Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 13 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

Latest Update 🆕 on Page No. 348 👇

Post in thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)'
 
इंडेक्स पूरी तरह अपडेट कर दिया है, अगर किसी का कोई अपडेट रह गया है तोह प्लीज यहाँ से पेज No. देख क पद सकते है



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इंडेक्स 👇



Thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)'
 
अगले अपडेट से...

इस समय अगर गाड़ी की सुनियों पे धियान दिया जाता तोह सायद दिन क 11.55 होने को होंगे, यही इस कामुक दिन का पहला पहर पूरा hi होने वाला था.. और दिन अपने अगले पड़ाव की और आगे बढ़ने लगा था

वैसे अभी क लिए बारिश का हाल कुछ ऐसा था मानो नन्ही नन्ही बंधे हवा से लड़ती हुई फुहार का रूप लेके जमीन को चूमने की कोशिश कर रही थी, पर उनमें इतनी ताक़त कहा जो वो इसमें सफल हो पाती और ऐसे खुशनुमा पर शांत और शाम जैसे मसुआम में दोनों चची भतीजे घर की और कामद बड़ा चुके थे.. पर सवाल यही है की किया मेरी मालती घर पहुंच पाएंगी
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 348

अपडेट #19

सन 🖼️ #03 & सन 🖼️ #04

पहलवान क खेत.. और Maha-Rand 'अवतार'



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सुंदरपुर गाओं क उस सुनसान खंडहर में आज मेरी माँ मालती की कामुक सिसकारियों ने उसे फिर से जीवित कर दिया था और उनकी ये कामुक और हवस क रास में डूबी हुई सिसकारियां निकलने वाला और कोई नहीं अपितु मेरे ताऊ जी का बीटा यानि भाई और मेरी माँ का सागा भतीजा.. सत्यम है

यहाँ तक आप सभी ने पड़ा और आननद लिया

पर अभी भी माँ और सत्यम घर नहीं पहुंचे है, तोह सवाल ये है की किया ये खेल आज क लिए पूरा हो चूका है.. चलिए जानते है

मालती उस अनोखे और अजीब से सपने क कारन अपने जिस्म में एक बार फिर से वही कामुक चीटिया रेंगती हुई महसूस करने लगी थी, पर जैसे तैसे वो अपना काबू बनाये रखने की भरकस कोशिश कर रही थी.. सायद वो नहीं चाहती थी की सत्यम को उसकी योनि की मनोदशा का पता चले इसलिए वो खुद को जितना संभव हो सकता था सामान्य बनाये हुए थी

पर कामुकता की लहर कभी भी किसी क काबू में रहने वाली चीज़ नहीं है, ये तोह इन्शान को अपने साथ बहा ले जाने में यकीन रखती है.. क्यू सही कहा न ?

इस समय अगर गाड़ी की सुनियों पे धियान दिया जाता तोह सायद सुबह क 11.55 होने को होंगे, यही इस कामुक दिन का पहला पहर पूरा hi होने वाला था.. और दिन अपने अगले पड़ाव की और आगे बढ़ने लगा था, वैसे अभी क लिए बारिश का हाल कुछ ऐसा था मानो नन्ही नन्ही बंधे हवा से लड़ती हुई फुहार का रूप लेके जमीन को चूमने की कोशिश कर रही थी, पर उनमें इतनी ताक़त कहा जो वो इसमें सफल हो पाती और ऐसे खुशनुमा पर शाम जैसे मौसम में दोनों चची भतीजे घर की और कदम बड़ा चुके थे.. पर सवाल यही है की किया मेरी मालती घर पहुंच पाएंगी

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(Maa)Maalti और सत्यम उन नन्ही बांधो क बीच अपने घर की और कदम बड़ा चुके थे, यानि सफर की सुरुवात फिर से हो चुकी थी, और जल्दी hi दोनों उस खंडहर को काफी पीछे चोर क गाओं क हरे भरे खेतों क किनारे किनारे उस कच्ची पक्की सड़क पे आगे बढ़ने लगे थे

वही बिना ब्रा क होने क कारन मालती क हलके भीगे हुए ब्लाउज में उसके जामुन जैसे निप्पल्स का आकर साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था

पर किस्मत से अभी तक उन्हें कोई मनुष्य नहीं मिला था.. जो हमारी खूबसूरत मालती को ऐसे अवतार में देख पाटा, पर सवाल ये था की किया घर तक की ये यात्रा इतनी hi सरल होगी

वही सत्यम.. मालती क ठीक बगल में चलते हुए एक बार को मालती क तने हुए निप्पल्स पे अपनी नज़र डालता है और हलके उछलते हुए उसके दूध देख क उसके चेहरे पे एक कामिनी सी मुस्कान खेल जाती है

उसकी आँखों में आयी वो चमक उसकी आँखों क आगे वो दृश्य उत्पन्न करने लगती है जब उसने जान क मालती की ब्रा को वही उस खंडहर में उसी जगह रख दिया था जहा से उसे वो चटाई और लालटेन मिली थी

मानो जैसे वो उस ब्रा क द्वारा उस खंडहर में जाने वाले अगले व्यक्ति को बताना च रहा हो की वो ब्रा इस बात की निशानी है की उसने वह एक औरत को नंगा किया था.. और ये काम उसने तब किया था जब मालती उस अजीब से सपने में खोयी हुई थी

×|× ुपद
एते 19, सन 03 कंटिन्यू.. ×|×

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ऐसी दिन सुंदरपुर गाओं में सुबह क करीब 8.30 पे

“सुबह सुबह कहा चल दिए.. मौसम का हाल तोह देख लीजिये कही जाने से पहले”

अपने पति को सुबह सुबह घर से बहार जाने की तैयारी करते हुए देख, उसकी भरे जिस्म वाली पत्नी उसे टोकते हुए

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“कितनी बार कहा है, जब कही बहार जाने वाला राहु तोह टोका मत करो, पता है न कितना बड़ा अपशगुन होता है”

आदमी जो बहार जाने को पूरी तरह तैयार हो चूका था, वो अपनी पत्नी की बात सुनकर बुरी तरह खिसकिया सा गया था.. और अपने डाट पेस्स्ट हुए अपनी बात कहता है

उसकी पत्नी बुरा सा मुंह बनाते हुए

“अरे मैं तोह बस ये कह रही थी की ऐसे मौसम में बहार जाने की किया hi जरुरत है ?”

आदमी आँगन में एक और पड़े अपने जुटे पेहेनते हुए, जिन्हे देख hi लग रहा था की वो काफी अछि कीमत देके लिए गए होंगे और ऐसे जुटे सुंदरपुर गाओं में हर किसी क पास होना इतना आसान नहीं था

“मंदिर जा रहा हु.. फिर सोच रहा हु वह से खेतों की और नज़र सौधा लूंगा

सुना है वो कामचोर बुद्धा पूरा दिन दारू क ठेके पे पड़ा रहता है, ऐसे तोह वो ठरकी बुद्धा सरे खेत बर्बाद कर देगा.. आज जेक साले की माँ छोड़ता हु"

अपने पति की बात पे उसकी धर्मपत्नी ऐसे है पड़ती है मानो खुद अपने पति की बात पे काटास्का सा कर रही हो

पर उसका पति उसकी और धियान दिए बिना आगे बोलता जाता है.. पर ऐसे जैसे कोई बड़ी रहस्य की बात बोलने जा रहा हो

"उसके बाद हमे ठाकुर साहब क जंगल वाले अड्डे पर भी चलना है.. तैयार रहना”

औरत अपने पति की बात सुनकर है में सर हिलती है पर तभी उसे मंदिर वाली बात याद आ जाती है जिसपे उसे मानो अभी तक यकीन नहीं हो प् रहा था

“वैसे.. आप और मंदिर.. ?”

“दुनिया को दिखाना भी होता है, वर्ण तुम तोह मुझे जानती hi हो..”

आदमी अपनी बात कहते हुए है पड़ता है और जल्दी hi वो घर से बहार निकल चूका था, वही उसकी पत्नी आँगन में hi पड़ी एक चारपाई की और बढ़ती है और अगले hi पल उसपे पूरी तरह पसर सी जाती है और ऊपर आसमान की और देखते हुए

“हम्म.. आज फिर ठाकुर साहब का वही खेल होगा..”

वो औरत लेते लेते ऊपर आसमान की और देखती है जहा बादलों का रंग बदलना सुरु हो चूका था, और ऐसा लग रहा था जैसे काली चाय छाती जा रही हो.. चारपाई पे लेती हुई वो औरत एक लम्बी सांस चोरते हुए

“न जाने आज कौनसा तूफान आने वाला है’

फिर कुछ सोचते हुए वो मन hi मन मुस्कुरा पड़ती है और अपनी ढीली ढली मैक्सी.. जो गाओं में सायद hi कोई दूसरी स्त्री पहनती होगी, उसके ऊपर से hi अपनी योनि क स्तन पे अपनी उँगलियों को रगड़ते हुए

“बाल बहुत बड़े हो गए है.. साफ़ करने होंगे”

इधर उसका पति गाओं क उसी मंदिर की और चल पड़ता है, जहा मालती आगे बाद रही थी और गौरिया वह से वापस लौट रही थी..

इस रहस्मय आदमी को यही चोर क हम वापस मालती और सत्यम क पास लौट चलते है..

×|× अपडेट 19, सन 03 कंटिन्यू.. ×|×

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मालती चलते चलते बार बार अपने पल्लू से अपनी उछलती हुई कठोर चूचियों को छुपाने की कोशिश करती जा रही थी, और उसकी ये म्हणत देख क सत्यम मुस्कुराये जा रहा था

मालती उसे मुस्कुराते हुए देख क शर्मा सी जाती है

“डाट किया निकल रहा है, सब तेरे hi कारन हुआ है”

"एक hi दिन मैं"

और इतना कहते hi सत्यम खिलखिला क है पड़ता है, जिससे मालती पूरी पानी पानी हो जाती है

कुछ पल हसने क बाद सत्यम मालती क बड़े गले से नज़र आती उसकी गहरी चूचियों क बीच की घाटी को देखते हुए

“वैसे एक दिन में इतने बड़े थोड़ी होते है.. ये हाल तोह कुंदन चाचा ने किया होगा न”

मालती को एक पल क लिए समझ नहीं आता, पर तभी उसे एहसास होता है की सत्यम उसकी उछलती hi दूध से भरी चूचियों की और इशारा कर रहा है

“चुप कर बदमाश, वर्ण मार खायेगा”

इस बार मालती ने खुद को संभल लिया था और शरमाते हुए अपनी बात कहती है

सत्यम- (अपना चेहरा हल्का सा पीछे की और करता है और मालती की हिलती हुई कामुक गांड क दर्शन करते हुए कहता है) वैसे ये भी कुंदन चाचा ने hi किया है.. या कोई और…

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मालती बुरी तरह हड़बड़ा सी जाती है और उसकी साँसों में एक तेज़ी सी आने लगती है मानो जैसे उसे दर लग रहा हो.. जैसे किसी चोर को दर लगता है की कही उसकी चोरी पकड़ी न जाये

“पागल.. पागल है किया, कुछ भी बोलता है

सीधे सीधे घर चल.. और अपना मुंह बंद रख”

सत्यम है पड़ता है पर एक पल क लिए उसे मालती क चेहरे पे एक अजीब सा दर नज़र आया था.. जैसे कही कोई राज़ खुल न जाये, सत्यम इस बात पे धियान न देते हुए आगे कहता है

“मेरा मुंह बंद करने का तोह एक hi तरीका है.. आपके होंठ”

सत्यम की बात पे मालती ऐसे शर्मा जाती है जैसे कोई नवयुवती अपने प्रेमी क मज़ाक पे शर्म से लाल हो जाती है

“तुझसे तोह कुछ बोलना hi बेकार है”

पर फिर एक पल क लिए रूकती है और आगे खुद hi बोलती है

“वैसे मेरे होंठों का भी हाल बिगड़ है दिया दुने”

मालती अपनी hi कही बात पे ऐसे शर्मा उठती है जैसे कोई नवी नवेली दुल्हन हो.. और ये कहते हुए वो एक पल क लिए अपने होंठों पे अपनी जीभ घुमा बैठते है.. सायद ये उसने जान क नहीं किया था, ककी कुछ चीज़े प्राकृतिक भी होती है

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पर सत्यम ऐसी बातों में धीरे धीरे काफी निपुड़ होता जाता जा रहा था

“ओह आपको लगा मैंने ऊपर क होंठों की बात कर रहा हु”

मालती अपने माथे पे बल डालते हुए

“फिर…… चुप क मार खायेगा.. कमीना”

मालती एक बार फिर से किसी फूल की तरह शर्मा उठती है, ककी उसकी बात क बीच hi सत्यम ने अपनी आँखों को घूमते हुए उसके पैरों क बीच इशारा कर दिया था

दोनों चची भतीजे यही घर की और आगे बड़े जा रहे थे.. इस बीच कई बार मालती का हाथ सत्यम क हाथों से टकरा जाता और उसके चेहरे पे एक मुस्कान खिल सी उठती, पर इस बीच सत्यम ने कई बार उसका हाथ पकड़ने की भी कोशिश की पर मालती हर बार उसका ये उद्देश्य पूरा नहीं होने देती

ककी वो नहीं चाहती थी की कोई उन दोनों को ऐसे देखे.. और गाओं में तरह तरह की बातें सुरु हो जाये, ककी सुंदरपुर गाओं में खबर आग से ज्यादा तेज़ फैलती है

सत्यम.. मालती क बगल चलते हुए उसे देख देख क मंद मंद मुस्कुराये जा रहा था, वही मालती भी अपने चेहरे से अपनी ख़ुशी और हसी को छुपा नहीं प् रही थी, की तभी एक आवाज़ ने अचानक से मालती को सावधान कर दिया

“अरे भाई.. तू इतनी बारिश में कहा.. और चची आप भी”

पक्के रंग और पूरी तरह से सावला या आसान सब्दो में हलके काले रंग का वो जवान लड़का, इस समय पूरी तरह भीगा हुआ था और उसके जिस्म पे सिर्फ एक पेंट थी और भी पूरी तरह भीगी हुई.. मालती को हैरानी होती है की ऐसी ठण्ड मैं ये यु कैसे घूम सकता है

मालती अपनी सोच से बहार आते हुए, वैसे यु अचानक से उसके रस्ते में यु मिल जाने से थोड़ा दर भी गयी थी और साथ साथ एक पल क लिए उसे वो सपना भी याद आ जाता है जहा उसके सपने में वही लड़का उसकी गांड में अपना मोटा काला लुंड घुसाए हुए वो अनमोल सब्द बोले जा रहा था

"आआआअह्ह्ह्ह... यकीन नहीं होता.. मैं मालती चची को छोड़ रहा हु.. आआह्ह्ह्ह..

