Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 100 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

मंजू भाभी - किस्सा





और मंजू भाभी ने पता नहीं सच पता नहीं बना के किस्सा सुनाया।

बुच्ची को अपनी ओर खींच के बोलीं

" एकदम बुच्ची वाला किस्सा, लेकिन हम बुच्ची से साल भर छोट ही रहे होंगे,.... मामा के लड़के की शादी, और उनकी कोई सगी बहन तो थी नहीं तो सब रसम और जैसे बुच्ची कोहबर रखा रही है तो हम भी और साथ में सब भौजाई गाँव की,

तो एक भौजाई ने हमको भैया के साथ कमरे में बंद कर दिया और लालटेन भी बाहर ले गयीं, घुप्प अँधेरा। "

“फिर”, शीला और बुच्ची एक साथ बोलीं।

" फिर का, हमार भैया तोहरे भैया ऐसे बुरबक थोड़े थे और मैं खुद उनको अपनी कच्ची अमिया दिखा के ललचाती थी। उनका पैंट पूरा टाइट हो जाता था। तो बस भैया को मौका मिला गया और एक झटके में मेरी फ्राक पकड़ के खींच दी, ऐसे "

और शीला इशारा समझ गयी, झट से उसने पीछे से बुच्ची के दोनों हाथ कस के दबोच लिए और मंजू भाभी ने बुच्ची की फ्राक खींच के मुन्ना बहू के पास फेंक दी, और फ्राक के अंदर कुछ था भी नहीं।

चड्ढी पहले ही भौजाइयों ने उतरवा दी थी।





और इमरतीया और मुन्ना बहू क्यों मौका छोड़तीं, बुच्ची के टिकोरे दोनों ने बाँट लिए और कस कस के रगड़ने मसलने लगीं।

जाँघों के बीच मंजू भाभी का हाथ था, वहां सहलाते बात उन्होंने आगे बढ़ाई,

" अरे जब जुबना पे भाई का हाथ सबसे पहले पड़ता है तो कस के गदराता है। सगा न हो तो ममेरा, फुफेरा, चचेरा जो भी हो और ऊपर से हमर भौजाई कुल, भैया के खूंटे में नउनिया भौजी तेल चुपड़ चुपड़ के एकदम चिक्क्न की थीं और हमरी बुलबुल भी, तो बस, भैया हमार दोनों टांग उठा के बुरिया पे रगड़ रगड़ के, और जब हम अपने मुंह से कहे,

' भैया पेलो न तभी "

फिर, सोच सोच के बुच्ची की भी हाल खराब थी, लेकिन सुनना भी चाहती थी,

" फिर क्या, तोहरे अस बहिन पाय के कोई भाई छोड़ेगा, तो वो भी पेल दिए , और पूरे दस मिनट तक "

और इमरतिया कुछ और सोच रही थी, उसका देवर, सुरजू तो आधे घंटे से पहले झड़ने के नजदीक भी नहीं पहुंचेगा, आज देख चुकी थी वो





मंजू भाभी ने रस लेकर अपनी पहली चुदाई का हाल सुनाया,

कैसे अपने ममेरे भाई से अपनी कसी कोरी चूत फड़वायी।

सुन के तो सब गरमा रही थीं, लेकिन सबसे ज्यादा हालत बुच्ची की खराब हो रही थी। एक तो दो दो खूब खेली खायी भौजाइयां इमरतिया और मुन्ना बहू जम के उसकी छोटी छोटी चूँची रगड़ रही थीं और फिर मंजू भौजी जिस तरह से अपनी हथेली उसकी कुँवारी चुनमुनिया पे मसल रही थी, बुच्ची की बुरिया गीली हो रही थी,

लेकिन उससे भी ज्यादा, बुच्ची की हालत खराब थी ये सोच सोच के की सुरुजू भैया अपना मोटा खूंटा उसकी कसी कोरी बिलिया में घुसाएँगे, केतना दर्द होगा, केतना मजा आएगा। लेकिन उससे रहा नहीं गया, उसने मंजू भौजी से पूछ लिया,

" भौजी बहुत दर्द हुआ होगा न "

" अरे पूछो मत, बहुत। बस जान नहीं निकली और वो भी एक बार नहीं, दो बार। पहली बार जब भैया का सुपाड़ा घुसा, और थोड़ी देर बाद जब झिल्ली फटी, लेकिन मजा भी बहुत आया। अरे पगली बिना दर्द के कहीं मजा आता है, जितना दर्द उतना मजा, लेकिन असली मजा दुबारा आया। "

" कैसे " अभी चारों एक साथ बोली, बुच्ची, शीला, इमरतिया और मुन्ना बहू।

" अरे हमार सब भौजाई नंबरी छिनार" मंजू भाभी बोलीं और बुच्ची और शीला खिलखिला के बोलीं,

" एकदम भौजी, ....कुल भौजी छिनार होती हैं और हम दोनों को तो नम्बरी छिनार "





" अभी बताउंगी कितनी छिनार हूँ हम तीनो, "

हंस के मंजू भाभी बोलीं और आगे का किस्सा बयान किया।

उनके भैया ने बाहर की खिड़की थोड़ी खोल दी थी तो थोड़ी चांदनी आ रही थी, लेकिन बहन चोदने की जल्दी में वो भूल गया था की भौजाइयों ने दरवाजा बाहर से तो बंद कर दिया था लेकिन अंदर से उन लोगो ने नहीं बंद किया है। बस थोड़ी देर में चारो भौजाई अंदर और मंजू के पीछे

" क्यों मंजू, मजा आया हमरे देवर के साथ और चलो अब हमरे सामने, पहले चूस चूस के अपने भैया का फिर से खड़ा करो और एक भौजाई ने कस के मंजू भाभी का गाल दबा के मुंह खोलवा दिया और दूसरे ने मंजू भाभी के भैया का खूंटा पकड़ के उनके मुंह में। छत का दरवाजा बंद था, आधी रात बाकी थी तो किसी के आने का भी खतरा नहीं था। मारे जोश के उसके भैया अपनी बहन का सर पकड़ के गप गप





फिर थोई देर में भौजाइयों ने अपने सामने,

एक बोली

" अरे जंगल में मोरा नाचा किसने देखा, ….जबतक बहन की चुदाई हम सब के सामने "

