Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 110 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

कटोरे का हलवा



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इमरतिया हचक के आज चुदी थी,

एक बार देवर सूरजु ने ऊपर चढ़ के कचरा था और फिर निहुरा के,

और भौजाई को बिस्वास हो गया था अब देवर अखाड़े में उतरने के लिए तैयार है। कोई स्साली सामने आएगी तो उसको और उसकी माँ दोनों को चोद के रख देगा। इमरतिया की उठने की हालत नहीं थी, बुर धक्के खा के लाल हो गयी थी, कल्ला रही थी, लेकिन उसको मालूम था, देवर को अभी एक तैयारी और करानी है।

किसी नयी कच्ची बिन चुदी लौंडिया के ऊपर चढाने की,

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लौंड़ा भले ही सूरजबली सिंह का पत्थर का है लेकिन दिल मक्खन का है।

और जहां वो थोड़ा बहुत चीखी चिल्लाई हाथ पैर झटकी, दर्द से तड़पी, हाय बप्पा, हाय मैया की, बस वो बाहर निकाल लेगा,

और नयी दुलहिनिया को तो उसके गाँव की नाउन, सहेली, भौजाई कुल समझा के भेजती हैं, भले दस लौंड़ा घोंट के गवने उतरी हो लेकिन ऐसा चिल्लायेगी जैसे लंड नहीं घोंट रही गले पे छुरी चल रही है। इसलिए अपने सामने किसी कच्ची कली की फड़वाना जरूरी है और बुच्ची अब तैयार भी है, लेकिन अपने सामने उसकी फड़वाना होगा,

पर देवर अगर एक दो और कच्ची अमिया चख लेते, टिकोरे कुतर लेते तो एकदम पक्के हो जाते,

और वो भी खुद से बिना इमरतिया के उसका हाथ पैर पकडे,

कल बड़की ठकुराइन मुन्ना बहू से बोली तो थीं, आज किसी को ले आने को और मुन्ना बहू से ज्यादा इस काम में इस गाँव में कोई नहीं है, चाहे एक से एक चुदक्कड़ लड़के हों, या छिनार लड़कियां या फिर कच्ची कोरी कुँवारी।

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पता नहीं किसको ले आयी है और अब टाइम भी नहीं रह गया है, एक बार चोदने से कुछ नहीं होता।

और उसके बाद तरह तरह के आसन सिखाने का काम,

पहले दिन तो सिर्फ ऊपर चढ़ के, दूसरे दिन निहुराय के, तीसरे दिन गोदी में बैठे के और चौथे दिन तक तो कम से कम दर्जन भर तरीके से, खड़े खड़े भी अगर दुलहिनिया चुद जाए तो वो मान जाती है हाँ मर्द दमदार है।

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इमरतिया ने घडी की ओर देखा, करीब बीस पचीस मिनट बचा था, हल्दी की रसम होने में , भाभियाँ खूब छेड़ती हैं चाहे बन्नी हो या बन्ना, और सूरजु की तो पेसल रगड़ाई होगी आज।

किसी तरह सहारा लेकर इमरतिया खड़ी हुयी, पेटीकोट ब्लाउज पहना, और सूरजु के देह पे लगा बुकवा छुड़ाना और मालिश करना एक बार फिर शुरू किया, बस पांच दस मिनट का काम बचा था, और इमरतिया की निगाह देवर के 'छोटे पहलवान' पर पड़ी।

अब तक बीसो मूसल घोंट चुकी नउनिया भौजी कुछ अचरज से कुछ लालच से निहार रही थीं, पूरा टनटनाने के बाद जितना किसी मर्द का नहीं होता उतना, ये थोड़ा सोया थोड़ा जागा, देवर का 'छोटा पहलवान' उससे ज्यादा जबरदंग लग रहा था। अभी भी कटोरी में वो तेल बचा था जो इस मूसल पे लगाने के लिए वो लायी थी, उसका असर तो दस बीस मिनट में शुरू जो जाएगा, और काम से छह सात घंटे तक ये टनटनाया रहेगा, दो चार बार पानी निकालने के बाद भी।

बुकवा छुड़ाने के बाद दोनों हाथों में वो 'जादुई तेल " जिसमे सांडे का तेल, शिलाजीत और न जाने कौन कौन सी जड़ी बूटी पड़ी थी, हाथ में मल कर इमरतिया भौजी ने छोटे पहलवान पर मालिश शुरू की और मन में उनके सिर्फ बुच्ची थी, ये मोटू कैसे बुच्ची की कोरी कच्ची बिल में जाएगा

कल सबके सामने बुच्ची ने खुद बोला है आज सांझ के पहले, सूरज डूबने के पहले सूरज भैया का पूरा खूंटा घोंटेगी, और घोंटना तो पड़ेगा ही वो भी इमरतिया के सामने

सूरजु भी बुच्ची के बारे में सोच रहे थे और छोटे पहलवान जगना शुरू हो गए,

नीचे बुच्ची अपने सूरजु भैया के लिए पांच गाँठ हल्दी पीस रही थी और भाभियाँ जम के खुल के गरिया रही थीं अपनी बुच्ची ननदिया को सूरजु सिंह का नाम जोड़ जोड़ के

बरइन बीरा लगाओ,

अरे वो बीरा खाएं, सूरजु सिंह की बहिनी, अरे वो बीरा खाएं बुच्ची छिनारिया

खाते गरभ रह जाए, अरे खाते गरभ रह जाए

अरे बुच्ची केकर गरभ रखाऊ,



अरे एक रात सोई सूरजु भैया संग, उन्ही से पेट रखाई,

रामपुर वाली भाभी ने अपने भाई गप्पू का नाम जोड़ के गाया

" अरे भौजी, एक रात सोई गप्पू के संग, उन्ही से पेट रखाई "
 
कच्ची अमिया

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वो 'जादुई तेल ' लगाते इमरतिया सूरजु को चिढ़ा रही थी,'छोटे पहलवान ' पूरी तरह जग गए थे, बित्ते से बड़े, फनफना रहे थे, बुच्ची की गारी वो भी सुन रहे थे,

" आज ये जाएगा बुच्ची की बुरिया में " तेल ख़तम करते और कस के मुट्ठी में लेकर दबाते इमरतिया ने सूरजु को छेड़ा लेकिन अब देवर भी भौजाई के मजाक का जवाब देने लगा था,

" अरे भौजी तोहरे मुंह में घी गुड़ " हसंते हुए देवरु पहलवान बोले।

कटोरे का हलवा अभी भी आधा बचा था,

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बुआ ने दस बार टोका था, नीचे लाने के पहले पूरा कटोरा भर के खिला देना, लेकिन ग्रहण के दौरान कुछ खाना पीना मना था इसलिए कुछ ग्रहण लगने के पहले हलवा इमरतिया ने जो खिलाया तो उसके देवर ने दो बार इमरतिया का हलवा बना दिया, और अब बाकी खतम करना था

और हलवा खिलाते हुए इमरतिया सूरजु को मन से कच्ची कलियों के लिए तैयार कर रही थी,

तन तो उसका तगड़ा था है और ये हलवा और तेल और उस सांड को दस सांड के बराबर की ताकत दे देंगे लेकिन असली बात तो मन से तैयार करना था और सिखाना पढ़ना था , खेली खायी औरत जहाँ इत्ते लम्बे मोटे लंड को देख के खुद बौरा जाती, पकड़ के अपने बिल में लगाती, नीचे से धक्का लगा के खुद घोंट लेती,...

