल्लू: मां तुम ठीक तो हो न लगी तो नही?

लता: नाशपीटे अंधे सांड की तरह आकर टक्कर मार दी और बोला है लगी तो नहीं कमीने कहां अंधों की तरह भाग रहा था,

अब लल्लू क्या बोलता उसकी ये सोच फट रही थी कि कहीं मां ने अंदर जाकर दीदी को उस हालत में देख लिया और दीदी ने बता दिया कि उसने क्या किया तो वो तो गया,

लल्लू: वो मां मैं तो वो मैं तुम्हें ही ढूंढ रहा था,

लता: आह्ह्हह मुझे क्यों?

लल्लू: वो पापा ने वो हां चाय हां चाय मंगाई थी खेत पर।

लल्लू ने अपनी मां को सहारा देकर उठते हुए कहा,

लता: अरे तो नंदिनी से बनवा लेता ना वो क्या कर रही है,

लल्लू: वो मां दीदी तो मां वो दीदी,

लता: अरे क्या मैं वो दीदी कर रहा है, चल अंदर।

लल्लू की ये सोच कर फटने लगी कि अंदर दीदी की हालत देख कर उसकी मां उसे आज मार डालेगी,

लल्लू: मां चोट लगी है तो चलो वो बाबा से दवाई ले आते हैं।

लता: अरे रहने दे इतनी भी नहीं लगी है गरम तेल से मालिश करूंगी हो जायेगा ठीक।

लता अंदर की ओर जोर डालने लगी तो लल्लू को भी न चाहते हुए लता को सहारा देते हुए अंदर चलना पड़ा, हर कदम पर लल्लू के मन में प्रार्थना चल रही थी, अंदर घुसते ही लल्लू ने देखा आंगन में तो नंदिनी नहीं थी लल्लू ने धीरे धीरे ले जा कर लता को आंगन में पड़ी खाट पर बिठा दिया।

लता: अब ये नंदिनी कहां गई? बुला तो?

लल्लू ये सुनकर डरते हुए आवाज देने लगा,

लल्लू: दीदी ओ दीदी।

कुछ ही पल में कमरे से नंदिनी निकली जिसे देख लल्लू को थोड़ी हैरानी हुई और चैन भी आया क्योंकि नन्दिनी ने कपड़े पहने हुए थे और उसका चेहरा भी साफ था मतलब उसका रस नहीं लगा था,

नंदिनी: क्या हुआ मां कमर में ऐसे क्यों पकड़ी हुई है?

नंदिनी ने पास आते हुए कहा,

लता: ये है न सांड भागते हुए मुझसे द्वार पर टकरा गया, गिरा दिया मुझे।

नंदिनी: इसकी हरकतें तो बस बढ़ती ही जा रही हैं सारे काम ऐसे ही करता है ये मां।

नंदिनी ने लल्लू को गुस्से से घूरते हुए कहा तो लल्लू की तो हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी आंखों में देख सके इसलिए आँखें झुका के बैठा रहा,

लता: अरे वो चाय चढ़ा दे तेरे पापा ने खेत पर मंगाई है वही लेने आया था ये,

नंदिनी: अभी चढ़ाती हूं,

नंदिनी ने एक बार और लल्लू को गुस्से से देखा और फिर चूल्हे की ओर बढ़ गई।

छोटू सुबह जब उठा तो बिस्तर पर अकेला था आंखें मल के बैठ गया और कुछ पल लगे उसे नींद की चादर से निकलने में, धीरे धीरे नींद हटी तो उसे रात की बातें याद आने लगी वो सब जो उसने अपनी मां के साथ किया, उसे याद आने लगा, और उसकी धड़कनें तेज होने लगीं,उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि रात में उसके और उसकी मां के बीच इतना कुछ हो गया, एक तरफ सोच कर उसे बुरा भी लग रहा था कि ये सब पाप उससे हो गया, वहीं उसने नीचे देखा तो खड़ा लंड पाया जो कि इस बात की गवाही दे रहा था कि जो हुआ उसे बहुत अच्छा लगा था,

छोटू ने भी ये बात सच्चाई से सोची और उसने भी पाया कि सच में रात जैसा आनंद उसे कभी नहीं आया था, भले ही अपनी मां के साथ उसने ये सब किया था पर मज़ा सच में बहुत आया था फिर स्वयं ही वो रुक कर सोचने लगा, शायद मां के साथ किया इसलिए ही और आनंद आया, और आए भी क्यों न मां कितनी सुंदर है कितनी कामुक है, कितना भरा हुआ बदन है, उनका बदन तो दुकान वाली चाची से भी ज़्यादा मस्त है।

मन में रात जो हुआ उसे लेकर उसे एक गुदगुदी सी हो रही थी, जैसे किसी बच्चे को कोई पसंद का खिलौना मिल जाए तो वो कैसे खुश हुआ फिरता है वही अवस्था अभी छोटू की हो रही थी, रात में इतना सब हो गया था कि उसकी खुशी उससे संभाले नहीं संभल रही थी, पर बात कुछ ऐसी थी कि किसी को बता भी नहीं सकता था, खुशी खुशी में ही उसने कपड़े पहने और सोचने लगा चलो दोनों यारों से मिलता हूं ज़रूर दोनों सुबह सुबह चूतड़ देखने का जुगाड़ लगा रहे होंगे।

ये सोच कर छोटू घर से निकलता है और सबसे पहले लल्लू के घर की ओर बढ़ जाता है द्वार पर पहुंच कर किवाड़ खुले हुए देखता है तो अंदर बढ़ने से पहले उसे कल जो उसके और लता ताई के बीच हुआ वो याद आता है और सोचने लगता है कहीं ताई गुस्सा तो नहीं होंगी?

पर क्यों होंगी? मेरी क्या गलती थी, वैसे भी आज छोटू का आत्मविश्वास कुछ अलग ही था, आखिर मां का ऐसा प्रेम पाकर किस बेटे का आत्मविश्वास नहीं बढ़ेगा, वहीं उसका औरतों को देखने का भाव थोड़ा बदल गया था, वो मन में सोच रहा था कि औरत से डर कर नहीं पास जाकर ही असली सुख की प्राप्ति हो सकती है, आखिर रात मां के साथ भी तो वही हुआ, वैसे भी अपनी मां के साथ यदि मैं इतना कुछ कर सकता हूं तो ताई के साथ क्या ही ज़्यादा हुआ था।

इतना सोचते हुए वो अंदर घुस गया देखा आंगन खाली था, तो उसने आवाज लगाई: लल्लू ओ लल्लू।

अंदर से लता की आवाज़ आई: लल्लू नहीं है घर कौन छोटू, अंदर आ जा लल्ला।

लता घर पर अकेली ही थी लल्लू चाय लेकर चला गया था और नंदिनी नीलम के साथ खेत की ओर निकल गई थी।

छोटू लता की आवाज़ सुन थोड़ा सकुचाया पर फिर अपनी बातें याद कर अंदर बढ़ गया, लता चूल्हे के पास बैठी थी, छोटू भी उसके पास जाकर बैठते हुए बोला: लल्लू कहां है ताई?

लता भी थोड़ा सोच में पड़ी लल्लू को देख कल की बातें याद कर साथ ही ये सोच कि क्या सच में इस पर उदयभान की लुगाई का साया है, जिस तरह से ये बिल्कुल आराम से बात कर रहा है लगता नहीं कल की बात से कुछ अंतर पड़ा है लता ये ही सोच में पड़ी हुई थी।

छोटू: क्या हुआ ताई कहां खोई हो?

लता: लल्लू खेत गया है लल्ला, रात से तेरे ताऊ और बाबा खेत काट रहे हैं तो वो भी रात से उन्हीं के साथ था।

छोटू: अरे वाह अपना लल्लू भी आज कल मेहनत कर रहा है कितना अच्छा है।

लता: हां पर काहे का अच्छा, सुबह सुबह ही मेरी कमर तोड़ दी कमीने ने।

छोटू: अरे ऐसा क्या हो गया? क्या हुआ ताई तुम्हारी कमर में?

लता: ये लल्लू है न बिल्कुल अंधे सांड की तरह भागता है, पता नहीं कैसे सुबह भाग रहा था द्वार पर मुझसे टकरा पड़ा और मुझे गिरा दिया.

छोटू: अरे रे ताई, ज़्यादा लग गई क्या?

लता: हां लल्ला कमर में और कूल्हे में लगी है चलने में भी दिक्कत हो रही है, उसी के लिए तो तेल गरम किया है।

लता ने तेल की कटोरी की ओर इशारा करते हुए कहा,

छोटू: हां ताई इससे मालिश से आराम पड़ेगा।

लता: हां लल्ला अब इसी का सहारा है, अह्ह हाय दैय्या उठते भी नहीं बनता अब तो,

छोटू: आओ ताई मैं उठाता हूं,

ये कहकर छोटू सहारा देकर लता को उठाता है, और उसके एक ओर आकर उसे अपने कंधे से सहारा देता है और अपने हाथ से लता को पकड़ने के लिए उसकी कमर पर रख देता है, लता की गदराई कमर हाथ में महसूस कर छोटू को सिहरन होती है वहीं लता को भी कुछ अलग सा अहसास होता है,

छोटू लता को सहारा देते हुए अंदर कमरे में ले जाकर खाट पर बिठा देता है।

लता: अह्ह अच्छा हुआ तू आ गया लल्ला नहीं तो मुझसे तो उठा ही नहीं जाता।

छोटू: अरे ताई इसमें क्या है, मैं तुम्हारी सेवा नहीं करूंगा तो कौन करेगा।

लता को आज छोटू की बातों में अलग ही आत्मविश्वास दिखाई दे रहा था

लता: ये तो सही कहा लला, अब हमें तो तुम बच्चों का ही सहारा है, एक तेरा दोस्त है जो चोट देकर चला गया और एक तू है जो सहारा दे रहा है।

छोटू: अरे ताई क्यों ऐसे बोलती हो, मैं भी तो तुम्हारा अपना हूं, अच्छा बताओ मालिश करूं तुम्हारी कमर की?

लता उसके इस प्रश्न से थोड़ा चौंकती है।

लता: अरे नहीं लल्ला तू रहने दे मैं कर लूंगी।

छोटू: कैसे कर लोगी ताई तुम्हारा हाथ पीछे कैसे पहुंचेगा।

लता ने भी सोचा ये कह तो सही रहा है बिना हाथ पहुंचे कैसे लगाऊंगी।

लता: अच्छा ठीक है तू कह रहा है तो लगा दे।

छोटू: ठीक है ताई तुम उधर घूम जाओ,

लता उसकी बात सुन कर अपनी पीठ उसकी ओर करके घूम कर बैठ जाती है, छोटू उसके पीछे आकर अपनी उंगलियों को तेल की कटोरी में डुबाता है और फिर अंगुलियों में तेल लेकर अपने दोनों हाथों पर मल कर हाथ आगे बढ़ा कर लता की पीठ पर जो साड़ी और ब्लाउज़ के बीच की जगह थी उस पर रखता है तो पल भर के लिए दोनों के बदन में ही एक सरसरी सी होती है, छोटू अपनी उंगलियां और हथेली का प्रयोग करके लता की पीठ पर तेल मलने लगता है और मालिश करने लगता है, जिससे लता को भी आराम मिलता है, छोटू अपनी पूरी कोशिश करता है लता को आराम पहुंचाने की।

पीठ के हिस्से की अच्छे से मालिश करने के बाद छोटू और तेल उंगलियों पर लेता है और उसे हाथों पर चुपड़ने के बाद फिर से लता की कमर पर लगाता है पर इस बार पीठ के बीच में नहीं बल्कि उसकी कमर की दोनों ओर, लता को अपनी कमर पर छोटू का हाथ का स्पर्श पाकर फिर से एक सिरहन होती है वहीं छोटू अपने हाथों में ताई की चिकनी कमर का स्पर्श पाकर उत्तेजित होने लगता है पजामे में उसका लंड सिर उठाने लगता है।

वो धीरे धीरे लता की कमर को मसलते हुए मालिश करने लगता है।



जारी रहेगी।
 
आप सभी को जैसा कि ज्ञात है वर्ष का सबसे बड़ा त्यौहार है तो इसमें समय निकालना बहुत मुश्किल हो रहा है, इसलिए अगला अध्याय दीपावली के बाद ही आने की संभावना है, संयम बनाए रखें, और त्यौहार की खुशी मनाएं।

धन्यवाद।
 


सभी को दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं
 
अध्याय 12
पीठ के हिस्से की अच्छे से मालिश करने के बाद छोटू और तेल उंगलियों पर लेता है और उसे हाथों पर चुपड़ने के बाद फिर से लता की कमर पर लगाता है पर इस बार पीठ के बीच में नहीं बल्कि उसकी कमर की दोनों ओर, लता को अपनी कमर पर छोटू का हाथ का स्पर्श पाकर फिर से एक सिरहन होती है वहीं छोटू अपने हाथों में ताई की चिकनी कमर का स्पर्श पाकर उत्तेजित होने लगता है पजामे में उसका लंड सिर उठाने लगता है।

वो धीरे धीरे लता की कमर को मसलते हुए मालिश करने लगता है। अब आगे...

