Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2 - Page 8 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2

#63



मैं- तो ठीक है , उस रात बारिश बहुत तेज थी , उसी बारिश की वजह से मैं जंगल में एक पेड़ के निचे खड़ा था , घर आने की जल्दी थी पर बरसात तेज और तेज होती गयी, फिर मुझे ध्यान आया की फार्म हाउस नजदीक ही है क्यों न वहा चला जाऊ,

ताई- फिर .

मैं- भीगते हुए मैं फार्म हाउस पंहुचा , गीले कपडे बदलने मैं बाथरूम में था ही की ताऊ भी अपनी गाड़ी में आ गया पर वो अकेला नहीं था उसके साथ एक औरत थी , जिसके हाथ पाँव ताऊ ने बांधे हुए थे . ताऊ बहुत ज्यादा नशे में था , फिर उस औरत को होश आ गया .

ताई- फिर क्या हुआ

मैं- बता रहा हु, जैसे ही उस औरत को होश आया वो समझ गयी की गलत जगह पर आ फंसी है वो , ताऊ का दिल आया हुआ था उस पर इसलिए वो उठा लाया था उसे, चोदना चाहता था, वो गिडगिडाने लगी अपनी लाज की दुहाई देने लगी. पर ताऊ तो मालिक था न गाँव बस्ती का, उसने उस औरत के साथ जबरदस्ती करनी चाही

मैं ये देख न सका और बीच में आ गया. मैंने ताऊ को समझाने की कोशिश की , की ये सब गलत है पर वो नहीं माना, हमारी झीना- झपटी हो गयी , की तभी पिताजी आ गए वहां पर , अपने भाई को तो वो क्या कहते मुझे ही मारने लगे, माहौल थोडा ज्यादा गर्म हो गया .

पिताजी ने मुझे वहा से जाने को कहा , क्योंकि उन्होंने अपने भाई का पक्ष ले लिया था , ठीक उसी तरह से जैसे मेरी माँ और भाभी ने कर्ण का पक्ष लिया. पर मैं वाही रुका रहा, मैंने कहा की जाऊंगा पर उस औरत के साथ .

ताऊ अपनी जिद पर था और मैं अपनी , नशे में ताऊ फिर मुझसे उलझ गया और मैंने भी पिताजी का लिहाज नहीं किया , पिताजी बीच बचाव करने लगे, की तभी बिजली चली गई और हमने चीख सुनी , ताऊ की चीख थी वो . मैंने भाग कर लालटेन जलाई और जब कुछ देखने लायक हुआ तो ताऊ निचे पड़ा था उसकी छाती में खंजर घुसा हुआ था, उसी समय वो मर गया था.

पिताजी ने सोचा की अँधेरे का फायदा उठा कर मैंने ताऊ को मार दिया. जबकि उस थोड़ी देर के अँधेरे में क्या हुआ था कोई नहीं जानता , बस सच यही है की ताऊ मर चूका था . पिताजी को लगता है की मैंने ताऊ को मारा , इसी बात पर हमारे बीच तकरार हुई, दुरिया हो गयी और मैंने घर छोड़ दिया.

मेरी बात सुन कर ताई खामोश हो गयी . मैं उसके चेहरे पर आये भावो को पढने की कोशिश करने लगा.

मैं- बस यही थी उस रात की कहानी, अब तुम मुझे बताओ

ताई- अभी नहीं, पहले तुम मुझे बताओगे की वो कौन औरत थी, जिसके लिए तुम अपने ताऊ के खिलाफ हो गए.

मैं- हमारे सौदे में ये नहीं है ताई.

ताई- तो ठीक है भूल जा सौदे को फिर,

मैं- ये गलत बात है , धोखा हुआ ये तो

ताई- कैसा धोखा, मुझे हक़ है पूरी जानकारी लेने का , तूने नहीं मारा , देवर जी ने नहीं तो बची वो औरत , उसी ने मारा मेरे पति को , तू मुझे उसका नाम दे मैं तुझे तेरा सुराग दूंगी.

मैं- उसका नाम तो नहीं बताऊंगा,

ताई- तो ठीक है मत बता देवर जी से पूछ लुंगी

मैं- कर ले कोशिश मेरे और मेरे बाप के बीच एक करार है , उस औरत की सुरक्षा का , मेरा बाप भी नहीं बताएगा चाहे कितना ही लंड हिला तू उसका .

ताई- मैं पता कर ही लुंगी, और उसकी लाश तेरे इसी दरवाजे पर पटक कर जाउंगी, जिसके लिए तूने अपने ताऊ को मरवा दिया उसकी लाश जरुर देखेगा तू

मैं- वो दिन कभी नहीं आएगा, अगर तूने मालूम भी कर लिया उसके बारे में और मुझे खबर मिली की उसके जिस्म पर खरोंच भी आई, तो कसम है मुझे मैं भूल जाऊंगा तू मेरी ताई है , और तू क्या सोचती है तू मुझे नहीं बताएगी तो तेरे हाथ पांव जोडू मैं, कबीर में अभी इतनी गैरत बाकी है .

ताई- नादानी मत कर , तू बस उसका नाम बता दे बदले में मैं तेरी मुश्किल हल कर दूंगी,

मैं- तू मुझे समझ ही नहीं पायी कभी ताई, जा चली जा दूर हो जा मेरी नजरो से .

गुस्से में तमतमाती ताई चली गयी, मैं बस उसकी गोल मटोल गांड को देखते रहा . बेशक मैं चाहता तो इस सौदे में अपना फायदा बना सकता था पर फिर क्या इंसानियत रहती मेरी, जिस जान को मैंने बचाया था उसी को अपने फायदे के लिए हलाल करवा देता तो धिक्कार था मेरे ऊपर .

शाम होते ही मैं गाँव की तरफ चल दिया और सीधा पंहुचा सविता मैडम के घर , मैडम मुझे देखते ही हमेशा की तरह खुश हो गयी .

“बड़े दिन बाद आये ” मैडम ने कहा

मैं- हाँ थोडा व्यस्त था , पर अभी मुझे बहुत जरुरी बात करनी है

सविता- हाँ कहो

मैं- मास्टर जी कहा है

वो- तुम्हारे पिता के साथ शहर गए है , क्या मालूम कब लौटेंगे

मैं- ताई आखिरी बार कब मिली थी तुमसे

सविता- कल शाम को .

मैं- जब वो तुम्हारे साथ थी कुछ ऐसी घटना हुई थी क्या मतलब उन्होंने किसी बात का जिक्र किया , जो मुझसे सम्बंधित था , या हमारे परिवार से मतलब कोई छुपी हुई बात

सविता- नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं . वो रोज ही आती है मुझसे मिलने बस कल हम घर पर नहीं बल्कि स्कूल में ही बैठे थे , तुम तो जानते हो मैं कभी देर तक रुक जाती हु,

मैं- कोई आया था मिलने उस दौरान , तुमसे या ताई से

सविता- ऐसा तो कोई खास नहीं था पर तुम क्यों पूछ रहे हो .

मैं- ताई को मालूम हो गया है की उसके पति को किसने मारा

ये सुनते ही सविता के होश उड़ गए. उसने मेरी तरफ देखा

मैं- उसे शक है बस नाम नहीं पता ,

सविता- पर तुम तो जानते हो कबीर की मैंने .......



मैं- जानता हु तुमने नहीं मारा उसे, दरअसल यही मेरी उलझन है की ताऊ को मैंने नहीं मारा, तुमने नहीं मारा पिताजी अपने भाई को मारेगा नहीं तो फिर कौन कर गया वो काम
 
जर जमीन और जोरु, हर समय हर काल मे सारा पंगा बस इनका ही रहा है, एक छोटे से छेद की वज़ह से इतिहास बनता रहा है

अपनी कहानी भी ऐसी है, इंसानो के स्याह मन मे ना जाने क्या छुपा होता है

इंसान का असली लालच पैसा नहीं होता, होता है चूत का लालच, यही लालच इंसानो से तमाम वो कर्म करवाता है जिनका परिणाम फिर कुछ और ही निकालता है
 
#64



“कबीर मैं तुम्हारी अहसानमंद हु मेरी लाज बचाने के लिए तुमने न जाने क्या क्या कुर्बान कर दिया. घर बार सब छोड़ दिया, जब इस हाल में तुम्हे देखती हु तो दिल दुखता है मेरा ” सविता ने कहा

मैं- नसीब है मैडम जी,

सविता- पर कही न कही मैं दोषी भी तो हूँ

मैं- कोई और भी होती तो भी मैं उसके लिए ऐसा ही करता , पर फिलहाल मेरी प्राथमिकता है की तुम्हे ताई से दूर रखा जाए, मैं उस पर एक मिनट का भी भरोसा नहीं कर सकता, वो पूरा जोर लगाएंगी तुम्हे ढूंढने का

सविता- मैं ध्यान रखूंगी,

मैं- हमेशा अपने पास बन्दूक रखना जब भी तुम्हे लगे की तुम्हे खतरा है बेहिचक गोली चला देना बाकि मैं देख लूँगा.

