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प्रीवियस अपडेट ों पेज No.
481-482
अपडेट #21
Chapter
कामुक वर्षा..
सन
#06
हर्षिता की शरारत
नोट
अपडेट #21, सन 01 से आगे..
हर्षिता वापस सफाई क लिए शीला की और आगे बढ़ते हुए जब मोनू वाले कमरे क समीप से होक गुजरती है और अंदर जो देखती है उसने उसके पुरे सरीर में कामुकता की लहर सी दौड़ा दी थी, वही कामुकता की ये बौछार इतने पे hi कहा रुकी ककी आज तोह उसने अपने जवान हो चुके बड़े भतीजे यानि 'सत्तू' को एक बार फिर से घर की एकलौती शादीशुदा बेटी यानि अपनी बुआ 'शीला' क यौवन क दर्शन करते हुए भी तोह पकड़ा था.. और इन सभी चीज़ों ने उसके अंदर जो आग भड़काई थी वो च क भी उसकी तपिश से बच नहीं प् रही थी
पर फिर हर्षिता खुद पे पूरा काबू बनाये हुए वापस उसी कमरे में अंदर पहुंच चुकी थी जहा अब भी उसकी नानन्द यानि शीला अपने काम में पूरी मेहनत से लगी पड़ी थी, जहा अंदर आते hi हर्षिता क सामने जो नज़ारा था उसे देख क किसी मर्द का औजार तोह खड़ा होता hi होता.. पर इस समय तोह हर्षिता जैसी कामुक नारी की योनि में भी खुजली का कारन बन गयी थी दूध जैसी गोरी 'शीला' का वो भीगा हुआ यौवन
पानी की मोती बूँदें अब भी छप्पर से होती हुई जब जमीन पे गिरती तोह हर बार एक नया संगीत बना रही थी और साथ hi वो बूँदें पुरे वातावरण में भरी हुई ठण्ड को और ज्यादा बढ़ती जा रही थी
हर्षिता इस समय उस सालों से बंद पड़े कमरे में अंदर प्रवेश कर चुकी थी पर ऐसा नज़ारा देख क उसके पैरों ने मानो अपनी गति hi खो दी थी, पर तभी शीला को वह किसी क आने का आभास हो जाता है और वो घूमती हुई अपना सर उठा क हर्षिता को देखती है तोह थोड़ा मुंह बना क सिखयात भरे स्वर में कहती है
"किया भाभी कहा बार बार भाग जा रही हो, अभी देखो न कितना सारा काम पड़ा है"
फिर वो ऊपर चाट और कोनों में लगे जालों की और इशारा करते हुए कहती है
"ये जले हमसे साफ़ होंगे भला.. वह तक तोह हमारे हाथ भी नहीं पहुंचेंगे.. ?"
पर शीला अपने सवाल का जवाब भी खुद hi दे देती है, वो भी बिना रुके हुए
"सत्तू से जले साफ़ करवा लेंगे.. है न भाभी?"
हर्षिता बस धीरे से 'है' में अपना सर हिला देती है, असल में उसकी नज़रें तोह उस यौवन पे अटकी पड़ी थी जिसके लिए घर का सबसे जवान लड़का भी आज कल पागल हुआ पड़ा था.. पर शीला की बात सुनकर न जाने क्यों हर्षिता का सर जहा 'है' में हिला था वही उसके अधरों में मुस्कान भी खिल उठी थी और वो मुस्कुरा क धीरे से कहती है
"है सत्तू सही रहेगा.. वैसे भी वो तेरी कोई बात नहीं ताल सकता"
शीला को सही से मानो समझ नहीं आता, वो अपने काम में लगी हुई अपनी बात कहती है
"मतलब भाभी.. उसने आपकी कोई बात नहीं मणि किया ?
..मुझे बताओ कान खींचती हु उसके ?"
शीला हस्ते हुए अपनी बात कहती है
जिसपे हर्षिता भी वही एक और पानी की बाल्टी क पास बैठे हुए उसमें से जग भर क पानी निकलती है और फर्श पे दाल क वही पड़े अपने वाले झाड़ू से फर्श को रगड़ रगड़ क साफ़ करते हुए मुस्कुरा क कहती है
"मेरी चोरर मैं तोह अपनी बात उससे आज नहीं तोह कल मनवा hi लुंगी.. पर है तेरी बात तोह अलग hi है"
असल में हर्षिता जब अंदर आयी थी उस समय शीला क एक हाथ में बड़ा सा झाड़ू थमा हुआ था और उसके पास hi एक छोटी सी बाल्टी राखी हुई थी, पर जो बात अलग थी वो ये की उस समय उसका मुंह दूसरी और था यानि शीला की कामुक गांड हर्षिता की तरह थी और जिस बात ने 'वीरू की पत्नी' की धड़कन अचानक से तेज़ कर दी थी वो थी शीला की पूरी भीगी हुई सलवार को पीछे से इतनी पारदर्शी हो चुकी थी उसने द्वारा अंदर पहनी हुई लाल पेंटी पूरी तरह नज़र आ रही थी, पर इससे पहले hi हर्षिता ऐसा कामुक नज़ारा और अचे से देख पाती शीला काम करते हुए उसकी और मुद जाती है और फिर पता hi है वो किया सिखयात करते हुए किया कहती है
शीला अपनी भाभी की बात सुनकर थोड़ी उलझन से भरी हुई आवाज़ में कहती है
"मेरी बात अलग है.. वो कैसे भाभी ?"
हर्षिता उसकी बात पे मुस्कुरा पड़ती है और फिर एक पल रुकने क बात कहती है
"रहने दे वर्ण तू मुझपे hi ग़ुस्सा करेगी"
हर्षिता की बात सुनकर शीला है सी पड़ती है और अपने पास वाली बाल्टी क अंदर से जग भर क पानी निकालती है और अपने आगे वाली फर्श पे दाल देती है, और फिर अपने दूसरे हाथ में थामे झाड़ू से उस जगह को ragad-ragad कर साफ़ करते हुए कहती है
"कैसी बात करती हो भाभी.. भला मैं कभी अपनी पियरी भाभी ने नज़र हो सकती हु किया.. ?
.. बताओ न किया बात है ?"
हर्षिता फर्श की सफाई करते हुए धीरे धीरे आगे की और खिसकते हुए अपनी बात कहती है
"सोच ले फिर मुझे उल्टा सीधा न बोलना"
शीला जिसके चेहरे पे पसीने की नन्ही नन्ही बूंदें नज़र आ रही थी.. साथ hi साथ उसके कपडे अब लगभग पूरी तरह भीग चुके थे, इतने की पूरा जिस्म धीरे धीरे किसी दुपट्टे में लिप्त हुआ सा प्रतीत होना सुरु हो चूका था, वो अपनी भाभी की बात सुनकर पुरे बरोशे से अपनी बात कहती है
"मैं आपको उल्टा सीधा बोलने क बारे में सोच भी नहीं सकती भाभी.. अब बताओ भी, मेरी बात कैसे अलग है ?"
