Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2 - Page 9 - SexBaba
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Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2

#72



मैंने मुड कर देखा राणाजी चले आ रहे थे ,

“तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए था , जो दर्द तुमने इस गाँव को दिया है मैं अगर खाल भी खींच लू तो कम रहेगा ” राणा बोला

मैं- न पहले कोई हुआ जो मुझे रोक पाया, न आगे कोई पैदा होगा जो मेरे कदमो को रोक सके, रही बात इस गाँव की तो जब दिलो में नफरते भरी होंगी तो क्या मिलेगा सिवाय दर्द के .

राणा- ये किताबी बाते.

मैं- किताबी बाते तो ये हैं राणा की यहाँ तू ये रोना रो रहा है और पीछे मेरे बाप के साथ मिलकर कोई घोटाला कर रहा है . देख जरा तेरे लोगो की आंखो में, तू कोई उम्मीद नहीं दे पाया इनको, इस गाँव की आन बाण के लिए अगर तू जीता न, तो मैं कभी भी तेरी पहुँच से दूर नहीं था , तूने कोशिश ही नहीं की और अब समय बीत गया है,

राणा- गुस्ताख, तू जनता नहीं तू किस से बात कर रहा है ,

मैं- मुझे ये झूठी हेकड़ी मत दिखा राणा, तेरा जोर इन मजलूमों पर चलता होगा मुझ पर नहीं

राणा- जिन्दा नहीं जायेगा तू यहाँ से आज

मैं- कौन रोकेगा मुझे, ये मंदिर मेरा है , मैं इसका कोई कोशिश तो करे

राणा- कोशिश क्या करनी तेरी जान हमारी मुट्ठी में है , तुझे तो भान भी नहीं मौत कितने करीब है तेरे

मैं- ठीक है फिर , तू भी यही है और मैं भी यहीं हूँ , तेरा सारा गाँव आज तमाशा देखेगा तेरी पगड़ी यही गिरेगी मेरी ठोकर में, ये जो मूंछे पैनाये हुए हैं न तु, आज के बाद इनको मरोड़ नहीं पायेगा तू , आजा मैं भी देखू जोर तेरी बाजुओ का .

“रतनगढ़ अभी इतना कमजोर भी नहीं हुआ है की तुम्हारे लिए राणाजी को हथियार उठाने पड़े, अभी जिन्दा हैं राणाजी की पगड़ी को सँभालने वाले ”

ये आवाज, इस आवाज पर ही तो मर मिटा था मैं, मदमस्त हाथी सी चली आ रही थी मेघा, उसे देखते ही जैसे मैं तमाम जहाँ को भूल गया था , कोई और लम्हा होता तो बाँहों में भर लेता उसे, पर आज नसीब देखो हमारी ही मोहब्बत हमें रुसवा करने आई थी . जिन आँखों में अपने लिए झील की ठंडक देखि थी , वो आँखे आज नफरत से जल रही थी,

माना की मेरी गलती थी , पर बात इतनी भी नहीं थी की , पर अब क्या कहे , फिलहाल तो यूँ थे की कुछ कर नहीं सकते थे .

“तुम्हारे लिए मैं ही काफी हूँ ” मेघा बोली

मैं- सही कहा , जानता हूँ मैं इस बात को

मेघा- बढ़िया, तो चुन लो अपने हथियार , जितने चाहिए उठा लो, कहीं फिर अफ़सोस न हो तुम्हे .

मैं- तुम जानती हो , तुम्हारे आगे ये सब फिजूल है .

मेघा- क्या हुआ निकल गयी हेकड़ी, ये रतनगढ़ की मिटटी है अच्छे अच्छे घुटने टेक गए यहाँ पर , क्या कहा था तुमने राणाजी की पगड़ी तुम्हारे कदमो में होगी, सोच भी कैसे लिया तुमने , ये मान है मेरा, और मेरे मान को कोई छू भी दे उस से पहले वो हाथ जिस्म से जुदा कर दूंगी मैं .

किसी जहरीली नागिन सी फुफकार रही थी मेघा, मैं जानता था की नाराज है वो मुझसे

मैं- तेरी नाराजगी समझता हूँ , एक मौका दे मैं सब समझाता हु तुम्हे

मेघा- मौका दूंगी, मेरे बाप के पैर पकड़ ले, नाक रगड कर माफ़ी मांग ले तो मौका दूंगी,

बड़ी जोर से चुभी थी ये बात कलेजे को कोई और होता उसकी जगह से तो सर धड से अलग कर देता पर सामने मेघा थी अब उस से कहता तो क्या कहता .

मैं- तू भी जानती है इस मंदिर से मेरा नाता, मैं आऊंगा यहाँ आज आया हूँ बार बार आऊंगा

मेघा- क्योंकि तब मैं चाहती थी , अब नहीं चाहती

मैं- तू समझती क्यों नहीं हैं मेरी बात को

मेघा- दुश्मनों की बात को क्या समझना , ये बहाने मत बना कबीर, तू भी जानता है तू कायर है , मर्द होता तो मेरी चुनोती स्वीकार कर लेता अब तक .

मैं- क्या है तेरी चुनोती, तू अपनी भड़ास उतरना चाहती है मुझ पर, तू साबित करना चाहती है की तू सही हैं मैं गलत हूँ . पर क्रोध ने तेरी आँखों पर वो पट्टी बांध दी है जो खुलना मुश्किल है , अगर तेरी मर्जी यही हैं तो ठीक है आ तू भी कर ले अपनी चाह पूरी,

जब कभी लिखा जायेगा तो ये दिन भी लिखा जाएगा की कैसे तेरे हठ ने सब झुलसा दिया , अगर तेरी आग ऐसे बुझती है तो कर ले कोशिश , वादा है तुझे निराश नहीं करूँगा.

आँखों से आंसू गिरने को बेताब थे पर अब मेरा भी हठ था, गिरने नहीं दिया उनको पी गया उनको, जब मोहब्बत ने ही सोच लिया था की ज़माने के आगे रुसवा होना है तो ठीक है न तमाशा फिर बड़ा होना चाहिए, जब आग में दिल के अरमान जलने वाले हो तो धुआ फिर गहरा होना चाहिए की नहीं .

मेघा ने पहला वार किया, उसकी तलवार मेरी बाह को चीर गयी, मैंने रोकने की कोशिश नहीं की, जिस बाह के घेरे में सोया करती थी उसी को घायल कर गयी थी वो .

मैं- मजा नहीं आया मेरी जाना

मेरी मुस्कराहट ने उसे और गुस्सा दिला दिया , पर इस बार मैंने वार बचा लिया.

“कौशल कम है तुम्हारा ”

मेघा- जितना है बहुत है

उसने मेरी जांघ पर वार किया, मैं तिलमिलाया और न चाहते हुए भी मैंने अपनी तलवार की मूठ उसकी पीठ पर दे मारी, अब जख्म उसे दू भी तो लगना मेरे कलेजे पर ही था .

शाम रात में बदलने लगी थी , तलवारे खून से सनी थी , कुछ जखम मेरे थे और उसके जख्म भी मेरे ही थे, पूरा रतनगढ़ ही जैसे जमा हो गया था .

मैं- कर क्यों नहीं देती ख़तम ये तमाशा, ले मार दे मुझे, अपने हाथो से विधवा हो जा तू ,

मेघा- कुछ नहीं लगता तू मेरा .

इस बार उसकी तलवार पसली में घुस गयी, चीखा मैं

मेघा- मैं जानती हूँ तू बस मेरा मन रखने को कर रहा है ये सब , मेरी नहीं तो उन लम्हों का मान रख ले, कब तक कायरो का नकाब ओढ़े रखेगा

मैं- तेरे पास मौका है कर दे ख़तम बुझा ले आपनी नफरत की आग .



मेघा कुछ नहीं बोली, बस उसकी त्रीवता और बढ़ गयी . उसकी शक्ति पल पल बढती जा रही थी , जितना उसका गुस्सा बढ़ रहा था उतना वो पागल हो रही थी, इस बार जो हमारी तलवारे आपस में भिड़ी मेरी वाली दो टुकडो में बिखर गयी , उसने मेरी छाती में मारा और मैं सामने एक पिल्लर से जा टकराया.
 
#73



मैं इतनी जोर से पिल्लर से टकराया था की अन्दर से टूटती पेशियों की आह को मैंने बहुत जोर से महसूस किया. आँखों के आगे अँधेरा छा गया. इस से पहले की मैं संभल पाता मेघा ने बहुत गहरा जख्म दे दिया. मेरे मुह से खून की उलटी गिर गयी. जिस तरह से उसके प्रहारों की त्रीवता बढती जा रही थी मुझ को भी क्रोध आने लगा था .

और इसी गुस्से में मुझसे वो हो गया जो नहीं होना था , मैंने गुस्से में उसे उठा कर सीढियों पर दे मारा उसके हाथो से तलवार छूट गयी, जिसे मैंने उसके पेट में घोंप दिया. बेशक ये क्रोध का छोटा सा लम्हा था पर इसी में सब हो गया था .

