Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 5 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

अपडेट #13



सन 🖼️ #05




मोनू को लेके पहले से hi व्याकुल भानु मुश्किल से हीरा पन्ना क लिए कोई जुगाड़ कर पाया था.. और उसकी इस परेशानी मैं घी डालने का काम करती है उस ताली की करकस आवाज़

भानु ग़ुस्से से उस आदमी को कुछ कहने क लिए जैसे hi पीछे की तरफ मुड़ता है उसके सब्द बहार hi नहीं आ पाते ककी उसके सामने ताली बजने वाला और कोई नहीं अपितु 'त्यागी' था


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भानु मन hi मन सोचने पे मजबूर हो जाता है

'कही इसने कुछ ज्यादा तोह नहीं सुन लिया'

ये सोचते hi भानु क जिस्म मैं एक सार्ड लहर सी दौड़ जाती है.. की कही उसके सालों की म्हणत पे पानी तोह नहीं फिर जायेगा

ठण्ड तोह वैसे भी थी पर ऐसा लगता है जैसे मौसम और ज्यादा सार्ड होता चला जा रहा हो

ठंडी हवा पत्तों को हिला रही हो, मानो किसी तेज़ तूफान से पहले की शांति हो

त्यागी- (मानो जैस कटाक्ष सी करता है) कैसा चल रहा है तुम्हारा सद्यन्त्र ?

भानु को ऐसा लगा जैसे उसके सालों की म्हणत पे सच मैं पानी फिरने वाला हो.. पर वो इतनी आसानी से टूट जाये, ऐसा इन्शान कहा

पर त्यागी आगे बोलता है

"अनोखी.. फिर मोनू, और सायद... खालिद का बाप भी गुफरान भी.. 3 जान, वाह मन्ना पड़ेगा तुम्हे?"

भानु क कानो मैं पड़ने वाले ये सब्द ऐसे थे मानो किसी ने उसके कान मैं जलता हुआ कोयला भर दिया हो

भानु कुछ बोलना चाहता है पर वो रुक जाता है और अस्स पास देखने लगता है मानो पक्का कर रहा हो वह उन दोनों क अलावा और कोई तोह नहीं.. और जब उसे पूरी तरह यकीं हो जाता है वह बस वही दोनों है तोह वो अपनी नज़रों को घुमा क खेत की माइड क पास बहने वाली नाली क पास राखी हुई अपनी कुदाल की तरफ देखता है और मानो किसी निष्कर्ष पे पहुंचने की कोशिश कर रहा हो

त्यागी ने भी भानु की नज़रों को भाप लिया था इसलिए वो भी मुस्कुरा पड़ता है.. वैसे कही न कही उसे भी एक पल क लिए दर तोह लगा था, ककी वो अचे से जान चूका था की भानु किस प्रकार का आदमी है

त्यागी- (मुस्कुराते हुए) किया हुआ.. उस कुदाल से मुझे मरना चाहते हो.. हम्म्म.. सायद वैसे hi जैसे अनोखी, मोनू.. और गुफरान को मारा होगा.. एक मं सायद ये काम तुमने नहीं...

त्यागी दर तोह रहा था ककी वो भलीभांति जनता था की वो भानु से शारीरिक ताक़त मैं जीत नहीं सकता, पर दिमाग का इस्तेमाल करना वो भी अचे से जनता था

"ये सब तोह तुमने अपने आदमी जब्बार से करवाया होगा न.. हम्म तभी उसने मालती को भी मरने की कोशिश की"

भानु- (एक अंतिम बार कोशिश करते हुए) ये सब किया बकवास कर रहे है.. आपको पता है न मैं उस घर का दामाद हु

त्यागी मुस्कुराते हुए वही इमली क पेड क नीचे पड़ी चारपाई की तरफ बढ़ता है और मुस्कुराते हुए उसपे बैठ जाता है और हसकर अपनी बात आगे कहता है

"यकीं मानो.. मुझे ज्यादा म्हणत नहीं लगेगी ये सब साबित करने मैं, और अगर किसी को मेरी बात पे भरोषा नहीं हुआ तोह..

मोनू है न"

भानु ग़ुस्से से लाल होने लगता है, ककी त्यागी ने मोनू का नाम लेके उसके दर को और बड़ा दिया था.. भानु ग़ुस्से से कुदाल की तरफ बढ़ने लगता है

भानु को यु कुदाल की तरफ बढ़ते हुए देख क एक पल क लिए त्यागी भी दर से काँप जाता है पर वो अपने ऊपर दर को हावी नहीं होने देता

"मोनू सिर्फ मेरी वजह से होश मैं नहीं आ रहा.. वर्ण वो तोह कब का ठीक हो चूका है"

त्यागी ने मानो कोई धमाका सा किया हो, भानु क कदम भी वही क वही रुक जाते है और सवालिया नज़रों से त्यागी की तरफ देखते हुए

"किया मतलब है तुम्हारा ?"

भानु क मुख से निकली ये बात त्यागी क लिए विजयपथ पे चलने का रास्ता सा था

त्यागी- (मुस्कुराते हुए एक अंगड़ाई सा लेता है, मानो भानु की हालत का भरपूर मज़ा ले रहा हो.. और फिर वो एक राज़ खोलता है) तुम्हे किया लगता है.. मेरे जैसा वाडिया सर की एक जरा सी चोट को अब तक ठीक नहीं कर सका ?

भानु, कुदाल को भूल क त्यागी की तरफ कुछ कदम आगे बढ़ता है

"साफ़ साफ़ कहो"

त्यागी- मोनू तोह सुरु क 10 दिनों मैं hi ठीक हो गया था, कुछ बात तोह है उस लड़के मैं जो इतना जोरदार वार खाने क बाद भी मौत उसका कुछ बिगड़ नहीं पायी

भानु- किया कहना च रहे हो.. मैंने कहा न मेरा इन सब से कोई लेना देना नहीं है

भानु एक बार फिर से साडी बातों को मैंने से पूरी तरह मन करते हुए

त्यागी- (है पड़ता है.. और शांत आवाज़ मैं आगे कहता है) पता है.. मैं जब चहु मोनू को होश मैं ला सकता हु, और तुम्हे तोह पता hi है वो होश मैं आते hi सबको किया बताएगा

त्यागी अपनी जगह से उठता है और हस्ते हुए भानु क चारो तरफ ऐसे घूमने लगता है मानो उसकी परिक्रमा सी कर रहा हो और आगे कहता है

"वैसे मन्ना पड़ेगा, बड़े ताक़तवर मालूम पड़ते हो.. पर किया तुम कुंदन से जीत पाओगे, इतनी ताक़त है तुममे"

भानु का सब्र अब पूरी तरह टूट जाता है.. ककी त्यागी ने उसके दुश्मन को उससे ज्यादा बड़ा बता दिया था

भानु- (किसी सांड की तरह फुफकारते हुए) तुम मुझे जानते नहीं हो त्यागी.. अपनी हद मैं रहो वर्ण..

त्यागी- (वापस से मुस्कुरा पड़ता है) वर्ण किया.. मुझे भी मरवा डोज जैसे मालती को वर्ण की कोशिश की

भानु- मैंने मालती को मरवाने की कोशिश नहीं की.. ककी उसे तोह मैं अपने एक हाथों से मरूंगा, वो भी तड़पा तड़पा क

भानु ने अपने अंतिम सब्द ऐसे ग़ुस्से से कहे की त्यागी क जिस्म मैं भी झुरझुरी सी दौड़ पड़ी थी

त्यागी- (खुद को सँभालते हुए) हम्म.. मुझे पता है, तुम्हारे छोटे भाई क ज़हर खाने का सबब और यहाँ तक तुम्हारे माँ बाप क ज़िंदा जलने की वजह वही औरत 'मालती' है

भानु ऐसी हैरानी से त्यागी को देखता है.. जैसे उसके जीवन का सबसे बड़ा सच उसको पता चल गया हो

पर त्यागी बिना रुके आगे कहता है

"पर तुम अकेले नहीं हो जिसका परिवार और ज़िन्दगी मालती क परिवार ने बर्बाद की

फर्क सिर्फ इतना है की तुम्हारे छोटे भाई और माँ बाप क साथ जो हुआ उसकी वजह मालती और उसके दोनों भाई.. और मालती की बड़ी भाभी प्रेमलता है"

इससे पहले hi त्यागी कुछ आगे बोलता भानु ग़ुस्से से जलता हु बोल पड़ता है

"और वो हरामी 'मुरली दस' भी"

त्यागी है मैं सर हिलाते हुए आगे कहता है

"है.. मुरली दस, कुंदन का बाप.. भला उसे कैसे भूल सकता हु"

इस बार आगे बोलने का काम भानु करता है

"तुम्हारा किया बिगाड़ा है मालती ने"

त्यागी हैरानी से भानु को देखता है मानो पूछ रहा है..

'मेरा.. मतलब'

भानु अब काफी शांत नज़र आने लगा था वो आसानी से चलते हुए उस चारपाई पे बैठ जाता है और पुरे शांत स्वर मैं कहता है

"अब जब तुम्हे मेरे बारे मैं इतना सब पता है.. पर तुमने ये सब अपने दोस्त महेंद्र को बताने की जगह यहाँ मेरे पास आये हो, तोह ये सब यही तोह नहीं हो सकता"

असल मैं भानु को थोड़ा समय लगता है पर वो जल्दी hi समझ चूका था की त्यागी का यु उसे डरना और उसके बारे मैं इतना सब पता होना.. पर अब तक चुप रहना, जरूर उसके पीछे कुछ तोह राज़ है

त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए, वही भानु क पास चारपाई पे बैठ जाता है और किसी सुण्या मैं ताकते हुए कहता है) 'बेला'.. बेला नाम था उसका, मेरा प्रेम और मेरा जीवन थी वो.. पर 'मुरली दस' और उसके दोनों बेटों महेंद्र और कुंदन ने पुरे गाओं क आगे उस बेचारी को बदचलन और कुलटा बता क उसे ख़ुदकुशी करने पे मजबूर कर किया.. और चीन लिया मेरी बेला को मुझसे



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बेला 👆

त्यागी की आँखों मैं पानी भर आया था और गाला रुँधा सा गया था.. वो एक पल क लिए रुकता है और आगे कहता है

"पता है.. जब मेरी बेला ने गाओं वालों क तानो से परेशां होक ख़ुदकुशी की तोह वो अकेली नहीं मरी थी, उसके पेट मैं मेरा बचा भी था

उस दिन मुरली दस क दोनों बेटों ने सिर्फ मेरी होने वाली पत्नी को नहीं, बल्कि मेरे पैदा होने वाले बचे को भी मारा था

20 सालों से उनसे बदला लेने क लिए तरप रहा हु.. एक एक दिन कैसा काटा है सिर्फ मैं hi जनता हु, मेरी इन हड्डियों मैं तुम्हारी जैसी जान नहीं है.. पर जड़ी बूटियों का ऐसा ज्ञान जरूर है जिससे मैं उनसे बदला लेके रहूँगा"

भानु क लिए ये सब बिलकुल नया था.. वैसे उसने ये नाम 'बेला' सुना हुआ था

अपनी पत्नी शीला क मुख से.. पर उसके हिसाब से कहानी कुछ और hi थी और अब त्यागी क हिसाब से कुछ और

भानु- (सिर्फ मतलब की बात पे आते हुए) फिर मेरी किया जरुरत.. ककी तुम यहाँ ऐसे तोह नहीं आये होंगे ?

त्यागी- (भानु की तरफ देखता है और अपनी भर आयी आँखों को साफ़ करते हुए) मेरे पास जड़ी बूटियों का ज्ञान तोह है.. पर मैं मुरली दस क पुरे परिवार को तड़पा तड़पा क मरना चाहता हु, चाहता हु की वो सब भी वो दर्द महसूस करे जो मेरी बेला ने उस दिन महसूस किया होगा, इसलिए बूढी क साथ साथ मुझे तुम्हारा बल भी चाहिए

भानु अब सब कुछ समझ चूका था.. पर अब भी उसके मन मैं कई सवाल थे

भानु- आज अचानक क्यू.. पहले कभी मेरे पास आने क बारे मैं क्यू नहीं सोचा ?

"सच कहु तोह मुझे लगता था की महेंद्र और उसके परिवार से मैं और वनराज अकेले hi बदला ले सकते थे.. पर अभी कुछ दिनों पहले वनराज गाओं क बाजार मैं कुंदन से टकराया था और तब वो बड़ी मुश्किल से अपनी जान और पहचान छुपा क भाग पाया था

सीधा सीधा काबू तोह इस जुंग मैं वनराज और मैं.. काफी नहीं है, हमे तुम्हारी ताक़त भी चाहिए

वैसे भी हमारा दुश्मन लगभग एक hi है"

त्यागी अपनी पूरी बात कहते हुए, भानु की तरफ ऐसे देखने लगता है जैसे अब उसके उत्तर का इंतज़ार हो उसे

भानु- वनराज ?

पर भानु अलग hi सवाल करता है

त्यागी- (जैसे उसे अपनी गलती का एहसास हुआ हो) अरे है.. मैं बताना hi भूल गया, वनराज मेरी बेला का भाई है

भानु- (अब वापस सबसे हम सवाल पे आता है) तुम कह रहे थे की.. मोनू अब तक सिर्फ तुम्हारी वजह से उस बेहोशी की हालत मैं है ?

त्यागी- (मुस्कुरा पड़ता है) है.. मैं उसे जो जड़ी बूटियां देता हु वो उसे ठीक करने क लिए नहीं.. बल्कि उसे उसी अवस्था मैं रखने क लिए है

भानु- और इसकी वजह ?