हर्षिता की इस छोटी सी बात ने शीला को किसी नन्ही बच्ची जैसे उत्सुकता से भर दिया था, आखिर बात उसके सबसे पियरे भतीजे सत्तू की थी जिसे लेके हमेशा से उसका अंदर ज्यादा hi लाड पियर था.. हर्षिता कुछ पलों तक बस मुस्कुराती है और अपने काम में लगी रहती है इधर शीला बार बार काम करते हुए उसे hi देख रही थी की वो अब कुछ कहेगी, पर हर्षिता तोह उसके मन की इस्तिथि का भरपूर आनंद लेती जा रही थी
जल्दी hi हर्षिता काम करते हुए शीला क पीछे पहुंच चुकी थी, जहा शीला अब भी वैसे भी आगे सरकते हुए दरवाजे की और बढ़ती हुई फर्श की सफाई में लगी पड़ी थी.. इधर हर्षिता जैसे hi शीला क पीछे पहुँचती है एक बार फिर से उसे शीला की भीगी हुई सलवार नज़र आती है जहा अंदर पहनी हुई लाल पेंटी अब पूरी तरह नज़र आ रही थी, वैसे इसका एक कारन ये भी था की शीला ने अपनी कमीज को पानी में भीगने से बचने क लिए अपने घुटनो क बीच दबा राखी थी जिसके चलते उसकी सलवार और उसने अंदर कैद गोरी गांड पूरी तरह खुल गयी थी
तभी शीला फर्श को जोर से रगड़ रगड़ क साफ़ करते हुए हल्का से आगे की और झुक सी जाती है जिसके चलते उसकी गोरी गांड पूरी तरह उसकी सावली सलोनी भाभी हर्षिता क आँखों क आगे थोड़ी सी ऊपर की और उठ जाती है.. और ऐसा नज़ारा देख क बेचारी हर्षिता का rom-rom कामुकता से भर उठा था, तभी न जाने उसके मन में किया आता है की वो मुस्कुरा पड़ती है और धीरे से अपना काम चोर क अपनी एक ऊँगली मुंह में रख क उसे ऐसे चुस्ती है जैसे उसमें सेहद लगा रखा हो
फिर जब वो ऊँगली उसके मुंह से बहार आती है तोह वो पूरी तरह उसके थूक से भीगी हुई थी.. फिर वो अपने शरारत भरे चेहरे और अपने होंठों पे अपनी चमक बढ़ती हुई धीरे से वो ऊँगली बिलकुल सीढ़ी करती है और एक hi पल में पूरी गति से शीला की सलवार क बीच वाली दरार जो इस समय पूरी खुली हुई थी उसमें घुसा देती है..
शीला बुरी तरह तड़प पड़ती है ककी उसकी पतली और पूरी तरह पारदर्शी सलवार में हर्षिता की ऊँगली ने बिलकुल सही जगह निशाना ढूंढा था ककी अगले hi पल हर्षिता को अपनी ऊँगली किसी गरम छेद में अंदर जाती हुई महसूस होती है पर वो ज्यादा अंदर नहीं जा पाती ककी सलवार क कपडे क साथ साथ पेंटी का पतला कपडे भी उस छेद की रक्षा में ऐडा हुआ था
वही शीला बुरी तरह काँप सी पड़ी थी, ककी उसे ऐसा प्रतीत होता है जिसे कोई गीली चीज़ उसकी सलवार और पेंटी क ऊपर से hi उसके गांड क छेद क अंदर प्रवेश कर गयी हो
"आआआह्ह्ह्ह..... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa..... माआरररररररर...... गयीईइ............"
शीला जल्दी से हड़बड़ा क आगे की और खिसक जाती है, वो भी इतनी तेज़ की वो बस गिरते गिरते hi बची थी.. वही उसकी हालत और चीख पे हर्षिता वही पूरी तरह फ़ैल क बैठ जाती है और खिलखिलाहट से भर उठती है
शीला एक पल क लिए तोह समझ hi नहीं पाती की आखिर किया हुआ है, पर अपनी भाभी को ऐसे जोर जोर से हस्ते हुए देख क उसे समझते दिएर नहीं लगता की अभी अभी उसके साथ किया हुआ था.. वो तोह शीला दर्द से चिल्लाते हुए जल्दी से आगे खिसक गयी थी वर्ण अब भी उसकी भाभी की वो ऊँगली न जाने कहा तक अंदर प्रवेश कर चुकी होती, शीला बुरा क मुंह मन क
"किया भाभी.. आप भी पूरी पागल हो, किया उलटी सीधी हरकतें करती रहती हो"
शीला की बात सुनकर हर्षिता अब भी हस्ते हुए कहती है
"अरे अब तू ऐसी मस्तानी गांड लेके घूमेगी तोह कोई भी अंदर घुसना चाहेगा न.. ाचा है वो तोह में थी तोह बस ऊँगली डाली है
..कही सत्तू होता तोह... ?"
हर्षिता को आगे कुछ बोलने की जरुरत hi नहीं पड़ती पर शीला समझ जाती है की आगे क सब्द किया हो सकते है.. और जो सब्द उसके दिमाग में आते है उसने उसके पुरे अस्तित्व पे प्रहार सा कर दिया था
"किया भाभी जो भी मन में आता है बोल देती हो.. सत्तू कभी भी ऐसा कुछ नहीं कर सकता
आपको पता नहीं की वो कितना ाचा लड़का है, मेरा कितना सम्मान करता है"
हर्षिता उसकी बात सुनकर बस मन hi मन है पड़ती है और खुद से कहती है
'अब तुझे कैसे बताऊ मेरी पियरी नानन्द.. की वही सत्तू सम्मान क अलावा भी बहुत कुछ करना चाहता है तेरे साथ'
दोनों एक बार फिर से अपने अपने कार्य में लग जाते है की तभी हर्षिता आज पुरे दिन जो जो हुआ उस बारे में सोचने लगती है जहा उसकी योनि तब सबसे ज्यादा गीली होती है जब वो मोनू द्वारा सविता क लिए कहे गए उन शब्दों को याद करती है
"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"
इन सब्दो में न जाने कैसी ताक़त थी की हर्षिता का बचा खुचा मन भी काम करने में लगने से मन कर देता है, वो धीरे से अपनी जगह से उठे हुए कहती है
"मैं बस 5 मं में आती हु..."
और इतने कहते hi वो बिना किसी बात को सुने दरवाजे से बहार निकलने hi वाली थी की तभी शीला क सब्द उसके कानो में पड़ते है
"भाभी आपने बताया नहीं.. सत्तू क लिए मेरी बात कैसे अलग है.. ?"
हर्षिता बस मुस्कुरा क रह जाती है और फिर एक पल क लिए कुछ सोचने क बाद कहती है
"1-2 दिन में खेत चलना मेरे साथ.. फिर पुरे प्रमाण क साथ बताउंगी भी और दिखाउंगी भी"
शीला को समझ नहीं अत की उसकी भाभी की इस बात का किया मतलब हुआ भला, पर अब वो आगे कोई सवाल नहीं करती.. पर हर्षिता क जाते hi उसके काम करते हुए हाथ अचानक से रुक से जाते है और वो अपनी भाभी की करि गयी हरकत को सोचते हुए खुद से कहती है
"किया यहाँ सत्तू होता और मुझे ऐसे देखता.. तोह किया सच में अपना दाल...."