मुझे उसी पल अहसास हो गया था की अनर्थ हो गया है , मेघा दर्द से बिलबिलाते हुए सीढियों पर पड़ी थी , मैंने उसे भर लिया अपने आगोश में, उसकी आँखे खुली थी .मैंने तलवार पेट से बाहर निकाली , खून का दरिया जैसे बह चला, पर बात अगर यही तक ठीक थी तो कोई बात नहीं असली मुसीबत का पता मुझे थोड़ी देर बाद चला जब मेरे जिस्म में दर्द की एक लहर उठी.

ज़ख्म मेघा का था पर दर्द, मेरा था जितना खून उसके बदन से बह रहा था उतना दर्द मुझे हो रहा था , मेरा जिस्म ऐंठने लगा. नसे जोर मारने लगी, मैं पागलो की तरह चीख रहा था , चिल्ला रहा था पर सब मेघा को संभालने में लगे थे,

“”क्या किया तूने मेघा क्या किया “ मैंने सवाल किया उस से

पर वो बस आँखे मूंदे पड़ी थी , होंठ हिल रहे थे उसके हौले हौले. क्या मेघा ने तंत्र का कोई प्रयोग कर दिया मुझ पर . आँखे जैसे दर्द के मारे बाहर आने को हुई पड़ी थी , ये दर्द ऐसा था की जैसे कोई नोंच रहा हो, काट रहा हो मेरे बदन को , इस दर्द को मैंने पहले भी महसूस किया था जब टूटे चबूतरे पर जानवरों ने हमला किया था मुझ पर .

“ये तूने क्या किया मेघा, बताती क्यों नहीं मुझे ” मैंने चीखते हुए कहा पर उसके होंठो पर बस एक मुस्कान थी , वो मुस्कान जो कभी इस दिल में उतर जाती थी .

मेघा लड़खड़ाते हुए उठी, मेरे पास आई.

मेघा- ये साथ यही तक था, सोचा तो था की सुहागन बन कर तेरे साथ ये जीवन जीना है , पर अब ये ही सही .

वो मुड़ी और पीठ मोड़ कर चल पड़ी, मैं बस उसे जाते हुए देखते रहा , उसे रोकना चाहता था पर रोक नहीं पाया. जिस्म को जैसे अंगारों पर रख दिया हो किसी ने , आग लगी थी पर जल नहीं पा रहा था मैं , मैंने देखा मेरे बदन से बहता खून काला पड़ने लगा था . कोयले सा काला. घुटने धरती पर टिक गए थे, सब कुछ अँधेरा अँधेरा लगने लगा था .

न जाने कब बेहोशी ने अपने आगोश में समा लिया मुझे कोई होश नहीं , कोई खबर नहीं.

इन सब बातो से अनजान प्रज्ञा आरती के लिए दिया जला रही थी की मंदिर में रखते ही दिया बुझ गया, उसकी २२ साल की गृहस्थी में ऐसा कभी नहीं हुआ था, अनजाने भय से उसकी आत्मा कांप गयी, एक तो वो मेघा को लेकर बहुत परेशान थी . वो उस से नजरे नहीं मिला पा रही थी .

मेघा ने दिए को दुबारा जलाने के लिए दियासलाई जलाई ही थी की बाहर से आते शोर ने उसका ध्यान भटका दिया. नंगे पैर ही दौड़ी वो बाहर की तरफ और जब उसने देखा मेघा को चक्कर ही आ गए उसे, खून से लथपथ मेघा लड़खड़ाते कदमो से हवेली में आ रही थी . प्रज्ञा उसे देखते ही चीख पड़ी, माँ जो थी औलाद के लिए कलेजा फटना ही था .

“मेघा, मेरी बच्ची क्या हुआ तुम्हे ” प्रज्ञा भागी मेघा की तरफ

पर मेघा ने हाथ के इशारे से प्रज्ञा को रोक दिया.

“तुम्हे चिंता करने की जरुरत नहीं है मेरी , ये दिखावा बंद करो ” मेघा ने हौले से प्रज्ञा को कहा और अन्दर चली गयी.

प्रज्ञा को बहुत दुःख हुआ आँखों में पानी आ गया. उसने मूक निगाहों से राणा से सवाल किया की क्या हुआ . राणा ने उसे अपने साथ आने को कहा. धडकते दिल को बड़ी मुश्किल से संभाले प्रज्ञा राणा के साथ चल पड़ी.

राणा ने पूरी बात बताई उसे, प्रज्ञा के लिए अपने जज्बातों पर काबू रखना बहुत कठिन था , एक तरफ दोस्त के अनिष्ट की खबर और सामने पति खड़ा , धर्मसंकट में फंसी प्रज्ञा चाह कर भी कुछ न कर सकी. बस नसीब को कोस कर रह गयी.

अपने ज़ख्मो को सीती मेघा के चेहरे पर कोई भाव नहीं था , पर दिल में तूफ़ान आया हुआ था , आँखों के सामने तमाम वो पल आ रहे थे जो उसने कबीर के साथ बिताये थे, पर साथ ही एक याद ऐसी भी थी जिसने उसके मन को नफरत से भर दिया था.

“बस तुमसे अब मैं थोड़ी ही दूर हूँ, एक बार तुम्हे पा लू ” उसने अपने ख्यालो से कहा

अपने कमरे में चहलकदमी करते हुए राणा गहरी सोच में डूबा था , उसने प्रज्ञा का ऐसा रूप नहीं देखा था , वो हैरान था की औलाद ने क्या क्या छुपा रखा था उस से, और मेघा और कबीर के रिश्ते की हकीकत ने तो उसे हिला कर रख दिया था . राणा को अपनी बेटी पर बहुत गुमान था पर वही बेटी दुश्मन से इश्क में थी.

राणा जैसे लोग जिनके लिए जान से ज्यादा अपनी मूंछ की कीमत रही हो. वो ऐसी बातो को कैसे पचा पाते, और वो भी तब जब बात उसकी बेटी की हो.

उसने नौकर को भेजा मेघा को बुलाने के लिए. वो अपनी बेटी को टटोलना चाहता था उसके मन का भेद लेना चाहता था .

“देखो, बेटी मैं नहीं जानता की उस लड़के और तुम्हारे बीच क्या है क्या नहीं है , पर एक बाप होने के नाते मेरा इतना तो हक़ है की तुमसे पूछ सकू ” राणा ने पासा फेका

मेघा- कुछ नहीं है मेरा उस से, सिवाय इसके की वो हमारा दुश्मन है

राणा- हाँ पर बीते समय में हालात ऐसे नहीं थे न

मेघा- जो बीत गया उसका क्या जिक्र करना

राणा- तुम्हारा बाप हूँ , इस घर का मुखिया हूँ , मुझे मालूम होना चाहिए

मेघा- तो फिर करिए मालूम किसने रोका है , अभी मैं थोड़ी देर अकेले रहना चाहती हूँ सुबह वैसे भी मुझे शहर के लिए निकलना है



जिस तरह से मेघा ने राणा को जवाब दिया था एक पल को वो हैरान रह गया की क्या ये उसकी ही बेटी है .
 
#74



नफरतो ने ऐसा तंदूर सुलगा दिया था की मोहबत धुआ बन कर जल गयी थी , तीन लोग एक डोर से बंधे थे , डोर थी की ऐसी उलझी थी कोई राह दिख नहीं रही थी , दिल टूटे थे दर्द था पर आह नहीं थी और कहे भी तो किस से हाल अपने दिल का , दिल अपना था प्रीत पराई हो गयी थी .

डूबती आँखों और कांपती उंगलियों से मैंने प्रज्ञा का फ़ोन मिलाया.

“कबीर, क्या हुआ है तुम्हारे और मेघा के बीच , ” एक ही सांस में बोल गयी वो

मैं- मेघा कैसी है

प्रज्ञा- खुद को कमरे में बंद किये हुए है .तुम ठीक तो हो न

मैं- हाँ , ठीक हु न कोई फ़िक्र नहीं

प्रज्ञा- क्या फ़िक्र नहीं , जिस तरह वो आई थी मेरा दिल बैठा जा रहा है , मैंने चंपा को भेज दिया है जल्दी ही तुम तक पहुँच जाएगी वो ,

मैं- मेघा का ख्याल रखो, उसे जरुरत है तुम्हारी

प्रज्ञा- तुम दोनों की जरूरत है मुझे, मैं जिस्म हूँ मेरी जान हो तुम , औरत मुझे तुम दोनों साथ चाहिए, राणाजी है तो ज्यादा बात नहीं हो पायेगी, मैंने चंपा को सब समझा दिया है

किसी जन्म में कुछ तो अच्छा किया होगा जो प्रज्ञा का साथ मिला था मुझे , मैंने फोन को अपने सीने से लगा लिया जैसे प्रज्ञा सुन रही हो मेरी धडकने, कुछ देर बाद चंपा आ गयी. उसने मुझे उठाया और गाड़ी में पटक दिया.

