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कटोरे का हलवा
इमरतिया हचक के आज चुदी थी,
एक बार देवर सूरजु ने ऊपर चढ़ के कचरा था और फिर निहुरा के,
और भौजाई को बिस्वास हो गया था अब देवर अखाड़े में उतरने के लिए तैयार है। कोई स्साली सामने आएगी तो उसको और उसकी माँ दोनों को चोद के रख देगा। इमरतिया की उठने की हालत नहीं थी, बुर धक्के खा के लाल हो गयी थी, कल्ला रही थी, लेकिन उसको मालूम था, देवर को अभी एक तैयारी और करानी है।
किसी नयी कच्ची बिन चुदी लौंडिया के ऊपर चढाने की,
लौंड़ा भले ही सूरजबली सिंह का पत्थर का है लेकिन दिल मक्खन का है।
और जहां वो थोड़ा बहुत चीखी चिल्लाई हाथ पैर झटकी, दर्द से तड़पी, हाय बप्पा, हाय मैया की, बस वो बाहर निकाल लेगा,
और नयी दुलहिनिया को तो उसके गाँव की नाउन, सहेली, भौजाई कुल समझा के भेजती हैं, भले दस लौंड़ा घोंट के गवने उतरी हो लेकिन ऐसा चिल्लायेगी जैसे लंड नहीं घोंट रही गले पे छुरी चल रही है। इसलिए अपने सामने किसी कच्ची कली की फड़वाना जरूरी है और बुच्ची अब तैयार भी है, लेकिन अपने सामने उसकी फड़वाना होगा,
पर देवर अगर एक दो और कच्ची अमिया चख लेते, टिकोरे कुतर लेते तो एकदम पक्के हो जाते,
और वो भी खुद से बिना इमरतिया के उसका हाथ पैर पकडे,
कल बड़की ठकुराइन मुन्ना बहू से बोली तो थीं, आज किसी को ले आने को और मुन्ना बहू से ज्यादा इस काम में इस गाँव में कोई नहीं है, चाहे एक से एक चुदक्कड़ लड़के हों, या छिनार लड़कियां या फिर कच्ची कोरी कुँवारी।
पता नहीं किसको ले आयी है और अब टाइम भी नहीं रह गया है, एक बार चोदने से कुछ नहीं होता।
और उसके बाद तरह तरह के आसन सिखाने का काम,
पहले दिन तो सिर्फ ऊपर चढ़ के, दूसरे दिन निहुराय के, तीसरे दिन गोदी में बैठे के और चौथे दिन तक तो कम से कम दर्जन भर तरीके से, खड़े खड़े भी अगर दुलहिनिया चुद जाए तो वो मान जाती है हाँ मर्द दमदार है।
इमरतिया ने घडी की ओर देखा, करीब बीस पचीस मिनट बचा था, हल्दी की रसम होने में , भाभियाँ खूब छेड़ती हैं चाहे बन्नी हो या बन्ना, और सूरजु की तो पेसल रगड़ाई होगी आज।
किसी तरह सहारा लेकर इमरतिया खड़ी हुयी, पेटीकोट ब्लाउज पहना, और सूरजु के देह पे लगा बुकवा छुड़ाना और मालिश करना एक बार फिर शुरू किया, बस पांच दस मिनट का काम बचा था, और इमरतिया की निगाह देवर के 'छोटे पहलवान' पर पड़ी।
अब तक बीसो मूसल घोंट चुकी नउनिया भौजी कुछ अचरज से कुछ लालच से निहार रही थीं, पूरा टनटनाने के बाद जितना किसी मर्द का नहीं होता उतना, ये थोड़ा सोया थोड़ा जागा, देवर का 'छोटा पहलवान' उससे ज्यादा जबरदंग लग रहा था। अभी भी कटोरी में वो तेल बचा था जो इस मूसल पे लगाने के लिए वो लायी थी, उसका असर तो दस बीस मिनट में शुरू जो जाएगा, और काम से छह सात घंटे तक ये टनटनाया रहेगा, दो चार बार पानी निकालने के बाद भी।
बुकवा छुड़ाने के बाद दोनों हाथों में वो 'जादुई तेल " जिसमे सांडे का तेल, शिलाजीत और न जाने कौन कौन सी जड़ी बूटी पड़ी थी, हाथ में मल कर इमरतिया भौजी ने छोटे पहलवान पर मालिश शुरू की और मन में उनके सिर्फ बुच्ची थी, ये मोटू कैसे बुच्ची की कोरी कच्ची बिल में जाएगा
कल सबके सामने बुच्ची ने खुद बोला है आज सांझ के पहले, सूरज डूबने के पहले सूरज भैया का पूरा खूंटा घोंटेगी, और घोंटना तो पड़ेगा ही वो भी इमरतिया के सामने
सूरजु भी बुच्ची के बारे में सोच रहे थे और छोटे पहलवान जगना शुरू हो गए,
नीचे बुच्ची अपने सूरजु भैया के लिए पांच गाँठ हल्दी पीस रही थी और भाभियाँ जम के खुल के गरिया रही थीं अपनी बुच्ची ननदिया को सूरजु सिंह का नाम जोड़ जोड़ के
बरइन बीरा लगाओ,
अरे वो बीरा खाएं, सूरजु सिंह की बहिनी, अरे वो बीरा खाएं बुच्ची छिनारिया
खाते गरभ रह जाए, अरे खाते गरभ रह जाए
अरे बुच्ची केकर गरभ रखाऊ,
अरे एक रात सोई सूरजु भैया संग, उन्ही से पेट रखाई,
रामपुर वाली भाभी ने अपने भाई गप्पू का नाम जोड़ के गाया