शीला आगे क सब्द भी नहीं बोल पाती ककी उसका पूरा सरीर ऐसे कैंप उठता है जैसे ठण्ड की रात में उसे नेहला क तेज़ हवा क बीच किसी खेत में पूरा नंगा खड़ा कर दिया गया हो
"छी.. हर्षिता भाभी ने मेरा भी दिमाग ख़राब कर दिया है"
शीला एक बार फिर से अपने सर को झटक क अपने कार्य में लग चुकी थी, पर ये पहली बार था जब उसने सत्तू क लिए ऐसा कुछ गलती से भी सोचा था या सायद हर्षिता ने अनजाने में उसे ऐसा सोचने पे मजबूर कर दिया था
इधर यहाँ मोनू अभी भी अपने बिस्तर पे लेता हुआ अपने जिस्म से आती हुई अपनी बड़ी माँ की खुसबू को महसूस कर रहा था जिसके चलते बार बार उसके लुंड में वैसा hi उछाल उमड़ जा रहा था जैसे पहली बार हुआ था जब उसकी बड़ी बड़ी चूचियों वाली बड़ी माँ ने पहली बार घर पे उसका लुंड अपने गरम मुंह में लिया था..
मोनू धीरे से अपना एक हाथ रज़ाई क अंदर घुसता है जहा जल्दी hi उसका हाथ उसके जोशीले लुंड पे पहुंच चूका था और वो एक बार फिर से अपनी बड़ी माँ की छूट की गर्मी को याद करते हुए पहले से hi खड़े और अकड़ क फिर से किसी योनि की याद में तने हुए अपने लुंड को सहलाते हुए खुद से कहता है
"साले तुझे आज इतनी गरम छूट मिल चुकी थी तब भी सर उठा रहा है, न खुद आराम कर रहा है न मुझे करने दे रहा है.."
मोनू जबसे होश में आया है वो इस बात को लेके सोचने पे बार बार मजबूर हो रहा है की आज कल अचानक से उसके लुंड में ऐसा जोश कैसे आ रहा है
पहले भी उसका लुंड खड़ा होता था पर तब ऐसी अकड़ नहीं होती थी क्युकी अब तोह हाल कुछ ऐसा होता जा रहा है जैसे उसका लुंड सर झुकाने क लिए तैयार hi नहीं होना च रहा है.. मोनू अपना हाथ अपने मोठे लाल सुपडे पे ले जाते हुए उसके छेद और उसकी गर्माहट महसूस करते हुए उसपे अपनी उंगलिया फिरते हुए खुद से आगे कहता है
"साले तुझे हो किया गया है, अब किया फिर से छूट चाहिए.. ?"
तभी मोनू को उसके लुंड पे उछलती हुई उसकी बड़ी माँ क वो सब्द याद आ जाते है जिसके चलते एक hi पल में उसके मोठे सुपडे पे कामुकता क चिपचिपे आंसू निकल आते है.. और उसके कानो में वही सब्द गूंजने लगते है जब उसकी बड़ी माँ अपना पूरा दम लगा क जोर से अपनी गांड उठा क अपनी योनि को उसके जवान और जोशीले लुंड क मुहाने तक बहार लाती और फिर पूरी ताक़त से वापस नीचे बैठते हुए उसके लुंड को पूरा निगल ले रही थी
"Aaaaaaaaaaahhhh… कुट्ट्टीीीीे… leeeeeeeeee… छोड़… अपनी इस रखेल को…. पहाड़ मेरी छूट.. कुट्ट्टीीी…. दिखा अपने लुंड का दम… छोड़.. जोर से छोड़.. छोड़ इस चिनार को.. फड़ड़ड़ड़… क रख दे.. मेरी छूट…. आआआआहहहहह…."
मोनू क कानो में ये सब्द किसी कोयल की मधुर आवाज़ जैसे गूंज रहे थे की तभी अचानक से दरवाजा खुलता है और अंदर प्रवेश करने वाली उसकी सलोनी सूरत की मलिका 'हर्षिता' चची थी.. मोनू जल्दी से अपने लुंड से अपना हाथ तोह खींच लेता है पर उस बड़े से तम्बू का किया करे जो उस रज़ाई में नज़र आ रहा था
हर्षिता भी जैसे hi अंदर प्रवेश करती है उसकी नज़र एक पल क लिए उसी कमरे में कोने में जल्दी उस अंगेठी पे पड़ती है जिसकी लाल रौशनी से पूरा कमरा न सिर्फ गरम था बल्कि अंदर प्रवेश करते hi उसे एक भीनी भीनी सुगंध भी मिलती है जिसे वो किया कोई भी औरत अचे से पहचान सकती है.. ककी उस सुगंध में वीर्य का नमकीन स्वाद था और उसमें 2 जिस्म क मिले हुए पसीने की कामुक खुसबू भी थी
हर्षिता जैसे hi अंगेठी से अपनी नज़र हटा क सामने बिस्तर पे मोनू की और देखती है तोह उसके अधरों पे पहले से विराजमान मुस्कान और ज्यादा गहरी होती चली जाती है ककी वो जैसे hi मोनू की दिशा में अपना चेहरा घूमती है उसे मोनू की छड़ी हुई आँखें और रज़ाई क अंदर उसका हिलता हुआ हाथ hi नज़र आता है.. उसपे उसका सक तब और पक्का हो जाता है जब मोनू जैसे hi उसे देखता है वो अपना हाथ रज़ाई क बहार खींच लेता है जिसे देख क हर्षिता मुस्कुराती हुई उसकी और बाद चलती है और उसके ठीक समीप जेक कड़ी हो जाती है
"किया हुआ बीटा.. तेरे चेहरे पे ये पसीना कैसे, सब ठीक है न.. ?"
मोनू क चेहरा का ये पसीना उसकी बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों को याद करने क कारन आया था उसके उसका हाथ जो उसके दहकते हुए लुंड पे चल रहा था इन दोनों चीज़ों ने ऐसी ठण्ड में भी उसके चेहरे को पसीने से भर दिया था पर ये बात उसे खुद उसकी सलोनी चची क बताने क बाद hi पता चली थी.. मोनू जल्दी से अपनी इस्तिथि को सँभालते हुए किसी डरे हुए बचे सामान अपनी बात कहता है
"नहीं.. नहीं.. कहा चची.. कहा.. ?..
…मुझे कहा पसीना आ रहा है.. ?"
हर्षिता उसकी बात सुनकर मुस्कुरा उठती है सायद उसे मोनू का ऐसे डरना अनंदीद कर रहा था, वो मोनू क ठीक सर क समीप आ जाती है और एक पल क लिए उसे देखती है तोह उसे वो दृश्य याद आता है जो उसने वापसी में जाते हुए खिड़की से देखा था जहा..
