छुटकी - होली दीदी की ससुराल में
भाग -११५ बुच्ची, नेछु की रस्म और, किस्से बुच्ची की माई के
३९,९५,६०९
पूनम, मंझली मामी और, …
सूरजु के मामा ने ज़रा-सा दरवाजा खोलकर झाँका।
कोई नहीं था। पहले कांती बूआ और फिर वो निकल गए।
बुच्ची भी सम्हल-सम्हल कर पुआल पर से उतरी और उस कुठरिया से निकल कर बाहर।
उसके आँखों के सामने बार बार अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की चुदाई घूम रही थी, कैसे हचक के वो पेल रहे थे, क्या ताकत थी, हाथों में… धक्को में, और आधे घंटे तो कम से कम चली होगी। मंझले मामा की देह कितनी तगड़ी, और खूंटा भी एकदम तना था, कड़ा कितना होगा, बुच्ची की मौसी के चीथड़े कर दिए, मर्द हो तो ऐसा, और फिर हथौड़े की तरह मंझले मामा की बात दिमाग में घूम रही थी,
" अरे तो जो बीज लगाया हो ,...उसको पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "
एक बार नहीं बार बार और जैसे बुच्ची ने खुद से जवाब दे दिया,
" काहे नहीं है, …. एकदम है "
लेकिन बुच्ची गलियारे से आँगन में नहीं घुसी।
सूरजू भैया अभी भी आँगन के बीचों-बीच पीढ़े पर अकड़कर बैठे थे। हल्दी की रस्म का पीला हंगामा अभी-अभी थमा था—मिट्टी के फर्श पर हल्दी के छींटे ऐसे चमक रहे थे जैसे सरसों का खेत घर में ही उग आया हो। औरतों की खिलखिलाहट की गूँज अब भी हवा में तैर रही थी, कहीं कोई ढोलक की थाप पर उँगलियाँ आज़मा रहा था, तो कहीं बड़की चाची पान लगाते-लागाते अगली रस्म की खबर ले रही थीं।
पर बुच्ची समझदार थी। उसे मालूम था—भौजाइयाँ अभी थकी नहीं होंगी। हल्दी का बदला अभी पूरा कहाँ हुआ! कोई न कोई उसे पकड़ कर फिर से पीला कर देगी, या चुटकी काट-काट कर छेड़ेगी— “अरे, अगली बारी तेरी है रे!”
सो बुच्ची ने दाँव बदला।
गलियारे से फुर्र होकर वह दालान में पहुंची—सीधे मर्दों के इलाके में। वहाँ खटियों पर गाँव के बूढ़े-बाबा गमछा डाले बतिया रहे थे—किसान-सभा से लेकर बैलों की जोड़ी तक सब पर चर्चा। हुक्का गुड़गुड़ा रहा था।
घर की बेटी थी, उसका न कोई परदा था न घूंघट। वह हवा की तरह पूरे घर में घूम सकती थी।
दालान से वह आहिस्ता-आहिस्ता कुएँ की ओर खिसकी। कुएँ के पास रस्सी की चर्र-चर्र, पानी खींचती औरतों की बातों में घुली हँसी, और भीगी मिट्टी की सोंधी गंध—सब कुछ मिलकर जैसे कोई अलग ही दुनिया रच रहे थे। वहीं से घर की दीवार से सटी पतली गली निकलती थी, जो पीछे वाले दरवाज़े तक जाती। उसी दरवाज़े से काम करने वाली या पड़ोस की औरतें आया-जाया करती थीं।
बुच्ची उसी गली में बिल्ली-सी सरकती हुई पहुंची। उसका इरादा साफ था—भीतर भी रहना है, पर पकड़ में नहीं आना है। मौका देखकर किसी टोली में घुस जाएगी और ऐसे मासूम चेहरा बना लेगी जैसे अभी-अभी आई हो।
वह कभी कुछ सोचकर मुस्कुराती तो कभी कुछ इरादे करने लगती है।
बुच्ची को अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की बातें याद आ रही थी की कैसे बुच्ची की माई ने जब बुच्ची से साल भर से भी ज्यादा छोटी थीं तो अपने भौजी के भाई के साथ, ….और दो दिन में छह बार और चार बार पिछवाड़े भी, …और बुच्ची का अभी खाता भी नहीं खुला,
उसने इरादा कर लिया, सूरजु भैया के बाद गप्पू को पक्का,
वो स्साला डरेगा तो खुद चढ़ के और उसके बाद जो जो उसके पीछे पड़े हैं न सबको, बेचारे पिछले सावन से ललचा रहे हैं, शीलवा उसकी पक्की सहेली ने बीसो बार कहा, और एक बार अपने गाँव लौट गयी तो वहां तो बीसो मुश्किल
उधर सूरजू भैया की माई—यानी उसकी मामी—ने उसे दस बार समझाया था,
“अरे, खाली भौजाई उतार कर भाग जाने से काम ना चलेगा। रुको महीना-बीस दिन। गाँव का मजा लो। खेलो, कूदो, आम का बाग़ीचा घूमो, पोखरे पर जाओ। ननिहाल में ही तो असली मज़ा है! जो मन करे सो करो। न कोई मना करेगा, न रोके-टोकेगा। यही तो उम्र है जी भर के जीने की!”