यकीन नहीं कर प् रहा हु की मेरा लुंड उनकी गांड की गहराई नाप रहा है”

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मालती को एक पल क लिए तोह ऐसा लगा जैसे ये सब्द उसके सपने में नहीं अपितु उसके सामने खड़ा वही सपनो वाला लड़का झींगुर उससे बोल रहा हो, और ये कल्पना मात्र क कारन.. मालती की पहले से hi गीली योनि में अजीब सा उन्माद भर देता है.. पर मालती अपनी ेसिथि और अपनी भावनाओ को सँभालते हुए

“झींगुर बीटा.. यु इतनी ठण्ड मैंने ऐसे, अरे बीमार पद जाओगे”

झींगुर अपनी आँखों में दुनिया भर की निशारा और दुःख भरते हुए

“किया करू चची.. मुझ अनाथ को सही गलत समझने वाला कोई है hi नहीं.. मेरी किस्मत मोनू जैसी कहा


काश आप मेरी भी माँ होती”

झींगुर क ये सब्द मालती क दिल की गहराई तक उतारते चले जाते है, और वो सोचने पे मजबूर हो जाती है की बेचारे ने बचपन से अब तक कितने hi दुःख सही होंगे.. बिन माँ बाप क जीवन भी कोई जीवन है

आखिर मालती में कामुकता कितनी भी हो, पर वो एक ममता से भरी हुई माँ भी है, और सत्यम क उस दोस्त झींगुर क उन सब्दो में उसके अंदर की ममता को पुखर लिया था

मालती- (अपने स्वर में ममता की चासनी घोलती हुई) अरे मैं भी तोह तेरी माँ जैसी hi हु.. और इसीलिए कह रही हु, ऐसे नहीं घूमना चाहिए बीमार पद जायेगा

वही उनके पास खड़ा सत्यम दोनों की बातों को सुनकर मन hi मन मुस्कुरा रहा था, खास करके झींगुर का नाटक देख क

‘बहनचोद का नाटक तोह देखो, पक्का मादरचोद नदी में नहाने गया होगा.. साला समझ hi नहीं आता की ठण्ड हो या गर्मी ये साला नदी में नहाने से बाज क्यू नहीं आता’

झींगुर- (मुस्कुराते हुए) जी चची.. अब आपने माँ की तरह समझाया है न, देखिएगा आगे से ऐसा hi होगा

वही झींगुर क ये सब्द सुनकर सत्यम मन hi मन है पड़ता है और हस्ते हुए खुद से कहता है

‘साल नौटंकी’

झींगुर- (जैसे उसे कुछ याद आया हो) अरे है.. आप दोनों ऐसे भीगे हुए…..

वो अपनी बात कह hi रहा था की अचानक उसके निकलते हुए सब्द उसके मुंह की गहराई में hi दफ़न होने लगते है ककी तभी एक ठंडी हवा क झोंके क कारन मालती का पल्लू उसके सरीर का साथ चोर देता है और उसके भीगे हुए ब्लाउज से नज़र आते उसके जामुन जैसे काले निप्पल्स ब्लाउज क ऊपर से झींगुर को दिख जाते है

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ऐसे ठण्ड में भी झींगुर अपना थूक गटकने पे मजबूर हो जाता है, और उस पल तक मालती क ब्लाउज से दर्शन देते उसके नुकीली निप्पल्स को देखता रहता है जब तक मालती जल्दी से अपने पल्लू से अपनी लाज को छुपा नहीं लेती

मालती बुरी तरह सकपणा गयी थी ककी वो जान चुकी थी की झींगुर को किया दिख गया है.. उसके मन में कई बातें एक साथ आने लगती है

'न जाने झींगुर अब किया सोचेगा.. पर में किया करती मेरी ब्रा वह मिली hi नहीं थी, न जाने अचानक से कहा गायब हो गयी थी

जरूर अब झींगुर मुझे लेके कुछ गलत hi सोचेगा, बेचारे कितना ाचा बचा है और मेरी एक गलती की वजह से न जाने आज क बाद मुझे लेके किया सोच होगी उसकी’

पर मालती की उधेरबुन से बहार निकलने का काम सत्यम करता है, वैसे इतनी दिएर में ये पहली बार था जब वो कुछ बोलै था

“कुछ नहीं यार.. वो मंदिर गए थे, चची ने मोनू क स्वस्थ क लिए मन्नत मांगी थी की वो उसके ठीक होने क बाद मंदिर वाले तालाब में डुबकी लगाएंगी”


मालती ने जैसे hi सत्यम क ये सब्द सुने उसकी जान में जान आ गयी और धीरे से सत्यम की और देखते हुए उसे मन hi मन धन्यवाद् कहने लगी, वही सत्यम धीरे से झींगुर की नज़रों से बचते हुए मालती को देख क आँख मार देता है.. जिससे मालती की हसी फुट पड़ती है

“कमीना..”

झींगुर- कुछ कहा किया चची.. ?

मालती- (इस्तिथि को सँभालते हुए) अरे नहीं नहीं.. बीटा वो.. मैं कह रही थी, ऐसी हालत में बहार मत घूम ठण्ड लग जाएगी, जा जल्दी से घर जा…. है.. वो जा.. घर.. घर जा

मालती क ये अंतिम सब्द इसलिए बिखरने लगे रहे थे ककी वो अपनी बात कह hi रही थी की तभी अनायास hi उसकी घूमती हुई नज़र झींगुर की एकलौती पेंट पे पहुंच जाती है जहा उसे उसके पैरों क बीच एक तेज़ हलचल नज़र आयी थी, पर जल्दी hi मालती अपना काबू वापस प् लेती है

पर उसके मन में एक बात जरूर आयी थी

‘किया इस हलचल का कारन में हु..’

झींगुर- (मालती क पल्लू क ऊपर से hi उसके काले निप्पल्स को देखने की कोशिश करते हुए) वैसे आप दोनों भी पुरे भीगे हुए है.. ऐसे तोह आप दोनों भी बीमार पद जायेंगे, क्यू न आप दोनों यही पास में मेरे घर चले

फिर झींगुर मालती को ऊपर से नीचे तक देखते हुए

“मैं वह आपकी गर्मी का प्रबंद कर दूंगा… मेरा मतलब की आप दोनों क लिए”

इन कुछ पलों में आये बदलाव क कारन जो ममता कुछ समय पहले मालती क अंदर आयी थी वो कही खो सी गयी थी, या सायद खुद मालती को अब उस ममता का एहसास नहीं हो रहा था

झींगुर की बात पे सत्यम तुरंत बोल पड़ता है

“तू चची की फ़िक्र मत कर.. ककी मेरे होते हुए मैं कभी भी इन्हे ठंडा नहीं होने दूंगा.. मेरा मतलब की ठण्ड नहीं लगने दूंगा”

सत्यम एक पल क लिए रुकता है और फिर मालती की और देख क मुस्कुरा क कहता है

“क्यू चची है न…”

मालती बुरी तरह दर जाती है की ये सत्यम ने किया बोल दिया है, कही झींगुर को सब पता चल गया था.. उसका सरीर धीरे धीरे कांपने लगा था और ये कंपकपी ठण्ड क कारन नहीं थी, वही सत्यम पूरी तरह बेफिक्र था

मालती क इस दर का कारन झींगुर की उस गीली पेंट में लगातार दीखते हुए उछाल क कारन भी था.. और वो अचे से जानती है ऐसी इस्थिति में मनुष्य का दिमाग किस प्रकार चलता है

झींगुर- (कुछ सोचते हुए) साले तू कोनसा आग की भट्टी है जो चची को तेरे रहते ठण्ड नहीं लगेगी

सत्यम- (मुस्कुराते हुए) अरे तुझे नहीं पता, ये तोह सिर्फ मालती चची जानती है.. की मेरे अंदर कितनी आग है

मालती का पूरा सरीर दर और शर्म से लाल पड़ता जा रहा था, उसे दर लगने लगा था की कही झींगुर को सब पता न चल जाए.. वही मालती की मनोदश को सत्यम भी अचे से समझ प् रहत था पर उसे इसमें मज़ा आने लगा था, उसे ऐसा लग रहा था जैसे आज सही मायने में उसकी जीत हो रही हो

पर किस चीज़ की जीत ये उसे खुद भी नहीं पता था

मालती- (अपनी कांपती हुई आवाज़ में) हमे.. हमे अब चलना चाहिए.. क्यू है न.. सत्यम बीटा

पर आगे झींगुर बोल पड़ता है, ककी सत्यम की बातें और यु मालती क चेहरा का बदलता हुआ रंग उसके मन में कुछ सनका पैदा कर रहा था

“साफ़ साफ़ बोल न सत्यम.. मुझसे किया बातें घूमना, क्यू है न चची..”

झींगुर मालती की और देखते हुए जब ये बात कहता है तोह एक पल क लिए मालती को ऐसा लगता है मानो उसकी सांस रुकने लगी थी और दर क कारन उसका जिस्म पहले से ज्यादा कांपना सुरु हो चूका था

मालती बस ‘है’ में अपना सर हिला क रह जाती है.. वो मन hi मन यही प्रार्थना कर रही थी की कही सत्यम सच न बोल दे, और अगर ऐसा हुआ तोह वो कही की नहीं रहेगी

सत्यम मालती की और देखते हुए मन hi मन हस्ते हुए

“बता दू चची.. की आपको कैसे गर्मी दी है”

मालती क पास और कोई रास्ता नहीं था, उसका सर है में हिलता चला जाता है.. पर उसके अंदर एक तूफान उठ रहा था और उसका दिल जोरो से धक् धक् का स्वर उप्तन्न कर रहा था

सत्यम- (मुस्कुराते हुए) अरे वो मंदिर क पास आज कुछ लोग आग जला क बैठे थे.. तोह हम वही रुक गए थे, बड़ी गर्मी थी उस आग में.. है न चची

सत्यम क ये सब्द मालती क अंदर मानो पुनः जीवन का संचार करते है, और उसकी रूकती हुई साँसे फिर से चल पड़ती है

“है… है.. वो.. सही कहा बीटा.. सही.. सही कहा..”

झींगुर एक पल क लिए मालती को देखता है और फिर सत्यम क चेहरे की तरह.. और मन hi मन खुद से कहता है

‘कुछ तोह बात है.. अगर किसी तरह सचाई पता चल जाये तोह मेरा काम भी बन सकता है, कोई जुगाड़ बिठाना पड़ेगा’

सत्यम- चल भाई.. तू भी निकल वर्ण ऐसा नंगा पुंगा घूमेगा तोह तेरी कुल्फी जैम जाएगी

झींगुर है पड़ता है और साथ hi साथ मालती क चेहरे पे भी बड़ी दिएर बाद हसी दिखी थी

झींगुर- (मालती को देखते हुए) आशा करता हु आपसे फिर मिलूंगा

और ये कहते हुए वो मुस्कुरा क नमस्ते करता है और आगे बाद जाता है, मालती पीछे मुद क झींगुर को तब तक देखती रहती है जब तक वो उसकी आँखों से ओझल नहीं होने लगता है

सत्यम- अरे वो चला गया.. अब हम भी चले

मालती जैसे hi ये सब्द सुनती है, वो ग़ुस्से से भर उठती है

“दिमाग ख़राब हो गया था तेरा किया.. किया बकवास किये जा रहा था, अगर उसे जरा भी कुछ पता चल जाता तोह पता है मेरा किया होता

कही मुंह दिखने लायक नहीं रह जाती”

मालती ग़ुस्से से पूरी लाल हो जाती है

सत्यम मुस्कुराते हुए

“अरे मेरी रैंड तोह जरा सी बात पे ग़ुस्सा हो गयी”

मालती मानो ग़ुस्से से पहात पड़ती है

“मुंह तोड़ दूंगी.. अगर आज क बाद तूने मुझे रैंड कहा”

सत्यम एक पल क लिए हैरान रह जाता है पर अगले hi पल वो अपने दोनों कानो को पकड़ क वही बीच रस्ते पे उस कच्ची सड़क पे उठा बैठी करने लगता है

“ाचा बाबा गलती हो गयी.. 1.. 2..3…”

सत्यम की ऐसी बचकानी हरकत पे मालती की हसी फुट पड़ती है, और एक hi पल में उसका ग़ुस्सा न जाने कहा हवा हो जाता है

मालती- (हस्ते हुए) बंद कर ये नाटक.. जान निकल दी थी मेरी, चुपचापप घर चल

और ये कहते हुए खुद hi आगे बाद चलती है, वही उसके आएगी बढ़ते hi सत्यम सीधा खड़ा होता और मालती को देख क मन hi मन हस्ते हुए धीर से खुद से कहता है

“मेरी रंडी, और मुझि से मियॉं.. तुझे तोह तेरी औकात दिखानी पड़ेगी, रुक साली अभी बताता हु तुझे की तेरी औकात किया है”

सत्यम क चेहरे क भाव अब हर पल बदल रहे थे, उसके अंदर की मासूमियत मानो पूरी तरह ख़तम हो चुकी थी.. उसने ये सारा नाटक किया ताकि वो अपना अगला डाव खेल सके, वैसे तोह वो कसम की बात भी याद दिला सकता था पर अभी वो अपना तरीका चुनना पसंद कर रहा था

सायद वो देखना च रहा था.. बिना उस कसम क वो मालती को कहा तक ले जा सकता है..