लेकिन नई नवेली वहीँ इतना बड़ा मूसल देख के घबड़ा जाती, छिनरपन करती, मन भले करता लेकिन, लेने में नौटंकी करती।इमरतिया ने अपने देवर सूरजू को समझाना शुरू किया, कैसे कच्ची कलियों को पटाया जाए, उन्हें थोड़ा बहला के थोड़ी जबरदस्ती कर के, कली से फूल बनाया जाए, जो मजा ताज़ी कली के चटकने का है वो किसी में नहीं

" देखो, बुच्ची हो या कोई और कच्ची अमिया वाली, पहले उसको अपना ये मूसल दिखा के, पकड़ा के ललचाओ, खुद उसकी बिल पनिया जायेगी। कोई मौका दिखाने का मत छोडो, जैसे लड़के लड़कियों की चूँची, कुर्ती और ब्रा के अंदर से देख लेते हैं वैसे लड़कियां भी देख के सोचती हैं कितना बड़ा होगा, मोटा होगा, तो इस लिए कोई मौका मत छोड़ना आपने छोटे पहलवान क दर्शन करवाने का।

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दूसरी बात सीधे मत ठेल देना, खूब बुरिया पे रगड़ना, दोनों फांको के ऊपर, फांको के बीच, फिर ऊँगली में तेल लगा के एक पोर कम से कम अंदर घुसेड़ना, और गोल गोल, कभी दाएं बाएं चार पांच मिनट, वो खूब चिल्लायेगी चूतड़ पटकेगी, तो चिल्लाने देना उसको।

एक तो फायदा है रो गाके उछल कूद के चुप हो जायेगी, थक जाएगी, और दूसरा जब पेलोगे तो उतना नहीं चिल्ला पाएगी। हाँ जब सूपड़ा एक बार दोनों फांक के बीच फंसा के धक्का मारोगे न तो एकदम बेरहमी से मारना, पूरी ताकत से ठेलना, और बड़ी जोर से उछलेगी, चिल्लायेगी तो पूरी देह का वजन उसकी देह पे और कलाई कस के पूरी ताकत से , जैसे अखाड़े में दूसरे पहलवान को चांप के दबोचते हो न, एकदम उसी तरह से, और होंठ से उसके होंठ भींच के, अपनी जुबान उसके मुंह में डाल के, जबतक सुपाड़ा पूरी तरह न घुस जाये, बस खाली ठेलते जाना, और जब सुपाड़ा घुस जाए तो रुक जाना। "

" क्यों भौजी " सूरजु इमरतिया की एक एक बात सुन रहे थे जैसे अखाड़े में अपने गुरु की हर बात सुनते समझते थे, एक एक बात मानते थे, एकदम उसी तरह

सूरजु ने अपनी जिंदगी में अब तक तीन गुरु माने थे,

पहली और सबसे बड़ी गुरु उनकी माई, सूरज चाहे इधर से उधर हो जाए, सूरजु सिंह उनकी बात नहीं टाल सकते थे, पिता की ज्यादा याद नहीं थी उनको बस माई की, और बचपन से सब बातें उन्ही की मानते आये थे तो जब माई ने कहा की इमरतिया भौजी की कुल बात मानना तो बस आखिरी आखर

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दूसरे गुरु, उनके अखाड़े वाले जिन्होंने सूरजु सिंह की सब दांव पेंच सिखाये, जीने का तरीका सिखाया और इतने दंगल जितवा के एक नया नाम दिया पहचान दी की पचास सौ कोस में लोग उनको दूर से देख के पहचानते हैं की सूरजु सिंह आ रहे हैं। लेकिन गुरू जी ने खुद कहा अब तुम अखाड़े में नहीं आ सकते लेकिन जिन्नगी का अखाडा कम जोरदार नहीं है, हमारा आशिर्बाद है वहां भी जीतोगे। अब तुम लंगोट की कसम से आजाद हो, हाँ वहां तुम को कोई नया गुरु मिलेगा नए अखाड़े का दांव पेंच सिखाएगा, उस की भी सब मानना समझना

और वह गुरु बनी इमरतिया भौजी।

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माई का हुकुम और फिर गुरु का हुकुम तो तीसरी गुरु इमरतिया भौजी, उनके नुक्सान फायदे का ध्यान रखने वाली, एक एक बात दस दस बार अर्था अर्था के समझाने वाली, तो जब सूरजु ने उनसे पुछा क्यों तो इमरतिया ने इस बुद्धू पहलवान को समझाया

" अरे बुद्धू, इसलिए की स्साली कच्ची कली, जहां ऊँगली भी नहीं घुसी है वहां मुट्ठी इतना सुपाड़ा घुसेगा, तो परपरायेगा, दर्द होगा, फटेगी उसकी लेकिन थोड़े देर तक ठेल के रखोगे तो वो उस मोटाई का कड़ेपन का मजा लेना सीख जायेगी, तो बस पांच मिनट प्यार दुलार "

" हाँ समझ गया मैं चुम्मा लेना, चूँची चूसना, गाल काटना " मुस्करा के सूरजु बोले

" एकदम, और उसके बाद धीरे धीरे आराम से ठेलना बिना उसका मुंह बंद किये, थोड़ा बहुत चिल्लाने देना लेकिन जब थोड़ा सा घुस जाए, आगे और नहीं घुस पायेगा, मतलब झिल्ली आ गयी। अब रुक जाना, कस कस के चूँची रगड़ना, और फिर मुंह उसक कस के बंद कर के पूरी ताकत से, पहले थोड़ा सा निकाल के फिर पूरी कमर की ताकत लगा के पेल देना और रुकना नहीं। वो चिलायेगी, रोयेगी , चटकेगी पर तुम पेलते रहना जब तक आधे से जायदा मूसल न अंदर चला जाये, हाँ जैसे बोला था पहली चुदाई में अपना ये एक फूटा पूरा मत पेल देना पर दूसरी चुदाई में एक इंच भी बाहर नहीं रहना चाइये और कच्ची कली को तो बिना दो बार चोदे छोड़ना ऐसे है जैसे घायल शेरनी को छोड़ना "

" लेकिन भौजी, बुच्ची तो चलो मान जायेगी, पर और कोई कच्ची अमिया कहाँ मिलेगी " सूरजु को बिस्वास नहीं हो रहा था

" अरे तोहार भौजी काहें को हैं, एक से एक, जिसकी झांट भी न आयी हो ठीक से वो सब दिलवाऊंगी, लेकिन तुम छोड़ना मत बिना पेले " हँसते हुए इमरतिया ने बोला और बुकवा और हलवा का खाली कटोरा फर्श पर रख दिया, उसी समय सीढ़ी पर से आवाज आयी बुच्ची की

" भौजी, भैया को तैयार कर दो, नीचे हल्दी की तैयारी हो गयी है "

और पल भर में फटाक से कोहबर का दरवाजा खुला,

बुच्ची के साथ एक और लड़की थी, गाँव की ही थी, बुच्ची के आगे बच्ची लग रही थी, मुस्करा रही थी और सूरजु की निगाह बुच्ची पर नहीं उस दूसरी लड़की के बस आते हुए कच्चे टिकोरों पे चिपकी थी।
 
बुच्ची और कच्चे टिकोरे वाली



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चननिया क चूँची दुतल्ला से ऊँची , चननिया क चूँची दुतल्ला से ऊँची ,

