Adultery उल्टा सीधा - Page 4 - SexBaba
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Adultery उल्टा सीधा

सोमपाल: अरे तुझे पता है न कितना वहमी है वो, अगर पुड़िया की नहीं बोलता न तो मन होने के बाद भी नहीं पीता।

कुंवरपाल: ये तो सही कहा धी का लंड है तो इसी लायक, पर अब रात को इसका हल तैयार हो गया तो क्या करेगा? बेचारे के पास खेत तो है नहीं।

सोमपाल: तभी तो मजा आएगा, रात भर तड़पेगा ससुरा।

कुंवरपाल: चल अब हम भी चलें खोपड़ी घूम रही है।

सोमपाल: हां हां चल सही कह रहा है।

दोनों भी अपने अपने घर की ओर बढ़ जाते हैं।


अध्याय 14

प्यारेलाल बहकते कदमों के साथ अपने घर पहुंचता है, ये बात सच थी कि उस पर ताड़ी का सुरूर कुछ ज़्यादा ही चढ़ता था, घर पर पहुंचते ही खाट पर बैठ जाता है तब तक खाना भी बन चुका था तो रत्ना ने अपने ससुर, पति और दोनों बेटों को परोस दिया, प्यारे लाल का तो सिर झूम रहा था इसलिए जल्दी से उसने खाना निपटाया और बाहर चबूतरे की ओर तुरंत ही निकल गया,

ससुर को जाते देख रत्ना ने तुरंत ही भूरा को कहा: ए लल्ला जा बाबा की खाट बिछा दे जाकर।

भूरा भी तुंरत बाहर चबूतरे पर गया और अपने बाबा के लिए बिस्तर लगा दिया, प्यारे लाल तो वैसे भी झूम रहा था तुरंत बिस्तर पर पसर गया, इधर रत्ना ने सबको खाना खिलाया और फिर खुद खाया, सारा काम निपटाया तब तक उसके पति और दोनों बेटे भी अपने अपने बिस्तर पर पहुंच चुके थे, सारा काम निपटा कर सब पर एक बार नज़र मारती है और जब उसे आभास होता है कि सब सो चुके हैं तो वो अपने टोटके वाले काम पर लग जाती है, तुरंत कमरे में जाकर वो अपनी सास की साड़ी पहनने लगती है

चबूतरे पर प्यारेलाल परेशान हो रहा था एक तो ताड़ी का असर जिसके कारण उसका दिमाग घूम रहा था दूसरी ओर कुंवर पाल ने जो पुड़िया दी थी उसके कारण उसके बदन में एक अलग ही गर्मी और उत्तेजना का संचार हो रहा था, उसका लंड धोती में बिल्कुल तन कर खड़ा था, वो सोने का भरसक प्रयास कर रहा था पर बार बार उसकी नींद खुल जाती थी,

उसकी आंख लगी ही थी कि उसे फिर से कुछ आभास हुआ उसने धीरे से आँखें खोल कर देखा तो एक साया अपने बगल में देखा, अपने घूमते हुए दिमाग के साथ वो समझने का प्रयास करने लगा ये कौन है तो चांद की रोशनी में वो साड़ी दिखी जिसे वो अच्छे से पहचानता था साड़ी का ध्यान आते ही उसके मन में एक नाम गूंज गया, गेंदा मेरी गेंदा, उसकी स्वर्गीय पत्नी।

ताड़ी का असर और पुड़िया की उत्तेजना ने उसे ये भुलावा कर दिया कि उसकी पत्नी तो स्वर्ग सिधार चुकी है, धोती में उसका लंड और कड़क हो गया, वो ध्यान से अपनी पत्नी के साए को देखने लगा जो उसके बिस्तर के पास घूम रही थी,

उसके बगल से होते हुए वो नीचे की ओर गई और फिर दूसरी तरफ आने लगी, कि तभी प्यारे लाल से और संयम नहीं हुआ और प्यारेलाल ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर उसे बिस्तर पर खींच लिया, खींचते ही गेंदा की चीख निकली पर प्यारेलाल ने तुरंत ही उसका मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया, और उसे बिस्तर पर नीचे दबा कर खुद उसके ऊपर आ गए।

प्यारेलाल: हाय लल्ला की मां, बिल्कुल सही बखत आई है तू, देख कितना तड़प रहा था मैं तेरे लिए।

पर गेंदा उसका कोई जवाब नहीं दे रही थी बल्कि उसको अपने ऊपर से हटाने का प्रयास कर रही थी, पर प्यारे लाल बदन में उससे भारी भी था और बलशाली भी,

प्यारेलाल: तू भी न पहले पास आती भी है और फिर शर्मा के इतने नखरे भी करती है, अब आ गई है तो गेंदा का रस पिए बिना ये भंवरा नहीं मानेगा।

ये कहकर प्यारेलाल ने उसका चेहरा पकड़ कर अपने होंठों को अपनी पत्नी के होंठो से मिला दिया, जिनके मिलते ही गेंदा ने उसे फिर से अपने ऊपर से धकेलने की कोशिश की पर प्यारेलाल के आगे उसका जोर नहीं चल रहा था, हवस और उत्तेजना में पागल प्यारेलाल उसके होंठों को पागलों की तरह चूसने लगा।

उसके दिमाग में वही वर्षों पुरानी यादें चल रहीं थी जहां वो अपनी पत्नी के साथ रात को बिस्तर गरम करता था, उसे अपनी पत्नी आज और जवान लग रही थी उसके होंठ और अधिक रसीले हो गए थे, वैसे हो भी क्यों न क्योंकि जिसके होंठों को वो चूस रहा था वो उसकी पत्नी गेंदा नहीं बल्कि उसकी बहु रत्ना थी।

रत्ना बेचारी अपनी सास की साड़ी पहन कर टोटका कर रही थी, अपने बेटों और पति की खाट पर टोटका करने यानि खाट के चारों पावों पर तेल लगाने के बाद वो दबे पांव बाहर चबूतरे पर आई थी, उसने ससुर पर नज़र डाली तो वो उसे सोते दिखे थे उन्हें देख कर वो अपना काम करने लगी और खाट के पावों को तेल लगाने लगी पर जैसे ही तीसरे पाए से चौथे की ओर बड़ी उसे ससुर जी ने हाथ बढ़ाकर बिस्तर पर खींच लिया, उसकी चीख भी निकली जिसे ससुर जी ने तुरंत हाथ से बंद कर दिया, वो झटपटने लगी अपने आप को ससुर जी से छुड़ाने की कोशिश करने लगी पर ससुरजी उसे नीचे कर खुद उसके ऊपर चढ़ गए, और फिर जब ससुर जी से उसने अपनी सास का नाम सुना तो वो समझ गई कि वो उसे उसकी सास यानी अपनी पत्नी समझ रहे हैं, वो परेशान हो गई उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो किस मुश्किल में फंस गई है, क्यों उसके ससुर उसके साथ ऐसा कर रहे हैं, फिर जैसे उसे खुद ही उत्तर मिल गया कि शाम को उसने उन्हें ताड़ी पीते देखा था उसे समझ आ गया कि उसके ससुर नशे में हैं साथ ही उसने भी अपनी सास की साड़ी पहनी है इसलिए ये सब हो रहा है,

वो सोचने लगी आज टोटके की वजह से बहुत बुरी फंसी हूं, उसे कुछ समझ आता इससे पहले ही उसके ससुर के होंठ उसके होंठों पर थे उसे बहुत गलत लगा तो उसने तुरंत अपने ससुर को धक्का लगाने की कोशिश की पर उसकी ससुर के आगे उसका बल कुछ भी नहीं था, उसके ससुर उसके होंठों के रस को पीने लगे और वो उनके नीचे दबी हुई तड़पने लगी, कुछ पल के बाद उसका बदन भी गरम होने लगा, न चाहते हुए भी उसके ससुर के होंठों से उत्तेजना की तरंगें निकल कर उसके पूरे बदन में फैलने लगीं, फिर भी वो किसी तरह से इस सब से निकलना चाहती थी, इसी बीच उसके ससुर के हाथ उसके चेहरे से नीचे सरकने लगे और उसकी छाती तक पहुंच गए तब जाकर उसे आभास हुआ कि वो कितनी बुरी फंस चुकी है क्योंकि छाती पर हाथ पहुंचते ही प्यारेलाल को एहसास हुआ कि गेंदा ने सिर्फ साड़ी लपेट रखी है और कुछ नहीं पहना।

रत्ना मन ही मन खुद को कोसने लगी कि क्यों उसने ये टोटका करने की सोची, ऊपर से उसे सास की सिर्फ साड़ी मिली थी और कुछ नहीं और वो सिर्फ उसे ही बदन पर लपेट कर ये टोटका करती थी, उसके ससुर उसकी साड़ी का पल्लू उसकी छाती से हटाने लगे तो उसने खुद की चूचियों को बचाने के लिए पल्लू को पकड़ लिया दोनों हाथों से और हटाने से रोकने लगी,

प्यारेलाल भी उसके होंठों को चूसना छोड़ उसका पल्लू खींचने में लग गए, रत्ना भी अपना पूरा जोर लगा रही थी पल्लू को रोकने में कि तभी प्यारेलाल ने थोड़ा अपने बदन को ऊपर उठाया और दोबारा से नीचे हो गए और नीचे होते ही रत्ना के मुंह से हल्की सिसकी निकल गई और उसके हाथ पल्लू पर ढीले पड़ गए जिसका फायदा प्यारे लाल ने उठाया और अगले ही पल रत्ना की चूचियां उसके ससुर के सामने बिल्कुल नंगी थीं, लेकिन अभी रत्ना का ध्यान अपनी नंगी चूचियों पर नहीं था बल्कि कहीं और था और वो जगह थी उसकी टांगों के बीच क्योंकि जैसे ही प्यारेलाल थोड़ा हिला डुला था तो उस कारण से उसका कड़क लंड सीधा रत्ना की टांगों के बीच था और रत्ना की चूत पर टक्कर मार रहा था,

उसकी टक्कर से तो रत्ना का पूरा बदन कंप कंपा उठा, प्यारेलाल के लंड और रत्ना की चूत के बीच सिर्फ रत्ना की साड़ी थी क्योंकि प्यारेलाल की धोती तो कब की खुल चुकी थी, रत्ना की चूत की गंध प्यारेलाल के लंड को मिल चुकी थी प्यारेलाल की कमर स्वतः ही धीरे धीरे हिलने लगी जिससे रत्ना की हालत खराब होने लगी क्योंकि प्यारेलाल के हिलने से उसका लंड बार बार रत्न की चूत पर दबाव डालने लगा,

ऊपर प्यारेलाल ने रत्ना की छाती से पल्लू हटा दिया था रत्ना की मोटी मोटी चूचियां चांद की रोशनी में उसके ससुर के सामने थीं, प्यारेलाल ने भी जैसे ही उन सुंदर चूचियों को देखा उसने तुंरत अपना मुंह एक चूची में लगा दिया, वहीं दूसरी को अपने एक हाथ से मसलने लगा, रत्ना जो पहले से ही हैरत में थी जैसे ही ससुर का मुंह चूचियों पर पड़ा वो मचलने लगी, उसका बदन सिहरने लगा, एक ओर वो इस मुसीबत से निकलना चाहती थी पर वहीं उसके बदन पर उसके ससुर की हरकतों का असर हो रहा था, चूचियों के चूसे जाने से उसके बदन में उत्तेजना बढ़ रही थी वहीं चूत पर ठोकर मारता लंड उसके विरोध की दीवार को हर टक्कर पर तोड़ता जा रहा था, उसे यकीन नहीं हों रहा था कि वो घर के बाहर चबूतरे पर खुले आसमान के नीचे अपने ससुर के साथ ये सब कर रही थी,

प्यारेलाल अपने काम में बहुत कुशल था, चूचियों को चूसते हुए उसने अपना एक हाथ नीचे ले जा कर रत्ना की साड़ी को ऊपर खींचने लगा, रत्ना तो अभी अलग ही द्वंद लड़ रही थी अपने ही आप से उसका ध्यान अपने ससुर के हाथ पर तो बिल्कुल नहीं था, धीरे धीरे प्यारेलाल ने उसकी साड़ी को उसकी जांघों पर इकठ्ठा कर दिया पर ये सब करते हुए भी प्यारेलाल ने अपना मुंह उसकी चूची से नहीं हटाया, धीरे धीरे रत्ना की साड़ी उसकी जांघों पर इकट्ठी हो चुकी थी अब बस उसके मोटे चूतड़ों के नीचे दबे होने के कारण ही रुकी हुई थी, पर प्यारेलाल के सिर पर हवस चढ़ी हुई थी और हो भी क्यों न बाबा की पुड़िया का जो असर था, प्यारेलाल ने अपना दूसरा हाथ भी रत्ना की चूची से हटाया और अपने दोनों हाथ नीचे ले जाकर रत्ना की कमर के नीचे फंसा कर उसे थोड़ा ऊपर उठा लिया रत्ना ने भी अनजाने ही अपने ससुर का साथ दे दिया अपनी कमर उठा कर बस इतना समय काफी था प्यारेलाल के अनुभवी हाथों को साड़ी ऊपर करने के लिए, रत्ना की साड़ी उसकी कमर पर इकट्ठी थी और रत्ना को इस बात का आभास तब हुआ जब उसका ससुर का मोटा लौड़ा उसकी गरम चूत से टकराया,

इस स्पर्श से ही वो कांप गई उसे पता ही नहीं चला था कि उसकी साड़ी कब कमर से ऊपर उठ गई थी, स्पर्श होते ही उसका पूरा बदन झनझना उठा उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था उसके ससुर का लंड उसकी चूत पर है, पर इस आभास ने उसे झकझोर दिया कि जो हो रहा है बहुत गलत है महापाप है अभी भी ये सब होने से रोक ले रत्ना, और उसी आवाज़ को सुनकर उसने भी तुरंत नीचे हाथ बढ़ाया अपने ससुर को रोकने के लिए अपनी चूत को अपने ससुर के लंड से बचाने के लिए,

पर अक्सर कई बार होता है कि आप जीवन में कुछ करने का भरसक प्रयास करते हो पर आपके हाथ सिर्फ लौड़े लगते हैं रत्ना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ हाथ तो उसने अपनी चूत को बचाने के लिए बढ़ाया था पर उसके हाथ में आ गया उसके ससुर का कड़क गरम मोटा लोड़ा, जिसके हाथ में आते ही रत्ना के पूरे बदन में बिजली दौड़ गई उसे ऐसा लगा जैसे उसके हाथ में बिजली का कोई खंभा है जिससे बिजली निकल रही है और पूरे बदन में उत्तेजना भर रही है, उसकी चूत गीली होने लगी, वहीं प्यारेलाल लंड पर हाथ महसूस कर और जोश में आ गया और कमर हिला हिला कर हाथ को ही चोदने लगा,

अब परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि प्यारेलाल के मुंह में रत्ना की चूची थी वहीं रत्ना के हाथ में उसके ससुर का कड़क लंड था ज्यों ज्यों प्यारेलाल कमर को आगे कर झटका मारता तो उसका लंड रत्ना के हाथ में आगे पीछे होता जैसे रत्ना उसे मुठिया रही हो वहीं लंड का टोपा उसकी मुट्ठी से आगे निकल कर हर झटके पर रत्ना की चूत से टकराता, और हर झटके पर रत्ना का बुरा हाल हो रहा था, उसे पता था कि सब कितना गलत हो रहा है पर फिर भी उसका बदन उसका साथ नहीं दे रहा था, चूत के ऊपर पड़ रहे लंड के वार से उसका विरोध कमज़ोर पड़ता जा रहा था, इसी बीच प्यारेलाल ने उसकी चूची को मुंह से निकाला और चेहरा ऊपर कर फिर से उसके होंठों को चूसने लगा, रत्ना के मन में अब ससुर को रोकने जैसा तो कोई विचार ही नहीं आ रहा था वो बस खुद को रोकने की कोशिश कर रही थी खुद को रोके इस वासना में बहने से पर हर बढ़ते पल के साथ ये मुश्किल होता जा रहा था, उसे खुद पता नहीं चला कि वो खुद कब अपने ससुर का साथ देने लगी उसके होंठ चूसने में, वो इतनी उत्तेजित हो गई कि जिस हाथ से उसने अपने ससुर का लंड रोकने के लिए पकड़ रखा था उसी हाथ से उसने लंड को अपनी चूत के द्वार पर रख दिया और हाथ हटा लिया बाकी का काम प्यारेलाल के धक्के ने कर दिया और प्यारेलाल का लंड सरसराता हुआ उसकी बहु की चूत में घुस गया, रत्ना के मुंह से एक चीख तो निकली पर वो उसके ससुर के मुंह में ही घुट के रह गई, प्यारेलाल को भी लंड चूत में घुसने का आभास हुआ तो वो भी उत्तेजित होकर गुर्राया, और अपना मुंह रत्ना के मुंह से हटाया और फिर आँखें बंद कर अपनी कमर चलाने लगा, और अपनी बहु की चूत में जिसे वो अपनी स्वर्गीय पत्नी समझ रहा था उसे चोदने लगा, वैसे प्यारेलाल का हवस में यूं पागल होना स्वाभाविक था क्योंकि वर्षों बाद आज उसे चूत मिल रही थी चोदने को ऊपर से पुड़िया का असर तो वो आंखें मूंद कर अपने वर्षों की गर्मी दनादन धक्का लगाकर निकालने लगा,

वैसे आंखें तो रत्ना की भी बंद थी, एक तो पहली बार जीवन में अपने पति के अलावा किसी का लंड उसने लिया था और वो भी अपने ससुर का, और उसका ससुर तो उसे पागलों की तरह चोद रहा था एक साथ उसके अंदर इतने सारे भाव आ रहे थे खुद से घृणा भी हो रही थी तो चूत में अंदर बाहर होता लंड उसे एक अलग ही मज़ा दे रहा था, हर बढ़ते पल के साथ उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, और एक पल ऐसा आया जब वो सब भुला कर अपने ससुर की चुदाई का आनंद लेने लगी, हालांकि उसका पति भी महीने में एक आध बार उसे खूब अच्छे से चोदता था पर अभी जो उत्तेजना उसे ससुर के साथ महसूस हो रही थी वो पति के साथ नहीं हुई थी, ये वही एहसास था जो कुछ गलत करने पर मन को एक उत्साह का आभास कराता है, रत्ना को भी यही हो रहा था, प्यारेलाल गुर्राते हुए अपनी बहु को ताबड़तोड़ चोद रहा था, और उस चुदाई का असर रत्ना पर भी भर पूर हो रहा था, घर के बाहर चबूतरे पर वो अपने ससुर से चुदवा रही थी, इस एहसास से ही वो सिहर रही थी और अंत में उसकी उत्तेजना उसके शिखर पर पहुंच गई और वो स्खलित होते हुए पानी छोड़ने लगी, इधर प्यारेलाल ने भी कुछ झटके और लगाए और फिर उसने भी अपना रस अपनी बहु की चूत में भर दिया, झड़ने के बाद प्यारेलाल तो रत्ना के ऊपर ही गिर गया, नशा और झड़ने के बाद के आलस ने उसे तुरंत नींद में पहुंचा दिया, उसका लंड सिकुड़ कर रत्ना की चूत से बाहर आ गया, रत्ना को भी अब फिर से वास्तविकता का एहसास होने लगा तो वो परेशान होने लगी।

घबराते हुए उसने धक्का देकर अपने ससुर को अपने ऊपर से हटाया और बिस्तर से उठ कर अंदर की ओर भागी उसकी साड़ी प्यारेलाल के नीचे दब कर वहीं रह गई वो नंगी ही घर के अंदर की ओर भागी, आंखों में आंसुओं की धार बह रही थी, और मन जैसे फटने को हो रहा था और हों भी क्यों न कहां कुछ देर पहले तक वो एक संस्कारी पतिव्रता औरत थी और कहां उसने अपने पति को धोखा देकर किसी और से चुदवा लिया था और वो भी कोई और नहीं अपने ससुर से।

अंदर आकर वो सीधे कमरे में गई और बिस्तर पर लेट कर सुबकने लगी, काफी देर तक रोने के बाद उसे एहसास हुआ कि वो अभी भी नंगी है तो उसने तुरंत उठ कर कपड़े पहने और रोते रोते ही सो गई।


जारी रहेगी
 
जिन महाभावों को कहानी बहुत जल्दी से पढ़ने की आकांक्षा है उनसे निवेदन है यह कहानी आपके लिए नहीं है, जितना समय मेरे पास है उसमें प्रति सप्ताह एक अध्याय ही अधिक से अधिक मैं लिख सकता हूं, तो जिन भी सज्जनों को इससे आपत्ति है आप अन्य कहानियों पर जा सकते हैं, मुझ पर टीका टिप्पणी करने का कोई लाभ नहीं होगा, परिवार और व्यापार से जो समय मिलेगा उसी में लिखूंगा, नहीं बचेगा तो नहीं लिखूंगा, उत्साह वर्धन न कर सकें तो अनुचित टिप्पणियां भी न करें, किसी को भी कहानी पढ़ने के लिए मैंने आमंत्रित नहीं किया है आप अपनी मर्ज़ी से आए हैं जा भी सकते हैं,

।।धन्यवाद।।
 
अध्याय 15

घबराते हुए उसने धक्का देकर अपने ससुर को अपने ऊपर से हटाया और बिस्तर से उठ कर अंदर की ओर भागी उसकी साड़ी प्यारेलाल के नीचे दब कर वहीं रह गई वो नंगी ही घर के अंदर की ओर भागी, आंखों में आंसुओं की धार बह रही थी, और मन जैसे फटने को हो रहा था और हों भी क्यों न कहां कुछ देर पहले तक वो एक संस्कारी पतिव्रता औरत थी और कहां उसने अपने पति को धोखा देकर किसी और से चुदवा लिया था और वो भी कोई और नहीं अपने ससुर से।

अंदर आकर वो सीधे कमरे में गई और बिस्तर पर लेट कर सुबकने लगी, काफी देर तक रोने के बाद उसे एहसास हुआ कि वो अभी भी नंगी है तो उसने तुरंत उठ कर कपड़े पहने और रोते रोते ही सो गई। अब आगे....

अगली सुबह हुई तो तड़के ही फुलवा उठी और अपने टोटके के लिए चल दी पिछली सुबह की तरह ही उसने नदी में स्नान किया और फिर नंगी होकर पेड़ के पास आई, पर आज वो थोड़ा असहज महसूस कर रही थी कल जो भी हुआ उसे सोच कर उसके मन में एक असहजता का आभास हो रहा था और साथ ही उत्तेजना का भी, उसने एक बार अच्छे से चारों ओर देखा अपने मन की जिज्ञासा शांत करने के लिए, उसे कोई आस पास नहीं दिखा, वो फिर झुककर बैठ गई और विधि अनुसार मंत्र पढ़ने लगी, कुछ देर ही हुई थी कि उसे अपने चूतड़ों पर एक हाथ का आभास हुआ और उसके बदन में बिजली दौड़ गई, अगले ही पल उसकी चूत के होंठों को फैलाता हुआ एक गरम लंड उसकी चूत में समाने लगा, उसके दांत अपने आप पिस गए और उसके हाथों ने अपने नीचे की घास को कस कर पकड़ लिया, एक दो झटके लगे और लंड उसकी चूत में जड़ तक समाया हुआ था, फुलवा के मुंह से सिसकियां निकलने लगीं उसके लिए मंत्र बोलना भी लगभग रुक ही गया पर वो फिर भी कोशिश कर रही थी, लंड ने धीरे धीरे अंदर बाहर होना शुरू कर दिया और फुलवा का बदन मचलने लगा, विधि के अनुसार वो आंखें नहीं खोल सकती थी जब तक मंत्र न पूरे हो जाएं तो आंखे बंद करके फुलवा अपनी चूत में इसी तरह धक्के लगवाने लगी तभी उसने महसूस किया जो हाथ उसकी कमर पर थे वो सरकते हुए उसकी कमर और फिर उसकी पपीते की आकार की चूचियों पर आ गए और उन्हें मसलने लगे, फुलवा तो इस हमले से पागल सी होने लगी और उसका बदन झटके खाने लगा,

ऐसे खुले में किसी अनजान व्यक्ति से चुदाई करवाना और फिर इस तरह अपने बदन से खेलने देना ये सब फुलवा के लिए बहुत उत्तेजक था, ऊपर से गरम कड़क लंड उसकी चूत में अंदर बाहर हो रहा था, और उसे एक ऐसा अहसास दे रहा था जो जीवन में पहले कभी नहीं हुआ था, अपने पति के अलावा किसी और से चुदने का जो गलत होकर भी जो एक अलग एहसास था वो उसे पागल कर रहा था, जो भी उसकी चुदाई कर रहा था वो चुदाई की कला में निपुण था तभी तो कैसे उसके बदन से खेलना है उसे अच्छे से पता था उसके धक्के ऐसे थे कि फुलवा के वजूद को हिला रहे थे, चूचियों का मर्दन और तगड़े लंड की चुदाई का कुछ ऐसा असर फुलवा पर हुआ कि उसका बदन कांपने लगा और उसका पूरा बदन ऐंठने लगा, पर जो उसे चोद रहा था उसने अपने हाथों को उसकी चूचियों से हटाया और उसे ऐसे जकड़ लिया कि वो गिरे न और न ही उसके लंड से अलग हो, और ऐसे पकड़े हुए ही कुछ और धक्के उसकी चूत में लगा दिए, बस फुलवा के लिए इतना काफी था और वो स्खलित होने लगी, उसकी चूत पानी छोड़ने लगी और अपने रस से उस कड़क लंड को भिगोने लगी, फुलवा का स्खलन इतना ज़ोरदार था कि वो तो स्खलित होते ही मानो बेहोश हो गई, और बेजान होकर वहीं मिट्टी पर गिर पड़ी, उसकी आँखें बंद पहले से ही थी, फुलवा की ये हालत देख उस अनजान साए ने अपना लंड उसकी चूत से निकाला और उसे पलट दिया, अब फुलवा अपनी पीठ पर उसके सामने बिल्कुल नंगी पड़ी थी, वो अनजान साया फुलवा को देखते हुए अपने लंड को अपने हाथों से पकड़ कर हिलाने लगा और कुछ ही पलों में उसके लंड से धार निकली जो कि फुलवा के चेहरे और छाती पर गिरी,

इसी तरह एक के बाद एक कई धारों ने फुलवा के चेहरे और छाती को उसके रस से सना दिया,

कुछ पल बाद फुलवा को होश आया तो उसने खुद को पेड़ के बगल में नंगा पाया वो तुरंत उठ कर बैठ गई, और इधर उधर अपने कपड़े तलाशने लगी, इसी बीच उसका ध्यान उसकी छाती पर गया तो उसने हाथ लगा कर रस को अपनी उंगलियां में समेत कर उठाया और नाक के पास लाकर सूंघने लगी वो समझ गई कि वो क्या है, दूसरा हाथ अपने आप उसकी चूत पर पहुंच गया जो अपने रस से सराबोर थी, अपनी चूत को सहलाते हुए फुलवा ने अपनी रस से सनी उंगलियों को देखा तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ गई।

जहां पत्नी नदी किनारे पूरी नंगी होकर चुद रही थी सोमपाल सुबह उठ कर खेत की ओर चल दिए, इतने में ही पीछे से कुंवरपाल ने आवाज लगाई तो रुक गए,

कुंवरपाल: अरे रुक जा हम भी चल रहे,

कुंवरपाल ने हाथ में लोटा पकड़े आते हुए कहा,

सोमपाल: आ जा आजा, प्यारे कहां है?

