Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 15 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 390



अपडेट #20


सन 🖼️ #02

मेरी पत्नी चुद रही है..

सुंदरपुर की सुंदरता इस समय पहले से कही गुना बड़ी हुई थी, बारिश ने कुछ पलों क लिए मानो विराम सा लिया था और आस्मां में एक खूबसूरत सा इंद्रधनुष बना हुआ था.. जिससे दूर दूर तक फैले खेतों क खूबसूरती मानो कई गुना बाद गयी हो


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पर ऐसा ज्यादा दिएर तक रहता नहीं.. ककी तभी बिन बुलाये मेहमान की तरह बारिश ने एक बार फिर से अपनी ठंडी दस्तक दे दी थी, ये ठंडी बूंदों वाली बारिश फिर से सुंदरपुर क हरे भरे खेतों की हरियाली को और बढ़ने लगी थी

बारिश की मोती बूंदें पत्तों पे गिरते हुए जब नीचे की और बहती तोह इंद्रधनुष की हलकी सी रौशनी की चाप सी उनमें नज़र आती है और मानो जैसे वो बंधे कुछ पलों क लिए नन्ही नन्ही मोतियों में बदल जाती हो

आसान सब्दो में लिखू तोह इस गाओं की खूबसूरती को सब्दो में समां पाना मेरे लिए संभव नहीं हो प् रहा है

पर तभी लगातार अपनी रफ़्तार को बढ़ती हुई बारिश क बीच कही से वो खनकती हुई आवाज़ उस खेत क पत्तों क बीच से गुजर पड़ती है

“रुकिए जी.. अब खेल को और रंगीन बनाने का समय है, आज आपको मुझे पूर्ण ख़ुशी देनी है, इतना प्रेम करना है की मेरी योनि से ख़ुशी क आंसू फुट पड़े”

ये कामुक और मासूम की ध्वनि खेत क बीच दौड़ती हुई उस खेत क बिलकुल अंत में बानी उस झोपडी तक पहुंच जाती है जहा उसे सुनने वाला वो तीसरा इन्शान उपस्तिथ था.. और वो इन्शान था सोनू का बाप 'वीरू'

झोपडी क अंदर उस पुराणी और टूटी हुई चारपाई पे लेते हुए वीरेंदर यानि वीरू क कानो में जब ये सब्द पड़ते है तोह मानो उसकी नींद की खुमारी उसका साथ चोरते हुए उसे आज़ाद करती जाती है और वो धीरे से अपनी आँखों को खोलते हुए उस आवाज़ पे धियान देने लगता है जो उसने अभी अभी सुनी है और ये आवाज़ वो हज़ारों की भीड़ में भी पहचान सकता था.. सायद इसीलिए एक भी पल नस्ट हुए बिना hi उसके अधरों से वो नाम फुट पड़ता है

“हर्षिता..”


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ये नाम उसने इतने hi स्वर में लिया था की वो खुद hi सुन पाटा, वैसे अगर वो चिल्लाता भी तोह सायद कोई सुन न पाटा ककी बारिश का शोर लगातार बढ़ता जा रहा था

तभी अचानक से उस झोपडी में लगा वो पुराण और जगह जगह से टूट चूका बांस का दरवाजा तेज हवा और बारिश की भीसड़ता से लड़ते हुए अचानक से एक पल क लिए खुल पड़ता है.. पर ये एक पल hi काफी था ये देखने क लिए की इस समय खेत में उस झोपडी क ठीक सामने उसकी धर्मपत्नी किसी मर्द क साथ उपस्तिथ है

वीरू क होंठों से फिर से दबी हुई आवाज़ फुट पड़ती है

“हर्षिता यहाँ.. इतनी बारिश में, और ये किसके साथ है”

पर अब तक झोपडी का वो दरवाजा फिर से बंद हो चूका था, मानो जैसे आज ठंडी हवाओं क साथ hi वो बांस का दरवाजा खुलता बंद होता रहना च रहा हो.. या सायद आज वो द्वार भी वीरू क साथ छुपन छुपाई खेलने का मौका ढूंढ रहा हो

वीरू अपने स्थान से उठाने की चैस्ता करता है तोह मानो उसका सरीर उसका साथ नहीं देता.. ऐसा लगता है जो अगली आवाज़ उसके कानो में पड़ी, उसने उसके सरीर से पूरी ताक़त चीन ली हो

“तुम्हारे इस सलोने और सावले सरीर से प्रेम करने का बहुत इन्तिज़ार किया है, अब और मत रोको.. मुझे तुम्हारी सवाली योनि से मन भर क प्रेम करना है.. आज मुझे मत रोको बहु..”

बहु.. यही वो सब्द थे जिसने वीरू से उसके सरीर की पूर्ण इच्छाशक्ति चीन ली पर साथ hi एक अजीब सी गुदगुदी उसके सरीर में भर दी थी, उसका सरीर भले hi उस चारपाई से उठ न प् रहा हो पर उसके हिलते होंठों से वो सब्द जरूर निकले

“बड़े भैया और मेरी पत्नी.. मतलब”

वीरू का दिमाग भी इसके आगे क लिए तैयार नहीं था, पर उसके सरीर का कोई और हिस्सा जरूर जो होने वाला था उसे लेके ख़ुशी से उछलने की तैयारी करने लगा था और उसका उठान वीरू की लेगी लुंगी से नज़र आने लगा था.. जो इस बात का प्रमाण था की जो होने वाला है वो वीरू को काफी पसंद आने वाला है

वीरू क दिल की धड़कन अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा था साँसों में गर्माहट भरने लगी थी, तभी हवा क झोंके से वो बांस का दरवाजा एक hi बार में कई बार खुलता बंद होता चला जाता है.. पर वो रुकता भी है, और अब वो पहले से ज्यादा खुला हुआ था

मानो वीरू चोरी छुपे कुछ देखने की चैस्ता कर रहा हो.. और फिर आता है सामने का वो हसीं नज़ारा

पर अब सब कुछ बदल चूका था, ककी अब उसकी संस्कारी पत्नी पूर्ण नंगी थी.. इतनी जल्दी कैसे, बस यही एक बात आयी थी वीरू क दिमाग में यु अपनी पत्नी को अपने बड़े भाई क लिए पूर्ण निवस्त्र देख क

पर फिर उसे नज़र आता है उसके बड़े भाई का वो 8.7” का काला हथोड़े जैसा लुंड जो उसकी नंगी पत्नी को देख कैसे किसी हैवान की तरह तन क खड़ा था मानो बस किसी गरम चीज़ पे अपना वार करने को उतारू हो


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‘आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. कितनी गरम है मेरी छोटी बहु”

ये वो सब्द थे जो निकले तोह महेंद्र क मुख से थे पर उसका असर वीरू क सरीर पे हुआ था ककी न जाने कैसे उसका एक हाथ धीरे धीरे उसके hi पैरों क मध्य पहुंचने लगा था जहा एक 7” का तम्बू धीरे धीरे अपना आकर लेने लगा था.. पर ऐसी क साथ हवा ने फिर से वीरू क साथ शरारत कर दी थी ककी एक बार फिर से हलकी सी आवाज़ क साथ वो दरवाजा फिर से बंद हो गया था, मानो जैसे वो दरवाजा और हवा दोनों एक साथ मिलकर आज वीरू की परीक्षा लेने वाले हो

“आज आपको अपनी इस गरम बहु की पूरी गर्मी निकालनी होगी जेठ जी.. बोलो निकल डोज न”

वीरू ये तोह नहीं देख पता की बहार उस खुले खेत और ऐसी ठंडी बूंदों वाली बारिश में अब किया हो रहा है पर उसकी पत्नी क वो सब्द उसके अंदर एक अंजनी सी ऊर्जा और अग्नि पैदा कर रहे थे.. पर वीरू को ज्यादा इन्तिज़ार नहीं करना पड़ता ककी जल्दी hi वापस से हवा अपना खेल खेलती है और जैसे तेज़ आंधी में खिड़की क कपड़ खुलते बंद होते है अब ठीक वही हाल उस झोपडी क उस पुराने और जगह जगह से टूट चुके द्वार क साथ होने लगा था.. जो रह रह क सामने का नज़ारा दिखने लगा था और अब सामने का नज़ारा कुछ ऐसा था जो किसी भी मर्द क लुंड का पानी निकल देने की पूरी हिम्मत रखता था ककी सामने उस खेत में उसकी सलोनी सूरत वाली कासी और उन्नत उरोजों वाली कामुक पत्नी पूर्ण नंगी हालत में अपने जेठ का मोटा खड़ा हाथ अपने कोमल हाथों में पड़के हुए उनकी आँखों में ऐसे देख रही थी मानो अपनी वासना का ेस्टर समझा रही हो

ये नज़ारा कुछ ऐसा था की वीरू को ऐसी ठण्ड और ऐसे मौसम में भी अपना गाला सूखता हुआ सा महसूस हो प् रहा था, वही तेज़ वर्षा क बीच बरसती उन बड़ी बड़ी बूंदों से उस खेत में पूरी तरह पानी भर चूका था.. और अब पानी में गिरती बूंदों क कारन होने वाली आवाज़ क उपरांत भी वो अपने दिल की धकधक साफ़ साफ़ सुन प् रहा था.. उसे अब सिर्फ इस बात का इन्तिज़ार था अब आगे किया होने वाला है ?



