Adultery गुजारिश 2 (Completed) - Page 8 - SexBaba
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Adultery गुजारिश 2 (Completed)

मोहब्बत अजीब होती है मित्र, ये ना जाने कब हमे चुन लेती है, गली मोहल्ले, तन्हा रास्ते, लहराते खेत, शांत पेड़, कब हमारी कहानी का वो हिस्सा बन जाते हैं जो हमे बहुत बाद मे महसूस होती है, अब मेरा हाल सुनो मोहब्बत लिखने के लिए मुझे दर्द सहना पड़ता है, बेशक ये ऑनलाइन सिस्टम जहां भावनाओ की कदर नहीं पर होते हैं कुछ हम जैसे लोग जो इस दुनिया मे बस मोहब्बत भर देना चाहते हैं, ये कहानी बस माध्यम है आप सबके दिलों को धड़कने की कोशिश
 
#61



ताई- तुझे नहीं मालूम क्या रीना के लिए रिश्ता आया है .

एक पल को मुझे मेरे कानो पर यकीन नहीं हुआ.

मैं- क्या कहा तुमने

ताई- यही की रीना के लिए रिश्ता आया है मैं उसके घर जा रही हूँ, एक मिनट क्या रीना ने तुझे नहीं बताया

मैं- बताया था , बस मेरे दिमाग से निकल गयी थी .

अपने भावो को छुपाते हुए मैं बस इतना ही कह पाया. और कहता भी तो क्या , इस दिन की शुरुआत ऐसे हुई थी तो अंजाम की क्या ही कहे. सर में अचानक से ही दर्द हो गया था . समझ ही नहीं आ रहा था की क्या करू, क्या कहूँ. इस छोटे से दिल में ज़माने भर का बोझ उठाये मैं पागल ही हो गया था . दिल चाहता था की मैं रोकर इस बोझ को हल्का कर लू . पर वो आशिकी ही क्या जिसका इम्तिहान न हो.

चाहता तो अभी उसका हाथ पकड कर पूछ सकता था की ये सब क्घया है पर उसमे भी मेरी ही रुसवाई थी घर से निकल तो आया था पर रीना की दहलीज पर जाने की हिम्मत नहीं हुई तो उसी नीम के निचे बैठ गया . सीने में आग सी लगी थी मेरे न , न जाने ये दर्द जख्म का था या मोहब्बत का पर जल रहा था मैं. जब दिल दीवाने पर कोई जोर नहीं चला तो मैं गाँव से बाहर आ गया . दिन , दोपहार से शाम , शाम से रात में बदल गया था पर इस मनीष को चैन नहीं था .

अपनी बेचैनी लिए मैं शिवाले में बैठा था . उस देवता से मेरी आँखे न जाने कितने सवाल पूछ रही थी जिसने मेरे भाग को अपनी वीरानियो से जोड़ दिया था .

“क्या लिखा है मेरे नसीब में तुमने ” मैंने सवाल किया उस से और तभी पायल की उस झंकार ने मेरा ध्यान खींच लिया , उस पायल की झंकार जिसे मैं एक हजारो में नहीं लाखो में पहचान सकता था ,एक पल में मेरी सारी बेचैनी, सारी तन्हाई जैसे ख़ाक में मिल गयी .

“रीना ” मैंने अपने आप से कहा . और बस एक पल में ही मैंने उसे अपनी तरफ आते हुए देखा. मेरा दिया हुआ नीला सूट पहने हुए, हाथो में मेहँदी लगाये . जैसे जैसे वो कदम बढ़ाये मेरी तरफ आ रही थी एक के बाद एक शिवाले के दिए जलने लगने लगे थे. पर आज उसकी आँखों में वो दहशत नहीं थी , आज वो जानी पहचानी लग रही थी . मुस्कुराते हुए उसने मेरी पीठ से अपनी पीठ टिकाई और बैठ गयी .

“जानती थी तुम यही मिलोगे ” उसने कहा

मैं- जाये तो कहाँ जाये अब . ये महफिले ये दुनिया सब बेगानी सी लगती है

रीना- ये फितरत है इस दुनिया की

मैं- ऐसा लगता है की मुद्दत हुई तुम्हारे संग यूँ बैठे वो तमाम शामे जो हमने डूबते सूरज को देखते हुए बिताई, वो तमाम लम्हे जो हमने जिए

रीना- ये लम्हा भी तो खास है हम है तुम हो और ये जवान रात है .

मैं- ये लम्हा बस यही थम जाये बैठी रहो तुम आगोश में , देखता रहूँ बस तुम्हे .

रीना- बचपन से जवानी तक का सफ़र कैसे बीत गया ऐसा लगता है जैसे बस कल की ही बात हो .

मैं- मुझे कल से नहीं आने वाले कल से डर लगने लगा है .

रीना -डरना किसलिए भला

मैंने अपना चेहरा रीना की तरफ किया और उसके हाथ को थाम लिया.

मैं- डर लगता है मुझे, तुझसे दूर हो जाने का तुझे खो देने का .

रीना- मैं हमेशा तेरे संग रहूंगी, तेरे दिल में रहूंगी.

मैं- सुना की आज मेहमान आये थे

रीना- तुझे मालूम ही है तो क्यों पूछता है

मैं- तूने बताया भी तो नहीं .

रीना- क्या बताऊ तुझे मेरे सनम , कुछ भी तो नहीं मेरे पास बताने को .

मैं- ऐसा लग रहा है की वक्त रेत के जैसे मेरी मुट्ठी से फिसल रहा है , रीना सच बता तू मुझे छोड़ कर तो नहीं जाएगी न , तेरे बिना कैसे जियूँगा मैं नहीं जी पाउँगा मैं , नहीं जी पाउँगा मैं . बचपन से लेकर आज तक इस दुनिया ने ठुकराया है मुझे, दुत्कारा है मुझे, एक तू ही थी जिसने मुझ गरीब का हाथ थामा. मेरे दुःख में मेरे सुख में , मेरी ख़ुशी में बस तू ही थी . और आज ऐसा लगता है की कोई आ गया है मुझसे मेरी ख़ुशी छीनने के लिए.

जो दर्द मैंने बचपन से पीया हुआ था आज आंसू बन कर इस शिवाले में रीना के सामने बह रहा था , उसकी आँखे भी नाम हो गयी .

मैं- बचपन से मेरा कोई नहीं था सिवाय तेरे. मेरे माँ- बाप मुझे छोड़ गए . वो तू ही तो थी जिसने मुझे थामा मैं कब का टूट कर बिखर गया होता अगर तू नहीं होती . मुझे पराया मत कर अपने से दूर मत कर मेरी जान

रीना- मेरे दिल से पूछ , ये हवाए, ये फिजाए मेरी हर एक सांस गवाह है मेरे सनम मेरी हर सुबह ने बस तेरा दीदार किया मेरी हर शाम ने तेरा इंतज़ार किया मेरा दिल चीर कर देख हर धड़कन पर बस तेरा ही नाम लिखा होगा. मैंने तो अभी सोचा ही नहीं था की जिंदगी मुझे इस मोड़ पर ले आयेगी, मेरे पैरो में बेडिया है मेरे हाथो में तेरा हाथ है बता मैं करू तो क्या करू मेरे सनम. हर घडी, हर लम्हा, मेरा एक एक मिनट मैंने तेरे नाम किया . मैं कोसती हूँ खुद को काश उस दिन मैंने तुझसे जिद न की होती इस मनहूस जगह आने की . सारी दुनिया जान गयी मेरी-तेरी मोहब्बत के बारे में. मैं करू तो क्या तुझसे कहूँ तो क्या कहूँ मेरी माँ ने मेरे पैरो में उसके नाम की बेडिया बान्ध दी है

मैं- मैं बात करूँगा उनसे , माँ है वो औलाद के मन की बात समझेगी .

