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- Dec 5, 2013
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सूरजबली सिंह
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बाबू सूरजबली सिंह, सुगना के ससुर,... एकदम लहीम सहिम, जबरदस्त मर्द उमर तो पचास नहीं तो पचास के आस पास, पहुँच गयी थी लेकिन ताकत में जवान मात,.. बड़की नाउन और ग्वालिन चाची दोनों बोल रही थीं, ...जब पांच हाथ की लाठी लेकर निकलते तो धरती कांपती
सुगना की सास सुगना के गौने उतरने के कई साल पहले ही ऊपर चली गयी थी,..
लेकिन बाबू साहेब का नागा नहीं होता था, ... खेत बाड़ी, पुरानी जमींदारी,...
अरे गुलबिया की चचिया सास ,.. उनके घर की नाउन, कभी तेल लगाने तो कभी गोड़ मींजने, इमरती नाम था,... और सब को मालूम था था की तेल कहाँ कहाँ लगता था,...
और वो मुंह खोल के बताती भी थी, एक दिन में मेरी सास ने मजाक में मेरे सामने पूछ भी लिया हँसते हुए ."ओह बड़का औजार में तेल आज कल लगता है की नहीं, केतना बड़ा है,..."
तो जिस तरह बित्ता फैला के इमरतिया बोली की मेरा और मेरी सास दोनों का मुंह खुला रहा गया. और साथ में हंस के साफ़ भी कर दिया." अरे मोटा कड़ियल काला नाग है,... सब बिल के बस का नहीं है।"
यह किस्सा सुगना का है, लेकिन थोड़ा बहुत उनके ससुर का भी है, सूरजबली सिंह का भी। तो कुछ उनके बारे में,... लेकिन ये सब बातें सुनी सुनाई हैं
लेकिन कई मुंह से तो सच ही जान पड़ती हैं और ज्यादातर उनसे बड़ी,.... उम्र में भी रिश्ते में भी उनकी भौजाइयों ने,
मेरी पश्चिम पट्टी की अजिया ( दादी ) सास ने, उमर में ७० पार कर रही होंगी, लेकिन गाँव के हर रतजगे में, गवनही में मौजूद, उन्होंने ने बहुत कुछ बताया सूरज बली सिंह के बारे में, उनकी माई के बारे में और भी सब औरतों के बीच वाली बातें, ....बताउंगी, सब बताउंगी
मेरी मुंहदिखाई में जो इनकी सास दी थीं, वो पांच तोले की नथ उतार के दे दी थी,
' बहुत पतोह उतारे, आपन भी, पोतों क भी लेकिन अइसन चाँद आज तक यह गाँव में न उतरा, अऊर अइसन सुलच्छिनी, गांव क भाग जग गया' ,
गौने के तीसरे दिन हमार सास गाने का प्रोग्राम रखी थी, और आजी ( मैं क्या सब उन्हें आजी ही कहते थे, और मेरा सर दुलार से अपने गोद में रखती थीं वो ) ने मुझे चढ़ा के अपनी सब पतोहों को, ( मतलब जो मेरी सास लगती थीं )
सब से पहले मैंने अपनी सास को फिर गाँव की सब सास को बारी बारी से, ....एकदम अच्छी वाली गारी दिलवाई, क्या क्या न चढ़वाया मैंने अपनी सास लोगों के ऊपर , और मेरी अजिया सास, बल्कि आजी एक एक को इशारा करके " अरे वो लाल साड़ी वाली रमुआ क माई बची हो अभी '
मेरे चाचा मामा से शुरू होक्के, गदहा घोडा तक,... और आजी इतना खुश की सब कड़ा छडा अपने गोड़ का, और तब से जैसे दादी पोती की दोस्ती होती है वैसे वाली दोस्ती हो गयी।
