- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,768
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 511-512
अपडेट #21
Chapter
कामुक वर्षा..
सन
#09
मालती की चाय
नोट:- ये अपडेट पिछले आये अपडेट से ठीक आगे का है..
& ये अपडेट मेरी पर्सनल फंतासी को भी दिखायेगा

** * **
सुंदरपुर की ठण्ड क बारे में इतना कुछ बता दिया है की अब आगे कुछ बताने को खास बचा नहीं है, वैसे इस समय ज्यादातर लोग घर क बहार उसी छप्पर क नीचे बैठे हुए थे जहा अब.. पहले अंदर 2 रज़ाई उठाये हुए हर्षिता पहुँचती है और अपने जेठ जी की चारपाई पे रखते हुए अनायास hi उन्हें देख क मुस्कुरा क कहती है
"लीजिये जेठ जी.."
महेंद्र ने जैसे hi रज़ाई देखि वो मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए कहता है
"ये काम ाचा किया बहु.. ठण्ड तोह जैसे बढ़ती hi जा रही है"
हर्षिता बिना रुके टपक से बोल पड़ती है
"तभी तोह मैं गर्मी देने आ गयी.. मेरा मतलब रज़ाई लेके"
महेंद्र तोह जैसे बुरी तरह इतनी सी बात से इधर उधर देखने पे विवस सा हो जाता है, मानो उसके पास से वर्णमाला क सभी अक्षरों ने छुट्टी ले ली हो, पर दूसरी चारपाई पे बैठा हुआ वीरू न जाने क्यों ये सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ा था और एक बार फिर से उसे अपना वो स्वप्न याद ा जाता है और जहा उसकी पत्नी क पीछे उसका बड़ा भाई था उसकी बेहरमी चुदाई कर रहा था
इतना सोचने भर से वीरू का हाल कुछ ऐसा होने लगता है की अगर उसने इस बारे में तनिक भी और कुछ सोचा तोह उसके लुंड का उठान वो खुद भी रोक नहीं पायेगा
इधर हर्षिता की चंचलता ने जहा महेंद्र जैसे आदमी को ऐसी ठण्ड में पसीने से भिगो दिया था वही अंदर से 2 और रज़ाई उठाये हुए शीला बुदबुदाते हुए चली आती है
"किया भाभी.. खुद तोह हलकी हलकी रज़ाई ले आयी और मुझे भरी वाली थमा दी"
शीला की सिखयात भरी बात पे वह उपस्थित महेंद्र, सविता, वीरू, हर्षिता, भानु, सत्तू, और सत्यम.. ये सभी है पड़ते है
"किया हो गया भाई.. इतना क्यों है रहे है सब ?"
तभी अंदर से अपनी खूबसूरत पत्नी से इतने समय बाद बात करने क कारन कुंदन का मन भी कुछ खुस सा था, जैसे उसकी ब्याह में होता वो दर्द अब उसके लिए मायने hi न रखता हो
कुंदन क बहार आते hi शीला का चेहरा सबसे ज्यादा चमक उठता है आखिर उसकी शादी क बाद आज पहली बार उसके भाई 'कुंदन' ने उसे कोई तौफा दिया था, पर हर्षिता क चलते वो उसे देख नहीं पायी थी.. वही अपने बड़े भाई 'कुंदन' को देखते hi अपने चेहरे की ख़ुशी छुपाते हुए शीला, सत्तू वाली चारपाई पे दोनों रज़ाई एक साथ रखते हुए एक सिखयात सी करती है
"आपने hi ये हर्षिता भाभी को पसंद किया था न वीरू भैया क लिए.. अब देखो खुद हल्का हल्का काम करती है और मुझसे सब भरी काम करवाती है"
कुंदन क कुछ बोलने से पहले hi हर्षिता उस पल में अपनी खनकती हुई आवाज़ घोलते हुए बोल पड़ती है
"अरे मेरी पियरी 'ननद रानी'.. मैं तोह जान क तुझसे ज्यादा काम करवाती हु ताकि तोह और मजबूर बने, ऐसे तोह हड्डिया कमजोर पद जाएँगी न.."