चुमावे चलल हो, अरे हल्दी लगावे चलल हो चननिया छिनरी, अरे दूल्हे क बहिनिया छिनरी

अरे उहे चूँची मलवावे चलल हो, मिस्वावे चलल हो, भैया रखली छिनरी, अरे भैया चोद छिनरी

अरे चुमावे चले हो, अरे हल्दी लगावे चले हो, भैया रखली छिनरी, अरे भैया चोद छिनरी


नीचे से तेज तेज गाने की आवाजे आ रही थीं पर सूरजु बाबू की निगाह बस बुच्ची के साथ जो कच्ची कली आयी थी, उसी के टिकोरों पे चिपके थे। अभी अभी तो इमरतिया भौजी ने कच्चे टिकोरों के बारे में इतना बताया और अभी ये,

स्साली मस्त माल लग रही थी, एकदम आग लगा रही थी। जिसका हक़ीम लुकमान की दवा खा के न खड़ा हो, उसका खड़ा हो जाए. देखने से उमरिया की बारी लग रही थी, और थी भी बुच्ची से भी ठीक १४ महीने छोटी, चेहरे से भी भोली, लेकिन साथ में ऐसी लुनाई, गाल ऐसे भरे भरे की देख के कचकचा के काट लेने का कच्चा चबा जाने का मन करे, हल्की सी सांवली, लेकिन

वो सांवली जो सलोनी होती है, रंग दबा भी नहीं गेहुंआ, बुच्ची की तरह गोरी चम्पई नहीं लेकिन लगती बड़ी सुन्दर थी। पर चेहरे के भोलेपन पे जो जान मारती थी, वो थी कजरारी कजरारी बड़ी बड़ी आँखे, और उन आँखों से जिस तरह वो देखती थी, इशारा साफ़ था, अगर किसी ने हिम्मत की तो वो हिम्मत में पीछे नहीं हटेगी। गाँव की लड़कियों की तरह देह की करेर, ताकत से भरपूर, देह की कबड्डी में बराबर का मुकाबला करती।

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उसके चेहरे की लुनाई, बोलती बुलाती आँखे और ललचाती सूरत किसी का भी मन डुला सकती थीं, लेकिन जो जान मारती थीं, वो थी उसकी कच्ची अमिया, कम से कम मुट्ठी भर की, एकदम कड़ी कच्ची कुतरने के लिए ठोर मारने के लिए किसी का मन ललचा जाए। देह से चिपकी टाइट सी टॉप पहनी थी, और उभारों का उभार, कड़ापन, ... किसके मुंह में पानी न आ जाए। कोई भी देख। के कहता, भले उमरिया की बारी हो, लेकिन स्साली पटक के, निहुरा के लेने लायक हो गयी है. थोड़ा फड़फड़ाएगी, तड़फड़ाएगी, हाथ पैर फेंकेंगी लेकिन अगर तगड़ा मर्द है तो बिना पेले छोड़ेगा नहीं,

और यही बात उसे देख के इमरतिया सोच रही थी।

असल में मन सूरजु क महतारी क था और एकदम सही था, बड़की ठकुराइन बोली थीं, " असल में खूब खायी, चुदी चुदाई औरतें ही मरदो को दांव पेंच अच्छे से सीखा पाती हैं, वो भी एक दो नहीं चार पांच, लेकिन कुँवारी भी, एकदम कच्ची कोरी भी, ….अरे एक बार सील तोड़े रहेगा, खून खच्चर देखे रहेगा तो घबड़ायेगा नहीं, तो नई दुल्हिन खूब नखड़ा करती है, भौजाई कुल सिखाई के भेजी रहती हैं, और ये तो ऐसे ही दस बार बोलेगी की मैं तो पढ़ाई वाली हूँ, और फिर एक से नहीं, …

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बुच्चिया तो ठीक लेकिन कम से कम दो तीन और कच्ची कोरी, भरौटी में है एक दो, बुच्ची से भी कच्ची, कम उमर वाली लेकिन देह में करेर, मुन्ना बहू को बोलती हूँ, वो ये सब काम में तेज है, कल हल्दी में ले आएगी,

तो इमरतिया के सामने मुन्ना बहू से वो बोलीं थीं, " बुच्ची से भी कच्ची, कम उमर वाली लेकिन देह में करेर, .... एक बार तोहार देवर दो चार क झिल्ली फाड़ दिया तो तोहरे देवरानी क पहली रात को चटनी बनाएगा, और हमार का, तोहं लोगन क नाक नहीं कटेगी। "

पटा के लाने की जिम्मेदारी मुन्ना बहू की थी और अच्छी तरह फड़वाने की जिम्मेदारी इमरतिया की, और पटाने में लौंडिया को चारा डालके फंसाने में मुन्ना बहु का जवाब नहीं था, कुँवार हो, ब्याहता हो, बाइस पुरवा क कोई पुरवा नहीं बचा था, जहाँ की जवान होती लौंडिया हो बस चूँचियाँ उठान होना शुरू हुआ हो डॉक् चार झांटे भी आ गयी हों या कउनो नयी गौने से आयी हो, मरद सूरत पंजाब चला गया हो, चुदवासी हो, लंड के लिए ब्याकुल हो, मुन्ना बहू को न सिर्फ खबर रहती थी बल्कि उसे पटा के गन्ने के खेत तक पहुँचाने का काम भी वो सबसे बढ़िया करती थी।

और उसकी नाक ताज़ी कसी कच्ची बुर न सिर्फ बाईसपुरवा के बाइस टोलों में बल्कि दस बीस कोस दूर तक के गाँव में में सूंघ लेती थी,

और अबकी तो बड़की ठकुराइन का काम था,

बाइस पुरवा का सबसे बड़का घर, और फिर ठकुराइन सबके सुख दुःख की साथी और मुन्ना बहू और इमरतिया से तो खास, एकदम मन की बात खोल के, सीना चीर के दिखा देती थीं, और इमरतिया के सामने जब कल मुन्ना बहू से रतजगा ख़तम होने के बाद सुजू क माई , बड़की ठकुराइन बोलीं,

" बुच्ची से भी कच्ची, कम उमर वाली लेकिन देह में करेर, ....कोई हाथ भी न लगाया हो, चुम्मा चाटी भी नहीं, एकदम कोर पूरी टाइट "

तो बस आज सबेरे ही मुन्ना बहू ले आई, अपने साथ और बुच्ची को पकड़ा दी, " तोहार समौरिया, अपने साथ रखना, अभी ले जाना अपने भैया हो भतार हो उनके पास "

और बुच्ची ले आयी साथ, ग्रहण ख़तम हो गया था, नीचे हल्दी, चुमावन क तैयारी हो गयी थी, मामी ( सूरजु का माई ) बोलीं थीं, " बुच्चिया जाय के अपने भैया को ले आओ और इसको भी ले जाओ साथ में , तुम दोनों साथ में जाओ, ये सब काम बहिनी का है " तो इमरतिया की ननद।

तो वो बुच्ची के साथ सूरजु सिंह के कमरे में, और इमरतिया कभी उस कच्ची कोरी माल को निहार रही थी, तो कभी सूरजु सिंह की निगाह को। समझ तो वो गयी ही थी की ये वही माल है जिसके बारे में कल बड़की ठकुराइन ने बोला था और मुन्ना बहू पटा के ले आयी है, एकदम कच्ची और कोरी।