रीना- काश वो समझ पाती, तुझे क्या लगता है मैंने कहा नहीं उससे. उसे ज़माने की फ़िक्र है मेरी नहीं .

मैं- और तुझे किसकी फ़िक्र है मेरी जान

रीना- मैं तो दोराहे पर खड़ी हूँ , तुझे छोड़ दू तो रुसवाई से मरूंगी माँ को छोड़ दिया तो जलालत से मरूंगी. दोनों तरफ से मरना तो मेरा ही है .

मैं- क्या तूने इस रिश्ते के लिए हाँ कह दी है

रीना- मेरी हां न की किसे परवाह है .

मैं- मैं मर जाऊंगा रीना तेरे बिना

रीना- मैं तो वो भी नहीं कर सकती

मैं- तो ठीक है , तू एक काम कर मुझे अभी इसी वक्त मार दे. इस किस्से को यही पर ख़तम कर दे.जीना का मकसद तू है तो मेरा अंजाम भी तू ही बन

रीना- यही बात अगर मैं तुझसे कहूँ तो तू कर पायेगा ऐसा.

मैं- तो तू ही बता क्या करूँ मैं

रीना- यही तो मैं तुझसे पूछ रही हूँ

रीना ने अपने गले में हाथ डाला और वो हीरे वाला धागा निकाल कर मेरे हाथ में रख दिया बोली- इसकी जरुरत नहीं मुझे. तू ही रख इसे

मैं- मैं भला क्या करूँगा इसका. तू ही रख

मैंने वो धागा वापिस रीना को दे दिया. रीना ने मेरे सीने पर हाथ रखा और बोली- मुझे सदा अफ़सोस रहेगा इस जख्म के लिए

मैं- तू जानती थी , तुझे पता था

रीना- मैं हर दम हर पल अपने होश में थी .

मैं- तो तू सब जानती है

रीना- मैं बस तुझे जानती हूँ , मैंने बस तुझे जाना है

एक एक कर के शिवाले के दिए बुझने लगे.

रीना- मेरे सनम ये दर्द जो तुझे दिया है इसका कोई तोड़ नहीं है , पर मैंने इसे आधा बाँट लिया है दर्द उठेगा तेरे सीने में साथ तडपना मुझे है .

मैं- नहीं , तू ऐसा नहीं कर सकती

रीना- प्रेम की लौ जलाई है सुलगना तो पड़ेगा.

मैं- वो दुनिया , दुनिया नहीं होगी , जिसमे तू नहीं होगी मैं जलाकर ख़ाक कर दूंगा उस दुनिया को .

रीना- उस ख़ाक से धुआ भी मेरे ही प्यार का उठेगा.



मैं कुछ कहता उस से पहले ही रीना ने आगे बढ़ कर मेरे होंठो को चूम लिया और चली गयी शिवाले के अँधेरे ने मुझे लील लिया.
 
#62



गाँव से जैसे अब नाता तोड लिया था मैंने, ज्यादातर वक्त मेरा खेतो पर ही गुजरता था अपने गुस्से को इस जमीन पर उतारता था मैं, जब तक मैं फ़ना होने के करीब नहीं पहुँच जाता मैं खेती की कोशिश करता ही रहता था . मुझे अपनी किस्मत पर हद से जायदा गुस्सा था . चढ़ती उम्र के लड़कपन में मैं मोहब्बत तो कर बैठा था पर अब मैं करू भी तो क्या. रीना से दूर होना मेरे लिए ऐसा था की जैसे किसी मजदुर से उसकी रोटी को छीन लिया गया हो.

चाहता तो सारे गाँव के आगे उसका हाथ थाम सकता था और किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी की मुझे रोक पाए . पर इसमें भी रीना की ही रुसवाई होनी थी , पर लगता था इ मैं ज्यादा देर तक अपने दिल में भरे इस गुबार को खाली नहीं कर पाऊंगा. उस दिन मुझे कुछ कपड़ो की जरुरत थी तो मैं घर गया . देखा की गली में पृथ्वी की गाड़ी खड़ी थी. मैं ताई के घर की तरफ मुड गया वैसे भी इस चूतिये के मुह नहीं लग्न चाहता था मैं .

मैंने देखा दरवाजा अन्दर से बंद था , एक दो बार आवाज देने पर भी किसी ने नहीं खोला, मुझे वैसे भी रुकना तो था नहीं मैं दिवार पर चढ़ा और अन्दर कूद गया. अन्दर कमरे से किसी के हसने बोलने की आवाज आ रही थी . ताऊ तो हो नहीं सकता इतना तो मुझे विस्वास था . कोतुहल वश मैंने खिड़की से अन्दर झाँका तो एक बार मुझे अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हुआ. ताई और चाचा दोनों बिस्तर पर नंगे थे . चाचा लेटा हुआ था और ताई उसके ऊपर चढ़ कर चुदवा रही थी .

इस औरत का यही रंडी रोना था इसे न जाने कितनी प्यास थी जो बुझ ही नहीं रही थी .कोई और मौका होता तो अभी पकड़ कर इनको जलील करता , तभी मेरे दिमाग में ये बात आई की चाची के मामले में तो इस चुतिया नंदन का लंड खड़ा नहीं होता और इधर देखो कैसे हुमच हुमच कर पेल रहा है . कुछ देर बाद दोनों शांत होकर बिस्तर पर ही पसर गए.

चाचा - इस उम्र में भी बड़ी गजब हो तुम भाभी

ताई- सो तो है , और मैं भी क्या करू मेरी निगोड़ी चूत हमेशा से ही इतनी प्यासी है .

चाचा- यही बात तो तुम्हारी सबसे अलग बनाती है तुमको

ताई- अब छोड़ो ये फालतू की चापलूसी , तुम्हारा काम हो गया अब निकलो मुझे भी खेतो पर जाना है . कितने दिन हुए मनीष घर की तरफ आया ही नहीं है . मुझे चिंता होने लगी है उसकी .

चाचा- आजकल न जाने किस धुन में लगा है वो .

ताई- उस पर जूनून सवार है , रीना को चाहता है वो

चाचा- चढ़ती उम्र का जोश है थोड़े दिनों में ठंडा हो जायेगा. लडकियों का क्या है एक गयी दूसरी आ जाएगी. चूतों की कोई कमी थोड़ी न है गाँव में .

ताई- इस खानदान में वो ही है जिसे चूत का चस्का नहीं है , रिस्तो को थामने वाला, मानने वाला है वो . मुझे डर है रीना को लेकर वो कोई बवाल खड़ा न कर दे.

चाचा- अब क्या करे, रीना की जगह कोई और होती तो सोच भी लेते . वो भांजी है इस गाँव की तुम ही बताओ कैसे मुमकिन है .