सविता- जब तुम साथ हो तो मुझे क्या खतरा होगा,

मैं- ये ठीक है पर हर समय भी तो मैं साथ नहीं हो सकता न , अब तक तो मैं निश्चिन्त था पर अब जब आग लग ही गयी है तो जल्दी ही धुआ भी दिखाई देगा, मेरी जिन्दगी में बहुत कम लोग है और मैं नहीं चाहता की उनमे से भी कोई कम हो जाये

मैंने सविता का हाथ पकड़ा और कहा - वादा करो तुम, अगर कोई ऐसी परिस्तिथि आई जब तुम अकेली इस खतरे का सामना करोगी तो , बेहिचक तुम निर्णय लोगी.

सविता- हाँ कबीर,

मै- ठीक है तो फिर मैं चलता हूँ अपना ख्याल रखना ,और चूँकि ताई तुम्हारी खास सहेली है ध्यान देना उसके व्यवहार पर, उसकी बातो पर

मै उठ कर खड़ा हुआ की सविता ने मेरा हाथ पकड़ लिया.

“रुको कबीर, ” सविता बोली

मैं- क्या हुआ .

सविता- कुछ नहीं मैं चाहती हु की तुम आज रात मेरे साथ रहो, मेरे पास रहो ,

सविता का आँचल थोडा सा सरक गया मेरी निगाह उसके उन्नत वक्षो पर पड़ी .

मैं- अगर मुझे ये करना होता तो कभी का कर सकता था न

सविता- जानती हु कबीर, पर मेरी इच्छा है , मैं ये करना चाहती हु

सविता आगे बढ़ी और मेरे होंठो पर अपने होंठ रख दिए. प्यासे होंठो से सुर्ख लबो की रगड़ ने बदन को हिला कर रख दिया. सविता अपने आप में हुस्न का एक बम थी , जैसे जैसे वो चूमती जा रही थी मेरे हाथ उसकी गोल गांड तक पहुच गए . मैंने उसके कुलहो को दबाया.

सविता की साडी उतार कर फेक दी मैंने , बलाउज और काले पेटीकोट में उसका गोरा बदन कहर ढा रहा था . ब्लाउज फाड़ कर बाहर आने को बेताब उसकी पञ्च पांच किलो की चुचिया. किसी को भी पागल कर दे, मैंने अपनी पेंट खोल दी.

सविता की नजर मेरे लंड पर पड़ी. मुस्कुराते हुए वो मेरे पास आई और उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया. नर्म उंगलियों के स्पर्श मात्र ने ही मेरे तन में आग सुलगा दी. मैंने उसे अपने आगे खड़ी की और उसकी चुचियो को मसलने लगा. बलाउज को उतार फेंका . मैंने उसके कंधो को चूमा.

सिसकारी भरते हुए वो लंड को हिला रही थी मैंने अपनी उंगलिया पेटीकोट के नाड़े में फंसाई और संमर्मारी जांघो से रगड़ खाते हुए वो सविता के पैरो में आ गिरा. मैंने कभी सोचा नहीं था की सविता को चोदने का दिन आएगा. मैंने कभी इस नजर से देखा ही नहीं उसे.

“सीईई ” सविता आहे भरने लगी थी उसके अपनी जांघे खोली और मैंने चूत को अपनी मुट्ठी में भर लिया, जैसे एक छोटी भट्टी दहक रही हो.

“बहुत गर्म हो तुम,”

“बहुत दिनों से किआ नहीं न ” सविता बोली

मैं- मास्टर जी की रूचि नहीं है क्या

सविता- समय कहाँ है हमेशा से तो तुम्हारे पिताजी के साथ घूमते रहते है , वो तो बाहर मुह मार लेते होंगे मैं प्यासी रह जाती हु

मैं- पहले बता देती ऐसी बात थी तो

सविता- तुम कब समझे मेरे इशारे, हार कर आज मुझे खुल कर कहना ही पड़ा.

सविता ने अपने हाथ घुटनों पर रखे और झुक गयी उसकी बड़ी सी गांड देख कर मैं तो पागल हो गया. मैंने लंड को चूत के मुहाने पर रखा और उसकी कमर को थामते हुए धक्का लगा दिया. चूँकि सविता के बच्चा नहीं हुआ था तो चूत में दम था. मेरे लंड ने जैसे ही अपनी जगह बनाई मैं उसे पेलने लगा.

मेरे धक्को के घर्षण से उसकी चूत का पानी जांघो तक बहने लगा. वो आह आह कर रही थी मैं उसे पेल रहा था . सविता के पैर मस्ती के मारे डगमगाने लगे थे, पुच की आवाज से लंड बाहर निकल आया.

सविता- बेड पर चलो

वो मेरे आगे आगे अपनी गांड मटकाते हुए चल रही थी, ऐसा मादक द्रश्य देख कर मैं और उत्तेजित हो गया. बिस्तर पर लेटते ही उसने अपनी जांघे फैलाई मैंने उसकी जांघो को अपनी जांघो पर चढ़ा लिया. और एक बार फिर हम एक दुसरे में समां गए. मैं बार बार उसके होंठो को चूम रहा था फिर मैंने उसके निप्पल को मुह में भर लिया.

सविता का पूरा बदन ऐंठ गया मेरी इस हरकत पर उसने मुझे कस कर भींच लिया अपनी बाहों में और कुछ ही देर में हम दोनों साथ साथ झड़ गए. उसका बदन बुरी तरह कांप रहा था . कुछ देर हम एक दुसरे से लिपटे रहे फिर अलग हो गए.

सविता शायद बाथरूम में चली गयी, मैं लेटा रहा . की तभी मेरा फ़ोन बज उठा, दुनिया में बस एक ही थी जिसका फ़ोन मुझे आता था , वो थी प्रज्ञा मैंने तुरंत फ़ोन उठाया

मैं- हाँ,

प्रज्ञा- कबीर, कहाँ हो, मुझे अभी तुमसे मिलना है

मैं- अभी पर क्यों कैसे

प्रज्ञा- कोई सवाल नहीं , मैंने कहा न अभी के अभी मिलना है

मैं- ठीक है जगह बताओ

प्रज्ञा- मैं अनपरा में हु, तुम यही से पिक करो मुझे

मैं- ठीक है जल्दी ही पहुचता हूँ

मैंने फटाफट अपने कपडे पहने तबतक सविता आ गयी .

सविता- क्या हुआ,

मैं- मुझे जाना होगा बहुत जरुरी है

सविता- कहाँ जा रहे हो

मैं- मिलके बताता हु

मैंने बाहर निकलते हुए कहा , तभी मुझे एक बात ध्यान आई

मैं- तुम्हारी गाड़ी मिल सकती है क्या

सविता- हाँ क्यों नहीं, उधर मेज पर रखी है चाबी.

मैंने सविता का माथा चूमा और उसे अपना ध्यान रखने को कहा .



गाड़ी स्टार्ट करते ही मैंने गति बढ़ा दी. आखिर ऐसा क्या हुआ था जो मुझे प्रज्ञा ने तुरंत ही अनपरा बुलाया था . दिल जोरो से धडकने लगा था .
 
#65



मेरे दिल में एक साथ हजार सवाल दौड़ रहे थे आखिर ऐसी क्या बात थी जो प्रज्ञा ने मुझे इतना अर्जेंट बुलाया था, किसी अनहोनी की वजह से मैं थोडा टेंशन में आ गया था , ले देकर बस एक प्रज्ञा ही तो बची थी मेरे पास , खैर मैं जल्दी ही अनपरा पहुच गया , मैंने उसे फ़ोन किया

मैं- हाँ मैं पहुच गया हु

प्रज्ञा- पुरानी हवेली के पास आ जाओ

मैंने गाड़ी उस तरफ मोड़ ली, कुछ देर बाद प्रज्ञा उस तरफ आई , उसके हाथो में एक बैग था , तुरंत वो गाड़ी में बैठ गयी

मैं- क्या हुआ .

वो- बताती हु, तुम गाड़ी स्टार्ट करो

मैं- पर हुआ क्या

प्रज्ञा- कहा न यहाँ से चलो

मैं- ठीक है बाबा , पर किधर चलना है .

प्रज्ञा- जहाँ सिर्फ हम दोनों हो .

उसने मेरे काँधे पर अपना सर रखा और बोली- थोड़ी देर सोना चाहती हु

मैं समझ गया था की उसे कहाँ जाना है और ये भी की परेशान है वो . रात आधी से ज्यादा बीत गयी थी , थोडा समय और लगा हमें फिर हम प्रज्ञा के फार्महाउस पहुच गए.

गाड़ी अन्दर लगाई और फिर कमरे में आ गए.

