Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 23 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 511-512



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #09

मालती की चाय

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ℹ️नोट:- ये अपडेट पिछले आये अपडेट से ठीक आगे का है..

& ये अपडेट मेरी पर्सनल फंतासी को भी दिखायेगा

🙏

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सुंदरपुर की ठण्ड क बारे में इतना कुछ बता दिया है की अब आगे कुछ बताने को खास बचा नहीं है, वैसे इस समय ज्यादातर लोग घर क बहार उसी छप्पर क नीचे बैठे हुए थे जहा अब.. पहले अंदर 2 रज़ाई उठाये हुए हर्षिता पहुँचती है और अपने जेठ जी की चारपाई पे रखते हुए अनायास hi उन्हें देख क मुस्कुरा क कहती है

"लीजिये जेठ जी.."

महेंद्र ने जैसे hi रज़ाई देखि वो मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए कहता है

"ये काम ाचा किया बहु.. ठण्ड तोह जैसे बढ़ती hi जा रही है"

हर्षिता बिना रुके टपक से बोल पड़ती है

"तभी तोह मैं गर्मी देने आ गयी.. मेरा मतलब रज़ाई लेके"

महेंद्र तोह जैसे बुरी तरह इतनी सी बात से इधर उधर देखने पे विवस सा हो जाता है, मानो उसके पास से वर्णमाला क सभी अक्षरों ने छुट्टी ले ली हो, पर दूसरी चारपाई पे बैठा हुआ वीरू न जाने क्यों ये सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ा था और एक बार फिर से उसे अपना वो स्वप्न याद ा जाता है और जहा उसकी पत्नी क पीछे उसका बड़ा भाई था उसकी बेहरमी चुदाई कर रहा था

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इतना सोचने भर से वीरू का हाल कुछ ऐसा होने लगता है की अगर उसने इस बारे में तनिक भी और कुछ सोचा तोह उसके लुंड का उठान वो खुद भी रोक नहीं पायेगा

इधर हर्षिता की चंचलता ने जहा महेंद्र जैसे आदमी को ऐसी ठण्ड में पसीने से भिगो दिया था वही अंदर से 2 और रज़ाई उठाये हुए शीला बुदबुदाते हुए चली आती है

"किया भाभी.. खुद तोह हलकी हलकी रज़ाई ले आयी और मुझे भरी वाली थमा दी"

शीला की सिखयात भरी बात पे वह उपस्थित महेंद्र, सविता, वीरू, हर्षिता, भानु, सत्तू, और सत्यम.. ये सभी है पड़ते है

"किया हो गया भाई.. इतना क्यों है रहे है सब ?"

तभी अंदर से अपनी खूबसूरत पत्नी से इतने समय बाद बात करने क कारन कुंदन का मन भी कुछ खुस सा था, जैसे उसकी ब्याह में होता वो दर्द अब उसके लिए मायने hi न रखता हो

कुंदन क बहार आते hi शीला का चेहरा सबसे ज्यादा चमक उठता है आखिर उसकी शादी क बाद आज पहली बार उसके भाई 'कुंदन' ने उसे कोई तौफा दिया था, पर हर्षिता क चलते वो उसे देख नहीं पायी थी.. वही अपने बड़े भाई 'कुंदन' को देखते hi अपने चेहरे की ख़ुशी छुपाते हुए शीला, सत्तू वाली चारपाई पे दोनों रज़ाई एक साथ रखते हुए एक सिखयात सी करती है

"आपने hi ये हर्षिता भाभी को पसंद किया था न वीरू भैया क लिए.. अब देखो खुद हल्का हल्का काम करती है और मुझसे सब भरी काम करवाती है"

कुंदन क कुछ बोलने से पहले hi हर्षिता उस पल में अपनी खनकती हुई आवाज़ घोलते हुए बोल पड़ती है

"अरे मेरी पियरी 'ननद रानी'.. मैं तोह जान क तुझसे ज्यादा काम करवाती हु ताकि तोह और मजबूर बने, ऐसे तोह हड्डिया कमजोर पद जाएँगी न.."

हर्षिता की बात पे इस बार सबके साथ खुद कुंदन भी है पड़ता है जिससे शीला अपनी सलोनी भाभी हर्षिता को किसी बची सामान जीभ दिखते हुए

"बड़ी आयी.."

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और एक बार फिर से सभी की khil-khilahat और तीव्र हो जाती है, जल्दी hi कुंदन भी सभी क साथ बैठ चूका था और वह उपस्थित सभी लोगो क पैरों पे रज़ाई भी चढ़ चुकी थी ताकि ठण्ड क प्रकोप को काम किया जा सके.. ऐसी बीच सभी चारपाइयों क बीच जलती हुई आग में अपने पैरों को सीखते हुए भानु बोल पड़ता है

"ाचा तोह हर्षिता भाभी, कुंदन भैया की पसंद है.."

कुंदन भी अब शीला और सत्तू क साथ उसी चारपाई पे बैठा हुआ मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए हर्षिता की और इशारा करते हुए कहता है

"अरे नहीं.. मैं तोह बस इसके गाओं में अपने एक दोस्त की शादी में गया था, वही बाबू जी क खास मित्र 'संभु चाचा' यानि हमारी हर्षिता क बापू का घर भी था तोह 'भैया और बाबूजी' क कहने पे चला गया था उस समय तोह मुझे पता तक नहीं था की इसके घर क्यों जा रहा हु"

कुंदन की बात को आगे पूरा करने का काम महेंद्र करता है वो भी ऐसे जैसे पुराने दिनों को याद कर रहा हो

"तब वीरू क लिए हमने रिश्ते देखने सुरु hi किये था की संभु चाचा ने वीरू और अपनी बिटिया 'हर्षिता' क रिश्ते की बात भी चला दी पिता जी से

...और किस्मत से उसी समय कुंदन को भी 'रसपुरा' गाओं में अपने दोस्त की शादी में जाना था तोह ये हुआ की वो जा hi रहा है तोह लड़की भी देख लेगा और अगर सब ठीक रहा तोह बाद में बड़े जेक बात आगे बड़ा लेंगे"

महेंद्र की बात सुनते हुए वीरू अपनी सलोनी सूरत वाली पत्नी की टांग खींचते हुए

"और ऐसे ये मेरी किस्मत पे कुंडली बन क बैठ गयी"

वीरू पे बात पे जहा सभी है पड़े वही हर्षिता अपने पति को देख क पियर से मुंह बनाते हुए जैसे झूठा ग़ुस्सा दिखा रही हो

"वो तोह आपकी किस्मत अछि थी जी जो मेरी जैसी सीधी शादी लड़की मिली, कही कोई तेज मिल जाती तोह पता चलता"

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वीरू भी कहा पीछे रहने वाला था

"तुम और सीधी शादी.."

छप्पर क नीचे का माहौल एक बार फिर से हसी से गूंज उठा था, इन सब में सत्यम hi एक ऐसा था जिसे हसने का कोई कारन नहीं दिख रहा था वो मन hi मन सबको देखते हुए सोच रहा था

'अजीब चुटिया लोग है.. इतने में hi खुस हो जा रहे है'

सत्यम का हाल उन लोगों क सामान था जो बड़ी खुशियों को ढूंढ़ने क चक्कर में छोटी छोटी खुशियों क मायने भूल जाते है

तभी ऐसी बीच हर्षिता अपने सांड जैसे सरीर वाले जेठ यानि कुंदन को देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा क कहती है

"वैसे जेठ जी.. वो मेरी सहेली मधुबनी आपको बड़ा पूछती रहती है.."

इस बार बोलने की बरी सविता की थी

"कोण वही न.. जो अपने सोनू क मंडल क समय अपने बड़े भाई क साथ आयी थी"

हर्षिता 'है' में सर हिलाते हुए अपने जेठ कुंदन की और देखती है जो मधुबनी का नाम सुनते hi न जाने क्यों थोड़ा असहज से हो गए थे, पर हर्षिता मुस्कुरा क कुंदन की और देखते हुए कहती है

"मधुबनी.. तोह मेरे कुंदन जेठ जी बड़ी तारीफ करती है, न जाने ऐसी कोनसी जादू की छड़ी घुमा दी इन्होने"

कुंदन जो बड़े से बड़े पहलवान से न डरता था वो आज अपने छोटे भाई की पत्नी की बस बातों से हिला सा हुआ प्रतीत हो रहा था

"मैं.. मैं कोनसा जादू करूँगा, वो तोह बस है hi बड़ी बातूनी.. जब मिलती है bak-bak करने लगती है"

सविता भी कुंदन की इस्तिथि भांप लेती है इसलिए मुस्कुरा क कहती है

"अरे अगर मेरे देवर ने कोई जादू की छड़ी घुसा.. मेरा मतलब घुमा भी दी तोह इसमें बेचारे कुंदन की किया गलती, वैसे भी तेरी वो सहेली मधुबनी भी कोनसी काम खूबसूरत है"

कुंदन का तोह जैसे पसीना hi छूट जाता है, वो जल्दी hi अपने बैठने की इस्तिथि बदलते हुए

"वो.. भैया ऐसी ठण्ड में चाय होती न तोह बढ़िया रहता"

आखिर कुंदन ने पूरी बात को बड़ी hi खूबसूरती से घुमा hi दिया था, ककी चाय का नाम आते hi महेंद्र भी बोल पड़ता है

"है.. चाय हो जाती तोह मज़ा hi आ जाता"

सविता भी पूरा दिन chai-chai सुनते हुए थोड़ा खीज सा जाती है

"किया तुम लोगो को पूरा दिन बस chai-chai चाहिए.."

महेंद्र हस्ते हुए

"अरे चाय जीवन है.. तुम किया जानो इसकी महिमा"

महेंद्र की ऐसी बात पे सभी क चेहरे हसी से खिल उठते है



कंटिन्यू... 👇
 
इस समय रात क करीब 10:40 हो चुके थे ऐसे में सुंदरपुर का घाना अंधकार और गहराता जा रहा था, वैसे भी इतने वीराने में बेस इस गाओं में बिजली आने से ज्यादा जाना पसंद करती है.. रात क सुरु हो चुके इस पहर में आसमान कुछ साफ़ सा हो चूका था जिसके चलते हर एक तारा साफ़ नज़र आ रहा था, वही बहार से आती ठण्ड की वो तीखी सी हवा बार बार सरीर में सिरहन भरने का अपना दायित्व बखूबी निभा रही थी



चारपाई क बीच जलती उस आग की हलकी पीली रौशनी सबके चेहरों पे पड़ती हुई माहौल को हल्का सा गरम करने की कोषसिंह में लगी हुई थी पर इस माहौल में सोंधी चाय की च उत्पन हो चुकी थी, बाकि ये तोह याद है की खूबसूरत मालती इस समय घर में अंदर hi है.. की तभी अपने बड़े भाई की बात का समर्थन करते हुए वीरू बोल पड़ता है

"वैसे बड़की भौजाई.. भैया कह तोह सही रहे है, ऐसी ठण्ड में सोने से पहले चाय मिल जाये तोह बात hi बन जाएगी"

वीरू की बात पे सविता भी इस बार मुस्कुरा क अपने छोटे देवर वीरू की टांग खींचते हुए कहती है

"है… तू तोह ठहरा अपने भैया क चमचा.. तुझे तोह बस मौका चाहिए… उनकी है में है मिलाने का"

सविता की इस बात पे सबसे ज्यादा हसी हर्षिता को hi आती है, पर फिर वो अपनी जगह से उठते हुए

"मैं बना लाती हुए"

पर सविता ने तुरंत hi उसे रोक दिया

"अरे तू कहा जा रही है, बैठ न… अपनी मालती है न रसोईघर में"

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फिर तुरंत hi अपने जवान बेटे सत्यम की और देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"सत्यम जरा जा और अपनी पियरी मालती चची से चाय के लिए बोल दे.. और बोल क बस भाग मत आना, समय बहुत है थोड़ी मदद भी कर देना उसकी तबसे अकेली hi लगी पड़ी है"

अपनी गदराई माँ की ये बात सुनते hi सत्यम का पूरा सरीर खुसी से ऐसे झूम उठता है जैसे उसकी वो ीचा पूरी हो गयी जिसके लिए वो कबसे तरस रहा था.. टलतभी तोह उसके चेहरे पे वो शरारत भरी मुस्कान खिल उठी थी

सत्यम बिना किसी विलम्ब क तुरंत अपनी जगह से उठा है, वो इतनी जल्दी में लग रहा था की उसने ऐसी ठण्ड में भी कोई शाऊल लेने की जरुरत नहीं समझी और उसी हालत में बस लोअर और वो मोती t-shirt पहने हुए अंदर की और चल पड़ता है.. जल्दी hi उसके पैरों की आवाज़ छप्पर से दूर जाती हुई महसूस होने लगती है और वो स्वर अब रसोईघर की और बढ़ने लगा था जहा इस समय मेरी कामुक हसीं माँ पिता जी क द्वारा दिया गया वो सारा सामान रख क वह वापस पहुंच चुकी थी

मालती इतने समय बाद अपने पति क शब्दों क चलते काफी खुस थी, उसके चेहरे की लालिमा उसके अंदर की ख़ुशी को चीख चीख क बयां कर रही थी, वैसे अब रसोई में करने को कोई खास कार्य बचा नहीं था इसलिए वो बस बचे हुए 2-4 बर्तन धूल क उन्हें सजा क निकलने hi वाली थी की तभी उसकी ख़ुशी में खोये हुए अस्तित्व को हिलने सत्यम क पैरों क निशान उसकी और बढ़ने लगते है, वैसे बर्तन धुलने क चलते मेरी खूबसूरत माँ 'मालती' की साड़ी और खास करके उनकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह भीगा हुआ था और उनके उन्नत उरोजों को प्रकट करते हुए हल्का सा नीचे की और ऐसे सरक गया था जैसे वो खुद चाहता हो की मालती का यौवन अपना निखार दिखते रहे.. वापस आने क बाद से जो माटी, अपनी जेठानी सविता की नज़रों और उनकी बातों को सोच क परेशां थी और उनसे नज़रें मिलाने से भी दर रही थी वो इस समय जैसे सब कुछ भूल क काफी खुस नज़र आ रही थी और इसका कारन तोह आप हम सभी अचे से जानते hi है

मालती क सोच क तारों को हिलाते हुए उसके बेटे सामान भतीजे सत्यम क सब्द मालती क कानो में प्रवेश करते जाते है

"हैईईई.. पीछे से तोह बड़ी कातिलाना लगती है आप, ऐसी मोती गांड देख क तोह नपुंसक भी मर्द बन जाये"

सत्यम क शरतात भरे इन शब्दों से मालती को उसके आगमन का ज्ञान होता है और साथ hi साथ अपने यौवन क लिए ऐसे कामुक शब्दों को सुनकर वो हल्का सा मुस्कुरा भी पड़ती है, जिससे उसके चेहरे की ख़ुशी और होंठों का हिलना कुछ ऐसा था जैसे गुलाब क फूल हलकी हवा क झोंके क चलते हौले से हिलोरे खाने लगे हो

"सुधर जा.. वर्ण किसी दिन जोर से लगाउंगी.."

सत्यम और खुद मालती भी ये बात bhali-bhanti जानती थी की उसके शब्दों में ग़ुस्से का कोई भी अंश नहीं है, पर सत्यम क सब्द तोह अभी बहार आने सुरु hi हुए था, वो वही रसोईघर में अंदर आके शेल्फ क सहारे अपनी पीट टिका क मालती क हलके से नीचे सरक चुके पल्लू क कारन पूरी तरह नज़र आते यौवन और उसकी गहराई की और देखते हुए मुस्कुरा क कहता है

"किया बात है चची.. आप तोह बड़ी खूबसूरत लग रही हो, कुछ खास हुआ है किया आज.. ?"