इस समय तक दिन क 12.05 हो चुके थे और अभी घर का ये सफर काफी लम्बा था.. अगले 5-6 मं पूरी शांति से ये सफर चलता रहता है, पर सत्यम ने अब ऐसी सफर में अपना अगला खेल खेलने का फैसला ले लिया था.. पर वो ये भी जनता था ये सब उसे जल्दी hi करना होगा

सत्यम तेज़ी से चलते हुए मालती क आगे निकल जाता है, पर जैसे hi वो मालती क पास से गुजरता है दोनों हाथों से अपना कान पकड़ क माफ़ी मांग लेता है.. जिससे मालती क चेहरे पे मुस्कान फिर से लौट आती है

×|× अपडेट 19, सन 03 कंटिन्यू.. ×|×


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यहाँ से कहानी माँ यानि मालती की जुबानी 👇👇

सत्यम अब मेरे आगे आगे चल रहा था, मानो उसे मेरे ग़ुस्से से दर लग रहा हो, और ये सोच क में मुस्कुरा रही थी.. पर सच इस समय मुझे कहा पता है

मैं अब धीरे धीरे सत्यम क पीछे पीछे चली जा रही थी, वही उस खंडहर में जो हुवा उस बारे में सोच क मेरे चेहरे की लाली और शर्म की मिली जुली ख़ुशी हैट hi नहीं रही थी.. अभी अभी जो दर मैंने महसूस किया था उसपे उस खंडहर वाले आनंद ने पूरी तरह काबू प् लिया था

की तभी सत्यम पीछे मुड़ता है और मोनी की माँ यानि मुझे देख क मुस्कुराते हुए कहता है

"किया हुआ जानेमन.. जल्दी जल्दी चलो न वर्ण फिर से बारिश होने लगेगी"

सत्यम की इस बात और एक बार फिर से उसके कमीनेपन पे मुझे हसी आ गयी थी.. वही उसने ये बात हस्ते हुए पहले मुझे और फिर ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए कही थी जो सच में एक बार फिर से काले और भरी होने लगे थे

मैं सत्यम की मुस्कान का मतलब भली भांति समझ रही थी इसलिए शर्माने क अलावा कुछ नहीं कर सकती थी.. और धीरे धीरे अपनी चल में तेज़ी लाते हुए जल्दी hi सत्यम क करीब से होते हुए उसे देख क मुस्कुराती हुई उसके आगे निकल जाती हु, मानो मैं उसे अपनी खूबसूरत मुस्कान से छैर रही हु

पर जैसे hi मैं उसके कुछ कदम hi आगे आयी थी की मुझे कुछ सुनाई पड़ता है

"आआअह्ह्ह्हह... उफ्फ्फ्फ़ किया हिलती हुई गांड है.. चची"

मैं शर्म से लाल हो जाती हु और पीछे नहीं देख पाती ककी ऐसा करती तोह मेरी नज़रें यक़ीनन एक बार फिर से मेरे बेटे की उम्र क सत्यम से जरूर टकराती..

उसी सत्यम से जो मेरा भतीजा भी था और आज थोड़ी दिएर पहले hi उसने मुझे उस खली और पुराने खंडहर में 1 नहीं बल्कि 2 बार पूरी सिद्दत से रगड़ रगड़ क छोड़ा था

मेरी गीली छूट उसका अंदर बहार होता हुआ मोटा काला लुंड और उसका खूबसूरत एहसास लिए हुए थी और ऐसी कारन मेरी योनि से हल्का हल्का कॉमर्स बहने लगा था

मैं सत्यम की बात सुनकर शर्मा जरूर गयी थी और मेरे खूबसूरत चेहरे ने शर्म की परत सी ओढ़ ली थी.. मैं बिना सत्यम की तरफ देखे धीरे से मुस्कुरा क कहती हु

"कमीना.."

की तभी मुझे सत्यम की खिलखिलाहट सुनाई पड़ती है जिसका मतलब उसने मेरी ये बात सुन ली थी, वो तेज़ कदमो से चलते हुए मेरे करीब आके चलना लगता है और न च क भी एक पल क लिए मैं अपना चेहरा घुमा क उसकी तरफ देखती हु तोह खुद hi शर्मा जाती हु.. ककी वो चलते हुए भी मुझे hi देख

मैं इस पल ऐसे शर्मा रही थी जैसे कोई दुल्हन रात भर अपने नए पति से अपनी चुदाई करवाती है और अगली सुबह उससे और उसके परिवार से नज़रें मिलाने से शर्माती है

तभी सत्यम क कुछ सब्द मेरे कानो में पड़ते है

"जानेमन.. ये चूचिया इतनी ज्यादा क्यू हिल रही है, मुझे लगता है ये मुझसे कुछ कहना च रही है"

ये सब्द जैसे hi मेरे कानो में पड़ते है मैं शर्म से लाल हो जाती हु और तुरंत hi दूसरी तरफ मुंह गुमा लेती हु पर चेहरे की ख़ुशी मुझसे छुपाई नहीं जाती, वैसे सत्यम क मुख से यु जानेमन और प्रेम भरे सब्द मुझे और ज्यादा पागल कर रहे थे.. मैं अभी सोच hi रही की किया जवाब दू की तभी मुझे मेरी एक मोती पपीते सामान चुकी पे हाथ का एहसास होता है और इससे पहले की मैं कोई प्रतिक्रिया दे पाती वो हाथ मेरी उस मसली गयी चुकी को फिर से मसल देते है

मैं- (कामुकता से सिसकारी भरते हुए) आआअह्हह्ह्ह्ह.. किया कर रहह है... ेस्शह्ह्हह्ह.. कोई देख लेगा

मेरे मन करने पे भी सत्यम मंटा नहीं और मेरी चुकी पे अपने हाथ का पूरा पंजा रख क उसे जोर से दबा देता है

सत्यम- (मेरी खूबसूरत चुकी को मेरे ब्लाउज क ऊपर से hi जोर से दबाते हुए) आआअह्ह्ह्ह.. मेरी फानन बताओ न ये इतनी हिल क्यू रही है ?

मैं उसकी तरफ ग़ुस्से से देखती हु पर अगले hi पल खुद hi शर्मा जाती हु और जल्दी से उसका हाथ अपनी कोमल और दूध से भरी हुई चुकी से हटा देती हु और ग़ुस्से का झूठा नाटक करती हुई कहती हु

"बदमाश.. मार खायेगा मुझे, किसी ने देख लिया तोह ?"

सत्यम जैसा लड़का इतनी आसानी से किसी औरत का चक्कर चोर दे ऐसा तोह संभव hi नहीं हो सकता, मैं जैसे hi अपनी चुकी से उसका हाथ जातक्ति हु वो टपक से अपना हाथ मेरे पीछे ले जेक मेरे एक उन्नत और कठोर चूतड़ को अपनी मुठी मेरिन दबोच लेता है.. पर इससे पहले की मैं संभल पाती वो अचानक से मेरी साड़ी क पीछे अपने हाथ की एक ऊँगली मेरी गांड की कोमल दरार में घुसा देता है

"आआआह्ह्ह्ह...... Maaaaaaaaaaaaa.... किया कर रहा है.... ेस्शह्ह्ह"

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सत्यम की ऊँगली एक पल क लिए मेरी गांड क गुलाबी छेद तक पहुंच गयी थी.. जिससे मेरे पुरे सरीर में अजीब सी गुदगुदी भर गयी थी

मैं यु खुले में अपने भतीजे क जरिये होती चेरखनि से एक बार फिर से अपने अंदर गर्मी का तामपमान बढ़ता हुआ महसूस कर प् रही थी

सत्यम- (मेरे झूठा विरोध देख क हस्ते हुए) आआह्ह्ह चची आपकी गांड तोह सच में बहुत कासी है, लगता है बहुत माल भरा है इसमें

और वो एक बार फिर से मेरी गांड पे अपना हाथ रख क उसे साड़ी क ऊपर से hi सहलाने लगता है

इस बार न जाने मुझे किया होता है मैं उसका हाथ हटाने की जरा की कोशिश नहीं करती पर चारो तरफ देख जरूर रही थी की कही को हम चची भतीजे को यु ऐसी रासलीला करते हुए पकड़ न ले

"है बहुत माल बारे है, टट्टी कहते है उसे टट्टी.. खाएगा"

मैं ये बात कह तोह देती हु पर अगले hi पल खुद hi जोरो से है पड़ती हु, मुझे पता नहीं किया हो गया था जो ऐसी बात बोल दी मैंने

पर सत्यम इस मोके का पूर्ण फायदा उठाने से नहीं चुकता

"आपकी तोह टट्टी का भी स्वाद होगा, कहो तोह अभी यही खा क दिखा दू"

सत्यम की ऐसी बात की मैंने तनिक भी कल्पना नहीं की थी, मैं उसे घर क देखती हु तोह वो बस मुस्कुरा पड़ता है और अपना जो हाथ उसने मेरी कोमल और कासी गांड पे रखा हुआ था उसकी एक ऊँगली मेरी साड़ी क ऊपर से hi मेरी गांड की मासूम दादर में फिर से घुसा देता है.. वैसे तोह मैंने साड़ी और फिर पेंटी पहनी हुई थी इसलिए वो अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पात पर उसने ये काम इतनी ताक़त से किया था की एक पल क लिए मुझे लगा की उसकी ऊँगली सच में मेरी साड़ी पहाड़ क मेरी गांड की गहराई तक उतर जाएगी

मैं उसकी इस हरकत की वजह से लगभग अपने पेअर क पंजो पे उछाल hi पड़ती थी और कुछ कदम आगे बाद गयी थी, जिससे मेरी गांड से उसके हाथों की पकड़ भी छूट गयी थी, मैं उसे देख क ग़ुस्सा करने की पूरी कोशिश करते हुए कहती हु

"थप्पड़ पड़ेगा, कमीना कुछ भी करता है.. अरे फिर से"

अभी मैं सत्यम को डाटने की चैस्ता hi कर रही थी की एक बार फिर से बारिश ने झमझम करते हुए अचानक से बरसना सुरु कर दिया, और इस बार तोह अस्स पास कोई ऐसी जगह भी नहीं थी की हम चुप सकते.. मैं मायुशि से सत्यम को देखती हु मानो उससे कह रही हु की

'अब तोह पक्का भीग जायेंगे'

पर सत्यम क चेहरे पे एक अलग hi मुकसान खेल रही थी जिसे देख क मैं शर्म से इतनी लाल हो जाती हु की अपना चेहरा नीचे झुका क अपने पंजो को देखने लगती हु और किसी नव युवती जैसे अपने पेअर को मिटटी पे मरने लगती हु

"ऐसे किया देख रहा है.. अब तोह हम भीग जायेंगे"

सत्यम मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर मेरे हाथ पकड़ लेता हुआ और मेरी आँखों में देखते हुए कहता है

"लगता है फिर से खंडहर जैसा कुछ ढूँढना पड़ेगा"

सत्यम की ये बात सीधा मेरे दिल की गहराई में उतर जाती है और मारे शर्म क जो नज़रें अभी अभी ऊपर उठी थी वो एक बार फिर से नीचे झुक जाती है, पर इस पूरी प्रक्रिया में मेरी नज़रें एक बार को सत्यम क लोअर से जरूर टकराती है जहा मैंने एक बड़ा सा बना हुआ तम्बू देख क समझ जाती हु की मेरा जवान भतीजा मेरे जवानी लूटने क लिए के बार फिर से तैयार हो रहा है

"नहीं....."

मैं सत्यम की बात सुनकर मुख से नहीं तोह कह रही थी, पर मुझे पता नहीं था की मेरा सर है में हिल रहा है.. ये कैसी अजीब परिस्थति है मेरे जिस्म की

वैसे आगे बढ़ने से पहले मैं आपको अपने जिस्म की मनोदशा जरूर बताना चाहूंगी, मेरा हाल इस समय ऐसा hi की जिस पल सत्यम ने मेरी चूचियों क हिलने की बात कही थी उसी पल से मेरे योनि से कॉमर्स और ज्यादा टपकना सुरु हो गया था, और ऐसा उस हालत में हो रहा है जब अभी से थोड़ी hi दिएर पहले उसने उस खंडहर में तेज़ बारिश क दौरान मेरी दुमदार चुदाई करि है.. जिस कारणवस मेरी चाल में भी बदलाव साफ़ साफ़ देखा जा सकता है

और इतनी जल्दी एक बार फिर से मेरा जिस्म जो एक जवान लड़का बना चुकी है अपनी छूट से.. वो फिर से कुछ वैसा hi मांगने लगी थी

वही जब मेरे भतीजे ने मेरी गांड को अपनी मुठी में दबोचा उसी पल से मेरे निप्पल्स में कड़कपन आना सुरु हो गया था और अब तोह हाल ऐसा था की मेरे तने हुए निप्पल्स इस सुरु हो चुकी बारिश में अपनी hi जेठानी क लड़के को ग्रीन सिंगल दे रहे थे

यानि मेरे बिना ब्रा वाले ब्लाउज क ऊपर से वो पूरी तरफ मालूम पद रहे थे, कोई भी इस पल ऐसे मुझे देखता तोह वो तुरंत समझ जाता की मैंने ब्लाउज क नीचे ब्रा नहीं पहनी हुई है.. वैसे झींगुर सब समझ भी चूका होगा

अब आपको याद दिलाने की जरुरत तोह है नहीं की मेरी ब्रा कहा रह गयी है, और अगर कोई गलती से भूल गया तोह कृपया वापस जाइए और मेरे पिछले अपडेट पढ़िए.. वर्ण आगे जो होने वाला है उसका आनंद नहीं ले पाएंगे

चलिए वापस वही आते है जहा मेरे भतीजे सत्यम ने मेरा हाथ पकड़ क मुझे एक तरफ लेके चलना सुरु कर दिया, वैसे अभी तक हम सीधा रस्ते पे hi चल रहे थे जो कभी कच्चा तोह कभी पक्का था.. कही सड़क तोह कही खड़ंजा लगा हुआ था