हर्षिता की बात पे इस बार सबके साथ खुद कुंदन भी है पड़ता है जिससे शीला अपनी सलोनी भाभी हर्षिता को किसी बची सामान जीभ दिखते हुए
"बड़ी आयी.."
और एक बार फिर से सभी की khil-khilahat और तीव्र हो जाती है, जल्दी hi कुंदन भी सभी क साथ बैठ चूका था और वह उपस्थित सभी लोगो क पैरों पे रज़ाई भी चढ़ चुकी थी ताकि ठण्ड क प्रकोप को काम किया जा सके.. ऐसी बीच सभी चारपाइयों क बीच जलती हुई आग में अपने पैरों को सीखते हुए भानु बोल पड़ता है
"ाचा तोह हर्षिता भाभी, कुंदन भैया की पसंद है.."
कुंदन भी अब शीला और सत्तू क साथ उसी चारपाई पे बैठा हुआ मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए हर्षिता की और इशारा करते हुए कहता है
"अरे नहीं.. मैं तोह बस इसके गाओं में अपने एक दोस्त की शादी में गया था, वही बाबू जी क खास मित्र 'संभु चाचा' यानि हमारी हर्षिता क बापू का घर भी था तोह 'भैया और बाबूजी' क कहने पे चला गया था उस समय तोह मुझे पता तक नहीं था की इसके घर क्यों जा रहा हु"
कुंदन की बात को आगे पूरा करने का काम महेंद्र करता है वो भी ऐसे जैसे पुराने दिनों को याद कर रहा हो
"तब वीरू क लिए हमने रिश्ते देखने सुरु hi किये था की संभु चाचा ने वीरू और अपनी बिटिया 'हर्षिता' क रिश्ते की बात भी चला दी पिता जी से
...और किस्मत से उसी समय कुंदन को भी 'रसपुरा' गाओं में अपने दोस्त की शादी में जाना था तोह ये हुआ की वो जा hi रहा है तोह लड़की भी देख लेगा और अगर सब ठीक रहा तोह बाद में बड़े जेक बात आगे बड़ा लेंगे"
महेंद्र की बात सुनते हुए वीरू अपनी सलोनी सूरत वाली पत्नी की टांग खींचते हुए
"और ऐसे ये मेरी किस्मत पे कुंडली बन क बैठ गयी"
वीरू पे बात पे जहा सभी है पड़े वही हर्षिता अपने पति को देख क पियर से मुंह बनाते हुए जैसे झूठा ग़ुस्सा दिखा रही हो
"वो तोह आपकी किस्मत अछि थी जी जो मेरी जैसी सीधी शादी लड़की मिली, कही कोई तेज मिल जाती तोह पता चलता"
वीरू भी कहा पीछे रहने वाला था
"तुम और सीधी शादी.."
छप्पर क नीचे का माहौल एक बार फिर से हसी से गूंज उठा था, इन सब में सत्यम hi एक ऐसा था जिसे हसने का कोई कारन नहीं दिख रहा था वो मन hi मन सबको देखते हुए सोच रहा था
'अजीब चुटिया लोग है.. इतने में hi खुस हो जा रहे है'
सत्यम का हाल उन लोगों क सामान था जो बड़ी खुशियों को ढूंढ़ने क चक्कर में छोटी छोटी खुशियों क मायने भूल जाते है
तभी ऐसी बीच हर्षिता अपने सांड जैसे सरीर वाले जेठ यानि कुंदन को देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा क कहती है
"वैसे जेठ जी.. वो मेरी सहेली मधुबनी आपको बड़ा पूछती रहती है.."