अब इससे ज़्यादा खुली छूट कोई क्या देता! पर बुच्ची का मन भी बड़ा अलबेला था।
ननिहाल की आज़ादी उसे ऐसे भाती थी जैसे आम के पेड़ पर पहली बौर।
ऐसे माहौल में बुच्ची की खिलखिलाहट भी किसी चिड़िया की तरह पूरे आँगन में फुदकती फिरती—पकड़ी जाए तो हँस दे, बच निकले तो और हँसे। और आज तो घर में शादी थी—सो हर कोना कहानी बन जाने को तैयार था
लेकिन उसको सूरजु के मामा की बात याद आ गयी और वो धीमे धीमे मुस्कराने लगी,
" जो बीज लगाया है,... उसको तो फल खाने का हक सबसे पहले है",
तो क्या सूरजु के मामा भी नजर लगाए हैं उसपे?
अरे लगाए हैं तो लगाए रहे अब उन्हें और लचायेगी वो और पूनम दीदी ने तो बोला था की
" जिसे हम बड़े उमर वाला समझते हैं न वो और छिनरा होते हैं, ख़ास तौर से कच्ची उमर वालियों को देख के,... और मजा भी लेकिन उनके साथ आता है।"
सही बात है जिस तरह से रगड़ रगड़ के वो कांती बूआ को, …बुच्ची की मौसी को पेल रहे थे, बुच्ची एकदम गीली हो गयी थी।
उसने तय कर लिया, बहुत हो गया, अब ताला नहीं लगाएगी… खुला दरवाजा। आजाये जिस स्साले को आना है, उसके भैया, भौजी लोगों के भैया, और गाँव के यार। बहुत दिन उपवास हो गया, अब एक दिन भी नागा नहीं होगा और दोनों जून दावत होगी।
जैसे ही बुच्ची कुएँ से मुड़ी, उसकी नजर अहिराने वाली पूनम दीदी पर पड़ी।
दीवार से सटी खड़ी थीं—ईंटों के एक ढेर पर चढ़ी हुईं—और सामने वाले कमरे की खुली खिड़की से भीतर झाँक रही थीं। उनकी चोटी हवा में हल्की-हल्की हिल रही थी और पाँव की पायल ईंट से टकराकर छन-छन कर रही थी।
बुच्ची को देखते ही उन्होंने आँख दबाई, उँगली से इशारा किया— “ए इधर आ, चुपचाप!”
बुच्ची बिल्ली की तरह दबे पाँव पहुँची।
पूनम दीदी फुसफुसाईं—
“चल, तुझे खेल दिखाएँ। सूरज भैया की मंझली मामी, बहुत हम सबको गरिया रहीं थीं न! ज़रा उनकी हालत देख!”
दोनों खिड़की से सटकर झाँकने लगीं।
अंदर का नज़ारा देख बुच्ची की आँखें गोल।
मंझली मामी सचमुच गाँव की चर्चा थीं। लंबी, गोरी, गठीली देह—कमर ऐसी कि सच में मुट्ठी में आ जाए। चाल में लचक, बात में मिठास, और हँसी में ऐसी खनक कि सामने वाला अपना नाम भूल जाए। और दो दो मुट्ठी में भी न आएं ऐसे बड़े बड़े डबल डबल साइज के कड़े कड़े गदराये जोबन और उनसे भी जानमारु चूतड़। आगे कोई पड़ जाए तो जोबन जान मार लें उसकी, और पीछे से चूतड़ होश उड़ा दें।
माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, बालों में चमेली का गजरा, और कलाई भर-भर के कड़े।उनकी चाल जब आँगन पार करती तो लगता है जैसे कोई नाचती हुई बेल लहराकर निकल गई। और बोल? अरे, जैसे शहद घोलकर रखती हों ज़ुबान पर। मज़ाक भी खुलकर, ठहाका भी खुलकर। मायके में भी वही रानी, ससुराल में भी वही शान। यहाँ तक कि उनकी ननद की ससुराल तक में उनके किस्से पहुँचते थे।
और हाँ—उनकी रसमलाई!