♦️ ♦️ कंटिन्यू... 👇
 
की तभी उसकी कैसे बदन और गोल गांड वाली पत्नी उसके बड़े भाई महेंद्र का मोटा लुंड अपने गदेली क बीच लेके उसपे ऐसे हाथ फिरती है मानो उस मोटाई का पूरा एहसास ले लेना च रही हो.. की वो उसकी हलकी काली या यु कहे की सावली योनि में पूरी तरह भर पायेगा की नहीं

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और ये नज़ारा ऐसा था की वीरू अपना हाथ अपने लुंड पे ले जाने से खुद को रोक नहीं पाटा और अब फिर किया था वो जल्दी जल्दी अपनी उखड़ती हुई साँसों क साथ अपनी गीली धोती को अलग करने लगता है पर एक पल क लिए भी उसकी आँखें सामने क नज़ारे से अलग नहीं हो रही थी मानो उसे दर हो की ऐसा नज़ारा वो कभी दुबारा देख पायेगा की नहीं… आखिर अब सामने का नज़ारा कुछ बदल जो चूका था और अब सोनू की माँ अपने जेठ का लुंड अपने हाथों में दबोचते हुए उनके बिलकुल करीब आ चुकी थी और देखते hi देखते हर्षिता अपने पेअर क पंजे पे ऊपर होने लगी थी

जहा वीरू का बड़ा भाई भी अपनी कामुक बहु की ऐसी हरकत पे पीछे कैसे रह सकता था, इसलिए वो भी बिना किसी देरी क अपने बीड़ी से काले पद चुके होंठों को आगे कर देता है जिससे बिना किसी देरी क दोनों क होंठ एक दूसरे से जुड़ जाते है.. यानि आज यु ऐसी बारिश और ऐसे ठन्डे मौसम में 2 जिस्म गरम होने सुरु हो चुके थे

अब बस देखना ये है की गर्मी कब तक रहती है.. और सबसे बड़ा सवाल की ये गर्मी कैसे निकलने वाली है

वीरू की साँसे पूरी तरह ुढकने लगी थी ऐसा लग रहा था जैसे किसी भी पल उसके साँसे रुक जायेगा ककी सामने का नज़ारा hi ऐसा था पूरी तरह बारिश में नहाते हुए दो नंगे जिस्म.. जिसमें से एक उसके बड़े भाई का मरदाना और किशन वाला टङ्गा जिस्म था तोह दूसरा उसकी कामुक और सावली पत्नी का कोमल सरीर, और अब वो दोनों सरीर आपस में चिपक चुके थे

महेंद्र अपनी सलोनी कामुक बहु को और कसके अपने जिस्म से चिपका लेता है

“Ummmmmmmmmmmmm………… ummmmmmmmmmmmmmmmmmmmm……”

वीरू उस चारपाई पे बैठे हुए अपने बड़े भाई क द्वारा अपनी पत्नी क होंठों को चूसने से उत्पन होने वाले स्वर को सुन प् रहा था, जबकि बारिश क तेज़ पानी क कारन खेत क पौधों पे गिरने से होने वाली तेज़ ध्वनि भी उस आवाज़ को वीरू क कानो तक आने से रोक नहीं प् रही थी

वीरू की आँखें अब पूर्णतः सामने क नज़ारे पे लगी हुई थी, जहा एक बार फिर से हवा क कारन दरवाजा भीड़ जाता है और कुछ पल क लिए सामने का कामुक नज़ारा नज़र आना बंद हो जाता है, वैसे तोह ये बस कुछ पलों तक क लिए था पर वीरू को ऐसा लगता है जैसे उस कुछ पलों में कई महीने गुजर गए हो

जल्दी hi हवा फिर से सोनू क बाप से शरारत करते हुए दरवाजे को खोल देती है जहा अब उसका भाई बारिश में पूरी तरह भीगते हुए अपनी बहु और उसकी पत्नी क होंठों से अपने होंठों को जोड़े हुए बेहरहमी से चूमे जा रहा था

“Ummmmmmmmmmm……….. Ummmmmmmmmmmmmmmm…….. Ummmmmmmmmmmmmmm… ssssssssssssslllllllluuuuuuuuuuuppppppppppp.”

वीरू उस जगह से भी ये समझ प् रहा था की इस समय उसके बड़े भाई की जीभ उसकी पत्नी क मुंह क अंदर होगी और अपनी कामुक अटखेलिया कर रही होगी.. और ये एहसास काफी था वीरू क लिए की वो अपने लुंड को अपनी गीली धोती से अलग करके अपने हाथों में भर ले, और उसने वही तोह किया

महेंद्र भी ऐसी कामुक और देसी बहु क मिलान से खुद को रोक नहीं प् रहा था इसलिए वो अपने छोटे भाई की पत्नी क होंठों को बेहरहमी से चूसते हुए अपना एक हाथ उसकी कासी हुई चुकी पे रख क उसका मर्दन सुरु कर देता है, ये वही चूचिया थी जिसे वीरू चूसा करता था और आज उसका बड़ा भाई ठीक उसके सामने खेत में बारिश क नीचे भीगते हुए पूर्ण नंगी हालत में बेहरमी से दबा दबा क मज़े ले रहा था.. और ऐसा नज़ारा देख क किसी भी मर्द का लुंड तन hi जायेगा


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वीरू जोर जोर से अपने लुंड को ऊपर नीचे करने लगा था जिससे उसके लुंड की चमड़ी पूरी तरह हैट चुकी थी और उसका गोल और मोटा टोपा खुल क बहार आ चूका था, वीरू की साँसे पूरी तरह भाग रही थी और वो सामने अपनी पत्नी को अपने बड़े भाई क द्वारा मसले जाने का कामुक नज़ारा देखते हुए अपने लुंड से खेल खेलना सुरु कर चूका था.. इस समय उसका सरीर बुरी तरह काँप रहा था पर ये हालत ठण्ड क कारन नहीं अपितु कामुकता क चलते थी और ऐसा होना स्वभाबिक भी था

इस पुरे दृस्य क दौरान वीरू ये भी देख रहा था की कैसे उसकी कामुक पत्नी अपने खूबसूरत होंठों का रास उसके बड़े भाई से चुसवाते हुए उनका मोटा लुंड अब भी दबोचे हुए थी और उसे जोर जोर से अपने हाथों से रगड़ रही थी, जिससे पहले से hi अकड़ क खड़ा महेंद्र का मोटा लुंड बार बार हर्षिता क हाथों से आज़ाद होक कही और घुसने का निर्णय लेना च रहा था और ये नज़ारा सोनू क बाप को पागल कर रहा था.. सायद अब वो भी उस मोठे लुंड को कही घुसते हुए देखना च रहा था और अपने पति की ये ीचा न जाने कैसे उसके वह होने की बात से अनभिग उसकी पत्नी ने आखिर सुन hi ली

“तैयार… हो जाइए.. आअह्हह्ह्ह्हह.. जेठ जी अपने छोटे भाई की पत्नी को छोड़ने क लिए”

इतनी दिएर से अपने जेठ को अपने होंठों का रास पिलाने क कारन सायद हर्षिता की साँसे ुढकने लगी थी और सायद उसके हाथ भी दर्द करने लगा था उस मोठे लुंड को मथने क कारन.. इसीलिए उसने खेल को अगले चरण में ले जेक का निर्णय ले लिया था, इसलिए खुद hi उनके होंठों से अपने होंठों को अलग करके हफ्ते और अपनी साँसों को काबू करते हुए उसने ये बात कही थी

वीरू तोह जैसे hi ये सुनता है उसकी रिड की हड्डी में सनसनी सी दौड़ जाती है और आँखें उस खुलते बंद होते बांस क दरवाजे पे और ज्यादा अचे से टिक जाती है, जहा सामने उसकी खूबसूरत पत्नी बारिश में भीगते हुए अब उसके बड़े भाई से कुछ कदम दूर कड़ी थी और बारिश का ठंडा पानी उसके जिस्म को भिगोते हुए सर से होते हुए उसकी कामुक और कासी मोती चूचियों से बेहटा हुआ उसकी हलके काले बालों से भरी योनि की और आगे बाद रहा था

पर तभी आसमान में एक तेज बिजली कौंधती है और एक हवा का झोंका तेजी से उस दरवाजे को बंद कर देता है जहा इस बार वो वापस से खुलने में पहले से ज्यादा समय ले लेता है और जब ऐसा होता है तोह सामने का नज़ारा पूरी तरह बदल चूका था.. महेंद्र बारिश में भीगता हुआ पूर्ण नंगी हालत में अपने छोटे भाई की पत्नी क लिए अपने खड़े लुंड को मुठिया रहा था जिसपे बारिश की ठंडी ठंडी बंधते पड़ती तोह मानो गर्मी का पारा पहले से ज्यादा बाद जाता

और ऐसा होना भी चाहिए था ककी इस समय हर्षिता यानि सोनू की हसीं माँ उसके ताऊ जी क सामने एक कुटिया क अंदाज़ अपना चुकी थी, यानि हमारी सलोनी सूरत वाली हर्षिता अपने दोनों हाथों को खेत की कच्ची और पानी से भरी हुई मिटटी में जमा क अपनी कामुक गांड हवा में उठा चुकी थी जिसपे गिरती हुए पानी की मोती बंधे उसके नंगे सरीर की गर्मी को और जावा कर रही थी..


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किसी कुटिया की तरह झुक क अपनी गांड को हवा में उठा चुकी सोनू की माँ इस समय उस खेत और पूरी तरह सुनसान जगह पे गाओं की सायद सबसे कामुक नारी प्रतीत हो रही थी, जिसकी पीट पे गिरता हुआ पानी जब उछलता और फिर जैम क बेहटा हुआ गांड की गहरी दरार में कोने लगता तोह वो नज़ारा इतना कामुक होता की एक नहीं अपितु गाओं क सरे मर्द एक साथ खड़े होक ये नज़ारा देखे तोह उन सभी का लुंड भी अपनी आग उगलने से खुद को रुक नहीं पायेगा..

फिर भला वीरू खुद को कैसे रोकता सायद इसीलिए उसके तेज़ी से घर्षण कहते लुंड क टोपे पे कामुकता की एक चिपचिपी बंध नज़र आने लगी थी.. और ये इस बात का साक्ष था की अपनी पत्नी को ऐसी अवस्था में देखना कितना सुख देने वाला नज़ारा होता है

मुरली दस की मंझली बहु यानि हमारी सलोनी हर्षिता इस समय किसी कुटिया क सामान बन चुकी थी और बारिश का ठंडा पानी उसके अंदर की गर्मी का तापमान बढ़ाने का काम कर रहा था.. हर्षिता मुस्कुरा क अपना चेहरा अपने पति क बड़े भाई की और करते हुए कहती है

“मज़ा आया जेठ जी.. नज़ारा देख क”

हर्षिता ये कहते हुए किसी कामुक नारी की भांति अपनी गांड को हिला देती है, जिससे महेंद्र का लुंड जोर का झटका खा जाता है.. वैसे इस समय सत्तू क बाप की नज़रें एकटुक उसके भाई की पत्नी की गांड क बीच hi तिकी हुई थी, वैसे वो जो देख रहा था वीरू वो तोह नहीं देख प् रहा था पर वो अचे से जनता था की उसका बड़ा भाई किया देख क अपना लुंड हिला रहा है

हर्षिता अपनी कामुक और कोमल मोती और गोल गांड को हिलाते हुए महेंद्र की आँखों में देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

“लो जेठ जी.. आपकी बहु की गांड का नज़राना”

ाशन भाषा में कहा जाये तोह हर्षिता ने खेल क अगले पड़ाव में किया होने वाला है ये साफ़ कर दिया था


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पर हर्षिता इतने में कहा रूकती है, आज तोह सोनू की माँ कामुकता का पूरा तूफान लाने क इरादे से नंगी होइ थी और ये बात वीरू से बेहतर कोण जान सकता था, आखिर इतने सालों से वही तोह इस छूट की गर्मी भुजा रहा था



हर्षिता एक हवसी कुटिया की तरह झुकी हुई अपने जेठ जी को कामुकता भरी नज़रों से देखते हुए अपना एक हाथ पीछे ले जेक अपनी सावली और गोल गांड को सेहलने लगती है मानो सविता क पति की icha-shakti की परीक्षा ले रही हो

