Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 89 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

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भाग ९५ - सास का पिछवाड़ा

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Erotica - फागुन के दिन चार

फागुन के दिन चार भाग २८ - आतंकी हमले की आशंका पृष्ठ ३३५अपडेट पोस्टेडपढ़िए आनंद लीजिये लाइक करें और कमेंट जरूर करें

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फागुन के दिन चार भाग २६ पूर्वांचल और,... पृष्ठ ३१८

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जोरू का गुलाम भाग २३७ - शेयर, म्युचुअल फंड और नयी क्राइसिस पृष्ठ १४२६



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भाग ९६

ननद की सास, और सास का प्लान

२२, ११,११९

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मैंने झट से उनके मुंह पे हाथ रख दिया, घर की बिटिया, कहीं मुंह से उलटा सीधा, अशकुन,... और सर सहलाती रही।

हम दोनों चुप चाप बैठे रहे, धीमे से मेरी ननद बोलीं

" हम सुने थे की मायका माई से होता है लेकिन हमार मायका तो भौजी से है "

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मुझे देख रही थीं और उनकी बड़ी बड़ी आँखे डबडबा रही थीं, मैंने चूम के उन पलकों को बंद कर दिया।

बोलना मैं भी बहुत कुछ चाहती थी बहुत कुछ वो भी,... पर कई बादल उमड़ घुमड़ के रह जाते हैं बिना बरसे,

तबतक मेरी सास की आवाज आई रसोई में से ननद को बुलाती, किसी काम में हेल्प के लिए। ननद रसोई में चली गयी और मैं भी निकली तो ननदोई जी के कमरे के बाहर

ननद अपनी माँ के पास रसोई में और मैं भी ,

तभी ननदोई जी के कमरे से फोन की आवाज आयी।नन्दोई जी और ननद की सास की बात, बात तो टेलीफोन पे हो रही थी, वही स्पीकर फोन आन था और दोनों ओर की बात सुनाई पड़ रही थी

मैं ठिठक गयी, कान पार के सुनने लगी।

मेरे पैरों के नीचे से जमीन सरक गयी। आँखों के आगे अँधेरा छा गया, किसी तरह दीवाल पकड़ के खड़ी हो गयी।

उधर से ननद की सास की चीखने, चिल्लाने की आवाज आ रही थी। मैं सुन सब रही थी, बस समझ नहीं पा रही थी, बार बार मेरे सामने मेरी ननद की सूरत आ रही थी। अभी पल भर पहले कितनी खुश आ रही थी और यहाँ उनकी सास, क्या क्या प्लान,

बेचारी मेरी ननद। \

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नन्दोई जी की एक अच्छी आदत थी, एक साथ कई काम करने की, फोन करते समय भी वो कुछ पढ़ते रहेंगे, किसी और काम भी और फोन स्पीकर फोन पे,

और इस समय भी फोन स्पीकरफोन पे था, और आवाज मेरे कमरे में भी आ रही थी। वैसे तो मैं ध्यान नहीं देती लेकिन ननद जी की सास की आवाज सुन के मैं दीवाल से चिपक गयी, ननद की सास थोड़े गुस्से में लग रही थी,

" कल क्यों नहीं आयी महरानी जी " सास उनकी गुस्से में बोल रही थीं।

" अरे कल उसके सर में दर्द बहुत था, मैं हस्पताल से आया तो हम लोग आ ही जाते, लेकिन, " नन्दोई जी बोलने की कोशिश कर रहते थे पर ननद की सास ने बात बीच में काट दी,

" सुख रोग लगा है महरानी को, भौजाई गोड़ दबा रही होगी, महतारी मूँड़, सब नौटंकी, आने दो आते ही, अब पूरे घर का काम, झाड़ू पोंछा, गोबर उठावे, कण्डा पाथे, जितने कामवाली हैं सबको आज ही से हटा देतीं हूँ,... जो काम बहू का है वो तो कर नहीं रही, वंश का चिराग देने का,... तो यही काम करें, कुल मूड़ पिराना ठीक हो जाएगा। "

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नन्दोई ने कोई जवाब नहीं दिया, सास ही उनकी फिर से बोलीं,

