Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 78 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

फागुन के दिन चार भाग १५

दूबे भाभी

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Erotica - फागुन के दिन चार

फागुन के दिन चार ----भाग १५ दूबे भाभी1,85,204---- चंदा भाभी अन्दर गई और रीत और संध्या भाभी दोनों मुझे उकसाते, फुसफुसाते बोलीं," जाओ, जाओमैं दूबे भाभी की ओर बढ़ा।संध्या भाभी और रीत वहीं टेबल के पास खड़ी रही, मुश्कुराती हुई। खरगोश और शेर वाली कहानी हो रही थी। जैसे गाँव वालों ने...

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भाग ८७ - इन्सेस्ट कथा -इंटरवल और थोड़ा सा फ्लैश बैक

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भाग ८७ - इन्सेस्ट कथा -इंटरवल और थोड़ा सा फ्लैश बैक
 
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१८,०१,४०२





भाई बहन दोनों थक के बिस्तर पर पड़े थे सुध बुध खोये, और साथ में मैं भी,... बाहर चांदनी झर रही थी , आम के बौर की, महुए की मादक महक हवा के साथ आ रही थी।

रात आधी से ज्यादा गुजर गयी थी, मेरी ननद दो बार अपने सगे भाई की सेज चढ़ चुकी थी, और जिस तरह से चूतड़ उठा उठा के उसने मलाई घोटी थी अपने भैया की मुझे पक्का अंदाज था की वो अपने भैया से गाभिन हो गयी होगी।

भाई बहिन एक दूसरे से चिपके मस्ती में लेटे थे,

लेकिन लम्बी ड्राइव में गाड़ी की टंकी हरदम फुल रहनी चाहिए तो मैं भाई बहिन को एक दूसरे की बाँहों में छोड़कर, ... पेट्रोल पम्प मतलब किचेन की ओर,

खीर बहुत बची थी अभी,

लेकिन दूबे भाभी की जड़ी बूटी भी तो डालनी थी उसमे वीर्यवर्धक वाली, ... और तरीका जो उन्होंने बताया था की दुबारा इस्तेमाल करने के लिए खीर को पहले पांच मिनट हल्का गुनगुना गरम करना, धीमी आंच पर , फिर पांच फूल केसर, थोड़ी सी अश्व्गन्धा और दूबे भाभी वाली जड़ी बूटी जो औरत मर्द दोनों पर असर करती थी,

मर्द को दस सांड की ताकत देती थी, वीर्य की मात्रा और शुक्राणु की ताकत दोनों बढाती थी

और औरत को भी गर्म करती थी और सबसे बड़ी बात उसकी बच्चेदानी खोल देती थी।

पांच मिनट धीमी आंच के बाद ये सब डालने के बाद उसे दस मिनट तक ठंडा भी करना था जिससे असर अच्छी तरह भिन जाए।

उनके वीर्य की बात सोच के मुझे हंसी आ गयी, पिछले साल ही तो, जनवरी था शायद, दो दिन पहले खिचड़ी पड़ी थी.

कुछ दिन बाद ही मेरे इंटर का बोर्ड का इम्तहान शुरू होने वाला था।

मिश्राइन भौजी आयी थीं, हमारे स्कूल की वाइस प्रिंसिपल, ... और माँ की पक्की सहेली। मुझे कोई हिंदी की कविता समझा रही थीं। तभी माँ इनकी कुंडली लेकर आ गयीं, ये तो मुझे मालूम था की मेरी शादी की बात चल रही है, ... पर मेरी माँ और उनकी समधन दोनों कुंडली मानती थी इसलिए तय हुआ की पहले लड़के की कुंडली आएगी. मिलाई जाएगी उसके बाद लड़के वाले देखने आएंगे, फिर अगर बात जमी तो,...

माँ बीच में आ गयी और कुंडली लड़के की निकाल के मिश्राइन भाभी के हवाले कर दी। मिश्राइन भाभी ज्योतिषी खानदान की थीं और पत्रा पचांग बांचने के साथ कुंडली भी पढ़ लेती थीं , जनम पत्री मिला लेती थीं,

थोड़ा बहुत माँ भी समझ लेती थीं,...

बस कुंडली , जन्म पत्री आने के बाद, माँ के पीछे पीछे मेरी जन्म से मेरी दुश्मन,... दोनों, और कौन मेरी दोनों दुष्ट बहने,... हम भी सुनेगे, हम भी सुनेंगे जीजू के बारे में, अभी लड़की पसंद भी नहीं आयी थी और इन दोनों शैतानो के ये जीजू हो गए थे। तब से दोनों जीजू की चमची।

बिहारी एक ओर मिश्राइन भाभी ने धर दिया और कुंडली उठा ली। वो कुंडली पढ़ रही थीं, माँ और मेरी दोनों बहने उनका चेहरा पढ़ रही थीं। मैं जबरदस्ती उलटी किताब देख रही थी, लेकिन दिल धकधक कर रहा था, जैसे बोर्ड का रिजल्ट देख रही हूँ। कान मिश्राइन भाभी की ओर चिपका, क्या फैसला सुनाती हैं।

उनका चेहरा बहुत खुश लग रहा था, जैसे जैसे आगे बढ़ती जा रही थीं चेहरे की चमक बढ़ती जा रही थी, फिर अचानक तेजी से वो मुस्करायी, मेरी ओर मुड़ी और कस के मेरे गाल पे चिकोटी काट के बोलीं,

" ननद रानी , ठीक नौ महीने में लल्ला होगा,"

दोनों बहने और खुश, दोनों मौसी बन जायेगीं। कहा न मेरी जन्म की बैरन, मेरी परेशानी नहीं सोच रही थी खाली मौसी कहलाने की पड़ी थी।