लेकिन मजा इमरतिया को सूरजु सिंह की निगाह को देख के आ रहा था।

वो नयके माल को देख के ऐसे लार टपका रहे थे, खूंटा फनफना रहा था की मौका मिलते ही छोड़ेंगे नहीं। इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी, हफ्ता दस दिन पहले यही उसके देवर, अस लजाधुर, लड़की को देख के आँख नीचे कर लेते थे, और आज ऐसे मस्ताए सांड की तरह, मौका मिल जाए तो अभी चढ़ जाएँ पेल दें ससुरी को, ऐसे चूत के लिए बौराएँ हैं देवर सुरजू

और यही तो वो चाहती थी,

लेकिन एक बात और थी. बड़की ठकुराइन की तरह वो भी चाहती थी की दुलहिनिया के आने के पहले सूरजु दो चार की झिल्ली फाड़ के खून खच्चर कर लें जिससे पहले दिन हदस न जाएँ, और दुलहिनिया केतनो चोकरे, गांड पटके, बिना खून खच्चर के, बिना बुर फाड़े छोड़ें नहीं उसको , और इमरतिया ये भी देखना चाहती थी की मुन्ना बहु जिसको ले आयी है वो सच में कोरी है की नहीं,

और झट से इमरतिया ने उसकी स्कर्ट उठा ली, लेकिन नीचे चड्ढी का ढक्कन लगा था। और इमरतिया ने बुच्ची को आँखों से इशारा किया,

कुछ रतजगा की ट्रेनिंग कुछ कोहबर में भौजाइयों की मेहनत और अब बुच्ची को समझाने की जरूरत नहीं थी बस वो कच्ची कोरी कुछ समझे, बुच्ची ने उसके दोनों हाथ कस कर पीछे से दबोच लिए।

और इमरतिया ने न सिर्फ चड्ढी का ढक्क्न हटा के नीचे सरकाया, बल्कि अपनी टांग उस नयको के टांग के बीच में फंसा के कस के कैंची की तरह फैला दिया और चिढ़ाते बोली,

" अब ढक्कन खोलने का दिन है लगाने का नहीं, और शादी बियाह का घर, तोहार तो भैया लगेंगे "

और वो इमरतिया की ननद लगती।

मुन्ना बहू के मर्द की ममेरी बहन, कुछ दिन के लिए आयी थी, तो मुन्ना बहू की ननदऔर ननद तो वैसे छिनार होती हैं, फिर शादी बियाह का घर, इमरतिया ऐसी भौजाई और मुन्ना बहू चुन के अपनी इस कच्ची कोरी ननद को ले आयी थी तो उसकी लाज शरम तो उस ननद के पिछवाड़े डालनी ही थी, जितना जल्दी उतना अच्छा।
 
लीला

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जमीन पर गिरी चड्ढी से इमरतिया ने उस नयकी की दोनों ककड़ी अस मुलायम कलाई कस के बाँध दी, पिछवाड़े और स्कर्ट उठा के कमर में फंसा दिया और देवर से बोली,

" देख ला अपनी बहिनिया क बिलुक्का ".

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भौजी को अब अपने देवर को सिखाने पढ़ाने की जरूरत नहीं थी, जैसे किसी लालची भुक्खड़ के आगे रसमलाई का डिब्बा खुल गया हो, एकदम बड़ी बड़ी आँखे खोल के सूरजु उस नयको की जांघ के बीच, और इमरतिया ने देखा तो मान गयी, गलती उसके देवर की, सूरजु बाबू की नहीं थी, कोई भी लिबरा जाए,

खूब फूली फूली, मांसल, पावरोटी झूठ उसके आगे, लेकिन दोनों फांके ऐसे चिपकी की दरार का कहीं पता भी नहीं चलता था, बैसे जैसे एक सूत ऐसा ऊपर किसी ने रख दिया हो और झांटे भी बस आ रही थीं, केसर क्यारी ऐसी दो चार खूब मुलायम मुलायम, छोटी छोटी बुर में चिपकी। इमरतिया ने पानी दोनों टाँगे उस नयकी के टांगों के बीच डालकर फैला दिया था जिससे उस कच्ची कोरी की जाँघे एकदम अच्छी तरह फ़ैल गयी थीं, बुर साफ़ साफ़ दिख रही थी।

इमरतिया ने कभी तेल लगाते, कभी मजाक में कितनी कच्ची कोरी ननदों की बिन चुदी चूत देखी थी, लेकिन ऐसी टाइट कसी कभी नहीं,

और अब बुच्ची भी मैदान में आ गयी, उसका एक हाथ लड़की के कंधे पे था और थोड़ा नीचे कर के उसके टिकोरों को हलके से टीपती अपने भैया को चिढ़ाती बोली,

" क्यों भैया पसंद आयी मेरी छोटी बहिनिया, लीला नाम है इसका। मैं ले आयी की चलो एक बार भैया से मिलवा दूँ, अरे तोहरे गाँव क है, मुन्ना बहू और हमार बहिनिया , "

" मिलवाने ले आयी हो की पेलवाने : ? "

इमरतिया ने बुच्ची को छेड़ा

और इमरतिया को अच्छा लगा की अब बुच्ची खाली चुदवाने के लिए नहीं बेचैन नहीं है बल्कि अपने भैया के लिए एक से एक माल पटा के भी ले आएगी

" अरे भौजी, पहले भौजी लोगों से बचे तब तो हम ननद लोगन क नंबर लगेगा, और फिर भौजी लोग तो बाहर के गाँव से आ के रोज रोज हमरे भैया क मजा लेती हैं तो हम बहने ही काहे प्यासी रहें, क्यों लीलवा सही है न " बुच्ची भी अब दो दिन के रतजगे के और कोहबर में रगड़ाई के बाद भौजी लोगों की बात का जवाब देना सीख गयी थी और लीलवा को भी अपनी बात में लपेट रही थी।

" अरे लीलवा लीलने में तोहरो नंबर डकायेगी, देखो आते ही आपने रसमलाई भैया के सामने खोल दी, तुहीं तोप ढांक के रखी हो " इमरतिया ने लीला की हिम्मत बढ़ाई और बुच्ची को छेड़ा।

बुच्ची ने खुद अपनी स्कर्ट उठा के अपनी कमर के चारो ओर लपेट लिया लेकिन इमरतिया ने देखा की अभी भी सूरजु की निगाह लीलवा की जाँघों के बीच ही चिपकी थी, और लीलवा जो पहले शरमा रही थी, उसकी निगाह जमीन में गड़ी थी, अब हलके हलके मुस्करा रही थी, बीच बीच में लजाती हंसती आँखों से सर उठा के सूरजु को देख रही थी ,

बुच्ची ने सूरजु को छेड़ा, " हे भैया दोनों बहिनिया का तो देख लिया चुनमुनिया लेकिन आपन खूंटा मार तोप ढांक के रखे हो "

और इमरतिया अपने देवर की ओर आ गयी और दोनों लड़कियों को उकसाते बोली, " अरे तो खोल काहें नहीं देती,डर काहें रही हो काट थोड़े लेगा " और लीला के दोनों हाथ जो थोड़ी देर पहले इमरतिया ने उसी की चड्ढी से बांधे थे, खोल दिए।

खुला तो था ही लेकिन जैसे ही सीढ़ी से बुच्ची की आवाज और इन दोनों लड़कियों के आने की आवाज मिली, झट से तौलिया सूरजु ने अपने खूंटे पर रख दिया।