कुंवर पाल: अरे आया नहीं वो आज वैसे तो सबसे पहले जाग जाता है,

सोमपाल: लगता है रात की ताड़ी का तगड़ा असर हुआ है, चल चबूतरे से ही उठाते हैं सो रहा होगा अभी,

इस पर दोनों हंसने लगे, और आगे प्यारेलाल के चबूतरे की ओर बढ़ गए, जा कर देखा तो प्यारेलाल अभी भी सो रहा था,

सोमपाल: इसकी तो हालत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई भाई, देख कैसे सो रहा है,

कुंवरपाल: बिगड़ गई या बन गई देख तो बेशर्म को,

कुंवरपाल ने प्यारेलाल की खुली धोती की ओर इशारा करते हुए कहा जिसके बीच उसका लंड नंगा सोता हुआ दिखाई दे रहा था,

सोमपाल: धत्त तेरी की, अरे उठा इसे नहीं तो बच्चा औरतें आने लगी तो थू थू हो जाएगी,

कुंवारपा तुरंत अपने लौटे से पानी अपने हाथ में लेता है और छींटे प्यारेलाल के चेहरे पर मारता है और अगले ही पल प्यारेलाल हड़बड़ा के उठता है और इधर उधर देखता है, और अपने दोनों यारों को अपने अगल बगल खड़ा पाता है, तुरंत उठ कर बैठ जाता है,

कुंवरपाल: उठ धी के लंड, ऐसे सो रहा है कुछ शर्म लाज है कि नहीं,

प्यारेलाल: हैं क्या हुआ?

सोमपाल: अरे क्या हुआ क्या, अपनी धोती देख।

प्यारेलाल तुरंत नीचे देखता है और अपनी धोती और कच्छे को खुला देख चौंक जाता है और तुरंत खाट से उठ कर सही से बांधता है और बांधते हुए उसे रात जो हुआ वो याद आने लगता है,

कुंवरपाल: अब क्या हुआ ऐसे बावरों की तरह क्यों सोच रहा है?

प्यारेलाल: यार रात को बहुत अजीब किस्सा हुआ है,

सोमपाल: ऐसा क्या हो गया जो तू अपनी सुध बुध खोकर अधनंगा सो रहा था,

प्यारेलाल: बताता हूं बैठो तो सही,

प्यारेलाल दोनों को खाट पर बैठाता हैं और फिर फुसफुसा कर दोनों को बताने लगता है,

प्यारेलाल: अरे यार रात को लल्ला की अम्मा आई थी मुझसे मिलने और उसकी चुदाई की मैंने,

सोमपाल: का भौजी आई थी मिलने और तूने उनकी चुदाई की, सही में बौरा गया है तू,

प्यारेलाल: अरे मेरी बात तो सुनो,

फिर प्यारेलाल रात की पूरी बात सुनाता है, उसकी कहानी खत्म होने पर दोनों हंसने लगते हैं,

कुंवरपाल: साले तुझपे ताड़ी का नशा झेला नहीं जाता, इसीलिए ऐसे सपने आते हैं तुझे,

सोमपाल: और क्या साले कम से कम मरी हुई भौजी को अब तो आराम करने दे,

प्यारेलाल: अरे यार तुम समझ नहीं रहे मैं सच बोल रहा हूं,

कुंवरपाल: अब चल सुन लिया तेरा सच सिधारी हुई भौजी को अपनी हवस के लिए परेशान कर रहा है, अब उठ खेत चल रहे हैं,

प्यारेलाल भीं अपना सिर खुजाता हुआ खड़ा होता है उसे भी लगने लगता है उसने सपना ही देखा है तो वो खड़ा होता हैं और अपना बिस्तर समेटने लगता है, कि तभी उसकी नज़र एक जगह रुक जाती है और वो ज्यों का त्यों अटक जाता है,

सोमपाल: क्या हुआ अब रुक क्यों गया? फिर से भौजी दिखने लगी,

प्यारेलाल: अरे नहीं तुम लोगों को मैं झूठा लग रहा हूं तो ये बताओ कि ये तुम्हारी भौजी की ये धोती यहां कैसे आई?

प्यारेलाल ने खाट के नीचे पड़ी धोती उठा कर दोनों को दिखाते हुए कहा,

सोमपाल: ये भौजी की धोती है?

प्यारेलाल: हां उसी की है?

कुंवरपाल: तो साले तू ही लाकर सो गया होगा रात में नशे में,

सोमपाल: और क्या नशे में तूने ही सब किया है।

प्यारेलाल: साले तुम दोनों बच्चों जैसी बातें कर रहे हो, रुको,

ये कहकर उसने धोती को अपने बिस्तर के नीचे ही दबा दिया।

प्यारेलाल: आगे चलते हुए बातें करते हैं।

प्यारेलाल ने खाट के नीचे रखा लौटा उठाया और तीनों खेत की ओर चल दिए,

सोमपाल: अब बता कि तू ही लाया था न धोती रात को,

प्यारेलाल: नहीं, उसके कपड़े तो उसके सिधारने के बाद कमरे में संदूक में बंद करके रख दिए थे,

कुंवरपाल: तो धोती तूने नहीं निकाली संदूक से?

प्यारेलाल: अरे नहीं यार तुम दोनों बताओ लड़कों के ब्याह के बाद हम लोग कभी अपने घर के कमरों में भी गए हैं संदूक छूना तो दूर की बात है,

सोमपाल: हां यार ये बात तो है, बहु आने के बाद तो कमरे में जाने का सवाल ही नहीं उठता,

कुंवरपाल: हां मैं भी नहीं गया कभी,

प्यारेलाल: अब खुद सोचो कि मैं धोती कैसे निकालूंगा।

कुंवरपाल: देख कह तो तू सही रहा है पर फिर भी ईमानदारी से बता तू नहीं लाया धोती कहीं से भी,

प्यारेलाल: भूरा की कसम यार ना मैं धोती लाया और न ही मैं कुछ झूठ बोल रहा हूं, रात तुम्हारी भौजी ही आई थी और मैंने उसकी चुदाई की भी।

ये सुनकर दोनों सोच में पड़ जाते हैं, कुछ देर सोचने के बाद सोमपाल कहता है: कुछ सोचते हैं इस बारे में।

तीनों आगे बढ़ जाते हैं।

पुष्पा की नींद खुली तो उसने खुद को अपने बेटे की बाहों में नंगा पाया वो भी पूरा नंगा था पुष्पा कुछ देर आँखें खोल कर अपने बेटे के चेहरे को देखती रही सोते हुए बहुत प्यारा लग रहा था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका बेटा इतना बड़ा हो गया था कि उसके बदन को रात भर उसने अच्छे से मसला था, कुछ पल बाद पुष्पा उठी और धीरे से छोटू के हाथ को अपने ऊपर से हटाया और उसे सीधा कर दिया और खुद उठ कर बैठ गई, उसके बदन में एक अजीब सा मीठा मीठा दर्द हो रहा था, जो उसकी रात भर हुई बदन तोड़ चुदाई का साक्ष्य था,

उठ कर वो अपने कपड़े ढूंढने लगी, और इधर उधर देखते हुए उसकी नज़र छोटू के आधे खड़े लंड पर पड़ी, उसे देख उसके बदन में फिर से एक सिरहन होने लगी, कुछ पल वो टक टकी लगाकर उसे देखती रही और फिर खुद को संभाला और उठ कर अपने कपड़े पहने, खुद बिल्कुल तैयार हुई और फिर छोटू को उठाया,

पुष्पा: उठ बेटा उठ कपड़े पहन ले अपने,

छोटू नींद में ही उठा और अपना पजामा वगैरा पहन कर दोबारा सो गया, फिर पुष्पा बाहर निकली, बाहर निकलते हुए वो मन ही मन सोच रही थी कि आज उसके साथ कुछ अजीब हो रहा था, कल जब वो उठी थी तो उसे इतनी ग्लानि हुई थी पूरा दिन उसके मन में अपने लिए घृणा का भाव आ रहा था, सुबह तो उसके आंसू ही नहीं थम रहे थे, पर आज उसने उससे भी बड़ा पाप किया था अपने ही बेटे के साथ पर आज उसके मन में कोई ग्लानि नहीं हो रही थी, वो चाह रही थी बार बार अपने आपको कोसने की कोशिश कर रही थी पर आज उसे मन से बुरा लग ही नहीं रहा था, बल्कि उसे आज बहुत हल्का हल्का लग रहा था, बदन में एक मीठा मीठा सा दर्द का एहसास हो रहा था वहीं मन में एक सुख का अनुभव था, वो समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा क्यों हो रहा है,

ख़ैर जल्दी ही सुधा भी जाग गई और दोनों बाहर जाकर अपनी टोली से मिलीं और फिर खेतों की ओर चल दीं। आज पुष्पा भी खूब चहक चहक कर सबसे मज़ाक कर रही थी जो कि उसका स्वभाव भी था, चारों में सिर्फ एक का मुंह आज बंद था और वो थी रत्ना, उसके दिमाग में तो अपने ससुर के साथ की चुदाई ही चल रही थी, वो जितना उसे अपने दिमाग से निकालने की कोशिश करती वो सब उतना ही उसके दिमाग में आता,

यहां औरतें अपनी बातों में व्यस्त थीं वहीं भूरा तेजी से भागता हुआ जा रहा था सड़क पर इधर उधर देख कर वो खेत में अंदर घुसने के लिए जैसे ही मुड़ता है अचानक किसी से टकरा जाता है टकराने पर हैरान होकर सामने देखता है तो उसका मुंह बन जाता है।

भूरा: तू यहां क्या कर रहा है?

वो सामने खड़े लल्लू को देख कर तुनक कर कहता है,

लल्लू: क्यों बे इस खेत पर तेरा नाम लिखा है का?

भूरा: छोड़ मुझे तुझसे बात ही नहीं करनी,

ये कह भूरा उठ के मूड कर जाने लगता है,

लल्लू: क्यों आज बिना काम निपटाए ही जा रहा है?

भूरा: मुझे कोई काम नहीं है।

लल्लू: अच्छा तो ऐसे भाग के कहां जा रहा था अपनी गांड मरवाने?

भूरा: देख भेंचो मैं तुझे गाली नहीं दे रहा तो तू भी मत दे, वैसे भी मुझे तुझसे कोई मतलब नहीं।

ये कहकर भूरा चल देता है तो लल्लू उसकी कमीज पीछे से पकड़ लेता है।

लल्लू: अच्छा ठीक है अब बुरा मत मान यार, भूल जा बीती बातें।

भूरा: मुझे न भूलना कुछ और न याद करना है।

लल्लू: अरे यार समझ ना कल जिस टेम तू आया था उस टेम मेरी गांड किलस रही थी बहुत बुरी। एक तो मेरे बाप ने पूरी रात भर खेत करवाया उसके बाद भी सुबह सोचा तेरे साथ सुबह का प्रोग्राम करूंगा तो उसमें भी अड़चन लगा दी और मैं बुरा किलस गया और सारा गुस्सा तुझ पर निकल गया,

भूरा कुछ देर चुप रहता है,

लल्लू: अब मुंह बना कर रखेगा तो आज का भी प्रोग्राम निकल जाएगा, चल जल्दी। नहीं तो मेरी गांड देखनी पड़ेगी।

ये सुन भूरा को हंसी आ जाती है वैसे भी भूरा अपने दोस्त से ज़्यादा देर गुस्सा नहीं रह सकता था, इसलिए तुरंत तैयार हो गया,

भूरा: आज छोड़ रहा हूं आगे से ऐसा किया तो तेरी गांड चीर दूंगा।

लल्लू: हां भाई चीर लियो अब जल्दी चल।

दोनों फुर्ती में और सावधानी से अंदर बढ़ने लगते हैं, कि तभी भूरा की कुछ ध्यान आता है और उसके कदम रुक जाते हैं, वो सोचने लगता है अगर लल्लू ने देख लिया और उसे पता चल गया कि उसकी और मेरी मां सुधा चाची और पुष्पा चाची भी यहीं बैठती है तो क्या होगा वो तो मेरी जान ले लेगा, अब क्या करूं कैसे रोकूं उसे,

लल्लू पीछे मूड कर उसे देखता हैं और फुसफुसाते हुए आगे बढ़ने का इशारा करता है और फिर से आगे बढ़ने लगता है, भूरा को समझ नहीं आता क्या करे, उसका दिमाग तेजी से चलने लगता है तभी उसके दिमाग में एक बात आती है कि लल्लू को थोड़े ही पता मैं ये सब कल भी देख चुका हूं मुझे बस ऐसे दिखाना कि मैं पहली बार देख रहा हूं,

ये सोचते हुए वो आगे बढ़ता है और धीरे धीरे दोनों खेत के किनारे पहुंच जाते हैं, दूसरी ओर से आती हुई आवाजों को सुन लल्लू के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और वो भूरा को चुप रहने का इशारा करते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ कर घुटनों के बल आगे होता है और अपना चेहरा आगे कर सावधानी से झाड़ियों के बीच आगे कर झांकता है और सामने का नज़ारा देख उसकी आंखें चौड़ी हो जाती हैं, वो तुरंत खुशी से पलट कर भूरा को देखता है और उसे तुंरत आगे आ कर देखने को कहता है, मन तो भूरा का था ही वो भी लल्लू के बगल में जगह लेता है और अपनी आँखें फिर से लगा देता है, आज भी कल जैसा ही नज़ारा था चार एक से बढ़कर एक गांड़ उसकी आंखों के सामने थीं, पर वो जानता था ये सुन्दर चूतड़ किस किस के हैं, उसका लंड तुरंत कड़क हो जाता है, तभी उसे अपनी बगल में कुछ आहट होती है तो वो उधर देखता है तो पाता है कि लल्लू ने तो अपना लंड निकाल कर मुठियाना भी शुरू कर दिया था,

लल्लू: ओह भेंचो आज तो भाग खुल गए यार एक की जगह चार चार मोटी मोटी सुंदर गांड देखने को मिल रही हैं।

लल्लू ने फुसफुसाते हुए कहा,

भूरा: हां यार सारी एक से बढ़कर एक हैं पता नहीं ये कौन कौन हैं?

भूरा ने भी फुसफुसाते हुए जवाब दिया,

लल्लू: जो भी हो यार हैं बड़ी मस्त, अरे रुक ये दूसरे नंबर वाली तो पुष्पा चाची की ही है, मुझे अच्छे से याद है उनकी।

भूरा: हां यार वही लग रही हैं मुझे तो, पर बाकी की तीन समझ नहीं आ रहीं,

भूरा ने अपना नाटक जारी रखते हुए कहा,

लल्लू: हां यार पर बाकी की गांड भी बड़ी मस्त हैं पता चल जाता कौन हैं तो मज़ा आ जाता,

भूरा मन ही मन सोचता है साले पता चल जायगा तो तेरी फट जाएगी,

उधर चारों औरतें भी आपस में बातें कर रहीं थीं,

लल्लू तभी भूरा को चुप रहने का इशारा करता है और धीरे से कहता है कि चुप रह इनकी बातें सुनते हैं क्या पता चल जाए कौन कौन हैं।

दोनों कान लगाकर सुनने लगते हैं तो सबसे पहले लल्लू को एक आवाज सुनाई देती है जिसे सुनकर वो तुरंत कहता है: अरे ये तो पक्का सुधा चाची हैं पुष्पा चाची के बगल में, हाय उनकी गांड है सबमें छोटी पर चूतड़ बड़े मस्त हैं गोल मटोल से।

भूरा: हां यार पुष्पा और सुधा चाची दोनों ही मस्त हैं एक दम।

लल्लू: अब ये दोनों किनारों वाली का और पता लगाना है,

तभी उसके कानों में एक आवाज पड़ती है, अरे आज तू चुप क्यों है रत्ना?

और रत्ना सुनकर वो चौंक जाता है क्योंकि रत्ना तो भूरा की मां का नाम था, मतलब एक कोने वाली भूरा की मां है, वो सोचने लगता है अब भूरा क्या करेगा पर तभी उसका दिमाग घूमता है और वो सोचता है पर जिसने ये बोला वो आवाज तो.... मेरी मां की है,

ये खयाल आते ही उसका लंड रस छोड़ने लगता है, एक के बाद एक धार उसके लंड से छूटने लगती है उसकी आँखें अपनी मां के चूतड़ों पर टिकी की टिकी रह जाती है, इधर भूरा भी झड़ रहा होता हैं और वो भी अपनी मां की गांड को टक टकी लगाकर देख रहा होता है, झड़ने के बाद दोनों शांत होते हैं तो लल्लू तुरंत अपना पजामा ऊपर कर बापिस चल देता है और भूरा उसके पीछे पीछे।

भूरा तो पहले ही ये झेल चुका था पर वो जता नहीं सकता था वो लल्लू के पीछे पीछे चल देता है लल्लू सोचता हुआ चलता चला जाता है और सीधा नदी के किनारे आकर रुकता है, दोनों शांत होकर खड़े रहते हैं काफी देर की चुप्पी के बाद लल्लू बोलता है,

लल्लू: भेंचो बहुत बड़ा कांड हो गया यार पाप हो गया,

भूरा: हां यार भेंचो ऐसा तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा हो सकता है, हमारी बुद्धि ही काम न करी।

लल्लू: ये सब न हमारे कर्मों की सजा है भाई, हमने छोटू के साथ धोखा किया और उसकी मां को गलत हालत में देखा और हिलाया, तो उसी की सज़ा हमें मिली और आज हमने अपनी मां को देख कर हिला लिया।

भूरा: हां भाई बहुत बड़ी गलती हो गई है हमसे अब का करें कुछ समझ नहीं आ रहा?

लल्लू: हां यार भेंचो हमारे दिमाग को न जाने हुआ क्या है? अपनी ही मां की गांड देख कर कैसे हिला सकते हैं हम लोग? इतना बड़ा पाप कैसे कर सकते हैं?

भूरा: पता नहीं यार पर हमें पता थोड़े ही था कि वो चूतड़ हमारी मां के हैं, देखने में अच्छे लगे तो शायद इसीलिए हमने ये सब किया,

ये सुनकर लल्लू थोड़ा चुप हो जाता है, और कुछ सोचने लगता है,

लल्लू: एक काम करते हैं जो हुआ उसे दिमाग से निकालने की कोशिश करते हैं, और सब भूल कर आज के बाद कभी ऐसा नहीं करेंगे।

भूरा: ठीक है,

लल्लू: आंखें बंद करते हैं और इस सब को अपने दिमाग से हटाते हैं,

लल्लू ये कहकर अपनी आँखें बंद करता है पर वो जिस दृश्य को हटाने की कोशिश करता है वही उसे दिखाई देता है और वो दृश्य होता है उसकी मां की गांड का, चारों औरतों में उसकी मां के चूतड़ सबसे बड़े थे और दरार भी गहरी नज़र आ रही थी, उसकी आंखों के सामने से उसकी मां के चूतड़ हट नहीं रहे थे,

तभी उसे अपने बगल से अह मां ऐसी सिसकी सुनाई देती है तो वो आंखें खोल कर देखता है और चौंक जाता है, वो देखता है कि भूरा की आंखें बंद हैं पर वो अपने हाथ से पजामे के ऊपर से ही लंड सहलाता हुआ सिसकियां ले रहा है वो भी अपनी मां के नाम की।

लल्लू तुरंत उसे हाथ मारकर जैसे होश में लाता है।

लल्लू: साले तुझे मैंने कहा कि उस बात को दिमाग से निकाल तू कुछ और ही करने लगा, माना तब अनजाने में हुआ पर अभी जान बुझ कर करना तो महा पाप है।

भूरा उसे कुछ पल देखता है और फिर अपना पजामा नीचे खिसका कर अपने कड़क लंड को बाहर निकाल लेता है और कहता है: भाई अब पापी कह ले या महा पापी पर अभी अगर मैंने नहीं हिलाया तो मैं पागल हो जाऊंगा।

ये कहकर भूरा अपने लंड को मुठियाने लगता है आँखें फिर से बंद हो जाती हैं और मुंह से सिसकियां निकलने लगती हैं: अह्ह मां कितने मस्त चूतड़ हैं तुम्हारे, अह्ह मां,

लल्लू उसे आँखें फाड़े देख रहा होता है इसलिए नहीं कि वो अपनी मां के नाम की मुठ्ठी मार रहा था बल्कि इसलिए कि साले में इतनी हिम्मत है कि ये जानते हुए भी गलत है फिर भी कर पा रहा है और यहां वो नाटक कर रहा है, जबकि चाहता तो वो भी यही है कि अपने मां के चूतड़ों को याद करके खूब लंड हिलाए,

कुछ पल यूं ही खड़े रहने के बाद आखिर वो फैसला कर लेता है और फिर उसका पजामा भी नीचे होता है और आंखे बंद कर अपनी मां के नाम की मुठ्ठी लगाने लगता है,

लल्लू: अह्ह मां इतने मस्त और भरे चूतड़ मैंने किसी के नहीं देखे, अह्ह मन करता है अपना लंड घुसा दूं तुम्हारे चूतड़ों के बीच।

दोनों इसी तरह से अपनी अपनी मां को याद करके अपने अपने लंड हिलाते हैं और फिर पानी गिराने के बाद शांत होते हैं,

झड़ने के बाद दोनों पीछे ऐसे ही लेट जाते हैं,

भूरा: अह्ह यार मज़ा आ गया।

लल्लू: सही में यार इतना तगड़ा तो मैं किसी के लिए भी नहीं झड़ा जितना अपनी मां के चूतड़ों को याद करके झड़ा।

भूरा: तो गलत भी नहीं है यार ताई के चूतड़ हैं भी तो इतने मोटे

लल्लू भूरा के मुंह से ये सुनकर आंखें चढ़ाकर उसे देखने लगता है, पर अगले ही पल मुस्कुराने लगता है।

लल्लू: वैसे तो अगर तू मेरी मां के बारे में कुछ बोलता तो तेरी गांड छील देता पर हम जिस मोड पर आ गए हैं वहां सब चलता है, वैसे साले चाची की गांड भी कम नहीं थी, एक दम कसी हुई लग रही थी,

भूरा: हां यार ये तो सही कहा तूने,

लल्लू: वैसे हमने सोचा भी नहीं था कि हम पूरे गांव की औरतों की गांड देखने के पीछे पड़ेंगे, और सबसे मस्त गांडे हमारे अपने घरों में होंगी।

दोनों को ऐसे खुल कर बात करने में मजा आ रहा था,

भूरा: अरे हमारा तो ठीक है साले छोटूआ की किस्मत तेज है साले के घर में दो दो हैं।

लल्लू: हां यार ये तो सही कहा तूने। और दोनों ही कम नहीं हैं।

भूरा: पर तुझे क्या लगता है छुटुआ कभी हमारे जितना खुल पाएगा?

लल्लू: खुलेगा नहीं तो खोलना पड़ेगा, साले को अपने साथ लेना पड़ेगा।

भूरा: कुछ योजना बनानी पड़ेगी।

लल्लू: हां बनायेंगे पर मेरा फिर से खड़ा हो गया मां के बारे में सोच कर एक बार और हिलाते हैं।

दोनों फिर से एक एक बार अपना पानी गिराते हैं और फिर बातें करते हुए गांव के अंदर की ओर चल देते हैं।


जारी रहेगी।
 
अध्याय 16

लल्लू: हां यार ये तो सही कहा तूने। और दोनों ही कम नहीं हैं।

भूरा: पर तुझे क्या लगता है छुटुआ कभी हमारे जितना खुल पाएगा?

लल्लू: खुलेगा नहीं तो खोलना पड़ेगा, साले को अपने साथ लेना पड़ेगा।

भूरा: कुछ योजना बनानी पड़ेगी।

लल्लू: हां बनायेंगे पर मेरा फिर से खड़ा हो गया मां के बारे में सोच कर एक बार और हिलाते हैं।

दोनों फिर से एक एक बार अपना पानी गिराते हैं और फिर बातें करते हुए गांव के अंदर की ओर चल देते हैं। अब आगे...

चूल्हा चौका हो चुका था और लता अभी साफ सफाई कर रही थी, इधर आज लल्लू खाना खाने के बाद जो गांव में हांडने निकल जाता था वो घर पर ही था और छुप छुप कर अपनी मां के बदन को निहार रहा था, उसे आज पता चल रहा था कि उसकी मां कितनी कामुक है, इतना भरा हुआ बदन है कमर तो पूछो ही मत और ब्लाउज़ के अंदर कितनी मोटी मोटी चूचियां हैं, जबसे उसने अपनी मां की गांड आज सुबह देखी थी उसका तो मानो सोचने का तरीका ही बदल गया था, सुबह से ही उसका लंड बैठने का नाम नहीं ले रहा था।

लता: तुझे का हुआ आज अभी तक घर में है वैसे तो तुरंत निकल जाता है?

लता ने चूल्हा साफ करते हुए कहा तो लल्लू अपने खयालों से बाहर आया और बोला: वो कुछ नहीं मां बस ऐसे ही। बाहर घूमने से कोई फायदा थोड़े ही है।

लल्लू अपनी मां के फैले हुए चूतड़ों पर आँखें लगाते हुए बोला,

लता: अरे वाह आज तो बड़ी समझदारी दिखा रहा है।

नंदिनी: हां मां समझदारी तो दिखाएगा ही, अब बड़ा जो हो रहा है।

नंदिनी दूसरी ओर से लल्लू को गुस्से से देखते हुए बोली, तो लल्लू की नज़र अपनी बड़ी बहन से मिली और फिर तुंरत झुक गईं।

लता: हां बड़ा तो होगा ही, तभी तो ब्याह करेगा और मेरे लिए बहुरिया लाएगा, और मुझे थोड़ा आराम मिलेगा।

लल्लू: अरे मां तुम भी न कहां ब्याह करवाने लगीं, और रही बात काम की तो मुझे बता दिया करो न मैं कर दूंगा।

लता: अरे देख तो नंदिनी इसकी तबीयत तो ठीक है न? ये घर के काम करवाएगा, जो गिलास भर न उठा के देता हो,

लल्लू: हां मां पर अब से करवाया करूंगा तुम देख लेना।

नंदिनी: अच्छा तो जा फिर अंदर वाला बिस्तर और ये सब खाट जो बिछी पड़ी हैं वो सब समेट।

लल्लू तुरंत उठता है और खाट के पास जाकर चादर उठा कर घड़ी करने लगता है।

नंदिनी और लता उसे देख हैरान भी हो रही होती हैं और खुश भी।

ऐसा ही हाल कुछ भूरा के घर में भी था आज उसकी नजर भी अपनी मां के भरे हुए बदन से नहीं हट रही थी, वहीं काम करते हुए भी रत्ना के दिमाग में रात में हुआ हादसा चल रहा था, उसे बेहद ग्लानि हो रही थी उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, राजू और उसके बाप सुबह का नाश्ता कर घर से निकल गए थे अब घर पर बस भूरा और रत्ना थे, भूरा को भी अपनी मां आज कुछ परेशान दिख रहीं थीं,

भूरा: क्या हुआ मां कोई परेशानी है क्या आज तुम कुछ परेशान लग रही हो,

भूरा का ये सवाल सुन कर रत्ना थोड़ा घबरा गई और खुद को संभालते हुए बोली: नहीं तो लल्ला ऐसा कुछ नहीं है।

भूरा: नहीं मां मैं जानता हूं तुम झूठ बोल रही हो।

रत्ना थोड़ा और डर जाती है और कहती है: झूठ कैसा झूठ?

भूरा: यही कि तुम परेशान हो और उस परेशानी की वजह क्या है वो भी जानता हूं।

ये सुन कर तो एक पल को रत्ना का सिर घूम जाता है उसे लहता है कि भूरा को रात के बारे में पता है क्या, कैसे, क्या उसने मुझे देख लिया?