माँ ने बिना कहे मिश्राइन भाभी से आँखों ही आँखो में पूछ लिया और मिश्राइन भाभी ने कुंडली आगे कर दी,

" देख रही हैं, शुक्र किस घर में है और अभी अगले पांच साल की दशा, दशांतर, शुक्र प्रबल ही नहीं महा प्रबल है। लिखा भी है वीर्यवान, प्रबल शुक्राणु,... एक बूँद भी अंदर गया तो गाभिन होने से कोई रोक नहीं सकता।

मैं जोर से उछली, नहीं इतनी जल्दी नहीं, मुझे अभी आगे पढ़ना है।

" तो पढ़ न कल ही तुझे तेरी डाक्टर भाभी के पास ले चलती हूँ , दवा दे देंगी वो , साल दो साल के बाद, देखना जब जैसा दामाद जी कहेंगे " माँ ने मुझे जोर से हड़काया और मिश्राइन भाभी से आगे का हाल पूछा, लेकिन मिश्राइन भाभी अब एकदम भाभी वाले मूड में आ गयी थीं, मुझे छेड़ते बोलीं

" बस यही लिखा है की रोज तेरी टाँगे उठी रहेंगी,... "

माँ मुस्कराते हुए बोली, " अरे वो तो,...सादी बियाह होता किसलिए है, लेकिन गुन कितने मिलते हैं "

" बहुत ज्यादा, बस यही एक बात है की मेरी ननद रगड़ी कस के जायेगी रोज दिन रात "मेरी दोनों बहने मुझे देख के खिलखिला रही थीं तो मिश्राइन भाभी ने अपनी तोप का रुख उनकी ओर मोड़ दिया,

" बहुत हिनहिना रही हो न दोनों , तुम दोनों की भी फाड़ेगा वो "

" हमारे जीजू जो उनकी मर्जी वो करें " दोनों होने वाली सालिया एक साथ बोली।

उसी समय मैं समझ गयी, अभी शादी तय भी नहीं हुयी,.. और मेरा पूरा परिवार दल बदल कर गया, मेरी बहने अपने जीजू की ओर और माँ, दामाद के पास। मैं बेचारी मायके में भी अकेली।
 
मेरी सास, ननद, जेठानी





और शादी क्या ऐसे तय होती है,

और शादी तो छोड़िये लड़की देखना भी ऐसे थोड़ी होता है जैसे इनके मायके वालों ने किया। न हम लोगों को नए परदे लगाने का मौका मिला, न आस पास से कुशन सेट टेबल क्लाथ मांग के लगाने का, न नया टी सेट खरीदने का।

दोनों मेरी दुश्मन जब से बात शुरू हुयी थी, चिढ़ाती रहती थीं,

" दीदी, ट्रे ले कर चलने की प्रैक्टिस शुरू कर दीजिये, खाली नहीं भरी केटली टी सेट, समोसे की प्लेट,... और आँखे नीचे कर के बात करियेगा। हँसियेगा एकदम मत,... "

दोनों आपस में मुझे दिखा के प्रैक्टिस करतीं। एक सास बनती, एकदम गुस्सैल नकचढ़ी, चल के दिखाओ, अखबार पढ़ो, खाने में क्या क्या बना लेती हो, भजन गाओ "

माँ ने कुंडली मिलने की खबर भिजवाई और अगले दिन वो लोग हाजिर,... बताया था की देर शाम तक लेकिन तिझरिये में ही, और मैं अभी पूरी तरह तैयार भी नहीं थी, दरवाजा भी मैंने ही खोला। न ट्रे में चाय ले जाने का मौका मिला,... समोसे वो लोग खुद ही ले के आये थे, हमारे बगल वाले झटकु की दूकान से।

मेरी सास, यही ननद और जेठानी,

माँ ने पूछ लिया दामद जी नहीं आये तो मेरी जेठानी ने पट्ट जवाब दिया, " वो क्या करेंगे, देवरानी मुझे ले जानी है की उसे "

लेकिन सबसे बड़ा धमाका किया मेरी सास ने ये बोल के " हम लड़की देखने नहीं आये हैं "

हम सब लोगो को सांप सूंघ गया, क्या हो गया ये, लेकिन मेरी यही ननद बोलीं,

" हम लोग भाभी को ले आने आये हैं, "

और सास ने जिस तरह से मीठे बोल से मुझसे कहा, बेटी इधर आओ, ..

मेरे कदम अपने आप उनके पास, बगल में उन्होंने बैठा लिया, ... और अपने गले की सतलड़ी निकाल के मेरे गले में डाल दी और माँ से कहा की उनकी सास ने उनकी मुंह दिखाई में दिया था। मैं सास ननद के बीच बैठी।

मेरी माँ के कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पड़ोस से मांग के आयी क्रोशिया की कढ़ाई, मैट वर्क अभी अंदर ही पड़े थे, जिसे दिखा के वो कहती मेरी बेटी ने काढ़ा है, दबी जबान से वो बोली और, शादी,...

