चंदरवा

अब सास खुश और एक बार फिर से मेरी बुर की चुसाई में लग गयी लेकिन थोड़ी देर में पूछी और बिटटुवा के बाद कौन हमरी बहुरिया चोदा ?
-- " असल में, ...आपकी बहुरिया को बड़ी जोर से मूतवास लगी थी, "....मैंने सास के सवाल का जवाब दिया, और सास ने भी मेरी बात में हामी भरी
" सही कह रही हो, जब रगड़ के चुदाई होती है न ओकरे बाद मूतवास लगती है लेकिन मूत लेना चाहिए तुरंत नहीं तो तो दुबारा चुदवाने में मजा नहीं आता "
" वही तो और आस पास बगिया में कउनो जगह नहीं थी, आम क बगिया में जहाँ देखो तहँ कउनो ननद निहुरी, कउनो टांग उठाये अपने भैया से चुदवाय रही थी तो थोड़ा और निकल के जहाँ खूब गझिन, पाकुड़ महुआ, बरगद और खूब झाड़ झंखाड़ है वहीँ, ... वहां कोई नहीं था तो वहीँ बैठ के ,... बड़ी जोर से मुतवास लगी थी,.... खूब देर तक,... छुलछुल छुलछुल,... फिर जब उठी तो आराम मिला, फिर जब दस कदम ही चली थी की बरगद के पेड़ के पास एक लौंडा खड़ा मूत रहा था आपन पकडे, ... पीछे से पहचान तो नहीं पायी, लेकिन खूब कसरती देह चौड़ा कन्धा पतली कमर और पीठ के मांस तो एकदम टाइट और वही हालत चूतड़ के, मन तो किया पकड़ के सहला दूँ लेकिन,;;;
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पर बात बीच में सास ने काट दी,
"पतली कमर, टाइट चूतड़ और पीठ जैसे बता रही हो, मतलब बहुत जांगर होगा उसमे, और बहुत ताकत होगी उसके धक्के में" ,
और मैंने अपनी बात जारी रखी,...
" मैं एकदम दबे पांव उसके पीछे गयी और कस के पीछे से दबोच लिया, साडी मेरी वैसे ही छल्ले की तरह खाली कमर में लिपटी, अपने जोबन क बरछी उसके पीठ में रगड़ते एकदम चिपक के मैंने देखा, ... चेहरा तो अभी भी नहीं दिखा था लेकिन उसकी देह देख के,... मेरी देह में फिर से अगन लग गयी थी, ये दिख रहा था की स्साला अपना खूंटा बाएं हाथ से पकड़े, मूत रहा था,... और ऐसे पकडे था जैसे मुठिया रहा हो, बस जैसे मैंने उसकी बहिनिया को लेके एक जब्बर गारी दी, खूब मोटा तगड़ा खूंटा था,..
" साले बहिन क नाम लेके मुट्ठ मार रहे हो यहां, ... "

उसी समय वो मुड़ा और उसका चेहरा देख के मैं पहचान गयी चन्दरवा है, और मैंने फिर बहिनिया को लेके उसको गरियाया,
" ई धक्का बहिनिया के बुर में पेलते तो,... " लेकिन बात पूरी नहीं हुयी की मैं समझ गयी गलती हो गयी, उसका चेहरा मुरझा गया था और खूंटा भी ,
अब सास ने मामला साफ़ किया
" हाँ ओकर बड़की बहिनिया सुनितवा, मेला में कउनो चुड़िहारे के साथ भाग गयी थी दो चार साल पहले, अरे तर ऊपर की तो नहीं थी लेकिन चदंरवा से दो तीन साल ही बड़ी थी। लेकिन कुछ दोस तो चंदरवा का भी तो था, साल भर से ऊपर से छनछनाती फिरती थी, और घर में रोज,...
ओकर महतारी सुनितावा के चाचा से, फूफा से,... किससे नहीं फंसी थी। सुनितवा क बाबू तो सूरत गए थे कमाने वही दिवाली छठ पे आते थे हफता भर के लिए। सुनितवा क महतारी क यारन से चुदवावे से फुरसत नहीं, पता नहीं था की घर में लड़की जवान हो रही है सब देख रही है, ओकरे भी बिल में आग फूट रही है। अरे तुहि बतावा अगर बछिया सांड़ के लिए हुड़क रही है , दो दिन चार दिन दस दिन, कउनो इंतजाम नहीं होगा तो का होगा "

