Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 111 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

जोरू का गुलाम।

भाग २५९ तीज पार्टी का दिन -निधि पृष्ठ १६२९

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११४ हल्दी- बुच्ची और गप्पू
 
छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११४ हल्दी- बुच्ची और गप्पू

३०,५६,६११

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चुमावन को सबसे पहले मंझली मामी उठीं, अक्सर पहले भौजाई और बड़ी औरतों का नंबर लगता है लेकिन वो तो सूरजु क माई क भाभी थीं, तो उनका नंबर पहले लगना ही था। और मंझली मामीजितनी सुन्दर थी, उतनी ही हर तरह से छिनार भी, हर तरह से छिनार मतलब बोल बात में, चाल ढाल में, मर्दो को छोड़िये लौंडों को देख के उनका आँचल जोबन पर नहीं टिकता था, डबल मीनिंग वाली बात और मुस्कान और आँख के इशारे, तो उठते ही उन्होंने क्या चूतड़ मटकाया, कैसे मुस्करायीं, और चुमावन के लिए आगे बढ़ी,

पर इधर पूनम तैयार थीं और ऊपर से कांती बूआ, मुस्करायी, और पूनम को इशारा किया, चल चालु हो जा, आखिर उन्ही भाभी की भाभी और गानों का लेवल बदल गया,

" मामी से जिन चुमावे दिया हो माई, अरे मामी से जिन चुमावे दिया हो माई

अरे मामी मामा से छुवायल बाड़ीं हो माई ,

अरे मामी चन्नर चच्चा से छुवायल बाड़ीं हो माई अरे सूरजु भैया के मंझली मामी


अब तो सूरजु के गाँव की सब लड़कियां लहरा लहरा के और कांती बूआ के इशारे पे गाने लगीं,

चन्नर चाचा से चुदवायल बाड़ीं हो माई, हमरे फूफा से जोबना दबवावे हो माई



" मामी से जिन चुमावे दिया हो माई, अरे मामी से जिन चुमावे दिया हो माई


उसके बाद जब छोटकी मामी का नंबर आया तो गाना और तेज हो गया, दूल्हे के पीछे नाउन बैठी रहती हैं, अक्सर भाभियाँ चूमते हुए कस के देवर को धक्का दे देती हैं और इधर उध्दार कभी चिकोटी काट लेती हैं तो कभी गुदगुदा देती हैं और बेचारा दूल्हा गिरते गिरते बचता है और भौजाइयां मारे चिढ़ा चिढ़ा के

" अरे देवर इतनी जल्दी गिर जाओगे,.... तो हमरे देवरानी का काम कैसे चलेगा, ? "

नाउन का काम देवर को गिरने से रोकना होता है और अपने देवर का पिछवाड़ा सम्हाल के इमरतिया बैठी थी और साथ में सूरजु के ननिहाल की नहीं दुलारी भी रस्म करा रही थी।

लेकिन सूरजु की मामियाँ भाभियों से भी दो हाथ आगे थीं। वो तो सूरजु ने लंगोट बाँध लिया था और अखाड़े में उतर गए थे, वरना उनके जब रेख आ रही थी, कोई न कोई मामी, उनका न सिर्फ शिकार कर लेती बल्कि सिखा पढ़ा के स्वाद दिला दिला के नंबरी चोदू बना देतीं, पर नथ तो उनकी इमरतिया भौजी को उतारना था। और मजाक भी छेड़छाड़ भी भाभियों से भी दो हाथ आगे, तो छोटी मामी ने कस के धक्का दिया,

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लेकिन एक तो इमरतिया पहले से पीछे से तैयार थीं, दूसरे उसने सुरजू के कान में समझा दिया था की अगर मामी या कोई भौजाई धक्का दे तो बस उसे पकड़ लेना, वो भी गिरेगी साथ, और सूरजु तो अखाड़े के सब दांव पेंच सीखे, तो बस धक्के का जवाब उन्होंने धक्के से दिया, और खिलखिलाती हुयी छोटी मामी ने चिढ़ाया,

" हे ये धक्का मारना किसने सिखाया है, हमार छिनार ननद मर्दखोर तोहार महतारी ने, की, और

फिर पूनम की ओर देख के मुस्करा के बोलीं

" की तोहार ये पैदयाशी छिनार बहिनिया ने ? "

बैठी हुयी मंझली मामी हंसती हुईं बोलीं, " दोनों ने "

लेकिन अहिराने की पूनम काहें चुप रहती बोली,

" अरे हाँ हमार भैया है, तो धक्का भी हम ही सिखाये हैं लेकिन लेकिन धक्का खाने के उनकी सब ननिहाल वालियां आयीं है। अरे खाली हमार भैया नहीं, हमार चाचा, बाबू जी, और फिर कांती बूआ की ओर देख के बोली, " और हमार फूफा भी धक्का मारने के लिए तैयार बैठे हैं, बस अब मरवाने के लिए तैयार रहिये आप सब "

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मुस्करा के सूरजु ने पूनम की ओर देखा और पूनमिया ने अपने भैया को देखते, दिखाते जान बूझ के अपना आँचल गिरा दिया, जुबना झलका दिया, और गुलाबी होंठों से एक चुम्मा भी उछाल दिया।

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सूरजु पूनम को देख के जोर से मुस्करा दिए और तब तक शीतल मौसी चुमावन के लिए खड़ी हुयी और मोर्चा चननिया, और बुच्ची ने सम्हाल लिया

चूम चुम्मा हो दूल्हे क मौसी

चुम्मा चुम्मा हो मौसी तोहे नेग देबे, चुम्मा चुम्मा हो मौसी नेग देबे

तोहरे लगवा दूल्हे क चच्चा क भेज देबे, तोहरा गलवा चूमे के भेज देबे, तोहार जोबना लुटे के भेज देबे,


शीतल मौसी कौन कम थीं, पूनम और बुच्ची दोनों की ओर इशारा कर के, फिर सूरजु को दिखा के ऊँगली से चुदाई का इंटरनेशनल सिम्बल बनाया की दूल्हे से तुम दोनों को चुदवा चुदवा के थेथर कर दूंगी, बुच्ची तो थोड़ी लजा गयी पर पूनम तो आज एकदम गर्मायी थी बोली

" अरे मौसी आपके मुंह में घी गुड़, रोज दुनो जून आपको लम्बा लम्बा मोटा मोटा औजार मिले "

और फिर रामपुर वाली भाभी आयीं चूमने तो बुच्ची और पूनम दोनों चालू हो गयीं,

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घर में से निकली भाभी हो, अरे रामपुर वाली भौजी हो, गले मोतियन का हार

घर में से निकली भाभी हो, अरे रामपुर वाली भौजी हो, गप्पू का बहिनिया हो गले मोतियन का हार

धीरे धीरे भाभी चूमिया हो, अरे धीरे धीरे चूमिया हो भौजी, भैया हमार हौं सुकुवार

चुम्मा चुम्मा हो भौजी नेग देबे, चुम्मा चुम्मा हो भौजी नेग देबे,

दुनो जोबना क रखे क बेग देबे, अरे दुनो गेंदवा क रखे क बेग देबे

चुम्मा चुम्मा हो भौजी नेग देबे, चुम्मा चुम्मा हो भौजी नेग देबे,

तोहरे पलंगिया पे अपने भैया क भेज देबे, तोहें चोदे क आपन भैया भेज देबे


अरे तोहें ऊपर चढ़े के मोटका गदहवा देबे,

सूरजु बुच्ची के मुंह से ऐसा गाना पहली बार सुन रहे और थोड़ा सा ध्यान बेटा तो बस एक हाथ से रामपुर वाली भाभी ने खड़ा खूंटा कस के दबा दिया और दूसरे हाथ से जोर से धक्का दिया।

वो तो इमरतिया पीछे से होशियार थी, लेकिन तो भी सूरजु हड़बड़ा के लड़खड़ा गए और फिर तो उनके ननिहाल वालों की हंसी का फुहार छूटा, पर सूरजु भी पक्के पहलवान, उन्होंने सीधे भौजी के चोली पे हाथ मारा और वो भी देवर की गोद में और अब सूरजु के गाँव वालियों की, उनकी बहनों की और बूआ के हंसने की बारी थी

लेकिन जब कांती बूआ चूमने आयीं तो सूरजु के ननिहाल वालियों ने सूद साथ बसूल कर लिया, रामपुर वाली भौजी की छुटकी बहिनिया चुनिया , शीतल मौसी की बेटी, रमा, और बड़ी मामी की बेटी रीनू चालू हो गयीं और शीतल मौसी और मंझली मामी आगे आगे गा रही थीं,

सिल्क के साडी पहन के आवेली, अरे बूआ, अरे दूल्हे क बुआ चुमावेली

सिल्क के साडी पहन के आवेली, अरे बूआ, अरे दूल्हे क बुआ गीत गावेली,

अरे दूल्हे क बुआ गीत गावेली, आपन दुनो गद्दर जोबना लुटावेली

अरे चूमा चूमा हो बुआ नेग देबे, अरे चूमा चूमा हो दूल्हे क बूआ नेग देबे

तोहरी कोठरी में, अरे तोहरी पलँगी पे दूल्हे क मामा क भेज देबे,


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चननिया जब चूमने आयी तो ननिहाल की सब लड़कियां और साथ में शीतल मौसी और मंझली मामी,

चननिया छिनरो चुम्मे चली, चननिया छिनरो चुम्मे चली,

अरे चननिया क चूँची, अरे चननिया का चूँची, पहाड़ से ऊँची, हमारे भैया से दबवावत है,

अरे चननिया छिनरो खूब चुदासी, हमारे भैया से चुद्वावत है

एक एक कर अब मायके की सब औरतें चुमावन को आ रही थीं, अब दोनों ओर की लड़कियां गा रही थीं, गाने की धार रुक नहीं रही थी