मैं- अब तो बता दो

प्रज्ञा- बताती हु, मेरे पति और तुम्हारे पिता का क्या रिश्ता है

मैं- इस सवाल के लिए इतना जल्दी था मिलना

प्रज्ञा- बताओ मुझे

मैं- तुम नहीं जानती क्या

प्रज्ञा- जानती तो तुमसे सवाल नहीं करती

मैं- दुश्मनी का

प्रज्ञा - और दो दुश्मन जब एक साथ आ जाये, उनमे दोस्ती हो जाये तो

मैं- हो सकता है लोग अपने स्वार्थ के लिए अक्सर दुश्मनी भुला देते है , या फिर कोई ऐसी चीज़ जो दुश्मनी से ऊपर हो , मतलब कोई व्यापारिक फायदा जैसे की

प्रज्ञा- यही बात मुझे खटक रही है की पीढियों की दुश्मनी को अचानक भुला कर दो लोग एक कैसे ही गए, कोई और मौका होता तो मैं भी खुश होती की चलो दोनों गाँव एक हो गए, भाईचारा बन गया , पर इस हालात में ये कैसे मुमकिन है

मैं- भाड़ में जाए दुनिया, तुम क्यों इतना सोचती हो. अगर दोनों कोई खिचड़ी पका भी रहे है तो भी हमें क्या लेना देना उनसे

प्रज्ञा- आज होटल में एक मीटिंग हुई है , किस्मत से मुझे जानकारी मिल गयी ,

मैं- क्या हुआ मीटिंग में

प्रज्ञा- ये कहानी इतनी आसान नहीं है कबीर, इस कहानी के मोहरे भर है हम सब , तुम्हे याद होगा कबीर मैंने तुमसे कहा था की राणाजी ने बहुत सा सोना ख़रीदा है . वो लोग उस सोने से कुछ करने जा रहे है

मैं- क्या , क्या करने जा रहे है

प्रज्ञा- ये मालूम करना होगा हमें .

मैं- किस जगह

प्रज्ञा- जल्दी ही मालूम कर लुंगी मैं

मैं- हम्म, पर तुम्हारी माँ बीमार है , तुम्हे ऐसे नहीं आना चाहिए था फ़ोन पर बता देती , मैं देख लेता मामले को

प्रज्ञा- मेरा सब कुछ दांव पर लगा है कबीर, राणाजी ने रखैल पाली हुई है गृहस्थी डांवाडोल हुई पड़ी है

मैं- समझता हूँ पर सोचो जरा एक दिन ऐसा आएगा जब दुनिया के सामने तुम्हे हमारे इस रिश्ते को बताना पड़ेगा तब क्या कहोगी तुम राणाजी से.

प्रज्ञा- मैं क्या कहूँगी, मैं क्या कहूँगी मैं हक़ से तुम्हारे हाथ को थाम लुंगी

मैं- किस हक़ से

प्रज्ञा- दोस्ती के हक़ से,

मैं- जमाना कहाँ मानता है इन बातो को और मेरी वजह से तुम्हारे दामन पर दाग लगे, ऐसा होने नहीं दूंगा मैं .

प्रज्ञा- इसलिए तो तुमपे भरोसा करती हूँ , ये जिस्मानी रिश्ते इसलिए नहीं बनाये मैंने की मेरी हवस मेरे काबू में नहीं है बल्कि मैं तुमसे इस तरह जुडी हु की तुम मेरा एक हिस्सा हो .

मैं- इसीलिए डरता हु की कही मेरी वजह से तुम्हारी ग्रहस्थी में आग न लग जाये.

प्रज्ञा- आग तो राणाजी ने लगा ही दी है , मैं तो बुझाने की कोशिश कर रही हूँ

मैंने ताई वाली बात प्रज्ञा को बताई की मैं सविता के लिए चिंतित था

प्रज्ञा- अगर वो रतनगढ़ आ जाये तो मैं जिम्मेदारी ले सकती हु उसकी सुरक्षा की

मैं- ऐसा नहीं हो पायेगा.

प्रज्ञा- तो फिर जैसा है वैसे रहने दो. वैसे मैंने एक बात और मालूम कर ली है

मैं क्या

प्रज्ञा- यही की कामिनी के कमरे में वो कौन आदमी की तस्वीर थी .

मैं- ये सबसे पहले बताना था न

प्रज्ञा- अभी ध्यान आया, वो राणा हुकुम सिंह की तस्वीर थी ,

मैं- कौन राणा हुकुम सिंह

प्रज्ञा- तुम्हे हमेशा से इतिहास जानने की तलब थी न , मैं पूरा तो नहीं पर जितना जानती हूँ बताती हूँ , राणा हुक्म सिंह का ताल्लुक देवगढ़ से है .

मैं- देवगढ़. पर वो तो

प्रज्ञा- हाँ , वही देवगढ़ जो बरसो पहले खत्म हो गया .

प्रज्ञा ने एक पेग बना कर मेरी तरफ बढ़ाया

मैं- इस से बात नहीं बनेगी,

प्रज्ञा- तो क्या चाहिए तुम्हे

मैं- तुम्हारी चूत का रस पीना चाहता हु

प्रज्ञा- तुम्हारी ये अश्लील बाते, कलेजे में उतर जाती है

मैं- तुम हो ही ऐसी , इस खूबसूरत बदन की कशिश मुझे पागल कर देती है

प्रज्ञा- ठीक है वो रस भी पिला दूंगी , पर पहले इन अधूरी बातो को पूरा कर लेते है , और कल सुबह सुबह ही हम देवगढ़ के लिए निकलेंगे.

मैं- बिलकुल , पर एक बात खटक गयी है दोनों ठाकुर मिल कर आखिर क्या करने वाले है कामिनी की डायरी भी नहीं आई है दुरुस्त होक , कुछ जानकारी मिल जाती

प्रज्ञा- जानकारी मिली तो है , देखो मंदिर में पिघला सोना, फिर वो बावड़ी पर सोना, उसके बाद दोनों ठाकुरों का सोना खरीदना, फिर कामिनी की हवेली में पिघला सोना मिलना , ये सब आपस में जुडी हुई घटनाये है , बस हमें इनके जुड़ने की वजह तलाश करनी है

मैं- और वो वजह हमें मिलेगी देवगढ़ में .

मैंने प्रज्ञा का हाथ पकड़ा और उसे अपने आगोश में खींच लिया .

प्रज्ञा- मुझे लगता है थोड़ी देर सो लेना चाहिए



मैं- सो लेंगे पर अभी मुझे तुम्हे प्यार करना है .
 
#66



प्रज्ञा के साथ वो खास पल जीना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी , बीते कुछ महीने जबसे वो मेरे जीवन में आई थी , जिन्दगी क्या होती थी मैं जान गया था, बाकि बची तमाम रात वो मेरी बाँहों में थी, मेरे आगोश में थी . सुबह हुई, हम तैयार थे देवगढ़ जाने को, मैंने गाड़ी स्टार्ट की ,

प्रज्ञा- मैं चलाती हु .

मैं साइड में हो गया. मैंने भरपूर नजर उसके चेहरे पर डाली, रात की चुदाई के बाद बड़ी खुशगवार लग रही थी वो .

“ऐसे क्या देख रहे हो ” बोली वो

मैं- बस तुम्हे देख रहा हूँ , जी चाहता है की तुम सामने ऐसे ही बैठी रहो मैं तुम्हे देखा करू .

प्रज्ञा- तुम भी न

मैं- झूठ नहीं कहूँगा, मेरे दिल में एक जगह तुम्हारी भी है , तुम जब जब मेरे साथ होती हो लगता है जिन्दा हूँ मैं , मेरे आस पास का मौसम ख़ुशी से भर जाता है जब मैं इस चेहरे को मुस्कुराते देखता हूँ

प्रज्ञा- छोड़ो न इन बातो को मेरे दिल के तार झनझना जाते है

मैं- काश तुम मेरी होती

प्रज्ञा- एक तरह से तुम्हारी ही तो हूँ मैं

मैं- हो भी नहीं भी

प्रज्ञा- अब तुम्हारी किस्मत में जितना है उतना मिल ही गया तुमको

मैंने गाड़ी का शीशा चढ़ाया और प्रज्ञा के काँधे पर अपना सर रख दिया

मैं- काश ऐसा होता की तुम हमेशा मेरे पास रहती मेरे साथ रहती,

प्रज्ञा- इस जन्म में तो राणाजी ले गए मौका किसी और जन्म में देखना अब तुम

मैं- ये बात तो है

ऐसे ही आपस में हंशी मजाक करते हुए हम देव गढ़ की तरफ बढ़ रहे थे, जल्दी ही आबादी खत्म हो गयी , सुनसान इलाका शुरू हो गया . रस्ते पर पत्ते पड़े थे, छोटे मोटी टहनिया पड़ी थी

“ऐसा लगता है जैसे काफी समय से इस तरफ कोई नहीं आया है ” मैंने कहा

प्रज्ञा- हाँ , मैंने भी ज्यादा कुछ सुना नहीं इधर के बारे में ,

मैं- पर हुकुम सिंह का कामिनी से सम्बन्ध था , तो देवगढ़ का तुम्हे मालूम होना चाहिए

प्रज्ञा- मेरे परिवार में कामिनी की कोई खास इज्जत नही है कबीर, एक तरफ से वो अय्याश टाइप औरत थी , हमेशा से अलग रही थी परिवार से .