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मालती हौले से मुस्कुराती है और एक पल क लिए बुरी तरह सकपका सी भी जाती है और फिर अगले hi पल उसके गाल ऐसे लाल होते चले जाते है जैसे किसी ने उसके होंठों पे गुलाब की पंखियों को मॉल दिया हो

"चुप कर बदमाश.."

मालती उसे दाती जरूर है पर खुद भी शर्म से ऐसे चेहरा झुका लेती है जैसे एक प्रेमी क शब्दों ने किसी प्रेमिका क अंतर्मन क तारों को छू लिया हो

"उफ्फफ्फ्फ़… ये लाजा.. मन तोह करता है ऐसी जवानी को बस बाहों में भरे राखु"

एक जवान बेटे की माँ अपने उसी बेटे सामान भतीजे की उम्र क लड़के से ऐसे शब्दों को सुनकर ऐसे पानी पानी हो जाती है जैसे उसके लज़्ज़ा सामान गहने हवा क हलके तपते हुए मधुर ध्वनि बजने लगे हो.. मालती शरमाते हुए बस इतना hi बोल पाती है

"कमीना.."

पर सत्यम तोह जैसे पूरी फुर्सत से आया हो

"मैं क्यों कमीना हुआ भला.. मैंने कोनसा आपको को.."

वो बस इतना hi बोल पता है की मालती उसे बड़ी बड़ी पर शर्म से लाल आँखों से एक पल क लिए देखती है और फिर जल्दी से अपना सर नीचे की और झुका लेती है, जहा उसकी इस ादः पे सत्यम जैसा Maha-harami लड़का भी एक पल क वैसे hi पिघल सा गया था जैसे तेज धुप में बर्फ पिघलने लगती है

"Uffffffffffffffff…. ये खूबसूरती.."

मालती अपने दिल की बढ़ती हुई dhak-dhak करने धड़कन को काबू करने की झूटी कोशिश में लगी हुई एक बार फिर से उसकी और देखती है और इस बार दोनों की नज़रें ऐसे एक दूसरे से टकराती है जैसे वो दोनों और कही कुछ देखने की ीचा hi न रखते हो और मालती क पैरों क बीच अचानक उसे कुछ गीलापन सा महसूस होना सुरु हो जाता है जिसके चलते वो तुरंत hi खुद को सँभालते हुए अपना पल्लू सही तोह करती है पर अपने सूखते हुए गले को अपने थूक से गीला करती चली जाती है

"बकवास बंद कर.. और बता कुछ काम था किया ?"

मालती ये कह तोह ऐसे रही थी जैसे वो आगे कुछ सुन्ना hi न च रही हो, पर उसके दिल की तीव्र होती धड़कन का स्वर सायद ऐसे शब्दों की और कामना सा कर रहा था

"उफ्फ्फ.. आपकी खूबसूरती भी किया चीज़ है चची, इसके आगे कुछ याद hi नहीं रहता मुझे"

सत्यम क शब्दों ने माटी क अंदर एक ऐसी हलचल मचा दी थी जैसे उसकी उम्र कुछ साल काम हो गयी हो और उसकी जवानी का फूल फिर से खिलने लगा हो, वो अपने चेहरे की ख़ुशी को छुपाने की कोश्शि तोह करती है पर ऐसा करने में कामयाब नहीं होती, इसलिए जल्दी से वही रखे हुए एक चमचे को उठा क सत्यम की और दिखते हुए

"चुप कर नहीं तोह इससे hi मार खायेगा.. और बता किस लिए आया था"

सत्यम बस मुस्कुरा hi पड़ता है, वही मालती क यौवन खास करके उसकी गांड का वो कामुक उभर जो सत्यम को उसके ऐसे रसोईघर की शेल्फ से टिक क खड़े कोने क कारन बस उसकी हलकी झलक hi देख प् रहा था.. पर ये जरा सी झलक भी उसके लुंड पे ऐसा दबाव बना रही थी की उसके सरीर में खून की गति मानो दुगनी हो गयी हो

"वैसे तोह माँ ने भेजा की आपको बोल दू की सबके लिए चाय बना दो, पर अब आपको देख क मेरा भी कुछ पीना का मन करने लगा है.."

मालती का जिस्म कामुकता की तीव्र लहर से काँप उठता है, और उसके बहार आने क लिए तैयार सब्द जैसे वही अंदर hi अपना दम तोड़ते चले जाती है.. पर वो हिम्मत नहीं हारती और इस बार अपने शब्दों पे बल देते हुए कहती है

"मैं.. मैं अभी चाय बना क लती हु, तू जा यहाँ से वर्ण.."

सत्यम धीरे से अपने होंठों को मोनू की माँ क कान क पास लेके अत है और गरम साँसों की तपिस चोरते हुए धीरे से कहती है

"वर्ण किया.. कही अपना काबू तोह नहीं खो डौगी"

मालती बुरी तरह हड़बड़ा सी जाती है

"चुप.. चुप कर बदमाश.. चल जा यहाँ से.."

सत्यम इस बार फिर से मुस्कुराते हुए सीधा खड़ा हो जाता है और रसोईघर क बहार क अँधेरे को देखते हुए कहता है

"जाना तोह चाहता हु पर.."

मालती का जिस्म एक बार फिर से कामुकता की उमग से भरता चला जाता है और पतली सी पेंटी क कारन उसकी जांघें किसी कॉमर्स क बहने की साक्षी बनने लगती है, वो धीरे से कांपते हुए होंठों से कहती है

"पर.. पर किया.. देख ऐसा कुछ मत सोचा जिससे मेरी बदनामी हो इस घर में.."

फिर एक पल क लिए अपने थूक को निगलते हुए आगे कहती है

"इस समय में तेरी कोई भी बात नहीं मैंने वाली समझा.."

सत्यम मुस्कुराते हुए धीरे से मालती की और हल्का सा झुकता है और एक बार फिर से मालती को अपने कानो पे उसकी गरम साँसों का झोंका सा महसूस होता है पर उसके आगे जो होता है उसके चलते उसकी आँखें स्वतः hi बांध होती चली जाती है और होंठ कामुकता की गर्मी चोरते हुए खुलते चले जाते है

"आआआआअह्हह्ह्ह्ह… किया कर रहा है सत्यम बीटा…… Essssssssssshhh… मत कर कमीने…"

पर सत्यम तोह अपनी जवानी की गर्मी का परिचय देते हुए उसके कान की लौ को अपने होंठों क बीच भर चूका था और धीरे से उसे चूसते हुए आज़ाद करता है तोह कुंदन की पत्नी क उस कान का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह उसके जवान भतीजे क थूक से सं चूका था

"Ummmmmmmmmmmmm… आपके तोह हर एक हिस्से में स्वाद भरा हुआ है.. मन करता है सब कुछ खा जाऊ"

सत्यम क इन शब्दों में न जाने ऐसा किया था की मालती को ऐसा प्रतीत होता है की उसके शरीर में आग की लपटे उठने लगी हो.. और दिल करता है की बस साड़ी को जिस्म से नोच क फेक दे, पर वो अपना काबू खोटी नहीं पर उसके पैरों क बीच से वो कॉमर्स बहना सुरु हो चूका था जो अब न रुकने की कसम सी खा चूका हो जैसे, अपनी ऐसी इस्तिथि पे एक पल क लिए मालती खुद से सवाल करने पे मजबूर सी हो जाती है

'आखिर ये सब किया हो रहा है aaj-kal मुझे, सत्यम क सिर्फ इन कुछ शब्दों ने hi मेरे कॉमर्स का बहाव निकल दिया'

मालती अगर इस समय बिना कपड़ों क होती तोह सायद ये देखा जा सकता था की कैसे उसकी योनि से उसका चिपचिपा कॉमर्स नीचे की और बहते हुए एक चिपचिपे धागे की भांति नीचे की और लटक रहा था..

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वैसे खुद सत्यम भी नहीं जनता था की उसकी कुछ बातों और उसके एक जरा सी हरकत क चलते मालती का ऐसा हाल भी हो सकता है

पर मालती को उसके विचारों से बहार निकलने का कार्य भी खुद उसकी योनि को आज 3 बार चौड़ा करने वाला उसका पियारा भतीजा hi करता है

"और वैसे भी माँ ने कहा था की मैं चाय का बोल क तुरंत न जाऊ.. उन्होंने कहा है की मैं आपकी हर तरह से मदद करू"

सत्यम की बातों से मालती क अंदर बैठा हुआ ये दर की सविता भौजाई सब जानती है, उसे और भी ज्यादा पक्का कर दिया था.. पर हैरानी की बात तोह ये थी ये दर भी न जाने क्यों उसकी कामुकता को बड़ा रहा था तभी तोह बस इतने hi पलों में उसके काले जामुन सामान निप्पल्स पूरी तरह तन गए थे और उसके ब्लाउज क ऊपर से अपनी उपस्तिथि दिखा रहे थे

"किया.. बड़की भौजाई ने कहा.. ये ?"

सत्यम को समझ नहीं आता की माँ की बात में ऐसा किया था पर वो फिर भी 'है' में सर हिला क अपनी सहमति जाता देता है.. मालती अब एक लम्बी सी सांस भरते हुए उसकी और देखती है और फिर धीरे से कुछ सोचते हुए कहती है

"चुपचाप बस यही खड़े रहना, मैं चाय बना क देती हु"

पर सतयम तोह पूरी बदमाशी क इरादे से hi आया था, वो मुस्कुरा क माटी क यौवन को ऐसे देखता है जैसे कोई कुत्ता गोश्त क टुकड़े को देखता है और मुस्कुरा क कहता है

"मैं तोह कह रहा था.. आज जो हुआ उसके चलते आप थक गयी होंगी, कहिये तोह मैं कन्धों की थोड़ी मालिश सी कर दू"

सत्यम ये कहते हुए जैसे hi थोड़ा सीधा होता है तोह मालती ऐसे काँप उठती है जैसे उसके यौवन को लूटने की कोशिश की जाने वाली हो वो जल्दी से अपनी तीव्र होती साँसों को काबू करते हुए कहती है

"नहीं.. नहीं.. तू चुपचाप बस वही खड़े रह, मैं.. मैं चाय बना क देती हु"

असल में माटी उसे कुछ भी करने से इसलिए रोक नहीं थी ककी वो खुद अपने सरीर की हालत पे काबू नहीं रख प् रही थी, उसका हाल कुछ ऐसा था इस समय जैसे हाथ में पकड़ी हुई राइट धीरे धीरे फिसलती जा रही हो.. और वो उसे रोकने क लिए अपनी मुठिया जितनी जोर से भिनकती वो राइट उतनी hi गति से गिरनी सुरु हो जाती

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'मेरा सरीर इतनी जल्दी कैसे गरम होने लग रहा है..'

मालती ने ये सब्द अपने अंदर hi खुद से hi कहे थे..

तभी सत्यम अपनी चची की हड़बड़ाहट देखते हुए मुस्कुरा क कहता है

"मैं तोह बस मदद.."

मालती फिर से उसे देख क उसे आगे क शब्दों क पूरा होने से पहले hi उसे रोकते हुए कहती है

"नहीं.. मैं अचे से जानती हु तोह कैसी मदद करेगा.."

वैसे उसके इन शब्दों में न जाने ऐसा किया था की वो खुद hi शर्म और लाज क चलते लाल पद गयी थी, और सत्यम ऐसे मुस्कुरा पड़ता है जैसे उसका शिखर खुद hi करीब आता जा रहा हो.. वैसे उसकी ख़ुशी भी उसके लोअर में उस बनते हुए तम्बू से देखि जा सकती थी, मालती कांपते हुए धीरे से कहती है

"कुछ उल्टा सीधा सोचने की जरुरत नहीं है

...मैं कुछ भी करने नहीं दूंगी.."



कंटिन्यू... 👇
 
उधर बहार सभी लोग बैठे हुए था की कही दूर किसी खेत में किसी सियार क रोने की कॉकस आवाज़ ने सभी का मन भांग कर दिया



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"ये सियार का रोना तोह बड़ा hi अपशकुन मन जाता है.. प्रभु करे सब ाचा रहे बस, अब कोई परेशानी न आये"

सियार क रोने की आवाज़ सुनते hi हर्षिता क मुख से ये स्वर फुट पता था जिसे सुनते hi कुंदन बोल पड़ता है

"ये सब बस मन का वहां होता है, किसी जानवर क रोने से किसी इन्शान की ज़िन्दगी में कैसे कोई बदलाव हो सकता है.. ?"

शिक्षा से दूर रही हर्षिता जो ऐसी बातों को एक गाँठ की तरह मानती थी वो कुंदन की बात को नारकरते हुए कहती है

"नहीं जेठ जी ये सब सच है, ऐसे hi थोड़ी bade-budhe मानते थे ये सब.. होता है तभी न सब मानते होंगे न"

हर्षिता की बात पे इस बार वीरू उसकी चुटकी लेते हुए

"अरे तू एक काम करना न.. सबकी भलाई क लिए कोई उपवास कर लेना, तू तोह वैसे भी आये दिन यही सब करती रहती थी न"

हर्षिता अपने पति क उपहास को समझ नहीं पति वैसे भी उसकी मान्यता उसे ऐसी चीज़ों को लेके उपहास करने की आज्ञा नहीं देती

"है.. रखूंगी न, वैसे भी.. जी वो मैंने वो नदी वाले मंदिर पे जाने का मन था.. तोह.. ?"

वीरू जो पहले उपहास सा कर रहा था इस बार थोड़ा चीड़ सा जाता है

"दिमाग ख़राब है किया तुम्हारा.. पता है न वो मंदिर कितना दूर है, ऊपर से अपने गाओं में है भी नहीं

वह जाने का मतलब है की रात कही बहार की काटनी पड़ेगी, और इस समय देख रही हो न सब किया चल रहा है.. तुम अपना ये अन्धविश्वास बंद कर दो, वर्ण किसी दिन.."

वीरू का स्वर थोड़ा तीव्र हो जाता है, जिसे हर्षिता बेचारी बुरी तरह झेप सी जाती है पर उसकी ऐसी हालत देख क महेंद्र ग़ुस्सा हो उठता है

"ये किया तरीका है घर की लक्समी से बात करने का, अरे अगर वो कुछ मानती है तोह तुझे किया दिक्कत है"

वीरू भी अपने बड़े भाई की डाट पे सीधा होक बैठ जाता है और धीरे से अपनी बात कहता है

"अरे भैया आप नहीं जानते.. इसका ये अन्धविश्वास.."

महेंद्र भी थोड़ा ग़ुस्से में था पर वो अपने स्वर पे काबू रखते हुए कहता है

"जिसे तू अन्धविश्वास कह रहा है वो उसकी मान्यता है, और अगर उसकी 2-4 बात मान लेगा तोह कोनसा पहाड़ तू पड़ेगा.."

वीरू अपना सर सा झुका लेता है, वैसे इस समय छप्पर क नीचे बैठा हर इन्शान सांस रोके सा हुआ था.. इधर महेंद्र की बात पूरी होते hi वीरू बोल पड़ता है

"पर भैया वो मंदिर भी तोह कोनसा अपने गाओं में है.. एक दिन में तोह आना जाना भी नहीं हो सकता न, फिर वो जंगल का घाना रास्ता.. ?"

महेंद्र जो अब भी अपने होंठों क बीच बीड़ी दबाये हुए था वो बीड़ी का खास भरते हुए एक एक सब्द पे जोर डालते हुए

"है तोह कोनसा वो किसी विदेश में है.. 'लोभी गाओं' में hi है न.."