छोटू: आराम मिल रहा है ताई?

छोटू ने लता की मांसल कमर को मसलते हुए कहा,

लता: अह्ह बहुत आराम है लल्ला, तेरे हाथों ने तो कमाल कर दिया,

छोटू: बस थोड़ी देर में सारा दर्द गायब हो जाएगा ताई बस देखती जाओ।

ये कहते हुए छोटू ने अपनी उंगलियां लता की मांसल गदराई कमर में गड़ा दीं,

लता: हां लल्ला तू करता रह,

वैसे ध्यान देने वाली बात ये थी कि चोट तो पीछे पीठ के निचले हिस्से पर लगी थी पर छोटू अब उसे छोड़ कर लता की कमर को मसल रहा था, और लता उसे रोक भी नहीं रही थी, उसकी वजह थी लता को छोटू के हाथों का स्पर्श बहुत भा रहा था, लता मन ही मन सोच रही थी: ये मुझे क्या होता जा रहा है क्यों मैं अपने बदन को नियंत्रण में नहीं रख पाती, रात को अपनी बेटी के साथ इतना कुछ किया और अब ये छोटू में न जाने क्या है कल भी इसके साथ इतना कुछ कर गई और आज भी इसे रोकने की जगह इसको और उत्साहित कर रही हूं,

इधर छोटू के लिए ये सब नया था और उत्साहित करने वाला भी, उसका आत्मविश्वास आसमान को छू रहा था, रात को अपनी मां के साथ इतना कुछ करने से उसे लग रहा था कि वो बेकार में इतना डरता था, औरतें भी उतनी ही गरम होंती हैं जितने मर्द, ऐसा नहीं होता तो उसकी मां उसके साथ ऐसा क्यों करती, कल ताई उसका लंड क्यों मुठियाती।

ये ही आत्मविश्वास लिए उसकी हिम्मत भी बढ़ती जा रही थी, वो खिसक कर और आगे हो गया और पीछे से लता से चिपक गया, उसका सीना लता की पीठ से टकराया तो लता के तो बदन में मानो बिजली सी दौड़ गई, उसकी चूत फिर से गीली होने लगी, इधर छोटू ने अपने हाथों को और आगे बढ़ा कर लता के पेट तक ले जाना शुरू कर दिया और अब कमर के साथ साथ लता के गदराए पेट को भी मसलने लगा, लता का पेट भी कुछ ही पलों में उसकी कमर की तरह ही तेल से चिकना हो गया, जिस वजह से छोटू को और मजा आ रहा था लता के पेट को मसलने और सहलाने में,

लता के मुंह से न चाहते हुए भी हल्की हल्की सी सिसकियां निकल रहीं थी, जो कि छोटू के कानों में पड़ रहीं थी और उसका उत्साह बढ़ा रहीं थीं, छोटू का लंड भी पजामे में पूरी तरह से कड़क हो चुका था, पर अभी छोटू को लता के पेट को मसलने में जो आनंद मिल रहा था वो उसे छोड़ना नहीं चाह रहा था, इसीलिए लगातार पेट को मसल रहा था, पर इस आनंद को वो ज़्यादा देर तक नहीं ले पाया क्योंकि कुछ पल बाद ही किवाड़ों के खुलने की आवाज़ आई तो लता चौंक कर उठ गई और अपनी साड़ी को अपने सीने पर डाल कर अपनी हालत ठीक करने लगी, छोटू ने भी अपने तने लंड को नीचे की ओर कर दिया ताकि दिखे न,

दोनों कमरे से बाहर आए तो देखा आंगन में मगन, लल्लू और कुंवर पाल घुस रहे हैं, लल्लू ने छोटू को देखा तो तुरंत बोला: तू कब आया?

छोटू: थोड़ी देर हो गई, मैं ताई की सेवा कर रहा था।

छोटू ने मुस्कुराते हुए ये लता की ओर देख कर कहा, लता की नजरें भी पल भर को उससे मिली, और उसके कहने के तरीके से ही लता को बदन में सिहरन सी हुई, छोटू और लल्लू एक ओर जाकर बात करने लगे, दोनों के ही मन में बहुत कुछ था पर एक दूसरे से कह नहीं सकते थे, लल्लू के मन में उसके और उसकी बहन के बीच जो हुआ वो चल रहा था तो छोटू अपने और अपनी मां के साथ साथ लल्लू की मां के साथ की घटनाएं याद कर खुश हो रहा था,

लता घर के काम में लग चुकी थी, मगन और कुंवर पाल को भी नहाना था, लल्लू और छोटू एक दूसरे के साथ बातों में लगे थे।

दूसरी ओर नंदिनी अपनी सहेली नीलम के साथ खेत में जा रही थी, उसके दिमाग में जो कुछ रात में हुआ वो और फिर थोड़ी देर पहले उसके और लल्लू के बीच जो हुआ वो सब घूम रहा था, उसे लल्लू पर गुस्सा भी आ रहा तो साथ ही इन सभी नई घटनाओं को सोचकर एक उत्साह और उत्तेजना भी हो रही थी, खेत में पहुंच कर दोनों हमेशा की तरह अपनी अपनी सलवार का नाड़ा खोल कर सलवार नीचे सरका कर एक दूसरे के बगल में बैठ गए, नीलम इधर उधर की बातें कर रही थी पर नंदिनी का ध्यान कहीं और ही था अपनी मां के बदन के साथ रात में खेल कर उसके मन में अपने अलावा दूसरी औरतों के बदन को लेकर एक नई जिज्ञासा जाग गई थी, हर किसी को वो एक नई नज़र से देख रही थी, और वही नई नज़र उसने अपनी बचपन की सहेली नीलम पर भी डालनी चाही, पर क्यों कि दोनों अगल बगल बैठती थीं, तो नंदिनी को नीलम का एक चूतड़ वो भी उसका थोड़ा सा ही हिस्सा नंगा नज़र आ रहा था, नंदिनी के मन में नीलम के अंग देखने की जिज्ञासा जागने लगी, नीलम तो लगातार बातों में लगी थी, और नंदिनी बस उसकी बातों पर हम्म ह्म्म्म किए जा रही थी,

इसी बीच नंदिनी ने कुछ सोचा और अपना लोटा लेकर उठी और कुछ कदम पीछे होकर बैठ गई,

नीलम: अरे क्या हुआ कहां भागी जा रही है?

नंदिनी: अरे कुछ नहीं बहन कांतर(कीड़ा) थी।

नीलम: हाय दैय्या, किधर?

नंदिनी: अरे यहीं थी मेरे पैरों के पास।

नीलम: मैं भी चली इधर से,

ये कह नीलम अपना लोटा उठती है तो नंदिनी को अपनी योजना असफल होती दिखी पर नीलम उठ कर उसके बगल में नहीं बैठी बल्कि घूम कर उसकी ओर मुंह कर बैठ गई, जो कि जो नंदिनी ने भी सोचा था उससे भी अच्छा हो गया, क्योंकि अब उसकी ठीक आंखों के सामने नीलम की कुंवारी चूत थी, और चूत क्या एक पतली सी फांक थी जिसके होंठ एक शर्मीली दुलहन के होंठों की तरह बिल्कुल बंद नजर आ रहे थे,

नंदिनी तो टक टकी लगाकर अपनी सहेली की चूत को देखने लगी,

नीलम की भी नजर जब नंदिनी के चेहरे पर पड़ी तो उसने उसे अपनी चूत को देखते पाया, एक पल को तो नीलम को गुस्सा भी आया और वो कुछ बोलने ही वाली थी कि उसकी स्वयं की आँखें भी नीचे होकर नंदिनी की चूत पर टिक गईं, नीलम के लिए भी नंदिनी की चूत पहली थी अपने अलावा जिसे वो देख रही थी, नंदिनी की चूत पर नज़र पड़ते ही नीलम चुप हो गई और वो भी कुछ पल तो लगातार नंदिनी की चूत को ही देखती रही, उसने देखा कि नंदिनी की चूत उसकी चूत से दिखने में अलग थी पर सुंदर थी,

इसी बीच नंदिनी ने एक बार अपनी नज़र उठा कर नीलम के चेहरे को देखा तो उसे अपनी टांगों के बीच देखते पाया, ये देख नंदिनी के चेहरे पर मुस्कान आ गई, नीलम को भी ये आभास हुआ कि वो लगातार नंदिनी की चूत को देख रही है तो उसने अपनी नज़र हटाई और उसके चेहरे की ओर देखा तो दोनों की नज़रें मिल गईं, नंदिनी उसकी ओर देख कर बेशर्मी से मुस्कुरा रही थी,

नंदिनी: देख ली या और अच्छे से दिखाऊं?

नीलम नंदिनी की बात समझ कर बुरी तरह झेंप गई

नीलम: धत्त वो तो तू तू भी तो मेरी देख रही थी इसलिए मेरी नज़र चली गई।

नंदिनी: अरे तो क्या हो गया मैं तो कह रही हूं अगर देखना हो अच्छे से तो बता और अच्छे से दिखा दूंगी। सहेली ही तो सहेली के काम आएगी।

नीलम: हट कमीनी, कितनी गंदी बातें करती है तू।

नंदिनी: अरे इसमें गंदा क्या है, जो तेरे पास है वही मेरे पास है, तो इसमें इतना शर्माना क्या?

नीलम: अच्छा माना दोनों के पास एक ही चीज है पर है तो हमारे गुप्तांग, उन्हें तो छुपा के ही रखना पड़ता है।

नीलम ने समझाते हुए कहा,

नंदिनी: अच्छा ऐसा किसने कहा?, सहेलियों में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए,

नीलम: ऐसा कुछ नहीं है।

नंदिनी: ऐसा ही है अच्छा जब तू नया सूट सलवार बनवाती है तो दिखाने लाती है कि नहीं,

नीलम: हां लाती हूं पर वो सूट सलवार होता है और ये..... ये...

नीलम ये कह चुप हो जाती है,

नंदिनी: ये चूत हैं, खुल के बोल न,

नीलम शर्म से अपना मुंह ढंक लेती है और मुंह बनाते हुए कहती है: सच में बहुत गंदी हो गई है तू, ज़रूर ये सब उस लफंगे सत्तू के साथ का असर है।

नंदिनी: अरे किसी का असर नहीं है, तू ही अम्मा बनी रहती है न जाने इतने संस्कार लेकर कहां जाएगी? चूत को चूत न बोलूं तो क्या बोलूं और सहेलियां आपस में ऐसे मज़ाक नहीं करेंगी तो कौन करेगा?