त्यागी- (भानु की तरफ देख क मुस्कुराते हुए) किया तुम मालती की औलाद को इतनी आसान और शांत मौत देना चाहते हो, जहा उसे दर्द का पता तक न चले

भानु- (मानो ग़ुस्से की आग भड़क उठी हो) बिलकुल नहीं.. उसे तोह ऐसी मौत दूंगा की मालती और कुंदन देख क अपनी मौत की भीख मांगेंगे, पर उस दिन सब कुछ मेरी सोच से अलग चल रहा था इसलिए उसे इतनी आसान मौत देनी पड़ी.. पर मेरी किस्मत की वो तब भी नहीं मारा

त्यागी- मैं फिर से मौका दे सकता हु.. इस बार उसका वो हाल करो जो तुम चाहते हो

भानु- (त्यागी की तरफ देखते हुए) ऐसा कैसे संभव है.. वो होश मैं आते hi मेरा सच सबको बता देगा

त्यागी- (मुस्कुराते हुए) जब उसे याद रहेगा तब न.. मैं अपनी जड़ी बूटियों से उसके दिमाग मैं बसी अंतिम यादों को दबा दूंगा, और जब तक मैं नहीं चाहूंगा उसे बेहोशी से पहले का कुछ पल याद नहीं आएंगे

भानु, त्यागी की तरफ ऐसे देखता है मानो आँखों hi आँखों मैं सवाल कर रहा हो

त्यागी- (मुस्कुराते हुए) है.. तुम्हारा सोचना सही है, मैं उन यादों को पूरी तरह भी मिटा सकता हु.. पर तब तुम मुझे भी तोह मार सकते हो न.. अब तुम्हारा किया भरोषा, आखिर अनोखी भी तोह तुम्हारे लिए काम करती थी.. देखो किया हाल किया तुमने उसका

वैसे त्यागी ने जो बातें कही.. खास करके अनोखी और जब्बार को लेके उनपे अब तक वो खुद पक्का नहीं था, पर उसकी इन बातों से भानु का रवैया देख क वो समझ चूका था की वो जो सोच रहा है.. वो सब सच है

भानु डाट पेश क रह जाता है.. ककी त्यागी क हिसाब से भानु कभी भी उसके विरुद्ध नहीं जा सकता था, वर्ण वो मोनू की यादों को जागृत भी कर सकता है

कुलमिलाकर त्यागी, मोनू क बहाने भानु पे अपना काबू बना रहा है.. जो बात वो अचे से समझ रहा था

भानु- ठीक है.. पर याद रहे, अगर तुमने मुझे देखा देने की सोची भी तोह..

त्यागी- (उसकी बात काटे हुए) और तुम भी याद रखना.. अगर तुम मेरे खिलाफ गए तोह.. मोनू को सब कुछ याद आ सकता है

त्यागी ने साफ़ सब्दो मैं बता दिया था की अब भानु बिना उसकी मर्ज़ी क कुछ नहीं सकता

त्यागी अपनी जगह से उठते हुए

"चलो फिर कल एक चमत्कार होगा.. कल मोनू को होश आएगा"

त्यागी अपनी बात कहते हुए मुस्कुरा पड़ता है और वह से चल पड़ता है.. उसे जाते हुए देख क भानु किसी ज़हरीली नाग जैसा फुफकार पड़ता है

"एक बार मैं इस जब्बार का मसला हल कर दू, फिर तुझे भी तेरी औकात दिखाऊंगा.. मादरचोद त्यागी"

वही खेत से दूर निकल आने पे त्यागी लम्बी सी सांस लेते हुए मुस्कुरा पड़ता है और खुद से कहता है

"भानु.. अब तू वही करेगा जो मैं चाहूंगा, ककी अब तेरे गले मैं त्यागी का पत्ता रहेगा

मेरा जड़ी बूटियों को लेके इतने सालों का ज्ञान अब काम आएगा.. वैसे भी मोनू क अंतिम पलों की यादें तोह मैं कब का दबा चूका हु, लोगो को अंदाज़ा hi नहीं आयुर्वेद कोण कोण से चमत्कार कर सकता है"

यहाँ तक चीज़े अब साफ़ हो चुकी है.. इसलिए वापस उसी समय लौट चलते है जब त्यागी मोनू क उपचार करने वाला है, या सिर्फ एक नाटक मात्र

सन 🖼️ #06

त्यागी ने कमरे को अंदर से बंद कर रखा था.. और यहाँ हर किसी की नज़रें सिर्फ और सिर्फ दरवाजे की तरफ अटकी हुई थी

सविता, मालती, शीला और हर्षिता चारो औरते कभी दरवाजे की तरफ देखती तोह कभी ईश्वर से प्रधान करने लगती

वही मर्दों का भी हाल कुछ अलग नहीं था.. जहा महेंद्र बार बार सब ाचा होने की कामना करता वही मोनू का बाप कुंदन, बार बार अपने बचे क सही होने की दुआ मांग रहा था

वीरू, सत्तू और सोनू भी अपने भाई क जल्दी से ठीक होने की प्राथना करने मैं पीछे नहीं थे.. अगर कोई था जिसे किसी बात का फर्क नहीं पद रहा था वो था सत्यम, ककी उसकी नज़रें बार बार मालती की गठीले जिस्म पे नाच रही थी

सत्यम मन hi मन

'अगर ये मोनू ठीक हो गया तोह लगता नहीं हम कभी इस गाओं की गरीबी को चोर क सेहर की खुशाल ज़िन्दगी देख पाएंगे..

वैसे ये भी है की जब तक मोनू सही नहीं होगा मेरा मालती चची पे चढ़ने का सपना भी पूरा नहीं होगा.. बहनचोद अजीब मुशीबत है'

तभी सविता की आवाज़ सभी का धियान अपनी तरफ खींचने मैं कामयाब रहती है

"अरे ये इत्ता सारा दुआ कैसे.. ?"

कुंदन- सायद त्यागी भैया ने उस खास हिमालयन जड़ी बड़ी से मोनू का इलाज सुरु कर दिया है

कुंदन सभी को त्यागी की कही बातें याद दिलाते हुए

समय यही बीतता चला जाता है..10 मं.. 15 मं.. 20 मं.. 1 जानता

कमरे की बंद खिड़की और दरवाजे क बीचे से हल्का हल्का धुआँ अब भी बहार आता जा रहा था पर न त्यागी अभी तक बहार आया था न hi उसका कोई जवाब

जबकि यहाँ मर्दो का हाल ऐसा था की कभी कुंदन पुरे आँगन मैं चैहाल कदमी करते हुए दीखता तोह कभी महेंद्र, है भानु जरूर कुछ परेशां सा था

भानु मन hi मन

'कही ये त्यागी मुझे देखा तोह नहीं देखा.. इसने जो कहा है की मोनू की अंतिम समय क कुछ पल याद नहीं रहेंगे, कही वो सब झूट तोह नहीं.. ये मादरचोद कही मेरा खेल बिगड़ न दे'

पर तभी भानु की सोच मैं वीगन पद जाता है ककी दरवाजा हल्का सा खुलता है और त्यागी का पसीने से भीगा हुआ चेहरा बहार आता है

सभी क सभी उठ क त्यागी की तरफ लगभग भाग से पड़ते है पर त्यागी उन्हें रोकते हुए

"वही रुकिए आप सभी.. मोनू का उपचार जितना सरल समझ रहा था, उतना है नहीं.. मुझे.. सविता भौजाई से थोड़ी मदद चाहिए"

सविता ये सुनते hi आगे बढ़ने मैं कोई भी विलम्ब नहीं करती और तुरंत hi दरवाजे क पास पहुंच जाती है, त्यागी बिना कुछ कहे दरवाजे से हट्टे हुए अंदर आने का रास्ता देता है और फिर वापस से दरवाजा बंद कर देता है

सविता अब कमरे क अंदर थी.. वो देखती है की कमरे मैं एक तरफ लोहे क तसले मैं आग जल रही थी जिसके पास hi त्यागी का झोला रखा हुआ था.. और उस आग से हल्का हल्का धुवा निरन्तन निकलता जा रहा था

वही जब वो मोनू की तरफ देखती है तोह पाती है मोनू क सर पे किसी जड़ी बूटी का लैप सा लगा हुआ था

सविता- (व्याकुलता भरे स्वर मैं) किया बात है.. त्यागी भैया, हमारा मोनू ठीक तोह हो जायेगा न ?

त्यागी एक पल क लिए मन hi मन हस्ता है और सोचता है

'मोनू तोह कब का ठीक हो चूका है, पर अपने खेल को आगे बढ़ाने क लिए अभी थोड़ा और नाटक करना है मुझे, उसके बाद hi उसे होश मैं लाऊंगा

वैसे भी असली खेल तोह अब सुरु होगा'

त्यागी ये सोचते हुए सविता क भारीभरकम जिस्म को बड़ी hi पियासी नज़रों से देखता है

त्यागी वापस से अपने चेहरे पे चिंता की लकीरे लाते हुए

"भौजाई.. बात ये है की.. wo...ki.."

सविता- (परेशां सी होने लगती है) बात किया है भैया.. बताइए न, कुछ भी करिये बस हमारे मोनू को ठीक कर दीजिये

त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए) भौजाई बात ये है की.. मेरी जड़ी बूटी को काम करने क लिए बहुत सी गर्मी की जरुरत है.. और वो.. मैं..

सविता- अरे तोह इसमें कोनसी बड़ी बात है, आप कहिये तोह मैं अभी यहाँ आग जलवा देती हु

त्यागी- (एक पल क लिए रुकता है, वो जान क माहौल को संजीदा बनाने की पूरी कोशिश करते हुए आगे कहता है) आप समझी नहीं भौजाई.. मैं.. कैसे समझौ.. कुछ समझ नहीं प् रहा.. किस मुंह से बताऊ

"त्यागी भैया जो भी बात है आप खुल क साफ़ साफ़ कहिये न यु पहेलियाँ क्यू भुजा रहे है..

मैं मालती का ऐसा भुजा हुआ चेहरा और नहीं देख सकती..

एक माँ पे अपने बचे को इस हालत मैं देख क उसपे किया बीत रही होगी.. मैं सोच भी लेती हु तोह मेरा कलेजा पहात पड़ता है

त्यागी- (एक लम्बी सी सांस लेते हुए) भौजाई मैं जो बोलने जा रहा हु.. उसे सुनकर आप मुझे गलत मत समझना पर और कोई रास्ता नहीं है, और अगर मोनू को जल्दी hi होश नहीं लाया गया तोह वो हमेशा हमेशा क लिए ऐसी अवस्था मैं फास जायेगा

त्यागी की बात सुनकर सविता काँप सी पड़ती है

"अरे तोह दिएर क्यू कर रहे है.. मोनू को भले hi मैंने जन्म नहीं दिया है, पर मैं भी उसकी माँ जैसी हु.. आप बस बताइए करना किया है"

त्यागी- (मन hi मन है पड़ता है अपनी चाल क सफल होने पे) असल मैं भौजाई.. मोनू को जिस गर्मी की जरुरत है वो है शारीरिक गर्मी.. आप समझ रही है न.. मैं कैसे समझौ.. वो

सविता ने दुनिया देखि थी.. और शारीरिक गर्मी का मतलब भी भली भाटी समझ चुकी थी, पर फिर भी धीमी सी आवाज़ मैं कहती है

"आप.. आप कहना किया च रहे है भैया.. साफ़ साफ़ कहिये न"

त्यागी- भौजाई.. मोनू को जल्दी से होश मैं लाने क लिए मेरी इस जड़ी बूटी क साथ साथ उसे बहुत सी शारीरिक गर्मी की आवश्यकता है.. और ये काम सिर्फ एक औरत कर सकती है अपने जिस्म से.. आप समझ रही है न

सविता इस बार कुछ बोल hi नहीं पाती, पर है मैं अपना सर जरूर हिला देती है

त्यागी- (आगे बोलते हुए) और मेरी नज़रों मैं सिर्फ आप hi है जो मोनू को वो गर्मी दे सकती है.. वैसे मैंने पहले मालती को ये सब बताने का निरयण लिया था पर फिर सोचा वो एक माँ है.. उसकी कुछ सीमा है.. इसलिए

त्यागी अपनी बात कहते हुए चुप हो जाता है

सविता- (कुछ पलों तक शांत रहने क बाद) और कोई रास्ता नहीं..

त्यागी अपना सर 'न' मैं सर हिला देता है, सविता कुछ पलों तक कड़ी कड़ी सोचती hi रहती है पर जब वो बहसः मोनू क मासूम चेहरे को द्केहती है तोह उसके अंदर की ममता भी उछाल मरने लगती है

सविता- मुझे मंजूर है.. बताइए किया करना है, पर ये बात

त्यागी- (अपनी ख़ुशी को छुपाते हुए) मैं जनता हु.. ये बात सिर्फ हम दोनों तक hi रहेगी.. बल्कि मोनू को भी कभी इस उपचार का बारे मैं पूरी बात नहीं पता चलेगी

सविता- (अपनी नज़रें नीचे झुकाये हुए) तोह किया यहाँ..

त्यागी- नहीं नहीं भौजाई.. ये सब इतना सरल भी नहीं.. इसके लिए पहले आपके सरीर पे एक खास जड़ी बूटी से बना टेल लगेगा, ताकि अपने जिस्म की गर्मी और ज्यादा बाद सके और उसके बाद.. मैं बताऊंगा कैसे..

यानि त्यागी ने साफ़ कर दिया था की जब ये सब हो रहा होगा.. वो खुद भी वही होगा

त्यागी आगे कहता है

"जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक पुराण मंदिर हुआ करता था जहा अब सिर्फ खंडहर बचे है.. वो जगह सही है, वह हम थोड़ी आग भी जला सकते है मदद क लिए और वह कोई आएगा भी नहीं, और सबसे बड़ी बात मुझे कुछ और जड़ी बूटियों की जरुरत है जो मुझे उसी जगह मिल जाएँगी.. पर आप जानती है न मेरे कहने का किया मतलब है

देखो भौजाई मैं जनता हु की मैं किया कह रहा हु.. पर किया करू, और कोई रास्ता भी नहीं है

और अगर मोनू जल्दी से होश मैं नहीं आया तोह वो हमेशा हमेशा क लिए ऐसी अवस्था मैं फास क रह जायेगा"

सविता- (तुरंत बोल पड़ती है) नहीं नहीं.. आप जो चाहते है वो सब होगा, आप बस उपचार करिये

त्यागी- तोह ठीक है मैं महेंद्र और सभी से बात करके उस जगह पे सरे इंतिज़ाम करवाता हु

सविता बस है मैं अपना सर हिला क रह जाती है और फिर मोनू क सर क पास बैठ क बड़े hi स्नेह भरे हाथों से उसके बालों मैं अपनी उंगलिया चलने लगती है.. पर इस समय उसकी आँखों मैं सिर्फ ममता थी.. हवस नहीं

दूसरी तरफ त्यागी बहार आके सभी को ये बताता है की उसको कुछ ताज़ी जड़ी बूटियों की जरुरत है जिसे वो तुरंत तोड़ क इस्तिमाल करेगा और जिसके लिए जंगल क उत्तरी हिस्से मैं उस खण्डार वाली जगह पे आगे का उपचार होगा

और वो ये भी बताता है की इसके लिए उसे सविता भौजाई की जरुरत पड़ेगी ककी इन सभी मैं उन्ही को सबसे ज्यादा अनुभव है.. वैसे त्यागी की इस बात पे बाकि तीनो औरते भी अपना सहयोग देने की बात कहती है जिसपे त्यागी मन hi मन है पड़ता है.. ककी उन्हें पता नहीं था की आज कोनसा सहयोग होने वाला है

कुंदन- (त्यागी की बात सुनकर अपनी सनका व्यक्त करते हुए) त्यागी भैया आपकी सब बात ठीक है, पर आप तोह जानते hi है.. की इस समय मोनू को खतरा है ऐसे मैं उसे उस एकांत जगह पे और आप कह रहे है हम भी वह नहीं आ सकते ?

