Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 95 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

अगले दो महीने के लिए यह कहानी पॉज मोड पर रहेगी, कारण कई हैं,

पहली बात तो कहानी की प्रतियोगिता के कारण अनेक मित्र पाठक वहीँ, लिखने पोस्ट करने में व्यस्त हैं और हर व्यक्ति एक सिमित समय ही इस फोरम पर दे सकता है,

और अगर कमेंट करने वालों की संख्या मैं देखूं तो उनमे थोड़ी कमी, लोगो की अपनी व्यस्तता के कारण भी आयी है, फिर अपने मित्रो से अपेक्षा करना की नियमित रूप से तीन तीन कहानियों को पढ़ें, उन्हें लाइक करें, कमेंट करें, कुछ शायद ज्यादा ही है।

दूसरी बात जब मैंने यह कहानी शुरू की थी तब ही मैंने सोचा था की अधिक से अधिक १०० भाग होंगे और अगर २० लाख व्यूज मिल गए तो बड़ी बात होगी, क्योंकि मोहे रंग दे ऐसी कहानी भी उस समय १५ लाख तक नहीं पहुंची थी , और अब इसके व्यूज भी २४ लाख हो गए हैं और पोस्ट भी १०० होगयी है तो विराम के लिए इससे अच्छा स्थल नहीं हो सकता।

हाँ कहानी के अंत में मैं द एन्ड अभी नहीं लिख रही हूँ, यह सिर्फ विराम है।

और आगे निर्भर करेगा, मित्र पाठको की उपलब्धता पर, उनके आग्रह पर और मेरे पास भी समय की उपलब्धता पर

हाँ बाकी दोनों कहानियां जारी रहेंगी, कोशिश होगी की जोरू का गुलाम और फागुन के दिन चार पर दो -तीन अपडेट हर महीने देती रहूं यानी महीने में ४-६ अपडेट। वो दोनों कहानियां भी अब एक नयी दिशा में मुड़ चुकी हैं , एक्शन और थ्रिलर की ओर जहाँ लिखने के ;िये पढ़ने की और समझ कर अधिक प्रयास करने की जरूरत पड़ती है , समय भी अधिक लगता है।

हाँ इस सूत्र पर भी मैं आती रहूंगी, बतकही भी होगी, कमेंट्स के जवाब भी दूंगी लेकिन फोरम पर मेरी उपलब्धता थोड़ी कम रहेगी।

अभी भी आपके कमेंट्स के लिए इन्तजार में
 
जब यह कहानी मार्च में रुकी १०० वे भाग के बाद तो उस समय ही मैंने कहा था ये पॉज है, एक अल्पविराम, सौ सीढ़ी चढ़ने के बाद सुस्ताने जैसा

और अब जब फिर यह कहानी कुछ नए मोड़ों के साथ शुरू हो रही है तो मैं यह स्वीकार करना चाहूंगी की १०० वे भाग को ख़ास तौर से कुमुद की वेदना को लिखने के बाद मैं कुछ लिखने की हालत में थी भी नहीं

करुणा मेरे लिए कहानी का एक अंग है, एक आवश्यक अंग और कसौटी, कई बार ऐसे दुःख आते है जब लगता है सांप अपनी गुंजलिका में बाँध कर, कस कस हड्डी हड्डी कड़कड़ा कर तोड़ देता है, लेकिन जिंदगी जब तक जिन्दा हैं तब तक तो चलेगी न,

तो उस पॉज के बाद अब फिर ये कहानी शुरू हो रही है, और इसमें आप सब के प्यार का मनुहार का भी योगदान है, बहुत योगदान है तो अगला भाग होगा भाग १०१
 
भाग १०१ - मेरा मरद

२४,९४,२७७

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पता नहीं काहें, ये सब बातें, इन्सेस्ट विंसेस्ट वाली, महतारी बेटवा के साथे, बेटी बाप के साथे, और पता नहीं का , ककोल्ड, फाकोल्ड सब

लेकिन एक बात बताऊँ, अपने मन की और किसी औरत से पूछ के देख लीजिये, जहां मन और तन दोनों मिला हो, वहां की बात कर रही हूँ , जेतना मज़ा अपने मरद के साथ आता है न ओतना किसी के साथ नहीं। बाकी सब तो चटनी अचार हैं, स्वाद के लिए चख लिया, लेकिन असली पेट तो खाना खाने से ही भरता है,

लेकिन मरद को कभी पगहे से नहीं बांधना चाहिए, अरे सांड़ कभी खूंटे में बंधता है। लेकिन जैसे गाय गोरु चर के सांझे घर आ जाते हैं, वैसे ही मरद भी, सोयेगा खायेगा तो घर पे ही। कभी भी पेटीकोट के नाड़े से मरद को बाँधने की गलती नहीं करनी चाहिए, हाँ पेटीकोट सुंघा के पागल करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, और ज्यादा सवाल जवाब नहीं करो तो खुदे बताएगा, कहाँ कहाँ शिकार कर के आया।

और अगर किसी को देख के ज्यादा ललचा रहा हो तो खुद जुगाड़ कर के,… जब ननदोई से इनको बात करते मैंने सुना छुटकी के बारे में, मैं समझ गयी,… और माँ से बात कर के खुद ही, … ये अपनी दोनों सालियों पे लुहाए थे तो मैंने भी इन्हे होली में एकदम खुल के, ….अरे साली पे जिज्जा नहीं चढ़ेगा तो कौन ,

छुटकी थोड़ी हदसी थी, अरे इनका मोटा खूंटा, सांड़ ऐसा है तो कोई भी और वो तो एकदम कोरी कच्ची दर्जा नौ वाली, तो मैंने और इनकी सलहज ने मिल के अपने सामने इन्हे इनकी साली पे

और ये भी भुखाये थे और मैं भी, पिछले पांच छह दिन से, नन्दोई के साथ हॉस्पिटल में और फिर मेरी ननद के साथ और मैं भी,
 
औरत मरद

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जितना कस के इन्होने मुझे दबोचा, उससे ज्यादा कस के मैंने

हम दोनों पागल हो गए थे, जैसे न जाने कब के बिछुड़े मिलें,

जैसे मरद कमा के लौटता है तो माई के लिए साड़ी, बहन के लिए कपडा, सबके लिए कुछ न कुछ, लेकिन औरत तो बस अपना मरद ढूंढती है, और रात में मिलने पर बस कस के भींच लेती है।

मरद परदेस का किस्सा सुनाता है, लेकिन औरत को तो बस उसकी आवाज सुननी होती है, क, ख,ग, घ, बोले तो भी वैसे ही मीठी,... इतने दिन बाद वो आवाज, और फिर प्रेम का रस कूप खोल देती है, जैसे माँ को मालूम होता है बेटे को खाने में क्या क्या अच्छा लगता है वैसे औरत को भी उसके देह का पहाड़ा, ककहरा,

बस एकदम उसी तरह हम दोनों एक दूसरे को भींचे, बिना कुछ किये बड़ी देर तक, फिर पहल मैंने ही की, पहला चुम्मा लेने की