नंदिनी ने थोड़ा रूखे तरीके से बोला तो नीलम चुप हो गई और कुछ सोचने लगी, फिर धीरे से बोली: शायद तू सही कह रही है, सहेलियां ही तो आपस में मज़ाक करती हैं।

नंदिनी: वही तो मेरी लाड़ो, थोड़ा अपने आप को खोल, मज़े कर, हमेशा सही गलत में पड़ी रहेगी तो खुश नहीं रह पाएगी।

नीलम: ओहो देखो तो जानी अम्मा को

इस बात पर दोनों ही हंसने लगे, तब तक दोनों शौच निपटा चुके थे, और दोनों ने ही अपने अपने चूतड़ों को धोया और खड़े हो गए और खेत से बाहर निकल गए।

नंदिनी: क्या हुआ अब क्या सोच में पड़ी है?

नीलम: कुछ नहीं बस ऐसे ही।

नंदिनी: अब मुझे भी नहीं बताएगी।

नीलम: अरे बस वही सोच रही हूं कि मैं ज़्यादा सही गलत करती हूं क्या?

नंदिनी: हां करती तो है, और मैं ये नहीं कह रही कि ये गलत है, पर अभी हम जवान हैं ये उमर हमारी मज़े करने की है, अभी से अगर सिर्फ सही गलत करेंगे तो कुछ और नहीं कर पाएंगे।

नीलम: हां कह तो तू सही रही है,

नंदिनी: मैं तो हमेशा ही सही कहती हूं।

नीलम: हां हां दादी अम्मा।

दोनों हंसती हुई नल के पास आ जाती हैं जहां दोनों हाथ धोती हैं और फिर घर की ओर चल देती हैं, नंदिनी जैसे ही घर के द्वार पर पहुंचती है उसी समय घर से लल्लू और छोटू निकल रहे थे, लल्लू अपनी बड़ी बहन को देख कर मुंह नीचे कर लेता है वहीं नंदिनी उसकी ओर देखती है और मुंह बना कर अंदर चली जाती है।

छोटू: दीदी को क्या हुआ ये क्यों गुस्सा सी लग रही हैं।

लल्लू: कुछ कुछ नहीं यार पता नहीं कब किस बात पर गुस्सा हो जाती है।

छोटू: ये तो है ही, नीलम दीदी भी लगता है हमेशा गुस्से में ही रहती है।

दोनों बातें करते हुए आगे बढ़ जाते हैं, दूसरी ओर नदी के किनारे बैठ कर सत्तू चुदाई का जान बरसा रहा था और भूरा उसमें भीग रहा था,

सत्तू: तुझे बताऊं भूरा औरत में मर्द से ज़्यादा गरमी होती है, और जब औरत गरम होती है तो अच्छा खासा मर्द उसके आगे हल्का पढ़ जाता है।

भूरा: सही में सत्तू भैया? मैं तो सोचता था हमारे अंदर ही गरमी है सारी।

सत्तू: नहीं चेले, औरत का क्या है वो छुपाने में अच्छी होती है शर्माती है कभी खुल के नहीं कहती।

भूरा: पर ऐसा क्यों?

सत्तू: ऐसा इसलिए क्यूंकि अगर औरत खुल कर चुदाई की बातें या चुदाई करने लगे तो मर्द उसे रंडी का नाम दे देते हैं, क्योंकि गरम और खुली औरत को संभालना आसान नहीं होता, इसलिए समाज ने ही ऐसी धारणा बना दी और औरत को शर्म की बंदिशों में बांध दिया।

भूरा: सही में अब सही समझ आ रहा है सत्तू भैया। पर भैया एक और सवाल है।

सत्तू: पूछ पूछ आज सारे संशय मिटा ले।

भूरा: कोई भी औरत अपने पति को धोखा क्यों देती है, मतलब पति को छोड़ कर किसी और से क्यों चुदवाती है।

सत्तू: तगड़ा सवाल पूछा है तूने, इसका जवाब भी तू मुझे देगा.

भूरा: मैं मैं कैसे?

सत्तू: तुझे प्यास लगी हो और तेरे घर का नल पानी नहीं दे रहा हो तो क्या करेगा?

भूरा: बाहर के नल से पानी पियूंगा।

सत्तू: समझ गया?

भूरा थोड़ा सोचता है और फिर जब उसे समझ आता है तो उसकी आंखें चौड़ी हो जाती है और चेहरे पर बड़ी मुस्कान आ जाती है।

भूरा: सही में सत्तू भाई तुम तो गुरु आदमी हो यार।

सत्तू: सही समझा, जब औरत को घर पर वैसी रगड़ाई नहीं मिलती पति से तब वो बाहर वालों के लिए टांगे खोलती है, पर सुन ऐसा नहीं है कि तब भी वो किसी से भी जाकर चुद जाएगी, बोलेगी तब भी नहीं,

भूरा: अच्छा फिर?

सत्तू: फिर क्या, यहीं मर्द की नज़र परखी होनी चाहिए, जो औरत की प्यास को समझ लेता है, और जान जाता है कि ये औरत प्यासी है, वो फिर मलाई मारता है।

भूरा सत्तू के ज्ञान से हैरत में था और उसकी एक एक बात को अच्छे से समझ रहा था।

भूरा: पर भाई हर औरत ऐसी थोड़ी होती होगी।

सत्तू: हां हर औरत ऐसी नहीं होती, पर हर औरत, एक औरत तो होती है, और औरत है तो बदन की प्यास भी है, सिर्फ समय और कोशिश की बात है कुछ जल्दी तांगे खोल देती हैं कुछ थोड़ा नखरा करती हैं।

भूरा: ये बात तो सही कही भईया।

सत्तू: और बताऊं जो जितना नखरे करती है उसको चोदने में उतना ही मज़ा आता है।

भूरा: सही में सत्तू भैया, तुम्हारे पास तो चुदाई के ज्ञान का भंडार है।

सत्तू अपनी प्रशंसा सुनकर खुश होता है और ज्यादा भूरा पर अपने जान की छींटे मारता है।

दूसरी ओर गांव में ही अरहर के खेत में एक औरत घोड़ी बनी होती है और उसके पीछे एक आदमी उसकी साड़ी को उसकी कमर पर इकट्ठी करके पकड़े हुए उसके पीछे घुटनो पर बैठ कर औरत के मोटे मोटे चूतड़ों के बीच अपना लंड सटा सट अंदर बाहर कर रहा होता है, हर झटके पर जैसे ही आदमी की जांघें औरत के चूतड़ों से टकराती हैं तो उसके चूतड़ों में लहर उठ जाती, औरत के मुंह से लगातार अह्ह अह्ह की आवाज़ आ रही थी,

पीछे से चोदता हुआ आदमी भी सिसकियां लेते हुए फुसफुसा रहा था,

आदमी: अह्ह भाभी अह्ह्ह्ह क्या गजब की चूत है तुम्हारी, जितना भी चोद लो मन नहीं भरता अह्ह।

औरत: उहम्म ह्म्म्म अह्ह देवर जी जल्दी करो अह्ह कोई आ गया तो गड़बड़ हो जाएगी।

आदमी: कोई नहीं आएगा भाभी, आज तक कोई आया क्या?

औरत: अह्ह छोटू और उसके दोस्त यहीं घूमते रहते हैं देवर जी।

आदमी: अरे भाभी तुम वो सब छोड़ो और ये बताओ ये द्वार कब खुलेगा।

आदमी ने अपनी उंगली औरत की गांड के छेद पर घुमाते हुए कहा, तो औरत और सिहरने लगी, औरत को गरम देख आदमी ने अपनी उंगली थोड़ी थूक से गीली कर गांड के अंदर सरका दी, जिससे औरत मचल पड़ी,

औरत: अह्ह वहां नहीं, बाहर निकालो अह्ह।

आदमी: ओह भाभी अह्ह्ह्ह काहे बचाती फिरती हो इतनी मस्त गांड को एक बार इसकी भी सैर कर लेने दो,

औरत: न नहीं वहां अह्ह्ह्ह तो मैने कभी उनको भी नहीं छूने दिया,

आदमी: अरे कौनसा लंड घुसाया है उंगली ही तो डाली है इतना क्यों मचल रही है मेरी रांड भाभी, अह क्या मस्त गांड है तेरी छिनाल कुत्तिया, अह्ह।

आदमी ने उंगली को लगातार अंदर बाहर करते हुए कहा साथ ही चूत में लंड लगातार अंदर बाहर हो ही रहा था, औरत भी दोहरे हमले साथ ही अपने लिए गालियां सुन कर खुद की उत्तेजना को संभाल नहीं पाई और थर्राते हुए झड़ने लगी, उसका बदन कांपने लगा और वो आगे गिर गई, लंड चूत से निकल गया, आदमी के लिए भी ये चरम का ही समय था उसके लंड ने भी पिचकारी छोड़ना शुरू कर दिया जो कि औरत के चूतड़ों को भिगाने लगी, एक के बाद एक रस की धार औरत के मोटे चूतड़ों पर गिर रही थी, जो कि खुद नीचे औंधी पड़ी हुई मचल रही थी। झड़ने के बाद दोनों ही जल्दी जल्दी से अपने अपने कपड़े सही करते हैं और पहले औरत एक तरफ से निकल जाती है और आदमी दूसरी ओर से।

दोपहर का समय हो चुका था घर के सारे मर्द बाहर निकल गए थे, नीलम भी नंदिनी के साथ कढ़ाई सीखने गई थी घर पर सिर्फ जेठानी और देवरानी साथ ही उनकी सास थी, यानी पुष्पा, सुधा और फुलवा।

फुलवा तो खाट पर लेटी हुई झटकी मार रहीं थी दोनों बहुएं पटिया पर बैठीं कपड़े धो रही थीं। पुष्पा अभी भी उसी ग्लानि और सोच में थी जो कुछ रात में उसके और उसके बेटे के बीच हुआ था, वहीं सुधा भी अपनी जेठानी को सोच में देख रही थी, सुधा को लग रहा था कि जेठानी अभी भी उनके बीच जो हुआ उस वजह से मुंह बनाए हुए हैं।

सुधा: दीदी ओ दीदी।

पुष्पा: हां? हां हां क्या हुआ?

सुधा: दीदी मुझे पता है तुम परेशान हो उस बात को लेकर पर ऐसे कब तक चलेगा। कब तक हम ऐसे ही रहेंगे?

पुष्पा: मतलब? कौन कौनसी बात?

सुधा: वही जो हमारे बीच हुआ, जानती हूं वो सही नहीं था, पर उस वजह से कब तक हम एक दूसरे से बात नहीं करेंगे, हमें जीवन भर साथ रहना है तो कुछ तो तरीका निकालना पड़ेगा ना।

सुधा ने अपनी बात रखते हुए कहा।

पुष्पा उसकी बात सुन सोचने लगी: बेचारी को लग रहा है मैं इस वजह से परेशान हूं, पर नहीं जानती कि मुझसे कितना बड़ा पाप हुआ है, पर इन सब में इसकी क्या गलती, ये सही कह रही है एक ये ही तो है जिससे अपने मन की बात कर पाती हूं, इससे भी बात नहीं होगी तो मैं सोच सोच कर बावरी हो जाऊंगी।

पुष्पा: वो बात नहीं है, मैं बस ऐसे ही चुप थी, उस बात को लेकर नहीं।

सुधा: मतलब तुम मुझसे गुस्सा नहीं हो,

पुष्पा: धत्त तुझसे भी गुस्सा हो सकती हूं मैं? तू मेरी छोटी बहन, सहेली सब कुछ है।

ये सुनकर सुधा खुश हो गई,

सुधा: अरे दीदी ये सुनकर बड़ा अच्छा लग रहा है मन कर रहा है तुम्हारी पुच्ची ले लूं।

पुष्पा: ले ले किसने रोका है।

सुधा ने आगे हो कर पुष्पा का गाल चूम लिया। और दोनों हंसने लगीं।

सुधा: अरे दीदी तुमने तो मेरे मन का भार हल्का कर दिया पता है तुमसे बात नहीं होती तो मेरा मन परेशान रहता है।

पुष्पा: मेरे साथ भी ऐसा ही है बहना।

सुधा: अच्छा दीदी एक बात पूछूं?