भैया चउरा से अंजुरी भराईल, धीरे धीरे चुमाइला, हौले हौले चुमाइला

चूमे गयलि अम्मा सोहागन, चूमे गयलि अम्मा सोहागन

अम्मा हाथ के कंगनवा लुटाय दा, धीरे धीरे चुमाय ला

भैया चउरा से अंजुरी भराईल, धीरे धीरे चुमाइला, हौले हौले चुमाइला

चूमे गयलि भाभी सुहागिन, अरे भाभी सुहागिन, अरे भाभी सुहागिन

भाभी, चोली के दोनों जुबना लुटाय दा, अरे भौजी दोनों जुबना लुटाय दा

भैया चउरा से अंजुरी भराईल, धीरे धीरे चुमाइला, हौले हौले चुमाइला

चुम्मन गयी दीदी सुहागन दीदी सुहागन , दीदी गले का हरवा लुटायल

भैया चउरा से अंजुरी भराईल, धीरे धीरे चुमाइला, हौले हौले चुमाइला
 
हल्दी

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चुमावन में सिर्फ भाभियाँ ही बदमाशी नहीं कर रही थीं, बहने भी कम दुष्ट नहीं थी। पूनम ने चूमते हुए खड़े खूंटे को भी चूम लिया, चुनिया ने बुच्ची का हाथ पकड़ के उसके भैया का खूंटा कस के नेकर के ऊपर से पकड़ा दिया।

चुमावन के साथ हल्दी की तैयारी भी चल रही थी, मुन्ना बहू ने दो बड़े कटोरे हल्दी ला के रख दिए,

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और एक बार फिर गुटबंदी बदल गयी, हल्दी लगाने का काम भौजाइयों के जिम्मे और गाने का लड़कियों के जिम्मे,

बुच्ची अब चुनिया के साथ थी और दोनों सहेलियां मिलकर कसकर ढोलक टनका रही थीं। साथ में बुच्ची के लीला और गाँव की दो चार लड़कियां, और ननिहाल की बड़ी मामी की बेटी रीनू, मौसी की बेटी रीमा और दो चार और, गाने एक के बाद एक,

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कुछ पुराने गाने थे वो पूनम ने शुरू कर दिए

पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी, पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी

केउ मंगावेला शुभ के हरदिया, केउ मंगावेला कडुआ तेल

पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी, पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी

पापा मंगावेला शुभ के हरदिया, अरे शुभ के हरदिया

अरे अम्मा मंगावली कडुआ तेल, अरे अम्मा मंगावली कडुआ तेल

पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी, पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी

केउ लगावेला बन्ने के सिसवा, अरे केउ लगावेला बन्ने के सिसवा

केउ लगावेला बन्ने के पाँव, अरे केउ लगावेला बन्ने के पाँव,

पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी, पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी

पापा चढावेले दूल्हे के सिसवा, अरे पापा चढावेले दूल्हे के सिसवा,


अरे अम्मा चढावेलीन दूल्हे के पाँव , अरे अम्मा चढावेली दूल्हे के पाँव

पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी, पीसो पीसो रे नउनिया रगड़ हल्दी


और सूरजु भैया रगड़े जा रहे थे,

पांच छह भौजाइयां एक साथ, सबसे आगे तो ननिहाल की ओर से रामपुर वाली भौजी, मंजू भाभी और यहाँ से पठान टोले की सैयदायिन भौजी , पश्चिम टोले की नयकी भौजी और भरौटी की दो महीने पहले गौने उतरी भौजी,

रामपुर वाली भौजी बोलीं, अरे जरा सा बस सगुन करना है बस थोड़ा सा और भरौटी वाली को इशारा किया, " अरे तू सबसे छोटी है तू शुरू कर "

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फिर तो दोनों हाथों में हल्दी लेकर पूरे चेहरे पर छाप दिया, और पीछे से इमरतिया ने हड़काया बोली, " अरे आँख में चला जाएगा "

" तो आँख बंद कर लें न "

सैयदायिन ने चिढ़ाया, और पीठ पे हल्दी रगड़नी शुरू कर दी, फिर उनमे और रामपुर वाली में कुछ आँखों में बात की और दोनों हाथों में हल्दी लेकर, जैसे दो लड़के एक लड़की के ऊपर साथ चढ़ रहे हैं और दोनों जोबन बाँट ले, दाएं वाला तेरा बाएं वाला मेरा, तो बस एकदम उसी तरह, दाएं वाली छाती पे सैयदायिन भौजी का कब्ज़ा और बायीं वाली रामपुर वाली के हिस्से में पड़ी।

और क्या कस के मसला को भौजाइयों ने और चिढ़ा अलग रही थीं,

" हे हमारे भाई तेरी बहनों का ऐसे ही मसलेँगे " रामपुर वाली ने छेड़ा।

" बुच्ची से बड़ी तो नहीं लेकिन लीलवा से बड़ी जरूर है हमरे देवर की " सैयदायिन ने चिढ़ाया।

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बुच्ची ने ढोलक सम्हाल ली थी और गा रही थी

आज हमरे बन्ने के चढ़ेले हरदिया हो,

आज हमरे भैया के चढ़ेले हरदिया हो

अरे हमारी भौजी लगावे बन्ने के हरदिया हो


अरे भौजी लुटावें जोबनवा हो
 
बुच्ची- हल्दी



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तब तक मामी, मौसी और औरतें भी हल्दी लगाने में जुट गयी थीं, नेकर के बाहर का कोई हिस्सा नहीं बचा था और सैय्यदायिन भौजी ने दोनों हाथों में हल्दी लगा के नीचे से सूरजु के नेकरमें हल्दी लगे हाथ डाल दिया

और पेट पे हल्दी लगाते रामपुर वाली का हाथ सरक के ऊपर से नेकर के अंदर,

भरौटी की भौजी जो दो महीने पहले गौने उतरी थी, बाईसपुरवा क सबसे नयी बहू, पीठ पर लगाते हुए उसने हाथ पिछवाड़े से चूतड़ के ऊपर

और रामपुर वाली ने बुच्ची को बुलाया फिर और लड़कियां सबसे आगे पूनम , लेकिन जब बुच्ची हल्दी लगा रही थी दो दो भौजाइयों ने उसका दांया हाथ पकड़ के उसके भाई के नेकर के अंदर डाल दिया।

" आरी बिन्नो यहाँ हल्दी लगाने का काम छोट बहिन का ही है " सूरजु के ननिहाल की एक भाभी ने समझाया,

" अरे जबरदस्त नेग मिलेगा बहिनिया को " ननिहाल की दूसरी भाभी ने पलीता लगाया

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" क्या नेग मिलेगा " गलती से बुच्ची के मुंह से निकल गया और रामपुर वाली ने मौके का फायदा उठा के बोल दिया

" अरे हमार भाई,... तोहार यार तोहार भतार मिली। और गप्पू अब अकेले नहीं है उसके दो चार दोस्त भी आ गए हैं, तो एक साथ डबल धमाका होगा, दुनो छेद का मजा एक साथ मिली "

और उन्होंने भी नेकर के अंदर हाथ डाल दिया और बुच्ची का हाथ पकड़ लिया और भरौटी वाली और रामपुर वाली ने जबरदस्ती बुच्ची के हाथ में उसके भइया का खूंटा पकड़ा दिया और कस के मुठियाने लगी।

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" अरे अइसन हल्दी लगाओ की सफ़ेद मलाई निकल जाए तब तो असली बहन मानी तुझे, कस कस के जैसे तोहरी बिलिया में सूरजु के ननिहाल के लौंडन क खूंटा जाई एकदम वैसे "

अहिराने वाली भौजी हंस के बुच्ची से बोलीं।

बड़की ठकुराइन, सूरजु की माई थोड़ी दूर खड़ी देख-देखकर मुस्कुरा रही थीं। अब आ रहा है शादी की रस्म का मजा।

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बुच्ची बिचारी चाह के भी हाथ नहीं निकाल सकती थी और गाँव की ही दो भाभियों ने अब अंदर हाथ जकड़ रखा था,

बुच्ची को अच्छा भी लग रहा था, लेकिन झिझक भी रही थी, मज़ा भी आ रहा था लेकिन शर्मा भी रही थी।

बात भौजाइयों तक होती तो गनीमत थी, लकिन सब बड़ी उमर की औरतें भी, कांती बूआ, सूरज की बूआ, बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं।

और ऐसे ही और भी, चाची, ताई, सूरजु भैया की मामियां,

और सबके सामने पकड़ना नहीं चाहती थी लेकिन भरौटी वाली भौजी, मुन्ना बहु की देवरान क पकड़ इतनी कस के थी और रामपुर वाली ने उसकी कलाई पकड़ के रखी थी,

" हे बिन्नो, खाली भैया का पकड़ने से काम नहीं चलेगा, जोर जोर से मुठियाओ, पानी निकालो "

चुनिया उसकी सहेली ने चिढ़ाया

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तो सैयदायिन भौजी बोलीं, " अरे हमार देवर है इतना जल्दी पानी नहीं निकलेगा "

दो दो भौजाइयां पकड़ के बुच्ची का हाथ सूरजु के मोटे लंड पे, कस कस के मुठिया रही थीं,

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खूंटा नेकर के अंदर था लेकिन सब लड़कियों औरतों को साफ़ लग रहा था कि क्या हो रहा है। भाभियाँ तो ननद को रगड़ें का कोई मौका नहीं छोड़ती लेकिन अब बड़ी उमर की औरतें भी पनिया रही थीं और वो उधरा जाएँ तो फिर ऐसी गालियां होती हैं की लोग कान में ऊँगली डाल ले, और सबसे ज्यादा गरमाई थीं दूल्हे की माई, बुच्ची की मामी, बड़की ठकुराइन। हँसते हुए गाँव की बहुओं को ललकारा उन्होंने,

" अरे अगर हमार ननद होतीं तो हम सीधे मुट्ठी करते अंदर,अगर भाइचॉद छिनार पानी न निकालती, ... ऐसे सस्ते न छोड़ते "

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" अरे तो हमरो ननद कुल मुठियाई जाएंगी, और बुच्ची बबुनी को तो मैं खुद, एक बार बारात जाने तो दीजिये, अइसन नंगई होगी, कउनो ननद छिनार के बदन पे एक सूत नहीं रहेगा हाँ ओकरे पहले ज़रा हमरे देवर लोगन से पेलवा पेलवा के आपन बुरिया चौड़ चाकर करवाय लें, और सबसे पहले जिसकी मुठिया रही हैं "