त्यागी- है कुंदन तुमने सही सुना, ककी यहाँ एक बंद कमरा था पर वह पूरा खुला वातावरण होगा और उस बूटी का धुआँ दूर तक जा सकता है.. मेरे पास उस बूटी की काट वाली दवा सिर्फ इतनी hi है की मैं उसे सिर्फ किसी एक को दे सकता हु और मैंने सविता भौजाई को दे दी ताकि उनपे उस दुवे का प्रभाव न पड़े.. और रही बात मोनू पे खतरे की तोह माना मैं तुम्हारे जैसा जवान नहीं.. पर तुम्हसे वडा करता हु अगर मोनू पे किसी प्रकार का कोई खतरा हुआ तोह चाहे मुझे अपनी जान क्यू न देनी पड़े पर मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा

महेंद्र- नहीं नहीं त्यागी भाई कैसी बात करते हो हम सभी को आप पर पूरा भरोषा है

महेंद्र बरी बरी से सभी की तरफ देखता है जहा हर कोई महेंद्र से सहमत था

करीब 40 मं बाद..

जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक चटाई बिछी हुई थी जिसपे मोनू बेहोशी की हालत मैं लेता हुआ था और उसके समीप hi त्यागी और सविता खड़े थे.. बाकि सभी लोग वह से करीब 500 मीटर दूर एक छोटी सी पुलिया क पास खड़े थे

असल मैं हर कोई वह आना च रहा था इसलिए त्यागी ने की कहा था की वो सब आ सकते है पर काम से काम 500म उनसे दूर रहना होगा ताकि उस दुवे का गलत प्रभार उन सभी पे न पड़े

इधर उस पुराने खादर जैसी जगह पे कड़ी सविता पहले मोनू और फिर त्यागी की तरफ देखते हुए

"तोह अब.."

त्यागी आने झोले से एक बोतल निकलता है जिसमें सरसो जैसा कोई टेल भरा हुआ था.. उस बोतल को हाथ मैं लेते हुए

"कपडे उतरो भौजाई.."



कंटिन्यू.. इन अपडेट #14
 
लेटेस्ट अपडेट ों पेज No. 181 👑

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शॉप की जिम्मेदारी क कारन मैं कुछ दिनों तक यहाँ अवेलेबल नहीं हो पाउँगा

उसके लिए आप सभी से माफ़ी चाहूंगा

🙏🙏🙏🙏
 
मैं एक होली स्पेशल स्टोरी लाने की सोच रहा हु, जो की होली क दिन कम्पलीट भी हो जाएगी

िफ़ अन्य सुग्गेस्टियन्स 🙏 प्लीज



 
अपडेट #14

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सन 🖼️ #01

सुबह क करीब 4 बजे

'मालती.. मालती'

ये सब्द ऐसे थे जो लगातार मालती को उसके कानो मैं सुनाई पद रहे थे.. पर इस आवाज़ का एस्ट्रोट कहा है ये वो ढूंढ नहीं प् रही थी की तभी उसे एक ठंडी हवा का कंपकपा देने वाला झोका महसूस होता है

हवा कुछ ज्यादा hi ठंडी थी.. ककी इस एक पल मैं hi उसका पूरा जिस्म ऐसे काँप गया था मानो सार्ड ऋतू मैं किसी ने उसे पूर्ण नंगी करके रात्रि मैं किसी नदी क बीचों बीच खड़ा कर दिया हो.. पर एक मं

मालती तोह सच मैं किसी नदी.. तालाब या ऐसी hi किसी जगह थी, जहा दूर दूर तक जहा नज़र डालो वह बस पानी hi पानी था

"ये.. ये.. मैं यहाँ कैसे.. कोई है.. कोई है... ?"


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मालती क अंदर भय का साया घर करने लगता है, वो अपने चारो तरफ देखती है जिससे उसे ज्यादा दर महसूस होता है उसे

ककी वो खुद को पानी मैं खड़ा हुआ पाती है जहा दूर दूर तक जहा नज़र डालो वह सिर्फ पानी hi पानी नज़र आ रहा था

"कोई है... मोनू क पिताजी.. सविता भाभी.. जेठ जी... कोई है"

मालती फिर से डरते हुए अपनों को याद करती है, पर बदले मैं पहले जैसा hi उत्तर मिलता है, यानी पूर्ण शांति

तभी अचानक उसे अपने पैरो क पास कुछ हलचल सी महसूस होती है, वो पानी मैं कुछ कदम पीछे हटती है तोह ऐसा महसूस होता है वो अपना पेअर hi न उठा प् रही हो, या ऐसा लगा की किसी ने उसके पैरों को अपने मजबूत पंजो मैं जकड लिया हो

पर मालती हार नहीं मानती और अपनी पूर्ण ताक़त लगा क पीछे हटती है

तभी वो देखती है की पानी की सतह से एक हाथ धीरे धीरे पानी क ऊपर आ रहा होता है.. फिर उसके बाद एक चेहरा उभारना सुरु होता है


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मालती पूरी तरह आश्चर्य मैं पड़ी हुई कभी उस आकृति को पानी से बहार आते हुई देख रही थी तोह कभी अपने चारो तरफ दूर दूर सिर्फ पानी को देखते हुए और ज्यादा गबरा रही थी

अचानक दूर कभी तेज़ बिजली कौंधने की आवाज़ सुनाई पड़ती है.. जिससे मालती को उस दिशा मैं देखना hi पड़ता है

पर ये किया दूर दूर तक एक बार फिर से पूर्ण शांति थी.. पर इस बार जब मालती वापस पानी मैं उभरती हुई उस आकृति पे नज़र डालती है तोह बस हैरान hi रह जाती है, ककी अब वह एक स्त्री कड़ी थी.. है सायद स्त्री hi थी

पर पूर्ण नंगी अवस्था मैं जिस्म पे एक कपडे का धागा तक नहीं.. पूर्ण किसी नवजात की तरफ बस नंगी


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वो स्त्री मुस्कुराते हुए अचानक मालती क सामने कड़ी हुई दिखती है

मालती को समझ नहीं आता की अचानक वो उसके इतने करीब कैसे आ गयी.. जैसे कोई चलवा हो

तभी उस स्त्री क मुख से सब्द निकलते है और उसके साथ hi एक ठंडी सार्ड हवा भी मालती क चेहरे से टकराती है.. मालती को ऐसा लगता है जैसे उस स्त्री क मुख क निकल रहे सब्दो क कारन उसके चेहरे पे बर्फ जमने लगी हो

पर मालती क अंदर सिरहन भरने का काम उसके सब्द कर रहे थे

"तू बड़ी खुस है.. तुझे लगता है तेरा बीटा बच गया.. है हां है हहाआआअह्ह्ह"

वो स्त्री इतना बोल क ऐसे हस्ती है मानो कोई रक्षक हो जिसकी करकस आवाज़ से मालती का पूर्ण जिस्म ठंडा पड़ने लगा था

मालती- कोण.. कोण.. हो तुम.. ?

अगले hi पल उस स्त्री ने आगे बढ़कर मालती की कलाई को कसके जकड लिया, उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी की मालती को अपने जिस्म मैं तेवर ठण्ड और कंपकपी सी महसूस होती है

स्त्री- (भयनकर रूप से हस्ते हुए) मौत हु.. तेरे बेटे की मौत

'मोनू.................."

मालती पूरी ताक़त लगाकर अपने बेटे का नाम लेती है कुछ पलों क लिए उसकी आँखें भी बंद हो गयी थी, पर जब वापस वो अपनी आँखों को खोलती है तोह सब कुछ बदल चूका था

ककी वो तोह अपनी चारपाई पे लेती हुई थी, सरीर पे एक भरी रज़ाई थी पर उसका एक पेअर रज़ाई क बहार निकला हुआ था.. जिस कारणवस उसे हलकी ठण्ड भी महसूस होती है

पर इस समय मालती को उसकी परवा नहीं थी.. ककी वो इतना तोह समझ चुकी थी की ये बस एक सपना था, पर ऐसा क्यू था की ये सच से भी ज्यादा सच्चा लगा.. मालती को कुछ समझ नहीं आ रहा था

उसे महसूस होता है की इतनी भीसाद ठण्ड मैं भी, उसे पसीना आ गया था.. वो जल्दी से अपने पल्लू से अपना पसीना पोछने की लिए जैसे hi अपना हाथ उठती है उसका पूर्ण जिस्म मानो काँप उठता है ककी उसे अपनी कलाई पे लाल निशान दीखते है मानो जैसे किसी ने उसकी कलाई को इतने जोर से पकड़ा हो की कुछ पलों क लिए वह का खून जैम गया हो

माली का पूर्ण जिस्म किसी नयी अनहोनी क बारे सोच क सिहर सा जाता है, वो लम्बी लम्बी साँसे लेते हुए खुद को काबू मैं करने की पूर्ण कोशिश करने लगती है.. तभी उसे एहसास होता है सुबह का आरम्भ हो चूका है.. वो घर मैं छप्पर क नीचे hi सोते हुए सोनू, सत्तू और सत्यम को देखती है जहा तीनो hi अलग अलग चारपाई पे बेसुध से सो रहे थे

मालती खुद को मुश्किल से काबू करते हुए अपने पल्लू को चोर क ऐसे hi अपनी खूबसूरत गाडियों से अपने चेहरा का पसीना पोछने क लिए जैसे hi उसे चेहरे से लगाती है उसे कुछ चिपचिपा सा महसूस होता है.. पर उस चिपचिपाहट मैं एक गर्माहट भी थी

इस एहसास ने मालती क पुरे जिस्म मैं अजीब सी सिरहन भर दी थी उसे ऐसा लगता है मानो उसका पूरा जिस्म एक अजीब से गर्माहट को महसूस करने लगा हो..

मालती जल्दी से उस गरम चिपचिपी चीज़ को अपनी उँगलियों मैं लेके पहले अपनी आँखों से देखती है तोह उसकी आँखें खुद hi फैलती चली जाती है और फिर जब अपनी नाक क नज़दीक लाके उसकी अजीब सी कामुक सुगंध को मह्सुश करती है तोह उसे अपने जिस्म मैं एक साथ लाखों चीटियों क रेंगने जैसा महसूस होता है

बिना बिना किसी विलम्ब क अपने जिस्म से रज़ाई हटती है तोह एक और अजीब सा आश्चर्य उसका इन्तिज़ार कर रहा था वो देखती है उसकी साड़ी कुछ ज्यादा hi उसके गोर गोर पैरों से ऊपर तक उठी हुई है.. यहाँ तक उसने साड़ी क नीचे हो लाल रंग की पेंटी पेहेन राखी थी उसे वो तक नज़र आती है

मानो जैसे किसी ने जान क उसकी साड़ी को उठाने की कोशिश की हो, पर ऐसा कैसे संभव था.. किया वो इतनी गहरी नींद मैं थी की उसे पात hi नहीं चला या ये उसकी सिर्फ एक सोच है

मालती और ज्यादा देरी नहीं करती और अपनी जगह से उठ क आँगन मैं hi एक किनारे लगे छोटे से सीसे क सामने आके कड़ी हो जाती है जहा अब वो अपने खूबसूरत चेहरे को देख रही थी, पर इस समय उसके चेहरे पे उसकी कामुक मुस्कान नहीं बल्कि कुछ गाड़ा चिपचिपा सा लगा हुआ था जो उसके माथे से बेहटा हुआ उसके होंठों तक आ रहा था


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मालती का पूरा सरीर ऐसे अकड़ सा जाता है की जैसे किसी ने उसे मूर्ति मैं बदल दिया हो, वो न चाहते हुए भी अपनी जीभ को बहार निकल क अपने होंठों तक बह क आ चुके उस गाड़े सफ़ेद मलाई जैसे चिपचिपे प्रदार्थ को हल्का सा चखती है

मालती को जैसे hi उसका स्वाद मिलता है उसके पूरा जिस्म मचल पड़ता है मानो किसी ने उसके बड़े बड़े ेस्तानो को मुठी मैं भर क जोर से दबोच दिया हो

मालती का जिस्म कंपकपा सा जाता है और वो एक बार फिर से अपनी जीभ निकल क उसे और ज्यादा चखती है और फिर चखती चली जाती है

हाल ऐसा होने लगता है की वो अपनी एक ऊँगली से अपने माथे और खूबसूरत गालों पे लगे उस गाड़े वीर्य को भर क उसे अपनी मुंह मैं भर लेती है.. उसकी गर्माहट ने मालती को एक बात तोह बता दी थी की किसी ने कुछ समय पहले ने उसके खूबसूरत चेहरे को अपने हवस वाले पानी से भिगोया है .. पर किसने ?

मालती फिर से छप्पर क नीचे देखती है जहा तीनो बचे गहरी नींद मैं सो रहे थे

पर इससे पहले की वो और कुछ तय कर पाती उसका अंतर्मन उसे रोकने की एक कोशिश सी करता है

'पागल है.. किया कर रही है ये.. जानती भी है किसका वीर्य है जिसे तू स्वाद लेके चख रही है, कैसी औरत है तू ?'

मालती का अंतर्मन उसे इस प्रकार से झंझोर देता है की उसका पूरा सरीर कांपते हुए वास्तविकता मैं लौट आता है

मालती जल्दी से अपने पल्लू द्वारा अपने चेहरे को साफ़ करती है.. और अपने मन मैं एक अपराध बोध लिए हुए वापस अपनी जगह पे आके रज़ाई ओढ़ क लेत जाती है

उसका मन एक अजीब सी कस्मकश मैं फसा रहता है, कभी वो उस अजीब सपने क बारे मैं सोचती.. तोह कभी अपने खूबसूरत चेहरे पे उस गरम वीर्य क बारे मैं सोचने लगती

'कोण कर सकता है ऐसी हरकत.. ये दूसरी बार है जब उसके साथ ऐसा हुआ है ?'