पुष्पा: हां बोल न।

सुधा: तो हम जो हुआ हमारे बीच उस बारे में बात कर सकते हैं या बुरा सपना समझ कर भूल जाना है।

पुष्पा: उसे भूलना इतना आसान नहीं है, वैसे सच कहूं तो भूलना ही कौन चाहता है।

इस पर दोनों तेजी से हंसने लगीं, पुष्पा को भी अपनी चिंता छोड़ कर कुछ पल सुधा के साथ हंसी के बिताना अच्छा लग रहा था, इधर फुलवा की नींद तो पहले ही खुल गई थी वो बस खाट पर लेटी हुई छप्पर को निहारते हुए बस जो कुछ हुआ था उसके बारे में सोच रही थी, तभी उसे अपनी बहुओं के खिलखिलाने की आवाज आई। यहां घर पर कोई समस्या न आए उसके लिए मैं परेशान हूं, उस चक्कर में न जाने किसी से चुदवा भी बैठी, सोच सोच कर ही मेरा सिर घूम रहा है और इन दोनों की हंसी ठिठोली चल रही है अभी बताती हूं।

फुलवा: अरे कपड़े धुल गए हों तो कोई एक इधर आओ।

सुधा: लो हम इतनी तेज हंसे क्या कि अम्मा भी उठ गई।

पुष्पा: उठ भी गईं और बुला भी रही हैं।

सुधा: जाऊं मैं?

पुष्पा: नहीं तू रुक मैं पूछ आती हूं,

पुष्पा हाथ धोकर अपनी सास के पास जाकर बोली: हां अम्मा क्या हुआ?

फुलवा: हुआ का, सिर पिरा रहा है थोड़ा मालिश कर दे।

पुष्पा: हां अम्मा अभी तेल लाई मैं।

पुष्पा जल्दी से तेल लेकर आती है और फुलवा के सिर की मालिश करने लगती है फुलवा को भी आराम मिलता है

पुष्पा: कैसा लग रहा है अम्मा?

फुलवा: आराम मिल रहा है बहुरिया, मालिश अच्छी करती है तू।

पुष्पा: तुम्हें आराम मिलना चाहिए अम्मा ।

फिर फुलवा को जैसे कुछ ध्यान आता है तो कहती है: क्यों बहुरिया जब हमने तुझसे कहा था रात को लल्ला के साथ ही सोना है तो तू नीचे क्यों सो रही थी।

इस सवाल से पुष्पा थोड़ा घबरा जाती है साथ ही उसे फिर से वो सब ध्यान आने लगता है

पुष्पा: वो अम्मा मैं साथ ही सोई थी रात भर पर खाट न बहुत छोटी है दो लोग उस पर आ ही नहीं रहे थें

फुलवा: हां खटिया छोटी तो है अब तो लल्ला भी बड़ा हो गया है ना।

पुष्पा: हां अम्मा बड़ा तो बहुत हो गया है,

पुष्पा ने ये जवाब दिया तो उसकी आंखो के सामने छोटू का कड़क लम्बा लंड आ गया और उसे फिर से अपनी चूत नम होती महसूस हुई।

फुलवा: एक काम कर बहु फिर दो चार दिन तुम दोनों कमरे में ही सो जाओ। वहां तो कोई परेशानी नहीं होगी?

पुष्पा: ठीक है अम्मा कमरे में ही सो जाएंगे।

अब पुष्पा चाहती तो मना करना था पर अपनी सास को कैसे बोलती इसलिए न चाहते हुए भी हां करनी पड़ी। खैर सिर की मालिश करके बापिस घर के कामों में लग गई दोनों देवरानी जेठानी एक दूसरे से बातें करते हुए सारे काम निपटाती गईं।

सूरज ढल रहा था और तीनों बूढ़े एक चबूतरे पर बैठे चिलम पी रहे थे,

सोमपाल: अरे बहुत दिन हो गए ताड़ी मुंह से नहीं लगी, सुभाष से मंगवानी पड़ेगी।

कुंवर पाल: अरे मंगवाने की जरूरत नहीं है घर पर रखी है।

सोमपाल:अरे फिर मंगा, कोई लड़का दिख रहा है का? अरे ये रहा राजेश ओ राजेश इधर आ।

राजेश: हां बाबा का हुआ?

कुंवरपाल: अरे घर चला जा और अपनी ताई से ताड़ी की डोलची मांग कर ले आ।

राजेश: अरे बाबा तुम भी न इस उमर में नशा करोगे।

सोमपाल: जा चुपचाप, जितना कहा जाए उतना कर बढ़ो से मुंह नहीं लड़ाते।

राजेश: तुम भी बाबा मान जाओ फिर तबीयत खराब होती है तुम्हारी।

सोमपाल: जा रहा है कि निकालू डंडा?

राजेश: जा तो रहा हूं। देखना अम्मा से कहूंगा तुम पियो आज। राजेश ये कह कर भाग जाता है।

सोमपाल: देख रहे हो नाती पोते को समझा रहा है।

कुंवरपाल: अपने बाप के बाप को ज्ञान दे रहा है।

इस पर तीनों तेजी से हंसने लगते हैं, कुछ ही देर में राजेश डोलची और तीन गिलास लेकर आ के रख देता है

राजेश: लो तुम्हारी ताड़ी, और बाबा ताई ने कहा है डोलची और गिलास खो मत देना।

कुंवरपाल: हां भाई नहीं खोएंगे, अब जा तू।

प्यारेलाल: अरे तुम दोनों ही पियो ताड़ी पीकर मेरा पेट खराब हो जाता है।

सोमपाल: अरे यार कुंवरपाल देख इसने फिर रोना शुरू कर दिया।

कुंवरपाल: कुछ नहीं होगा प्यारे पीले।

प्यारेलाल: पिछली बार पी थी तो बड़ी तकलीफ हुई थी अगले दिन तक पेट में पीर रही थी।

सोमपाल: अच्छा बस इतनी सी तकलीफ है मेरे पास पुड़िया है बाबा की, मेरे भी पेट दर्द की समस्या रहती है, घर जाकर गुनगुने पानी से पी लियो।

कुंवरपाल: ले हो गया इलाज। अब तो पियेगा?

प्यारेलाल: अब तुम बिना पिलाए मानोगे कहां?

इस पर तीनों ठहाका लगा कर हंसते हैं और फिर ताड़ी चलने लगती है, पीते पीते बातें करते हुए अंधेरा हो जाता है तब जाकर खत्म होती है।

प्यारेलाल: चलो भाई अंधेरा हो गया अब चलें घर।

सोमपाल: हां हां चलो नहीं तो तुम्हारी भाभी आज बच्चों के सामने सुनाने लग जाएगी।

कुंवरपाल: ठीक है लाओ भाई डोलची और गिलास समेत लूं नहीं तो हमें भी सुननी पड़ेगी।

इस पर तीनों एक बार फिर से हंसे।

प्यारेलाल: अरे सोमपाल, वो पुड़िया तो दो नहीं तो रात में कहीं तकलीफ हुई तो कहां भागता रहूंगा।

सोमपाल: अरे हां ये ले। खाना खा कर पानी के साथ पी लेना।

सोमपाल ने पुड़िया देते हुए कहा, प्यारेलाल पुड़िया लेकर चल दिया तो कुंवरपाल और सोमपाल भी अपने घर की ओर चल दिए, और प्यारेलाल के थोड़ा दूर जाते ही सोमपाल हंसी दबा कर हंसने लगा।

कुंवरपाल: क्या हो गया हंस क्यों रहा है?

सोमपाल: प्यारेलाल का सोच कर।

कुंवरपाल: ऐसा क्या हो गया।

सोमपाल: बेचारा पेट लिए पुड़िया खाएगा और होगा कुछ और।

कुंवरपाल: मतलब, वो पुड़िया पेट की पीर की नहीं है?

सोमपाल: अरे नहीं यार वो हल तैयार करने वाली पुड़िया है जुताई के लिए।

कुंवरपाल उसकी बात समझते हुए तेजी से हंसने लगा: अरे भेंचो, तेरी आदत नहीं सुधरी बालपन से ही उसके साथ मज़ाक करने की।

सोमपाल: अरे तुझे पता है न कितना वहमी है वो, अगर पुड़िया की नहीं बोलता न तो मन होने के बाद भी नहीं पीता।

कुंवरपाल: ये तो सही कहा धी का लंड है तो इसी लायक, पर अब रात को इसका हल तैयार हो गया तो क्या करेगा? बेचारे के पास खेत तो है नहीं।

सोमपाल: तभी तो मजा आएगा, रात भर तड़पेगा ससुरा।

कुंवरपाल: चल अब हम भी चलें खोपड़ी घूम रही है।

सोमपाल: हां हां चल सही कह रहा है।

दोनों भी अपने अपने घर की ओर बढ़ जाते हैं।

तीनों घरों में खाना बन चुका था और खाया जा चुका था, और रोज़ की तरह बिस्तर लगाए जा रहे थे, इसी बीच पुष्पा की परेशानी बढ़ती जा रही थी, कल जो कुछ हुआ उससे वो पहले से ही परेशान थी, और आज अम्मा ने कह दिया था कि वो और छोटू कमरे में सोएंगे, उसे समझ नहीं आ रहा था कैसे अपने बेटे का सामना करेगी जिससे सुबह से ही वो नजर बचाती आई थी। पर मना करे तो कैसे करे। क्या कारण दे, अगर कुछ कहती है तो अम्मा के भड़कने का डर भी था,

रसोई में सबके लिए दूध निकालते हुए उसका दिमाग इसी सब में लगा हुआ था, इतने में बर्तन धो कर सुधा पीछे से आई,

सुधा: अरे कर दिया दूध दीदी?

पुष्पा: हां सबके लिए निकाल दिया है,मैं राजेश और बाबा को देकर आती हूं तू तब तक लल्ला के लिए एक गिलास में दवाई घोल दे पुड़िया में से। और अपना और नीलम का ले लियो।

सुधा: ठीक है दीदी, कहां रखी है पुड़िया?

पुष्पा: वो ऊपर डिब्बे में।

पुष्पा बता कर दोनों दूध के गिलास लेकर चबूतरे पर अपने ससुर और भतीजे को दूध देकर आती है तब तक सुधा भी अपना और नीलम का दूध का गिलास लेकर जा चुकी थी।

पुष्पा बापिस आकर ये भूल जाती है कि उसने सुधा को भी पुड़िया की दवाई घोलने को बोला था, इसलिए वो भी पुड़िया निकालती है और बचे हुए दो गिलासों में से एक गिलास में पुड़िया घोली और फिर दोनों गिलास लेकर कमरे में आ गई जहां बिस्तर पर छोटू पहले से ही लेटा हुआ था, और उत्सुक होकर अपनी मां की प्रतीक्षा कर रहा था,

पुष्पा: ले दूध पीले।

पुष्पा ने छोटू के चेहरे की ओर न देखते हुए ही उसके आगे दूध का गिलास कर दिया।

छोटू: हां मा लाओ,

छोटू ने बिल्कुल आज्ञाकारी बच्चे की तरह दूध का गिलास लिया और तुरंत अपने मुंह में लगाकर दूध गटकने लगा, जो कि दूध पीने के नाम पर नाटक करने वाले छोटू के लिए अलग बात थी, पर पुष्पा का ध्यान अभी कहीं और ही था इसलिए उसका ध्यान इस बात पर नहीं गया। और वो भी एक गिलास से दूध पीने लगी।

छोटू के मन में बहुत से सवाल थे, वो आज की रात के लिए बहुत उत्साहित और उत्तेजना था, एक तो कल रात जो हुआ वो सब फिर शाम को उसकी अम्मा ने ये और कहा कि वो और उसकी मां कमरे में सोएंगे, ये सुन कर तो उसका मन खुशी से छलांगें मार रहा था, मन में हर तरह के सपने सजा रहा था कि क्या क्या होगा कैसे कैसे होगा, पर मन की बात को प्रत्यक्ष में पेश करना बहुत कठिन होता है और वैसा ही छोटू के साथ हो रहा था, उसने तो सोचा था मां के आते ही उससे चिपक जाएगा, पर इतना सब होने के बाद भी वो उसकी मां थी और एक झिझक एक डर उसे अब भी अपनी मां से था खासकर सुबह से जैसे वो पेश आ रही थी तो उसे देखकर तो छोटू ने स्वयं को रोकना ही ठीक समझा।