“देख क मज़ा आ रहा है न.. सोचो जब इस गांड में आपका मोटा लुंड जायेगा तोह कैसी कामुक गर्माहट और कितना hi अनोखा मज़ा आएगा आपको”

हर्षिता क ये सब्द सत्यम क बाप से ज्यादा उसके चाचा वीरू पे असर करते है और जोश में आके अपने लुंड को पूर्ण नीचे से पकड़ क अपनी hi बड़ी बड़ी गैंडे यानि ाँद दबाने लगता है.. इससे आप अंदाज़ा लगा सकते है की हमारे वीरू का इस समय किया हाल होगा

“आआह्ह्ह्ह.. किस बात का इन्तिज़ार कर रहे हो भैया.. आगे बड़ो, और छोड़ो मेरी पत्नी”

ये वो सब्द थे जो अंततः वीरू क होंठों से निकल hi जाते है, वो तोह बारिश की तेज़ बूंदों का खेतों और उन हरे पत्तों पे गिरने से होने वाले स्वर का असर था वर्ण सामने खेत में नंगा नाच करने वाले महेंद्र और हर्षिता ने भी ये सायद सुन hi लिया होता.. पर वो दोनों तोह अपने खेल में इतना लीं थे की उन्हें इसका एहसास तक नहीं था की उस खेत क अंत मैं बानी उस झोपडी में उस छूट का असल मालिक उपस्तिथ है

पर प्रतीक्षा तोह अब महेंद्र से भी नहीं हो प् रही थी इसलिए ऐसी ठण्ड और गर्जन भरी बारिश में और समय नस्ट न करते हुए 'स्वर्गवासी मुरली दस' का बड़ा बीटा तुरंत hi आगे बाद पड़ता है और अपने छोटे भाई की पत्नी क ठीक पीछे बैठ जाता है.. उसके घुटने खेत की कच्ची मिटटी में धस जाते है और तेज़ बारिश का स्वर मानो कुछ पल क लिए पूरी तरह शांत हो जाता है ककी अब महेंद्र का मोटा 8.7” का तना हुआ लुंड हर्षिता क पीछे उस कामुक और कैसे भूरे छेद को चूमने की कोशिश करने लगा था

पर इस दृश्य का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे वीरू पे हो रहा था जिसकी हालत तोह ऐसी हो रही थी मानो किसी भी पल बस उसकी साँसे hi रुक जाएँगी.. पर आज वो हर चीज़ क लिए खुद को तैयार कर चूका था

हर्षिता ने आसमान से गिरती ठंडी और बड़ी बड़ी बूंदों की परवा किये बिना अपना हाथ खुद hi पीछे अपनी गांड क बीच उछलते हुए महेंद्र क मोठे खड़े लुंड पे रख क उसे ठीक निशानी पे लगा दिया.. यानि अपनी भूरी गांड क छेद पे

वीरू जिस जगह बैठा हुआ था वह से वो ये साफ़ साफ़ देख नहीं सकता था, पर इस पल उसे भी ऐसे लग रहा था मानो वो अपने बड़े भाई का बड़ा लुंड अपनी पत्नी क छेद पे सत्ता हुआ देख प् रहा था.. और ठीक ऐसी पल हवा क तीव्र झोंके ने एक बार फिर से उसके आनंद में बाधा ला दी और वो बांस का पुराण दरवाजा एक पल क लिए बंद हो जाता है.. वीरू तोह ऐसे बौखला जाता हिअ मानो किसी बचे से उसका सबसे पसंदीदा खिलौना चीन लिया गया हो

वीरू पुरे दिल से वापस उस खुलते बंद होते दरवाजे क फिर से खुलने की कामना कर hi रहा था की तभी उसके कानो में एक तेज और दर्द भरा सवार गूंज उठता है

“Aaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh…………. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaa………. Jethhhhhhhhhhhhhhhhhh jiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii…………… phaddddddddddddddddddddd gayyyyiiiiiiiiiiiiiiiiii reeeeeeeeeeeeeeeee.. Merrrrrrrrrrrrrrriiiiiiiiiii…….. Gandddddddddddddd”

और ऐसी क साथ वो दरवाजा खुल hi जाता है और अब वीरू देख सकता था की उसके बड़े भाई का मोटा टोपा उसकी पत्नी की गांड क छेद को फैलता हुआ अंदर प्रवेश कर चूका था.. और इसका परिणाम था हर्षिता क चेहरे का लाल पड़ना और उसके चेहरे की नसे तक नज़र आना, जो इस बात का सबूत था की उसे कितनी पीड़ा हो रही थी.. पर फिर भी वो आज किसी भी हाल में पीछे नहीं रहने वाली थी

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh…. पूरा घुसा दो भैया………”

वीरू अपनी जगह बैठा हुआ जोर जोर से अपने मोठे ाँद मसलते हुए मन hi मन अपने भाई से विनती सी कर रहा था, वही उसका बड़ा भाई वह सामने उसकी उपस्तिथि से अनभिग उसकी पत्नी की गांड में अपना लुंड उतरने का कार्य आरम्भ कर चुके थे

“मुझे यकीन नहीं था बहु.. की तुम मेरा लुंड झेल पाओगी, पर तुममे तोह बहुत hi दम है

लगता है मेरे छोटे भाई ने बहुत अचे से खिलाया पिलाया है.. मान गया अपने छोटे भाई को”

महेंद्र अपनी बहु की गांड क छेद में अपना टोपा घुसाने क बाद उसकी तारीफ किये बिना रह नहीं पता.. जिसपे दर्द से तिलमिलाती हुई हर्षिता अपनी गांड क छेद क फैलने का आनंद लेती हुई कामुक और मीठे दर्द को बर्दास्त करते हुए कहती है

“Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. गड्ड्ढड मेरी पहात रही है… और तारीफ अपने भाई की कर रहे है………. Haiiiiiiiiiiiiiiii reeeeeeeeeeeeeeee… जेठ जी……… कितना मीठा मीठा दर्द देते हो…… Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh… अब जल्दी से अपने छोटे भाई का नाम लेके पहाड़ दो आज उसकी पत्नी की गांड.. और घुसा दो अपना पूरा मोटा लुंड.. मेरी गांड में……..”


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अपनी खूबसूरत सावली सलोनी पत्नी क मुख से निकलते इन सब्दो क कारन वीरू का हाथ उसके ाँद से ऊपर की और सरकते हुए एक बार फिर से उसके पुरे लुंड पे चलना सुरु हो गया था, जहा उसका हाथ उसके लुंड की मोती चमड़ी को ऊपर नीचे करते हुए उसे असीम आनंद दे रहा था, पर सच्चा आनंद तोह उसे ये देख क मिल रहा था की आज उसके बड़े भाई का मोटा लुंड उसकी पत्नी की गांड को चीरते हुए अंदर घुसने वाला है.. आसान भाषा में लिखू तोह आज एक पति अपनी आँखें फाड़े अपनी ज़िन्दगी में पहली बार अपनी पत्नी की पहली गांड चुदाई देखने वाला था

बातों hi बातों से महेंद्र को हरी झंडी मिल चुकी थी, इसलिए उन्होंने बिना देरी क अपनी बहु की कमर को दोनों हाथ से मजबूती से पकड़ा और अपना लुंड जो पहले hi गांड क छेद को फैला क अंदर घुसा हुआ था उसे सही रास्ता दिखते हुए अपनी पूरी ताक़त का नमूना दीखते हुए जोर एक ताक़तवर दक्का जड़ दिया.. जिससे एक बार फिर से वीरू को अपनी पत्नी की दर्द भरी चीख सुनने को मिलती है पर इस चीख में दर्द से ज्यादा कामुकता और मिठास घुली हुई थी

"आअह्ह्ह्ह.... मायआ.... मरररररररर गयी..... Haiiiiiiiiiii... मेरी गांड.... Jettttttttttthhhhhhhhhhhhhhhh Jiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii……. अपने छोटे Bhaiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.. की पत्नी हु………… सूरजमुखी गाओं की धनदेवाली nahiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii………. Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh…… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa… Haiiiiiiiiiiiiiiiii reeeeeeeeeeee कहा हो सोनू क Bapuuuuuuuuuuuuuu…. देखो कैसे आपके भाई मेरी गांड पहाड़ रहे है…………. Haiiiiiiiiiiii reeeeeeeeeeeeeeee…….. बहनचोद किया कर दिया मेरी गांड क साथ.... Aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh"


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पर महेंद्र अचे से जनता था.. की अब रुकना नहीं है, आखिर उसने न जाने ऐसी कितनी hi गांड पहाड़ी हुई थी.. इसलिए वो हर्षिता को दर्द से बिलखते हुए देखने क बाद भी नहीं रुका

और सायद वीरू भी वह झोपडी में बैठा हुआ अपने लुंड को जोर जोर से मसलते हुए यानि बुदबुदा रहा था

“Aaaaaaahhhhhhhhhh.. Sabbbbbbassshhhhhhhhhhhh.. Bhaiaaaaaaaaaaaaaaaaayyyyaaaaaaaaaaa… ऐसे hi……. Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh.. पहाड़ दो आज मेरी……… पत्नी की गांड……… पहाड़ दो मेरी हर्षिता की गांड……. Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh”

मानो जैसे बड़े भाई ने छोटे भाई की ीचा सुन ली हो और उसे पूर्ण करने का फैसला भी ले लिया हो, ककी महेंद्र अपना मोटा काला भीमकाय लुंड पीछे की और खींचता है तोह उसका पीले पीले गीले सोने में लथपथ हो चूका लुंड धीरे धीरे हर्षिता की सावली या यु लिखू की काली गांड क भूरे छेद से बहार आते हुए बहुत hi खूबसूरत लगा था.. जल्दी hi सत्तू क बाप का मोटा लुंड पूरी तरह बहार आ चूका था बस उनका मोटा काला गुलाबजामुन जैसा टोपा hi अंदर बचा हुआ था

वीरू ये सब सही से देख नहीं प् रहा था ककी तेज़ बारिश क कारन सब कुछ हल्का झिलमिला सा था पर उसे परवा कहा थी.. ककी उसे तोह उसका एहसास जैसे एक एक पल की सुचना दे रहा हो.. की कैसे उसकी पत्नी की गांड से उसके भाई का मोटा लुंड धीरे धीरे सरकते हुए बहार आ रहा है और कैसे अब अगले बड़े प्रहार क लिए वो लुंड एक बार फिर से पूरी तरह तैयार है



♦️ ♦️ कंटिन्यू... 👇
 
तभी एक दिल बैठा देने वाली तीव्र चीख गाओं क घरों तक सायद पहुंच गयी होगी, ककी महेंद्र ने अपना लुंड अंदर उतर दिया था

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh……….. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa………. जेठ jiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii………………. Aaappppppppppppppppppppp… neeeeeeeeeeeeeeeee तोह सच में………. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh… मुझे धनदेवाली बना दिया है……… Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh……….. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa………….. Ghusaaaaaaaaaaaaaaaaa diyaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa……. Reeeeeeeeeeeeeeeeeeee जड़ तक अपना मोटा लुंड मेरी गांड में……………”


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अपनी पत्नी की ऐसी कामुक चीखें सुनकर बेचारे वीरू क लुंड पे कामुकता की नन्ही नन्ही बुँदे और नज़र आने लगी थी, वही इस समय उसके लिए बारिश की मोती और तेज़ बंधे मानो कुछ पल क हवा में hi रुक गयी हो.. उसे इन्तिज़ार था तोह बस अपने बड़े क जवाब का

महेंद्र जो पहले hi अपने दोनों हाथ अपनी बहु की कोमल त्वचा पे जमाये हुए था वो अपना पूरा लुंड अंदर तक उतारते हुए मानो ख़ुशी से दहाड़ पड़ता है

“Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh.. मेरी गरम बहु… कितनी गर्मी है तेरी गांड में……… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. आअज देख… कैसे तेरी गांड क गर्मी निकलता हु…….. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. बहु तेरी गांड तोह मेरा लुंड जला देगी………. Uffffffffffffffffffffffffffffff… कितनी गरम गांड है तेरी.."