फिर हर्षिता की और देखते हुए

"बहु तू मुझे बताना जब चलना होगा, मैं ले चलूँगा.. इस नालायक को यही रहने दो"

वीरू को पड़ती डाट पे इस बार सविता धीरे से है पड़ती है, जिसे देख क हर्षिता भी मुस्कुरा पड़ती है.. वही वीरू का लुंड ये सोच क उसकी चमड़ी से बहार आने लगा था की उसकी सलोनी सूरत वाली पत्नी उसके बड़े भैया क साथ बहार जाएगी

"वैसे जी अब अगर आप 'लोभी गाओं' जायेंगे hi तोह 2-4 दिन में hi चले जाना.."

महेंद्र कुछ कहता नहीं बस सवालिया नज़रों से अपनी पत्नी की और देखता है, जिसपे सविता खुद hi आगे बोलने लगती है

"अरे मालती क लिए कुछ लेंगे नहीं किया, इतना बड़ा दिन होगा.."

महेंद्र को जैसे अचानक से याद अत है

"अरे.. है.. है.. ाचा याद दिलाया, चलो 'चुटकी बहु' होगी तोह कुछ ाचा पसंद भी कर लेगी मालती क लिए"

कुंदन ये सुनकर कुछ बोलना तोह च रहा था पर उसे पता था की इस समय उसका बोलना सही नहीं वर्ण कही उसे भी वीरू की तरह डाट न पद जाये

अगले कुछ पल शांति से गुजरते है की बीड़ी का धुआँ उड़ाते हुआ महेंद्र hi इस बार बोलता है

"चाय में बड़ा समय लग रहा है.."

जिसपे सविता तुरंत hi बोल पड़ती है

"अरे मालती दूसरे कामों में लगी थी, चाय में थोड़ा समय तोह लग hi जायेगा.. जरा सा भी सब्बर नहीं है

..सत्यम गया है न अंदर, अचे से चाय बनवा रहा होगा"

सविता अपनी बात कहते हुए खुद hi धीरे से है पड़ती है..

चलो हम सब अब वापस अंदर लौट चलते है मालती और सत्यम क पास जहा इस थोड़ी से दिएर में hi वह का पूरा दृस्य बदल चूका था

मालती इस समय रसोईघर क दरवाजे क पास वाली दिवार पे अपने दोनों हाथों को टिकाये हुए झुकी थी उसकी गोरी उंगलिया बारिश की सीलन क चलते ठंडी दीवारों पे जमी हुई थी और कमर पीछे की और निकली पड़ी थी जिसके चलते उसकी गोल और सख्त जानलेवा गांड बहार की और उभरी हुई थी.. पर सबसे बड़ी बात की उसकी साड़ी जो इस समय उसकी कमर तक छड़ी हुई थी और कुछ ऐसे साड़ी को मोड़ क अंदर की और दबा दिया गया था की उसे पकड़ क रखने की जरुरत hi नहीं थी और इस कारन मेरी कामुक माँ 'माटी' की पूरी गांड पूरी तरह निवस्त्र होक सत्यम की आँखों क सामने अपने यौवन का परचम लेघरा रही थी

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"मत कर सत्यम.. कोई आ सकता है, मुझे दर लग रहा है.."

मालती धीरे से अपने पीछे खड़े सत्यम को देखती है जो उसे कोमल मस्तानी और गदराई गांड को निहारते हुए अपने लोअर क ऊपर से hi अपने लुंड को सहलाये जा रहा था और एकटुक घर की मंझली भानु की नंगी योनि और गांड को देख क मस्त होता जा रहा था.. वो अपने लुंड को जोर से अपने लोअर क ऊपर से hi दबाते हुए अपना थूक जातक क धीरे से कहता है

"दर मत कुटिया.. तलटरी गांड नहीं मरूंगा, वैसे भी तेरी गांड का छेद तोह कुवारी लड़की जैसा लग रहा है, इसमें मैंने अभी लोढ़ा पेल दिया तोह साली चिनार तू चिल्ला चिल्ला क सबको बुला लेगी"

सत्यम क सब्द अब पूरी तरह बदल चुके थे, उसकी आँखों और शब्दों में सिर्फ हवस hi हवस थी

"कमीने.. कहा था न मैंने की घर में ऐसा कोई सब्द नहीं बोलना वर्ण मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.."

मालती वैसे तोह उसे डाटने क लिए इन शब्दों का प्रयोग करती है पर वो खुद जानती थी की उसके शब्दों में कोई भी दम नहीं है.. सत्यम अपना एक हाथ आगे बड़ा क 'मोनू की माँ' की नंगी गांड पे रखते हुए धीरे से सेहला देता है जिससे मालती की कामुकता क चलते आँखें बंद होती चली जाती है और उसके निकलते शब्दों में उसकी कामुकता का पता लग भी रहा था

"Aaaaaaaaaahhhh.. लमिने.. किया कर रहा है, तूने बस देखने क लिए कहा था.. वो भी अगर मैंने मोनू की कसम न ली होती तोह ये भी नहीं देखने देती, भूल मत हम घर में है"

मालती की बातों से ये तोह पक्का हो गया की खेल इतनी जल्दी यहाँ तक कैसे आ पहुंच.. चलिए अब इसके आगे देखते है किया किया होने वाला है आज मोनू की गदराई माँ क साथ



कंटिन्यू... 👇
 
सत्यम अपना पेअर उठा क मालती क घुटनो क नीचे अटकी हुई उसकी पूरी तरह गीली पेंटी को अपने पेअर क अंगूठे और ऊँगली क बीच दबा क उसे और नीचे की और खींच देता है जिससे मालती की वो पूरी तरह चिपचिपे प्राधार से गीली पेंटी अब उसके पैरों क बीच फास चुकी थी ठीक वैसे जैसे किसी ने मालती क दोनों पैरों में बेड़िया दाल दी हो.. उसकी साड़ी का पल्लू उसे ऐसे झुके होने क कारन पूरी तरह नीचे गिरा हुआ था और ब्लाउज आगे से थोड़ा खुला हुआ था, साथ hi साथ ब्लाउज की हालत से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसे जोरो से मसल गया हो ककी उसपे काफी सिलवाते नज़र आ रही थी

माँ की नंगी गांड इतनी ज्यादा पीछे की और निकली हुई थी की गांड क कोमल छेद क साथ साथ उनकी छूट का लाल पद चूका और सुजा हुआ छेद भी साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था..

जिसे देख क सत्यम का लुंड बस उसका लोअर पहाड़ क बहार आने क लिए अंतिम लड़ाई लड़ने पे उतारू था, तभी ठंडी हवा का एक झोंका बहार से आके पूरी रसोईघर में भरता चला जाता है जिससे चूहे की आग तेजी से भड़क सी पड़ती है और वही ठंडी हवा का झोंका जब नंगी मालती की नंगी गांड से टकराता है तोह मालती का पूरा जिस्म कामुकता की सिरहर से ऐसे भर उठता है की पूरा सरीर सूखे पत्ते सामान कंपकपी से भरता चला जाता है.. और उसके मुंह से एक मौक सिसकारी फुट पड़ती है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh…………."

मालती की लगातार बढ़ती कामुकता का हाल कुछ ऐसा होता जा रहा था की हवा क एक झोंके से भी उसकी योनि थर्रा दे रहा था

तभी सत्यम जो अपना हाथ मालती की गांड पे रखे हुए उसे धीरे धीरे सेहला रहा था वो अपनी हाथ की उँगलियों की गांड की गहरी दरार में चला देता है.. जहा उसकी मोती उंगलिया गांड की दरार क बीच पहुंचते hi पहले उस कामुक छेद को चुटी है जो किसी कुवारी लड़की क छेद जैसा प्रतीत हो रहा था और फिर वो मरदाना उंगलिया उस नजूम छेद क अंदर से आती गर्मी को बर्दाश्त करते हुए आगे की और बढ़ती है और नीचे की और सरकती चली जाती है, जहा जैसे hi उसकी 4 उंगलिया एक साथ गांड क कोमल छेद को छेड़ते हुए लाल सूजी हुई योनि पे आती है तोह बेचारी हमारी मालती का पूरा सरीर ऐसे काँप उठता है जैसे किसी ने उसे नंगा करके ठण्ड की रात में बीच सड़क पे खड़ा कर दिया हो.. एक जवान लड़के की उँगलियों की चुवा जब एक गर्दै औरत की योनि पे लगती है तोह वो औरत कितना भी चाहे अपनी कामुकता और अपनी सिसकारी को रोक नहीं सकती

"Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhh…………… Satyaaaaaaaaaaaaaa………mmmmmmmmmm… maaaaaaaaatttttttttttt.. Karrrrrrrrrrrrrrrrr….. Esssssssssssssssssssshhhhhhhhhhh… Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

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पर जब एक गदराई औरत ऐसे कामुकता से सिसकारी भर्ती है तोह सत्यम जैसे जवान लड़के भी अपना आप अपने आप hi खो देते है.. और ऐसी का नतीजा था की वो पूरा हाथ hi दर्द से भरी हुई मोनू की माँ की योनि पे जमा देता है और जोर से उसे भींच डालता है, जिससे दर्द की एक ऐसी लहर मालती क सरीर में दौड़ पड़ती है की उसकी चीख निकल पड़ती है.. वो तोह वो खुद hi जल्दी से अपना मुंह जोर से बंद कर लेती है और होंठों को जैसे खुद hi सी लेती है वर्ण उसकी ये चीख बहार बैठा हर इन्शान अचे से सुन सकता था

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh…………. Ummmmmmmmmmmmmm…. Gggrrrrrrrrrrrrrrrppppppppppppppp… Kuttttttttttttttttteeeeeeeeeeeeeeeeeeee…. किया कर रहा है hamarjadeeeeeeeeeeeeeee… चोर… Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhh…. Ummmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm….. Grrrrrrrrrrrrrrrmmmmmmmmmm….. Hmmmmmmmmmmmmmmmmrrrrrrrrrrrrggggggggggggguuuuuuu…"

मालती अभी दर्द से तड़पती हुई अपने होंठों को जोर से बंद hi करती है ताकि उसकी चीख घर में किसी तक पहुंचे न, पर इतने में hi सत्यम अपना कमीनापन दिखते हुए अपना मोटा अंगूठा मालती की सूजी हुई छूट में पूरा का पूरा एक hi बार में उतर देता है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh…. निकल………… kuttttttttttttttteeeeeeee…. हरामजादे………………. Aaaaaaaaaaaaaahhhhh…. Essssssssssshhhhh"

सत्यम भी मुस्कुरा क अपना अंगूठा बहार खींच लेता है और उसे मुंह में रखते हुए उस सूजी हुई छूट का कॉमर्स चखते हुए

"Ummmmmmmmmmmmmmm… स्वादिष्ट……… ummmmmmmmmmmmmm.."

मालती जो अभी अभी दर्द से तड़प उठी वो भी अपने जवान भतीजे की ऐसी हरकत पे अंदर तक गंगना सी जाती है जिसका परिणाम ये निकलता है की उसकी योनि क दोनों सूजे हुए होंठ खुद hi हौले हौले खुलने बंद होने लगते है.. जिन्हे देख क ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो सांस ले रहे हो

एक जवान लड़कों क हाथों का जादू hi था की जिसने एक hi पल में मालती जैसी कामुक और गदराई औरत क नमकीन पानी की धार निकल दी थी और अब वो नमकीन पानी धीरे धीरे रिश्ते हुए उसकी योनि और उसके काले बालों क जंगल क सिचाई सी कर रहा है.. मालती बुरी तरह थकी सी हाफ रही थी

"Aaaaaaaaaaaaaaahhh.. कमीनाआआआ………."

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और सत्यम बस मुस्कुरा hi पड़ता है

वही मालती की पीट पीछे चूल्हे पे चाय छड़ी हुई थी जिसमें जौरात की सभी चीज़े पद चुकी थी अब बस जरुरत थी तोह उबाल आने की, वैसे जो हालत इस समाय मालती की थी उससे तोह यही लगता था की उस चाय से पहले कई मालती क सरीर की गर्मी ुभल भरना न सुरु कर दे, वैसे तोह उसका सरीर लगभग उस तापमान तक पहुंच hi चूका था.. अगले कुछ पल सविता की उस रसोई में या तोह मालती की तेज़ी से चलती गरम साँसों का स्वर सुनाई पड़ता है या चूल्हे पे बनती उस चाय की ध्वनि क साथ साथ उसकी मध्यान और पियरी सी सुगंध वह फैली होती है

मालती इस समय हफ्ते हुए दोनों हाथों को उसी दिवार पे टिकाये हुए नीचे से पूरी नंगी अवस्था में अपनी साड़ी को गांड क ठीक ऊपर फसाये हुए गांड क छेद से लेके योनि की सूजन तक दिखते हुए धीरे धीरे गरम साँसे लेते जा रही थी, जहा उस कारन उसके सरीर में होती कामुक कम्पन का सीधा असर महेंद्र क छोटे बेटे सत्यम क लुंड पे पड़ता दिख रहा था.. तभी तोह वो अपने लोअर क ऊपर से hi अपने भीमकाय मोठे काले मुसल को जोर से मसलता है

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और बिना अपनी चची क ज्ञान क उसकी गांड क पास जेक घुटनो पे बैठ जाता है जिससे उसका मुंह अब पूरी तरह मालती की गहरी गांड की गहरी दरार क सामने था.. सत्यम धीरे से दोनों हाथों से 'मोनू की माँ' की गांड को जकड़ता है और धीरे से उसे चीरते हुए उस कामुक और कैसे हुए छेद पे अपने होंठों को गोल करते हुए गरम फूंक सी मरता है, उसकी इस ादः और अपने चूतड़ों का ऐसा फैलना उसपे अपने कैसे छेद पे सत्यम की गरम साँसों क पड़ना ये सब एक साथ होने क कारन उसका पूरा सरीर कुछ ऐसा होता है जैसे कामुकता की आग में अचानक से मालती का सरीर झुलसना सुरु हो गया हो, जिससे उसके मुंह से कामुक सिसकारी और एक पियर सी गाली निकलने पड़ती है

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhh.. Kutttttttttttteeeeeeeeeeeeeee… अब किया करना चाहता है.. Esssssssssssssssshhhhhhhhhhh"

मालती क इन शब्दों में सत्यम को मन करने से ज्यादा, न जाने क्यों उसे और उकसाने जैसी गर्मी थी

वही सत्यम अपनी खूबसूरत हसीं चची की बात और उनके शब्दों को सुनकर और ज्यादा कमीनेपन से मुस्कुरा पड़ता है और धीरे से हस्ते हुए अपनी चची क गांड क छेद को देखते हुए कहता है

"ऐसे तोह मई hi पहाडुंगा… छोड़ छोड़ क काला कर दूंगा इस गुलाबी छेद को.."