एक साथ बहुत से खयाल उसके मन में घूमने लगते हैं, और वो चुप होकर ज्यों के त्यों रुक जाती है।

भूरा: मैं जानता हूं मां कि रानी दीदी के ब्याह के बाद तुम अकेली पड़ गई हो घर का सारा काम तुम पर आ गया है, और करते करते तुम थक जाती हो।

ये सुनकर रत्ना के मन में शांति पड़ती है और वो हल्की सी झूठी मुस्कान होंठो पर लाकर कहती है: नहीं लल्ला अब घर का काम तो मेरा ही है, इसमें क्या परेशानी।

भूरा: जानता हूं मां पर तुम कहो न कहो पर कभी कभी तो तुम भी परेशान हो जाती होगी, पर अब से चिंता मत करो अब मैं तुम्हारी मदद किया करूंगा काम में,

रत्ना को अपने बेटे की बात सुन हैरानी होती है और थोड़ा अच्छा भी लगता है

रत्ना: अरे लल्ला तू क्यों करेगा घर के काम? तू मत परेशान हो मैं कर लूंगी।

भूरा: क्यों नहीं कर सकता तुम मेरी प्यारी मां हो और अपनी मां का हाथ बटाने में क्या परेशानी।

भूरा के मुंह से ये सब सुनकर रत्ना को बहुत अच्छा लग रहा था, इतने गहरे मानसिक तनाव के बीच भूरा की सांत्वना भरी बातें उसके मन को पसीज रहीं थीं, वैसे भी रत्ना बहुत ही जल्दी घबराने और डरने वाले स्वभाव की थी, ऐसे स्वभाव वाले व्यक्ति को हमेशा ही किसी के सहारे या सांत्वना की आवश्यकता होती है जो उनका साथ दे या जो कहे कि सब ठीक है। और ऐसे में रत्ना को वो सांत्वना अपने बेटे से मिल रही थी तो उसका मन बहुत से भावों से भर गया,

रत्ना: सच्ची लल्ला?

भूरा: हां मां तुम्हारी कसम।

भूरा ने भी आगे होकर अपनी बाहें मां के बदन के चारों ओर फैलाकर उसको प्यार से गले लगाते हुए कहा,

अपने बेटे के सीने से लग कर रत्ना को एक अचानक से शांति मिली, उसे एक सुरक्षा का भाव मिला अपने बेटे की बाहों में, उसके मन के भाव उमड़ पड़े। रात से मानसिक तनाव को उसके वेग को कैसे भी उसने रोक रखा था वो बांध टूट पड़ा और अचानक से ही वो अपने बेटे के सीने से लग कर फूट पड़ी और रोने लगी।

अपनी मां का यूं रोना देख भूरा घबरा गया और परेशान हो गया उसे समझ नहीं आया कि वो क्यों रो रही है।

भूरा: अरे मां क्या हुआ तुम्हें क्यों रो रही हो? बताओ ना मुझे चिंता हो रही है।

अब रत्ना उसे बताए तो क्या बताए इसीलिए बिना बोले बस रोती रही और अपने दुख को आंसुओं के रास्ते बहाने लगी।

भूरा: मां मत रो मां, अब तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है, मैं हूं न मैं हूं हमेशा तुम्हारे साथ, तुम्हे कोई परेशानी नहीं होने दूंगा,

भूरा को लग रहा था कि घर के काम बहुत अधिक होने से उसकी मां के सब्र का बांध आज टूट पड़ा और इसलिए वो रो रही है, तो उसने भी अपनी बातों से अपनी मां को अपने सीने से लगाए हुए ढांढस बंधाना शुरू कर दिया, अभी उसके मन में अपनी मां के लिए कोई भी कामुक विचार नहीं थे वो बस चिंतित था,

रत्ना को अपने बेटे के साथ उसकी बातें उसके सीने से यूं लग कर रोना बहुत अच्छा लग रहा था, उसे ऐसा भाव दे रहा था कि वो अपने बेटे की बाहों में सुरक्षित है उसे किसी भी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

धीरे धीरे उसके आंसू हल्के होने लगे उसका सुबकना भी बंद हो गया, भूरा उसकी पीठ को सहलाते हुए अब भी उसे सांत्वना दे रहा था उसे समझा रहा था, रत्ना अब चुप हो चुकी थी पर उसका मन नहीं हो रहा था अपने बेटे से अलग होने का,

भूरा: अब तुम ठीक हो मां?

रत्ना ने ये सुन कर अपना चेहरा उसके सीने से हटाया और उठाकर हल्की सी मुस्कान के साथ भूरा को देखा, अपनी मां की प्यारी सी मुस्कान देख कर भूरा के मन को एक अथाह शांति मिली, उसने प्यार से चेहरा झुकाकर अपनी मां के माथे को चूम लिया, रत्ना अपने बेटे के इस प्यार से शर्मा गई और फिर से अपना चेहरा उसके सीने में छुपा लिया, अब भूरा के मन से मां की चिंता हटी तो तुरंत ही मन के कमरे में कामुक विचार घुस गए।

उसे फिर से सुबह का वो दृश्य दिखाई देने लगा, और आंखों के सामने मां के नंगे चूतड़ आ गए, बदन में उत्तेजना होने लगी एक तो वो दृश्य और फिर अभी उसकी मां उससे चिपकी हुई जो थी, उसे डर भी लग रहा था कि अपनी मां के इतने पास होने पर भी वो ऐसा सोच रहा है पजामे में उसका लंड भी कस चुका था, उसे डर था कि कहीं उसकी मां को न पता चल जाए कि उसका लंड खड़ा है, पर उसका डर और बढ़ता इससे पहले ही रत्ना ने अपना सिर उसके सीने से हटाया और फिर दूर हो गई।

रत्ना: चल अब काम करने हैं बहुत लाड़ हो गया।

भूरा: हां चलो न मैं भी मदद करता हूं,

रत्ना: चल आज बहुत से काम करवाऊंगी तुझसे।

दोनों मां बेटे काम में लग जाते हैं।

इधर छोटू आज काफी देर से उठा था, और उस वजह से उसे आज अकेले ही खेत में जाना पड़ा था हगने के लिए, वैसे भी उसका मन भी कुछ पल अकेले रहने का था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि रात भर उसने अपनी सगी मां को चोदा है, अपना लंड उस चूत में डाला है जिससे वो कभी निकला था, ये सोच सोच कर उसका दिमाग़ घूम रहा था, ऐसा मज़ा उसे कभी नहीं आया था, जितना अपनी ही मां की चूत को चोदकर आया था वैसे तो उसने इससे पहले चूत सिर्फ छुप कर ही देखी थी उसने सोचा भी नहीं था कि उसकी पहली चुदाई उसकी मां के साथ ही होगी, और वो भी ऐसी होगी। हगते हुए उसके मन में यही सब चल रहा था हगने के बाद वापिस घर की ओर चलते हुए उसे रास्ते में जो अपनी उम्र के लड़के मिल रहे थे वो खुद की उनसे बड़ा और परिपक्व महसूस कर रहा था, और किस्मत वाला भी, और करे भी क्यों ना आख़िर उसके जैसी किस्मत हर किसी की कहां थी?

हर औरत को अब वो एक अलग ढंग से देख रहा था, अपनी किस्मत पर मन ही मन मुस्कुराते हुए वो घर की ओर चला आ रहा था, घर पहुंचा तो उसकी आँखें उसकी मां को ढूंढने लगी, जो उसे खाना बनाती दिखी, वो जाकर चूल्हे के पास बैठ गया और अपनी मां को एक प्रेमी की तरह देखने लगा, इसी बीच उसकी मां ने उसे देखा और बोली: आ गया लल्ला ले, चाय ले ले, परांठे खाएगा?

छोटू: वो हां मां?

पुष्पा: जा टोकरी से प्लेट लेकर आ अभी देती हूं,

छोटू अपनी मां के कहे अनुसार टोकरी से प्लेट लेने चल दिया और चलते हुए वो सोच में था क्योंकि उसकी मां तो ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे कुछ हुआ ही नहीं, कहां उसे लगा था कि उसके और मां के बीच सब कुछ बदल गया पर मां तो कुछ और ही दिखा रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं, वो सोचने लगा कि बड़े बुजुर्ग सही ही कहते हैं स्त्री के मन की बात कोई नहीं जान सकता, पर मैं क्यों चिंता कर रहा हूं मुझे तो बस रात को मां अपनी चूत की सेवा करने दें दिन में चाहे कैसे भी करें, ये सोचते हुए वो परांठे लेकर बैठ गया। धीरे धीरे नाश्ता करके घर के मर्द घर से निकलने लगे छोटू ने भी नाश्ता कर लिया तो उसने सोचा अब घर पर तो कुछ होने वाला नहीं है लगता नहीं मां कुछ करना तो दूर उसके बारे में बात भी करेंगी तो इसलिए वो भी घर से निकल गया।

इधर लल्लू अपनी मां और बहन के साथ मिलकर पूरी लगन से घर के काम करवा रहा था, तो नंदिनी ने अपनी मां से कहा ये काम करवा रहा है तो मैं नहा लेती हूं, और फिर वो नहाने चली गई, नहाने के बाद नंदिनी सिलाई सीखने के लिए निकल गई, अब घर पर सिर्फ लल्लू और उसकी मां थे, काम लगभग निपट चुके थे,

लता: हो गए काम लल्ला सारे, अब तू भी नहा ले।

लल्लू: हां मां नहा लेता हूं तुम क्या करोगी,

लता: मैं भी बस कुछ कपड़े हैं इन्हें भीगा कर निकाल दूं फिर नहा लूंगी तू नहा ले तब तक,

लल्लू उसकी बात मान कर पटिया पर कपड़े उतार कर नहाने लगता है कुछ पल बाद ही लता भी पटिया पर कपड़े लेकर आ जाती है और एक बाल्टी में घुलने वाले कपड़े डाल देती है और फिर अपनी साड़ी भी उतार कर उसी बाल्टी में डाल देती है और लल्लू की नज़र तुरंत अपनी मां के बदन पर टिक जाती है, लता तो रोज़ ही ऐसे ही कपड़े धोती थी ब्लाउज़ और पेटीकोट में और आज भी बेटे के सामने क्या शर्माना था इसीलिए आज भी अपनी साड़ी को उतार कर बाल्टी में डाल दिया और नल चलाकर बाल्टी भरने लगी,

लल्लू तो अपनी मां को आज वैसे भी अलग दृष्टिकोण से देख रहा था और अभी मां के गदराए बदन को पेटिकोट और ब्लाउज़ में देख तो उसका बदन सिहरने लगा वो उसके हाथ धीरे हो गए, मां का गदराया पेट और कमर देख कर ब्लाउज़ में कसी हुई मोटी चुचियों को देख कर लल्लू का लंड चड्डी में सिर उठाने लगा, ऊपर से लता झुक कर नल चला रही थी तो उसकी मोटी सी गांड और फैल कर बाहर निकल गई थी साथ ही नल चलाने की वज़ह से ऊपर नीचे हो रही थी ये देख देख तो लल्लू का हाल बुरा होने लगा, उसका लंड चड्डी में पूरी तरह से तन चुका था और चड्डी भी गीली थी तो उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे छुपाए,

बाल्टी भरते ही लता ने अपना पेटीकोट का नाड़ा ढीला किया और उसे छाती तक चढ़ा लिया और अपने मुंह में एक छोर दबा लिया और बड़ी आसानी से पेटिकोट के अंदर से ही ब्लाउज़ खोला और उसे भी बाल्टी में डाल दिया, और फिर पेटिकोट को अपनी छाती के ऊपर बांध दिया, ये ऐसी कला है जिसमें हर महिला कुशल होती है, लल्लू के सामने जैसे ही ब्लाउज बाल्टी में गिरा उसने तुरंत आँखें उठा कर ऊपर देखा और अपनी मां को सिर्फ पेटीकोट में देख कर वो उत्तेजना में तड़प उठा, उसका लंड चड्डी में झटके खाने लगा जिसे वो किसी तरह से छुपाए हुए था,

लता: अरे लल्ला कितनी देर नहाएगा अभी मुझे भी नहाना है।

लल्लू: हां हां मां बस हो गया,

लल्लू खुद को संभालते बोला, और लोटे से पानी भरकर अपने बदन पर डालने लगा, लल्लू को डर था कि कहीं मां उसका खड़ा लंड न देख लें, इसलिए वो थोड़ा घूम कर नहाने लगा, इसी बीच लता की नज़र लल्लू की पीठ पर पड़ी,

लता: तू इतना बड़ा हो गया पर नहाने का सहूर नहीं आया तुझे देख पीठ पर मैल जमा पड़ा है।

लल्लू: कहां मां पीठ पर दिखता भी नहीं है और न ही हाथ पहुंचते हैं,

लता: रुक अभी, मैं कर देती हूं

ये कह कर लता उसके पीछे बैठ कर उसकी पीठ घिसने लगती है वहीं अपनी मां के हाथों को महसूस कर लल्लू के बदन में सिहरन होने लगती है, लता उसकी पीठ पर लगे मैल को घिस घिस कर उतारने लगती है,

लता: देख न जाने कब का जमा हुआ है इतना घिसना पड़ रहा है,

लल्लू: क्या करूं मां पीठ पर दिखता तो है नहीं इसीलिए जम गया है।

लता: चल आगे से मुझसे साफ करवा लिया करना।

ले हो गया साफ अब धो ले,

लल्लू ने तुरंत ही लोटे में पानी लिया और अपनी पीठ पर डालने लगा जो कि पीछे बैठी लता पर भी गिर रहा था, पीठ धोने के बाद लल्लू सावधानी से अपनी मां की ओर ही पीठ किए हुए ही खड़ा हुआ और फिर तुंरत अंगोछे को अपनी कमर से लपेट कर गीली चड्डी को उतारा और फिर अंगोछे को कमर से लपेट लिया और फिर मूड कर बैठ गया और अपनी उतारी हुई चड्डी को धोने लगा, लता भी बाल्टी से गिले कपड़े निकाल कर धो रही थी, चड्डी धोते हुए लल्लू की नज़र सामने मां पर पड़ी तो उसकी आँखें जमीं रह गईं, क्योंकि गीले होने की वजह से पेटीकोट लता की चूचियों से चिपक गया था और उसकी चूचियों के आकार को बड़ी कामुकता से दर्शा रहा था, हल्के पीले रंग का होने के कारण वो हल्का पारदर्शी हो चुका था और लल्लू को अपनी मां की मोटी चूचियों के दर्शन भी हल्के हल्के हो रहे थे, उसका लंड तो मानो लोहे का हो चुका था, उसके हाथ उसकी चड्डी पर हल्का हल्का चल रहे थे क्योंकि उसका ध्यान तो मां की चूचियों पर था,

इधर लता की नज़र भी उसके हाथों पर पड़ी तो बोली: अरे कैसे धो रहा है ला मुझे दे दे मैं धो लूंगी,

और हाथ बढ़ाकर उसके सामने से चड्डी उठा ली, अब लल्लू के पास कोई कारण नहीं बचा था रुकने का तो उसे उठना पड़ा और वो उठ कर धुले हुए कपड़े पहनने लगा, पर उसकी नज़र बार बार अपने मां के बदन पर ही जा रही थी, उसके लंड का बड़ा बुरा हाल हो चुका था, इधर लता कपड़े धोने में व्यस्त थी, लल्लू ने कपड़े पहने ही थे कि किवाड़ बजने लगे,

लता: लल्ला देख तो द्वार पर कौन है, कोई बड़ा हो तो बाहर ही रोक दियो मैं नहा रही हूं ना,

लल्लू: ठीक है मां,

ये कह लल्लू द्वार पर गया और किवाड़ खोल कर देखा तो सामने छोटू खड़ा था,

लल्लू: और छोटू साहब कहां रहते हो तुम आजकल मिलते ही नहीं?

छोटू: मैं तो यहीं रहता हूं तू ही नहीं मिलता,

लल्लू: साले मैं और भूरा बुलाने जाते है तुझे तो अम्मा बोलती है तू सो रहा तेरी तबीयत खराब है, अब ये क्या लगा रखा है तूने?

छोटू: अरे वो,

इतने में पीछे से लता की आवाज़ आती है : अरे कौन है लल्लू?

लल्लू: छुटुआ है मां, मैं जा रहा हूं इसके साथ।

लता: अरे रुक जा थोड़ी देर मैं नहा लूं फिर चले जाना, दोनों आ जाओ थोड़ी देर बैठ जाओ घर में ही।

लल्लू: चल आजा।

दोनों अंदर आते हैं छोटू पटिया पर कपड़े धोती लता को देखता है और उसे प्रणाम करता है, सारे बच्चे एक ही उमर के थे तो ऐसे पेटिकोट में रहना दोनों के लिए ही कोई बड़ी बात नहीं थी,

लता: बैठ जा छोटू थोड़ी देर फिर चले जाना, नहा लूं मैं नहीं तो बीच में कोई आए तो किवाड़ खोलने की दिक्कत हो।

छोटू: अरे कोई बात नहीं ताई,

दोनों आंगन में ही बैठ जाते हैं लल्लू अब भी नजरें छुपा छुपा कर अपनी मां को देख रहा था वहीं छोटू की भी नज़र जब से ताई की गीली चुचियों पर पड़ी थी तो वो भी छुप छुप कर उन्हें ताड़ने के मौके ढूंढ रहा था, कुछ ही पलों में दोनों के पजामें में उनके लंड सिर उठा रहे थे, लल्लू का तो खैर बैठा ही नहीं था,

लल्लू चालाकी दिखाते हुए कुछ न कुछ बातें छोटू से किए जा रहा था ताकि उसे या मां को शक न हो और छोटू भी उसकी हर बात का जवाब दे रहा था पर देख दोनों ही लता के बदन को रहे थे,

लता: ए लल्ला ज़रा नल तो चला दियो आकर।

लता ने बोला तो लल्लू खड़ा हुआ और जाकर नल चलाने लगा तो लता कपड़ों की बाल्टी खिसका कर आगे हुईं और नल से निकलती धार के नीचे बाल्टी लगा दी इधर उसके आगे होने से लल्लू की नज़र अपनी मां के पिछवाड़े पर गई और एक बार को तो उसके हाथ से नल का हत्था ही छूट गया, लता का पेटिकोट पीछे से भी गीला था और भीग कर उसके चूतड़ों से चिपका हुआ था, पेटिकोट का कुछ हिस्सा तो उसके चूतड़ों की दरार में भी घुस गया था, लल्लू को तो लग रहा था मानों उसकी मां सुबह की तरह ही जैसे खेत में बैठी थी वैसी ही उसके बगल में नंगी बैठी है, पजामे में उसका लंड ठुमके मारने लगा, वो तो सीधा अपनी मां के पिछवाड़े को घूरने लगा,

आंगन से छोटू भी लता को देख रहा था फिर उसने नज़र ऊपर करके देखा तो लल्लू की नज़र को अपनी मां के पिछवाड़े की ओर पाया तो छोटू सोचने लगा: साला हरामी अपनी मां के पिछवाड़े को देख रहा है, फिर उसके मन में आया मैं उससे क्या ही कह सकता हूं वो तो बस देख ही रहा है मैने तो अपनी मां को चोदा भी है, ये सोच कर छोटू और उत्तेजित होने लगा,

इसी बीच लता उठी और घूम कर बाल्टी में रखे कपड़े निचोड़ने लगी जिसका असर ये हुआ कि अब उसका मुंह लल्लू की ओर हो गया,

लता: रुक जा लल्ला बाल्टी भर गई,

लल्लू का तो ध्यान ही नहीं था अपनी मां की आवाज़ सुनकर उसने नल रोका और खड़ा हो गया, क्योंकि अब उसकी मां का मुंह उसी की ओर था तो उसने खुद को संभाला और अपनी नजर मां के बदन से हटाई और उसने छोटू को देखा जो कि आंखें फाड़े टक टकी लगाकर उन दोनों की ओर देखा जा रहा था उसने सोचा ये क्यों पागलों की तरह देख रहा है तभी उसे अचानक से समझ आया कि घूमने की वजह से उसकी मां का पिछवाड़ा अब छोटू की ओर हो गया था मतलब छोटू मेरी मां के चूतड़ों को देख रहा है, पर ये सोचकर भी उसे गुस्सा नहीं आ रहा था बल्कि उत्तेजना हो रही थी,

इधर छोटू ने जब लता ताई के पेटीकोट में भीगे चूतड़ देखे तो उसका तो लंड हिलोरे मारने लगा, वो सोचने लगा ऐसा नज़ारा हो तो कौन अपने आपको रोक सकता है बेटा हो या बाप, मेरी मां होती तो मैं तो अब तक चोदने लगता, इसमें बेचारे लल्लू का क्या दोष वो तो बस देख ही रहा था।

छोटू ये सोचते हुए देखने में इतना खो गया था कि उसे पता ही नहीं चला कि कब लल्लू आ कर उसके बगल में बैठ गया,

अब दोनों दोस्तों के सामने एक ही नजारा था, लल्लू सोच रहा था अब मैने भी तो इसकी मां और चाची के चूतड़ों को देखा है तो ये तो कपड़े के ऊपर से देख रहा है, दोनों को ही लता के बदन ने उत्तेजित कर दिया था, दोनों के ही लंड बिल्कुल तन कर खड़े थे,

इसी बीच लता कपड़े रखने के लिए झुकी तो और उसकी गांड फैल गई जिसका असर दोनों ही दोस्तों पर हुआ और दोनों के मुंह से एक हल्की सी आह निकल गई, लता कुछ देर तक कपड़े निचोड़ती रही और दोनों ही उसे टक टकी लगाकर देखते रहे, कपड़े निचोड़ने के बाद लता ने अपनी साड़ी और पेटीकोट उठाया और बगल में कच्चे से स्नानघर में घुस गई, तब जाकर दोनों की नजर उसके बदन से हटी, लल्लू को ये तो समझ आ गया था कि छोटू भी उसकी मां के चूतड़ों को देख रहा था पर इसकी गलती भी क्या है ऐसे चूतड़ देख कर कौन खुद को रोक सकता है, वैसे इससे इतना तो समझ आ गया कि साला हरामी ये भी है मेरे और भूरा की तरह जब मेरे सामने मेरी मां के चूतड़ों को देख सकता है तो हमारा साथ भी दे सकता है, पर साले से बात कैसे करूं समझ नहीं आ रहा?

लल्लू अपनी उधेड़बुन में था तो छोटू ये सोच घबरा रहा था कि कहीं लल्लू ने उसे ताई के पिछवाड़े को घूरते हुए देख तो नहीं लिया, साला वैसे भी गुस्सा जल्दी हो जाता है क्या करूं?

दोनों ही अपनी अपनी सोच में लगे हुए थे, इतने में लता नहा कर निकली और बोली: अब जा सकते हो तुम लोग।

लल्लू ने अपनी मां की बात सुनी और फिर छोटू को बोला: चल।

छोटू भी उसके पीछे पीछे चल दिया।


सत्तू अपने घर में एक खाट पर लेता हुआ था और नंगे चित्रों वाली किताब को देख देख कर अपने लंड को सहला रहा था तभी बाहर किवाड़ पर कुछ आहट हुई तो उसने तुंरत किताब को तकिए के नीचे सरका दिया इतने में ही एक भरे बदन की औरत आंगन में प्रवेश करती है।

सत्तू: अब आई हो मां इतना टेम लगा देती हो तुम तो।

झुमरी: अरे वो वो तुझे तो पता है न औरतें बातों में लग जाती हैं तो रुकती कहां हैं।

सत्तू: अच्छा तुम वहां बातों में लगी रहो और मुझे अभी तक चाय भी नहीं मिली।

झुमरी: चढ़ा रही हूं तेरी चाय, ये नहीं कि खुद ही बना ले कभी सब काम मैं ही कर के दूं तुझे।

झुमरी चाय चढ़ाते हुए कहती है,

सत्तू: अरे मां तुम्हें पता है ना बाहर के सारे काम कर लेता हूं मैं बस घर के काम नहीं होते मुझसे।

सत्तू भी उठ कर अपनी मां के पास चूल्हे के बगल में आकर बैठ जाता है

झुमरी: तभी कहती हूं अब ब्याह करले, बहु आ जाएगी तो मुझे भी आराम मिल जाएगा, और तुझे भी बिस्तर पर चाय मिल जाया करेगी।

सत्तू: का मां तुम भी ऐसे थोड़े ही होता है ब्याह, उसके लिए लड़की चाहिए अच्छी सी और फिर बहुत सारा पैसा भी लगता है ब्याह में,

झुमरी: तो लड़की मैं ढूंढ लूंगी पैसा तू कमा।

दोनों हंसने लगते हैं,

सत्तू: पैसा कमाना है तभी तो शहर के सबसे ज़्यादा चक्कर लगाता हूं पूरे गांव में।

झुमरी: जानती हूं लल्ला, तूने ही तो सब संभाल रखा है,

झुमरी उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फिराते हुए कहती है,

सत्तू: अच्छा मां कल तुम खेत गई थी क्या?

ये सुनते ही झुमरी के चेहरे का रंग उड़ जाता है,

झुमरी: मैं न नहीं तो क्या क्या हुआ क्यों पूछ रहा है?

सत्तू: कुछ नहीं वो एक बार देखना था सब्जियों की क्या हालत है, चलो कोई नहीं आज मैं ही देख आऊंगा।

झुमरी: हां वो घर के काम से समय ही नहीं मिला पूरे दिन इसलिए नहीं जा पाई।

सत्तू: कोई बात नहीं मां मैं देख आऊंगा आज।

झुमरी: ठीक ले बन गई तेरी चाय,

झुमरी उसे चाय देती है और सत्तू चाय लेकर बापिस खाट पर बैठ जाता है वहीं झुमरी चूल्हे की ओर देखते हुए किसी सोच में डूब जाती है।

झुमरी का परिवार हमेशा से ही छोटा था सत्तू के बाप से ब्याह होकर आई थी तो घर में उसकी सास और उसके पति ही थे, ससुर पहले ही पधार गए थे उसके पति की बड़ी बहन थी उसका भी ब्याह हो चुका था, और अभी तो उसके घर में सिर्फ दो ही लोग बचे थे, उसके पति और सत्तू के बाप का निधन तो 8 साल पहले ही नदी में डूब कर हो गया था शव तक नहीं मिला था बेचारे का, तब तो सत्तू बहुत छोटा था फिर भी बेचारे को उमर से पहले बढ़ा होना पड़ा, खूब मेहनत की और अपनी मां का भरपूर साथ दिया था तब जाकर उन्होंने वो कठिन समय काटा था, यूं तो झुमरी सत्तू को दिखाती थी कि उससे अब मेहनत नहीं होती और उसकी उम्र हो चुकी है पर अभी उसकी उमर ही क्या था छत्तीस वर्ष, और बदन पूरा भरा हुआ, खेतों में खूब काम किया था उसने तो बदन बिल्कुल कसा हुआ था, नितम्ब फैले हुए जो साड़ी के अंदर होते हुए भी लोगों पर अलग ही जादू करते थे, वहीं मोटी मोटी चूचियां थीं जिनकी कसावट अब भी बाकी थी, कमर और पेट गदराया हुआ था पर मोटापा बिलकुल नहीं था, पति की मौत के बाद कुछ समय तो वो सूखती सी गई पर फिर उसने अपना सारा ध्यान अपने बेटे और खेतों में लगा दिया था और जबसे सत्तू ने काम संभाला तब से तो उसका बदन भरता चला गया और अब ये कहना गलत नहीं होगा कि वो गांव की सबसे कामुक औरतों में से एक थी।

नीलम और नंदिनी रजनी भाभी के पास बैठे हुए थे और सिलाई सीख रहे थे पर आज मशीन ने उन्हें धोखा दे दिया था और चल नहीं रही थी,

नीलम: क्या हुआ भाभी नहीं चलेगी क्या?

रजनी: नहीं भाभी की ननद लग तो नहीं रहा,

रजनी मशीन को ठीक करने की कोशिश करते हुए बोली...

नीलम: लो गया आज का दिन बेकार।

नंदिनी: अरे तू चुप कर गलत ही बोलेगी।

रजनी मशीन को एक ओर सरका देती है और कहती है: अब इसे तो तुम्हारे भैया ही सही करवा कर लायेंगे, अब बताओ तुम क्यों लड़ रही हो आपस में।

नंदिनी: ये नीलम है भाभी हमेशा उल्टा ही बोलती है, अब बोल रही है दिन खराब हो गया,

नीलम: ठीक ही तो बोल रही हूं, अब मशीन खराब हो गई तो और कहां सीख पाएंगे।

नंदिनी: अरे सिलाई ही तो नहीं सीख सकते और भी बहुत कुछ सिखा सकती हैं भाभी क्यों भाभी?