हर्षिता भी अपनी गांड क अंतिम चोर तक अपने जेठ जी का मोटा लुंड अंदर तक बरसदास्त करते हुए मानो कररह उठी थी

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhh.. Nikaaaaaaaaaaaaaallllllllllllllll.. दीजिये जेठ जी……….. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhh…….. मेरी गांड की पूरी गर्मी निकल दीजिये…. पहाड़ दीजिये मेरी निगोड़ी गांड को………. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh.. इसकी गर्मी मुझे हर समय जलती रहती है…….. Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. आज मेरी गांड क छेद को इतना फैला दीजिये की इसकी गर्मी अपने आप hi निकलती रहे… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. Maaaaaaaaaaaaaaaa… छोड़ डालिये मेरी गांड की…….. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa”

महेंद्र जैसा गाओं का देसी मर्द ऐसी बातें सुनकर और क्तिना खुद को रोक पता.. इसलिए वो और समय नस्ट न करते हुए अपनी कमर को पीछे की और चलता है जिससे उसका मोटा लुंड एक बार फिर से 'सोनू की माँ' की गांड से बहार आने लगता है और अगले hi पल उसी वेग से वो मोटा काला भूसंद लुंड अंदर घुस भी जाता है.. जिससे हर्षिता क सरीर को एक जोर का झटका लगता है और उसकी सावली मोती और गोल चूचिया जो नीचे लटक रही थी जोर से हिचकोले सी खा जाती है

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh.. जेठ जी…….. Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh.. Haaaaaaaaaaaaaaaaa… है… ऐसे hi hi…. पहाड़ द्जिये मेरी गांड..”

वीरू भी समझ चूका था की अब खेल पूरा होने क बाद hi समाप्त होगा.. इसलिए वो वही झोपडी क अंदर बैठा हुआ अपने लुंड को जोर जोर से मसलते हुए उसे ऊपर से नीचे.. नीचे से ऊपर की और मसलते हुए उस कामुक दृश्यों का पूर्ण आनंद ले रहा था

“Aaaaaaaaaaaaaaahh.. Haaaaaaaaaaaaaaaaaaaa.. Bhaiyaaaaaaaaaaaaaaa… ऐसे hi जोर जोर से छोड़ो मेरी पत्नी को.. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh.. Aaaaaaaaaaaj पता चला अपनी पत्नी की गांड में दूसरे लुंड को देख क कितना आनंद आता है.. शाब्बाश मेरे Bhaiyaaaaaaaaaaaa.. ऐसे hi पहाड़ डालो मेरी पत्नी की गांड को…. Aaaaaaaaaaaaaahhh.. जोर जोर से छोड़ो मेरी पत्नी..”


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“जोर से छोड़ो जेठ जी.. Aaaaaaaaaaaaaahhhh.. ऐसे hi……… Aaaaaaaaaahhhhhhhhh.. और जोर से छोड़ो… गांड पहाड़ डालो आज मेरी.. Aaaaaaaaaaaaahhhh.. कहा है रे सोनू… देख तेरी मायआ….. कैसे चुद रही है……. Aaahhhhhhhhhhh.. कहा है सोनू क बापू… देखिये कैसे मेरी गांड पहात रही है…….. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhh”

दोनों पति पत्नी में कितना प्रेम है इस बात का सबूत था उसके ये सब्द और उसकी कामुक सोच.. जो लगभग एक जैसी hi था

वही महेंद्र अपना पूरा देसी दम दिखते हुए अपनी ताक़त का एक एक कटरा अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड मरने में लगा दे रहा है.. उसे ेशास भी हो रहा था की उसका इतना मोटा और काला लुंड कैसे अब उसकी बहु की गांड की दीवारों को फैलते हुए अंदर बहार होने लगा था.. और अजीब सी चिकनाहट उसे ये काम करने में मदद कर रही थी

महेंद्र अब पूरा दम लगा क अपना मोटा लुंड अंदर बहार करने लगा था, जिससे सोनू की माँ की मोती और गोल गोल चूचिया बारिश में भीगते हुए और बारिश का पानी अपनी काली काली गुंडियों यानि निप्पल्स से टपकते हुए जोरो से हिल रही थी, मानो जैसे हर्षिता क निप्पल्स भी अपनी मालकिन की गांड चुदाई से खुसी से झूम रहे हो

महेंद्र पूरा दम लगा क दकके मर रहा था, जिससे उसका मोटा लुंड जोर से बहार आता और फिर उतनी hi गति से अंदर तक घुसता चला जाता.. उफ़ कितना कामुक दृस्य है ये में सही से लिख भी नहीं सकता हु

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. बहु… Aaaaaaaaaaaaaaaj तोह तेरी गांड का घु निकल दूंगा….”


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“Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. निकल दीजिये जेठ जी.. जो चाहे आज निकल लीजिये.. आज अपने भाई क पत्नी की ये गांड आपके हवाले है.. जो चाहे करिये मेरी गांड क साथ”

हर्षिता भी बारिश में एक अनजान आदमी क खेत में कुटिया बानी हुई अपने दोनों हाथों को पानी से भरे हुए मिटटी वाले खीचड़ में भरे हुए दोनों हाथों को खेत क कीचड़ में जमाये हुए जोर जोर से अपने पति क बड़े भाई से अपनी गांड मरवाये जा रही थी

इस बीच कितनी hi बार बारिश अपना उग्र रूप भी धारण कर लेती, पर माना पड़ेगा जेठ बहु की इस जोड़ी को जो एक पल क लिए भी विचलित नहीं हो रहे थे.. और अपने काम में लगे हुए थे

वीरू तोह हर एक पल का भरपूर आनंद ले रहा था और इस बात का सबूत था उसकी मुठी में जमा हुआ उसका 7” का मोटा लुंड जिसकी चमड़ी जोर जोर ऊपर निचोड़ घर्षण करते हुए उसे असीम आनंद दे रही थी

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh.. हाआआआआ… ऐसे hi भैया.. जोर से छोड़ो मेरी पत्नी हो.. Aahhhhhhhhhhhhhhhh… उफ्फ्फ्फ़… शाब्बाश हर्षिता… तू कितनी अछि है… जो अपने गांड में मेरे बड़े भाई का बड़ा लुंड ले रही है…. Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh.. जोर से भैया.. जोर से छोड़ो मेरी पत्नी……”

महेंद्र क हर एक जोरदार दकके की वजह से ‘घर की छोटी बहु’ का जिस्म बुरी तरह काँप रहा था, मानो जैसे वो दर्द से तरप रही हो.. पर ये दर्द नहीं आनंद था.. असीम आनंद

महेंद्र अब तक अपनी बहु की कमर को पकडे हुए जोरदार दकके मरते हुए उसकी गांड का कचूमर बना रहा था.. पर अब उसने अपना एक हाथ उसके कंधे पे रख क वह अपनी पकड़ बनाते हुए उसकी सावली गांड क अंतिम चोर तक अपना लुंड घुसते हुए जोर जोर से घर की छोटी बहु को छोड़ने का महँ काम कर रहा था


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“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. Bahuuuuuuuuuuuuu.. तुम्हारी गांड की गर्मी तोह काम hi नहीं हो रही है.. लगता है बहुत पुराणी गर्मी है.. पर में आज साडी गर्मी निकल दूंगा”

ये वो सब्द थे जिसके बोलते हुए महेंद्र क दक्कों में और रफ़्तार आ गयी थी

"आआअह्ह्ह्ह.. मायआ... haiiiiiiiiiiiiiiiii जेठ jiiiiiiiiiiiiiiiiii...Uffffffffffffffffffff आअज्ज्ज्ज तोह आपने सच में मेरी गांड पहाड़ daaaliiiiiiiiiiii.. हैईईई रीई.. जलन होने लगी है मेरी गांड में……. Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhh.. पर आप रुकना नहीं.. Aaaaaaaaaaaaaaaahhh.. आअज पूरा दम लगा क छोड़ो.. जोर से छोड़ो जेठ जी… जोर से छोड़ो अपने छोटे भाई की पत्नी को…. Aaaaaaaaaaaaahhhh….meri गांड.... हीी..........."

वीरू का बड़ा भाई भी अब कहा रुकने वाले था, उनका लुंड तोह सविता की देवरानी की कासी हुई गांड मैं अंदर तक घुस चूका था.. इसलिए वो पूरा जोर और अपना दम लगा क उस काली गांड को छोड़ने में लगे हुए थे

महेंद्र- (अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड मरते हुए) आआआहहह... बहुउउउउउउउउ... कितनी कासी गांड थी………. पर देखो मैं आज ऐसे ढीला करके hi रहूँगा……. Aaaaaaaaaaaahhh... उफ्फफ्फ्फ़... कितने समय से अरमान था.. तुम्हारी गांड मरने का... आआअह्ह्ह्ह... आज तुमने मेरा ये सपना पूरा साकार कर दिया... उफ्फफ्फ्फ़...... आआह्ह्ह्हह्ह.....