सास ने बात मेरी ओर ठेल दी,
" खूंटा तोड़ाय देगी और का " हँसते हुए मैं बोली लेकिन चंदर वाला मामला अभी मुझे साफ़ नहीं हो रहा था मैंने सास से पूछ लिया लेकिन चंदरवा,
" अरे बुरबक ससुर, घरे में माल, बहिन गरमाय के सिवान, खेताड़ी क चक्कर काट रही है और वो,... असल में चंदरवा बचपन से ही अखाड़े और दंगल के , ... पहले १०० दंड लगाता था फिर कोई बोला नहीं २००,... तो बस दंड पेलने के चक्कर में,... देह तो खूब बनाया था,... माना सुनितवा उससे दो तीन साल बड़ी थी तो का हुआ, ... " सास बोलीं
और मैंने भी बात जोड़ी,...
" एकदम अरे आज बिट्टू लीना की झिल्ली फाड़ा की नहीं, पूरे आठ साल बड़ा है , तो बड़ा भाई छोटी बहन की ले सकता है बुर फाड़ सकता है तो छोटा भाई काहें नहीं चोद सकता, ...वो स्साला बुरबक रह गया दंड पेलने में,... उसकी बहिनी को कोई और लंड पेल दिया , "

" एकदम यही बात, एकदम सही सोचती हो बहू तुम। और जो सुनीता मेले में सहेलियों के साथ गयी,... तो एक चुड़िहार ताक में था ही , चूड़ी पहनाने के बहाने हाथ पकड़ा , बांह सहराई, जोबन दबाया, फिर एक दिन खेत में ले जाके पेल दिया। और तुम तो जानती हो गरमाई लौंडिया को एक बार लंड का स्वाद लग जाये बस ,
.... रात दिन घर में महतारी को कभी चाचा से कभी फूफा से कभी मौसा से चुदवाती देख रही थी तो और,... फिर तो चूड़िहरवा को मुफ़्त का जवान होता माल मिल गया, कभी दो बार कभी तीन बार कभी रात में लौटती भी नहीं थी, तो बस मेला खतम हुआ और वो भी चुड़िहारे के साथ,...
फिर कहाँ पता चलता है, किसी से फंसी हो , पेलवा रही हो तो चलता है लेकिन किसी के साथ भाग गयी तो,... बाद में चंदरवा को भी लगा की उसकी बहिन कितनी बार उसको इशारा की , कई बार खुल के भी, लेकिन वो दंड पेलने के चक्कर में,... लेकिन ये बताओ बहू की चंदरवा उदास हो गया तो तू का की? "
और मैंने हाल खुलासा बयान किया।
मुझे भी लगा बड़ी गलती हो गयी, सुनीता का किस्सा तो मुझे भी मालूम ही था, लेकिन मुंह से ंनिकली बात और लंड से निकला बीज वापस तो हो नहीं सकता।
बस पीछे से ही पकड़ के मैंने कस के एक चुम्मा चंदर के होंठ पे ले लिया और बैठ के उसका और जैसे उसका लंड पकड़ के होंठों के पास ले गयी चंदरवा बिचक गया,
" अरे भौजी, अभी तो,... "
सच में धार अभी पूरी तरह रुकी नहीं थी,... लेकिन मैंने उसकी आँखों में आँखे डालकर, जोर से गरियाया,
" स्साले गांडू, तेरी महतारी की गाँड़ अपने मायके के गदहों से मरवाऊँ, ये मोट बांस अस लौंड़ा केकर हौ, तोहार की तोहरे भौजी क ? "

" भौजी क, भौजी तोहार " मुश्किल से वो बोल पाया।
बस जीभ निकाल के जीभ की टिप से उसका छेद जहाँ पल भर पहले,... मैंने जोर से चाट लिया और वो गनगना गया। चेहरे पर मस्ती छा गयी थी।