मेरी ननद हमेशा से जुबान की तेज, मेरे ऊपर हाथ रख के,( जैसे लोग खाली सीट पे रुमाल रख देते हैं ) बोली,

" ये आप बड़े लोग तय करिये, मैं तो अपनी भाभी को ले जाने आयी हूँ। और जब भी शादी की तारीख तय हो जाए, रस्म वसम शुरू होने की बात तो मैं खुद भाभी को पहुंचा दूँगी, एक दम सील टाइट, चाक चौबंद, जैसे ले जारही हूँ उसी तरह। "

" और क्या, मेरा देवर मिठाई देख के ललचाता रहेगा, मिलेगी शादी के बाद, जब मैं कंगन खुलवा दूंगी। "

जेठानी कौन कम थीं, वो बोलीं।

माँ को अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा लेकिन सास ने जब लेन देन की बात की तो उनकी फूंक सरकी।

मेरी सास बोलीं, देखिये लेन देन भी तय कर लें,... मेरी माँ चुप,

सास ने ही आगे की बात बोल दी,... देखिये जो मुझे लेना था मैंने ले लिया, मेरी बेटी मुझे मिल गयी, अब उसके बदले में जो मुझे देना है, .... तो बरात में लड़के के चाचा, ताऊ, फूफा, मामा मौसा, जो जो आप को पंसद आये, बस रख लीजियेगा, आप कहेंगी तो गदहे, घोड़े, हाथी,... सब पूरी बरात, समधन के लिए तो सब कुछ हाजिर है,... हाथ गोड़ या जो कुछ दबवाना हो उसके लिए हमारा नाउ, आपकी कुइंया में पानी भरने के लिए कन्हार,... जो कहिये सब,... लेकिन अपनी बेटी तो मैंने ले ली,...

और मजाक के मामले तो मेरी माँ भी कम नहीं थी, फिर खाने के समय ये गारियां गयीं माँ ने अपनी समधन के लिए

लगन की बात थी तो मिश्राइन भाभी थीं ही लेकिन उन्हें मेरी बारहवें के बोर्ड की भी तारीख मालुम थीं तो बोलीं की इम्तहान के बाद तो फिर दिन ठीक नहीं है, फिर चैत लग जाएगा, ... जेठ में ही २१ जून के बाद लग्न है।

लेकिन मेरी सास के मीठे बोल,... उन्होने रास्ता भी निकाल दिया। गौने में तो इतना ज्यादा लगन का चक्कर नहीं है तो

और मेरे होम साइंस के प्रैक्टिकल के दो दिन पहले शादी,... फरवरी में और जिस दिन इम्तहान ख़तम हुआ उसके चौथे दिन गौना। होली के हफ्ते भर बाद। चार दिन में साल पूरा होगा।

खीर अब ठंडी हो गयी थी।

मुझे याद आया मिश्राइन भाभी की एक एक बात सही निकली यहाँ तक की इनके कमर पे नाभि से एक बित्ते नीचे बायीं ओर तिल भी उन्होंने बताया था।

मैं भी न खीर के चक्कर में एक बात बतानी भूल ही गयी। मिश्राइन भाभी, इनके उच्च शुक्र और शुक्राणु की बात तो बता के चली गयी, मुझे कुछ भी गुदगुदी भी लग रही थी, कुछ कहीं कहीं डर भी लग रहा था, और मिश्राइन भाभी के जाते ही मैं माँ से चिपक गयी, मेरी सबसे बड़ी, सबसे अच्छी सहेली वही थीं,

" माँ मुझे, " मेरी समझ में नहीं आ रहा था कैसे कहूं, बस मैं उनकी गोद में घुस के बैठ गयी और कस के दबोच लिया।

" ये मत कहना की तुझे शादी नहीं करनी, मैंने तो उन्हें हाँ भी कर दी, " माँ मुझे दुलराती बोलीं,

कैसे कहूं, नहीं समझ में आ रहा था, लेकिन मैंने माँ की परेशानी कम करते हुए, साफ़ कर दिया, " नहीं उसकी बात नहीं, वो आपने हाँ कर दिया तो ठीक है, शादी की नहीं, वो उसके बाद, "

अब माँ समझी, दुलार से मुझे चूमती बोलीं, " अरे अपनी मिश्राइन भौजी की बात से डर गयी तू " बड़ी देर तक वो खिलखिलाती रही फिर एकदम सीरियस हो के जैसे ससुराल जाती बेटी को माँ समझाती हैं, उसी तरह समझाते बोलीं

" देख मेरी बात एक सुन, गौने वाली रात, थोड़ा बहुत तो ठीक है, हर लड़की कुछ नखड़ा करती है, लेकिन ज्यादा नहीं। मरद को अगर कही पहले दिन मना कर दिया न तो जिंदगी भर के लिए खटास हो जाती है। और दर्द वर्द तो सब लड़की झेल लेती हूँ, किसी को कम, किसी को ज्यादा, और चीखे चिल्लायेगी भी उसमें भी कुछ बुराई नहीं है, लेकिन मेरे दामाद को इन्तजार मत कराना। बल्कि एक बात मेरी मान ले, लड़को को बड़ी जल्दीबाजी रहती है तो तो अपनी बुलबुल में थोड़ा सा कडुवा तेल पहले से डाल के जाना, दामाद मेरा तुझे छोड़ेगा तो है नहीं, छोड़ना चाहिए भी नहीं, इसलिए, हाँ और तेरी भौजाई, नाउन की नयकी बहुरिया, जब बुकवा करेगी न, लगन लगने पे तो वैसे भी मेरे कहने की जरूरत नहीं, वहां बिना तेल पानी किये छोड़ेगी नहीं। "

माँ भी मेरी न, शादी के पहले ही बेटी का पाला छोड़ के दामाद की ओर खिसक ली थीं।

लेकिन बात वो नहीं थी, इतना तो मुझे भी मालूम था। अब मैं झुँझला रही थी, कैसे समझाऊं माँ को , मिश्राइन भौजी ने इशारा भी दिया था लेकिन माँ के जिम्मे पचास काम वो भी भूल गयी थीं।

" माँ, वो नहीं, आप की बात ठीक है, मैं उसके बाद की बात कर रही हूँ " झुंझला के मैं बोली

अब माँ थोड़ा हंसी, थोड़ा सीरियस हुईं। फिर एक बार मुझे गोद में दुबकाया और बोलीं

" मेरी बिटिया सच में भोरी है, आज कल तो नौवें दसवे में पढ़ने वाली लड़कियां बस्ते में गोली लेलेकर टहलती हैं। लेकिन तू सही कह रही है तोर मिश्राइन भौजी भी कही थीं की किसी लेडी डाकटर को एक बार दिखा लें जैसा वो कहे, मैं ही भूल गयी थी। "
 
