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चला मानर परछे

तभी हल्ला हुआ मानर आया, मानर आया बाहर से ढोलक बजने की आवाज आ रही थी, चमरौटी से मानर आया था
सुरजू की बुआ ने उनकी माई को गरियाते हुए कहा, "हे दूल्हा क माई, हमरे भतीजा क खूंटा बहुत देर निहार ली, चला मानर परछे।
और सब औरतें झरर मार के दरवाजे की ओर जिधर से ढोलक बजने की आवाज आ रही थी,
नाउन इमरतिया भी सूप में मानर परछने का सामन लेके सुरजू की माई के साथ, जैसे जैसे ढोलक की आवाज तेज हो रही थी, वैसे ही औरतों के गाने की आवाज, और उनमे सबसे तेज टेर रही थीं, सुरजू के ननिहाल से आयी, उनकी भौजाई, मंजू भाभी।

कोई कह नहीं सकता था साल में नौ दस महीने अपने घर बंबई में रहती हैं,
कवन बाबा दुअरुआ बाजन एक बाजेला है, अरे हमरे देवरा के, सुरजू के बाबा के दुअरवा बाबा एक बाजल हो
बाजो नारायण, बाजो बासुदेव, अरे पितर लोगन के दुअरवा, अरे पितर लोगन के दुअरवा बाजन एक बाजल हो
सुरजू की माई दूब अक्षत पैसा लेकर ढोलक पे सिंदूर से टीक रही थीं और पांच बार टीकने के बाद जो ढोलक लायी थी वो ढोलक पर से सब सुरजू की माई के अंचरा में
गाने की धार रुक नहीं रही थी, पूरब पट्टी की बिटिया,… गुड़िया अभी ससुराल से लौटी थी, उसने अगला गाना पकड़ा और फिर मंजू भाभी और बाकी सब औरतें,
केकरा घर के लाल दुअरुआ , केकरा घर के लाल दुअरवा, केकरा घर के ढोल
केकरा घर की पतरी तिरियावा, केकरा घर के पतरी तिरयावा, मानर पूजे जात
अरे हमरे सुरजू भैया के लाल दुअराउआ, अरे मुन्ना क काकी के ढोल
अरे सुरजू भैया के बाबा की पतरी तिरियवा, अरे हमार चाची, सुरजू भैया क माई, मानर पूजे जात।
---
लेकिन वहीँ से कांती बुआ ने गाना उठा लिया, दूल्हे की माई मानर पूज रही हो और गरियाई न जाए, वो भी ननदों के रहते,
अरे सुरजू भैया क छिनार महतरिया, रंडी क जनी, जब्बर छिनारिया, मानर पूजे जाय ,
सूरज की महतारी जोर से मुस्करायी, आँचल से तीन बार ढोलक परछ चुकी थीं और जो मानर ले के आयी थीं वो भी तो गाँव की भौजाई थी तो सुरजू की महतारी ने मुस्करा के अगली बार पूजते पूछ लिया
“मानर क का नेग चाही, देखा तोहरे लिए मस्त माल मंगाया है "और बूआ की ओर इशारा करते हुए छेड़ा,
"भतीजा की शादी है,.... दुनो जोबन लुटायेंगी, “

उधर ये सब छेड़ खानी चली रही थी, उधर बुच्ची अपनी बदमांशी में, उसे मालूम था की उसके भैया की निगाह कहाँ पे , बस हलके से अपने चूतड़ सुरजू को दिखाते हुए मटका दिए,
बेचारे सुरुजू की हालत खराब,
कहते हैं की औरतों की चार आँखे होती हैं , आगे भी पीछे भी और बियाह शादी के घर में तो नाउन की दर्जन आँखे होती हैं, और दो दर्जन हाथ
इमरतिया बुच्ची के साथ सट के खड़ी थी, एक हाथ से परछन का समान पकडे बस दूसरे हाथ से पीछे से बुच्ची का फ्राक उठा के हटा दिया,
गोल गोल मस्त चूतड़, एकदम चिपके, गोरे गोरे, मक्खन मलाई,

