Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2 - Page 10 - SexBaba
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Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2

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हजारो अफ़साने थे हजारो बहाने थे , आँखों से बहती गंगा थी तो दिल में उमड़ता सागर भी था, जिन्दगी ने जिन्दगी को ऐसे मोड़ पर ला पटका था की अब क्या कहना था और क्या करना था , रेत मुट्ठी से फिसलती जा रही थी और थामने को अब था भी क्या , इतिहास ने वर्तमान को इस तरह से तहस-नहस कर दिया था की दामन में बाकी क्या रहना था कोई नहीं जानता था .

मेरे हाथ में वो तस्वीर थी जिसे मैंने ठीक होने के लिए शहर में दिया था और अब जब मैं इसे देख रहा था , हकीकत ने मेरे सर पर ऐसा बम फोड़ दिया था की मैं सोच रहा था की काश उस दिन मैं रतनगढ़ आया ही नहीं होता तो ठीक रहता. जैसी भी थी जिन्दगी मैं जी तो रहा था न, बेशक तनहा था मैं अकेला था पर कम से कम ये उलझन तो नहीं थी मेरे पास,

उलझन जो अब और उलझ गयी थी , इस तस्वीर ने मुझे ऐसे दोराहे पर ला पटका था मैं कहूँ तो भी किसे और किसके आगे अपना दुखड़ा रोऊँ, और पिछले जनम की किसी अधूरी कहानी का हिस्सा अगर मैं था भी तो इस जन्म में और उलझ गयी थी कहानी , नसीब देखो मैं तो किसी को कुछ बताने लायक भी नहीं रहा था ,

उस तस्वीर में जो कुंदन के घर की बहु थी वो कोई और नहीं बल्कि............ उसके गले में पड़े लॉकेट को मैं समझ क्यों नहीं पाया, ये लॉकेट जो मैंने खुद पहना था और जो अब ,,,,,,,,,,, नहीं ये नहीं हो सकता , नहीं हो सकता ये मैं चीख पड़ा. ये केवल रिश्तो की डोर नहीं थी ये फांसी का फंदा बन कर मेरे गले से लिपट गया था अब.

मैंने वो तस्वीर गाडी में डाली और वापिस देवगढ़ की तरफ चल पड़ा. आँखों में आंसू थे दिल में दर्द था , मुझे किसी से अब मिलना था ,वापसी में मैं पीर साहेब की मजार पर रुका, पर चैन नहीं मिला . और मिले भी तो कैसे दिल के दो हिस्से जो हो गए थे , अब मैं कुछ कुछ समझ पा रहा था की कुंदन के लिए कितना मुश्किल रहा होगा ये सब पर अब कुंदन की जगह कबीर था और कबीर के लिए भी कहाँ आसान था ये चुनाव करना, सुना था मोहब्बत बहुत इम्तिहान लेती है पर ऐसी परीक्षा तो कभी नहीं ली गयी होगी न किसी हीर-रांझे की न किसी लैला- मजनू की जैसी परीक्षा मेरी थी , बंद मुट्टी खोलनी ही होगी मुझे और खोलते ही दिल का एक हिस्सा बिखर जायेगा मेरा.

देवगढ़ आकर मैंने उस तस्वीर को वापिस से दिवार पर लगाया और उस चेहरे को देखने लगा, ये वो चेहरा था जिसने सब बदल दिया था सब कुछ , सवालो के जवाब कही थे तो वो थे रतनगढ़ में , मैंने वही जाने का सोचा . मैंने कच्चा रास्ता लिया ताकि जल्दी पहुँच सकू पर नसीब में अभी और कुछ लिखा था .

पीपल के उस पेड़ के निचे वो बैठी थी , भरी दोपहर में प्रज्ञा यहाँ क्या कर रही थी , मैं गाड़ी से उतरा और उसके पास गया आँखे मूंदे वो जैसे कुछ सोच रही थी , मेरे आने का भान भी नहीं हुआ उसे,

“प्रज्ञा, ” मैंने पुकारा उसे

उसने आँखे खोली, नजरे नजरो से मिली “सरकार ” बस रुंधे गले से इतना ही बोल पाया मैं और वो दौड़ कर मेरे सीने से लग गयी. चूमने लगी मुझे, गालो पर होंठो पर गर्दन पर , ऐसी दीवानगी, ऐसा पागलपन उसने अपने आगोश में बाँध लिया मुझे, मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया. इस दुनिया में बस एक वो ही थी जिसे सरकार कह कर बुलाता था मैं .

मुझे खींच कर वो उस बूढ़े पीपल के पास ले आई

“देखो इस पेड़ को, क्या याद आता है ” पूछा उसने

मैं- तुम बताओ

वो- हमारी पहली मुलाकात, वो रात जब मैं तुमसे मिली थी , वो मुलाकात जैसे बस कल की ही बात हो .

मैं- हाँ , कल की ही बात हो जैसे , बहुत देर लगाई तुमने

“जुदाई ख़त्म हुई , अब लौट आई मैं ” प्रज्ञा ने कहा

मैं- आओ मेरे साथ

वो- कहाँ

मैं- घर

वो- किसका घर

मैं- तुम्हारा, मेरा, हमारा घर

वो-हाँ , पर पहले मैं कही और जाना चाहती हूँ

मैं- कहा

वो- बताती हूँ

कुछ देर बाद गाड़ी रफ़्तार से दौड़ रही थी , मुझे लगा था की वो शायद देवगढ़ जाएगी पर नहीं , वो तो रतनगढ़ भी नहीं जा रही थी , वो तो अर्जुन्गढ़ जा रही थी .

“अर्जुन्गढ़ ” पूछा मैंने

वो- हाँ भी और नहीं भी.

मैं- तो फिर कहा

वो- तुम्हे नहीं मालूम

मैं- मुझे कैसे मालूम होगा .

वो- हो जायेगा जल्दी ही सब मालूम हो जायेगा. मुझे याद आ गया तुम्हे भी आ जायेगा.

गाड़ी अर्जुन्गढ़ भी पार कर गयी थी , दूर खेतो से होते हुए हम नहर पार गए थे और फिर एक जगह प्रज्ञा ने गाडी रोकी, और एक तरफ देखने लगी .

मैं- क्या

उसने मेरा हाथ पकड़ा और ले चली मुझे खींचते हुए. एक सुनसान जगह पर जाकर बोली वो- घर ,

मैं- यहाँ तो कुछ भी नहीं .

प्रज्ञा ने अपनी हथेली को थोडा सा काटा और कुछ पढ़ते हुए खून के छींटे हवा में फेंके और कुछ ही देर में एक खंडहर दिखने लगा. काली स्याह हवेली, जिस पर भी वक़त की मार पड़ी थी हमारी ही तरह.

“तुम्हारी हवेली ” मैंने कहा

ख़ुशी से जैसे चहकते हुए उसने हाँ में सर हिलाया.

मैंने उसका हाथ पकड़ा और चल पड़ा . लोहे का वो जर्र्ज्र दरवाजा हलके से धक्के से खुल गया . सीढिया चढ़ते हुए हम अन्दर आये, धुल भरी दीवारों पर चारो तरफ तस्वीरे लगी थी , उसने एक तस्वीर को अपनी चुन्नी से साफ़ किया, ये तस्वीर हम दोनों की थी “याद है , ये तस्वीर तब खींची थी जब हम दोनों उस दोपहर नदी किनारे थे, ” उसने कहा

मैं मुस्कुरा दिया.

“सबकुछ वैसा ही है ”

प्रज्ञा ने मेरा हाथ थामा और मुझे पहली मंजिल पर बने उस कमरे में ले आई,

“मेरा कमरा ” बड़ी शोखी से बोली

“इसी कमरे में हम एक हुए थे , यही मैंने जाना था की तुम्हारा एक हिस्सा होना क्या था मेरे लिए. ”



प्रज्ञा मेरे पास आई और अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए.
 
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देवगढ़,

मेघा भरी दोपहर में आँगन में खड़ी थी,खुले बाल नीला लहंगा और सफ़ेद ब्लाउज , कमर तक आये गीले बाल , जैसे कोई प्यासा पानी के मटके की तरफ देखता है ठीक उसी तरह से वो चोबारे को देख रही थी उसी चोबारे को जो कभी उसका होता था.

“घर ” उसके होंठ हौले से बुदबुदाए.

दूसरी तरफ कुछ और लोग थे , और ये लोग थे मैं और प्रज्ञा , मेरी आयत , मेरी बाँहों में लिपटी वो सीने से सर टिकाये धडकनों को सुन रही थी ,

“सुनो ” मैंने कहा

“अभी नहीं ” उसने हौले से कहा

“अभी मुझे बस इस आगोश में रहना है अपने यार के संग ” प्रज्ञा ने कसमसाते हुए कहा

मैं- अब कभी जुदा मत होना

वो- नहीं, अब कभी नहीं .