तो उन आजी ने गाँव की कोई लड़की, औरत नहीं होगी जिसका पेटीकोट मेरे सामने न उघारा हो, किसका नाडा किस हरवाह में सबसे पहले खोला, कौन बहुरिया जिसका मरद कलकत्ता गया था, भैसं दुहने वाले से दुहाती थी, कितनी अपनी भाइयों से फंसी थीं, सगी नहीं तो चचेरे, ममेरे फुफेरे, और सिर्फ मेरी पीढ़ी की नहीं, मेरी सास की ननदें, जेठानियाँ, देवरानियां, सब का किस्सा और सबसे ज्यादा सूरजबली सिंह का, उनकी शादी के पहले से लेकर, और उनकी माई का भी, गाँव भी कुछ भी तोपा ढांका नहीं था उनसे, मैं अक्सर दुपहरिया में उनके पास, कभी उनका बाल संवारती, सर में तेल लगाती और वो किस्से,
तो बहुत कुछ जो मैं सुनाऊँगी वो उनसे सुना और गुलबिया की सास से
और सिर्फ बबुआन में ही नहीं, पठान टोले में भी और खाली हिना के घर से नहीं, पूरे सैयदाने से,
हिना की अम्मा, बड़की सैय्यदायिन तो सूरजबली सिंह की असली भौजी थी,
बिना होली में सुगना के ससुर को रगड़े, जिस दिन से गौने में आयी थीं, उस साल से ही, उमर में उनसे बराबर ही होंगे या साल दो साल छोटे
लेकिन बड़े सैय्यद, हिना के बाबू गाँव में कोई अगर उनसे बोल पाता था तो सूरजबली सिंह ही ,यहाँ अगर हिना की माँ को भी अपने पति से कुछ मांगना हो, कहना हो तो अपने देवर सूरजु का ही सहारा लेती। सगा भाई झूठ, सूरज बली सिंह इतनी इज्जत करते थे बड़े सैय्यद की और हिना के बाबू भी, कभी भी उन्होंने अपने सुरजू की बात नहीं टाली।
एक बार की बात, खुद हिना की अम्मा ने बताई,
सूरज बली सिंह की लाठी, खाली गाँव में नहीं पचास साठ गाँव में मशहूर थी।
बचपन ही अखाडा, डंड लगाना, हर नागपंचमी में कोई दंगल बचता नहीं था, जो वो जीत के न आते हों, दोनों हाथ से एक साथ चालीस चालीस सेर की गदा उठाते थे, और लाठी उन्होंने सिखाई भी थी, कुछ भरौटी, कुछ अहिरौटी, दो चार पासी, दर्जन भर से ऊपर लठैतों को उन्होंने गंडा बाँधा था, लेकिन शर्त दो ही थी, लाठी कभी गरीब के ऊपर नहीं उठनी चाहिए , हरदम गरीब के लिए उठनी चाहिए और कदम कभी पीछे नहीं हटेंगे।
हिना की माँ ने ही बताया, एक बार कुछ दंगा फसाद की खबर आयी, बगल के गाँव से, थानेदार ने खबर भी करवाई, सावधान रहने के लिए, बड़े सैयद की तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए पड़ोस के गाँव वाले हिम्मत कर रहे थे , लेकिन तब भी बड़े सैय्यद ने हिम्मत की।
पर सुरजू आ गए आगे ( हिना की माँ की आँखे भर गयीं )
" भैय्या, छोट भाई के रहते, बड़ा भाई घर से बाहर पैर निकाले, हमार कसम " और सूरज बली सिंह की लाठी ऐसा चक्कर घुमाते की आठ दस लठैत तो आस पास भी नहीं फटक पाते।