पुष्पा ने भी अपना दूध का गिलास खाली कर दिया और एक ओर रख दिया और फिर बिना छोटू की ओर देखे लेट गई और अपने हाथ को अपने माथे पर रख कर अपना चेहरा ढंक लिया, छोटू ने अपनी मां को लेटते देखा फिर उसकी नज़र खुले हुए किवाड़ों पर गई, वो सोचने लगा कि ऐसे खुले किवाड़ रहे तो कुछ होने से रहा, पर ऐसे कैसे बंद करूं? पर तभी उसके मन में एक योजना आई और वो बिस्तर से खड़ा हुआ और फिर कमरे से बाहर निकल गया, पुष्पा ने भी छोटू को कमरे से जाते देखा तो सोचने लगी ये क्यों बाहर गया है? चाहे जिस लिए भी गया हो, पर आज मुझे कुछ भी गलत नहीं होने देना है, आज स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखना है कल जो पाप हुआ उसका पश्चाताप करने का यही तरीका है।


जारी रहेगी।
 
पुष्पा ने भी छोटू को कमरे से जाते देखा तो सोचने लगी ये क्यों बाहर गया है? चाहे जिस लिए भी गया हो, पर आज मुझे कुछ भी गलत नहीं होने देना है, आज स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखना है कल जो पाप हुआ उसका पश्चाताप करने का यही तरीका है।

अपडेट 13

पुष्पा ये ही सब सोच रही थी कि इतने में छोटू बापस आया और अंदर आकर उसने किवाड़ बंद कर दिए, कमरे में जलते हुए मिट्टी के तेल के दिए की रोशनी में एक नज़र अपनी दूसरी ओर करवट लेकर सोती हुई मां की ओर डाली और बिस्तर पर बैठते हुए स्वयं ही बिना बताए बोल पड़ा: मैं तो पेशाब भी के आया अब सोते हैं।

ये ही उसकी योजना थी कि पेशाब करने के बहाने से जाएगा आते हुए किवाड़ लगा देगा, और थोड़ा और चालाकी दिखाते हुए उसने ये बोल भी दिया, वो देखना चाह रहा था कि उसकी मां की क्या प्रतिक्रिया आएगी पर पुष्पा तो दूसरी ओर मुंह करके बिना हिले डुले सोने का नाटक भी करने लगी थी,

ये देख छोटू को थोड़ी हैरानी हुई वो सोचने लगा मां आज अलग तरीके से पेश आ रही हैं, कल इतना कुछ हुआ और आज पड़ते ही सो गईं, क्या करूं जगाऊं? या कुछ और करूं? समझ नहीं आ रहा,

इधर पुष्पा जो सोने का नाटक कर रही थी उसे धीरे धीरे बदन में एक बढ़ती हुई गर्मी का एहसास होने लगा, उसके बदन में उत्तेजना बढ़ने लगी, चुचियों की घुंडी तनने लगीं, चूत में नमी के साथ साथ एक अजीब सी खुजली का आभास होने लगा मानो बहुत से कीड़े उसकी गरम चूत में रेंग रहे हैं, उसका उत्तेजना और बदन की खुजली से बुरा हाल होने लगा, इधर छोटू मन ही मन अपनी मां के पीछे लेटा हुआ कुछ योजना बनाता फिर उसे खुद ही असफल बता देता, उसे समझ नहीं आ रहा था कैसे आगे बढ़े, कैसे अपनी मां के साथ वो सब करने की शुरुआत करे जो कल हुआ था, काफी गहन सोच के बाद उसने अपनी आंखें बंद की और सोने का नाटक करने लगा, ऐसे ही कुछ पल रहने के बाद उसने अपना हाथ उठाकर अपनी मां की कमर पर रख दिया और खुद वैसे ही सोने का नाटक करता रहा,

पुष्पा की कमर पर जैसे ही छोटू का हाथ पड़ा पुष्पा के पूरे बदन में बिजली दौड़ गई, उसका बदन जो पहले ही उत्तेजना से जल रहा था लगने लगा जैसे उसमें घी और डाल दिया हो, पुष्पा ने खुद को रोकना जितना आसान समझा था उतना हो नहीं रहा था और पुष्पा को समझ नहीं आ रहा था कि क्यों उसका बदन ऐसे तड़प रहा है पहले तो कभी इतनी बैचैनी नहीं हुई उसके अंदर जैसी अभी हो रही है। वो भी अपने बेटे के बगल में लेटने से, मैं इतनी नीच कैसे हो सकती हूं, जो ऐसा पाप हो रहा है मुझसे।

पुष्पा बेचारी स्वयं को दोष दे रही थी पर उसे क्या पता था जो उसके साथ हो रहा था उसका कारण वो नहीं बल्कि बाबा की पुड़िया थी जो कि एक साथ वो दो खुराक ले चुकी थी, भाग्य ने बेचारी के साथ अनोखा खेल खेला था, पहले तो जिस गिलास में सुधा पहले से ही दवाई मिला गई थी, उसी में एक बार और दवाई मिला दी थी, और फिर अपनी सोच में इतनी मगन हो गई थी कि ग्लास देते हुए ये ध्यान ही नहीं दिया कि दवाई वाला गिलास कौन सा है और बिना दवाई वाला कौन सा, बेचारी ने दवाई वाला वो भी दूनी खुराक वाला खुद पी लिया था और छोटू को बिन दवाई का पिलाया था, अब बाबा की उत्तेजना बढ़ाने वाली दवाई और वो भी दो ख़ुराक़ कोई खा ले तो उसे कैसा महसूस होगा ये तो वो ही जानता है।

छोटू का हाथ उसकी कमर पर था और पुष्पा अपनी पूरी सहनशीलता लगा कर खुद को रोक रही थी पर उसकी परेशानी ये थी कि हर बढ़ते पल के साथ उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, वो जैसा चाह रही थी ठीक उसका उलट हो रहा था, ऊपर से छोटू का हाथ जो उसकी कमर पर रखा था वो उसकी परेशानी और बढ़ा रहा था, मानो हाथ में से ही एक गर्मी निकल रही थी जो उसके पूरे बदन में फैल रही थी, उसकी चूत हर बढ़ते पल के साथ गीली होती जा रही थी।

छोटू थोड़ी देर से लेटा हुआ सोने का नाटक कर रहा था उसे जब अपना हाथ मां की कमर पर रखने की उसकी मां की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उसका आत्मविश्वास और बढ़ा और वो धीरे धीरे आगे की खिसकने लगा, और कुछ देर में खिसकते हुए अपनी मां से पीछे से सट गया,

छोटू के पीछे से चिपकते ही पुष्पा ने जो अब तक किसी तरह से अपनी उत्तेजना के वेग को जिस सहनशीलता के बांध से रोक रखा था वो चरमराने लगा, पुष्पा उत्तेजना से पागल होने लगी, और फिर छोटू ने नीचे से भी ज्यों ही खुद को अपनी मां से चिपकाया, और उसका खड़ा लंड पजामे के अंदर से ही पुष्पा के साड़ी में बंधे चूतड़ों से स्पर्श हुआ तो उस स्पर्श के आभास से ही पुष्पा की सहनशीलता का बांध टूट पड़ा, और उसके मुंह से एक बड़ी ही कामुक आह निकली जिसे सुनकर छोटू का लंड ठुमके मारने लगा।

पुष्पा के लिए अब स्वयं को रोकना असंभव हो गया, वो अपने बदन की गर्मी के सामने हार मान गई और खुद भी पीछे सरक कर छोटू से पूरी तरह अपने बदन को चिपका दिया उसकी पीठ छोटू के सीने से ऐसे सट गई कि बीच में हवा आने तक की जगह न हो,

अपनी मां की ऐसी प्रतिक्रिया पाकर छोटू तो मन ही मन खुशी से नाचने लगा वहीं उसका छोटू यानि उसका लंड भी उसकी मां के चूतड़ों के बीच ठुमके मारने लगा,

छोटू ने अब जोश में आते हुए अपने हाथ को मां की कमर से बढ़ाते हुए उसके पेट पर रख लिया और धीरे धीरे उसे मसलने लगा, पुष्पा उसके बदन से सटी हुई मचलने लगी, अपने बदन को अपने बेटे के बदन से रगड़ने लगी,

छोटू मां का पेट तो मसल रहा था पर अब भी उसके अंदर थोड़ी झिझक थी वो कोई भी गलती नहीं करना चाहता था और धीरे धीरे संयम से आगे बढ़ना चाह रहा था, वहीं पुष्पा के पास अभी किसी चीज की कमी थी वो थी संयम की, उसके लिए एक एक पल मुश्किल हो रहा था, और उसी कारण उसे वो सब करना पड़ रहा था जो वो कभी सोचना भी नहीं चाहती थी, अपने बदन के आगे हारते हुए उसे अपने संस्कारों का भार उसकी उत्तेजना के भार के आगे बहुत हल्का लगा।

इधर छोटू के लिए तो ये सब मनचाहे सपने जैसा था, उसने जैसा सोचा था वैसा ही हो रहा था, उसका हाथ उसकी मां के कोमल गदराए पेट को मसल रहा था, उसका लंड कपड़ों के ऊपर से ही सही पर उसकी मां के चूतड़ों की दरार में घिस रहा था, तभी उसे मां के हाथ कुछ हरकत करते हुए महसूस हुए, उसे पल भर को लगा कहीं मां उसे रोकने वाली तो नहीं पर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो वो मां के पेट से खेलता रहा पर तभी उसके हाथ के ऊपर उसकी मां का हाथ आया तो उसने अपनी हरकत रोक दी, फिर मां ने उसका हाथ पकड़ा और उठाकर ऊपर की ओर ले गई तो पहले छोटू को समझ नहीं आया, पर फिर मां ने जब उसका हाथ रखा तो छोटू तो अंदर तक हिल गया, क्योंकि छोटू का हाथ सीधा उसकी मां की नंगी चूची पर पड़ा जिसका आभास होते ही छोटू का तो पूरा बदन कांप गया,

पुष्पा ने अपने बदन की बढ़ती खुजली मिटाने के लिए अपने बेटे के हाथ में अपने भारी और मोटी चूची को पकड़ा दिया, वैसे तो पिछली रात भी उसने अपनी मां की चूची को मसला था, पर फिर से उसे सब कुछ नया नया आनंद दे रहा था, छोटू ने अब स्वयं को संभाला और क्योंकि अपनी मां की चूचियों का मर्दन वो एक बार पहले ही पिछली रात को कर चुका था, उसने तुंरत ही अपना हाथ पड़ते ही मोटी मोटी चुचियों को दबाना शुरू कर दिया, उसे आभास हुआ कि जो मां के हाथ उसे हरकत करते हुए महसूस हो रहे थे तब उसकी मां अपना ब्लाउज खोल रही थी,

छोटू ने अपनी मां की चुचियों को दबाना शुरू किया तो पुष्पा के मुंह से सिसकारियां निकलने लगी।

पुष्पा: अह्ह लल्ला ओह उहम्म ह्म्म्म ऐसे ही।

छोटू अपनी मां की सिसकारी से और उत्तेजित होने लगा और अपना दूसरा हाथ भी उसने अपनी मां के नीचे से निकाला और अब दोनों हाथों से अपनी मां की चुचियों को मसलने लगा, पुष्पा तो और आनंद में आहें भरने लगी, तो छोटू का आनन्द और उत्तेजना अपनी मां की आहें सुनकर और बढ़ने लगा,

छोटू: अह्ह मां तुम्हारी चूचियां कितनी मोटी हैं, अह्ह बड़ी बड़ी मज़ा आ रहा है दबाने में,

पुष्पा: ह्म्म्म अह्ह दबाता रह बेटा अह्ह मुझे भी मजा आ रहा है।

छोटू तो ये सुनकर और जोश में आ गया और अपनी मां की चुचियों को आटे की तरह गूंथने लगा, साथ ही अपने लंड को पीछे से मां के चूतड़ों में भी घिस रहा था,