और दूसरी बोली, " अरे तुम दोनों नौसिखिया हो, हम लोग सब गुन ढंग सिखा देंगे " बस एक ने मंजू भाभी के भाई का खूंटा पकड़ के बिल में और तीसरी ने देवर को ललकारा,

" पेल दे एकबार में "





मंजू भाभी चूतड़ पटकती रहीं, चीखती रही हैं और उनके भैया चोदते रहे।

और उनकी बात खतम होते होते बुच्ची की हालत ख़राब। पता नहीं मंजू भाभी की कहानी सच्ची थी या झूठी लेकिन असर हो गया था , बुच्ची ने मन ही मन तय कर लिया था, अब चाहे जो हो जाए, उसके सूरजु भैया चाहे जितना लजाधुर हों, सोझ हों, लेकिन बुच्ची उनसे चुदवा के रहेगी, भले ही उसे भैया से जिद्द करनी पड़े, खुद बेशर्म होना पड़े, लेकिन वो किसी से कम नहीं है, वो भी अपने भैया का लंड घोंट के रहेगी, अरे जो दुलहिनिया आएगी, उससे तो साल भर ही बड़ी है तो वो घोंट सकती है तो बुच्ची काहें नहीं, और दर्द होगा तो होगा, सबको होता है, कौन वो दुनिया में पहली बार चुदेगी.





और अब समय था जोड़ी बनाने का , इमरतिया सोच रही थी की मंजू भाभी खुद बुच्ची का निवान करेगी, लेकिन मंजू भाभी एक चालाक उन्होंने शीला की उकसाया,

" अरे शीलवा, खुद तो गन्ना के खेत में टांग उठाय के मोट मोट लंड घोंटती हो और तोहरी सहेली क बिलिया अभी तक कोरी है , तानी उसकी टांग उठाय के दिखाओ, कैसे लौंडे पेलेंगे उसको "

" एकदम भौजी " हँसते हुए शीला बोली और जब तक बुच्ची समझे, उसकी दोनों टाँगे, शीला के कंधे पे और क्या चूत से चूत पेघिस्सा मारा





मान गयी मंजू भाभी शीला, स्साली पक्की चुदक्कड़ है, खूब गन्ने और अरहर के खेत में कबड्डी खेली होगी। बुच्ची को यही छिनार सुधारेगी।

शीला के पहले धक्के में ही बुच्ची की सिसकी निकल गयी। और कच्चे टिकोरों को देख के न मरदो से रहा जाता है न खेली खायी औरतों से, और रिश्ता अगर ननद भौजाई का हो तो कहना ही क्या।

बस इमरतिया और मुन्ना बहू भी फाट पड़ीं, बुच्ची क चूँची पे।

लेकिन थोड़ी देर में शीला और बुच्ची की जोड़ी तो थी ही, मुन्ना बहू और इमरतिया ने मिल के टुकुर टुकुर देखती मंजू भाभी को छाप लिया और घपाघप, घपाघप,

फिर जब मंजू भाभी निकल पायीं तो उन्होंने इमरतिया को दबोच लिया।

हाँ बुच्ची के लिए इमरतिया ने साफ़ इशारा कर दिया था, एक तो उसकी झड़ने नहीं देना है, बस झड़ने के किनारे तक ले जा के छोड़ दो, जिससे दिन भर कल बुरिया में आग लगी रहे, छनछनाती घूमे। और दूसरे ऊँगली अंदर नहीं करनी, कोरी है तो कोरी ही रहेगी, जबतक मोटा मूसल न घुसे।

सब एक दूसरे से चिपक के सो गए, और मुंह अँधेरे, भिन्सारे शीला और मुन्ना बहू निकल गयीं, ये बोल के की दस बजे के पहले आ जाएंगी।

पांचो की लाज शर्म उसी बोरसी में सुलग के, सुबह होते होते

हाँ दो बातें, जैसे मंजू भाभी ने बोला था की उनकी भाभियों ने किया था, उसी तरह इमरतिया ने बुच्ची की दोनों फांके फैला के बूँद बूँद सौ ग्राम सरसों का तेल टपका दिया, " शादी बियाह का घर है, का पता कब कौन मिल जाए ? और जब मर्दो का खूंटा खड़ा होता न तो वो चिकनाई और तेल नहीं ढूंढते,… बस पटक के पेल देते हैं, इसलिए अपनी सावधानी खुद बरतना चाहिए। "

और मंजू भाभी ने खूब समझाया बुच्ची को सूरजु के बारे में

" अरे हमार देवर तनी ज्यादा ही लजाधुर है, तोहिं को पहल करना पड़ेगा, हरदम उसके आस पास रहो, उसे देख के मुस्कराओ। अपने दोनों चूजे उभार के दिखाओ और जैसे मर्दो की निगाह औरत की चूँची पे रहती है न तो अगर वो तेरे चूजे देखे तो तू उसका खूंटा देखो। वो भी समझ जाएगा।
 
मुन्ना बहू





और अब मुन्ना बहू का नंबर था, बुच्चीको गरमाने का और रगड़ाई करने का,

और कुछ मामलों में मुन्ना बहू, इमरतिया से भी चार हाथ आगे थी,

नंबरी लंड खोर, नमक भी जबरदस्त था, थोड़ी सांवली सलोनी, उम्र में भी इमरतिया से दो चार साल बड़ी ही होगी, बबुआने का तो जिस लौंडे की अभी रेख भी नहीं आनी शुरू हुयी से लेकर, बियाहता मरद तक, शायद ही कोई बचा होगा, जिसके खूंटे को मुन्ना बहू ने मजा न दिया हो,

पर उसकी असली खासियत थी, रेडियो झूठ था उसके आगे, ....गाँव में कौन लौंडिया किससे फंसी है, आज किसके गन्ने के खेत में कौन चुदी,





कौन बबुआने वाली अपने हरवाह से हल जुतवाती है जांघ के बीच तो कौन अपने ग्वाले से दूध दुहवाती है, उसकी मलाई खाती है सब मुन्ना बहू को मालूम था।

दर्जनों को तो वो खुद गन्ने के खेत में कभी निहुरे, कभी टांग उठाये, अहिरौटी भरौटी के लौंडो के साथ पकड़ चुकी है।