जीभ मेरी सुपाडे के छेद को छेड़ रही थी, लेकिन आंखे उसकी आँखों को ललचा रही थीं और मेरे दोनों खुले जोबन उसे और उकसा रहे थे।
मैंने होंठों को जोड़ के एक कुप्पी सी बनाई और सुपाड़े के उस छेद के ऊपर रखकर पहले तो कुछ देर चुसूर चुसूर चूसा फिर जीभ की टिप से जैसे सुपाडे को जीभ से चोद रही होंऊ।
जैसे बिजली की बटन दबाने से पंखा चलने लगता है, बल्ब जलने लगता है बस वही असर हुआ चंदरवा के खूंटे पर। खड़ाक, एकदम खट्ट से खड़ा हो गया।
फिर क्या था मैंने डबल अटैक कर दिया, ... मेरे मन में भी लग रहा था उसे बहन का नाम लेके नहीं बोलना चाहिए था पर अब जो कर सकती थी वो कर रही थी।
बाएं हाथ से लंड के बेस पे पकड़ के, बहुत मोटा था। सिर्फ अंगूठे और तर्जनी से बेस को दबा रही थी और अब पूरा सुपाड़ा मेरे मुंह में गप्प हो गया था और जैसे स्कूल की लड़कियां बर्फ के गोले को ले कर जोर जोर से चुस्से मारती हैं मैं भी उसी तरह,

चंदरवा पर मस्ती चढ़ रही थी, लंड एकदम लोहे का रॉड हो रहा था,
लेकिन मेरी बदमाशियां अभी शुरू ही हुयी थीं, हाथ से लेकर अब मैं उसके दोनों रसगुल्लों को कभी सहलाती, कभी तौलती तो कभी हलके से दबा देती तो कभी नाख़ून से बॉल्स और गाँड़ के बीच की जगह खुरच देती, लेकिन देवर मेरा भी तो मरद था . उसने कस के मेरा सर दबाया और बांस उसका धीरे धीरे मेरे मुंह के अंदर, ठेलने लगा,
मैंने कस के अपने गुलाबी रसभरे होंठों से लंड दबोच रखा था, जब चमड़ी होंठों को रगड़ते जाती इत्ता अच्छा लग रहा था, मेरी जीभ खूंटे के नीचे से चाट रही थी और कस कस के मैं चूस रही थी, वो पूरी ताकत से पेल रहा था, ठेल रहा था, और मैं घोंट रही थी,

एकदम हलक तक चंदरवा ने पेल दिया। आँखे उबली पड़ रही थीं, गाल फूले हुए थे थके फटे पड़ रहे थे लेकिन मैं पूरी ताकत से चूस रही थी, जीभ उसके सुपाड़े पे रगड़ रही थी। कुछ देर बाद जब चन्दर ने बाहर मूसल निकाला तो मैंने उसे जाने नहीं दिया हाथ से पकड़ लिया और साइड से चाटने लगी।
सपड़ सपड़ सपड़ सपड़
" भौजी, ओह्ह, उफ्फ्फ, ओह्ह्ह " मस्ती से बार बार चन्दर की आँखे बंद हो रही थीं। और वो चौंक गया, वो सोच भी नहीं सकता था,
मैं उसके एक रसगुल्ले को लेकर चूस रही थी और हाथ से उसके तने खड़े पागल मूसल को मुठिया रही थी बहुत हलके हलके। मेरे थूक से लग लग के लंड गीला हो गया था। जीभ मेरी कभी दोनों रसगुल्ले पर तो कभी बॉल्स से लेकर बेस तक पर मेरी आँखे चुदवाने के लिए जगह ढूंढ रही थी लेकिन चारो ओर झाड़ झंखाड़ , और खूब गझिन पाकुड़, महुवा, बरगद के पेड़, ....
और मैंने स्टाइल बदल दी।
अब बजाय होंठ के मेरी चूँचिंया उसके लंड को चोदने लगीं, अब मैं उसके ऊपर चढ़ के चोदू इत्ती जगह तो थी नहीं तो बस चूँची चोदन, और जिस ललचायी नजर से वो मेरी चूँची देखे रहा था कुछ इनाम तो बनता था बेचारे को।
बहन भी नहीं थी उसके घर में।
दोनों हाथों से चूँची पकड़ के उसके लोहे के रॉड पर रगड़ रही थी, बहुत मजा आ रहा था , कभी अपने मोटे मोटे निपल से उसके पेशाब के छेद को चोद देती