लेकिन बात मैंने जो की बस वही, टर्म्स और कंडीशन अप्लाइड वाली, मन और तन दोनों का मेल हो, और हम दोनों के साथ तो गौने के बहुत पहले से जब मैंने इन्हे पहली बार देखा था, बीड़ा फेंकते समय, उस समय जयमाल का चक्कर तो था नहीं, बस तब से मैं समझ गयी थी

असल में नयी नयी दुल्हन की गंध, रूप, रस, रंग सब अलग ही क्यों लगता है,

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मरद के देह की गंध, .....जब पहली रात ही मरद उसे रौंद देता है, जैसे कुम्हार जब माटी रौंदता है तो माटी फिर ताल पोखरा की न होकर कुम्हार की हो जाती है, कुम्हार की उँगलियों का जादू उसमें रच जाता है बस उसी तरह मरद की देह की गंध, रोम रोम में बसी, नयी दुलहिनिया भी मद में जैसे चूर और उसकी देह से भी मद बरसता रहता है, महकता रहता है।

और उन सबसे बढ़ के मरद की मलाई, गौने के अगले दिन जब मैं नहा रही थी, एक बूँद मलाई मेरे खजाने से लुढ़कती पुढ़कती बाहर निकली, इतना अच्छा लगा देख के, लेकिन अगले ही पल मैंने कस के भींच लिया और बोली,

' पड़ी रह चुप चाप अंदर, मेरे मरद की मलाई है ऐसे ही थोड़े छोड़ दूंगी, "

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और ऊपर से मेरी सास, और बूआ सास, मैं गाँव की औरतें सब, सास ,जेठानी, ननदें, ज्यादातर कुँवारी कुछ तो एकदम बच्चियां, और एक बूँद इनकी मलाई सरक के रेंगते रेंगते, मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी और जब वो लहंगे के नीचे से, मेरे महावर लगे पैरों पे, सबसे पहले बूआ ने देखा तो वो जोर से मुस्करायीं, फिर मेरी जेठानी और बाकी नंदों ने भी, बोला किसी ने कुछ नहीं लेकिन सब जिस तरह से मुस्कायीं,

मेरे चेहरे पे जैसे किसी ने ढेर सारा ईंगुर पोत दिया। एकदम लजा गयी मैं और अब तो ननदों को मौका मिल गया, दो चार तो खिस्स खिस्स

बाद में मेरी सास और बूआ सास ने छेड़ा,

" काहें इतना लजा रही थी अरे सबको मालूम है गौने की रात का होता है " और फिर सास ने ठुड्डी पकड़ के प्यार से बोला,

" अरे नयी दुलहिनिया के तो मांग में सिन्दूर दमकता रहे और बुर में से मलाई छलकती रहे यही तो नयी दुल्हन का असली सिंगार है "।

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" इसका मतलब की मरद कचकचा के प्यार करता है " बूआ सास ने जोड़ा।

उसके बाद से तो मैं नहाते समय खूब ध्यान से, सब सफाई बस ऊपर ऊपर से और बुर की दोनों फांके कस के भींचे रहती थी और अपनी बचपन की सहेली को हड़काती भी थी,

' आएगा न रात को खोलने वाला, फ़ैलाने वाला, तब तक तुम दोनों गलबहिंया डाल के एकदम चिपकी रह "

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और रात का कौन इन्तजार करता है, तिझरिया को ही जेठानी मुझे मेरे कमरे में पहुंचा आयी और थोड़ी देर में अपने देवर को भी भेज दिया, फिर तो,… और एक दो दिन में शादी के मेहमान चले गए तो उसके बाद न दिन देखें न रात,… और ज्यादा देर हो जाए तो मैं खुद ही चकर मकर,… जैसे बछिया हुड़क रही हो, और सब लोग ये नजर पहचानने लगे थे, यहाँ तक की मेरी नौवें में पढ़ने वाली छुटकी की समौरिया ननद आँखे नचा के बोलती,

" भौजी, भेजती हूँ अभी भैया को, "

साल भर करीब हो गया था मुझे इस घर में आये लेकिन मेरे अंदर अभी भी वही हुड़क रहती थी,
 
मेरी ननद और ननद का बदमास भाई

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--

अरे मेरी वही ननद, जो अभी ससुरे गयी हैं खुसी खुसी, वही, मुझको इस घर में लाने वाली, वही, ....सब उन्ही का चक्कर,

अपनी किसी सहेली के घर में देख लिया मुझे फिर एकदम मोहा गयीं और फिर अच्छी तरह से पीछे, पहली अपनी माँ, मेरी सास को, उसके बाद तो कभी मिश्राइन भाभी के जरिये, कभी दूबे भाभी से कहलवाती, और मेरी मम्मी हर बार , 'अरे अभी तो पढ़ रही है, अभी तो इंटर में है '

लेकिन मेरी ननद और मेरी सास एक दिन बस ऐसे ही बिना बताये, 'अरे बस ऐसे ही खाली मिलने आये हैं " और देखने के साथ ही सास ने अपना हार पहना दिया।

मेरी मम्मी ने समझाया भी मुझे की अरे अभी शादी थोड़ी, …लेकिन इंटर के इम्तहान के पहले ही शादी,

तब भी मम्मी बोलती रहतीं,

"अरे गाँव का रीत रिवाज, तीनसाल का गौना पडेगा, कौन जल्दी है, ....तुम बीस की हो जाओगी, "

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लेकिन अबकी दोनों समधन की मिली भगत और पीछे पड़ी मेरी यही ननद, होली के हफ्ते भर बाद, इंटर का आखिरी पेपर और उस के दो दिन बाद गौना, और मैं आ गयी,…

….

उन्हें पकडे पकडे मैं जादू के उस शीश महल से बाहर आयी और एक जबरदस्त गाली दी उन्हें

लेकिन वो,…. खिड़की दरवाजा बंद करना तो उस लड़के ने सीखा नहीं था और मैं बाहर के कमरे में, पर वो मुझे गोद में उठा के सीधे मेरे कमरे में मेरे बिस्तर पर, जहाँ गौने की रात दुल्हन की तरह मिली थी मैंने उनसे,

उनके पहले कपडे आज मैंने उतारे,…. उनके भी और अपने भी और वो मेरी दोनों टांगों के बीच,

चूसम चुसाई , स्साले को मुझे तड़पाने में बहुत मजा आता था।

मन मेरा कर रहा था,.... स्साला रंडी का, हचक के पेल दे, फ़ुट भर का डंडा काहें नीचे लटका रखा है, अब तो स्साले बहनचोद की बहन, भौजाई भी नहीं है, मेरी महतारी ने मेरे इंटर पास करने के पहले ही इसके पास काहें बिदा कर दिया था की पेल पेल के उनकी कच्ची कोरी बिटिया की चूत का भोंसड़ा बनाये, ये लेकिन तड़पाने में,

" उह्ह्ह कर न , काहें तड़पा रहा है स्साले अब तो तेरी बहिनिया भी नहीं है, ओह्ह करो न "

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मैं तड़प रही थी, चूतड़ पटक रही थी, कस के दोनों हाथों से चददर पकडे थी, "