मैं- पर हुकुम सिंह के बेहद करीब रही होगी,

प्रज्ञा- मुझे भी ऐसा ही लगता है .

कुछ देर बाद हम देवगढ़ में दाखिल हो गए. मकान पुराने थे , जर्जर हालत में , ऐसा लग रहा था की मैं किसी और ज़माने म पहुँच गया हूँ

प्रज्ञा ने एक जगह गाड़ी रोकी, जैसे ही मैं गाड़ी से उतरा मेरे सर में अचानक से दर्द हो गया .

“क्या हुआ कबीर, ठीक तो हो न ” बोली वो

मैं- हाँ ठीक हु, एकदम से सरदर्द हो गया .

प्रज्ञा- पर यहाँ कोई है नहीं किस से पूछे राणा हुकुम सिंह के बारे में

प्रज्ञा न जाने क्या कह रही थी मैं उसकी बात सुन नहीं पा रहा था, सर में बहुत तेज दर्द हो रहा था, आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था , काली पेली आक्रतिया आ रही थी, जैसे फोटो का नेगेटिव होता हैं न वैसे ही कुछ .

मैंने गाड़ी के बोनट को पकड़ लिया और अपने आपको संभालने की कोशिश करने लगा. नाक से नकसीर बहने लगी थी .

“कबीर , कबीर ये क्या हो रहा है ठीक तो हो न ”

मैं- हाँ ठीक हु, शायद गर्मी की वजह से नक्सेर आ गयी

मैंने रुमाल से खून साफ़ करते हुए कहा

प्रज्ञा- पर मौसम ठण्ड का है कबीर,

मैं- हो जाता है कभी कभी .

मैंने प्रज्ञा को टालते हुए कहा पर अन्दर से मैं घबरा गया था ,क्योंकि मेरे साथ पहले भी कुछ दुखद घटनाये हो चुकी थी इसलिए मैं थोडा सावधान हो रहा था . मेरी आँखे कुछ ऐसी छाया देख रही थी जो अजीब थी , हम थोडा आगे बढे, वो खाली पड़े मकान, वो सुनसान राहे, .

मैं देख रहा था , एक अपनापन महसूस कर रहा था जैसे इस जगह को जानता था ,

“इधर आओ, ये बाजार होता था प्रज्ञा , यहाँ की जलेबी बहुत प्रसिद्ध होती थी ” मैंने कहा

प्रज्ञा- पर तुम्हे कैसे मालूम

मैं- नहीं मालूम बस मेरे मुह से अपने आप निकल गया .

हम थोडा सा आगे बढे, एक बड़ा सा कमरा था , जिस पर एक जर्जर बोर्ड लगा था डाक खाना, देवगढ़ . कुछ आगे और बढे हम लोग. मुझे लगा की कोई छाया जैसे मेरे पास से भाग कर गयी, ये मेरा भ्रम नहीं था , मेरी स्मृति खेल रही थी मेरे साथ, मैं कुछ ऐसी यादो को महसूस कर रहा था जो मेरी नहीं थी, बहुत घुमने के बाद हम आखिरकार एक ऐसे घर के पास पहुंचे जिसने जैसे मेरी आँखों को जकड़ ही लिया हो.

वो बड़ा सा दरवाजा, जिसकी लकड़ी अब काली पड़ गयी थी , जगह जगह से दीमक खा गयी थी . पर लोहे के जर खाए कुंडे अभी भी लटके थे, कभी कभी जब हवा जोर से बहती तो आवाज करके बता देते थे की अभी भी पहरेदारी कर रहे है वो .

मैं आगे बढ़ा और उस दरवाजे को खोल दिया. ढेर सारी धुल ने मेरा स्वागत किया. ये बहुत बड़ा घर था , आँगन में एक चोपड़ा था जहाँ कभी तुलसी लगी होगी, एक जीप रही होगी किसी जमाने में अब केवल कबाड़ था. पर कुछ तो था इस घर में जिसने मेरे कदमो की आहट को महसूस कर लिया था .

पास में ही एक हैंडपंप था . मैंने न जाने क्यों उसे चलाया थोड़ी साँस लेने के बाद पानी फूट पड़ा उसमे , मैंने मुह धोया, एक बेहद अलग सा सकूं मिला मुझे, ये पानी ठीक वैसा ही मीठा था जैसा मुझे मजार के पास और उस तम्बू में मिला था .

मैंने पास वाले कमरे को खोला , शायद ये रसोई थी , जिसमे अब कुछ नहीं बचा था . निचे एक और बड़ा सा कमरा था जो शायद बैठक रही होगी, ऊपर जाती सीढिया थी, मैंने नजर डाली दो चोबारे थे, मैंने प्रज्ञा का हाथ पकड़ा और सीढिया चढ़ने लगा. सर का दर्द हद से ज्यादा बढ़ गया था . दिल जोरो से धडकने लगा था .



दाई तरफ वाले चोबारे का दरवाजा जैसे ही मैंने खोला , मैं और प्रज्ञा दोनों एक पल के लिए घबरा से गए.
 
#67



दाई तरफ वाले चोबारे का दरवाजा जैसे ही मैंने खोला , मैं और प्रज्ञा दोनों एक पल के लिए घबरा से गए.

“असंभव , ये नहीं हो सकता ” मैंने कहा

मेरी निगाह जैसे सामने दिवार पर जम सी गयी थी , बेह्सक उस तस्वीर पर धुल थी पर फिर भी मैं लाखो में उसे पहचान सकता था , वो तस्वीर मेरी थी , क्या कहा मैंने मेरी तस्वीर हाँ ये मेरी ही तस्वीर थी . या मेरे जैसी थी

“कबीर ये क्या है , तुम्हारी तस्वीर यहाँ कैसे ” प्रज्ञा ने सवाल किया

मैं- मेरी नहीं है ,

मैंने तस्वीर दिवार से उतारी और शर्ट की बाहं से धुल साफ़ की , वो आधी तस्वीर थी , शायद बाकि के हिस्से को किसी ने फाड़ कर फेक दियाथा

“आधा हिसा कहा गया इसका ” बोली प्रज्ञा

मैं- मुझे क्या मालूम दिवार पर दो तीन तस्वीरे और थी पर पहचानने लायाक बस वो एक ही थी , मैं पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और गौर से तस्वीर को देखने लगा. सर का दर्द और बढ़ गया था .

मैं- प्रज्ञा क्या मेरा कोई नाता है इस जगह से.

प्रज्ञा- नहीं जानती पर नियति अगर हमें यहाँ लायी है तो कोई बात होगी ही .

मैंने चोबारे की खिड़की खोली. ठंडी हवा ने मुझे ऐसे छुआ की मेरा बदन कांप गया

“बारिश ,” मेरे मुह से ये शब्द निकला

“कहाँ है बारिश ” प्रज्ञा ने पूछा

मैं उसे देता तो क्या जवाब देता . पास ही एक मेज थी, एक टूटा लैंप रखा था , पास के आलीये में एक स्पीकर, डेक, . मैंने अलमारी खोली, एक खाना किताबो का भरा था , मैंने उन्हें बाहर निकाल का फेका, फिर कपडे , एक बड़ा बक्सा जिसमे ढेरो ऑडियो कसेट , एक पैकेट जिसमे एक लाल चुन्नी थी . और ताज्जुब जिस हिफाजत के साथ साथ इसे रखा था नयी सी लगती थी ये.

मैंने वो किताबे देखि, एक छोटी सी डायरी मिली

“इस बारिश में जब तुम्हे छज्जे पर नाचते हुए देखा ,बस देखते ही रह गया , वो चुन्नी जो कल आ लिपटी थी मुझसे गलियारे में चुरा लाया था तुम्हारी छत से उसे, ये बारिश जो तुम्हारे गालो को चूम रही है, महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी सांसो को इस खिड़की से देखते हुए . जानता हु हर शाम छज्जे पर खड़ी रहती हो ताकि खेत जाते मुझे देख सको. तुम्हारा वो मेरी पीठ पीछे शर्माना सीने में हलचल मचा देता है , मेरी गली से जब तुम साइकिल पर घंटी बजाते निकलती हो कसम से सब छोड़ कर दरवाजे की तरफ भाग आता हूँ मैं . ”

मैं पढ़ ही रहा था की एक छोटा सा कागज़ जो पीला हो गया था डायरी से गिर गया .