पुष्पा के साथ कुछ अलग ही हो रहा था जितना वो सोच रही थी उसकी उत्तेजना कम होगी वो हर बढ़ते पल के साथ बढ़ती जा रही थी, उसकी चूत में असहनीय खुजली बढ़ती जा रही थी, ऊपर से पीछे से घिसता हुआ बेटे का लंड आग में घी का काम कर रहा था, पुष्पा ने पिछली रात की तरह ही अपना हाथ पीछे की ओर किया ओर छोटू के लंड को पजामे के ऊपर से ही पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो जैसे ही उसका हाथ लंड पर पड़ा तो उसे हैरानी हुई और साथ ही बदन में सिहरन भी हुई क्योंकि उसके हाथ में बेटे का नंगा फुंकारता हुआ लंड आ गया, छोटू कब अपना पजामा उतार कर नीचे से बिलकुल नंगा हो गया था उसे खबर तक नहीं हुई थी, अपने बेटे की हरकत पर उसे मन ही मन खुशी हुई और वो उसके लंड को हाथ पीछे किए हुए ही मुठियाने लगी, वहीं छोटू आहें भरता हुआ अपनी मां की चुचियों को मसलने में लगा रहा।

छोटू के लिए भी अब उत्तेजना उसके संभालने से ज़्यादा हो रही थी और हो भी क्यों न अपने हाथों में अपनी सगी मां की चूचियां थी तो लंड पर मां का हाथ चल रहा था, इसी जोश में आकर छोटू ने अपनी मां को पकड़ कर सीधा लिटा दिया तो पुष्पा के लिए भी आसानी हुई क्योंकि हाथ पीछे कर के लंड पर चलाना उसके लिए भी थोड़ा असहज महसूस हो रहा था,

छोटू तेल की डिमरी की रोशनी में अपनी मां का सुंदर चेहरा देख रहा था साथ ही उसके चेहरे पर बदलते भावों को भी उससे और रुका नहीं गया तो उसने आगे चेहरा बढ़ाकर अपने होंठों को अपनी मां के होंठों से मिला दिया, और रसीले होंठों को चूमने लगा, पुष्पा की उत्तेजना तो इस कदर थी कि वो अब स्वयं को रोकना उसके लिए असंभव सा लग रहा था ऊपर से छोटू की हर हरकत उसे और उत्तेजित कर रही थी, छोटू के होंठ जैसे ही उससे मिले वो पागलों की तरह उसका साथ देते हुए उसके होंठों को चूसने लगी।

बहुत ही अदभुत दृश्य था मां बेटे के होंठ आपस में ऐसे मिले हुए थे जैसे दो प्रेमियों के मिलते हैं जो विरह के बाद मिले हों, हालांकि छोटू ने जीवन में पहली बार यदि किसी के होंठों को चूमा था तो वो उसकी मां के ही थे वो भी पिछली रात को ही पर अभी वो ऐसे चूस रहा था मानो न जाने कितना अनुभव हो, पर शायद ऐसे कामों के लिए कुछ सीखने की जरूरत नहीं पड़ती, जैसे बच्चे को खाना नहीं सिखाना पड़ता, जानवरों को शिकार नहीं सीखना पड़ता, मछली को तैरना नहीं सीखना पड़ता, वैसे भी छोटू ने तो न जाने कितनी बार सपने में सब कुछ किया था तो उसे सीखने की क्या आवश्यकता थी।

कभी मां के निचले होंठ को अपने होंठों के बीच दबा कर उसका रस चूसता तो कभी ऊपर वाले को, उसके हाथ लगातार चूचियों पर चल ही रहे थे, वहीं पुष्पा का हाथ भी लगातार उसके लंड पर चल रहा था, तभी पुष्पा ने कुछ ऐसा किया जो छोटू के लिए हैरान करने वाला था पुष्पा ने होंठों को खोलते हुए अपनी जीभ छोटू के मुंह में घुसा दी, तो छोटू एक पल को हैरान ज़रूर हुआ क्योंकि उसने ऐसा कुछ सोचा नहीं था पर अगले ही पल वो अपनी मां की जीभ से जीभ लड़ाते हुए उसे चूसने लगा, पुष्पा को ये उसके पति ने सिखाया था जो आज वो अपने बेटे के साथ कर रही थी, छोटू को ये खेल बहुत भाया तो वो भी अपनी जीभ अपने मां के होंठों के बीच घुसा कर उसके मुंह को अंदर तक चाटने लगा, पुष्पा भी बेटे की जीभ को कुल्फी की तरह अंदर तक लेकर चाटने लगी, उसे अपने हाथ में छोटू का लंड फड़कता हुआ महसूस हो रहा था जिससे पता चल रहा था कि जो हो रहा था वो छोटू को कितना भा रहा था, काफी देर बाद दोनों मां बेटे के होंठ अलग हुए तो दोनों बुरी तरह हाफ रहे थे, पर हांफते हुए भी संयम न तो छोटू में था और न ही पुष्पा में, पुष्पा की हालत तो वैसे ही खराब हो रही थी उसका बदन गर्मी में जल रहा था।

होंठों के अलग होते ही छोटू ने अपना मुंह अपनी मां की मोटी चूचियों में घुसा दिया और एक चूची को मुंह में भर कर चूसने लगा, चूची के मुंह में भरते ही पुष्पा तो बिलकुल मचलने लगी, उसका सीना ऊपर की ओर तन गया जिससे अधिक से अधिक चूची छोटू के मुंह में चली जाए, साथ ही उसने छोटू के सिर को अपने हाथों से पकड़ लिया और उसे अपने सीने में दबाने लगी जैसे हर औरत के बदन में कोई न कोई संवेदनशील अंग होता है वैसे ही पुष्पा की चूचियां थी और उन चूचियों को छोड़कर छोटू ने अपनी मां को उस मोड पर ला दिया था जहां से उसका लौटना लगभग असम्भव था, छोटू तो पागलों की तरह अपनी मां की चूचियां चूसने लगा जिन चूचियों को उसने बचपन में चूस कर अपनी भूख मिटाई थी, अभी उन्हें चूस कर बदन की भूख मिटाने की कोशिश कर रहा था,

छोटू जितना पुष्पा के बदन के साथ खेल रहा था पुष्पा की उत्तेजना उतनी ही और बढ़ रही थी, हर एक पल के साथ उसका बदन जल रहा था, वो छोटू से चूचियों को चुसवाते हुए ही उठ कर बैठ गई पर छोटू ने उसकी चूचियों से अपना मुंह नहीं हटाया, और लगातार चूसता रहा।

पुष्पा ने सबसे पहले तो अपने खुले हुए ब्लाउज को अपनी बाहों से निकाला और अलग फेंक दिया और ऊपर से नंगी हो गई, अगले ही पल उसने छोटू की बनियान को भी पकड़ कर ऊपर किया तो छोटू ने पल भर के लिए अपनी मां की चूचियों को छोड़ा और अपनी बनियान उतारने में अपनी मां की मदद की, बनियान उतरते ही छोटू पूरा नंगा था और अपनी मां के बगल में बैठकर उसकी चूचियां चूस रहा था चूसते हुए उसकी नजर उसकी मां की आंखों से मिली तो, पुष्पा की आंखों में उसे हवस और एक अजीब तरह का पागलपन और बेचैनी दिखी, ऐसा उसने कभी अपनी मां को नहीं देखा था, अगले ही पल पुष्पा ने छोटू को धक्का देकर पीछे लिटा दिया, और ख़ुद उसके ऊपर बैठ गई, अपनी मां का ऐसा रूप देखकर तो छोटू को भी थोड़ी घबराहट होने लगी, पुष्पा ने छोटू के हाथ फिर से पकड़ कर अपनी चुचियों पर रख दिए तो छोटू तुरंत उन्हें दबाने लगा, पुष्पा ने बिना सोचे फिर अपना हाथ अपनी कमर पर रखा और अपनी साड़ी को ढीला करने लगी, और कुछ पल बाद उसके हाथ में उसके पेटिकोट का नाडा था, नाडे को बड़ी आसानी से खींचने के बाद वो बिजली की गति से खड़ी हुई और अगले ही पल अपनी साड़ी और पेटीकोट को अपने बदन से अलग कर एक ओर फेंक दिया, ये देख छोटू की तो आंखें फटी की फटी रह गईं, उसकी मां उसके सामने पूरी नंगी खड़ी थी, सुंदर चेहरा, उसके नीचे मोटी मोटी चूचियां, उनके नीचे सुंदर सपाट पेट और बीच में गोल नाभी जो बेहद कामुक लग रही थी, नाभी के नीचे आते हुए देखा तो आंखे और खुली रह गईं, उसे यकीन नहीं हुआ कि वो अपने जन्मस्थान को इतनी पास से देख पा रहा है, इतनी सुंदर चूत देख कर उसकी नज़रें पर उस पर टिकी रह गईं,

पर ज़्यादा देर नहीं रह पाईं क्योंकि अगले ही पल पुष्पा बापिस नीचे होकर उसके ऊपर इसकी जांघों पर बैठ गई, और अपने हाथ में बेटे का लंड पकड़ लिया और उसे ऊपर नीचे कर मुठियाने लगी, पुष्पा की नजर भी छोटू के लंड पर बिल्कुल टिक गई थी, छोटू के लंड का टोपा उसके साथ आंख मिचौली कर रहा था, जैसे ही उसका हाथ ऊपर आता वो छुप जाता और नीचे जाता तो दिखाई दे जाता, पुष्पा बेटे के लंड को एक टक निहार रही थी पर उसके मन में पति की बात चल रही थी, उसे याद है कुछ महीने पहले ही उसके पति शहर से एक किताब के कुछ पन्ने लेकर आए थे जिसमें चुदाई के कई चित्र छपे हुए थे और उन्हें दिखा दिखा कर पति उससे भी वैसे ही करने को कह रहे थे, जिसमें एक में एक औरत मर्द का लंड मुंह में भरे हुए थी, और चूस रही थी, उसे दिखाकर छोटू के पापा ने बहुत ज़िद की थी कि वो भी उनका लंड अपने मुंह में लेकर चूसे पर पुष्पा ने साफ मना कर दिया था कि पेशाब की गंदी चीज को मुंह से नहीं लगाएगी, उसके और पति के बीच इस बात पर काफी कहासुनी भी हुई थी, और अंत में अगले दिन पुष्पा राजी तो हुई पर सिर्फ टोपे को अपने होंठों में भर कर दो तीन बार आगे पीछे करने की, और उसने बस उतना ही किया था, क्योंकि उसे वो सब बहुत अजीब लगा था साथ ही एक घिन जैसी आ रही थी पर आज अपने बेटे के लंड को देखकर उसके मन में यही आने लगा कि इसका अनुभव कैसा होगा,उसका खुद का मन करने लगा कि वो एक बार अनुभव करके देखे, और जैसे अपने आप ही उसका चेहरा आगे को झुकता गया और फिर जैसे ही उसका चेहरा लंड के पास पहुंचा तो उसने एक गहरी सांस ली और छोटू के लंड की सौंधी गंध को अपने अंदर लिया तो बाकी का काम उस गंध ने कर दिया और अगले ही पल छोटू के मुंह से एक आह निकली और उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं सामने का दृश्य देख कर,

उसके सामने उसकी टांगों के बीच बैठी हुई उसकी पूरी तरह से नंगी मां आगे को झुकी हुई थी और उसके मुंह के बीच उसका लंड था, छोटू ने तो कभी ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था उसने ऐसा सिर्फ चित्रों में देखा था उसने कल्पना भी नहीं की थी कि उसकी मां या गांव की औरतों को ऐसा कुछ जान भी होगा, पर अपने मां के मुंह की गर्मी अपने लंड पर महसूस कर उसे एक अनोखा एहसास हो रहा था,