वीरू जो अब भी उस झोपडी में उसी चारपाई पे बैठा हुआ सामने खेत में खीचड़ में झुकी हुई अपनी पत्नी की गांड चुदाई देखते हुए जब अपने भाई क सपने क बारे में सुनता है तोह मानो जैसे उसके हाथ में और जोश भर जाता है और वो और जोर जोर से अपना लुंड को ऊपर नीचे करते हुए मज़े लेने लगता है

“Aaaaaaaaaaaaaaahhh… आअज सरे सपने पुरे कर लो भैया… जैसे चाहे वैसे छोड़ो मेटि पत्नी.. जितना चाहे उतना छोड़ो मेरी पत्नी.. Aaaaaaaaaaaaaahhhh.. पहाड़ डालो मेरी पत्नी की गांड को.. Aaaaaaaaaaaaaaahhh”


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♠️ ♦️ ♠️ कंटिन्यू... 👇
 
“आआअह्ह्ह... माआआआ...... haiiiiiiiiiiiiiiii… उफ्फफ्फ्फ़... माआ.... हीी जेठ जी मुझे ख़ुशी है की आपका एक सपना मैं आज पूरा कर पायी”

हर्षिता को भी इस बात की ख़ुशी होती है की वो अपने जेठ जी.. या यु कहे उनके लुंड क कुछ काम आ सकीय

ये खेल आगे न जाने और कितनी hi दिएर यही उसी खुले खेत और खुले आसमान क नीचे चलता hi रहता है, और एक जेठ अपने घर की इज्जत से खेलता रहता है.. जिसे छोड़ने वाले से ज्यादा आज छोड़ने वाली को आनंद आ रहा था

महेंद्र- (जिसके दक्कों में तूफानी तेजी आने लगी थी) आआआहहह... बहु बस अब होने वाला है…….. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhh... आआह्ह्हह्ह्ह्ह.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़....... तुम्हारी जैसी गांड आज तक नहीं मरी मैंने.. बहुत खुसकिमत है वीरू

वीरू क बड़े भैया पूरी तरह पसीने मैं नाहा चूका थे, और मालती की देवरानी का भी कुछ ऐसा hi हाल था.. पर दोनों hi इस खेल मैं लगे पड़े थे.. और उन्हें देखते हुए वीरू अपना लुंड का पानी किसी भी पल बहाने वाला था

महेंद्र क हर जोरदार आखिरी दकके क कारन हर्षिता को असीम दर्द मिल रहा था.. जो उनके चेहरे से पता भी चल रहा था की, और ये भी की उसे कितना सुकून दे रहा है वो नया दर्द

हर्षिता खुद भी अपनी कमर को जोर जोर से पीछे की और धकेलने लगी थी, जो इस बात का सबूत था की वो भी इस खेल में अचे से जितना च रही थी.. या ये मानो आज किसी भी हाल मैं ये अनोखा आनंद चाहिए hi था उन्हें

"आआआह्ह्ह्ह... माआआ..... हैईईईई..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह..... माआआआआ........."

वैसे इस पुरे प्रकरण में एक अनोखी बात थी की जेठ या बहु में से किसी ने भी गाली का प्रयोग नहीं किया था.. यानि गांड में लुंड घुसने क बाद भी संस्कार मरे नहीं थे

हर्षिता खेल क अंतिम हिस्से का भरपूर आनंद लेते हुए

"आआअह्ह्ह.... माआ.... हीी..... ेस्स्स्सह्ह... और जोर से जेठ जी.. Aaaaaaaaaaahhhhhh.. ऐस इ hi छोड़िये अपने छोटे भाई की धर्मपत्नी को…… Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhh……..Maaaaa..."

महेंद्र क बचे अंतिम दक्कों में इतनी ताक़त थी की हर्षिता की गोल और शाक्त चूचिया जोरो से नृत्य करते हुए हिलोरे खा रही थी.. वही उसके गले में लटक रहे उसके पतिव्रता होने की निशानी जोरो से हिलते हुए उस आनंद का सबूत बन रही थी

जल्दी hi सविता क पति क जोरदार दक्कों क कारन 'सुरीली देवी' की छोटी बहु अपनी हिम्मत खो देती है वही उस कीचड़ बन चुके खेत में जिसमे पुरे तरह मिटटी वाला गन्दा पानी भरा हुआ था उसमें वही नीचे पूरी तरह बिच सी जाती है.. और जोरो से हाफने लगती है

“Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh………. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa………………… uffffffffffffffffffffff…. Uffffffffffffff ये आनंद………. Haiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii……….. Reeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee……… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa…. जेठ जी……. मेरी गांड……….”

पर 'स्वर्गवासी सुरीली देवी' का बड़ा बीटा अब भी उसकी बहु को नहीं चोरता है और उस हालत मैं भी अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड का गोदाम बनाने पे लगा रहता है.

अपने बड़े भाई की ऐसी icha-shakti देख क वीरू को भी उनपे गर्व होने लगा था.. और वो जोर जोर से अपने लुंड से खेलते हुए बुदबुदाए जा रहा था

“Aaaaaaaaaaaaaaaahhh.. Sabbashhhhhhhhhhhhh… भैया……. भर दो मेरी पत्नी की गांड को.. Aaaaaaaaaaaaaahhhh.. भर दो अपना गाड़ा माल मेरी पत्नी की गांड में…… Aaaaaaaaaaahhhh”.

महेंद्र अपने बचे हुए अंतिम समय का पूरा प्रयोग करते हुए कोई भी कसार नहीं चोर रहा था..

"आआअह्ह्ह... मेरी बहु... आआह्ह्ह्हह... ये लोओओओओ... लूओ... और लो............ आआअह्ह्ह्ह..."

वीरू पूरी जान लगा क अपना लुंड मसलते हुए अपनी पत्नी की गांड में अपने भाई का मोटा लुंड घुसते हुए देख रहा था.. और सामने खेत में अपनी पत्नी की चुदाई देखते हुए उन्हें देखते हुए पूरी म्हणत से अपना लुंड मसल रहा था

"आआआअह्ह्ह... मायआ...... हैईईई...... ऐसे hi.... और जोर से.... आआआहहह.... Ufffffffffffffffffff.. जेठ जी और कितना छोड़ोगे.. Aaaaaaaaaaaaaaahhhh.. साडी कसार एक hi दिन में निकल लोगे किया.. बस करो.. अब तोह रोज़ रोज़ छोड़ना है आपको मुझे.. Aaaaaaaaaaaaahhh… हीी........"

हर्षिता फिर से हिम्मत दिखती है.. और दोनों हाथों क सहारे ऊपर उठते हुए अपने जेठ जी से चुड़ते हुए वापस गोदी बन जाती है.. पर अब उसकी गोल और सख्त चूचिया और उसका पेट पूरी तरह कीचड़ से सं चूका था.. जो पीठ पे गिरने वाले पानी क नीचे की और बहकर आते हुए पानी से धीरे धीरे धुलना भी सुरु हो गया था

"आआआअह्ह्ह्ह... माआआआ............. मायआ....... उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.............. हीी...... मायआ...... हैई...... रईईए... ऐसे hi ऐसे hi ऐसे hi छोड़िये जेठ जी... उफ्फ्फ्फ़.... पहाड़ दीजिये मेरी गांड... हीी... मायआ… जोर से छोड़ो अपने भाई की बीवी"


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हर्षिता की उखड़ती हुई साँसों क साथ साथ उसके गले में पड़े उसकी सुहाग की निशानी भी जोरो से हिल रही थी, और इस समय वीरू बस वही देख रहा था.. जिससे उसका आनंद कई गुना बढ़ता जा रहा था

अगले कुछ और दक्कों क बाद भी जब महेंद्र इस खेल में हरने का नाम नहीं ले रहा था.. तोह हर्षिता धीरे धीरे हारना सुरु हो गयी थी ककी थकावट और आनंद की वजह से उसकी आँखों बंद होती जा रही थी

“Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh.. Haiiiiiiiiiiiii… reeeeeeeeeeeeee… जेठ जी…….. Esssssssssssssssshhh.. आज सच में आपने मेरी गांड पहाड़ diiiiiiiiiiiiiii… Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhh”

"आआआअह्ह्ह....... आआह्ह्ह्हह्ह........ मेरी सलोनी बहु..... लो.... और लो..... ये भी लो..... आआअह्हह्ह्ह्हह... मेरी पियरी बहु.. आआआआअह्ह्ह....."

महेंद्र क ये सब बता रहे थे की वो किसी भी पल इस खेल क अंतिम चोर पे पहुंच सकता है

हर्षिता- आआअह्ह्ह... माआ... भर दीजिये जेठ जी.... मेरी गांड... आआह्ह्ह्ह... भर दीजिये अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड को अपने माल से……. Aaaaaaaaaaaahhhh

महेंद्र एक आखिरी जोर का दार दक्का मरता है.. और अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड मैं अपना वीर्य भरना सुरु कर देते है

“Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhh…… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa”

महेंद्र खुद भी अपने लुंड से निकलते अपने गाड़े रास क आनंद से भर उठा था

सायद ऐसी कारन उसके मुंह से भी ख़ुशी भरी ाः फुट पड़ी थी, पर ये आह एक नहीं दोनों भाइयों की फूटी थी ककी ऐसी पल वीरू न लुंड भी अपनी आग उगलने लगा था और एक नए मज़े क कारन उसकी आँखें ख़ुशी से बंद होने लगी थी


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वीरू की पत्नी हर्षिता एक बार फिर वही उसी कीचड़ और पानी से भरे हुए खीचड़ में पूरी थकी हुई डैम से गिरते हुए बिच सी जाती है और ठीक ऐसी पल दूर कही जोर से बिजली चमकती है मानो आज ये बिजली कही गिर क hi मानेगी

♦️ ♦️ ♠️ ♦️ ♦️

आशा करता हु ये अपडेट आप सभी को पसंद आया होगा.. पर ऐसी क साथ कई सवाल भी खड़े हो गए है ?

⭐ महेंद्र और हर्षिता यहाँ इस खेत पे कैसे आये ?


⭐ दोनों क बीच ऐसा किया हुआ की बात इतनी आगे बाद गयी ?

⭐ ये खेत किसका है.. और यहाँ वीरू किया कर रहा था ?


⭐ और सबसे बड़ी बात, ये सब कब हो रहा है ?

ऐसे और भी अनगिनत सवालों और उनके जवाबों क साथ मैं जल्दी लौटाऊंगा


आपका मित्र - मोनू
 
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नई अपडेट पोस्टेड 👆 (पेज No. 395-396)

🔗 Post in thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running'
 
बारिश की रफ़्तार इस समय थोड़ी सी काम हुई थी, या यु कह सकते है की आज बारिश भी मज़ाक कर रही थी.. कभी रफ़्तार पकड़ती तोह कभी बस माध्यम मीठी बौछार क साथ सुंदरपुर की भूमि को ठंडा और यहाँ क लोगो को गरम करने का कार्य करती

- भविस्य क अपडेट से..
 
अपडेट #20

सन 🖼️ #03

मेरा पल्लू सरक सरक जाये

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अपकमिंग अपडेट...
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 395-396



अपडेट #20




सन 🖼️ #03

मेरा पल्लू सरक सरक जाये




दिन क करीब 1 बजे...