आये सब , तलवार, एक दो के पास बन्दूक भी, पचासों की भीड़, नारे, हंगामा, लेकिन सूरजबली सिंह और उनके लठैत को देख के ठिठक गए।
उधर से कोई लठैत बोला, " बाबू साहेब आप हट जाइये, आप से कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन आज पठान टोला फूंका जाएगा, बहुत दिन का बदला लेना है, आप का पता नहीं फलाने शहर में का हुआ "
सूरज बली सिंह लाठी जमीन पर टिका के खड़े हो गए, लहीम सहीम शरीर, ६ फुट से ज्यादा, तेल से पुता, अंगद का पाँव, और उनसे भी एक हाथ बड़ी लाठी,
" जउन अपनी महतारी क दूध पिए हो आये आगे, ....अरे अखाड़ा में गुरु यही सिखाये थे की लाठी किस पे उठनी चाहिए , जउन शहर क बात कर रहे हो, जाके वहां लड़ो,..... हमरे बाइस पुरवा में घुसे भी तो, ....पठान टोला भी बाइस पुरवा में है , खाली हमार पैर हिला दो "
जैसे बात फैली, की बाबू सूरजबली सिंह निकल आये हैं बस पूरे बाइस पुरवा क कोई टोला नहीं बचा, जहाँ से चींटी की तरह भरभरा के,अहिरौटी, भरौटी, पसियाने से तो एक एक घर से चार चार पांच लाठी, सब सूरजु सिंह के सिखाये,
दंगा वाले चक्कर काटते रहे, लेकिन सिवान डाँकने की हिम्मत नहीं पड़ी, और तब से आज तक आस पास के शहर में कसबे में कितनी बार, कितने घर परिवार तो छोड़ के कहाँ कहाँ, मऊ, मुबारकपुर चले गए,..... लेकिन पठानटोला उसी तरह बाईसपुरवा में
,एक बार जब बड़े सैय्यद नहीं थे, हिना की अम्मा ने बस कह दिया उनसे एह बार मोहरम क अलम, हर बार बड़े सैयद ही
" अरे भौजी तोहार देवर खाली होली के लिए," हंस के वो बोले और उस साल अलम बाबू साहेब के हाथ में था।
इसलिए पूरे गाँव में दुःख था जब सूरजबली सिंह की तबियत खराब हुयी और कोई इलाज नहीं हो पा रहा था, डागदर हकीम सब जवाब दे दिए थे
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फुलवा क माई बोली की वो जब गौने उतरी तो बाबू साहेब क बियाह हो गया था , लेकिन उसकी सास बताती थीं।
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बाबू सूरजबली सिंह, सुगना के ससुर,... एकदम लहीम सहिम, जबरदस्त मर्द उमर तो पचास नहीं तो पचास के आस पास, पहुँच गयी थी लेकिन ताकत में जवान मात,.. बड़की नाउन और ग्वालिन चाची दोनों बोल रही थीं, ...जब पांच हाथ की लाठी लेकर निकलते तो धरती कांपती
सुगना की सास सुगना के गौने उतरने के कई साल पहले ही ऊपर चली गयी थी,..
लेकिन बाबू साहेब का नागा नहीं होता था, ... खेत बाड़ी, पुरानी जमींदारी,...
अरे गुलबिया की चचिया सास ,.. उनके घर की नाउन, कभी तेल लगाने तो कभी गोड़ मींजने, इमरती नाम था,... और सब को मालूम था था की तेल कहाँ कहाँ लगता था,...
और वो मुंह खोल के बताती भी थी, एक दिन में मेरी सास ने मजाक में मेरे सामने पूछ भी लिया हँसते हुए ."ओह बड़का औजार में तेल आज कल लगता है की नहीं, केतना बड़ा है,..."