अनोखा अनुभव तो पुष्पा के लिए भी था, बेटे का लंड मुंह में भरकर , उसका स्वाद पुष्पा को बहुत अलग लग रहा था आज तक जैसा उसने कभी अनुभव नहीं किया था पर उसका मन उसे छोड़ने का भी नहीं कर रहा था, और फिर उसने आंखें बंद कर के गहरी सांस ली और फिर वही करने लगी जो उस समय उसे सही लग रहा था, वो छोटू के लंड पर अपना मुंह ऊपर नीचे करने लगी, उसके थूक से छोटू का लंड पूरा गीला हो चुका था पर पुष्पा तो जैसे नशे में थी जितना वो बेटे के लंड को चूस रही थी उतना ही उसकी भूख और बढ़ रही थी कुछ ही देर में छोटू का पूरा लंड जड़ तक उसके मुंह में समाया हुआ था, गले से उग्ग उग्ग की आवाज़ आ रही थी पर पुष्पा पर कोई असर नहीं था वो कभी पूरे लंड को अपने मुंह में भर लेती तो कभी निकाल कर ऊपर से नीचे तक जीभ से चाटती,

छोटू का नीचे लेटे लेटें बुरा हाल था और इस बार जैसे ही पुष्पा ने उसके लंड को ऊपर से नीचे चाट कर मुंह में भरा छोटू का बदन अकड़ने लगा और छोटू के लंड ने पिचकारी छोड़दी, एक के बाद एक धार छोटू के लंड से निकलने लगी जो कि उसकी मां के मुंह को भरने लगी, पुष्पा ने जब अपने मुंह में बेटे का रस भरता महसूस हुआ तो उसे बदन में और सिहरन हुई क्योंकि कभी और मौका होता तो शायद उसे घिन से उल्टी हो जाती पर अभी तो उसे वो रस मलाई जैसा लग रहा था जिसे वो तुरंत गटकने लगी, छोटू के लंड ने आज तक इतनी मलाई नहीं छोड़ी होगी जितनी आज छोड़ रहा था पर आज से पहले उसकी मां ने उसका लंड भी कहां चूसा था, झड़ने के बाद छोटू बुरी तरह हाँफ़ रहा था आज तक उसने ऐसा स्खलन महसूस नहीं किया था, वहीं उसके लंड से एक एक बूंद निचोड़ लेने के बाद पुष्पा ने बेटे के लंड को छोड़ा।

छोटू ने हांफते हुए अपनी मां के चेहरे को देखा जो कि उसके थूक पसीने से सना हुआ था, होंठों पर हल्का सा लगा उसका रस उसे और कामुक बना रहा था, पर अभी भी उसे पुष्पा की आंखों में वही भूख वही बेचैनी दिख रही थी, पुष्पा के हाथ में छोटू का लंड था, और उसकी खुशी के लिए अभी भी झड़ने के बाद भी ज्यों का त्यों खड़ा हुआ था और हो भी क्यों न, जिसकी मां नंगी उसके सामने बैठी हो उसका लंड चूसकर उसका लंड कैसे बैठ सकता है, पुष्पा ने छोटू का लंड पकड़ा और उसकी आंखों में देखती हुई सीधी हुई और थोड़ा आगे की ओर खिसकी पर छोटू के लंड पर उसका हाथ लगातार बना रहा साथ ही उसकी आंखें भी छोटू की आंखें से मिली रहीं,

छोटू अपनी मां का ये रूप देख हैरान था, ऐसी प्यास और ऐसा पागलपन देख कर। कहां उसकी मां कितनी संस्कारी थी, और कहां अभी उसके ऊपर नंगी बैठी हुई उसकी आंखों में देख रही थी,

एक पल के लिए पुष्पा उसका लंड पकड़े पकड़े ही ऊपर हुई पर दोनों की आंखें पल भर के लिए भी एक दूसरे से अलग नहीं हुईं, और फिर दोनों के मुंह से ही एक आह्ह्हह निकली और जहां छोटू की आंखें खुली रह गईं वहीं पुष्पा की बंद हो गईं, क्योंकि पुष्पा ने छोटू का लंड अपनी चूत के मुहाने पर रखा और फिर न तो स्वयं को सोचने का समय दिया और न ही छोटू को और तुंरत ही नीचे हो गई, छोटू का लंड अपनी मां की चूत में समा गया, वहीं पुष्पा की खुजलाती चूत को बेटे का लंड पाकर आराम मिला तो उसकी आँखें आनंद से बंद हो गईं।

छोटू को तो यकीन नहीं हो रहा था कि उसका लंड उसकी मां की चूत में है, उस चूत में जिससे कई साल पहले वो इस दुनिया में आया था और आज बापिस उसी चूत में जड़ तक समाया हुआ है ये सोच कर और सामने का दृश्य देखकर छोटू के बदन में झुरझुरी दौड़ गई, उसका लंड उसकी मां की चूत में समाया हुआ था,उसने सोचा नहीं था कि उसकी पहली चुदाई उसकी मां के साथ होगी, पर अपनी मां जैसे बदन वाली औरत को पाकर छोटू के तो भाग्य खुल गए थे, उसकी उत्तेजना की तो अभी कोई सीमा ही नहीं थी, छोटू की कमर अपने आप ही हिलने लगी और वो नीचे से धक्के लगाने लगा,

पुष्पा तो आंखें बंद किए हुए इस आभास को अपने मन में समा रही थी, पर जैसे ही छोटू की कमर उसे चलती हुई महसूस हुई वो भी अपने चूतड़ों को अपने बेटे के लंड पर धीरे धीरे उछालने लगी, मां बेटे सारी दुनिया से बेखबर होकर चुदाई का आनंद लेने लगे, पुष्पा की चूत में जो असहनीय खुजली हो रही थी उसमें छोटू का लंड बेहद आराम दे रहा था और छोटू तो जैसे जन्नत में था, अपनी मां की कमर थामे नीचे से लगातार अपनी मां की चूत में दनादन धक्के लगा रहा था, वहीं पुष्पा भी अपने चूतड़ों को घूमा घुमा कर अपने बेटे के लंड पर पटक रही थी, छोटू एक बार पहले ही झड़ भी चुका था इसलिए इस बार समय भी ले रहा था, पुष्पा धीरे धीरे अपने चरम की ओर बढ़ रही थी, इसी बीच वो झुककर छोटू के होंठों को चूसने लगी छोटू भी अपनी मां का पूरा साथ दे रहा था, चुदाई में भी और चुसाई में भी, साथ ही नीचे से सटा सट धक्के लगा कर अपनी मां को चोद भी रहा था, होंठों के अलग होते ही पुष्पा ने और आगे होकर अपनी चूचियों को उसके मुंह में दे दिया, जिन्हें चूसते हुए वो लगातार चोदने लगा।

पुष्पा: अह्ह्ह्ह अह्ह अह्ह्ह लल्ला अह्ह्ह्ह ओह लल्लाअह, चूस ले अपनी मां की चूचियां, अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह दैय्या, चोद अपनी मां की प्यासी चूत को अह्ह्ह्ह, और तेज मार अपने लंड की चोट मेरी चूत में अह्ह्ह्ह,

पुष्पा उत्तेजना में बड़बड़ाने लगी जो सुनकर छोटू और जोश में आते हुए उसे चोदने लगा,

छोटू: अह्ह हां मां आह अह्ह आज तुम्हारी मस्त चूत खूब चोदूंगा अह्ह मां,

पुष्पा: अह्ह्ह्ह चोद लल्ला अह्ह आज दिखा दे मेरे दूध में कितनी ताकत है,

छोटू: अह्ह हां मा ओह लो ओह देखो अपने दूध की ताकत,अह्ह।

छोटू अपनी मां की चूत में और तेजी धक्के लगाते हुए बोला।

पुष्पा: अह्ह चोद लल्ला ऐसे ही अपनी रंडी मां को।

अपने लिए रंडी शब्द का प्रयोग करना पुष्पा को भारी पड़ा और वो अपने चरम पर पहुंच कर थरथराने लगी, यही हाल छोटू का हुआ जब उसने अपनी मां के मुंह से रंडी सुना तो उसकी उत्तेजना भी सीमा से बाहर निकल गई,

पुष्पा का बदन थरथराने लगा उसकी कमर झटके खाने लगी, इधर छोटू के लंड ने भी एक बार और अपनी पिचकारी मारनी शुरू कर दी और अपनी धार से अपनी मां की चूत में अपना रस भरने लगा, पर पुष्पा का स्खलन इतना तेज वेग के साथ था कि उसका पूरा बदन अकड़ गया, उसकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ गईं और उसकी कमर बुरी तरह झटके खाने लगी जिनसे छोटू का लंड भी उसकी चूत से निकल गया, छोटू के लंड से निकलती रस की धार उसके पेट पर गिरने लगी।


पर छोटू का ध्यान तो अपनी मां के ऊपर था जो कि बुरी तरह से कांप रहीं थी, एक पल को तो छोटू को घबराहट होने लगी कि कहीं उसकी मां को कुछ हो तो नहीं गया, की तभी पुष्पा की चूत से एक तेज धार निकली जो कि सीधा छोटू के पेट और सीने से होते हुए उसके चेहरे पर पड़ी, छोटू को पहले तो समझ नहीं आया ये क्या हुआ अचानक की फिर तभी फिर से पुष्पा की कमर ने झटका मारा और एक और धार उसकी चूत से निकली और उसके मुंह पर लगी, छोटू को जैसे ही समझ आया कि ये उसकी मां का मूत है, तो वो समझ नहीं पा रहा था कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दे, उधर पुष्पा की चूत से धार के बाद धार निकल रही थी और उसके बदन को भिगो रही थी, धीरे धीरे धार हल्की होने लगी छोटू अपनी मां के मूत में पूरी तरह से भीग चुका था और साथ ही बिस्तर भी,

छोटू ने अपनी मां के मूत की धार को हल्का होते देखा तो न जाने उसे क्या हुआ बिजली की फुर्ती से उठकर उसने अपना मुंह अपनी मां की चूत पर टिका दिया और उसके मूत को अपने मुंह में भरने लगा दो तीन धार उसके मुंह में मारने के बाद पुष्पा का मूत रुक गया, पुष्पा तो धार जैसे ही बंद हुई बिल्कुल बेजान पेड़ की तरह धम्म से बिस्तर पर गिर गई, और बुरी तरह हांफने लगी उसकी आँखें बंद थी,

इधर छोटू अपने मुंह में अपनी मां का मूत लिए बैठा था उसे समझ नहीं आ रहा था कि पहले तो उसने अपनी मां का मूत मुंह में लिया क्यों, वहीं अब वो क्या करे, उसका मन कर रहा था कि वो अपनी मां के मूत को गटक जाए, पर जो आज तक दुनिया के बारे में उसने जाना था उससे तो यही पता चलता था कि मूत बेहद गंदी चीज है इसे मुंह में लेना तो दूर इसे करके हम हाथ धोते हैं तो कुछ और करने का तो सवाल ही नहीं उठता,

उसे समझ नहीं आ रहा था समाज की सुने या मन की,

फिर मन में खयाल आया कि समाज के अनुसार तो जो अभी हुआ वो भी महापाप है क्या उसे मज़ा नहीं आया ये सब करने में, उसे अपनी उलझन का जवाब मिल गया और वो बड़े चाव से अपनी मां के मूत को गटक गया,

अपनी मां के मूत में नहाकर साथ ही उसे पीकर छोटू को एक अलग ही एहसास एक अलग ही उत्तेजना हो रही थी मानो मूत में नहाकर वो तरो ताज़ा हो गया हो, उसे पीकर उसके अंदर एक नई शक्ति आ गई थी, उसके बदन में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था, और उसी ऊर्जा का परिणाम था कि दूसरी बार झड़ने के बाद भी छोटू का लंड कड़क होकर खड़ा था।