इस बार बोलने की बरी सविता की थी
"कोण वही न.. जो अपने सोनू क मंडल क समय अपने बड़े भाई क साथ आयी थी"
हर्षिता 'है' में सर हिलाते हुए अपने जेठ कुंदन की और देखती है जो मधुबनी का नाम सुनते hi न जाने क्यों थोड़ा असहज से हो गए थे, पर हर्षिता मुस्कुरा क कुंदन की और देखते हुए कहती है
"मधुबनी.. तोह मेरे कुंदन जेठ जी बड़ी तारीफ करती है, न जाने ऐसी कोनसी जादू की छड़ी घुमा दी इन्होने"
कुंदन जो बड़े से बड़े पहलवान से न डरता था वो आज अपने छोटे भाई की पत्नी की बस बातों से हिला सा हुआ प्रतीत हो रहा था
"मैं.. मैं कोनसा जादू करूँगा, वो तोह बस है hi बड़ी बातूनी.. जब मिलती है bak-bak करने लगती है"
सविता भी कुंदन की इस्तिथि भांप लेती है इसलिए मुस्कुरा क कहती है
"अरे अगर मेरे देवर ने कोई जादू की छड़ी घुसा.. मेरा मतलब घुमा भी दी तोह इसमें बेचारे कुंदन की किया गलती, वैसे भी तेरी वो सहेली मधुबनी भी कोनसी काम खूबसूरत है"
कुंदन का तोह जैसे पसीना hi छूट जाता है, वो जल्दी hi अपने बैठने की इस्तिथि बदलते हुए
"वो.. भैया ऐसी ठण्ड में चाय होती न तोह बढ़िया रहता"
आखिर कुंदन ने पूरी बात को बड़ी hi खूबसूरती से घुमा hi दिया था, ककी चाय का नाम आते hi महेंद्र भी बोल पड़ता है
"है.. चाय हो जाती तोह मज़ा hi आ जाता"
सविता भी पूरा दिन chai-chai सुनते हुए थोड़ा खीज सा जाती है
"किया तुम लोगो को पूरा दिन बस chai-chai चाहिए.."
महेंद्र हस्ते हुए
"अरे चाय जीवन है.. तुम किया जानो इसकी महिमा"
महेंद्र की ऐसी बात पे सभी क चेहरे हसी से खिल उठते है
कंटिन्यू...
अपडेट #21
Chapter
सन
मालती की चाय
& ये अपडेट मेरी पर्सनल फंतासी को भी दिखायेगा
** * **
सुंदरपुर की ठण्ड क बारे में इतना कुछ बता दिया है की अब आगे कुछ बताने को खास बचा नहीं है, वैसे इस समय ज्यादातर लोग घर क बहार उसी छप्पर क नीचे बैठे हुए थे जहा अब.. पहले अंदर 2 रज़ाई उठाये हुए हर्षिता पहुँचती है और अपने जेठ जी की चारपाई पे रखते हुए अनायास hi उन्हें देख क मुस्कुरा क कहती है
"लीजिये जेठ जी.."
महेंद्र ने जैसे hi रज़ाई देखि वो मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए कहता है
"ये काम ाचा किया बहु.. ठण्ड तोह जैसे बढ़ती hi जा रही है"
हर्षिता बिना रुके टपक से बोल पड़ती है
"तभी तोह मैं गर्मी देने आ गयी.. मेरा मतलब रज़ाई लेके"
महेंद्र तोह जैसे बुरी तरह इतनी सी बात से इधर उधर देखने पे विवस सा हो जाता है, मानो उसके पास से वर्णमाला क सभी अक्षरों ने छुट्टी ले ली हो, पर दूसरी चारपाई पे बैठा हुआ वीरू न जाने क्यों ये सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ा था और एक बार फिर से उसे अपना वो स्वप्न याद ा जाता है और जहा उसकी पत्नी क पीछे उसका बड़ा भाई था उसकी बेहरमी चुदाई कर रहा था
इतना सोचने भर से वीरू का हाल कुछ ऐसा होने लगता है की अगर उसने इस बारे में तनिक भी और कुछ सोचा तोह उसके लुंड का उठान वो खुद भी रोक नहीं पायेगा
इधर हर्षिता की चंचलता ने जहा महेंद्र जैसे आदमी को ऐसी ठण्ड में पसीने से भिगो दिया था वही अंदर से 2 और रज़ाई उठाये हुए शीला बुदबुदाते हुए चली आती है
"किया भाभी.. खुद तोह हलकी हलकी रज़ाई ले आयी और मुझे भरी वाली थमा दी"
शीला की सिखयात भरी बात पे वह उपस्थित महेंद्र, सविता, वीरू, हर्षिता, भानु, सत्तू, और सत्यम.. ये सभी है पड़ते है
"किया हो गया भाई.. इतना क्यों है रहे है सब ?"