मैं- देवगढ़ चले ,

वो- जरुर, पर ऐसे नहीं ठीक वैसे ही जैसे तब ले गए थे, मुझे अपनी बना कर . उस घर में मैं पहले भी ब्याहता गयी थी आज भी वैसे ही जाउंगी, मेरे दिलबर बहुत तड्पी हूँ मैं, बहुत सताया है तेरे इश्क ने, मैं तो कुछ भी नहीं थी सिवाय एक रूह के, तुमने मुझे अहसास करवाया जिन्दगी क्या होती है , तुम्हारे इश्क ने मुझे वो बनाया जो मैं कभी थी ही नहीं , मुझे घर ले चलो पर उसी तरह से, मेरी मांग में अपने नाम का सिन्दूर भर के.

मैं- तो देर किस बात की चल फिर,

वो- मुझे ले चल मंदिर, ले चल

सांझ होते होते हम लाल मंदिर आ पहुंचे,

“कितनी शामे, हमने बस इन्ही सीढियों पर बितायी ” बोली आयत

मैं- और न जाने कितनी आने वाली शामे फिर बिताएंगे, हम अपनी मोहब्बत का इतिहास तो न लिख सके, पर मेरी सरकार मेरा वादा है ये जिंदगानी तेरी बाँहों में, तेरी पनाहों में बितानी है मुझे,

अपनी गोद में उठा कर उसे मैं लाया उसी मूर्ति के सामने जो कभी गवाह थी हमारी मोहब्बत की , और आज फिर मोहब्बत ही हमें फिर उसे ले आई थी , मैंने थाली में पड़ा सिंदूर प्रज्ञा की मांग में भर दिया. एक बार फिर मैंने उसे अपनी बना लिया था .

आयत- मेरा मंगलसूत्र कहाँ है

मैं- रुको जरा

मैंने अपने गले से वो लॉकेट उतारा और आयत के गले में पहना दिया. , जी चाहता था की वक्त यही थम जाए और सदा बस मैं उसके साथ कैद हो जाऊ ताकि फिर कोई कभी हमें जुदा न कर सके. हमने माथा टेका और देवगढ़ के लिए चल पड़े.

“सब बदल गया है वक्त बहुत आगे बढ़ गया है ” उसने शीशे से बाहर देखते हुए कहा

चाहे सब बदल जाये पर एक सच नहीं बदल सकता की तुम मेरी हो मैं तेरा , बहुत सताया है तक़दीर ने हमें पर अब और नहीं अब हम अपनी नयी दुनिया बसायेंगे जिसमे बस तुम होंगी और मैं

“अब रुलाएगा क्या मुझे , कैसे शुक्रिया अदा करूँ मैं उस रब का जिसने मेरी झोली में तेरे रूप में सितारे भर दिए , शीशे की तरह मैं बिखरी थी टूट कर तूने मुझे आइना बनाया, ” रुंधे गले बोली वो .

उसने अपना सर मेरे काँधे पर टिका दिया , और आँखे मूँद ली, एक बार फिर मेरा अतीत मेरी आँखों के सामने आ गया ,वो भी एक शाम थी जब मैं उसे देवगढ़ ले गया था ये भी एक शाम थी समय जैसे फिर खुद को दोहरा रहा था ,

किस्मत ने हमें दुबारा मिलाया था, जो ख़ुशी , जो जिन्दगी हम तब जी नहीं पाए थे वो ख़ुशी जीने का फिर मौका दिया था , पर हर चीज़ की कोई कीमत होती है इसकी भी थी , मेरा जोरो से धडकता दिल मुझे बार बार उस तस्वीर की याद दिला रहा था जो गाडी में पीछे रखी थी , सुख की चाहत में मैं ये तो नहीं भूल सकता था की सुख और दुःख तो हमेशा साथ साथ ही चलते थे.

पर मैं जीना चाहता था ,अपनी जान के साथ अपनी सरकार के साथ अपनी आयत की बाँहों में जीना चाहता था , वो तमाम खुशिया जो तब उसे नहीं दे पाया था मैं उसे अब देना चाहता था , पर क्या ये इतना आसान था........पर कहते हैं न अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो रौशनी की एक किरण उसे हटा ही देती है ,

हम भी एक नयी शुरुआत करने जा रहे थे, कुछ चीजों को मैं बदल नहीं सकता था पर एक नयी शुरुआत कर सकता था , जल्दी ही हमारी गाड़ी देवगढ़ आ पहुंची थी , हमारे घर के सामने , मुस्कुराते हुए आयत गाड़ी से उतरी और चोखट की मिटटी को अपने माथे से लगाया .

“आज कोई नहीं है तेरा स्वागत करने को” मैंने कहा

वो-तुम तो हो न मेरे पास, मैं अपनी मोहब्बत से फिर जिन्दा कर दूंगी इस घर को, तुम मेरी शक्ति हो तुम साथ थे तो हमने बंजर जमीं में फसल उगा दी थी , हम फिर कोशिश करेंगे , हम फिर नयी दुनिया बसायेंगे, हम फिर से इस गाँव को बसायेंगे, देवगढ़ ठाकुर कुंदन का था आगे भी रहेगा, ठाकुर लौट आया लोग भी आ जायेंगे.

मैं-गलत देवगढ़ अकेले कुंदन का नहीं उसके साथ आयत का भी है , मेरा नाम हमेशा तेरे बाद लिया जायेगा. तू जानती है .

वो- हाँ सरकार जानती हूँ .

मैं- तो अपने पावन कदम रख आगे और इस घर को फिर घर बना दे .



मैंने उसका हाथ पकड़ा और घर के अन्दर ले आया. आँखों के सामने न जाने क्या क्या घूम रहा था , जैसे बस कल की ही बात लगती थी जब दुल्हन के उस लाल जोड़े में मैं उसे लाया था अपनी बना कर . और उसके स्वागत में ये घर किसी महल सा सजा था और आरती की थाली लिए खड़ी थी , जस्सी ,मेरी भाभी जस्सी , इस घर की बड़ी बहु
 
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तमाम बातो को भूल कर हम एक नयी दुनिया बसाने जा रहे थे पर क्या ये इतना आसान था, और फिर वो मोहब्बत ही क्या जो बार बार किसी कसौटी पर तोली ना जाए, आज की रात भी कुछ ऐसी ही थी जब शायद इस कहानी का अंत होना था ,आज की रात एक नयी कहानी लिखने वाली थी , ये रात ही थी जो बताएगी की सुख किसका, दुःख किसके भाग का, आयत और कुंदन की कहानी का भाग ये रात ही लिखने वाली थी .

मैं अपनी जान का हाथ पकडे आँगन में खड़ा था , कभी मैं उस चाँद को देखता जो आसमान में था कभी मैं उस चाँद को देखता जो बाँहों में था . पर अभी चाँद के साथ बिजली भी आनी थी बल्कि यूँ कहूँ की आ चुकी थी , सीढियों से उतर कर वो आ रही थी अब मैं क्या कहूँ उसके बारे में और क्या ही कहूँ मैं उसे मेघा कहूँ या जस्सी, ठकुराइन जसप्रीत.

उसे देखते ही मेरा दिल जोरो से धडक उठा , चाँद रात में मैंने उसकी आँखों में वो चमक देखि, वो चमक जिसके ताप को मैं पहले भी सह चूका था .

“तो वक्त ने फिर से हमें उसी जगह लाकर खड़ा कर दिया. नसीब के निराले खेल ”जस्सी ने हमारे पास आते हुए कहा

“जस्सी, ” मेरे होंठो से निकला

“हाँ, जस्सी , मैं ठकुराइन जसप्रीत , इस घर की मालकिन, इस गाँव की मालकिन ” उसने बड़े दंभ से कहा

मैंने एक नजर आयत को देखा और बोला- हाँ सब तुम्हारा ही है, पहले भी तुम्हारा ही था आज भी और हमेशा ही रहेगा ,

जस्सी- खोखली बाते , मेरा तो सब कुछ होकर भी नहीं हुआ. मुझसे तो सब लूट ले गयी ये

मैं- मैं तुम्हारा कभी नहीं था , हो ही नहीं सकता था तुम्हारा , मैंने कभी देखा नहीं तुम्हे उस नजर से, बेशक हम एक दुसरे के बहुत करीब थे, पर ये दिल हमेशा आयात के लिए धड़का तब भी आज भी .

“नफरत है मुझे इस नाम से , सुना तुमने नफरत है मुझे, कल की छोरी न जाने कहा से आई और इस घर को बर्बाद कर गयी सब कुछ छीन गयी ” जस्सी ने गुस्से से कहा

“मैंने कभी कुछ नहीं छीना किसी से, मुझे जरुरत ही नहीं थी इस ऐश की इस धन संपदा की , मैं तो भटकती रूह थी जिसे जिन्दगी दी मेरे सरकार ने , मुझे तब भी कुछ नहीं चाहिए था आज भी नहीं, तुम रखो सब मैं कुंदन को लेकर कही और चली जाउंगी , कही भी रह लेंगे हम ” आयत ने कहा

जस्सी- मुर्ख, तुझे क्या लगता है मुझे इस भौतिक सुख की चाह है , नियति देखो मुझे इस जन्म में अपनी सबसे बड़ी दुश्मन के गर्भ से पैदा किया , कुछ कुछ संकेत मुझे हमेशा मिलते रहे मेरे इतिहास के पर देख पीर साहब की मजार टूटी और मेरी याद उस कैद से आजाद हो गयी , जस्सी लौट आई, और अब तो पीर साहब भी कुछ नहीं कर सकते कुंदन ने उनको साक्षी मानकर ही फेरे लिए है मेरे साथ , अब उसकी ब्याहता मैं हु तू नहीं

जस्सी हसने लगी .