" तुम भी न उसको बहुत सर चढ़ाये रहते हो, एक तो गोर चमड़ी, और ऊपर से मुंह में शहद,अस मीठ बोली, ऐसा लुभाय हो और सीधे भी हो तुमको तो ऊँगली पे नचाती है लेकिन अब बोल दे रही हूँ, अब मैं कुछ बोलूंगी, कहूँगी, करुँगी, तो सोच लेना, माई की मेहरारू "

" नहीं नहीं माई, आप की बात हम जिन्नगी में कभी काटे की अबे, तोहार बात सबसे ऊपर वो तो हम हस्पताल में इतने दिन, वहां भी हमरे साले की वजह से इतना आराम हो गया, "

" तो कौन बड़ा काम हो गया " ननद की सास ने ऐसा जहर उगला की मुझे लगा की पिछले जन्म में पक्की नागिन रही होंगी,

" अरे ओकरे बहन की हम अपने घर लाये हैं दो जून की रोटी देते हैं, कपडा देते हैं, महरानी बन के रहती हैं ठाठ से, तो तानी हस्पताल में, ससुराल वालों का काम है, एक ठो दमाद है इतना भी नहीं करेंगे, और बिटिया भी कैसी दिए हैं ....किसी काम लायक नहीं, तीन साल हो गए ,..."

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सास ननद की, गुस्से के मारे बोल नहीं पा रही थीं, और नन्दोई की हिम्मत नहीं हो रही थी न वो फोन काट सकते थे।

फिर उनकी सास की ही आवाज आयी, गुस्से से फुफकार रही थी,

" पहले क ज़माना होता, तो झोंटा पकड़ के महतारी के सामने ओकरे पटक आती, और ओहि दिन दूसर ले आती,... सोना अस हमार लड़का, केतना लोग आपन आपन बिटिया ले के, दरवाजा खोद डारे थे, जउने दिन नयकी आती, ठीक नववें महीने पोता पोती निकाल देती, और का समझती हैं वो तो हम इतना तोपे ढांके,.... नहीं तो कुलच्छिनी बाँझिन को मायके में भी जगह नहीं मिलती, भौजाई, भौजाई इतना करती हैं वही भौजाई दुरदुरा के निकाल देखती, शक्ल देख के दरवाजा बंद कर लेती की कहीं बाँझिन क परछाई पड़े से, अरे एक गयी दूसरी आती, "

लेकिन अबकी नन्दोई जी से नहीं रहा गया,

" नहीं माई ये सब नहीं आज, कल के ज़माने में बड़ी " बड़ी मुश्किल से वो बोले।

लेकिन बेटे का बदला सुर देख माँ ने भी अपना सुर बदल दिया

" मैं जानती नहीं का, अब वो सब, अरे हमरे मायके के बगल में एक हमरे रिश्तेदार ही थे, नयी भी नहीं बियाहे के तीन साल बाद, रसोई में कुछ, साडी में उसके, लापरवाही वो की भुगती सास ननद, थाना कचहरी कुल हुआ, साल भर बाद छूटीं, अभी भी मुकदमा चल रहा है , हमहुँ को मालूम है वो जमाना बाद नहीं है, लेकिन ये सोचो न की हमरे ससुर क तोहरे बाबू क कमाई, इतना खेत, बगीचा, इतना बड़ा घर, कल कोई चिराग जलाने वाला भी नहीं, अरे हम अमर घुट्टी नहीं पी के आये हैं, बस इहे एक साध थी, जाए के पहले पोती पोता का मुंह देख लेती तो,..."

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और फिर सास चुप होगयी, हलकी सी सिसकने की आवाज, पता नहीं सच या नौटंकी थोड़ी देर दोनों ओर से कोई आवाज नहीं आयी फिर सास हलकी आवाज में बोलीं

" अरे बहुरिया लाख गुन आगर होय, लेकिन, अरे हम जिनको गौने में उतारे हमसे चार पांच साल छोट, और ओकरे आंगन में तीन तीन पोती पोता, एक दिन ओकरे घर के सामने से जा रहे थे, वो अपनी पोती को बुकवा लगा रही थी, जान बुझ के पूछी " अरे दीदी कउनो खुस खबर," जी हमारा जर गया, तोहरे चार महीने बाद गौना उतरा था उसकी बहु का, "