तो जिस तरह बित्ता फैला के इमरतिया बोली की मेरा और मेरी सास दोनों का मुंह खुला रहा गया. और साथ में हंस के साफ़ भी कर दिया." अरे मोटा कड़ियल काला नाग है,... सब बिल के बस का नहीं है।"
यह किस्सा सुगना का है, लेकिन थोड़ा बहुत उनके ससुर का भी है, सूरजबली सिंह का भी। तो कुछ उनके बारे में,... लेकिन ये सब बातें सुनी सुनाई हैं
लेकिन कई मुंह से तो सच ही जान पड़ती हैं और ज्यादातर उनसे बड़ी,.... उम्र में भी रिश्ते में भी उनकी भौजाइयों ने,
मेरी पश्चिम पट्टी की अजिया ( दादी ) सास ने, उमर में ७० पार कर रही होंगी, लेकिन गाँव के हर रतजगे में, गवनही में मौजूद, उन्होंने ने बहुत कुछ बताया सूरज बली सिंह के बारे में, उनकी माई के बारे में और भी सब औरतों के बीच वाली बातें, ....बताउंगी, सब बताउंगी
मेरी मुंहदिखाई में जो इनकी सास दी थीं, वो पांच तोले की नथ उतार के दे दी थी,
' बहुत पतोह उतारे, आपन भी, पोतों क भी लेकिन अइसन चाँद आज तक यह गाँव में न उतरा, अऊर अइसन सुलच्छिनी, गांव क भाग जग गया' ,
गौने के तीसरे दिन हमार सास गाने का प्रोग्राम रखी थी, और आजी ( मैं क्या सब उन्हें आजी ही कहते थे, और मेरा सर दुलार से अपने गोद में रखती थीं वो ) ने मुझे चढ़ा के अपनी सब पतोहों को, ( मतलब जो मेरी सास लगती थीं )
सब से पहले मैंने अपनी सास को फिर गाँव की सब सास को बारी बारी से, ....एकदम अच्छी वाली गारी दिलवाई, क्या क्या न चढ़वाया मैंने अपनी सास लोगों के ऊपर , और मेरी अजिया सास, बल्कि आजी एक एक को इशारा करके " अरे वो लाल साड़ी वाली रमुआ क माई बची हो अभी '
मेरे चाचा मामा से शुरू होक्के, गदहा घोडा तक,... और आजी इतना खुश की सब कड़ा छडा अपने गोड़ का, और तब से जैसे दादी पोती की दोस्ती होती है वैसे वाली दोस्ती हो गयी।
तो उन आजी ने गाँव की कोई लड़की, औरत नहीं होगी जिसका पेटीकोट मेरे सामने न उघारा हो, किसका नाडा किस हरवाह में सबसे पहले खोला, कौन बहुरिया जिसका मरद कलकत्ता गया था, भैसं दुहने वाले से दुहाती थी, कितनी अपनी भाइयों से फंसी थीं, सगी नहीं तो चचेरे, ममेरे फुफेरे, और सिर्फ मेरी पीढ़ी की नहीं, मेरी सास की ननदें, जेठानियाँ, देवरानियां, सब का किस्सा और सबसे ज्यादा सूरजबली सिंह का, उनकी शादी के पहले से लेकर, और उनकी माई का भी, गाँव भी कुछ भी तोपा ढांका नहीं था उनसे, मैं अक्सर दुपहरिया में उनके पास, कभी उनका बाल संवारती, सर में तेल लगाती और वो किस्से,
तो बहुत कुछ जो मैं सुनाऊँगी वो उनसे सुना और गुलबिया की सास से
और सिर्फ बबुआन में ही नहीं, पठान टोले में भी और खाली हिना के घर से नहीं, पूरे सैयदाने से,
हिना की अम्मा, बड़की सैय्यदायिन तो सूरजबली सिंह की असली भौजी थी,
बिना होली में सुगना के ससुर को रगड़े, जिस दिन से गौने में आयी थीं, उस साल से ही, उमर में उनसे बराबर ही होंगे या साल दो साल छोटे
लेकिन बड़े सैय्यद, हिना के बाबू गाँव में कोई अगर उनसे बोल पाता था तो सूरजबली सिंह ही ,यहाँ अगर हिना की माँ को भी अपने पति से कुछ मांगना हो, कहना हो तो अपने देवर सूरजु का ही सहारा लेती। सगा भाई झूठ, सूरज बली सिंह इतनी इज्जत करते थे बड़े सैय्यद की और हिना के बाबू भी, कभी भी उन्होंने अपने सुरजू की बात नहीं टाली।