डाक्टर मीता,





और फिर लेडी डाक्टर की खोज शुरू हुयी।

लेडी डाक्टरों की कोई कमी नहीं थी शहर में, लेकिन मेरे स्कूल के रस्ते में एक डाकटर का क्लिनिक और नर्सिंग होम पड़ता था, एकदम सफ़ेद बाहर से चमकता रहता था। खूब बड़ा, ऐसी भीड़ की मेला झूठ, और एक से एक बड़ी बड़ी गाड़ियां, चमचमाती, नाम भी मैंने देख लिया था, लेकिन एक सहेली की भाभी से पूछा, तो उन्होंने बोला

" वो अच्छी तो बहुत हैं लेकिन अप्वाइंटमेंट मिलना बहुत टेढ़ा है, पंद्रह बीस दिन का तो वेटिंग है और उसके बाद भी, अरे तुझे तो गोली ही चाहिए न मैं बता देती हूँ,"

फिर खिलखिलाते हुए चिढ़ाया,

" देख तेरी सहेली हाईस्कूल में आयी थी तब से मैं दे रही हूँ, पूछ ले उससे, अबतक न जाने कितनो के आगे टांगे फैला चुकी है लेकिन गनीमत है एक दिन भी उलटी हुयी हो, पेट फूलने का तो सवाल ही नहीं "

लेकिन एक दिन मैं माँ से बात किया, उन्होंने भी दो तीन सहेलियों से बात किया था, सब उन्हें अच्छा तो बताती थीं जिसका नाम मैं लेती थी लेकिन बस यही की टाइम नहीं देतीं और बहुत महंगी है। लेकिन थोड़ी देर बाद मिश्राइन भौजी आ गयी और उन्होंने समस्या सुलझा दी, वो बोलीं,

" अरे वो डाक्टर मीता, काहे नहीं मिलेगा ऍप्वाइंटमंट ? अरे आप लोगो को मालूम नहीं, रितवा की बड़ी बहन हैं, किसी बड़े शहर में किसी बहुत बड़े हस्पताल में थी, लेकिन अपना नर्सिंग होम खोलना चाहती थी और रितवा भी यही थी तो आ गयी यहाँ। "

रितवा मतलब मेरी रीतू भौजी। नाम उनका रीता था, लेकिन जेठानियाँ और सास, रीता कभी नहीं कहते, रीता का रितवा हो गया था।

और किसी उनकी छोटी ननद ने भैया को उन्हें, भौजी को, प्यार से दुलराते, रीतू कहते सुन लिया था तो हम सब नंदों की रीतू भौजी हो गयी थी।

तो मिश्राइन भौजी ने फोन लगाया, स्पीकर फोन ऑन था, और रीतू भौजी ने पहले तो मुझे दस गालियां सुनाई फिर कहा अभी बताती हूँ।

और अगले दिन नौ बजे का टाइम मिला सुबह का। ये हिदायत भी काउंटर पे सिर्फ ये बताना है की मैं डाक्टर साहिबा की नन्द हूँ।

मैं और माँ नौ बजे उनकी क्लिनिक पे, सुबह सुबह ही इतनी चहल पहल भीड़ भाड़, लेकिन सब कुछ इतना साफ़, सफ़ेद, एकदम चमक रहा था, फर्श ऐसा की अपना मुंह देख लो। और रिसेप्शन में माँ के कुछ बोलने के पहले ही जैसे मैंने बोला " डाक्टर साहेब की ननद " बस जैसे किसी ने बिजली का बटन दबा दिया हो। पीछे से उस काउंटर की हेड एकदम उछल कर आगे, और मेरी ओर देखते बोली,

" आइये मैं ले चलती हूँ, डाक्टर साहेब ने आधा घंटे का स्लॉट आपके लिए पहले से ही खाली कर के रखा था, सीधे मैं उनके चैंबर में ले चलती हूँ।

डाक्टर मीता, जगह जगह दिख रही थीं, कहीं उनकी गवर्नर से इनाम लेती फोटो तो कहीं वीडियो, डाक्टर वाली ड्रेस में सफ़ेद कोट, गले में आला , बहुत स्मार्ट लग रही थीं और उतनी ही खूबसूरत।

और चैंबर में घुसते ही वो खड़ी, माँ से तो उन्होंने दोनों हाथ जोड़ के नमस्ते किया और मुझसे हाथ मिलाया। माँ ने कुछ बोलने की कोशिश की तो डाकटर ने उन्हें चुप करा दिया, और बोलीं रीतू ने मुझे सब बता दिया है, बस ये बताइये शादी कब है।

"बस डेढ़ महीने, बल्कि उससे भी कम, " माँ ने अपनी परेशानी बतायी,

और अब वह मुझसे मुखातिब हुईं,

" और पिया मिलन को कब जाना है, गुदगुदी हो रही है न, चींटियां काट रही हैं न चुनमुनिया में, रीतू ने बताया था की तेरा इंटर का इम्तहान है इसलिए बिदाई बाद में होगी, अरे इंटरकोर्स ज्यादा जरूरी है की इंटर, बोर्ड का इम्तहान कौन कुम्भ का मेला है, अगले साल दे देती,"

और वहीँ बैठे बैठे उन्होंने बटन दबाया, बोला की उनकी छोटी ननद आयी है उसका ब्लड लेना है और अल्ट्रा साउंड, और ब्लड लेने वाले को यहीं भेज दें, बाद में फिजिकल।

एक सफ़ेद कपड़े वाली सिस्टर आ के ब्लड ले गयी और मुझे भी, बाहर एक अल्ट्रा साउंड वाला कमरा था वहां छोड़ दिया,