" हां मालूम है मनोजवा न " बड़ी बुझी आवाज में ननदोई बोले,

" असली बात तो बताये नहीं जो करेजवा में आग लगाने वाली तोहार चाची बोलीं, " अब नन्दोई की माँ एक बार फिर से चहक रही थी " मनोजवा की मेहरिया, फिर खट्टा मांग रही है और मनोजवा क माई हमें जलाने के लिए बोली की हम तो बहु जउने दिन उतरी थी ओहि दिन बोल दिए थे बहू और कुछ नहीं लेकिन गोली ओली यह घरे में ना चली, हमरे कउनो कमी न है हार साल एक होई तो भी नहीं, बस हमरे आंगन में , बस हम चुपचाप, " ननद की सास चुप हो गयी और फिर बोलीं

" अरे हम भी तो एक्के चीज मांगे थे तोहरी मेहरारू से, जब दुल्हिन गोड़ छुई तबे हम बोल दिए थे, हमें नौ महीने में पोती पोता चाहिए, पोती हो, या पोता लेकिन, ..." और फिर उन्होंने ऐसी ठंडी सांस ली की नागिन की फुंफकार झूठ।

इतनी तेज फुफकार थी की उसका जहर दीवाल पार कर मेरे कमरे में फ़ैल गया। आवाज फिर से चाबुक ऐसी कड़क,

' कब आओगे, "

" आज फिर हस्पताल जाना है और पुलिस वाला काम भी है शाम को बुलाया है, कल सुबह, नहीं तो दोपहर तक " नन्दोई एकदम मेमना बन गए थे "

" कल सोमवार है न, तो एकदम दोपहर के पहले घर में तुम और वो महरानी, ये नहीं की सरहज के हाथ का खाना खाने के लालच में, बहुत ससुरार हो गया, आने तो दो रानी जी को, मैं साफ़ कह रही हूँ दोपहर तक तुम दोनों, "

एकदम ठंडी लेकिन असरदार आवाज और ननदोई जी पर जो असर हुआ, उससे ज्यादा दीवाल पार कर के मेरे ऊपर हुआ, जोर का झटका जोर से लगा,
 
आश्रम और सास का प्लान

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दोपहर, मतलब दस बजे के पहले पहले नन्दोई जी ननद को लेके और कल ही तो सारा असली, कल सुबह तो पता चलेगा, कुछ भी हो मुझे ननद की सास की काट ढूंढनी होगी, नन्दोई जी कल नहीं जा सकते, अगर कल सुबह, फिर तो इतने दिनों की मेहनत, मैं सोच में थी, कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन ननदोई जी की आवाज ने मुझे एक झटका और दिया,

" एकदम, कोशिश करूँगा की भले देर रात लगे, पर शहर का सब काम ख़तम करके आज ही यहां लौट आऊंगा, और कल मुंह अँधेरे निकल जाऊंगा, "

ये एक और झटका था, आज की रात तो ननदोई जी से ननद को बचाना था , आज पांचवी रात थी, कल मुंह अँधेरे, लेकिन झटके अभी और लगने थे और असली झटका बाकी था,

" परसों, मंगल की रात नहीं तो नरसो बुध के भिन्सारे लखनऊ चले जाना अपने मामा के यहाँ, उनका फोन आया था, कोई ट्रैकटर की एजेंसी की बात कर रहे थे, हो सका तो दिल्ली भी जाना पड़ेगा, हफ्ते भर की तैयारी से जाना होगा। और गुरु जी से बात हो गयी तो बुध को तोहरी महरानी को आश्रम,

अब ननदोई जी सनके उनके मुंह से निकल ही पड़ा, " लेकिन मैं नहीं रहूंगा तो, " बड़े धीमे से उन्होंने प्रतिरोध किया फिर तो इतने कोड़े पड़े

" मेहरारू क तलवा चाटोगे का, गोदी में उठा के ले जाओगे, महारानी को। अब बहुत सेवा सत्कार, हो गया महरानी का, अरे काम धंधा से पेट भरेगा की मेहरारू क तलवा चाट चाट के, ....तलवा चाटने लायक करम की होतीं, अब तक दो तीन पोती-पोता दी होतीं तो हमहुँ उनकी आरती उतारते,