एक बार की बात, खुद हिना की अम्मा ने बताई,
सूरज बली सिंह की लाठी, खाली गाँव में नहीं पचास साठ गाँव में मशहूर थी।
बचपन ही अखाडा, डंड लगाना, हर नागपंचमी में कोई दंगल बचता नहीं था, जो वो जीत के न आते हों, दोनों हाथ से एक साथ चालीस चालीस सेर की गदा उठाते थे, और लाठी उन्होंने सिखाई भी थी, कुछ भरौटी, कुछ अहिरौटी, दो चार पासी, दर्जन भर से ऊपर लठैतों को उन्होंने गंडा बाँधा था, लेकिन शर्त दो ही थी, लाठी कभी गरीब के ऊपर नहीं उठनी चाहिए , हरदम गरीब के लिए उठनी चाहिए और कदम कभी पीछे नहीं हटेंगे।
हिना की माँ ने ही बताया, एक बार कुछ दंगा फसाद की खबर आयी, बगल के गाँव से, थानेदार ने खबर भी करवाई, सावधान रहने के लिए, बड़े सैयद की तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए पड़ोस के गाँव वाले हिम्मत कर रहे थे , लेकिन तब भी बड़े सैय्यद ने हिम्मत की।
पर सुरजू आ गए आगे ( हिना की माँ की आँखे भर गयीं )
" भैय्या, छोट भाई के रहते, बड़ा भाई घर से बाहर पैर निकाले, हमार कसम " और सूरज बली सिंह की लाठी ऐसा चक्कर घुमाते की आठ दस लठैत तो आस पास भी नहीं फटक पाते।
आये सब , तलवार, एक दो के पास बन्दूक भी, पचासों की भीड़, नारे, हंगामा, लेकिन सूरजबली सिंह और उनके लठैत को देख के ठिठक गए।
उधर से कोई लठैत बोला, " बाबू साहेब आप हट जाइये, आप से कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन आज पठान टोला फूंका जाएगा, बहुत दिन का बदला लेना है, आप का पता नहीं फलाने शहर में का हुआ "
सूरज बली सिंह लाठी जमीन पर टिका के खड़े हो गए, लहीम सहीम शरीर, ६ फुट से ज्यादा, तेल से पुता, अंगद का पाँव, और उनसे भी एक हाथ बड़ी लाठी,
" जउन अपनी महतारी क दूध पिए हो आये आगे, ....अरे अखाड़ा में गुरु यही सिखाये थे की लाठी किस पे उठनी चाहिए , जउन शहर क बात कर रहे हो, जाके वहां लड़ो,..... हमरे बाइस पुरवा में घुसे भी तो, ....पठान टोला भी बाइस पुरवा में है , खाली हमार पैर हिला दो "
जैसे बात फैली, की बाबू सूरजबली सिंह निकल आये हैं बस पूरे बाइस पुरवा क कोई टोला नहीं बचा, जहाँ से चींटी की तरह भरभरा के,अहिरौटी, भरौटी, पसियाने से तो एक एक घर से चार चार पांच लाठी, सब सूरजु सिंह के सिखाये,
दंगा वाले चक्कर काटते रहे, लेकिन सिवान डाँकने की हिम्मत नहीं पड़ी, और तब से आज तक आस पास के शहर में कसबे में कितनी बार, कितने घर परिवार तो छोड़ के कहाँ कहाँ, मऊ, मुबारकपुर चले गए,..... लेकिन पठानटोला उसी तरह बाईसपुरवा में
,एक बार जब बड़े सैय्यद नहीं थे, हिना की अम्मा ने बस कह दिया उनसे एह बार मोहरम क अलम, हर बार बड़े सैयद ही
" अरे भौजी तोहार देवर खाली होली के लिए," हंस के वो बोले और उस साल अलम बाबू साहेब के हाथ में था।
इसलिए पूरे गाँव में दुःख था जब सूरजबली सिंह की तबियत खराब हुयी और कोई इलाज नहीं हो पा रहा था, डागदर हकीम सब जवाब दे दिए थे
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फुलवा क माई बोली की वो जब गौने उतरी तो बाबू साहेब क बियाह हो गया था , लेकिन उसकी सास बताती थीं।