डाक्टर साहेब को कमरे में ही स्क्रीन पे दिख रहा था। जब मैं लौट के आयी तो माँ और वो ऐसे गपिया रही थीं की न जाने कब की सहेली हों। उन्होंने अपने कम्प्यूटर का स्क्रीन हम लोगो की ओर घुमा के मेरी अल्ट्रा साउंड की फिल्म माँ को दिखाते और मुझे सुनाते बोलीं

" आपने एकदम सही किया जो इसे ले आयीं, ये देखिये मेरे ननद की बच्चेदानी, एकदम परफेक्ट, पूरी तरह तैयार है। बस पहली रात को मेरे नन्दोई पानी पिलायेंगे, और नौ महीने में आप नानी। ये बिना गाभिन हुए बच नहीं सकती। "

कुछ बात तो है जो मेरी भाभियाँ हैं या तो हड़काती हैं या गरियाती हैं और यहाँ भी यही हुआ, जैसे मैंने सुना गाभिन, और वही तो मैं इतनी जल्दी नहीं चाहती थी मैं बोल पड़ी,

" डाक्टर साहेब " और जोर की पड़ी, अबतक याद है। वो बोलीं जोर से और थोड़े गुस्से से,

" यहाँ डाक्टर कौन है, मुझे तो नहीं दिखता, " फिर जोड़ा,

" भाभी नहीं बोल सकती, बल्कि, भौजी " और खूब प्यार से मीठी मीठी मुस्करायीं जैसे भौजाइयां ननदों का नाम ले ले के उनके भाइयों से जोड़ के गारी गाते समय सब भौजाइयां मुस्कराती हैं, फिर दुलार से मुझसे बोलीं, गरियाते,

" अरे छिनार, घोंटना गपागप, काहे के लिए तुझे अपने नन्दोई के पास भेज रही हूँ , दिन दहाड़े, रात भर, बिना किसी डर के। और ननदोई को भी मैं कोहबर में बता दूंगी, कोई रबड़ वबड़, की जरूरत नहीं है, जब तक ननद की चमड़ी से चमड़ी न रगड़े, ऐसा रगड़ें की छिल जाए, तब तक मेरी ननद को मजा नहीं आएगा। बिना किसी डर के, ठोंके दिन रात,मैंने इलाज कर दिया है एडवांस में , न पेट फूलेगा, न उल्टी आएगी न खट्टा मांगेगी, बस गपागप घोंटेंगी। "

तब तक उनकी कोई ख़ास नर्स आ कर खड़ी हो गयी थी मुझे फिजिकल एक्जाम के लिए।

बाद में पता चला की डाक्टर मीता, जब तक कोई बहुत काम्पलेक्टेड केस नहीं हो खुद चेक वेक नहीं करती थी उनकी यही हेड नर्स जो डाक्टर मीता की ख़ास थी, और बड़ी एक्सपीरियंस्ड, हाँ वहां लगे कैमरे से एक एक पिक्चर उनके कंप्यूटर पे आती थी और वो बाहर से हेड नर्स को इंस्ट्रक्शन देती थीं, लेकिन आज डाक्टर मीता मेरा मतलब डाक्टर भौजी खुद खड़ी हो गयीं और उस हेड नर्स से बोलीं,

“चलो मैं भी चलती हूँ, ऐसी मस्त ननद की चुनमुनिया देखने का मौका थोड़ी छोड़ दूंगी। “

एग्जाम का कमरा एकदम सटा था, रस्ते में डाक्टर भौजी ने मेरे गाल पे चिकोटी काट के बोला, " मेरी बहन रितवा स्साली बड़ी कमीनी है, कभी नहीं बताया उनसे की इत्ता मस्त माल छिपा रखा है '

नर्स ने मुझे गाउन दिया लेकिन डाक्टर ने मना कर दिया,

" अरे छोडो, मेरी ननद बहादुर है। किससे शर्माएगी, महीने भर में शादी हो जाएगी तो मर्द के पाजामा का नाडा खुलने के पहले अपने साया का नाडा खोल के,सरका के तैयार हो जायेगी। "

और मुझसे बोला, " हे छुटकी, ये बात सीख ले, कपडे उतरने के पहले शर्म उतर जानी चाहिए और जिंदगी का असली मजा तभी आएगा "
 
डाक्टर भौजी और हल्दी की रस्म

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मुझे दोनों ने मिल के एक टेबल पे लिटा दिया, और मेरे पैर उठा के एक कोई फंसने वाली चीज थी, दोनों पैर फैला के उसमे उठा के फंसा दिया और टेबल के ऊपर की बत्ती जला दी,

डाक्टर मीता जैसे किसी माइक में बोल रही थीं, पेल्विक एक्जामिनेशन ऑफ़ कोमल, एज,...

और फिर जो जो चेक कर रही थीं वो बोलती जा रही थी। बीच बीच में छेड़ भी रही थीं, दोनों गुलाबी फांको को उन्होंने फ़ैलाने की कोशिश की, लेकिन मेरी फुद्दी के दरवाजे एकदम चिपके, बंद, वो बोली

" अरे ननद रानी स्साली तेरी तो बहुत टाइट है, लगता है कभी ऊँगली भी नहीं की तूने ठीक से ऊपर से रगड़ के काम चला लेती थी, नन्दोई को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी , लेकिन स्साला मेरी इत्ती प्यारी ननद को ले जा रहा है, करना है तो करे। "

फिर एक बहुत पतली सी ट्यूब, सींक से भी पतली, उसके ऊपर कोई जेल, नर्स से वो बोली, ढेर सारा लॉक्स लगाना, बहुत टाइट है, और फिर कंप्यूटर की स्क्रीन पे मुझे दिखाया,