“धोखा, तूने धोखा किया, छल से मेरे नाम का सिंदूर भरा है तूने अपनी मांग में ,तू अपना ये हठ छोड़ दे, तूने जो भी किया मैं भूलता हु पिछली बातो को जस्सी मेरे लिए सबसे बढ़के थी , उसका स्थान वाही रहने दे, इतना भी मत गिरो की अंत में कुछ शेष न रहे, ” मैंने उस से कहा

“कुंदन जस्सी का था और रहेगा, मियन तब तुम्हे न पा सकी अब जरुर पाऊँगी पति हो तुम मेरे अब और सिंदूर के मान को तो माँ तारा भी नहीं झुठला सकती ” जस्सी ने कहा

मैं- झूठ हमेशा झूठ होता है , कुंदन की सांसे अगर किसी की है तो बस आयत की

मैंने आयत का हाथ पकड़ा और कहा - चलो, यहाँ से हम कही और रह लेंगे.

मैं दरवाजे तक पहुंचा भी नहीं था की वो झटके से बंद हो गया . मैंने मुड कर देखा जस्सी हमारी तरफ आ रही थी .

“नहीं कुंदन कब तक ये चूहे बिल्ली का खेल खेलोगे, आज फैसला कर ही लेते है हम तीनो के नसीब का फैसला ” जस्सी ने कहा

मैं- कुंदन क्या कोई सामान है की आधा आधा बाँट लिया या फिर तुम अपने हिसाब से तय करोगी, कुंदन सिर्फ आयत का है और रहेगा

जस्सी- मुझे गुस्सा दिला रहे हो तुम

मैं- गुस्सा तो पहले भी किया था न तुमने सब बर्बाद कर दिया. ये मत भूलो की याददाश्त केवल तुम्हारी ही वापिस आई है मेरी भी आई है और ये तो मैं फिर भी उन यादो को दिल के किसी कोने में दफना रहा हूँ क्योंकि इतिहास की नफरत पर कभी भी भविष्य का सुख नहीं मिल सकता , मुझे आज भी याद है पूजा, उस बेचारी का क्या कसूर था , पाप कम नहीं है तुम्हारे .

जस्सी- तो एक और पाप सही, तब तुम्हे नहीं पा सकी थी अब पा लुंगी

“तब तुमने धोखा किया था जस्सी, तब कुंदन अकेला था अब नहीं अब उसके साथ उसकी ढाल है ,तुम्हे आजमाइश करनी है कर लो प्रीत की डोर टूटी जरुर थी पर धागे उलझे रहे , और मैं आयत अपनी डोर को वापिस बाँध दूंगी ” आयत मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी.

“मुझे तू न पहले समझ पायी थी न आज समझ पायेगी , मेनका की बेटी हु मैं ,जिस ताकत पर तुझे नाज है आयत उस से न जाने कितनी शक्तिशाली हूँ मैं , तू तब भी नहीं टिक पाई थी आज भी नहीं ” जस्सी बोली

“मैंने कभी अभिमान नहीं किया, और करती भी किसलिए मैं तो कुछ भी नहीं थी बिखरी हुई रेत थी मैं जिसे कुंदन ने आकार दिया. मैंने तो अपनी सब ताकत माँ तारा के आगे रख दी थी की मैं कुंदन के साथ जी सकू, सब कुछ तब भी तुम्हारा ही था जस्सी और आज भी है , और जैसा कुंदन ने कहा हम कही दूर चले जायेंगे ” आयत ने कहा

जस्सी- दूर तो तुम्हे जाना ही है मेरे और कुंदन से दूर,

जस्सी ने अपने हाथ हिलाए और आयत को एक झटका सा लगा .



“जस्सी, छोड़ उसे याद रखना उसे अगर कुछ भी हुआ तो ठीक नहीं रहेगा ” चीखा मैं
 
“तुम दूर हो जाओ कुंदन, अगर ये यही चाहती है तो ठीक है अब बात मेरी और इसकी है बेशक तब मैं छल से हारी थी पर आज नहीं ” आयत ने उठते हुए कहा .



अगले ही पल जैसे वहां पर तूफ़ान आ गया , आसमान में बिजलिया कड़कने लगी , दोनों के हाथो में तलवार आ गयी और शुरू हो गया प्रलय , जस्सी की नफरत को मैंने तब भी रोकने की कोशिश की थी जस्सी ने पूजा को जहर दे दिया था , आयत के गर्भ को गिरा दिया था , नफरत तो बहुत थी मुझे उस से पर मैं फिर भी एक नयी शुरुआत करना चाहता था , और अब देखना था की क्या होता है .

घाव उनके बदन पर हो रहे थे पर दर्द मुझे हो रहा था , आयत और जस्सी के वार जब भी दाए बाये होते देवगढ़ और थोडा टूट जाता, अब मैं समझा था इस गाँव का विनाश कैसे हुआ था .

हुकुम सिंह और अर्जुन के वारिस आपस में लड़ रहे थे , अगर वो दोनों आज यहाँ होते तो क्या देखते , शुक्र है की वो दोनों नहीं थे आज, तभी जस्सी ने एक ऐसा प्रहार किया आयत पर वो धरती पर गिर गयी पेट पकड़ लिया उसने अपना

“आयत , ” मैं चीखते हुए भागा उसकी तरफ.

उठाया उसे.

मैं- ठीक है तू.

“हाँ मेरे सरकार, ठीक हूँ ” उसने थूक गटकते हुए कहा

“हार मान ले आयत और चली जा कुंदन को छोड़ कर यहाँ से , ” जस्सी ने कहा

मैंने आयत की तलवार उठाई और बोला- चल जस्सी , मुझे जीत ले अगर तूने जीत लिया तो मैं तेरा . बस बहुत हुआ इस कहानी को खत्म करते है

“नहीं कुंदन नहीं ” आयत चीखी

मैं- अपने प्यार पर भरोसा रख ,तेरे लिए लाल मंदिर जीत लिया था मैंने इसे अबिमान है खुद की असीमित ताकत पर , इस कहानी का अंत ऐसे ही होना है मेरी सरकार, जस्सी और कुंदन ही लिखेंगे ये अंतिम पन्ने,

मैंने आयत का माथा चूमा और तलवार उठा ली .

मेरे दिमाग में हर एक बात घूम रही थी , हर एक बात पूजा की टूटती साँसे, अपने वंश को ख़त्म होते देखा था मैंने, आयत की लाश और खुद को जान , मेरी मन में इतनी नफरत किसी ज़माने ने अंगार के लिए हुई थी जब उसने आयत को रखैल बनाने को कहा था .

जस्सी का पहला वार ठीक मेरे कलेजे के ऊपर लगा.

मैं- बढ़िया, इस दिल से मिटा दे तेरी तमाम यादो को बहुत बढ़िया, आ और वार कर .

जस्सी फिर मेरी तरफ बढ़ी इस बार मेरे पैर को चीर दिया उसने,

“झुक जा कुंदन ” उसने कहा

मैं- कुंदन को तू मोहब्बत से झुका सकती थी जस्सी, नफरते तो तूने देखि नहीं मेरी,

जैसे ही जस्सी घूमी मैंने उसकी पीठ को चीर दिया. वो घूमी और मैंने अपनी तलवार उसके पेट में उतार दी, एक पल को जैसे सब थम गया और फिर उसका बदन चमकने लगा. सुनहरी होने लगी वो तंत्र का प्रयोग कर रही थी वो , आग की लौ सा दहकने लगा उसका बदन

“अप्सरा सिद्धि ” चीखी आयत

भागते हुए आयत ने मुझे अपने आगोश ने ले लिया . जस्सी का सारा स्वरूप बदल गया था शोलो सी दाहक रही थी वो .

उसने आयत को धक्का दिया और दूर फेक दिया. जस्सी ने अपनी ऊँगली मेरे कंधे पर रखी , जैसे लावा सब चीजो को चीर जाता है ठीक वैसे ही मेरा मांस गलने लगा. मैं चीखने लगा , जस्सी पर मेरा कोई जोर नहीं चल रहा था .

“जस्सी, छोड़ उसे ” आयत ने जस्सी पर वार किया पर उसे को फर्क नहीं पड़ा.