आज सुबह से होती इस बारिश ने पुरे मौसम को ठंडा कर रखा था, पर सुंदरपुर गाओं हमेशा से hi उलटी प्रवृति का रहा है.. यहाँ जब हर तरफ ठण्ड बढ़ती है तोह लोगो क अंदर की गर्मी उसके विपरीत बाँड्ने लगती है

और ऐसे मौसम में भी अगर आप गाओं क खेत खलियान क कोनो की जांच करेंगे तोह कही न कही आपको छूट गांड का कामुक खेल चलता हुआ नज़र आ hi जायेगा.. जहा कोई गर्दै हुई औरत किसी मोठे लुंड पे बैठ क उछलती हुई मिल जाएगी तोह कही कोई जवान लड़का अपनी माँ सामान औरत की बड़ी बड़ी चूचियों को चूसते हुए उसके गरम दूध का सेवन करता हुआ मिल सकता है

बाकि सुंदरपुर गाओं कैसा है ये तोह अब तक आप अचे से जान hi चुके है, और जो नहीं जान पाए है वो तोह मैं बताता hi रहूँगा.. यहाँ कामुकता का ये खेल चलता hi रहता है, फिर चाहे मौसम में कितनी hi ठण्ड क्यू न भर जाये

दिन क करीब 1 बज रहे होंगे और बारिश अपनी गति पकडे हुए थी.. और अगर देखा जाये तोह सायद ये वही समय है जब पहलवान क खेत में कुंदन की गरम पत्नी अपने यौवन और अपने महाराण्डी होने का साबुत सत्यम को दे रही है

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ठीक ऐसी पल एक पुराने से कहते क नीचे चिपटे हुए सोनू का बाप और महेंद्र का छोटा भाई वीरेंदर उर्फ़ वीरू अपने खेतों का काम निपटा क घर की और वापस चल चूका था

वैसे तोह ये छठा बस नाम मात्र क लिए था ककी वो पूरी तरह भीग चूका था, उसकी लुंगी क ऊपर उसकी सफ़ेद शर्ट कुछ इस प्रकार से भीग क उसके हलके भरे और देसी बदन से चिपक चुकी थी उसके सीने क बाल तक नज़र आने सुरु हो गए थे, वैसे जहा तक मुझे याद है मैंने आपको वीरू क बारे में ज्यादा अचे से बताया नहीं है तोह चलिए पहले थोड़ा बता देता हु

वीरू एक ऐसा मर्द है जिसने जवानी किया होती है इसका ज्ञान घर क बंद दरवाजे में लिया और वो कैसे हुए ये आगे कभी हम भविस्य में अचे से जानेंगे और चीज़ों की कामुकता को और अचे से समझेंगे

पर अभी क लिए ये जानना जरुरी है की वीरू थोड़ा अपने में रहने वाला मर्द है जो हर रोज़ सुबह अपनी सलोनी पर कामुक पत्नी हर्षिता से प्रेम करने का मौका ढूंढ़ता रहता है और फिर गाओं क दूसरे मर्दो की भांति अपने खेतों की और निकल पड़ता है, जहा शाम तक का पूरा समय वही उसके खेतों पे hi गुजरता है

वीरू एक बहुत hi मेहनती और सीधे साढ़े विचारों वाला इन्शान है पर इसका ये मतलब नहीं की उसके अंदर कामुकता की कोई कमी है, शारीरिक अग्नि की उसके अंदर कोई कमी नहीं है.. पर ये अग्नि सबसे ज्यादा कब प्रज्वलित होती है ये तोह आप पिछले अपडेट क द्वारा भली भांति जान hi चुके है

7” क कठोर लुंड का मालिक वीरू अपने परिवार और अपने छोटे से संसार में खुस था, तूफान तोह तब आया जब उसके बड़े भाई 'कुंदन' क बेटे क साथ वो दुर्घटना हुई और फिर कैसे पूरा परिवार इतने सालों बाद एक छत्त क नीचे लौटा ये आप जान hi चुके है

वीरू हमेशा से hi अपने दोनों बड़े भाई और अपनी दोनों बड़ी भौजाई का बहुत hi सम्मान करता आया है और कही न कही हमेशा उनसे जुड़ क रहने की कामना करता रहता था

पर फिर जीवन में आयी उथल पुथल क चलते जो बदलाव आये उस सब क कारन काफी कुछ बदलता चला गया, पर इतने सालों बाद एक बुरी और ददख भरी घटना से hi सही.. पर उसने पुरे परिवार को एक साथ एक छत्त क नीचे आखिर ला hi दिया

वीरू अपने खेतों से पूरी तरह भीगी हालत में खेतों क बीच पतली पगडण्डी पे चलते हुए आगे बड़ा जा रहा था जहा बारिश की तेज़ बौछार और ठण्ड उसके सरीर की परीक्षा लिए हुए थी, रफ़्तार से चलती हवाओं क कारन उसका छठा बार बार उसके हाथ से निकलने की पूरी कोशिश कर रहा था, वैसे अभी भी वीरू खेतों क बीच hi कही था

“थोड़ी दिएर क लिए कही रुकना hi सही होगा”

वीरू खुद से ये कहते हुए वही एक खेत में नज़र आती झोपडी की और बाद चलता है, सायद उसका ये फैसला सही भी था ककी बारिश और उग्रह रूप धारण करती जा रही थी और आसमान में बादल पहले से ज्यादा काले होते जा रहे थे

ऊपर से नीचे तक पूरी तरह भीग चूका वीरू उस झोपडी की और बाद चला था.. जहा खेत का सन्नाटा और गीली मिटटी की सोंधी सोंधी खुसबू इस बात का प्रमाण थी की वो झोपडी इस समय पूरी तरह खली है

वैसे अगर ये सवाल मन में आ रहा है की वीरू ये अचानक खेत पे कैसे आ गया और अब घर क्यू लौट रहा है तोह चलिए पहले एसपी hi थोड़ी रौशनी दाल ली जाये.. बाकि इस समय वीरू जिस खेत की झोपड़ी की और बाद रहा है, वह कोनसी कामुक बारिश बरसाने वाली है ये तोह आप पहले hi पद चुके है 😉

स्वर्गवासी मुरली दस क घर में.. सुबह क करीब 11 बजे

चारो तरफ फैले काले बादलों क कारन सुबह का समय एक बार फिर से रात क अँधेरे में बदलता नज़र आने लगा था और ऐसे में होती घनघोर बारिश इस मौसम को और संजीदा बना रही थी

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बारिश की तेज़ बंधे ऊपर छप्पर पे गिरते हुए अपने शोर से अपने आगमन की सुचना देती जा रही थी.. वही घर क बहार की कच्ची मिटटी और बड़े से बहार क आँगन में पानी पूरी तरह भरा हुआ नज़र आ रहा था और इन सभी क कारन मिटटी और पानी की मनमोहक सी खुसबू चारो और फैली हुई थी, पर ये खुसबू और इसकी एहमियत सिर्फ एक किशन या गाओं से जुड़ा व्यक्ति hi जान सकता है

इस समय छप्पर क नीचे वीरू अपने बड़े भाई महेंद्र, बड़े भतीजे सत्तू और अपने पुत्र सोनू क साथ बैठा हुआ था, जहा सोनू और सत्तू एक चारपाई पे विराजमान थे वही महेंद्र और वीरू एक चारपाई पे बैठे हुए था.. तभी महेंद्र अपने पैरों को हल्का सा हिलता है मानो जैसे उन्हें सीधा करने की कोशिश कर रहा हुआ.. वीरू बिना समय गवाए थोड़ा सा किरणे हो जाता है मानो वो अपने बड़े भाई क मन का हाल भली भांति जानता हो

अपने छोटे भाई की इस छोटी सी हरकत में भी महेंद्र ने उसके अंदर अपने लिए इतना सम्मान देख क ख़ुशी से भर उठा था

वीरू- (पूर्ण रूप से फैली हुई शांति को भांग करते हुए) किया हुआ भैया, पैरों में दर्द है किया ?

मानो जैसे वीरू ने अपने भाई क बस पेअर फैलने क तरीके से उसके सरीर की इस्तिथि को जान लिया हो, जिसपे महेंद्र क चेहरे पे मुस्कान चुप नहीं पाती और वो बस है में अपना सर हिला देता है

वीरू बिना समय गवाए अपने दोनों हाथ आगे करके अपने बड़े भाई क पैरो पे रख देता है.. जिससे तुरंत hi महेंद्र बोल पड़ता है

“अरे ये किया कर रहा है ?”

वीरू मुस्कुराते हुए

“पेअर दबाने जा रहा हु.. और किया ?”

महेंद्र धीरे से है पड़ता है

“पागल है किया, इतना बड़ा होक पेअर दबाएगा.. बचा थोड़ी है अब”

पर वीरू सुनता कहा है वो तोह अपना काम जारी रखते हुए अपने हाथों का धीमा सा दबाव अपने बड़े भाई की मजबूत जाँघों पे लगते हुए हस्ते हुए कहता है

“कहा बड़ा हुआ हु.. आपके लिए तोह वही बचा हु”

वीरू क स्नेह और उसकी बात पे महेंद्र धीरे से है पड़ता है वही दोनों भाइयों का आपसी प्रेम और अपनापन देखते हुए पास में दूसरी चारपाई पे बैठे दोनों भाई भी है पड़ते है यानि सत्तू और सोनू

पर तभी पीछे से एक सुरीला सा स्वर सुनाई पड़ता है

“मुझे नहीं पता था की यहाँ इतना प्रेम भरा दृस्य देखने को मिलेगा”

दोनों भाइयों क साथ साथ दोनों जवान लड़के भी उस स्वर की दिशा की और देखते है जहा एक खूबसूरत सी साड़ी में अपने कामुक और कैसे हुए सरीर को सँभालते हुए सलोनी सूरत वाली हर्षिता कड़ी मुस्कुरा रही थी और उसके हाथ में एक ट्रे थमी हुई थी जिसमे दूध क गिलास नज़र आ रहे थे.. और उस दूध का रंग बता रहा था की वो अनगिनत बिमारियों से लड़ने की ताक़त देने वाला हल्दी का दूध है

हर्षिता को देखते hi महेंद्र अपने पेअर सीधा करने की कोशिश करता है ये सोचते हुए की अपनी पत्नी क सामने यु पेअर दबाना सायद वीरू को ाचा न लगे पर वीरू तोह अपना कार्य बंद hi नहीं करता

“अरे लेते रहिये न”

सायद वीरू.. महेंद्र क मन की इस्तिथि को समझ गया था

हर्षिता भी पहले दोनों बच्चों की और आगे बढ़ते हुए अपने पति और अपने जेठ जी को देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

“सही कह रहे है जेठ जी ये.. हमे भी तोह थोड़ा पुण्य मिलना चाहिए न”

हर्षिता की बात सुनते hi वीरू हस्ते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में बोल पड़ता है

“तू भी आ जा.. तुझे भी पुण्य मिल जायेगा”

वीरू की बात पे सभी है पड़ते है पर हर्षिता इतनी आसानी से अपने पति को आगे कैसे रहने देती, आखिर वो गाओं की नारी है.. वो भी संस्कारी

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"आप तोह अपना देखिये.. मुझे जब पुण्य चाहिए होगा, तोह खुद आगे बड़के ले लुंगी”

हर्षिता एक पल क लिए रूकती है और दोनों बच्चों की और आगे बढ़ते हुए उनके सामने जेक अपने जेठ जी को देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

“क्यू है न.. जेठ जी"

हर्षिता की मुस्कान और उसके अंदाज में न जाने किया था ककी एक पल क लिए महेंद्र का गाला सा सूख गया था, पर वो जैसे तैसे अपना गाला गीला करते हुए जल्दी से है में सर हिलाते हुए दूर तक होती घनघोर वर्षा की और देखने लगता है.. जिसकी ठंडी ठंडी हवा इस समय छप्पर क नीचे भी पुरे वातावरण को पूर्ण ठंडा किये हुए थी

हर्षिता हल्दी वाले दूध की ट्रे लिए हुए सबसे पहले सत्तू क आगे झुकती है

“देखो तुम्हारे लिए गरमा गरम दूध लाइ हु.. जल्दी से मुंह लगा लो”

हर्षिता जैसे hi सत्तू की और उसके आगे झुकती है उसका पल्लू खुद hi उसके सरीर से बेवफाई करते हुए अलग हो जाता है, मानो उसे पहले से पता हो की सत्तू जैसे जवान लड़के क सामने उसका काम किया है..