रजनी: हां बिल्कुल बताओ तुम्हें क्या सीखना है सब कुछ सिखा सकती हूं।

नंदिनी: भाभी सिखाना है तो इस नीलम को कुछ गुण सिखाओ के पति को बिस्तर पर कैसे खुश रखना होता है।

नीलम: धत्त कितनी कुतिया है तू, मेरा नाम लगा कर अपने मन की क्यों पूछ रही है तुझे जानना है तो अपने लिए पूछ।

नंदिनी: क्यों तुझे नहीं रखना अपने पति को खुश?

नीलम: वो मैं रख लूंगी जब पति होगा तब, तू अपनी सोच।

नंदिनी: कामुक बातों से जैसे तू दूर भागती है न पति तुझे छोड़ कर भाग जाएगा। हैं न भाभी?

नीलम: भाग जाए तो भाग जाए मुझे क्या?

नंदिनी: भाभी अभी ये मज़ाक समझ रही है मेरी बातों को, तुम ही बताओ इसे।

रजनी: अच्छा तो आज तुम दोनों को ये सीखना है कि पति को बिस्तर पर कैसे खुश रखना है।

नीलम: मुझे नहीं भाभी इसे ही सीखना है।

नंदिनी: हां मुझे ही सीखना है तू अपने कान बंद कर ले, बताओ भाभी तुम।

रजनी: वैसे नीलम नंदिनी की ये बात सच है कि अगर पति बिस्तर पर खुश नहीं है तो फिर वो उखड़ा उखड़ा सा रहता है और हो सकता है बाहर भी मुंह मारने लगे।

नंदिनी: देखा अब बोल?

नीलम: मतलब भाभी, ये तो पत्नी के साथ गलत हुआ ना।

रजनी: देख जैसे पेट की भूख होती है न वैसे ही मर्दों को बदन की भूख भी होती है और अगर पत्नी से वो शांत नहीं होती तो पति बाहर ही जाएगा ना।

नंदिनी: बिल्कुल भाभी, सीधी सी बात है ये तो।

नीलम: तो भाभी पति ऐसा न करे उसके लिए पत्नी को क्या करना चाहिए?

रजनी: देखो हर आदमी को ऐसी औरत पसंद आती है जो सबके सामने खूब शर्माए, और बिल्कुल संस्कारी बन कर रहे पर बिस्तर पर बिल्कुल इसकी उलट हो।

नंदिनी: उलट मतलब?

रजनी: मतलब कि जो बिस्तर पर गरम हो, खुल कर अपने पति का साथ दे, उसके सामने शर्माती ही न रहे, बल्कि बिस्तर पर पहुंच कर शर्म को कपड़े के साथ ही उतार देना चाहिए। पति के साथ गंदी गंदी बातें करनी चाहिए, वो जैसा चाहे वैसा करोगे तो पति तुम्हें बहुत खुश रखेगा।

नंदिनी: सही में भाभी मैं तो बिल्कुल नहीं शर्माऊंगी।

रजनी: हां तुझे देख कर लगता है शर्माना तो तेरे पति को पड़ेगा।

इस पर तीनों हंसने लगती हैं,

नीलम: पर भाभी अगर शर्म आती हो तो अचानक से कैसे चली जाएगी वो तो आएगी ही न।

रजनी: बिल्कुल आएगी, तभी तो उसे धीरे धीरे कम करना चाहिए,

नीलम: पर भाभी कैसे? मुझे तो तुम दोनों के सामने भी शर्म आती है ऐसी बातें करने में।

नंदिनी: और पति तो शुरू शुरू में अनजान होगा भाभी, उसके सामने तो ये बोल भी नहीं पाएगी।

रजनी: वही तो, इसीलिए तुझे अभी से शुरुआत करनी होगी नीलम, नहीं तो बाद में परेशानी होगी।

नीलम: पर अभी से कैसे करूं भाभी यही तो समझ नहीं आता।

नंदिनी: मैं बताऊं, पहले तो तुझे ये नाटक करना बंद करना होगा कि तुझे ये सब पसंद नहीं आता या तेरा मन नहीं करता ये बातें करने का।

नंदिनी की बातें सुनकर नीलम चुप हो गई और रजनी की ओर देखने लगी।

रजनी: नंदिनी सही कह रही है नीलम, मैं मानती हूं हमें बचपन से यही सिखाया जाता है कि ये सब गंदी बाते हैं और इन सब से दूर रहना चाहिए, पर सच्चाई इससे अलग है।

नीलम: क्या है सच्चाई,

रजनी: यही कि हर कोई ये बातें करना चाहता है और करता भी है बस मना इसीलिए किया जाता है ताकि शर्म बनी रही, बाकी ऐसी कौन सी सहेलियां नहीं होंगी जो एक दूसरे की रात की कहानियां नहीं सुनती होंगी।

नंदिनी: समझी तो सबसे पहले हमारे साथ खुल, और खुल कर बात किया कर, इतना तो मैं भी तुझे समझती हूं कि मज़ा तुझे भी आता है बस मानना नहीं चाहती।

रजनी: सच में नीलम ये सब समाज की बातें खोखली हैं अगर पति खुश रहेगा साथ रहेगा तो समाज का फर्क नहीं पड़ता पर अगर पति ही अलग होने लगा तो समाज जीना मुश्किल कर देगा चाहे कितनी ही संस्कारी बन के रहो।

नीलम: सही कह रही हो भाभी।

रजनी: अब मुझे ही देख लो, अपने पति को पिता बनने का सुख नहीं दे पाई आज तक, समाज मुझे क्या क्या कहता है ये तुमसे छुपा नहीं पर मैंने अपने पति को कभी बिस्तर से असंतुष्ट होकर नहीं उठने दिया और शायद उसी के कारण हम आज तक साथ हैं नहीं तो समाज तो अब तक मुझे बांझ बना कर उनकी दूसरी शादी करा देता।

रजनी ने गंभीर होते हुए कहा तो वो दोनों भी गंभीर हो गईं, कुछ देर सन्नाटा रहा फिर रजनी बोली: अरे तुम लोग क्यों मुंह बना कर बैठ गईं, सीखना नहीं हैं क्या क्या करना होता है बिस्तर पर।

ये सुन कर दोनों हीं मुस्कुराने लगीं और रजनी उन्हें संभोग का ज्ञान देने लगी।

फुलवा आंगन में लेटी थी उसके बदन में हल्का हल्का दर्द था वह आंखें बंद करके लेटी थी और उसके सामने बस अपनी सुबह की चुदाई आ रही थी, पिछले दो दिनों से कोई अनजान साया उसे चोद रहा था और फुलवा उसकी चुदाई से पागल सी होती जा रही थी, खैर सुबह जल्दी उठने और फिर चुदाई की थकान से लेट कर उसे कुछ ही देर में नींद आ गई, घर के सारे मर्द बाहर थे नीलम सिलाई सीखने गई थी, घर पर सिर्फ दोनों बहुएं और फुलवा थीं,

सुधा: जीजी मैं का कह रही हूं आज फुर्सत है तो चलो कमरा ही साफ कर लेते हैं।

पुष्पा: कह तो सही रही है नहीं तो रोज ये काम टलता रहता है, जाले भी बहुत हो गए हैं कमरों में, पहले कौनसा करें?

सुधा: पहले तुम्हारा वाला कर लेते हैं

पुष्पा: चल ठीक है, आजा।

दोनों जल्दी से कमरे में पहुंचते हैं,

पुष्पा: मैं बिस्तर समेटती हूं तू तब तक संदूक के ऊपर से कपड़े हटा,

सुधा: ठीक है दीदी,

पुष्पा बिस्तर की ओर बढ़ती है और पास जाती है तो उसे बिस्तर पर हुई उसकी और उसके बेटे के बीच की चुदाई के दृश्य दिखाई देने लगते हैं और उसका बदन सिहरने लगता है, फिर से वो उत्तेजित होने लगती है, उसकी चूत नम होने लगती है, वो एक पल को रुक जाती है, बिस्तर को देखते हुए उसे एक एक पल याद आने लगता है कि कैसे इसी बिस्तर पर रात पर उसने अपने बेटे का लंड अपनी चूत में लिया और चुदवाया, अभी भी एक कम्पन उसकी चूत में उसे महसूस हो रहा था, और उसकी उत्तेजना को बढ़ा रहा था, इधर सुधा ने संदूक के ऊपर से कपड़े हटाए और बोली: दीदी इन्हें कहां रखूं?

पर पुष्पा ने कुछ जवाब नहीं दिया तो सुधा ने पुष्पा की ओर देखा जो बैठ कर बिस्तर को देखे जा रही थी, सुधा को समझ नहीं आया कि उसकी जेठानी क्या कर रही है तो उसने कपड़ों को अलग रखा और पुष्पा के पास गई और बगल में बैठते हुए उसके कंधे पर हाथ रख कर हिलाया और पूछा: क्या हुआ दीदी कहां खो गई,

तब जाकर पुष्पा अपने खयालों से बाहर निकली और बगल में अपनी देवरानी को बैठा पाया,

सुधा: क्या हुआ दीदी ऐसे क्यों बैठी हो?

पुष्पा को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले वो कभी सुधा को देखती तो कभी बिस्तर को, और फिर अचानक से उसके मन में न जाने क्या आया कि उसने आगे झुक कर अपने होंठ सुधा के होंठों से जोड़ दिए।


जारी रहेगी।
 
अध्याय 17


तब जाकर पुष्पा अपने खयालों से बाहर निकली और बगल में अपनी देवरानी को बैठा पाया,

सुधा: क्या हुआ दीदी ऐसे क्यों बैठी हो?

पुष्पा को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले वो कभी सुधा को देखती तो कभी बिस्तर को, और फिर अचानक से उसके मन में न जाने क्या आया कि उसने आगे झुक कर अपने होंठ सुधा के होंठों से जोड़ दिए। अब आगे,

सुधा तो अपनी जेठानी की इस हरकत से पूरी तरह चौंक गई, क्योंकि ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा होगा, पर जब तक वो कुछ प्रतिक्रिया करती तब तक तो पुष्पा ने उसे पीछे धकेल लिया था और स्वयं उसके ऊपर चढ़ गई थी और सुधा के होंठों को ऐसे चूस रही थी मानो पकी हुई अमिया हो,

सुधा जो हमेशा से ही थोड़ी चुलबुली रही थी और हंसी ठिठोली में आगे रहती थी आज पहली बार उसकी जेठानी ने उसे चौंका दिया था, पर कुछ ही पलों में उसने होश संभाला और जो हो रहा था उसका एहसास जैसे ही उसे हुआ तो पुष्पा के होंठों से उठती तरंगें उसके बदन में फैलने लगीं, और उनका असर कुछ ऐसा हुआ कि कुछ ही पलों में सुधा भी पूरा साथ देने लगी और अपनी जेठानी के होंठों को चूसने लगीं, दोनों ओर से बराबरी की आग थी तो फैलनी ही थी, सुधा हमेशा की तरह एक बार फिर से भारी पड़ने लगी और उसने पुष्पा को पलटा और खुद ऊपर आ गई पर दोनों के होंठ एक पल के लिए भी अलग नहीं हुए, सुधा ने ऊपर आकर चुंबन को और आगे बढ़ाया और अपनी जीभ अपनी जेठानी के मुंह में सरका दी, जिसके घुसते ही पुष्पा ने भी उसका स्वागत बड़े अच्छे से किया और कुछ ही पलों में उसके मुंह में दोनों की जीभ कुश्ती कर रही थी,

पुष्पा के हाथ अपने आप सुधा के चूतड़ों पर पहुंच गए थे और होंठों और जीभ की कुश्ती की आक्रामकता के अनुसार ही चूतड़ों के मांस को अपनी उंगलियों से साड़ी के ऊपर से ही गूंथ रहे थे,

वहीं सुधा भी कोई पीछे रहने वालों में से नहीं थी, उसके हाथ भी तो ऊपर थे और पुष्पा की मोटी चूचियों को ब्लाउज़ के ऊपर से ही मसल रहे थे, जिससे दोनों की ही उत्तेजना हर पल के साथ बढ़ती जा रही थी,

कुछ पल बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो दोनों ही बुरी तरह हाँफ रहे थे, पर अभी सांस लेने के लिए भी न दोनों के पास समय था और न ही संयम,

सुधा ने होंठों को छोड़ा तो पुष्पा के चेहरे और गर्दन को चूमने लगी, पुष्पा तो उत्तेजना से पागल हो कर सिसकने लगी, सुधा के हाथों का प्रहार लगातार उसकी चूचियों पर जारी था,

सुधा अपनी जेठानी के बदन को ऐसे चाट रही थी जैसे कोई बिल्ली मलाई को चाटती है, पुष्पा भी सुधा की हरकतों से आहें भर रही थी, उसका पूरा बदन उत्तेजना की गर्मी में जल रहा था,

सुधा गर्दन से नीचे सरकती हुई पुष्पा की छाती तक आ गई थी और ब्लाउज के ऊपर से ही उसकी चूचियों को चूसने की कोशिश कर रही थी और पुष्पा मानो पागल हुए जा रही थी, इसी तरह सुधा और नीचे बड़ी और पुष्पा के पल्लू को पकड़ कर एक ओर कर दिया और अब उसके सामने पुष्पा का मांसल पेट था जिसे देखते ही सुधा खुद को रोक नहीं पाई और पागलों की तरह पुष्पा के पेट को चाटने चूमने लगी, और इसका असर पुष्पा के बदन पर कुछ ऐसा हो रहा था कि वो लेटे हुए मचल रही थी, उसकी सांसे तेज तेज चल रहीं थी मुंह से सिसकियों के अलावा कुछ नहीं निकल रहा था, सुधा ने पेट चाटते हुए पुष्पा की कमर में फंसी साड़ी को पकड़ कर थोड़ा सा नीचे खिसकाया जिससे पुष्पा की साड़ी नीचे हुई तो उसकी गोल गहरी कामुक नाभी उसके सामने आ गई और सुधा ने उसे देख अपनी जीभ उस पर लगाई ही थी कि बाहर से उसकी सास फुलवा की आवाज़ आई।

फुलवा: अरे बहू ओह बहू कहां मर गईं दोनों।

आवाज़ सुनकर दोनों तुरंत चौंक कर उठ कर बैठ गईं एक दूसरे से अलग हो कर, और अपने अपने कपड़े सही करने लगी।

पुष्पा: डोकरी (बुढ़िया) को भी चैन नहीं है।

पुष्पा ने गुस्से में कहा तो सुधा थोड़ी हैरान हो गई क्योंकि इससे पहले सुधा ने कभी भी पुष्पा को अपनी सास के बारे में ऐसे बात करते नहीं सुना था, दोनों जल्दी से कमरे से बाहर निकल जाती हैं।

प्यारेलाल का मन आज बड़ा ही प्रफुल्लित भी हो रहा था साथ ही असमंजस में भी था, बार बार उसके मन में वही विचार आ रहे थे कि रात में आखिर जो हुआ वो हुआ कैसे, हमें पूरा विश्वास है कि हमने रात में चुदाई की थी और वो राजकुमार की अम्मा ही थी उसकी धोती पहन कर और कौन आ सकता है? और फिर अपनी धोती छोड़ कर भी चली गई, पर ऐसा कहां होता है मरने के बाद भी कभी कोई बापिस आता है, कुछ समझ नहीं आ रहा, क्या पता ये धोती ही दूसरी हो मुझसे ही कुछ भूल हो रही हो, एक काम करता हूं बहु से कहता हूं कि एक बार वो संदूक खोल कर देख ले धोती उसमें है कि नहीं।

ये ही सोच कर प्यारेलाल अपने बिस्तर के नीचे से धोती निकालता है और घर के अंदर पहुंच कर आवाज़ देता है, बहू सुन तो ज़रा,

रत्ना जो दोपहर का काम निपटा कर सोई हुई थी वैसे भी रात में उसे ठीक से नींद नहीं आई थी तो वो गहरी नींद में थी, तो कई बार आवाज़ लगाने पर भी रत्ना नहीं उठती तो प्यारेलाल आगे बढ़ कमरे में झांकता है तो अपनी बहू को सोता पाता है, और तुरंत पीछे हो जाता है, और सोचता है: अरे बहू तो सो रही है बेचारी काम भी तो बहुत करती है सोने देता हूं धोती के बारे में बाद में पूछ लूंगा। और ये सोच कर प्यारेलाल धोती को वहीं कमरे के बाहर ही खाट पर रख कर बाहर निकल जाता है, उसके जाने के करीब आधे घंटे बाद रत्ना की नींद खुलती है तो अपने कमरे से बाहर आती है और खाने की तैयारी से पहले आंगन में झाड़ू लगाने लगती है और झाड़ू लगाते हुए उसकी नज़र उस धोती पर पड़ती है जो प्यारेलाल अभी रख कर गया था, उस धोती को देख रत्ना को झटका लगता है और वो तुरंत उठ कर धोती को उठाती है और कमरे में जाकर छुपा देती है, ये सब करते हुए उसका मन फिर से रात की घटना को याद कर तेज़ी से धड़कने लगता है, पर वो सब याद कर उसके बदन में एक उत्तेजना का भी एहसास होता है। खैर अपने दिमाग को झटक कर रत्ना बापिस अपने कामों में लग जाती है।

छोटू और लल्लू, उसके घर से निकल कर सीधा जंगल के किनारे की ओर जाते हैं, कुछ देर पहले लता के बदन को नहाते हुए देख कर दोनों के ही लंड तने हुए थे, छोटू मन ही मन थोड़ा घबरा रहा कि लल्लू ने उसे ताई को ताड़ता हुआ देख लिया था वहीं लल्लू के मन में अलग ही विचार चल रहे थे कि छोटू को अपने साथ कैसे शामिल किया जाए,

छोटू: अरे ये चूतिया तो पहले से ही यहां है।

छोटू अड्डे पर पहुंच कर वहां पहले से बैठे भूरा को देख कर कहता है।

भूरा: हां आजा बेटा तेरी गांड मारूंगा आज इसलिए पहले से तेल लगा रहा था लंड में।

छोटू: अरे चल ने लोडू।

तीनों जल्दी ही उसी फटी पुरानी चादर को बिछाकर घेरा बना कर बैठ जाते है।

भूरा: चलो बताओ फिर क्या करना है?

छोटू: करना क्या है वही करना है जो हर दिन करते हैं,

लल्लू: हां पर यार छोटू एक ही चीज़ करने में अब मज़ा नहीं आता,

लल्लू ने छुपकर भूरा को आंख मारते हुए कहा जिससे भूरा भी उसका साथ दे,

भूरा: हां यार ये बात तो सही कही।

छोटू: फिर क्या करें तेरी गांड मारें?

इस पर लल्लू और छोटू हंसने लगते हैं और भूरा मुंह बना लेता है।

भूरा: गांड तेरी न मार लूं मैं मादरचोद।

छोटू भूरा के मुंह से मादरचोद सुनता है तो उसे अपनी मां के साथ चुदाई का खयाल आ जाता है और उसके बदन में सिहरन फैल जाती है।

लल्लू: अरे अब लड़ना बंद करो और कुछ ऐसा सोचो कि लंड फनकारने लगे।

छोटू: पर ऐसा क्या हो सकता है?

छोटू बात को आगे बढ़ाते हुए कहता है,

लल्लू: तू बता तू अभी क्या सोच रहा है जो तेरा लंड बिल्कुल तनकर खड़ा है,

लल्लू छोटू के पजामे की ओर इशारा करता है जहां छोटू के लंड ने तम्बू बनाया हुआ था,

छोटू ये सुन थोड़ा सकुचा जाता है, अब कैसे बताए कि अपनी और मां की चुदाई सोच कर ये खड़ा है,

छोटू: अरे ये तो बस ऐसे ही,

भूरा: ऐसे ही तो नहीं होगा बेटा कुछ तो बात होगी जो तू बता नहीं रहा।

छोटू: अरे तू चुप कर चूतिया कहीं का, तुझे कुछ नहीं पता,

लल्लू: पर बेटा मुझे पता है तेरा कब से और क्यों खड़ा है,

छोटू: तुझे पता है मतलब क्या पता है? छोटू घबराते हुए कहता है।

लल्लू: अभी हम कहां से आ रहे हैं?

छोटू: तेरे घर से।

लल्लू: और वहां तू क्या देख रहा था?

छोटू: क्या क्या देख रहा था कुछ भी तो नहीं देख रहा था।

लल्लू: देख बन मत मैं तब से ही देख रहा हूं तुझे छोटू।

लल्लू थोड़ा आवाज भारी करते हुए बोलता है तो छोटू की गांड लुपलुपने लगती है फिर भी छोटू हिम्मत जुटा कर जवाब देता है।

छोटू: क्या देख रहा था बता तो।

लल्लू: यही जब हम घर पर थे तो मां नहा रही थी और तू उन्हें घूर रहा था और तभी से तेरा लंड भी खड़ा हुआ है।

ये सुनकर तो छोटू की सिट्टी पिट्टी गुल हो जाती है और बेचारे का चेहरा सफेद पड़ जाता है,

भूरा: हैं रे लल्लू सच में छोटू ताई को देख रहा था नहाते हुए?

लल्लू: हां यार मैं इसे तबसे ही देख रहा हूं,

छोटू को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले उसे लग रहा था आज सच में लल्लू उसकी गांड फाड़ देगा,

भूरा: अच्छा तो फिर तू एक बात बता कि तू क्या देख रहा था लंड तो तबसे तेरा भी खड़ा है?

भूरा की ये बात सुनकर छोटू तुरंत लल्लू के पजामे में बने तम्बू को देखता है और उसे अपने बचने की थोड़ी आशा दिखती है, वहीं वो सोचता है आज पहली बार भूरा ने कुछ काम की बात बोली है।

छोटू: हां और मैं भी देख रहा था तू भी तो ताई को घूर रहा था जब वो नहा रहीं थी तब,

लल्लू:हट कुछ भी मत बोल।

भूरा: सच में छोटुआ? ये देख रहा था ताई को?

छोटू: अरे सच में भूरा माई कसम।

भूरा: क्यों भाई लल्लू अब क्या बोलेगा?

दोनों लल्लू की ओर देखते हैं और लल्लू थोड़ा नज़रें झुकाए रखता है और कुछ नहीं बोलता।

छोटू: अब कुछ बोलता क्यों नहीं बोल न। छोटू को बड़ी शांति मिल रही थी कि बात उसे हट कर लल्लू पर पहुंच गई थी।

लल्लू ये सुनकर अपनी नज़रें उठाता है और फिर मुस्कुराने लगता है, उसकी मुस्कान देख कर छोटू असमंजस में पड़ जाता है।

लल्लू: अब क्या करूं यार मां का बदन ही ऐसा है कि बिना देखे रहा नहीं जाता और देख लो तो लंड खड़ा हो जाता है।

छोटू ये सुनकर तो बिल्कुल हैरान रह जाता है उसे यकीन नहीं होता कि लल्लू अपनी मां के बारे में ऐसा बोल रहा है,

भूरा: हां यार ये तो तूने सही कहा मैं भी अपनी मां को देखता हूं तो लंड बैठता ही नहीं।

भूरा की बात सुनकर तो छोटू के चेहरे से हवाइयां उड़ने लगती हैं, वहीं भूरा और लल्लू छोटू के चेहरे को देख कर मजे ले रहे होते हैं।

छोटू: अरे तुम लोग ये क्या बोल रहे हो सालों?

भूरा: अरे यार इसे और परेशान मत कर, बता दे इसे पूरी बात।

छोटू: कैसी बात?

लल्लू: अभी तेरी जबसे तबीयत बिगड़ी है उस बीच कुछ ऐसा हुआ है जिससे हमारे सोचने का तरीका ही बदल गया।

छोटू: क्या हुआ?

लल्लू: ठीक है बताते हैं पर पूरी बात बिना मुंह बनाए और ध्यान से सुनियो।

छोटू: ठीक है बता,

फिर लल्लू और भूरा उसे शुरू से सारी बात बताते हैं कि कैसे गलती से उन्होंने चारों औरतों की गांड को देखा और कैसे उन लोगों के दिमाग में उनकी गांड की छाप पड़ गई, और अब वो लोग उस छाप को अपने दिमाग से निकाल नहीं पा रहे और कैसे वो लोग अपनी अपनी मां की गांड के दीवाने हो गए, है और कैसे दोनों ने अपनी अपनी मां के नाम की मूठ भी मारी,

छोटू सारी कहानी को सांसे थामे सुन रहा था,

लल्लू: देख ये थी सारी बात, अब हम लोगों को बस यही परेशानी थी, कि आज तक हमने जो किया तीनों ने साथ किया और ये भी हम अकेले करें ऐसा कैसे हो सकता था।

भूरा: हां यार अच्छा हो या बुरा, सही हो या गलत हमेशा साथ रहेंगे। अब तू बता तू क्या कहता है।

छोटू सारी बात सुनकर चुप था, जहां लल्लू और भूरा को लग रहा था कि छोटू को बुरा लगा है वहीं छोटू मन ही मन ये सोच रहा था कि ये दोनों कितने अच्छे दोस्त हैं मेरे बताओ मूठ भी मेरे बिना नहीं मार सकते, और मैं हूं जो कि अपनी मां को चोद चुका हूं और इन्हें कुछ भी नहीं बताया, अब क्या करूं अपने और मां के बारे में बता दूं? नहीं नहीं ये सही नहीं होगा इससे मां की बदनामी होने का खतरा है, पर एक काम कर सकता हूं इनका साथ तो दे सकता हूं।

लल्लू: बोल न कुछ,

दोनों उसकी प्रतिक्रिया का इंतेज़ार कर रहे थे,

छोटू: क्या बोलना है चलो अपनी अपनी मां के नाम की मूठ मारते हैं।

छोटू मुस्कुराते हुए कहता है तो दोनों खुशी से उसके गले लग जाते हैं,

भूरा: जे बात,

लल्लू: मुझे पता था हमारा छुटुआ हमसे अलग हो ही नहीं सकता।

छोटू: हम लोग अलग कैसे हो सकते हैं जो करेंगे साथ करेगें ।

भूरा: बिल्कुल, अब यार रहा नहीं जा रहा एक बार मुठिया लेते हैं तभी मज़ा आएगा,

छोटू: हां यार, पर लल्लू तू बुरा न माने तो एक बात बोलूं।

लल्लू: हां बोल ना।

छोटू: ये वाली मुट्ठी ताई के नाम की होगी। उनके पेटीकोट में मोटे चूतड़ और कमर आंखों से नहीं हट रहे।

लल्लू: साला हरामी कहीं का, पर कोई नहीं अब तो खुल के मार तू,

भूरा: अब आया मज़ा,

तीनों फिर अपने अपने हाथ अपने हथियार पर कस लेते हैं और गोलियां दागने लगते है।

इधर जहां लल्लू अपने दोस्तों के साथ मुठिया रहा था वहीं उसकी बहन नंदिनी अभी बाग में थी और सत्तू से अपने होंठों को चुसवा रही थी, सत्तू उससे चिपका हुआ सलवार के ऊपर से ही नंदिनी के चूतड़ों को मसलते हुए रसीले होंठों का रस पी रहा था, नंदिनी भी सत्तू के साथ को बहुत आनंद ले रही थी, अपनी मां के बाद मर्द का साथ कुछ अलग एहसास दिला रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था उसे क्या ज़्यादा पसंद है मां का या सत्तू का, फिर उसने सोचा क्यों न दोनों का ही मज़ा लिया जाए जब तक मिल रहा है।

दूसरी ओर पेड़ के एक ओर ओट में खड़ी नीलम आज कुछ बेचैन हो रही थी वैसे तो उसे फ़र्क नहीं पड़ता था नंदिनी और सत्तू के साथ होने का, पर जबसे रजनी भाभी और नंदिनी के साथ उसकी बात हुई थी इस सब के बारे में तबसे उसके मन में एक अलग जिज्ञासा जाग गई थी, और अभी उसका मन कर रहा था कि वो दोनों क्या कर रहे हैं वो देखे, और कुछ देर खुद को रोकने के बाद उसकी जिज्ञासा उससे संभाली नहीं गई और वो पेड़ की ओट से झांक कर देखने लगी, उसने दोनों के होंठ जुड़े हुए देखे साथ ही सत्तू के हाथ नंदिनी के चूतड़ों पर चलते हुए भी देखे, ये सब देख उसके बदन में भी एक कम्पन सा होने लगा जो उसने पहले कम ही महसूस किया था, वो सोचने लगी अगर कोई उसके साथ ऐसा करेगा तो उसे कैस लगेगा और यही सोच सोच कर उसकी टांगों के बीच में नमी होने लगी।

कुछ देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो सत्तू बोला: आह यार मज़ा आ गया तुम्हारे होंठों में अलग ही नशा है।

नंदिनीये: तो करते रहो न नशा रोका किसने है?