अहिराने से एक भौजाई बोली,

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पूनम क चचेरी भौजाई, सामु बहू, देह क खूब करेर, अकेले एक जून में पांच छह भैस दूह लेती थी। कल ही मायके से आई थी, बड़ी ठकुराइन की खूब मुँह लगी।

पर रामपुर वाली अपना फायदा नहीं भूल सकती थीं, उन्हें अपने भाइयों का ध्यान था, उन्होंने सीधे बुच्ची से कहा,

" हे मजा आ रहा है न भैया का मूसल पकड़ने में, अरे अभी सबके सामने अपने भाई का पकड़ के हिला रही हो, फिर मेरे भाई का भी नंबर लगेगा"

आज दूल्हे की माई भी खूब गरमाई थीं, बुच्ची के बहाने अपनी ननद को गरियाने का मौका क्यों छोड़ देतीं, मंजू भाभी और मंझली मामी साथ में बैठी थी, और उन्ही अपने मायके वालियों के साथ, दूल्हे की माई भी, तो हंसती हुयी सूरजु की मामी से बोलीं,

" अरे हमार छोट ननद ...बुच्ची क माई, हमरे कुल भाई के टांग उठा उठा के दी थीं,.... तो ये भी अपने माई पे पड़ी है। "

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" अरे हमार ननद तोहार ननद से बहुत आगे जायेगी, एक ओर से आपन भैया एक ओर से हमार भैया, अभी सबके सामने मुठिया रही है हमारे देवर का तो घोंटेंगी भी "

दूल्हे के खूंटे पर कस के उस दर्जा नौ वाली के कोमल कोमल हाथ दबाते भरौटी वाली भौजी बुच्ची को चिढ़ाते बोलीं।

" और क्या जो खड़ा करेगा, वो घोंटेंगे भी " हँसते हुए मंझली मामी भी अब बुच्ची के पीछे पड़ गईं।

वैसे तो रस्म के समय रसम का ही गाना होता है, लेकिन जब ननदो की रगड़ाई हो रही है भौजाइयों को रोकना मुश्किल है, और अहिराने वाली भौजी ने बुच्ची के लिए गाना टेर दिया, दूल्हे को गरियाते,

" अरे दूल्हे देखा दिवारिया पर का लिखल बा, अरे दूल्हे देखा दिवारिया पर का लिखल बा,



इतवार लिखल बा , सोमवार लिखल बा, तोहरी बहिनी क दस दस भतार लिखल बा,, अरे तोहरी बुच्ची क दस दस भतार लिखल बा"



और उनकी निगाह तभी अहिराने वाली ननद पूनम के ऊपर पड़ गयी, तो उसको भी लपेट लिया,

इतवार लिखल बा , सोमवार लिखल बा, तोहरी बहिनी क दस दस भतार लिखल बा,, अरे तोहरी पूनम क दस दस भतार लिखल बा"

लेकिन पूनमिया कम नहीं थी, सूद के साथ अपनी भौजाई को लौटा दिया, बोली,

" अरे भौजी तोहरे मुंह में घी गुड़, ....चला दो चार तोहे भी दे दूंगी, भैया है नहीं तो मशीन तो चालू रहनी चाहिए, "

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भरौटी वाली जो अभी भी कस के बुच्ची का हाथ सूरजु के लंड पे पकड़ाए थीं, हंस के बुच्ची को और उसके भाई को दिखाते बोलै,

" अरे दुलहा से का बोल रही हो, अपनी बहिनिया का, ये बुच्ची का तो पहला भतार उहे हैं, बाकी सब का बंबर बाद में आएगा। "

कांती बूआ जो अबतक चुप बैठी थीं वो भी मैदान में आ गयी और जोर अपनी भौजाई को चिढ़ाती मंझली मामी से बोलीं, " अरे दुलहवा खाली अपने बहिनिया पे ही नंबर लगाएगा की अपनी महतारी पे भी "

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और मंझली मामी अपने ननद को, दूल्हे की माई को पकड़ के बोलीं, "

एकदम अपने महतारी पे भी नंबर लगाएगा, बेचारी लम्बा मोटा देख के ललचा रही हैं, ऊपर नीचे दोनों मुंह में पानी आ रहा है , बचपन में अपने पूरे गाँव को बांटी, जवानी में ससुराल में, सबका मन राखीं,... तो दूल्हा क मन काहे नहीं रखेंगी"

अब तो औरतों में जो ठहाका लगा, लेकिन बड़की ठकुराइन ने एकदम बुरा नहीं माना। उन्हें तो मज़ा आ रहा था, अब उनकी ननद-भौजाई तो उन्हें गरिआयेंगी ही।

उधर बुच्ची को भी मजा आ रहा था, वो भैया के चेहरे की ओर देख देख के चिढ़ा रही थी और खुल के मुठिया रही थी ,

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चार पांच कोट हल्दी तो वहां लगा ही चुकी थी और पीछे से सूरजु के, दूल्हे की महतारीकी आवाज आयी,

" अरे बाकी जगह तो और सब लोग लगा लें, लेकिन मोटके मूसल में लगाने का हक तो बहिनी का ही है "

वो झुकी थी और अहिराने की एक भौजी ने पकड़ के बुच्ची का टॉप उठा लिया और पीठ पर और पिछवाड़े कस के हल्दी लगाना शुरू कर दिया पर पूनम आ गयी साथ देने और उसने अपने अहिराने की भौजी को पीछे से खुद हल्दी लगनी शुरू कर दी और चोली में हाथ डाल के दोनों जोबन रगड़ने शुरू कर दिए।

थोड़ी देर में एकदम फ्री फॉर ऑल हो गया।

बुच्ची झिझक रही थी। वैसे तो कितनी बार इमरतिया ने कोठरी में पकड़ाया था और अब बुच्ची खुद ही भैया का मोटा मूसल पकड़ के सोहराती थी, दबाती थी। भैया में अभी भी थोड़ी झिझक थी, लेकिन अब बुच्ची ही पहल करती थी। अरे अभी थोड़ी देर पहले ही खुद अपने हाथ से लीलवा को पकड़ाया था, दोनों ने मिल के वो पेसल तेल भी लगाया था, और भैया का 'वो' कितना सुन्दर और मजबूत भी था, मोटा और लम्बा तो था ही एकदम लोहे का मोटा रॉड,

पर अभी सबके सामने, चलिए भौजाइयों की कोई बात नहीं थी, लेकिन बड़ी बड़ी औरतें और सब से बढ़कर कांती बूआ ( बुच्ची की सगी बड़ी मौसी लगती थीं) और भैया के ननिहाल से भी मामी मौसी सब लोग,

लेकिन भौजाइयों ने पकड़ के बुच्ची का हाथ उसके भैया के लंड पे, और हुक्म सुना दिया

" ननद रानी अब हमरे देवर को यहाँ तब तक हल्दी लगाओ जब तक उसका पानी न निकल जाए, "

बुच्ची गिनगीना गयी, सबके सामने, न जाने कैसा कैसा लग रहा था, लेकिन रामपुर वाली की पकड़ बड़ी तगड़ी थी, उसके हाथ को पकड़ के सूरजु के खूंटे पे और हाथ चलाने लगी, नीचे उस दर्जा नौ वाली का कोमल मुलायम हाथ कच्ची ककड़ी की तरह की कलाइयों को भाभियों ने जकड़ लिया था और धीरे धीरे बुच्ची खुद हाथ चलाने लगी, उसे मजा आ रहा था और बस वो सोच रही थी, की जब मुट्ठी में इतना मजा आ रहा है तो नीचे की बिलिया में कितना मजा आएगा।

और फिर बुच्ची खुद कभी अपनी मुट्ठी कस के भींच लेती तो कभी ढीली कर देती, कभी एकदम दबा के रगड़ती तो कभी सहलाती, और साथ में बुच्ची की चुनमुनिया भी कभी कस के भिंच जाती थी, कभी थोड़ी ढीली हो जाती थी, कभी वो इतनी टाइट कर लेती थी की तर्जनी घुसाना भी मुश्किल हो तो कभी पूरी ताकत से ढीली करने की कोशिश करती जैसे सूरजु का मुट्ठी से भी मोटा लंड घोंट रही हो, और कल रात में मुन्ना बहु ने सिखाया था की मरद का लेते समय कैसे बिल को टाइट और ढीला करते हैं जिससे उसको पूरा मजा आये। कभी जैसे मूतवास रोकने के लिए पूरी टाक से सिकोड़ लेते हैं, टाइट कर लेते हैं एकदम वैसा और फिर जैसे धीरे धीरे ढीला करें वैसे। बुच्ची की दो ऊँगली अपनी बिल में लेकर मुन्ना बहु ऐसी ही कभी सिकोड़ती कभी फैलाती, और बुच्ची तो जल्द सीखने वाली,

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और उसका जबरदस्त असर सूरजु पर हो रहा था।

कुँवारी कोरी दर्जा नौ वाली बहन का हाथ मूसल पे वो भी सबके सामने भद भद भरे आंगन में, सूरजु कभी आँख बंद कर लेते, कभी सिसकते और बस ये सोचते की कब ये बुच्ची की चुनमुनिया मिलेगी, स्साली की मुट्ठी में इतना मजा मिल रहा है तो जब कसी कोरी बिल में फाड़ता दरदराता जाएगा तो कितना रस मिलेग।

मंजू भाभी ने बुच्ची को चिढ़ाया भी " अरे छिनार कब से भौजी लोग छोड़ दी हैं तब भी भैया का मोटा मूसल पकडे हो, अरे लेना हो तो बिलिया में लो "

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भौजाइयों ने इस लिए छोड़ दिया था की अब हल्दी ननद को लग रही थी अहिराने की दो भौजाइयों ने कस के बुच्ची को छाप लिया था और रामपुर वाली भाभी ने आराम से फ्राक उठा के हल्दी दोनों हाथ में लगा के दोनों खुले चूतड़ पर कस कस के, और गाँव क सबसे नयी बहू, मुन्ना बहू क टोली की, भरौटी की, भौजाई उसी ने बुच्ची के दोनों जोबन पे सीधे छापा मारा तो मुन्ना बहू बोलीं

" अरे अच्छी तरह से टटोल के देख लो, अहिरौटी भरौटी के कुल तोहरे देवर चढ़ेंगे यह माल के ऊपर "