और ऐसा होते hi उसके ब्लाउज में बंधे हुए उसके कैसे 'गोला आम' जैसी चूचियों की गहरी घाटी नज़र आने लगती है और ऐसा लगता है जैसे अब उन भरी 'गोला आम' का पूरा भार ब्लाउज क आगे क उन 3 बटन पे आ गया हो.. पर जैसा उनमें खिचाव नज़र आ रहा था उससे तोह यही लग रहा था की किसी भी पल वो ब्लाउज आगे से खुल जायेगा और सायद ऐसा hi होता अगर हर्षिता और कुछ दिएर उसी प्रकार सुबह की ठण्ड में अपना गरम नज़ारा दिखती रहती

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वैसे इस पुरे समय हर्षिता क जवान बेटे का पूरा धियान उसके मोबाइल पे लगा हुआ था जिसमें वो जाने किया देखे जा रह था, मानो एक पल क लिए भी अपने फ़ोन से दूर नहीं हो सकता था

सत्तू- (जिसे ऐसी ठण्ड में भी हल्का सा पसीना महसूस हो गया था) जी.. जी चची… मैं वो

हर्षिता मुस्कुराते हुए अपनी गहरी घाटी का नज़ारा दिखते हुए दूध का गिलास सत्तू की और आगे बड़ा देती है जिसे सत्तू अपने हौले से कांपते हुए हाथों से थाम लेता है पर इस कुछ पल क कार्यक्रम में हर्षिता सत्तू को निहारते हुए मुस्कुराये जा रही थी और बेचारा जवान सत्तू अपनी जवानी क जोश से अनभिग कांपे जा रहा था.. ये सोच सोच क की यही पास में पिताजी और चाचा है और सबसे बड़ी बात तोह उसके बगल hi सोनू बैठा हुआ है

हर्षिता धीरे से कड़ी होती है और एक हाथ से अपने पल्लू को सँभालते हुए ऐसे उसे अपने सरीर पे डालती है मानो उसका अंग प्रदर्शन का कार्य पूरा हो चूका हो.. पर इस पुरे समय वो सत्तू को निहारते हुए उसके घबराये हुए चेहरे को देखते हुए बस मुस्कुराये जा रही थी

हर्षिता सत्तू को दूध का गिलास थमने क बाद अपने जवान होते बेटे की और बढ़ती है जहा सोनू पूरी तरह अपने मोबाइल में न जाने किया hi देखे जा रहा था

“किया पूरा दिन मोबाइल में घुसा रहता है.. ये ले दूध पि”

सोनू अपने मोबाइल से अपना चेहरा हटते हुए बुरा सा मुंह बनाते हुए

“आप तोह मेरे मोबाइल…”

सोनू इतना hi बोल पाया था ककी उसके आगे क सब्द उसके अंदर hi अपनी कब्र बना चुके थे और उसकी वजह थी.. उसकी खूबसूरत सलोनी माँ इस समय दूध का गिलास लिए हुए उसके आगे झुकी हुई थी

वैसे इस बार तोह हर्षिता क पल्लू ने कोई देखा नहीं दिया था पर सोनू क लिए इतना hi बहुत था, ककी पल्लू क किनारे से नज़र आती हलकी झांकी भी उसका दिन बनाने लगी थी

“कहा खो गया.. दूध पीना hi पड़ेगा, कोई नाटक नहीं सुनूंगी..”

सोनू अपना हाथ आगे बड़ा क हल्दी वाले दूध का गिलास लेते हुए मुस्कुरा क कहता है

“ जरूर माँ.. दूध पीने क लिए तोह मैं हमेशा तैयार रहता हु”

हर्षिता अपने जवान होते बेटे की बात सुनकर एक पल क लिए उसे घूर क देखती है तोह इस एक पल में hi सोनू का जान अटक जाती है और मन में तरह तरह क विचार आने लगते है मानो किसी भी पल एक जोरदार थप्पड़ पद सकता है.. पर ऐसा कुछ नहीं होता, ककी अगले hi पल हर्षिता मुस्कुरा उठती है और धीरे से कहती है

“लगता है तुझे दूध बहुत पसंद है.. मेरा”

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सोनू को समझ नहीं आता की उसने जो सुना है वो सच है या एक पल क लिए उसे बस वेहम हुआ है, पर उसे उसी उलझन में चोरते हुए हर्षिता वापस से सीधा कड़ी होती है और अपने पति और जेठ की और आगे बाद चलती है जहा महेंद्र तोह उस समय छप्पर क बहार कुवे की देख रहा था.. जहा बहार का पूरा हिस्सा पानी से भरता जा रहा था

हर्षिता अपने पति की और देखते हुए अपनी आँखों क इशारे से पूछती है किया हुआ.. जिसपे वीरू न में सर हिलाते हुए अपने बड़े भाई क पैरों की हलकी मालिश सी करते हुए वही बैठा हुआ था

हर्षिता सबसे पहले अपने जेठ जी को दूध का गिलास देते हुए मुस्कुरा क कहती है

“याद से पि लीजिएगा.. बड़की भौजाई का आदेश है”

जिसपे उसका जेठ यानि महेंद्र न जाने क्यू इस पल उससे नज़रें नहीं मिला प् रहा था, वो इधर उधर देखते हुए जल्दी से दूध का गिलास थमते हुए बस है में सर हिला देता है, और फिर हर्षिता बचा हुआ गिलास अपने पति परमेश्वर की और बढ़ाते हुए धीरे से मुस्कुरा क उसके पैरों क बीचे इशारा करती है, जिसपे वीरू हल्दी वाले दूध का गिलास थमते हुए धीरे से बस मुस्कुरा पड़ता है

इसके बाद तोह हर्षिता क लिए वह कुछ बचा hi नहीं था इसलिए वो वह से सीधा रसोईघर की और चल पड़ती है, जहा एक नया आश्चर्य उसका इन्तिज़ार कर रहा था

कंटिन्यू.. इन अपडेट #20, सन 04


✨ ताक़त वाला दूध ✨



ों संडे 21-12-25
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 406



अपडेट #20


सन 🖼️ #04

ताक़त वाला दूध

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सुबह क दस बजने को थे, या शायद 10 hi बज चुके थे.. वैसे भी इस समय या आज दिन कोण hi घडी पे नज़र जमाये हुए है, आज तोह इस घर में या इस घर क लोगो क बीच जो हो रहा है या आज क इस बारिश क दिन क कारन जो होने वाला है.. उसका हिसाब रखना वैसे भी इतना आसान नहीं होगा

ककी बारिश की ये बंधे जहा सुंदरपुर गाओं में ठण्ड को लगातार बड़ा रही थी.. तोह वही साथ साथ यहाँ क लोगो की गर्मी भी निरंतर बढ़ती जा रही थी

वैसे इस 1 दिन क कारन कई जगह एक साथ ज्वाला भी भड़क चुकी थी, जिसके बारे में हमने अब तक काफी कुछ जाना है और आगे भी जानने वाले है

देखा जाये तोह ये दिन पूर्ण होते होते न जाने आज कितनो क वस्त्रो को उनके सरीर से अलग करने वाला है.. और न जाने कितनो को कामुकता और हवस की नयी परिभाषा सीखने वाला है, ाशन भाषा में कहु तोह बारिश का ये दिन पूर्ण होते होते न जाने कितनो क रिश्तों क नाम बदल देगा

सुबह 9 बजे hi अपने काले बादलों से बारिश की सुचना देने क बाद अब तक किया कुछ हो चूका है आपने जाना hi है.. पर जैसा की मैंने पिछली बार भी कहा था अभी बहुत कुछ बचा हुआ है आपको बताने क लिए और आपके साथ hi उसे खुद भी जीने क लिए

बारिश की रफ़्तार इस समय थोड़ी सी काम हुई थी, या यु कह सकते है की आज बारिश भी मज़ाक कर रही थी.. कभी रफ़्तार पकड़ती तोह कभी बस माध्यम मीठी बौछार क साथ सुंदरपुर की भूमि को ठंडा और यहाँ क लोगो को गरम करने का कार्य करती

वैसे बारिश इस समय थोड़ी सी काम हो राखी थी, सिर्फ हलकी फुहार जैसी बची थी.. जिसने पुरे गाओं और महेंद्र क घर में सीट लहर जैसा वातावरण बना रखा था, घर क लोग.. खास करके स्वर्गवासी सुरीली देवी क घर की औरतों को थोड़ी रहत सी जरूर थी पर हम तोह जानते hi है की ये सिर्फ कुछ पलों का सुकून है

ककी आज का पूरा दिन घनघोर बारिश का है, जैसे बादलों ने थान लिया हो की आज ज़मीन को भीगते hi रहना है.. वैसे भी आपको मेरी Maa(Maalti) की छूट में बरसते सत्यम क लुंड की बूंदों वाले दृस्य तोह याद hi होंगे

देखा जाये तोह अभी बारिश को खासा समय नहीं हुआ था पर उसकी भीसाद गति क कारन अभी से घर क आँगन में ाचा खासा पानी भर चूका था.. आँगन की गीली मिटटी पर बारिश की बूंदों ने लगातार गिरके उसके अंदर छुपी हुई मीठी खुसबू को आज़ाद कर दिया था, पर सारः hi साथ घर में मिटटी क पैरों क कारन खीचड़ क निशान भी नज़र आने सुरु हो गए थे