सत्यम की उंगलिया जो इस समय 'कुंदन की पत्नी' की कोमल और गुदाज गांड क मार्श में जैम चुकी थी वो और ज्यादा गहरी धंसती सी चलती जाती है यानि सत्यम अपने हाथों की पकड़ को और ज्यादा मजबूत बना देता है और.. मालती की तेज से भी ज्यादा तेजी से चलती हुई साँसे उसके जिस्म का काबू उसके हाथों से चींटी जा रही थी वो कुछ कहने क लिए मुंह तोह जरूर खोलती है पर जो कहना च रही थी वो नहीं कह पाती उसके स्तन पे उसके मुख से वो कामुक गहरी सिसकारी निकलती है जिसे सुनकर एक 100 साल क बुड्ढे का लुंड भी खड़ा हो जाये

"Satyaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaammmmmmmmmmm.. Kutttttttttttttteeeeeeeeeeeeeeee… किया कर रहा है yeeeeeeeeeeeee…. Essssssssssssssssssssssssssssssshhhhhhhhhhhhhhhh… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh… खा जा हरामी kutttttttttttteeeeeeeeeee…"

असल में सत्यम दोनों हाथों से अपनी खूबसूरत और गरम चची की गांड को अचे से दबोच क उसे इतना फैला देता है की उसकी हवस से भरी हुई आँखों क सामने वो कैसा हुआ छेद हल्का सा खुल सा जाता है और ये देखते hi सत्यम जैसे जवान लड़के का खूब पे काबू रख पाना संभव hi नहीं था.. इसलिए वो बिना विलम्ब क तुरंत hi अपना मुंह आगे करके अपने होंठों को पूरी तरह 'मोनू की माँ' क छेद पे रख क चुम लेता है, ेऐसे इस बात से आप ये भी अंदाज़ा लगा सकते है की सत्यम ने गांड को कितना ज्यादा फैला दिया होगा की वो उसकी दरार क बीच अपना मुंह घुसा प् रहा था

"Ummmmmmmmmmmmmmmmmmmmm…………… Slllllllllllllllluuuuuuuuurrrrrrrrrrrrppppppppppppppppppp.."

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सत्यम दोनों चूतड़ों को और अचे से फैला क उनके बीच अपना पूरा मुंह घुसा क पहले तोह बस उस कामुक और कैसे छेद को चूमता है और फिर धीरे से अपनी जीभ निकल क उसे जोर से किसी आवारा कुत्ते सामान अपनी कुर्दुइ जीभ से छत्त लेता है.. और वो ये एक नहीं 2-3 बार करता है

"Ummmmmmmmmmmmmm…. Sssssssssslllllllllllluuuuuuurrrrrrrrrpp……. Ggggggggggggggrrrrrrlllllllllluuuuuuppp……… uuummmmmmmmmmmmm… Ssssssrrrrrrrrrrrrrrrrppppppppppplllllllllllllllluuuuuuupppp…….. Chhhhhhhhhaaaaaaapppppppppplllllllssssssssssssssuuuuuurrrrrpppppppp…."

एक गदराई औरत क प्रति ऐसे कामुक प्रहारों में इतनी ताक़त होती है की वो उसे हार माने पे मजबूर कर देते है तभी तोह अब तक सत्यम को मन करने वाली मालती क नए सब्द उसके अंदर की गर्मी का खुद hi बखान सा करने लगे थे

"Aaaaaaaaaaaahhh…. kutttttttttttttteeeeeeeeeeee… हरामी……….. Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh.. कहाआआआ.. जा kutttttttttttttteeeeeeeeeee… कहाआआआ.. Jaaaaaaaaaa.. मेरी Gandddddddddddddd… पूरी गांड खा ले मेरी…………. Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhh.."

सत्यम का लुंड भी उसके लोअर में पूरी तरह कैद उसकी चची क ऐसे शब्दों क चलते ख़ुशी से कुछ बून्द आंसू बहा hi देता है


कंटिन्यू... 👇
 
मालती दोनों हाथों को उसी दिवार पे टिकाये हुए कामुकता की अधिकता क चलते पूरी पागल होती जा रही थी, उसे खूब पे काबू रख पाना जैसे असंभव सा लग रहा था.. वही सत्यम की हरकतें जैसे बस बढ़ती hi जा रही थी तभी तोह मालती न च क भी अपनी गांड को जोर से पीछे करने पे मजबूर होती जा रही थी और सत्यम भी अपनी जीभ को जोर से उस कामुक और कैसे गांड क छेद पे चलते हुए उसे अपने थूक से पूरा गीला कर चूका था पर वो अब भी रुक नहीं रहा था.. ऐसी बीच वो अपना चेहरा थोड़ा सा पीछे करता है जो 'मोनू की माँ' क चूतड़ों क बीच जोर से दबा हुआ सा था और फिर मालती क कुछ भी समझ पाने से पहले hi वो अपनी नाक को आगे करके हुए उसे मालती की गांड क छेद पे जोर से दबा देता है और एक गहराई सांस खींचता है

"Ummmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm…. Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh…. किया खुबसुओं………… haiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii………………… अतुलनीय…"

मालती तोह बेचारी पानी पानी सी हो जाती है, और मैं सच में पानी होने की बात कर रहा हु ककी उसकी योनि अब लगातार कॉमर्स की वर्षा किये जा रही थी, जो कही से भी आम बात नहीं थी पर ये कामुकता की बस एक छोटी सी झलक जैसी थी

सत्यम नाक को जोर से मालती की गांड पे कुछ ऐसे दबाता है है की 'मोनू की माँ' की गांड का वो कैसा गुलाबी छेद धीरे से हल्का सा खुल सा जाता है और सत्यम की नाक की ऊपरी नौक या ऊपरी हिस्सा हल्का सा अंदर की और घुस जाता है जिससे मालती को अजीब सा असीम आनंद और एक जहां पर कामुक पीटा का एहसास होता है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh… essssssssssssssshhhhh….. kuuuttttttttttttteeeeeeeeeeeee…. किया कर रहा है……….. Aaaaaaaaaaaahhhh… haiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii… Maaaaaaaaaaaaaaaaa………… मत कर… हरामी…. हरामजादे भड़वे.. Kuttteeeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaaahhhh…. मत कर सत्यम betaaaaaaaaaaaaa…. Esssssssssssshhhhhhhhhhhhhhh.."

मालती कामुकता की अद्किकता में दिवार पे दोनों हाथों को टिकाये हुए कभी अपनी गांड को धीरे से गोल गोल घूमती तोह कभी जोर से पीछे की और करती तोह उसे ऐसा प्रतीत होता हैसे उसकी भतीजे की नाक की वो तीखी नौक उसकी गांड में घुस सी जाएगी.. पर kul-milakar वो उस आनंद से खुद को बचा नहीं प् रही थी, वही दूसरी और उसका जवान बेटे सामान भतीजा नाक को जोर से गांड में घुसते हुए नीचे से अपनी जीभ को पूरा बहार निकल क गांड क निचले हिस्से से लेके मालती की सूजी हुई छूट तक जीभ फिरने का कार्य भी करने लगता है

"Ummmmmmmmmmmmmmm… Gllllllllllllllllluuuuuuurrrrrrrrpppp….. Slllllllllllllluuuuuurrrrrrrrrrrrrrpppppppppp…… Ssssssssssssssssslllllluuuuuuuppp…….. Chaaaaaaaaaaaaaaapppppppppppp…. Ummmmmmmmmmmmm… सललललललललूउउउउउउ….. Pucccccccccchhhhhhhhhh… Ssssssssssssslllllllluuuuuuuurrrrrrrrppppppp…"

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सत्यम की इन कामुक हरकतों ने मालती को बुरी तरह पागल कर दिया था, वो अजीब से मजधार में फास चुकी थी, जहा उसे इस बात का दर भी था की कही कोई आ न जाये.. पर साथ hi साथ ये भी दर सताने लगा था की कही सत्यम से मिलने वाला ये आनंद बंद न हो जाये, उसे किया चाहिए वो इस बात को तय नहीं कर प् रही थी.. उसे अपनी इज्जत से प्रेम तोह था पर साथ hi साथ अपनी इज्जत लुटवाने का ाँद भी वो खोना नहीं च रही थी

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhh… kuttttttttttttttteeeeeeeeee… mattttttttttt… Aaaaaaaaaaaaaahhh… Haiiiiiiiiiiiiiiiii… Maaaaaaaaaaaaaa… kuutttttttttteeeeeee… खा जाएगाआआआ.. kiyaaaaaaaa…Aaaaaaaaaaaaaahhh.. Haiiiiiiiiiiiiiii.. Maaaaaaaaaaaaa…. Essssssssssssssshhhhhhhhh… haiiiiiiiiiiii… reeeeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh.."

मालती कामुक सिसकारियां भरते हुए कभी सत्यम को मन करती तोह कभी उसे खुद hi उसकी गांड को चबा क खा जाने का आदेश सा देती, वो कामुकता सी अग्नि में पूरी तरह जल क स्वाहा होती जा रही थी.. उसकी सांसें अब धीरे धीरे टूटने लगी थी और उसका कामुक गदराया जिस्म थरथरा रहा था साथ hi उसकी मसल गोरी भरी हुई जांघें जोरो से काँप रही थी और वो धीरे धीरे अपनी गांड को अपने जवान भतीजे क मुंह पे दबाते हुए ये भूलती जा रही थी की बस थोड़ी hi दुरी पे सभी लोग उपस्थ्ति है

"आआह्ह्ह… सत्यम… kuttteeeeeeeeeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaahhh.. भड़वे.. हरामजादे……… Aaaaaaaaaaaahhhh.. मत karrrrrrrrrr… Aaaaaaaaaaahhhh… बस कर… betaaaaaaaaaaaa…. आआआहहह… कोई आ जायेगा… हीी मायआ… मत कर न… आआह्ह्ह… घर में सब लोग उपस्थित है… किसे ने देख लिया तोह किया जवाब दूंगी… आआह्ह्ह…"

मालती का मन करने वाला कोई भी सब्द उसके सरीर की अग्नि से मेल नहीं खा रहा था, बल्कि ये कहना ज्यादा सही होगा की उसके द्वारा मन किये जाना क लिए प्रयोग होता हर सब्द उसके मुख से बहार एते hi उसकी अपनी hi अग्नि में जल क राख होता जा रहा था

वही सत्यम बिना अपनी कामुक चची की बातों पे धियान देते हुए वो बस अपनी नाख को पहले तोह जोर जोर से अंदर घुसता रहता है और फिर जब उसे खुद hi सांस लेने में परेशानी होने लगती है तोह वह से अपनी नाख हटा क अपनी पूरी खुरदुरी जीभ को जोर जोर से मोनू की माँ की गांड क उस छेद पे चलने लगता है जिसका प्रयोग न जाने कब से नहीं हुआ था.. ककी उसकी कसावट से तोह यही प्रतीत हो रहा था जैसे वो किसी कुवारी कन्या का गुलाबी छेद हो

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सत्यम की हरकतों का पूरा जादू अब साफ़ साफ़ दिखने लगा था ककी अब खुद मालती अपनी गांड को जोर जोर से पीछे करने लगती थी और अपने जवान भतीजे क मुंह पे पूरी सिद्दत से दबाने लगी थी जैसे आज पुरे क पुरे सत्यम को अपनी गांड में भर लेगी.. वही उसकी योनि से उसका कॉमर्स लगातार बह रहा था, जो उसकी काली काली झाटों से होता हुआ उसकी मक्खन जैसी जाँघों पे बहते हुए उसकी पैरों में फांसी गीली पेंटी तक जाना सुरु हो चूका था.. मालती से जब और बर्दाश्त नहीं हो पता तोह वो खुद hi अपनी लाज का गहना सा उतर देती है और कामुकता से सिसकारी भरते हुए अपना एक हाथ दिवार पे जमाये रखती है पर दूसरे हाथ को पीछे ले जेक उसकी उँगलियाँ अपने जवान भतीजे क घने और इस कामुक म्हणत क कारन पसीने से भीगे बालों में अनायास hi चलनी सुरु हो जाती है, पर तभी सत्यम जोर से उसके दोनों कामुक और गोर हलके गुलाबी चूतड़ों को भींच सा लेता है और अपनी जीभ को नुकीला करके गांड क उस कैसे छेद में जोर से प्रवेश करवाने की पूरी चैस्ता करता है जिसके चलते मालती को अपने अंदर जलती हुई आग में घी पड़ने जैसा प्रतीत होता है और वो पुरे जोश से आआह्ह.. भरते हुए अपने जवान हरामी भतीजे क बालों को जकड क उसे कसके अपनी गोरी और गुलाबी गांड क बीच पूरा दबा सा देती है, इस पल में मालती की शक्ति मानो जैसे अचानक से जागृत हो जाती है वो इतनी जोर से सत्यम का चेहरा अपनी गांड पे दबा देती है की एक पल क लिए सत्यम को उसकी सांस रूकती हुई सी महसूस होती है और उसके होंठ जोर से मोनू की माँ की गांड क छेद पे रगड़ जाते है जिससे मालती को भी असीम और अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa……….. ले खा ले कुटीऐई… ले खा ले…. खा जा बहनचोद.. खा जा मेरी गांड को… Aaaaaaaaaaaaahhhhhhh.."

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मालती पुरे जोश में भरते हुए इतनी जोर से अपनी जेठानी क बेटे का मुंह अपनी गांड पे दबा क उसी हाथ से जैसे वही जोर से रगड़ सा देती है उसे.. जिससे सत्यम को सांस तक लेने में मुश्किल हो जाती है वो जोर से दोनों चूतड़ों क कामुक और गदराये मार्श में अपनी उंगलिया धंसा देता है और पूरी हिम्मत करते हुए अपना चेहरा उस छेद की गहराई से बहार निकल पता है.. और ऐसा होते है वो हल्का सा पीछे होक ऐसे जोर जोर से सांस लेने लगता है जैसे किसी ने उसका सर 2 मुलायम तकिये क बीच दबा रखा था इतनी दिएर से

सत्यम जोर जोर से सांस लेते हुए

"बहनचोद.. जान लेगी किया… मादरचोद रंडी साली.."

न जाने सत्यम की गालियों में ऐसी कोनसी कामुकता थी की मालती खुद भी हफ्ते हुए बस मुस्कुराती है और फिर उसकी और देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"मज़ा आया कमीने.. मेरी गांड चाट क.."

सत्यम एक बार को मालती को देखता है पर उसके खूबसूरत चेहरे को देखते हुए वो भी मुस्कुरा पड़ता है और फिर जोर से 'मोनू की माँ' की नंगी गांड पे थप्पड़ जड़ते हुए कहता है.. चतत्ताआआअआकककककक…

"साली.. एक दिन तेरी ये गांड झींगुर से फड़वाउंगा, तक देखूंगा कैसे हस्ती है"

मालती को न जाने झींगुर क बारे में सुनकर कैसी hi अनोखी गर्मी का एहसास होता है की उसकी योनि की कॉमर्स की कुछ बंधे निकल क उसकी काली झांटों में कही घूम सी हो जाती है और वो मुस्कुरा क कहती है

"मेरी गांड को शादी का भोज थोड़ी है, जिसे जो चाहे आके खा ले.."

मालती ने बात इतने अनोखे और कामुक तरीके से कही थी की सत्यम भी है पड़ता है, वही हमारी हर्षिता की जेठानी यानि मालती की गांड इस समय सत्यम क थूक से पिरि सनी सी हुई थी… जिसके चलते भी मालती को नया अनुभव hi मिल रहा था

सत्यम अब और देरी नहीं करता ककी वो जनता था की चाय लेके भी उसे जल्दी hi जाना है इसलिए वो फिर से अपनी इस्तिथि में लौटता है और एक बार फिर से 'मोनू की माँ' की गांड को दोनों हाथों से दबोच क उसके चूतड़ों को पूरा फैला देता है और बिना किसी देरी क वापस से अपना मुंह उस कामुक गांड क बीच उतर देता है जिसकी खुसबू इस समय पूरी रसोई में फैली हुई थी.. मालती एक बार फिर से कामुकता क चलते मचल पड़ती है और उसकी कामुकता से भरी हुई पर दबी सिसकारी फुट पड़ती है

"Aaaaaaaaaahhhhhhhhh… phirrrrrrrrrrr….. Seeeeeeeeeeeeeeee… Essssssssssshhhh…. Kuttttttttteeeeeeeeeee…. चाय बह जाएगीइइइइइइ… Aaaaaaaaaahhhhh.."