वो मुझे देवगढ़ ले आई थी ,

“मालकिन ने कहा की यहाँ से सुरक्षित कुछ नहीं ”

मैं- हम्म,

मैंने कपडे उतारे और अपने जख्म देखने लगा. ये अजीब से थे, तलवार इतनी गहरी उतरी थी पर फिर भी बस चीरे से ही थे, मैंने चंपा से बॉक्स लिया उअर मरहम पट्टी करने लगा.

मैं- तुम चाहो तो जा सकती हो.

चंपा- मालकिन ने साथ रहने को कहा है .

मैं थोड़ी देर लेट गया . आँख ऐसी लगी की फिर सीधा अगली दोपहर को ही आँख खुली . चंपा ने चाय नाश्ता करवाया, एक बार फिर मैंने कामिनी की डायरी निकाली और पढने लगा. मैंने बैग से वो तस्वीर निकाली वो पुराणी तस्वीर , जो कहने को अतीत थी पर मेरे आज को हिला देने वाली शक्ति रखती थी. कुछ सोच कर मैंने वो तस्वीर प्रज्ञा को दिखने का निर्णय लिया.

पर उस से पहले मैं रुबाब वाली से मिलना चाहता था मैं जैसे भी करके उस से सवाल जवाब करना चाहता था . उसने हर बार मुझे आगाह किया था की मैं मेघा से दूर रहूँ और पिछले कुछ समय में जब जब मेघा मुझे मिली थी कुछ न कुछ अनिष्ट हुआ ही था . उसका स्नेह उसका वो अपनापन खो गया था , बेशक दोष मेरा भी था मैं उसके दिल को भी समझ रहा था कोई भी औरत ऐसा ही करेगी और हमारे मामले में तो उसकी माँ उसके यार के साथ थी .

पर अब ये जैसे बीती बाते थी मुझे हर हाल में मालूम करना था की मेघा के मन में क्या चल रहा था और दोनों ठाकुर मिल कर क्या करने वाले थे . इसलिए रुबाब वाली का मिलना बहुत जरुरी था . दो तीन दिन ऐसे ही गुजर गए.

मैंने एक बार अर्जुन गढ़ जाने का सोचा , मेरे बाप पर नजर रखने के लिए मुझे सविता की मदद चाहिए थी , देर शाम मैं सविता के घर पहुंचा , हलके से मैंने दरवाजा खोला घर में सन्नाटा था, मैं सविता के कमरे की तरफ बढ़ा और मैंने जो देखा , यकीं नहीं आया, सविता मेरे बाप से चुद रही थी . दोनों लगे हुए थे एक दुसरे से. मैं ओट में हो गया. कुछ देर बाद चुदाई खत्म हो गयी और वो बाते करने लगे.

“उस काम का क्या हुआ ” पिताजी ने पूछा

सविता- चारा डाल दिया है , तुम जानते हो कितना मानता है वो मुझे पर समस्या ये है की वो मिल नहीं रहा मुझे, खेत पर भी रोज दो चक्कर लगाती हूँ पर वो रहता ही नहीं है , और तुम उसके नए ठिकाने के बारे में मालूम कर नहीं पाए हो

पिताजी- तेज बहुत है वो, रतनगढ़ के राणा की लड़की को फसा लिया है उसने ज्यादातर उसके साथ ही रहता है पर कहाँ मिलता है कब मिलता है मेरे आदमी भी मालूम नहीं कर पा रहे है . पर तुम से मिलने जरुर आएगा वो .

सविता- मैं खोद लुंगी बाते उस से , चूत में बहुत दम होता है

पिताजी- हाँ जानता हूँ, चल मैं निकलता हूँ मास्टर आने ही वाला होगा .

सविता ने भी अपने कपडे पहन लिए. मैं पिछले दरवाजे की तरफ चल दिया. सविता भी चुतिया बना रही थी , जिन्दगी में साला जो भी मिल रहा था सब धोखेबाज , साले सब चोर, इस रांड के लिए मैंने सब कुछ त्याग दिया और ये मेरे बाप के लिए काम कर रही थी .

मेरे चारो तरफ एक जाल बुना गया था जिसमे मैं फंस गया था पर किसलिए ये कौन बताएगा. जी तो किया की अभी सविता की गर्दन पकड़ लू पर खुद को रोक लिया. मैंने मास्टर को उठाने का सोचा, अब वही बताएगा जो बताये .

थोडा समय लगा पर मैं उसे जंगल में ले आया.

मास्टर- कबीर, बेटा ये क्या है , कैसी हरकत है ये

मैं- मास्टर, मेरे पास समय नहीं है और न तेरे पास मैं बस तुमसे कुछ सवाल करूँगा, तुम्हे जवाब देने है ,

मास्टर- ये हरकत महंगी पड़ेगी तुम्हे, मैं हुकुम से शिकायत करूँगा

मैं- मास्टर, गांड में डाल अपनी धमकी को, तेरे पास दो रस्ते है ये तो मुझे जवाब दे या फिर मैं तुझे मार दू मर्जी तेरी है

मास्टर कुछ सोचता उस से पहले ही मैंने उसके कंधे में चाकू घुसेड दिया.

चिलाने लगा वो मैंने आधा इंच चाकू और सरका दिया

मैं- जितनी देर तू लगाएगा मैं उतनी ही जल्दी करूँगा

मास्टर- क्या पूछना है तुम्हे

मैं- मेरा बाप क्या खुराफात कर रहा है

मास्टर- नहीं मालूम

मैं- तुझे नहीं मालूम तो किसको मालूम, ठीक है मत बता

मैंने उसकी पेंट खोली और उसके लिंग की खाल को थोडा सा काट दिया. दर्द से बिलबिला गया वो

मैं- बता इतना सोना किसलिए ख़रीदा है , रतनगढ़ के ठाकुर से क्या डील हुई है.



मैंने लिंग की खाल को और काटा, खून बहने लगा.
 
Bhai meri duty ही aisi hai jab pressure aata hai to din hafto me badal jate hai tumhare liye kahna aasan hai,

96 ghanto se ek minute bhi nahi soya, news to dekh hi li hogi

Baki ab base me aa gaya hu naha dhoke khana khaunga, ek do peg lunga fir update likhunga, if all goes well jaldi hi update post hoga
 
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“देख मास्टर, मेरे पास वक्त की कमी है तो मामले को जल्दी एडजस्ट कर , कहीं ऐसा न हो की फिर जिन्दगी रहे न रहे ” मैंने मास्टर की छाती पर चाकू से निशान बनाते हुए कहा

मास्टर- मुझे नहीं मालूम

मैं- देख मास्टर, तू भी जानता है की तू एक ऐसे आदमी के लिए अपनी जान को दांव पर लगा रहा है जो समय आने पर तेरी गांड पर भी लात मार देगा. तेरी वफ़ादारी क्या काम आएगी फिर, और मैं तो केवल एक बात पूछ रहा हूँ की उस सोने का क्या करने वाले है वो लोग , अब इतनी सी बात के लिए जान देना चाहता है तो तेरी मर्जी, वैसे भी तू रहे न रहे किसी को क्या फर्क पड़ता है , सविता तो चुद ही रही है मेरे बाप से

मास्टर ने आँखे फाड़ कर देखा मुझे और बोला- तुझे कैसे पता ये

मैं- मेरी छोड़, तू अपनी सोच कैसे चुतिया के जैसे जिन्दगी गुजार रहा है तू, मेरी बात मान

मास्टर- ठीक है , सुनो, दोनों गाँव बहुत जल्दी एक हो जायेंगे, रूठा हुआ परिवार एक हो जायेगा , रतनगढ़ अर्जुन्गढ़ का ही हिस्सा है बहुत समय पहले बंटवारे में भाई अलग हो गए थे , ठाकुर जगन सिंह की औलाद ने रतनगढ़ को बसाया था ,

मैं- कौन जगन सिंह

मास्टर- पुराणी बात है पर अब सब एक हो रहा है ,

मैं- तो हम , मेरा मतलब ये सब एक खून है ,

मास्टर- हाँ,

मेरे दिमाग के पुर्जे हिल गए थे क्योंकि मेघा और मेरा रिश्ता उलझ जाने वाला था अगर सब एक ही वंश बेल के हिस्से है तो .

मैं- पर ये अलग क्यों हुए थे .

मास्टर- ज़माने पहले देवगढ़ के ठाकुर कुंदन ने अर्जुन्गढ़ की आयत से प्रेम किया था , विवाह किया था , ऐसा कहते है की फिर कुंदन ने देवगढ़ छोड़ दिया और अर्जुन्गढ़ में बस गया. चूँकि आयत के मायके वालो से कुंदन की दुश्मनी थी और आयत वारिस थी , तुम तो जानते हो की ठाकुरों का इतिहास जमीन और जोरू के मामले में ठीक नहीं रहा कभी

वैसे भी आयत अर्जुन्गढ़ में नहीं बसना चाहती थी पर कुंदन आ गया तो फिर घटनाये कुछ ऐसी हुई की जगनसिंह के परिवार को अर्जुन गढ़ चोदना पड़ा और उन्होंने रतनगढ़ गाँव बसा लिया . तबसे ही दोनों गाँवो में खून खराबा होने लगा.