ताई- मुमकिन तो तेरा और रीना की माँ का रिश्ता भी नहीं है

चाचा- हम भी तो हार ही गए थे न , मुझे इस बात से जायदा उस लड़की की फ़िक्र है जिसके साथ वो आजकल रहता है. जब्बर को तलाश है उसकी.

ताई- मनीष जब्बर से टकराएगा तो ठीक नहीं होगा. वैसे तुमने कुछ ज्यादा ही छूट दे रखी है जब्बर को , तुम्हारे कान पर मूतने लगा है वो आजकल

चाचा- तो क्या करू, भाईसाहब के बोये बीजो की फसल मुझे काटनी पड़ रही है . जब्बर और भाई साहब की कितनी गहरी दोस्ती थी , अगर वो जब्बर की बहन को नहीं चोदते , उसे ख़राब नहीं करते तो आज हालात कुछ और होते.

ताई- इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है , जब्बर का आरोप है ये बस . अर्जुन ऐसा कभी नहीं करता

चाचा- तुम्हे बस भाई साहब की तारीफों का मौका चाहिए

ताई- इस घर में मैं हूँ तो उसकी वजह से .मैं लाख गलत थी पर फिर भी उसने मेरा साथ दिया. मैं जानती हूँ उसे.

चाचा- उनको कभी कोई नहीं जान पाया.

ताई- ठीक है अभी तुम निकलो . संध्या ने देख लिया तो बवाल करेगी . वैसे भी मुझे खेतो पर जाना है

जब तक वो कपडे पहनते मैं वापिस घर से बाहर हो लिया. पर आज मेरी किस्मत गधे के लंड से लिखी हुई थी गली में मेरा सामना पृथ्वी से हो गया जो ठीक उसी वक्त वापिस जा रहा था . मुझे देख कर वो रुक गया उसके होंठो पर मुस्कान आ गयी .

पृथ्वी- और कैसे हो , सुना है आजकल बड़े कष्ट में गुजर रहा है जीवन.

मैं- तू अपना देख, मेरी फ़िक्र कर लूँगा मैं खुद.

पृथ्वी- तेरी यही अकड़ मुझे हैरान किये हुए है . मेरे झांट बराबर भी नहीं है तू और घंमड जहाँ भर का .

मैं- तेरी किस्मत तेज है , तू मुझे ऐसी जगह पर ही मिलता है जहाँ तू भी जानता है की मैं कुछ करूँगा नहीं. यहाँ तुझे मारा तो तू रोता फिरेगा की अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर होता है .

पृथ्वी- कुत्ता तो मैं तुझे बनाऊंगा. याद कर मैंने तुझसे कहा था की मैं तुझसे तेरा सब कुछ छीन लूँगा. वैसे मैंने सुना की तेरी लैला का रिश्ता होने जा रहा है .

मैं- जुबान को लगाम दे पृथ्वी, कहीं ऐसा न हो की मैं इसे यही खींच लू.

पृथ्वी- शुरुआत हो गयी है . वैसे उसने तुझे बताया नहीं की उसके होने वाले पति का नाम क्या है , खैर कोई बात नहीं मैं बता देता हूँ , वो मैं ही हूँ जो उसे ब्याह कर ले जाएगा. तेरी सबसे अनमोल चीज को तुझसे छीन कर ले जाऊंगा मैं. और तब तू झुकेगा मेरे आगे. क्योंकि उसको होने वाली हर तकलीफ का दर्द तुझे होगा . यही सजा चुनी है मैंने तेरे लिए.

“पृथ्वी , हरामजादे ” मेरे गुस्से का बम फट गया था .

“बहन के लोडे, तू मेरे साथ खेल खेलेगा. तू ब्याह करेगा मेरी रीना के साथ , ” मैंने एक मुक्का पृथ्वी के मुह पर मारा. उसके होंठो से खून बहने लगा. अगली लात के साथ ही वो सीधा गाड़ी के दरवाजे से जा टकराया.

मैं- मेरी भूल थी ये जो मैंने तेरा लिहाज किया की घर आये हुए दुश्मन को भी इज्जत दी जाती है तू साले मेरे गुरुर के साथ खेलेगा. तेरी गांड में दम है तो लेकर आना तू बरात तेरे हर बाराती और तेरी लाशो को ही मंडप में नहीं सजा दिया तो मेरा नाम भी मनीष नहीं .

मैंने उसे एक मुक्का और मारा पर वो बचा गया घूँसा सीधा गाडी के शीशे पर अलग जो पल भर में ही तिडक गया .

“ये क्या कर रहे हो तुम दोनों. छोड़ो एक दुसरे को ” संध्या चाची ने हम दोनों के बीच आते हुए कहा.

मैं- तो इसलिए इस सांप को पाला था तुमने ताकि ये मुझको डस सके. इस हरामखोर का यहाँ आने का मकसद ही ये था की रीना संग रिश्ता जोड़ सके ये , पर मैं भी प्रण लेता हु की अगर ऐसा हुआ तो इस गाँव से लेकर रुद्रपुर तक इतनी लाशे गिरेंगे की गिनती कम पड़ जाएगी.

पृथ्वी- मैं भी देखूंगा कौन रोकेगा मुझे

मैं- भोसड़ी के रोकना तो दूर की बात है , मैं अह्बी तुझे इस काबिल नहीं छोडूंगा की तू वापिस लौट सके, तेरी कब्र यही खोद दूंगा.

संध्या- पृथ्वी तुम जाओ

पृथ्वी- पर बुआ

संध्या- मैंने कहा न लौट जाओ .

पृथ्वी ने गाड़ी स्टार्ट की और वापिस मुड गया . रह गए हम दोनों

मैं- तो इसलिए तुम खिलाफ थी मेरे और रीना के ताकि तुम अपने भतीजे का मामला सेट कर सको

संध्या- मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम था .

मैं- झूठी हो तुम, सारे गाँव को मालूम है की रीना का रिश्ता हुआ है और तुम्हे ये नहीं मालूम की तुम्हारे भतीजे ने ही ये खेल खेला है बिना तुम्हारी मंजूरी के ये मुमकिन ही नहीं .

चाची- मुझ पर झूठा इल्जाम लगा रहे हो तुम

मैं- झूठ भी शर्मिंदा हो जाये तुम्हे झूठी कहने में . अपने भतीजे की ख़ुशी के लिए तुमने बेटे का हक़ मार दिया. वाह चाची वाह , पर कोई बात नहीं . मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगा की मेरी वजह से रीना दुःख भोगे मैं उस जड़ को ही काट दूंगा. और कोई मुझे रोक नहीं पायेगा तुम भी नहीं .

संध्या- मेरी बात तो सुन, मुझे सच में नहीं मालूम था ये . मैं खुद जाकर बात करुँगी दद्दा ठाकुर से .



मैं- माँ चुदाये दद्दा ठाकुर. अब जो भी होगा वो मैं करूँगा. किसी एक को तो मरना ही है और वो पृथ्वी होगा.
 
#63



मेरा दिमाग इतना भन्नाया हुआ था की मैं न जाने क्या कर बैठता. पृथ्वी मुझसे बदला लेने के लिए रीना को मोहरा बनाना चाहता था , इस नीचता की उम्मीद नहीं थी मुझे. मर्द वो होता है जो सामने से दुश्मनी निभाए पर उसने कुटिलता दिखाई, वो जानता था की मेरी कमजोरी है रीना पर वो ये नहीं जानता था की रीना मेरी ताकत भी है .