वही सड़क क दोनों और घनी और बड़ी बड़ी झाडिया उघि हुई थी और साथ hi बड़े बड़े हरे भरे पेड लगे हुए थे, जिनसे आती ठंडी हवा हमारे जिस्म को पूरी तरह खुस कर रही थी

मंदिर से वापस आते हुए इस रस्ते पे अभी तक किया किया हुआ ये तोह आप पद hi चुके है, वैसे अभी तक हम मंदिर से घर जाने वाले सीधे रस्ते पे hi थे.. पर अब सत्यम मुझे लगभग खींचता हुआ एक गाओं की पतली पगडण्डी पे ले आया था

वो मेरा हाथ पड़के हुए आगे चल रहा था और मैं चारो तरफ देख क दर रही थी की कही किसी खेत में किसी किशन या काम करने वाले ने मुझे ऐसे अपने भतीजे क साथ जाते हुए देख लिया तोह पुरे गाओं में हमारी बदनामी होने से कोई नहीं रोक सकता था.. पर अभी तक मुझे कोई नज़र नहीं आया था सायद इसलिए ककी सुबह से hi बारिश का मौसम बना हुआ था.. उसपे आज की इस घनघोर बारिश क कारन सायद किसी ने खेतों में आने का सोचा hi नहीं होगा

और अगर कोई आये भी होगा तोह वो इस बारिश क रुकते hi अपने अपने घरों की तरफ चल पड़े होंगे

पर मैं ये बात झूट नहीं कहूँगी.. मुझे जहा इस बात का दर लग रहा था की कही कोई मुझे यु अपने जेठ क लड़के क साथ देख न ले, वही यही बात मुझे न जाने क्यू और ज्यादा गरम कर रही थी

पर दर भी था की कही कोई कुंदन की पत्नी को यु देख न ले.. 😉

मेरी साँसे काफी तेज़ हो चुकी थी और बारिश की हर एक गिरती बून्द मुझे ऐसे मालूम पद रही थी मानो गरम तवे पे कोई पानी का झौंका मार रहा हो.. जैसे उसमें पानी भाप बनकर उड़ता है वैसे hi मुझे अपने जिस्म से कामुकता सी लपटे निकलती हुई महसूस होने लगती थी

मेरी छूट जिसे मेरे भतीजे से जोरदार तरह से छोड़ा था वो एक बार फिर से अपना मुंह खोलने लगी थी.. न जाने पिछले कुछ महीनो में मुझे किया हो गया था, मैं पहले तोह कभी इतनी गरम नहीं होती थी.. फिर अब ऐसा क्यू होने लगा था

मैं अभी भी ऐसी उधेरबुन में फांसी हुई थी की वही मेरा जवान और मजबूत जिस्म वाला बेटे सामान भतीजा मुझे खेचते हुए एक खेत की पतली सी पगडण्डी से होक एक ऐसी जगह ले आया जहा अस्स पास कई पेड थे, यानि अगर कोई दूर से वह देखता तोह उसे सिर्फ वही पेड 🌲 और झाडिया hi नज़र आती.. पर सबसे बड़ी बात थी की वही सामने एक छप्पर जैसा बना हुआ था और उसके नीचे एक तखत पड़ा हुआ था

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ये सारा प्रबंध एक खेत क किनारे बना हुआ था, यानि ये सब इस खेत क मालिक का hi होगा.. अब तक मैं और सत्यम ाचा खासा भीग चुके थे इसलिए हम और विलम्ब न करते हुए जल्दी से उस छप्पर क नीचे आ जाते है, और सत्यम तोह सीधा सीधा उसी तखत पे लेत क लम्बी लम्बी साँसे लेने लगत है उसे ऐसे देख क मुझे हसी आ जाती है ककी थोड़ी दिएर पहले कुछ ऐसे hi मैं भी जोरो से साँसे ले रही थी जब उसका मोटा विकराल लुंड मेरी योनि मैं अंदर बहार घरसँ करते हुए घुस रहा था

मैं वही उसके पास बैठते हुए चारो तरफ देखती हु जहा मुझे दूर दूर तक कोई भी नज़र नहीं आ रहा था

"ये कहा ले आया है.. और किसके खेत है ये ?"

सत्यम मेरी बात सुनकर अपना हाथ उठता है मेरे हाथों को पकड़ क मेरी उँगलियों क बीच अपनी ऊँगली फसा देता है.. उसकी ये हरकत ऐसी थी मानो कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से अटखेलिया कर रहा हो

"पहलवान चाचा क खेत है, पर आप ज्यादा सोचो मत वैसे भी उन्हें तोह बाजार में अपने अनाज वाले काम से फुर्सत नहीं रहती.. ये खेत तोह उनके नौकर देखते है, पर इस समय पक्का वो गाओं क ठेके पे दारू पिके पड़े होंगे"

मैं उसकी इतनी साडी जानकारी पे हैरान भी रहती और कही न कही न कही उसकी ऐसी रोमांचित हरकत पे अंदर तक प्रेम से भर उठती थी उसे मुस्कुराते हुए उसे देख क आँखों से इशारा करते हुए पूछती हु

"पहलवान... वही न..."

सत्यम- बलवान चाचा.. आप सायद मिली नहीं है

मालती दिमाग पे जोर देते हुए

"है मिली तोह नहीं हु.. पर सुना है मोनू क पिताजी ने उन्हें.."

सत्यम- है सुना तोह मैंने भी है.. सच कोण जाने, वैसे भी ये सब मेरे पैदा होने और आपकी शादी क पहले की बातें है

सत्यम अपनी बात कहते हुए मुस्कुरा क मेरा हाथ अपने होंठों क करीब खींच लेता है और पियर से मेरे हाथों को चूमते हुए कहता है

"उम्मम्मम्मम..... आप फर्क न करो पहलवान चाचा मेरे दोस्त जैसे है"

मैंने पहलवान क बारे में सिर्फ सुना था.. कभी मिलना नहीं हुआ, पर जवाब देने क साथ साथ सत्यम ने जो कामुक हरकत की थी मैं उससे पूरी तरह अपने अंदर गरम ऊर्जा का प्रवाह महसूस करने लगती थी

मैं- (मैं अपने चेहरे पे मुस्कान लिए इधर उधर देखते हुए) वो 40-50 साल का आदमी, कबसे तेरा दोस्त हो गया ?

सत्यम मुस्कुरा पड़ता है

"आप ये सब चोरो असली मुद्दे पे आओ"

मैं बिना कुछ बोले बस अपनी आँखों को बड़ा करते हुए उसे देख क इशारा करती है, जिसका मतलब था

'कोनसा असली मुद्दा'

अपडेट 19, सन 03 कम्पलीट ✅

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मेरे इस इशारे पे सत्यम मुस्कुरा उठता है और न जाने क्यू उसे ऐसे हस्ते हुए देख क मैं बुरी तरह एक बार फिर से शर्मा सी जाती हु.. पर इस बार वो मुझे और मौका नहीं देता ककी अगले hi पल उसने मुझे अपने ऊपर खींच लिया था और मैं किसी नव विवाहित युवती जैसे उसके ऊपर गिर जाती हु

अब हालत ऐसी थी की मेरा एक हाथ मेरे जवान भतीजे क मजबूत सीने पे था तोह मेरा दूसरा हाथ उसके हाथों में कैद था, सत्यम मुझे मुस्कुरा क देखते हुए धीरे से कहता है

"चची.. किया आप मेरी रैंड नहीं हो"

पता नहीं क्यू मुझे उसकी बात बुरी नहीं लगती और उसके सीने पे अपना हाथ फिरते हुए धीरे से कहती हु

"माअररर कहेगा"

पर सत्यम सायद और कुछ सोच चूका था वो अपना दूसरा आज़ाद हाथ तुरंत hi मेरे कमर तक ले जाता hi और मुझे अपने ऊपर खींच लेता जिससे अब मैं पूरी तरह उसपे ऊपर लेत चुकी थी और हमारी नज़रें एक दूसरे मैं पूरी तरह खो चुकी थी

सत्यम- (मेरी नशीली और कामुक आँखों में देखते हुए) कहने दो न.. चची

मैं न मैं सर हिलाते हुए कुछ ऐसा कर देती हु जो नहीं करना चाहिए था.. सायद

मुझे न जाने किया होता है और मैं खुद hi आगे बढ़कर अपने होंठों को उसके होंठों से मिला देती हु, अब एक जवान लड़के को इसके आगे बताने की जरुरत नहीं होती की उसे किया करना है


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फिर ये तोह सत्यम है.. मेरे पति क बड़े भाई का लड़का, वो बिना एक भी पल गवाए मेरे होंठों का रसपान करना सुरु कर देता है और साथ hi साथ उसका जो हाथ अब तक मेरी कमर पे था अब वो वह से ऊपर सरकते हुए मेरी गोल और कठोर कासी हुई गांड तक आ चूका था.. जिन्हे उसने बिना किसी देरी क अपने मजबूत हाथ में दबोच लिया और अब वो ऊपर मेरे होंठ चूस रहा था तोह नीचे मेरी गांड का एक पैट यानि मेरे चूतड़ का मंथन कर रहा था

"Ummmmmmmmmmmm... उम्मम्मम्मम्म... ummmmmmmmmmmmm"

सत्यम मेरे चूतड़ को जोर जोर से मसलते हुए मेरे निचले होंठ को जोर जोर से चूसने लगता है.. और मैं भी किसी आवारा हिरणी जैसी अपने सरे संस्कार भूल क उसका साथ देने लगती हु

"उम्मम्मम्मम्मम... उम्मम्मम्मम... उम्मम्मम्मम्म....."

सत्यम अब अपना दूसरा हाथ भी मेरे हाथों से आज़ाद करके उसे मेरे चूतड़ तक ले आता है और अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की वो दोनों हाथों से मेरी गांड को मसलना सुरु कर चूका था

"उम्मम्मम्म... ummmmmmmmmmmmmmmmm.... उम्मम्मम्मम्म"

मैं और सत्यम एक दूसरे मैं बुरी तरह खोये हुए था और बिना दुनिया की परवा किये मैं 38 साल की औरत एक 18 साल क जवान लड़के को अपने होंठों का रास पीला रही थी, वही सत्यम भी अपनी चची को चूसने का कोई भी मौका नहीं चोर रहा था.. वो मेरे निचले होंठ को अपने मुंह मैं भर क उसे ऐसे काटने लगता है जैसे वो मेरे ऊपर क नहीं बल्कि नीचे क होंठ हो

"उम्मम्मम्म.... सल्ल्रररपपपपप.... ummmmmmmmmm...."

अब सत्यम क हाथ धीरे धीरे ऊपर की तरफ सरकने सुर हो चुके थे मैं ये अचे से जानती थी की उसका अगला गंतव्य किया है पर मैं उसे रोकने की कोई भी कोशिश नहीं कर रही थी, पर फिर कुछ ऐसा होता है की मेरी आअह्ह्ह और दर्द क कारन एक हलकी सी कराह एक साथ फुट पड़ती है

होता ऐसा है की सत्यम ने मेरे निचले होंठों को जोर से अपने दाँतों से काट लिया था और साथ hi साथ उसके दोनों हाथ एक बार फिर से मेरी कमर पे जा चुके थे और उसने वह भी मेरी गोरी कमर को कसके जकड क मसल दिया था

'Aaaaaahhhhhhhhhhhh... कामिनी......."

मैं दर्द से बिलख पड़ती हु और जल्दी से उठ क थोड़ा अलग होक बैठ जाती हु पर मेरा कमीना भतीजा वैसे hi लेते लेते हँसा रहता है

"किया हुआ मेरी जान.. और नहीं चुसवाना अपने होंठों को"

सत्यम ने बात कुछ ऐसे अंदाज़ में कही थी मानो मेरी इस्तिथि का मज़ाक उठा रहा हो, जो मुझे ाचा नहीं लगा

मैं- (ग़ुस्से से उसे डटे हुए) कमीने ऐसे कोई करता है किया.. आह्हः देख खून निकल आया

मैं ये कहते हुए जब अपने निचले होंठों को छू क देखती हु तोह पाती हु की उसने इतनी जोर से काटा था की उसने हल्का सा खून निकल आया था

सत्यम- (मेरी बात सुनकर मानो और गरम हो जाता है और अपना लुंड मसाले हुए) आह्ह्ह्हह्ह.. आप होंठों का ये लाल रंग आपको और ज्यादा खूबसूरत बना रहा है

वैसे तोह मैं ग़ुस्से में थी पर फिर भी मुझे उसकी बात पे हसी आ जाती है, और सायद ऐसा इसलिए हुआ था ककी सच में.. मैं अपने अंदर आग बढ़ती हुई महसूस कर रही थी और ऐसा लग रहा था जैसे मैंने जल्दी hi इस आग का कोई इलाज नहीं किया तोह मैं खुद hi जल क राख हो जाउंगी

तभी सत्यम यही लेते लेते अपना हाथ आगे बड़ा क मेरी गोरी कमर पे रख क वह मसलते हुए

"वैसे चची आप मुझे बार बार कमीना कहती हु पर मुझे गाली नहीं देने देती हो, ये तोह गलत है न"

मैं- बड़ा hi अजीब है तू.. तुझे ाचा लगेगा मुझे गाली देके, पागल है किया चची हु तेरी.. माँ सामान हु

सत्यम मेरी बात सुनकर जोर से मेरी कमर को मसल देता है जिससे मेरे पुरे जिस्म में कामुकता की आग लग जाती है, एशिया लगता है मानो मेरे जिस्म से आग की गरम लपटे निकलने लगी हो और जिसकी वजह से मैं खुद hi अंदर अंदर झुलसने लगी थी

सत्यम- किया चची.. पियर मैं इतना तोह चलता है

मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पाती हु, और हस्ते हुए कहती हु

"ाचा तोह तू मुझसे पियर करता है"

सत्यम मेरी खूबसूरत गोरी कमर को मसलते हुए ऐसे मुस्कुराता है मानो मैंने ये बोल क कोई गलती कर दी हो

"क्यू आप नहीं करती किया मुझसे पियर, वैसे लोग उसी का लुंड अपनी छूट में लेते है जिससे प्रेम करते है.. और जो बिना प्रेम क बिना किसी का लुंड खाये उसे पता है न किया कहते है"

सत्यम की बात सुनकर मेरे अंदर की गर्मी बहार भड़क hi पड़ती है और मैं एक गरम और लम्बी सी सांस लेते हुए धीरे से कहती हु

"रैंड"

सत्यम मुस्कुराते हुए मेरी हवस से लाल आँखों को देखते हुए

"तोह आप बताओ आप मुझसे प्रेम करती हो या मेरी...."