“हमें कुछ पता नहीं है हम क्यों बहक रहे है राते सुलग रही है दिन भी दहक रहे है जबसे है तुमको देखा बस इतना जानते है तुम भी महक रहे हो हम भी महक रहे है ”

मैंने प्रज्ञा को दिया वो कागज़ उस शेर को पढ़ कर उसके होंठो पर हंसी आ गयी .

“इजहार है ये किसी का ” बोली वो

मैं- तुम्हे कैसे पता

प्रज्ञा- बस जानती हु

मैंने उस कमरे की हर एक चीज़ को देखा , कुछ भी नहीं था फिर भी सब अपना लग रहा था , दिल पर जैसे किसी ने वजन रख दिया हो

प्रज्ञा- तबियत ठीक नहीं लग रही तो चले यहाँ से

मैं- नहीं , दुसरे कमरे को खोलते है

दुसरे कमरे पर कोई ताला नहीं था बस कुण्डी लगी थी, प्रज्ञा ने कुण्डी खोली और हम अन्दर आये. सामने दो अलमारिया थी , मैंने पहले वाली खोली, बहुत कपडे थे, श्रृंगार का सामान था . , ऐसे ही दूसरी अलमारी थी , पर एक चीज़ जो मुझे खटक गयी थी वो था बिस्तर , बिस्तर ऐसा था जैसे की सुबह ही किसी ने बिछाया हो. साफ सुथरा,

मेरे कहने से पहले ही प्रज्ञा शायद समझ गयी थी उस बात को ,”बिस्तर ” बोल पड़ी वो

मैं- जिंदगी क्या कहना चाहती है प्रज्ञा मुझसे

प्रज्ञा- एक मिनट कबीर , ये छोटा बक्सा दिखाना मुझे

मैं - ये सिंगारदान

प्रज्ञा- हाँ

प्रज्ञा ने उसे खोला और उसकी आँखे चमक उठी

“जिसका भी ये है उसकी पसंद बहुत उच्च कोटि की थी ” बोली वो

मैं- औरतो के सामान की परख तुम ही कर सकती हो .पर हमारे यहाँ आने का मकसद कुछ और हैं न प्रज्ञा

प्रज्ञा- हाँ कबीर, मुझे लगता है इस पुरे घर को अच्छे से खंगालने की जरुरत है क्योंकि ये जो तस्वीर मिली है ये एक सुराग है , और मुझे लगता है ऐसे सुराग और मिलेंगे यहाँ

सीढियों से उतरते हुए मुझे एक कमरा और दिखा जिस पर पहले शायद हमारी नजर नहीं गयी थी , उसे भी खोला हमने और यहाँ आकर लगा की प्रज्ञा का कहना बिलकुल सही था. वहां हमें बहुत सी तस्वीर मिली एक बहुत बड़ी तस्वीर थी जिसमे मैं था , हुकुम सिंह था , एक लड़का और था एक औरत हुकुम सिंह के साथ खड़ी थी .

“लगता है परिवार के साथ वाली तस्वीर है ” प्रज्ञा ने कहा

मैं- पर मेरा हुकुम सिंह से क्या सम्बन्ध

प्रज्ञा- मालूम हो ही जायेगा.

पास में ही एक तस्वीर और थी उसी लड़के की पर आधी थी जैसे ऊपर मेरी थी .

मैं- किसी ने आधा हिस्सा फाड़ा हुआ है

प्रज्ञा- शायद कोई नहीं चाहता की किसी को मालूम हो , जरा इधर देखना ये तस्वीर

प्रज्ञा ने पास वाली दिवार की तरफ ऊँगली की , ये और तस्वीरो से बड़ी थी, चेहरे वाले हिस्से पर शायद पानी गिरने से ख़राब हुआ था पर बाकि हिस्से से बड़ी आभा लगती थी .

मैं- हु ब हु कपडे हमने ऊपर देखे थे न

प्रज्ञा- हाँ

मैं- आओ मेरे साथ .

मैं प्रज्ञा को ऊपर ले आया

वो- क्या हुआ

मैं- देखो ये वही कपडे है न

प्रज्ञा- हाँ बाबा हाँ

मैंने एक नजर बाहर बदलते मौसम पर डाली और बोला- मेरी एक छोटी सी गुजारिश है

प्रज्ञा- क्या

मैं- तुम्हे इस रूप में देखना चाहता हूँ मैं

मैंने वो कपडे प्रज्ञा के हाथ में रख दिए.

प्रज्ञा- तुम भी न मैं कैसे



मैं- मेरे लिए , मैं तुम्हे आज किसी और नजर से देखना चाहता हु
 
#68



“उसी नजर से डर लगता है मुझे, ये जो ख्वाब दिखा रहे हो तुम , शीशे का महल है किसी ने मारा पत्थर बिखर जायेगा ” प्रज्ञा ने कहा

मैं- अपनी धडकनों से कहो फिर की मेरे दिल से झूठ बोलना छोड़ दे ,

प्रज्ञा मुस्कुराई, -

“थोड़ी देर बाहर जाओ, अब यार की हसरत तो पूरी करनी होगी ही, मैं तैयार होती हु ”

मैंने उसके गाल चूमे और वापिस पहले चोबारे में आ गया. मैं वापिस से खिड़की के पार देखने लगा . बेशक प्रज्ञा मेरे साथ थी पर दिल के किसी कोने से आवाज आई की मेघा अगर मेरे साथ होती तो मैं उसे बाँहों में भर लेता, वो समा जाती मुझमे, अपने प्रेम से रंग देती मुझे,

हताशा में मैंने टेबल पर हाथ मारा, एक किताब निचे गिर गयी मैं झुका उसे उठाने को की तभी मेरी नजर टेबल की निचली दराज पर गयी. उत्सुकता वश मैंने उसे खोल कर देखा . दराज में कुछ ऑडियो कैसेट थी और एक तस्वीर थी .

मैंने उसे हाथ में लिया, और वो हाथ में ही रह गयी .आज का दिन मुझ पर बहुत भारी था मैंने क्या देख लिया था क्या देखना बाकि था, पर इतना जरुर था की मुझे अब अंदाजा हो गया था की मेरी नियति क्या थी . बड़े गौर से मैंने तस्वीर देखि, उसके पीछे कुछ लिखा था .

“इतने करीब आके सदा दे गया मुझे , मैं बुझ रही थी आके हवा दे गया मुझे “

कहने को तो बस ये दो लाइन और एक तस्वीर भर थी पर इसकी हकीकत जो थी वो मेरे आने वाले कल की एक नयी इबारत लिखने वाली थी

“कबीर, आओ ” मेरे कानो में प्रज्ञा की आवाज आई

“हाँ अभी आया ” कांपती आवाज में मैंने जवाब दिया

उस तस्वीर को मैंने जेब में रखा मैंने और प्रज्ञा के पास गया . जिस नजर मैंने उसे उस रूप में देखा बस देखता ही रह गया, मेरे दिल को या तो उसने उस दिन धड्काया था जब वो काली साडी में थी या आज .

चाँद की चांदनी, आसमान की परी , सूरज की लाली या किसी दोपहर में पेड़ की छाया मैं क्या लिखू उसके बारे में , क्या कहूँ , क्या बताऊ बस इतना था की वो जो सुनना चाहती थी , मैं जो कहना चाहता था, वो बात उसके लाल हुए गालो ने कह दी थी .

“अब यूँ न देखो मुझे ,मैं पिघल जाउंगी ”

मैं- काबू नहीं मेरा खुद पर , मेरा बस चलता तो समय को यही रोक देता , अगर कुछ होता तो बस मैं और तुम

मैं आगे बढ़ा, प्रज्ञा की कमर में हाथ डाल कर मैंने उसे अपनी तरफ खींच लिया किसी कटी पतंग सी वो मेरी डोर में उलझती गयी . मेरे सीने से लगी उसने आहिस्ता से अपना चेहरा मेरी तरफ उठाया. बेहद सुर्ख लिपस्टिक से सजे उसके होंठ जो हल्का सा खुले कसम से लाख बोतल भी उतना नशा नहीं दे सकती थी मुझे.

कमर से होते हुए मेरे हाथ उसके नितम्बो पर पहुँच गए मैंने नितम्बो को सहलाया प्रज्ञा ने गर्दन थोड़ी सु ऊँची हुई, महकती सांसे, मेरी गरम सांसो से जो टकराई, हमारे होंठ आपस में जुड़ गए. प्रज्ञा ने अपनी बाँहों में मुझे थोडा जोर से कस लिया . सकूं से मेरी आँखे बंद हो गयी. प्रज्ञा ने दांतों से मेरे होंठ को हलके से काटा, पर इसमें मजा था .