" देख ये तेरी झिल्ली है, एकदम लाल, थोड़ी मोटी लग रही है, इसलिए पहली बार दर्द ज्यादा होगा, लेकिन सह लेना, और अगर कहेगी तो दर्द की दवा दे दूंगी, सेज पर जाने के पहले ले लेना "

" नहीं नहीं दवा की जरूरत नहीं है "

मेरे मुंह से निकल गया और वो और हेड नर्स दोनों हंसने लगी और डाक्टर भौजी बोलीं,

" देख कैसे चुदवासी हो रही है, वैसे बात तू सही कह रही है ननद रानी, उस दर्द का ही तो मजा है, जिंदगी भर गौने की रात याद रहती है "

फिर उन्होंने कुछ डिवाइस लगाई, मेरे निप्स के छुआ अपनी ऊँगली से और निप्स खड़े होने लगे, और रिकार्ड कर रही थीं

" हाइली सेंसिटिव, नर्व एंडिंग ऑन कम्प्लीट वैजिनल कैनाल, क्लिट वैरी सेंसिटिव "

फिर जब उन्होंने मेरे पिछवाड़े की दरार पर ऊँगली जैसे उन्होंने लगाई, मैं उछल पड़ी

" नहीं भौजी उधर नहीं "" तो क्या सोचती है, वो तेरी गांड नहीं मारेगा" हेड नर्स हँसते हुए बोली।

" और वो नहीं मारेगा तो हम दोनों मिल के उसकी और तेरी दोनों की मार लेंगे, ऐसे मस्त चूतड़ और मारी न जाए, संख्त नाइंसाफी है " हसंते हुए डाक्टर भौजी बोलीं, और मैं समझ गयी ये हेड नर्स, न सिर्फ उनकी मुहलगी है बल्कि पक्की सहेली की तरह है।

चेक के बाद जब मैं और डाक्टर भौजी बाहर आये तो डाक्टर भौजी ने माँ से पूछा, शादी की तारीफ़ पूछी और माँ ने शादी क्या शादी, तिलक सब बता दी, ये भी की अगले महीने है। और अब डाक्टर भौजी सीधे मुझ से,

" तेरा महीना, कब आएगा, अगला "

" चार दिन बाद, एकदम कैलेण्डर देखकर आंटी जी आती हैं, हर २५ दिन बाद, "

हँसते हुए जैसे कोई सहेली से बात करता है बस उसी तरह मैं बोली, लेकिन डाक्टर भौजी की आँख कलेण्डर पे चिपकी थी, फिर उन्होंने दो बातें बोलीं, एक मम्मी से, एक मुझसे।

मम्मी से उन्होंने कहा,

" अच्छा है शादी के १० दिन पहले खून खच्चर बंद हो जाएगा " और मुझे हुकुम दिया, जिस दिन महीना शुरू हो उसी दिन आ जाना, मैं गोली दे दूंगी, तीन चार महीने के लिए। "

" लेकिन शादी से का मतलब,. इसका, …बिदाई तो गौने के बाद ही,… इसका बोर्ड का इम्तहान खत्म होने के बाद "

माँ बोलीं और भौजी हँसते हुए बोलीं

“अरे मैं अपने लिए पूछ रही थी, हल्दी चुमावन सब रस्म होगी न, तो भौजाई हूँ तो जब हल्दी लगाउंगी, बिना ननद की चुनमुनिया में अच्छी तरह हल्दी पोते कहीं भौजाई की हल्दी की रस्म होती है। “

माँ को लग रहा था की डाकटर भौजी ऐसे ही, …जो इतनी बिजी हैं, सुबह से लेकर रात तक, दस दिन का अप्वाइंटमेंट मिलता है वो कहाँ गाँव वाली रस्म में

लेकिन डाक्टर भौजी आयीं न सिर्फ हल्दी और चुमावन में बल्कि माटी कोड़ने और बाकी रस्म में और रात में गाने में भी कई दिन सीधे क्लिनिक से,

हल्दी की रसम में भी मैं एक पियरी सिर्फ पहन के, कस के पकड़ के बैठी थी, पीछे नाउन की नयी नयी बहुरिया, मुझे पकड़ के, और सब भौजाई कोशिश तो कर ही रही थीं की हाथ पैर और गाल पे हल्दी लगाने क बाद साडी के अंदर हाथ डालने की, लेकिन मैं खूब कस के दबोच के बैठी थी, लेकिन डाक्टर भौजी तो,

गाल पर हल्दी लगाते हुए, मुझसे बोलीं, वो देख ऊपर कौन सी चिड़िया बैठी है, और जैसे ही मेरी नजर ऊपर, उनके हाथ साड़ी के अंदर दोनों जोबन पे और पूरी आधी कटोरी दोनों उभारों पर मलती बोलीं,

" छिनार, ननदोई से तो खूब हंस हंस के मिजवायेगी और हम भौजाइयों से छिपा रही है, यहाँ तो हल्दी लगाना सबसे जरूरी है।"

और क्या रगड़ा मसला पूरी ताकत से।

फिर पीछे बैठी नाउन को भी उन्होंने पता नहीं कैसे पटा लिया, और वैसे भी हमारी नाउन की बहू तो लगती तो भौजी ही थी, बस पैरों में हल्दी लगाते हुए, मैं कस के दोनों पैर चिपका के बैठी थी, मुझे मालूम था, लेकिन घुटने तक तो, पियरी उठा के, …तो डाक्टर भौजी भी घुटने तक, लेकिन फिर उन्होंने जोर से मुझे चिकोटी काटी, और साथ में पीछे से मुझे पकडे नाउन भौजी को इशारा किया।