और लड़कियों की तरह लौंडों का भी सब हाल मुन्ना बहू मालूम था। ख़ास तौर से १०-१२ जो अहिरोटी, भरौटी के, पासी के लौंडे, पक्के चोदू, न सिर्फ बित्ते भर के लम्बे, मोटे हथियार वाले, बल्कि रगड़ रगड़ के चोदने वाले, पहले धक्के में ही लड़की रोने लगे, चूतड़ पे, पीठ पे मार मार के लाल कर देने वाले, गाल पे, चूँची पे ऐसे कस कस के काटेंगे की चार दिन तक निशान न जाए, नाख़ून से नोचेंगे, और कहीं चीख रुकी तो बस झोंटा पकड़ के, घोड़ी की लगाम की तरह पकड़ के निहुराय के ऐसे खींचेंगे की बस, उसको अंदाज नहीं लगेगा की चुदवाने में ज्यादा दर्द हो रहा है की नोचवाने में

और मलाई कुल देह के भीतर,

जो लड़की उन सबों से चुद के आती, पूरे गाँव को मालूम हो जाता, चार दिन उस की चाल देखके, गाल और चूँची क निशान देख के की किसीसे चुद के आ रही है,

लेकिन सबसे बड़ी बात ये की वो सब मुन्ना बहू के इशारे पे थे, जउने लौंडिया की ओर मुन्ना बहू इशारा कर दें,उसे चोद चोद के के सब चूत क भोसंडा बना देते थे, लेकिन एक बात और थी, की जो स्साली उनसे चुदती थी, वो खुद सहारा लेके, लंगड़ाते फिर खुद ही आ जाती थी उनसे चुदने।

और बुच्ची जब से आयी, मुन्ना बहू की निगाह उस पे थी,





एकदम असली कोरी कच्ची कली, चेहरे से देखने से तो लगता था दूध के दांत भी अभी नहीं टूटे होंगे, लेकिन जोबन पे नजर आये तो कच्ची अमिया अच्छी खासी गदरा रही थीं, गाल भी खूब फूले फूले, एकदम से काटने लायक, लेकिन जिस तरह से लंड का नाम लेने, जरा भी मजाक करने से वो छटकती थी, मुन्ना बहू इन्तजार ही कर रही थीं, मौके का।

और जब कोहबर रखवारी का मौका आया, तो मुन्ना बहू ने बड़की ठकुराइन से बुच्ची की ओर बिना बोले इशारा कर दिया और एक बार बुच्ची का तय होगया

तो कच्चे टिकोरे के लालच में मंजू भाभी भी, मुन्ना बहू और इमरतिया का तो पहले से ही तय था और शीलवा, बुच्ची की पक्की सहेली थी, लेकिन उसको चुदवाती मुन्ना बहू ने पकड़ लिया था तो उसकी भी दबती थी,





और फिर जब शीरे वाला मजाक हुआ, और इमरतिया मुन्ना बहू को दिखा के खाली कुल्हड़ ले के अंदर गयी, सूरजु बाबू के पास और लौटी तो सूरजु का बीज बजबजा रहा था,

गाँव में तो ये माना जाता था की कउनो कुँवार लड़की को किसी मरद के बीज का दो बूँद भी खाली चटा दो तो ऐसी चुदवासी होगी की खुद ही उसके लंड पे चढ़ के बैठ जायेगी, और यहाँ तो कुल्हड़ भर मरद की मलाई,





इमरतिया ने मुस्करा के मुन्ना बहू की ओर देखा, और वो भी मुस्करा दी, दोनों ने बिना बोले सोच लिया था, बुच्ची न सिर्फ अपने भैया से चोदी जायेगी, बल्कि दस पंद्रह दिन के अंदर जबरदस्त छिनार, बन के खुद लंड खोजेगी, कम से कम दस पन्दरह लौंडन क घोंट के अपने ननिहाल से वापस जायेगी,

लेकिन मुन्ना बहू ने मंजू भाभी से कहा, मुस्करा कर,

" हे तू सोचत हो, की खाली तुंही भाई चोद हो, हमारी बुच्ची ननद तोहरो नंबर डकाएगीं, देखिये चौबीस घंटे के अंदर अपने भैया का, हमरे सूरजु देवर क लंड घोंटेंगीं, क्यों बुच्ची, अच्छा चल तोहे बतायी, तोहरे भैया कैसे अपने बहिनिया क पेलेंगे ,





और मुन्ना बहू ने हलके से बुच्ची को धक्का दिया और बुच्ची फर्श पे, बस दोनों टाँगे मुन्ना बहू के हाथ में, आराम से फैलाया और फिर अपने दोनों कंधो पे रख के बोली, " देख स्साली, तोहार भाई, ऐसे पहले दोनों टांग अपने कंधे पे रखेंगे, जांघिया बुरिया फैलाएंगे, जितना बुरिया फैलाओगी उतना आसानी से तोहरे भैया क जाएगा सटासट, "

और क्या कस के धक्का मारा अपनी चुदी चुदाई झांटो वाली बुर से, बुच्ची की कच्ची, बिन चुदी बुर पे

उईईई उईईई बेचारी बुच्ची जोर से सिसक पड़ी

लेकिन अभी तो चुदाई शुरू हुयी थी, मुन्ना बहू का एक हाथ बुच्ची की कच्ची अमिया पे और दुसरा पतली कटीली कमरिया पे, और धक्को का जोर बढ़ने लगा

उईईई भौजी नहीं ओह्ह्ह हाँ, लग रहा है, हाँ बहुत अच्छा, नहीं नहीं

बुच्ची कभी चीख रही थी, कभी सिसक रही थी, कुँवारी ननद की मस्ती भरी चीख से बढ़िया और कौन आवाज हो सकती है, मंजू भाभी और इमरतिया भी गरमा रही थीं लेकिन एक ननद और थी न, भले ही खेली खायी थी, बस मंजू भाभी ने बुच्ची की सहेली, शीला को धार दबोचा और उस पे चढ़ गयी, और अपनी बुर उसकी चूत पे रगड़ने लगी।

"जब झिल्ली फटेगी न तोहार तो तोहरे भैया ऐसे तोहार मुंह दबा देंगे, "

मुन्ना बहू बोली और पहले तो हाथ से कस के मुंह दबाया, फिर चुम्मा ले के अपनी जीभ उस कच्ची कली के मुंह में ठेल दी, अब बुच्ची चाह के भी नहीं चीख सकती, और दोनों जोबन बुच्ची के कस कस के रगड़े मसाले जाने लगे और चूत की रगड़ाई भी भर गयी,