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सत्यम इसके आगे नहीं बोलता पर मेरी साँसे जरूर जोरो से भागने लगती थी.. मैं उसकी आँखों मैं देखती जरूर हु पर कोई जवान नहीं देती

सत्यम मुझे देखते हुए धीरे से आगे बोलता है

"अगर आप कुछ नहीं बोलूंगी तोह मैं आपको अपनी..."

वो एक पल क लिए रुकता है और एक पल मेरे लिए कई जानते जैसा था, मेरे साँसे भागने लगती है और बिना ब्रा क ब्लाउज में कैद मेरी बड़ी बड़ी चूचिया जोरो से ऊपर नीचे होने लगती है

सत्यम- (मेरी आंखों मैं देखते हुए) रैंड समझूंगा.. बोलो आप हो न मेरी रैंड.. मेरी पियरी रैंड.. मेरी खूबसूरत रंडी

मेरी साँसे इतनी जोरो से चलने लगती है की कही मैं पागल न हो जाऊ, मुझसे काबू नहीं होता और मैं उसका तना हुआ लुंड उसके लोअर क ऊपर से दबोच लेती हु और उसके दबाते हुए कहती है

"मुझे चची समझ या रंडी.. पर अभी आगे बाद"

मैंने साफ़ साफ़ सब्दो में बोल दिया था की मुझे उसका लुंड चाहिए, न जाने मैं ऐसी कबसे हो गयी हु.. ऐसी तोह नहीं थी मैं

मुझमें न जाने इतनी हिम्मत कैसे आने लगी थी, इससे पहले भी ऐसा hi कुछ अपने खुद क बेटे क साथ किया था और उस दिन मैंने उसका लुंड उसी छूट में प्रवेश करने दिया था जिससे उसे निकला है.. मेरे अंदर अचानक से ये आग कहा से आ गयी

मैं ये सोच hi रही थी की तभी मेरे कानो में मेरे जवान भतीजे की आवाज़ पड़ती है

"तोह चल कुटिया साबित कर की तू मेरी रैंड है"

मैं तोह जैसे हैरान hi रह जाती हु की ये अचानक सत्यम कोनसी भासा बोलने लगा, पर मुझे बुरा क्यू नहीं लगा उल्टा मेरे अंदर एक अजीब सी बैचनी होने लगी.. मानो जैसे मैं अंदर से ये चाहने लगी थी की वो ऐसे hi सब्दो का प्रयोग करे, ऐसी hi भासा बोले

पर मैं अपनी इस ीचा को काबू में रखते हुए

"कमीना.. ये किया बोल रहा है"

अचानक न जाने सत्यम को किया हो जाता है और वो मेरी कमर से अपना हाथ हटते हुए

"ठीक है मुझसे गलती हो गयी.. हमने जो किया वो सब गलत था, मैं आपके आगे हाथ जोड़ क माफ़ी मांगता हुआ मुझे माफ़ कर दीजियेगा मेरे पाप क लिए"

और तुरंत hi उस तख़्त से नीचे उतर जाता है और मेरी तरफ देखते हुए

"चलिए हमे चलना चाहिए"

मैं बस अवाक् उसे देखती रह जाती हु, मेरी गर्मी वैसे hi बढ़कर मुझे पागल बना रही थी उसके इतनी दिएर तक मेरे होंठों को चूसने क बाद, और वो अब ऐसी बात कर रहा था मेरी हालत तोह ऐसी थी की मैं नंगी भी होना च रही थी पर शर्म भी आ रही है

"मैंने ऐसा किया कह दिया.. मैंने तोह बस"

मैं सच में इस पल चुदाई क लिए पागल होती जा रही थी, जहा इससे पहले जब मेरी ऐसी हालत हुई थी तब मैं अपने hi बेटे पे हावी हो गयी थी.. पर सत्यम में न जाने ऐसा किया था ककी उसपे मेरा नहीं मेरे ऊपर उसका प्रभाव दिख रहा था

सत्यम- (मेरे आगे हाथ जोड़ते हुए) नहीं नहीं सब मेरी hi गलती है, चुदाई क लिए लुंड चाहिए होता है उसे छूट की जरुरत थोड़ी होती है.. मैं hi पापी हु सब मेरी hi गलती है

मैं जल्दी से उठकर उसके करीब जब की कोशिश करती हु तोह वो खुद hi कुछ कदम पीछे हैट जाता है जिससे अब वो बारिश में भीगने लगा था

"ग़ुस्सा क्यू हो रहा है.. मैंने तोह ऐसा कुछ कहा भी नहीं, और वह क्यू खड़ा है बीमार हो जायेगा"

मुझे एक पल क लिए रसोई में उस दिन जो हुआ था.. उसी दिन की याद आ जाती है, ककी उसके बाद जब मैं खेत पे गयी थी.. तब भी कुछ ऐसा hi हुआ था

[Jisne ye dono Update nahi pade hai, Kripya wo jarur pade

👉 Part 01, Update 06

Post in thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete'

And 👇 Part 01, Update 21

Post in thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete' ]

सत्यम- नहीं मुझे बीमार होने दीजिये, आपका जो मन करे वो करवाओ.. मेरी कोई ीचा hi नहीं है, जरा सा पियर से रंडी या रैंड किया बोल दिया आप तोह ऐसे नाटक करने लगी जैसे सब मेरी hi गलती है

उसकी बातें सुनकर मुझे बुरा लग रहा था वही मेरा जिस्म अलग hi आग में लग रहा था, पश्चाताप और गर्माहट एक साथ महसूस कर रही थी मैं आज

मैं उसकी तरफ एक कदम बढ़ती हु पर मैं अब भी छप्पर क नीचे hi थी और उसे देखते हुए अपने दोनों कान पकड़ क किसी बची क जैसे विनती करती हु

"ाचा बाबा माफ़ कर दे.. मुझसे गलती हो गयी, अब ग़ुस्सा नहीं करुँगी"

सत्यम मुंह बनाते हुए

"नहीं नहीं चची आप रहने दो, किया फायदा आप मुझे hi विल्लिअन बना दो"

मैं न च क भी ऐसी इस्तिथि में भी फास पड़ती हु और अपने ब्लाउज क पीछे अपना एक हाथ ले जेक उसका एक हक़ खोलती हुए कहती है

"तू कबसे विल्लिअन हो गया, तू तोह मेरा बचा है

और ग़ुस्सा क्यू होता है, अपनी चची की बात मान ले और यहाँ आ जा वर्ण बीमार पद जायेगा"

"नहीं मुझे कुछ नहीं सुन्ना, मेरी बात की कोई परवा hi कहा है किसी को"

सत्यम किसी छोटे बचे जैसे अपनी जिद पे अड़ चूका था.. न जाने किया खेल खेलना च रहा था

वही मैं समझ चुकी थी ये तबतक नहीं मानेगा जब तक मैं इसके हिसाब से न चालू.. और मेरा इतना सोचना था की मेरी छूट मानो अपना कॉमर्स टपका क मेरी बात से अपनी सहमति देती है

मैं मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी चुकी क ऊपर से अपने कैसे और उभरे हुए निप्पल्स पे अपनी ऊँगली चलते हुए

"ाचा ठीक है जो तू चाहेगा वही होगा

अपनी चची को रंडी कहना है न.. तोह बोलै मुझे रंडी.. रैंड.. जो चाहे

बल्कि मैं तोह कहती हु मुझे सिर्फ रंडी मत बोल, अपनी रंडी बना ले.. ऐसे छोड़ जैसे अपनी चची नहीं बल्कि किसी रैंड को छोड़ रहा हो

जो चाहे वो बना ले मुझे.. चाहे रैंड या चाहे अपनी कुटिया"

मेरी बात सुनकर सत्यम मेरी तरफ ऐसे देखता है जैसे उसे अभी भी मेरी बात पे यकीन न हो, इसलिए मैं खुद hi बोलती हु

"अब भी भरोषा नहीं है अपनी चची पे.. ओह माफ़ कर दे अपनी रैंड को"

मैं ये कहते हुए धीरे से अपना निप्पल पकड़ क उसे ब्लाउज क ऊपर से जोर से दबा देती हु.. जिससे खुद मुझे पुरे जिस्म में तीव्र दर्द महसूस होता है

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×|× अपडेट 19, सन 04 कंटिन्यू.. ×|×

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मेरी ऐसी कामुक हरकत देख क सत्यम क चेहरे पे ख़ुशी नज़र आने लगती है, वो अपना लुंड अपने लोअर क ऊपर से hi सहलाने लगता है

"कैसे भरोषा करू.. आप फिर अपनी बात से पलट गयी तोह"

मैं अब भी अपने निप्पल्स को अपनी उँगलियों क बीच लेके उसे धीरे धीरे मसले जा रही थी जिससे मेरी सांसे इतनी गरम हो गयी थी अगर कोई उसके आगे आ जाये तोह जल जायेगा

मैं- (अपने जिस्म की गर्मी से खुद hi जलते हुए) तू जो कहेगा आज तेरी ये रैंड वही करेगी.. अब तोह मान जा

सत्यम कुछ पलों क लिए सोचता है और फिर मुस्कुराते हुए कहता है

"मेरी कसम कहिये, और याद रहे की आपने अगर मेरी झूटी कसम खाई तोह माँ.."

"थप्पड़ मरूंगी अगर आइंदा बेकार की बात करि, पहले hi मेरा एक बचा इतने समय बाद उठा है और तू..

ये सब किया कसम कसम लगा राखी है, पहले भी और अब फिर से..."

सत्यम धीरे से मेरे करीब आता है, वो अब तक काफी भीग चूका था उसके बालों से पानी टपक रहा था.. वो मेरे ठीक सामने खड़े होक मेरे ब्लाउज से नज़र आती मेरी चूचियों की घाटी को देखते हुए कहता है

"बिना कसम खाये मुझे यकीन नहीं होगा"

मैं उसकी तरफ देखती हु और उसकी आँखों मैं देखते हुए कहती हु

"ठीक है.. तोह ले एक बार फिर से सुन

मैं तेरी कसम कहती हु की आज से मैं यानि मालती तेरी चची.."

मैं एक पल क लिए रूकती हु ककी ये बोलते हुए मेरे साँसे जोर पकड़ने लगी थी और मेरी योनि भीगने लगी थी, पर आगे बोलती हु

"तेरी रैंड हु.. अब खुस"

मैं जैसे hi ये बोलती हु सत्यम ललप क मेरे सर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लेता है और बिना कुछ बोले अगले hi पल मेरे होंठों से अपने होंठों को मिला क चूसना सुरु कर देता है

"उम्मम्मम्मम... उम्मम्मम्मम्मम.... Ummmmmmmmmmmmmmmm"


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मेरे अंदर hi गर्मी ऐसे बाधक जाती है मानो किसी ने गरम आग में देसी घी दाल दिया हो, मैं भी अपना एक हाथ नीचे ले जेक उसके लुंड को दबोच लेती हु और उसे उसके लोअर क ऊपर से hi मसलते हुए जोर जोर से मुठ सी मरने लगती हु.. वही सत्यम भी इस खेल में पीछे नहीं था

वो अपने भाई 'मोनू' की माँ की दोनों चूचियों पे एक साथ अपने दोनों हाथों को रखकर उन्हें एक साथ दबाना सुरु कर देता है

अब माहौल कुछ ऐसा था की हम दोनों चची भतीजे एक दूसरे क होंठों का रसपान कर रहे थे, वही मैं उसका मोटा लुंड उसके लोअर क ऊपर से पकड़ क बेहरहमी से दबोच रही थी.. तोह मेरा 18 साल का जवान भतीजा भी मेरी 36डी की मोती मोती चूचियों पे अपने दोनों हाथों को रखे हुए बुरी तरह से मसले जा रहे थे, वो उन्हें ऐसे दबा रहा था मानो उनका दूध निकलने की फ़िराक में हो

हम दोनों hi एक दूसरे में खोये हुए थे वही बारिश पूरी रफ़्तार से बरस रही थी, और मुझे ऐसा लगने लगता है की जल्दी hi मेरी योनि भी अपना पानी बर्षा देगी पर तभी अचानक से सत्यम मेरी दोनों चूचियों पे अपने दोनों हाथों को सीधा करते हुए मुझे पीछे की तरफ दक्का दे देता है.. जिससे मेरा हाथ भी उसके मोठे लुंड से हैट जाता है

सत्यम- (मुझे देख क हस्ते हुए) साली रंडी कुटिया.. अगर तुझे ये लुंड चाहिए तोह पहले साबित करके दिखा की तू मेरी रैंड बनने लायक है

इस समय सत्यम की हरकत की वजह से मैं और ज्यादा बैचेन हो गयी थी ककी इतनी दिएर बाद जेक कुछ ऐसा होने वाला था की मेरी योनि से रास बेहटा पर पता नहीं उसे कैसे पता चला और ठीक उसी पल उसने मुझे खुद से दूर कर दिया.. सच कहु तोह अब मेरी हालत ऐसी थी की मैं उसके लिए कुछ भी करने को तैयार थी, ककी इस समय मुझे किसी भी हालत मैं उसका लुंड चाहिए था

मैं लुंड की भूखी कुटिया इस समय उसका लुंड खाने क लिए कुछ भी करने को तैयार थी

"अब किया बचा है.. मैंने तोह तेरी कसम भी खा ली न"