मेरे मरद को खाली चूसने और चाटने के पंद्रह तरीके आते थे, जीभ से बुर चोदना उसके अलावा था।

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और आज उस अपनी माँ के भतार ने क, ख , ग से शुरू किया था। दोनों जाघों पर चुम्मा ले ले के धीरे धीरे उसके होंठ मेरी प्यासी दुलहिनिया के चारो ओर चक्कर काट रहे थे जैसे लड़कियों के स्कूल की छुट्टी होने के पहले लौंडे चक्कर काटते हैं और फिर बाज की तरह झप्पटा मार के मेरी दोनों गुलाबी फांको को एक बार में गप्प,

" उईईई ओह्ह्ह्ह "

मेरी जोर से सिसकी निकल गयी, मस्ती में आँखे बंद हो गयीं, निपल पत्थर के हो गए।

पूरी देह कसमसा रही थी और वो, बस हलके हलके चूस चूस रहा था, मेरी दोनों फांको को मुंह में डाले, फिर जीभ से हलके से दोनों फांको को अलग किया जैसे आम की दो आपस में जुडी फांको को कोई अलग कर रहा ही और उस पतली सी कसी कसी दरार में मेरे साजन की जीभ ने सेंध लगाई, लेकिन जीभ से वो चोद नहीं रहा था।

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बस शुरू के एक दो इंच में उस प्रेम गली के, लव टनेल के, कहाँ मजे वाले प्वाइंट हैं , मेरी देह का रोम रोम पता था उस लड़के को ,

और उस की उँगलियाँ भी मैदान में आ गयीं। जैसे कोई बहुत दिनों से पड़े सरोद के तारों को छेड़ दे और पूरा कमरा राग रागनी से गूँज उठे, पहले तो उसने अपनी तर्जनी के टिप से हलके हलके मेरी फूली बौराई क्लिट को बस जरा सा दबाया, फिर छेड़ा

मेरी पूरी देह झंकार से भर गयी, मैं गिनगीना रही थी, काँप रही थी और जब उस बदमाश ने अंगूठे और तर्जनी के बीच लेकर रोल करना शुरू कर दिया और साथ ही जीभ अंदर तक, गोल गोल, क्या कोई लंड से चोदेगा जिस तरह से वो अपनी माँ का भतार जीभ से चोद रहा था

जैसे कुंए के अंदर से पानी अपने आप उछल के बेताब हो उसी तरह मेरे रस कूप से रस की धार निकलने को बेचैन थी बस लग रहा था अब झड़ी तब झड़ी, देह ढीली हो गयी थी , आँखे बंद हो गयी थीं

उह्ह्ह उह्ह्ह ओह्ह्ह्ह आह्हः अह्ह्ह बस मैं सिसक रही थी, हलके हलके चूतड़ पटक रही थी
 
दुष्ट,,,तड़पाना है तड़पा लो

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और वो रुक गया,

उसने गियर चेंज कर दिया, अब दोनों हाथ दोनों जोबन पर मेरे कस कस के चूँचियाँ निचोड़ी जा रही थीं, मसली जा रही थी और जीभ से सपड़ सपड़ मेरी चूत वो चाट रहा था, कभी क्लिट भी चूस लेता तो कभी जीभ अंदर धकेल देता

अबकी तो मैं दो मिनट में ही झड़ने के किनारे थी की वो फिर रुक गया और उसने मुझे खींच के, अब मेरा चूतड़ एकदम पलंग के किनारे, फिर जितनी तकिया, कुशन थे वो सब मेरे चूतड़ के नीचे, गद्दे से कम से कम एक फ़ुट ऊंचा मेरा चूतड़,

और वह अब फिर रुक गया पर मुझसे नहीं रुका गया

" कर न स्साले "

लेकिन वो जस का तस और मैं समझ गयी ये क्या सुनना चाहता है ,

" स्साले तेरी माँ का, ....पेल न अब काहे को तड़पा रहा है "

पर वो बदमाश, मुझे देखता रहा, मुस्कराता रहा और फिर मेरी कलाई से भी मोटे खूंटे को हाथ से पकड़ के बस कभी मेरी फुदकती फांकों पे रगड़ता तो कभी फूलती पिचकती क्लिट पे और जो वो सुनना चाहता था, मुझसे, उकसा के बोला,

" क्या पेलू, कहाँ पेलू, बोल साफ़ साफ़ "

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" अरे और कौन घर में है, तेरी महतारी तो है नहीं जो उसके भोंसडे में पेलोगे, पेल स्साले अपनी महतारी की बहू की बूर में " जोर से अपनी जाँघे फैलाते मैं बोली,

लेकिन वो आज कुछ ज्यादा ही, मेरी पतली कमर पकड़ के बस वो मूसल मेरे मुहाने पे रगड़ता रहा, और मुझे लगा की मैं दो बार झड़ते झड़ते रुकी हूँ, "तो क्या इसी तरह बाहर बाहर से ही झाड़ देगा, ये स्साला बहनचोद"

उईईई उईईई,... नहीं,..... जान गयी

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मैं जोर से चीखी। मेरा मरद आज ज्यादा ही गरमाया था। जब मैं सोच भी नहीं सकती थी अचानक दोनों अंगूठों से उसने मेरी फांके फैलायीं और हथोड़ा ठोंक दिया। जबरदस्त कमर की ताकत है मेरे सास के पूत में, और मैंने जो महतारी की गारी दे दी उसने और आग में घी का काम किया।

वो धकेलते रहे, ठेलते रहे, मैं चीखती रही चिल्लाती रही, करीब आधा भाला धंसा के ही वो रुके, और प्यार से मेरी ओर देखा। मैंने गुस्से से उनकी ओर देखा, लेकिन उस आदमी पे गुस्सा करना बड़ा मुश्किल था, मैं मुस्करा पड़ी, वो हंस पड़े और झुक के मुझे चूम लिया।

और जब होंठ अलग हुए तो मेरी आँखों में आँखे डाल के उन्होंने पूछा, और अबकी वो सीरियस भी थे कन्सर्न्ड भी

" हे ज्यादा दर्द तो नहीं हुआ "

अबकी मैं सच में गुस्सा हो गयी और उन्हें अपनी बाहों में कस के भींच के, अपने नाख़ून उनके कंधो में गड़ाती बोली,

" स्साले, बहन के भंडुए , मुझे दरद मेरा मरद नहीं देगा तो और कौन देगा, और मेरा मरद मुझे दरद नहीं देगा तो और किसको देगा, …उसकी महतारी का तो ताल पोखरा से भी चौड़ा है, मेरे मरद के मामा ने मायके से ही खोद खोद के, मैंने खुद ऊँगली डाल के देखा है, न बिस्वास हो तो पहर भर बाद आएँगी, डाल के देख लेना । मेरे मरद की मरजी जो चाहे वो करे, समझ ले ये बात हरदम के लिए,… "

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और अपनी बात को और अच्छी तरह समझाने के लिए मैंने उन्हें कस के भींच लिया।