और मुन्ना बहू की गालियां भी बढ़ गयीं,

" स्साली, नीचे से धक्का मार, खाली हमरे देवर ऊपर से पेलेंगे, तेरे सारे खानदान की गांड मारु"

और हलके से बुच्ची नीचे से कमर हिलाने लगी, वो देख रही थी की उसकी सहेली शीला कैसे चुद रही औरत की तरह कैसे चूतड़ उठा के, कमर हिला के मंजू भाभी के साथ मजे ले रही थी, तो वो भी थोड़ा वैसे ही,

" चल बोल, दस बार और जोर जोर से, मैं अपने भाई क लंड लूंगी, सूरजु भैया क लंड घोटूँगी "

बुच्ची धीरे से बोली, तो जोर का एक चांटा उसके चूतड़ पे और मुन्ना बहू जोर से बोली, " स्साली रंडी क बेटी, अइसन बोल क दुवारे तक सुनाई पड़े, बोल कस के "

" ,मैं अपने भैया क लंड लूंगी, मैं सूरजु भैया क लंड घोंटूंगी " अब बुच्ची क लाज कम होती जा रही थी, वो न सिर्फ बोल रही थी सोच भी रही थी

और उधर इमरतिया भी गरमा गयी थी तो दोनों जांघ फैला के शीला के ऊपर चढ़ गयी और शीला ने खुद अपना काम समझ के अपनी भौजी की बुर चाटना शुरू कर दिया,

एक साथ दो दो भौजाई शीला से मजे ले रही थीं, और मुन्ना बहू बुच्ची के साथ, लेकिन फरक ये था की उसने मंजू भाभी के साथ ये तय किया था की बुच्ची को झड़ने नहीं देना है, बस बार बार गरम करके छोड़ देना है तो दिन में लाँडो केसामने जब जायेगी, उसकी चूत में छींटे ककाटेँगे

और ऊँगली भी नहीं करनी है, उसकी फाड़ेंगे, उसके भाई और बाकी लौंडे, बस मस्ती और गरमाने का काम

और बुच्ची की हालत खराब हो रही थी, वो देख रही थी की शीला उसकी सहेली कैसे मस्ती से झड़ रही है , चूस के उसने इमरतिया भुआजी को झाड़ दिया और मंजू भाभी का पानी भी निकल गया, लेकिन बस वही, और जब वो झड़ने के करीब होती, तो मुन्ना बहू कभी उसकी चूँची पे चिकोटी काट लेती तो कभी इमरतिया गाल नोच लेती, कभी मुन्ना बहू रगड़ना रोक देती

" भौजी झाड़ दा न , मोर भौजी, जो जो कहियेगा करुँगी, मोर भौजी बस एक पानी " लेकिन मुन्ना बहू उसे बस गरमा रही थी और फिर जब दो चार बार झड़ते झड़ते बुच्ची रुक गयी, तो मुन्ना बहू उसके ऊपर से उठती बोली,

" अरे भोर हो रही है, अब जा तोहरे भैया जग गए होंगे, उन्ही से झड़वा लो "

सच में आसमन की कालिख कम हो गयी थी, भोर की चिड़िया बोल रही थी, और इमरतिया ने अपने कपड़े ठीक किये और बुच्ची को लेकर निकल दी।
 
बुच्ची-भोर भिन्सारे





भोर भिन्सारे तो कुल मरदन का खड़ा रहता है, और सूरजु देवर क तो एकदम घोडा, गदहा छाप, इमरतिया यही सोच रही थी,… जब वो बुच्ची के साथ चाय लेकर सुरजू सिंह की कोठरी में पहुंची।

रात भर की मस्ती के बाद बुच्ची की हालत खराब थी, ससुरी शीला इतना हाथ गोड़ जोड़े, की बहिनी एक बार झाड़ दो लेकिन ना, गरमा कर के चूड दे रही थी, और ऊपर से मंजू भाभी क बदमाशी, और ये समय फ्राक के नीचे कुछ पहनी भी नहीं थी, एकदम लस लस कर रही थी, गुलाबो।

सुरजू ने बुच्ची को देखा तो झट से एक छोटी सी तौलीया लुंगी की तरह लपेट ली, लेकिन सूरजू की निगाह बुच्ची के छोटे छोटे कबूतरों पे चिपक के रह गयी। ढक्क्न तो था नहीं तो दोनों छोटे छोटे कबूतर बाहर निकलने को बेचैन थे, और उनकी चोंचे भी साफ़ साफ़ दिख रही थीं।

सुरजू की निगाह अपनी बूआ की बेटी के चूजों पर चिपकी , और उसे देखते देख, बुच्ची और गरमा गयी। बुच्ची की निगाह भी सीधे, और तम्बू तना एकदम जबरदस्त।

बस इमरतिया को मौका मिल गया, जब तक भाई बहन की देखा देखी हो रही थी, झट से उसने तौलिया सरका दी , और शेर उछलकर बाहर आ गया।

'इत्ता बड़ा, इत्ता मोटा, और केतना गुस्से में लग रहा है,'

बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं, कलेजा मुंह में आ गया।

ये नहीं की उसने पहले नहीं देखा था। कहते हैं न की शादी नहीं हुयी तो बरात तो गए हैं, तो कई बार चौकीदारी उसने की थी, जब उसकी सहेली, शीलवा गन्ने के खेत में गाँव के लौंडो के साथ, तो कौन लड़की तांका झांकी नहीं करेगी। लेकिन ये तो हाथ भर का,

सुरजू ने अपनी बुआ की बिटिया को देखते देखा तो झट से तौलिया फिर से ठीक कर लिया और लजा गया, लेकिन बुच्ची जोर से मुस्कराने लगी और बोली, " भैया चाय "

लेकिन इमरतिया तो भौजाई, वो काहें देवर को रगड़ने का मौका छोड़ती, छेड़ते हुए खिलखिला के बोली

" अरे बबुआ किससे लजा रहे हो, हम देख चुके हैं, तोहार बहिनिया देख ली, तोहार माई तो बचपन में खोल खोल के कडुवा तेल लगायी है, मालिश की तब इतना मोटा सुपाड़ा हुआ और जो हमार देवरानी आयंगी दस दिन बाद, तो कोठरिया क दरवाजा बाद में बंद होई, तू एके पहले निकाल के देखाओगे। बहुत दिन शेर पिंजड़े में रह चुका अब जंगल में, घूमने,गुफा में घुसने का टाइम आ गया है। "