बेचारे सुरजू सिंह की हालत खराब, मन तो कर रहा था की यही पटक के पेल दें, आज तक कभी किसी को पेला नहीं था, लकिन अब बस वही मन कर रहा था,.. और अब रहा नहीं जा रहा था।
अब बूआ मानर परछ रही थीं और जो ढोलक लायी थी, वो गाँव के रिश्ते से तो कांति बूआ की भौजी ही लगती थीं, तो आँचर से परछते हुए दो बार तो शराफत से परसा लेकिन तीसरी बार सीधे जोबन पे हाथ लगा के कस के दबा दिया और अब दूल्हे की महतारी के साथ दूल्हे को भी लपेटा जा रहा था
उपेन्दर क जामल, दूल्हा, अरे सुरेंदर क जामल दुलहा, अपने मामा क जामल दुलहा,
और बूआ का मन कहाँ इससे भरने वाला था तो उन्होंने अपनी भौजाई को सीधे लपेटा,
सब कोई पूजे मानर, आनर, अरे सब कोई पूजे मानर आनर, अरे दूल्हे की माई तो पूजे,... दूल्हे का लंड,

लेकिन बजाय बुरा मानने के दूल्हे की माई हंस के अपनी ननद से अपने बेटवा की ओर देख के बोलीं,
" अरे पूजे लायक होएगी कोई चीज तो जरूर पूजी जायेगी, और इतना मन कर रहा हो भतीजे का लेना का तो ले लीजिये न अंदर पूरा, …सुरजू के बाबू की याद आ जायेगी, जब हमारे आये के पहले रोज बिना नांगा लेती थी। "
फिर गाँव की बहुओ की ओर देख के मुस्करा के बोली, " यह गाँव क कुल लड़किया स्साली भाई चोद हैं, ...चाहे हमार नन्द होय चाहे तोहार लोगन क "
इमरतिया ने बगल में सट के खड़ी बुच्ची के कंधे पे हाथ रखा था, उसकी चूँची हलके से टीपते बोली,
" हमार वाली तो पक्की भाई चोद है,... अगवाड़े और पिछवाड़े दोनों क छिनार, ....देवर हमार हिचकेंगे तो खुद चढ़ के पेल देती है "
बुच्ची ने एक बार और अपना पिछवाड़ा मटकाया, और मूड के सरजू को देख के जीभ चिढ़ा दी।

तभी हल्ला हुआ मानर आया, मानर आया बाहर से ढोलक बजने की आवाज आ रही थी, चमरौटी से मानर आया था
सुरजू की बुआ ने उनकी माई को गरियाते हुए कहा, "हे दूल्हा क माई, हमरे भतीजा क खूंटा बहुत देर निहार ली, चला मानर परछे।
और सब औरतें झरर मार के दरवाजे की ओर जिधर से ढोलक बजने की आवाज आ रही थी,
नाउन इमरतिया भी सूप में मानर परछने का सामन लेके सुरजू की माई के साथ, जैसे जैसे ढोलक की आवाज तेज हो रही थी, वैसे ही औरतों के गाने की आवाज, और उनमे सबसे तेज टेर रही थीं, सुरजू के ननिहाल से आयी, उनकी भौजाई, मंजू भाभी।

कोई कह नहीं सकता था साल में नौ दस महीने अपने घर बंबई में रहती हैं,
कवन बाबा दुअरुआ बाजन एक बाजेला है, अरे हमरे देवरा के, सुरजू के बाबा के दुअरवा बाबा एक बाजल हो
बाजो नारायण, बाजो बासुदेव, अरे पितर लोगन के दुअरवा, अरे पितर लोगन के दुअरवा बाजन एक बाजल हो
सुरजू की माई दूब अक्षत पैसा लेकर ढोलक पे सिंदूर से टीक रही थीं और पांच बार टीकने के बाद जो ढोलक लायी थी वो ढोलक पर से सब सुरजू की माई के अंचरा में
गाने की धार रुक नहीं रही थी, पूरब पट्टी की बिटिया,… गुड़िया अभी ससुराल से लौटी थी, उसने अगला गाना पकड़ा और फिर मंजू भाभी और बाकी सब औरतें,
केकरा घर के लाल दुअरुआ , केकरा घर के लाल दुअरवा, केकरा घर के ढोल
केकरा घर की पतरी तिरियावा, केकरा घर के पतरी तिरयावा, मानर पूजे जात
अरे हमरे सुरजू भैया के लाल दुअराउआ, अरे मुन्ना क काकी के ढोल
अरे सुरजू भैया के बाबा की पतरी तिरियवा, अरे हमार चाची, सुरजू भैया क माई, मानर पूजे जात।
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लेकिन वहीँ से कांती बुआ ने गाना उठा लिया, दूल्हे की माई मानर पूज रही हो और गरियाई न जाए, वो भी ननदों के रहते,
अरे सुरजू भैया क छिनार महतरिया, रंडी क जनी, जब्बर छिनारिया, मानर पूजे जाय ,
सूरज की महतारी जोर से मुस्करायी, आँचल से तीन बार ढोलक परछ चुकी थीं और जो मानर ले के आयी थीं वो भी तो गाँव की भौजाई थी तो सुरजू की महतारी ने मुस्करा के अगली बार पूजते पूछ लिया
“मानर क का नेग चाही, देखा तोहरे लिए मस्त माल मंगाया है "और बूआ की ओर इशारा करते हुए छेड़ा,
"भतीजा की शादी है,.... दुनो जोबन लुटायेंगी, “