वो सास के पूत थे तो मैं भी उसी सास की दुलारी बहू जिसे उन्होंने अपने सब गुन ढंग सीखा दिए थे। मेरी प्रेम गली ने उस दुष्ट मोटू को जकड़ लिया निचोड़ लिया और मैं अपने जुबना को जिसके वो दीवाने थे, कस कस के उनकी छाती में रगड़ने लगी।

और अबकी चुम्मा मैंने लिया और इस तरह की मेरे सास के पूत की बोलती बंद हो जाए, अपनी जीभ उसके मुंह में ठेलकर और कचकचा के उनके होंठ काट के।

और अबकी धक्का मैंने मारा नीचे से, पूरी ताकत से चूतड़ उछाल के और एक इंच और मेरी रामकली ने अपने मोटू को लील लिया। धक्को का काम उस मरद ने मेरे ऊपर छोड़ दिया और बाकी कामो में लग गया, इतनी लम्बी चौड़ी देह, रोम रोम रस का कूप और सब की सब मेरे पिया की जमींदारी, उसका खेत जब चाहे तब जोते।

लोग कहते हैं मर्दो के एक सेक्स आरगन होता है मेरी सास के इस पूत के कम से कम दस थे।

होंठ निपल चूस रहे थे मेरे

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और दूसरा जोबन मेरे मरद के हाथ कभी सहलाता, कभी निचोड़ता और दूसरा हाथ कभी सांप की तरह कभी बिच्छी की तरह मेरी देह पर डोल रहे थे और वो जहाँ चाहता, कभी सहला के कभी दबा के कभी चिकोटी काट के डंक मारता,…

और मोटा खूंटा तो अंदर घुसा ही था।

कुछ देर में ही हम दोनों देह के इस खेल को खेल रहे थे, कभी ऊपर से वो धक्का मारते, तो कभी नीचे से मैं धक्का मारती, कभी वो मेरी दोनों पतली कोमल कलाइयों को पकड़ के पूरी ताकत से हचक के धक्का मारते, चुरुर मुरुर करती आधी दर्जन चूड़ियां तो दरक ही जातीं। जाँघे फटी पड़ रही थीं, पूरी तरह मैंने फैला रखी थी, और फिर

उन्होंने मुझे दुहरा कर दिया।

बाकी सब बदमाशी बंद, मेरी दोनों टाँगे उनके कंधे पे, उनके दोनों हाथ मेरी पतली कमर पर, और खूंटा आलमोस्ट बाहर निकाल के क्या धक्का मारा उन्होंने , हथौड़ा सीधे बच्चेदानी पे लगा। सुपाड़ा था भी खूब मोटा, मेरी मुट्ठी जैसा और फिर इत्ती ताकत से लगा, मेरी पूरी देह हिल उठी

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और अबकी जब मैंने झड़ना शुरू किया तो झड़ती रही, तूफ़ान में कांपते पत्ते की तरह। और एक बार झड़ चुकने के बाद जैसे एक बार भूकंप आने के बाद भी कुछ दिनों तक झटके आते रहते हैं, मेरी देह भी रुक रुक के कांपती रही, मेरी योनि कभी टाइट होती कभी ढीली होती।

हाँ गनीमत थी , मेरे झड़ते समय वो रुक जाते और थोड़ी देर बाद छोटे छोटे चुम्बन के पग धरते उनके होंठ मेरे उरोजों की नसेनी चढ़ के निपल के शिखर पर कभी जीभ से फ्लिक करते , कभी बस चूम लेते तो कभी जोर से चूसते

और मैं एक बार फिर पागल हो गयी, उन्ही धक्को के लिए, हलके से चूतड़ उठा के मैंने इशारा किया और तूफ़ान फिर चालू हो गया।

लेकिन अगर वो मेरी सास के पूत थे तो मैं भी अपनी सास की बहू थी और बुर टाइट करने की जो तरकीब मेरी सास ने ऊँगली डाल डाल के प्रैक्टिस कराई थी, बस वही, कभी मैं निचोड़ती, कभी छोड़ती और एक बार जब उनका पूरा मूसल अंदर था मैंने कस के चूत को भींच लिया

" स्साले मजा आ रहा है, चोद न,... अब नहीं छोडूंगी " मुस्करा के मैं बोली।

" मजा तो बहुत आ रहा है, और तुझे नहीं चोदुँगा तो किसे चोदुँगा, आखिर मेरी सास ने तुझे भेजा किस लिए मेरे साथ कार में बैठाकर " मुस्करा के सास की दुहाई देते वो बोले ,

लेकिन मेरी पकड़ जबरदस्त थी, पर वो मेरा मरद सिर्फ मेरी सास का पूत नहीं था,अपनी सास का दामाद भी था, और शादी के पहले ही मेरे घर के सब लोगों ने दल बदल कर लिया था, मेरी माँ अब मेरी माँ नहीं इनकी सास थीं, मेरी बहने इनकी साली , और सास और साली ने मिल के मेरे बारे में एक एक छोटी छोटी चीज, मेरी हर कमजोरी, मुझे गुदगुदी बहुत लगती है कहाँ छूने पे सबसे ज्यादा लगती है सब कुछ

और उस लड़के ने गुदगुदी लगानी शुरू कर दी, मैं लाख कहती रही फाउल पर वो मुस्करा कर बोले , " एवरीथिंग इज फेयर इन लव "

और एक बार मेरा हंसना शुरू हुआ तो मेरी पकड़ ढीली और इनके धक्के तेज

दस मिनट तक नान स्टाप चुदाई, धुनिया जैसे रुई धुनता है उस तरह धुन के रख दिया उस बदमाश ने

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पर अबकी हम दोनों साथ साथ झड़े और उनकी सारी मलाई, एक एक बूँद मेरी बिल ने गटक ली। उसके बाद भी मैंने उन्हें बाहों में भींचे रखा, मेरी रामकली ने उस मोटू को निचोड़े रखा। बहुत देर बाद वो हटे और फिर हम दोनों पलंग पर एक साथ लेटे बिन बोले, बतियाते रहे।

कुछ उनसे, कुछ ' उससे'।
 
मेरी सास, सास का पूत और सास का,…

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और 'उससे' बतियाते, छेड़ते, चिढ़ाते, कभी मैं बस हलके से छू देती, कभी अपनी कोमल कोमल मुट्ठी में पकड़ के रगड़ देती और उकसाती,

" स्साले तू बहुत भोंसडे का मजा ले चुका है लेकिन देख तुझे ऐसे मस्त भोंसडे का मजा दिलवाऊंगी जैसा तो सोच भी नहीं सकता, एकदम रस की खान है, जब उसमे घुसेगा न तो असली औकात मालूम होगी, निचोड़ के रख देगी, वो भोसड़े वाली। जबतक एक एक बूँद पानी पी नहीं लेगी तेरा स्साली रंडी छोड़ेगी नहीं। "

सच में, जब मेरी सास मेरे नन्दोई पे चढ़ के चोद रही थीं, उनसे चूतड़ उठा उठा के चुदवा रही थीं। और सबसे बढ़कर अपनी मोटी मोटी चूँची से अपने दामाद का लंड, मस्त चोद रही थीं, मुझे हदस भी हो रही थी, जलन भी और गुस्सा भी आ रहा था।