मैं- और देव गढ़

मास्टर- क्या

मैं- देव गढ़ का क्या हुआ

मास्टर- पता नहीं, लोग कहते है की अचानक ही सब खत्म हो गया एक रात गाँव वाले गाँव छोड़ गए .

मैं- हम्म, पर इसमें दोनों ठाकुर कहाँ फिट होते है

मास्टर- मैंने कहा न खून एक हो गया है , दोनों ठाकुर मिल कर एक महा अनुष्ठान करने जा रहे है

मैं- किसलिए

मास्टर- ये नहीं मालूम मुझे पर शायद कोई गड़े धन का चक्कर है . मैंने सुना था की ठाकुर कुंदन के पास कुछ ऐसा था जिसने उसके यश को चोगुना कर दिया था, कुंदन का बहुत नाम था उन दिनों, कहते है की खुद शिव ने माँ तारा के माध्यम से कुंदन को वरदान दिया था .

मैं- और उसी वरदान के लिए दोनों ठाकुर अब इतिहास दोहराने की कोशिश कर रहे है , हैं न

मास्टर- हाँ और साथ ही एक खजाने के लिए भी,

मैं- कैसा खजाना

मास्टर- अब तुम इतने नादान भी नहीं हो कबीर, जानते हो तुम

मैं- मंदिर के तालाब वाला

मास्टर- हाँ

मैं- पर उसे छूना असंभव है ,नहारविरो की आन है उस पर

मास्टर- जल्दी ही आन टूटेगी ,पीर साहब की मजार खुल गयी, आन का पहला सुरक्षा चक्र टुटा , दूसरा चक्र टुटा मंदिर खंडित होने से , रही बात नाह्र्विरो की तो , पहले भी उन्हें साधा गया है और जो काम एक बार हुआ वो फिर भी हो सकता है

मैं- फिर करेगा कौन

मास्टर- जिसके भाग में खजाना है पीर साहब की मजार को बहुत पहले छुपा दिया गया था क्योंकि वो एक पाक जगह थी, एक कहानी शुरू हुई थी वहां से , एक दास्ताँ जिस पर समय ने कलम चलाई थी .

मैं- और क्या थी वो दास्ताँ

पर इस से पहले की मास्टर कुछ जवाब देता, उसे उलटी आई, खून की उलटी और कुछ देर में ही उसके प्राण साथ छोड़ गए. न जाने क्यों दुःख नहीं हुआ मुझे.

मैं वहां से चल पड़ा, अपने खेत पर आया तो देखा सारा सामान बिखरा हुआ था , किसी ने तलाशी ली थी वहां पर , एक बात तो थी की अब इस इलाके में मैं सुरक्षित नहीं था मुझे देव गढ़ जाना चाहिए था ,पैदल आना जाना थोडा मुश्किल था तो मैंने चंपा से एक गाड़ी के लिए कहा,

आँखों में जरा भी नींद नहीं थी, मैं सोच रहा था की आखिर क्या करने जा रहे है , किस प्रकार का अनुष्ठान करेंगे और ठाकुर कुंदन को क्या वरदान मिला था . दिल में एक रोमांच सा चढ़ गया था , मैं सोचने लगा क्या जिन्दगी रही होगी उन लोगो की , क्या कहानी होगी कुंदन और आयत की , कैसे जिए होंगे उन्होंने वो प्रेम के लम्हे ,कुंदन का ये घर न जाने क्यों मुझे महकता सा लग रहा था .

फिर मेरा ध्यान मास्टर की मौत पर गया, अचानक से उलटी हुई और मर गया वो. कैसे, किसी ने तांत्रिक वार किया होगा उस पर , अब मुझे खुद पर कोफ़्त हुई, मुझे तभी उसके शरीर की जांच करनी चाहिए थी , इतनी बड़ी बेवकूफी कैसे कर दी मैंने, और एक महत्वपूर्ण बात और मेर्रे बाप और सविता के अवैध संबंधो की बात सुन कर भी मास्टर विचलित नहीं हुआ था .

कुछ सोच कर मैंने कल सविता से मिलने का सोचा , इस से पहले मास्टर की मौत का सबको मालूम हो मैं सविता से मिल लेना चाहता था .

अपने ख्यालो में गुम था की एक आवाज ने मेरा ध्यान भंग कर दिया

“सोये नहीं तुम अभी तक ”

मैंने देखा दरवाजे पर रुबाब वाली खड़ी थी .

मैं- कब आई

वो- जब तुम सोच रहे थे

मैं- हाँ वो मैं ठाकुर कुंदन और आयत की कहानी के बारे में सोच रहा था .

वो- हम्म, क्या सोचा

मैं- यही की कैसे रहे होंगे वो लोग, कैसे जिए होंगे उन्होंने वो लम्हे कैसी होगी वो प्रेम कहानी जिसकी सब बात करते है



वो- पर वो कहानी कुंदन और आयत की थी ही नहीं .
 
#76



मैं- तो फिर किसकी है ये कहानी

वो- रूठे नसीब और बेबसी की , खुशनसीबी की , बदनसीबी की प्रेम की और अपमान की ,

मैं- मैं जानना चाहता हूँ ठाकुर कुंदन के बारे में

वो- अपने अन्दर झाँक कर देखो ,

मैं- तंग आ गया हूँ मैं इन उलझी बातो से , आखिर कोई मुझे सीधा सीधा बताता क्यों नहीं है , आखिर बताती क्यों नहीं मुझे की मैं कैसे जुड़ा हूँ इस कहानी से, मेरी शक्ल क्यों मिलती है कुंदन से

वो- तक़दीर , तक़दीर तुम्हारी कबीर , सब अपना भाग लिखा कर लाते है तुम भी अपने लेख लाये हों .

मैं- हम्म, फिर भी मैं ये कहानी सुनना चाहूँगा

वो- ये कहानी है कुंदन की एक आम सा लड़का जो फिर भी खास था , खास इसलिए की उसके दिल में करुणा थी, प्रेम था स्नेह था किसी के लिए भेदभाव नहीं था , कुंदन की चाहत थी पूजा ,

मैं- पर उनकी पत्नी तो आयत थी न .

वो- चुप रहो , कुंदन की चाहत थी पूजा, यही बस दो गली आगे रहती थी अपने रिश्तेदारों के घर , न जाने कब कुंदन और पूजा का दिल धडक उठा , और कहानी शुरू हो गयी, अक्सर गली मोहल्ले में दोनों मिल जाते, साथ पढ़ते थे तो बस इश्क में परिंदे उड़ने लगे थे .

कुंदन के अपने पिता के साथ रिश्ता कोई खास नहीं था वो तो बस जस्सी थी जिसने कुंदन को थाम रखा था वर्ना वो कभी का चला जाता इस घर से दूर .

मैं- जस्सी कौन

वो- जस्सी, कुंदन की भाभी इस घर की बहु, पर कहते है न की नसीब ने जाने क्या लेख लिख रहे है एक दिन कुंदन उस से टकरा गया जिसने सारी कहानी को बदल कर रख दिया. एक रात उसकी मुलाकात आयत से हुई , दोनों एक जैसे थे मुसाफिर, कुंदन का मन घर नहीं लगता था और आयत का घर नहीं था भटकते भटकते दोनों ने एक दुसरे का हाथ थाम लिया .

मैं- फिर

वो- फिर क्या आयत थी अर्जुन सिंह की बेटी, जो बेहद गहरा दोस्त था कुंदन के बाप का किसका खून हुकुम सिंह ने कर दिया था .

मैं- हाँ मैंने कामिनी की डायरी पढ़ी थी .

वो- तब तो तुम सब जान ही गए होंगे.

मैं- सब कुछ तो नहीं पर बहुत कुछ , मेरे सवाल शुरू वहां से होते है की जब कुंदन के आयत से ब्याह कर लिया था तो फिर आगे क्या हुआ .

वो- आगे क्या हुआ , आगे क्या हुआ, आगे वो हुआ जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था , आयत को को वरदान मिला था , वो इन्सान नहीं थी प्रेत थी पर प्रेम गहरा था उसका, तो खुद माँ तारा ने उसे इन्सान होने का वर दिया था .

मैं- सच में

वो - हाँ सच में, प्रेम से बड़ी क्या शक्ति होती है कबीर, प्रेम में खुद शिव वास करते है और माँ कैसे शिव का कहा टालती, पर इतना आसान कहाँ होता है प्रेम को प्राप्त कर लेना, और कुंदन की जिन्दगी तो तीन टुकडो में बंटी हुई थी उसके जीवन के तीन स्तम्भ थे आयत, पूजा और जस्सी,

जस्सी ठाकुर हुकुम सिंह की बेटी थी

मैं- मैं जानता हूँ

वो- रिश्तो की ऐसी भूलभुलैया में सब उलझे थे की किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था , खैर, कुंदन ने आयत और पूजा दोनों से विवाह कर लिया अपनी दो पत्नियों और जस्सी के साथ रहने लगा था वो .