मालती ने चाय क लिए इस लिए कहा था ककी अब पतीले में उबाल नज़र आने लगा था, वैसे चाय क उबाल से ज्यादा तोह उसकी कामुकता इस पल उबाल मार रही थी, पर उसका किया hi किया जा सकता था

सत्यम अपने लुंड क आगे हार मानते हुए दोनों हाथों से अपनी कामुकता से भरी गदराई हसीं चची 'मालती' की गांड को पूरा फैला चूका था और एकबार फिर से उसने अपनी खुरदुरी जीभ निकल क उस कैसे गुलाबी छेद पे चला सुरु कर दिया था..

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वो दोनों हाथों से दोनों चूतड़ों को जकड क थोड़ा और फैलता है और जैसे hi वो सुनहरा छेद खुलता है उसमें अपनी जीभ को पूरा hi अंदर उतर देता है, जिससे मालती का कामुकता की अग्नि में जलता हुआ सरीर ऐसे तड़प पड़ता है जैसे गरम तवे पे पानी की छींटे मारी गयी हो

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhh…. Kutttttttttteeeeeeeeeeee…. किया कर रहा है……… Aaaaaaaaaahhhh…"

पर सत्यम का ये वापस से नया कार्यक्रम तोह सुरु hi हुआ था, वो इस बार जितनी ज्यादा संभव हो सकती थी उससे ज्यादा hi अपनी जीभ को 'मोनू की माँ' की गांड में अंदर तक भर क ऐसे चलता है जैसे कोई जवान होता बचा पहली बार किसी कामुक गदराई औरत को छोड़ने की कोशिश कर रहा हो

मालती क जवान भतीजे की वो जीभ अब उसकी गांड क काफी अंदर तक उतर चुकी थी.. या ये लिखू की लगभग आध इसे ज्यादा अंदर घुस चुकी थी जिससे मालती का हाल कुछ ऐसा था की उसकी आँखें जोररो से बंद हो चुकी थी और होंठों इतनी जोर से उसने भींच लिए था की कही उसकी कामुकता भरी चीख न निकल पड़े

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कंटिन्यू... 👇
 
गदराई मालती अपना काबू पूरी तरह खो चुकी थी.. पर फिर भी वो अपनी कामुकता से भरी चीख को बहार निकलने से रोकने में अभी तक तोह कामयाब hi हो रही थी.. वही दूसरी और उसका जवान भतीजा 'सत्यम' उसे पूरी तरह पागल बनाने पे उतारू था ककी वो जीभ को गहराई तक अंदर उतरता और फिर बहार निकल क वापस अंदर ऐसे उतर देता जैसे कोई नाग baar-baar बिल में अंदर बहार जाने का खेल खेल रहा हो

"Aaaaaaaaaahhhhh… Esssssssssssshhhh… क्यों तंग कर रहा है.. कुत्त्तीीीे… चोर दे….. मुझे………. Maaaaaaaaaaaaaa… Haiiiiiiiiiiii… आईसीईईई.. ऐसे hi…. Essshhhhhhhhhh… ले चाट ले कुत्ते मेरी गांड को.. Aaaaaaaaaahhhh… ले घु भी खा ले मेरा… Aaaaaaaaaahhhhh.."

मालती, सत्यम की हरकतों से पूरी तरह बैचेन होती हुई अब एक बार फिर से अपनी गांड को उसके मुंह पे जोर जोर से दबाने लगी थी, जैसे मानो वो खुद च रही हो की सत्यम उसकी गांड में अपनी पूरी जीभ उतरता रहे.. वैसे उसकी गीली योनि उसकी काली झांटों को भिगोते हुए पूरी तरह उस खेल क मैदान को बिगोए जा रही थी, पर सत्यम अपनी जीभ को गहराई तक उतारते हुए गांड क अंदर की नमी और गीलेपन को ऐसे चाट रहा था जैसे उसका स्वाद अतुलनीय हो

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"Ummmmmmmmmm… आआआआअह्ह्ह.. सल्ल्ल्लूऊऊऊररररररपपप… Ssssssssssssslllllllupppppppp… Chaaaaaaaaaaaapppp…. Shhhhllllllllllllllluuuuuurpppp… आआआअह्ह्ह… Ummmmmmmmmm…"

बेचारी मालती भी ऐसे कामुक प्रहारों से कब तक खुद को बचा पाती वो अपने स्वर पे काबू तोह रखती है पर अपनी कामुकता को रोक नहीं पाती

"आआह्ह्ह… हरामजादे… kutttttttttteee….. सत्यम.. आआह्ह्ह्ह.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़….. haiiiiiiiiii.. बीटा… uffffffffff… जोर से सुवर कही क… आआआआहहह… ऐसे hi अंदर तक जीभ घुसा…. बहनचोद.. बीटा.. आआअह्ह्ह… चाट कुत्ते चाट मेरी गांड… आआआआअह्ह्ह्हह… ले घुसा अपनी पूरी जीभ मेरी गांड में… Aaaaaaaaaahhh.. Maaaaaaaaaaaaa…."

सत्यम गांड को गहराई तक छत्ता और चुस्त रहता है अगले 2-3 मं उस रसोई में चाय और लड़कियों क जलने से ज्यादा स्वर सत्यम की कामुक हरकतों का था

"उम्मम्मम्मम्मम.. Gllllllllllllluurrrrrrr…pppp.. Slllllllllllluuurrrrrrrrppp…. स्स्स्सस्स्ररररलल्लूऊऊप्प्प्पपप्पप.."

और फिर वो खेल आगे बढ़ाते हुए अपनी कामुक गरम चची की जाँघों पे अपना एक हाथ रखते हुए उसे और फ़ैलाने का काम करने लगता है, पर मालती क पैरों में पहले से hi उसकी पेंटी अटकी हुई थी इस कारन वो ज्यादा कुछ पैरों को फैला तोह नहीं पाती पर इतना तोह उसके पेअर फ़ैल hi गए थे की गांड क छेद क साथ साथ योनि क पुरे दर्शन अब पहले से ज्यादा मिलने लगे थे.. सत्यम बिना देरी क अपने दूसरे हाथ को भी मालती की कामुक गांड से हटा क उसकी दोनों नंगी जाँघों पे रख क उनकी कोमलता का आनंद लेने लगता है और अपना मुंह गांड की दरार से बहार निकल क उसकी खुसबू लेते हुए कहता है

"Aaaaaaaaaaahhhh… बेहेन की लोदी किया स्वाद है तेरी गांड है, झींगुर को मिल जाये तोह दिन दहाड़े ऐसे अपने लुंड से पहाड़ दे… वो तोह वैसे भी तेरी गांड क पीछे पागल है.. उम्मम्मम्मम्मम.. आआआहहह"

मालती को आज सत्यम क दोस्त झींगुर क बारे में एक नयी चीज़ पता चली थी, जो सायद सत्यम जोश में बोल गया था.. या जान क, ये तोह वही जाने ?

सत्यम की मरदाना उंगलिया 'कुंदन की पत्नी' की कोमल और भरी हुई जाँघों पे ऊपर नीचे घूमते हुए बेचारी की योनि क कॉमर्स को और ज्यादा बहाने पे मजबूर कर रही थी जिससे मालती का पूरा सरीर थरथरा जा रहा था पर उसके पैरों में फांसी उसकी पेंटी जो इस समय थोड़ा और नीचे सरक क उसकी पायल क पास पहुंच चुकी थी उसे अब पहले से थोड़ा ज्यादा अपने पैरों को फैलने की आज्ञा सी दे रही थी और वो वैसे hi करती है.. जहा अब सत्यम क लिए चीज़े और ज्यादा खुल चुकी थी, वो उन कोमल जाँघों पे अपने हाथ फिरते हुए मुस्कुरा क कहता है

"साली… तू सच में असली माल है.."

सत्यम की ऐसी गन्दी और चिरचोरी बात मालती क पुरे अस्तित्व को हिला देती है, वैसे भी वो अभी इस पल यही सोच रही थी की

'किया झींगुर सच में उसके बारे में ऐसी सोच रहा था'

पर फिर उसी क साथ सत्यम क शब्दों ने उसके अंदर उठती तरंग को और बड़ा दिया था

सत्यम एक बार फिर से दोनों हाथों से 'मोनू की माँ' क चूतड़ों को दबोच लेता है और फिर से पूरा फैला देता है पर अब मालती की टंगे पहले से ज्यादा खुली हुई थी जिस कारन उसे गांड क दीदार क साथ साथ योनि क दर्शन भी भरपूर मिल रहे थे.. इसलिए वो इस बार गांड क कैसे छेद पे अपने होंठों को लगा क जोर से चूमता है

"Ummmmmmmmmmmmmm………"

और फिर बिना रुके अपने होंठों को नीचे सरकते हुए उस सूजी योनि को भी एक hi बार में चूमते हुए अपनी जीभ निकल क उसकी पहली हुई फाकों पे चला देता है

"उम्मम्मम्मम्म… Sssssssssllllllllllllluuuuuuuuuuuuuurrrrrrrrrrrppppp.."

मालती को एक पियारा और तीखा सा दर्द महसूस होता है और उसके जबड़े भीचते चले जाते है और दोनों हाथ सामने की उस ठंडी दिवार पे और मजबूती से जैम जाती है

"Aaaaaaaaaaaaahhh… किया कर रहा.. हैईईई… Aaaaaaaaaahhh.. कुटटी… मत कर न…. आआआआअह्ह्ह…"

सत्यम ने ये खेल बंद करने क लिए थोड़ी hi सुरु किया था, वो अब अपनी जीभ को निकल क अपनी खूबसूरत चची की सूजी हुई छूट और पहली हुई फाकों पे चालते हुए धीरे से अपनी जीभ को उस योनि की दरार पे चालते हुए अंदर उतर देता है.. जिससे मालती का सरीर ऐसे कंपकपा उठत है जैसे कोई सूखा पत्ता अपनी साखा से टूट क जमीन पे पड़ा हो और हवा का झोंका उसके पुरे अस्तित्व से सवाल करता है

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhh…. Kuuutttttttttttttteeeeeeeeeeeee…… हरामी कही क…………….. Esssssssssssssshhhhhh…"

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मालती का पूरा सरीर काँप रहा था और टांगें तेजी से कंपनी लगी थी, दोनों हाथ दिवार पर जमे हुए थे और अब उसकी साँसें लगभग रुक रुक क टूटने से लगी थी

"Aaaaaaaaaaahhh… कुट्ट्टीीीी… गांड.. से मन नहीं भरा किया… आआआअह्ह्ह.. जो अब मेरी छूट भी चाट रहा है… Esssssssssssshhhh…. देख नीचे तूने मेरा किया हाल करा हुआ है.. ेस्स्स्सस्स्स्सह्ह्ह.. Maaaaaaaaaaaaa… haiiiiiiiiiiiii… कितना दर्द हो रहा है मुझे… essssssssssshhh… छूट सुजा डाली है हरामी तूने.. आआआआअह्ह्ह्ह…"

पर सत्यम तोह जैसे उस योनि और गांड का दीवाना हो चूका था.. ककी उसकी खुर्दरुई जीभ अब गांड क कैसे छेद से होती हुई बार बार योनि की सूजन तक आणि जनि सुरु हो चुकी थी, वो कभी योनि की दीवारों को अपनी जीभ से फैलते हुए उसकी दरार में अपनी जीभ अंदर घुसा देता तोह कभी वह पे अपनी जीभ को किसी कुत्ते की तरह लगते हुए गांड क छेद तक लाता और उस कैसे छेद में अंदर जीभ घुसाने की चैस्ता सी करता है.. उसकी ये कामुक हरकतें मालती की kaam-agni को जैसे और भड़का दे रही थी तभी तोह वो जैसे सब कुछ भूलती हुई अपनी इज्जत की परवा किये बिना अपनी इज्जत लुटवा रही थी

"Aaaaaaaaaaaahhh.. Kuttttteeeeeeeeeeeeee… ेस्स्स्सस्स्स्सह्ह्ह.. ऐसे hi हरामी.. .अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. खा ले मेरी गांड खा ले.. Aaaaaaaaaahhh.. चाट कुत्त्तीीे.. Aaaaaaaaaaaaahh.. चाट ले मेरी छूट.. आआआआहहह.. घुसा दे हरामी अपनी जीभ मेरी योनि में.. Aaaaaaaaaahhh.. Maaaaaaaaaaaaaa… uffffffffffff… ऐसे hi……… आआआआअह्ह्ह्ह… हरामी kuttteeeeeeeeeeeee… Ufffffffffff…. कुत्त्ते ये किया बना दिया है तूने मुझे.. आआआआअह्ह्ह्ह"

सत्यम इस बार मालती की बात सुनकर वह से अपना मुंह हटते हुए

"रंडी…."

सत्यम क मुख से निकले इन शब्दों में न जाने किया था की मालती की योनि इस बार फिर से भरभरा क बह उठती है और उसका पूरा सरीर अकड़ने लगता है, वो एक बार फिर से अपना एक हाथ पीछे ले जेक सत्यम को बालों को पकड़ क उसे जोर से अपनी योनि से चिपका देती है

"तोह ले… कुट्ट्टीीी.. चाट अपनी इस रंडी का पानी.. ले पि ले… हराम क पिल्लीए.. मेरा पानी पे leeeeeeeeee.. Aaaaaaaaaaaahhh.. ले kuttttteeeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaaahhh"

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मालती का पूरा सरीर ऐसे काँप रहा था जैसे भेसड ठण्ड में वो पूरी नंगी होक नदी क बीच कड़ी हो..



कंटिन्यू... 👇
 
सत्यम भी बिना देरी क अपना पूरा मुंह खोल क अपनी खूबसूरत हसीं चची मालती की योनि एक hi बार में ऐसे मुंह में भर लेता है की मालती का आनंद एक hi पल में दुगना हो जाता है

"Aaaaaaaaaaaaaahhhh… Kuttttttttttttteeeeeeeeeee… हरामी.. मादरचोद.. भड़वे… बहनचोद… सुवर की औलाद… गली क kuttteeeeeeeeeee… रंडी क पिल्लीई……. Aaaaaaaaaahhhhh.."