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स्साली खानदानी रंडी, इसकी सात पुस्त को अपने मरद से पेलवाऊं, अपने मायके वालों से पेलवाऊं, बेटी के मर्द के साथ इतना दुलार, इतनी मस्ती और बेचारा मेरा मरद अपना,

लेकिन ये भी लगता की मेरी सास प्यासी भी बहुत हैं और इस का बस एक ही इलाज है, जल्द ही अपने मरद को इसके ऊपर चढ़ाऊँ तभी इस की गरमी बुझेगी।

" हे किसके बारे में बात कर रही है " उत्सुकता से मेरे सोना मोना ने पूछा, और एक अच्छी पत्नी की तरह मैंने उन्हें हड़का लिया

" हे पहली बात तो मैं तुझसे बात नहीं कर रही इससे बात कर रही " झुक के उस फनफनाये मूसल को चुम्मा ले के मैं बोली फिर इरादा साफ कर दिया

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" अरे जिसके भोसड़े से निकले हो उसी के भोसड़े में डुबकी लगवाउंगी, ….अब तो कोई है भी नहीं। तेरी बहन कम रखैल तो अपने ससुराल चली गयी, भौजी और छुटकी बहिनिया बंबई में दूकान खोल के बैठी हैं अपने जुबना का , तो बस वही है। आ रही होंगी गाँव भर को अपने जुबना का नजारा दिखा के, इसलिए अपने इस मोटू की ताकत बचा के रख, आज मैं खुद अपने हाथ से उस भोंसड़ी वाली के पेटीकोट का नाडा खोलूंगी और अपने मरद का खूंटा पकड़ के अपने हाथ से, एक धक्के में पेल देना, कोई बहाना नहीं चलेगा "

उनका सुपाड़ा फूल के के कुप्पा हो गया, ऐसी जबरदस्त मिठाई मिलने वाली थी।

शैतान का नाम लो शैतान हाजिर और मेरी सास आ गयी और मेरा बस चलता तो उसी समय उनके लड़के को उनके ऊपर चढ़वा देती
 
छुटकी- जबरदस्त खुश खबरी

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लेकिन मेरी सास फिर बच गयीं, इनकी सास का फोन आ गया।

लेकिन पहली बार समधन लोगों में गाली गलौज नहीं हुयी, और मेरी सास का चेहरा ख़ुशी से चमक गया, और उन्होंने स्पीकर फोन ऑन कर दिया।

और फिर जो खबर सुनाई पड़ी, तो मारे ख़ुशी के मेरी और इनकी दोनों की हालत खराब, मैंने इन्हे कस के दबोच लिया, बहन मेरी थी लेकिन पहले इनकी साली थी।

खबर ही ऐसी थी, साल दो साल पहले छुटकी स्टेट लेवल पे अंडर फिफ्टीन पे बस सेलेक्ट होते होते रह गयी थी, लेकिन उसी समय एक सेलेकटर ने अपनी मज़बूरी बताई थी की कुछ प्रेशर हैं लेकिन जल्दी ही उसका भी नंबर,

माँ ने बोला की छुटकी का कबड्डी की स्टेट टीम में सेलेक्शन हो गया था।

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अभी थोड़ी देर पहले स्कूल से खबर आयी थी, फिर लखनऊ से भी और उसके बाद तो फोन पे फ़ोन।

लेकिन चक्कर ये था की दो दिन के अंदर उसे लखनऊ पहुंचना था, वहां पंद्रह दिन का कैम्प था, के डी सिंह बाबू स्टेडियम में और स्पोर्ट्स हॉस्टल में ही रहना खाना। और उसके बाद टीम को बंगलौर जाना था इंटर स्टेट कैम्प के लिए। डेढ़ दो महीने का चक्कर कम से कम

और उसी समय छुटकी का फोन आया इनके पास, बस जीजू जीजू बोल रही थी।

मैंने डांटा तो आगे की बात बोली,

बंगलौर में ही एक और सेलक्शन होगा, इंटर स्टेट के बाद, नहीं नहीं नेशनल टीम का नहीं।

वो लोग यंग टैलेंट्स, मतलब जिनकी एज कम हों, कभी नेशनल में न रही हों , फर्स्ट या सेकेण्ड टाईम इंटरस्टेट खेल रही हों वैसी २४ लड़कियां चुनते, और उनको ग्रूम करते। अभी नहीं, लेकिन दो चार महीने बाद पटियाला में एक दो तीन महीने की ट्रेनिंग, फिर कई मैच, मतलब वो स्पोर्ट आथारिटी की ही जिम्मेदारी में।

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तो मतलब अभी सिर्फ महीने दो महीने की बात थी,… उसके बाद अगर छुटकी का उस यंग टैलेंट वाले में हो गया तो फिर तीन चार महीने बाद पटियाला जाना पक्का,… लेकिन अभी सिर्फ महीने दो महीने की बात थी।

लेकिन मेरी सास ने अपने पूत को हड़का लिया,

" ऐसे फोनियाते ही रहोगे, या जा के बेटी को ले भी आओगे, समधन बोलीं हैं आज ही निकलना है "

और थोड़ी देर में मेरी बहन अपने जिज्जा की दुचक्की पे पीछे चिपक के बैठी, और जैसे ही छुटकी अन्दर आयी मेरी सास के पास इनकी सास का फोन फिर घनघनाया

दोनों समधन में कुछ देर ही बात हुयी और मेरी सास बोलीं,

" आपका दामाद है किसलिए, खाली होली खेलने के लिए जिज्जा बने हैं, …बस अभी, "

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और पता चला की छुटकी को न सिर्फ घर पहुंचाना था बल्कि अभी अभी लखनऊ से फोन आया था की कल सुबह ही लखनऊ में रिपोर्ट करना है। रात में ११ बजे कोई नाइट बस चलती चलती है, भोर भिन्सारे पहुंचा देगी, तो मामला ये था की छुटकी लखनऊ किसके साथ जाए। माँ मंझली को अकेले छोड़ के जाना नहीं चाहती थीं

तो बस घंटे भर के अन्दर छुटकी निकल के,…

मेरा मन बहुत खदबदा रहा था उसके किस्से सुनने के लिए, क्या रहा अरविन्द और गीता के साथ, कैसे बीते पिछले छह सात दिन

जान बूझ के मैंने लाख चाहते हुए भी अपनी छोटी बहन को पांच दिन तक घर के आस पास भी फटकने नहीं दिया था, मन पर मनो भारी पत्थर रख के, लेकिन घर की इज्जत की बात थी और ननद को गाभिन करने की और मैं नहीं चाहती थी की उसकी कानोकान खबर भी किसी को हो, न वो घर आयी न मैं उससे मिली, न उसके जीजा, और जब ननद हमार गाभिन होक ख़ुशी ख़ुशी अपने ससुरे अपने मर्द के साथ गयीं, पहुँच गयी, होने वाले मुन्ना की दादी और बूआ से मिल ली, उसके बाद ही,