सत्तू ने बारिश आरम्भ होते hi पक्की ईंटें आँगन में बिछा दी थी, ताकि घर क लोग बिना किसी परेशानी क इधर उधर aana-jaana कर सके.. वैसे जल्दी hi उन ईटों पे भी फिसलन नज़र आने लगती है

बारिश क साथ चलती ठंडी हवा क हर झोंके में बदन सिहरा देने की ताक़त थी, मौसम इतना ठंडा हो चूका था की साँसों से धुंआ निकलना सुरु हो चूका था.. पर साथ hi बारिश की मीठी खुशबू ने पूरे घर को एक अलग सी मदहोशी दे राखी थी

घर क बाकी मर्द बहार छप्पर क नीचे आग जला कर बैठे हुए थे, और थोड़ी थोड़ी दिएर में चाय का दौर चलना सुरु हो चूका था.. साथ hi साथ बातों सा सिलसिला भी जारी था उनका

बाकि अगर घर की औरतों की बात की जाये तोह वो इस बारिश में भी अपने कार्यों में लीं थी.. बाकि माँ (मालती) इस समय किया कर रही है ये तोह आप जानते है

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(माँ और सत्यम)



सविता रसोईघर से निकलते हुए साढ़े क़दमों से आँगन में बिछी हुई ईटों पे चलते हुए एक और बढ़ती चली जा रही थी और उसके हाथ में इस समय एक मोटा सा झाड़ू थमा हुआ था.. जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता था की वो जहा भी जा रही है वह उसका किया कार्य होने वाला है

उसने अपनी साड़ी कमर में अच्छे से खोंस राखी थी, ताकि कही उसकी मतवाली चाल क कारन उसका पल्लू उसकी इज्जत को रुस्वा न कर दे.. पर उसके bhaari-bhaari आधे से ज्यादा नज़र आते गेहुआ रंग क मोठे स्तन उस पल्लू क नीचे से कुछ ज्यादा hi उभर कर बहार आने को बेताब हो रहे थे.. मानो जैसे उन्हें वो रुकावट पसंद न हो

सायद इसीलिए वो हर एक कदम क साथ कुछ ज्यादा hi उछलने की गलती दोहरा रहे थे, मानो जैसे दो बड़े मटके खुदही अपने अंदर भरे हुए दूध को छलकने की कोशिश कर रहे हो.. सायद में इससे ज्यादा अचे से ऐसे समझा नहीं सकता

सविता क एक हाथ में झाड़ू थमा हुआ था तोह दूसरा हाथ उसकी चाल क साथ हिल रहा था, कोण कहेगा 2 बच्चों की माँ इतनी कामुक हो सकती है.. वैसे हमारी गेहुआ रंग की हसीं 2 बच्चों की माँ सविता क कदम इस समय उस कमरे की और आगे बाद रहे थे जहा मालती का एकलौता जवान बीटा मौजद था.. यानि 'मोनू'

आँगन में बिछी उन ईटों पे चलने क कारन महेंद्र की पत्नी की भारीभरकम गांड उसके हर एक कदम क साथ कुछ ज़्यादा hi हिलोरे मार रही थी, मानो जैसे कही वो साड़ी को पहाड़ क आज़ाद न हो जाये.. सविता क कपडे थोड़े से भीगे हुए थे सायद बारिश में इधर उधर चलने क साथ ऐसा हुआ होगा, पर इस कारन उसकी साड़ी पूरी तरह उसके कामुक और गदराये जिस्म से चिपक गयी थी थी, खासकरके उसके मोठे कूल्हों पे उसकी साड़ी तोह ऐसे चिपकी हुई थी मानो जैसे उसने वह कुछ पहना hi न हो.. कुलमिला क ये कह सकता हु की उसका वो हिस्सा पूरी तरह निवस्ट नज़र आ रहा था

सविता जब भी अपना एक कदम आगे बढ़ती तोह उसकी साड़ी उसके कूल्हों पे और ज्यादा कास जाती और बस ऐसा लगता जैसे किसी भी पल वो साड़ी पहात सकती है.. अपनी भरी जवानी को सँभालते हुए सविता आगे बाद hi रही थी की तभी उसकी नज़र आँगन क एक और पड़े छप्पर क नीचे छोटी सी चारपाई पे सोते हुए सोनू पे पड़ती है और उसके चेहरे पे ममता खिल उठती है.. जिसमे हलकी सी कामुकता भी थी

इस ठन्डे मौसम में सोनू ने रज़ाई को अचे से अपने जिस्म पे चढ़ा रखा था, जिससे उसे मिलने वाली गर्माहट क कारन वो पुरे आनंद से अब भी सोया हुआ पड़ा था.. वैसे अब आप समझ चुके होंगे की हर्षिता का सोनू को जगाने वाला वो दृश्य इसके बाद का था

सविता 'सोनू' को सोता हुआ देख क मंद मंद मुस्कुरा उठी है और खुद से कहती है

“सब उठ गए.. और नास्ता भी कर लिया, पर ये अब भी मस्त है अपने सपनो में”

पर फिर खुद hi अपनी बात पे धीमे से हंस पड़ती है और खुद hi खुद से आगे कहती है

“वैसे है तोह अभी बचा hi न… और इस उम्र में गर्माहट से बच पाना इतना आसान कहा होता है”

सायद इस समय सविता रज़ाई की बात नहीं कर रही थी..

सविता और मोनू क कमरे क बीच अब ज्यादा दुरी नहीं बची थी, वो उस झाड़ू को लहराते हुए आगे बढ़ने लगी थी की तभी एक शरारती आवाज़ उसके कानो में पड़ती है

"ऐसे कहाँ चल दी भौजाई…?

आपको देख कर तोह लग रहा है जैसे किसी पे चढ़ाई करने का इरादा है!"

शब्दों क चयन से साफ़ था की सविता क इस रूप का आननद लेते हुए ये बात कही गयी थी

सविता उसी जगह रुक उस आवाज़ की दिश्य में देखती है जहा उसे हर्षिता अंदर वाले हिस्से से बहार आती हुई उसे नज़र आती है.. और इस समय हर्षिता उसे hi देख रही थी और उसके अधरों पे मुस्कान विजारमान थी

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और कोई होता तोह उसे जवाब सोचने में समय लगता, पर ये तोह हमारी सविता ठहरी.. इसलिए वो टपक से बोलती है वो भी उसी अंदाज़ में आँख मारते हुए

"अरे तू मुझे नहीं जानती.. मैं चढ़ाई और… छू…"

सविता एक पल को रूकती है और फिर मुस्कुरा क आगे कहती है.. पर थोड़ी धीमी आवाज़ में

".. मैं कभी देरी नहीं पसंद करती"

हर्षिता ये तोह अचे से जानती थी की सविता उसे उत्तर जरूर देगी पर वो उत्तर ऐसा होगा उसने ये नहीं सोचा था.. पर अपनी बड़ी देवरानी क शब्दों क कारन उसके चेहरे की मुस्कान कई गुना ज्यादा बाद जरूर गयी थी, और साथ hi साथ कामुकता की एक मीठी की लहर भी उसके अंदर भर गयी जिससे उसके सलोने गालों पे लाली बिखर गयी थी

"आप नहीं सुधरेंगी भौजाई”

सविता ऐसे अपनी बड़ी बड़ी दुधारू चूचियों को हल्का सा झटका देते हुए बस है पड़ती है.. मानो उसे आगे कुछ कहने की जरूर hi नहीं थी, पर तभी उसे कुछ याद आता है

“वैसे तू.. यहाँ क्या कर रही है?

पक्का वहां पीछे उस बेचारी 'शीला' को अकेले काम पे लगा कर भाग आयी होगी"

हर्षिता अपनी जेठानी की बात पे बुरा सा मुंह बना क कहती है

“है है… आप तोह हमेशा अपनी नानन्द की hi तरफ से बोलना…

मैं कौन हूँ?”

पर हर्षिता क शब्दों में एक प्रेम रूपी nauk-jhaunk थी

सविता भी हर्षिता क मुंह देख क अपनी हसी नहीं रोक पाती, पर फिर हर्षिता खुद hi आगे बोल पड़त है

“और रही आपकी चाहती नानन्द की बात तोह मैं उसे वह छोड़ कर नहीं आयी हु… वो तोह सोनू को जगाना था और कमरे की जमीन धुलने क लिए पानी लेके जाना है, न जाने कितने सालों से वो कमरा बंद पड़ा है"

हरषिते ने एक hi बार में अपनी बात पूरी कह दी थी.. पर इसमें कोई नज़रगी नहीं थी बस एक पियरी सी Nauk-Jhaunk थी

"अरे बाप रे एक जान इतने सरे काम.. और ये किसने कहा तू मेरी कुछ नहीं है, तू तोह मेरी जान है.."

सविता, हर्षिता की बात पे है पड़ती थी और अपनी दोनों बाहों को फैलते हुए आगे कहती है

“अगर यकीन न हो तोह आके गले लग क देख ले”

सविता का अंदाज़ और उसकी बाते पे हर्षिता भी khil-khila क है पड़ती है और हस्ते हुए कहती है

“न बाबा न… मुझे आपके गले लगने की गलती नहीं करनी..

आपका क्या भरोसा.. कही मैं बन गया तोह mard-aurat न देखो"

इस बार सविता भी khil-khila क है पड़ती है जिससे उसकी भरी भरकम बड़ी बड़ी दुधारू दूध देने वाली गाय जैसी चूचिया जोरो से हिल उठती है, और वो हस्ते हुए कहती है

“बड़ी आयी… चल जा सोनू को जगा..”

फिर झाड़ू हर्षिता की और करते हुए आगे कहती है

“वर्ण ये ऐसी जगह घुसङ्गी की मोरली बन क पुरे आँगन में फिरती रहेगी”

हर्षिता भी सविता का hi तोह रूप थी, इसलिए वो भी कहा पीछे रहने वाली थी

“हैई… ये तोह काफी मोटा झाड़ू है…

मज़ा hi आ जायेगा”

हरषिते ने आँख मारते हुए अपनी बात पूरी करि थी, जिसपे दोनों hi देवरानी जेठानी एक साथ hi है पड़ती है और उनकी khil-khilahat जरूर बहार तक गयी हो पर उन्हें किया पता वो दोनों क्यू इतना है रही है

सविता हस्ते हुए मोनू की और उस कमरे में प्रवेश कर जाती है और हर्षिता भी अपने बेटे की और उसकी चारपाई क पास आगे बाद चलती है

..इसके आगे हर्षिता ने अपने बेटे को कैसे जगाया और किया हुआ था, ये तोह आप अपडेट #20, सन #01 (पेज No. 390

🔗 ) में पद hi चुके है



करीब 15 मं बाद..

कंटिन्यू... 👇
 
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