“तू ले जाएगी कुंदन को मुझसे दूर तू, देख मुझे, तू जीतेगी मुझे मैं सर्वशक्तिशाली, मैं ९ ग्रह विजेता, मैं अप्सरा सिद्ध करने वाली, तू जीतेगी मुझसे जस्सी चीखते हुए आयत को मारने लगी उसका जिस्म खून से भीगने लगा. ”

मैंने जस्सी का हाथ पकड़ा और उसे आयत से दूर किया.

मैं- जस्सी मान जा , मान जा अपने अंत को मत ललकार,

जस्सी- मेरा अंत , कौन करेगा मेरा अंत,

मैं- तू अभिमान में भूल गयी है की प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं , तू जानती है आयत ने अपनी सारी शक्तिया माँ तारा के आगे रख दी थी ताकि वो मेरे संग जी सके और मोहब्बत ने उसे वो वरदान दिया था जिसमे तेरा अंत था , तेरी नियति शायद यही था , तेरे पाप का घड़ा भर गया जस्सी ,

मैंने आयत का हाथ पकड़ा और बोला- एक होने का समय आ गया है , मेरी आँखों में देखो , मैंने आयत के गले में पड़े लॉकेट की जंजीर को तोड़ दिया और आयत को अपनी बाँहों में कस लिया. हम दोनों एक हो रहे थे अर्धनारीश्वर हो रहे थे हम

“असंभव , ये नहीं हो सकता ” जस्सी चीखी

मैं अब आधा कुंदन था आधी आयत.

मैं- काश तू प्रेम को समझ पाती

क्रोध में अंधी जस्सी ने मुझ पर वार किया पर बेकार था , अतीत की नफरत ने वर्तमान की मुहब्बत पर वजन डाल दिया था , मैंने जस्सी की छाती को फाड़ दिया और उसके कलेजे को बाहर खींच लिया. उसके कलेजे को खाता रहा मैं उसके बदन के टुकड़े टुकड़े कर दिए. उसका अंत ऐसे ही होना था .

जस्सी का अंत होते ही मेरे बदन में भी आग लग गयी , आँख खुली तो दिन चढ़ आया था मैं और आयत राख के ढेर पर पड़े थे आँगन में चारो तरफ काला खून बिखरा था जस्सी के टुकड़े गायब थे, गालो पर थपकी देकर मैंने आयत को जगाया , एक पल लगा उसे समझने को फिर वो मेरे गले लग गयी .

मैं- सब ठीक है , बस अब मैं और तुम हो, बहुत तडपा हु मैं तुम्हारे लिए, बहुत परीक्षा दी है अब मैं जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ तुम्हारी बाहों में , तुम्हारी सांसो में

आयत- जो हुक्म मेरे सरकार , ये सांसे बस तुम्हारी ही हैं हम अपनी दुनिया बसायेंगे हम फिर से जियेंगे , यही जियेंगे एक दुसरे की बाँहों में



मैंने आयत के माथे को चूमा और उसे घर के अन्दर ले चला.
 
#85



अंतिम अध्याय

जिन्दगी अपनी होकर भी अपनी नहीं थी, कहने को सब था मेरे पास मेरी जान आयत थी , मेरा गाँव देवगढ़ था पर फिर भी ये बर्बाद घर मुझसे हजारो सवाल पूछता था और मेरे पास कोइ जवाब नहीं था . एक दर्द था सीने में , मैं रोना चाहता था पर कर न पाया ये. आयत का साथ होना खुशनसीबी थी मेरे लिए , टूट कर चाहती थी वो मुझे पर कलेजे पर कुछ ऐसे जख्म थे जिनका भरना नामुमकिन था .

एक ऐसा ही जख्म था पूजा का, मैं घंटो उस टूटे छज्जे को देखता रहता था जिस पर खड़ी होकर वो इंतज़ार करती थी की कब मैं उसकी गली से गुजरूँगा. एक घाव था जस्सी का, जस्सी जो मेरा मान थी , अभिमान था मुझे उस पर की कभी अगर मैं न रहा तो सब संभाल लेगी वो , हम तो बस नाम के थे इस घर में कोई असली मर्द था तो वो जस्सी थी , पर कुछ ऐसी बात भी थी की जिसने इस हस्ते खेलते घर में बर्बादी की आग लगा दी थी .

“किस सोच में डूबे हो ” आयत ने मेरे पास आते हुए कहा

मैं- कुछ , कुछ नहीं

उसने मेरे हाथ में चाय का प्याला दिया और बोली- हमें अतीत को भुलाना ही होगा,

मैं- पर कैसे इतना आसान भी तो नहीं

आयत- पर आने वाली जिन्दगी के लिए कोशिश तो करनी होगी, कब तक इन जंजीरों को बांधे रखोगे ,पिछली जिन्दगी को भूल कर नए जीवन के बारे में सोचना होगा हमें.

मैं- हम लाख कोशिश कर ले सरकार, पर अतीत पीछा नहीं छोड़ेगा

आयत- जानती हु, पर अब इस जिंदगानी को तो भी जीना है न, और फिर तुम ही तो कहते थे न की तुम मेरे दामन में ज़माने भर की खुशिया भर देना चाहते हो .

मैं- हाँ मेरी जान

आयत- तो फिर चलो

मैं कहाँ

आयत- एक नयी शुरुआत करने .

आयत और मैं लाल मंदिर आ गए.

मैं- यहाँ किसलिए

वो- नयी शुरआत

वो मेरा हाथ पकड़ के तालाब के पास ले आई और बोली- समय आ गया है की इस जंजाल से मुक्ति पायी जाए,

आयत ने पानी अपनी अंजुल में लिया और मन्त्र पढने लगी , पानी में लहर उठने लगी , फिर मैंने कुछ ऐसा देखा जो बस भाग्वाले ही देख पाते है , मैंने नाह्र्विरो को देखा, ऐसा अलौकिक द्रश्य की मैं क्या वर्णन करू, मैं नहीं जानता था की आयत ने मंत्रो की भाषा में उनसे क्या कहा पर मैंने उनको मुस्कुराते देखा . वो पास आये और आयत के सर पर अपना हाथ रखा और गायब हो गए. तालाब का सारा पानी सूख गया . अब वहां कुछ नहीं था सिवाय गाद के .

“मैंने मुक्त कर दिया उनको ” बोली आयत

मैं- सही किया. अब जब धन नहिः होगा तो कोई लालच नहीं करेगा.

आयत सीढिया चढ़ते हुए मंदिर में आई और कुछ मन्त्र पढने लगी , उसने एक पात्र में हम दोनों का खून मिलाया और चढ़ा दिया. आस पास आग लगनी शुरू हुई, वो मन्त्र पढ़ती रही धरती हिलने लगी थी , पर वो आँखे मूंदे लगी रही , घंटे भर बाद एक जोरदार आवाज हुई और मंदिर गायब हो गया .

मैं- क्या हुआ ये

वो- मैंने अपनी शक्तिया माँ को वापिस लौटा दी है , मेरी असली शक्ति तुम हो मुझे इन सब की जरुरत नहीं .

मैं- एक मिनट ये तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ

वो- क्या

मैं- तुम, तुम तो , तुम तो और हसीन हो गयी हो. ऐसा लगता है की उम्र थोड़ी और कम हो गयी है तुम्हारी

वो- श्याद

वापसी में हम थोड़ी देर पीर साहब की मजार पर रुके.

मैं- एक बात पुछु , तुम्हे जस्सी पर शक कब हुआ था

वो- कभी नहीं होता, देखो जस्सी हमेशा तुम पर अपना हक़ तो जताती थी ही, और हम भी उसके स्नेह को समझते थे पर धीरे धीरे वो जलने लगी थी जब भी तुम मेरे या पूजा के साथ होती, वो झल्लाती, गुस्सा होती , और फिर पूजा की तबियत अचानक से ख़राब होने लगी, तुम जानते हो हमने उसे सब जगह दिखाया पर कोई असर न हुआ.

मैं नासमझ कभी समझी नहीं की जस्सी उसे जहर दे रही है, तंत्र का जहर बहुत धीरे असर करता है पर वार बहुत गहरा होता है , पूजा कई बार मुझे इशारो में बताना चाहती थी पर मैं नादान समझी नहीं .और फिर एक दिन पूजा की मौत हो गयी . याद है तुम्हे जब हम उसकी अस्थिया लेने गए थे वो बिलकुल काली थी तब मुझे ध्यान आया.

अक्सर जब भी मुझे कही तुम्हारे साथ जाना होता या जब भी हम साथ होते जस्सी किसी न किसी बहाने से हमें अलग कर देती और फिर जब उसके और मेरे झगडे होने लगे. कैसे वो हम दोनों के मन में खटास पैदा करने लगी थी .