तो कभी मेरी मोटी मोटी चूँची के बीच दबे कुचले रगड़े जा रहे चंदरवा के लंड के सुपाडे को कभी जीभ से चाट लेती तो कभी हलके से चूस लेती।
लेकिन चाहती तो मैं थी चुदवाना।
मेरी बुर मेरे होंठ और चूँची को गरिया रही थी की तुम दोनों मजा ले लिए और मैं ही प्यासी हूँ,
और वो भी चाहता था चोदना
मैंने हल्का सा इशारा ही किया बस बहुत जांगर था चंदरवा में। बस गोदी में उठाय के महुवा के पेड़ के सहारे खड़ा किया, खड़ा किया समझिये आधा हवा में और एक झटके में सुपाड़ा बिल में गच्चाक से अंदर, एक हाथ के सहारे हमारा चूतड़ पकड़ के टांग फैलाय के दूसरा धक्का अस करारा मारा की आधा बांस अंदर।
मैं कस के अपने उठे हुए पैर से चंदरवा का चूतड़ चाप के दाबे थी, अपनी ओर कस के भींच रही थी. मेरी उसकी लम्बाई करीब करीब बराबर थी , कुछ में उसे अपनी ओर खींच रही थी और कुछ वो ताकत से ठेल रहा था, चमड़ी से चमड़ी रगड़ते हुए, उसके चौड़े सीने से मेरी चूँची, जैसे चक्की गेंहू पीस पीस के पिसान कर देती है उसी तरह से, जब आधा से ज्यादा अड़स गया, तो वो रुक गया और हम दोनों चुदाई का मजा लेने लगे।

चुम्मा चाटी, उसके मुंह में मैंने जीभ डाल दी, और गोल गोल, ... मैं कभी अपनी चूत कस कस के उसके बांस पर सिकोड़ती, उसे दबोचती, लंड को निचोड़ती, और जब मैं रुक जाती तो वो हलके हलके धक्के
लेकिन थोड़ी देर में जब हम लोग सेट हो गए फिर जांगर दिखाया चन्दर ने और एक झटके में जैसे गोद में दोनों चूतड़ पकड़ के हवा में, मेरे दोनों पैर हवा में दोनों हाथों से चन्दर ने मेरे दोनों चूतड़ पकड़ के, का जबरदस्त धक्के खड़े खड़े मार रहा था और पूरा वजन भी सम्हाले था. हर धक्के में बच्चेदानी हिल रही थी. दूर दूर तक कोई नहीं था, खाली ऊँचे ऊँचे पेड़ पाकड़ के महुआ के, ननदों की चीख पुकार भी बहुत हलकी कभी किसी की गाँड़ फट रही हो, झिल्ली फटे उस समय भी बहुत हलकी सी चीख सुनाई देती थी वरना लग रहा था हम लोगों से एकदम अलग थलग चुदाई का मस्ती से मजा ले रहे थे,

दस मिनट तक मेरे दोनों चूतड़ अपने हाथ से पकडे, मेरी पूरी देह का वजन उसके ऊपर, और उसके लंड का जोर मेरे अंदर, कभी जोर जोर से पेलता, कभी दरेररता, लंड के बेस से बुर को रगड़ता, बदमाश इतना की जैसे उसे लगता मैं झड़ने के करीब हूँ कच कच्चा के कभी गाल काट लेता कभी चूँची पे दांत गड़ा देता, लेकिन थोड़ी देर में फिर उसने लंड एकदम बाहर निकाला और पलट के मुझे पेड़ के सहारे, अब मेरा मुंह पेड़ की ओर
--- और गाँड़ चंदरवा की ओर, वो पीछे से हमें दबोचे, मैं टांग भी खूब फैला ली और पीछे की ओर चूतड़ उचका के खड़े खड़े गप्प से उसका लंड घोंट ली। इतना मजा आया खड़े खड़े चुदवाने में, एक हाथ से हमारी कमर पकड़े थे दूसरे से चूतड़ पे, और दे धक्के पे धक्का,.. मजा तो हम दोनों का आ रहा था , लेकिन मैं जानती थी की मरद को असली मजा किस्मे आता है बस वही पाकड़ के पेड़ को पकड़ के थोड़ी देर बाद मैं निहुर गयी चूतड़ ऊपर