मेरी सास छुटकी को अपने हाथ से खिला रही थीं और वो बस ये बोल पायी की

अरे दी बहुत मजा आया और बैंगलोर से लौट के सीधे यही आउंगी। और सिर्फ गीता दी के साथ नहीं, दो दिन तो मैं नैना दी की ससुराल भी हो आयी और फिर फुलवा की छुटकी बहिनीया के साथ भी,.. एक दिन सब बताउंगी

मैं सास को देख के मुस्करा दी और सास मुझे, बिन बोले हम दोनों समझ गए।

मेरा भोर का सपना सौ फीसदी सच होने वाला है, उस सपने में यही तो था, ननद जी के ससुराल जाने के बाद छुटकी के कबड्डी में स्टेट टीम में सेलेक्शन की खबर आयी और ये छुटकी को ले के, ….और उसके बाद अपनी ससुराल से छुटकी को ले के लखनऊ, ….लेकिन असली बात तो इनके लखनऊ से छुटकी को छोड़ के आने के बाद की थी सपने में,

और अगर अब तक का सपना सच हुआ तो वो भी होगा, ये मेरी सास का पूत, सपने में मेरी सास के साथ, …

सास का पूत सास के सास के साथ,

लेकिन सास ने सपने का अंत बताने नहीं दिया था और हड़का लिया था, " अरे पगलिया, तोहार माई को चुदवा चुदवा ले एक से एक मस्त बिटिया जन्मने से फुरसत मिलती तो समझातीं, अरे भोर क सपना सच होता है, सोलहों आना सच लेकिन बताने से असर कम हो जाता है, तो अकेले में भी कभी मत बोलना की का सपन देखी थी, तू समझ गयी, हम समझ गयी।

और अब मेरी सास भी मान गयी थीं, मन बना लिया था, बहू के सामने, ….बहू के मरद के साथ,… घपाघप, घपाघप, और एक बार नहीं, कभी कभी नहीं रोज

होगा होगा जैसे इनका मिलन इनकी सगी बहिनिया के साथ हुआ, और गाभिन कर के अपने बहनोई के साथ ये भेजे, एकदम उसी तरह से

खूब बिस्तार से बताउंगी, लेकिन वो सुभ घडी आने तो दीजिये, अरे हमरे सामने,…. हमारी सास अपने दामाद के साथ तो इनकी सास के दामाद तो उनहुँ से बीस नहीं पच्चीस हैं,
 
भोर का वो सपना- सास का पूत और सास

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यही तो था सपने में

अगले दिन सुबह ये छुटकी को ले के मेरे घर और एक दिन बाद लखनऊ और अब लखनऊ से आ रहे थे , थोड़ी ही देर में पहुँचने वाले थे

सपनों में सब कुछ क्रम से तो होता नहीं,

ये पलंग पर बंधे छने, आंख पे मोटी पट्टी बंधी, काली। मैंने इन्हे समझा रखा था, ' कच्ची कलियों की तो बहुत फाड़ा तूने, जवान फूलों का भी रस लिया, आज तुझे एक खूब रसीले भोसड़े का रस दिलवाऊंगी, है मेरी एक खास, लेकिन दो शर्त है, एक तो तुझे आँख पे पट्टी बंधवानी होगी, और दूसरे तो तुझे पहले ऊपर चढ़ के चोदेगी, पूरे दस मिनट अगर तुम झड़ गए तो समझ लेना, और अगर नहीं झड़े तो पलट के उन्हें पेल देना, लेकिन झड़ने के पहले उन्हें झाड़ना होगा। "

उनके ऐसे गब्बर मर्द के लिए तो ये कौन बड़ी बात थी, लेकिन सुन के वो छनक गए, बोले

" ले आओ भौंसड़ी वाली को, फाड़ के चीथड़े चीथड़े न कर दिया, पता चलेगा किसी मरद का लौंड़ा घोंट रही है। " और छनकने के बात ही थी, कच्ची से कच्ची कलियों को भी तीन बार झाड़ने के बाद ही झड़ते थे वो।

लेकिन मान गयी मैं अपनी सास को, बातचीत में तो बहुत सीखा था मैंने सब मर्दों के साथ वाले दांव पेंच, और मुझे भी घमंड था ऊपर चढ़ के चोदने में मेरा मुकाबला नहीं, इनको और नन्दोई जी के तो ऊपर कितनी बार, फिर नए नए देवरों के साथ भी, लेकिन जब मैंने सास को देखा तब मैं समझी घुड़सवारी के असली गुर। कैसे घोड़े को सहला के, फुसला के कब्जे में किया जाता है, फिर चैलेन्ज, और सास की कलाई में भी अपने बेटे से कम ताकत नहीं थी।

पहले तो ललचाया, सास ने मेरी इनकी कलाई पकड़ी दोनों और बस अपने दोनों निचले होंठों से इनके फनफनाये सुपाड़े को देर तक छुअति रहीं, सहलाती रहीं, जैसे बदमाश मरद होते हैं, सुपाड़े को रसीली भीगी फुद्दी की फांको पे रगड़ते रहते हैं, औरत को पागल करते रहे हैं पिघलाते रहते हैं लेकिन पेलते नहीं, जब तक औरत खुद चूतड़ न उचकाने लगे, सिसक के पागल न हो जाए, एकदम उसी तरह लेकिन औरतों के पास तो मर्दों से दस गुना ज्यादा हथियार होते हैं। सावन के झूले की तरह वो झोंटा मारती थीं, मजाल है की कमर जरा भी हिले लेकिन उनके बड़े बड़े कड़े जोबना मेरे मर्द की चौड़ी छाती से रगड़ जा रहे थे।

बस थोड़ी देर में उनसे नहीं रहा गया, नीचे से उन्होंने चूतड़ उछाल के धक्का मारा, मेरी सास से तो वो नहीं पार पा सकते थे लेकिन मैंने भी उन्हें कस के गरियाया,

" स्साले, तेरी माँ बहन का भोंसड़ा मारुं, क्या बोला था चुपचाप दस मिनट चुदवाने को, स्साले तेरी माँ का भोंसड़ा है क्या जो ऐसे नीचे से धक्का मार के घुस जाओगे "

वो बेचारे, जस के तस, लेकिन माँ का दिल, मेरी सास को दया आ गयी, जरा सी चीज के लिए बच्चे का मन, कहने को तो उनका चार चार बच्चो का निकाल चुका भोंसड़ा था, लेकिन मैं जानती थी उस गुफा की हालत, गुफा नहीं बिल थी, वो भी सांप और चूहे की नहीं, चींटी की। एकदम बढ़िया रखरखाव, कसरत के साथ बरसों से एक दो ऊँगली से ज्यादा उसमे घुसी नहीं थी, हाँ बेचारी कन्या रस से काम चलाती थीं , न अजाने कितने देने बाद प्रेमगली को आहार मिला था, तो मेरी सास ने अपने भोसड़े की दोनों फांको को ऊँगली से फैला के दुलरुवा बेटे के मोठे सुपाड़े को फंसा लिया और बस हलके हलके दबाने लगीं।

बेचारे नीचे से मचल रहे थे तड़प रहे थे और उनके ऊपर चढ़ी महतारी कभी कस के भींच के कभी ढील दे के , लेकिन अब मुझसे भी नहीं रहा गया, आखिर मरद तो मेरा ही न। मैंने अपनी सास से धीरे से कान में सिफारिश लगायी, " दे दीजिये न बेचारे को , तड़प रहे हैं "