इन्ही उलझन क बीच कब उसे नींद आ जाती है इसका खुद उसे भी एहसास नहीं हो पाटा

सन 🖼️ #02

सुबह क 8 बजे

'मा.. मा"

मालती को अपने कानो मैं प्रेम से भरी हुई आवाज़ सुनाई पड़ती है.. वो अपनी आँखों को मलते हुए अपनी जगह से उठी है तोह सामने मोनू को देख क उसका दिन बन जाता है

मालती जल्दी से

"अरे खड़ा क्यू है.. इधर बैठ, तुझे मन किया था न कमरे से बहार मत आया कर, कितना कमजोर है अभी"

मोनू मुस्कुराते हुए चारपाई पे अपनी माँ क बगल मैं बैठ जाता है

"माँ आज तीसरा दिन है.. अब मैं ठीक हुए

आप लोग तोह मुझे कुछ करने hi नहीं देता.. बस पूरा दिन बिस्तर पे पड़े रहो

घर से बहार तोह कदम भी नहीं रखने दिया है

अरे अब मैं ठीक हु"

"है.. है पता है तू बड़ा बहादुर है, पर अभी इतने समय क बाद तुझे होश आया है, इसलिए तेरा सरीर बहुत कमजोर हो गया है.. और त्यागी भाई साहब का भी कहना है अभी तुझे आराम की जरुरत है"

ये बात रसोई से हल्दी वाला दूध लेके आयी सविता कहती है, वही अपने बड़ी माँ क हाथों मैं दूध का गिलास देख क मोनू बुरा सा मुंह बनता है

सविता- मुंह मत बना.. पीना तोह पड़ेगा

मोनू- (मालती की तरफ देखते हुए) Maaa...aaaaaaaa

मालती- (हस्ते हुए) मुझे न देख, भाभी की बात टालने की हिम्मत तोह जेठ जी तक मैं नहीं है.. मैं कुछ नहीं कर सकती, पीना तोह पड़ेगा hi

सविता- (मोनू क बालों मैं हाथ फिरते हुए) बड़ा आया माँ वाला.. चुपचाप दूध पि

मोनू- (मुस्कुराते हुए सविता क मोठे मोठे गाय क ठंडो जैसे स्तनों को देखते हुए) पियूँगा बड़ी माँ.. जरूर पियूँगा

सविता, मालती क वह होने क कारन बस उसे मुस्कुराते हुए घर क देखती है कुछ बोल नहीं पाती

मोनू दूध पीने क बाद उठकर वापस अपने कमरे मैं चला जाता है.. वही सविता भी दूध का गिलास लेके रसोई की तरफ जाने लगती है तोह मालती उसका हाथ पकड़ लेती है और उसे अपने पास चारपाई पे बैठने का इशारा करती है

सविता- (बैठते हुए) किया बात है ?

मालती- (एक लम्बी सांस चोरते हुए) पता नहीं भाभी.. ऐसा क्यू लग रहा है जैसे अभी खतरा टाला नहीं है

सविता उसकी बात से पूरी तरह सहमत होती हुई नज़र आती है

"तू फ़िक्र मत कर.. एक बार कुंदन और भानु, मोनू को लेके दिल्ली चले जाये फिर मैं बताती हु किया करना है"

मालती सवाल भरी नज़रों से सविता को देखते हुए, जिसपे सविता खुद hi आगे बोलने लगती है

"मैंने सुना है अभी कुछ दिनों पहले पड़ोस क गाओं मैं 2 बहुत पहुंचे हुए तांत्रिक आये है.. पर तू तोह जानती है हमारे यहाँ क मर्द और खास करके तेरा और मेरा पति ये सब नहीं मंटा, इसलिए मौका देख क मैं खुद जाउंगी उनसे मिलने.. बस ये बात हम दोनों क बीच रहने चाहिए"

मालती है मैं सर हिलाते हुए

"वैसे आप जानती हो किया उन तांत्रिक को.. किया नाम है"

सविता- जानती तोह नहीं, पर नसरीन बता रही थी बहुत पहुंचे हुए है.. और उनके नाम.. है.. उनके नाम थे

"हीरा और पन्ना स्वामी"

सविता अपनी बात पूर्ण करते हुए उठ क रसोई की तरफ चल पड़ती है की तभी मालती उसे फिर से आवाज़ देते हुए कहती है

"भाभी मुझे ये तोह नहीं पता उस दिन त्यागी जी और आपने किया करा.. पर उसके कारन मेरा बचा ठीक हो गया, मैं अपना जीवन देके भी इसका एहसान नहीं उतर पाऊँगी"

सविता- पागल है किया.. इसमें एहसान कैसा, मोनू मेरा बचा नहीं है किया.. है बोल ?

मालती की आँखों मैं आंसू भर आये थे.. इसलिए वो बस है मैं सर हिला क रह जाती है

वही सविता रसोई मैं आके गिलास रखते हुए 3 दिन पहले जंगल क पास जो हुआ उस बारे मैं सोचने लगती है

मानो जैसे सब कुछ उसकी आँखों क आगे चलने लगा हो

सन 🖼️ #03

ठीक 10 जानते पहले..

सोनू और सत्यम गाओं क अँधेरे को चीरते हुए आगे बाद रहे थे

सोनू- भैया मैंने कहा था टोर्च ले लेते है.. इतना अँधेरा है की कुछ सुझाई hi नहीं पद रहा

सत्यम- (हस्ते हुए) छोटे हम जिस काम क लिए जा रहे है उसके लिए ऐसा hi अँधेरा चाहिए

सोनू- (सत्यम की बात पे है पड़ता है) वैसे आपको यकीं है वो हमारे लिए वो दवा बना देगा

सत्यम क हाथ मैं एक झोला जैसा था.. वो उसको थपथपाते हुए

"इसमें बड़ा धूम है, तुम बस देखता जा"

जल्दी hi दोनों भाई गाओं क एकांत मैं बानी एक छोटी सी झोपडी क बहार खड़े थे

सोनू, सत्यम को देखता है.. ककी वो थोड़ा घबराया हुआ सा था पर सत्यम को देख क ऐसा लग रहा था जैसे ये सब उसके लिए कोई बड़ी बात न हो

सत्यम- (दरवाजे पे दस्तक देते हुए) बांकेलाल चाचा.. बांकेलाल चाचा

अब बताने की जरुरत तोह नहीं की ये दोनों इस समय बांकेलाल की झोपडी क बहार hi खड़े है

करीब 2 मं बाद उस झोपडी का दरवाजा खुलता है और कोयले जैसा काला बांकेलाल जिसने इस समय सिर्फ एक धोती पेहेन राखी और ऊपर से पूर्ण नंगा था.. वो इतना काला था की अगर थोड़ी दुरी पे खड़ा हो तोह ऐसी काली रात मैं नज़र भी न आये

बांकेलाल दोनों बच्चों को वह देख क हैरानी से

"अरे सत्यम तू यहाँ किया कर रहा है.. और ये.. वीरू का बीटा है न"

सोनू है मैं अपना सर हिलता है

सत्यम बांकेलाल को किनारे करते हुए झोपडी क अंदर आ जाता है हुए उसके पीछे पीछे सोनू भी

जहा झोपडी क अंदर इस समय चूल्हे पे कुछ पाक रहा था, अब तक बांकेलाल भी अंदर आ चूका था

"कुछ काम था ?"

सत्यम- है चाचा.. बहुत जरुरी काम है

बांकेलाल सवाल भरी नज़रों से देखता है, पर कुछ कहता नहीं

सत्यम hi आगे बोलता है

"मुझे नींद क लिए कोई दवा चाहिए"

बांकेलाल- मतलब.. तू किया करेगा उसका ?

सत्यम एक बार सोनू को देखता है और फिर बांकेलाल की तरफ देखते हुए आगे बोलता है

"अरे एक सांड है जो रोज़ रात हमारे खेतों मैं घुस क फसल बरदाद कर देता है, मैं सोच रहा हु खेत क आगे क हिस्से मैं वो दवा पानी मैं मिला क दाल दू ताकि वो सांड उसे खा क पूरी रात सोता रहे और सुबह सुबह जल्दी जेक उसे कालीचौड वाले से पकड़वा दू"

बांकेलाल को न जाने क्यू सत्यम की बातों पे यकीं नहीं होता

"ठीक है.. मैं कल दवा बना क महेंद्र भैया को दे दूंगा, तुम दोनों अभी जाओ बहुत रात हो रही है"

बांकेलाल की बात सुनकर सोनू तोह दर से काँप hi जाता है.. पर सत्यम अपना सय्यम नहीं खोता, वो उस झोले से दारू की बोतल निकलते हुए

"पिताजी को इसमें लाएंगे तोह ये थोड़ी मिलेगी"

पैसों क चक्कर मैं पिछले कुछ दिनों से दारू क लिए तड़पता हुआ बांकेलाल दारू की बोतल देखते है उसपे लपक पड़ता है.. पर सत्यम अंतिम समय पे दारू की बोतल खींच लेता है

"नींद की दवा.. और ये बात सिर्फ हम तीनो तक रेहनी चाहिए, मैं नहीं चाहता इतनी छोटी सी बात क लिए पिताजी या कोई दूसरा परेशां हो"

बांकेलाल सक की नज़रों से सत्यम और सोनू को देखता है.. पर सामने दारू की बोतल होने क कारन उसकी बुद्धि पूर्ण भर्स्ट हो गयी थी

वो जल्दी से अपने बिस्तर क नीचे से एक काजल की पुड़िया निकल क उसे सत्यम की तरफ बढ़ाते हुए

"ये बहुत ताक़तवर नींद की जड़ी बूटी है, इसको जरा सा चुटकी भर भी पानी या किसी चीज़ मैं मिला क किसी को दे दो तोह वो ऐसे सोयेगा की बड़े बड़े भूकंप क झटके भी उसे जगा नहीं पाएंगे.. पर इसका असर सिर्फ 4 जानते hi रहेगा"

सत्यम उस पुड़िया को लपक लेता है और दारू की बोतल बांकेलाल की तरफ बड़ा देता है

"याद रहे की.."

बांकेलाल- (बीच मैं hi सत्यम की बात काटते हुए) है.. है.. ये बात सिर्फ हम तीनो क बीच hi रहेगी

सत्यम उस पुड़िया को अपनी जेब मैं रखता है और मुस्कुरा क सोनू को वह से चलने का इशारा कर देता है

जल्दी hi दोनों वह से काफी दूर निकल आये थे

सोनू- सत्यम भैया.. ये सही तोह है न, मुझे दर लग रहा है

सत्यम- मालती चची चाहिए की नहीं ?

सोनू जल्दी जल्दी है मैं सर हिलता है

सत्यम- (मुस्कुराते हुए) तोह जैसा मैं कहता हु, करता जा.. फिर देखना वो दिन दूर नहीं जब हम दोनों मिलकर मालती चची की छूट और गांड मैं अपना लुंड एक साथ डालेंगे

करीब 2 जानते बाद घर क आँगन मैं पूरा परिवार जमा हुआ था.. सभी बहुत खुस थे जिसकी वजह उनके साथ hi बैठा हुआ मोनू था

महेंद्र- आखिर इतने दिनों बाद त्यागी जी की म्हणत और उनकी जड़ी बूटी ने हमारे मोनू को ठीक कर hi दिया

महेंद्र की बात पे भानु को चोर क सभी त्यागी जी का गुणगान करने से खुद को रोक नहीं पाते.. ककी भानु क अलवाल किसी को भी सत्य का ज्ञान नहीं था

पूरा परिवार मिलकर ऐसे hi अगले 10-15 मं तक बातें करते रहता है की तभी मालती कहती है

"आज पता नहीं इतनी नींद क्यू आ रही है ?"

सत्तू- (जो पास hi एक चारपाई पे बैठा हुआ था) सही कहा चची.. मुझे भी आज अभी से नींद आ रही है

महेंद्र अपने हाथ की गाड़ी को देखते हुए

"रात क 11 तोह बज hi रहे है.. कल काफी काम है, चलो सभी लोग सोने की तैयारी करो"

सविता- सही कहा आपने, पर अब हमे जल्दी hi बाकि कमरे खोलने होंगे और उनकी साफ़ सफाई करनी होगी.. ऐसे सब लोग यहाँ वह कब तक सोयेंगे

महेंद्र- सही कहा तुमने.. अब तक मोनू की सेहत को लेके हम इतना परेशां थे की किसी को भी अपने आराम की तनिक भी परवा नहीं था, पर अब एसपी धियान देना जरुरी है

महेंद्र- (कुंदन की तरफ देखते हुए) तोह दिल्ली जाने का किया है ?

कुंदन- कल रात की ट्रैन है.. पर हम दोनों क जाने क बाद इतने सारे काम.. ?

महेंद्र कुछ सोचने क बाद

"तुम दोनों उसकी परवा मत करो, चक्की का काम वीरू और सत्तू संभल लेंगे

रही बात खेतों की तोह.. भानु क खेतों की जिम्मेदारी मैं खुद लूंगा, और मेरे खेत सत्यम और सोनू की जिम्मेदारी होंगे

Tum(Kundan) और भानु सिर्फ जल्दी से दिल्ली जेक मोनू क सभी जरुरी टेस्ट करवाओ.. ताकि आगे भविष्य मैं कोई परेशानी न हो

पर साथ hi साथ दोनों अपना ख्याल भी रखना, ककी खतरा अभी टाला नहीं है"

इस बार भानु बोलता है

"तभी तोह मैं कुंदन भैया को अकेले नहीं जाने दे रहा हु.. खुद भी उनके साथ जा रहा हु"

भानु की बात सुनकर सबसे ज्यादा ख़ुशी शीला को होती है, की उसका पति इस परिवार क बारे मैं कितना सोचता है

वही भानु मन hi मन

"अभी मैं इस सपोले को अकेला नहीं चोर सकता हु, कही ऐसे सब याद आ गया और इसकी वजह से मेरा खेल बिगड़ गया तोह...

नहीं नहीं.. अभी एसपी नज़र रखना बहुत जरुरी है, और अगर जरुरत पड़ी तोह दिल्ली क किसी समसान मैं hi ऐसे ज़िंदा गाड़ दूंगा"

सन 🖼️ #04

रात क करीब 2 बजे.. मालती की चारपाई क पास

"सत्यम भैया पक्का न.. चची नहीं उठेंगी"

सत्यम- तू दर मत, जो मन चाहे कर.. बस चुदाई हम तभी करेंगे जब ये पुरे होश मैं होगी

सोनू छप्पर क नीचे पड़ी चारपाई पे सोते हुए सत्तू को देख क

"और सत्तू भैया.. ?"

सत्यम- तू सोचता बहुत है.. अरे वो नींद की दवा मालती चची क साथ साथ सत्तू भैया को भी दी है, इसलिए ज्यादा सोच मत और जुट जा

सत्यम ये कहते हुए खुद hi आगे बढ़कर मालती क जिस्म पे पड़ी उस भरी रज़ाई को खेच लेता है.. जिससे साड़ी मैं कैद मालती का हुस्न खिल उठता है

सत्यम इतने पे hi नहीं रुकता.. वो झुकता है और मालती की साड़ी को उठाना सुरु कर देता है

ी, और तब तक उठता है जब तक मालती की लाला रंग की पेंटी नज़र नहीं आने लगती

वही सोनू ने बिना किसी विलम्ब क अपने लुंड को आज़ाद कर दिया था और इस समय वो मालती क खूबसूरत चेहरे क ऊपर अपने लुंड लाते हुए मुस्कुरा क कहता है

"आज तोह चची का चेहरा अपने गाड़े वीर्य से धक् दूंगा"

कंटिन्यू...
 