ऐसा नहीं था की हमारे जिस्म प्यासे थे पर उस से मेरा नाता ही कुछ ऐसा जुड़ा था . जब वो चुम्बन टुटा तो मैंने उसे घुमा कर आईने के सामने खड़ा कर दिया .

प्रज्ञा- क्या

मैं- मैं देखो खुद को .

प्रज्ञा- रोज देखती हूँ

मैं- मेरी नजर से देखो,

मैंने प्रज्ञा के मुलायम पेट को सहलाया. उसने एक आह भरी , मेरी उंगलिया उसके ब्लाउज के निचले बोर्डर तक पहुच गयी थी .मैंने उसके सर की क्लिप को खुल दिया, जुल्फे आजाद हो गयी . ब्लाउज के ऊपर से मैं हौले हौले प्रज्ञा के उभारो को दबाने लगा. और वो कबूतर भी फद्फदाने को मचलने लगे. उसकी नितम्बो की थिरकन मैंने अपने अंग से गुजरते महसूस किया .

“क्या इरादा है ” पूछा उसने

मैं- बस तुम्हे देखने का

“पर हरकते तो कुछ और कह रही है ” उसने अपना हाथ मेरे लिंग पर रखते हुए कहा

मैं- ये वक्त फिर न आएगा , इस दो पल ठहरे वक्त में मैं रुकना चाहता हूँ जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ, इन बाँहों की पनाहों में मैं अपने लिए थोडा सकून चाहता हूँ ,

मैं कुर्सी पर बैठ गया , प्रज्ञा मेरी गोद में आ गयी, मेरे सर के बालो को सहलाते हुए बोली- इतनी संजीदगी क्यों

मैं- मालूम नहीं,

प्रज्ञा ने मेरे माथे को चूमा और बोली- मैं हर कदम साथ चलूंगी ,मैं वो उम्मीद की डोर बनूँगी,

मैंने उसके ब्लाउज की डोर खोल दी. बड़े आहिस्ता से उसने उसे उतार कर पास में रख दिया. प्रज्ञा ने ब्रा नहीं पहनी थी .

“मदहोश हो जाता हूँ इस रूप को देखते हुए मैं ”

वो- रहने दो, अब वो कशिश बची नहीं मुझमे

मैं- सूरज को कम लगती है तपन अपनी, तपत उस से पूछो जो झुलसा है

मैंने उसे उठाया और लहंगे को उतार दिया. मेरी रानी पूरी नंगी मेरे सामने खड़ी थी , मैंने भी अपने कपडे उतार फेंके, बेशक ये ऐसी जगह नहीं थी जब हम ये खास पल बिता सके पर अब खुद पर काबू रखना कहाँ आसान था .

रात भर हम दोनों एक दुसरे में समाये रहे खोये रहे, जब तक बदन में उर्जा के कतरे बचे हम अपने जिस्मो की प्यास बुझाते रहे, न जाने कब फिर नींद आई पर किसे मालुम था की आने वाला वक्त हमारे नसीब में क्या लेकर आएगा. इसका अहसास सुबह हुआ जब मेरे कानो में वो आवाज पड़ी जिसे मैं भुला न सका था



“तो ये चल रहा है यहाँ पर , ”
 
#69



रात भर हम दोनों एक दुसरे में समाये रहे खोये रहे, जब तक बदन में उर्जा के कतरे बचे हम अपने जिस्मो की प्यास बुझाते रहे, न जाने कब फिर नींद आई पर किसे मालुम था की आने वाला वक्त हमारे नसीब में क्या लेकर आएगा. इसका अहसास सुबह हुआ जब मेरे कानो में वो आवाज पड़ी जिसे मैं भुला न सका था

“तो ये चल रहा है यहाँ पर ,

मेरी आँख झट से खुल गयी , इस आवाज को मैं लाखो में सुन सकता था पहचान सकता था .मैं झटके से बिस्तर से उठ खड़ा हुआ , मेरे हडबडाने से प्रज्ञा भी जाग गयी, हमारे बदन से चादर उतर गयी और उसकी आँखे और जल गई.

मेरे लिए ये सुबह कयामत से कम नहीं थी ,

“मेरी बात सुनो मेघा, मेरी बात सुनो तुम गलत समझ गयी हो .”

“मेरे प्यार को इस बिस्तर पर रौंद कर मुझसे ही कहते हो, मैं तुमसे थोडा क्या दूर हुई बेवफाई पर उतर आये तुम तो. और तुम, छि, घिन्न आ रही है मुझे तुम्हे देख कर ” मेघा एक सांस में बोल गयी

“मेरी पीठ पीछे मेरे प्यार की ये रुसवाई, मेरे अपनों के हाथो वाह ” मेघा ने कहा

प्रज्ञा ने तब तक अपने कपडे पहन लिए थे .

प्रज्ञा- मेघा, मेरी बात सुनो,

प्रज्ञा ने जैसे ही मेघा का नाम लिया मैं जान गया ये जानती है आपस में

“क्या सुनु मैं, तुमको मुह मारने के लिए मेरा यार ही मिला था माँ ” आँखों में आंसू लिए मेघा ने कहा

जैसे ही उसने माँ कहा मेरे कदमो तले जमीं सरक गयी.

प्रज्ञा की आँखों से आंसू गिरने लगे.

मैं- मेघा , प्रज्ञा की कोई गलती नहीं है , ये सब दोष मेरा है .

प्रज्ञा ने उपहास से ताली बजाई- हम्म, तो ऐसा क्या मिल गया मेरी माँ में जो मैं तुम्हे न दे सकी , मोहब्बत की बड़ी बड़ी बाते यूँ भुला दी , अरे थोडा दूर क्या हुई, हमें तो रुसवा कर दिया तुमने कबीर, एक हम थे जो दिन रात तड़प रहे थे तुम्हारे लिए, जानते हो कितना खुश थी मैं, जब तुम संग फेरे लिए थे मैंने , ये लॉकेट तुम्हारा मंगलसूत्र समझ कर पहना था मैंने ,

और मेरा सबकुछ मेरे अपने ही लूट गए, जिस्म की भूख थी मुझसे कहा तो होता कबीर तुमने मैं सलवार खोल देती . और माँ तुम माना की हमारे बीच हजार फासले थी , एक घर तो डाकिन भी छोड़ देती है तुमने तो बेटी का घर ही खा लिया

प्रज्ञा- मेघा , मैं सब समझाती हूँ सुनो मेरी बात , मैं तुम्हे सब बताती हूँ

मेघा- नहीं सुनना मुझे कुछ ,अब क्या बाकी रहा कहने और सुनने को . तनहा मैं पहले भी थी , आगे भी रह लुंगी,

मेघा की आँखों से आंसू गिरने लगे, मैं आगे बढ़ा उसे सँभालने को पर उसने मुझे रोक दिया.

“कोई जरुरत नहीं कबीर, सब ख़तम हो गया. ”

मेघा ने वो लॉकेट अपने गले से उतारा और मेरे चेहरे पर फेक दिया. मुड़ी वो और चल दी, मैं उसके पीछे भागा ,

“तुम ऐसे नहीं जा सकती , तुम्हे सुनना होगा, तुम्हे समझना होगा , बात सिर्फ तुम्हारी जिन्दगी की नहीं है हमारी जिन्दगी की है मेघा ” मैंने कहा

मेघा- हमारी जिन्दगी, हमारी जिदंगी को तो तुमने मेरी माँ के साथ बिस्तर में रौंद दिया है कबीर, धोखा किया है तुमने मेरे प्रेम से , मैं बस आ ही गयी थी तुमसे मिलने को , तुम्हारे पास, तुम्हारे साथ जीने को पर अब कहाँ जिन्दगी है . रास्ता छोड़ो मेरा ,आज से अभी से , इसी वक्त से हमारी राहे जुदा होती है .

मैं उसके आगे खड़ा हो गया .

“जाने नहीं दूंगा तुम्हे ”

मेघा- मैंने कहा न हाथ छोड़ो मेरा

मैं- नहीं

मेघा ने मुझे धक्का दिया , ये धक्का इतनी जोर का था की मैं प्रज्ञा की कार से जा टकराया , इतनी शक्ति से फेका था उसने मुझे की पसलिया कड़क गयी, जब तक मैंने संभाला खुद को मेघा जा चुकी थी . मुझे प्रज्ञा को संभालना था मैं ऊपर गया वो अपना माथा पकडे बैठी थी, आँखे सुजा ली थी उसने,

मैं- गयी वो

प्रज्ञा कुछ न बोली

मैं- प्रज्ञा,

प्रज्ञा- तुमने मुझे बताया क्यों नहीं मेघा के साथ रिश्ता है तुम्हारा काश मुझे मालूम होता तो ये सब नहीं करती मैं

मैं- मुझे कहाँ मालूम था वो तुम्हारी बेटी है , झूठ बोल कर मिली थी वो मुझे .