उस समय हर्षिता बाल्टी उठाये हुए आगे बढ़ती जा रही की तभी मोनू वाले कमरे क पास से गुजरते समय अनायाश hi उसकी नज़रें कमरे क अंदर घूम जाती है, और उस छोटी सी खिड़की क कपड़ क बीच से उसे जो दीखता है उसके चलते उसके हाथ से बाल्टी बस गिरते गिरते बची थी.. पर अंदर चलता वो नज़ारा कुछ ऐसा था की एक hi पल में उसके हाथों में कामुकता की कंपकपाहट भर आयी थी की.. वो जल्दी से बाल्टी को नीचे रखती है और अंदर चलते हुए उस दृस्य को देखने पे मजबूर हो गयी थी साथ hi उसके जवान भतीजे 'मोनू' क उन शब्दों ने उसके पुरे अस्तित्व को कंपकपी से भर दिया था
"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"
ये वो सब्द थे जो उसका जवान इतनी दिनों से बीमारी क चलते बिस्तर पे पड़ा हुआ भतीजे अपनी तै जी यानि घर से सबसे बड़ी बहु की छूट में अपना लुंड डाले हुए बोल रहा था
एक पल क लिए तोह हर्षिता को अपने कानो पे यकीन hi नहीं होता की उसने जो सुना है वो सत्य है, पर फिर जब वो अपने जवान भतीजे क ऊपर बैठी हुई तेज़ी से उछलती अपनी बड़की भावजी को देखती है और उसकी हालत पहले से भी ज्यादा बुरी हो जाती है वो ये यकीन hi नहीं कर प् रही थी मोनू जैसा अभी अभी जवान हुआ लड़का सविता जैसी भरी भरकम औरत की ऐसी हालत बना सकता है..
फिर जब उसे मोनू क वो बीज वाले सब्द याद आते है तोहि हर्षिता की बुर क होंठ बुरी तरह फड़फड़ाने पे मजदुर हो जाते है.. हर्षिता उस सोच से वापस वर्तमान में लौटते हुए मोनू क पसीने से भरे चेहरे को एक बार फिर देखती है और फिर उसके चेहरे से होती हुई उसकी नज़रें नीचे की और सरकने लगती है जहा वो जब रज़ाई क ऊपर से hi उसके पैरों वाले हिस्से पे आती है तोह उसे फिर से वही बड़ा सा तम्बू नज़र आता है और उसे देखते हुए मुस्कुरा पड़ती है और मन hi मन खुद से कहती है
'हैरानी की बात है.. बड़की भौजाई को ऐसे छोड़ने क बाद भी इसका खड़ा हो रहा है'
पर फिर वो अपने शब्दों में सवार भरते हुए उस तम्बू की और इशारा करते हुए कहती है
"ये किया है.. ?,
रज़ाई क अंदर कुछ रखा है किया तूने.. ?"
मोनू जैसे hi ये सुनता है उसका पूरा बदन काँप उठता है और बुरी तरह डरते हुए कहता है
"नहीं… नहीं.. चची… कुछ… कुछ नहीं है.. वो.."
हर्षिता उसकी हड़बड़ाहट और उसकी हालत पे मंद मंद मुस्कुरा उठती है और फिर उसका चेहरा देखते हुए धीरे से कहती है
"अरे इतना दर क्यों रहा है.. मैं कोनसा हाथ से पकड़ लुंगी.."
मोनू को समझ नहीं आता की उसकी चची आखिर किया कहना च रही है, पर इस समय तोह उसकी हालत ऐसी नहीं थी की वो कुछ भी बोल पता.. वो बस अपना सूखा हुआ गाला अपने hi थूक से गीला करने की चैस्ता करता रहता है
पर हर्षिता इतनी आसानी से उसका पीछे कहा चोर्ने वाली थी
"तू सच में ठीक है न.. इतना पसीना क्यों आ रहा है तुझे.."
और ये कहती हुए उसके सर क बिलकुल समीप कड़ी हुई वो पूरी तरह झुक सी जाती है और अब उसका चेहरा अपनी गरम साँसे चोरते हुए उसके बालों क ऊपर था वो बिना रुके अपना एक हाथ आगे बड़ा क उसके बालोने में फिरते हुए कहती है..
"कह रहा है की पसीना नहीं है.. पुरे बाल तक भीगे हुए है ?"
पर बेचारे मोनू का जो पसीना अब उसके लुंड से निकलने को उतारू हो चूका था उसका किया.. ककी हर्षिता जिस प्रकार से झुकी हुई थी उस कारन उसके ब्लाउज क बड़े गले से नज़र आती उसकी चूचियों क बीच की गहरी घाटी और वो उसके दोनों कैसे यौवन ठीक मोनू क होंठों क ऊपर लटक रहे थे, हाल कुछ ऐसा था की अगर मोनू जरा सा भी अपना सर ऊपर उठा ले तोह अपनी जीभ की नोक को उन गहरी घाटियों क बीच चला सकता था.. मोनू की तोह जैसे सांस hi अटक गयी थी वो बेचारा सांस तक लेना भूल सा गया था, वही हर्षिता अचे से उसके बालों में अपना हाथ फिरने क बाद सीधी खड़ी होती और लाल पद चुके चेहरा को देखते हुए मन hi मन है पड़ती है और फिर मुस्कुरा क कहती है
"अरे तुझे किया हो गया.. चेहरा तोह ऐसे लाल हो गया है जैसे मिर्ची खा ली हो"
मोनू जल्दी hi अपने पूरी तरह सुख चुके गले को तर करते हुए कहता है
"नहीं नहीं.. वो… चची.. बस.. वो गर्मी ज्यादा है न.."
हर्षिता को तोह जैसे ऐसी बात की प्रतीक्षा थी, वो रज़ाई का एक सिरा पकड़ते हुए कहती है
"ला फिर में रज़ाई हटा देती है.."
मोनू तोह बेचारा सूखे पत्ते सामान काँप पड़ा था, वो जल्दी से रज़ाई को दोनों हाथों से पकड़ क हकलाते हुए कहता है
"नहीं नहीं.. चची… ऐसे.. ऐसे… hi रहने दो… अब.. अब.. गर्मी.. गर्मी.. नहीं लग रही है.."
हर्षिता मुस्कुरा क हर पल का आनंद लेते हुए कहती है
"चल ठीक है.. बाकि अगर ज्यादा गर्मी लगे तोह मुझे बताना.. तेरी चची गर्मी निकलना भी जानती है.."
जवानी क उन्माद से भरा हुआ मोनू अब भी बात की गहरी को समझ नहीं पता, और हर्षिता वापस से अपनी मादक गांड को लहरती हुई वह से निकल जाती है ककी अपनी hi इस छोटी की कामुक हरकत से वो खुद hi पूरी गीली हो चुकी थी, और कॉमर्स उसकी साड़ी क अंदर उसकी योनि से बेहटा हुआ उसकी छोटी सी वीरू द्वारा लायी गयी उस अंग्रेजी बनवत वाली पेंटी से बेहटा हुआ उसकी जाँघों तक पहुंचने लगा था, पर वो दरवाजे से बहार निकलने से पहले एक अंतिम बार वापस रज़ाई में तने हुए उस बड़े से तम्बू को देख क धीरे से खुद से कह पड़ती है
"ेस्स्स्सस्स्ष्ह.. ये तोह मेरी गांड का छेद फैला देगा.. "
हर्षिता फिर वह और नहीं रूकती, ककी अभी शीला क साथ मिलकर उस कमरे की सफाई का कार्य पूरा नहीं हुआ था, वो तोह बस बीच में थोड़ा मोनू से मिलने और उसकी इस्तिथि का आनंद लेने चली आयी थी
करीब 15 मं बाद, वैसे इस समय दिन क 1 बज रहे होंगे…
** * **
नष्ट सन
गांड का दर्द...