सत्यम- (मुस्कुराते हुए) तोह उससे किया हुआ, लोग कसम तोह तोड़ भी देते है.. आपको साबित करना होगा की आप मेरी रंडी हो

मैं उसकी आँखों मैं देखते हुए अपने गरम जिस्म की वजह से पूरी तरह पागल हो रही थी

"बता फिर किया करना होगा मुझे"

सत्यम मुस्कुरा क मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए

"रंडी क जिस्म पे कपडे अचे नहीं लगते"

सत्यम ने इतना hi कहा था और मैं समझ गयी थी की वो मुझे इस खुली जगह पे नंगी करना चाहता है.. वैसे और कोई समय होता तोह मैं पक्का उसकी बात से मन कर देती, पर अब मैंने उसकी कसम खा ली थी और एक रैंड का कर्त्तव्य होता है की वो हर बात को माने

मैं उसकी आँखों में देखते हुए अपने पल्लू को पूरी तरह हटा देती हु और बिना किसी विलम्ब क अपने दोनों हाथों को पीछे ले जेक अपने ब्लाउज क हक़ खोल क उसे धीरे से खींचते हुए कहती हु

"तैयार हो जा.. अपने रंडी क जलवे देखने क लिए"

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और ये कहते hi मैं अपना ब्लाउज अपने जिस्म से उतर क वही तख़्त पे फैक देती हु.. और अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की मैं ऊपर से पूरी नंगी हो चुकी हु

पर मैं यही नहीं रूकती और अपने साड़ी को अपनी कमर से निकल क अनपे जेठ क बेटे की आँखों में देखते हुए फिर से कहती हु

"रंडी की छूट देखनी है.. तोह तैयार हो जा"

बस फिर किया था, अगले कुछ hi पलों बाद मेरी साड़ी धीरे धीरे मेरे जिस्म से अलग होती हुई अब वही उसी तखत पे पड़ी हुई थी और मैं सिर्फ एक पेंटी में अपने जवान बेटे समान भतीजे क सामने कड़ी थी

सोच क देखिये एक 38 साल की खूबसूरत औरत एक 18 साल क जवान लड़के क सामने ऊपर से पूरी नंगी सिर्फ एक पेंटी में.. एक खेत पे कड़ी है

सत्यम मुझे ऐसे देख क तड़प पड़ता है और जल्दी से पूरी तरह हड़बड़ा क अपना लुंड अपने लोअर क बहार खींच लेता है.. उसकी ऐसी जल्दबाजी देख क मुझे हसी आ जाती है

सत्यम- (मुझे हस्ते हुए देख क) मादरचोद रंडी साली कुटिया चिनार हस्ती है, चल जल्दी से ये भी उतर

सत्यम ने मुझे एक साथ न जाने कैसी कैसी गन्दी गालियां दे डाली.. जिसे सुनकर मेरी पहले से hi गीली छूट और ज्यादा गीली हो जाती है, और इस बार मैं कोई सिखयात भी नहीं करती बस धीरे से झुक क अपनी पेंटी को अपनी छूट से नीचे सरकते हुए अपने पैरों को उठा क उसे वही उस तखत पे उछाल देती हु.. पर सायद ज्यादा जोर लगा दिया था ककी मेरी पेंटी थोड़ा आगे जेक तखत क दूसरी तरफ खेत की गीली मिटटी में गिर जाती है

ये देख क सत्यम है पड़ता है

"वाह साली चिनार.. अब तोह तू घर बिना ब्रा पेंटी क जाएगी"

बुरा तोह मुझे भी लगा था पर सत्यम की बात पे अपनी हसी भी नहीं रोक पायी थी.. और अब मैं पूरी तरह नंगी सच में एक रंडी जैसे उस 'पहलवान' क खेत पे कड़ी थी

सत्यम अपना बहार निकल चूका लुंड मसलते हुए वापस उसी बिस्तर पे किसी राजा की तरह बैठ जाता है और अब भी अपने लुंड को सहलाये जा रहा था.. वही मैं उसके मोठे विकराल लुंड को किसी हवस की भूखी रंडी की तरह देखे जा रही थी

सत्यम मेरी नज़रों का पता जनता था.. इसलिए वो हस्ते हुए कहता है

"चल साली रैंड, ऐसे hi बारिश में जेक नाहा और अपनी छूट को रगड़ रगड़ क साफ़ कर.. मैं नहीं चाहता फिर से वही छूट छोड़ू जिसमे मेरा hi माल भरा है"

सत्यम का ये आदेश सुनकर मेरी तोह सांस hi अटक जाती है, वैसे तोह वो जगह पैदा से ढकी हुई थी पर फिर भी यु खुले में नंगी नहाना.. ये तोह मेरे सोच से भी ज्यादा था

पर मैं सत्यम को और नज़र नहीं करना चाहती थी, इसलिए किसी सस्ती रोड किनारे वाली रंडी की तरह अपनी गांड को मटकते हुए धीरे धीरे चलते हुए उस जगह क बीच आके कड़ी हो जाती हु

पानी की ठंडी ठंडी बुँदे मेरे जिस्म पे जैसे hi पड़ती है मैं बुरी तरह मचल पड़ती हु

"Aaaaaaaaaahhhhhh......"

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बारिश मैं तोह मैं न जाने कितनी hi बार भीगी थी पर ऐसे यु पूरी नंगी होक किसी अनजान क खेत पे.. ये पहली बार था, और यही चीज़ मुझे और ज्यादा गरम कर रही थी

मैं धीरे से अपने दोनों चूचियों को अपनी मुठी में भर क सत्यम को दिखते हुए धीरे से मुस्कुरा पड़ती हुई और उन्हें खुद से मसलने लगती हु.. वही मेरा ऐसा रान्दीपन देख क सत्यम क लुंड पे हल्का सा पानी नज़र आने लगता है, और ऐसा होता भी कैसे नहीं

'मैं Maha-Randi मालती जो हु'

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मैं अपने जवान बेटे सामान भतीजे को अपनी चूचिया दिखते हुए बारिश क तेज़ पानी में उन्हें जोर जोर से ऐसे मसल रही थी मानो उनकी ढुलाई कर रही हु

सत्यम जोर से अपने लुंड को दबाते हुए

"आआआहहहहह... जल्दी कर कुटिया रंडी... आआह्ह्ह्हह्ह साललीई किया जिस्म है तेरा.. उफ्फफ्फ्फ़"

सायद अब तक जिस आग में मैं जल रही थी, वही आग सत्यम को महसूस होने लगी थी

इसलिए इस बार सत्यम की बात सुनकर मुझे ख़ुशी hi मिलती है, ककी उसकी इस बात का सीधा सा मतलब था जल्दी hi उसका मोटा लुंड मेरी छूट की गहराई में घुसने वाला है

मैं उसे और तड़पने का तय करती हु, और अपनी एक चुकी को पकड़ क हल्का सा ऊपर उठती हु पर इस उम्र में भी मेरी जवानी बहुत कासी हुई थी.. इसलिए मेरी चुकी मेरे होंठों तक ऊपर नहीं उठती पर मैं फिर भी पीछे नहीं रहती अपनी जीभ निकल क किसी कुटिया जिसे अपनी मोती दुधारू दूध से भरी चुकी का मोटा गुलाबजामुन जैसा निप्पल्स चूस लेती हु.. बल्कि यु कहु की उसपे अपनी जीभ फिरने लगती हु

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वही मुझे ऐसे अपने मोठे गोल निप्पल्स पे अपनी जीभ फिरते हुए देख क सत्यम का हाल ऐसा होने लगता है की वो कही बिना मेरी चुदाई क hi बह न जाये

सत्यम- (कामुकता से लगभग काँप सा उठता है) आआआह्ह्ह्ह... साआल्लीीी कुटिया.. मादरचोद जल्दी कर हरामजादी

सत्यम को ऐसे तड़पते हुए देख क मैं khil-khila क है पड़ती हु

"किया हुआ बीटा, तुझे रैंड चाहिए थी न.. अब किया बर्दाश्त नहीं कर प् रहा है इस रैंड की गर्मी"

मैंने जान क मर्द की मर्दानगी पे ऊँगली उठा दी थी, यु समझो सत्यम की गर्मी में घी दाल दिया था

फिर किया था, सत्यम गरम तवे जैसा तप्त हुआ अपनी जगह से उठता है.. उसका मोटा लुंड किसी काले नाग सामान अपना सर उठाये हुए थे और वो उसी हालत में लगभग भागता सा हुआ मेरे पास आता है और जोर से मेरे बालों से मुझे पकड़ क बोलता है

"मादरचोद रैंड कुटिया साली.. मेरा मज़ाक बनाएगी साललीई रुक चिनार"

और वो ग़ुस्से से मुझे मेरे बालों से पकड़ क बिलकुल खींचता सा हुआ उस छप्पर क नीचे ले आता है.. मैं झूट नहीं कहूँगी मुझे बहुत ज्यादा दर्द हो रहा था इन सब में, पर पता नहीं क्यू फिर भी मेरी छूट से पानी टपक रहा था

सत्यम मुझे वही उस बिस्तर पे जोर से दक्का देके मानो जैसे फैक सा देता है और मैं दोनों हाथों क बल उसपे गिरती हु.. वो तोह मैंने समय रहते अपने हाथों को आगे कर लिया था वर्ण सीधा मुंह पे चोट आती

पर फिर भी मैंने उसपे ग़ुस्सा नहीं किया उल्टा इसकी वजह से मुझे मेरी छूट से रास टपकता हुआ साफ़ साफ़ महसूस हो रहा था.. मैं उसी प्रकार किसी गोदी या कुटिया जैसे दोनों हाथों को बिस्तर पे किये हुए अपनी बड़ी hi तरबूज जैसी गांड उसकी तरफ निकल क हस्ते हुए कहती हु

"किया हुआ.. बस इतनी hi सही गयी इस रैंड की गर्मी'

मैंने जान भुज क सत्यम को ललकारा था, जिसका परिणाम भी मुझे मिला.. ककी अगले hi पल एक जोरदार थप्पड़ मेरी गांड पे पड़ता है और उस जोरदार बारिश में भी उसकी आवाज़ न जाने कहा तक गयी होगी

"चत्तत्ताआआककककक......"

मैं दर्द से बुरी तरह तिलमिला जाती हु

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhh... माआआआआ... कमीने reeeeeeeeeeeee"

सत्यम हस्ते हुए अपने जीत की ख़ुशी मानते हुए

"अब आयी न अपनी औकात में मादरचोद रैंड"

×|× अपडेट 19, सन 04 कंटिन्यू.. ×|×

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सत्यम ये कहते हुए दोनों हाथों से मेरे चूतड़ पकड़ क पूरा फैला देता है जिससे उसे मेरी गांड का सुनहरा छेद नज़र आने लगा होगा

"आआआअह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़ साआल्लियइ कितना कैसा हुआ छेद है, आआअह्ह्ह्हह मेरी रैंड"

और इतना कहते hi इस बार वो मेरी छूट पे मारता है.. वैसे इस बार वार इतना जोरदार नहीं था, पर छूट पे पड़ने वाली हलकी मार भी बहुत जोरदार लगती है.. ककी छूट को सिर्फ लुंड की मार सहने लायक बनाया गया है

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सत्यम अब अगले पड़ाव की और बढ़ने लगा था.. और मेरे कुछ बोल पाने से पहले hi वो मेरी गांड को पूरी तरह फैला चूका था और उसपे अपने होंठ लगा चूका था.. न जाने कितने hi सालों से मेरी गांड का ये छेद नहीं चुवा गया था, यु समझो मैं एक हिसाब से पीछे से फिर से कुवारी हो चुकी थी

इसलिए जब इतने सालों बाद मेरी गांड पे मेरे जालिम भतीजे क होंठ लगते है तोह मैं बुरी तरह मचल पड़ती हु

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhh.... माआआआआ.... Satyaaaaaaammmmmmmmmmm"

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वही सत्यम तोह जैसे मेरी गांड में खो सा गया था, वो अपना पूरा मुंह मेरी गांड की दरार में घुसता चला जाता है और अपने होंठों को मेरे छोटे से सुनहरे छेद पे रगड़ने लगता है

मेरी तोह जैसे कामुकता क कारन साँसे hi अटक जाती है

"Aaaaaaaaaaaahhhh... माआआआआ.... माहारररररर गयीईइ रईईईईई... माआआआ"

पर सत्यम अपने काम में लग चूका था, वो दोनों हाथों से मेरे दोनों चूतड़ों को फैलाये हुए मेरी गांड क छेद पे अपने होंठों को रगड़ने क बाद उसने चूसना सुरु कर चूका था

"सललललूउपपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प..... उम्मम्मम्मम.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp..... उम्मम्मम्म.... गलल्लूऊऊऊप्प्प"

वही मैं दोनों हाथों को उस बिस्तर पे पटकते हुए बुरी तरह पागल हुए जा रही और सामने खेतों में जोरदार बारिश की वजह से भरने वाले पानी को देखते हुए उस पल क भरपूर आनंद उठा रही थी

"Aaaaaaaaaaahhhhhh.... Maaaaaaaaaaa..... ेस्स्स्सह्ह्ह.... Maaaaarrrrrrrrrr...... गयीईइ... हैईईई kamineeeeeeeeeeeeeee.... कुत्त्तीीीी... खा ले अपनी चची की गांड... आआअह्ह्ह... खा ले... कुत्त्तीीीे... माआआआ..... माअररररररररर गईइइइइइइ... Reeeeeeeeeeee...."