सत्तू: मेरा वश चले तो हमेशा ही चूसता रहूं, पर वो है न तुम्हारी खडूस सहेली अभी आ जाएगी, चलो चलो बहुत हो गया। पता नहीं क्यों इतनी चिड़ी रहती है?

नंदिनी: शायद उसे जलन होती है कि कोई उसके साथ ये सब क्यों नहीं करता।

सत्तू: अरे ऐसा है तो बुलाओ अभी कर देते हैं उसे भी खुश।

नंदिनी: हट, बहुत चालू बन रहे हो। जाओ फिर आगे से उसी के साथ करना।

सत्तू: अरे तुम तो रूठने लग गई हम तो तुम्हारी बात कर रहे थे।

नंदिनी: अच्छा हम करें ये सब नीलम के साथ।

सत्तू: और क्या क्यों नहीं कर सकती।

सत्तू की ये बात पर नंदिनी का भी ध्यान गया वो भी सोचने लगी, अगर जैसा मां के साथ किया वैसा नीलम के साथ करने में कैसा लगेगा।

इधर नीलम उन्हें देख देख कर अपनी टांगे घिस रही थी उसे बहुत उत्तेजना हो रही थी, कि तभी उसने देखा कि नंदिनी अलग हो कर उसकी ओर आ रही है तो उसने थोड़ा खुद को संभाला।

सत्तू दूसरी ओर से निकल गया वहीं दोनों सहेलियां रजनी भाभी के घर की ओर निकल गईं।

नीलम: देखा कितनी देर हो गई तेरी वजह से, रजनी भाभी राह देख रही होंगी।

नंदिनी: अरे तू भी न बहुत चिंता करती है थोड़ा खुश रहा कर।

दोनों इसी तरह नोंकझोंक करते हुए रजनी के घर पहुंच जाते हैं हमेशा की तरह द्वार से अंदर आकर वो लोग छप्पर के नीचे आंगन में आते हैं पर रजनी वहां नहीं होती,

नंदिनी: भाभी कहां गई, भीतर देख तो।

नीलम कमरे के अंदर जा कर देखती है तो कमरा भी खाली पड़ा होता है

नीलम: यहां भी नहीं हैं,

नंदिनी: आज कहां गईं ये वो भी इस बखत (समय)?

नीलम: छत पर देखें?

नंदिनी: हां चल,

दोनों ही कच्ची सीढ़ियों से चढ़ कर ऊपर जाती हैं पर उनकी निराशा के लिए छत भी खाली होती है, जैसे ही दोनों छत पर पहुंचती हैं तभी उन्हें भाभी के खिलखिलाने की आवाज़ आती है तो वो नीचे देखती हैं और कुछ ही पलों में रजनी हंसती खिलखिलाती हुई द्वार से आंगन में आती है और उसके पीछे उसका पति मनोज भी होता है, नंदिनी उसे आवाज देने वाली होती है पर मनोज भैया को देख कर चुप हो जाती है,

इधर आंगन में पहुंच कर रजनी थोड़ी धीमे होती है तो मनोज उसे पीछे से दबोच लेता है,

रजनी: क्या कर रहे हो छोड़ो मुझे, नीलम नंदिनी आती होंगी।

मनोज: अरे उन्हें आना होता तो अब तक आ जाती, अब बस मैं और तुम हैं।

ये कह कर मनोज पीछे से रजनी के कंधे और गर्दन को चूमते हुए आगे उसके पल्लू को सरका कर उसके पेट को मसलने लगता है,

छत से ये सब देख दोनों सहेलियां ही थोड़ा झेंप जाती हैं और नीचे बैठ जाती हैं ताकि उन्हें वो लोग न देख लें।

नीलम: अब क्या करें?

नंदिनी: अरे यार इन लोगों ने तो अपना खेल शुरू कर दिया अब अगर बीच में उतरे तो बहुत अजीब लगेगा।

नीलम: हां इनका कार्यक्रम खत्म होने तक यहीं रुकना पड़ेगा।

ये सुनकर नंदिनी मुस्कुराने लगती है तो नीलम उससे पूछती है मुस्कुरा क्यों रही है?

नंदिनी: देखेगी?

नीलम: हट दुष्ट, ये भी कोई देखने की चीज है।

नंदिनी: मैं तो देखूंगी।

अब चाहती तो नीलम भी थी पर खुद से कैसे बोले, वहीं नंदिनी ने तो थोड़ा आगे खिसक कर एक अच्छी सी जगह देख कर अपना चेहरा नीचे की ओर लगा दिया ।

उसने आंगन में देखा तो दोनों ही बहुत जल्दी में लग रहे थे क्योंकि रजनी के बदन से उसकी साड़ी गायब थी और ब्लाउज के पर खुले हुए थे ब्रा तो गांव की औरतें कम ही पहनती थीं तो रजनी की मध्यम आकार की चूचियां बाहर थी और उनपर मनोज के हाथ चल रहे थे, जिस पर रजनी सिसक रही थी,

रजनी: आह ओह तुम भी न दिन में ही शुरू हो गए।

मनोज: अरे जब पत्नी ऐसी हो तो दिन क्या रात क्या? मनोज उसकी चूचियों को मसलते हुए कहता है।

ऊपर से ऐसा नज़ारा देख कर ही नंदिनी की चूत गीली होने लगती है उसकी चूचियां कड़क होने लगती हैं, वो अपनी सलवार के ऊपर से ही अपनी चूत को हल्का सा सहलाते हुए अपना चेहरा पीछे करती है और फुसफुसाते हुए कहती है।

नंदिनी: देख नीलम अगर तूने आज ये नहीं देखा तो बहुत पछताएगी।

ये कहकर वो बापिस आगे देखने लगती है, नीलम जो इतनी देर से हिम्मत जुटा रही थी खुद से आगे जाने की नंदिनी की इस बात ने उसमें और जोश भर दिया, उसने भी अपना दिल मजबूत किया और नंदिनी के बगल में जाकर नीचे देखने लगी और सामने का नज़ारा देख कर उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।

सामने रजनी भाभी की चूचियां उनके ब्लाउज़ के बीच में नंगी झूल रही थी, वहीं वो अभी मनोज भैया की बनियान उतार रहीं थी,

जल्दी ही मनोज को बनियान और धोती रजनी ने पकड़ कर उतार दी अब मनोज सिर्फ़ जांघिया में था,और उसमें उसका खड़ा लंड साफ पता चल रहा था,

ये सब देख छत पर दोनों सहेलियों की चूत पसीजने लगी थी दोनों ही किसी तरह खुद को सम्भाल रही थीं,

पर दोनों की ही आंखें आंगन में चल रहे कार्यक्रम पर टिकी ही हुईं थी, जिसमें मनोज ने अब रजनी के ब्लाउज़ को पूरी तरह उसके बदन से अलग कर दिया था और अभी खुद खाट पर बैठ कर और रजनी को अपनी गोद में बिठाकर उसकी चूचियों को चूस रहा था, रजनी आंखें बंद करके सिसक रही थी,

नंदिनी: अरे यार क्या मस्त चूस रहे हैं मनोज भैया, और भाभी की चूचियां भी कितनी मस्त हैं और मोटी मोटी।

नीलम को समझ नहीं आ रहा था वो क्या बोले वो पहली बार किसी को चूचियों को चूसते हुए देख रही थी, ऊपर से नंदिनी की बात सुनकर उसकी उत्तेजना और बढ़ रही थी, उसके मुंह से नंदिनी की बात के जवाब में एक सिसकी के साथ हां ही निकली।

मनोज अपनी पत्नी की चूचियों को बदल बदल कर चूस रहा था और रजनी भी उत्तेजना और आनंद में पागल होकर उसका सिर अपनी छाती में दबा रही थी जी भर के चूचियों को चूसने के बाद मनोज ने रजनी की चूचियों को छोड़ा तो रजनी उसकी गोद से खड़ी हो गई, रजनी के उठते ही मनोज खुद उठा और अगले ही पल उसने कमर पर हाथ लगा कर अपने कच्चे को पकड़ कर नीचे सरका दिया जिसके नीचे सरकते ही उसका कड़क लंड झूलता हुआ बाहर आ गया,

जिसे देख कर नीलम और नंदिनी दोनों के ही मुंह से आह निकल गई। क्योंकि दोनों ही पहली बार इस तरह एक मर्द को पूरी तरह नंगा और उसके लंड को कड़क अवस्था में देख रही थीं, नंदिनी ने पहले हालांकि लल्लू को मुठियाते हुए एक बार देखा था पर वो सब इतना जल्दी हुआ था कि वो कुछ ठीक से देख नहीं पाई थी पर अभी वो बिल्कुल अच्छे से देख पा रही थी, वहीं नीलम की तो हालत ही खराब थी पहली बार वो कड़क चोदने को तैयार लंड को देख रही थी उसकी चूत में उसे देखते ही न जाने कितनी चीटियां रेंगने लगीं थीं, वो किसी तरह से अपनी जांघों को जकड़ कर खुद को संभाले हुए थी, यही हाल नंदिनी का भी था।

दोनों बिल्कुल टक टकी लगाकर आंगन में देख रहीं थीं, कि तभी रजनी ने कुछ ऐसा किया कि जिसे देख कर तो दोनों बिल्कुल चौंक गईं, रजनी अपने पति के सामने नीचे घुटनों पर बैठ गईं और फिर अपने पति के लंड को पकड़ कर उसे मुंह में भर लिया और उसे चूसने लगी।

ये देख कर तो दोनों ही बिल्कुल हैरान रह गईं,

नीलम: छी छी ये भाभी क्या कर रही हैं? पेशाब की जगह को मुंह में, हाय दय्या।

नीलम ने फुसफुसाते हुए कहा, हालांकि हैरान तो नंदिनी भी थी क्योंकि वो भी ऐसा कुछ पहली बार देख रही थी पर उसने अपनी मां की चूत चाटी थी यहां तक कि उनका मूत भी पिया था तो वो कहीं न कहीं समझ रही थी। उसके मन में ये खयाल आ रहा था कि मनोज भैया के लंड का स्वाद कैसा होगा।

नीलम के लिए ये सब जितना गंदा था उतना ही उसे और उत्तेजित कर रहा था, उसकी नज़र पल भर के लिए भी हट नहीं रही थी, वहीं रजनी तो पूरी लगन से मनोज के लंड को चूस रही थी कभी जितना हो सके मुंह में लेती तो कभी जीभ से ऊपर नीचे तक चाटती। मनोज तो बिल्कुल आनंद में था, हालांकि लंड चुसवाना उसने पिछले एक साल से ही चालू करवाया था, उससे पहले उसे पता ही नहीं था कि ऐसा कुछ होता है वो तो शहर में मिली किताब के कुछ पन्नों से उसे ज्ञान मिला फिर उसे दिखाकर और बहुत मिन्नतें कर उसने रजनी को मनाया, रजनी को भी शुरू में बहुत अजीब लगा घिन जैसा भी लगा फिर धीरे धीरे उसे भी आदत पड़ गई और अब ये कहना गलत नहीं होगा कि रजनी को भी मजा आता था, इधर उसे जैसे ही ये महसूस हुआ कि वो कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो रहा है उसने रजनी के मुंह से लंड निकाल लिया और रजनी की कमर पर बंधे पेटीकोट के नाडे को पकड़ कर खींच दिया जिससे पेटीकोट नीचे सरक गया और नीलम और नंदिनी के सामने रजनी बिल्कुल नंगी थी, उसे नंगा देख कर नंदिनी को बहुत कुछ होने लगा वहीं नीलम भी अनजाने में ही अपने होंठों पर जीभ फेरने लगी,

रजनी के नंगे होते ही मनोज ने उसे घुमा कर खाट के ऊपर झुका दिया जिससे रजनी के चूतड़ और खुल कर बाहर को निकल गए, उनकी गोलाई और आकार देख कर नीलम और नंदिनी की आँखें उसकी गांड पर जम गईं।

मनोज ने बिना देर करते हुए अपना लंड पकड़ा और रजनी के पीछे जगह ली और फिर अपने लंड को पीछे से रजनी की चूत के द्वार पर लगा दिया और फिर धक्का देकर अंदर घुसा दिया, जिसके साथ ही चार सिसकियां घर में गूंजी, दो मनोज और रजनी की तो दो दोनों सहेलियों की, हालांकि दोनों की आह धीमे थी जिससे सिर्फ उन दोनों तक ही रह गई, मनोज ने रजनी की कमर को थाम कर चोदना शुरू कर दिया,

दोनों सहेलियां अपने जीवन की पहली चुदाई देख कर अपने आप से आपा खोने लगीं, नीलम के लिए खुद को संभालना बहुत मुश्किल हो गया था, उसकी चूत में बहुत तेज खुजली हो रही थी, वो मन ही मन सोच रही थी क्या तरीका होगा जिससे वो अपनी चूत को खुजा सके और जब ये खुजली असहनीय हो गई तो उसने पहली बार आंगन से अपनी नजरें हटाई और देखने लगी कि कहीं नंदिनी उसकी ओर न देख रही हो तो वो खुजा लेगी, पर जैसे ही नीलम ने नंदिनी की ओर देखा तो उसे झटका लगा क्योंकि नंदिनी की सलवार उसके घुटनों से नीचे थी और वो छत पर बिल्कुल लेटी हुई थी उसका एक हाथ उसकी टांगों के बीच में चल रहा था और दूसरा छाती पर था, नीलम को तो नीचे क्या चल रहा था उससे कोई मतलब ही नहीं रह गया था, नंदिनी की भी नज़र नीलम पर ही जम गई उसे देख उसे अपनी मां के साथ बिताए पल याद आने लगे और फिर नंदिनी ने कुछ सोचा और नीलम के ऊपर लेट गई, नीलम इस अचानक हुई हरकत से थोड़ी हड़बड़ाई पर और उसकी आवाज़ निकलने को हुई पर नंदिनी ने उसे भी बंद कर दिया क्योंकि उसने नीलम के होंठों को अपने होंठों में भर लिया था और पागलों की तरह चूसने लगी थी,

नीलम के लिए तो आज झटके पर झटके लग रहे थे पहली बार जीवन में उसके कोई होंठों को चूस रहा था और वो भी उसकी सहेली, नीलम को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे पर उसका बदन जैसे सबके लिए तैयार था और खुद ब खुद प्रतिक्रिया दे रहा था, उसके होंठ भी नंदिनी के होंठों को चूसने लगे क्योंकि उसे खुद भी एक अलग सा एहसास हो रहा था, धीरे धीरे वो भी नंदिनी के होंठों को चूसने लगी, नीलम का साथ पाकर तो नंदिनी और उत्तेजित हो गई और उसने अपना एक हाथ नीचे ले जाना शुरू कर दिया और जल्दी ही उसका हाथ नीलाम की टांगों के बीच था, नंदिनी ने अगले ही पल नीलम के हाथों को उसकी टांगों से पकड़ कर हटा दिया और अपनी उंगलियों को नीलम की चूत पर लगा दिया, अपनी सहेली की अंगुलियों का स्पर्श अपनी चूत पर पाते ही नीलम अपने होश खो बैठी और कस कर नंदिनी के होंठों को चूसने लगी उसके हाथों ने नंदिनी को जकड़ लिया,

नंदिनी भी अपनी सहेली के होंठों का स्वाद पाकर बेहद उत्तेजित हो रही थी पर अभी भी उसके मन में जिज्ञासा थी जिसे शांत करने के लिए वो ये सब कर रही थी और वो जिज्ञासा थी कि उसे जानना था कि जो उसकी सहेली का स्वाद उसकी मां के स्वाद से कितना अलग होगा, कैसा अनुभव होगा बिल्कुल जैसा मां के साथ था वैसा या उससे अलग।

कुछ देर तक होंठों को चूसने के बाद नंदिनी ने नीलम की गर्दन को चूमना शुरु कर दिया और नीचे सरकने लगी, नीलम को तो अब कुछ खबर ही नहीं थी कि क्या हो रहा है क्यों हो रहा है वो बस अनुभव का आनंद ले रही थी, नंदिनी की उंगलियां उसकी चूत को अलग ही एहसास दे रहीं थी जैसा उसने आज तक महसूस नहीं किया था, पर तभी पल भर को उसकी चूत उसे खाली महसूस हुई और वो बेचैन होने लगी, उसने आँखें खोल कर अपनी टांगों के बीच में देखा तो हैरान रह गई क्योंकि उसे अपनी टांगों के बीच नंदिनी का चेहरा दिखा और अगले ही पल नंदिनी अपनी जीभ निकाल कर उसकी चूत पर फिरा रही थी और उसकी जीभ का चूत पर स्पर्श होते ही नीलम पागल होने लगी,

नीलम पहले तो उसकी हरकत से चौंकी क्योंकि ये कितना गंदा था वो उसकी चूत पर अपनी जीभ फिरा रही थी जहां से वो पेशाब करती थी वहां अपना मुंह लगा रही थी,

नीलम: आह नंदिनी नहीं वो गंदी है मत,

पर नीलम बस इतना ही बोल पाई क्योंकि नंदिनी की जीभ उसकी चूत पर कुछ ऐसा जादू कर रही थी कि उसका बदन मचलने लगा, उसकी कमर झटके खाने लगी,

कुछ देर तक नीलम का बदन ऐंठता रहा मचलता रहा उसकी कमर कभी जमीन से उठ जाती तो कभी बापिस नीचे गिर जाती पर नंदिनी अपनी जीभ को उसकी चूत से अलग नहीं होने दे रही थी, और तब तक नहीं होने दी जब तक उसने नीलम की चूत के रस का स्वाद नहीं चख लिया,

नीलम स्खलित होने के बाद बेजान सी होकर गिर गई वहीं नंदिनी ने अपना चेहरा उसकी टांगों के बीच से निकाला जो कि उसके रस में सना हुआ था इसी बीच पीछे से एक आवाज़ आई जिसे सुनकर नंदिनी के होश उड़ गए,

हाय दैय्या ये क्या है?

जारी रहेगी।
 
अध्याय 18
कुछ देर तक नीलम का बदन ऐंठता रहा मचलता रहा उसकी कमर कभी जमीन से उठ जाती तो कभी बापिस नीचे गिर जाती पर नंदिनी अपनी जीभ को उसकी चूत से अलग नहीं होने दे रही थी, और तब तक नहीं होने दी जब तक उसने नीलम की चूत के रस का स्वाद नहीं चख लिया,

नीलम स्खलित होने के बाद बेजान सी होकर गिर गई वहीं नंदिनी ने अपना चेहरा उसकी टांगों के बीच से निकाला जो कि उसके रस में सना हुआ था इसी बीच पीछे से एक आवाज़ आई जिसे सुनकर नंदिनी के होश उड़ गए,

हाय दैय्या ये क्या है? अब आगे....

नंदिनी और नीलम ने जैसे ही मुड़ कर देखा तो दोनों के ही होश उड़ गए सामने उनकी रजनी भाभी अपने मुंह पर हाथ रखे खड़ी थी, नंदिनी और नीलम ने जितना जल्दी हो सके अपने अपने कपड़े पहने दोनों ही बुरी से घबराई हुई थी, नीलम को तो लग रहा था कि ये आज उसका आखिरी दिन होने वाला था बेचारी का पूरा बदन कांप रहा था, कपड़े पहन कर दोनों खड़ी हो गईं दोनों ही रजनी से नजरें नहीं मिला पा रहीं थीं, दोनों को समझ नहीं आ रहा था क्या करें?

रजनी: अब दोनों खड़ी क्या हो जल्दी से नीचे चलो तुम्हारे भैया बस बाहर ही गए हैं।

रजनी ये कहके मुड़ी तो दोनों पीछे पीछे चल दीं, नीचे ले जाकर रजनी ने उन्हें कमरे में बिठाया,

रजनी: सुनो ये आएं और पूछें तो बोलना बस अभी आए हो तुम लोग ठीक है,

कुछ पल बाद मनोज आया और फिर रजनी को बोल कर दुकान के लिए निकल गया, उसके जाते ही नीलम जिसने खुद को अब तक रोक रखा था वो और नहीं संभाल पाई और फूट फूट कर रोने लगी, रजनी उसे चुप कराने की कोशिश करने लगी, इसी बीच नंदिनी ने भी उसके पास आकर उसे चुप कराने की कोशिश की तो नीलम ने उसे अलग धकेल दिया,

नीलाम: हट तू दूर ये सब तेरी वजह से हुआ है सब तूने किया है बदनामी करवा दी तूने मेरी,

नीलम रोते हुए बोली, उसका गुस्सा और दुख दोनों नंदिनी पर बरसने लगा, नंदिनी अपनी सहेली के इस बर्ताव से हैरान रह गई उसने सोचा नहीं था ऐसा कुछ होगा, घबराई हुई तो वो भी थी पर उसने नीलम को संभालने का सोचा था पर नीलम उल्टा उस पर ही बरस पड़ी थी,

नीलम रोते हुए नंदिनी को सुनाए जा रही थी रजनी उसे चुप कराने का प्रयास कर रही थी, वहीं नंदिनी बस अपनी नज़रें झुकाए सुने जा रही थी, उसकी आँखें नम हो रहीं थी और कभी भी आंखों का झरना फूट सकता था, नीलम की आंख से आंसु की एक बूंद सरकते हुए नीचे उसके गाल तक पहुंची और नीचे सरकती उससे पहले ही उसने उसे पोंछ दिया और उठ खड़ी हो गई उसके उठने से पल भर को रजनी चौंकी और नीलम भी,

नंदिनी उठी और बगल में रखा अपना सामान उठाया और बिना कुछ कहे बिना किसी को ओर देखे चली गई, रजनी उसे आवाज देती रही पर नंदिनी ने नहीं सुनी और घर से बाहर निकल गई,

रजनी: ले अब ये रूठ कर चली गई,

नंदिनी के यूं जाने पर नीलम का रोना भी रुक गया था उसने भी नहीं सोचा था कि नंदिनी ऐसा कुछ करेगी, इससे पहले भी उनकी लड़ाई हुई थी पर तब नंदिनी सामने से पूरा लड़ती थी इस तरह छोड़ कर जाना नीलम को भी बहुत अलग लगा,

रजनी: उसको बाद में देखेंगे पहले तू ये बता आखिर हुआ क्या था, छत पर क्या कर रहे थे तुम लोग,

नीलम इस सवाल से थोड़ा असहज हो गई,

रजनी: देख तो मैने लिया ही है और साथ ही पूरी बात नहीं पता होगी तो तुम दोनों की सुलह भी नहीं करा पाऊंगी।

नीलम कुछ सोचकर धीरे से बोली: वो भाभी...

इसके बाद नीलम रजनी को सारी बात बताने लगी।

वहीं नंदिनी अपने आंसुओं को दुपट्टे से पोंछते हुए अपने मन ही मन बडबडा रही थी: साली कुतिया क्या समझती है खुद को रंडी कहीं की, सीधी बनी फिरती है पर हर काम करना है और पकड़े जाओ तो सारी गलती मेरी, आज के बाद रंडी से बोलूंगी ही नहीं, गुस्से में नंदिनी अपने घर की ओर बढ़ गई।

दूसरी ओर तीनों दोस्त एक बार अपनी अपनी मां के नाम पर हिलाकर शांत होकर बैठे थे,

लल्लू: बता भेंचो हम लोग बाहर की औरतों को देख कर मुठ मारने के चक्कर में रहते थे ये सोचा ही नहीं कि अपने घर में ही इतनी मस्त औरतें हैं।

भूरा: हां यार और एक ही नहीं हम तीनों के ही घर में एक से एक हैं, छुटुआ तो और नसीब वाला है इसके घर में तो दो हैं।

छोटू: हां यार हैं तो वैसे मुझे तो लगता है वो हमारी मां हैं इसलिए और उन्हें देख कर हमारा लंड तन जाता है।

लल्लू: हो सकता है क्योंकि जितना सोचता हूं ये सब गलत है ससुरा लंड उतना ही कड़क होता जाता है,

छोटू: गलत है तभी और मज़ेदार है।

भूरा: ये बात तो सही कही, वैसे तुम दोनों को अपनी अपनी मां के बदन में क्या पसंद है सबसे ज्यादा?

लल्लू: मां ही पसन्द है उसमें क्या पसंद आयेगा?

भूरा: अरे मतलब जैसे मुझे मेरी मां की चूचियां और पेट बड़ा पसन्द है उन्हें देख कर मन खुश हो जाता है,

लल्लू: अच्छा ऐसे तो मुझे मेरी मां के चूतड़ बहुत पसंद है, हाय क्या फैले फैले तरबूज जैसे हैं।

छोटू: सही में यार ताई के चूतड़ तो गजब के हैं, देख कर मजा आ जाता है।

भूरा: अरे ताई के भतीजे, तू भी बता तुझे क्या पसंद है अपनी मां में,

छोटू: अरे यार ऐसे क्या बताऊं मां का तो सब कुछ कमाल है, मोटे मोटे गोल चूतड़, गोरा मांसल पेट, भरी हुई पपीतों सी छातियां,एक चीज़ कैसे बताऊं?

लल्लू: अरेे भेंचो ये तो बिल्कुल एक एक चीज ताड़ कर बैठा है रे भूरा।

भूरा: वैसे गलत भी नहीं कह रहा पुष्पा चाची हैं भी ऐसी ही, और उन्हीं की गांड की वजह से तो ये सब शुरू हुआ है।

लल्लू: हां यार ये तो सही कहा, सबसे पहले उनकी गांड देखी और सारा दिमाग ही घूम गया,

छोटू: सालों हरामी मुझसे छिप कर मेरी मां के चूतड़ों को देखते रहे और अब मेरे सामने ही गा रहे हो।

भूरा: अरे अब चिढ़ मत तेरी मां हमारी मां, और हम मादरचोद,

इस पर तीनों हसने लगते हैं।

लल्लू: अरे यार पर कब तक हम ऐसे ही हिलाते रहेंगे भेंचो लंड को कभी चूत नसीब होगी कि नहीं,

भूरा: और उससे भी बड़ा सवाल अपनी मां की चूत मिलेगी कि नहीं।

इस पर छोटू मन ही मन खुश हुआ क्योंकि वो कितना नसीब वाला था जो अपनी मां को चोद चुका था,

लल्लू: हां यार कौन सा दिन होगा जिस दिन हम लोग अपनी मां के चूतड़ों के बीच अपना लंड घुसाएंगे।

भूरा: ये तो होने से रहा, मां के नाम पर तो सिर्फ हिला ही पाएंगे सच में नहीं होने वाला।

छोटू: हैं क्यों नहीं होने वाला?

लल्लू: हां यार तू तो दिल तोड़ रहा है।

भूरा: अरे पर सच यही है चूतिया, हवस हमारे मन में चढ़ी पड़ी है उनके थोड़े ही, हमारी माएं जान दे देंगी पर इतना बड़ा पाप नहीं करेंगी।

लल्लू: एक तरह से तो तू कह तो सही रहा है फिर क्या करें ऐसे ही सोच सोच कर हिलाते रहें?

छोटू: सही कह रहा है पर हाथ पर हाथ रख कर थोड़े ही बैठेंगे।

भूरा: अच्छा फिर क्या करेंगें?

लल्लू: हां यार क्या कर सकते हैं कुछ नहीं।

छोटू: अरे चूतिया तुम लोग ये भूल रहे हो कि वो हमारी मां होने के साथ साथ औरतें भी हैं,

भूरा: तो ये बात भूल कौन रहा है। औरतें हैं तो हैं।

छोटू: अरे ये चूतिया है लल्लू तू बता सत्तू भैया ने कहा था न कि उन्हें बताया है किसी साहब ने कि औरतों के अन्दर मर्दों से ज़्यादा गर्मी होती है और उत्तेजित भी उतना ही हो जाती हैं।

लल्लू: हां यार बताया तो था,

भूरा: कहा तो था पर वो हमारे सामने थोड़े ही गरम होंगी।

छोटू: वही तो करना पड़ेगा।

लल्लू: करना पड़ेगा? पर कैसे?