फिर तुमने फैसला किया की हम देवगढ़ छोड़ कर मेरे घर रहेंगे, तो जस्सी से बर्दाश्त नहीं हुआ , तुम्हे याद है जल्दी ही मेरे गर्भ में हमारे प्यार की निशानी आ गयी थी , पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था. उस रात जब तुम शहर गए थे जस्सी हवेली पर आई, उसने कहा की उस से भूल हुई थी , वो मुझे वापिस देवगढ़ लेने आई थी ,

मैंने कहा की जब तक कुंदन नहीं आ जाता मैं नहीं जाउंगी , चूँकि मैं गर्भावस्था में थी तो मेरी शक्तिया कम हो गयी थी , उसने चाल से मुझे विश्वाश दिलाया की तुम्हारी उस से बात हो गयी है मैं उसके साथ चल दी.

रस्ते में मैं माथा टेकने के लिए मजार पर रुकी और तभी उसने अपना गन्दा खेल खेल दिया. इन्सान सबसे कमजोर जब होता है जब वो इबादत में होता है , उसने ठीक वो समय ही चुना , मेरे पेट पर वार किया उसने . गर्भ की हत्या कर दी उसने, मेरी जान ली, पर मैंने मेरी याद का एक टुकड़ा मजार पर छोड़ दिया, और कसम खाई की एक दिन मैं लौटूंगी और जब वो दिन आएगा मेरी याद मुझे मेरे होने का अहसास करवाएगी, वो रुबाब वाली जो तुम्हे मिलती थी मेरी ही याद थी .

मैं- तुम जानती हो जब वो मंजर आँखों के सामने आता है तो आज भी दिल टूट जाता है दुनिया को उजड़ते देखा था मैंने, तुम्हारे वियोग में मैंने वही अपने प्राण त्यागे थे, मुझे मालूम हो गया था की जस्सी ने ये अत्याचार किया था , मेरे अंतिम शब्द यही थे की वो मुझे कभी पा नहीं सकेगी. पर शायद जस्सी ने भी ठीक वैसा ही किया होगा उसने भी अपनी याद सुरक्षित रखी होगी, क्योंकि जब चबूतरा टुटा तभी वो याद उसमे समाई होगी.

आयत- मेनका की बेटी थी वो ,

मैं- अकाट्य सत्य. जस्सी जैसी कोई नहीं थी पर न जाने कब वो हक़ और पाने में फर्क करना भूल गयी. पर इस जन्म में तुम्हारी बेटी बन कर आना उसका

आयत- एक तरह का आवरण पर खैर, अब क्या फायदा इन बातो का , दुखो का मौसम बीता अब सुख आया है

उसने मेरा हाथ थाम लिया. शाम होते होते हम देवगढ़ लौट आये ,एक दुसरे की बाँहों में बाहे डाले . पर वहां आकर कुछ और ही देखने को मिला , पिताजी की गाडी उसी घर के आगे खड़ी थी , हम देखने गए तो अन्दर पाया की सविता और पिताजी दोनों की लाशे पड़ी थी . आधा आधा शारीर पिघला हुआ, न जाने क्यों कोई दुःख नहीं हुआ ,

खैर, कुछ महीने बीत गए थे , मैंने और आयत ने नयी दुनिया बसा ली थी , हम खुश थे उस शाम मौसम अजीब सा हुआ पड़ा था लगता था की बारिश गिरेगी आज, मैं अपने चोबारे की खिड़की पर खड़ा घटाओ को देख रहा था की बिजली कुछ जोर से गरजी, मेरी नजर शीशे पर पड़ी और वही रह गयी, शीशे में वो थी .................



समाप्त ....
 
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Adultery - गुजारिश

@Musafir yaha par update aayega ? :confuse:

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Will meet here soon
 
दिल अपना प्रीत पराई 2

“”मैंने जानती थी तुम यही मिलोंगे “ चाची की आवाज ने मेरा ध्यान तोडा .


“इसके सिवा जाना ही कहा ” मैंने कहा

“अब तुम्हे समझाने की हिम्मत मुझमे तो नहीं है , माना की खेती का शौक है साहबजादे को पर हमारी और भी कितनी जमीने है वहां कर लो पर न जाने क्यों इस बंजर टुकड़े से इतना लगाव है तुम्हे . हालत देखो अपनी , पसीने से लथपथ क्यों करते हो इतनी मेहनत ये जमीन कभी कुछ नहीं देगी तुम्हे. ” चाची ने कहा .

“सकून तो देगी चाची, ”मैंने कहा

चाची- तुम्हे समझना बड़ा मुश्किल है , घंटो मगजमारी करते हो इस बंजर टुकड़े पर , क्या नहीं है हमारे पास देखो वो दूसरी तरफ के खेत हर साल फसल पैदा करते है , पानी की भी कोई कमी नहीं पर न जाने क्यों तुम इसी बंजर टुकड़े पर कस्सी चलाते रहते हो , कभी कभी तो लगता है की तुम खुद को सजा दे रहे हो . खैर खाना लायी हूँ खा लो .

“कमरे में रख दो मैं थोड़ी देर में आता हूँ ” मैंने कहा

चाची- याद से खा लेना,

चाची ने कहा और वापिस मुड गयी .

अब मैं भला क्या कहता उनको की इस बंजर जमीन और मेरा क्या रिश्ता था दोनों एक से ही थे. हाथो के छालो पर ध्यान न देते हुए मैंने चाची का लाया झोला खोला और खाना खाने लगा. दो तीन सब्जिया, रायता, सलाद और भी न जाने क्या क्या . नीम की छाया तले बैठे मैंने एक नजर तपते सूरज पर डाली और वापिस से खाना खाने लगा. इस बंजर जमीन की सबसे बड़ी खास बात अगर कुछ थी तो ये नीम का पेड़ जो बड़ा गहरा था , और हरा भरा यही बात मुझे हौंसला देती थी .

बेशक मुझे और कस्सी चलानी थी पर न जाने क्यों मेरा मन नहीं हुआ तो मैं कुवे की तरफ चल दिया. और शायद यही से ये कहानी शुरू होनी थी .

तपती गर्म लू, जैसे जान ही निकालने का सोच कर आई थी . गर्म हवा से कलेजा तक जल रहा था सूरज दादा ने जैसे आज अपने क्रोध से सब झुलसा देने का सोच ही लिया था ,

“नहा लेना चाहिए ” मैंने अपने आप से कहा और कुवे पर बने गुसलखाने की तरफ बढ़ने लगा. और जैसे ही मैं पास गया चूडियो की खनक ने मेरा ध्यान खींच लिया. और ठीक तभी वो हुआ जिसने इस कहानी की ऐसी शुरुआत की ..........

बाथरूम का दरवाजा झटके से खुला और मेरे सामने पानी की बूंदों में लिपटी चाची खड़ी थी . ऊपर से निचे तक पूर्ण रूप से नग्न दरवाजे के बीचो बीच वो पांच फुट का जिस्म जिसके दुधिया रंग पर वो अपनी की बूंदे किसी शीशे सी धुप में चमकने लगी थी .

“हाय दैया , तुम यहाँ मैं तो मर गयी ” चाची चीलाई और वापिस गुसलखाने में घुस गयी . दरअसल ये सब अचानक इतनी जल्दी हो गया की हम दोनों ही कुछ ना कर सके सिवाय शर्मिंदा होने के .

“मेरे कपडे , दो ” चाची ने अपना हाथ हलके से बाहर निकाल कर कहा .

“जी ” मैंने धीरे से कहा और पास टंगे घाघरा चोली चाची को दिए. कुछ देर बाद वो बाहर आई.

मैं- माफ़ करना चाची मुझे मालूम नहीं था आप यहाँ नहा रहे हो

मैंने नजरे नीची किये कहा .

चाची- आज बड़ी उमस है , तो सोचा यही नहा लू , खैर खाना खाया तुमने

चाची ने बात बदलते हुए कहा .

मैंने हाँ में सर हिलाया.

चाची- ठीक है मैं चलती हूँ और तुम भी समय से घर आ जाना .

मैं- साथ ही चलता हूँ

मैंने अपनी साइकिल ली और चाची के साथ पैदल पैदल चल पड़ा. वो मेरे पास पास चल रही थी हवा के उड़ते झोंके उनके बदन की खुशबु मेरे पास ला रहे थे . और कुछ ही देर पहले मैंने उन्हें नग्न देख लिया था .हालाँकि मैंने कभी कुछ गलत नहीं सोचा था उनके बारे में कभी भी पर न जाने क्यों बार बार वो द्रश्य मेरी आँखों के सामने आ रहा था .

“चुप क्यों हो , ” चाची ने कहा .

मैं- मुझे लगता है की हमें साइकिल पर बैठ कर चलना चाहिए , जल्दी पहुँच जायेंगे

चाची- ठीक है पर मुझे गिरा मत देना .

चाची साइकिल की पिछली सीट पर बैठ गयी और मैं पैडल मारने लगा.

चाची- थोडा डर लग रहा है , आदत नहीं है न ऐसे बैठने की , घर में गाड़िया खड़ी है पर तुझे न जाने क्या शौक है इसे ही लिए फिरता रहता है .

“मेरा इस से काम चल जाता है चाची ” मैंने कहा .