एक हाथ से जोबन दबाते हुए भरौटी वाली भौजी ने दूसरा हाथ सीधे बुच्ची की बिलिया पे और हथेली से कस कस के रगड़ने लगी और चिढ़ाते बोली

" जितना मोरे गाँव के देवर हैं सब को ननदोई बनाउंगी लेकिन खाली अपने भाइयों को देगी की हमारे भाइयों को भी चखाएगी ?:"

" अरे सब को देगी, हमारे भाई से तो पहले ही फंसी है, सब लड़के इस गाँव के स्साले बनेंगे हम लोगो के भाई के"

बुच्ची के गोल गोल मुलायम चूतड़ सहलाते, उसपे हल्दी लगाते, गचाक से पिछवाड़े की दरार में ऊँगली पेलते रामपुर वाली भाभी ने चिढ़ाया।

बुच्ची की बुर लासा हो रही थी, हाथ में सूरजु भैया का मोटा मस्त कड़क लंड, और अगवाड़े, पिछवाड़े और गाँव की भौजाइयों का हाथ, कस कस के रगड़ते मसलते, बस मन कर रहा था की जो हाथ में है वो बिलिया में चला जाए,
 
हल्दी की मस्ती



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गाँव की शादी बियाह में मजाक तो खुल के होता ही है, जो मरद भी मजाक के रिश्ते वाले होते हैं, देवर, ननदोई, बहनोई सब भी खुल के गरियाये जाते हैं।

लेकिन छूने का मौका, उन पे हाथ लगाने का रगड़ने का मौका हल्दी के रस्म में ही मिलता है, जितनी हल्दी दूल्हे को लगती है उससे दुगुनी औरतें लड़कियां एक दूसरे को लगा देती हैं,'इधर -उधर' और कई गुना ज्यादा, देवर, जीजा, नन्दोई ऐसे मर्दों को, और जो ज्यादा गर्मायी रहती हैं वो रिश्ते भी नहीं देखती जो मरद सामने पड़ता है उसी के,

और मरद भी वैसे भी औरतों के इलाके में नहीं आते, लेकिन उस दिन तो बाहर भी सम्हल कर रहते हैं।

लेकिन मन तो उनका भी करता है, कोई करेर भौजाई, सलहज लगा दे, छूछे न रहें, तो वो भी ताका झांकी करते रहते हैं। ऊपर ऊपर तो मरद हल्दी से घबड़ाते थे, लेकिन मन भी करता था और उसी बहाने, साली, सलहज, भौजाई को छूने, चिपटने का भी मौका मिलता था। अक्सर मर्द सब घर के बाहर वाली दालान में दिन में बैठे रहते थे, या उस से जुड़े बड़े कमरे में, बहुत हुआ तो मर्दाने वाले आँगन तक, पर जिनके रिश्ते ऐसे होते थे, जैसे बहनोई, देवर, नन्दोई वो अंदर के गलियारे तक चक्कर मार लेते थे, हाँ उस आंगन में जब तक किसी रस्म के लिए न बुलाया जाए, तो माण्डव वाले इलाके में नहीं जाते थे, पर लालच।

तांक झाँक तो करते ही रहते थे। और एक बात और थी।

सूरजु की महतारी के मायके से भी अब आज तक अच्छी भीड़ जमा हो गयी थी।

अब कई मामियां आईं थीं, तो साथ में मामा लोग भी आए थे, और मामा की रस्म भी होती है । मौसियां भी थी तो दो चार सूरजु की माई के बहनोई भी, कुछ छोटे कुछ बड़े, पर बहनोई तो बहनोई और ये तो पुराना कायदा था की बहन की ससुराल में, बहन की नंदों पर, बहन की ससुराल के गाँव की लड़कियों पर भाई लाइन मारते ही हैं और सूरजु के मामा लोग तो और, ,,,और सूरजु के ननिहाल से जो मामियां, मौसी लोग आयी थीं, गाँव वाले, ...

आखिर भौजी की बहने, भौजाइयां, तो वो लोग भी लाइन मारने के चक्कर में, पहले

लेकिन जितना मरद गरमाये थे उससे ज्यादा औरतें,

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हल्दी की रस्म ही ऐसी होती है, और रिश्तों के मुताबिक सबने पहले से सोच रखा था।

अब जो सूरजु के ननिहाल वालियां थीं, उनके लिए तो जो सूरजु के चाचा लोग थे, वो उनकी भौजाई के, बहन के देवर लगे तो मजाक का, छेड़ छाड़ का रिश्ता था, उसी तरह ददिहाल वलियाँ भी सूरजु की बूआ लोग, उनके मामा लोगों की स्साले, स्साले कह के खूब खिंचायी करती, और वह छेड़ छाड़ कई बार आगे भी बढ़ जाती , और हल्दी में तो मौका पूरा मिल जाता।

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ख़ास तौर से जो शादी शुदा, खेली खायी औरतें थीं वो तो और,हल्दी लगाने का काम कपडे के ऊपर से शुरू होता था लेकिन जब तक बहनोई, या ननदोई के चूतड़ पे छापा न लगे तो क्या हल्दी हुयी अक्सर मर्द सिर्फ बचत करने के लिए हाथ लगाते, लेकिन जहाँ पहले का चक्कर हो, या औरतें ज्यादा गरमाई हो बात आगे भी बढ़ जाती।

और एक बात थी की यहाँ मांमला बहुत ज्यादा खुला था और सबसे बढ़ के खुद बड़ी ठकुराइन, मजाक और मस्ती के मामले में अपनों भाभियों और ननदो से भी चार हाथ आगे थीं और यहाँ तक की जो रिश्ते में बेटियां और बहुएं लगती थीं उनसे एकदम खुल के मजाक करती थीं, और फिर तो अभी शादी बियाह का घर तो जिनसे मजाक का रिश्ता हो, उन्हें ऐसे मौके पर भी छोड़ दिया जाए ये उन्हें कबूल नहीं था।

और वो टोला मोहल्ला, जाति बिरादरी, उमर कुछ नहीं मानती थीं, अगर भरौटी की लड़की भी गाँव के रिश्ते से उनकी ननद लगती है तो उसके मर्द को वो नन्दोई ही मानेगी और बिना गरियाये, खुल के रगड़ाई किये छोड़ेंगी नहीं। बात उनकी साफ़ थी: गाँव का दामाद तो पूरे गाँव का दामाद होता है , और देवरों की तो कमी नहीं।

और मजाक के रिश्ते में उम्र भी नहीं देखी जाती। अब उत्तर पट्टी की एक बियाह में, भले उमर में उनसे १२-१४ साल छोटी रही हो, उनके लड़के से खाली ४-५ साल बड़ी, लेकिन पट्टीदारी में तो ननद ही लगती थी तो मिलना में क्या रगड़ाई न की उस दूल्हे की, कुँवारी सालियाँ झूठ। आँख में काजल, होंठ पे लिपस्टिक लगा के हाथ में चूड़ी भी पहना दी और फिर मांग में सिन्दूर लेकिन वो दूल्हा भी हिम्मती था, उन्हें छेड़ते हुए बोला, " सलहज जी, सिन्दूर दान के बाद सुहाग रात भी होती है "

" तो मैं कौन भाग रही हूँ, बहन के भंडुए, पहले मेरी ननद से मना लो और वो इम्तहान पास हो गए तो अगली बार आइयेगा, और ये याद रखियेगा की साली से पहले सलहज का हक होता है "

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और बेटे के बियाह में उन्होंने ननद को तो बुलाया ही, उस नन्दोई से भी कहा,

" अरे, मेरी ननद को अकेले मत भेजिएगा, आपको भी आना है और दस दिन पहले से। और फिर मेरी ननद आ जाएगी तो क्या वहाँ बहन महतारी से काम चलाइएगा, और यहाँ तो साली, सलहज की भरमार है।

और वो नन्दोई आ गए थे और चुन चुन के खाने के समय उन्हें गालियां पड़ीं, कुछ बड़की ठकुराइन ने खुद दी, कुछ मुन्ना बहू से दिलवायीं।

और कई दूल्हे के फूफा, मौसा तो बस ऐसे रिश्ते में अगर हल्दी में भी बच गए तो क्या मजा

तो दूल्हे की हल्दी में तो भौजाइयां, बहने लगी थीं,

लेकिन मामियां, मौसियां, बूआ और बाकी उस उमर की औरतें मर्दो के चक्कर में और एक दूसरे को छेड़ने के चक्कर में , अपने आदमी का, भाई का नाम लगा के मजाक करने ,में

मंझली मामी ने कांती बूआ को चिढ़ाया भी उकसाया, "देखा तोहार असली भतार, बचपन के यार "

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मझली मामी के मरद थे, सूरजु के मामा, बड़की ठकुराइन के भाई, और दुल्हिन के भाई जब चौथी ले के जाते हैं तीज खिचड़ी, तो अपनी बहन के ननदो से चक्कर तो चालु ही हो जाता है। ननदे भी भौजी के भाई को छेड़ती हैं और भाई भी मौका पाके,

और बाद में शादी बियाह में फिर से वही यादें,

कांती बूआ एक पल के लिए झिझकी, लजाई, फिर दरवाजे की ओट में खड़ी हो गयी और जैसे दुबारा मझले मामा नजर आये, लपक के उनके कुर्ते पे पीठ पे हल्दी का थापा और उसके बाद पाजामा, वो बाहर भागे लेकिन पीछे पीछे बुआ और बाहर दालान में मंझले मामा पकडे गए।

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बड़की ठकुराइन की भाभियों ने, सूरजु की मामियो ने, सूरजु के चाचा लोगो को निशाना बनाया, और उनकी मौसियां भी साथ में थीं, आखिर उनकी ननद के बहन के देवर थे तो उनके भी देवर लगे और ऐसे मौके देवर सूखे बचे,

और भाभियाँ तो सब गर्मायी थीं, चाहे सुरुजू के ननिहाल वाली, मंजू भाभी, रामपुर वाली या गाँव की हों या काम करने वाली, घेर के सब लौंडो को, पजामे का नाडा पहले खुलता था हल्दी बाद में लगाती थी, हल्दी की होली हो रही थी,