मैं- फिर

वो- एक बात बताओ कबीर,

मैं- हाँ

वो- तुम्हे क्या लगता है प्रेम और नफरत में क्या फर्क होता है

मैं- दोनों दिल से होते है

वो- दोनों अपनों से होते है , जब प्रेम नफरत में बदलता है तो फिर बस दर्द होता है , कुंदन की इच्छा थी आयत को उसका सम्मान लौटाने की , इसलिए वो अर्जुन गढ़ आया जिस हवेली की हक़दार थी आयत उसके ताले खोलने ,

मैं- फिर क्या हुआ

वो- फिर एक जलजला आया जो अपने साथ सब कुछ उजाड़ गया , खुशियाँ कब गम में बदल गयी किसी को मालूम नहीं हुआ कुंदन जा चूका था , उसके गम में आयत जैसे पागल हो गयी थी कुंदन की लाश देख कर मानो विक्षिप्त हो गयी वो . दोनों गाँवों में पहले से ही दुश्मनी तो थी ही कुंदन की मौत ने आग में घी डाल दिया.

देवगढ़ तबाह हो गया , पर आयत का कहर भी टूटा था अर्जुन गढ़ पर लाल मंदिर में जोड़ा था शिव और शक्ति का ,आयत के क्रोध ने खंडित कर दिया उसे.

जिस प्यार के लिए साक्षात् यम को जीत आई थी वो प्यार कोई ऐसे कैसे छीन सकता था उस से इस बात को आयत ने दिल से लगा लिया. और टूटे दिल की सदा क्या होती है समझ तो सकते ही हो तुम . देवगढ़ ढह गया था जस्सी टूट गयी थी पूजा बेहाल थी.

फिर एक घडी ऐसी आई जब आयत ने अपने प्राण त्याग दिए. कहते है उस पूरी रात बारिश आई थी, एक कहानी बस वक्त की रेत में दब गयी, रह गयी तो बस एक बात की प्रीत की डोर जो दोनों ने बाँधी थी उसका एक हिस्सा खो गया कही .

मैं- एक हिस्सा, क्या मतलब है तुम्हारा, एक मिनट एक मिनट एक हिस्सा मेरा मतलब दूसरा हिस्सा थी पूजा ..

वो मुस्कुरा पड़ी बोली- पूजा के बारे में हम फिर कभी बात करेंगे रात बीतने को है तुम थोड़ी देर सो जाओ.

मैं- कुछ कहूँ

वो- हाँ

मैं- क्या मैं ठाकुर कुंदन हूँ , मेरा मतलब कहीं ये पुनर्जनम जैसा कुछ तो नहीं

वो- जैसा मैंने कहा कुछ कहनिया बस कहानी ही होते है , बेह्सक तुम्हारी शक्ल मिलती है पर उन जैसा कोई नहीं हो सकता, तुम तो बिलकुल नहीं , पर तुम एक काम कर सकते हो, देवगढ़ को दुबारा बसा सकते हो, इस घर को दुबारा बसा सकते हो .

मैं- जरुर करूँगा मैं ये काम ,

वो उठी और जाने लगी की मैंने उसे टोक दिया .

मैं- जाने से पहले एक सवाल और मेघा को जब मैंने तलवार मारी थी तो खून मेरा बहा था ,ज़ख्म मुझे हुए क्यों



उसने मेरी आँखों में देखा और बोली- ये तो उस से फेरे लेने से पहले सोचना था आधी शक्ति है वो तुम्हारी अब , डोर बाँधी तुमने अब देखो तमाशा
 
#७७



मैं जानता था की रौशनी का कोई तो दरिया आसपास जरुर है पर कहाँ ये नहीं मालूम पड़ रहा था , अपने आप को जैसे जकड़ा हुआ महसूस करने लगा था मैं किसी जाल में . दो तीन दिन गुजर गए मैं सविता से मिलने जा भी नहीं पाया. प्रज्ञा का फोन बंद था , रुबाब वाली का भी कोई अता पता नहीं था .

देवगढ़ में अकेले रहना बहुत अलग था मेरे लिए, इस घर को मैंने न जाने कितनी बार छान मारा था पर कुछ नहीं मिला था सिवाय तन्हाई के शायद वक्त की मार के आगे यहाँ की कहानी ने दम तोड़ दिया था . पर क्या सच में ऐसा था . नहीं ऐसा नहीं था , मैंने एक बड़े से कागज़ पर नक्शा बनाया , ये कला मैंने मेघा से सीखी थी .

ठाकुर कुंदन की जिन्दगी के तीन स्तम्भ थे जो कुछ भी था इन सब के बीच ही था तो मैंने हर उस छोटी से छोटी बात को जोड़ा जो मुझे मालूम थी , एक प्रेम त्रिकोण , दो लुगाई, और जस्सी , सबसे ज्यादा मुश्किल थी तो जस्सी को समझना , वो किसकी तरफ थी कुंदन की तरफ या राणा हुकुम सिंह की तरफ या इस शतरंज की वो रानी थी, जिसने ये सारी बिसात बिछा दी थी .

कुंदन जब आयत के साथ अर्जुंग गढ़ आया था तो वो रहता कहाँ था क्योंकि इतने सालो में मैंने कभी ऐसा नहीं सुना था , मुझे एक वजह और मिल गयी थी वापिस गाँव जाने की , पर एक चीज और थी जिस पर मेरा ध्यान अभी तक नहीं गया था वो था मेरे दादा कमरा जो उनकी मौत के बाद ही बंद पड़ा था .

मैं तभी गाँव के लिए निकल पड़ा . पहुँचते पहुँचते दोपहर हो गयी थी , घर पर मुझे आया देख कर हैरान तो थे घर वाले पर जताया कुछ नहीं , मैंने सवाल पूछती भाभी की निगाहों को इग्नोर किया और दादा के कमरे की तरफ चल पड़ा. मुझे अच्छे से याद था की उनकी मौत के बाद ही इस दरवाजे पर ताला लगा दिया था , और किसी को भी इसे खोलने की इजाजत नहीं थी पर आज वो दरवाजा खुला था .

क्या मेरे बाप ने मुझसे पहले अपने कदम रख दिए थे , फिर भी मुझे तलाशी तो लेनी ही थी मैंने देखा कमरे में सफाई हुई पड़ी थी , जैसे किसी ने यहाँ से सारा सामान कही और शिफ्ट कर दिया हो .

“अब यहाँ कुछ नहीं है ”

मैंने देखा दरवाजे पर माँ खड़ी थी . हमेशा की तरह हाथो में खाने की थाली लिए. मेरी माँ न जाने कैसे जान जाती थी की बेटा भूखा है .

मैं- कहाँ गया दादाजी का सामान

माँ- तेरे बापू सा आये थे कुछ दिनों पहले यहाँ उन्होंने ही सफाई करवाई थी .

मैं- पर किसलिए

माँ- भूख लगी होगी आओ खाना खा लो

मैंने थाली माँ के हाथ से ले ली . वो मेरे पास बैठ गयी.

माँ- मेघा से झगडा हुआ

मैं- नहीं तो

माँ- मुझसे झूठ बोलेगा तू

मैं- झगडा नहीं बस नाराज है वो मैं मना लूँगा उसे

माँ- एक रोटी और ले

मैंने एक रोटी और उठा ली

माँ- तुझे मालूम तो होगा ही की दोनों गाँव एक हो गए है , भाई भाई वापिस मिल गए है

मैं- मुझे क्या फर्क पड़ता है इस से

माँ- मेघा और तेरे रिश्ते पर फर्क पड़ेगा न

मैं- उसके और मेरे रिश्ते के बारे में तुम जानती हो माँ, मैं प्यार करता हु उस से पत्नी है वो मेरी

माँ-कबीर, मेरे बेटे तक़दीर न जाने कैसा खेल खेल रही है तुम्हारे साथ .

मैं- चाहे कितने खेल खेल ले तक़दीर पर जीतूँगा मैं ही

माँ- मुझे फ़िक्र है तुम्हारी और मेघा की , तुम्हारे रिश्ते की

मैं- तू फ़िक्र मत कर, तयारी कर जल्दी ही तेरी छोटी बहु को यहाँ ले आऊंगा ,

माँ- इसी बात का डर है मुझे, इस खून खराबे से डरती हूँ मैं , अपने बेटे को इस हालत में नहीं देख सकती मैं

मैं- तो क्या करू, लोगो के लिए मेघा को छोड़ दूँ , उन लोगो के लिए जिनका मेरे जीवन से कोई लेना देना नहीं है

माँ- खून तो एक ही हैं मेघा और तेरा.

मैं- प्रीत भी एक है उसकी और मेरी, और किस खून की बात करती हो , बेशक मेरा जन्म अर्जुन गढ़ में हुआ है पर मेरी आत्मा देव गढ़ की है माँ. मैंने अतीत को देखा हैं माँ, मैंने ठाकुर कुंदन को देखा है माँ, मैंने देखा उनकी तस्वीर को हु ब हु उनके जैसा दीखता हु माँ

माँ ने आँखे मूँद ली .

मैं- तुम जानती थी न माँ, तुम जानती थी इस बात को पर फिर भी मुझसे छुपाया .