जिसने एक बार चख ली, बस उसी का मुरीद।वो सिर्फ दीवाना ही नहीं करती थीं, दीवानों का मन भी रखती
जोबन लुटाने में न उन्हें उमर का लिहाज था न रिश्तों का, और उमर अभी उनकी ज्यादा थी भी नहीं, बड़की ठकुराइन से पांच छह साल छोटी ही थीं,
तो वही और पश्चिम पट्टी वाले चन्नर चाचा, एकदम कसरती, तगड़े और नंबरी छिनरा,
पहली चीज बुच्ची ने नोटिस की, सूरजु की मामी के जाँघों के बीच मलाई पूरी तरह लिपटी थी, और अभी भी चुनमुनिया से चू रही थी बूँद बूँद,
साफ़ था दूसरे राउंड की तैयारी थी,
कमरे के एक कोने में चारा काटने की मशीन रखी थी, और आधे कमरे में चारे के बंडल बंधा रखा था, एक बांस चारपाई रखी थी, जो काम वालों के बैठने, सोने के काम में आती थी , फर्श कच्चा था और एक खिड़की थी काफी ऊपर थी और ठीक से बंद नहीं होती थी जहाँ से पूनम और बुच्ची सिनेमा देख रही थीं।
चन्नर चचा के सिर्फ सीने के नीचे का दिख रहा था, वो खड़े थे, ...उनका खड़ा था और मंझली मामी, घुटनो के बल बैठीं थी, साड़ी उन्होंने चरी के बंडल पे रख दी थी,
ब्लाउज सिर्फ खुला हुआ था, पेटीकोट कमर तक उठा और कमर में लिपटा, और अपने मेंहदी लगे हाथों से उन्होंने खड़े खड़कते खूंटे को पकड़ रखा था, और खुला मुंह एकदम पास, उनके लिपस्टिक लगे रसीले होंठ मोटे सुपाड़े से बस थोड़े दूर,
" काहें तड़पा रही है , चूस न "
चाचा तड़पते हुए बोले, और मुस्कराके मामी ने बस अपनी लपलपाती जीभ से सुपाड़ा छू भर दिया और खिलखिलाने लगीं। जैसे खील बताशा,
और चाचा तड़प के रह गए, बोले, " ले लो न मुंह में, बस थोड़ा सा,
और मामी ने अपना चेहरा उठाकर बड़ी बड़ी काली काली कजरारी आँखों से उन्हें देखा जैसे पूछ रही हों " सिर्फ थोड़ा सा क्यों, इतना मस्त खड़ा है "
और गप्प से पूरा सुपाड़ा गप्प, एकदम लीची ऐसा
और वैसे ही वो चूस रही थीं धीरे धीरे रस लेकर,
लेकिन अब चन्नर चाचा से नहीं रहा गया, कस के मामी का सर पकड़ के उन्होंने ठेलना शुरू कर दिया, और मामी भी कम छिनार नहीं थी। होंठों से उसे चिपका कर, रगड़ते हुए, नीचे से जीभ से सहलाते हुए, धीरे धीरे, तिल तिल कर चूसते हुए घोंट रही थी, जैसे किसी कुँवारी कच्ची चूत में मोटा लंड दरेरते हुए जा रहा हो,
चाचा का भी कसरती बदन, अपनी भौजाई की भौजाई, डबल भौजाई के मुंह में डबल ताकत से वो पेल रहे थे,
और आधा घुसने के बाद मामी गों गों करने लगी, लेकिन चच्चा नहीं रुके
चुसाई ख़तम हो गयी, चुदाई चालु हो गयी और मामी का मुंह चोदा जा रहा था,चाचा कस कस के पेल रहे थे और मामी भी अपने मायके की खिलाडी, हलक तक चला गया उनके होंठ लटके हुए दोनों रसगुल्लों से चिपक गए, गाल एकदम फूल गया, आँखे बाहर को निकल रही थी, होंठों के किनारे से लार टपक रही थी, फिर भी वो पीछे नहीं हटी।
जीभ उनकी उसी तरह मुंह के अंदर जहां सुपाड़ा लंड के डंडे से मिलता है उस जगह पे रगड़ रही थी, होंठ चाट रहे थे और वो पूरी ताकत से चूस रही थीं।
चचा ने भाला बाहर निकला करीब करीब पूरा फिर धीरे करके ८ इंच का मोटा अपना गन्ना, रस से भरा मीठा मीठा, मामी को खिला दिया। एक बार फिर जड़ तक, हलक तक ठूस दिया,