मिलता हु फ्राइडे (27-03-27) मॉर्निंग में




अपडेट #21
Chapter
सन
हर्षिता की शरारत
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हर्षिता वापस सफाई क लिए शीला की और आगे बढ़ते हुए जब मोनू वाले कमरे क समीप से होक गुजरती है और अंदर जो देखती है उसने उसके पुरे सरीर में कामुकता की लहर सी दौड़ा दी थी, वही कामुकता की ये बौछार इतने पे hi कहा रुकी ककी आज तोह उसने अपने जवान हो चुके बड़े भतीजे यानि 'सत्तू' को एक बार फिर से घर की एकलौती शादीशुदा बेटी यानि अपनी बुआ 'शीला' क यौवन क दर्शन करते हुए भी तोह पकड़ा था.. और इन सभी चीज़ों ने उसके अंदर जो आग भड़काई थी वो च क भी उसकी तपिश से बच नहीं प् रही थी
पर फिर हर्षिता खुद पे पूरा काबू बनाये हुए वापस उसी कमरे में अंदर पहुंच चुकी थी जहा अब भी उसकी नानन्द यानि शीला अपने काम में पूरी मेहनत से लगी पड़ी थी, जहा अंदर आते hi हर्षिता क सामने जो नज़ारा था उसे देख क किसी मर्द का औजार तोह खड़ा होता hi होता.. पर इस समय तोह हर्षिता जैसी कामुक नारी की योनि में भी खुजली का कारन बन गयी थी दूध जैसी गोरी 'शीला' का वो भीगा हुआ यौवन
पानी की मोती बूँदें अब भी छप्पर से होती हुई जब जमीन पे गिरती तोह हर बार एक नया संगीत बना रही थी और साथ hi वो बूँदें पुरे वातावरण में भरी हुई ठण्ड को और ज्यादा बढ़ती जा रही थी
हर्षिता इस समय उस सालों से बंद पड़े कमरे में अंदर प्रवेश कर चुकी थी पर ऐसा नज़ारा देख क उसके पैरों ने मानो अपनी गति hi खो दी थी, पर तभी शीला को वह किसी क आने का आभास हो जाता है और वो घूमती हुई अपना सर उठा क हर्षिता को देखती है तोह थोड़ा मुंह बना क सिखयात भरे स्वर में कहती है
"किया भाभी कहा बार बार भाग जा रही हो, अभी देखो न कितना सारा काम पड़ा है"
फिर वो ऊपर चाट और कोनों में लगे जालों की और इशारा करते हुए कहती है
"ये जले हमसे साफ़ होंगे भला.. वह तक तोह हमारे हाथ भी नहीं पहुंचेंगे.. ?"
पर शीला अपने सवाल का जवाब भी खुद hi दे देती है, वो भी बिना रुके हुए
"सत्तू से जले साफ़ करवा लेंगे.. है न भाभी?"
हर्षिता बस धीरे से 'है' में अपना सर हिला देती है, असल में उसकी नज़रें तोह उस यौवन पे अटकी पड़ी थी जिसके लिए घर का सबसे जवान लड़का भी आज कल पागल हुआ पड़ा था.. पर शीला की बात सुनकर न जाने क्यों हर्षिता का सर जहा 'है' में हिला था वही उसके अधरों में मुस्कान भी खिल उठी थी और वो मुस्कुरा क धीरे से कहती है
"है सत्तू सही रहेगा.. वैसे भी वो तेरी कोई बात नहीं ताल सकता"
शीला को सही से मानो समझ नहीं आता, वो अपने काम में लगी हुई अपनी बात कहती है
"मतलब भाभी.. उसने आपकी कोई बात नहीं मणि किया ?
..मुझे बताओ कान खींचती हु उसके ?"
शीला हस्ते हुए अपनी बात कहती है
जिसपे हर्षिता भी वही एक और पानी की बाल्टी क पास बैठे हुए उसमें से जग भर क पानी निकलती है और फर्श पे दाल क वही पड़े अपने वाले झाड़ू से फर्श को रगड़ रगड़ क साफ़ करते हुए मुस्कुरा क कहती है
"मेरी चोरर मैं तोह अपनी बात उससे आज नहीं तोह कल मनवा hi लुंगी.. पर है तेरी बात तोह अलग hi है"
असल में हर्षिता जब अंदर आयी थी उस समय शीला क एक हाथ में बड़ा सा झाड़ू थमा हुआ था और उसके पास hi एक छोटी सी बाल्टी राखी हुई थी, पर जो बात अलग थी वो ये की उस समय उसका मुंह दूसरी और था यानि शीला की कामुक गांड हर्षिता की तरह थी और जिस बात ने 'वीरू की पत्नी' की धड़कन अचानक से तेज़ कर दी थी वो थी शीला की पूरी भीगी हुई सलवार को पीछे से इतनी पारदर्शी हो चुकी थी उसने द्वारा अंदर पहनी हुई लाल पेंटी पूरी तरह नज़र आ रही थी, पर इससे पहले hi हर्षिता ऐसा कामुक नज़ारा और अचे से देख पाती शीला काम करते हुए उसकी और मुद जाती है और फिर पता hi है वो किया सिखयात करते हुए किया कहती है
शीला अपनी भाभी की बात सुनकर थोड़ी उलझन से भरी हुई आवाज़ में कहती है
"मेरी बात अलग है.. वो कैसे भाभी ?"
हर्षिता उसकी बात पे मुस्कुरा पड़ती है और फिर एक पल रुकने क बात कहती है
"रहने दे वर्ण तू मुझपे hi ग़ुस्सा करेगी"
हर्षिता की बात सुनकर शीला है सी पड़ती है और अपने पास वाली बाल्टी क अंदर से जग भर क पानी निकालती है और अपने आगे वाली फर्श पे दाल देती है, और फिर अपने दूसरे हाथ में थामे झाड़ू से उस जगह को ragad-ragad कर साफ़ करते हुए कहती है
"कैसी बात करती हो भाभी.. भला मैं कभी अपनी पियरी भाभी ने नज़र हो सकती हु किया.. ?
.. बताओ न किया बात है ?"
हर्षिता फर्श की सफाई करते हुए धीरे धीरे आगे की और खिसकते हुए अपनी बात कहती है
"सोच ले फिर मुझे उल्टा सीधा न बोलना"
शीला जिसके चेहरे पे पसीने की नन्ही नन्ही बूंदें नज़र आ रही थी.. साथ hi साथ उसके कपडे अब लगभग पूरी तरह भीग चुके थे, इतने की पूरा जिस्म धीरे धीरे किसी दुपट्टे में लिप्त हुआ सा प्रतीत होना सुरु हो चूका था, वो अपनी भाभी की बात सुनकर पुरे बरोशे से अपनी बात कहती है
"मैं आपको उल्टा सीधा बोलने क बारे में सोच भी नहीं सकती भाभी.. अब बताओ भी, मेरी बात कैसे अलग है ?"