" अरे भौजी डरूंगी काहें, हम दोनों के प्यारे प्यारे भैया का है, और काटेगा भी तो कटवाय लूंगी, क्यों लीलवा, मेरी छोटी बहिनिया " बुच्ची भी अब लीलवा को पटाने फंसाने में इमरतिया का पूरा साथ दे रही थी और खुद लीला का हाथ पकड़ के सूरजु के छोटे से तौलिया पे, और तौलिया तो बस रखा ही था, सरक कर नीचे, और फनफनाता हुआ कड़ियल नाग बाहर।

लीला की आँखे फ़ैल गयी, बच्ची थी लेकिन इतनी भी नहीं, लौंडे तो लाइन मार ही रहे थे, सहेलियां भी ज्ञान देती थीं और एक दो लौंडो ने तो खोल के दिखा भी दिया था, लेकिन कहाँ केंचुआ कहाँ हाथ भर का टनटना रहा, मस्ती से पूरा मोटा, सूरजु का खूंटा,

" पसंद आया मेरे देवर का, अगवाड़े पिछवाड़े दोनों ओर लीलना पड़ेगा, लीला रानी " मजे से अपनी ननद के गाल मींजते इमरतिया ने चिढ़ाया लेकिन जवाब उसकी ओर से बुच्ची बोली,

" अरे भौजी, जब हमार भौजाई लोग ले सकती हैं, एक तोहार देवरान क माई बाप, दान दहेज़ देके, हमरी मामी का ( सूरजु का महतारी ) का हाथ गोड जोड़ के, अपनी बिटिया को पढाई छुड़वा के यही घोंटने भेज रहे हैं तो बहिनिया काहें घबड़ाएंगी, लीलवा काहें घबड़ायेगी, क्यों लीला "

देख देख के भैया क लौंड़ा उस दर्जा नौ वाली बुच्ची की बुरिया लसलसा रही थी। लेकिन लाली का मन भी कम नहीं ललचा रहा था, कितनी बार तो अपनी भौजी को, मुन्ना बहू को कितने मर्दों के साथ गन्ने के खेत में, कभी नदी के कछार में घोंटते देखा था।

तब तक नीचे से कांति बुआ, बुच्ची की मौसी की आवाज आयी, " अरे बुच्ची, ले आओ दूल्हा को तय्यारी हो गयी है हल्दी, चुमावन की "

एक कटोरी में तेल रखा था, व्ही पेसल, काफी कुछ तो इमरतिया ने अपने देवर को लगा दिया था बस तलछट में थोड़ा सा बचा था, इमरतिया ने दोनों लड़कियों से कहा " हे देख काहे रही हो, ऐसे हल्दी के लिए भाई को ले जाओगी ? अरे मालूम है भौजाई सब केतना छेड़ती हैं दूल्हे को ? पहले ये तेल अपने हाथ में लगा के दूल्हे के खूंटे में लगा दो, असली हल्दी तो वहीँ लगतीहै "

बुच्ची ने सबसे पहले लीला के हाथ में कटोरी से तेल थोड़ा गिरा दिया था, कुछ अपने हाथ में ले लिया और मारे बदमाशी के खड़े लंड के खुले सुपाड़े को कस के दबा दिया, और पिच्च से इकलौती आँख खुल गयी, बस बूँद बूँद वो तेल मोटे सुपाड़े की खुली आँख में, और सरसराते, छरछराते, परपराते तेल की बूंदे लुढ़कते पुढ़कते अंदर, और आँख मार के लीला से बोली,

" अरे लगाओ न सखी "

फिर दोनों कच्ची कुँवारी लड़कियों ने हिम्मत कर के मिल के मोटा खूंटा पकड़ लिया, एक की मुट्ठी में तो आता नहीं। और पहले हलके हलके फिर कस के, लीलवा पहले घबड़ा रही थी, सहम सहम के छू रही थी, लेकिन फिर बुच्ची की देखा देखीं वो भी, कस के मुठियाने लगी,

" ओह्ह, उह्ह्ह, नहीं हाँ "

सूरजु हलके हलके सिसक रहे थे और इमरतिया मुस्करा रही थी, तेल कोई मामूली नहीं था। था तो कडुवा तेल ही, घर के कोल्हू का पीली सरसों का पेलने के काम के लिए एकदम सही, लेकिन उसमे बैदाइन के यहाँ से वो आधा छटांक सांडे का तेल, असली शिलाजीत, केसर, अश्व्गन्धा की जड़ी और पता नहीं क्या क्या मिलवा के लायी थी, और उसका असर ये था की तेल लगा जाने पे ये खूंटा घंटा भर तो अब बैठने वाला नहीं था, सूरजु भी लाख कोशिश कर ले तो भी नहीं।

और एक टोटका भी, हल्दी की रस्म के पहले अगर मूसल पे कुँवारी लड़की के हाथ से तेल लग जाए तो दूल्हा नम्बरी चुदककड़ हो जाता है, केहू को छोड़ेगा नहीं और उस के साथ जो कुँवारी लड़कियां दूल्हे के खूंटे में तेल लगाती हैं वो नम्बरी चुदवासी हो जाती है, किसी के आगे टाँगे फ़ैलाने से मना नहीं करती बल्कि उनके मन में खुद हरदम चुदवाने का भूत सवार रहता है।

" अरे तनी कस के लगाओ, हाथ में लेके मुठियाओ, दबा दबा के तेल सूखा दो " बुच्चिया ने लीलवा को उकसाया और खुद खूंटा छोड़ दिया और कटोरी में बचा डॉक् आहार बूँद तेल एक बार फिर से सुपाड़े पे टपका के ख़तम कर दिया।

लीलवा भी अब मजा ले रही थी और बुच्चिया ने सूरजु को चिढ़ाया, " क्यों भैया कैसी लगी मेरी छोटी बहन, हैं न मस्त खूब मेरी तरह से, लोगे इसकी "

" मेरी बहन हो और मस्त न हो " अब सूरजु के बोल भी फूटने लगे थे और यही तो इमरतिया और मुन्ना बहू चाहती थीं, ये अइसन हो जाए की बहिन महतारी केहू को भी न छोड़े, खुले आम सबके सामने रगड़ रगड़ के चोदे।

लेकिन भाई बहन की इस मस्ती के बीच में बिघन पड़ गया, और कौन भौजाइयां। चाहती भी है की ननदें छिनार हों और ऐन मौके पे खुरपेंच भी करती हैं।

" हे बुच्चिया, लीलवा, अपने भैया से चुदवा चुकी हो तो दूल्हे को नीचे ले आओ, हल्दी चुमावन के लिए देर हो रही है " नीचे से रामपुर वाली भाभी की गरियाती, चिढ़ाती आवाज आयी और साथ में मंजू भाभी बोलीं " अरे बुच्ची, दूल्हा दुलहिनिया के पहले तोहरे ऊपर ही चढ़ेगा, घबड़ा मत, लेकिन अभी जल्दी आओ "

चुनिया, बुच्ची की पक्की सहेली क्यों पीछे रहती, उसने और आग लगाई, " अरे कुल जोबना अपने भैया पे ही लुटा दोगी, तो हमार भाई तोहार भतार, गप्पू का करेगा। मैं आ रही हूँ ऊपर। "

" अरे नहीं चुनिया, हम लोग आ रहे हैं नीचे, भैया तैयार हो रहे हैं, बस आ ही गए "

बुच्ची घबड़ा के बोली।

" अरे छिनरो ऐसे ले जाओगी, नंग धड़ंग, और हल्दी में कुल कपडा खराब हो जाता है " इमरतिया ने ननदों को हड़काया, पहले तौलिया की बात हुयी तो इमरतिया ने समझाया, " अरे भौजी सब पहले वही खोलेंगी, कुछ और देखो "