संध्या- शांत होजा मनीष ,

मैं- कैसे शांत हो जाऊ मैं, मेरे सामने वो दो कौड़ी का इन्सान इतनी बड़ी बात कह गया . उस दिन भी मैंने तुम्हारा लिहाज़ किया वर्ना उसके ही घर में उसे बता देता मैं

चाची- तो मेरा लिहाज़ करके ही शांत हो जाओ और घर चलो

मैं- किसका घर, मेरा की घर नहीं है .मैं अपना सामान ले जा रहा हूँ इस चोखट पर अब कदम नहीं रखूँगा, जहाँ पर मेरे दुश्मन का आना जाना हो वो जगह बेगानी हुई मेरे लिए.

चाची- मेरी बात तो सुन , मैं आज ही रुद्रपुर जाउंगी और इस मामले को देखूंगी .

मैं- मैंने अपना निर्णय कर लिया है , पृथ्वी को दुश्मनी चाहिए मैं उसे जहन्नम दूंगा. रीना सिर्फ मेरी है ,मेरी ही रहेगी.

“तडाक ” एक थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा.

“तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी लड़की का नाम लेने की , पुरे गाँव के सामने बदनाम करता है उसे ” रीना की माँ ने मेरे गाल पर थप्पड़ मारा .

कोई और होता तो मैं उसे बता देता पर सहन किया मैंने.

मैं- थप्पड़ मारने से सच बदल नहीं जाएगा, अब बात खुली है तो दूर तक जायेगी, मैं और रीना एक दुसरे से प्यार करते है , ब्याह करना चाहते है

संध्या- मनीष, गाँव के सामने तमाशा मत कर

रीना की माँ- तमाशा तो इसने कर ही दिया है , अपनी औकात भूल गया है ये, इसके साथ थोडा बोल बतला क्या ली इसने तो हद ही पार कर दी, गाँव राम की कोई शर्म है या नहीं , देखो गाँव वालो बहन बेटी को ही ब्याहने की मन में है इस नीच के.

इकठ्ठा हुए गाँव वालो ने भी रीना की माँ के सुर में सुर मिलाये.

संध्या- रीना भांजी है हमारी मनीष , हम मानते है की तुम करीब हो एक दुसरे के पर जो तुम चाहते हो वो कभी नहीं हो पायेगा.

मैं- तुम जानती हो चाची, वो इस्तेमाल करना चाहता है उसका.

रीना की माँ- मेरी बेटी तो उसके साथ ही ब्याही जाएगी, मैं तो लाख से भी इतने बड़े घर का रिश्ता न छोडू

मैं- रीना से तो पूछ लो एक बार

रीना की माँ- मेरी बेटी है वो , उस से पूछने की क्या जरुरत मुझे, जहाँ कहूँगी वही उठेगी- बैठेगी मेरी बेटी.

मैं- ठीक है फिर , अगर तेरी यही जिद है तो ये ही सही . तू कर रिश्ता , बुला बारात मैं भी देखूंगा डोली कैसे उठती है . तेरे साथ साथ ये पूरा गाँव जोर लगा ले .किसी के गांड में दम हो तो रोक लेना मुझे,

रीना की माँ- संध्या इसे समझाले , कहीं ऐसा न हो की बात फिर संभालनी मुश्किल हो जाये

चाची- आप घर जाओ. तमाशा मत करो मैं बात करुँगी इससे , इसका गुस्सा ठंडा हो जायेगा थोड़ी देर में . बात का बतंगड़ बनाना ठीक नहीं है .

रीना की माँ- जा रही हूँ , पर दुबारा इसकी जुबान पर मेरी बेटी का नाम आया तो जुबान खींच लुंगी इसकी .

मैं- सबसे पहले तुझे ही रस्ते से हटाऊंगा

संध्या- चुप हो जा, क्यों हमारी बेईजज्ती करवाता है.

मैं- तेरी बेइज्जती तब नहीं हुई जब तेरा आदमी इस औरत को पेल रहा था पूछ कर देख इस से कितनी बार ली है चाचा ने इसकी .

मेरे मुह से ये शब्द निकल तो गए थे पर तुरंत ही मुझे अहसास हो गया की ये नहीं कहना था पर अब तीर कमान से निकल चूका था . हर कोई ये बात सुन कर स्तब्ध रह गया . चाची ने अपने मुह पर हाथ रख लिया.

रीना की माँ- कोई और आरोप है तो वो भी लगा ले, जितना जहर तेरे अन्दर भरा है सारा उगल ले तू, कमीने अब तू भी देखना मैं क्या करती हूँ .

रीना की माँ तमतमते हुए घर चली गयी चाची ने मेरी बाहं पकड़ी और घर के भीतर ले आई.

चाची- भर गया मन तेरा , मिल गयी कलेजे को ठंडक. ये तमाशा जो तूने किया है करने की जरुरत नहीं थी, और गड़े मुर्दे उखाड़ कर क्या मिला तुझे, तेरी माँ की उम्र की है वो उसकी इज्जत उछाल दी तूने. बहुत बहादुरी का काम किया तूने . तेरे दिमाग में न जाने क्या भरा है , मैंने दुनिया देखि है , न जाने क्या क्या देखा है , तू सोच भी नहीं सकता उस सच को मैं रोज देखती हूँ , उस सच को बड़ा होते हुए देखा है मैंने. हर बार मैंने तुझे टोका रीना के लिए , कोई तो कारण रहा होगा न . ऐसा नहीं है की मुझे तेरी परवाह नहीं है , तू इस दुनिया में किसी भी लड़की की तरफ इशारा कर , उसे तेरी बहु बनाकर इस घर में ले आउंगी मैं . पर रीना तेरी नहीं हो सकती इस अकाट्य सत्य को तुझे मानना ही पड़ेगा.

मैं- मेरा दिल नहीं मानता

चाची- इस दिल के ही तो है ये सारे बखेड़े. शाम को जाकर रीना की माँ से माफ़ी मांग लेना , वो समझ जाएगी.

मैं- उसके पैर पकड़ लूँगा. अगर वो मेरी बात समझे तो .

संध्या- जिसे तू खेल समझ रहा हैं न वो मौत की वो दास्तान है , जिसकी तपिश में तू झुलसेगा नहीं , जलेगा, रीना जेठ जी की सरपरस्ती में है इतना काफी है तुझे हकीकत समझाने को . हम सब उसके पहरेदार है . आगे तेरी मर्जी है , तू जाने और तेरा नसीब जाने.

“मैं अपना नसीब खुद लिखूंगा ” मैंने कहा और घर से बाहर आ गया .

कुवे पर पहुंचा तो देखा की ताई वहां पर मोजूद थी .

ताई- कितने दिन हुए घर पर आया नहीं तू , हार कर मैं ही आई इधर .

मैं- क्या करता घर पर आकर,

ताई- और लोग क्या करते है , तेरा घर है तू नहीं आएगा तो कौन आएगा.

मैं- मैं वहां रहता तो तुम्हे मौका नहीं मिलता चाचा संग सोने का . और तुम्हे मेरी क्या जरुरत , कोई न कोई तो होता ही है तुम्हारी लेने के लिए. दोपहर को मैं घर पर ही था मैंने देख लिया था चाचा और तुझे. सच कहूँ तो मुझे गुस्सा नहीं आता इस बात पर की मन में आये उसको दे रही है तू, पर मुझे कोफ़्त होती है मेरी ताई ........