कुछ देर बाद हम घर पहुंचे, और मैं सीधा अपने चोबारे में चला गया . मैंने पंखा चलाया और बिस्तर पर पसर गया .

“तो आ गए साहबजादे , ” भाभी ने अन्दर आते हुए कहा.

“आप यहाँ भाभी ” मैंने कहा

भाभी- क्या मैं नहीं आ सकती यहाँ

मैं- ऐसी तो कोई बात नहीं , वो दरअसल आपका ज्यादातर समय रसोई में ही बीतता है न तो थोडा अजीब लगा.

भाभी- क्या करे साहब, अब काम तो करना पड़ेगा न

मैं- माँ और चाची भी तो है वो मदद क्यों नहीं करती, मैं बात करूँगा उनसे

भाभी- नहीं,नहीं, और बताओ तुमने खाना खाया,

मैंने हाँ में सर हिलाया.

भाभी- तुम दोपहर का खाना घर पर क्यों नहीं खाते. मुझे समझ नहीं आता, क्या तुम्हे पसंद नहीं मेरे हाथ का खाना

मैं- ऐसी बात होती तो मैं रात का खाना भी बाहर खाता.

भाभी- तो क्या बात है .

मैं- सच कहूँ तो मुझे ये घर एक कैद लगता है ,वैसे तो मेरे पास सब कुछ है भाभी , किसी चीज़ की कमी नहीं पर न जाने क्यों मेरा मन नहीं लगता यहाँ पर .

भाभी- तुम्हारे भैया बड़ी फ़िक्र करते है तुम्हारी, कभी तुमसे कहते नहीं पर , परवाह करते है वो तुम्हारी .

मैं- जानता हूँ

भाभी- कल क्या तुम मुझे मंदिर ले चलोगे, मेरा व्रत है पूजा करनी है

मैं- हाँ चलेंगे उसमे क्या है . आप का कहा कभी टाला है मैंने

भाभी- मेरा कहा तुम मानते भी कहाँ हो

मैं- ये इल्जाम है मुझ पर आपका

भाभी- तो कबूल करो इस इल्जाम को

मैं- मैं समझ रहा हूँ आप क्या कहना चाहती है

भाभी- जब समझ ही रहे हो तो बता क्यों नहीं देते मुझे की तुम अपने भाई से बात क्यों नहीं करते

मैं- हम इस बारे में बात कर चुके है भाभी, एक नहीं न जाने कितनी बार

भाभी- और हर बार की तरह मैं फिर तुमसे पूछ रही हूँ,

मैं- आप भाई से क्यों नहीं पूछ लेती

भाभी- उनका जवाब भी तुम जैसा ही होता है , तुम दोनों के बीच के खालीपन को ये सारा घर महूसस करता है

मैं- मेरा कोई दोष नहीं इसमें .

भाभी- ठीक है मैं तुम पर जोर नहीं दूंगी .

भाभी ने उठते हुए कहा और चोबारे से बाहर चली गयी . उनके जाने के बाद मैंने तकिये का सहारा लिया और पास रखी किताब को उठा लिया. पर मन नहीं लगा तो मैं भी उठ कर छज्जे पर आया तो देखा आँगन में चाची कुछ कूट रही थी . मुसल चलाते हुए उनकी चूडिया खनक रही थी पर मेरी नजर उनके ब्लाउज से झांकती उनके उभारो की घाटी पर चली गयी और चली ही गयी .


दुधिया गोरी चुचिया जिनकी बस थोड़ी सी ही झलक ने मेरे मन में हलचल मचा दी थी . मेरी आँखों के सामने कुवे वाला वो नजारा आ गया जब मैंने उनको नंगी देखा था . अपने ख्यालो में ज्यादा देर नहीं रह पाया की बाहर से आती गाड़ी के हॉर्न ने मेरा ध्यान खींच लिया. ......
 
#2



मैंने देखा भाई घर लौट आया था और अब मेरा यहाँ रहना मुश्किल था . मैं निचे आया और घर से निकल गया .

“देवर जी चाय ” भाभी आवाज देते रह गयी पर मैंने अनसुना किया और वहां से दूर हो गया . ये जानते हुए भी मैं इस घर से दूर नहीं भाग सकता हार कर मुझे यही लौटना होता है , फिर भी मैं भागता था .आज का दिन बड़ा बेचैनी भरा था . मेरे मन में बार बार चाची की तस्वीर आ रही थी . न चाहते हुए भी मेरा ध्यान बस उस द्रश्य पर ही जा रहा था . ऐसी बेचैनी मैंने पहले कभी भी महसूस नहीं की थी . अपनी तिश्नगी में भटकते हुए मैं जंगल की तरफ चल दिया.

अपनी साइकिल एक तरफ खड़ी की मैंने और पैदल ही झाडिया पार करते हुए अन्दर की तरफ बढ़ गया . काफी दूर जाने के बाद मैंने देखा एक लड़की , लकडिया काट रही थी . ढलती धुप में पसीने से भीगा उसका लाल हुआ चेहरा , मेरी नजर जो उसके चेहरे पर ठहरी बस ठहर ही गयी . उसने भी मुझे देखा , कुल्हाड़ी चलाते हुए उसके हाथ मुझे देख कर रुक गए.

“सुनो, ” उसने चिल्लाकर मुझसे कहा .

मैं उसके पास गया .

“लकडिया थोड़ी ज्यादा काट ली मैंने क्या तुम उठा कर मेरे सर पर रखवा दोगे ” उसने कहा .

मैं- जी,

वो - बस मेरा काम लगभग हो ही गया है , अच्छा हुआ तुम इस ओर आ निकले , मुझे आसानी हो जाएगी.

वो न जाने क्या बोल रही थी क्या मालूम मेरी नजर उसके चेहरे से हट ही नहीं रही थी , सांवला चेहरा धुप की रंगत में और निखर आया था . मैंने पसीने की कुछ बूंदे उसके लबो पर देखि और न जाने क्यों कलेजे में मैंने जलन सी महसूस की .

“क्या सोच रहे हो , उठाओ इंधन को ” उसकी आवाज जैसे मेरे कानो में शहद सा घोल गयी .

“हाँ, ” मैंने हडबडाते हुए कहा.

उसने अपने सर को बड़ी अदब से थोडा सा झुकाया और मैंने लकडियो का ढेर उसके सर पर रख दिया.

“शुक्रिया, ” उसने हौले से कहा . और आगे बढ़ गयी . मैं बस उसे जाते हुए देखता रहा . जब तक की वो नजरो से लगभग ओझल नहीं हो गयी. तभी न जाने मुझे क्या हुआ मैं दौड़ा उसकी तरफ . उसने मुझे हाँफते हुए देखा .

“क्या मैं ये लकडिया ले चलू, मेरी साइकिल पर रख दो इन्हें ” मैंने साँसों को काबू करते हुए कहा.

उसने एक पल मुझे देखा और बोली- ठीक है .

हम मेरी साइकिल तक आये और मैंने लकडियो का गठर उस पर रख लिया.

“चलो ” उसने कहा

“हाँ, ” मैंने कहा .

जैसा मैंने कहा , आज का दिन बड़ा अजीब था ढलते सूरज की लाली जैसे चारो तरफ बिखर सी गयी थी . वो बेखबर मेरे साथ कदम से कदम मिलाते हुए चल रही थी . हवा बार बार उसकी चुन्नी को सर से हटा रही थी मुझे रश्क होने लगा था उन झोंको से . जी चाह रहा था की उस से बात करूँ, और शायद वो भी किसी उलझन में थी उसकी उंगलिया चुन्नी के किनारे से जो उलझने लगी थी .

“आप रोज यहाँ आती है ” मैंने पूछा

“नहीं तो ” उसने कहा .

उसने एक पल मुझे देखा और बोली- रोज तो नहीं पर तीसरे चौथे दिन आ ही जाती हूँ , बस यही रुक जाओ गाँव शुरू होने वाला है , अब ये लकडिया मुझे दे दो

मैं- मैं ले चलता हूँ न

वो- नहीं गाँव आ गया है ,

मैंने एक पल उसकी आँखों में देखा और जैसा उसने कहा वैसा किया . वो एक बार फिर से आगे बढ़ने लगी. जी तो किया की इसे यही रोक लू पर मेरा क्या बस चले किसी पर बस उसे जाते हुए देखता रहा एक तरफ वो जा रही थी दूसरी तरफ सूरज ढल रहा था .

घर आकर भी मुझे चैन नहीं था मैं चोबारे में गया और अपना डेक चलाया ”तुम्हे देखे मेरी आँखे इसमें क्या मेरी खता है ”

पिछले कुछ बक्त से ऐसा बहुत कम हुआ था की मैंने कोई गाना बजाया हो . मैं बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गया और सांझ की ठंडी हवा को दिल में उतरते महसूस करने लगा.

“वाह क्या बात है , ये शाम और ये गाना, क्या हुआ मेरे देवर को आज तेवर बदले बदले से लगते है ” भाभी ने मेरी तरफ आते हुए कहा .