आगे आगे इमरतिया, पीछे एक ओर बुच्ची, दूसरी ओर लीला, बीच में सूरजु

तो एक छोटा सा शार्ट, लेकिन ढीला ढाला, पर कितना भी ढीला हो हाथ भर का खड़ा खूंटा नहीं छिपा सकता था। बनियान भी लेकिन वो तो पहुँचते ही उतर गयी, छोटी मामी ने हड़काया, " अरे का लौंडियों की तरह ब्रा, बॉडी पहना के ले आयी हो तुम सब "

पठान टोली की सैयदायिन भौजी आज बहुत गर्मायी थीं बोलीं " अरे रात भर में सूरजु देवर क कही चूँची तो नहीं निकला आयी जो इतना तोप ढँक के "

मंझली मामी ने बनयायिन खींच के उतार दी लेकिन सब की निगाह चाहे बुआ, मौसी आइस बड़ी उम्र वाली हों या भौजाइयां या कल की जन्मी, खी खी करती लड़कियां, सब की निगाह बस उस हाथ भर के शार्ट फाड़ते खड़े खूंटे पे,
 
हल्दी चुमावन -पूनम

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जब बुच्ची और लीला सूरजु को ले कर आंगन में पहुंचे तो पूरी घचमच मची थी खूब बड़ा सा आँगन, चारो और ढलान, आंगन इतना बड़ा की एक बरात एक साथ बैठ के भात खा ले, औरतें लड़कियां, काम करने वाली, हाँ मर्द लड़के कोई नहीं थी।

पर लौंडे बीच बीच में कुछ बहाने से दरवाजे के आसपास 'अपनी वाली' को झाँक जाते थे, इशारे बाजी कर लेते थे।

कम से कम सत्तर अस्सी औरतें लड़कियां, और आज गुट एकदम बंटे थे, सादी बियाह के घर में अक्सर कभी ननदें एक ओर तो भौजाइयां एक और तो कभी लड़कियां एक साथ और बियाहता एक साथ, लेकिन आज एकदम अलग मामला था।

सूरजु के ननिहाल की औरतें, लड़कियां सब बायीं ओर बैठी थीं, सूरजु के माई के मायके वालियां सब आज मिल गयी थीं, लड़कियां, सूरजु की मामियां, मौसी, ननिहाल की भाभियाँ, मंजू भाभी और रामपुर वाली भाभी, और उनकी छोटी बहन चुनिया तो सबसे आगे थीं।

और आज मंझली मामी, छोटी मौसी भी आ गयी थीं, और बड़ी मामी की लड़की रीनू, जो सूरजु की समौरिया थी, बियाह पिछले साल जेठ में हुआ था पर गौना अभी नहीं हुआ था, कल के रतजगे के बाद वो भी एकदम खुल गयी थी और चहक चहक के बोल रही थी, कम से कम पांच छह लड़कियां, कुँवारी, दो चार ब्याहता,, चार पांच भौजाइयां, और मौसी मामी भी जोड़ के कुल २५-२६ रही होंगी।

और आज इधर भी सूरजु के अपने गाँव का जमावड़ा भी कम नहीं था, दर्जन भर से ऊपर तो लड़कियां ही होंगी, उसमे चार पांच ब्याहता, आठ दस भाभियाँ, और फिर चाची, ताई, बूआ, कांति बूआ सब बड़की ठकुराइन के ससुराल में सबसे आगे और सब बहुओ को, लड़कियों को ललकार रही थीं।

और आज सूरजु के गाँव की लड़कियां भी जोस में थीं, क्योंकि उनकी दो ब्याहता बहने भी आ गयी थी।

और दोनों कुंवारे में भी सब लड़कियों की लीडर थी और अब तो और, सब से आगे अहिराने की पूनमिया और पश्चिम पट्टी वाली चननिया और बियाह के पहले भी दोनों में सगी बहन ऐसी दोस्ती थी। और दोनों आज तय कर के आयी थीं की आज गर्दा उड़ा देंगी और सब लड़कियों के आगे, ढोलक चननिया के हाथ में,

पूनिमिया या पूनम सूरजु क समौरिया बल्कि दो तीन साल छोटी ही होगी,

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ग्वालिन चाची क एकलौती बिटिया, और ग्वालिन चाची बड़की ठकुराइन की देवरानी की तरह, एकदम घर वाली, चार गाय, पांच भैंस थी और सब अकेले दुह लेती थीं और सूरजु उनसे बचपन से ही हिले मिले थे । उनकी जिद्द थी की दूध जैसे भैंस दे वैसे ही सीधे उन्हें पीना है तो बस ग्वालिन चाची के आते ही, सूरजु उनके आगे पीछे, दूध के लालच में। लेकिन सबकी देखा देखीं ग्वालिन चाची को वो भौजी ही बोलते, बचपन से और वो छेड़ती भी ऐसे,

पूनमिया, जब दूध दूहने ग्वालिन चाची आतीं तो साथ साथ और फिर अक्सर सूरजबली सिंह के घर पर ही रुक जाती, साथ खेलती, झगडती, और सूरजु की देखा देखीं उनकी महतारी को माई बोलती और ग्वालिन को भौजी।

एक दिन सुबह सुबह ग्वालिन भैंस दूह रही थीं, पूनमिया उनकी पीठ पर चढ़ी बदमाशी कर रही थी , और सुरुजू, ग्वालिन चाची के आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, " भौजी दूध, भौजी दुध "

पूनिमिया अब इतनी छोटी भी नहीं थी, कच्चे टिकोरे निकलने लगे थे, बस ग्वालिन चाची ने पूनमिया के टिकोरों को दबा के सूरजु को चिढ़ाया,

" हे इसका दूध पियोगे "।

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और चिढ़ाने वाली, ग्वालिन चाची अकेले नहीं थी, सूरजु क माई, मुन्ना बहू सब,। सूरजु क माई सूरजु को चिढ़ाती,

" हे पूनमिया से बियाह करबे " और अब सूरजु लजाने लगे थे।

लड़कियां लड़कों से पहले जवान होती हैं, और पूनम अपने गाँव की लड़कियों से भी दो तीन साल पहले, माखन सा तन दूध सा जोबन, और जोबन भी जल्द ही हिलोरे मारने लगा। लेकिन पूनम का न तो सूरजु के घर आना जाना कम हुआ न सूरजु को चिढ़ाना, छेड़ना, घर में न कोई भाई था न बहन।

एक दिन ग्वालिन चाची, उनकी ननद, पूनम की बूआ, सूरजु की माई के घर आयी थीं और साथ में पूनम भी। बस सूरजु को देखते ही ग्वालिन चाची, चिढ़ाने पे जुट गयी, पूनम को दिखाते हुए छेड़ा,

" हे पीना है इसका दूध ? " फिर खुद जोड़ा, " लेकिन पहले अपनी मलाई खिलानी पड़ेगी तब दूध देगी ये । "

सूरजु की माई मुस्करा दी, सूरजु कस के लजा दिए और पूनम खिस्स खिस्स हंसने लगी लेकिन कहारिन भी थी, उसने छेड़ा

" अब ये मत कहना मलाई नहीं निकलती, रोज मैं पाजामा धोती हूँ, कटोरी भर के मांड निकलती है, बिन नागा, रात में सपने में गिराने से तो अच्छा है "