ताई- तू मुझे दोष तो दे सकता है , पर ये तो पूछ की आखिर मैं ऐसी कैसे हो गयी, किसने मुझे ये लत लगाई की मैं गंड मरी हो गयी. किसने मुझे ये आदत डाली की मैं चुदे बिना रह ही नहीं पाती.

मैं- नहीं जानना मुझे ये



ताई- क्यों नहीं जानना मुझे, मुझे चोद सकता है , मेरी गांड मार सकता है पर ये नहीं पूछने की हिम्मत की किसने मुझे नंगी बनाया. ....
 
ग्रामीण क्षेत्रों मे खास कर उत्तरी भारत मे ऐसी शादियों को मान्यता नहीं मिलती है sex एक अलग विषय है और विवाह एक विषय. नयी पीढ़ी बेशक ईन मान्यताओं को तोड़ रही है, जिसका फल उन्हें आनर किलिंग से मिल रहा है

ये तमाम बाते बेमानी है, मोहब्बत को हमेशा से जीतना पड़ता है, परिस्तिथियों को इस प्रकार बनाया गया है कि प्रेमियों की परीक्षा हो, रही बात मनीष की तो मीता ने उसके सितारों को पढ़ कर कहा था कि कुछ भी नहीं है सिवाय बर्बादी के
 
दिल टूटने की बात नहीं है, ईन सब से आगे निकल गया हूं मैं, हर अपडेट जिसमें इश्क लिखता हूँ मैं, वो बाते जो किरदारों के माध्यम से आप तक पहुंची है कहीं ना कहीं जी है मैंने, और अब उन यादो मे दुबारा नहीं जाना चाहता मैं.

पाठक और लेखक का रिश्ता भी परिवार जैसा ही होता है परंतु मेरी भी अब मजबूरियाँ है, मैं जीना चाहता हूं उर्वशी के साथ, माही को अपने आँगन मे खेलते हुए देखना चाहता हूं, एक फौजी की जिंदगी होती ही कितनी है आज ये कमेंट कर रहा हूं मेरा कल हो ना हो. तमाम संभावना पर विचार कर के मैंने यही सोचा है
 
रीना और मनीष की प्रेम कहानी कोई साधारण कहानी नहीं है, खुन से धड़कनों पर लिखी गई इबारत है,

अर्जुन सिंह जिसने रीना को अपनी सरपरस्ती दी, ये मत भूलिए अर्जुन एक पिता है पर कभी वो किसी का पति था किसी का दोस्त था किसी का प्रेमी था

अर्जुन की खामोशी के क्या कारण है किस तूफान को सीने मे दबाये है वो ये अर्जुन खुद ही बताये तो ठीक हो
 
#64



मैं- अब मुझे परवाह नहीं है किसी की भी परिवार से मेरा मोह छूटा . जिसको भी मैंने अपना समझा उसी ने मेरी राह में कांटे बिछाए. उस घर में मेरे रहने की एक वजह तुम भी थी , मैंने तुमसे कहा था की ये सब कम बंद करो तुम पर तुमने नहीं मानी. अब मूझे न कुछ कहना है , न सुनना है मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो . इस जिंदगी को कैसे जीना है मैं अपने तरीके से देख लूँगा.

ताई- मैंने तुझसे पहले ही कहा था गड़े मुर्दे मत उखाड़, कुछ नहीं मिलना सड़ांध के सिवा.

मैं- जा सकती हो तुम और लौट कर कभी मत आना मेरे पास

मेरी बात सुनकर ताई आहत हुई और वापिस लौट गयी . ये ऐसे हालात थे जब मुझे सबसे ज्यादा परिवार की जरुरत थी पर इसी परिवार ने मुझे कदम कदम पर धोखा दिया था . ढलती शाम में मैं बावड़ी के पत्थर पर पड़ा था की मैंने मीता को आते देखा.

“कैसे हो ” उसने मेरे पास बैठते हुए कहा

मैं- बस जिन्दा हूँ

मीता- चलो बढ़िया है ,मैंने सुना गाँव में बवाल काटा हुआ है तूने,

मैं- जब तुझे मालूम ही है तो फिर क्यों पूछती है .

मीता- ये आशिकी भी न , ये मोहब्बत के किस्से, वो तमाम कहानिया जो मैंने पढ़ी थी, वो सब तेरे आगे झूठे से लगते है , मुझे मोहब्बत में कभी भी यकीन नहीं था जब तक की मैं तुझसे नहीं मिली थी तू जो मेरी जिन्दगी में आया , तुझे जो मैंने जाना , तेरे संग जो मैं जी रही हूँ . अक्सर मैं सोचती हूँ तू क्या चीज है , तूने मुझ पर ये कैसा रंग डाला है , तू कैसा रंगरेज है जो मुझे ही नहीं जो भी तुझसे मिले उसें रंग डालता है अपने रंग में .

मैं- बड़ी तारीफ हो रही है क्या है तेरे मन में

मीता- तू कहे तो आज मैं बता दू.

मैं- तुझे पूछने की जरुरत नहीं .

मीता- मैं ये मालूम करना चाहती हूँ की जब आजतक मैंने उस हवेली में कदम नहीं रखा तो वहां पर मेरी तस्वीर कैसे है , क्या दद्दा ठाकुर मेरी असलियत जानता है या उस घर में कोई और . ये सवाल मुझे पागल किये हुए है ,

मैं- इतनी सी बात के लिए परेशां है तू, तू कहे तो अभी के अभी चलते है हवेली में .

मीता- हाँ कितना आसान है न .

मैं- मैंने तुझसे वादा किया है तू हवेली की वारिस है जितना तेरा हक़ है वहां तुझे दिला कर रहूँगा मैं.

मीता- ठीक है ठीक है . वैसे तुझे रीना से मिलना चाहिए, वो परेशां होगी . तू बात करेगा तो अच्छा लगेगा उसे.

मैं- मन तो मेरा भी है पर उसकी माँ उसे अकेला छोड़ ही नहीं रही , उसके घर जाऊंगा तो फिर वही तमाशा होगा.

मीता- वो शिवाले में जरुर आएगी , वहां मिल लेना

मैं- अवश्य , फिलहाल अगर तू दो रोटी पका ले तो काम बन जाये सुबह से कुछ नहीं खाया मैंने आज.

मीता- अगर तू तारबंदी कर ले तो मैं कुछ सब्जिया बो दू, कुछ मुर्गियां पाल लू.

मैं- ख्याल तो ठीकहै वैसे भी अब मुझे यही पर रहना है .

मीता- अभी मेरी इच्छा नहीं है खाना बनाने की .

मैं- रहने दे फिर.

मीता- आज रात हम दोनों शिवाले पर चलेंगे. खोज करेंगे कोई तो बात मालूम हो की ये क्या किस्सा है क्या माजरा है . नाह्र्विर किसकी सुरक्षा करते है वहां पर.

मैं- तू पूछ सकती है उनसे

मीता- जिसने उनको साधा है वो ही बात आकर सकता है

मैं- कितना अच्छा होता जो हम इन सब चक्करों से दूर रहते .

मीता- नियति का खेल है सब , हम तो कठपुतलिया है जिस तरफ वो ले जाए ,उसके इशारे पर चल देते है .