छोटू: सुनो बताता हूं।

ये कहकर छोटू दोनों को योजनाएं समझाने लगता है और दोनों पूरी लगन से सुनते हैं।

जहां एक ओर ये तीनों योजना बना रहे थे वहीं दो लोग और भी थे जो गहन सोच विचार कर रहे थे, और वो दोनों थे सोमपाल और कुंवरपाल,

सोमपाल: यार मुझे प्यारे की बात भरोसा नहीं हो रहा,

कुंवरपाल: भरोसा तो मुझे भी नहीं हो रहा, बहनचोद मरने के बाद कोई औरत आकर कैसे चुदवा सकती है।

सोमपाल: पर जिस यकीन के साथ वो कह रहा है लग नहीं रहा कि झूठ बोल रहा है ।

कुंवरपाल: फिर क्या किया जाए।

सोमपाल: एक काम कर सकते है.

कुंवरपाल: क्या?

सोमपाल: आज रात साले पर नजर रखते हैं।

कुंवरपाल - कह तो सही रहा है ये ही करना होगा।

सोमपाल: चल फिर खाने के बाद मिलते हैं।

कुंवरपाल: चल ठीक।

दूसरी ओर अरहर के खेत में से आज फिर ठप थप की आवाज़ आ रही थी एक औरत खेत के बीच में घुटने पर झुकी हुई थी उसकी साड़ी कमर पर इकठ्ठा थी और पीछे से एक आदमी उसकी कमर को थामे उसे दनादन चोद रहा था,

आदमी: अह ओह भाभी तुम्हारी चूत तो दिन पर दिन और गरम होती जा रही है।

औरत: आह इसकी गरमी शांत करवाने ही तो तुम्हारे पास आती हूं देवर जी।

आदमी: आह भाभी तुम्हारी चूत की गर्मी तो मिटाते ही हैं एक बार यहां की सैर भी करवा दो,

आदमी उस औरत की गांड के छेद को कुरेदते हुए कहता है,

औरत: आह देवर जी वहां हाथ मत लगाओ आह वो नहीं दे सकती हर बार तुम उसे ही छेड़ते हो।

आदमी: आह भाभी क्या करूं तुम्हारी गांड का छेद है ही ऐसा की देख कर रहा ही नहीं जाता,

ये कहकर आदमी अपनी उंगली गांड में घुसा देता है तो औरत सिसकने लगती है साथ ही बहुत उत्तेजक भी हो जाती है, वहीं आदमी के लंड में भी रस भरने लगता है जल्दी ही दोनों स्खलित हो जाते हैं, दोनों अपने कपड़े सही करते हैं और अलग अलग दिशा में चल देते हैं औरत जैसे ही खेत से बाहर निकल कर थोड़ा आगे बढ़ती है और सामने किसी को देखती है तो उसके होश उड़ जाते हैं, उसका दिमाग घूमने लगता है,

सत्तू: अरे मां तुम खेत में क्या कर रही थी कब से राह देख रहा था तुम्हारी?

झुमरी: अरे वो वो बेटा वो खेत में पेशाब करने गई थी, तू तू यहां क्यों आया?

सत्तू: बहुत समय लगा दिया तुमने तो तुम्हें ढूंढ रहा था,

झुमरी: चल चल घर चलते हैं तुझे भूख लग रही होगी,

झुमरी अपने माथे से पसीना पोंछते हुए सत्तू के साथ आगे बढ़ जाती है।

वहीं आदमी भी खेत के दूसरी ओर से निकल कर थोड़ा आगे बढ़ कर चल रहा होता है कि उसके कानों में आवाज़ पड़ती है और वो भी सुन्न रह जाता है,

चाचा प्रणाम,

वो आदमी सिर घुमा के देखता है तो और सामने से सत्तू को झुमरी के साथ आते देखता है तो उसके माथे पर पसीना आने लगता है,

सत्तू: कहां घूम रहे हो चाचा?

सत्तू और झुमरी उसके पास आ जाते हैं और साथ चलने लगते हैं झुमरी और वो आदमी दोनों ही मन ही मन घबरा रहे थे,

आदमी: कही नहीं, वो बस नदी तक गया था,

सत्तू: अच्छा फिर शहर चलने का कब सोचा है, सब्जियां काफी हो गई हैं।

आदमी: हां बस कल परसों ही चलते हैं

सत्तू: ऐसा करो अगर परसों चलो तो बढ़िया है मां भी चल लेगी साथ में इसे भी हस्पताल जाना है।

इस पर वो आदमी और झुमरी एक दूसरे की ओर देखते हैं फिर झुमरी नजर झुका लेती है।

आदमी: चल फिर कल नाव तैयार कर लेते हैं परसों भोर में ही निकल पड़ेंगे।

सत्तू: ये ठीक रहेगा, चाचा मैं तो कहता हूं अब तुम छुटुआ को भी साथ ले चला करो एक आध चक्कर लगाएगा शहर का तभी तो कुछ सीखेगा।

जी हां वो आदमी जो सत्तू की मां को चोदता है वो और कोई नहीं छोटू का बाप सुभाष है,

सुभाष: हां लला सोचा तो है अमावस के बाद से उसे ही भेजा करूंगा।

इसी तरह बात करते हुए तीनों आगे बढ़ जाते हैं।


जारी रहेगी।
 


रत्ना, सुधा, लता, पुष्पा और झुमरी
 
अध्याय 19
बरहपुर गाँव में, जहाँ जवानी की दहलीज़ पर खड़े तीन किशोर अपनी-अपनी माँओं के जिस्मों के छुपे हुए नज़ारों और दमित इच्छाओं में खोए थे, वहीं दो बुज़ुर्ग भी किसी और ही रहस्य की गहराई में डूबे हुए थे - सोमपाल और कुंवरपाल।

सोमपाल, अपनी झुर्रियों भरी आँखों को सिकोड़ते हुए बोला, "यार कुंवरपाल, ये प्यारेलाल की बातें मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही हैं।"

कुंवरपाल, जिसने अपनी आधी ज़िंदगी गाँव के बदलते रंग देखे थे, सहमति में सिर हिलाया, "हाँ सोमपाल, मुझे भी ये सब हजम नहीं हो रहा। मरने के बाद कोई औरत आकर किसी मर्द से... ये सब कैसे करवा सकती है?" उसकी आवाज़ में अविश्वास साफ़ झलक रहा था।

सोमपाल ने अपनी लाठी को ज़मीन पर ठोंका, "पर साला जिस दावे के साथ कह रहा है, उसकी आँखों में जो चमक है... लगता नहीं कि बूढ़ा झूठ बोल रहा है।"

कुंवरपाल ने अपनी धोती को कमर पर और कसा, "तो फिर क्या करें? इस बुढ़ापे में कौन सी भूत-प्रेत की छानबीन करें?"

सोमपाल की आँखों में एक शरारती चमक आई, "अरे यार, छानबीन नहीं करेंगे तो पता कैसे चलेगा कि इस बूढ़े के दिमाग का तार हिला है या सच में कोई गड़बड़ है?"

कुंवरपाल थोड़ा हिचकिचाया, "मतलब...?"

सोमपाल ने अपनी मूँछों पर ताव दिया, "मतलब आज रात। आज रात हम उस प्यारेलाल पर नज़र रखेंगे।"

कुंवरपाल की आँखें थोड़ी फैल गईं, "रात भर? इस ठंड में? क्या मिलेगा हमें?"

सोमपाल ने रहस्यमयी अंदाज़ में कहा, "मिलेगा... सच मिलेगा। अगर वो झूठ बोल रहा है तो उसका नाटक पकड़ में आ जाएगा, और अगर सच में कुछ है... तो हमारी आँखों के सामने होगा।"

कुंवरपाल ने गहरी साँस ली, "कह तो सही रहा है। यही करना होगा।

दोनों बुज़ुर्ग अपनी-अपनी आशंकाओं और उत्सुकताओं के साथ अलग हो गए,

इधर रत्ना गहरी उधेड़बुन में फँसी थी। पिछली रात प्यारेलाल के साथ जो 'टोटके' के नाम पर हुआ, उसे याद करके उसका मन कचोट रहा था, एक अजीब सी डर और शर्म की मिलीजुली भावना उसे घेरे हुए थी। लेकिन साथ ही, उस अनुभव की कुछ धुंधली यादें उसके बदन में एक अनजानी सी सिहरन भी पैदा कर रही थीं। पहले उसने सोचा कि आज रात वो चबूतरे की ओर नहीं जाएगी, पर उसके अंदर का डरपोक मन, जो हमेशा डरता रहता था, कुछ अशुभ होने की संभावना उसे लगती रहती थी वो टोटके वाली किताब की बात मानने को मजबूर करता था, उसे बेचैन कर रहा था। आखिरकार, उसने एक गहरी साँस ली, अपने सारे कपड़े उतार दिए और अपनी सास की पुरानी, थोड़ी महकती हुई साड़ी को अपने नंगे बदन पर लपेट लिया। उसके दोनों बेटे और पति सो चुके थे तो उसे कोई समस्या तो नहीं होने वाली थी,

बाहर चबूतरे के पास, सोमपाल और कुंवरपाल एक मिशन पर थे। प्यारेलाल के 'स्वर्ग से आई पत्नी' वाले दावे की सच्चाई जानने के लिए, वे छिपकर चबूतरे के बगल में अँधेरे में घात लगाए बैठे थे। उन्हें उम्मीद थी कि आज रात प्यारेलाल का झूठ पकड़ा जाएगा। बेचारा प्यारेलाल, इन सबसे बेखबर, अपनी चारपाई पर लेटा उस स्वर्गीय मिलन की आस लगाए था। कल रात जो सुख उसे मिला था, उसे याद करके उसकी बूढ़ी नसों में भी एक हल्की सी सिहरन दौड़ रही थी। इंतज़ार में उसकी आँखें पहले तो खुली रहीं, नींद नहीं आ रही थी उस पर रात की खामोशी और थकान, उसने इसके लिए बची हुई ताड़ी अपने पास रखी हुई थी और उठ कर उसे पी गया कुछ पल बैठने केबाद नशे के आगे उसकी पलकें धीरे-धीरे भारी होने लगीं।

अँधेरे में छिपे सोमपाल और कुंवरपाल भी नींद से जूझ रहे थे। रात ठंडी थी और पत्तों की सरसराहट उनकी बेचैनी बढ़ा रही थी। फिर भी, वे अपने इरादे पर डटे रहे, प्यारेलाल के चबूतरे से अपनी नज़रें हटाए बिना।

कुंवरपाल: देख साले को ताड़ी गटक रहा है,

सोमपाल: मुझे तो लगता है ये नशे में ही होगा

वो लोग बातें ही कर रहे थे कि घर के किवाड़ खुले और एक साया बाहर निकला

रत्ना दबे कदमों से घर से बाहर निकली। अपनी सास की साड़ी को अपने नंगे बदन पर कसकर लपेटे हुए, वह चाँदनी रात में एक साए की तरह लग रही थी। उसका दिल धड़क रहा था, डर और एक दबी हुई उत्तेजना की मिलीजुली भावना उसे आगे खींच रही थी। उसे पता नहीं था कि चबूतरे के पास अँधेरे में दो और आँखें उसकी हर हरकत पर टिकी हुई हैं।

रत्ना के हाथों में मिट्टी की छोटी कटोरी थी, जिसमें सरसों का तेल भरा हुआ था। टोटके के मुताबिक, उसे इस तेल को अपने ससुर प्यारेलाल की खाट के चारों पायों पर चुपचाप लगाना था। हर कदम पर उसका दिल धक-धक कर रहा था। उसे कल रात की शर्मनाक और उत्तेजक घटना याद आ रही थी, जब प्यारेलाल ने उसे अपनी मरी हुई पत्नी समझकर दबोच लिया था। आज तो खतरा और भी बड़ा था जिनसे वो अनजान थी, क्योंकि चबूतरे के पास अँधेरे में दो और जोड़ी आँखें घात लगाए बैठी थीं।

साड़ी उसके नंगे बदन पर सिहर रही थी, ठंडी हवा उसकी त्वचा को छू रही थी और उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी। उसे लग रहा था जैसे हर पत्ती की सरसराहट में कोई फुसफुसाहट हो, हर छाया में कोई छिपा हुआ हो।

दबे कदमों से चलती हुई रत्ना प्यारेलाल की खाट के पास पहुँची। बूढ़ा गहरी नींद में खर्राटे ले रहा था। चाँदनी की हल्की रोशनी में उसका झुर्रियों भरा चेहरा शांत दिख रहा था। रत्ना ने धीरे से तेल की कटोरी नीचे रखी और झुककर खाट के पहले पाये पर तेल लगाने लगी। उसकी उंगलियाँ ठंडे लकड़ी को छू रही थीं, और उसके कान हर छोटी सी आवाज़ पर चौकन्ने थे।

जैसे ही वह दूसरे पाये पर तेल लगाने के लिए झुकी, उसकी साड़ी उसके कंधों से थोड़ी खिसक गई, जिससे उसकी नंगी पीठ का कुछ हिस्सा चाँदनी में चमक उठा। उसे महसूस हुआ जैसे किसी की आँखें उस पर गड़ी हों। उसने डर से चारों ओर देखा, लेकिन अँधेरे में उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।

तीसरे पाये पर तेल लगाते वक़्त, उसे पिछली रात प्यारेलाल के मजबूत हाथों का स्पर्श याद आ गया। उसकी योनि में एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई। उसने जल्दी से तेल लगाया और उठने ही वाली थी कि अचानक प्यारेलाल ने नींद में करवट ली और एक कराह भरी आवाज़ निकाली। रत्ना का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। वह डरकर वहीं रुक गई, साँस रोके हुए।

कुछ पल बाद, जब प्यारेलाल फिर से शांत हो गया, तो रत्ना ने हिम्मत करके चौथे पाये पर तेल लगाना शुरू किया। उसका हाथ काँप रहा था और तेल थोड़ा छलक गया। जैसे ही उसने आखिरी बूँद तेल पाये पर लगाई और उठने के लिए मुड़ी, अचानक एक मजबूत हाथ ने उसकी कमर पकड़ ली और उसे अपनी ओर खींच लिया।

"मेरी प्यारी... तू आ गई!" प्यारेलाल की नींद और नशे में डूबी हुई आवाज़ उसके कानों में गूँजी। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि रत्ना हिल भी नहीं पाई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसे पता था कि अब वही होने वाला है जो कल हुआ था, पर इस बार दर्शक भी मौजूद थे। उसकी शर्म और डर की कोई सीमा नहीं रही।

प्यारेलाल के बूढ़े पर मजबूत हाथों की गिरफ्त में फँसी रत्ना का पूरा बदन काँप रहा था। उसकी साड़ी उसके नंगे जिस्म से और कसकर लिपट गई, हर हरकत उसकी नंगी चमड़ी पर सनसनी पैदा कर रही थी। "छोड़ो मुझे... ससुर जी..." वह दबी हुई, डरी हुई आवाज़ में फुसफुसाई, पर उसकी आवाज़ प्यारेलाल की नींद में डूबी हुई बड़बड़ाहट में खो गई।

"मेरी जान... तू इतनी रात को कहाँ चली गई थी? मैं कब से तेरा इंतज़ार कर रहा था..." प्यारेलाल की साँसें उसकी गर्दन पर महसूस हो रही थीं, उसकी बूढ़ी उंगलियाँ उसकी कमर को सहला रही थीं। रत्ना को उल्टी आने जैसा महसूस हो रहा था, पर डर के मारे उसका गला सूख गया था।

"ससुर जी... ये मैं हूँ... रत्ना..." उसने फिर कोशिश की, इस बार थोड़ी हिम्मत जुटाकर।

पर प्यारेलाल तो अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था। "तेरा बदन तो आज और भी गरम लग रहा है, मेरी रानी..." उसकी पकड़ और मजबूत हो गई और उसने रत्ना को अपनी ओर खींचा, जिससे उसका नंगा बदन प्यारेलाल के धोती पहने जिस्म से रगड़ा गया। रत्ना की योनि में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई, डर और घिन के साथ-साथ एक दबी हुई उत्तेजना भी उसे महसूस हो रही थी।

चबूतरे के पास अँधेरे में छिपे सोमपाल और कुंवरपाल अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे। जो वे देख रहे थे, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं था। प्यारेलाल, अपनी बहू को अपनी मरी हुई पत्नी समझकर बाहों में भरे हुए था, और बहू... बहू विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, या शायद... शायद उसके अंदर भी कुछ और चल रहा था।

"आह्ह... मेरी जान... तेरे होंठों को चूमने को तरस गया था..." प्यारेलाल का बूढ़ा मुँह रत्ना की गर्दन पर झुक गया। रत्ना ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, उसके चेहरे पर बेबसी और शर्म की गहरी छाया थी। उसे लग रहा था जैसे उसका जिस्म पत्थर का हो गया हो, जिसमें कोई जान बाकी न रही हो।

प्यारेलाल का हाथ अब उसकी कमर से नीचे सरक गया, उसकी उंगलियाँ उसकी नंगी जाँघों को छू रही थीं। रत्ना की साँसें तेज़ होने लगीं, उसके अंदर का डर और उत्तेजना एक अजीब सा मिश्रण बना रहे थे। उसे लग रहा था जैसे वह किसी दलदल में फँसती जा रही हो, जहाँ से निकलना मुमकिन नहीं था।

"तू आज इतनी चुप क्यों है, मेरी रानी? क्या मुझसे नाराज़ है?" प्यारेलाल की आवाज़ अब और धीमी हो गई थी, जैसे वह सच में अपनी पत्नी से बात कर रहा हो।

रत्ना की आँखों से आँसू बहने लगे। वह बोलना चाहती थी, चिल्लाना चाहती थी, पर उसकी आवाज़ उसके गले में ही घुट रही थी। उसे लग रहा था जैसे वह एक भयानक सपने में फँस गई हो, और कोई उसे जगाने वाला नहीं था। और उस सपने में, उसके ससुर के बूढ़े हाथ उसकी नंगी चमड़ी पर अपनी पकड़ और मजबूत करते जा रहे थे।

प्यारेलाल का बूढ़ा मुँह अब रत्ना के कंधे पर रेंग रहा था, उसकी सूखी चमड़ी रत्ना की नरम त्वचा पर अजीब सी सनसनी पैदा कर रही थी। "बोल ना मेरी जान गेंदा.. इतना भी क्या गुस्सा... चल, तुझे प्यार करता हूँ..." उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी, नींद और कामुकता के नशे में डूबी हुई।

रत्ना के अंदर का डर अब एक बेबस गुस्से में बदल रहा था। "ससुर जी... छोड़िए मुझे... ये क्या कर रहे हैं आप?" उसकी आवाज़ काँप रही थी।

प्यारेलाल ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसका हाथ अब रत्ना की साड़ी के अंदर घुस गया था, उसकी उंगलियाँ उसकी नंगी कमर को सहला रही थीं। रत्ना की साँसें तेज़ हो गईं। उसे लग रहा था जैसे उसका खून जम गया हो।

"तेरा बदन तो... एकदम मलाई जैसा है, मेरी रानी..." प्यारेलाल की उंगलियाँ अब और नीचे सरक रही थीं, उसके पेट की चिकनी त्वचा को छू रही थीं। रत्ना ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।

प्यारेलाल का हाथ अब उसकी नाभि के पास पहुँच गया था, उसकी उंगलियाँ हल्के से उस गड्ढे में घूम रही थीं। रत्ना के अंदर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई, घिन और उत्तेजना का एक बेमेल मिश्रण। उसने अपने होंठों को भींच लिया ताकि कोई आवाज़ न निकले।

"याद है, जब तू पहली बार आई थी... कितनी शरमाई हुई थी... हमारी सुहागरात का दिन पर देख तू आज भी शर्मा रही है तेरी यही शर्माने की अदा तो मुझे भाती है" प्यारेलाल बड़बड़ा रहा था, उसकी उंगलियाँ अब उसकी साड़ी के नीचे और नीचे सरक रही थीं। रत्ना को लग रहा था जैसे उसका जिस्म सुन्न हो गया हो, उसमें कोई हरकत बाकी न रही हो।

"तेरी ये जवानी... आज भी वैसी ही है..." प्यारेलाल का हाथ अब उसकी योनि के पास पहुँच गया था, उसकी उंगलियाँ उसकी साड़ी के ऊपर से ही उस जगह को सहला रही थीं। रत्ना की योनि गीली होने लगी थी, उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। उसे लग रहा था जैसे उसके अंदर की आग अब बाहर निकलने को बेताब हो रही हो।

"आह्ह... मेरी जान..." प्यारेलाल की आवाज़ अब एक धीमी कराह में बदल गई थी। उसका हाथ अब उसकी साड़ी के अंदर चला गया था, उसकी बूढ़ी उंगलियाँ उसकी गीली योनि के होंठों को छू रही थीं। रत्ना की आँखें अब खुल गईं, उनमें बेबसी और एक दबी हुई कामुकता का अजीब सा मिश्रण था।

चबूतरे के पास छिपे सोमपाल और कुंवरपाल अब फुसफुसा रहे थे। "ये क्या हो रहा है?" कुंवरपाल की आवाज़ में हैरानी और घिन दोनों थे।

"लगता है बूढ़ा सच में अपनी मरी हुई लुगाई समझ रहा है," सोमपाल ने धीमी आवाज़ में कहा, उसकी आँखों में भी अविश्वास था।

प्यारेलाल का हाथ अब रत्ना की योनि के अंदर धीरे-धीरे प्रवेश कर गया था। रत्ना की आँखों से आँसू बहने लगे, पर इस बार उसमें सिर्फ शर्म नहीं थी, एक दबी हुई कराह भी उसके गले से निकलने को बेताब थी। उसे लग रहा था जैसे वह किसी भयानक सपने में फँस गई हो, जहाँ से जागना मुमकिन नहीं था। और उस सपने में, उसके ससुर के बूढ़े हाथ उसकी योनि के अंदर अपनी पकड़ और मजबूत करते जा रहे थे।

रत्ना की साँसें अब तेज़ी से चलने लगी थीं। ससुर की बूढ़ी उंगलियों का उसकी योनि के अंदर घूमना, पहले तो उसे घिनौना लग रहा था, पर धीरे-धीरे उसके निचले हिस्से में एक अजीब सी गर्मी फैलने लगी थी। उसकी योनि की दीवारें सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं, हर स्पर्श पर एक दबी हुई लहर उसके पूरे बदन में दौड़ रही थी।

प्यारेलाल, अपनी ही मदहोशी में डूबा हुआ था। उसे लग रहा था जैसे उसकी प्यारी पत्नी बरसों बाद उसके पास लौट आई हो। उसकी उंगलियाँ अब और गहराई तक जा रही थीं, उस गुप्त जगह को तलाश रही थीं जहाँ कभी उसे असीम सुख मिलता था।

रत्ना ने अपने होंठों को और कसकर भींच लिया। उसकी योनि अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी, और ससुर की उंगलियों की हर हरकत पर एक दबी हुई कराह उसके गले तक आ रही थी। उसे लग रहा था जैसे उसका शरीर अब उसका काबू नहीं रहा, एक अजीब सी आग उसके अंदर धधक रही थी।

प्यारेलाल ने अपनी उंगलियों की रफ़्तार थोड़ी बढ़ाई। रत्ना का बदन हल्का सा हिल गया। उसे लग रहा था जैसे कोई उसके अंदर मथ रहा हो, एक अजीब सी बेचैनी और एक दबी हुई चाहत उसके अंदर घुलमिल रही थी।

"आह्ह... मेरी रानी... तू अब भी उतनी ही... कोमल है..." प्यारेलाल की आवाज़ अब धीमी और कांपती हुई थी। उसकी उंगलियाँ अब रत्ना की योनि के अंदर एक खास जगह पर टिक गईं, और हल्के-हल्के दबाव डालने लगीं।

रत्ना की आँखें अचानक खुल गईं। उसके चेहरे पर दर्द और एक अजीब सी उत्तेजना का मिश्रण था। उसे लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई तार बज उठा हो। एक दबी हुई चीख उसके मुँह से निकलने ही वाली थी कि उसने अपने दाँतों से अपने होंठों को और ज़ोर से काट लिया।

प्यारेलाल को शायद उसकी बेचैनी महसूस हुई। उसकी उंगलियों का दबाव थोड़ा बढ़ा। रत्ना का पूरा बदन काँपने लगा। उसे लग रहा था जैसे उसके अंदर की आग अब ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ेगी। एक अजीब सी लहर उसके निचले हिस्से से उठकर पूरे शरीर में दौड़ गई।

"उफ्फ..." रत्ना के मुँह से एक दबी हुई आवाज़ निकली, उसकी पकड़ बिस्तर की चादर पर और मज़बूत हो गई। उसकी योनि की मांसपेशियाँ कस गईं, और एक अजीब सा सुख उसके अंदर फैल गया।

प्यारेलाल ने महसूस किया कि उसकी बहू गरम हो रही है। उसकी बूढ़ी उंगलियों ने और तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया। उसे लग रहा था जैसे बरसों बाद उसकी पत्नी फिर से उसके लिए तड़प रही हो।

रत्ना की साँसें अब हांफने लगी थीं। उसे लग रहा था जैसे उसका शरीर जल रहा हो, और ससुर की उंगलियाँ उस आग को और भड़का रही हों। शर्म और घिन अब उत्तेजना के आगे कहीं खो गए थे। उसे बस उस आग को शांत करने की ज़रूरत थी, उस अजीब से सुख को और गहरा करने की चाहत थी।

प्यारेलाल, अपनी उत्तेजना के चरम पर था। उसने अपनी बहू रत्ना को धीरे से नीचे लिटाया, उसकी साड़ी उसके नंगे बदन पर अस्त-व्यस्त हो गई थी। उसकी बूढ़ी आँखें रत्ना के कामुकता से लाल हुए चेहरे और खुले हुए होंठों पर टिकी थीं। अब वह खुद उसके ऊपर आ गया, उसका बूढ़ा लिंग उसकी गीली योनि के मुहाने पर काँप रहा था, अगले मिलन के लिए बेताब।

उधर, झाड़ियों में छिपे सोमपाल और कुंवरपाल का भी बुरा हाल था। रत्ना के नंगे जिस्म पर प्यारेलाल के धक्के उन्हें अंदर तक झकझोर रहे थे। उनकी दबी हुई जवानी की आग अब और बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उनके लिंग भी तंबू की तरह तन गए थे, रत्ना के बदन की प्यास उन्हें खींचकर चबूतरे की ओर ले आई।

जैसे ही प्यारेलाल ने पहला धक्का मारा, उसका बूढ़ा लिंग रत्ना की योनि में धँस गया, रत्ना की एक दबी हुई कराह रात की खामोशी में गूँज उठी। धीरे धीरे प्यारेलाल ने एक बार फिर से अपनी बहू को चोदना शुरू कर दिया उसी पल, सोमपाल और कुंवरपाल दोनों रत्ना के एक-एक ओर आ गए। सोमपाल कांपते हुए हाथों से रत्ना की एक उभरी हुई चूची को पकड़ लिया, उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल को मसलने लगीं। कुंवरपाल भी पीछे नहीं रहा, उसने दूसरी चूची को अपने मोटे हाथों में भरकर मसलना शुरू कर दिया।

रत्ना नए, अप्रत्याशित स्पर्श से चौंक गई।उसे समझ नहीं आ रहा था उसके साथ क्या हो रहा था, उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। एक तरफ उसके ससुर का बूढ़ा लिंग उसकी योनि को चीर रहा था, और दूसरी तरफ दो और बूढ़ों के हाथ उसकी छाती से उसकी मोटी चूचियों से खेल रहे थे। पर उसके अंदर की उत्तेजना इतनी बढ़ चुकी थी कि वह विरोध करने का सोच भी नहीं पा रही थी। एक अजीब सी सनसनी उसके पूरे बदन में दौड़ रही थी, डर, शर्म और एक बेकाबू कामुकता का मिश्रण।