बड़ी माँ 'सविता' इस रेडी... 😉
 
अपडेट #15



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मालती- (स्नेह भरे स्वर मैं) भाभी मुझे ये तोह नहीं पता उस दिन त्यागी जी और आपने किया करा.. पर उसके कारन मेरा बचा ठीक हो गया, मैं अपना जीवन देके भी इसका एहसान नहीं उतर पाऊँगी"

सविता- पागल है किया.. इसमें एहसान कैसा, मोनू मेरा बचा नहीं है किया.. है बोल ?

मालती की आँखों मैं आंसू भर आये थे.. इसलिए वो बस है मैं सर हिला क रह जाती है

वही सविता रसोई मैं आके गिलास रखते हुए 3 दिन पहले जंगल क पास जो हुआ उस बारे मैं सोचने लगती है

मानो जैसे सब कुछ उसकी आँखों क आगे चलने लगा हो..

****

जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक चटाई बिछी हुई थी जिसपे मोनू बेहोशी की हालत मैं लेता हुआ था और उसके समीप hi त्यागी और सविता खड़े थे.. बाकि सभी लोग वह से करीब 500 मीटर दूर एक छोटी सी पुलिया क पास खड़े थे

असल मैं हर कोई वह आना च रहा था इसलिए त्यागी ने की कहा था की वो सब आ सकते है पर काम से काम 500म उनसे दूर रहना होगा ताकि उस दुवे का गलत प्रभार उन सभी पे न पड़े

इधर उस पुराने खादर जैसी जगह पे कड़ी सविता पहले मोनू और फिर त्यागी की तरफ देखते हुए

"तोह अब.."

त्यागी अपने झोले से एक बोतल निकलता है जिसमें सरसो जैसा कोई टेल भरा हुआ था.. उस बोतल को हाथ मैं लेते हुए

"कपडे उतरो भौजाई.."

सविता जब ये सुनती है तोह उसका पूरा जिस्म सनसनाहट से भर पड़ता है.. वही उसकी हालत देख क त्यागी सोचने लगता है कैसे कितनी म्हणत से उसके ये सब रचा है, वो उस पल क बारे मैं सोचने लगता है जब उसने इस बारे मैं अपने सद्यन्त्र अनुसार सविता को बताया था..

"भौजाई.. मोनू को जल्दी से होश मैं लाने क लिए मेरी जड़ी बूटी क साथ साथ उसे बहुत सी शारीरिक गर्मी की आवश्यकता है.. और ये काम सिर्फ एक औरत कर सकती है अपने जिस्म से.. आप समझ रही है न"

"जंगल क पास आग जलनि जरुरी थी ?"

सविता की इस बात ने त्यागी को उसकी सोच से बहार ला दिया था, वैसे भी सब कुछ उसके सोचे अनुशार hi हो रहा था

त्यागी उन तीनो से थोड़ी hi दूर पे जल रही आग को देखते हुए मन hi मन सोचता है

'ये आग तोह बस एक नाटक है.. ताकि तुम्हारे परिवार का कोई भी व्यक्ति यहाँ न आये'

पर अपनी सोच से बहार आते हु

"आप फर्क न करो भौजाई.. जल्दी hi आग ठंडी हो जाएगी"

त्यागी बात तोह उस जलती हुई आग की कर रहा था.. पर देख सविता क गदराये यौवन को रहा था

असल त्यागी ने सभी को ये कहा था की उपचार वाली जगह पे वो एक घास जड़ी बूटी से आग जलाएगा जिससे निकलने वाला धुआँ उन तीनो क अलावा बाकियों को नुकसान पहुंचा सकता है

त्यागी पक्का करना चाहता था की कोई भी उस जगह न आये.. ताकि वो अपने खेल को सुचारु रूप से आगे बड़ा सके

इस समय उस जगह पे त्यागी, सविता और उस चटाई पे बेहोशी की हालत मैं लेता हुआ मोनू था

वैसे इस जगह की बात करू तोह ये जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक पुराण मंदिर हुआ करता था जहा अब सिर्फ खंडहर बचे है..

इधर उस पुराने खादर जैसी जगह पे कड़ी सविता पहले मोनू और फिर त्यागी की तरफ देखते हुए एक लम्बी सी सांस भर्ती है और अपनी बात पे पुनः आते हुए कहती है

"तोह अब.."

त्यागी आने झोले से एक बोतल निकलता है जिसमें सरसो जैसा कोई टेल भरा हुआ था.. उस बोतल को हाथ मैं लेते हुए

"कपडे उतरो भौजाई.."

सविता को वैसे तोह पता hi था की यहाँ जंगल क इतने पास किया होगा

पर यु अचानक से अपने पति क उम्र क आदमी और जिन्हे वो भाईसाहब कहती थी उनके मुख से ऐसा कुछ सुनकर एक पल क लिए तोह उसका जिस्म झुरझुरी सी खा hi जाता है पर इससे पहले की वो कुछ बोल पाती उसे सामने हरी हरी घास पे बिछी चटाई पे बेसुध बेहोश पड़ा मोनू नजर आता है और उसके सब्द बहार नहीं आ पते

औरत को समझना कितना मुश्किल है.. कभी गाओं चोर्ने क लिए तैयार सविता कुछ भी करने को तैयार थी, वही अब अपनी देवरानी क बेटे को बचने लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार है

सविता त्यागी जी को देख क थोड़ा शरमाते हुए अपने पल्लू को अपने उन्नत और मोठे मोठे दूध से धीरे से सरकारें हुए अपनी नज़रों को नीचे करके कहती है

"भाईसाहब आप उधर देखिये न"

त्यागी- (मानो जैसे बहुत hi गंभीर बनने की पूरी करते हुए) अरे भौजाई जी यहाँ हम दोनों क अल्वा कोई नहीं है.. और यहाँ जो भी होना है सब कुछ मोनू की भलाई क लिए है, इसलिए आप ज्यादा न सोचिये और मोनू की भलाई क लिए नंगी हो जाइए

सविता यु नंगी होने की बात सुनकर उसका जिस्म फिर से झुरझुरी सी खा जाता है पर उसे पता था की आज त्यागी जी सबकुछ देख hi लेंगे तोह किया फायदा और ज्यादा शर्म दिखने की

वैसे सविता जैसी तेज़ तर्रार औरत भी यु किसी पराये मर्द क आगे नंगी होने से दर रही थी.. यानि लज्जा तोह अब भी बाकि थी उसमें

सविता अपनी साड़ी को धीरे धीरे अपने जिस्म से अलग करने लगती है.. जैसे जैसे उसकी साड़ी उसकी कमर क चारो और घूमते हुए उसके जिस्म का साथ चोर रही थी.. ठीक वैसे वैसे hi त्यागी की धोती मैं नया सा उभर बनने लगा था

सविता शरमाते हुए अपनी नज़रों को हल्का से उठा क देखती है की त्यागी जी किया कर रहे है.. वैसे उसे लग रहा था की जरूर वो अब तक वो अपनी नज़रों को फेयर चुके होंगे, आखिर वो उनके सबसे अचे दोस्त की धर्मपत्नी जो है

पर जब वो त्यागी की नज़रों और उनका खुला मुंह देखती है तोह उसके जिस्म मैं ऐसी इस्तिथि मैं भी कामुकता की लहर सी दौड़ जाती है

ककी सविता पाती है की त्यागी जी एकटुक बस उसकी खुलती हुई साड़ी और उसके नंगे होते जिस्म को hi घूरे जा रहे थे

सविता को अपने hi दिल की धड़कन सुनाई पड़ने लगती है उसकी साँसें भी कुछ भरी हो गयी थी.. सविता जैसी तेज़ औरत भी यु किसी क आगे धीरे धीरे निर्वस्त्र होती हुई आज शर्मा रही थी

वही त्यागी जी एकटुक बस सविता क अर्धनग्न सरीर को घूरे जा रहे थे

मोनू की बड़ी माँ तुरंत hi अपनी नज़रों को नीचे करने की कोशिश करती है पर तभी उसकी नज़रों को कुछ ऐसा नज़र आ जाता है की उसके पैरो क बीच एक साथ मानो हज़ारों चीटिया रेंगने लगी हो

सविता एक पल क लिए तोह भूल hi जाती है की वो अपनी साड़ी को अपने जिस्म से अलग कर रही है.. ककी उसकी नज़रें तोह त्यागी जी की धोती मैं उठे उस विशाल तम्बू पे अटक चुकी थी जो धीरे धीरे सांस लेते हुए हिलोरे मार रहा था

ऐसा लग रहा था जैसे त्यागी जी ने अपनी धोती मैं कोई अजगर पाल रखा हो जो बहार आने क लिए फुफकार रहा है

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सविता मन hi मन

'ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... मायआ.... ये.. तोह... ये कुछ ज्यादा बड़ा नहीं है... पर त्यागी जी तोह सामाजिक मोह माया से दूर रहने वाले आदमी है.. फिर इनका इतना बड़ा...'

सविता की सोच कुछ और आगे बाद सकती की उससे पहले hi त्यागी जी उसे टोक देते है

"किया हुआ भौजाई.. रुक क्यू गयी, हमारे पास समय नहीं है"

सविता जल्दी से उस फुफकारते अजगर से अपनी नज़रों को हटते हुए

"जी.. जी भाईसाहब"

और अगले hi पल उसकी साड़ी उसकी कमर से निकल क जमीन की हरी हरी घास का चुम्बन ले रही थी

सविता को एक पल क लिए ऐसा लगा जैसे उसने अभी अभी त्यागी जी की एक कामुक ाःह सुनी हो पर वो इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर जाती है ककी सच मैं समय की काफी कमी थी

सविता- इतना काफी है.. या ?

सविता इस समय ब्लाउज और पेटीकोट मैं रह गयी थी.. उसके साँसे जोरो से चल रही थी जिस कारन उसके उन्नत बड़े बड़े उरोज जिन्हे एक साथ हाथों मैं भी जकड़ा नहीं जा सकता वो धीरे धीरे ऊपर नीचे होते हुए त्यागी जी क तम्बू को और ज्यादा ललकार रहे थे

त्यागी- भौजाई जी आप तोह जानती है

त्यागी अपने हाथ मैं थमी उस टेल की सीसी को दिखते हुए

"मोनू को आपके सरीर की गर्मी की जरुरत है.. और इस खास टेल की मालिश से आपकी गर्मी उतनी बाद जाएगी जितनी की जरूर है.. इसलिए आपको पूर्ण निवस्त्र होना hi पड़ेगा"

सविता इस बार और कोई सवाल नहीं करती बस अपनी जोरो से चलती साँसों को सँभालते हुए है मैं सर हिला क अपने दोनों हाथों को अपने ब्लाउज पे रख क उसके हक़ को खोलना सुरु कर देती है

ककी उसके मन मैं अब एक बात तय हो चुकी थी

'सविता.. आज तोह तुझे नंगा होना hi पड़ेगा'

जल्दी hi सविता का ब्लाउज धीरे से उसके सरीर को चोरते हुए नीचे गिरने लगता है जिसे सविता पकड़ने की कोशिश तक नहीं करती, पर सायद त्यागी जी ऐसी क इन्तिज़ार मैं थे ककी जैसे hi ब्लाउज जिस्म को आज़ाद करते हुए अलग होता है उन्होंने लपक क उसे बीच मैं hi पकड़ लिया था

सविता एक पल क लिए त्यागी जी को देखती है जिसपे वो धीरे से जवाब देते है

"वो.. मैंने सोचा ऐसा गन्दा हो जायेगा"

सविता बस है मैं सर हिला क अपने जिस्म क ऊपरी हिस्से मैं बची ब्रा क पीछे क हक़ को खोलने क लिए अपने दोनों हाथों को पीछे ले जाती है.. पर उसकी किस्मत ऐसी की हक़ काफी कोशिश करने क बाद भी नहीं खुल रहा था

सविता शरमाते हुए त्यागी जी को देखती है तोह उसकी साँसों मैं गर्माहट भर्ती चली जाती है ककी वो देखती है की त्यागी जी उसके ब्लाउज की खुसबू को अपनी साँसों मैं भर रहे है.. ये देखते हुए सविता क बड़े बड़े खरबूजे जैसे दूध ऐसे उछाल मरने लगते है मानो कभी भी उस ब्रा को पहाड़ क रख देंगे

सविता धीरे से

"भाईसाहब.. वो हक़ नहीं खुल रहा"

त्यागी मानो होश मैं आता है, वैसे उसकी ऐसी हालत की जिम्मेदार भी सविता hi था

न जाने वो कबसे सविता को फिर से ऐसी हालत मैं देखने क सपने देखता आया था और आज उसका सपना सच हो रहा था

त्यागी जल्दी hi ब्लाउज को जमीन पे ऐसे फेक देता है, मानो वो उसके साथ कुछ कर रहा हो

"मैं.. मैं खोल देता हु"

सविता बिना कोई जवाब दिए धीरे से घूम जाती है.. जहा अब उसकी लगभग नंगी हो चुकी पीट त्यागी की हवस भरी नज़रों क आगे थी

त्यागी अपना एक हाथ आगे बड़ा क हक़ क पास सत्तू की माँ की नंगी पीठ पे रख देता है

सविता- (सविता क पुरे जिस्म मैं मानो एक अलग तरंग hi उठ जाती है) aaaaaaaaaaahhhhhhh...

त्यागी मन hi मन

'साली का अभी से ये हाल है, असली खेल तोह अभी बाकी है'

वो और कोई हरकत न करते हुए धीरे से सविता की ब्रा का हक़ खोल देता है जिससे अगले hi पल उसकी ब्रा नीचे गिरती जाती है और पुराने खँडहर जैसी जगह पे सविता की भरी भरकम जवानी को नंगा कर देती है

सविता धीरे से त्यागी जी की तरफ घूमती है पर उसने अपनी बड़ी बड़ी खरबूजे सामान चूचियों पे दोनों हाथ रखे हुए थे.. वैसे उनकी चूचियों का आकर इतना बड़ा था की उसे छुपाने क लिए काम से काम 2 लोगो की जरुरत तोह पड़ेगी hi

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त्यागी तोह जैसे किसी नवयुवक की भांति अपनी आँखों को चौड़ा करते हुए बस ऊपर से नंगी हो चुकी सविता को घूरता hi रह जाता है

"आआआआहहह... किया किस्मत है महेंद्र भाई की"

त्यागी को आज एक बार फिर से अपने दोस्त की किस्मत से जलन हो गयी थी.. भले hi वो दोस्ती उसने सिर्फ अपने मतलब क लिए की हो

त्यागी खुद को रोक नहीं पाटा और अपने दूसरे खली हाथ को अपनी धोती पे रख क अपने अजगर को पकड़ क ऐसे मसल देता है की पहले से hi झुकी हुई सविता की नज़रों को इस बार उस फुफकारते हुए सांप का पूरा आकर नज़र आ जाता है

'बाआआपपप... रईईईई.... ये.. ये कुछ ज्यादा... बड़ा......'