जितना सूरज सिंह लजा रहे थे, उतना बुच्ची मुस्करा रही थी, और चाय बढ़ाते बोली,

" लो न भैया, अपने हाथ से बना के लायी हूँ "

और इमरतिया ने फिर रगड़ा अपनी ननद -देवर को, " आज से बुच्ची देंगी तोहे, ले लो ले लो, तोहार बहिन देने को तैयार है और तुम्ही लेने में हिचक रहे हो भैया। "

लेकिन रात की मस्ती के बाद अब बुच्ची भी एकदम गरमाई थी और डबल मीनिंग बात में एक्सपर्ट हो गयी थी, आँखे नचा के वो टीनेजर पलट के जवाब देती बोली

" तो भौजी, क्या खाली भौजी लोग दे सकती हैं, …भैया को बहिनिया नहीं दे सकती हैं ? "

" एकदम दे सकती है काहें नहीं दे सकती, जो चीज भौजी लोगो के पास है वो बहिनियो के पास है तो काहें नहीं दे सकती। और अभी तो तोहरे नयकी भौजी के आने में दस बारह दिन, तो फिर रोज दूनो जून दा। देखो न कितना भूखा है बेचारा "

इमरतिया कौन पीछे रहने वाली थी

लेकिन आज दिन भर उसको बहुत काम था। सब रीत रिवाज रस्म, शादी में जितना काम पंडित का होता है उससे दसो गुना ज्यादा नाउन का।

नाउन और बूआ सब रस्म में यही दोनों आगे रहती है और उसके अलावा, आना जाना मेहमान आज से, और फिर बड़की ठकुराईआं का पूरा बिस्वास इमरतिया पे और घर में कोई सगी,… चचेरी बहु भी नहीं तो दूल्हे की भौजाई वाला भी

लेकिन निकलने के पहले, अपना हाथ दिखाना नहीं चुकी।

बुच्ची के पीछे खड़ी हो के, एक झटके में उसने बुच्ची का फ्राक ऊपर उठा दिया, और बोली,

" बिन्नो हमरे देवर क तो खूब मजा ले ले के देखा तो जरा अपनी सहेली का भी चेहरा दिखा दो न "

बुच्ची ने छिनरपन कर के अपनी टांगो को चिपकाने की कोशिश की, लेकिन उसका पाला इमरतिया से पड़ा था, और इमरतरिया ने बुच्ची की दोनों टांगों के बीच टाँगे डाल के पूरी ताकत से फैला दिया। पर हालत सुरजू की ख़राब हो रही थी,

एकदम कसी कसी दो फांके, गुलाबी, एकदम चिपकी, लसलसी, जैसे लग रहा था लाख कोशिश करने पे भी दोनों फांके अलग नहीं होंगी, कितना मजा आएगा उसके अंदर ठोंकने में,





सरजू की निगाह बुच्ची की जाँघों के बीच चिपकी थी, बुच्ची छूटने के लिए छटपटा रही थी। लेकिन सुरजू को वहां देखते उसे भी न जाने कैसा कैसा लग रहा था।

और इमरतिया ने गीली लसलसी चासनी से डूबी फांको पर अपनी तर्जनी फिराई, उन्हें अलग करने की कोशिश की और सीधे सुरजू के होंठों पे

" अरे चख लो, खूब मीठ स्वाद है "

बोल के बुच्ची का हाथ पकड़ के मुड़ गयी, और दरवाजा बंद करने के पहले दोनों से मुस्करा के बोली,

" अरे कोहबर क बात कोहबर में ही रह जाती है और वैसे भी छत पे रात में ताला बंद हो जाता है।

और सीढ़ी से धड़धड़ा के नीचे, बुच्ची का हाथ पकडे, बड़की ठकुराइन दो बार हाँक लगा चुकी थी। बहुत काम था आज दिन में

दिन शुरू हो गया था, आज से और मेहमान आने थे, रीत रस्म रिवाज भी शुरू होना था।
 
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग 105 कोहबर और ननद भौजाई , पृष्ठ १०८६

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जोरू का गुलाम अगला अपडेटड

२५० वां भाग

होगा तो ये अपडेट भी जासूसी से भरा, एम् का ही लेकिन जासूस जेम्स बांड की तरह भी तो हो सकता है, तो थोड़ा बहुत इरोटिका का तड़का भी

और सबसे बड़ी बात =एक मेगा अपडेट

८ भाग

करीब करीब ९,५०० शब्द ( दो भागों इतना बड़ा ) और वर्ड में २५ पेज

आज ही २५० वां भाग
 
Erotica - जोरू का गुलाम उर्फ़ जे के जी

जोरू का गुलाम भाग २५० पृष्ठ 1556 एम् -२ --एक मेगा अपडेट पोस्टेड कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट जरूर करें

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जोरू का गुलाम भाग २५० एम् -२ पृष्ठ 1556

-एक मेगा अपडेट पोस्टेड

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फागुन के दिन चार भाग ४१ पृष्ठ ४३५

फेलू दा

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भाग १०६ - रीत रस्म और गाने

२६,८०,१७७

सुरजू सिंह की माई





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सरजू की निगाह बुच्ची की जाँघों के बीच चिपकी थी, बुच्ची छूटने के लिए छटपटा रही थी। एकदम चिपकी हुयी रस से भीगी मखमली फांके, गोरी गुलाबी, फांके फूली फूली,

लेकिन सुरजू को वहां देखते उसे भी न जाने कैसा कैसा लग रहा था।





और इमरतिया ने गीली लसलसी चासनी से डूबी फांको पर अपनी तर्जनी फिराई, उन्हें अलग करने की कोशिश की और सीधे सुरजू के होंठों पे

" अरे चख लो, खूब मीठ स्वाद है " बोल के बुच्ची का हाथ पकड़ के मुड़ गयी, और दरवाजा बंद करने के पहले दोनों से मुस्करा के बोली,

" अरे कोहबर क बात कोहबर में ही रह जाती है,... और वैसे भी छत पे रात में ताला बंद हो जाता है।

और सीढ़ी से धड़धड़ा के नीचे, बुच्ची का हाथ पकडे, बड़की ठकुराइन दो बार हाँक लगा चुकी थी। बहुत काम था आज दिन में,…

दिन शुरू हो गया था, आज से और मेहमान आने थे, रीत रस्म रिवाज भी शुरू होना था।

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" जा, अपने देवर के ले आवा, आज का काम शुरू होय, बहुत काम बचा है, अभी सुरजू का बूआ भी नहीं आयी " बार बार दरवाजे की ओर देखते,… सुरजू सिंह की माई इमरतिया से बोली।





आँगन में जमावड़ा लगना शुरू हो गया था औरतों, लड़कियों का।

बड़े सैय्यद की दुल्हिन, अभी डेढ़ साल पहले गौने उतरी थीं, सुरजू क असल भौजाई समझिये, ….और उनकी सास, ….