रत्ना को चौंकता देख कुंवरपाल अपनी लार टपकाते हुए बोला, "अरे बहू... हम भी तो तेरे ससुर ही हैं। शर्मा मत।" उसकी आवाज़ कामुकता से भरी हुई थी।

इसी बीच, प्यारेलाल की साँसें तेज़ हो गईं। उसका बूढ़ा लिंग रत्ना की योनि में तेज़ी से धक्के मार रहा था। "आह्ह... मेरी रानी... क्या चूत है तेरी..." वह हाँफ रहा था, उसकी आँखें धुंधली हो रही थीं। और फिर, एक ज़ोर की चीख के साथ, उसका वीर्य रत्ना की योनि के अंदर छूट गया।

प्यारेलाल शांत होकर रत्ना के ऊपर ढेर हो गया। कुछ पल बाद, जब वासना और ताड़ी का नशा उतरा तो उसे होश आया कि उसने क्या कर दिया है। अपनी बहू के नंगे बदन पर अपना वीर्य देखकर वह चौंक गया। "हे भगवान! ये मैंने क्या कर दिया!" खुद को कोसते हुए वह हाँफते हुए रत्ना के ऊपर से हट गया।

प्यारेलाल के हटने से रत्ना की योनि में एक खालीपन महसूस हुआ, एक अजीब सी ठंडी हवा का झोंका रत्ना जो ये सब नहीं चाहती थी अब उसे लंड का चूत से निकलना अच्छा नहीं लगा।

पर यह खालीपन पल भर का ही था। अगले ही पल, कुंवरपाल उत्तेजित होकर पहले से तैयार था बगल में तेल की कटोरी से तेल लेकर अपने लंड पर लगा चुका था उसने अपना तना हुआ लिंग पकड़ा और बिना किसी हिचकिचाहट के रत्ना की गीली चूत के मुहाने पर टिका दिया।

"अब मेरी बारी, बहू," कुंवरपाल फुसफुसाया, उसकी आँखों में हवस की आग जल रही थी। और बिना किसी इंतज़ार के, उसने अपना लंड रत्ना की चूत में धकेल दिया, उस खालीपन को तुरंत भर दिया। रत्ना की एक दबी हुई कराह रात की खामोशी में गूँज उठी, उसकी उत्तेजना अब और बढ़ चुकी थी, भले ही शर्म और असहजता की एक पतली परत अभी भी उसके ऊपर मौजूद थी। सोमपाल अब भी उसकी एक चूची को मसल रहा था, उसकी लार टपक रही थी जैसे वह किसी मीठे फल का रस निचोड़ रहा हो।

कुंवरपाल का मोटा, लाल लिंग रत्ना की गीली योनि के अंदर धँस गया। रत्ना की आँखें फिर से चौड़ी हो गईं, एक दबी हुई चीख उसके गले में अटक गई। एक तरफ प्यारेलाल का वीर्य अभी भी उसकी योनि के अंदर रिस रहा था, और अब कुंवरपाल का लंड उसकी गहराई नाप रहा था।

"आह्ह... क्या चूत है तेरी, बहू... एकदम गरम!" कुंवरपाल हाँफ रहा था, उसका बूढ़ा पेट रत्ना के पेट से टकरा रहा था। उसने अपने हाथों से रत्ना की जाँघों को फैला दिया, मानो उसे और ज़्यादा खोलकर देखना चाहता हो।

सोमपाल अब भी रत्ना की एक चूची को बुरी तरह मसल रहा था, उसकी उंगलियाँ उसके निप्पल को पीस रही थीं। "रसदार माल है साली... बुड्ढे ने खूब मज़ा लूटा होगा।" उसकी आवाज़ में हवस और ईर्ष्या का गंदा मिश्रण था।

रत्ना का बदन काँप रहा था। उसे लग रहा था जैसे वह किसी बुरे सपने में फँस गई हो, जहाँ से निकलना मुमकिन नहीं था। एक ससुर ने अभी-अभी उसकी योनि को चीरा था, और दूसरा अब उसे बुरी तरह से चोद रहा था, जबकि तीसरा उसकी छाती को नोच रहा था। शर्म और घिन की भावना अब उत्तेजना की उस परत के नीचे दब गई थी जो उसके अंदर सुलग रही थी।

कुंवरपाल ने पहला धक्का और ज़ोर से मारा, उसका लंड रत्ना की योनि की गहराई तक चला गया। रत्ना ने एक दबी हुई कराह भरी, उसकी कमर अपने आप ऊपर उठ गई।

"उफ्फ... धीरे... ससुर जी..." वह फुसफुसाई, उसकी आवाज़ में दर्द और एक अजीब सी चाहत थी।

"धीरे? इतनी गरम चूत को धीरे-धीरे कौन चोदता है, बहू?" कुंवरपाल हँसा, उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं। उसने अपनी कमर हिलाई और दूसरा धक्का मारा, इस बार और गहराई तक।

सोमपाल ने अब अपना हाथ नीचे खिसकाया और रत्ना की दूसरी चूची को भी पकड़ लिया। अब दोनों बूढ़े उसके दोनों स्तनों को बुरी तरह मसल रहे थे, उनके मोटे होंठों से लार टपक रही थी जैसे वे किसी रसदार फल को निचोड़ रहे हों।

रत्ना की योनि कुंवरपाल के लंड को कसकर जकड़ रही थी। उसे लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई आग जल रही हो, और कुंवरपाल का लंड उस आग में घी का काम कर रहा हो। शर्म और डर की भावना अब उत्तेजना की एक तेज़ लहर में बह गई थी। उसकी कमर अपने आप ऊपर-नीचे हो रही थी, कुंवरपाल के हर धक्के का जवाब दे रही थी।

"आह्ह... ससुर जी... और ज़ोर से..." रत्ना के मुँह से एक दबी हुई कराह निकली, उसकी आँखें आधी खुली थीं, उनमें एक अजीब सी बेबसी और चाहत का मिश्रण था।

कुंवरपाल ने उसकी बात सुनी और अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। उसका लंड अब तेज़ी से रत्ना की योनि में धक्के मार रहा था, हर धक्के के साथ रत्ना की कराहें और तेज़ होती जा रही थीं। सोमपाल ने अब झुककर रत्ना की गर्दन को चूमना शुरू कर दिया, उसके बूढ़े होंठ उसकी नरम त्वचा पर रेंग रहे थे।

रत्ना का पूरा बदन काँप रहा था। उसे लग रहा था जैसे वह किसी गहरे कुएँ में गिरती जा रही हो, जहाँ से निकलना मुमकिन नहीं था। पर उसे अब निकलना भी नहीं था। उस आग में जलना, उस सुख को महसूस करना... यही उसकी नियति थी, कम से कम इस रात के लिए तो यही सच था।

कुंवरपाल, अब पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था, रत्ना की गीली चूत में अपने लंड को धड़ाधड़ पेलने लगा। हर धक्के के साथ रत्ना की कराहें और तेज़ होती गईं, उसकी कमर बिस्तर पर ऊपर-नीचे उछल रही थी। सोमपाल अब भी उसकी चूचियों को मसल रहा था, उसकी लार टपक रही थी जैसे वह बरसों की प्यास बुझा रहा हो।

"आह्ह... क्या माल है ये... एकदम टाइट!" कुंवरपाल हाँफ रहा था, उसका बूढ़ा लंड रत्ना की योनि की दीवारों से टकरा रहा था। "आज तो मजा आ गया, बहू!"

रत्ना की आँखें मुंदी हुई थीं, उसके होंठ खुले हुए थे और एक धीमी सी कराह उसके गले से निकल रही थी। उसके अंदर की आग अब शांत होने लगी थी, एक अजीब सी तृप्ति उसके पूरे बदन में फैल रही थी।

कुछ और ज़ोरदार धक्कों के बाद, कुंवरपाल का शरीर अकड़ गया और उसने रत्ना की योनि में अपना वीर्य उड़ेल दिया। वह हाँफते हुए रत्ना के ऊपर ढेर हो गया।

"उफ्फ... मजा आ गया, बहू..." कुंवरपाल फुसफुसाया, उसका लंड अभी भी रत्ना की चूत के अंदर धड़क रहा था।

अब सोमपाल की बारी थी। उसने कुंवरपाल को धीरे से हटाया और रत्ना की गीली योनि पर अपने मोटे, लाल लंड को टिका दिया।

"अब मैं चोदूँगा तुझे, बहु" सोमपाल गुर्राया और बिना किसी हिचकिचाहट के अपना लंड रत्ना की चूत में घुसा दिया। रत्ना ने एक दबी हुई कराह भरी, उसकी चूत अब दो बूढ़ों के लंडों से खिंच चुकी थी।

सोमपाल ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। रत्ना का बदन अब शांत हो चुका था, पर उसके अंदर एक अजीब सी सुन्नता फैल रही थी। उसे लग रहा था जैसे उसका जिस्म अब उसका नहीं रहा, बस इन बूढ़ों की हवस बुझाने का एक जरिया बन गया हो।

कुछ देर तक चोदने के बाद, सोमपाल भी थक गया और रत्ना के ऊपर ढेर हो गया। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

"हम्म्म... गरम बदन है बहु तेरा ..." सोमपाल फुसफुसाया और फिर वहीं रत्ना के ऊपर करवट लेकर लेट गया। कुंवरपाल भी दूसरी तरफ करवट लेकर लेट गया। तीनों बूढ़े, अपनी हवस की आग बुझाकर, वहीं चबूतरे पर शांत पड़ गए।

रत्ना, उन बूढ़ों के बोझ के नीचे दबी हुई थी। उसकी चूत में अब दो आदमियों का वीर्य भरा हुआ था। उसका बदन दर्द कर रहा था, पर उसके अंदर एक अजीब सी खालीपन महसूस हो रहा था।

कुछ देर तक वहीं लेटे रहने के बाद, जब उसे लगा कि बूढ़े गहरी नींद में सो गए हैं, तो रत्ना धीरे-धीरे उठी। उसका नंगा बदन चाँदनी में चमक रहा था। वह लड़खड़ाते हुए खड़ी हुई और बिना पीछे मुड़े, तेज़ी से अपने घर के अंदर भाग गई,


रत्ना घर के अंदर भागी तो ज़रूर, पर उसका शरीर सुन्न था और दिमाग सुन्न। उसके नंगे बदन पर बूढ़ों के छुअन की छाप अभी भी ताज़ी थी, हर रोम-रोम में उस रात की गंदी यादें रेंग रही थीं। जैसे ही उसने अंदर कदम रखा, एक तेज़ सिहरन उसके पूरे बदन में दौड़ गई, पर यह सिहरन डर या उत्तेजना की थी या घिन और अपमान की ये वो खुद नहीं समझ पा रही थी।

जारी रहेगी
 
अध्याय 20

रत्ना अपने कमरे में अकेली बैठी थी, उसका शरीर दर्द से भरा हुआ था। तीन बूढ़ों—प्यारेलाल, कुंवरपाल, और सोमपाल—की हवस का शिकार होने के बाद उसका बदन टूट रहा था।

उसकी योनि में जलन थी, और हर सांस के साथ एक अजीब सी सुन्नता उसके अंदर फैल रही थी। लेकिन आज उसकी आंखों से आंसू नहीं बहे। कल रात की तरह ग्लानि तो थी, पर कहीं न कहीं उसके मन में एक ठंडापन भी था, जैसे वो इस सबके लिए तैयार हो चुकी हो।

बहुत देर तक वो अपने बिस्तर पर बैठी उन भयानक पलों को याद करती रही—प्यारेलाल की बूढ़ी उंगलियां, कुंवरपाल का मोटा लंड, और सोमपाल की लार टपकाती हरकतें। आखिरकार, थकान और दर्द से चूर होकर उसने कपड़े पहने और बिस्तर पर लेटते ही नींद की आगोश में चली गई।

उधर, चबूतरे पर प्यारेलाल अपनी बहू को चोदने के बाद झड़ते ही पलटकर सो गया था। उसे अब भी लगता था कि उसने अपनी मरी हुई पत्नी गेंदा को प्यार किया है।

लेकिन सोमपाल और कुंवरपाल की हालत अलग थी। अपनी हवस की आग बुझाने के बाद अब उनके होश ठिकाने आ रहे थे। रत्ना की चूचियां मसलने और उसकी चूत में लंड पेलने की यादें अब उनके मन को कचोट रही थीं। दोनों चबूतरे से उठे और बिना एक शब्द बोले नदी किनारे की ओर चल पड़े।

नदी किनारे की ठंडी हवा में पानी की कल-कल ही एकमात्र आवाज थी। दोनों एक बड़े पत्थर के पास रुक गए और उससे टिककर बैठ गए।

कुंवरपाल का चेहरा लटका हुआ था। उसने गहरी सांस ली और धीरे से कहा, "भेंचो, बहुत बड़ा पाप कर लिया हमने हवस में।

"सोमपाल ने भी सिर झुकाकर सहमति जताई, "हां यार, अपने आप पर काबू ही नहीं कर पाए। साला, ऐसा गंदा काम... हमसे हो गया।

दोनों कुछ देर चुप रहे, अपने किए पर पछताते हुए। फिर कुंवरपाल ने बेचैनी भरे लहजे में पूछा, "अब समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या होगा?

सोमपाल ने सिर खुजलाया, "घर चलें वापस?

कुंवरपाल ने तुरंत मना कर दिया, "नहीं यार, मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही। ऐसा करते हैं, यहीं रुकते हैं।

सोमपाल ने सहमति में सिर हिलाया, "ठीक है।"कुछ देर तक दोनों चुपचाप नदी की ओर देखते रहे। फिर सोमपाल ने बात शुरू की, "साला ये प्यारे भी कम नहीं है। अपनी बहू और अपनी मरी हुई लुगाई में उसे कोई फर्क ही नहीं दिखता। हमसे भी पाप करवा दिया।

कुंवरपाल ने गुस्से में कहा, "हां यार, अगर वो ऐसा न करता तो हम भी तो आगे नहीं बढ़ते।

सोमपाल ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, "पर कुंवर, मुझे लगता है कि बात इतनी सीधी नहीं है। इसमें कुछ गड़बड़ जरूर है।

कुंवरपाल ने हैरानी से उसकी ओर देखा, "कैसी गड़बड़?

सोमपाल ने गहरी सांस ली और बोला, "तुझे याद है न, कल प्यारेलाल बोल रहा था कि उसने पिछली रात भी अपनी लुगाई को चोदा था?

कुंवरपाल की आंखें फैल गईं, "हां, बोला तो था! अरे, इसका मतलब उसने कल रात भी अपनी बहू को चोदा था!

सोमपाल ने सिर हिलाया, "हां, और अगर ऐसा है तो ये रत्ना आज रात फिर चबूतरे पर क्यों आई?

जब उसे पता है कि कल भी ऐसा हुआ था, तो आज वो फिर क्यों आई? मतलब कुछ तो बात है।

कुंवरपाल ने गंभीरता से सोचा, "हां यार, कुछ गड़बड़ तो है ही।

सोमपाल ने सुझाव दिया, "देख, अभी आधी रात ही हुई है। भोर होने तक यहीं सो लेते हैं थोड़ी देर, फिर सुबह देखेंगे कि क्या करना है।

कुंवरपाल ने सहमति जताई, "ठीक है।"दोनों बूढ़े नदी किनारे पत्थर से टिककर सो गए, उनके मन में पछतावे और संदेह की लहरें अभी भी उथल-पुथल मचा रही थीं।

दूसरी ओर, जैसे ही भोर की पहली किरणें आसमान में फैलीं, प्यारेलाल झटके से अपनी चारपाई पर उठ बैठा। उसकी आंखें इधर-उधर दौड़ने लगीं, और तभी उसे अहसास हुआ कि वो पूरी तरह नंगा था। उसकी धोती एक तरफ पड़ी थी, और चारपाई पर कुछ दाग साफ दिख रहे थे। धीरे-धीरे रात की सारी घटनाएं उसकी आंखों के सामने साकार होने लगीं।

पहले उसने सोचा कि वो सपना होगा, लेकिन जैसे-जैसे उसकी नींद और ताड़ी का नशा उतरने लगा, हकीकत उसके सामने नंगी खड़ी हो गई। उसने अपनी बहू रत्ना को अपनी मरी हुई पत्नी गेंदा समझकर चोदा था—न सिर्फ एक बार, बल्कि दो रातें। और इस बार तो बात और भी भयानक थी, क्योंकि उसके दोस्तों—सोमपाल और कुंवरपाल—ने भी उसकी बहू की चुदाई की थी।

प्यारेलाल का कलेजा बैठ गया। उसकी सांसें तेज हो गईं, और उसकी झुर्रियों भरी आंखों में आंसुओं की एक पतली परत छा गई। "हाय राम, ये मैंने क्या कर दिया!" उसने अपने सिर पर हाथ मारते हुए कहा। उसका मन उसे धिक्कारने लगा। "महापाप कर दिया मैंने... अपनी ही बहू के साथ ऐसा घिनौना काम... मैं तो नरक में भी जगह न पाऊंगा!" उसकी आवाज कांप रही थी, और उसका चेहरा ग्लानि और पछतावे से भर गया।

लेकिन जैसे ही उसने रात की पूरी घटना को याद किया, उसका गुस्सा सोमपाल और कुंवरपाल की ओर मुड़ गया। "साले मादरचोदों को मैंने हमेशा अपना दोस्त माना... और उन्होंने मेरे साथ ये किया!" उसने गुस्से में अपने दांत पीसे। "मैं तो नशे में था, नींद में था... मुझे रोकना चाहिए था इन लोगों को! इस महापाप से मुझे बचाना चाहिए था! लेकिन ये साले खुद ही आगे बढ़ गए... मेरी बहू की इज्जत लूट ली!"

प्यारेलाल का खून खौल रहा था। उसकी आंखों में ग्लानि की जगह अब आग जलने लगी थी। "आज इन दोनों को छोड़ूंगा नहीं!"प्यारेलाल ने गुस्से में उठकर अपनी धोती पहनी। तभी उसकी नजर बगल में पड़ी साड़ी पर गई—वही साड़ी जो रत्ना ने पहनी थी। उसने उसे उठाया और अपने कंधे पर डाल लिया। फिर उसने अपनी लाठी उठाई और तेज कदमों से चल पड़ा।

सबसे पहले वो सोमपाल और कुंवरपाल के चबूतरों की ओर गया, जहां वो अक्सर सुबह बैठा करते थे। लेकिन वहां कोई नहीं था। उसने एक पल सोचा कि उनके घर जाकर आवाज लगाए, लेकिन फिर उसे ख्याल आया कि ऐसा करने से पूरा गांव जाग जाएगा और तमाशा खड़ा हो जाएगा। "नहीं, ये ठीक नहीं होगा," उसने मन ही मन कहा।

फिर उसे याद आया कि सोमपाल और कुंवरपाल और वो अक्सर सुबह-सुबह जंगल के किनारे नदी के पास बैठते थे ताज़ी हवा के लिए। "वहीं होंगे साले!" प्यारेलाल ने गुस्से में अपनी लाठी को जमीन पर ठोंका और जंगल की ओर चल दिया।

उसकी आंखों में गुस्से की चमक थी, और उसके कदमों में एक अजीब सा जोश था। नदी की ओर बढ़ते हुए वो मन ही मन सोच रहा था, "आज इन दोनों को सबक सिखाकर ही दम लूंगा। मेरे घर की इज्जत लूटने की सजा तो इन्हें मिलेगी ही!" प्यारेलाल की सांसें तेज थीं, और उसकी लाठी हर कदम के साथ जमीन पर ठक-ठक की आवाज कर रही थी। वो नदी के किनारे की ओर बढ़ता जा रहा था, जहां सोमपाल और कुंवरपाल अभी भी सो रहे थे, अनजान इस बात से कि उनके पुराने दोस्त का गुस्सा उनकी ओर बढ़ रहा था।

जंगल के किनारे पहुंचते ही प्यारेलाल ने अपने कदम धीमे कर लिए। सुबह की हल्की धुंध अभी भी हवा में तैर रही थी, और नदी की हल्की-हल्की लहरों की आवाज उसके कानों तक पहुंच रही थी। उसने चारों ओर नजर दौड़ाई, सोमपाल और कुंवरपाल को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन अभी तक वो कहीं दिखाई नहीं दिए।

तभी उसकी नजर नदी की ओर गई, जहां से एक साया धीरे-धीरे बाहर निकल रहा था। प्यारेलाल की भौंहें सिकुड़ गईं। वो थोड़ा और आगे बढ़ा, अपनी आंखों को सिकोड़कर उस साए को देखने की कोशिश करने लगा।जैसे ही वो करीब पहुंचा, उसकी सांसें थम गईं। वो साया एक औरत थी—और चौंकाने वाली बात ये थी कि वो बिल्कुल नंगी थी। उसका गीला बदन सुबह की हल्की रोशनी में चमक रहा था, और वो नदी से निकलकर जंगल की ओर बढ़ रही थी। प्यारेलाल की आंखें फैल गईं। "हाय राम, ये कौन है?"

उसने मन ही मन सोचा। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। एक पल के लिए उसने सोचा कि कहीं ये फिर से उसकी मरी हुई पत्नी गेंदा तो नहीं, लेकिन फिर उसे अपनी सोच पर गुस्सा आया। "नहीं, ये मुमकिन नहीं... मैं फिर से वही गलती नहीं करूंगा," उसने खुद को समझाया।

प्यारेलाल ने अपनी सांसें थाम लीं और चुपके से उस औरत के पीछे-पीछे चलने लगा। वो नहीं चाहता था कि उसकी भनक भी उस औरत को लगे। उसके कदम धीमे और सतर्क थे, और वो पेड़ों की आड़ लेते हुए आगे बढ़ रहा था। औरत कुछ दूर जाकर एक बड़े बरगद के पेड़ के पास रुक गई। उसने इधर-उधर देखा, जैसे किसी के आने की आशंका हो।

प्यारेलाल ने तुरंत खुद को एक झाड़ी के पीछे छुपा लिया। उसकी नजरें उस औरत पर टिकी हुई थीं। जैसे ही उस औरत ने अपना चेहरा उसकी ओर किया, प्यारेलाल के होश उड़ गए। "फुलवा भौजी!"

उसने मन ही मन चौंकते हुए कहा।ये सोमपाल की पत्नी फुलवा थी। प्यारेलाल को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। फुलवा इस हालत में—बिल्कुल नंगी—जंगल में क्या कर रही थी? उसका गीला बदन सुबह की धुंध में चमक रहा था। उसके लंबे, गीले बाल उसकी पीठ पर चिपके हुए थे, और उसकी गोल-मटोल चूचियां हल्की ठंड से सख्त होकर उभरी हुई थीं। उसकी कमर से नीचे का हिस्सा मांसल और भरा हुआ था, और उसकी गोल गांड हर कदम के साथ हिल रही थी। प्यारेलाल की सांसें तेज हो गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि फुलवा यहां इस हालत में क्या कर रही थी।

एक पल के लिए उसका मन भटक गया। फुलवा को इस तरह नंगा देखकर उसके जवानी के दिन याद आ गए। वो हमेशा से फुलवा के बदन को आकर्षक मानता था। फुलवा का गोरा, मांसल बदन, उसकी भरी हुई चूचियां, और उसकी चौड़ी गांड—ये सब उसे हमेशा अपनी ओर खींचता था। लेकिन तब वो सिर्फ एक दूर की कल्पना थी। आज, इतने सालों बाद, उसे फिर से वही बदन नंगा देखने को मिल रहा था, और उसकी जवानी की हवस फिर से जाग उठी।

उसकी सांसें और तेज हो गईं, और उसका बूढ़ा लंड धोती के अंदर तनने लगा।

लेकिन तभी उसे रात की घटना याद आई। रत्ना की बेबसी, उसकी कराहें, और सोमपाल-कुंवरपाल की हरकतें—सब कुछ उसकी आंखों के सामने फिर से घूम गया। उसकी जवानी की हवस एक बार फिर गुस्से में बदल गई। "साला सोमपाल... मेरी बहू की इज्जत लूटी, और अब उसकी लुगाई को मैं इस हाल में देख रहा हूं," उसने मन ही मन सोचा। उसका गुस्सा अब और भड़क उठा। उसे लगा कि ये एक मौका था—सोमपाल से बदला लेने का मौका। "जैसा उसने मेरे घर की इज्जत के साथ खेला, वैसा ही मैं उसकी लुगाई के साथ करूंगा," उसने गुस्से में अपने दांत पीसे।

प्यारेलाल ने अपनी लाठी को एक तरफ रख दिया और चुपके से फुलवा की ओर बढ़ने लगा। फुलवा अब बरगद के पेड़ के पास झुक गई थी। वो एक टोटके की रस्म निभा रही थी, जैसा कि वो पिछले कई दिनों से कर रही थी। वो अपने मंत्रों को धीमी आवाज में बुदबुदा रही थी, और उसकी आंखें बंद थीं। उसे लग रहा था कि जैसे हर रात की तरह आज भी वो अनजान साया उसके पास आएगा, जो पिछले कुछ दिनों से उसे चोद रहा था।

इधर प्यारेलाल ने देखा कि फुलवा झुकी हुई थी, उसकी गोल गांड पूरी तरह से नंगी और खुली हुई थी। उसकी चूत के होंठ साफ दिख रहे थे, और वो हल्के से गीले थे। प्यारेलाल की हवस और गुस्सा दोनों एक साथ उबाल मारने लगे। उसने चुपके से अपनी धोती को कमर तक ऊपर कर लिया और अपना बूढ़ा, तना हुआ लंड बाहर निकाला। उसकी सांसें तेज थीं, और उसकी आंखों में एक अजीब सी आग जल रही थी। वो चुपके से फुलवा के पीछे पहुंच गया।

फुलवा को कुछ भनक नहीं थी। वो अपनी आंखें बंद किए मंत्र पढ़ रही थी, और उसकी कमर झुकी हुई थी। प्यारेलाल ने एक बार फिर इधर-उधर देखा, ये सुनिश्चित करने के लिए कि कोई और आसपास न हो। फिर उसने अपना लंड पकड़ा और उसे फुलवा की चूत के मुहाने पर टिका दिया। फुलवा को हल्का सा स्पर्श महसूस हुआ, और उसे लगा कि ये वही अनजान साया है जो हर रात आता है। उसने बिना पीछे मुड़े अपने मंत्र पढ़ना जारी रखा, क्योंकि उसे डर था कि अगर उसने पीछे देखा तो टोटका टूट जाएगा।

प्यारेलाल ने एक जोरदार धक्का मारा, और उसका बूढ़ा लंड फुलवा की चूत में घुस गया। फुलवा की एक हल्की सी कराह निकली, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया और मंत्र पढ़ना जारी रखा। उसे लगा कि ये वही साया है। वो बिना कुछ बोले झुकी रही, अपने टोटके को पूरा करने की कोशिश करती रही। लेकिन प्यारेलाल का इरादा कुछ और ही था। वो गुस्से और हवस के मिश्रण में डूबा हुआ था। उसने फुलवा की कमर को मजबूती से पकड़ा और तेजी से धक्के मारने लगा।"आह्ह... साली... तेरे मर्द ने मेरी बहू की इज्जत लूटी... अब मैं तेरी चूत का भोसड़ा बनाऊंगा," प्यारेलाल ने मन ही मन में फुसफुसाया।