माँ कुछ नहीं बोली

मैं- बोलती क्यों नहीं , क्या मैं ठाकुर कुंदन का पुनर्जन्म हु

माँ- तुम बस कबीर हो मेरे बेटे मेरा अंश .

मैं- तो फिर क्या ये इत्तेफाक है की मेरी शक्ल कुंदन से मिलती है

माँ- मैं नहीं जानती

मैं- तो क्या जानती हो तुम

माँ- यही की मैं तुम्हे खोना नहीं चाहती

मैं- मैं ये तो नहीं जानता की मेरी नियति क्या है माँ, पर मैं मालूम करके रहूँगा की कुंदन को किसने मारा था , ऐसा क्या हुआ था की देवगढ़ बिखर गया .. कुंदन ने देवगढ़ छोड़ा तो क्यों, मेरे दादा ने वसीयत में मेरे लिए वो मिटटी का दिया क्यों छोड़ा

माँ - आयत का है वो दिया.

मैं- तो

माँ- वो गवाह है उस प्रीत का जब कुंदन और आयत पहली बार मिले थे . आयत ने कहा था की वो लौट आएगी , वो लौटेगी , उसने मरते हुए कहा था

मैं- तो दिए का क्या सम्बन्ध

माँ- मालूम नहीं पर तब से ही धरोहर है .

मैं- माँ, मैं वो दिया जला चूका हूँ

माँ- असंभव , ये नहीं हो सकता , संभव ही नहीं

मैं- तेरी कसम माँ ,

मैंने माँ के सर पर हाथ रख दिया, वो भी जानती थी की उसका बेटा उसकी झूठी कसम नहीं खायेगा.

माँ- कैसे , कौन था तेरे साथ ,

मैं- पर..

तभी मेरे दिमाग में जैसे एक साथ बहुत धमाके हो गए, एक तेज दर्द ने मुझे हिला कर रख दिया.

मैं - माँ मुझे जाना होगा , मैं जल्दी ही मिलूँगा अभी जाना होगा.

माँ- कबीर, सुन तो सही.

मैं - जाने दे मुझे माँ, जरुरी है , पर मैं वापिस आऊंगा , मैं आऊंगा

मैं कमरे से निकला ही था की सामने से आती भाभी से टकरा गया.

भाभी को देख कर मैंने अपने हाथ जोड़ दिए.



“उस दिन के लिए माफ़ी देना भाभी, मेरी मंशा तुम्हारा अपमान करने की नहीं थी , मेरी इतनी हसियत नहीं की इस घर की लक्ष्मी से ऐसा व्यवहार कर पाऊं, अपने देवर को छोटा भाई समझ कर माफ़ करना ” मैंने भाभी से माफ़ी मांगी और चल पड़ा. गाड़ी जल्दी ही गाडी उस मंजिल की तरफ दौड़ रही थी जो जिन्दगी का एक नया अध्याय लिखने वाली थी .
 
#



ये क्या हो रहा था मेरे साथ , कैसी उलझने थी जो सुलझने का नाम ही नहीं ले रही थी , सबसे पहले मैं देव गढ़ गया मैंने वो तस्वीरे दिवार से उतार कर गाड़ी में डाली और शहर चल दिया. एक सबसे खास तस्वीर को दुबारा से बनवाना चाहता था मैं , आने जाने और स्टूडियो में दिन ख़राब हो गया पर अच्छी बात ये थी की उन्होंने कोशिश करने का बोला था .

वापसी में रात घिरने लगी थी , मेरी धड़कने बहुत बढ़ी हुई थी मैं पीर साहब की माजर पर रुका कुछ देर, मेरे सर का दर्द अभी भी बना हुआ था मुझे अपने चारो तरफ अजीब सी परछाई दिख रही थी जैसे कोई लड़की भाग रही हो , मैं उसके पीछे भाग रहा हूँ, हवा में उड़ता दुपट्टा , तमाम तरह के विचित्र चित्र सामने आ रहे थे .

मैं वहां पर बैठ गया, थोडी राहत मिली, मैंने फ़ोन निकाल कर प्रज्ञा का नंबर घुमाया पर जवाब अभी भी वही था , फोन बंद था उसका. और मेरा उस से मिलना बहुत जरुरी था मैंने रतनगढ़ जाने का सोचा, पर मेघा भी होगी वहां पर , प्रज्ञा के लिए कही और जलील करने वाले हालात न हो जाये.

और राणा अगर हवेली में हुआ तो. मैंने गलती की दिन में ही चंपा के हाथ संदेसा भिजवा देना चाहिए था पर वो कहते है न जब दिलबर से मिलने का जनून हो तो फिर लोक लाज की दुहाई नहीं लगती, मैंने गाड़ी रतनगढ़ की तरफ मोड़ दी. हवेली से थोडा दूर मैंने एक साइड में गाड़ी लगाई और आगे चल पड़ा. प्रज्ञा ने मुझे एक बार बताया था की उसका कमरा पहली मंजिल पर है,

एक चक्कर लगा कर मैंने पहरेदारो को देखा और जुगाड़ लगा कर दीवार फांद गया. अन्दर दाखिल तो हो गया था पर ऊपर जाना अभी भी मुश्किल था पर किस्मत की बात देखो पिछली दीवारों पर शयद पुताई करवाई होगी सीढ़ी वही पर छूटी हुई थी मैं बड़ी मुश्किल से चढ़ पाया. पहले कमरे को खोल कर देखा कोई नहीं था, फिर मैं दुसरे की तरफ बढ़ा और दरवाजा खोलते ही जैसे जन्नत मेरे सामने थी,

प्रज्ञा अभी अभी नहा कर निकली थी, गुलाबी बदन पर टपकती पानी की बूंदे, भीगे खुले बाल मैं अपना दिल हार बैठा कोई और लम्हा होता तो अब तक उसे बाँहों में भर चूका होता. पर अभी बात दूसरी थी दौर दूसरा था .

उसने जैसे ही मुझे देखा, घबरा गयी वो उसके बदन में कम्पन महसूस किया मैंने .

“तुम यहाँ ” दबी सी आवाज में बोली वो

प्रज्ञा ने दरवाजे की कुण्डी लगाई और बोली- तुम्हे यहाँ नहीं होना चाहिए था , हालात ठीक नहीं है किसी को मालूम हुआ तो जिन्दा नहीं छोड़ेंगे तुम्हे .

मैं- शांत हो जाओ, बैठो मेरे पास .

मैंने उसके धडकते दिल को महसूस किया

मैं- अभी चला जाऊंगा, जानता हूँ मेरी वजह से तुम्हे भी परेशानी उठानी पड़ रही है पर मेरा एक सवाल है तुमसे जिसके जवाब के लिए तुम्हारे पास आना पड़ा

प्रज्ञा- क्या .

मैंने जेब से वो फोटू निकाली और प्रज्ञा के सामने रख दी. उसने तस्वीर को देखा और बोली - झूठ है ये ,

मैं- अपना झूठ किसी और का सच भी तो हो सकता है न

प्रज्ञा- क्या कहना चाहते हो

मैं- इस तस्वीर की सच्चाई जानना चाहता हूँ

प्रज्ञा- हमने कभी नहीं खिंचवाई ये तस्वीर जानते हो तुम

मैं- प्रज्ञा, ये तस्वीर अपनी नहीं है , ये ठाकुर कुंदन की है और साथ में जो है या तो आयत है या पूजा .

प्रज्ञा- तो तुम ये कहना चाहते हो की मैं इन दोनों में से एक हूँ

मैं- नहीं, पर हम दोनों की शक्लो का इस तस्वीर में मोजूद लोगो से मिलना कोई इत्तेफाक नहीं .

प्रज्ञा- मुझे नहीं मालूम

मैं- मेरी आँखों में देखो, तुम्हारा मुझसे मिलना करीब आना , दोस्ती होना क्या ये कोई इशारा नहीं था उपरवाले का

प्रज्ञा- कबीर, मेरा परिवार है ,

मैं- और ये तस्वीर कुंदन का परिवार

प्रज्ञा- न तुम कुंदन हो न मैं कोई और

मैं- क्या मालूम पिछले जन्म की कोई अधूरी डोर जो तुम्हारे और मेरे बिच

प्रज्ञा- फ़िलहाल तो मैं इस डोर से बंधी हु

उसने अपना मंगलसूत्र मुझे दिखाया.

मैं- मैं बस इतना जानता हूँ प्रज्ञा की अगर इस तस्वीर में जरा भी सच्चाई है तो मैं तुम्हे ले जाऊंगा अपने साथ , आयत या पूजा तब भी कुंदन की थी अब भी उसकी ही होंगी, ये जो झूठी कसमे, रस्मे है तोड़ दूंगा मैं .

प्रज्ञा- चुप रहो तुम, बकवास मत करो. तुम मेरी बेटी के पति हो, तुम्हारा सुख उसके साथ है और अगर तुम्हारी बात में जरा भी सच्चाई है तो भी मैं तुम्हारे साथ नहीं आउंगी , मेघा का हक़ उसको ही मिलेगा.उसकी ख़ुशी नहीं छीन सकती मैं

मैं- और तुम्हारी ख़ुशी , हमारी ख़ुशी .