पश्चिम पट्टी क पंडिताइन भौजी, आधे दर्जन से ज्यादा सुरजू की माई की गाँव क देवरानी, जेठानी, गाँव क बहुएं , लड़किया, काम करने वाली,

आज अभी कोहबर लिखा जाना था, उसके पहले मंडप क पूजा, फिर मानर पूजा जाना था, उसके बाद,

और हर काम में इमरतिया और उसकी टोली वाली सब,

" हे चलो, जल्दी माई गुस्सा हो रही हैं, बूआ तोहार आने वाली हैं और ये सब क्या पहने हो, रस्म में ये सब नहीं "

और सुरजू के मना करते करते पैंट खींच के नीचे, और शर्ट खुद सुरजू ने उतार दी,….

" भौजी ये का, ,,,और दरवाजा भी खुला है "बेचारे सूरजु बोलते रह गए

लेकिन ऐसा जवान मर्द उघाड़े खड़ा हो तो जवान भौजाई क निगाह तो जहाँ पड़नी चाहिए वही पड़ी और इमरतिया खुश हो गयी । समझ गयी देवर सच में उसकी बात मानेंगे।

जैसे कल भौजी ने हुकुम दिया था, एकदम उसी तरह, लंड का टोपा एकदम खुला , लाल भभुका और भौजी कौन जो मौके का फायदा न उठाये। इमरतिया झुक के 'उससे ' बोली,





" सबेरे सबेरे दर्शन होगया बुच्ची की बुरिया का, है न एकदम मस्त। बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी उसमे घुसने के लिए, खूब कसी है रसीली लेकिन मजा भी उतना ही आएगा, एकदम कच्ची कोरी में पेलने में, थोड़ी मेहनत, ….थोड़ी जबरदस्ती "

और इमरतिया ने अपनी हथेली में थूक लगा के दस पांच बार उसे आगे पीछे, और वो फनफनाने लगा। लेकिन तभी नीचे से ठकुराइन की आवाज आये, " अरे दूल्हा क लैके जल्दी आओ "

सुरजू को पहनने के लिए एक बिना बांह वाली बनियान और एक छोटी सी थोड़ी ढीली नेकर मिली।

'जल्दी पहनो, अब आज से यही, हर रस्म में, तेल हल्दी चुमावन;" वो बोली और नेकर उसने जान बूझ के ऐसी चुनी थी। अंदर कुछ पहनने का सवाल नहीं, तो जैसे ही टनटनायेगा, साफ़ साफ़ दिखाई देगा और हल्दी लगाते, भौजाई सब जब अंदर तक हल्दी लगाएंगी तो ढीली नेकर में हाथ डालने में आसानी होगी।

और निकलते समय भी दो चार बार कस के नेकर के ऊपर से ही मसल दिया। सीढ़ी से उतरते समय भी बस उसी खूंटे को पकड़ के और नतीजा ये हुआ की जैसे सुरजू आंगन में पहुंचे सब उनकी भौजाइयां सीधे ‘वहीँ’ देख के खुल के मुस्कराने लगी।





और उनकी माई भी मुस्करा रही थीं, अपने दुलारे को देख के,… और बुच्ची को हड़काया,

"हे चलो, अपने भैया को बैठाओ, चौकी पे और साथ में रहना,… छोट बहिन हो,... खाली खाली नेग लेने के लिए।"

इमरतिया और बुच्ची सुरजू के पीछे, एकदम सट के, कई बार भौजाइयां रस्म करते करते लड़के को जोर से धक्का दे देती हैं, नाउन और बहन का काम है सम्हालना।

आज सुरुजू क माई फूले नहीं समा रही थी।

ख़ुशी छलक रही थी, वैसे भी उस जमाने के हिसाब से भी सुरजू सिंह की माई की कम उम्र में शादी होगयी, साल भर में गौना।

सूरजु के बाबू से रहा नहीं जा रहा था, तो पहले रात ही, और नौ महीने में ही सूरजु बाहर आ गए। ३५-३६ की उमर होगी, लगती दो चार साल कम ही थीं। भरी भरी देह, खूब खायी पी, लेकिन न मोटापा न आलस। कोई काम करने वाली न आये तो खुद घर का सारा काम अकेले निपटा लेती थीं , गाय भैंस दूहने से झाड़ू पोंछा, रसोई। इसलिए देह भी काम करने वालियों की तरह खूब गठी, हाथ पकड़ ले तो नयी नयी बहुरिया नहीं छुड़ा पाती।





खूब गोरी, चेहरे पर लुनाई भरी थी, गजब का नमक था। चौड़ा माथा, सुतवा नाक, बड़ी बड़ी आँखे, भरे भरे होंठ, लेकिन जो जान मारते थे उनके देवर, नन्दोई के,…. वो थे उनके जोबन, सबसे गद्दर, और उतने ही कड़े। और उनको भी ये बात मालूम थी, सब ब्लाउज एकदम टाइट, आँचल के अंदर से भी कड़ाव उभार, झलकता रहता और दर्जिन को कहना नहीं पड़ता, उसे मालूम था की गला इतना कटेगा की बस जरा सा आँचल हटे और गोलाई गहराई सब दिख जाए, और छोटा इतना हो की नाभि के ऊपर भी बित्ते भर पेट दिखे।

और मजाक, छेड़ने के मामले में, गाने, गवनही के मामले में, अकेले आठ दस नंदों के पेटीकोट का नाड़ा खोल लेती थीं।

आज खुश होने की बात भी थी, एकलौते लड़के की शादी थी, उसके चौके बैठने जा रही थीं।

और लड़का भी ऐसा, माँ को कहना भी नहीं पड़ता था, बस इशारा काफी था।

कहीं से दंगल जीत के आता तो पहले मंदिर फिर सीधे माई के पास, और कुल इनाम माई के गोड़ में रख के बस उनका मुंह देखता।