मालती पूरी तरह पागल होते हुए हर वो गन्दा सब्द बोल रही थी जो किसी भी संस्कारी औरत पे सोभा नहीं देगा.. पर इस समय तोह वो किसी आवारा कुटिया सामान थी जिसे कोई भी कुत्ता कभी भी छोड़ सकता है, तभी तोह उसकी छूट जोर से झड़ती जा रही थी जिसका कॉमर्स अब सीधा सत्यम क मुंह में भरता जा रहा था.. वही मालती अब भी उसी दिवार पे अपने दोनों हाथों को जमाये हुए झुकी हुई थी, उसकी उंगलियां ठंडी दिवार पे मानो धास्ति सी जा रही थी और उसे अपना hi होश नहीं था.. उसकी वो साड़ी अब भी पीछे से कमर तक चढ़ी हुई थी और कमर क ठीक ऊपर अंदर की और फांसी हुई थी, उसके यौवन की रक्षा करने वाला उसका पल्लू एक तरफ लटका हुआ था और इज्जत को नीलम कर रहा था.. साथ hi उसकी गीली पेंटी अब भी उसकी पायल क पास नीचे पैरों में फांसी हुई उसकी वासना और उसकी कामुकता का परचम लहरा रही थी, और चूल्हे पे छड़ी वो चाय तेजी से उबलते हुए किसी भी पल बहार आ जाने पे उतारू थी

सत्यम जोर जोर से अपना मुंह चलते हुए छूट को ऐसे भींच रहा था अपने होंठों से जैसे उसके अंदर से निकलने वाली आखिरी बून्द तक वो अपने मुंह में भर लेगा.. वो एक भी खतरा आज नहीं चूर्ण च रहा था, वही मालती अब अपनी आँखें बंद किये हुए पूरी तरह थकन से भर चुकी थी और अब पियर से सत्यम क बालों में अपनी उंगलिया फिरते हुए उसका सर अब भी अपने पीच से अपनी योनि पे दबाये हुए थी, पर अब उसकी उँगलियों में वो जकड नहीं थी वो बस अब अपना हाथ रखे हुए थी.. उसका सरीर बुरी तरह थक चूका था और वो गहरी गहरी साँसे भर्ती हुई पूरी तरह उस ठंडी दिवार से चिपक चुकी थी

"Aaaaaaaaaaaaaaahh.. Kutttteeeeeeeeeee… तूने सच में मुझे 'सूरजमुखी गाओं' कोई सस्ती रंडी जैसा बना दिया है.. Aaaaaaaaaaaaaahhhh.. पूरा सरीर टूट रहा है मेरा.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़…”

मालती हाफति हुई बस इतना hi कह पाती है, पर उसकी उंगलिया अब भी उसके जवान भतीजे क बालों में चलती hi जा रही थी

सत्यम कुछ पलों तक अचे से छूट को चुस्त रहता है जहा बार बार मालती की काली गीली झांटें भी उसके मुंह में भर जा रही थी, और फिर वो धीरे से घुटनो क बल से उठता है तोह मालती भी हफ्ते हुए अपना चेहरा धीरे से घुमा क उसकी और देखती है तोह उसके चेहरा का हाल देख क खुद hi शर्म से लाल हो पड़ती है, ककी सत्यम का मुंह पूरी तरह उसके कॉमर्स में सना हुआ चमक रहा था.. साथ hi उसकी छूट की खूबसू उस पूरी रसोई में फैली हुई वह क वातावरण को और कामुक बना रही थी, सत्यम भी मालती को देखता है और मुस्कुरा पड़ता है पर उसके होंठ जोर से आपस में भींचे से हुए था

वो जल्दी से मुड़ता है और वही रसोईघर की लड़की वाले शेल्फ पे रखे हुए कई सरे चाय क कप में से एक को उठा लेता है, मालती जो अब धीरे से सीधी कड़ी होती हुई अपनी साड़ी नीचे गिराने लगी थी वो उसे ऐसा करते हुए समझ नहीं प् रही थी की आखिर वो किया करना च रहा है.. इधर सेतम जल्दी से वो चाय का खली चुप उठता है और अपने मुंह क पास लेक अपने होंठों क नीचे करते हुए धीरे से अपने होंठ खोल देता है

मालती उस पल अपने साड़ी को सही कर चुकी थी और अब नीचे झुक कर अपनी पेंटी को ऊपर की और चढ़ा रही थी, इतना ज्यादा कॉमर्स बहाने क कारन उसे हलकी सी खुमारी और थकन भी महसूस हो रही थी जिसके चलते उसकी टांगें अब भी हौले हौले कैंप रही थी.. वो पेंटी को पूरी तरह चढ़ा लेती है और फिर साड़ी को अचे से सही करती है और पल्लू से भी अपना यौवन और 'स्वर्गवासी मुरली' क घर की इज्जत छुपाते हुए खुद को पहले जैसा सामान्य बनाने की कोशिश सी करती है, जहा अगले hi पल मालती देखती है की उसके जवान भतीजे सत्यम क मुंह से कुछ गाड़ा चिपचिपा प्राधारत सा निकल क उस चाय क कप में गिरने लगता है जिसे देख क उसे समझते दिएर नहीं लगती की वो उसका hi कॉमर्स है जो उसकी योनि से निकलता था.. और अब ये समझना भी आसान था की उस समय सत्यम उसका कॉमर्स पि नहीं रहा था बस अपने मुंह में भरता जा रहा था

जल्दी hi मालती का वो कॉमर्स जो अभी तक सत्यम क मुंह में भरा हुआ था वो अब कप को भरता चला जाता है, और फिर सत्यम उस चुप को मालती की और बढ़ाते हुए

"मेरी रंडी चची क लिए खास चाय.."

मालती का पूरा सरीर थरथरा सा उठता है, उसके हाथ पेअर कांपने लगते है और वो धीरे से हाथ बड़ा क वो कप थम लेती है और जब अपनी आँखों क सामंने उसे लाते हुए अंदर देखती है तोह आधे से थोड़ा hi काम भरा हुआ वो कप देख क उसकी योनि जैसे उसी पल फड़फड़ा सी उठती है और अपने होंठों को ऐसे खोलने लगती है जैसे किसी चीज़ की मांग कर रही हो..

मालती कुछ कहने क लिए मुंह तोह खोलती है पर कुछ बोल नहीं पाती वो कभी सत्यम को देखती तोह कभी उस कप की और देखती, सत्यम.. मालती को ऐसे हैरान होता हुआ देख क मुस्कुरा उठता है और उसकी और देखते हुए धीरे से आँख मार क कहता है

"पीना जरूर.. आपका hi है.."

और फिर से मुस्कुरा उठता है.. मालती फिर से कप क अंदर देखती है जहा चिपचिपा और गाड़ा कॉमर्स भरा हुआ था, उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसके अंदर की वो अग्नि फिर से लौ पकड़ रही हो

अगले 5 मं बाद.. सत्यम चाय की ट्रे थामे हुए बहार छप्पर नीचे पहुंच ज्यादा है, जहा उसका लुंड अब भी अपना सर उठाये hi हुआ था, ककी शांति तोह मालती को मिली थी उसे कहा.. पर उसे देखते hi सविता जैसे उसे पूरी तरह एक hi बार में पद लेती है और मुस्कुरा क कहती है

"बड़ा समय लगा दिए तुम दोनों ने.. कोनसी चाय बनाने लगे थे ?"

अपनी गदराई गेहुआ रंगत वाली माँ की बात सुनकर सत्यम भी मुस्कुरा उठता है और धीरे से चाय को सबसे पहले उनकी और hi बढ़ाते हुए कहता है

"अरे माँ.. आप तोह जानती hi हो, मलाई निकलने में समय लगता है"

और फिर धीरे से उसकी चूचियों की गहराई देखते हुए आँख मार देता है, सविता भी एक कप उठते हुए मुस्कुरा क कहती है

"मुझसे ज्यादा अचे से ये कोण जानेगा भला.."

और वो खुद भी मुस्कुरा उठती है

वही अंदर रसोईघर में शेल्फ क सामने कड़ी मालती इस समय लगातार उसी कप की और देख रही थी जिसमें उसका hi कॉमर्स भरा हुआ था, फिर कांपते हुए हाथों से चाय का बर्तन उठती है और धीरे से उसमें चाय डालने लगती है.. जहा जैसे जैसे उस कप में चाय भर रही थी उसका गाड़ा कॉमर्स तरिता हुआ ऊपर किसी मलाई की भांति नज़र आने लगता है, फिर वो बर्तन को वापस एक और रखती है और एक पल क लिए उसी कप को निहारती रहती है फिर उसे उठा क अपने लाल गुलाब की किसी खिली हुई पंखुड़ी जैसे होंठों से लगा क पहला घूंट भर्ती है और खुद hi उसकी आँखें बंद होती चली जाती है

"आआआआहहह… स्वादिस्ट.."

***

आशा करता हु 'मालती की चाय' वाला ये खास अपडेट आप सभी को पसंद आये

🙏🙏

नष्ट अपडेट 👉 मत कर ये गुनाह है..

[On 15-04-26 (in Just 3 Days)]

🪶🪶🪶🪶🪶🪶

अपकमिंग उपदटेस ✨ 🖋️

मत कर ये गुनाह है.. (15-04-2026)

फिर से नहीं.. आआअह्ह (24-04-2026)

और इन्ही दोनों अपडेट क साथ,

ये Chapter 👉 कामुक वर्षा..

पूर्ण होगा

नेक्स्ट Chapter 👉 बिछड़ना..

उपदटेस: 👇

1- ये कैसा सपना था ?

2- ले पहाड़ मेरी गांड

3- बड़े साहब

4- नयी छूट की चुदाई

5- इंजन आयल लगा क मार ली

6- सुहानी सुबह

7- मेरा पियर चुद रहा था

8- छेड़खानी

9- दोस्त


10- मौत.. और अलविदा
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 528-529



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #09

मत कर ये गुनाह है..

सुंदरपुर में होती घनघोर वर्षा ने पुरे hi गाओं का जीवन ast-vyast सा कर दिया था, दूर दूर तक नज़र आते खेत बारिश की तीव्र बूंदों क बीच सुनसान नज़र आ रहे थे ऐसे में सायद hi कोई घर से बहार निकलने की चैस्ता करना चाहेगा.. वैसे भी पूरी तरह काले छाए हुए बादलों क चलते दिन क इस पहर में भी आज रात का दृस्य दीखता हुआ मिल रहा था, ऐसे मौसम में बारिश की नन्ही पर तीव्र बूंदें पैदा की डालियों को नहलाते हुए अपने ठण्ड का प्रकोप बढ़ती जा रही थी


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पर कई बार जीवन को जीना की प्रक्रिया हमे ऐसे वातावरण में भी घर से बहार निकलने पे विवस कर देती है और ऐसा hi कुछ हाल इस समय 40 साल क उस कुंवारे काले स्याह रंग क आदमी का भी था जो त्यागी जी की अनुपश्यतीति में यहाँ का वैद्य बना रहता है, वो इस पल पूरी तरह बीज हुए उस आदमी ने अपनी कमर तक आता हुआ कुरता पहना हुआ था जो घनघोर वर्षा क चलते इस हद तक भीग चूका था की वो सफ़ेद कुरता पूरी तरह उसके काले सरीर से चिपक क उसे निवस्ट सा कर रहा था

वही सरीर क निचले हिस्से में पहनी हुई उसकी धोती का भी यही हाल था, पूरी तरह भीगी हुई और उस पतले दुबले सरीर से चिपकी हुई

"साले.. अजीब सी बारिश है, कुछ पल क लिए रूकती है और फिर सुरु हो जाती है"

आदमी अपने हाथ में थमी एक छोटी सी पन्नी की और देखता है जिसमें उसका बटन वाला फ़ोन सुरक्षित था और फिर खुद से बड़बड़ाते हुए कहता है

"ये तबरेज भाई को भी ऐसी वर्षा में hi गरम होने वाली वो Jadi-buti की पुड़िया चाहिए थी..

... वैसे उनकी भी किया गलती है, ऐसे मौसम में अगर किसी क पास उनके जैसी हसीं बेगम हो तोह बेचारे का मन होगा hi"

फिर उसी पन्नी की और वापस देखता है जिसमें वो फ़ोन रखा हुआ था ककी उसी में वो पैसे भी थे जो उसे उस जड़ी बूटी की पुड़िया क बदले मिले थे

"वैसे भाभी ने ज्यादा hi पैसे दे दिया.. पर मुझे किया"

वो आदमी अपनी hi बात पे हस्ते हुए आगे बाद चलता है, जहा उसे याद आता है की वो घर में भरते हुए पानी क बाद भी आराम से अपनी चारपाई पे चढ़ा हुआ लेता था की तभी उसका फ़ोन बजता है और तबरेज भाई की बेगम का आदेश मिलता है

"इन्होने वो वाली जड़ी बूटी मंगवाई है.. जल्दी करियेगा"

और सिर्फ इतना कहकर hi वो फ़ोन भी काट देती है, जिससे पहले तोह उसे ग़ुस्सा आता है की ऐसी बारिश में वो पागल थोड़ी है जो दवा बना क देने जायेगा, पर फिर उसे रात की दारू क लिए पैसों की जरुरत याद आती है और बिना समय नस्ट किये हुए पहले से hi कुछ बनाई हुई दवा में से एक पुड़िया उठता है और चल पड़ता है.. और अब वो वही देने क बाद वापस लौट रहा था

तेज़ कदमो से चलता हुआ वो पतला दुबले आदमी जिसे देख क ऐसा प्रतीत हो रहा था की हलकी हवा भी उसके पैरों को हिलने में सक्षम होगी वो लगभग भागता हुआ सा आगे बड़े चला जा रहा था

"अरे बांकेलाल भैया.. इतनी बारिश में कहा भागे जा रहा हो, तनिक कही रुक जाओ"

ये सब्द उस साइकिल वाले क थे जो बांकेलाल की विपरीत दिशा यानि सामने से तेज़ पंडाल भरते हुए उस बारिश से बचने की कोशिश में आगे बड़ा जा रहा था, वैसे उसके शब्दों से आप जान hi गए है की मैं जिस आदमी की बात कर रहा था वो और कोई नहीं अपितु 'बांकेलाल' है

पर जैसे hi बांकेलाल उस साइकिल वाले को देखता है हैरानी से भर उठता है

"तबरेज भाई.. आप यहाँ, मतलब वो.."

तबरेज नमक वो आदमी भी अब ठीक बांकेलाल क पास पहुंच चूका था और अपनी साइकिल को धीरे करते हुए

"अरे वो सुबह जरा 'सूरजमुखी गाओं' तक गया था कुछ काम से, सोचा था रात हो जाएगी पर इस बारिश क चलते कुछ काम hi नहीं हुआ तोह जल्दी लौट आया"

तबरेज ठीक सामने आके अपनी साइकिल को रोकते हुए.. पर बांकेलाल तोह समझ hi नहीं पाटा की आखिर बात किया है पर वो अपनी इस्तिथि को छुपाते हुए जल्दी से खुद को सामान्य करते हुए

"अउ सुनाओ तबरेज भाई कैसे हो आप ?"

फिर ऊपर आसमान की और देखते हुए

"आप तोह देख hi रहे है इस बारिश में सर छुपाने की जगह hi कहा है ?"

साइकिल पे बैठा वो गाओं का आदमी भीगता हुआ और हौले से काँपता हुआ मुसकरुआ क कहता है

"है भैया ये बात तोह ठीक कही.."

पर तभी जैसे उसे कुछ याद आता है

"अरे वो आगे खंडहर है न, वह चले जाओ.. यही आगे तोह अभी पड़ेगा, फिर जब बारिश रुक जाये तोह आगे बाद जाना"

तबरेज के पल क लिए रुकता है और आगे कहता है

"मैंने भी पहले सोचा की वही रुक जाता हु, फिर याद आया घर पे आपकी भाभीजाण अकेली होगी इसलिए रुका नहीं"

तबरेज की बात सुनते hi अनायास hi बांकेलाल क अधरों पे मुस्कान खिल उठती है

तबरेज नमक गाओं का वो व्यक्ति बांकेलाल को एक सलाह देते हुए वापस अपनी साइकिल को गति दे देता है और आगे बाद जाता है, जहा अब बांकेलाल भी आगे बढ़ते हुए विचार करने लगता

"बात तोह ठीक hi है वैसे.. पर देखा जाये तोह मैं भीग तोह गया hi हु, तोह फायदा किया.. ?"