इतिहास कह रहा है की कभी न कभी तुम मेरी थी , और अगर तब मेरी थी तो अब भी मेरी ही रहोगी, माना ये अजीब है पर सच और होनी को कोई नहीं टाल सकता, बेशक तुम्हे कुछ याद नहीं पर अगर डोर सच्ची है तो वो पल जल्दी ही आएगा.

प्रज्ञा- मुझे किस दुविधा में डाल रहे हो तुम, पहले ही मेरे दो टुकड़े हो चुके है कबीर, एक हिस्सा इस घर में है एक तुम्हारे पास , मैं सह नहीं पाउंगी.

मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया.

“तुम जाओ यहाँ से मैं जल्दी ही देव गढ़ आउंगी ”

मैंने जाने के लिए दरवाजा खोला की तभी वो आ लिपटी मुझसे और अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए. बेहद सकूं था उसकी बाँहों में. जिस तरह से मैं आया था उसी तरह से वहां से निकल लिया. वापसी में मैंने देखा की मजार पर दिया जल रहा था , मतलब मेघा आई होगी, पर मैं रुका नहीं गाड़ी मैंने देवगढ़ के रस्ते पर मोड़ दी.

देवगढ़ की सीम में पहुँचते ही मैंने देखा की मेरे पिता की गाडी भी उसी तरफ जा रही है मैंने अपनी रफ़्तार थोड़ी कम कर ली और लाइट बंद कर ली. पीछा करने लगा मैं उनका. गाड़ी कुंदन के घर की तरफ नहीं गयी बल्कि किसी और तरफ गयी, थोडा आगे जाकर गाड़ी रुक गयी . दो लोग उतरे उसमे से.

एक मेरा बाप और दूसरी ताई, ये दोनों यहाँ क्या कर रहे थे मैं भी गाड़ी से उतरा और उनके पीछे चल पड़ा. ताई की मटकती गांड जिसका दीवाना हो गया था मैं बहुत जानलेवा थी. पैदल चलते चलते वो लोग एक पुराने मकान के पास पहुंचे. जब तक मैं पहुंचा वो अन्दर जा चुके थे.



मैं भी अन्दर जाने को था ही की किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा .
 
#79

बिस्तर पर बैठी प्रज्ञा के हाथ में वो तस्वीर थी जो कबीर उसे दे गया था , जिसमे वो कबीर के साथ थी , उसका दिल जो कह रहा था दिमाग मानने को तैयार नहीं था और माने भी तो क्यों, उसका अपना जीवन था ये घर था परिवार था पर जिस तरह से कबीर उसके जीवन में आया था और अजनबी होकर भी आज अपनों से ज्यादा था ये नियति का कैसा इशारा था ,

प्रज्ञा के डर की वजह एक और भी थी मेघा , उसकी बेटी , और वो मेघा से कैसे दगा करे , उसे अगर मालूम होता तो वो कभी कबीर के इतने करीब नहीं जाती , पर ये सब नियति का चलाया ही चक्र तो था , सोचते सोचते जब रहा नहीं गया तो प्रज्ञा ने लाल मंदिर जाने की सोची, क्योंकि अगर कबीर किब बताई बात सच थी तो लाल मंदिर और आयत का बहुत गहरा रिश्ता रहा था .

दूसरी तरफ.

किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा , मैंने पलट कर देखा ही था की के जोरदार मुक्का मेरी नाक पर आ पड़ा. रात अँधेरी में आँखों के आगे और अँधेरा छा गया. चूँकि नाक पर बहुत जोर से लगी थी मैं संभल नहीं पाया और इतने में दो चार लात और सिक गयी.

धुल झाड़ते हुए मैंने देखा वो राणा था प्रज्ञा का बाप.

मैं- राणा तू यहाँ

राणा- मुझे यहाँ नहीं तो कहा होना चाहिए, तेरी मौत बनकर आया हूँ मैं आज , मैंने सब सुन लिया तेरी और उस रंडी की बाते, उसका तो मैं ऐसा हाल करूँगा की उसे देख कर और कोई फिर यार बनाने की हिम्मत नहीं करेगी, तेरे टुकड़े ले जाकर फेकुंगा उसके आगे, जब वो रोएगी तब दिल को सकून मिलेगा.

मैं- राणा, ये एक अजीब गुत्थी है मैं तुझे समझाता हूँ

राणा- कुछ नहीं सुनना, तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर की तरफ देखने की मेरी बीवी और बेटी दोनों को फंसा लिया तूने , अब तेरा खून पीकर ही प्यास बुझेगी मेरी .

मैं- चुतियापा मत कर राणा , मैं समझता हु तेरी हालत पर तू कोशिश कर बात को समझने की , मुझे एक मौका दे

राणा- तूने मेरा घर बर्बाद कर दिया और मैं तुझे मौका दू, ,जरुर दूंगा बहुत जल्दी तेरी सांसो को तेरे बदन से अलग कर दूंगा मैं .

राणा ने फिर से मुक्का मारा. मैं समझ गया था की ये नहीं मानेगा. और अब इसका मुकाबला करना ही पड़ेगा. मैंने राणा का हाथ पकड़ लिया. और उसे धक्का दिया. पर राणा शक्तिशाली था . उसने प्रतिकार किया. न जाने कहा से उसके हाथ एक लकड़ी का टुकड़ा लग गया और वो मुझ पर टूट पड़ा.

गुस्सा तो मुझे भी आ रहा था पर मेघा के साथ हुई घटना की वजह से मेरा शरीर कमजोर था, मुझे लगने लगा था की मैं राणा से पार नहीं पा पाउँगा . उसने मुझे उठा कर सामने दीवार पर दे मारा. पहले से चकराया मेरा सर और घूम गया , मुह से उलटी सी आई मैं समझ गया हालत ख़राब हुई अपनी.

उसने मेरे पैर पर मारा. मैं दर्द से बिलबिला गया .

राणा- देख साले, तेरी क्या औकात है, कैसे मेरे कदमो में पड़ा है तू , तेरा बाप खामखा कहता था की तू कुंदन का पुनर्जन्म है , मेरा लंड है पुनर्जन्म , तू तो दो मिनट न टिक पाया. जब मेघा और तेरी लड़ाई हुई तो मुझे एक पल को लगा था पर अभी तेरी हालत देख कर लगता है तू कुछ नहीं . आज तेरी जिन्दगी के सारे पन्ने फाड़ दूंगा मैं , पर पहले तू इतना बता की उस रंडी के साथ कहाँ कहाँ मजे किये तूने, कहाँ कहाँ ली उसकी .

“तमीज मत भूल राणा , प्रज्ञा के बारे में उल्टा सीधा मत बोल, मेरे लिए बहुत इज्जत है उसकी, उसका बहुत मान करता हु मैं .”

राणा ने फिर एक लात मेरे पेट में मारी बोला-देखो सपोले को कैसे दर्द हो रहा है , साले मेरे दिल पर क्या बीत रही है , आग तुमने लगायी है झुलस मैं रहा हूँ

मैं उठ खड़ा हुआ

मैं- राणा, मैं समझता हूँ तेरे लिए बहुत मुश्किल है तेरी जगह मन होता तो मेरे लिए भी होता, पर प्रज्ञा मेरी जान है , प्यार है वो मेरा मेरी जिन्दगी मेरा सब कुछ है वो , उसके लिए न जाने क्या कुछ कर जाऊ मैं

राणा ने अपनी गन निकाल ली और बोला- हाँ कर लेना अगले जन्म में जो तेरा दिल करे वो कर लेना क्योंकि इस जन्म में मैं हूँ पहले तुझे मारूंगा फिर उस रंडी को .

राणा ने गोली चलाई मैं उछल कर पास की एक दिवार कूद गया .

राणा- बच नहीं पाएगा तू कुत्ते.

धडाम से दूसरी तरफ गिरा मैं पैर में लगी चोट की वजह से परेशान था मैं , उठ ने की कोशिश कर रहा था की तभी राणा भी आ पहुंचा , जैसे ही वो मेरे पास पहुंचा मैंने पास पड़ी रेत मुट्ठी में भर कर उसकी आँखों में फेक दी. वो तिलमिला गया . मेरे लिए बस यही मौका था . हाथ एक पत्थर लग गया मैंने वो राणा के सर पर दे मारा

गन उसके हाथ से गिर गयी. मैंने तुरंत उठा लिया उसे और फायर कर दिया. एक के बाद एक फायर करता गया. जब तक की गोलिया खत्म नहीं हो गयी. राणा को मार दिया था मैंने अपने हाथो से अपनी प्रज्ञा की मांग के सिंदूर को मिटा दिया था. ये मेरा कायराना कदम था ,धोखे से मारा मैंने उसे, पर क्या करता उसे नहीं मारता तो वो मार देता मुझे.

वही बैठ गया मैं उसकी लाश के पास.

प्रज्ञा माँ की खंडित मूर्ति के आगे बैठी थी , मन में सवाल लिए.