दूल्हे की हल्दी अब गाँव की बाकी लड़कियां कर रही थीं,

बुच्ची के बाद पूनम और ललिया ने हल्दी लगाई, फिर बाकी लड़कियों ने एक एक करके, और बुच्ची ने देखा की सूरजु भैया की माई नहीं दिख रही हैं, आँगन में, फिर बाहर से उनकी हलकी हलकी आवाज आयी। तबतक मझली मामी ने किसी को देखा और हल्दी का कटोरा लेकर लपकीं, सीधे बाहर। कांती बूआ तो पहले ही निकल गयीं थीं, धीरे धीरे ज्यादातर वर्तें बाहर निकल गयी थीं और अब लड़कियां, भाभियाँ ही आँगन में थीं और नाउन कहाईन और काम करने वालियां। लड़के अब अंदर बार बार झाँक रहे थे, और ज्यादातर की सेटिंग हो गयी थी, कम से कम बात चीत में, किसी लड़की को देख के लड़के के दोस्त कहते, हे देख तेरी वाली और यही बात लड़कियों की सहेलीयों की भी थीं

बुच्ची, पूनम और चननिया के साथ थी, पूनम ने ही पहले देखा और बुच्ची को इशारा किया,

चुनिया भी साथ में थी, मुस्करा रही थी और पूनम से बोली, " अरे तोहरी बहिनी के यार हैं, हमार भाई, कल रतजगा में सब के सामने ये कबुली थीं की उस के सामने टांग फैलाएंगी '
 
गप्पू

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" अरे तब तो उन की खातिर जम के होनी चाहिए, " हँसते हुए चननिया बोली और हल्दी का एक बड़ा कटोरा ला के बुच्ची को पकड़ा दिया, बुच्ची ने भी दोनों हाथों में लगा के देखा गप्पू झाँक के उसे चिढ़ा के भाग जाता था,

बस पूनम चननिया और ललिया के साथ दो चार और लड़कियों ने मिल के बुच्ची को अपने पीछे छिपा लिया

अबकी गप्पू ने झाँका तो बुच्ची नहीं दिखी और वो अंदर तक, और अबकी लड़कियों के झुरमुट से निकल के बुच्ची ने दौड़ा लिया, आँगन से बाहर निकल के गप्पू गलियारे में, फिर बरामदे में पीछे पीछे बुच्ची

लेकिन पूनम ने बचपन से इस घर में बहुत लुका छिपी खेली थी, वो एक कोने में खड़ी थी

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और जैसे गप्पू उधर मुड़ा पूनम सामने से और बोली,

" अरे भौजी क भैया, हम हल्दी नहीं लगाएंगे हम सीधे तोहार गांड मारेंगे, ...चल खोल पाजामा"

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और पीछे से बुच्ची ने गपुच लिया, हल्दी के दो थापे पहले कुर्ते पे, फिर पीठ पे, फिर पाजामे पे, और जब बुच्ची ने पजामे के अंदर पिछवाड़े डालने की कोशिश की तो गप्पू ने बुच्ची का हाथ पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, पर अहिराने की बिटिया, पूनम. कितनी गाय-भैंस दुही थी।

करेर हाथ , गप्पू का दोनों हाथ कस के पकड़ लिया और आराम से बुच्ची ने पीछे से पाजामे में हाथ डाल के गप्पू के पिछवाड़े, खूब गोरे गोरे गोल गोल चूतड़ों पर हल्दी, लगाने के साथ कस कस के चिकोटी भी काटा,

गप्पू जोर से उछला और खिलखिलाते हुए पूनमिया ने छेड़ा,

" हे गाँड़ में मिर्ची लग गयी क्या ? अरे हमार छोट बहिन डाल रही है चुप चाप डलवा लो "

" लेकिन जब हम तोहरी बहिनिया के डालेंगे न तो उससे बोल देना, भागेगी नहीं, न चिल्लायेगी "

अब गप्पू भी मजा लेने लगा था गाँव की लड़कियों का।

" एकदम नहीं भागेगी, हमार छोट बहिन है बल्कि निचोड़ के रख देगी "

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आगे से 'उसे ' पजामे का ऊपर से पकड़कर हल्दी लगाते पूनमिया बोली। और बुच्ची ने भी पूनमिया के सुर में सुर मिलाया। कल गप्पू का नाम लेकर भौजाइयों ने बहुत गरियाया था उसे, अब मौका मिला था। हल्दी लगे हाथ से गप्पू की बनियान के अंदर उसके मेल टिट्स को मसलते छेड़ती बुच्ची बोली

" अरे पूनम दीदी डालने वाले डाल देते हैं पूछते नहीं है , अरे इस भाई के स्साले से मैं छह महीने पहले बोली थी, 'टिकोरे खाने का मन है तो ऊपर चढ़ आओ " लेकिन चढ़ने की हिम्मत ही नहीं पड़ी, मैं कहाँ भागी जा रही हूँ। "

लेकिन तब तक चननिया की आवाज आयी, कोई और शिकार दिख गया था, किसी भौजाई का भाई और पूनम उधर लपकी, हाथ छूट गया, और गप्पू बुच्ची से छुड़ा के, पहले उसने इधर देखा फिर बगल में एक छोटी सी कुठरिया दिखी उसमे भागा,पर पीछे पीछे बुच्ची भी।

लेकिन गप्पू के बचने का दिन आज नहीं था, बुच्ची बहुत गर्मायी थी और इमरतिया और मुन्ना बहू की संगत में धीरे धीरे पक्की हो रही थी। गप्पू के पीछे पीछे वो भी,

वो कच्चा गलियारा एकदम संकरा सा था और उधर निकलता था जिधर बाहर जानवर बंधे जाते थे। गलियारे के किनारे चार पांच कुठरिया थीं, छोटी छोटी, किसी में पुवाल, किसी में भूसा और आजकल शादी बियाह का घर था तो एक दो में गद्दे रजाई भी रखे थे। एक दो कमरों में काम करने वालियां रात में सो जाती थीं।

इमरतिया की सिखाई, बुच्ची ने कमरे में घुसते ही पहले अंदर से सांकल लगायी और इधर उधर देखा, काफी अँधेरा था, बस ऊपर रोशनदान से थोड़ी सी लाइट आ रही थी। चारो और पुवाल के बंधे हुए गट्ठर, और, उन्ही में से एक के पीछे, गप्पू,

दबे पाँव बुच्ची दूसरी ओर ,… जैसे वो गप्पू को देख नहीं पा रही है, फिर तेजी से मुड़ी और पीछे से दबोच लिया, जबतक वो सम्हले एक बार फिर से बुच्ची के हाथ अंदर , एक कुर्ते के अंदर मेल टिट्स पर और दूसरा पजामे में पिछवाड़े उसके नितम्बो पे, और हल्दी लगाना चालू और उसके कान में बोली

" कहाँ छिपोगे बच्चू "

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" जब डालूँगा न तो भागोगी," गप्पू मुस्कुराकर धीरे-धीरे बोला। अब वो भी डबल मीनिंग डायलॉग बोलने लगा था, पर सामना इमरतिया की सिखाई से हो रहा था।

अपने गाल की हल्दी प्यार से उसके गाल पे रगड़ती, मुस्कराती वो किशोरी दर्जा नौ वाली बोली,

" एकदम नहीं भागुंगी, जब चाहे तब ट्राई कर ले भैय्या के स्साले, तेरी बहनिया भागती है क्या? रोज तो तोहरे जीजा के, हमरे भैया के सामने टांग फैलाती हैं स्साले। तो चलो एकाध बार मैं भी तोहार मन रख दूंगी। "

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और पीछे से अपने दोनों जोबन उसकी पीठ में रगड़ने लगी।

गप्पू बुच्ची को अच्छा लगता था, और जब उसको देख के लिबराता था, उसकी आती हुयी कच्ची अमिया को देख के ललचाता था बुच्ची का मन सिहर उठता था और चुनिया उसकी पक्की सहेली, यह देख देख के बुच्ची को खूब चिढ़ाती थी।

और ये चक्कर साल से तो ऊपर ही चल रहा था , लेकिन अब कल रतजगा में जिस तरह उसकी रगड़ाई हुयी उसने कबूल किया की दे देगी चुनिया के भाई को और सब लड़कियां गप्पू को लेके मजाक करती थी तो अब उसे देख के सिर्फ दिल में ही नहीं हुक उठती थी, नीचे दोनों जांघों के बीच की तितली भी फड़फड़ाने लगती थी। बुर एकदम लासा हो जाती थी,

और आज तो हाथ में जिस तरह पकड़कर सबके सामने,उसने सूरज भैया का खूंटा मसल-मसल करके हल्दी लगाई। कांती बूआ, शीतल मौसी, मंझली और छोटी मामी, सूरजु भैया क माई, सब के सामने, बल्कि मंझली मामी तो और लहकार रही थीं, और भाभियों ने दोनों जोबना बाहर निकाल के रगड़ रगड़ के हल्दी लगाई, गप्पू की बहिनिया, रामपुर वाली भाभी ने एकदम खुल के उसके दोनों जाँघों के बीच हाथ डाल के, बस पानी नहीं निकाला और सब कुछ किया।

बुच्चिया एकदम गरमाई हुयी थी, और उसी समय गप्पू पकड़ में आ गया था कमरे में अकेला भी था और बाकी सब औरते और लड़कियां अपने अपने काम में लगे थे।

और अब गप्पू पकड़ में आ गया है तो, वो कस कस के उसके चूतड़ पे हल्दी लगा रही थी तो गप्पू ने चैलेन्ज किया,

" हे हिम्मत है तो आगे भी लगा दे "

बस ऊपर सीने पे हल्दी लगा रहा हाथ, सरक के नीचे आ गया पजामे के अंदर और झट से पकड़ लिया, थोड़ा सोया थोड़ा जागा, लेकिन मुंह बंद , चमड़े का ढक्क्न लगा।

" अबे चुनिया के भाई न तुझसे डरती हूँ न तेरे इससे "

बुच्ची बोली और हल्के से पीछे से गप्पू का कान काट लिया और जीभ की नोक से कान में सुरसुरी करने लगी।