फुलवा अपने मंत्रों में डूबी हुई थी, और उसकी कराहें धीरे-धीरे तेज होने लगीं। प्यारेलाल का लंड उसकी चूत में तेजी से अंदर-बाहर हो रहा था, और हर धक्के के साथ उसकी गांड हिल रही थी। फुलवा की चूत गीली हो चुकी थी, और उसकी सांसें तेज हो रही थीं।प्यारेलाल ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। उसकी बूढ़ी कमर तेजी से हिल रही थी, और उसका लंड फुलवा की चूत की गहराई तक जा रहा था। "आह्ह... क्या चूत है तेरी, फुलवा... साला सोमपाल कितना नसीब वाला है," उसने मन ही मन सोचा। उसकी हवस अब चरम पर थी, और वो सोमपाल से बदला लेने के नशे में डूबा हुआ था। फुलवा की कराहें अब तेज हो गई थीं, लेकिन वो अभी भी मंत्र पढ़ने की कोशिश कर रही थी। उसकी आंखें बंद थीं, और उसका बदन हर धक्के के साथ कांप रहा था।

कुछ देर तक प्यारेलाल ने उसे तेजी से चोदा। उसकी सांसें हांफने लगीं, और उसका बूढ़ा लंड फुलवा की चूत में धड़कने लगा। आखिरकार, एक दबी हुई कराह के साथ उसका वीर्य फुलवा की चूत में छूट गया। फुलवा की एक हल्की सी चीख निकली, लेकिन उसने अभी भी पीछे नहीं देखा। वो जमीन पर झुकी रही, अपने टोटके को पूरा करने की कोशिश करती रही। प्यारेलाल ने अपना लंड बाहर निकाला और हांफते हुए पीछे हट गया। उसकी सांसें तेज थीं, और उसका चेहरा पसीने से तर था। उसने अपनी धोती को ठीक किया और चुपके से वहां से निकलने लगा।

वो दबे पांव जंगल के किनारे की ओर बढ़ रहा था, जब अचानक एक पेड़ के पीछे से एक साया निकला। प्यारेलाल चौंक गया। उसने अपनी आंखें सिकोड़कर उस साए को देखने की कोशिश की, लेकिन तभी एक तेज धुआं उसकी ओर बढ़ा। धुआं इतना घना था कि उसकी आंखें जलने लगीं। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं, और अगले ही पल उसे चक्कर आने लगे। उसकी सांसें रुकने लगीं, और वो जमीन पर गिर पड़ा।

सुबह की हल्की धुंध अभी भी बरहपुर गांव की गलियों में छाई हुई थी। सूरज की पहली किरणें धीरे-धीरे घरों की छतों पर पड़ रही थीं। भूरा, जो रात को अपनी मां रत्ना के चूतड़ों की कल्पना करते हुए मूठ मारकर सोया था, सुबह जल्दी उठ गया। उसकी आंखें अभी भी नींद से भारी थीं, लेकिन उसे अजीब सा बेचैन सा महसूस हो रहा था। उसने देखा कि उसकी मां रत्ना, जो हर सुबह सबसे पहले उठकर घर का काम शुरू कर देती थी, आज अभी तक बिस्तर पर ही थी।

भूरा को कुछ गड़बड़ लगी। वो धीरे से अपनी मां के कमरे की ओर गया। दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। उसने अंदर झांका तो देखा कि रत्ना बिस्तर पर लेटी हुई थी, उसकी सांसें तेज चल रही थीं, और उसका चेहरा पसीने से तर था। भूरा ने पास जाकर देखा तो पाया कि उसकी मां को तेज बुखार था। उसकी मां की हालत देखकर उसका दिल बैठ गया। रात की सारी हरकतें—प्यारेलाल, सोमपाल, और कुंवरपाल की हवस—रत्ना के बदन पर भारी पड़ गई थीं। उसका शरीर टूट चुका था, और बुखार ने उसे जकड़ लिया था।

इस सब से अनजान भूरा घबरा गया। उसने तुरंत अपने बड़े भाई राजू को जगाया, जो बगल के कमरे में सो रहा था। "भैया, भैया! जल्दी उठो! मां को बुखार है!" भूरा की आवाज में डर साफ झलक रहा था। राजू नींद में बड़बड़ाते हुए उठा, "क्या हुआ, भूरा? सुबह-सुबह चिल्ला क्यों रहा है?" लेकिन भूरा की घबराहट देखकर वो तुरंत उठ गया। दोनों भाई अपने पिता राजकुमार के पास गए, जो बाहर आंगन में अपनी चारपाई पर लेटे हुए थे। "पापा, जल्दी चलो! मां को तेज बुखार है!" भूरा ने लगभग चीखते हुए कहा।

राजकुमार चौंक गया। वो तुरंत उठा और रत्ना के कमरे की ओर भागा। रत्ना को बुखार में तपते देखकर उसका चेहरा लटक गया। "हाय राम, ये क्या हो गया?" उसने रत्ना के माथे पर हाथ रखा, जो आग की तरह तप रहा था। "भूरा, जल्दी पानी ले आ! राजू, तू घर संभाल मैं दवाई लेकर आता हूं" राजकुमार ने जल्दी से दोनों बेटों को काम सौंप दिए और खुद भी निकल गया।

भूरा तुरंत रत्ना की सेवा में जुट गया। उसने एक गीला कपड़ा लिया और अपनी मां के माथे पर रख दिया। वो बार-बार कपड़े को ठंडे पानी से भिगोकर रत्ना के माथे पर रख रहा था, ताकि उसका बुखार कम हो सके। उसकी आंखों में अपनी मां के लिए प्यार था, लेकिन कहीं न कहीं उसकी वासना भी जाग रही थी। रत्ना की साड़ी हल्की सी खिसक गई थी, और उसकी भरी हुई चूचियां साफ दिख रही थीं। भूरा की नजरें बार-बार वहां टिक रही थीं, लेकिन उसने खुद को संभाला और अपनी मां की देखभाल में ध्यान लगाया।

इधर, राजू ने घर के सारे काम संभाल लिए। उसने झाड़ू लगाई, बर्तन मांजे, और आंगन को साफ किया। राजू भूरा से बड़ा था और ज्यादा समझदार भी। उसे अपनी मां की हालत देखकर चिंता तो हो रही थी, लेकिन वो घर की जिम्मेदारी को समझता था।कुछ ही देर में राजकुमार दवाई ले आया था और अब रत्ना के पास बैठा उसकी हालत देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रत्ना को अचानक इतना तेज बुखार कैसे हो गया। उसे रात की घटनाओं का कोई अंदाजा नहीं था—कि उसकी पत्नी को उसके ससुर और दो बूढ़ों ने चोदा था, और उसका बदन इस कदर टूट गया था कि बुखार ने उसे जकड़ लिया।

इधर, राजू ने अपने पिता के लिए चाय बनाई। वो जानता था कि उसकी मां जैसी चाय वो नहीं बना सकता, लेकिन उसने अपनी समझ से जितना अच्छा हो सका, उतना बनाया। उसने एक मिट्टी के कुल्हड़ में चाय डाली और अपने पिता को लाकर दी। "पापा, ये लो चाय," राजू ने धीरे से कहा। राजकुमार ने कुल्हड़ ले लिया और एक घूंट पीकर अपने बेटे की ओर देखा। "अच्छी बनी है, बेटा," उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसकी नजरें अभी भी रत्ना पर टिकी हुई थीं। भूरा अभी भी अपनी मां की सेवा में लगा हुआ था। वो बार-बार ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर रत्ना के माथे पर रख रहा था, और उसकी नजरें अपनी मां के चेहरे पर टिकी हुई थीं।

तभी अचानक घर के बाहर से तेज कदमों की आहट सुनाई दी। दरवाजा जोर से खुला, और एक आदमी हांफता हुआ अंदर घुस आया। उसका चेहरा पसीने से तर था, और उसकी सांसें तेज चल रही थीं। "राजकुमार! राजकुमार!" उसने हांफते हुए पुकारा।

राजकुमार चौंक गया। उसने तुरंत कुल्हड़ नीचे रखा और उस आदमी की ओर देखा। "क्या हुआ, भैया?" उसने चिंता भरे लहजे में पूछा।आदमी ने एक गहरी सांस ली और हांफते हुए कहा, "अरे वो... चाचा जी...!"राजकुमार की आंखें फैल गईं। "चाचा जी? क्या हुआ सही से बोलो?"

उसकी आवाज में बेचैनी साफ झलक रही थी। लेकिन उस आदमी ने कुछ जवाब देने से पहले ही अपनी सांसें संभालीं, और फिर उसकी आंखों में उदासी छा गई। "चाचा जी... उनकी लाश नदी किनारे मिली है," उसने धीमी आवाज में कहा।

राजकुमार को जैसे सांप सूंघ गया। उसकी आंखें स्थिर हो गईं, और उसका चेहरा सफेद पड़ गया। "क्या... क्या बोल रहे हो?" उसने कांपती आवाज में पूछा, जैसे उसे अपने कानों पर यकीन ही न हो। भूरा और राजू भी ये सुनकर सन्न रह गए। भूरा का हाथ अपनी मां के माथे पर रुक गया, और राजू का कुल्हड़ हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया।

रत्ना, जो अभी तक बिस्तर पर लेटी अपने परिवार को देख रही थी, ये सुनते ही सिहर उठी। उसकी आंखें फैल गईं, और उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

कुछ ही देर में ये खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव में फैल गई। प्यारेलाल की लाश को कुछ लोग नदी किनारे से उठाकर उनके चबूतरे पर ले आए। गांव की औरतें राजकुमार के घर में जमा हो गईं, और वहां बिलख-बिलख कर रोना शुरू हो गया। "हाय राम, चाचा जी चले गए!" "क्या हो गया ऐसा?" "अभी तो कल ही उनसे बात हुई थी!" औरतों की चीखें और सिसकियां पूरे घर में गूंज रही थीं। रत्ना भी बिस्तर से उठकर औरतों के बीच पहुंच गई। उसका बुखार अभी पूरी तरह से उतरा नहीं था, लेकिन अपने ससुर की मौत की खबर सुनकर वो खुद को रोक नहीं पाई। वो भी औरतों के साथ बिलख-बिलख कर रोने लगी।

उसका मन भारी था, और उसके दिमाग में बार-बार एक ही बात कौंध रही थी—रात को उसका ससुर उसे अपनी मरी हुई पत्नी समझकर चोद रहा था, और आज वो इस दुनिया में नहीं था। रत्ना को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब कैसे हो गया। उसके अंदर ग्लानि, डर, और दुख का एक अजीब सा मिश्रण उमड़ रहा था।बाहर चबूतरे पर गांव के आदमी जमा हो गए थे। सोमपाल और कुंवरपाल भी वहां पहुंच गए। अपने पुराने दोस्त प्यारेलाल की इस तरह अचानक मौत की खबर सुनकर दोनों को गहरा दुख हुआ। सोमपाल की आंखें नम हो गईं, और कुंवरपाल का चेहरा लटक गया। दोनों एक-दूसरे को देखकर चुपचाप सिर झुकाए खड़े थे। लेकिन उनके मन में सिर्फ दुख ही नहीं था, बल्कि एक अजीब सा डर और बेचैनी भी थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक ये सब कैसे हो गया। रात को वो तीनों प्यारेलाल की बहू रत्ना को चोद रहे थे, और अब प्यारेलाल की लाश उनके सामने पड़ी थी।


सोमपाल ने धीरे से कुंवरपाल की ओर देखा और फुसफुसाया, "कुंवर, ये सब कैसे हो गया? रात को तो वो ठीक था... फिर ये अचानक...?"कुंवरपाल ने सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया, "पता नहीं, सोमपाल... कुछ तो गड़बड़ है। लेकिन अब कुछ कहने से क्या फायदा? जो होना था, हो गया।" दोनों की नजरें प्यारेलाल की लाश पर टिकी थीं, और उनके मन में रात की ग्लानि और इस मौत का रहस्य एक साथ उथल-पुथल मचा रहा था।

प्यारेलाल की लाश के बगल में वो साड़ी भी पड़ी थी, जो रात को रत्ना ने पहनी थी। लेकिन गांव वालों ने उसे प्यारेलाल की स्वर्गीय पत्नी गेंदा की साड़ी समझ लिया। इस साड़ी को देखकर गांव में तरह-तरह की बातें शुरू हो गईं। कोई कह रहा था, "चाचा जी अपनी पत्नी से मिलने चले गए... देखो, उनकी साड़ी भी साथ ले गए!" कोई और बोल रहा था, "चाची जी खुद चाचा को लेने आई थीं... तभी तो ये साड़ी यहां पड़ी है!" कुछ लोग इसे भूत-प्रेत की बात मान रहे थे, तो कुछ इसे टोटके और अंधविश्वास से जोड़ रहे थे। लेकिन कुल मिलाकर कोई नहीं जानता था कि असल में क्या हुआ था।प्यारेलाल की लाश चबूतरे पर पड़ी थी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। लेकिन उसकी मौत का रहस्य अभी भी अनसुलझा था। रात को फुलवा को चोदने के बाद एक साए और धुएं ने उसे बेहोश कर दिया था, और अब वो इस दुनिया में नहीं था। गांव वाले अपनी-अपनी बातें बना रहे थे, लेकिन सच्चाई किसी को नहीं पता थी। राजकुमार अपने पिता की लाश के पास बैठा सिसक रहा था, भूरा और राजू अपने दादा की मौत से सदमे में थे, और रत्ना का मन ग्लानि और दुख के भंवर में डूबा हुआ था।

जारी रहेगी।।
 
अध्याय 21

बरहपुर गांव में प्यारेलाल की मौत ने हर किसी को हिला दिया था। उनके चबूतरे पर पूरा गांव इकट्ठा हो गया था। मर्द बाहर खड़े थे, जहां प्यारेलाल की लाश पड़ी थी, और औरतें घर के आंगन में जमा होकर रो रही थीं। पुष्पा, सुधा, लता, झुमरी, रजनी—गांव की सारी औरतें रत्ना को संभालने की कोशिश कर रही थीं।

रत्ना का चेहरा पीला पड़ गया था। उसका बुखार तो हल्का हो गया था, लेकिन ससुर की मौत की खबर ने उसे तोड़ दिया था। वो औरतों के बीच बैठी थी, लेकिन उसका दिमाग कहीं और भटक रहा था। रात को प्यारेलाल, सोमपाल, और कुंवरपाल ने उसे चोदा था, और अब उसका ससुर इस दुनिया में नहीं था। उसके बदन में अभी भी उनके लंड का एहसास बाकी था, और ये सोचकर उसका मन डर और ग्लानि से भर जाता था। उसे शक हो रहा था कि कहीं रात की घटना के बाद सोमपाल और कुंवरपाल से झगड़ा तो नहीं हो गया। लेकिन अभी कुछ कह पाना संभव नहीं था।

फुलवा भी आंगन में बैठी थी, लेकिन उसका मन भी उलझन में था। रात को वो नदी किनारे टोटका कर रही थी, जहां से प्यारेलाल की लाश कुछ दूरी पर मिली थी। उसे डर था कि कहीं उस टोटके या अनजान साए का इससे कोई संबंध तो नहीं। वो चुपचाप सोचती रही, अपने डर को किसी से जाहिर न करने की कोशिश करती हुई।

इसी बीच, रत्ना और राजकुमार की बेटी रानी अपने पति और सास के साथ वहां पहुंची। रानी ने अपने दादा की लाश देखते ही बिलख-बिलख कर रोना शुरू कर दिया। "हाय बाबा! मुझे छोड़कर कहां चले गए!" उसकी चीखें आंगन में गूंज उठीं। रानी की सास ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन वो बार-बार अपनी मां रत्ना की गोद में सिर रखकर रोती रही।

रिश्तेदारों के आने के बाद प्यारेलाल का अंतिम संस्कार किया गया। नदी किनारे चिता की आग ने सबको भावुक कर दिया।अगले कुछ दिनों तक गांव में शोक का माहौल रहा। राजकुमार के घर में चूल्हा नहीं जला, और गांव के बड़े-बुजुर्ग उसे सांत्वना देते रहे। एक बुजुर्ग ने कहा, "देख बेटा, अब उनका समय आ गया था। वो चले गए। तुम अब घर के बड़े हो, खुद को और परिवार को संभालो।" दूसरा बोला, "उम्र हो गई थी, एक न एक दिन तो जाना ही था। अच्छा हुआ बिना तकलीफ के चले गए।" राजकुमार चुपचाप सिर झुकाए सुनता रहा, लेकिन उसका मन भारी था।

रात ढल चुकी थी। पुष्पा ने खाना बनाया और रत्ना के घर ले गई। फुलवा भी उसके साथ थी। दोनों ने तय किया कि आज वो रत्ना के साथ ही सोएंगी, ताकि उसे अकेलेपन का एहसास न हो। फुलवा ने सुधा को पहले ही समझा दिया था कि वो घर पर छोटू का ध्यान रखे। उसने सुधा को कहा कि वो छोटू को पुड़िया वाली दवाई दे दे, ताकि वो उत्तेजित न हो, और आज रात छोटू के साथ सो जाए, क्योंकि पुष्पा घर पर नहीं होगी। सुधा ने घर के सारे काम निपटा लिए। उसने सबको खाना खिलाया और बाहर सो रहे लोगों को दूध पिलाया। फिर उसने छोटू के लिए दूध में पुड़िया मिलाई और कमरे में गई, जहां छोटू पहले से लेटा हुआ था।"ले लल्ला, दूध पी ले," सुधा ने प्यार भरे लहजे में कहा, एक मिट्टी का गिलास छोटू की ओर बढ़ाते हुए।

छोटू ने सिर हिलाया, "मन नहीं कर रहा चाची, मुझे भी भूरा के यहां सोना था।" उसकी आवाज में उदासी थी। प्यारेलाल की मौत और गांव का शोक उस पर भी असर छोड़ गया था।सुधा ने उसे समझाया, "अरे लल्ला, मैं समझती हूं तू अपने दोस्त के लिए दुखी है। पर वहां सब बड़े हैं ही। दूध पिएगा तभी तो ताकत आएगी, और अपने दोस्त की हर काम में मदद कर पाएगा। ले, चल पी ले।" उसकी आवाज में ममता थी, और उसने छोटू को प्यार से मनाया।छोटू ने चाची की बात मान ली। उसने गिलास लिया और एक ही सांस में सारा दूध पी गया। सुधा ने तुरंत किवाड़ बंद कर दिए और बिस्तर के पास आ गई। उसने अपनी साड़ी उतारी और एक ओर रख दी। सुधा की हमेशा से आदत थी कि वो पेटीकोट और ब्लाउज में ही सोती थी। उसने अपना भरा हुआ बदन बिस्तर पर लिटाया और आंखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगी।

लेकिन छोटू के लिए ये नजारा मुश्किल हो गया। अपनी चाची को इस तरह देखकर उसकी आंखें फैल गईं। सुधा का नंगा पेट, उसकी गहरी नाभि, और ब्लाउज में से झांकती चूचियों की दरार—ये सब देखकर छोटू के दिमाग में वो पुरानी यादें ताजा हो गईं, जब उसने चाची को चाचा के साथ चुदाई करते देखा था। उस रात की चीखें, सुधा की नंगी चूचियां, और उसकी मोटी गांड—सब कुछ उसके सामने घूमने लगा और उसका लंड धीरे-धीरे तनने लगा। वो नहीं चाहता था कि चाची को उसकी उत्तेजना का पता चले, इसलिए उसने जल्दी से करवट ले ली और दूसरी ओर मुंह करके लेट गया।

सुधा ने आंखें बंद कर लीं और सोने की कोशिश करने लगी। उसे लगा कि छोटू भी सो गया होगा। लेकिन छोटू का मन उथल-पुथल मचा रहा था। एक तरफ उसका मन कह रहा था कि उसे चुपचाप सो जाना चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ उसकी हवस उसे उकसा रही थी। उसने सोचा, "मैंने तो अपनी मां को चोद लिया है, फिर चाची से डरने की क्या बात है? चाची तो वैसे भी कितनी गरम है, मैंने उसे चाचा के साथ देखा है।" ये सोचकर उसने हिम्मत जुटाई और धीरे से सुधा की ओर करवट ले ली। उसने सोने का नाटक करते हुए अपना हाथ सुधा के नंगे पेट पर रख दिया।

सुधा ने पहले छोटू के स्पर्श को अनदेखा किया। उसे लगा कि शायद छोटू नींद में ऐसा कर रहा है। लेकिन जैसे ही छोटू का हाथ उसके पेट पर हल्के-हल्के सहलाने लगा, सुधा के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसे अपनी जेठानी पुष्पा के साथ बिताए वो पल याद आने लगे, जब वो दोनों एक-दूसरे के बदन को सहलाती थीं। सुधा की सांसें तेज होने लगीं, और उसकी चूत में एक हल्की सी गीलापन महसूस होने लगा। लेकिन फिर उसे अहसास हुआ कि ये छोटू है, उसका भतीजा। उसने जल्दी से छोटू का हाथ पकड़ा और अपने पेट से हटा दिया। उसने छोटू को सीधा कर दिया और खुद भी सीधी होकर लेट गई।

छोटू डर गया। उसे लगा कि चाची को उसकी हरकत का पता चल गया है। उसने तुरंत सोने का नाटक शुरू कर दिया और चुपचाप लेट गया। सुधा ने एक बार छोटू के चेहरे की ओर देखा। उसे वो सोता हुआ नजर आया। उसने राहत की सांस ली और फिर से आंखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगी। लेकिन तभी उसकी नजर छोटू के निक्कर पर पड़ी, जहां एक तंबू साफ दिख रहा था। सुधा का मुंह हैरानी से खुल गया।

अपने भतीजे के कच्छे में इतना बड़ा तंबू देखकर सुधा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वो हैरान रह गई कि इतनी सी उम्र में छोटू का लंड इतना बड़ा कैसे हो सकता है। उसकी जिज्ञासा जाग उठी—अगर कच्छे के ऊपर से ऐसा दिख रहा है, तो सामने से कैसा होगा? उसने अपने सिर को झटककर इन विचारों को बाहर निकालने की कोशिश की। वो जानती थी कि वो एक कामुक औरत है, लेकिन आज उसे छोटू के साथ कुछ अलग ही आभास हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि उसके बदन पर उसका कोई काबू नहीं है। उसने मन ही मन सोचा, "क्या सच में छोटू के ऊपर कोई साया है? नींद में वो मेरे पेट से खेल रहा था... कुछ समझ नहीं आ रहा। ऊपर से उसका ये इतना अकड़ा हुआ है—क्या ये मेरे पास होने की वजह से है?" फिर उसने खुद को डांटा, "नहीं-नहीं, छोटू तो मेरा भतीजा है। वो मुझे देखकर उत्तेजित क्यों होगा?" सुधा के मन में सवालों का तूफान मचा था। वो दोबारा सोने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसकी सांसें अब भी तेज थीं।

छोटू भी सोने का नाटक कर रहा था। लेकिन उसे भी ग्लानि हो रही थी। उसने सोचा, "प्यारेलाल चाचा की मौत जैसे बड़े हादसे के बाद मैं हवस के चक्कर में क्यों पड़ रहा हूं?" उसने खुद को समझाया कि उसे शांत रहना चाहिए। उसने अपनी सांसों को नियंत्रित करने की कोशिश की और नींद लेने का प्रयास किया। कुछ ही देर में दोनों की नींद लग गई, और कमरे में सन्नाटा छा गया।अगली सुबह जब सूरज की किरणें कमरे में झांकने लगीं, सुधा की आंखें खुलीं। उसका मन अभी भी छोटू के साथ हुई उस घटना के विचारों से भरा था, लेकिन उसने उन्हें मन से निकालने की ठान ली। वो उठकर घर के काम में जुट गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

छोटू भी सामान्य व्यवहार करने की कोशिश कर रहा था। उसने रात की ग्लानि को पीछे छोड़ दिया और दिन की दिनचर्या में लौट आया।

अगले दो-तीन दिन गांव में शोक के माहौल में बीते। छोटू कभी सुधा के साथ, तो कभी पुष्पा के साथ सोया, लेकिन उसने अपनी हवस पर काबू रखा। उसने अच्छाई दिखाई और कुछ भी करने की कोशिश नहीं की। इन दिनों फुलवा ने भी टोटका करना बंद कर दिया था, क्योंकि प्यारेलाल की मौत ने उसे डरा दिया था। सोमपाल और कुंवरपाल भी रत्ना से आंखें मिलाने से बच रहे थे। उन्हें रात की घटना की ग्लानि सता रही थी, और वो अपने आपको दोषी महसूस कर रहे थे।

उधर, पुष्पा को हैरानी हो रही थी कि छोटू अब उसके साथ कुछ करने की कोशिश नहीं करता। उसे लगा कि प्यारेलाल की मौत ने उसे बदल दिया है। लेकिन पुष्पा की अपनी उत्तेजना दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। उसका बदन सुलग रहा था, और वो छोटू की अनुपस्थिति में खुद को संभाल नहीं पा रही थी। लता की हालत भी कुछ ऐसी ही थी। उसकी उत्तेजना भी बढ़ रही थी, लेकिन वो लगातार रत्ना के घर सो रही थी, इसलिए अपने मन पर ध्यान नहीं दे पा रही थी।

नंदिनी भी खुद को शांत करने की कोशिश कर रही थी। उसने नीलम के साथ हुई घटना को भुलाने की ठानी थी, लेकिन दोनों की बोलचाल अब भी बंद थी। जब भी वो एक-दूसरे के सामने आतीं, नजरें चुरा लेतीं। इस बीच, भूरा का भाई राजू और नंदिनी थोड़ा-थोड़ा खुल गए थे। नंदिनी को राजू का शर्मीला व्यक्तित्व पसंद आ रहा था, जो उसके अपने खुले स्वभाव से बिल्कुल उलट था। साथ ही, प्यारेलाल की मौत के बाद राजू के परिवार के प्रति उसकी सहानुभूति बढ़ रही थी।

ऐसे ही तेरहवीं का दिन भी बीत गया। गांव का माहौल धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। तेरहवीं के अगले दिन सुबह की शौच से लौटते हुए लल्लू, भूरा, और छोटू साथ-साथ थे। ताजा हवा और सुबह की ठंडक उनके चेहरों पर थोड़ी राहत ला रही थी।

लल्लू ने बात शुरू की, "अब क्या करना है आज पूरे दिन?"छोटू ने सिर खुजलाते हुए कहा, "पता नहीं यार, कुछ सूझ ही नहीं रहा। करने को कुछ है ही नहीं।

भूरा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, "है तो बहुत कुछ करने को, बहुत दिनों से कुछ किया ही कहां है?" उसकी आंखों में एक चमक थी, जो उसके दोस्तों को तुरंत समझ आ गई।

लल्लू और छोटू एक साथ मुस्कुरा पड़े। लल्लू ने कहा, "अरे यार, मन की बात कह दी तूने तो!

"छोटू ने जोड़ा, "सही में यार।"भूरा ने हंसते हुए कहा, "अरे मन में थी तो अब तक बाहर क्यों नहीं आई?

लल्लू ने ठहाका लगाया, "यार, इतना बड़ा कांड तेरे घर में हो गया था, इसलिए हम लोग खुद को रोक रहे थे।

भूरा ने सिर हिलाया, "अरे अब जो हो गया सो हो गया। बाबा चले गए, और अब वापस आने से रहे। पर इसका ये मतलब तो नहीं कि हम जिंदगी ही न जिएं।

छोटू ने तारीफ की, "अरे वाह भाई, क्या समझदारी वाली बात कही!

लल्लू ने उत्साह से कहा, "हां यार, वैसे अब बताओ क्या करना है। मुझसे रुका नहीं जा रहा।

छोटू ने जोड़ा, "हां यार, और हमारी योजना भी तो अधूरी रह गई।

भूरा ने सुझाव दिया, "उस पर भी काम करेंगे, बस थोड़े दिन के लिए विराम लिया था।

लल्लू ने उत्साहित होकर कहा, "तो फिर चलो खेत की तरफ। देखते हैं, कोई नजारा मिल जाए।


तीनों दोस्तों की आंखों में शरारत की चमक थी। वो तुरंत खेत की ओर दौड़ पड़े, हल्की ठंडी हवा उनके चेहरों को छू रही थी, और उनके मन में पुरानी हवस फिर से जागने लगी थी।

जारी रहेगी, आपकी प्रतिक्रिया का बहुत बेसब्री से इंतजार है, प्रतिक्रिया कम हो रही हैं तो लिखने का भी मन नहीं होता।
 
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