और नीचे से सासू का बेटा सिसक रहा था, बेटे की तो आँखे बंद थी लेकिन माँ खूब मस्ती से देख रही थी, कभी उनको तो कभी मुझको जैसे सास मुझे अपनी बात याद दिला रही थीं, " देख तू बेकार में घबड़ा रही थी, मैं कह रही थी चढ़ के चोदूगी इसे, अरे तूने कह दिया बस अब हम दोनों मिल के इसे स्साले को पक्का मादरचोद बना देंगी "

और भोर का वो सपना लम्बा था, सिर्फ रात में बिस्तर पे ही नहीं

दिन दहाड़े रसोई में भी, जब कभी कोई भी आ जाता , ग्वालिन चाची, फुलवा की माई, पंडाइन भौजी

सास मेरी रसोई में झुकी हुयी चावल धो रही थी और मेरी नींद हलकी सी खुल गयी लेकिन मैंने कस के आँख मींच ली और सपना फिर गतांक से आगे चालू हो गया

ये आये और मैंने मुस्करा के एक बार देखा और बदमाशी से सास का साडी साया ऊपर उठा दिया, बस खेल चालू

मजा तो सास को भी बहुत आ रहा था लेकिन बनावटी गुस्से से बोलीं, " अरे बहू कम से कम रसोई में तो "

तबतक उनके बेटे ने गली के अंदर दाखिला ले लिया था , दोनों जोबन उसकी मुट्ठी में कस के

मैं कहीं और देख रही थी, इधर उधर और मुझे देसी घी वाला ही डिब्बा दिखा और हथेली पे उसे लुढ़काते हुए मैं बोली

" मेरी सास किसी से कम हैं क्या, जब चूतड़ मटकाते चलती हैं तो आदमी क्या गदहों का खड़ा हो जाता है और जित्ते लौंडो की नेकर सराक एक मारी होगी न, मेरी सास का पिछवाड़ा उससे भी टाइट है "

और सारा का सार हाथ का घी सास के गाँड़ के छेद पे, और जो थोड़ा बहुत निकल रहा था उसे भी अपनी ऊँगली में लपेट के अंदर तक, पहले एक ऊँगली और फिर उसपे चढ़ा के दूसरी ऊँगली और दो ऊँगली भी घी लगी होने पर भी मुश्किल से जा रही थी। लेकिन मेरा वाला तो गाँड़ मारने में एकदम उस्ताद, अपनी कच्ची कोरी दस में पढ़ने वाली साली की खाली थूक लगा के गाँड़ मार दी थी, तो मेरी सास तो

और जब प्रेम गली से खूंटा बाहर निकला तो बस हाथ में लगा सब घी लगा के मैंने कस कस के मुठियाया और उनके सुपाड़े को मेरी सास के पिछवाड़े, गोल छेद को चियार के सटा दिया, और बोली

" मार धक्का "

उधर सास के पिछवाड़े मेरे मरद का जोरदार धक्का पड़ा

जिसने मेरी नहीं छोड़ी, मेरी दसवें और नौवें में पढ़ने वाली बहनों का कोरा पिछवाड़ा नहीं छोड़ा, वो मेरी सास का पिछवाड़ा क्यों छोड़ता।

मैं समझ गयी थी, बस ये एक बार छुटकी को छोड़ के आ जाएँ, उसके बाद इनका पक्का मादरचोद बनना तय, और मेरी सास भी समझ गयी थी, लिखा कौन टार सकता था और वो सोच के मुस्करा रही थीं उनके किस्मत में मेरे मरद का गदहा छाप लिखा था।

लेकिन सपने में सब डिटेल तो होता भी नहीं, ये अगले दिन लखनऊ से नहीं आये, लेकिन ये अपनी किस्मत ऊपर से लिखवा के लाये थे , ससुराल वाली

बस से अपनी साली के साथ लखनऊ सुबह पहुंच तो गए, फिर पता चला की स्पोर्ट्स हॉस्टल में कुछ चक्कर हो गया है और वहां रहने की जगह पांच दिन बाद ही छुटकी को मिलेगी, इनके एक परिचित विधायक थे तो पहले एम् एल ए हॉस्टल में लेकिन जब उन को पता चला की इनके साथ इनकी साली भी है नाक की बात है तो उन्ही के दोस्त का एक होटल था हजरतगंज में ही बस वहीँ, तो पांच दिन ये होटल में अपनी साली के साथ, और सिर्फ साली ही नहीं, वो कैम्प में आयी लड़कियों से छुटकी की दोस्ती भी हुयी और पांच छह साली और मिल गयी,

और जिस ने अपनी बहन को नहीं छोड़ा वो साली बल्कि सालियों को छोड़ता,

छठवें दिन ये लौटे तो सब बताया लेकिन उससे पहले मेरी छोटी बहन ने भी बहुत कुछ बता दिया था, बस की बात भी। बस हंसती रही बोली , जीजू ने जब मुझे ट्रेन में नहीं छोड़ा हाथ बाँध के तो फिर बस में तो छोड़ने का सवाल ही नहीं था।

बताउंगी बताउंगी, छुटकी का सब किस्सा, लौट के आएगी ने कबड्डी से तो वो खुद ही क्या हुआ गीता के यहाँ, नैना के यहाँ और कबड्डी के कैमो में

लेकिन वो पांच दिन मेरे कैसे गुजरे मेरी सास के साथ बस थोड़े में उसकी भी कुछ बात

पति के साथ मन में घुसने का रास्ता तन से हो के जाता है इसलिए गौने की रात या सुहागरात और उसके बाद की तीन चार रातें बहुत इम्पोर्टेन्ट हैं और एक बार तन मन की गांठे खुल गयीं तो फिर तो दूध भात की तरह सब घुल मिला जाता है, कहाँ से पत्नी शुरू होती है और कहाँ से पति ये पता नहीं चलता,

लेकिन घर परिवार के बाकी लोगों के साथ, सास हो ननद हो, घुसने का रास्ता मन से है और एक बार मन मिल गए तो कई बार तन भी मिल जाते हैं

तन मन का यह द्व्न्द जितना जल्दी ख़तम हो उतना ही अच्छा है और मेरे और मेरी सास के साथ यही हुआ, उनके अकेलेपन का अहसास उनसे ज्यादा मुझे था, खास तौर से जब से में मायके से लौटी थी, उनकी बड़ी बहू और छोटी बेटी बड़े बेटे, गाँव के कितने बेटों बहुओं के साथ बंबई चली गयी थी और अब बस तीज त्यौहार में मेहमान की तरह, और मैंने अपनी सास को साफ़ बोल दिया था की मैं उन्हें छोड़ के कहीं नहीं जाने वाली अपने मायके तक नहीं।

और इन पांच दिनों में हम और नजदीक आ गए, देह में भी नेह में भी। पहले जब ये नहीं होते तो जिस सेज पर इनके रहने पर पहंचने की जल्दी लगी रहती थी वही नागिन की तरह डराती थी, सौतन की तरह काटती थी