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पर तभी सविता की सोच को तोड़ते हुए अपनी उखड़ती हुई आवाज़ मैं

"भौजाई जल्दी करो.. मोनू क पास समय काम है"

सविता अपनी सोच से बहार लौट आती है और धीरे से अपनी बड़ी बड़ी मोती मोती दुधारू पशुओं जैसी चुकी को एक पराये मर्द क आगे नंगी करते हुए अपने हाथों को हटा देती है

त्यागी की धोती मैं छुपा उसका लुंड ऐसे उछाल पड़ता है मानो बस धोती पहाड़ क बहार आ जायेगा

सविता अब अपने जिस्म पे बचे हुए पेटीकोट की घंट पे अपने दोनों हाथों को रखती है और धीरे से उसे खोल देती है.. जिससे बिना किसी विलम्ब क उसका पेटीकोट धीरे धीरे सरकते हुए नीचे जाने लगता है

सविता ने आज पेंटी नहीं पहनी थी, यानि जैसे जैसे उसका पेटीकोट सरकते हुए नीचे जा रहा था वैसे वैसे उसका पूर्ण नंगा होता सरीर त्यागी जी नज़रों क सामने आता जा रहा था

त्यागी जी को सबसे पहले पेटीकोट क सरकने क कारन हलकी हलकी काली घास नज़र आती है और जब पेटीकोट और नीचे सरकता है तोह उनके उस काली घास क साथ साथ महेंद्र की पत्नी की हलकी झाटों से भरी योनि क पूर्ण दर्शन मिलते है

त्यागी का लुंड तन हुआ और मुंह खुला का खुला रह जाता है, सविता अपनी नज़रों को ऊपर करती है और उन्हें यु अपने नंगे जिस्म को निहारते हुए देख क उसकी योनि भी गीली होने लगती है

सविता- (धीरे से) अब भाईसाहब.. ?

त्यागी को जैसे होश आता है, वो अपनी हाथ मैं पकड़ी हुई सीसी दिखते हुए

"इस खास टेल से आपकी मालिश होगी"

सविता का पूर्ण जिस्म काँप सा पड़ता है.. हैरानी की बात ये भी थी की पहले से पता था की यहाँ किया होना है पर फिर भी उसका जिस्म कामुकता की अधिकता को बर्दाश्त नहीं कर प् रहा था

सविता अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए

"लाइए.. दीजिये"

त्यागी जी- नहीं भौजाई.. ये टेल बहुत म्हणत से खास जड़ी बूटियों से निर्मित है और सिर्फ इतना hi है

सविता सवाल भरी नज़रों से उन्हें देखते हुए

"मैं समझी नहीं ?"

त्यागी एक कदम आगे बढ़ता है जिससे अब उसके और महेंद्र की नंगी पत्नी क बीच का अंतर और काम हो जाता है

"मतलब की हमे इतने से टेल से hi काम निकलना है.. इसलिए ये मुझे hi आपके सरीर पे लगाना होगा ताकि ये व्यर्थ न जाये"

सविता का जिस्म कामुकता क मरे झुरझुरी सी खा जाता है

"किया आप.. मतलब.. की.."

त्यागी जी- देखो भौजाई.. समय बहुत काम है, हम और नस्ट नहीं कर सकते

त्यागी ने जान का मोनू की हालत की बात करि ताकि सविता क पास सोचने का समय न रहे.. ममता से भरी हुई सविता क पास अब सच मैं कुछ भी नहीं बचा था कहने क लिए इसलिए वो धीरे से अपना सर है मैं हिला देती है

त्यागी- घूम जाओ भौजाई

सविता बिना सवाल किये एक बार बेहोश पड़े मोनू को देखती है और फिर धीरे से अपनी नंगी पीठ और नंगी गांड को त्यागी जी की तरफ करते हुए घूम जाती है

सविता लम्बी लम्बी साँसें लेते हुए त्यागी जी क अगले कदम का इंतज़ार करने लगती है.. जहा अचानक से उसे अपनी गांड की दरार पे कोई चीज़ चुभती हुई सी महसूस होती है

सविता का जिस्म कंपकपी सी खा जाता है पर इससे पहले की वो कुछ बोल पाती उसकी पीट पे त्यागी जी का खुरदुरा हाथ आता है और वो उसकी पीट पे अपना हाथ रगड़ना सुरु कर देते है

सविता महसूस करती है की उनके हाथ मैं टेल लगा हुआ है जिसे वो उसकी पूरी पीट पे चलते हुए लगा रहे थे.. बल्कि देखा जाये तोह वो टेल काम लगा रहे थे उसकी नंगी पीट को रगड़ ज्यादा रहे थे

अब एक पूर्ण नंगी स्त्री की पीट पे कोई पराया मर्द यु अपना मरदाना हाथ चलाएगा तोह किया उसकी योनि से रास नहीं टपकेगा.. ?

सविता बड़ी मुश्किल से अपनी साँसों को रोकने की कोशिश कर रही थी.. पर जिस प्रकार से त्यागी जी उसकी पीट पे अपना मरदाना हाथ घुमा रहे थे उसके कारन उसके निप्पल्स तन चुके थे, और एसपी सविता का कोई काबू नहीं था

सविता की हलके बालों से भरी योनि भी पूर्ण गीली हो चुकी थी और उसमें से हल्का हल्का कॉमर्स बहार आने लगा था

तभी त्यागी जी अपना हाथ सविता क कंधे तक लाते हुए उसके गांधी पे टेल की मालिश सी करते हुए

"ये निशान कैसे है भौजाई.. ?"

सविता पूरी ताक़त से अपनी आँखों को बंद किये हुए थे ताकि अपनी बढ़ती कामुकता पे काबू रख सके.. पर त्यागी जी सायद ऐसा करने नहीं देना चाहता था

सविता मन hi मन

'ऐसा क्यू लग रहा है.. की त्यागी भाईसाहब आज इस मोके का फायदा उठा रहे है.. ेस्स्स्सह्ह्ह्ह...'

वही त्यागी जैसा मर्द जिसने अपनी पूरी ज़िन्दगी कामुकता को समझने और उसके लिए जड़ी बूटियां बनाने मैं hi बिता दी वो सविता की हालत को भली भांति समझ रहा था और मंद मंद मुस्कुरा भी रहा था

"बताइए न भौजाई.. ये कंधे पे निशान कैसे है"

सविता न चाहते हुए भी धीरे से अपना एक हाथ अपनी योनि पे रख क उसे जोरो से मसल देती है और फिर त्यागी जी को जवाब देती है

"वो.. ब्रा की वजह से बन गए है"

त्यागी जी एक पल क लिए रुकते है, और फिर वापस से और ज्यादा चिपक से जाते है.. जिससे सविता को अपनी नंगी गांड की दरार मैं कुछ बहुत मोटा अंदर घुसता हुआ सा महसूस होता है.. ऐसा लगता है जैसे कोई मोटा काला अजगर धीरे धीरे उसकी गांड की दरार को खोलते हुए किसी बिल मैं घुसने की कोशिश कर रहा हो

वो कितनी मुश्किल से अपनी आअह्ह्ह्ह रोक पायी थी बेचारी वही जानती है

त्यागी जी ने आप दोनों हाथों से सविता क गले और कंधे पे टेल की मालिश करते हुए

"किया ब्रा की वजह से.. यानि आप अछि वाली ब्रा नहीं पहनती है, कोई नहीं मैं आपके लिए खास मुलायम वाली ला दूंगा

आखिर अपनी भौजाई क लिए इतना तोह कर hi सकता हु"

त्यागी जी ने ये सविता क बिलकुल कान क पास आके कहा था जिससे उनकी गरम साँसे सविता क गले और गांधी पे महसूस होती है और वो काँप सी जाती है

और बेचारी एक बार फिर से अपनी गडेरी से अपनी योनि को ऐसे मसल और रगड़ देती है.. मानो किसी कीड़े को पीस क मार रही हो

सविता- आआआअह्ह्ह्हह... जी... जी... त्यागी जी... लाआआ... दीजियेगा

सविता की बिगड़ती हुई हालत से त्यागी समझ चूका था की खेल उसके हिसाब से hi आगे बाद रहा है

त्यागी हल्का सा पीछे होता है तोह उसका धोती क ऊपर से hi सत्यम की माँ की गांड की दरार मैं घुसा हुआ लुंड धीरे से बहार निकल आता है और फिर वो अपने कुर्ते क जेब से टेल की सीसी निकल क थोड़ा और टेल अपने हाथों पे लगते हुए

"घूम जाओ भौजाई.. अब आगे लगाना है"

सविता का जिस्म कंपकपी सी खा जाता है.. ये कामुकता की बढ़ती हुई लहर की वजह से हुआ था

सविता उसी प्रकार अपनी नंगी पीठ और गांड त्यागी जी की तरफ किये हुए

"किया आगे... ?"

त्यागी- (मुस्कुराते हुए) मोनू को असली गर्मी तोह आगे से hi मैगी न भौजाई

सविता जैसे hi त्यागी जी की बात का मतलब समझती है वो जोर से अपनी योनि को मुठी मैं दबोच क इतनी जोर से मसल लेती है की उसकी सिसकारी इस बार रुक नहीं पाती

"Aaaaaaaaaaahhhhhhhhh................ Maaaaaaaaaaaaaa"

कुछ पलों क अंतराल क बाद सविता धीरे से त्यागी जी की तरफ घूम जाती है.. जहा उसकी बड़ी बड़ी खरबूजे सामान चूचिया पूरी तरह नंगी थी पर उसने योनि पे उसका हाथ रखा हुआ था

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त्यागी जी मन hi मन

'साले महेंद्र आके देख तेरी बीवी को नंगा कर दिया है इस त्यागी ने'

फिर त्यागी अपनी मनोदशा को छुपाते हुए

"भौजाई अब लज़्ज़ा का समय नहीं है.."

इतना कहते हुए वो वापस से अपने कुर्ते की जेब से उस सीसी को निकलता है जो अब तक आधी खली हो चुकी थी.. उसमें से टेल लेके अपने दोनों हाथों पे अचे से मलने क बाद सविता क इतने नज़दीक आ जाता है की उसे उसके दिल की जोरो से चलती हुई धड़कन और उसके लम्बी लम्बी साँसें की रफ़्तार तक महसूस होने लगी थी

त्यागी अपने दोनों हाथों को मालती की जेठानी.. की बड़ी बड़ी नंगी चूचियों क ऊपर लाते हुए

"मैं...."

त्यागी को और कुछ बोलने की जरुरत नहीं थी, ककी वो किया चाहता था ये बात तोह सविता जानती hi थी.. इसलिए वो धीरे से अपनी गहराई होती साँसों को सँभालते हुए अपनी हलके और छोटे बालों से भरी योनि से अपना हाथ हटते हुए अपना सर है मैं हिला देती है

त्यागी का हाल ऐसा हो जाता है की उसका दिल करने लगता है की वो ख़ुशी से नाचना सुरु कर दे.. पर वो अपने हाव भाव को बड़ी hi चतुरता से छुपा ले जाता है

त्यागी अपने दोनों हाथों को सविता की बड़ी बड़ी खरबूजे सामान चूचियों पे रखते हुए.. उनके तने हुए निप्पल्स को धीरे से अपनी गडेरी से दबा देता है

सविता- aaaaaaaaaahhhhh.... Esssshhhhhhhhhhhh.. त्यागी जी....

अपने जिस्म पे किसी पराये मर्द का स्पर्श पाते hi सविता जैसी तेज़ औरत की भी सिसकारी फुट पड़ती है

वही त्यागी मन hi मन हस्ते हुए अपने दोनों हाथों की पकड़ उन बड़ी बड़ी दुधारू चूचियों पे बनाते हुए मालिश करने से पहले hi उन्हें कसके दबा देता है

सविता- (चूचियों क मर्दन से सविता का जिस्म अकड़ सा जाता है) आआआअह्हह्ह्ह्ह... भाईसाहब ये किया कर रहे है

त्यागी अपनी पकड़ को काम करते हुए

"वो.. माफ़ करना भौजाई, आप जैसी खूबसूरत औरत की चूचियों पे किसी मर्द का हाथ हो और अगर वो उसे दबाये नहीं तोह पक्का वो कोई नामर्द hi होगा"

अब भला सविता किया hi जवाब देती.. इस बात का

त्यागी अब अपना काम सुरु कर देता है.. वो दोनों हाथ को मजबूती से सविता की बड़ी बड़ी चूचियों पे चलते हुए उनकी अचे से मालिश कर रहे थे.. बल्कि मालिश तोह नाम की था असल तोह वो उन्हें बेहरहमी से मसले जा रहा था

सविता मन hi मन

'आआअह्ह्ह... त्यागी जी तोह ज्यादा hi जोर जोर से दबा दे रहे है मेरी चूचियों को... Esssshhhhhhhhhhhh... उफ्फ्फफ्फ्फ़ ये कैसी मालिश है.... आआआह्ह्ह्ह.. और मुझे इतनी गर्मी क्यू महसूस हो रही है, इतने ठन्डे मौसम मैं यु नंगी कड़ी हो फिर इतनी ज्यादा गर्मी क्यू लग रही है

ऐसा लग रहा है जैसे धीरे धीरे मेरे जिस्म मैं गर्मी का पारा बाद सा रहा हो'

वही त्यागी अब सविता की दोनों चूचियों को चोर क उसकी चूचियों क बीच की गहरी घाटी पे अपनी उँगलियों को चलते हुए वह भी अचे की मालिश करने का काम करने लगता है

त्यागी मन hi मन हस्ते हुए

'जल्दी hi खास जड़ी बूटियों से बने इस खास टेल की वजह से सविता क जिस्म मैं ऐसी आग लगने लगेगी की.. की ये उसे भुजने क लिए रस्ते पे चलते हुए कुत्ते तक से छोड़ने को तैयार हो जाएगी'

पर त्यागी ये नहीं जनता था की उसके टेल ने काम करना सुरु कर दिया है.. ककी सविता का हाल ऐसा होता जा रहा था की उसका बस चलता तोह एक साथ अपनी 4 उँगलियों को अपनी योनि मैं घुसा लेती

सविता

'आआआह्ह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़... पता नहीं किया हो रहा है, मुझे इतनी ज्यादा गर्मी क्यू लग रही है.. उफ्फ्फ्फ़ ऐसा लग रहा है जैसे मैं जल क भस्म हो जाउंगी इस आग मैं'

कंटिन्यू.. 👇
 
त्यागी महसूस करता है की सविता अपने जिस्म को धीरे धीरे हिलाते हुए हल्का सा आगे करने लगी थी, सायद वो त्यागी क हाथों की मजबूती हो और अचे से महसूस करना च रही थी