मुट्ठी से कभी कस के दबा लेती वो किशोरी, कभी हलके से ढीला छोड़ देती,

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ये सब ट्रिक कोहबर में रात में दो दिन से मुन्ना बहु सिखा रही थी। लौंडो का मुठियाओगी कैसे, कैसे झट्ट से खड़ा हो जाएगा। बजाय आगे पीछे करने के बस वो दबाती छोड़ती, पीठ पर अपने जोबन की बरछी चुभाती,, और एक झटके से खूब कस के पूरी ताकत से खींच दिया,

चमड़ा खुल गया, कड़ियल नाग का फन बाहर आ गया, और बस अपनी तर्जनी से खुले सुपाड़े की एकलौती आँख पर बुच्ची सुरसुरी करने लगी।

लंड खड़ा हो गया, एकदम कड़ा, तैयार, अच्छा ख़ासा मोटा, लम्बा,

न गप्पू बोल रहा था न बुच्ची बस दोनों की साँसे अब लम्बी लम्बी चल रही थीं, बीच बीच में गप्पू सिसकियाँ भर रहा था, बुच्ची के होंठ गप्पी के गले के पिछले हिस्से पर हलके हलके चुमबन लेते कभी बस छूते सरकते, कंधे तक और जब होंठों का स्पर्श टूटा तो चुम्बनों की बारिश कंधे पर

और धीरे धीरे बुच्ची ने मुठियाना शुरू कर दिया,

गप्पू की हालत खराब हो रही थी, वो सोच रहा था की बस उसका मोटा लिंग बुच्ची की कसी प्रेमगली में घुस रहा है, रगड़ते, दरेरते,। कब से वो ये सोच रहा था, चाहरहा था, लेकिन आज, इतने दिनों बाद, और उसने मन की बात पूछ ली,

" हे देगी, बुच्ची ?"
 
" हे देगी, बुच्ची ?"



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स्साला इत्ता टाइम लगाया, बुच्ची ने मन में सोचा और फिर चिढ़ाया,

" हे क्या चाहिए, चुनिया से मांग न। मेरी पक्की सहेली है, बोल दूंगी,... दे देगी, मना नहीं करेगी तुझे। "

और कस के खूंटे को दबा दिया,

पल भर के लिए बुच्ची के दिमाग में सूरजु भैया का मोटा मूसल कौंध गया।

, वैसा नहीं है, लेकिन उसके भैया ऐसा किसी का नहीं है न हो सकता है, गदहा घोड़ा मात लेकिन गप्पू का है प्यारा।

बाकी लड़को का भी उसने देखा है, पिछले साल सावन में आयी थी, तब तक गप्पू वाला चक्कर चालू हो गया था, तो शीलवा के साथ मेला देखने गयी, मेला तो बहाना था। मेले के पहले ही निहोरा करके पहरेदारी के लिए शीलवा ने बुच्ची को खड़ा किया, गन्ने का खेत और मुश्किल से दस हाथ दूर, सव साफ़ साफ़ दिख रहा था।

और गाँव से ही जो शीलवा का यार पीछे लगा था, उसके साथ वहीँ खेत में टांग उठा के गप्पगप्प घोंट रही था, अंदर बाहर जाता सब साफ़ दिख रहा था।

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महीने भर बुच्ची थी और महीने में कम से कम बीस दिन बुच्चिया ने चौकीदारी की, और कई बार तो बस दो चार हाथ दूर, दर्जन भर से ज्यादा तो इस गाँव में ही शीलवा के यार थे और सब का, खूब अच्छी तरह से,…

एक बार तो शीलवा के साथ मेला जा रही थी, एक पतली गली से, दो दो लौंडे बुच्ची के चोली में हाथ डाले, कस कस के मसल रहे थे और एक ने तो बुच्ची के हाथ में एकदम पकड़ा दिया, एकदम टनटनाया, उसे बड़ा गिचपिच लगा लेकिन शीलवा की हंसी सुन के ही वो समझ गयी की उसकी पक्की सहेली की ही बदमाशी है , फिर तो उसने भी खुल के मजा लिया, दबाया मुठियाया। और कम से कम दो चार बार हाथ में , एक बार मेले में झूला झूल रहे थे, दो की सीट पर तीन, शीलवा वैसे ही अपने यार की गोद में बैठी थी, बस जैसे ही झूला ऊपर गया, मारे डर के बुच्चिया की चीख निकल गयी और शीलवा ने अपने यार का उसकी मुट्ठी में पकड़ा दिया " ले यार तू भी तो मजा ले "/

तो उन सब से गप्पू का उन्नीस नहीं था, बीस ही होगा और जिस तरह से बेचारा इतने दिनों से पीछे पड़ा था, उसके सवाल का एक ही जवाब हो सकता था वो उसने दे दिया, लेकिन पहले चिढ़ाया

" का चाही एक बार खुल के तो बोलो "

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अब बहुत हो गया।

गप्पू से रहा नहीं गया , उसने झटके से बुच्ची से अपने को छुड़ाया, उसको झटक के पुवाल के बंडल पे और पीछे से दबोच लिया और जिन कच्ची अमियों के लिए इतने दिन से तरस रहा था वो अब उसकी दोनों मुट्ठी में।

पहले तो बच्ची उस दर्जा नौ वाली के कच्चे टिकोरों के छुअन के अहसास का ही मजा लेता रहा, एकदम रुई के फाहे ऐसे मुलायम, फिर हलके हलके मसलना शुरू किया,

" ओह्ह्ह नहीं, अहहा, हाँ छोड़ न, नहीं नहीं इत्ते जोर से नहीं लगता है, हाँ उफ्फ्फ : बुच्ची सिसक रही थी, पिघल रही थी,

ऐसा नहीं की उसके जोबना पर पहली बार किसी मरद का हाथ पड़ा हो, शीलवा के साथ तो मेले आते जाते, न जाने कितनी बार कितने लौंडो ने कस कस के दबा दबा के उभारों की ऐसी की तैसी कर दी थी, उसके बाद भी शीलवा ने अपनी दोस्ती की कसम दिलवा के कभी झूले पे तो कभी अमराई में

" यार अपनी सोनचिरैया अपने भैया के लिए बचा राखी है तो ये दोनों अपने लड्डू तो खिला दे मेरे यारों को। ' और शीलवा खुद बुच्चिया की चोली खोलकर अपने यारों को सहेली के जोबना परस देती।

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शीलवा के खाली बबुआने में ही दर्जन भर यार होंगे, और उतने ही अहिराने, भरौटी,कहरौटी में, बाइस पुरवा का कोई पुरवा नहीं बचा था, जिसके दो चार लौंडो के आगे उसने टांग नहीं फैलाई हो। और शीलवा के सब यार बुच्चिया के भी जोबना देख के ललचाते।

लेकिन आज तो कुछ और ही लग रहा था, गप्पू कस कस के जोबन मसल रहा था, पीछे से उसकी देह रगड़ रही थी, खूंटा एकदम खड़ा धक्का मार रहा था। इमरतिया और मुन्ना बहू के संगत में बुच्ची समझ गई थी कितनी बार लड़की को ही पहल करनी पड़ती है और उसने अपनी स्कर्ट उठा के कमर पे लपेट ली और हाथ बढ़ा के पजामा का नाड़ा,

पजामा सरसरा के नीचे

बुच्ची की मांसल किशोर जाँघे फ़ैल गयीं और खूंटा सीधे चुनमुनिया का चुम्मा लेने लगा, दरवाजे की सांकल खड़काने लगा, तितली पंख फड़फड़ा रही थी और गप्पू एक हाथ सरक के मक्खन ऐसी जाँघों के बीच, और सीधे से हथेली फैला के उसने खजाने पर कब्ज़ा कर लिया।

बुच्ची के तन-बदन में आग लग गई, अगर गप्पू उसे वहीं निहुरा के चोद देता तो वो चुदवा लेती। मुड़ के खुद उसने गप्पू का चुम्मा ले लिया, गप्पू भी करीब करीब उसका हम उम्र, किशोर, सालों से लाइन मार रहा था, और गप्पू ने मौका जान के जो बात सालो से कहना चाह रहा था कह दिया,

" हे बुच्ची दोगी न "

और अब बुच्ची ने बिना उसे चिढ़ाए, छेड़े मान लिया,

" हाँ गप्पू हाँ, जब कहो तब, जितनी बार कहो उतनी बार, जैसे कहो वैसे "

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और शब्दों से ज्यादा बुच्ची की देह हाँ कह रही थी, वह पहले तो अपनी देह से गप्पू की देह रगड़ रही थी, फिर खुद पुआल के ऊँचे गट्ठर पर निहुर गयी और बुच्ची के चूतड़ अब गप्पू के तन्नाए डंडे से रगड़ रहे थे ,

गप्पू बुच्ची की अनचुदी कच्ची गीली चूत की दोनों फांको को एक ऊँगली से फैला रहा था,

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बुच्ची ने खुद अपने किशोर हाथों से उसका सुपाड़ा खोल दिया था, और व्ही सुपाड़ा अब चूत के मुहाने पे अपना मालिकाना हक जता रहा था।

गप्पू कस कस के जिन गालों को देख के ललचाता था, जिसे दिखा दिखा के उसकी बहन चुनिया चिढ़ाती थी, अब उसे कस कस के चूम रहा था,चूस रहा था, कचकचा के काट रहा था।

लेकिन जानते दोनों थे, इससे ज्यादा मुश्किल था ,

जैसे सूरजु चाह के भी नहीं अपनी बहिनिया को पेल पाए, तेल नहीं था और छेद भी ढूंढ पा रहे थे तो उसी तरह फिर दर्जा नौ वाली कच्ची चूत को खाली थूक लगा के, …. नहीं हो सकता था

लेकिन उससे बड़ी बात थी शोर-गुल और आसपास के लोग। आंगन बगल में ही था, और वहां से आवाजें आ रही

कोई कौन.