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और इतनी जोर का ठहाका लगा, और पूनिमिया ने कस के सूरजु को चिकोटी काटी, बिना लजाये।

सूरजु की माई ने देखा और हँसते हुए बोलीं

" अरे तो क्या हुआ, ये तो इस गाँव का रिवाज है सब मरद बहनचोद होते हैं , गाँव के पानी का असर "

" और लड़कियां कुल भाई रखनी, "

पूनम को चिढ़ाते हुए ग्वाकिन चाची ने अपनी बेटी को छोड़ा और लगे हाथ अपनी ननद को भी लपेटा, पूनम से बोलीं,

" न विश्वास हो तो अपनी बुआ से पूछ लो, तुमसे छोटी थीं तो सबसे पहले उन्होंने किसका घोंटा था । "

पूनम खूब गोरी, सब कहते थे , अहिराने में पूनो का चाँद निकल आया है और चोली में भी दो पूनम के चाँद, लम्बाई भी अच्छी खासी, जितने बड़े जोबन उतने चौड़े कूल्हे, और गाने में मजाक में अकेले सब भौजाइयों का मुकाबला कर लेती , लौंडे बहुत पीछे पड़े थे लेकिन सब जानते थे इन दूध के दोनों कटोरों का स्वाद तो सूरजु ही चखेंगे, और जाँघों के बीच की दही की इस कहतरी का भी स्वाद वही चखेंगे। मन तो सूरजु का भी करता था,

लेकिन एक तो लजाधुर, पूनिमिया की सहेलियां सब कहती थीं , " यार तू ही पटक के चोद दे साले को ।"

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लेकिन उसी के कुछ दिन बाद नाग को पिटारे में बंद कर दिया सूरजु ने, अखाड़े में उतर गए और गुरु का दिया लंगोट पहन लिया, पक्के ब्रम्हचारी, माई के अलावा किसी से खुल के बात भी नहीं करते थे।

और कुछ दिन बाद पूनम की शादी हो गयी, फिर पिछले अगहन में गौना, और मरद भी बस, कुछ ख़ास नहीं और दस पंद्रह दिन बाद पंजाब कमाने चला गया, और जैसे ग्वालिन ने खबर दी की सूरजु भैया क बियाह है बस पूनम ने अपना बिस्तर बाँध लिया, मरद वैसे बाहर था, दो चार दिन के लिए हफ्ते भर पहले आया था लेकिन अब छह महीने तक आने का कोई स्बावल नहीं था। भौजाई के न होने से छोटी ननद के और पंख खुल जाते थे, और पूनम की सास तो एकदम पूनम के कहे पर चलने वाली, बस एक मन उसको था की एक पोता/पोती कुछ दे दे बहुरिया।

और जिस दिन पूनम गाँव पहुंची उसके एक दिन पहले ही उसकी बचपन की सहेली भी आ गयी थी, चननिया। नाम उसका चांदनी था, पश्चिम पट्टी की लेकिन सब कहते चननिया ही थी, उसी ने पूनम को खबर दी थी की तेरे बचपन के यार ने अखाडा छोड़ दिया है, लंगोट उतार दिया है और अब बियाह होने वाला है। और मिलते ही जैसे दोनों गले भेंट के मिली, पूनमिया ने अपना इरादा बता दिया की सूरजु भैया के दुलहिनिया के आने के पहले वो सूरजु भैया की मलाई अबकी पक्का खायेगी।

उसके दोनों चूँची पकड़ के कस के दबाती मसलती हंसती चननिया बोली

" मलाई खायेगी तो नौ महीना बाद दूध भी देगी "

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"एकदम, तू तो समझदार है, और एक बार क्यों, बार बार,... और दूध पिलाऊंगी भी उसको कब से बेचारा दूध दूध कर रहा था, एक चूँची से उसको, एक से उसके बेटवा को, जॉन सब कह रहे हैं न की पढ़ी लिखी आ रही है न उसके पहले निकाल दूंगी "

हँसते हुए पूनमिया बोली, फिर चननिया के साये में हाथ डाल के अपनी सहेली की बुलबुल को दबोचती बोली,

" अरे सखी, एक पंडित बोला था की पूरे आधे दर्जन बच्चे होंगे मेरे तो उसकी बात सही साबित करना है न, लेकिन बाप सबका वही होगा एक ही। "

दोनों सहेलिया खिखिलाने लगी लेकिन पूनमिया पक्की छिनार, चननिया की बिलिया में गचाक से एक ऊँगली जड़ तक पेल के बोली,

" और तोहरो चुनमुनिया में मलाई जाई, फिर कउनो दिन दोनों सहेली साथ साथ मजा लेंगी, अभी तो बरात जाने में सात आठ दिन है "

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अपने गौने के पहले, पूनमिया ने ये अपनी जिद्द सिर्फ चननिया को बतायी थी, की उसकी छाती में दूध आएगा तो सूरजु भैया की ही मलाई खाने के बाद, और तरीका भी बता दिया था, गौने के महीने भर पहले से गाँव की आशा दीदी से बच्चा रोकने वाली गोली ले आई थी, लहंगा उसने खाली मरद के आगे अबतक पसारा था वो भी स्साला केंचुआ छाप, रहना न रहना बराबर, और दस दिन बाद पंजाब। पता नहीं ठीक से अंदर गया भी की नहीं। और अब पूनम ने जब से बियाह की खबर सुनी गोली बंद कर दी थी, आठ दस दिन पहले महीना हुआ था। मरद उसे बाद आया था,

तो वही पूनमिया, आज सब गाँव की लड़कियों की गोल बना के बैठी थी, और जो कच्ची कलियाँ थी उन्हें तो चुन चुन के लायी थी, फिर उसकी सहेली चननिया और दो चार ब्याहता लड़कियां और जैसे ही भैया चौके पे बैठे, चननिया ने इशारा किया, हाथ भर का नहीं तो बित्ते से तो पक्का बड़ा होगा, और मोटा कितना, खड़ा खूंटा नेकर में। बुच्चिया और लीला साथ में इमरतिया भौजी, चौके पे भैया को बैठाय के इमरतिया के पास, लीला पूनिमिया के पास और साथ में बुच्ची भी, आगे कांती बूआ थीं, बुच्ची की बड़ी मौसी।

गाने शुरू हो गए थे और आज सूरजु के गांव वाली औरतें लड़कियां उनके ननिहाल वालों को ललकार रही थीं, खुल के माँ बहिन कर के नाम ले ले के गरिया रही थीं, आंगन में खाली औरतें थीं इसलिए और खुल के।
 
मामी से जिन चुमवहिया,.