मैं- आज जब हम शिवाले जायेंगे तो खाली हाथ नहीं आयेंगे चाहे कुछ भी हो जाये.

जब रात ने दुनिया को अपने आगोश में लिया. तो हम दोनों शिवाले की तरफ चल दिए. आज मौसम शांत सा था . हवा भी नहीं चल रही थी शिवाला गहरे अँधेरे में डूबा था .

“कहाँ से शुरू करे, इतने बड़े क्षेत्र में कहाँ क्या छिपा हो सकता है ” मैंने कहा

मीता- बात तो सही है तुम्हारी , कड़ीयो को जोड़ने की कोशिश करते है .

सबसे पहले हमने उस कमरे की छान बिन करनी शुरू की जिसमे देवता था , एक एक दिवार को देखा की कहीं से कुछ खाली तो नहीं , मैं ये भी जानता था की ये शिवाला मामूली नहीं है जिसे छिपाया गया है वो मेरे सामने भी हो तो भी आसान कहाँ होगा उसे तलाशना तंत्र, मन्त्र और न जाने क्या क्या किया गया था यहाँ पर.

बहुत मेहनत के बाद भी जब कुछ नहीं मिला तो थक हार कर मैं पत्थरों की सीढियों पर बैठ गया .

मीता- मैं पानी लेकर आती हूँ .

दोपल के लिए मैंने अपनी आँखे बंद की मुझे वो लम्हा याद आया जब रीना और मैं यही पर थे. उसने मेरे लबो को चूमा था . कैसे उसका वो चुम्बन मेरे दिल को चीर गया था . एक मिनट , एक मिनट दिल , इस पुरी जगह का दिल था ये स्थान जहाँ पर मैं था , दिल चीर गया था वो लम्हा, इसी समय मुझे ये ख्याल आना क्या किसी तरह का संकेत था मेरे लिए. क्या किस्मत मुझ पर मेहरबान हो सकती थी . क्या मेरा ये ख्याल उस राज़ को खोल सकता था जिसकी डोर सबसे बंधी थी .

मैंने देवता की मूर्ति को जोर लगाकर उखाड़ लिया . यदपि ये ऐसा कार्य था जो अनुचित था , पर मैंने ये कर दिया. इधर उधर ढूँढने पर मुझे लोहे की इक संभल मिल गयी जिस से मैंने वहां पर खोदना शुरू किया. गीली मिटटी इधर उधर फैलने लगी . तभी मीता वहां पर आ गयी .

मीता- ये क्या अनर्थ कर दिया तूने , इसका परिणाम

मैं- मुझे लगता है ये हमें नयी दिशा दिखायेगा.

मीता- मनीष, ये पाप है .

मैं- जानता हूँ

तभी मेरी संभल किसी चीज से टकराई . मिटटी साफ़ की तो देखा की ये एक हांडी थी जिस पर लाल कपडा बंधा हुआ था .

मीता- ये तो ठीक वैसी ही है जैसी हौदी में मिली थी .

मैं- शायद वो इशारा इसके लिए ही था .

मीता- मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा .

मैं- खोल कर देखे क्या

मीता- मैं नहीं जानती की इसके अन्दर क्या है पर अगर इसे देवता के चरणों में रखा गया तो इसका महत्त्व जरुर है .

मैं इस से पहले की मीता को कुछ जवाब दे पाता, हांडी भारी होने लगी . उसका वजह बढ़ने लगा. मैं उसे संभाल नहीं पा रहा था .

मैं- मीता, थाम जरा इसे .

पर इस से पहले की मीता मुझ तक पहुँच पाती एक जोर का धमाका हुआ , इतना जोर का धमाका की मैं अपनी सुध बुधलगभग खो ही बैठा. सब कुछ धुल धुल हो गया. अचानक से हुआ की मैंने खुद को हवा में उड़ते हुए देखा. जब धुल का अम्बार हटा तो मैंने देखा की मीता थोड़ी दुरी पर बेहोश पड़ी है. मेरे पैर पर शिवाले का खम्बा गिरा हुआ था . मैंने जैसे तैसे उसे हटाया और मीता को देखा. सच कहूँ तो मीता से जायदा मेरी दिलचस्पी अब शिवाले में थे.

सब कुछ तबाह हो गया था . शिवाले की सभी दीवारे गिर गयी थी . आस पास के पेड़ चबूतरे ,जहाँ तक भी शिवाले की हद थी सब तहस नहस हो गया था . कुछ भी नहीं था सिवाय मलबे के. ऐसा क्या था उस हांडी में . मैंने मीता के मुह पर पानी के छींटे मारे और उसे होश में लाया. मैंने देखा जहाँ पर संध्या चाची ने अपने मांस का भोग दिया था , जहाँ पर मेरा, रीना और मीता का रक्त बहा था वहां धरती दो हिस्सों में बंट गयी थी और एक गहरा गड्ढा हो गया था जिसके मुहाने पर सात पगड़ीधारी लाशें पड़ी थी .

“नाहर वीरो की लाशे ” मीता ने अपने मुह पर हाथ रखते हुए कहा .

मीता- हमें अभी के अभी निकलना चाहिए यहाँ से .

मीता ने मेरा हाथ थामा और अँधेरे में हम लौट पड़े. रस्ते में हमने देखा की वो ग्यारह पीपल एक के बाद एक धरती पर पड़े थे. जैसे किसी ने उखाड़ कर फेंक दिया हो.

मीता-अनर्थ , घोर अनर्थ.



बेकाबू धडकनों को लिए हम मेरी जमीन की दहलीज पर पहुंचे ही थे की एक और नजारा जैसे हमारा ही इंतज़ार कर रहा था . वो बावड़ी दो टुकडो में बंटी पड़ी थी . जैसे बीचोबीच किसी ने दो हिस्से कर दिए हो उसके. दूर दूर तक धरती गीली हो गयी थी पानी से , पर क्या वो सचमुच पानी था . .............................
 
#65



मीता- कही हमसे कुछ ऐसा अनिष्ट तो नहीं हो गया मनीष जो कदापि नहीं होना चाहिए था . ये विनाश जो हम देख रहे है किसी आने वाले तूफान की आहट तो नहीं .

मैं- कुछ समझ नहीं आ रहा मीता. ऐसा क्या था उस हांडी में जिसकी तपिश शिवाला भी नहीं झेल पाया.

मीता- हमें किसी ऐसे की जरुरत है जो इस घटना को समझ सके और आगे राह दिखा सके.

मैं- पर ऐसा कौन होगा. तू पूछ अपने सितारों से क्या बताते है वो

मीता- अंधेरो में जलता एक दिया दिख रहा है मुझे बस

हम दोनों अपने कमरे तक आ गए थे . सुबह होने में कुछ घंटे ही सेष थे मैंने चारपाई निकाली और बैठ गया. नींद आँखों से कोसो दूर थी.

मीता- क्या सोच रहा है

मैं- यही की कल कैसा होगा.

मीता- सुबह होते ही सबको शिवाले की घटना मालूम हो ही जाएगी.

मैं- उस से फर्क नहीं पड़ता , मुझे रीना से कल मिलना ही होगा.

मीता- पिछले दिनों से जो भी हालात रहे है , रीना को खतरा है . तुम्हे उसकी सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने होंगे.