हर्षिता की इस छोटी सी बात ने शीला को किसी नन्ही बच्ची जैसे उत्सुकता से भर दिया था, आखिर बात उसके सबसे पियरे भतीजे सत्तू की थी जिसे लेके हमेशा से उसका अंदर ज्यादा hi लाड पियर था.. हर्षिता कुछ पलों तक बस मुस्कुराती है और अपने काम में लगी रहती है इधर शीला बार बार काम करते हुए उसे hi देख रही थी की वो अब कुछ कहेगी, पर हर्षिता तोह उसके मन की इस्तिथि का भरपूर आनंद लेती जा रही थी
जल्दी hi हर्षिता काम करते हुए शीला क पीछे पहुंच चुकी थी, जहा शीला अब भी वैसे भी आगे सरकते हुए दरवाजे की और बढ़ती हुई फर्श की सफाई में लगी पड़ी थी.. इधर हर्षिता जैसे hi शीला क पीछे पहुँचती है एक बार फिर से उसे शीला की भीगी हुई सलवार नज़र आती है जहा अंदर पहनी हुई लाल पेंटी अब पूरी तरह नज़र आ रही थी, वैसे इसका एक कारन ये भी था की शीला ने अपनी कमीज को पानी में भीगने से बचने क लिए अपने घुटनो क बीच दबा राखी थी जिसके चलते उसकी सलवार और उसने अंदर कैद गोरी गांड पूरी तरह खुल गयी थी
तभी शीला फर्श को जोर से रगड़ रगड़ क साफ़ करते हुए हल्का से आगे की और झुक सी जाती है जिसके चलते उसकी गोरी गांड पूरी तरह उसकी सावली सलोनी भाभी हर्षिता क आँखों क आगे थोड़ी सी ऊपर की और उठ जाती है.. और ऐसा नज़ारा देख क बेचारी हर्षिता का rom-rom कामुकता से भर उठा था, तभी न जाने उसके मन में किया आता है की वो मुस्कुरा पड़ती है और धीरे से अपना काम चोर क अपनी एक ऊँगली मुंह में रख क उसे ऐसे चुस्ती है जैसे उसमें सेहद लगा रखा हो
फिर जब वो ऊँगली उसके मुंह से बहार आती है तोह वो पूरी तरह उसके थूक से भीगी हुई थी.. फिर वो अपने शरारत भरे चेहरे और अपने होंठों पे अपनी चमक बढ़ती हुई धीरे से वो ऊँगली बिलकुल सीढ़ी करती है और एक hi पल में पूरी गति से शीला की सलवार क बीच वाली दरार जो इस समय पूरी खुली हुई थी उसमें घुसा देती है..
शीला बुरी तरह तड़प पड़ती है ककी उसकी पतली और पूरी तरह पारदर्शी सलवार में हर्षिता की ऊँगली ने बिलकुल सही जगह निशाना ढूंढा था ककी अगले hi पल हर्षिता को अपनी ऊँगली किसी गरम छेद में अंदर जाती हुई महसूस होती है पर वो ज्यादा अंदर नहीं जा पाती ककी सलवार क कपडे क साथ साथ पेंटी का पतला कपडे भी उस छेद की रक्षा में ऐडा हुआ था
वही शीला बुरी तरह काँप सी पड़ी थी, ककी उसे ऐसा प्रतीत होता है जिसे कोई गीली चीज़ उसकी सलवार और पेंटी क ऊपर से hi उसके गांड क छेद क अंदर प्रवेश कर गयी हो
"आआआह्ह्ह्ह..... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa..... माआरररररररर...... गयीईइ............"
शीला जल्दी से हड़बड़ा क आगे की और खिसक जाती है, वो भी इतनी तेज़ की वो बस गिरते गिरते hi बची थी.. वही उसकी हालत और चीख पे हर्षिता वही पूरी तरह फ़ैल क बैठ जाती है और खिलखिलाहट से भर उठती है
शीला एक पल क लिए तोह समझ hi नहीं पाती की आखिर किया हुआ है, पर अपनी भाभी को ऐसे जोर जोर से हस्ते हुए देख क उसे समझते दिएर नहीं लगता की अभी अभी उसके साथ किया हुआ था.. वो तोह शीला दर्द से चिल्लाते हुए जल्दी से आगे खिसक गयी थी वर्ण अब भी उसकी भाभी की वो ऊँगली न जाने कहा तक अंदर प्रवेश कर चुकी होती, शीला बुरा क मुंह मन क
"किया भाभी.. आप भी पूरी पागल हो, किया उलटी सीधी हरकतें करती रहती हो"
शीला की बात सुनकर हर्षिता अब भी हस्ते हुए कहती है
"अरे अब तू ऐसी मस्तानी गांड लेके घूमेगी तोह कोई भी अंदर घुसना चाहेगा न.. ाचा है वो तोह में थी तोह बस ऊँगली डाली है
..कही सत्तू होता तोह... ?"
हर्षिता को आगे कुछ बोलने की जरुरत hi नहीं पड़ती पर शीला समझ जाती है की आगे क सब्द किया हो सकते है.. और जो सब्द उसके दिमाग में आते है उसने उसके पुरे अस्तित्व पे प्रहार सा कर दिया था
"किया भाभी जो भी मन में आता है बोल देती हो.. सत्तू कभी भी ऐसा कुछ नहीं कर सकता
आपको पता नहीं की वो कितना ाचा लड़का है, मेरा कितना सम्मान करता है"
हर्षिता उसकी बात सुनकर बस मन hi मन है पड़ती है और खुद से कहती है
'अब तुझे कैसे बताऊ मेरी पियरी नानन्द.. की वही सत्तू सम्मान क अलावा भी बहुत कुछ करना चाहता है तेरे साथ'
दोनों एक बार फिर से अपने अपने कार्य में लग जाते है की तभी हर्षिता आज पुरे दिन जो जो हुआ उस बारे में सोचने लगती है जहा उसकी योनि तब सबसे ज्यादा गीली होती है जब वो मोनू द्वारा सविता क लिए कहे गए उन शब्दों को याद करती है
"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"
इन सब्दो में न जाने कैसी ताक़त थी की हर्षिता का बचा खुचा मन भी काम करने में लगने से मन कर देता है, वो धीरे से अपनी जगह से उठे हुए कहती है
"मैं बस 5 मं में आती हु..."
और इतने कहते hi वो बिना किसी बात को सुने दरवाजे से बहार निकलने hi वाली थी की तभी शीला क सब्द उसके कानो में पड़ते है
"भाभी आपने बताया नहीं.. सत्तू क लिए मेरी बात कैसे अलग है.. ?"
हर्षिता बस मुस्कुरा क रह जाती है और फिर एक पल क लिए कुछ सोचने क बाद कहती है
"1-2 दिन में खेत चलना मेरे साथ.. फिर पुरे प्रमाण क साथ बताउंगी भी और दिखाउंगी भी"
शीला को समझ नहीं अत की उसकी भाभी की इस बात का किया मतलब हुआ भला, पर अब वो आगे कोई सवाल नहीं करती.. पर हर्षिता क जाते hi उसके काम करते हुए हाथ अचानक से रुक से जाते है और वो अपनी भाभी की करि गयी हरकत को सोचते हुए खुद से कहती है
"किया यहाँ सत्तू होता और मुझे ऐसे देखता.. तोह किया सच में अपना दाल...."