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कांती बूआ आज सबसे आगे बैठीं थी, गाँव की औरतों की लड़कियों को जबरदस्त लीड कर रही थीं, सिल्क की सरकती हुयी साड़ी, जिसका आँचल जोबन पे टिकता नहीं था, मांग में भरभराता हुआ नाक तक लगाया सिन्दूर, छोटी सी नथ, कुछ पान से कुछ लिपस्टिक से रंगे भरे भरे होंठ, चम्पई रंग के खूब भरे काटने लायक गाल, गले में लम्बा मंगलसूत्र तो जो खूब लो कट ब्लाउज से छलकते दोनों जोबनो के बीच, दबा कुचला, और जोबन भी बस ऐसे की उनका मुकाबला, पूरे गाँव में सिर्फ उनकी भौजाई कर सकती थीं, सूरजु की माई, बड़की ठकुराईन, ३८ के जोबन तो ४० के बड़े बड़े चूतड़,

और गाना गाने में तो दस पांच गाँव में मुकाबला नहीं और गालियां तो ऐसी की मायके में उनकी भौजाइयां और ससुराल में उनकी ननदें, कान में ऊँगली डाल ले, और कान से ऊँगली निकलवा के सीधे कान में सुनाएँ, और अक्सर गाँव की गारियों में ननदो के ऊपर भौजाइयां अपने मरद को, देवर को, और अपने भाइयों को चढाती हैं। लेकिन कांती बूआ, तो अगली पीढ़ी तक, बाप और बेटे को भी नहीं छोड़ती थीं, और गदहा, घोडा, सांड सब कुछ,

खूब गरमाई थीं और उसका एक कारण और भी था, आज उनकी टीम में पूनम, चननिया ऐसी चार पांच गाँव की ब्याहता लड़कियां, सात आठ बहुएं, बुच्ची और लीला ऐसी कोरी कुँवारी आधी दर्जन से ज्यादा लड़कियां, और दूसरी ओर उनकी भौजी, सूरजु की माई के मायके वाली सब बैठीं थीं।

लेकिन सूरजु के ननिहाल वालियां भी कम जोश में नहीं थीं, उनके मायके से भी आज सुबह सुबह बहुत लोग आ गए थे,

मंझली मामी और मामा और उनकी दो बेटियां, बंबई से शीतल मौसी और उनकी बेटी और सूरजु की महतारी के मायके के और भी लोग आ गए थे। चुनिया, छोटी मामी, रामपुर वाली भाभी, मंजू भाभी और भी, सूरजु की माई की भौजाइयां पहले से ही थीं।

लेकिन आज मोर्चा सम्हाला था, मंझली मामी ने, और शीतल मौसी भले बियाहे के बाद बंबई चली गयी हों लेकिन गाँव के रीत रिवाज और गवनहि में कम नहीं थी। और सूरजु की महतारी क असल बहन झूठ।

असल में सरजू के न कोई सगे मामा, न मौसी और इसलिए सैकड़ो बीघा खेत, बाग़ बगीचा, ताल बड़ा सा घर, सब नवासे में मिला, बल्कि सूरजु के नाना ने सीधे सूरजु के नाम ही लिख दिया था।

पर गाँव के पट्टीदारी, रिश्तेदारी के मामा, मौसी की कमी नहीं थी, ननिहाल में और शीतल मौसी तो सूरजु की माई की चचेरी बहन, सटा हुआ घर, और सूरजु की माई से छह सात महीने बड़ी ही होंगी, मजाक करने में उनका अगर कोई मुकाबला करता था तो सूरजु की माई और अपनी इन दो नंदों पे भारी पढ़ती थीं, मंझली मामी और अब गाँव की बहुओ और लड़कियों के साथ सूरजु के ददिहाल वालों की आज वो ऐसी की तैसी कर रही थीं, गरियाये सूरजु ही जाते थे लेकिन ननिहाल वाले सूरजु की बूआ का नाम लेके, उनके गाँव की लड़कियों का नाम ले ले के और कांती बूआ, सूरजु की मामी, मौसी और ममेरी, मौसेरी बहनों को।

पहला झगड़ा होता था, ढोलक किस पार्टी के कब्जे में रहेगी और सूरजु के मायकेवालियों ने बाजी मार ली थी, कांती बूआ के नेतृत्व में और पूनम ढोलक टनका रही थी और कांती बूआ की तगड़ी आवाज, और शुरू में तो रस्म रिवाज के ही गाने, हाँ साथ सूरजु के ननिहाल वाली भी दे रही थीं

बगिया में मोरवा बोले, अंगना में कउवा हो

घर घर देइ द नउनिया जाय के बुलव्वा हो।

आज हमरे बन्ने के चढ़ेले हरदिया हो,

आज हमरे भैया के चढ़ेले हरदिया हो

( गाँव की लड़कियों की आवाज थी और सबसे तेज कपूनमिया और चननिया की )

आज हमरे देवर के चढ़ेले हरदिया हो

( अबकी गाँव की बहुओं की और सबसे टनकदार रामपुर वाली भौजी )

अंगना में बैठहु आय के मोरे सब सखिया हो

हरदी लगावहु गाय के मंगल गितिया हो


और जैसे ही बुच्ची, लीला के साथ दूल्हे आये चौके पे बैठने, उनकी आँख अहिराने की पूनम से मिली, बल्कि लड़ी आउटर बचपन की सब शरारतें, कैसे ग्वालिन भौजी चिढ़ाती थीं, दूध और मलाई का मजाक कर के और माई और कहारिन भी साथ में, सूरजु जोर से मुस्कराये और पूनमिया भी, आँचल तो पूरा ढलक गया, कसी कसी छोटी छोटी चोली में से झांकते उछलते कूदते जोबन दावत देते नजर आये और पूनम भी जोर से मुस्करायी और होंठ ऐसे मुड़े जैसे कस के बचपन के दोस्त का चुम्मा ले रही हो।

कांती बूआ समझ गयी थीं की बुच्ची और लीला पे सूरजु के मायके वालों की निगाह है और उन दोनों की रगड़ाई सबसे ज्यादा होगी तो इशारे से उन्होंने उन दोनों को बुला लिया और बुच्ची और लीला गाँव की लड़कियों और भौजाइयों के झुण्ड में खो गयीं। पर पूनमिया खुल के दूल्हे से नैन मटक्का कर रही थी और उसे एक बात का फर्क भी नहीं पड़ रहा था की चार आँखों का ये खेल सब देख रहे हैं .

चुमावन को सबसे पहले मंझली मामी उठीं, अक्सर पहले भौजाई और बड़ी औरतों का नंबर लगता है लेकिन वो तो सूरजु क माई क भाभी थीं, तो उनका नंबर पहले लगना ही था। और मंझली मामी जीतनी सुन्दर थी, उतनी ही हर तरह से छिनार भी, हर तरह से छिनार मतलब बोल बात में, चाल ढाल में, मर्दो को छोड़िये लौंडों को देख के उनका आँचल जोबन पर नहीं टिकता था, दुजरि मीनिंग वाली बात और मुस्कान और आँख के इशारे, तो उठते ही उन्होंने क्या चूतड़ मटकाया, कैसे मुस्करायीं, और चुमावन के लिए आगे बढ़ी,

पर इधर पूनम तैयार थीं और ऊपर से कांती बूआ, मुस्करायी, और पूनम को इशारा किया, चल चालु हो जा, आखिर उन्ही भाभी की भाभी और गानों का लेवल बदल गया,

" मामी से जिन चुमावे दिया हो माई, अरे मामी से जिन चुमावे दिया हो माई

अरे मामी मामा से छुवायल बाड़ीं हो माई ,

अरे मामी चन्नर चच्चा से छुवायल बाड़ीं हो माई अरे सूरजु भैया के मंझली मामी

अब तो सूरजु के गाँव की सब लड़कियां लहरा लहरा के और कांती बूआ के इशारे पे गाने लगीं,

चन्नर चाचा से चुदवायल बाड़ीं हो माई, हमरे फूफा से जोबना दबवावे हो माई

" मामी से जिन चुमावे दिया हो माई, अरे मामी से जिन चुमावे दिया हो माई
 
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११३ हल्दी-चुमावन की रस्म पृष्ठ ११७०

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फागुन के दिन चार

भाग ५० रिपोर्ट पृष्ठ ४८८

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