उधर ये सब छेड़ खानी चली रही थी, उधर बुच्ची अपनी बदमांशी में, उसे मालूम था की उसके भैया की निगाह कहाँ पे , बस हलके से अपने चूतड़ सुरजू को दिखाते हुए मटका दिए,
बेचारे सुरुजू की हालत खराब,
कहते हैं की औरतों की चार आँखे होती हैं , आगे भी पीछे भी और बियाह शादी के घर में तो नाउन की दर्जन आँखे होती हैं, और दो दर्जन हाथ
इमरतिया बुच्ची के साथ सट के खड़ी थी, एक हाथ से परछन का समान पकडे बस दूसरे हाथ से पीछे से बुच्ची का फ्राक उठा के हटा दिया,
गोल गोल मस्त चूतड़, एकदम चिपके, गोरे गोरे, मक्खन मलाई,

बेचारे सुरजू सिंह की हालत खराब, मन तो कर रहा था की यही पटक के पेल दें, आज तक कभी किसी को पेला नहीं था, लकिन अब बस वही मन कर रहा था,.. और अब रहा नहीं जा रहा था।
अब बूआ मानर परछ रही थीं और जो ढोलक लायी थी, वो गाँव के रिश्ते से तो कांति बूआ की भौजी ही लगती थीं, तो आँचर से परछते हुए दो बार तो शराफत से परसा लेकिन तीसरी बार सीधे जोबन पे हाथ लगा के कस के दबा दिया और अब दूल्हे की महतारी के साथ दूल्हे को भी लपेटा जा रहा था
उपेन्दर क जामल, दूल्हा, अरे सुरेंदर क जामल दुलहा, अपने मामा क जामल दुलहा,
और बूआ का मन कहाँ इससे भरने वाला था तो उन्होंने अपनी भौजाई को सीधे लपेटा,
सब कोई पूजे मानर, आनर, अरे सब कोई पूजे मानर आनर, अरे दूल्हे की माई तो पूजे,... दूल्हे का लंड,

लेकिन बजाय बुरा मानने के दूल्हे की माई हंस के अपनी ननद से अपने बेटवा की ओर देख के बोलीं,
" अरे पूजे लायक होएगी कोई चीज तो जरूर पूजी जायेगी, और इतना मन कर रहा हो भतीजे का लेना का तो ले लीजिये न अंदर पूरा, …सुरजू के बाबू की याद आ जायेगी, जब हमारे आये के पहले रोज बिना नांगा लेती थी। "
फिर गाँव की बहुओ की ओर देख के मुस्करा के बोली, " यह गाँव क कुल लड़किया स्साली भाई चोद हैं, ...चाहे हमार नन्द होय चाहे तोहार लोगन क "
इमरतिया ने बगल में सट के खड़ी बुच्ची के कंधे पे हाथ रखा था, उसकी चूँची हलके से टीपते बोली,
" हमार वाली तो पक्की भाई चोद है,... अगवाड़े और पिछवाड़े दोनों क छिनार, ....देवर हमार हिचकेंगे तो खुद चढ़ के पेल देती है "
बुच्ची ने एक बार और अपना पिछवाड़ा मटकाया, और मूड के सरजू को देख के जीभ चिढ़ा दी।
