बौरहा, एकदम लजाधुर, और काम में भी सब खेत बाड़ी यहाँ का भी, अपने ननिहाल का भी, इसलिए आज जितने गाँव के लोग, नाते रिश्तेदार जुटे थे, उतने ही सूरजु की माई के मायके के भी, और फिर बहु भी, पहली बार गाँव में पढ़ी लिखी बहु आ रही थी, नहीं तो चिट्ठी पत्री पढ़ लेती बहुत से बहुत,

इस रस्म में माँ को लड़के के साथ चौके बैठना होता है और माँ आलमोस्ट गोदी में लेके छोटे बच्चे की तरह,

तो जैसे सूरजु की माई ने उन्हें अपनी गोद में खींचा, वो बेचारे लजा गए और कस के डांट पड़ गयी,

" हे काहें को लजा रहे हो। ससुराल जाओगे तो सास गोदी में दुबका के प्यार दुलार करेगी तो खुद उचक के बैठ जाओगे, अरे हमरे लिए तो बच्चे ही हो, "





और सूरजु की माई का आँचल ढुलक गया, दोनों जबरदस्त गोलाइयाँ, छलक गयी। पता नहीं मारे बदमाशी के या ऐसे ही। लेकिन जोबन थे उनके जान मारु

गाँव की बहुये जोर जोर से हंसने लगी, एक उनको चिढ़ाते हुए बोली, " अरे जरा नीचे देखिये तो पता चल जाएगा की हमारा देवर बच्चा है,… की बड़ा हो गया,:"

वाकई 'बड़ा' था।

कनखियों से सूरजु की माई ने देखा था, लेकिन अब सीधे वहीँ, नेकर पे निगाह थी। अपने बाबू पे गया था बल्कि उनसे भी आगे, बित्ता भर से कम नहीं होगा और मोटा कितना, लेकिन बहुओं को जवाब देती, मुस्करा के बोलीं,

" हे नजर मत लगावा,… थू, “

और इमरतिया से बोलीं,

" आज ही राय नोन से नजर उतारना हमरे बेटवा की " और इमरतिया क्यों मौका छोड़ती वो बुच्चिया की ओर देख के चिढ़ाते बोलीं,

" तनी काजर ले के टीक देना अपने भैया का, …अच्छी तरह से "

शादी ब्याह में, ख़ास तौर से लड़के के सबसे ज्यादा गरियाई जाती हैं, और कौन लड़के की बहिन और महतारी। और लड़के के महतारी के पीछे पड़ती हैं, लड़के की मामी और बूआ, उनकी महतारी की भाभी और ननद।

तो सूरजु की एक मामी जो कल ही आगयी थीं, सूरजु के ननिहाल से, सूरजु की महतारी को चिढ़ाती बोलीं,

" अरे काहें लजा रही हैं, बचपन में तो बहुत पकड़ा होगा। अंदर हाथ डाल के,.. पकड़ के सहला के देख लीजिये "





सूरजु की माई मुस्करा के रह गयी, वो कुछ और सोच रही थीं, मुस्करा रही थीं, उनका दुलरुआ उनके समधन की बिटिया की का हाल करेगा पहली रात।

और करना भी चाहिए… उसकी महतारी की जिम्मेमदारी है समझा बुझा के भेजे अपनी बिटिया को।

रस्म शुरू हो गयी, ढोलक टनकने लगी, बीच बीच में गाँव की बड़ी औरतें, और इमरतिया भी रस्म में मदद कर रही थीं,
 
कांती बूआ,





तभी दरवाजे के पास थोड़ा हलचल हुयी, मुन्ना बहू और एक और कहारिन गाने लगी, और गाँव की औरतें भी शामिल हो गयीं,

" ननंद रानी काहें बैठी हो मुंह लटकाये,…. यार मिले नहीं क्या दो चार "

और सूरजु की माई की आँखे दरवाजे की ओर, सुबह से इन्तजार कर रही थीं,…. सूरजु के बूआ की।

और वही आयी थीं, कांती बूआ,बुच्ची की मौसी.

सूरजु की माई और उनमे अजीब आंकड़ा था, बिना गरियाये दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर सकती थीं, लेकिन जैसे ही कांती बूआ आतीं फिर चौबीस घंटे ननद भाभी, एक थाली में खाना, पाटी में पाटी मिला के सोना, और बात की चक्की चलती ही रहती।

और पूरे गाँव में कांती बुआ अकेले थीं जो सूरजु के माई की गारी का, छेड़ खानी का जवाब दे पाती। हर बार रतजगा में एक दुलहा बनती दूसरी दुल्हन।

सूरजु की महतारी का चेहरा जैसे सूरज को देख के कमल खिल जाता है उस तरह खिलगया और अपनी ननद से बोलीं

" रस्ते में कितने मरद से चुदवा के आरही हैं,… जो इतना टाइम लग गया "





"अरे अपनी भौजाई के लिए बयाना दे रहे थे, दर्जन भर से कम मरद में कहाँ काम चलेगा, ....अइसन गहरा ताल पोखरा है " हंस के कांती बूआ बोलीं

और फिर से गाना चालु हो गया।

शादी बियाह में, जैसे सावन भादो की झड़ी नहीं रूकती वैसे गाने नहीं रुकते और ख़ास तौर से गारी। अबकी सूरजु की मामी ने शुरू किया ,

वो अपनी ननद को बिना रगड़े नहीं छोड़तीं तो ये तो ननद की नन्द, तो बस और उन्होंने सूरजु को भी लपेटे में लिया, अब नन्द छोटी हो बड़ी हो नाम नहीं लेते तो दूल्हे का ही नाम लगा के

दूल्हा आपन बूआ बेचें,



आजमगढ़ में आलू बेचें, बलिया में बोड़ा जी



दुलहा आपन बूआ बेचें, सौ रूपया जोड़ा जी

सूरजु सिंह की माई ने सूरजु की मामी की ओर देखा जैसे कह रही हों अरे हमार ननद है, इतना कम मिर्च से काम नहीं चलेगा और गाने का लेवल बढ़ गया

दूल्हा आपन बुआ चुदावें, अपने ननिहाल में जी।

अब दूल्हे की बुआ खुश हुयी, मुस्करा के सूरज की माई और मामी की ओर देखा और खुद बिना ढोलक के चालु हो गयी