प्रज्ञा- अनर्थ हो गया कबीर, अपनी बेटी की नजरो से गिर गयी मैं .

मैं- कुछ नहीं हुआ है ऐसा, और कौन सा गुनाह किया है तुमने , अभी वो गुस्सा है जब शांत हो गी समझेगी वो .

प्रज्ञा- वो क्या कह रही थी , तुम दोनों ने शादी कर ली

मैं- प्रज्ञा मैं तुम्हे सब कुछ बताता हूँ पर तुम रोना बंद करो , मैंने पानी की बोतल दी उसे, उसने कुछ घूँट भरे .

मैंने उसे बताना शुरू किया हर वो बात जो मेरे और मेघा के बीच हुई थी, कैसे वो मुझे मिली, हमारी जान पहचान हुई कैसे हम करीब आये, कैसे उसने अपना परिचय छुपाया, हर के बात मैंने प्रज्ञा के सामने खोल दी.

मैंने वो लॉकेट फर्श से उठाया और अपने गले में पहन लिया.

प्रज्ञा- कबीर, मुझे भूलना होगा तुम्हे, मुझसे दूर होना होना होगा, हम दोनों के लिए सही रहेगा ये,

मैं- क्या कह रही हो तुम, तुमसे दूर हो जाऊ

प्र्य्गा- तुमने ठीक सुना, मैं अपनी बेटी का हक़ नही मार सकती, मुझे ख़ुशी है की उसने एक बहुत नेक इन्सान का हाथ पकड़ा है पर उसकी ख़ुशी के लिए, तुम्हारी आने वाली जिन्दगी के लिए तुम्हे भूलना होगा मुझे

मैं- तुम्हे भूल जाऊ ये हो नहीं सकता, तुमने ही तो थामा है मुझे बेशक मेरी मोहब्बत है मेघा पर प्यार तो तुमसे भी है न , मैं बात करूँगा उस से समझाऊंगा उसे, तुम मेरी दोस्त हो. साथी हो. मेरे हर दुःख दर्द को समझा है तुमने मैं कैसे दूर हो पाउँगा तुमसे, तुमसे जुदा होना पड़ा न मुझे तो फिर जीना नहीं है मुझे जान दे दूंगा मैं

प्रज्ञा- समझते क्यों नहीं तुम कबीर, मैं अपनी ख़ुशी के लिए बेटी के दामन को दुखो से नहीं भर सकती,

मैं- तुम कहती थी न जब कभी ऐसा दिन आयेगा तो तुम मेरे आगे खड़ी हो जाओगी प्रज्ञा वो दिन आ गया है , आ गया है वो दिन



प्रज्ञा मेरे सीने से लग गयी और फूट फूट कर रोने लगी.
 
#70



मैं प्रज्ञा को दिलासा तो दे रहा था पर जानता था की डोर हाथ से फिसल गयी है , मेघा बहुत ज्यादा गुस्से में थी और आने वाला समय प्रज्ञा के लिए आसान नहीं होने वाला था , उसे हर पल अपनी बेटी की सवाल पूछती निगाहों का सामना करना पड़ेगा. उसे अपनी बेटी द्वारा तिरस्कार सहना पड़ेगा. प्रज्ञा की ग्रहस्थी दांव पर लग गयी थी और क्या होगा जब ये हकीकत राणाजी को मालुम होगी.

प्रज्ञा ने बहुत साथ दिया था ,एक वो ही तो थी जिसने हर एक कदम पर थामा था मुझे, एक वो ही तो थी जो मेरी हमराह थी, जिसके बूते मैं आज तक यहाँ पहुंचा था .एक वो ही तो थी जो मेरी थी . और इस हालात में मैं उसे अकेला छोड़ दूँ ये मेरी खुदगर्जी ही होगी.

“सब ठीक हो जायेगा, मैं संभाल लूँगा ” मैंने उस से कहा

प्रज्ञा- क्या संभाल लोगे तुम, बात हाथ से निकल गयी है कबीर, ऐसी आग लगी है कबीर जिसमे अब झुलसना ही है , अभी तो केवल धुआ उठा है जब लपटे उठेंगी तो सब जलेंगे.

मैं- अगर जलना पड़ा तो भी तुम्हारे साथ ही जलूँगा , बेशक मेघा जान है मेरी पर तुम भी तो आन हो मेरी, मान हो मेरा तुम , और तुम्हारी इज्जत पर जरा भी आंच आये ऐसा मैं होने नहीं दूंगा .

मैंने उसे अपनी बाँहों में भींच लिया. पर मैं जानता था की आने वाला समय मुश्किलें बढ़ा देगा मेरी.

नसीब ने भी क्या खूब खेल खेला था मेरे साथ, जिन्दगी में आई भी तो दो माँ बेटी, अब मैं सफाई भी अगर दू तो क्या दूँ मेघा को . जिस हालत में उसने हमें देखा था कहने को कुछ रह भी तो नहीं गया था . मैंने प्रज्ञा को वापिस जाने को कहा , मैं वहीँ रुक गया . मैं देव गढ़ को और जानना चाहता था .

प्रज्ञा के जाने के बाद एक गहरी ख़ामोशी छा गयी इस घर में . जिस बिस्तर पर एक खूबसूरत रात हमने बितायी थी उसी पर बैठे मैं सोचता रहा , मेरा सबसे पहला सवाल ये ही था की मेघा आखिर यहाँ क्या कर रही थी , क्या उसे मालूम था यहाँ के बारे में, न जाने मुझसे क्या क्या छुपाया हुआ था उसने .

दूसरा वो तस्वीर जो मुझे दराज से मिली थी , मैं उसके बारे में बात करना चाहता था क्योंकि बात ही ऐसी थी पर ये रायता फ़ैल गया था जिसे समेटना बेहद जरुरी था. जितना मैं मेरे सर पर जोर डालता मेरा सर उतना दुखता, कुछ परछाई मुझ पर हावी होने की कोशिश कर रही थी.

मैंने वो तस्वीर फिर देखि, हु ब हु मेरे जैसी पर क्या मैं था , और अगर था भी तो कैसे, आस पास के पुरे इलाके को छान मारा मैंने ये गलिया, ये रस्ते, गाँव में अगर आबादी होती तो कोई न कोई मिल जाता जो मुझे कुछ बता सके.

सोचते सोचते न जाने कब आँख लग गयी, होश आया तो मैं अँधेरे कमरे में पड़ा था , बाहर आके देखा आसमान में तारे खिले थे, चाँद मेरी तरह तनहा सा था . सामने एक खाट बिछी थी , जिस पर कुछ बर्तन रखे थे , मैंने हटा कर देखा, खाना था , एक दम गर्मागर्म, खुसबू सूंघते ही मुझे अहसास हुआ की किस कद्र भूखा था मैं ,पर कौन रख गया ये खाना .

मैं खाना खाने बैठ गया , दो चार निवाले तोड़े थे की मुझे वही पायल की आवाज सुनाई दी, सीढियों से कोई आ रहा था ,इ क पल लगा मेघा है पर नहीं ये वो रुबाब वाली थी .

“पानी,” उसने लोटा मेरे पास रखा और मुंडेर पर बैठ गयी.

मैं- आप का घर है ये,

वो- कह सकते है

मैं- मुझे जगा दिया होता

वो- कोई बात नहीं, पहले तुम खाना खा लो, फिर बात करेंगे.

मैंने जल्दी से खाना खत्म किया.

वो- तो आखिर तुम आ ही गए, देर से ही सही लौट तो आये

मैं- समझा नहीं

वो- अक्सर सीधी बाते कम समझ आया करती है

मैं- तो आप ही समझा दो, बहुत उलझा हु मैं

वो- उलझन तो कोई नहीं है बस एक फ़साना है , एक अधूरी कहानी है , एक वादा है शुरू तुमसे हुई थी अंजाम तुम्हारा है .

मैं- पर मुझे नहीं मालूम कुछ

वो- घर आ गए हो, वो वक्त भी आ जायेगा. तुम्हारा यहाँ रहना सुरक्षित है , हर जरुरत की चीज़ मिल जाएगी तुम्हे, ये तुम्हारा घर है

मैं- पर कैसे मैं तो अर्जुन्गढ़ का हूँ न

वो- नहीं कुंवर, अर्जुन्गढ़ बस इसलिए है की देवगढ़ है , तुम हो

मैं- और रतनगढ़

वो- कुछ नहीं , अर्जुन्गढ़ का एक हिस्सा भर है वो, एक ज़माने में अर्जुन गढ़ ही था वो बाद में गाँव के दो हिस्से हो गए.

मैं- तो देवगढ़ का क्या रिश्ता है अर्जुन्गढ़ से

वो- प्रीत का , प्रीत का रिश्ता है , एक कहानी लिखी गयी थी जिसके किरदार कहीं खो गए.