ओह बाँझिन क नाम मत लेवावा सबेरे, परसों पहली बस से लखनऊ, बड़ी मुश्किल से कुछ ले देके एजेंसी वाले से बात हुयी है और ये बाँझिन के चक्कर में,। "

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गुस्से में वो बोल नहीं पा रही थी और ननदोई की बोलने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी लेकिन सन्नाटे को तोड़ती हुयी सास जी की आवाज आयी मेरी बस जान नहीं निकली, सामने होती तो मैं मुंह नोच लेती उनका। ''

" तुम्हारे रहने की कोई जरूरत नहीं, तुम रहोगे तो वो और नौटंकी करेगी, और खबरदार उसको कानों कान खबर न हो, जाउंगी तो मैं भी नहीं । गुरूजी बड़े अच्छे हैं उन्होंने कहा है की अपनी चार प्रमुख सेविकाएं भेजंगे, उनका वाहन आएगा, झांगड़, बस वो चार सेविकाएं ले जाएंगी और एक हफ्ते के लिए, बस कल दोपहर के पहले तुम दोनों आ जाना, "

" एकदम " नन्दोई जी बोले लेकिन उसके पहले उनकी माँ फोन काट चुकी थीं।

प्रमुख सेविकाएं, झांगड़, मेरी तो पैरो के नीचे की ज़मीन सरक गयी और मैं जो जानती थी न ननद से कह सकती थी न अपनी पूरा कमरा घूम रहा था, चक्कर आ रहा था, बार बार वही प्रमुख सेविकाएं, झांगड़ सुनाई पड़ रहा था,

कुछ तो मेरी ननद ने सुनाया था लेकिन बाद में मैंने अपनी एक सहेली से, जो उसी गाँव में ब्याही थी जिसके पास वो आश्रम था और उसने बताया था

' प्रमुख सेविकाओं ' का किस्सा, ये सब लेडीज बाउंसर थी जो दिल्ली के आसपास से बार से आती थीं, और उनमे भी सबसे खूंख्वार, पक्की लेस्बो,

और झांगड़ चलता फिरता टार्चर चैंबर, एक छोटा ट्रक कंटेनर की तरह का, एकदम साउंड प्रूफ, वो चारों किसी लड़की को पहले तो गंगा डोली करके पकड़ के उस ट्रक के पीछे, और ड्राइवर पीछे से बंद कर देता।

पहले तो उस लड़की को दो दो झापड़ सब बारी बारी से, और उसके बाद नोच नोच के उसके कपडे, फिर दो पकड़ के उसके हाथ बाँध देती, झांगड़ की छत में चुल्ले लगे थे इस काम के लिए। फिर एक बड़े से कटोरे में आसव, जबरदस्ती मुंह खुलवा के, ...जरा भी मना करने पर, फिर से चांटे। वो एक कटोरा आसव ही देह की सब ताकत धीरे धीरे ख़तम कर देता, और सब से बढ़ कर उस लड़की की देह में जबरदस्त कामाग्नि जगाता, दस मिनट रुक के दुबारा वही आसव, और उस के बाद चारो मिल के उस के बदन को नोचती जब तक हर काम के लिए वो हाँ न कर देती।

मेरी फूल सी ननद, इत्ती प्यारी दुलारी, रूपे का तन, सोने का जोबन और ये, और इसी लिए हफ्ते भर के लिए ननदोई जी को बाहर किया जा रहा था, हफ्ते भर में आश्रम में, और वहां जो गिद्ध नोचते,....

अब मुझे समझ में आया होली की मस्ती में भी बीच में उनका चेहरा उदास क्यों हो गया था, एकदम बुझा जब वो बोलीं,

अबकी भौजाई से होली खेल लूँ, फिर पता नहीं ननद भौजाई की कब होली हो,

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उन्हें अंदाज था यहाँ से लौटने पर क्या होने वाला है ।

मैंने सर को झटका,

पहले पहली परेशानी,

नन्दोई जी रात को जो लौटने का जो प्रोग्राम बनाये हैं उन्हें किसी तरह शहर में हस्पताल में ही उलझाना, किसी भी हालत में आज उन्हें नहीं आना था, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था इस परेशानी का हल,

लेकिन तभी वो आगये,... जिसके साथ मेरी माँ ने भेजा था, मेरी सब परेशानियों का हल करने के लिए,
 
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