शीला आगे क सब्द भी नहीं बोल पाती ककी उसका पूरा सरीर ऐसे कैंप उठता है जैसे ठण्ड की रात में उसे नेहला क तेज़ हवा क बीच किसी खेत में पूरा नंगा खड़ा कर दिया गया हो
"छी.. हर्षिता भाभी ने मेरा भी दिमाग ख़राब कर दिया है"
शीला एक बार फिर से अपने सर को झटक क अपने कार्य में लग चुकी थी, पर ये पहली बार था जब उसने सत्तू क लिए ऐसा कुछ गलती से भी सोचा था या सायद हर्षिता ने अनजाने में उसे ऐसा सोचने पे मजबूर कर दिया था
इधर यहाँ मोनू अभी भी अपने बिस्तर पे लेता हुआ अपने जिस्म से आती हुई अपनी बड़ी माँ की खुसबू को महसूस कर रहा था जिसके चलते बार बार उसके लुंड में वैसा hi उछाल उमड़ जा रहा था जैसे पहली बार हुआ था जब उसकी बड़ी बड़ी चूचियों वाली बड़ी माँ ने पहली बार घर पे उसका लुंड अपने गरम मुंह में लिया था..
मोनू धीरे से अपना एक हाथ रज़ाई क अंदर घुसता है जहा जल्दी hi उसका हाथ उसके जोशीले लुंड पे पहुंच चूका था और वो एक बार फिर से अपनी बड़ी माँ की छूट की गर्मी को याद करते हुए पहले से hi खड़े और अकड़ क फिर से किसी योनि की याद में तने हुए अपने लुंड को सहलाते हुए खुद से कहता है
"साले तुझे आज इतनी गरम छूट मिल चुकी थी तब भी सर उठा रहा है, न खुद आराम कर रहा है न मुझे करने दे रहा है.."
मोनू जबसे होश में आया है वो इस बात को लेके सोचने पे बार बार मजबूर हो रहा है की आज कल अचानक से उसके लुंड में ऐसा जोश कैसे आ रहा है
पहले भी उसका लुंड खड़ा होता था पर तब ऐसी अकड़ नहीं होती थी क्युकी अब तोह हाल कुछ ऐसा होता जा रहा है जैसे उसका लुंड सर झुकाने क लिए तैयार hi नहीं होना च रहा है.. मोनू अपना हाथ अपने मोठे लाल सुपडे पे ले जाते हुए उसके छेद और उसकी गर्माहट महसूस करते हुए उसपे अपनी उंगलिया फिरते हुए खुद से आगे कहता है
"साले तुझे हो किया गया है, अब किया फिर से छूट चाहिए.. ?"
तभी मोनू को उसके लुंड पे उछलती हुई उसकी बड़ी माँ क वो सब्द याद आ जाते है जिसके चलते एक hi पल में उसके मोठे सुपडे पे कामुकता क चिपचिपे आंसू निकल आते है.. और उसके कानो में वही सब्द गूंजने लगते है जब उसकी बड़ी माँ अपना पूरा दम लगा क जोर से अपनी गांड उठा क अपनी योनि को उसके जवान और जोशीले लुंड क मुहाने तक बहार लाती और फिर पूरी ताक़त से वापस नीचे बैठते हुए उसके लुंड को पूरा निगल ले रही थी
"Aaaaaaaaaaahhhh… कुट्ट्टीीीीे… leeeeeeeeee… छोड़… अपनी इस रखेल को…. पहाड़ मेरी छूट.. कुट्ट्टीीी…. दिखा अपने लुंड का दम… छोड़.. जोर से छोड़.. छोड़ इस चिनार को.. फड़ड़ड़ड़… क रख दे.. मेरी छूट…. आआआआहहहहह…."
मोनू क कानो में ये सब्द किसी कोयल की मधुर आवाज़ जैसे गूंज रहे थे की तभी अचानक से दरवाजा खुलता है और अंदर प्रवेश करने वाली उसकी सलोनी सूरत की मलिका 'हर्षिता' चची थी.. मोनू जल्दी से अपने लुंड से अपना हाथ तोह खींच लेता है पर उस बड़े से तम्बू का किया करे जो उस रज़ाई में नज़र आ रहा था
हर्षिता भी जैसे hi अंदर प्रवेश करती है उसकी नज़र एक पल क लिए उसी कमरे में कोने में जल्दी उस अंगेठी पे पड़ती है जिसकी लाल रौशनी से पूरा कमरा न सिर्फ गरम था बल्कि अंदर प्रवेश करते hi उसे एक भीनी भीनी सुगंध भी मिलती है जिसे वो किया कोई भी औरत अचे से पहचान सकती है.. ककी उस सुगंध में वीर्य का नमकीन स्वाद था और उसमें 2 जिस्म क मिले हुए पसीने की कामुक खुसबू भी थी
हर्षिता जैसे hi अंगेठी से अपनी नज़र हटा क सामने बिस्तर पे मोनू की और देखती है तोह उसके अधरों पे पहले से विराजमान मुस्कान और ज्यादा गहरी होती चली जाती है ककी वो जैसे hi मोनू की दिशा में अपना चेहरा घूमती है उसे मोनू की छड़ी हुई आँखें और रज़ाई क अंदर उसका हिलता हुआ हाथ hi नज़र आता है.. उसपे उसका सक तब और पक्का हो जाता है जब मोनू जैसे hi उसे देखता है वो अपना हाथ रज़ाई क बहार खींच लेता है जिसे देख क हर्षिता मुस्कुराती हुई उसकी और बाद चलती है और उसके ठीक समीप जेक कड़ी हो जाती है
"किया हुआ बीटा.. तेरे चेहरे पे ये पसीना कैसे, सब ठीक है न.. ?"
मोनू क चेहरा का ये पसीना उसकी बड़ी माँ की बड़ी बड़ी चूचियों को याद करने क कारन आया था उसके उसका हाथ जो उसके दहकते हुए लुंड पे चल रहा था इन दोनों चीज़ों ने ऐसी ठण्ड में भी उसके चेहरे को पसीने से भर दिया था पर ये बात उसे खुद उसकी सलोनी चची क बताने क बाद hi पता चली थी.. मोनू जल्दी से अपनी इस्तिथि को सँभालते हुए किसी डरे हुए बचे सामान अपनी बात कहता है
"नहीं.. नहीं.. कहा चची.. कहा.. ?..
…मुझे कहा पसीना आ रहा है.. ?"
हर्षिता उसकी बात सुनकर मुस्कुरा उठती है सायद उसे मोनू का ऐसे डरना अनंदीद कर रहा था, वो मोनू क ठीक सर क समीप आ जाती है और एक पल क लिए उसे देखती है तोह उसे वो दृश्य याद आता है जो उसने वापसी में जाते हुए खिड़की से देखा था जहा..