“तुम्ही मेरी दुविधा दूर करो माँ, नियति ने मेरे दो टुकड़े कर दिए है एक तरफ मेरा परिवार है तो दूजी तरफ कबीर, इतिहास अगर खुद को दोहरा रहा है तो मेरे आज का क्या होगा. किसी एक को भी थामू तो भी एक हिस्सा मेरा ही बर्बाद होगा. माँ तुम क्या खेल खेल रही हो, क्या लिखा हिया मेरे भाग में, आज बताना ही होगा मुझे, अगर कबीर की बात सच है तो मुझे बताना ही होगा मैं कौन हूँ , कौन हु मैं ” प्रज्ञा ने सवाल किया

“तुम सरकार हो. तुम वो दीपक हो जिसने देवगढ़ को रोशन किया तुम वो कहानी हो जिसका हर एक पन्ना मोहब्बत से भरा है तुम वो हो जिसका ये सब है ”

प्रज्ञा ने पीठ घुमा कर पीछे देखा .
 
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“तुम कौन ” प्रज्ञा ने सवाल किया

“मैं कौन, मैं कौन, मैं बस एक याद हूँ तुम्हारी ,” जवाब आया

प्रज्ञा- कैसी याद

“तुम्हे जल्दी ही सब याद आ जायेगा,तुम्हे मेरे साथ चलना होगा खारी बावड़ी ”

प्रज्ञा- मैं तुम पर विश्वास कैसे करूँ , तुम्हे जानती भी नहीं और कहाँ है ये खारी बावड़ी

“विश्वास तो तुम्हे करना ही पड़ेगा , जानती हूँ तुम्हारी दुविधा पर वर्तमान इसलिए भी मुश्किल होता है की उसका एक अतीत होता है तुम्हारा भी अतीत है और अब वक्त आ गया है की तुम्हे तुम्हारे अतीत से रूबरू करवाया जाये चलो मेरे साथ ”

रुबाब वाली ने प्रज्ञा का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ खारी बावड़ी की तरफ ले चली.

देवगढ़,

अपनी उखड़ी साँसों को संभालते हुए मैं राणा की लाश के पास बैठे सोच रहा था की प्रज्ञा को क्या जवाब दूंगा, बेशक वो मेरे बहुत करीब थी पर पति तो पति ही होता है और उसे कितनी परवाह थी अपने परिवार की ये मुझसे बेहतर कौन जानता था .

कुछ देर बाद मैंने एक गाडी की आवाज सुनी तो मैंने दिवार के ऊपर से देखा, सविता और मास्टर आये थे,

“इतनी रात को ये दोनों क्या कर रहे है यहाँ पर ” मैंने अपने आप से सवाल किया और दिवार फांद कर उनके पीछे चल पड़ा वो लोग भी उसी घर में घुस गए जहाँ पर मेरा बाप और ताई थे. टूटी खिड़की से मैंने देखा की अन्दर का माहौल बहुत अलग था, गर्म था , अन्दर एक बड़ी सी भट्ठी चल रही थी जिसमे सोना पिघला हुआ था .

एक हवन वेदी थी , जिसमे आंच थी, ताई पूर्ण रूप से नग्न आँखे मूंदे किसी अजीब सी मुद्रा में खड़ी थी , मेरा बाप पास में बैठा था और एक औरत जो साधू की बेश में थी कुछ मन्त्र पढ़ रही थी .मास्टर जो सामान अपने साथ लाया था उसने पास में रखा और सविता को पीछे जाने का इशारा किया.

मैं देखता रहा , धीरे धीरे वो औरत ताई से पैरो पर पिघले सोने का लेप लगाने लगी, मैं हैरान था की गर्म सोने से ताई की त्वचा जल क्यों नहीं रही . मन्त्र अब तेजी से पढ़े जाने लगे थे , ताई की आँखे बंद थी सोना उसके बदन पर चढ़े जा रहा था , घुटने से होते हुए ऊपर जांघो तक ,

अजीब सा पागलपन था ये किसी हाड मांस वाले इन्सान पर गर्म सोने की परत चढ़ाई जा रही थी

फिर कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था , पिघले सोने में आग लग गई, उस साध्वी ने कुछ छिड़का ताई के बदन पर आग पल पल तेज होते जा रही थी , ताई चीखने लगी थी . साध्वी न जाने क्या कर रही थी पर इतना जरुर था की उसके उपाय कारगार नहीं थे, ताई के बदन में आग लग गयी. वो चीखती रही जलती रही और अंत में राख बनकर बिखर गयी.

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया था . सबकी जुबान को जैसे लकवा मार गया हो, कोई कुछ नहीं बोल रहा था बस कुछ देर बाद उन्होंने अपना सामान समेटा और वहां से निकल गए.मैंने पूरी तसल्ली की की अब मेरे सिवा और कोई नहीं है तो मैं कमरे में दाखिल हुआ. ये कोई तांत्रिक प्रयोग किया था जो सफल नहीं हुआ था .

पर मुझे एक बात का जरुर मालूम हुआ की सोना जो तमाम जगह था उसका उपयोग किसी ऐसे ही प्रयोग के लिए हुआ था . सामने एक मूर्ति थी , एक मिटटी की मूर्ति ठीक वैसी ही जैसे मंदिर में थी , मैंने उसे उठाया और मुझे जैसे बिजली का तेज झटका लगा. सुध बुध जैसे छीन ली किसी ने .

इधर रुबाब वाली प्रज्ञा को लेकर खारी बावड़ी पर आ पहुंची थी, प्रज्ञा हैरान थी इस जगह को देख कर उसके सर में दर्द होने लगा , आँखों के आगे कुछ छाया आने लगी, पायल का शोर, सर सर उडती चुनरिया. एक जलता चूल्हा , रोटी सेंकती प्रज्ञा. कच्ची सड़क पर नंगे पैर भागती वो और दूर से आती एक आवाज , “सरकार ”.

प्रज्ञा की आँखे झटके से खुल गयी , आँखों में आंसू थे कानो में वो शब्द अब तक गूँज रहा था “सरकार ”

“क्या हुआ था मुझे ” पूछा प्रज्ञा ने

“अतीत की दस्तक , अतीत ने पुकारा है तुम्हे ” रुबाब वाली ने जवाब दिया

प्रज्ञा- कैसा अतीत मुझे बताती क्यों नहीं तुम , क्यों पहेलियाँ बुझा रही हो.

प्रज्ञा के दिमाग में वो तस्वीर आ रही थी जो कबीर ने उसे दिखाई थी , जिसमे वो कबीर के साथ थी युवावस्था में, उसका दिल अनजाने डर से और जोर से धड़कने लगा था .

“बताती क्यों नहीं मैं कौन हु, तुम कौन हो ” चीख पड़ी प्रज्ञा

“मैं तो तुम्हारी ही छाया हूँ, तुम्हारा ही एक अंश, तुम्हारी एक याद जो बस इसलिए थी की तुम्हे सही वक्त पर खुद तुमसे रु ब रु करवा सकू,तुम्हे सब याद आ जायेगा , ” रुबाब वाली ने जवाब दिया

प्रज्ञा- मैं जानना चाहती हूँ सब

रुबाब वाली ने प्रज्ञा की आँखों से आँखे मिलाई और उसे अपनी बाँहों में भर लिया. रुबाब वाली के बदन में आग लग गयी, उसके बदन की आग ने प्रज्ञा को भी अपने लपेटे में ले लिया. प्रज्ञा का मांस जलने लगा. हवा में जलते मांस की दुर्गन्ध फैलने लगी, प्रज्ञा रोने लगी, चीखने लगी, पर रुबाब वाली ने उसे नहीं छोड़ा. नहीं छोड़ा.

जब मेरी आँख खुली तो मैंने खुद को उसी कमरे में पड़े पाया, बदन की हड्डिया अभी तक दुःख रही थी , मेरा फोन बज रहा था मैंने उसे उठाया और कान से लगाया, दूसरी तरफ से जो बताया दिल थोडा खुश हो गया था , कपडे झाड़ते हुए मैं अपनी गाड़ी के पास गया और शहर की तरफ चल दिया.

जब प्रज्ञा को होश आया तो उसने खुद को ऐसी जगह पाया की वो समझ नहीं पायी, दिमाग कुछ दुरुस्त हुआ तो उसे होश आया, वो एक राख के ढेर से लिपटी धरती पर पड़ी थी , खांसते हुए वो उठी , आँखे चकरा रही थी , पर आँखों में एक अजीब चमक थी ,



चलते हुए वो उस टूटे कमरे तक आई , दीमक खाए दरवाजे पर जो दिल बना था उस पर हाथ फेरा उसने , उसके निचे लिखे उन दो नामो पर उंगलिया फेरी उसने, “कुंदन ” उसके कांपते होंठो से एक ह्या निकली. और आँखों से आंसू, उस टूटे किवाड़ से लिपट कर जो रोई वो बस रोटी ही रही, दिल का दर्द आँखों से बहते हुए निकल रहा था , मोहब्बत लौट आई थी , वो लौट आई थी
 
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