चिकोटी काटते ही मेरे पैर खुल गए और पीछे से नाउन की बहुरिया ने वो कस के गुदगुदी लगाई, बस भौजी को मौका मिला गया और उनका हाथ सीधे मेरे खजाने पे दोनों जाँघों के बीच और हथेली से रगड़ रगड़ के, दोनों ऊँगली से फांको को दबा के, एक कटोरा हल्दी तो वही,

मेरी बहने और सहेलियां एक से एक अच्छी वाली गारियां डाक्टर भौजी को सुना रही थीं,

लेकिन उन्हें कोई असर नहीं पड़ रहा था, उसके बाद हालंकि रात में गाने में उन्होंने मेरी बहनों की भी खूब खबर ली।

जैसा उन्होंने कहा था मेरा महीना जब शुरू हुआ तो पहले दिन ही मैं उनके पास गयी और उन्होंने गोली तो दो ही, सब कुछ एकदम साफ़ साफ़ समझाया और ढेर सारी टॉनिक की विटामिन की गोलियां, भी दी। पक्की दोस्ती हो गयी थी,

एक दिन गलती से मेरे मुंह से निकल गया, डाक्टर भौजी और वो उदास हो गयीं,

फिर बोलीं, " यार, डाक्टर और मैडम कहने वाले तो इस शहर में हजारों हैं लेकिन भौजी कहने वाली तो इस शहर में, बल्कि मेरी जिंदगी में तू अकेली। "

उसके बाद मैंने उन्हें भौजी के अलावा कुछ नहीं कहा और हम लोग ननद भौजाई के साथ पक्की सहेली भी थे, जो बात वो किसी से नहीं कह पाती , वो मुझसे कहती थी और मैं भी,

और गौने के अगले दिन सुबह सबसे पहले उन्ही का मेसज आया

" कितनी बार चुदी ? "

और सिर्फ मुझसे नहीं, इनसे भी, अपने नन्दोई से, कोहबर में ही साफ़ साफ़ बोल दिया था, " नन्दोई जी, मेरी ननद गोली खाती है तो आपका दुहरा फायदा, एक तो रबड़ का खर्चा बचा और दूसरे चमड़ी से चमड़ी रगड़ने का मजा"

तो गौने की रात इन्हे भी मालूम था की किसी सावधानी की जरूरत नहीं है। मैंने इनसे तो नहीं बोला था लेकिन खुद सोच रखा था बच्चे कम से कम तीन साल तक नहीं, गौने की रात वाले दिन तक तो मेरे इंटर का रिजल्ट नहीं आया था, इम्तहान ख़तम हुए दो दिन हुए थे बोर्ड के, लेकिन मैंने तय कर लिया था बी ए तो करुँगी ही, भले ही प्राइवेट। इसलिए कम से कम तीन साल,

और मुझे सास भी ऐसी ही मिल गयीं,

जहाँ तक बच्चे वाला मामला था सुहाग रात के अगले दिन ही मेरी सास ने फैसला सुना दिया,... इसका फैसला न मेरी सास करेंगी न इनकी सास। सिर्फ मेरी सास की छोटी बहू यानी मैं करुँगी। और अगले दिन वो खुद आशा बहू के यहाँ ले जाकर तांबे वाला ताला लगवा लायीं।
 
भैया और बहिनी - खेल चालू





तो उनकी शुक्राणु के ताकत की बात आज देखनी थी मिश्राइन भाभी की बात मुझे मालूम था ये भी सही होगी।

भैया बहिनी चिपक के लेटे थे, थोड़ा बहुत चुम्मा चाटी भी,... और मेरी ननद मेरे साजन को छेड़ रही थी, कान पकड़ के पान बना रही थीं.

“मुझे मालूम ही तू रोज बिना नागा मेरी ब्रा में मलाई छोड़ता था है न,... “

थोड़ा सा झेंपते हुए, वो बोले, " तुझे पता था तो टोका क्यों नहीं "

" क्यों टोकती, मेरे मीठे भइया की मीठी मलाई,... मैं तो वैसे ही गीली गीली पहन के कालेज जाती थी " हँसते हुए उनकी बहन ने अपना राज भी खोला।

तबतक मैं भी पहुँच गयी थी, मैंने ननद से पूछा,

" मलाई का मजा सिर्फ आपकी ब्रा को ये देते थे की अपनी महतारी की ब्रा को भी " हँसते हुए खीर का कटोरा टेबल पर रखते हुए मैंने पूछा।

" उनकी ब्रा में भी, लेकिन गलती भौजी आपकी थी, आप आयी देर से वरना मेरा भाई सही जगह में मलाई डालता "

टिपिकल ननद, जो भौजाई की टांग खींचने का कोई मौका न छोड़े।

" अरे गलती न आपकी न आपके भैया से ज्यादा भतार मेरे मरद की, आपके ये दूध के कटोरे ऐसे रसीले हैं, ... "

और मैंने खीर ननद के गदराये जोबन पर ही लपेट दिया और अपने सैंया का मुंह खींच के उनके ऊपर,... और हँसते हुए उनसे बोली,

" अभी ऊपर ऊपर से खा लो, ठीक नौ महीने बाद जब हमार ननद बियायेंगी तो दूध एही चूँची से पीना। एक चूँची से इनकी बिटिया और दूसरे से इनके भैया। और नहीं होगा निचोड़ निचोड़ के निकाल के दोगे तो एक कटोरी ओहि दूध की खीर भी बना देंगे। "

" अरे भौजी तोहरे मुंह में घी गुड़, एकदम पियाऊंगी तोहरे मर्द को दूध अगर ये तोहरे रंडी महतारी क दामद हमको गाभिन कर दिया तो " बोली ननद।

बिना गारी क ननद क बोली मीठी भी नहीं लगती।

मैंने दूसरी चूँची पर भी खीर पोत दी।

ननद ने ढेर सारी खीर अपने मुंह में लेकर थोड़ी देर चुभलाने के बाद सब की सब अपने भैया के मुंह में।