तभी सत्यम दोनों हाथों से एक साथ मेरे दोनों चूतड़ों पे जोर से मरता है और एक बार फिर से उस खेत और आसपास की जगह मेरे चूतड़ पे पड़ने वाली मार से गूंज जाती है

"चत्तत्ताआआककककक..... चत्तत्ताआआककककक"

मैं फिर से बिलख पड़ती हु

"आआआआअह्ह्ह्हह... Maaaaaaaaaaaaaaaaa..... कुत्त्तीीीी..... माहाआररररर.... क्यू रहा है.... आआआह्ह्ह्ह"

सत्यम मेरी बात का कोई जवाब नहीं देता ककी वो तोह मेरी गांड को फैलाये हुए उसे चूसने का आनंद ले रहा था

"Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप.... srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... Ummmmmmmmmmm"

मैं- (अपने जवान भतीजे से अपनी गांड का चुसन कटवाते हुए बुरी तरह तड़प रही थी) Aaaaaaaaaaaahhhhhh... माआआआआ... हैईईई... Reeeeeeeeeee.. ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... माहाआररररर गयीईइ मैं.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.. खा जा कुत्ते... खा जा मेरी गांड... खा ले.. उसके अंदर भरा घु भी खा ले... सुवर... सब खा ले.... आआआआअह्ह्ह्हह"

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पर तभी जैसे hi मैं उसे गन्दी गालिया देती हु वो फिर से मेरे दोनों चूतड़ों पे एक साथ मरता है, कमीना ढोलक बजा रहा था मेरी गांड से

"चाताआककककक...... चाहात्त्त्त......"

मैं फिर से मचल पड़ती हु, दर्द तोह इस बार भी बहुत हो रहा था पर झूट नहीं कहूँगी मुझे आनंद भी बहुत आया.. ककी मेरी छूट से टपकने वाला कॉमर्स तोह ऐसी की निशानी थी

"Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप.... Ummmmmmmmmmmmmm... आआआह... Ummmmmmmmmmm"

मैं पूरी तरह जिस्म की आग में जलती हुई पागल हो चुकी थी, इस समय मेरा हाल ऐसा था की मैं अपनी चुदाई करवाने क लिए कुछ भी कर सकती हु.. और सायद ऐसा hi कुछ हाल सत्यम का भी था ककी वो टपक से मेरी गांड से मुंह निकलता है और मेरा सर पकड़ क कसके मुंह और ज्यादा झुका देता है

सत्यम- (मेरी गांड क नीचे अपना एक हाथ ले जेक उसे और ऊपर उठाने की कोशिश करते हुए) गांड उठा रैंड....... उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ हरामजादी की किया गांड है.. रैंड कही की

मैं ऐसे अनमोल वचन सुनते हुए उसकी बात मान लेती हु और अपनी गांड को पूरा ऊपर उठा देती हु.. जिससे अब मेरी गांड क साथ साथ मेरी छूट का छेड़ भी पूरी तरह नज़र आने लगा होगा

वैसे मैं थोड़ा उलझन में भी थी.. मुझे पता नहीं लग प् रहा था सत्यम एक बार फिर से मेरी योनि से यौवन चूसेगा, या मेरी गांड का तरबूज फाड़ेगा

पर तभी मेरी सोच को नस्ट करने का काम मेरे पति क भाई का लड़का बहुत अचे से करता है.. कमीना अचानक से अपनी मोती ऊँगली मेरी गांड में ऐसे उतर देता है जैसे उसके बाप का राज़ हो

"Aaaaaaaaaaahhhhhh.... Kuuuuttteeeeeeeeeeeeeeeeee... Maaaaaaaaaaaaaa... बता तोह दिया hotaaaaaaaaaa..... ेस्स्स्सह्ह्ह"

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मुझे यु तड़पता हुआ देख क न जाने सत्यम को किया मज़ा मिल रहा था, वो हरामी मेरी गांड में पूरी ऊँगली उतरने क बाद मेरे ऊपर झुकते हुए मेरे कान क पास आके कहता है

"मज़ा आ रहा है रैंड"

मैं अब किया कहती.. झूट तोह बोल नहीं सकती थी इसलिए 'है' में सर हिला hi देती हु

सत्यम वापस से पहले जैसे खड़ा हो जाता है और मेरी गांड से अपनी मोती ऊँगली निकल क उसे मेरी नाक क पास लाते हुए

"ले सुंग रैंड अपनी टट्टी..."

मुझे एक तीव्र और गन्दी बदबू आती है मानो जैसे उलटी हो जाएगी

मैं- (उसके हाथ को अपने चेहरे क सामने से हटाने की कोशिश करते हुए) हटाओ ऐसे... चींईईई

वही सत्यम हस्ते हुए अपनी ऊँगली को मेरे होंठों क पास लाते हुए

"साआल्लियइ तू रैंड है मेरी, चल साबित कर"

मुझे समझ नहीं आता वो मेरी गांड से निकली हुई अपनी ऊँगली को मेरे होंठों क पास लाके आखिर चाहता किया है मुझसे.. तभी जो बात मेरे दिमाग मैं खोदती है उससे तोह जिस्म झुरझुरी खा जाता है

मैं- (बुरी तरह हड़बड़ा सी जाती हु) किया.. नहीं नहीं, ये मैं नहीं चूसने वाली पागल हो गया है भूल मत चची हु तेरी

सत्यम जोर से दूसरे हाथ से मेरे बाल पकड़ क खींचते हुए

"मादरचोद तू चची घर पे है.. बहार सिर्फ मेरी रैंड है, और याद है न तूने मेरी कसम खाई है

कही साली मुझे मरने क लिए झूटी कसम तोह नहीं... आआआआअह्हह्ह्ह्ह... शाब्बाश मेरी रैंड"

सत्यम जब ये सब बोल रहा था तब जेक कही मैंने उसकी ऊँगली को सही से देखा था, उससे अब भी बुरी तरह की बदबू आ रही थी और वो ऊँगली पूरी तरह पीली और मेरी टट्टी से सनी हुई थी

पर उसे कभी भी चूसने का सोच भी नहीं सकती थी, मगर फिर उसने जो कहा उसने मेरे अंदर की औरत और रैंड को एक साथ जगा दिया.. और मैंने लपक क उसकी अपनी टट्टी में सनी हुई ऊँगली गपक से अपने मुंह भर ली

"सललललूउपपप.... उम्मम्मम्म... गलल्लूऊऊऊप्प्प..... Ummmmmmmmmmm.... उम्मम्मम्म.... Ummmmmmmmmmmm... Ummmmmmmmmmmm... Ummmmmmmmmm"

और जब मैं उसकी ऊँगली को आज़ाद करती हु तोह वो पूरी तरह चमक रही थी, उसपे मेरी टट्टी का एक निशान भी नहीं नज़र आ रहा था

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सत्यम अपनी ऊँगली को देखते हुए

"आआआहहहहह... मेरी रैंड तूने साबित कर दिया, तूने सच्ची कसम खाई है"

मैं ग़ुस्से से सत्यम की तरफ अपना मुंह करके

"आज क बाद ऐसी बकवास न करना, तू मेरे बचे जैसा है.. और मैं कभी भी तेरी झूठी कसम नहीं खा सकती"

मैं ये बात पुरे दिल से कही थी, वैसे मैं अपनी मनोदशा की बात करू तोह मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी भी पल उलटी हो जाएगी.. अंदर से अजीब सी घिन आ रही थी, देखो इस हवस ने आज मुझसे किया करवा दिया

मैं अपनी hi सोच में डूबी हुई थी की तभी मेरी गांड फैलती हुई महसूस हुई.. यानि सत्यम खेल को आगे बढ़ाने वाला है, इसलिए मैं भी पूरी तरह अपने दोनों हाथों को उस बिस्तर पे टिका क तैयार हो गयी

सत्यम अपने दोनों हाथों से मेरी गांड को पूरी तरह फ़ैलाने क बाद

"रैंड तेरी गांड बहुत टाइट है, ऐसे तोह आराम से कहूंगा मैं.. अभी तोह तेरी गीली छूट मरूंगा"

अगर मैं अपने दिल की बात कहु तोह न जाने क्यू मेरा मन हो रहा था की सत्यम मेरी गांड में अपना मोटा काला लुंड डाले.. पर सायद इतना सब होने क बाद भी मेरे अंदर कही लज़्ज़ा बच गयी थी और मैं उसे ये नहीं बोल पाती

तभी मेरी सोच को तार तार करने का काम मेरी छूट क मुहाने पे चुने वाली वो गरम आग जैसी चीज़ करती है, जो बताने की जरुरत नहीं की वो मेरे भतीजा का मोटा काला लुंड था

मेरी साँसे और तीव्र हो जाती है और मैं धीरे से पीछे मुद क देखती हु जहा सत्यम अपना काला लुंड पीछे से मेरी छूट पे लगा चूका था और मुझे hi देख रहा था

"क्यू रैंड... घुसा दू अंदर"

मैं कामुकता से कांपते हुए अपने जिस्म क साथ अपना सर है में हिला देती हु

सत्यम- मादरचोद रैंड.. मुंह से बोल कुटिया

"है घुसा दो अपना मोटा काला लुंड अपनी रैंड की छूट.... Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh.... माआआआआ.. माआरररर गईइइइइइ.... ेस्स्स्सस्स्शह्ह्ह्ह धीरीईईए.... कुत्त्तीीीी......"

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सत्यम एक जोरदार दक्का मरता है की मेरी पहली से गीली और उसी क लुंड से पहले चुद चुकी छूट में उसका मोटा काला वीरकाल लुंड एक बार फिर से अपनी जगह बनाते हुए अंदर प्रवेश कर जाता है

मुझे ऐसा लगता है जैसे किसी ने मेरे ताज़ा जख्मों पे नमक मिर्च एक साथ भर दी और वो भी किसी मोठे डंडे पे लगा क

पहले हुई मेरी दोनों जोरदार चुदाई से अभी मेरी छूट संभालना सुरु hi हुई थी की एक बार फिर मेरी उसी चूड़ी हुई छूट में मेरे भतीजे ने अपना वही मोटा काला वीरकाल लुंड वापस से घुसा दिया था

मैं दोनों हाथों वो वही उस बिस्तर पे टिकाये हुए अपने जिस्म को मजबूत करती रहती हु ककी मुझे पता था अभी तोह ऐसे कई जानदार और जोरदार दक्का खाने है मुझे

और मेरी सोच पूरी तरह सही थी, सत्यम मेरी छूट की गहराई में घुसे हुए अपने विकराल लुंड को वापस खींचता है इतना की सिर्फ उसका मोटा सूपड़ा hi मेरी योनि क छेद तक रह जाता है और फिर बिना किसी अतिरिक्त विलम्ब क वापस से पूरा लुंड मेरी गीली छूट में उतर देता है.. उसी छूट में जिससे मैंने मोनू को पैदा किया था

"Aaaaaaaaaaaahhhhh.... Maaaaaaaaaaaa.... कामिनीई... ेस्स्स्सह्ह्ह धीरीईए.... दर्द होता है... रईईईई"

मेरी तरप और चीख पुकार उस जोरदार बारिश की शोर में खो सी जाती है पर मेरी योनि में अपना मोटा लुंड डाले हुए सत्यम तोह उसे सुनता hi है

सत्यम- (हस्ते हुए) चुप कर साली राआनंनंड्डड्डड़... कुटिया... चिनार... हरामजादी सुवर कही की.. आज तोह तेरी छूट इतनी छोडूंगा की हफ्ते भर वो लुंड लेने का नाम नहीं लेगी.. ये ले... साल्ल्लिई मेरी रैंड..

सत्यम वापस से अपना मोटा लुंड बहार खींचता है और तुरंत hi उसे वापस अंदर घुसा देता है

"Aaaaaaaaaaahhhh.... ेस्स्स्सह्ह्ह.... माआआआआ.... कामिनी...."

मुझे ऐसा लगता है मानो मेरी योनि की अंदरूनी दिवार पे किसी मोठे बांस से खुरच दिया गया हो.. सत्यम का इतना मोटा लुंड लेना कोई बच्चों का खेल नहीं और मैं तोह उसे वापस से अपनी छूट में ले रही हु, एक hi दिन में तीसरी बार

और अभी तोह पहली दोनों जोरदार चुदाई को 1 जानता भी पूरा नहीं हुआ और अब एक बार फिर से मेरी छूट की जुताई चालू हो चुकी थी


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वैसे तोह कहते है बारिश में खेत में अतिरिक्त पानी लगाने की जरुरत नहीं होती, पर यहाँ इस खेत क पास मेरी छूट में बहुत सारा पानी लग रहा था

"आआआहहहहह.... साललीई इतनी बुरी चुदाई क बाद भी तेरी छूट मेरा लुंड निचोड़ रही है, वाआआअह्ह्ह्ह साललीई किया छूट है.. आज तक ऐसी छूट नहीं छोड़ी थी.. उफ्फफ्फ्फ़ किया किस्मत है मेरी वाआहहह रैंड मिल गयी मुझे.. आआआहहहहह"

सत्यम अपनी किस्मत पे नाज़ करते हुए मेरी छूट की गहराई नाप रहा था, उसका मोटा लुंड पूरी रफ़्तार से बहार तक आता और फिर उतनी hi गति से अंदर प्रवेश कर जाता.. और हर बार उसके दुमदार धक्कों क कारन मुझे ऐसा लगता मानो जैसे उसका लुंड मेरी योनि की और अधिक गहराई तक घुस रहा हो

"Aaaaaaaaaaaaahhhhh... माआआआआ.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... कामिनीई... पहाड़ड़ड़ड़... डीईई.... इस रैंड की छुट्ट्ट्ट... दिखा कुट्टी अपना दम"

लगातार इतनी जोरदार दकके खाने की वजह से भले hi मेरी योनि में दर्द की लहर भर रही हो, पर साथ hi साथ आनंद की अलग अनुभूति भी होनी सुरु हो चुकी थी.. और इस बात का सबूत था मेरी गांड में आने वाली थिरकन

मैं उसी बिस्तर पे अपने दोनों हाथों को जमाये हुए अपनी गांड को थोड़ा सा पीछे करने की कोशिश करती हु.. इस उम्मीद में की उसका मोटा लुंड और अधिक गहराई नाप सके

और ऐसा hi होता है, मेरी हरकत का एहसास मेरे भतीजे को भी हो गया था वो हस्ते हुए अपना एक हाथ आगे बड़ा क मेरी गर्दन को पीछे से दबोच लेता है और दूसरे हाथ से मेरी गांड को पहले तोह सहलाता है और फिर जोर से उसपे मरता है

"चत्तत्ताआआककककक........."