बांकेलाल अभी अपने विचारों में hi पंहुचा था की तभी आसमान में जोर से चमकती बिजली और गड़गड़ाहट ने उसके पुरे सरीर को बुरी तरह कंपकपी से भर दिया था

"नहीं.. नहीं… चलके उसी खण्डार में रुक जाता हु, किया पता कुछ lakdi-wakdi मिल जाये तोह कुछ रहत मिल जाएगी"

कुपोषण का सिखर सा दिखने वाला हड्डियों पे खड़ा बांकेलाल उस बिजली की चमक से ऐसे भयभीत हो उठता है की उसके कदम खुद बा खुद उस खण्डार की और बढ़ते चले जाते है

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अगले कुछ hi पलों बाद बांकेलाल उसी खंडहर में पहुंच जाता है जहा अंदर प्रवेश करते hi वो एक सुकून की एक लम्बी सांस भरता है तोह उसे बारिश की सोंधी खूबसू क साथ साथ कुछ ऐसी खुसबू भी मितली है जैसे किसी की योनि से कॉमर्स बह रहा हो.. बांकेलाल और तेजी से अपने अंदर उस खुसबू को भरते हुए

"Snnnnnnnnhhffffffffff… आआआआअह्ह्ह्ह.. किया खूबसू है, लगता भी आज फिर यहाँ कोई रैंड पेली गयी है"

सुंदरपुर का ये खंडहर किस लिए जाना जाता है ये तोह मैं पहले भी आपको बता hi चूका हु


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कामवासना से जुडी जड़ी बुटिया बनाने वाला बांकेलाल उस खूबसू को एक hi पल में पहचान जाता है और फिर उस खंडहर को चारो तरफ घूमते हुए देखने लगता है जहा, वैसे वो अभी ज्यादा अंदर नहीं गया था.. पर दीवारों पे उखेरी गयी वो कामुक तस्वीरें हर बार उसके लुंड में जान फुक दिया करती है

"साला पुरे गाओं को छूट मिल रही है, और एक मैं हु जो 40 का होक भी हिला रहा हु.."

उन तस्वीरों में उभरती हुई कामुकता को देख क पूरी तरह भीगा हुआ बांकेलाल अपनी भीगी धोती क ऊपर से hi अपने काले लुंड को मुठी में भर लेता है पर उस खुसबू ने उसके लुंड में जो जान भरी थी उसके चलते उसकी अपनी सभी उंगलिया भी उस लुंड की मोटाई को पूरी तरह भरने में सक्षम नहीं थी

बांकेलाल एक पल क लिए अपने लुंड को सहलाता रहता है और उसकी आँखें उस ख़ुशी से धीरे से बंद होने लगती है, पर तभी बहार से आती उस ठंडी हवा ने उसके भीगे सरीर में ऐसी कंपकपी भरी दी थी वो पूरी तरह काँप उठता है

"उफ्फ्फ.. बहनचोद ये ठंडी.."

बांकेलाल जल्दी से लकडिया देखने लगता है और इस खोज में वो खण्डार क एक कोने में पहुँचता है जहा उसे एक चटाई नज़र आती है, वो सोचता है चलो कुछ बैठने क लिए तोह मिला पर वो जैसे hi उस चटाई को उठता है उसे उसके पीछे एक ऐसी चीज मिलती है जिसे देख क उसके अधरों पे मुस्कान खिल उठती है

"ये तोह किसी की ब्रा लग रही है.. लगता है रंडी छोड़ने क बाद बिना ब्रा पहने hi चली गयी होगी, पर यहाँ ऐसे छुपा क यहाँ क्यों राखी गयी है ?"

बांकेलाल खुद से बात करते हुए वो ब्रा उठा लेता है, जिसकी कोमलता उसकी काली उँगलियों में एक ऐसा नासा भरने लगती है जिसका असर उसकी भीगी धोती में अपना सर उठते हुए उसके काले Naag-baba पे नज़र आने लगता है

नोट- वैसे ये ब्रा किसकी है और यहाँ कैसे आयी ये आप जानते hi होंगे, और अगर नहीं जानते तोह आप कृपया


Part 02, अपडेट #19

पड़े जो आपको 'पेज No. 338' पे मिल जायेगा

बांकेलाल बिना देरी क उस ब्रा को धीरे से अपने चेहरे पे रख क जोर से सांस खींचते हुए

"आआआअह्ह्ह.. किया खुसबू है, न जाने किस चिनार की ब्रा है ये"

फिर वापस से वो ब्रा हाथों में पकड़ क उसे अपनी आँखों क आगे फैलता है और उस स्तन को देखता है जहा उस ब्रा वाली स्त्री क निप्पल्स आते होंगे और फिर किया था वो तुरंत hi अपनी जीभ निकल क ब्रा क उस स्तन पे चलना सुरु कर देता है

"उफ्फ्फ…. जिसकी खुसबू इतनी कामुक है न जाने वो खुद कितनी कामुक होगी"

वैसे ब्रा पे अपनी जीभ चलते हुए बांकेलाल को बारिश में भीगी पर अब हलकी सुख चुकी उस ब्रा से अब भी उसकी नमी महसूस हो रही थी, और उसकी खुसबू ने उस 40 साल क कुंवारे आदमी को पूरी तरह पागल बना दिया था.. वैसे भी वो जिस औरत की थी उसकी खुसबू इतनी आसानी से कहा जाने वाली थी

जल्दी hi बांकेलाल को वही खंडहर क थोड़ा और अंदर बिलकुल बीच में जाली हुई लकडिया नज़र आ जाती है, जिन्हे देखते हुए वो मुस्कुरा पड़ता है और वपास से वही उस चटाई क बिछा को उसपे बैठते हुए

"लगता है ऐसी जगह वो रंडी छोड़ी गयी होगी, खास मुझे भी मिल जाये एक बार.. मेरा तोह जीवन सफल हो जायेगा"

बांकेलाल जल्दी hi जैसे तैसे जुगाड़ करके उन लकड़ियों को जला hi लेता है और अपने पुरे कपडे उतर क बिलकुल सीधा लेत जाता है और अब वो ब्रा उसके काले भीमकाय सीधे खड़े काले लुंड क टोन पे तंगी हुई थी.. बांकेलाल उस ब्रा को देखते हुए

"बहनचोद.. न जाने कोण होगी वो रंडी.. ?"

फिर उसकी कोमलता को अपने काले लुंड क टोपे पे महसूस करते हुए

"ऐसे तोह मैं लेके जाऊंगा.."

अब हम बांकेलाल को यही उस कामुक aurat(Jinhe आप जानते hi है) की ब्रा क साथ चोर देते है और यहाँ से सीधा शाम क समय सुंदरपुर क एक घर की और प्रस्थान करते है



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सुंदरपुर की ठंडी पर कामुक वर्षा भरे इस दिन में अब भी इतनी कामुकता भरी हुई थी की कई योनियों क कॉमर्स की घनघोर वर्षा करवा सकती थी, ऐसे में इस समय जब शाम क करीब 6 बज चुके थे गाओं क बाजार में उस छोटे से घर क अंदर प्रवेश करते है जहा नीचे तोह एक बड़ी सी दुखन थी और उसी दुकान क बगल से hi ऊपर क हिस्से में बने घर को जाने वाली सीडिया थी.. हम भी इन्ही सीढ़ियों पे चलते हुए ऊपर पहुंचते है जहा इस घर क अंदर रसोईघर में एक भरी जिस्म वाली कामुक औरत सलवार सूट पहने हुए न जाने किसी सोच में डूबी हुई नज़र आ रही थी और ये और कोई नहीं अपितु 'नसरीन' थी.. यानि सविता की खास सहेली इतनी की आप सोच भी नहीं सकते



रसोईघर में एक और बानी उस बड़ी सी खिड़की क ठीक सामने उसकी चौखट पे अपने दोनों हाथों को रखे हुए नसरीन न जाने कोनसी गहरी सोच में लीं थी जिसका पता उसके चेहरे पे आने वाली सीखें से लग रहा था, बार बार उसके कामुक रसीले होंठ एक पल क लिए फड़फड़ा से पड़ते और पूरा जिस्म एक पल क लिए ऐसे काँप उठता जैसे किसी बात को सोच क वो रह रह क सिरहन से भर्ती जा रही हो.. वही घनघोर वर्षा बार बार हवा से अपनी गति और दिशा बदलते हुए उस बंद पड़ी खिड़की क सीसे पे आके टकराई पर इस शोर से भी नसरीन अपनी सोच से बहार आने में सफल नहीं हो प् रही थी

बार बार हार हवा क तेज़ झोंखों क साथ बारिश का पानी उस बंद खिड़की क सीसे से आके टकराता जिसके चलते बारिश की वो मोती सामान ठंडी बूँदें पानी की धार बांके नीचे की और बह रही थी और उस धूमल पद चुके सीसे में नसरीन खुद को देखते हुए मन hi मन बड़बड़ये जा रही थी

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"मुझसे इतना बड़ा गुनाह कैसे हो गया.. मैंने उसे रोका क्यों नहीं, कैसे मैंने उसे उसकी हद पार करने की इजाजत दे दी

..तौबा.. यलए कैसा गुनाह कर दिया मैंने ?"

खिड़की की चौखट पे अपने दोनों हाथों को टिकाये हुए नसरीन हल्का सा झुके हुई थी जिसके चलते उसकी ज्यादा hi विशाल और भरी चूचिया अपने वजन क चलते हलकी सी झुक रही थी और अगर उन्हें थमने क लिए उसके सूट क अंदर उसकी वो सफ़ेद ब्रा नहीं होती तोह सायद उसके भरी दूध कबके उसकी कमीज को सामने से पहाड़ क बहार निकल चुके होते..

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वही उसकी उस पतली सी सलवार का कपडा इस समय उसकी भरी गांड क दोनों भरी चूतड़ों क बीच फांसी हुई थी जिसका ज्ञान तक उसे नहीं थी, पर जो बात नसरीन को गाओं क लोगो की नज़रों में कामुकता का jeeta-jagta सबूत बनती थी वो तोह उसकी इतनी भरी चूचिया जो अपने खुद क भार तक को संभाले में सफल नहीं थी.. इन चूचियों की विशालता का अनुमान आप इस बात से लगा सकते है की अगर इन्हे हाथों में जकड़ना हो तोह ये एक आदमी क बस की बात नहीं

नसरीन उसी प्रकार से उस खिड़की क पास झुकी हुई कड़ी बहार होती घनघोर वर्षा और कभी कभी बहार बाजार की सड़क पे भागते हुए लोगों को देखते हुए अपनी hi उलझन में फांसी हुई थी, वैसे खिड़की का वो सीसा इतना धूमिल सा था की बहार का कुछ भी साफ़ नज़र आना संभव नहीं था.. ठीक उसके अंदर चलते उस द्वन्द की तरह जिसे लेके वो किसी एक निष्कर्ष पे नहीं पहुंच प् रही थी, मानो जैसे कुछ भी साफ़ न हो उसके लिए

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उसके दिमाग में एक hi बात बार बार किसी नगाड़े की तरह बज रही थी

'कैसे होने दिया मैंने ये गुनाह.. मुझे उसे रोकना चाहिए था, आखिर में अम्मी हु उसकी'

नसरीन एक पल क लिए अपनी सोच क साथ खुद भी रूकती है और एक गहरी सांस लेते हुए आगे अपने विचारों में खो जाती है

'भला एक माँ होक मैंने अपने सेज बेटे को इतना हक़ कैसे दे दिया.. की जिस जगह से वो निकला था आज उसी पे अपना हक़ जाता रहा है.. ?

.. आखिर मैं इतनी कमजोर कैसे पद जाती हु उसके आगे.. की उसके हाथ का खिलौना बन जाती हु, पर सबसे बड़ी बात की मुझे उसका खिलौना बनकर ाचा क्यू लगता है ?..

ये कैसे गुनाह क भवर में फास गयी हु मैं.. ?'

नसरीन अपनी सोच की लहरों से उबरने की पूरी कोशिश कर रही थी पर उसके अंदर गुनाह का वो भोज उसपे लगातार हावी होता जा रहा था, सायद इसकी एक वजह ये भी थी की वो ये बात किसी को बता नहीं सकती थी

'किया मुझे सविता को इस बारे में बताना चाहिए.. उसके पास तोह हर मुश्किल का हल होता है..'

पर नसरीन क मन में उठती इस बात का जवाब भी उसके अंदर से hi आता है

'ाचा पर किया बताउंगी उसे.. की मैंने अपने सेज बेटे को वो हक़ दे दिया जो बस एक सोहर का होता है'

नसरीन एक पल क लिए रुक क लम्बी सी सांस भर्ती है और फिर धीरे से खुद से कहती है

"पागल हो गयी है किया नसरीन"

नसरीन बारिश क तीव्र शोर क बाद भी अपने विचारो में पूरी तरह खोयी हुई थी की तभी उसके पीछे से दो मज़बूत और मरदाना हाथ निकल क आगे आते है और पूरी सावधानी क साथ उसकी बड़ी बड़ी भरी भरकम चूचियों को एक साथ अपने बहुपस में जकड लेते है.. पर नसरीन की चूचियों की मोटाई और भारीपन इतना अधिक था की पूरी म्हणत करने क बाद भी वो हाथ पूरी चुकी को अपने अंदर भर पाने में सफलता हासिल नहीं कर पाए थे

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पर जैसे hi नसरीन को अपनी चूचियों पे वो कठोर हाथों का जाना पहचाना स्पर्श और उसकी पकड़ महसूस होती है उसके पुरे जिस्म में अजीब सा दर पर एक कामुकता की मीठी सिरहन क साथ भरता चला जाता है और उसके हाथ उस खिड़की की चौखट पे मजबूत होते चले जाते है, वही दूसरी और उन दोनों हाथों पे पूरी ताक़त क साथ नसरीन की बड़ी बड़ी चूचियों को इतने जोर से थाम लिया था की उँगलियों क बीच से भी दूध क गोश्त का हिस्सा बहार निकल रहा था जो उसकी विशालता का परिणाम था

"Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh… Aaaaaaaaaamiiiiiiiiii.."

पकड़ इतनी मजबूत थी की नसरीन की दर्द और कामुकता में मिली हुई वो तीव्र चीख उसके मुख से निकल पड़ी थी और ऐसी क साथ उसकी साँसे मानो एक पल क लिए चलनी बंद हो गयी थी.. वो पूरी तरह चौंक उठी थी उसकी काली गहरी आँखें मानो पहात सी गयी हो उसने तुरंत अपना चेहरा पीछे की और किया और जो चेहरा उसे नज़र आता है उसे वो सबसे अचे से पहचानती थी आखिर उसकी बुर से hi तोह वो निकला था, पर जैसे hi दोनों की नज़रें आपस में मिलती है उन हाथों का मालिक और जोर से उन चूचियों पे दबाव बना देता है

"आआआआअह्ह्ह.. खालिद बीटा…… आआआअह्ह्ह्ह… चोर मुझे………… Aaaaaaaaaaahhhh… किया कर रहा है… Aaaaaaaaaaaaaaahhhhhh.."