दूल्हा आपन माई चुदावे, दूल्हा आपन मामी चुदावें

और साथ के लिए गाँव की लड़कियों की ओर देखा और वो सब भी चालू हो गयीं, आखिर कांती बुआ इसी गाँव की लड़की थीं

और टारगेट में दूल्हे की महतारी ही थीं,

अंगना में चकरी अजब घुमरी, अंगना में

दूल्हा क माई, सोमवार चुदावें, मंगलवार चुदावें,

बुध को दूल्हा खुद नंबर लगावें, दूल्हे की माई मजा ले ले चुदावें,





और दूल्हे की माई मजे से सुन रही थीं,.... औरचिढ़ा रही थीं सब लड़कियों को,

“बहुत जोश दिखा रही हो न। आज शाम गवनहि में तुम सब क शलवार खोली जायेगी, यह गाँव क कुल लड़की भाई चोद हैं, भाई को देख के खुद शलवार खोल के निहुर के खड़ी हो जाती हैं, ....आवा भैया, “





तो कांती बुआ ने जवाब में गाँव की लड़कियों की ओर से नया गाना शुरू किया,.... लेकिन निशाने पे उनकी भौजी, सूरज की माई,

और गाँव की सब लड़कियां उनका साथ दे रही थीं, खुल के खूब जोर जोर से गा रही थीं, ....और जहाँ सूरजु का नाम आता उन्हें देख के मुस्करातीं, चिढ़ाती, इशारे करतीं

अंगना में लाग गए काई जी, अरे अंगना में लाग गए काई जी ,

ओहि अंगना में निकली दूल्हे की माई, अरे निकली हमरी भौजाई, गिर पड़ी बिछलाई जी,

अरे दूल्हे की माई गिर पड़ी बिछलाई जी, अरे उनकी भोंसड़ी में घुस गयी लकडिया जी ,

दौड़ा दौड़ा दुलहा भैया दौड़ा दुआ सूरजु भैया, भोंसड़ी से खींचा लकडिया जी, अरे बुरिया से खींचा लकडिया जी


सूरजु को बहुत ख़राब लग रहा था, वो झेंप भी रहा था और कुछ कर भी नहीं सकता, लेकिनसाथ साथ गाँव की लड़कियों से ये सब एकदम खुला खुला सुन के मजा भी आ रहा था,

और बुआ की किसी बचपन की सहेली ने अगली लाइन शुरू कर दी

अरे अंगना में निकले दूल्हे की माई, अरे निकली हमार भौजाई, गिर पड़ी बिछलाई जी

और लड़कियां भी गाँव की अपनी बुआ के साथ,

अरे दूल्हे की माई गिर पड़ी बिछलाई रे, अरे उनकी गंडिया में घुस गयी लकडिया जी

दौड़ा दौड़ा दूल्हे भैया, दौड़ा दौड़ा सूरजु भैया, अरे गंडिया से खींचा लकडिया जी।





सूरजु के चेहरे से लग रहा था उसे थोड़ा खराब लग रहा है, ,,,,और जो दुलहा जितना झिझकता है उसकी उतनी रगड़ाई होती है। फिर कांती बूआ तो वो तेल पानी लेके चढ़ गयी अपने भतीजे के ऊपर.

" अरे काहें लजा रहे हो, अपनी माई की चुदाई की बात सुन के, …अरे हमरे भैया तोहरी माई को चोदे न होते तो तू कहाँ से होता, ...की अपने मामा क जामल हो? अपनी महतारी से पूछ ला, हमार भैया कैसे हचक हचक के तोहरे महतारी के पेले थे,.... हमही गए थे लाने सबेरे, उठा नहीं जा रहा था, इतना धक्का खायी थी "





अब सुरजू भी मजा लेने लगे थे, और बुआ तो तो जब आती थीं उसके पीछे पड़ के,

लेकिन अब सुरजू क माई लजा गयीं, पहली रात की बात सोच के,

सच में सुरजू के बाबू ने जबरदस्त फाड़ा था, और रात भर, ….

और सुबह यही सूरज क बूआ, उनकी छोटी ननद अपनी गाँव की दो सहेलियों के साथ, कुँवारी थीं तब कांती, बारी उमरिया, लेकिन बड़ा सहारा दी,





दोनों हाथ पकड़ के दो ननदों ने उठाया, एक ने पीछे से सहारा दिया। देह पूरी टूट रही थी, दर्द के मारे हालत ख़राब थी। और फिर चद्दर जब उन्होंने देखा तो एकदम खून से लाल, एक दो बूँद नहीं, बड़ा सा धब्बा, एकदम वो धक्क से रह गयीं,

लेकिन यही बूआ, चिढ़ाते हुए हिम्मत बढ़ाई,

" अरे भौजी ये खून वाली चद्दर ही तोहरे ननद क नेग है, अरे देखु आज से ठीक नौ महीने बाद भतीजा होई, तब लेब जबरदस्त नेग " और सच में सुरुजू नौ महीने बाद पधार गए।

लेकिन ननद की बात का जवाब न दें ऐसी भौजाई वो नहीं थी और सूरजु की बूआ को जवाब देते, हँसते हुए बोलीं

" देखो ननदी रानी, तोहार भैया हमें चोदे थे,... तो हमार महतारी भेजे थीं चुदवाने l और तोहार भैया गए थे २०० की बारात लेके लाने,… लेकिन ये बतावा की तू काहें सूरजु के बाबू से, अपने भैया से चुदवावत रहु "





गाँव की सब लड़कियां देख रही थीं, अब बूआ का बोलती हैं, कहीं गुस्सा तो नहीं हो जाएंगी लेकिन कांती बुआ, हसंते हुए जवाब दिया अपनी भौजी को

" अरे भौजी, यही कहते हैं की केहू का फायदा करावा, और वो ऊपर से नखड़ा चोदे, अरे तुहें तो अपनी ननद को धन्यवाद करना चाहिए की तोहरे मरद के सिखाय पढ़ाई के तैयार किये थे, नहीं तो कहीं पहली रात को बजाय अगवाड़े पेले के पीछे, पीछे ठोंक दिए होते तो चार दिन चला नहीं जात। "

भरौटी की एक ननद लगती थीं उन्होंने कांती बूआ को हड़काया, उमर में बड़ी भी थी।

" अरे साफ़ साफ़ बोलो न की कहीं हमार भैया पहली रात में ही गांड मार लिए होते " वो आगे कुछ बोलतीं की सुरजू की मामी बीच में कूद पड़ी
 
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