मैं- Aaaaaaaaaaahhhhhh.... कामिनीई..... किया करता है.... ेस्स्स्सह्ह्ह

पर सत्यम नहीं रुकता और उसी तेज़ी से वापस मरता है

"चत्तत्ताआआककककक......"

मैं एक बार फिर से तड़प पड़ती हु पर साथ hi साथ वो जब भी मेरे चूतड़ पे मरता तोह दर्द की वजह से मैं अपनी गांड का छेद सिकोड़ लेती और उसके कारन छूट का छेद भी कास जाता.. जिससे उसका लुंड और कसता हु अंदर जाता और मुझे ऐसा आनंद मिलता की मैं वो सब्दो में लिख नहीं सकती

"आआआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह..... कामिनीई.... छोड़... छोड़... अपनी चची को... आआअह्ह्ह... छोड़ अपनी चची"

सत्यम जो से मेरी गर्दन को पदक क पीछे से दबा देता है और मानो ग़ुस्से से कहता है

"किया कहा साली चची.. मादरचोद तू रैंड है.. सिर्फ रैंड.. आआआह्ह्ह्ह... बता कोण है तू कुटिया... कोण है तू.. आआआअह्ह्ह्ह"

सत्यम और ज्यादा गति से मेरी योनि में दकके मरते हुए मेरी गर्दन पे अपनी उँगलियों क निशान चोरते हुए कहता है

मैं- (अपने ऊपर होने वाले इस जुल्म की वजह से ऐसा महसूस करती हु जैसे मेरी योनि से भर भरा क कॉमर्स बहने लगा हो.. जिस कारन एक पल क लिए मेरी आँखें भी बंद हो जाती है पर तभी सत्यम वापस से मेरी गर्दन पे अपना दबाव बनाते हुए

"बोल रैंड... कोण है तू..."

मैं अपनी गांड को जोर जोर से हिलाते हुए अपने भतीजे का लुंड अपनी योनि में और अंदर और गहरी तक लेते हुए हवस से कांपती हुई आवाज़ में कहती हु

"रैंड.. रैंड... रैंड... रैंड... रैंड.. रैंड.. हु मैं तेरी.."


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मैं अपने पीछे सत्यम का चेहरा तोह नहीं दीख पाती पर सायद वो मेरे इन सब्दो को सुनकर बहुत खुस हो गया था, वो मेरे ऊपर झुकता चला जाता है और मेरी गर्दन पे अपने डाट गदा देता है.. जिससे में ऐसा लगता है मानो कोई पिसाच मेरा खून पीने की कोशिश कर रहा हो

पर सत्यम भी कामुकता क कारन मेरी गर्दन पे काट लेता है.. जिससे मैं न च क भी अपनी योनि में उसका मोटा लुंड गपागप गपागप गपागप करके लेती हुई बुरी तरह मचल पड़ती है

"Aaaaaaaaaaaaahhhh...... किया कर रहा है.... ेस्स्स्सह्ह्ह... Maaaaaaaaaaaaaa....... माहारररररररर... गईइइइइइ"

पर न मैं अपनी गांड हिलाते हुए अपने भतीजे का लुंड लेना बंद करती हु, न hi वो जोरदार दकके मरते हुए मेरी छूट का छेद चौड़ा करने का काम बंद करता है, इस समय तक मेरी छूट में लगने वाले दकके इतने जोरदार हो चुके थे की हर धक्का मुझे बुरी तरह हिला दे रहा था.. मेरे सरीर की एक एक हड्डी को चरचरा दे रहा था

पर कमीना सत्यम बाज़ नहीं आता और मेरी गर्दन पे न जाने कितनी hi जगह अपने दाँतों की चाप चोर देता है

"आआआआअह्ह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... कामिनीईईए..... खा जा अपनी चची को.. आआआह्ह्ह्ह"

सत्यम जैसे hi ये सुनता है वो एक बार फिर से गुस्सा हो जाता है और अपने दूसरे हाथ को मेरे सर पे लाके मेरे बाल पकड़ क खींच लेता है

"मादरचोद.. साली कुटिया.. चची नहीं रैंड.. रैंड है... तू रैंड है मेरी"

मैं भी अपनी योनि से बहते कॉमर्स क आगे पूरी तरह अपनी हार मानते हुए

"है... रैंड.. रैंड... रैंड... रैंड... हु... रैंड"


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सत्यम पीछे से मेरे गाल पे एक जोरदार थप्पड़ सा मरते हुए

"चाताआककककक....."

सत्यम- नाम लेके बोल.. कोण है मेरी रैंड...

सत्यम ये बोलते हुए दकके भी पूरी गति से मार रहा था जिससे मेरी चूड़ी हुई योनि फिर से पूरी तरह चुदाई का आनंद लेने लगी थी

मैं- (अपनी छूट में लगने वाले जोरदार दक्कों का भरपूर आनंद लेते हुए) मालती.. मालती... मालती... है तुम्हारी रैंड... रैंड... रैंड.. आआआअह्ह्ह्हह"

इसके बाद ये खेल रुकता नहीं और सत्यम की तेज़ गति की ट्रैन जैसे मेरी छूट का भोसड़ा बनाने का अपना कर्त्तव्य पूरी निष्ठां और ईमानदारी से करता है

मेरी छूट पे लगने वाला हर दक्का मेरे जिस्म की गर्मी को धीरे धीरे ठंडा कर रहा था.. वही मेरे सरीर में ऐसा कम्पन उत्पन्न कर रहा था मानो जल्दी hi मैं फिर से अपना कॉमर्स बहा दूंगी

"आआआआअह्ह्ह... माआआआ... आआआआहहह... पहाड़ड दे... इस रैंड की छूट... आआआअह्ह्ह... कचूमर बना दे इस रैंड की छूट का.... आआआआह्ह्ह्ह... छूट का चौराहा बना दे... आआआआह्ह्ह्ह... और जोर से छोड़ इस रैंड को... आआआहहह... माआआआ... आआअह्ह्ह्ह.... पहाड़ड दो मेरी छुट्ट्ट्ट.... आआआआह्ह्ह्ह"

सत्यम भी किसी पागल जानवर जैसे बिना किसी बात की परवा किये बिना पूरी रफ़्तार से मेरी छूट की गहराई को और गहरा बना रहा था

"आआआआअह्ह्ह्हह... साआल्लीीी.... रैंड... बहुत गर्मी थी न... आआआआह्ह्ह्ह.. अब आया मज़ा... आआअह्ह्ह्ह.. ये ले... ये ले.... आआअह्ह्ह्ह... पहाड़ड दूंगा आज तेरी छूट को... आआआआह्ह्ह्ह... रंडी साली.... मेरी रैंड.... कामिनी"

मैं तोह पूरी तरह पागल हो चुकी थी वही मेरी गीली छूट में अब सत्यम का लगने वाला हर दक्का

"फुक्कक्कक्कछहहहह..... Fucccccccccccccchhhhhhhh.... फुसक्कछहः...."

का मधुर संगीत भी उत्पन्न कर रहा था.. वही सत्यम क लुंड क नीचे लटकने वाले मोठे मोठे ाँद जब मेरी छूट क पास जोर से टकराते तोह

"थाआपप.... थाआपप... थापाककक"

का मधुर संगीत भी बना रहे थे.. मैं पूरी तरह अपने पति क बड़े भाई क बेटे से चुदती हुई हर पल का भरपूर आनंद ले रही थी, और अपनी छूट का गुलदस्ता बनवा रही थी

वही इतनी दिएर से लगातार छोड़ने की वजह से मेरे अंदर जलने वाली वो आग धीरे धीरे ठंडी होने लगी थी

"आआआहहहहह... आआआहहहहह... हआ... आआआह्ह्ह्ह... ऐसे... ऐसे.... हाआआआ.. ऐसे hi.... आआआआहहह... माआआ.... पहाड़ड दो इस रैंड की छूट.... आआआअह्ह्ह... उफ्फफ्फ्फ़... ऐसे... है ऐसे... आआआह्ह्ह्ह"

तभी मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे पेअर एक बार फिर से कांपने लगे हो और मेरी योनि से भरभरा क लावा बहने लगता है.. पर सत्यम रुकता नहीं वो मेरी उस हालत में भी अपने दक्कों का दम मेरी छूट पे दिखता रहता है जिससे मेरी लबालब भरी हुई छूट में उसका मोटा लुंड मधुर आवाज़ उत्पन्न करने का कार्य कर रहा था

"फुसक्कछहः.... फुसक्कछहः..... थाआपप... थापाककक... फुसक्कछहः..."

मैं- Aaaaaaaaaahhhhh...... Maaaaaaaaaaaa.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़...... Haiiiiiiiiii

मैं अभी कामुकता क इन अनमोल पलों का आनंद ले hi रही थी की तभी अचानक से मेरा भतीजा मुझे मेरे कंधे से पकड़ क जोर से दक्का देते हुए खड़ा कर देता है और इससे पहले की मैं कुछ समझ पाती अगले hi पल वो दोनों हाथों से मेरे कंधे को दबाते हुए मुझे वही नीचे मिटटी पे जहा तक बारिश का पानी भर चूका था उसी में घुटनो क बल बैठा देता है.. जिससे उसका मोटा लुंड भी मेरी योनि से एक झटके से बहार निकल आया था

अभी मैं उसे देख क ये समझने की कोशिश hi कर रही थी की अब वो किया चाहता है की उसने खुद hi मेरा मुंह पकड़ क कसके दबा दिया जिससे मैं बुरी तरह तड़प पड़ती है हु

"आआआआह्ह्ह्ह.... आठ... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... गरररूपप...... गलल्लूऊऊऊप्प्प..... सललललूउपपप.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... गरररूपप.... सललललूउपपप.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप"

मैं जैसे hi बोलने क लिए अपना मुंह खोलती है सत्यम उसमे अपना गन्दा मेरी योनि से निकला हुआ चिपचिपा मेरे hi कॉमर्स से सना हुआ अपना लुंड मेरे गले तक उतर देता है

मैं बुरी तरह झटपट सी जाती हु ककी उसने गले क बहुत अंदर तक घुसा दिया था मुझे सांस नहीं आ प् रही थी


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पर उसे कहा इस सब की परवा.. वो तोह पूरी रफ़्तार से मेरे मुंह की चुदाई करने का अपना कार्य करने लगता है

"गलल्लूऊऊऊप्प्प... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललररररररपपपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प..... गरररूपप... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp"

सत्यम अपने दोनों हाथों से मेरे सर को कसके जकड लेता है जिससे मैं उसके लुंड को अपने मुंह से बहार न निकल सकू और फिर पूरी रफ़्तार से जोरदार दकके मरते हुए मेरे मुंह की गन्दी तरह से चुदाई सुरु कर देता है

"सललललूउपपप... गरररूपप... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... गलल्लूऊऊऊप्प्प...... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp"

वो पूरी रफ़्तार से मेरे मुंह की चुदाई कर रहा था और मैं भी और कोई रास्ता न होने क कारन उसका लुंड अपने गले तक उतर क चूस रही थी

"गलल्लूऊऊऊप्प्प... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... गरररूपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प..... उम्मम्मम... सललललररररररपपपप"


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पर कमीना सत्यम बीच बीच में लुंड मेरे मुंह की इतनी गहरी तक घुसा देता की मैं बुरी तरह चटपटा सी जाती ककी मैं सांस नहीं ले पति थी

पर वो कमीना किसी बात की कोई परवा नहीं करता और उसी प्रकार मोनू की माँ क खूबसूरत मुंह की चुदाई करता रहा

"गलल्लूऊऊऊप्प्प... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप... उम्म्म्म... सललललूउपपप"

सत्यम का मेरे मुख छोडन का ये खेल अगले 2-3 मं hi चलता है की अचानक से वो मेरा सर कसके जकड लेता है और उसका लुंड अपना गरम लावा चूर्ण सुरु कर देता है

"गलल्लूऊऊऊप्प्प.... गरररूपप.... उम्मम्मम्मम"

मैं एक बार को कोशिश जरूर करती हु की उसका लुंड अपने मुंह से बहार निकल सकू पर वो ऐसा करने नहीं देता.. फिर तोह मैं भी किसी महा रैंड जैसे उसके लुंड से निकलने वाले वीर्य का एक एक कटरा जातक जाती हु

सत्यम- आआआआअह्ह्ह.... साआल्लीीी रैंड... सब चूस ले.... आआआअह्ह

और मैं भी उसकी बात का अनुसरण करते हुए उसका लुंड अपने मुंह में घुसाए हुए पूरा रास पी जाती हु

"गलल्लूऊऊऊप्प्प.... सललललूउपपप.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp"

और फिर बिना किसी सिखयात या सत्यम क कहे बिना उसके लुंड को इतनी अछि तरह से छत्त छत्त क साफ़ करती हु की उसका लुंड मेरे थूक से चमकने लगता है, पर उसके लुंड ने इतना ज्यादा लावा उगला था की.. जब मैं अपने मुंह से उसका लुंड आज़ाद करती हु तोह सारा रास बहार गिरने लगता है


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अगले 2 मं बाद मैं पूरी तरह नंगी अवस्था में उसी 'पहलवान' क बिस्तर पे पड़ी हुई हाफ रही थी और सत्यम मेरी बड़ी बड़ी ऊपर नीचे होती चूचियों पे अपना सर रखे हुए लम्बी लम्बी साँसें लिए जा रहा था

हमे इस बात की तनिक भी परवाह नहीं की थी की हम पूरी तरह नंगी अवस्था में यहाँ किसी और क खेत क बहार लेते हुए है

मैं उसी प्रकार अपनी आँखों को बंद किये हुए न जाने कबतक यही लेती रहते हु.. और सबसे बड़ी बात की इतनी ठण्ड में भी हम दोनों पूरी तरह नंगे लेते हुए हाफ रहे थे

×|× अपडेट 19, सन 04 कंटिन्यू.. ×|×


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