नसरीन ये कहते हुए बुरी तरह काँप गयी थी.. पर उसकी चूचियों पे उसके अपने सेज बेटे की उँगलियों का वो दबाव उसके अंदर अजीब सी कामुक सिरहन पैदा करने लगती थी.. पर उसका जवान बीटा 'खालिद' अपनी अम्मी की बात का जवाब देने की जगह अपना चेहरा आगे करके अपने होंठों को उनकी गर्दन पे रख क अपना पुर मुंह खोल क एक गीला सा चुम्बन जड़ देता है

"Ummmmmmmmmmmmm……"

नसरीन अपना एक हाथ उसी चौखट पे जमाये रहती है, पर दूसरा हाथ आगे बड़ा क अपनी एक चुकी पे जमे अपने बेटे क हाथ पे रख क उसे वह से हटाने की कोशिश सी करती हुई कहती है

"चोर.. ये किया गुनाह कर रहा है.. मैंने कहा चोर मुझे…"

पर खालिद अपना पूरा मुंह खोल क अपनी अम्मी की गर्दन पे अपने दाँतों की निशान बनाते हुए पियर से चूमता चला जाता है और साथ hi साथ दोनों हाथों की उँगलियों से वो कामुक हलकी सी हरकत करते हुए अब अपनी सगी अम्मी क सिक्के जितने बड़े निप्पल्स को उँगलियों क बीच भर क जोर से मसल सा देता है.. जिससे एक बार फिर से एक माँ अपने जवान बेटे क कामुक प्रहार से मचल उठती है

"Aaaaaaaaaahhh.. चोर बीटा… फिर से ये गुनाह मत कर… Aaaaaaaaaaahhhh.. चोर मुझे… मैंने कहा चोर खालिद…"

खालिद ेकी बार फिर से अपनी अम्मी की गर्दन पे अपने होंठ और दाँतों को हल्का सा गाड़ते हुए अपनी गरम साँसों को उनकी गर्दन की संवेदनशील त्वचा पे चोरते हुए कहता है

“अम्मी मैं जनता हु तुम्हे ये ाचा लगता है… फिर तुम मुझे ये सब करने क्यों नहीं देती

..देखो न अम्मी मेरे छूटे hi तुम्हारे निप्पल्स कैसे कड़े हो गए है…"

अपने निप्पल्स क और उसकी तानी हुई इस्तिथि क बारे में सुनकर नसरीन ऐसे शर्म से लाल हो पड़ती है, जैसे उसकी सबसे बड़ी चोरी पकड़ ली गयी हो

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नसरीन- (अपना काबू बनाते हुए) बकवास मत कर मुझसे.. ऐसे कुछ नहीं है.. तू बस चोर मुझे.. Aaaaaaaaaaaahhhh…. मत कर बीटा.. ये गुनाह है…

पर खालिद पे तोह उसकी अम्मी क जिस्म को प् लेने का नशा सा चढ़ता जा रहा था, वो एक बार फिर से नसरीन की गर्दन पे अपनी जीभ चलते हुए पियर से कहता है

"अम्मी मुझे पता है.. तुम्हे ये चाहिए, फिर नाटक क्यों करती है.. तुम्हे इसमें बहुत मज़ा आता है, खेत पे भी पहले तुम यही कह रही थी पर बाद में कैसे जोर जोर से खुद hi मेरा लुंड लेने लगी थी.."

ये सुनते hi नसरीन का पूरा जिस्म ऐसे काँप उठता है जैसे उसके सामने वही बात कही जा रही हो जिसका उसे दर हो.. पर फिर भी वो उस मज़े से इंकार करने की कोशिश करती हुई अपनी बात कहती है

"बकवास मत कर वर्ण मार खायेगा, मुझे कोई मज़ा नहीं आया था.. खेत पे भी तूने सब जबरदस्ती hi किया था.. मैंने तोह वह भी रोक था.."

अपनी अम्मी की चूचियों और उनके सिक्के जितने बड़े निप्पल्स को अपनी उँगलियों क बीच भरकर जोर से उसे पीसते हुए अपनी गरम साँसे उनकी गर्दन पे चोरते हुए खालिद फिर से कहता है

"ाचा.. पर खेत पे मैंने तोह एक बार भी आपको लुंड चूसने क लिए नहीं कहा था, आपने खुदसे क्यों चूसा था बताइए ?.. और तोह और मेरे टट्टे तक चाट गयी थी आप?"

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नसरीन का मुंह तोह खुलता है अपनी बात कहने क लिए पर सब्द बहार नहीं आ पते, आखिर उसका बीटा झूट तोह कह नहीं रहा था.. इसलिए खालिद hi आगे कहता है

"देखो अम्मी.. मुझे पता है तुम्हे ये सब ाचा लगता है, तोह मुझे खुल क सब करने क्यों नहीं देती.. मैं तुम्हे बहुत खुस रखूँगा.."


अब बेचारी नसरीन अपनी बुर से जन्मे अपने बेटे को इस बात का किया hi जवाब देती.. की आखिर वो क्यों उसे वो नहीं करने देना च रही है जो वो चाहता है

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पर उसका जवान मर्द बन चूका बीटा अपनी जवानी क जोश की ताक़त दिखता रहता है और भरी और गदराई नसरीन की चूचियों को पूरी जान लगा क ऐसे निचोड़ रहा था जैसे अब भी वो उन चूचियों से दूध पीने की कामना रखता हो.. पर हमारी नसरीन की चूचियों की मोटाई इतनी अधिक थी की खालिद क हाथ पूरी तरह उस गदराई भरी जवानी को अपने अंदर भर hi नहीं प् रहे थे



अपने जवान बेटे को वो भले hi रोकने की चैस्ता कर रही हो पर वो भी एक औरत है वो भी एक गदराई और भरे जिस्म वाली सुंदरपुर की कामुक औरत.. ऐसे में भले hi उसके अंदर द्वन्द जारी हो पर उसका सरीर खालिद क हाथों की मजबूती क आगे फिगलना सुरु हो चूका था, जिसका सबसे ज्यादा असर उसकी चूचियों पे उसके काले सिक्के जैसे बड़े निप्पल्स में आती कठोरता से पता चल रहा था

"Aaaaaaaaaaaaaaaahhhh…. मत कर ये… Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhh… क्यों गुनेहगार बन रहा है… Aaaaaaaaaaaahhh.. कमीने रुक जा.. kutteeeeeeeeeee... Ammiiiiiiiiiii हु तेरी…… Aaaaaaaaaahhhh"

पर एक जवान बेटे क हाथों में उसकी इतनी गदराई अम्मी की चूचियों हो और और वो उसके मोठे सिक्के जितने बड़े निप्पल्स से खेल रहा तोह भला वो कैसे खुद को रोक सकता है..

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"पहले आप सच बताओ.. किया आपको ये सब ाचा नहीं लगता, आप दिल पे हाथ रख क कह दो, मैं दुबारा कभी आपके जिस्म को हाथ भी नहीं लगाऊंगा.. बोलो अम्मी.. बोलो.."

एक बार फिर से नसरीन क पास इसका कोई भी जवाब नहीं था, आखिर वो कह भी किया सकती थी ककी खालिद की इन कामुक हरकतों क चलते उसके पुरे जिस्म में अजीब सी सिरहन दौड़ने लगी थी और पैरों क बीच सलवार क अंदर कैद उसकी गीली छूट पानी क बहाव चोर्ने लगी थी जिसके चलते न च क भी बार बार उसकी आँखें बंद होने लगी थी और ऐसा लग रहा था जैसे उसके ऊपर कोई नशा हावी होता जा रहा हो

नसरीन की अंतरात्मा उससे सवाल करने लगती है

'तू अपने बेटे को ये गुनाह करने से रोकती क्यों नहीं.. रोक उसे वर्ण एक बार फिर से वो इस पाक रिश्ते में दाग लगा देगा.. रोक उसे..'

पर न जाने कैसे और क्यों उसकी अंतरात्मा की ये आवाज़ उस तक जैसे पहुंच hi नहीं रही थी, सायद उसके जवान बेटे क दोनों हाथों का उसकी चुकी और पीछे सलवार क अंदर उसकी मोती गांड क बीच की दरार में उस बढ़ती चुंबन ने एक दिवार सी बना दी थी

"अम्मी मैं जब भी तुम्हारे इन बड़े बड़े दूध को अपने हाथों से जकड़ता हु तोह पूरा पागल सा हो जाता हु.. ऐसा लगता है जैसे दुनिया में इससे खूबसूरत दूसरी कोई चीज़ है hi नहीं, ये कितने मोठे बड़े और कोमल है, मेरी साडी उंगलिया इनके अंदर पूरी धस सी जाती है"

खालिद एक पल क लिए रुकता है और और नीच से अपनी कमर को पूरी तरह अपनी अम्मी की गांड पे चिपका देता है जिससे नसरीन को एक पल क लिए लगता है जैसे वो मोटा नाग अब किसी भी पल उसके बिल को ढूंढ क उसके अंदर घुस जायेगा.. खालिद अपनी गरम साँसों को अपनी अम्मी की गर्दन पे चोरते हुए आगे कहता है

"उफ्फ्फफ्फ्फ़.. अम्म्मीईई आपको गांड से तोह जैसे आग निकल रही हो.. ये हमेशा इतनी गरम क्यों रहती है.."

एक माँ भला अपने जवान बेटे क इस सब का किया hi जवाब दे सकती है, नसरीन बस अपने होंठों को चबा क रह जाती है सायद कहने क लिए उसके पास शब्दों का ाकल सा पद चूका था

नसरीन की सांसें लगातार बढ़ती जा रही थी और उसके चलते उसकी bhari-bharkam चूचियां upar-neeche होने लग पड़ी थी, जैसे मानो किसी भी पल वो उस कमजोर सूट को पहाड़ क बहार आ सकती है.. नसरीन साफ़ साफ़ महसूस कर प् रही थी की उसके बेटे की पकड़ पहले से ज्यादा मजबूत होती जा रही है और अब वो उसकी दोनों चूचियों को जकड़े हुए उन्हें न सिर्फ मसल रहा था बल्कि उन्हें आगे की और खींच सा रहा था जिस कारन नसरीन क मुख से वो सब्द निकल पड़ते है जो उसे सायद नहीं कहने था

"आआआआअह्ह्ह.. खींच क्यों कहा है, पहले hi इतनी बड़ी बड़ी है.. आआआहहह"

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जिसपे खालिद अपने जीभ से उसके कान क नीचे चाट सा लेता है और मुस्कुरा कहता है

"मैं चाहता हु मेरी अम्मी की चूचिया पुरे गाओं में सबसे बड़ी हो.."

न जाने इन शब्दों में ऐसा किया खास था की उसकी योनि का पानी ऐसे बह उठता है जैसे नाली में बहते हुए नाली क बीच लगी रुकावट को अचानक से खोल दिया गया हो

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhh.. चुप हो जा बीटा… शर्म नहीं आती किया… Ammiiiiiiiiiiii हु तेरी….. मान जा मत कर ये.. आआआआअह्ह्ह.."

खालिद अपना एक हाथ एक चुकी से आज़ाद करता है और नीचे की और सरका देता है.. इससे पहले की नसरीन कुछ भी समझ पाती उसका वो मजबूत हाथ उसकी अपनी सगी अम्मी की सलवार क ऊपर से hi उनकी छूट पे आके थम जाता है

"Aaaaaaaaaaaaaahhh… वह हाथ मत लगा बीटा…"

नसरीन अपने जवान बेटे का हाथ उसकी hi जन्मभूमि पे पाके जैसे तरप उठती थी

पर खालिद इस बात का उत्तर दोहरे हमले से देता है, पहला उनके कान की लौ को अपने दाँतों क बीच लेके धीरे से काटते हुए और दूसरा हमला वो अपनी अम्मी की पूरी छूट को एक hi बार में मुठी में भर क ऐसे बेहरमी से मसल देता है जैसे सलवार क अंदर घुसे किसी कीड़े को मसल क उसकी जान निकल देना च रहा हो

"देखो न अम्मी.. आप मुझे मन कर रही हो पर आपकी बुर से कितना ज्यादा पानी बह रहा है, मैं जनता हु अम्मी आपको ये पसंद है

..आप चाहती हो की मैं ये करू आपके साथ.. पर आप कहती नहीं हो, बोलो अम्मी चाहती हो न.. ?"

नसरीन क मुख से सब्द नहीं निका पाते पर अनायास hi उसकी गांड पीछे की और दबती चली जाती है जहा उसके बेटे का वो काला अजगर उसकी सलवार की दरार में अपने बिल को ढूंढ क उसके अंदर घुस जाना च रहा था.. और ये बात खालिद ने पकड़ ली थी

"अम्मी तुम भले hi कुछ न बोलो.. पर सच यही है की तुम्हे ये सब पसंद है, वर्ण अपनी ये इतनी बड़ी गांड मेरे लुंड पे क्यों दबती.. बोलो अम्मी.."

नसरीन को जैसे hi इस बात का ज्ञान होता है की उसकी एक और चोरी उसके बेटे ने पकड़ ली है वो शर्म क मारे पानी पानी हो जाती है पर न अपनी गांड को आगे की और खींचती है न पानी योनि पे अपने बेटे का मजबूत हाथ हटाने की कोशिश करती है.. अगर उसके मुख से कुछ निकलता है तोह वो बस उसकी गरम सिसकारी थी

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhh… चुप हो जा… kutteeeeeeeeeeee…. Ammiiiiiiiiii.. हु मैं तेरी……….. Aaaaaaaaaaaaaaaahhhh"

पर तभी उसका अंतर्मन उसे फिर से समझने की कोशिश सी करता है

'रोक उसे नसरीन.. वर्ण फिर से वही गुनाह कर लेगी जिससे बचने क लिए तोह परेशां थी इतने दिएर से..'

पर एक बार फिर से उसके सरीर की आवाज़ उस बात को काट देती है

'तू इसकी बातों पे धियान न दे.. तू तोह ये देख की तेरा बीटा तुझसे कितना पियर करना चाहता है, वो तेरे जिस्म क हर हिस्से से पियर करना च रहा है.. बता इतना पियर करने वाला बेटे किसी को नसीब होता है किया.. ?

"खालिद तू जो कर रहा है वो सही नहीं है… ?"

नसरीन पूरी हिम्मत जूता है बस इतना hi बोल पायी थी, पर उसके सब्द उसके सरीर की हरकत से मेल नहीं कहते ककी जब वो ये कह रही थी तोह उसकी भरी गोल मोती गांड धीरे धीरे उसके बेटे क लुंड पे हलकी सी थिरकने से लगी थी जिससे खालिद को अपने मोठे लुंड पे अपनी अम्मी की गांड की कामुक और गरम रगड़ अचे से महसूस होती है

"Aaaaaaaaaaaahhhh.. Ammmiiiiiiiiiiiiii.. ऐसे hi………. Aaaaaaaaaaahhh"

नसरीन को भी एक पल क लिए ऐसा लगता है जैसे उसके बेटे क उस अजगर ने उसके बिल को ढूंढ लिया हो, जबकि कुरदत की सच्चाई तोह ये है की अजगर जब भी बिल में घुसने की कोशिश करता है वो उस बिल को पूरी तरह उजाड़ देता है

वही नसरीन अपने बेटे की बात सुनते hi पानी पानी हो जाती है पर वो खुद को रोक नहीं पाती बल्कि उसकी गांड की वो थिरकन और ज्यादा बाद जाती है.. और आँखें पूरी तरह बंद होती चली जाती है.. उसी पल खालिद अपना लुंड जोर से अपनी अम्मी की सलवार की दरार में इतना अंदर तक उतर देता है की नसरीन को अपने आग चोरते हुए छेद पे तेज़ प्रहाद महसूस होता है जैसे किसी ने मोठे गरम लोहे क हथोड़े से उसके दरवाजे को तोड़ने क लिए तेज हमला किया हो

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.. किया कर रहा है………. Essssssssssssshhh"

खालिद उसी प्रकार से अपनी अम्मी को मसलते हुए अपनी बात आगे कहता है

"आआह्ह्ह्हह्ह.. अम्मीय.. तुम्हारी गांड क छेद से तोह जैसे आग निकल रही है…

तुम्हारी गांड इतनी बड़ी कैसे है अम्मी… ?"

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खालिद एक ऐसा सवाल करता है जिसका भला हमारी नसरीन किया hi जवाब देती, वो बस वही पुराने सब्द दोहरा देती है


"रुक जा बीटा.. ये गुनाह मत कर.. Aaaaaaaaaaaaaaaahhhh.."

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