मैं- क्या करूँ मैं, मेरे बस में कहाँ है ये सब , मैं आमने सामने की लड़ाई लड़ सकता हूँ , ये जादू टोना-तंत्र-मन्त्र मेरे बस की बात नहीं है. जानता हूँ शिवाले से रीना का कोई गहरा सम्बन्ध है तू ही बता क्या करू.

मीता- समय आ गया है की अब नरमी से काम नहीं चलेगा. अब चाहे जो हो आने वाले कल का सामना करने के लिए मजबूत होना पड़ेगा. दद्दा ठाकुर के खानदान ने पीढ़ी दर पीढ़ी शिवाले का संरक्षण किया है , क्या मालूम उस से कुछ ऐसा मालूम हो जाये जो अपने काम का हो.

मैं- सुबह होते ही पूरा रुद्रपुर जमा हो जायेगा , मैं दद्दा से मिलने गया तो कही और पंगा न हो जाये. वैसे ही मेरी खींची हुई है पृथ्वी से. थोड़े समय के लिए इस टकराव में उलझना नहीं चाहता मैं.

मीता- थोडा आराम कर ले. कल देखते है

मीता ने मुझे झप्पी डाली और अपनी बाँहों में कस लिया. थोड़ी देर के लिए अपनी सारी परेशानिया भूल गया मैं. सुबह जब मेरी आँख खुली तो मीता जमीन का जायजा ले रही थी , कल तक जो जमीन बंजर थी वो पानी से भरी हुई थी , पर क्या ये पानी था , नहीं ये लाल रंग पानी का तो नहीं हो सकता , ये खून था . इस जमीन की प्यास खून से बुझ रही थी पर किसके खून से.

मीता और मैं बस उस धरती को देखते रहे और जब इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला तो हम गाँव की तरफ चल पड़े. संध्या चाची से मिलना बेहद जरुरी हो गया था . हम गाँव जा तो रहे थे पर ये नहीं जानते थे की वहां पर एक और तूफान हमारा इंतज़ार कर रहा है वो तूफान जो मेरे आज और आने वाले कल को हिला कर रख देगा.

मोहल्ले में चीख-पुकार मची थी , चबूतरे पर आदमी बैठे थे , औरतो का रुदन कान फाड़ रहा था , मेरा दिल जोरो से धडकने लगा. मीता ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया.

मीता- क्या हुआ है यहाँ

मैं- मालूम नहीं .

भीड़ को हटा कर हम लोग आगे बढे तो जो देखा कलेजा मुह को आ गया . धरती पर रीना की माँ की लाश पड़ी थी , जिसे इस हद तक चीर दिया गया था की देख कर ही लगे की , कातिल को गहरी दुश्मनी थी जिसे उसने शिद्दत से निभाया था . ये एक ऐसी घटना हो गयी थी जिसे नहीं होना चाहिए था .

मैंने रीना को देखा जो लाश के पास ही बैठी थी उसका आंसुओ से भरा चेहरा मेरे कलेजे को चीर गया , दौड़ कर वो मेरे सीने से लग गयी . मैंने बाँहों में भर लिया उसे. पर बस एक पल के ही लिए अगले ही पल उसने मुझे धक्का दे दिया.

रीना- तू यही चाहता था न , कर ली तूने तेरे मन की. तू , तूने ही किया है न ये, मुझे पाने के लिए तू इतना अँधा हो गया की तूने मेरी माँ को ही मार दिया .

मैं- ये क्या कह रही है तू रीना, समझता हूँ इस घटना से तुझे सदमा लगा है पर तू मुझ पर ही आरोप लगा रही है .

रीना- हाँ, तुझ पर ही . सबको पता है , मेरी माँ जीते जी मुझे तेरी नहीं होने देती , कल तूने उसे धमकी भी तो दी थी . मैं समझाती उसे, मौका तो दिया होता तूने , ये क्या किया तूने मनीष क्या किया तूने .

मैं- तेरा दर्द समझता हूँ मैं मेरी जान. तुझे अगर ये लगता है की ये नीच हरकत मैंने की है , तू ने मान ही लिया है ऐसा तो फिर ठीक है तेरा हर आरोप, तेरा हर इल्जाम सर माथे पर. सजा भी मुकर्रर कर दे तू. पर तेरा दिल जानता है मेरा इसमें कोई हाथ नहीं .

रीना- दिल का ही तो सारा कसूर है , जो तुझे अपना मान बैठा . तू चला जा यहाँ से , मैं रोक नहीं पाउंगी खुद को , इस से पहले की मुझसे कुछ हो जाये तू चला जा यहाँ से .

रीना की आँखों का रंग बदलने लगा था .

मैं अपनी सफाई देकर करता भी तो क्या , यहाँ कौन था जो मेरी बात को मानता , कल जो गर्मागर्मी हुई थी उस से सबको ये ही लग रहा था की मैंने ही रीना की माँ का कतल किया है. कहने को तो मीता थी सबूत जो ये साबित कर सकती थी की पूरी रात मैं उसके साथ था पर जब रीना ने ही ये आरोप लगा दिया तो अब क्या रह गया था कहने सुनने को .

मीता- मनीष चल यहाँ से .....

तभी भीड़ में कानाफूसी होने लगी. लोग इधर उधर होने लगे. सबके हाथ जुड़ने लगे. मैंने देखा सामने से वो आदमी चले आ रहा था . सर पर लाल पगड़ी,सफ़ेद धोती-कुरता कानो में सोने की मुर्किया , पैरो ने लाल चमड़े की जुतिया. कंधे पर साफा रखे.

“हुकुम हुकुम ” की आवाजो से आसमान गूंजने लगा. जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहा था लोग उसके पैरो में झुक रहे थे , पर उसे इन लोगो से कोई सरोकार नहीं था . पर मेरी आँखों में जहाँ भर का पानी भर आया था वो सक्श कोई और नहीं मेरा बाप था , चौधरी अर्जुन सिंह.

“बाबा ” मैं दौड़ पड़ा , बस अपने बाप के सीने से लग जाना चाहता था मैं. हर दिन हर पल मैंने यही इन्तजार तो किया था की कब मेरा बाप लौट कर आये और मुझे अपने सीने से लगा ले.

पर ये कोई और अर्जुन था जिसे मैं नहीं जानता था, हाथ से के फटकारे से उसने मुझे परे किया और सीधा रीना की माँ की लाश के पास जाकर बैठ गया . उसने लाश को हाथ लगा कर देखा , वो कुछ नहीं बोला . रीना के सर पर हाथ रखा उसने, रीना अर्जुंन सिंह के सीने से लग कर रोने लगी.

“बस चुप हो जा मेरी बच्ची, तुझे कुछ कहने की जरुरत नहीं मैं आ गया हूँ ” बाबा ने बस इतना ही कहा.



रीना ने रोते हुए मेरी तरफ अपनी ऊँगली से इशारा किया..........
 
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किस्मत, हाँ ये निगोड़ी किस्मत ही तो थी जो मुझसे मजाक कर रही थी . जिस पल का मैंने बरसों इंतज़ार किया था की एक दिन आयेगा जब मेरा बाप मुझे अपने सीने से लगा लेगा. उस दिन मेरे सारे दुःख आंसू बन कर बह जायेंगे, किस्मत ने वो दिन तो मेरे सामने ला खड़ा दिया था पर सामने जो सक्श था वो मेरा बाप नहीं चौधरी अर्जुन सिंह खड़ा था , अपने उस गुरुर में तना हुआ जिसकी बाते मैंने गाँव वालो से सुनी थी .