त्यागी मन hi मन

'लगता है मेरा जड़ी बूटियों वाला टेल अपना कमल दिखा रहा है'

त्यागी अपने खेल को आगे बढ़ाने क लिए अपना हाथ नीचे की तरफ खिसकना सुरु कर देता है, और जल्दी hi उसके एक हाथ की बीच वाली ऊँगली सत्यम की माँ की गहरी नाभि क अंदर चलना सुरु हो जाती है

वही सविता अपनी नाभि मैं त्यागी की मोती ऊँगली पाके अपना आप कोने लगती है, वो खुद hi अपने होंठों को काटना सुरु कर देती है.. और उसकी योनि भर भर क कामर्स टपकने लगती है जो उसकी मांसल जाँघों तक बेहटा हुआ आ रहा था

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सविता- aaaaaaaaaahhhhh.... और कितनी दिएर मालिश होनी है.. आआआहहहहह.... Esssshhhhhhhhhhhh

त्यागी एक एक पल का भरपूर आनंद लेते हुए, ककी वो जनता था की ऐसा पल बार बार नहीं आता

त्यागी जी- असली जगह की मालिश हो जाये.. फिर आप मोनू को गर्मी देना सुरु कर सकती है

सविता- असली जगह... Aaaaahhhhhhhhhhhhhhh..... भइईईई साहबबबबबबब... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

सविता अपना सवाल भी पूरा नहीं कर पायी थी की त्यागी ने बिना किसी विलम्ब क अपना हाथ नीचे खिसकते हुए सीधा महेंद्र की पत्नी की योनि पे रख दिया और इससे पहले की सविता कुछ और सोच या बोल पाती

त्यागी ने तुरंत hi अपनी बीच वाली ऊँगली जो टेल मैं सनी हुई थी उसे उस गीली रास टपकती योनि मैं उतर दिया

सविता- (मानो जैसे अचानक हुए इस हमले से अपने पंजो पे कड़ी हो गयी हो) आआआअह्हह्ह्ह्हह.... त्यागी..... जी.... निकालिये... ये कहा ऊँगली दाल दी

वही त्यागी एक और कदम पास आते हुए अपनी ऊँगली को और ज्यादा अंदर तक घुसते हुए

"सरीर का कोई भी हिस्सा चोर नहीं सकता, हर जगह की मालिश होनी जरुरी है भौजाई"

त्यागी ये बोलते हुए अपनी ऊँगली को हल्का सा बहार खींचता है और उसी प्रकार कड़ी अपनी योनि मैं अपने पति क दोस्त की ऊँगली लिए हुए सविता की योनि मैं वापस से और ज्यादा अंदर तक उतर देता है

सविता- aaaaaaaaaaaahhhh.... माआआआ....... Dhirereeeeeeeeeeeee...... भईईई साहबबबबब... आआअह्ह्ह

पर ऐसा मौका कोनसा मर्द चोर सकता है जो त्यागी आज चोरता, वो जोर जोर से अपनी ऊँगली को अंदर बहार करना सुरु कर देता है.. उसकी ऊँगली गपागप गपागप गपागप करके सविता की गीली योनि मैं अंदर बहार होने लगती है

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सविता- आआआआहहहहह... भईई साहबब... आआआह्ह्ह्ह... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.... Dhirereeeeeeeeeeeee... हीी.. माआ

त्यागी- माफ़ करना भौजाई पर किया करू, औरत की गर्मी का मुख्या एस्ट्रोट यही है.. इसलिए इसकी मालिश अचे से होनी जरुरी है

सविता से अब और ज्यादा काबू नहीं होता, उसकी योनि अपना दम तोड़ देती है.. और उसका कॉमर्स बहना सुरु हो जाता है

"Aaaaaaaaaaahhhhhhhh......... Maaaaaaaaaaaaaa"

त्यागी को अपनी अंदर बहार होती ऊँगली पे एक गाड़ा सैलाब सा महसूस होता है तोह वो मंद मंद मुस्कुरा पड़ता है

त्यागी अचानक से अपनी ऊँगली को बहार खींच लेता है.. जिससे सविता का कॉमर्स भर भरा क बहार टपकना सुरु हो जाता है

"अब आप तैयार है"

अपनी योनि से अचानक बहार आयी ऊँगली की वजह से सविता का आनंद अचानक से मानो रुक जा जाता है.. और ऐसा आनंद बीच मैं रुक जाये तोह आप जानते hi है जिस्म की किया हालत होती है.. पर अब भी उसकी योनि से रास का बहना बंद नहीं होता

सविता अपने चेहरे पे चाय हवस क साथ

"अब किया करना है.."

त्यागी- (मुस्कुराते हुए) सबसे पहले मोनू को नंगा करना पड़ेगा

सविता तोह पहले से hi जानती थी की किया होना है.. पर किस तरह होगा ये अब वो धीरे धीरे जान रही थी

जमीन पे बिछी चटाई पे बेहोश पड़े मोनू क जिस्म पे इस समय एक पतली सी बनियान और नीचे एक धोती थी.. ककी इतने समय से बेहोश रहने की वजह से उसके दैनिक निटर क्रिया का धियान और उसके सरीर को गीले कपडे से साफ़ करने मैं ये हलके कपडे बाधा नहीं बनते थे

और ऐसी कारन त्यागी को ज्यादा म्हणत नहीं करनी पड़ी, और कुछ hi दिएर मैं मोनू पूर्ण नंगी अवस्था मैं उस हरी हरी घास पे पड़ा हुआ था.. पर इस समय उसका लुंड पूरी तरह सुप्त अवस्था मैं था

त्यागी जी- (मोनू क लुंड की तरफ इशारा करते हुए) पहले ऐसे जगाना पड़ेगा

सविता सवालिया नज़रों से त्यागी जी को देखते हुए

"पर वो होश में कहा है.. फिर कैसे.. मतलब ?"

त्यागी वापस से अपनी जेब से वही सीसी निकलते है और खुद hi आगे बढ़कर मोनू क लुंड को हाथ से पकड़ क ठीक उसके लुंड क टोपे पे टेल को धीरे धीरे टपकने लगते है.. जिससे वो टेल मोनू क लुंड को पूरी तरह भिगोने लगता है

और जब लुंड पूरी तरह भीग जाता है.. तब वापस सविता क पास आके

"अपने हाथ फैलाओ"

सविता बिना किसी सवाल क अपने दोनों हाथों को उनके आगे फ़ैल देती है.. जिससे त्यागी जी सीसी मैं बचा हुआ ाचा खासा टेल उनके हाथों पे डालते हुए कहते है

"सबसे पहले आपको अचे से मोनू क लुंड की मालिश करनी होगी.. ककी आप जितने अचे से मालिश करेगी उतना hi उसका लुंड किसी लोहे जैसा सख्त होगा, ये भी इस टेल की एक खूबी है"

त्यागी ने लगभग आधी से ज्यादा सीसी खली कर दी थी, और बचे हुए टेल को देखते हुए कहता है

"इतना टेल आगे काम आएगा"

सविता क मन मैं सवाल जरूर आता है.. अब इसके बाद भला और टेल की किया जरुरत पर वो ये बात पूछती नहीं

त्यागी आगे बढ़कर मोनू क पास बैठे हुए एक बार त्यागी जी को देखती है और फिर अपनी नज़रों को झुकाते हुए उसी प्रकार पूर्ण निवस्त्र अवस्था मैं अपने एक हाथ से मोनू क सोये हुए लुंड को पकड़ लेती है

मोनू का लुंड पहले से hi टेल से पूरी तरह भीगा हुआ था.. जिसे सविता को और कुछ सोचने की जरुरत नहीं थी, वो तुरंत hi अपने काम मैं लग जाती है

वो लुंड क अंतिम बिंदु से लेके ऊपर टोपे तक अपनी उँगलियाँ चलना सुरु कर देती है.. और जल्दी hi उसकी म्हणत नज़र आने लगती है ककी लुंड मैं जान आणि सुरु हो चुकी थी

सविता, मोनू क धीरे धीरे खड़े होते लुंड को अपने हाथों क बीच महसूस करती हुई अपने जिस्म मैं गर्मी का पारा बढ़ते हुए भी महसूस कर रही थी

'आआआह्ह्ह्ह... पता नहीं मुझे किया हो गया है, ये इतनी ज्यादा गर्मी क्यू लग रही है.. उफ्फ्फफ्फ्फ़'

सविता ये सोचते हुए जोर जोर से लुंड की मालिश सुरु कर देती है.. वो अपने हाथों क बीच मोनू का लुंड जकड़े हुए ऊपर से नीचे.. और नीचे से ऊपर तक की मालिश कर रही थी और बीच बीच मैं अपना चिरपरिचित अंदाज़ यानि मोनू क लुंड क साथ साथ उसके मोठे मोठे ाँद (बॉल्स) को मुठी मैं भर क उसकी मालिश भी कर दे रही थी

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अभी कुछ hi पल हुए होंगे और सविता को अब अपना दूसरा हाथ भी इस्तिमाल करना पद गया था, ककी मोनू का लुंड अब पूरी औकात मैं आ चूका था.. वही इतनी दिएर से एक हाथ से मालिश करने क कारन उसका वो हाथ भी दर्द करने लगा था

अब सविता एक हाथ से मोनू का वीरकाल लुंड मसल रही थी तोह दूसरे हाथ से उसके ाँद की मालिश कर रही थी

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मोनू का लुंड अब पूरी तरह अकड़ क खड़ा हो जाता है.. पर वो उसी प्रकार लुंड की मालिश करते हुए अपनी नज़रों को ऊपर उठा क त्यागी जी को देखते हुए

"ये हो गया.."

त्यागी जी मन hi मन

'वाह यानि ये टेल लुंड पे भी सही तरह से काम करता है, यानि अगर इस टेल से लुंड की लगातार कई दिनों तक मालिश की जाये तोह ये सच मैं लुंड को पत्थर जैसा मजबूत बना सकता है.. यानि मेरी ये नयी जाती बूटी सही से काम कर गयी'

त्यागी अपनी सोच से बहार आते हुए अपने हाथ मैं पहनी पुराणी सी गाड़ी मैं समय देखने का नाटक करते हुए

"अब ज्यादा समय नहीं है भौजाई.. चढ़ जाओ मोनू क लुंड पे"

सविता यु सीधा सीधा लुंड पे चढ़ने की बात सुनकर बुरी तरह शर्मा सी जाती है पर होना तोह यही था hi.. इसलिए वो बिना किसी सवाल क अपने दोनों पैरों को मोनू क भीमकाय से दिखने वाले सीधा खड़े लुंड क दोनों तरफ अपने पेअर करते हुए अपनी छूट को उसके गरम लुंड क टोपे पे छुवाते हुए अपने दोनों हाथों को मोनू क सीने पे रख क अपना भर सँभालने की कोशिश करती है.. ताकि लुंड को धीरे धीरे अपनी गीली छूट मैं उतर सके

पर वो भूल जाती है की उसके हाथों पे टेल लगा हुआ था.. और वो जैसे hi अपना पूरा भार मोनू क सीने पे डालती है उसका हाथ फिसल जाता है और कामुक दुर्घटना घाट जाती है

हाथ फिसलने की वजह से उसका संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है और जो योनि उसने अपने बेटे सामान भतीजे क लुंड पे टिका रही थी.. वो अचानक से एक hi बार मैं पुरे लुंड को अपने अंदर समाती चली जाती है

और इससे पहले की वो कुछ भी समझ पाती मोनू का वीरकाल और टेल से सना हुआ लुंड एक hi बार मैं योनि की उस गहराई में उतर जाता है जहा तक अचे अचे अपना लुंड घुसाने की बस कामना करते है

पर इस कामुक दुर्घटना क कारन सविता को अपने जिस्म मैं एक तीव्र जलन सी महसूस होती है

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhh.... Maaaaaaaaaa....... Maaaaarrrrrrrrrr..... गयीईईई.... Reeeeeeeeeeeeeeeeeeeee"

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सविता जल्दी से अपनी कमर को उठा क योनि को बहार खींचने की कोशिश करती है पर त्यागी जी पहले से तैयार खड़े थे, इसलिए वो लपक क आते है और सविता क कंधे पे हाथ रखते हुए उसे उठने नहीं देते

"ये गलती न करना भौजाई.. मोनू को आपकी गर्मी की बहुत जरुरत है"

सविता जिसका चेहरा दर्द क मरे लाल पड़ने लगा tha..wo अपनी चीख को दबाने की कोशिश करते हुए

"अचानक से पूरा लुंड अंदर घुस गया है भाईसाहब.. बड़ा दर्द हो रहा है, ऐसा लगता है अंदर से चील गयी है"

त्यागी जी- आप खुद को सँभालने की कोशिश करो.. वर्ण अगर आपकी चीख वह पुलिया तक चली गयी तोह वो सभी यहाँ आ जायेंगे

सविता- (अपनी छूट मैं अचानक से लुंड क घुसने क कारन उसे सच मैं बहुत पीड़ा हो रही थी) किया करू पर.. दर्द hi इतना हो रहा है

त्यागी जी- तब तोह एक hi रास्ता है

सविता, त्यागी जी की बात को कुछ समझ पाती उससे पहले hi त्यागी जी उसके पीछे से ठीक सामने आके खड़े हो गए थे.. यानि वो वो मोनू क मुंह क ऊपर खड़े थे

सविता जैसे hi अपनी आँखों को खोलती है वो हैरान hi रह जाती है ककी त्यागी जी तोह पूर्ण निवस्त्र थे, आखिर ये हुआ कब ?.. और उनका अजगर जैसा लुंड ठीक उसके होंठों क आगे था..