तभी अंदर से अपनी खूबसूरत पत्नी से इतने समय बाद बात करने क कारन कुंदन का मन भी कुछ खुस सा था, जैसे उसकी ब्याह में होता वो दर्द अब उसके लिए मायने hi न रखता हो
कुंदन क बहार आते hi शीला का चेहरा सबसे ज्यादा चमक उठता है आखिर उसकी शादी क बाद आज पहली बार उसके भाई 'कुंदन' ने उसे कोई तौफा दिया था, पर हर्षिता क चलते वो उसे देख नहीं पायी थी.. वही अपने बड़े भाई 'कुंदन' को देखते hi अपने चेहरे की ख़ुशी छुपाते हुए शीला, सत्तू वाली चारपाई पे दोनों रज़ाई एक साथ रखते हुए एक सिखयात सी करती है
"आपने hi ये हर्षिता भाभी को पसंद किया था न वीरू भैया क लिए.. अब देखो खुद हल्का हल्का काम करती है और मुझसे सब भरी काम करवाती है"
कुंदन क कुछ बोलने से पहले hi हर्षिता उस पल में अपनी खनकती हुई आवाज़ घोलते हुए बोल पड़ती है
"अरे मेरी पियरी 'ननद रानी'.. मैं तोह जान क तुझसे ज्यादा काम करवाती हु ताकि तोह और मजबूर बने, ऐसे तोह हड्डिया कमजोर पद जाएँगी न.."
हर्षिता की बात पे इस बार सबके साथ खुद कुंदन भी है पड़ता है जिससे शीला अपनी सलोनी भाभी हर्षिता को किसी बची सामान जीभ दिखते हुए
"बड़ी आयी.."
और एक बार फिर से सभी की khil-khilahat और तीव्र हो जाती है, जल्दी hi कुंदन भी सभी क साथ बैठ चूका था और वह उपस्थित सभी लोगो क पैरों पे रज़ाई भी चढ़ चुकी थी ताकि ठण्ड क प्रकोप को काम किया जा सके.. ऐसी बीच सभी चारपाइयों क बीच जलती हुई आग में अपने पैरों को सीखते हुए भानु बोल पड़ता है
"ाचा तोह हर्षिता भाभी, कुंदन भैया की पसंद है.."
कुंदन भी अब शीला और सत्तू क साथ उसी चारपाई पे बैठा हुआ मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए हर्षिता की और इशारा करते हुए कहता है
"अरे नहीं.. मैं तोह बस इसके गाओं में अपने एक दोस्त की शादी में गया था, वही बाबू जी क खास मित्र 'संभु चाचा' यानि हमारी हर्षिता क बापू का घर भी था तोह 'भैया और बाबूजी' क कहने पे चला गया था उस समय तोह मुझे पता तक नहीं था की इसके घर क्यों जा रहा हु"
कुंदन की बात को आगे पूरा करने का काम महेंद्र करता है वो भी ऐसे जैसे पुराने दिनों को याद कर रहा हो
"तब वीरू क लिए हमने रिश्ते देखने सुरु hi किये था की संभु चाचा ने वीरू और अपनी बिटिया 'हर्षिता' क रिश्ते की बात भी चला दी पिता जी से
...और किस्मत से उसी समय कुंदन को भी 'रसपुरा' गाओं में अपने दोस्त की शादी में जाना था तोह ये हुआ की वो जा hi रहा है तोह लड़की भी देख लेगा और अगर सब ठीक रहा तोह बाद में बड़े जेक बात आगे बड़ा लेंगे"
महेंद्र की बात सुनते हुए वीरू अपनी सलोनी सूरत वाली पत्नी की टांग खींचते हुए
"और ऐसे ये मेरी किस्मत पे कुंडली बन क बैठ गयी"
वीरू पे बात पे जहा सभी है पड़े वही हर्षिता अपने पति को देख क पियर से मुंह बनाते हुए जैसे झूठा ग़ुस्सा दिखा रही हो
"वो तोह आपकी किस्मत अछि थी जी जो मेरी जैसी सीधी शादी लड़की मिली, कही कोई तेज मिल जाती तोह पता चलता"
वीरू भी कहा पीछे रहने वाला था
"तुम और सीधी शादी.."