" अरे भौजी, एक रात सोई गप्पू के संग, उन्ही से पेट रखाई "
इमरतिया हचक के आज चुदी थी,
एक बार देवर सूरजु ने ऊपर चढ़ के कचरा था और फिर निहुरा के,
और भौजाई को बिस्वास हो गया था अब देवर अखाड़े में उतरने के लिए तैयार है। कोई स्साली सामने आएगी तो उसको और उसकी माँ दोनों को चोद के रख देगा। इमरतिया की उठने की हालत नहीं थी, बुर धक्के खा के लाल हो गयी थी, कल्ला रही थी, लेकिन उसको मालूम था, देवर को अभी एक तैयारी और करानी है।
किसी नयी कच्ची बिन चुदी लौंडिया के ऊपर चढाने की,
लौंड़ा भले ही सूरजबली सिंह का पत्थर का है लेकिन दिल मक्खन का है।
और जहां वो थोड़ा बहुत चीखी चिल्लाई हाथ पैर झटकी, दर्द से तड़पी, हाय बप्पा, हाय मैया की, बस वो बाहर निकाल लेगा,
और नयी दुलहिनिया को तो उसके गाँव की नाउन, सहेली, भौजाई कुल समझा के भेजती हैं, भले दस लौंड़ा घोंट के गवने उतरी हो लेकिन ऐसा चिल्लायेगी जैसे लंड नहीं घोंट रही गले पे छुरी चल रही है। इसलिए अपने सामने किसी कच्ची कली की फड़वाना जरूरी है और बुच्ची अब तैयार भी है, लेकिन अपने सामने उसकी फड़वाना होगा,
पर देवर अगर एक दो और कच्ची अमिया चख लेते, टिकोरे कुतर लेते तो एकदम पक्के हो जाते,
और वो भी खुद से बिना इमरतिया के उसका हाथ पैर पकडे,
कल बड़की ठकुराइन मुन्ना बहू से बोली तो थीं, आज किसी को ले आने को और मुन्ना बहू से ज्यादा इस काम में इस गाँव में कोई नहीं है, चाहे एक से एक चुदक्कड़ लड़के हों, या छिनार लड़कियां या फिर कच्ची कोरी कुँवारी।
पता नहीं किसको ले आयी है और अब टाइम भी नहीं रह गया है, एक बार चोदने से कुछ नहीं होता।
और उसके बाद तरह तरह के आसन सिखाने का काम,
पहले दिन तो सिर्फ ऊपर चढ़ के, दूसरे दिन निहुराय के, तीसरे दिन गोदी में बैठे के और चौथे दिन तक तो कम से कम दर्जन भर तरीके से, खड़े खड़े भी अगर दुलहिनिया चुद जाए तो वो मान जाती है हाँ मर्द दमदार है।
इमरतिया ने घडी की ओर देखा, करीब बीस पचीस मिनट बचा था, हल्दी की रसम होने में , भाभियाँ खूब छेड़ती हैं चाहे बन्नी हो या बन्ना, और सूरजु की तो पेसल रगड़ाई होगी आज।
किसी तरह सहारा लेकर इमरतिया खड़ी हुयी, पेटीकोट ब्लाउज पहना, और सूरजु के देह पे लगा बुकवा छुड़ाना और मालिश करना एक बार फिर शुरू किया, बस पांच दस मिनट का काम बचा था, और इमरतिया की निगाह देवर के 'छोटे पहलवान' पर पड़ी।
अब तक बीसो मूसल घोंट चुकी नउनिया भौजी कुछ अचरज से कुछ लालच से निहार रही थीं, पूरा टनटनाने के बाद जितना किसी मर्द का नहीं होता उतना, ये थोड़ा सोया थोड़ा जागा, देवर का 'छोटा पहलवान' उससे ज्यादा जबरदंग लग रहा था। अभी भी कटोरी में वो तेल बचा था जो इस मूसल पे लगाने के लिए वो लायी थी, उसका असर तो दस बीस मिनट में शुरू जो जाएगा, और काम से छह सात घंटे तक ये टनटनाया रहेगा, दो चार बार पानी निकालने के बाद भी।
बुकवा छुड़ाने के बाद दोनों हाथों में वो 'जादुई तेल " जिसमे सांडे का तेल, शिलाजीत और न जाने कौन कौन सी जड़ी बूटी पड़ी थी, हाथ में मल कर इमरतिया भौजी ने छोटे पहलवान पर मालिश शुरू की और मन में उनके सिर्फ बुच्ची थी, ये मोटू कैसे बुच्ची की कोरी कच्ची बिल में जाएगा
कल सबके सामने बुच्ची ने खुद बोला है आज सांझ के पहले, सूरज डूबने के पहले सूरज भैया का पूरा खूंटा घोंटेगी, और घोंटना तो पड़ेगा ही वो भी इमरतिया के सामने
सूरजु भी बुच्ची के बारे में सोच रहे थे और छोटे पहलवान जगना शुरू हो गए,
नीचे बुच्ची अपने सूरजु भैया के लिए पांच गाँठ हल्दी पीस रही थी और भाभियाँ जम के खुल के गरिया रही थीं अपनी बुच्ची ननदिया को सूरजु सिंह का नाम जोड़ जोड़ के
बरइन बीरा लगाओ,
अरे वो बीरा खाएं, सूरजु सिंह की बहिनी, अरे वो बीरा खाएं बुच्ची छिनारिया
खाते गरभ रह जाए, अरे खाते गरभ रह जाए
अरे बुच्ची केकर गरभ रखाऊ,
अरे एक रात सोई सूरजु भैया संग, उन्ही से पेट रखाई,
रामपुर वाली भाभी ने अपने भाई गप्पू का नाम जोड़ के गाया
" अरे भौजी, एक रात सोई गप्पू के संग, उन्ही से पेट रखाई "