लीला थी, कच्ची कली और अहिराने की दो करेर दो दो बच्ची की महतारी भौजाइयों के चंगुल में फंस गयी थी, मुन्ना बहू भी पीछे से ललकार रही थी, और रामपुर वाली के साथ सूरजु के ननिहाल की दो भौजाइयां भी मैदान में आ गयी थी, और अहिरानेवालियों को चढ़ा रही थी

" अरे ननदों का कपड़ा उतारा नहीं जाता, फाड़ दिया जाता है "

" पहले कपडा फाड़ो, फिर कपडे के भीतर वाला " हंस के एक अहिराने वाली बोली

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तो सूरजु के ननिहाल की किसी भौजाई ने मिर्ची लगाई

" कपडे के भीतर वाला तो इसका भाई फाड़ेगा, " और तब तक कपडे लगता है उतर चुके थे, क्योंकि एक अहिराने वाली बोली

" अरे छिनार झांट आने लगी लेकिन अभी तक कोर बची है, तोहरे भाई लोगन क न खड़ा होत हो तो हमें बतावा, अपने मायके से बुलवाय के अगवाड़ पिछवाड़ा दुनो फाड़ दिया जाए "

" अरे हमार भाई लोग तो चढ़ेंगे ही इसपर, हमार सास लोग गोर गोर चिक्क्न चिक्क्न बिटिया एही लिए तो पैदा करती हैं की उनके बहुओं के मायके वालों का भला हो लेकिन चल एक दिन क मोहलत, कल रतजगा में अगर झिल्ली टाइट मिली तो हम सब का मायका दूर नहीं है , एक साथ दो दो तीन चढ़ेंगे " अहिराने वाली दूसरी बोली लेकिन शर्त लगा दी,

"लेकिन चल पहले चूस चाट के हमार झाड़।"

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बुच्ची सोच रही थी, की अगर लीला की जगह वो पकड़ी जाती तो और दुरगत होती

पर गप्पू घुसाने के फिराक में था, बिना तेल के घुसने का चांस नहीं लग रहा था, चूत में आग लगी थी, लंड भी एकदम खड़ा पागल हो रहा था , लेकिन गप्पू का सारा जोश एक मिनट में ठंडा हो गया। खड़ा लंड बैठ गया।

मंझले मामा की आवाज सुनाई दी , बड़ी हलकी सी लेकिन उनकी आवाज तो कोई भी पहचान लेता, उसकी बहन के गाँव के रिश्ते से ससुर लगते थे, एकदम लहीम सहीम, ५०० डंड बैठक रोज पेलने वाले, कसरती देह,

बुच्ची ने भी उनकी सुनी, टॉप नीचे हो गया, पाजामा ऊपर और दबे पाँव बाहर निकलते गप्पू बोला,

" सुन पांच मिनट बाद निकलना तुम "

और गलियारे में इधर उधर देख कर तीर की तरह गायब

बुच्ची ने अपना हुलिया थोड़ा ठीक किया, मुस्करायी, लेकिन तब तक कांती बुआ की आवाज सुनाई दी, उसी तरह हलकी फुसफुसाती पर एकदम साफ़।

कांती बुआ, सूरजु की तो बुआ लगती थीं लेकिन बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं।

और बुच्ची ठिठक गई। चुपके से उसने दरवाजा बंद किया और दबे पाँव कमरे के एक कोने में पुवाल के गट्ठरों के पीछे दुबक गई।

लेकिन एक बार फिर से मंझले मामा की आवाज आयी, खूब धीमी सी, बगल वाले कमरे में। उस कमरे में तो रजाई गद्दे रखे रहते थे, वहीँ से बुच्ची और शीलवा लाद के गद्दे और रजाई ऊपर कोहबर वाले कमरे के लिए ले गयी थीं, तो वहां उस समय मंझले मामा क्या कर रहे थे ?

दर्जा नौ वाली लौंडिया, बदन में फुर्ती देह में ताजगी, मन हरदम कुलबुलाता, पुवाल के गठ्ठरों पर एक के बाद कर के ऊपर चढ़ गयी वो। दोनों कमरों के बीच में एक ईंट की पतली दीवार और ऊपर कुछ ईंटें निकालकर बनाए गए रोशनदान थे।
 
मंझले मामा

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मंझले मामा ही थे।

लेकिन सिर्फ बनियान पहने, और उस धुंधली रौशनी में भी उनका कसरती देह साफ़ दिख रहा था, और फिर जब उसकी निगाह नीचे गई तो ऊपर की सांस ऊपर नीचे की नीचे, कोई औरत थी, सिर्फ पिछला हिस्सा दिख रहा था, हाँ फर्श पर पड़ा साडी और ब्लाउज दिख रहा था, पेटीकोट कमर तक।

खेल बस अभी शुरू हुआ था, मंझले मामा ने कस के दोनों हाथ से कमर पकड़ रखी थी, कोई उम्र वाली थी, चौड़े चौड़े नितम्ब, चिकनी मांसल जाँघे, रजाई के ढेर रखे थे उसे पकड़ के झुकी, निहुरी। रौशनी एक दुसरे रोशनदान से उस कमरे में आ रही थी और नितम्ब और कमर के आसपास तो साफ़ दिख रहा था लेकिन चेहरा रजाई में दुबका था,

मामा ने मुंह से ढेर सारा थूक निकाला, और अपने सुपाड़े में लगाया, और वो देख के बुच्ची कुछ हदस गयी कुछ मुस्कराने लगी,

मुन्ना बहू और मंजू भाभी ने कोहबर में उसकी जो क्लास ली थी, उसमे ये साफ़ साफ़ समझाया था, अगर सुपाड़ा धूसर, खूब बदरंग हो तो मरद खूब चोद चूका होगा, नम्बरी चुदक्कड़ और मूड आ गया तो अपनी सगी महतारी को नहीं छोड़ेगा, खड़े लौंड़े के बाद कुछ नहीं सूझेगा उसको, और दूसरी बात झड़ेगा खूब देर में, और भूत की तरह रगड़ रगड़ के पेलेगा, औरत लाख चूतड़ पटके अपनी मन मर्जी किये बिना मानेगा नहीं।

और मुन्ना बहू ने जोड़ा और अगर किसी औरत का भोसंडा खूब काला है तो उसका मतलब खूब चुदी है वो,

मंझले मामा तो एकदम गोरे थे, लेकिन सुपाड़ा जैसा मंजू भाभी ने बोला था एकदम वैसा धूसर खूब बदरंग, जब की डंडा एकदम गोरा, और जहाँ वो डाल रहे हैं वो भी काली एकदम, तवे के पिछवाड़े जैसी, जबकि जाँघे गोरी,

मतलब खूब चुदी है वो,

थूक लगा के भी वो घुसेड़ नहीं पाए और जोर से गरियाया,

" स्साली रंडी की जनी झांट आने के पहले से चुदवा रही है,, हजारो बार चुदी होगी, दो दो अपनी ऐसी छिनार बिटिया इस भोंसडे से निकाल चुकी, बीसो बार तो मैंने पेला है लेकिन अभी भी वैसे ही टाइट, "

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उधर से हंसी की आवाज आयी, खुली खिलखिलाती और वैसे भी बुच्ची जैसे खड़ी थी, सिर्फ कमर के ऊपर तक दिख रहा था। वो बेचैन थी, ….कौन है जो मामा से चुद रही है, सूरजु भैया के ननिहाल वाली, या कोई काम वाली या कोई जिसे बुच्ची जानती है।

बुच्ची देखने के लिए थोड़ा उचकी और अबकी थोड़ा आगे तक दिखा, जैसे गाय के दूध दुहने के पहले थन, खूब बड़ी बड़ी गोरी गोरी गदरायी चूँचियाँ, मामा ने एक हाथ से कस के लटके हुए जोबन पकड़ा दूसरे से कमर दबोची और जैसे सांड बछिया पर चढ़ता है, पूरी ताकत से पेल दिया।

आगे से हलकी सी चीख निकल गयी, और मंझले मामा बोले,

" स्साली काहें को चीख रही है, अभी तो ठीक से सुपाड़ा भी नहीं गया है , पूरा मूसल बाकी है। इतने दिन बाद मिली हो, रगड़ रगड़ के पेलूँगा । "

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और सच में अगला धक्का उन्होंने कस के मार दिया, और गचाक से सुपाड़ा अंदर बुर में घुस गया जैसे मक्खन में चाक़ू। चीख अबकी थोड़ी और कस के निकली, और उस के बाद तो धक्के पे धक्के,

ये नहीं कि इसके पहले बुच्ची ने चुदाई नहीं देखी थी।

कितनी बार, अभी चार महीने पहले इसी गाँव में अपनी पक्की सहेली शीलवा को चुदते कितनी बार देखा होगा, करीब करीब रोज ही। और उस के पहले अपने गाँव में भी, घर में भी, लेकिन इस तरह दिन दहाड़े, मंझले मामा किसी औरत को रगड़ रगड़ के पेल रहे हैं। उनका मोटा सुपाड़ा उस बुर वाली की बिल में धंसा, बुच्ची का भी मन गिनिगिना रहा था, कोई उसके साथ भी ऐसे ही, बुच्ची की आँखे एकदम वही चिपकी थीं, गले में थूक अटक गया था, साँसे ऊपर की ऊपर नीचे, की नीचे,

लेकिन आज उसे लगा की लड़के लड़कियों की चुदाई और मर्द औरत की चुदाई में बहुत फरक होता है और आज वो जिसका खेला देख रही थी, दोनों ही साफ़ लग रहा था इस खेल के जबरदस्त खिलाड़ी हैं।

धक्को की रफतार बढ़ गयी थी, मामा हर धक्के के साथ बोल भी रहे थे और अब दोनों हाथ से कस कस के लटके हुए जोबन दबा रहे मसल रहे थे।

बुच्ची को बिलिया के अंदर आता जाता मोटा खूंटा जाता साफ़ साफ़ दिख रहा था और बुच्ची की बुरिया भी लसलसा रही थी। वो अपने दोनों जाँघों को कस कस के रगड़ रही थी, जिस तरह से मंझले मामा का खूंटा अंदर बाहर हो रहा था, उसका मन कर रहा था उस औरत को हटा के वो खुद उसकी जगह निहुर जाए और मामा का खूंटा, सच में मामा नंबरी चोदू लग रहे थे। क्या जोर जोर से धक्के मार रहे थे, एकदम हथोड़ा, और उस को भरौटी वाली भौजी की बात याद आ रही थी,

" अरे जउने दिन किसी मरद के, खेले खाये चोदे मर्द के नीचे आओगी न बबुनी, तो लौंडन को भूल जाओगी, जैसे रुई धुनते हैं न वैसे धुन के रख देगा "

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सच में जैसे रुई धुनते हैं न उसी तरह मंझले मामा पेल रहे थे, पूरी ताकत से।