लेकिन अब तो मेरी सेज, जब ये सास का पूत नहीं होता था तो सास के पूत की माँ के साथ, मेरी सास के साथ। कभी बात करते करते रात कट जाती तो कभी मस्ती करते करते, देह सुख के इतने मंतर मेरी सास ने मुझे सिखाये, पुरुषों से भी और औरतों से भी
 
मेरी ससुरार का गांव -

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घर घर की कहानी

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और फिर गाँव का हर किस्सा, मेरे जमाने का ही नहीं उनके ज़माने का,

यानी उनकी गाँव के रिश्ते की ननदें, मेरी बुआ सास, उनकी जेठानिया, मेरी चचिया सास सब, लेकिन ज्यादातर उनकी ननदों का और एक से एक हॉट किस्से, और गाँव के मर्दो के भी

एक दिन मैंने उन्हें ककोल्ड टाइप कोई बात बतायी, कुछ मरद होते हैं की उनके सामने कोई दूसरा मरद उनकी औरत पे चढ़े तो उन्हें अच्छा लगता है, कई तो अपने हाथ से पकड़ के अपनी मेहरारू की बिल में

मेरी सास हँसते हुए लहालोट, मुझे दबोच के कस के चूमते हुए बोलीं

" अरे तुम तो पढ़ी लिखी, पढ़ी बात कह रही हो, मैं तो आँखों देखी, तुम भी उनको देखी हो मिली हो और जो अपने मरद के सामने दूसरे मर्द के बीज से जुड़वाँ तोहार ननद है उनहू से, "

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और जब उन्होंने नाम बताया तो मेरे तो पैरों से जमीन निकल गयी, दोनों जुड़वा बहने मेरी मंझली की उम्र की, इस साल दोनों का दसवा था

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हम सब भौजाइयां उन दोनों को छुई मुई कहते थे, लजाती इतनी थीं और गुदगुदी भी दोनों को खूब लगती थी, वैसे तो कहीं शहर में , लखनऊ, इलाहाबाद कही, लेकिन दोनों अपने ननिहाल गर्मी की छुट्टी में महीने भर और जाड़े में भी दस पंद्रह दिन, तो सबसे खूब घुली मिली और उसके अलावा, शादी बियाह तीज त्यौहार,

और गाँव हो या शहर, ननदें जितनी छिड़ती हैं, लजाती हैं मजाक से उछलती है भौजाइयां उतनी ही ज्यादा और गाँव में तो और ज्यादा खुल के ही

कोई नाउन कहारीन उन दोनों को देख के चिढ़ा के गाना शुरू कर देती है

" बिन्नो तेरी अरे बिन्नो तेरी भो, बिन्नो तेरी भो, "

और वो दोनों चिढ के अपनी माँ से शिकायत करतीं, ' मम्मी देखिये भौजी छेड़ रही हैं "

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तो कोई भौजाई और आग लगाती , " तो तुम दोनों को मालूम है क्या, भो से क्या, "

और वो कहारिन छेड़ती " अरे अभी से भोंसड़ा हो गया है क्या, जो भो से,... और फिर गाना पूरा कराती

" बिन्नो तेरी भोली सुरतिया, बिन्नो तेरी बू , बिन्नो तेरी बु "

एक बार मैं और पीछे पड़ गयी, मैंने गुलबिया के इशारा किया और उसने फ्राक उठा दी और मैंने चड्ढी पकड़ के, सर सररर , नीचे और गुलाबी दरवाजा दिख गया '

" अरे झूठे तुम लोग भोंसड़ा कह रही थी देख अभी तो झांटे भी ठीक से नहीं आयी हैं " दोनों को चिढ़ाते मैं बोली। ननद तो ननद। ननद की उम्र थोड़े ही देखि जाती है

अगले दिन दोनों शलवार पहन के आयीं तो बस एक भौजाई ने एक हाथ पकड़ा और दूसरे ने दूसरा और आराम से मैंने धीरे धीरे शलवार का नाडा खोल दिया।

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वो बेचारी अपनी माँ से शिकायत करतीं लेकिन हम सब की बुआ सास, उलटे हम सब का साथ देतीं, बोलतीं

" अरे तुम सब क भौजाई बहुत सोझ हैं, हम लोगन क भौजाई तो दो दो ऊँगली एक साथ सीधे अंदर तक डाल के हाल चाल लेती थीं, मलाई चेक करती थीं। तुम सब क भाई रोज तोहरे भौजाई क नाड़ा खोलते हैं,... तो उन सब का भी तो हक़ है "

और रतजगे में हम सब की सास लोग बुआ की खूब, सब से पहले उन्ही का पेटीकोट खुलता था।

लेकिन वो खूब हंसमुख, खुल के मजाक वाली, तो मेरी सास ने उन के कुंवारेपन से लेकर कैसे उनके मरद को दूसरे को उनके ऊपर चढ़ाने का

.....सुनाऊँगी, वो सब किस्सा भी सुनाऊँगी और मेरी सास ने न सिर्फ अपनी ननदों का बल्कि गाँव के मर्दो का भी

एक दिन मैंने उनसे सुगना के ससुर का , हम दोनों सब्जी काट रहे थे, तो एक एक किस्सा और तभी ग्वालिन चाची आ गयीं और गुलबिया की सास तो और, सुगना के ससुर सूरजबली सिंह का जिससे, इमरतिया, उस का भी पूरा किस्सा

तो गाँव के एक एक मरद का, ....पठान टोली के सैय्यद लोगो का भी

मेरी सास के साथ एक बहुत अच्छी बात थी, कोई टोला हो कोई पुरवा, कोई बिरादरी, बरात बिदा करनी हो, दुल्हिन उतारनी हो या बेटी क बिदाई , वो सबसे आगे, और अब उनके साथ मैं भी। भले मैं साल भर पहले की ही गौने की उतरी लेकिन हर जगह, सुख दुःख में सास के साथ मैं भी

और सास की सहेलियां थीं, ग्वालिन चाची, गुलबिया क सास, बड़की नाउन, हों या पंडाइन चची सब पुरवा में , सब से मेरी भी तो सास के सामने वो लोग खुल के बात करतीं, और मुझे भी गाँव भर के मर्दो का औरतों का हाल और पांच दिन में बहुत कुछ पता चला

तो पांच दिन के बाद मेरे सास का बेटा आया और फिर,....

बताउंगी, वो सब किस्सा भी

लेकिन उसके पहले दो बातें एक तो अब तक कहानी काफी कुछ क्रमानुसार चल रही थी एक एक दिन की हाल चाल जैसी लेकिन अब एक प्रकरण शुरू करुँगी तो उसके कुछ हिस्से मेरे गाँव में आने के पहले के होंगे तो कुछ बाद के लेकिन वो सब एक साथ ही और एक किस्सा ख़त्म होने के बाद दूसरा और छुटकी वाला सबसे बाद में जब वो बैंगलोर से लौट आएगी तो

और दूसरी बात

अगला किस्सा होगा सुगना और उनके ससुर का,

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कुछ झलक तो पहले मिल गयी थी बस बात वहीँ से शुरू करुँगी
 
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