उन्होंने चाय का कप मुझे पकडाया और पास बैठ गयी .

“कुछ नहीं भाभी , काफी दिनों से इसे देखा नहीं था लगा की कहीं खराब न हो जाये तो बजा लिया. ” मैंने कहा .

भाभी- चलो इसी बहाने तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान तो आई .

मैं- क्या भाभी आप भी .

भाभी- अब तुमसे ही तो मजाक करुँगी, हक़ है हमारा

मैं- सो तो है .

हम बाते कर ही रहे थे की चाची भी ऊपर आ गयी .

“मुझे तुमसे एक काम है , क्या तुम मेरे साथ शहर चलोगे कल ” चाची ने कहा

मैं- नहीं, मुझे अल कुछ काम है आप चाचा के साथ क्यों नहीं जाती

चाची- वो ले जाते ही नहीं , तुम्हे तो पता ही है उनका हिसाब कभी कभी तो लगता है की उनकी बीवी मैं नहीं बल्कि ये निगोड़ी किताबे है , कालेज से आने के बाद भी बस लाइब्रेरी में ही घुसे रहते है कभी कभी सोचती हूँ आग लगा दू इन किताबो को .

भाभी- कर ही दो चाची ये काम

चाची- तू भी छेड़ ले बहुरानी , खैर अकेली चली जाउंगी मैं .

बहुत देर तक हम तीनो बाते करते रहे, रात बस ऐसे ही बीत गयी . सुबह मैं भाभी को लेकर मंदिर की तरफ चला गया . भाभी को मैंने पूजा की थाली दी और अन्दर जाने को भाभी .

“तुम भी चलो साथ ,हमें अच्छा लगेगा ” भाभी ने कहा

मैं- नहीं भाभी मेरा मन नहीं है .



मैं वही सीढियों पर बैठ गया सुबह सुबह का वक्त,और अलसाया मेरा मन पर तभी कुछ ऐसा हुआ की ..................... ....... .
 
#3



इस से बेहतरीन सुबह और भला क्या होती , अचानक ही मेरी नजर उस पर पड़ी. और लगा की दिल साला कहीं ठहर से गया . लहराते आँचल से बेखबर वो दनदनाती हुई हाथो में थाली लिए सीढिया उतर कर मेरी तरफ ही आ रही थी . माथे पर बड़ा सा तिलक , हाथो में खनकती चूडिया . जी करे बस देखता ही रहूँ, और अचानक से ही हमारी नजरे मिली ,हमने इक दुसरे को देखा, मुस्कराहट को छुपाते हुए वो मेरे पास आई और बोली-”हाथ आगे करो ”

मैंने हथेली आगे की .

“ऐसे नहीं दोनों हाथ ” उसने जैसे आदेश दिया.

उसने एक लड्डू मेरे हाथ पर रखा और बोली- तुम यहाँ

मैं- वो भाभी आई है पूजा के लिए तो साथ आना पड़ा

वो- तो अन्दर क्यों नहीं गए.

मैं- अन्दर जाने की क्या जरुरत मुझे अब ,

अचानक ही वो हंस पड़ी .

“अच्छा रहता है यहाँ आना , आया करो ” उसने कहा

मैं- अब तो आना ही पड़ेगा

वो- खैर, मैं चलती हूँ देर हो रही है

मैं- मैं छोड़ दू आपको

वो- अरे नहीं,

उसने मेरी गाड़ी की तरफ देखते हुए कहा .

मैं- मुझे अच्छा लगेगा

वो- पर आदत तो मेरी बिगड़ जाएगी न

बेशक उसने बिना किसी तकल्लुफ के कहा था पर वो बात दिल को छू गयी .

“कुछ चीजों की आदत ठीक रहती है ” मैंने कहा

वो- और बाद में वहीँ आदते जंजाल बन जाती है , खैर फिर मुलाकात होगी अभी जाना होगा मुझे.

इतना कहकर उसने अपना रास्ता पकड़ लिया मैं बस उसे जाते हुए देखता रहा . मुझे लगा वो पलट कर देखेगी पर ऐसा नहीं हुआ. अब और करता भी क्या बस इंतज़ार ही था भाभी के आने का . थोड़ी देर बाद वो भी आ गयी . और हम घर की तरफ चल पड़े.

“क्या बात है देवर जी , चेहरे पर ये मुस्कान कैसी ” भाभी ने कहा

उनकी बात सुनकर मैं थोडा सकपका गया .

“नहीं भाभी कुछ भी तो नहीं ” मैंने कहा

भाभी- कुछ होना था क्या .

उन्होंने हँसते हुए कहा .

मैं- क्या भाभी आप भी , ऐसा करेंगी तो मैं फिर साथ नहीं आऊंगा.

भाभी- अच्छा बाबा,

हंसी ठिठोली करते हुए हम घर पहुंचे . मैंने देखा भाई आँगन में कुर्सी पर बैठा था . मैं उसे नजरंदाज करते हुए चोबारे में जाने लगा.

“छोटे, रुको, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है ” उसने कहा

मैं- पर मुझे कुछ नहीं कहना सुनना

भाई- बस तेरा ये रवैया ही तेरा दुश्मन है , मैं तेरे लिए एक मोटर साईकिल लाया था सोचा तू खुश होगा ,

मैं- मैं अपनी साइकिल से ही खुश हूँ , दूसरी बात मैं अपनी जरूरतों का ध्यान रख सकता हूँ मेरी चादर इतनी ही फैलती है जितनी मेरी औकात है . तीसरी बात मैं नहीं चाहता की हमारी वजह से इस घर की शान्ति भंग हो तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो .

“भाई हो तुम दोनों भाई एक दुसरे पर जान छिडकते है और तुम दोनों हो की जब भी एक दुसरे से बात करते हो , कलेश ही करते हो , आखिर क्या मन मुटाव है तुम्हारे बीच बताते तो भी नहीं . ” माँ ने हमारे बेच आते हुए कहा .

“भाइयो में कैसी नाराजगी माँ, छोटा है इसका हक़ है जो चाहे करे ,कोई बात नहीं इसे मोटर सायकल नहीं लेनी तो नहीं लेगा. छोटा है जिस दिन बड़ा होगा समझ जायेगा ” भाई ने माँ से कहा और अपने कमरे में चला गया .

रह गए मैं , माँ और भाभी .

मैं- ऐसे भाई नसीब वालो को मिलते है , इतना चाहता है तुझे कितनी परवाह करता है तेरी और तू है की ऐसा व्यवहार करता है .

मैं-माँ तू चाहे तो मुझे मार ले , पर इस बात को यही पर रहने दे,

माँ- या तो तुम अपने मसले हल कर लो वर्ना मैं तुम्हारे पिताजी को बता दूंगी फिर वो ही सुलटेंगे तुमसे, मेरी तो कोई सुनता ही नहीं है इस घर में .

मैं- ठीक है माँ, मेरी गलती हुई, मैं चलता हूँ

“देवर जी खाना तो खा लो, ” भाभी ने आँखों से मनुहार करते हुए कहा .

मैं- पेट भरा है भाभी , आजकल भूख ज्यदा नहीं लगती मुझे . वहां से मैं सीधा कुवे पर पहुंचा और जोर आजमाइश करने लगा अपने उसी बंजर टुकड़े के साथ , दोपहर फिर न जाने कब शाम हो गयी . दिन पूरा ही ढल गया था की मैंने चाची को आते देखा .

“आज फिर भाई से झगडा किया ” चाची ने मेरे पास बैठते हुए कहा .

मैं- इस बारे में मैं कोई बात नहीं करना चाहता और माँ ने अगर आपको भेजा है तो बेशक चली जाओ

चाची- तुझे क्या लगता है किसी को जरुरत है मुझे तेरे पास भेजने की .थोड़ी देर पहले ही शहर से आई, आते ही मालूम हुआ की सुबह बिना रोटी खाए तू निकला है घर से तो खाना ले आई . देख सब तेरी पसंद का बना है .

मैं- भूख नहीं है

चाची- मुझसे झूठ बोलेगा इतना बड़ा भी नहीं हुआ है तू.

मैं- मेरा वो मतलब नहीं था चाची

चाची- ठीक है , चल मेरे हाथो से खाना खिलाती हूँ , मेरी तसल्ली के लिए ही थोडा सा खा ले .

चाची ने टिफिन खोला और एक निवाला मेरे मुह में दिया . न जाने क्यों मेरी रुलाई छूट पड़ी . और मैं चाची के सीने से लग कर रोने लगा. चाची ने मुझे अपनी बाँहों में ले लिया और मेरी को सहलाने लगी.

“बस हो गया ,अब खाना खा ले तू नहीं खायेगा तो मैं भी नहीं खाने वाली आज रात ” चाची ने कहा .

मैं- खाता हूँ .

खाने के बाद चाची ने बर्तन समेटे और बोली- घर चले.

मैं- मेरा मन नहीं है

चाची- मेरे घर तो चल , वैसे भी प्रोफेसर साहब आज कही बाहर गए है तो अकेले मुझे डर लगेगा.