वो औरत कौन थी, जानने का उसका मन हो रहा था। फर्श पर गिरी रेशम की साडी बलाउज कुछ देखी लग रही थी, लेकिन जबतक चेहरा न साफ़ दिखाए तब तक मुश्किल था और एक तो जहां से वो पुवाल के गट्ठर पर खड़ी थी वहां से ज्यादा दिखना मुश्किल था।

लेकिन बुच्ची को एक रास्ता दिखा, जो ईंटे बीच बीच में से निकाल के दोनों कमरों के बीच रोशनदान सा बना था, हाथ बढ़ा के उसे पकड़ किया और उचक के दीवाल से चिपक के ऊँचे पुवाल के गट्ठर पे खड़ी हो गयी और अब साफ़ साफ़ दिख रहा था और उसी समय उस औरत ने करवट बदली, और अब चेहरा साफ़ दिख रहा था,

मारे झटके के बुच्ची गिरते गिरते बची, किसी तरह एक हाथ से मुंह पे रख के चीख रोकी और हाथ से वो रोशनदान की ईंट छूट गयी, लेकिन अगले ही पल उसने दूसरे हाथ से रोशनदान को पकड़ा, किसी तरह

बंदरिया की बच्ची की तरह, किसी तरह लटकी रही, लेकिन आँखे उसकी फैली, मुंह खुला

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कांती बुआ,



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कांती बुआ, ( असल में सूरजु की बूआ) बुच्ची की सगी बड़ी मौसी, बुच्ची की माँ की सगी बड़ी बहन, तर ऊपरी मतलब साल भर का मुश्किल से अंतर और सूरजु भैया के मामा से, …

और मामा ने निकाल के अपना लम्बा भाला पूरा बाहर तक, कस के पूरी ताकत से एक धक्के में अंदर तक जड़ तक भोंक दिया और कांती बूआ ने कस के रजाई को पकड़ लिया। लगता है धक्का सीधे बच्चेदानी पे लगा था और साथ में बूआ ने एक जबरदस्त गन्दी गाली मामा को दी,

" तोहार बेटा चोद बहिनिया अस पोखरा तालाब नहीं है, जिसमे गदहे घोड़े गोता खाते हैं. ज़रा आराम आराम से करो न, कहाँ भागी जा रही हूँ, "

कांती बुआ ने सूरजु की माई, अपनी भाभी और मंझले मामा की बहन को जबरदस्त गाली दी वो भी उनके बेटे दूल्हे सुरजू से जोड़ के।

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" अरे नहीं है तो हम कर देंगे न बुच्ची क मौसी काहें घबड़ात हो, हमारे बहिनिया क मुट्ठी तो आराम से घोंट लेबू " हँसते हुए सूरजु के मामा ने चिढ़ाया और फिर दोनों जोबना पकड़ के वो धक्का मारा की बुच्ची की मौसी, कांती बूआ को जो कुछ हुआ लेकिन देख के बुच्ची हिल उठी, और लुढ़कते लुढ़कते बची।

पर मान गयी वो भी,

उसकी मौसी को छेड़ते हुए, दस बीस करारे धक्को के बाद खूंटा बाहर निकाला तो अंदर नहीं ठेला,

सूरजु की बूआ निहोरा करती रहीं, लेकिन वो छेड़ते रहे और अंत मेंबुच्ची मान गयी अपनी मौसी को, क्या ताकत से चूतड़ उन्होंने पीछे ठेला और इंच इंच कर के सूरजु की बुआ ने सूरजु के मामा को मोटा खूंटा करीब करीब पूरा अंदर।

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लेकिन अब मामा का नंबर था बदला लेने का और कचकचा के सीधे झुक के उन्होंने बूआ की चूँची पे काट लिया लंड के बेस से उनकी क्लीट को रगड़ते, तड़पाते पूछा

" तोहार छोटकी बहिनिया, बुच्ची का माई नहीं आयी ? "

" अरे उनके घर में खुदे बियाह पड़ा है, उनके देवरानी क बेटवा क लगन है लेकिन घबड़ा जिन बरात जाने के दो दिन पहले आ जाएंगी और बरात बिदा करके तब जाएंगी, ले लिहा उनका भी मजा, बहुत याद आती है का, बुच्ची क महतारी क "

हँसते हुए बुच्ची की मौसी, कांती बूआ बोलीं

" याद आने की बात ही है, चौथी में हम और बड़े भैया आये थे, और उस समय तो वो बुच्चिया से भी,… "

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हँसते हुए सूरजु के मंझले मामा बोले लेकिन उनकी बात काटते हए बूआ ने एक धक्का कस के पीछे की ओर मारा, पूरा खूंटा घोंटा और बोलीं

" हमसे बोलरहे हो , तुम दोनों भाई उस की कच्ची अमिया देख के कितना ललचा रहे थे, अरे अभी बुच्ची जिस उमर की है उससे पूरी चौदह महीने छोटी थी, इतना हमसे निहोरा किये तुम दोनों,.... तो हमही बहाना बना के, 'खाली दूध देना है, कुछ नहीं करना है अरे हम तो रहेंगे ही, 'और मुश्किल से आयी और पहली बार केतना चिचियाई, "

हँसते हुए बुच्ची की मौसी, कांती बूआ ने, बुच्ची की माई की रगड़ाई का किस्सा सुनाया।

बुच्ची कान पारे सुन रही थी, सूरजु के मंझले मामा ने सूरजु की बूआ के बिल में कस कस के दस धक्के पूरी ताकत से मारे जैसे बुच्ची की बड़ी मौसी को नहीं बुच्ची की माई को चोद रहे हों, और फिर कचकचा के उनकी चूँची दबाते बोले,

" सच में बुच्चिया क माई के साथ बहुत मजा किये थे, दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिल के पेले थे उसको "

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" और गांड भी तो मारे थे " पीछे धक्का लगाते सूरजु की बूआ बोलीं,

" तीन बार, दो बार हम एक बार बड़के भैया " सूरजु के मामा ने जुगलबंदी पूरी की

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साफ़ लग रहा था वो सब बातें सोच के बुच्ची की मौसी को बड़ा मजा रहा था, हर धक्के के जवाब में दूने जोर से वो धक्का मारतीं, बुर निचोड़ के लंड भींच लेतीं, चेहरे पे ख़ुशी, मस्ती साफ़ दिख रही थी।

बुच्ची जबरदस्त चुदाई देख रही थी, और अपनी माई के बारे में सोच रही थी,

कैसे अपनी भौजाई के भाई के साथ दो दिन में छह बार और वो भी उमर में उससे चौदह महीने छोटी थीं तब से चुद रही है। इधर उसकी भाभी, रामपुर वाली भौजी का भाई साल भर से निहोरा कर रहा है, चलो अब एकदम खुल के देगी और सबको देगी,

उधर लगता है सूरजु के मामा और बूआ दोनों झड़ने के कगार पे धक्के तेज हो गए थे और पोज भी बदल गया था।

बजाय निहुरे होने के अब सूरजु की बूआ, कांती बूआ जमीन पर पड़े किसी गद्दे पर लेटी थी और सूरजु के मामा उनकी ले रहे थे, हचक के

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और कुछ सोच के बुच्ची की मौसी की बड़ी बड़ी चूँची चूसते, निपल मुंह से निकाल के हँसते बोले,

" बुच्ची एकदम अपनी माई पे गयी है वैसे ही जबरदंग जोबन आये हैं उसके "

" उसका भी लेने का मन है क्या? वैसे सब लोग कहते हैं बुच्चिया तोहरे बीज से जामल हो, बुच्चिया क माई को बियाहे के दिन, सिन्दूर दान के बाद, बिदाई के पहले दो बार मलाई खिलाये के बिदा किये थे, और ठीक नौ महीना में बुच्चिया निकल आयी थी। "

नीचे से कसकर चूतड़ उछालते हुए, बूआ, बुच्ची की मौसी, बुच्ची की महतारी की सगी बड़ी बहन बोलीं।

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वो अब झड़ रही थीं,

मंझले मामा भी लम्बी साँसे भर रहे थे और खूंटा उनका बिल में एकदम जड़ तक, धक्के रुक चुके थे और बुच्ची ने देखा की कांती बूआ, बुच्ची की बड़ी मौसी की बिल से बूँद बूँद करके सफ़ेद खूब गाढ़ी मलाई बह रही थी, फिर उनकी जांघों के आसपास भी मलाई लथपथ हो गयी।

बुच्चिया की बुर भी लासा हो गयी थी।

बुच्ची की मौसी की बुर से खूंटा निकालते मामा हंस के बुच्ची की मौसी, कांती बूआ से बोले,

" अरे तो जो बीज लगाया हो,... उसको पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "

मंझले मामा की बात बुच्ची ने सुनी तो लेकिन उसका पूरा ध्यान दीवाल से चिपके रहने और किसी तरह पुवाल के गट्ठर पे ठीके रहने पे थी, जरा भी खड़बड़ हुयी तो पकड़ी जायेगी।

कांती बूआ ने अपनी रेशम की साड़ी ब्लाउज जो उन्होंने बहुत सम्हाल के एक गद्दे के ढेर पर रखी थी, उठा के झाड़ के पहन लिया ,सूरजु के मामा ने जरा सा दरवाजा खोल के झाँका। कोई नहीं था। पहले कांती बूआ और फिर वो निकल गए।

बुच्ची भी सम्हल-सम्हल कर पुआल पर से उतरी और उस कुठरिया से निकल कर बाहर।

उसके आँखों के सामने बार बार अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की चुदाई घूम रही थी, कैसे हचक के वो पेल रहे थे, क्या ताकत थी, हाथों में धक्को में, और आधे घंटे तो कम से कम चली होगी।

मंझले मामा की देह कितनी तगड़ी, और खूंटा भी एकदम तना था, कड़ा कितना होगा, बुच्ची की मौसी के चीथड़े कर दिए, मर्द हो तो ऐसा, और फिर हथौड़े की तरह मंझले मामा की बात दिमाग में घूम रही थी,

" अरे तो जो बीज लगाया हो उसको,... पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "

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एक बार नहीं बार बार और जैसे बुच्ची ने खुद से जवाब दे दिया,

" काहे नहीं है , ….एकदम है "
 
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