दो चार बार तो धीरे धीरे लेकिन फिर वो ये भूल गए की चूत नहीं मुंह है, ...और क्या हचक के चुदाई की मामी की मुंह की,
देखने वाली पूनम और बुच्ची दोनों गरमा गयी थीं,
बुच्ची चुदी भले न हो लेकिन इमरतिया ने उसे अपने सूरजु भैया के गन्ने का स्वाद मुंह में तो दिलवा दी दिया था, और पूनम तो घाट घाट का पानी पी, ब्याहता, दीवानी दोनों हो रही थीं मोटे लंड के लिए।
पहल पूनम ने की, बुच्ची की स्कर्ट के अंदर हाथ डाल के उसकी चिड़िया पकड़ ली और लगी कस कस के भींचने,
उधर मामी की हालत खराब थी,
मायके ससुराल में उन्होंने बहुत गन्ने घोंटे थे लेकिन चन्नर चाचा के गन्ने की बात ही कुछ और थी, जितना सख्त उतना ही मीठा। और इसलिए भी अपनी ननद के ससुराल में आने का उनका बहुत मन करता था, और सूरजु तो एकदम घर के लड़के से भी बढ़कर,.... इसलिए पूरे १२ दिन के लिए आयी थीं, लिपस्टिक का सब रस उतर गया, आँख में लगा काजल गाल पे आ गया, पर न चुसाई कम हुयी न मुंह की चुदाई,
और दस मिनट की जबरदस्त मुंह चुदाई के बाद जब चच्चा ने निकाला तो चाची को कुछ इशारा नहीं करना पड़ा,
वो खुद उसी बांस खटिया को पकड़ के निहुर गयीं, बुरिया में पहली चुदाई की मलाई थी,
और चन्नर चाचा ने ठीक दिया, कुछ मुंह चुसाई से थूक से लग के लंड चिकना हो गया था, कुछ गीली बुर और बुर में पहली चुदाई की मलाई लेकिन इन सबसे ज्यादा चाचा के कमर की ताकत, जैसे किसी ने तान के पूरे जोर से मुक्का मारा हो।
मामी ने पूरी ताकत से बँसखटिया पकड़ रखी थी फिर भी हिल गयीं,
लेकिन धक्के पर धक्के लगते गए, इंच इंच कर के करीब करीब मोटा खूंटा अंदर था,
मामी कभी दर्द के मारे कहरती, कभी मजे से सिसकती, कभी पीछे मुड़ के चच्चा को चिढ़ाते हुए मुस्करा के कह देती और चच्चा अगला धक्का और कस के मार देते। जब एक दो इंच बाहर रह गया तो धक्के रुक गए और एक हाथ से चच्चा ने मामी का ब्लाउज अब पूरी तरह उतार के दूर फेंक दिया।
सीधे चारे की मशीन पर जा के गिरा।
और अब दोनों जोबन चाचा की मुट्ठी में ,
जिन उभारों को देख के जिस का कब से खड़ा होना बंद हो गया हो,बैद हकीम हार मान गए हों, उसका भी फड़फड़ाने लगे, वो दोनों जोबन अब कस कस के रगड़े मसले जा रहे थे।
कभी लगता है दबा दबा के चच्चा बुरी हाल करेंगे तो वो को चूँची छोड़ के निपल पकड़ लेते और कस के उस घुंडी को नोच लेते
कभी झुक के कचकचा के चूँची का ऊपरी हिस्सा काट लेते, जोर से पूरी ताकत से दांत गड़ा देते, जैसे कच्ची अमिया कुतर रहे हों। सबको मालूम था की मंझली मामी एकदम ही लो कट ब्लाउज पहनती हैं, जरा सा झुकीं तो निपल तक साफ़ दिखता है और गाँव में ब्रा का ढक्क्न तो चलता नहीं और सादी बियाह के घर में तो एकदम नहीं। और ऊपर से मामी बात बात में आँचल ढलकाती हैं
साफ़ था ये दांत के निशान तो ब्लाउज के बाहर ही रहेंगे और जरा सा आँचल मामी ने ढलकाया तो चाचा के निशान दिख जाएंगे।
" क्या कर रहे हो, काटो नहीं," मामी ने मीठी मीठी शिकायत की और जवाब में सूरजु भैया के चाचा ने सूरजु भैया के मामी का मीठा मीठा गाल कचकचा के कस के काट लिया।