मैं- आप तो सब जानती है न मुझे बताती क्यों नहीं फिर

वो- बता दूंगी, सब बता दूंगी . फिलहाल तो मैं ये कहूँगी की तुम जोगन से दूर रहो,

मैं- किस जोगन से

वो- जान जाओगे, जानते हो कुंवर, इस दुनिया में सबसे मुश्किल क्या है

मैं क्या

वो- प्रेम, प्रेम करना और उसे निभाना सबसे मुश्किल होता है प्रेम अपने साथ कभी खुशिया नहीं लाता, वो तुम्हे देता है असीम दुःख, और अनगिनत परीक्षा , तुम्हारे मन को देखा है मैंने ये जो प्रेम है न मुझे इसमें दुविधा है , खैर, जाने दो, हम फिर कभी बात करेंगे इस बारे में. तुम आराम करो

उसने बर्तन समेटे और जाने लगी.

मैं- कहाँ जा रही है आप



वो- जहाँ नसीब ले जाए
 
#71



मैं- तो मुझे भी साथ ले चलो , क्या पता वहां मेरा नसीब भी हो

उसने मुझे देखा और बोली - आज नहीं फिर कभी ,

मैं वही छत पर बैठ गया , अकेले तनहा, जिन्दगी बस तीन औरतो के बीच घूम रही थी , मेघा, प्रज्ञा और ये रुबाब वाली, और अब लगता था की तीनो से ही मेरा गहरा नाता था . पर कैसे ये कोई नहीं बता रहा था, उसने कहा था ये मेरा घर है , और घर किसी भी आदमी का गढ़ होता है तो यहाँ कुछ न कुछ ऐसा जरुर होना चाहिए था जो मुझे मेरे जवाब दे सके,

मैंने निर्णय लिया की सुबह होते ही एक बार फिर से तलाशी लूँगा. अगर मेरा घर है तो मुझे पहचान लेगा. मुझे बताएगा मेरी मोजुदगी को, मेरे हर नक्श को, मेरे अक्स को दिखायेगा मुझे . ये घर ही मिलाएगा मुझे मेरे अतीत से , और आने वाले कल से.

सोचते सोचते सुबह हो गयी, बरसो बाद मैंने सुबह देखि थी और ये बहुत शानदार सुबह थी , थोड़ी दूर मोर बोल रहे थे, सूरज की लाली में ठण्ड थी . अंगड़ाई लेते हुए मैं उठा , हाथ मुह धोये, एक बार फिर मेरी निगाहे उस तस्वीर पर आकर ठहर गयी जिसका चेहरा धुंधला गया था . मुझे मालूम करना था ये कौन है .

बहुत देर तक मैंने उसे देखा , फिर मैं बैठक में आया. मैंने दीवारों को टटोला, फर्श को अच्छे से देखा और देखिये मुझे एक चोर दरवाजा मिला. थोड़ी मशक्कत के बाद मैंने उसे खोल दिया. निचे जाने को कुछ सीढिया थी जल्दी ही मैं एक तहखाने में पहुँच गया .

रौशनी के लिए टोर्च जलाई, तो पाया की एक छुपा कमरा था , एक तरफ शराब की धुल खायी बोतले थी, एक बड़ा सा पलंग था . थोडा बहुत सामान और दिवार पर सजी चार बड़ी सी तस्वीरे. आदमकद तस्वीरे, शीशे की फ्रेम में जड़ी हुई, मैंने एक कपडे से उनकी धुल साफ़ की , दो तस्वीरो को मैं तुरंत पहचान गया, हुकुम सिंह और कामिनी की तस्वीरे.

दो तस्वीरे और थी एक जोड़ा और था , वो आदमी मुझे बहुत देखा देखा लग रहा था , मैंने दिमाग पर और जोर दिया .

और मैं समझ गया मैंने उसे कहा देखा था वो ठाकुर अर्जुन सिंह थे, अर्जुन सिंह जिनके नाम पर अर्जुन गढ़ बसाया था, मेरे सर में भयंकर दर्द होने लगा था , जैसे की ये फट जायेगा. एक असहनीय दर्द, मुझे बहुत सी छाया दिखनी शुरू हो गयी, मैं किसी औरत के पीछे भाग रहा हूँ , वो मुझसे अठखेली कर रही थी , मैंने ऊँट देखे , एक छप्पर देखा , चूल्हे पर रोटी बनाती देखा किसी को मैं उसके पास बैठा था.

छाया बदली मैंने खुद को देखा, किसी से लड़ते , शोर गूँज रहा था चारो तरफ मैंने कुछ ऐसा देखा जिस से मेरा कोई लेना देना नहीं था .

मेरे कानो में फ़ोन बजने की आवाज आई तो मैं जैसे धरती पर आ गिरा. एक अनजान नम्बर से फ़ोन था पर जो दूसरी तरफ से कहा गया सुन कर मैं खुश हो गया. मैं तुरंत वहां से निकला , मुझे शहर जाना था . जितना जल्दी हो सके.

कुछ घंटे बाद मेरे हाथ में कामिनी की डायरी थी , मैंने वहीँ बैठ कर उसे पढना शुरू किया, दो दोस्तों की कहानी, जैसे मैं खो गया पर जल्दी ही मुझे झटका लगा जब मैंने उनकी दुश्मनी के बारे में भी पढ़ा, मैंने पद्मिनी को जाना, मैंने कामिनी को जाना मैंने जाना अर्जुंग सिंह और हुकुम सिंह को .

उस डायरी में सब कुछ था उनके बारे में उनके सुख के दिनों के बारे में, उनके ऊपर आये दुखो का वर्णन , बस कुछ नहीं था तो वो कड़ी जो मुझे जोड़ दे उनसे, पर एक चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा था वो था लाल मंदिर .

अर्जुन और हुकुम सिंह की लड़ाई की जगह , जहाँ हुकुम सिंह ने एक प्रतिज्ञा ली थी .

मैंने जाना कैसे हुकुम सिंह ने दुनिया से अपनी मोहब्बत को छुपाया, मुझे वो एक फट्टू लगा जो इतना दबंग होते हुए भी अपनी प्रेमिका का हाथ ज़माने के सामने न थाम पाया. मैंने जाना की लाल मंदिर की मिटटी में कुछ था जिसको पद्मिनी ने बांध दिया था ताकि हुकुम सिंह उसका उपयोग न कर पाए.

मैंने जाना उनके टूटते रिश्ते की उलझनों को , मैंने जाना खारी बावड़ी के बारे में और मैं सबसे पहले उस जगह को पहचान गया , मैंने एक नक्षा बनाया और अगर वो खारी बावड़ी थी तो मुझे लाल मंदिर का पता भी मिल गया था .

तारा माँ का मंदिर ही लाल मंदिर था , वहीँ पर दोनों दोस्तों की दोस्ती की डोर टूटी थी , ये प्रीत की डोर उनकी दोस्ती की डोर थी , और खुद रुबाब वाली ने कहा भी तो था की रतनगढ़ अर्जुन गढ़ का हिस्सा ही हैं . वो दिया जो मुझे विरासत में मिला था वो अर्जुन सिंह का था जो पीढ़ी दर पीढ़ी घूम रहा था जब तक की वो सही हाथो में न पहुँच जाए, और वो वारिस मैं था .

मैं तुरंत चल दिया रतनगढ़ के लिए , मेरी मंजिल था लाल मंदिर , इतिहास को खींच कर आज के कदमो में डालने का समय आ गया था . वहां पहुँचते पहुँचते शाम सी हो गयी थी . चूँकि मंदिर का दुबारा से निर्माण कार्य चल रहा था तो लोग थे वहां पर , पर मुझे किसी की घंटा परवाह थी . मुझे देखते ही लोगो में खुसर पुसर शुरू हो गयी . मैं चलते हुए तालाब की तरफ जाने लगा.

“रुक जा कबीर, इतना सब होने के बाद भी तू यहाँ आ गया ”

मैंने देखा ये वही टोली थी सुमेर सिंह के दोस्तों वाली, बस उनके साथ गाँव के भी कुछ लोग थे

मैं- किसी के बाप की जगह नहीं है ये, और ना तुम लोगो की औकात की मुझे रोक सको

“रतनगढ़ में अभी भी मर्द है ” टोली में से कोई बोला

मैं- पर मुझे शौक नहीं है तुम्हारी मर्दानगी देखने का , अपने काम करो मुझे मेरा करने दो

“हमारा काम यही है की दुश्मन का इलाज कर दिया जाए ”

मैं समझ गया था की ये चूतिये ऐसे नहीं मानने वाले

मैं- ठीक है फिर, कौन आएगा तुम में से पहले मरने को , जिसकी इच्छा है आगे आ जाये, चलो करते है शुरू



“इनसे क्या जोर आजमाइश , मजा तो जब आयगा जब दर्द भी अपना और दुश्मन भी अपना ” दूर से आती आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया
 
Back
Top