कुछ देर में ही कटोरा खाली हो गया और खूंटा भी खड़ा होने लगा, लेकिन आज हम ननद भौजाई बदमाशी पर आमादा थे।

कौन लौंडिया होगी जिसके मुंह में बित्ते भर का लंड देख कर पानी न आये,

और ये तो सगी बहिनिया, बचपन से ललचा रही थी, भैया कब खूंटा अंदर गाड़ें। लेकिन दो बार सगे भाई से चुदने के बाद अब मेरी ननद को भी कई जल्दी बाजी नहीं थी. बुर में भाई का बीज बजबजा रहा था, बच्चेदानी भरी हुयी थी. और बदमाशी भी उनकी बहिनिया ने ही शुरू की,

" भौजी तोहार छिनार बहिनियन क जीजा, बहुत लिबरा रहे हैं, इनका हाथ गोड़ न छान दें, "

" एकदम जो आपन बहिन महतारी क तडपावे उसके साथ यही होना चाहिए "

उन्हें तंग करने के हर प्रस्ताव पर मेरी सहमति थी चाहे वो मेरी छिनार ननद की ओर से क्यों न आएं। और जब तक वो समझें उनके हाथ पैर चारों पलंग के चारों पाए से बंधे, और गाँठ मैंने कस के लगायी, प्रेजिडेंट गाइड थी स्कूल में। तड़पें।

तड़पाने वाली बहन भी बीबी भी, जबरदस्त थ्रीसम।

शुरुआत मैंने ही . हाथ पैर बांधते ही, खूंटा खड़ा होने लगा, बस बची हुयी खीर मैंने कटोरे से बूँद बूँद उसपे चुआ और उनकी बहन को इशारा भर कर दिया,

बस पहले तो वो जीभ से अपने सगे भाई का लंड, .. सिर्फ जीभ की टिप से बस छू छू के जैसे सिर्फ खीर में उसकी दिलचस्पी हो, ... फिर चार चाट के,... बहन की जीभ हो भाई का खूंटा,... कैसे न खड़ा हो,.. एकदम कुतबमीनार, ...

और गप्प से ननद ने मुंह में भर लिया और बस कभी चुभलाती कभी चूसती। कभी अपने दीये जैसे बड़ी बड़ी आँखों से उन्हें देखती, जैसे पूछ रही हो,

" आ रहा है न मजा भैया "

हाथ पैर ही तो बंधे थे, कमर तो फ्री थे, क्या हचक के धक्का मारा मेरे मर्द ने मेरी आँख के सामने अपनी बहन के मुंह में,

गप्पांक, आधे से ज्यादा बांस ननद के मुंह में। ननद का मुंह फूल गया, मोटे सुपाडे से. गाल फटा जा रहा था, आँखे उबली पड़ रही थीं लेकिन वो कस कस के चूस रही थीं।

पर ये तो साझा खेल था, मैं भी आ गयी मैदान में,

गन्ना मेरी ननद के हिस्से में तो दोनों रसगुल्ले मेरे मुंह में। एक साथ बहन और बीबी दोनों चूसे, एक साथ मोटा मूसल और बॉल्स दोनों चूसी जाएँ , क्या हाल होगी किसी मरद की। वही हाल मेरे मरद की हो रही थी, एकदम बेताब।

फिर ननद भाभी ने लंड बाँट लिया,... दायीं और से ननद चाट रही थीं, वामा मैं, बायीं ओर से मैं. पर कुछ देर में खूंटा मेरे हिस्से में गया पूरा और रसगुल्ले दोनों ननद के हिस्से में।

मुझे एक बदमाशी सूझी,

मैंने जो तकिये कुशन ननद के चूतड़ के नीचे लगाए थे, इनके नीचे लगाए थे और ननद का मुंह दबा के सीधे इनके पिछवाड़े।

मान गयी मैं इनकी बहिनिया को, सपड़ सपड़ उनका पिछवाड़ा चूस चाट रही थी, मैंने सर पर से हाथ हटा लिया था तब भी उसका चूसना जारी थी,

और मैंने अब अपने साजन का फड़फड़ाता तड़पता लंड अपने मुंह में ले लिया, इनकी बहन की तरह आधा तीहा नहीं, पूरा,... सीधे हलक तक।

" ओह्ह नहीं उफ़ छोड़ दो मुझे, एक बार ओह्ह "

वो चीख रहे थे, चिल्ला रहे थे और उनके मुंह को बंद करने का ढक्क्न था मेरे पास, बस अपनी रसमलाई रख दी उनके मुंह पे जैसे बच्चे जब बहुत रोते हैं तो माँ निपल उनके मुंह में ठूंस देती है।

मुंह तो उनका बंद हो होगया, लेकिन उनके दुष्ट होंठ और जीभ जिस तरह से मेरी फड़फड़ाती चुनमुनिया को पागल कर रहे थे मैं ही जानती थी, लेकिन मेरी मुट्ठी में, मेरा मतलब मेरे मुंह में उनका मोटू था, और मेरे होंठ और जीभ कौन शरीफ थे. जिस तरह से मैं चूस रही थी, चाट रही थी, मेरी उँगलियाँ मुंह से बाहर खूंटे को रगड़ रही थीं, सहला रही थीं, और वो तड़प रहे थे धक्के लगा रहे थे।

उनकी हालत मुझसे भी खराब थी क्योंकि उनके पिछवाड़े के गोल दरवाजे पर उनकी सगी बहिनिया चुम्मी ले रही थी, उसकी सांकल खटखटा रही थी, कभी जीभ से बंद दरवाजे को खोलने की भी कोशिश करती। रीमिंग भी, ब्लो जॉब भी।
 
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