उस समय हर्षिता बाल्टी उठाये हुए आगे बढ़ती जा रही की तभी मोनू वाले कमरे क पास से गुजरते समय अनायाश hi उसकी नज़रें कमरे क अंदर घूम जाती है, और उस छोटी सी खिड़की क कपड़ क बीच से उसे जो दीखता है उसके चलते उसके हाथ से बाल्टी बस गिरते गिरते बची थी.. पर अंदर चलता वो नज़ारा कुछ ऐसा था की एक hi पल में उसके हाथों में कामुकता की कंपकपाहट भर आयी थी की.. वो जल्दी से बाल्टी को नीचे रखती है और अंदर चलते हुए उस दृस्य को देखने पे मजबूर हो गयी थी साथ hi उसके जवान भतीजे 'मोनू' क उन शब्दों ने उसके पुरे अस्तित्व को कंपकपी से भर दिया था
"आआअह्ह्ह... हैईईई... साली.... मेरी रखेल हरामजादी.. कुटिया... बता भरवाएगी अपनी छूट को मेरे बीज से... आआआआहहहहह"
ये वो सब्द थे जो उसका जवान इतनी दिनों से बीमारी क चलते बिस्तर पे पड़ा हुआ भतीजे अपनी तै जी यानि घर से सबसे बड़ी बहु की छूट में अपना लुंड डाले हुए बोल रहा था
एक पल क लिए तोह हर्षिता को अपने कानो पे यकीन hi नहीं होता की उसने जो सुना है वो सत्य है, पर फिर जब वो अपने जवान भतीजे क ऊपर बैठी हुई तेज़ी से उछलती अपनी बड़की भावजी को देखती है और उसकी हालत पहले से भी ज्यादा बुरी हो जाती है वो ये यकीन hi नहीं कर प् रही थी मोनू जैसा अभी अभी जवान हुआ लड़का सविता जैसी भरी भरकम औरत की ऐसी हालत बना सकता है..
फिर जब उसे मोनू क वो बीज वाले सब्द याद आते है तोहि हर्षिता की बुर क होंठ बुरी तरह फड़फड़ाने पे मजदुर हो जाते है.. हर्षिता उस सोच से वापस वर्तमान में लौटते हुए मोनू क पसीने से भरे चेहरे को एक बार फिर देखती है और फिर उसके चेहरे से होती हुई उसकी नज़रें नीचे की और सरकने लगती है जहा वो जब रज़ाई क ऊपर से hi उसके पैरों वाले हिस्से पे आती है तोह उसे फिर से वही बड़ा सा तम्बू नज़र आता है और उसे देखते हुए मुस्कुरा पड़ती है और मन hi मन खुद से कहती है
'हैरानी की बात है.. बड़की भौजाई को ऐसे छोड़ने क बाद भी इसका खड़ा हो रहा है'
पर फिर वो अपने शब्दों में सवार भरते हुए उस तम्बू की और इशारा करते हुए कहती है
"ये किया है.. ?,
रज़ाई क अंदर कुछ रखा है किया तूने.. ?"
मोनू जैसे hi ये सुनता है उसका पूरा बदन काँप उठता है और बुरी तरह डरते हुए कहता है
"नहीं… नहीं.. चची… कुछ… कुछ नहीं है.. वो.."
हर्षिता उसकी हड़बड़ाहट और उसकी हालत पे मंद मंद मुस्कुरा उठती है और फिर उसका चेहरा देखते हुए धीरे से कहती है
"अरे इतना दर क्यों रहा है.. मैं कोनसा हाथ से पकड़ लुंगी.."
मोनू को समझ नहीं आता की उसकी चची आखिर किया कहना च रही है, पर इस समय तोह उसकी हालत ऐसी नहीं थी की वो कुछ भी बोल पता.. वो बस अपना सूखा हुआ गाला अपने hi थूक से गीला करने की चैस्ता करता रहता है
पर हर्षिता इतनी आसानी से उसका पीछे कहा चोर्ने वाली थी
"तू सच में ठीक है न.. इतना पसीना क्यों आ रहा है तुझे.."
और ये कहती हुए उसके सर क बिलकुल समीप कड़ी हुई वो पूरी तरह झुक सी जाती है और अब उसका चेहरा अपनी गरम साँसे चोरते हुए उसके बालों क ऊपर था वो बिना रुके अपना एक हाथ आगे बड़ा क उसके बालोने में फिरते हुए कहती है..
"कह रहा है की पसीना नहीं है.. पुरे बाल तक भीगे हुए है ?"
पर बेचारे मोनू का जो पसीना अब उसके लुंड से निकलने को उतारू हो चूका था उसका किया.. ककी हर्षिता जिस प्रकार से झुकी हुई थी उस कारन उसके ब्लाउज क बड़े गले से नज़र आती उसकी चूचियों क बीच की गहरी घाटी और वो उसके दोनों कैसे यौवन ठीक मोनू क होंठों क ऊपर लटक रहे थे, हाल कुछ ऐसा था की अगर मोनू जरा सा भी अपना सर ऊपर उठा ले तोह अपनी जीभ की नोक को उन गहरी घाटियों क बीच चला सकता था.. मोनू की तोह जैसे सांस hi अटक गयी थी वो बेचारा सांस तक लेना भूल सा गया था, वही हर्षिता अचे से उसके बालों में अपना हाथ फिरने क बाद सीधी खड़ी होती और लाल पद चुके चेहरा को देखते हुए मन hi मन है पड़ती है और फिर मुस्कुरा क कहती है
"अरे तुझे किया हो गया.. चेहरा तोह ऐसे लाल हो गया है जैसे मिर्ची खा ली हो"
मोनू जल्दी hi अपने पूरी तरह सुख चुके गले को तर करते हुए कहता है
"नहीं नहीं.. वो… चची.. बस.. वो गर्मी ज्यादा है न.."
हर्षिता को तोह जैसे ऐसी बात की प्रतीक्षा थी, वो रज़ाई का एक सिरा पकड़ते हुए कहती है
"ला फिर में रज़ाई हटा देती है.."
मोनू तोह बेचारा सूखे पत्ते सामान काँप पड़ा था, वो जल्दी से रज़ाई को दोनों हाथों से पकड़ क हकलाते हुए कहता है
"नहीं नहीं.. चची… ऐसे.. ऐसे… hi रहने दो… अब.. अब.. गर्मी.. गर्मी.. नहीं लग रही है.."
हर्षिता मुस्कुरा क हर पल का आनंद लेते हुए कहती है
"चल ठीक है.. बाकि अगर ज्यादा गर्मी लगे तोह मुझे बताना.. तेरी चची गर्मी निकलना भी जानती है.."
जवानी क उन्माद से भरा हुआ मोनू अब भी बात की गहरी को समझ नहीं पता, और हर्षिता वापस से अपनी मादक गांड को लहरती हुई वह से निकल जाती है ककी अपनी hi इस छोटी की कामुक हरकत से वो खुद hi पूरी गीली हो चुकी थी, और कॉमर्स उसकी साड़ी क अंदर उसकी योनि से बेहटा हुआ उसकी छोटी सी वीरू द्वारा लायी गयी उस अंग्रेजी बनवत वाली पेंटी से बेहटा हुआ उसकी जाँघों तक पहुंचने लगा था, पर वो दरवाजे से बहार निकलने से पहले एक अंतिम बार वापस रज़ाई में तने हुए उस बड़े से तम्बू को देख क धीरे से खुद से कह पड़ती है
"ेस्स्स्सस्स्ष्ह.. ये तोह मेरी गांड का छेद फैला देगा.. "
हर्षिता फिर वह और नहीं रूकती, ककी अभी शीला क साथ मिलकर उस कमरे की सफाई का कार्य पूरा नहीं हुआ था, वो तोह बस बीच में थोड़ा मोनू से मिलने और उसकी इस्तिथि का आनंद लेने चली आयी थी
करीब 15 मं बाद, वैसे इस समय दिन क 1 बज रहे होंगे…
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नष्ट सन
मिलता हु फ्राइडे (27-03-27) मॉर्निंग में