मैं- माँ है भाभी है तो सही

चाची- तुझे कोई दिक्कत है क्या , वैसे तो मेरी चाची , मेरी चाची करते रहता है और चाची को ही परेशां देख कर अच्छा लगता है तुझे .

मैं- ठीक है चाची ,चलते है .




घर आने के बाद हमने बहुत देर तक बाते की , रात बहुत बीती तो मैं फिर सोने चला गया . न जाने कितनी देर आँख लगी थी की उन अजीब सी आती आवाजो ने मेरी नींद छीन ली. ऐसा लग रहा था की जैसे चुडिया तेजी से खनक रही थी . मैं उठा और उस तरफ गया दरवाजा खुला था और जो मैंने देखा , बस देखता ही रह गया .
 
#4



मैं नहीं जानता था की मेरी तक़दीर मेरे लिए कुछ ऐसा लिख रही है जो नहीं होना था , बल्ब की पीली रौशनी में मैंने देखा चाची बिस्तर पर अकेली , लहंगा पेट तक उठा हुआ, छाती खुली हुई , एक हाथ में वो कोई किताब लिए थी जिसे पढ़ते हुए वो दुसरे हाथ को जोर जोर से हिला रही थी जो उनकी जांघो के बीच था . बेशक कमरे में पंखा पूरी रफ़्तार से चल रहा था पर गर्मी कुछ बढ़ सी गयी हो ऐसा मुझे महसूस हो रहा था . जांघो के बीच वो हाथ अजीब सी हरकते कर रहा था और तब मुझे मालूम हुआ की वो दरअसल वो चाची की उंगलिया थी जो तेजी से उनकी योनी के अन्दर बाहर हो रही थी .

बेशक मैं योनी को ठीक से नहीं देख पा रहा था परन्तु बालो की उस काली घटा को जरुर महसूस कर रहा था , चाची का पूरा ध्यान उस किताब को पढने में था . मेरी साँसे फूलने लगी थी . दो दिन में ये तीसरी बार हुआ था जब मैं चाची के बदन को इस तरह महसूस कर पा रहा था . मैंने अपने सीने पर पसीने की बूंदों को दौड़ते हुए महसूस किया .

ये सब देखने में बड़ा अच्छा लग रहा था पर अचानक से चाची बिस्तर पर गिर गयी . और लम्बी लम्बी साँसे भरने लगी . जैसे की बेहोशी छा गयी हो उनपर, पर फिर वो उठी, अपने ब्लाउज को बंद किया और उस किताब जिसे वो पढ़ रही थी तकिये के निचे रखा और बिस्तर से उठ गयी . मैं तुरंत वहा से हट गया क्योंकी अगर वो मुझे वहां पर देख लेती तो शायद हम दोनों ही शर्मिंदा हो जाते.

सुबह मैं उठा तो चाची ने मुझे चाय पिलाई, ऐसा लग ही नहीं रहा था की रात को यही औरत आधी नंगी होकर कुछ कर रही थी . खैर, मेरे दिमाग में बस यही था की उस किताब को देखूं की चाची क्या पढ़ रही थी , पर अफ़सोस तकिये के निचे अब वो किताब नहीं थी, शायद चाची ने उसे कहीं और रख दिया था .

घर जाते ही मेरा सामना मेरे पिता से हुआ. जो नाश्ता कर रहे थे .उन्होंने मुझे पास रखी कुर्सी पर बैठने को कहा .

“एक ही घर में रहते हुए , हम आपस में मिल नहीं पाते है , थोडा अजीब है न ये ” उन्होंने कहा.

मैं- ऐसी बात नहीं है जी

पिताजी- तुमने मोटर साइकिल लेने से मना कर दिया , गाड़ी तुम्हे नहीं चाहिए , घर वालो से तुम घुल मिल नहीं पाते हो , दोस्त तुम्हारे नहीं है , बेटे हमें तुम्हारी फ़िक्र होती है , कोई समस्या है तो बताओ, हम है तुम्हारे लिए तुम्हारे साथ .

मैं- कोई समस्या नहीं है पिताजी , और मैं बस यही आस पास ही तो आता जाता हूँ, उसके लिए साइकिल ठीक है गाड़ी मोटर की क्या ही जरुरत है .

पिताजी- चलो मान लिया , पर बेटे हमें मालूम हुआ तुम कीचड़ में उतर गए एक बैल गाड़ी को निकालने के लिए, तुम हमारे बेटे हो तुम्हे समझना चाहिए .

मैं- किसी की मदद करना अच्छी बात होती है आप ने ही तो सिखाया है

पिताजी- बेशक हमें दुसरो की मदद करनी चाहिए पर आम लोगो में और हम में थोडा फर्क है , इस बात को तुम्हे समझना होगा . खैर, हम चाहते है की तुम आगे की पढाई करने बम्बई या दिल्ली जाओ .

मैं- क्या जरुरत है पिताजी वहां जाने की जब अपने ही शहर में पढ़ सकता हूँ मैं

पिताजी- हम तुम्हारी राय नहीं पूछ रहे तुम्हे बता रहे है

मैं- मैं नहीं जाऊंगा कही और

ये कहकर मैं उठ गया और आँगन में आ गया . मैंने इस घर को देखा , इसने मुझे देखा और देखते ही रहे . खैर मैंने भाभी के साथ नाश्ता किया और अपनी साइकिल उठा कर बाहर आया ही था की चाची मिल गयी .

चाची- किधर जा रहा है

मैं- और कहा जाना बस उधर ही जहाँ अपना ठिकाना है

चाची- दो मिनट रुक फिर मुझे भी साथ ले चलना

“नहीं खुद ही आना ” मैंने कहा और उन्हें वही छोड़ कर चल दिया. गलियों को पार करते हुए मैं बड़े मैदान की तरफ जा रहा था की तभी मैंने सामने से उसे आते हुए देखा .केसरिया सूट में क्या गजब ही लग रही थी . वो नजदीक आई , उसने मुझे देखा, उसके होंठो पर जो मुस्कान थी उसका रहस्य अजीब लगा . बस हलके से उसकी उडती चुन्नी मुझे छू भर सी गयी और न जाने मुझे क्या हो गया . एक रूमानी अहसास , उसके गीले बालो से आती क्लिनिक प्लस शम्पू की खुशबु मुझे पागल कर गयी .

मैं उस से बात करना चाहता था , पर वो बस आगे बढ़ गयी , हमेशा की तरह उसने पलट कर नहीं देखा, इसके बारे में मालूम करना होगा , दिल ने संदेसा भेजा और मैंने कहा , हाँ जरुर. दिन भर मैं क्रिकेट खेलता रहा पर दिल दिमाग में बस उसका ही अक्स छाया रहा . और फिर कुछ सोचकर मैं जंगल में उस तरफ गया जहाँ पहली बार मैं उस से मिला था .

यकीं मानिए, उस दिन मैंने जाना था की किस्मत भी कोई चीज़ होती है , थोड़ी ही दूर वो मुझे लकडिया काटते हुए दिखी, लगभग दौड़ते हुए मैं उसके पास गया .

“क्या ” उसने मुझे हांफता देख पर पूछा

मैं- आपसे बात करनी थी .

वो-क्या बात करनी है

मैं- वो तो मालूम नहीं जी,

मेरी बात सुनकर उसने कुल्हाड़ी निचे रखी और लगभग हंस ही पड़ी .

“तो क्या मालूम है तुम्हे ” उसने शोखी से पूछा

मैं- पता नहीं जी

वो- चलो, मेरी मदद करो लकडिया काटने में एक से भले दो , अब तुम मिल ही गए हो तो मेरा काम थोडा आसान हो जायेगा.

मैंने कुल्हाड़ी उठाई और लकड़ी काटने लगा. करीब आधे घंटे में ही अच्छा ख़ासा गट्ठर हो गया .

“तुम्हारा मुझसे बार बार यूँ मिलना क्या ये इत्तेफाक है “ उसने पूछा

मैं- आपको क्या लगता है

वो- मुझे क्या लगेगा कुछ भी तो नहीं .

मैंने गट्ठर साइकिल पर रखा और बोला- चले

वो - हाँ, पर उठने दो मुझे जरा

उसने अपना हाथ आगे किया तो मैंने उसे थाम कर उठाया. ये हमारा पहला स्पर्श था.उसको क्या महसूस हुआ वो जाने , पर मैं बिन बादल झूम ही गया था .

“अब छोड़ भी दो न ”
उसने उसी शोखी से कहा तो मैं थोडा लाज्जित हो गया और हम थोड़ी बहुत बाते करते हुए वापिस गाँव की तरफ चल पड़े. पिछली जगह पर हम अलग हुए ही थे की मैंने प्रोफेसर साहब की गाड़ी को खड़े देखा. चाचा की गाडी इस वक्त यहाँ जंगल की तरफ क्या कर रही थी मैं सोचने को मजबूर हो गया . और गाड़ी की तरफ बढ़ गया .
 
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