पुष्पा तो मानो ऐसे स्खलन से बेहोश सी हो गई थी उसे लग रहा था उसके प्राण उसके बदन से निकल गए हैं और वो बादलों के बीच बिल्कुल नंगी उड़ रही है, तभी बादलों के बीच में दूर से उसे कुछ चमकता हुआ अपनी ओर आते हुए दिखा, चमकती हुई चीज जब पास आई तो देखा कि एक बेहद सुंदर सा सुनहरा लंड है जो हवा में उसके आस पास घूम रहा है, वो लंड को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाती है पर लंड उसके हाथ में आता ही नहीं कभी इधर भाग जाता है तो कभी उधर और जब पुष्पा उसे पकड़ने का प्रयास बंद कर देती है तो लंड स्वयं ही उसके पास आता है और उसके चक्कर लगाने लगता है, और फिर चक्कर लगाते हुए उसकी टांगों के बीच आ जाता है और फिर उसकी चूत में घुस जाता है, उस सुंदर लंड के चूत में घुसते ही पुष्पा के पूरे बदन में आनंद की तरंगें उठने लगती हैं, उसे बेहद मज़ा आने लगता है, लंड धीरे धीरे उसकी चूत में अंदर बाहर होने लगता है, पुष्पा बादलों के बीच उड़ती हुई उस सुनहरे लंड से चुदाई के मजे ले रही है, तभी अचानक उसे अपनी कमर पर कुछ महसूस होता है वो देखती है दो सुनहरे हाथ उसकी कमर पर हैं और उसे पकड़ कर एक ओर खींच रहे हैं उसे समझ नहीं आता वो हाथ उसे कहां ले जाना चाहते हैं, वो हाथ लगातार उसे खींच रहे होते हैं तभी अचानक से उसके नीचे जो बादल था वो गायब हो जाता है और वो नीचे गिरने लगती है नीचे गिरते हुए वो अपनी कमर पर रखे हाथों को पकड़ लेती है ताकि वो उसे गिरने से बचा लें पर हाथ भी उसके साथ नीचे गिरने लगते हैं और कुछ ही पलों में वो धरती से टकराने वाली होती है कि तभी उसकी आँखें खुल जाती हैं और वो देखती है कि उसका बेटा छोटू उसकी टांगों के बीच है उसकी कमर पकड़ कर उसे चोद रहा है पुष्पा को समझ आ गया वो सपना देख रही थी, पर लंड जो मज़ा सपने में दे रहा था वैसा ही अभी भी दे रहा था,

अपने बेटे को चोदते देख न जाने क्यों उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई उसने उसे अपने पास आने का इशारा किया, छोटू अपनी मां के नंगे बदन पर झुक गया और अपना चेहरा अपनी मां के चेहरे के पास किया तो पुष्पा ने अपने हाथ से उसका चेहरा पकड़ा और अपने होंठ उसके होंठो से मिला दिए और बड़ी कामुकता से चूसने लगी, छोटू भी अपनी मां का पूरा साथ देने लगा, पुष्पा को छोटू के होंठों से इस बार एक अजीब सा ही स्वाद आ रहा था जो उसे नहीं पता किसका था पर पुष्पा को बहुत अलग सा एहसास दे रहा था, कुछ ही पलों में दोनों की जीभ भी एक दूसरे के मुंह में कुश्ती कर रहीं थी, और इसी बीच अचानक पुष्पा का ध्यान एक गंध पर गया तो उसने अपने होंठों को बेटे के होंठों से हटाया और बोली: लल्ला अह्ह्ह ये गंध कैसी है पेशाब जैसी।

तो इस पर छोटू ने उसकी चूत में धक्के लगाते हुए उसके गाल को चूमते हुए कहा, तुम्हारे ही मूत की गंध है मां, अभी झड़ते हुए तुमने ही तो अपने मूत से मुझे नहला दिया था,

पुष्पा ये सुन कर हैरान रह गई कि उसने अपने ही बेटे के ऊपर मूत दिया था, कोई और परिस्थित होती तो पुष्पा शर्म और ग्लानि से मर जाती ये सुन कर पर अभी तो ये सुनकर वो फिर से उत्तेजित होने लगी, अपने ही बेटे के ऊपर मूतने के खयाल से पुष्पा का बदन मचलने लगा, ये काम सुनने में जितना गंदा और घिनौना लग रहा था उतना ही उसे उत्तेजित कर रहा था, तभी छोटू ने बड़े गर्व से कुछ और कहा जिससे पुष्पा का रोम रोम मचल उठा।

छोटू: मां मैने तो तुम्हारा मूत पिया भी, बड़ा मज़ेदार था।

ये सुनकर तो पुष्पा की आंखें चौड़ी हो गईं, छोटू का लंड लगातार उसकी चूत से अंदर बाहर हो रहा था उसे न जाने क्या हुआ की पुष्पा ने फिर से अपने होंठ अपने बेटे के होंठों से मिला दिए और उसे बड़ी आक्रामकता से चूसने लगी, अपनी ही पेशाब का हल्का सा स्वाद और गंध जो बेटे के मुंह से आ रहा था वो उसे और उत्तेजित कर रहा था, वो नीचे से कमर उठा उठा कर छोटू की थाप से थाप मिलाने लगी साथ ही उसकी जीभ छोटू के मुंह में घुसी हुई थी और अटखेलियां कर रही थी, होंठों और जीभ को छोड़ने के बाद पुष्पा छोटू के चेहरे और गर्दन और जहां जहां चाट सकती थी उस हिस्से को जीभ से चाटने लगी, उसे समझ नहीं आ रहा था उसे क्या हो रहा है उसे जहां घिन आनी चाहिए थी वहीं वो स्वयं को रोक नहीं पा रही थी उसे अच्छा लग रहा था अपने बेटे के मूत से भीगे बदन को चाटना,

छोटू पहले भी दो बार झड़ चुका था तो इस बार बड़े संयम और आराम से अपनी मां को चोद रहा था, कभी उसको चूमते हुए चोदता तो कभी उसकी चूचियों को चूसते हुए तो कभी सिर्फ उसके चेहरे के भावों को देख कर चोदता रहता काफी देर की चुदाई के बाद पुष्पा एक बार फिर से झड़ी और उसके थोड़ी देर बाद छोटू के लंड में भी उसे रस भरता हुआ महसूस हुआ, तो झड़ने से पहले ही उसने अपना लंड अपनी मां की चूत से निकाल लिया और अपने लंड की पिचकारी अपनी मां के बदन पर छोड़ने लगा, पुष्पा का पेट और चूचियां उसने अपने रस से सना दीं।

मां बेटा दोनों झड़ चुके थे और दोनों बुरी तरह से हाँफ रहे थे, पुष्पा ने हांफते हुए अपना हाथ अपने पेट पर रखा तो उसकी उंगलियां छोटू के रस में लग गईं, उसने अपनी उंगलियों से उसके रस को अपने पेट पर मलना शुरू कर दिया, और दूसरे हाथ से चूचियों पर पड़े रस को चूचियों पर मलने लगी, कुछ ही पलों में सारा रस उसकी चूचियों और पेट पर चमक रहा था, छोटू उसके बगल में लेट गया, दोनों मां बेटे एक दूसरे से चिपक कर लेटे थे दोनों के नंगे बदन एक दूसरे को आनंद और गर्मी दे रहे थे, छोटू के बदन से आती हुई पेशाब की गंध दोनों के ही मन को बहका रही थी कमरे में खामोशी थी पुष्पा की चूत इतना चुदने के बाद भी धीरे धीरे फिर से प्यासी होने लगी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या हो रहा है इतना तो एक रात में जीवन में वो नहीं चुदी थी पर उसकी उत्तेजना कम ही नहीं हो रही थी, छोटू तो अपनी मां से चिपक कर आंखें मूंद कर लेटा हुआ था, पुष्पा की उत्तेजना फिर से बढ़ने लगी तो उससे नहीं रूका गया और वो उठ कर बैठ गई, बैठ कर सबसे पहले छोटू के लंड पर नज़र डाली जो कि न तो पूरी तरह खड़ा था और न ही पूरी तरह सोया हुआ था, पुष्पा ने उसे पकड़ लिया और हाथ से मुठियाने लगी, कुछ पल मुठियाने के बाद पुष्पा ने झुक कर अपने बेटे के लंड को मुंह में भर लिया और चूसने लगी, छोटू को जब लंड पर गरम आभास हुआ तो उसने आंख खोल कर देखा और अपनी मां को लंड चूसता देख मुस्कुराने लगा, पुष्पा के कुछ देर लंड चूसने से ही छोटू का लंड एक बार फिर से तन कर खड़ा हो गया, पुष्पा ने एक बार फिर से अपने बेटे के लंड के ऊपर आकर उसे अपनी चूत में भर लिया, और उछलने लगी, कुछ देर बाद छोटू उसकी चूचियां मसलते हुए बोला: मां मैं तुम्हें कुतिया की तरह चोदूं?

पुष्पा: उहम्म अपनी मां को अपनी कुतिया बनाएगा,

पुष्पा ने मुस्कुराते हुए पूछा तो छोटू के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई और बोला: हां मां मज़ा आएगा,

पुष्पा अपने बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए तुरंत ही उसके आगे अपने हाथों और घुटनों पर झुक गई, पुष्पा के मोटे चूतड़ छोटू के सामने आ गए और उसके झुकने से फैल गए, छोटू ने चूतड़ों के बीच की दरार को देखा जिसमें गीली चूत और उसके ऊपर छोटा सा भूरा गांड का छेद दिखा जो छोटू को बहुत प्यारा लगा और वो उसे ध्यान से देखने लगा,

पुष्पा: अब बस देखता ही रहेगा या अपनी कुतिया पर चढ़ेगा भी,

छोटू ने जब ये सुना तो तुरंत सीधा हुआ और अपना लंड अपनी मां की चूत में घुसा दिया और उसकी कमर पकड़कर दमदार धक्के लगाने लगा, इस तरह से चुदाई में दोनों को ही एक अलग मज़ा आ रहा था जहां पुष्पा को बेटे का लंड सीधा अपनी बच्चेदानी पर ठोकर मारता हुआ महसूस हो रहा था वहीं छोटू को भी अपनी मां की चूत में धक्के लगाने में आसानी हो रही थी, इसी बीच उसकी आँखें फिर से अपनी मां के गांड के छेद पर आकर रुक गई कुछ देर उसकी सुंदरता देखने के बाद वो स्वयं को रोक नहीं पाया और अपना एक हाथ अपनी मां की कमर से हटाकर चूतड़ों के बीच ले आया और फिर उंगलियों से उसे छेड़ने लगा, पुष्पा को अपनी गांड के छेद पर जब बेटे की उंगलियों का आभास हुआ तो उसे अजीब सी सिहरन हुई।

पुष्पा: अह्ह लल्ला वहां नहीं अह्ह।

छोटू: नाम तुम्हारा ये छेद बहुत सुंदर है।

पुष्पा को अपने बेटे से अपनी गांड की तारीफ सुनना अच्छा तो लगा, पर फिर भी वो अपनी बात को दबाते हुए बोली: छी वो गंदा है लल्लाअह्ह्ह्ह वहां हाथ नहीं लगाते,

पुष्पा ऊपर से भले ही ये सब बोल रही थी पर मन ही मन उसे एक अलग उत्तेजना हो रही थी,

छोटू: कितना प्यारा तो है मां तुम्हें न जाने क्यों गंदा लगता है,

छोटू ने एक उंगली से उसे कुरेदते हुए कहा,

पुष्पा: अच्छाह ठीक है पर तू अभी जो कर रहा है उस पर ध्यान दे।

पुष्पा ने ये कहा तो छोटू ने वापिस उसकी चूत में तेजी से धक्के लगाना शुरू कर दिया। इस बार की चुदाई काफी लंबी चली क्योंकि छोटू पहले ही तीन बार पानी छोड़ चुका था, वहीं इसका फायदा पुष्पा को हुआ जो कि एक बार और झड़ गई तब जाकर छोटू ने उसके चूतड़ों पर अपना रस निकाला और फिर थक कर बगल में लेट गया, थक तो पुष्पा भी बुरी तरह गई थी, आज जितनी चुदाई उसकी कभी नहीं हुई थी, वो भी छोटू के बगल में थक कर लेट गई, दोनों मां बेटे को कब नींद लग गई पता ही नहीं चला।

जारी रहेगी।
 
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