छप्पर क नीचे का माहौल एक बार फिर से हसी से गूंज उठा था, इन सब में सत्यम hi एक ऐसा था जिसे हसने का कोई कारन नहीं दिख रहा था वो मन hi मन सबको देखते हुए सोच रहा था
'अजीब चुटिया लोग है.. इतने में hi खुस हो जा रहे है'
सत्यम का हाल उन लोगों क सामान था जो बड़ी खुशियों को ढूंढ़ने क चक्कर में छोटी छोटी खुशियों क मायने भूल जाते है
तभी ऐसी बीच हर्षिता अपने सांड जैसे सरीर वाले जेठ यानि कुंदन को देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा क कहती है
"वैसे जेठ जी.. वो मेरी सहेली मधुबनी आपको बड़ा पूछती रहती है.."
इस बार बोलने की बरी सविता की थी
"कोण वही न.. जो अपने सोनू क मंडल क समय अपने बड़े भाई क साथ आयी थी"
हर्षिता 'है' में सर हिलाते हुए अपने जेठ कुंदन की और देखती है जो मधुबनी का नाम सुनते hi न जाने क्यों थोड़ा असहज से हो गए थे, पर हर्षिता मुस्कुरा क कुंदन की और देखते हुए कहती है
"मधुबनी.. तोह मेरे कुंदन जेठ जी बड़ी तारीफ करती है, न जाने ऐसी कोनसी जादू की छड़ी घुमा दी इन्होने"
कुंदन जो बड़े से बड़े पहलवान से न डरता था वो आज अपने छोटे भाई की पत्नी की बस बातों से हिला सा हुआ प्रतीत हो रहा था
"मैं.. मैं कोनसा जादू करूँगा, वो तोह बस है hi बड़ी बातूनी.. जब मिलती है bak-bak करने लगती है"
सविता भी कुंदन की इस्तिथि भांप लेती है इसलिए मुस्कुरा क कहती है
"अरे अगर मेरे देवर ने कोई जादू की छड़ी घुसा.. मेरा मतलब घुमा भी दी तोह इसमें बेचारे कुंदन की किया गलती, वैसे भी तेरी वो सहेली मधुबनी भी कोनसी काम खूबसूरत है"
कुंदन का तोह जैसे पसीना hi छूट जाता है, वो जल्दी hi अपने बैठने की इस्तिथि बदलते हुए
"वो.. भैया ऐसी ठण्ड में चाय होती न तोह बढ़िया रहता"
आखिर कुंदन ने पूरी बात को बड़ी hi खूबसूरती से घुमा hi दिया था, ककी चाय का नाम आते hi महेंद्र भी बोल पड़ता है
"है.. चाय हो जाती तोह मज़ा hi आ जाता"
सविता भी पूरा दिन chai-chai सुनते हुए थोड़ा खीज सा जाती है
"किया तुम लोगो को पूरा दिन बस chai-chai चाहिए.."
महेंद्र हस्ते हुए
"अरे चाय जीवन है.. तुम किया जानो इसकी महिमा"
महेंद्र की ऐसी बात पे सभी क चेहरे हसी से खिल उठते है
कंटिन्यू...