“बेशक तू मेरा बेटा है , पर जो पाप तूने किया है उसकी सजा तुझे जरुर मिलेगी, एक बेटी को उसकी माँ से जुदा करके जो तूने अन्याय किया है उसकी सजा तुझे मेरे हाथो से ही मिलेगी ” बाबा ने मेरा गिरबान पकड़ लिया.

“मनीष को छोड़ दो बाबा, आपकी किसी भी सजा को न ये मानेगा और ना मैं इसे मानने दूंगी. न्याय की मूर्ति चौधरी साहब, आप इतना तो जानते ही है की आरोप को साबित करने के ठोस प्रमाण की आवशयकता होती है , और मनीष ने रीना की माँ को नहीं मारा इसका सबूत मैं हूँ ” मीता ने कहा

बाबा ने अपनी पकड़ मेरे कालर से ढीली कर दी और बोले- लड़की , सबूतों का होना कई बार जरुरी नहीं होता, जरुरी होता है उद्देश्य

मीता- चौधरी साहब मैंने बचपन से सुना है की न्याय का दूसरा नाम है चौधरी अर्जुन सिंह ,तो फिर ये अन्याय कैसे कर सकते है , मैं जल उठाने को तैयार हूँ मैं दावे से कहती हूँ की मनीष रीना की माँ का कातिल नहीं है कतल कल रात हुआ है , और कल रात मनीष इस गाँव में था ही नहीं ....

बाबा- तुम्हारे आलावा कोई और है जो ये गवाही दे सके

मीता- हैं ना हमारे पास गवाह , रुद्रपुर का टुटा शिवाला गवाह है मनीष की सच्चाई का, आपकी बंजर जमीन चीख चीख कर कहेगी आप से की कल रात मनीष और मैं रुद्रपुर के शिवाले में थे, उसके बाद आपकी बंजर जमीन पर थे.

“क्या कहा तूने बेटी ” बाबा की आवाज एकदम से कमजोर हो चली थी .

मीता- मैंने कहा की जब कल रात शिवाला टुटा तो मैं और मनीष वहीँ पर थे .

“शिवाला टूट गया ” बाबा बस इतना ही कह पाए और वहां से चलने लगे.

मैं- आप ऐसे नहीं जा सकते बाबा, थोड़ी देर पहले ही आपने कहा था की एक बेटी को माँ से जुदा करने की सजा आप मुझे जरुर देंगे, तो एक सवाल मेरा भी है मुझे आपसे जुदा करने के लिए आपकी क्या सजा होगी, सबको न्याय देने वाले चौधरी साहब से उनका बेटा अपना इंसाफ मांगता है , सोलह साल मैंने बिना बाप के जिए है , उन सोलह सालो का हिसाब चाहिए मुझे, आप ऐसे नहीं जा सकते, आपको मुझे न्याय देना ही होगा.

बाबा ने मुड कर मुझे देखा और बोले- काबिल औलादे सवाल नहीं करती, वो हाथ फैला कर नहीं मांगती, वो अपना हक़ छीन लेती है . इस पल मुझे कहीं जाना है पर मैं तुमसे मिलूँगा जरुर. जो तुम कर आये हो उसे समेटने में बड़ी मुश्किल आएगी.

बाबा मेरे पास आये , मेरे काँधे पर हाथ रखा और कुछ कदम हम साथ चलने लगे.

बाबा- एक बेटे ने बाप को उलाहना दिया है , देना भी चाहिए . ये सोलह साल सोलह जनम जैसे बीते है तुम्हारे लिए भी और मेरे लिए भी . हो सकता है तुम्हारा गुनेह्गर हूँ मैं, पर एक दिन तुम जान जाओगे , तुम समझ जाओगे.

बाबा ने मेरे सर पर हाथ रखा और बोले- किसी ज़माने में मैं भी ऐसा ही था. रुद्रपुर से दूर रहना .

एक तूफ़ान जिसे मीता ने टाल दिया था . पर कितनी देर के लिए . मैं रीना को समझाना चाहता था पर मीता मुझे वहां से ले आई. थोड़ी दूर पर ही संध्या चाची खड़ी थी अपने सीने पर हाथ रखे.

चाची- कुछ पलो के लिए मैं डर ही गयी थी की कहीं बाप बेटा आमने सामने न हो जाये.

मैं- क्या होता फिर. जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो मुझे क्यों डरना किसी से , वैसे भी टुटा हुआ शिवाला गवाह है , कोई भी जाकर देख सकता है उसे

चाची- कैसे हुआ ये अनर्थ

मीता- आपकी क्या दिलचस्पी है इतनी शिवाले में

चाची ने घुर कर मीता को देखा और बोली- तुम चुप रहो लड़की . तुम्हे बीच में बोलने का हक़ नहीं है

मीता- मुझे किस बात का हक़ है , किसका नहीं ये आप निर्धारित करने वाली कौन होती है .

चाची- इसकी दोस्त है इसलिए तू मेरे घर में है , वर्ना तुझे गली से न गुजरने दू.

मीता- मनीष की दोस्त हूँ तो हक़ तो अपने आप ही हो गया मेरा. रही बात गली, मोहल्ले , गाँवो की तो मैं आज तुमसे एक बात कहती हूँ , वक्त का पासा पलट रहा है , वर्तमान सवाल बन कर अतीत की खाल उधेड़ने को बेताब है . वो दिन दूर नहीं है जब मैं सवाल बन कर तुम्हारे सामने खड़ी रहूंगी और तुम्हारे पास कुछ नहीं होगा. मेरा कहा याद रखना .तुम हक़ की बात करती हो , वो जगह, वो अतीत वो सब कुछ तुम्हारा होगा , मेरा सिर्फ सवाल होगा. उस दिन हक़ की बात होगी.

संध्या- मनीष इसे चुप कर ले. मेरा दिमाग ख़राब कर रही है ये, जेठ जी लौट आये है ये बड़ी बात है . रीना की माँ के कातिल को तलाशने में रात दिन एक कर देंगे वो

मैं- ऐसा क्या है की मुझसे ज्यादा उन्हें रीना की फ़िक्र है .

चाची- काश मैं जानती,

मैं- समस्या तो यही है की तुम कुछ जानती ही नहीं , कितनी भोली हो तुम.

गाँव से थोडा बाहर आकर मैं और मीता एक पानी की टंकी पर बनी खेली पर बैठ गए.

मैं- मीता मैं अपना वादा जरुर पूरा करूँगा. तू देखना पृथ्वी को लात मार कर हवेली से बाहर निकाल दूंगा, फिर तू रहना आराम से वहां पर.

मीता- मुझे हवेली की कोई चाहत नहीं

मैं- पर मैं तुझे तेरा हक़ जरुर लौटा दूंगा.

मीता- वक्त आएगा तो देखेंगे. फिलहाल मेरी चिंताए दूसरी है .

मैं- तू कहे तो अभी के अभी रुद्रपुर जाकर हवेली से घसीट कर बाहर कर दू पृथ्वी को

मीता- रुद्रपुर तो जाना ही है पर किसी और काम के लिए . और मुझे लगता है की यही ठीक समय है किसी से मिलने का

मैं- किस से . .



मीता- अतीत के एक घटिया पन्ने को पलटने का समय आ गया है.
 
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