सविता- भाईसाहब आप तोह... गलल्लूऊऊऊप्प्प..... गररररररललललपपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प

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सविता जैसे hi अपनी बात कहने क लिए मुंह खोलती है, त्यागी जी तुरंत hi उनके बालों को मुठी मैं पकड़ क अपना लुंड उनके मुंह मैं गले तक उतर देते है.. जिससे सविता की सब्द अंदर hi अपना दम तोड़ देते है

त्यागी जी दूसरा हाथ भी काम मैं ले आते है और अब दोनों हाथों से सविता का मुंह जकड क जोर जोर से अपना लुंड उनके मुंह की गहराई मैं उतरना सुरु कर देते है.. उनका उतावलापन देख क ऐसा लग रहा था जैसे न जाने वो ऐसे किसी पल का कबसे इन्तिज़ार कर रहे हो

त्यागी जी- (सविता क मुंह मैं जोर जोर से अपना लुंड अंदर बहार करते हुए) आआह्ह्ह्ह... भौजी... आआह्ह्ह्हह.. माफ़ करना मुझे.. पर आपकी आवाज़ को दूर तक जाने से रोकने का बस यही एक तरीका था मेरे पास

करने को तोह मुंह पे हाथ रखा जा सकता था.. या मुंह मैं कोई कपडे भी ठूसा जा सकता था, पर हरामी ने ये तरीका चुना

सविता कोई कल की पैदा हुई औरत तोह थी नहीं.. वो मन hi मन सोचती है

'कुत्ता मोके का फायदा उठा रहा है'

पर सविता को इस समय अपने भतीजे मोनू की परवा थी.. इसलिए वो ये भी करने को तैयार हो जाती है और त्यागी जी का लुंड अपने मुंह की गहराई मैं लेते हुए धीरे धीरे नीचे से अपनी कमर को उठाना सुरु कर देती है

सविता अपने मुंह मैं त्यागी का अजगर जैसा मोटा लुंड लेते हुए जो उसके मुंह को पूरी तरह भर रहा था.. नीचे से जब अपनी कमर को उठती है तोह मोनू का वीरकाल लुंड भी उसकी छूट की चमड़ी से पूरी तरह चिपक क ऐसे ऊपर को खींचता है की सविता की जान निकल जाती है

पर मुंह मैं तोह मोटा अजगर घुसा है था बेचारी बोलती भी किया.. इसलिए वापस पे लुंड पे अपनी कमर का दम लगते हुए बैठ जाती है और अपनी छूट की गहराई मैं वापस से मोनू का लुंड अंदर तक भर लेती है

ये खेल वो कई बार दोहराती है.. और जल्दी hi उसकी छूट मोनू क मोठे लुंड पे अचे से ऊपर नीचे होना सुरु हो जाती है, वही त्यागी का मोटा काला अजगर तोह अपना काम पूरी रफ़्तार से कर hi रहा था

खेल यही आगे बढ़ता रहता है..

"Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp... सललललररररररपपपप.... सल्ल्लीऊऊऊप्प्प... सललललूउपपप..."

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त्यागी पूरी रफ़्तार से अपना लुंड सविता क मुंह क अंदर बहार कर रहा था.. जिससे कामुकता से मिलने वाले आनंद की वजह से उसकी आँखें बार बार बंद होती जा रही थी

वही सविता भी अपन अपनी कमर को ऊपर उठा क लुंड क टोपे तक लाती और फिर अपना भरी भरकम वजन वापस से मोनू क लुंड पे डालते हुए नीचे बैठ जाती.. जिससे एक मधुर स्वर उत्पन्न होने लगा था

"थाआपप.... थाआपप.... छाआपपप.... थाप.... चटप...... थाआपप.... धाप... ताआआप्प.. थापाककक"

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नीचे ऊपर खेल दोनों जगह पूरी रफ़्तार से चल रहा था.. त्यागी जी जितनी जोर जोर से अपना लुंड सत्तू की माँ क मुंह मैं घुसा रहे थे.. उतनी hi ऊर्जा क साथ मोनू क लुंड पे सविता की छूट चल रही थी

कभी.. srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप.... की कामुक ध्वनि तोह कभी थापाककक... थाआपप..... धाप्प्प की सुरीली काम आवाज़ सुनाई पद रही थी उस जगह

तभी अचानक से त्यागी जी अपना लुंड बहार खींच लेते है और कुछ कदम पीछे हट्टे हुए कहते है

"अब आप नहीं चीख रही हो.. माफ़ करना भौजाई मुझे ये करना पड़ा"

सविता अपने दोनों हाथों को मोनू क मजबूत सीने पे जमाये हुए.. पूरी रफ़्तार से उसके लोहे जैसे तने लुंड पे उछलते हुए

"आअह्हह्ह्ह्हह..... मैं समझती हु भाईसाहब आपने जो किया भलाई क लिए किया.. आआअह्ह्ह्ह... उफ्फफ्फ्फ़.... मुझे आपसे किसी प्रकार की नाराज़गी नहीं है.. आआआहहहहह"

सविता पूरी ताक़त लगा क मोनू क कठोर हुए लुंड पे उछाल रही थी.. जिससे उसकी भरी भरकम बड़ी बड़ी चूचिया ऐसे हिलोरे मार रही थी मानो किसी दुधारू गाय क बड़े बड़े थान हो

"आआह्ह्ह्हह्ह.... उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़..... माआआआ.... आआह्ह्ह्हह.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... मायआ..... माआरररररर... गयीईइ.... हैईईई... आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"

सविता की कामुक आअह्ह्ह और सिसकारियां जोरो से फूटने लगी थी.. पर उतनी hi जोरो से उसकी मोती गांड जब लुंड क बड़े बड़े ाँद से टकराती तोह मदुर आवाज़ भी उत्पन्न कर रही थी

"थाआपप..... थाआपप... ठपपाकककक... छाआपपप... थाआपप..."

सविता जोरो से मोनू क लुंड पे उछलते हुए जब वापस से त्यागी जी की तरफ देखती है तोह उसे उनका मोटा अजगर जैसा लुंड नज़र आता है.. जिसपे से उसका थूक टपक रहा था

तभी त्यागी जी मोनू क पास आते हुए उसका चेहरा देखते हुए गंभीरता से कहते है

"भौजाई मुझे दर है की आपकी गर्मी पद रही है"

सविता- (पूरी म्हणत से मोनू क लोहे सामान लुंड पे उछाल रही थी) आआआह्ह्ह्ह... मैं तोह कोई कसार नहीं चोर रही हु... आआआह्ह्ह्ह.... फिर अब किया करे... आआअह्ह्ह्ह

त्यागी जी कुछ सोचते हुए

"भौजाई.. मुझे माफ़ करना, पर मोनू क पास समय काम है इसलिए अब यही एक तरीका बचा है मेरे पास"

सविता को समझ नहीं आता की त्यागी जी आखिर कहना किया चाहते है.. पर त्यागी जी बिना उसकी परवा क कोई विलम्ब किये जल्दी से अपने कुर्ते की जेब से वही सेस्सी निकलते है जिसमे थोड़ा सा hi टेल बचा हुआ था और उसे अपने लुंड पे एक hi बार मैं उड़ेल देते है

अब उनका लुंड टेल की वजह से चमकने लगा था.. सविता मोनू क लुंड पे उछलते हुए समझने की कोशिश कर रही थी की आखिर त्यागी जी चाहते किया है

पर त्यागी जी अपना अगला कदम बताते नहीं बल्कि करके दिखते है.. वो तुरंत hi बिना कोई समय नस्ट किये हुए सविता क पीछे की तरफ आते है और उसे एक बार मैं मोनू क ऊपर पूरा झुका देते है

सविता- आआआअह्ह्ह... भाई साहब.. किया करने वाली.... माआआ.... पर इसके आगे क सब्द वो बोल नहीं पाती

सविता को ऐसा लगता है मानो किसी ने उसकी छूट और गांड क छेद को दोनों हाथों से पकड़ क इतना फैला दिया हो की उसे दर्द की नयी परिभाषा जानने को मिल रही हो

उसका जबड़ा मजबूती से कास चूका था और मोनू क सीने पे रखे हुए हाथों की मुट्ठियां पूरी मजबूती से खास्ती चली गयी थी.. आँखों क आगे हल्का अँधेरा सा चने लगा था

अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की त्यागी जी ने जैसे hi सविता को मोनू क ऊपर झुकाया उन्होंने बिना किसी विलम्ब क अपना अजगर जैसा विशाल लुंड सत्यम की माँ की गांड क छेद पे लगाया और उसे अंदर उतारते चले गए

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त्यागी जी की इस नयी हरकत की वजह से हमारी गदराई सविता का जिस्म थरथराहट से भर गया था.. उसे यकीं hi नहीं हो रहा था की आज उसके जिस्म मैं एक साथ 2 लुंड प्रवेश कर चुके है

जहा नीचे मोनू का लुंड उसकी उम्र से ज्यादा बड़ा और वीरकाल प्रतीत होने लगा था.. वही त्यागी जी जैसे इन्शान जिन्हे देख क ऐसा लगता था की उन्होंने वैराग्य जीवन चुना है उनका अजगर जैसा विशाल लुंड गांड को चीरता हुआ जैसे जैसे आगे बाद रहा था वैसे वैसे सविता को दिन मैं तारे गिनने का मौका मिलता जा रहा था

सविता ने अपने जीवन मैं कई लुंड से पानी निचोड़ा है.. पर एक साथ 2 लुंड खाने का ये उसका पहला मौका था, ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो उसके गांड और छूट मैं घुसे दोनों लुंड किसी एक बिंदु पे आके आपस मैं मिल जायेंगे

सविता- (जिस्म मैं उठ रही जोरदार दर्द से भरी लहर को सेहन करती हु) Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhh.......... माआआआ....... त्यागीइइइइइ..... जीईई...... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... गररररररललललपपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प

वो इतना hi बोल पायी थी ककी बीच मैं hi त्यागी जी का हाथ आगे आता है और कोई कपडे जैसी चीज़ उसके मुंह मैं भर देते है

सविता को एक बहुत तीव्र गंध महसूस होती है.. ऐसा लगता है उस कपडे को सालों से धोया hi न गया हो, एक पल को तोह उसकी इतनी तीव्र गंध क कारन उसे और कुछ महसूस hi होता

पर जैसे hi त्यागी जी अपने विशाल लुंड को उसकी मोती गांड से बहार खींचना सुरु करते है.. जिससे जैसे जैसे लुंड बहार आने लगता है उसके साथ साथ सविता की गांड की कोमल चमड़ी भी मानो साथ मैं बहार खींचने सी लगती है

इससे पता चल रहा था की त्यागी जी का हद से ज्यादा विशाल लुंड उसकी गांड की कोमल चमड़ी क बीच किस हद तक फसा हुआ था

त्यागी जी का बहार को खींचता लुंड मानो सविता क प्राण भी खींच रहा हो, पर उसके मुंह मैं घुसे उस कपडे की वजह से वो कुछ बोल नहीं प् रही थी.. बस उसकी आवाज़ हूउउउउउउ..... Ummmmmmmmmmm..... Ggggggggggg... जैसे समझ न आने वाले सब्दो क रूप मैं हलकी हलकी बहार आ रही थी

इधर त्यागी जी आज ज्यादा hi खुस नज़र आ रहे थे, उन्होंने मोके का पूरा फायदा उठाते हुए अपने दोनों हाथों को महेंद्र की धर्मपत्नी क हाथों क नीचे से निकलते हुए आगे लाये और जल्दी hi उसकी खरबूजे जैसी विशाल चूचियों को मुठी मैं जकड क मर्दन करते हुए वापस अपने विशाल लुंड को उसकी गांड क अंतिम बिंदु मैं प्रवेश करा दिया

सविता को एक बार फिर से जोरदार दर्द की अनुभूति होती है.. इन पलों मैं वो मोनू क लुंड पे उछलना तक भूल चुकी थी

और भला ऐसा होता भी कैसे नहीं, इतना विशाल लुंड अगर आपकी गांड मैं घुस रहा हो तोह भला किसी को और कुछ कैसे धियान रहेगा

त्यागी जी भोलेपन का नाटक करते हुए

" आआआअह्ह्ह्ह... भौजाई... आपकी गांड इतनी कासी क्यू है... उफ्फफ्फ्फ़.... भौजाई मेरी हरकत का बुरा न मन्ना, मैं जो भी कर रहा हु हमारे मोनू की भलाई क लिए कर रहा हु

ककी उसे ठीक होने क लिए और अधिक गर्मी की आवश्यकता है, और अब उसे हम दोनों क सरीर की गर्मी मिल रही है"

त्यागी जी अपनी बात कहते हुए मंद मंद मुस्कुरा उठते है और दोनों चूचियों को एक साथ इतनी बेहरहमी से पकड़ क मसल देते है मानो उसे उखड क hi दम लेंगे.. पर उनका कार्य सिर्फ इतना थोड़ी था

उन्होंने इस बार अपनी गति भी बड़ा दी थी, सविता को मोनू क ऊपर और ज्यादा लिटाते हुए जोर से अपना लुंड उनकी गांड से बहार खींचते है और जैसे hi टोपा नज़र आता है वापस उसे अंदर प्रवेश करवा देते है

इस बार इस हरकत मैं कोई प्रेम नहीं था बस हवस थी, जिस कारणवस सविता का जिस्म एक बार फिर से काँप उठा था

अब ये खेल बार बार होता है, त्यागी जी दोनों चूचियों का जोर से मदरां करते हुए सविता की गांड मैं अपना लुंड जल्दी जल्दी अंदर बहार करने लगते है

त्यागी जी- आआआहहहहह... भौजाई आप रुकी क्यू है, मोनू क लुंड की सवारी जारी रखिये वर्ण उसको गर्मी मिलनी बंद हो जाएगी.. मैं पीछे से आपके अंदर और गर्मी भर रहा हु.. आआआह्ह्ह्ह

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सविता जो अब त्यागी जी क दक्कों को धीरे धीरे सहने लगी थी और उसकी गांड ने उनके विशाल लुंड क लिए जगह बनाई सुरु कर दी थी.. वो मन hi मन सोचती है

'मादरचोद त्यागी मैं समझ रही हु.. तू मोनू को ठीक तोह कर रहा है पर साथ hi साथ उस बात का फायदा उठा क मुझे छोड़ भी भी रहा है.. कमीना... उफ्फफ्फ्फ़... पर मन्ना पड़ेगा, भोषड़ीवाले का लुंड कितना ज्यादा मोटा है

ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने मेरी गांड मैं कोई मुसल घुसा दिया हो'

सविता को चीज़ों का ज्ञान तोह हो रहा था आप तोह जानते hi है की वो अधूरा है.. अब सविता एक बार फिर से मोनू क सीने क ऊपर लेत सी जाती है और जोर जोर से अपनी योनि को उसके लुंड क ऊपर चलना सुरु कर देती है

उधर त्यागी जी की गति लगातार बाद रही थी, सविता भी कहा पीछे रहने वाली स्त्री है

उसने भी मोनू क विकराल लुंड पे खासी हुई अपनी छूट को जोर जोर से अपनी कमर उठा क अपने भतीजे को छोड़ना सुरु कर दिया था.. पीछे से त्यागी जी क जोरदार दकके और उसपे सविता की मोती हिलती हुई कमर




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कंटिन्यू 👇
 
मोनू का बेहोश सरीर इतना अधिक भार सेह रहा था.. और साथ hi 2 जिस्म की कामुकता से भरी गर्मी भी सेह रहा था, जिसका परिणाम दिख रहा था ककी उसका पूरा सरीर पसीने से भीग चूका था



तभी उसके सरीर मैं हलकी थिरकन सी होती है

"आअह्ह्ह्ह.... उम्मम्मम्मम्मम"

सविता जैसे hi इतने समय बाद मोनू क मुंह से ये आवाज़ सुनती है वो खुसी से उछाल hi पड़ती है, वो खुद hi अपने मुंह मैं घुसे उस कपडे को निकल देती है और जैसे hi उसे दूर फेकने लगती है वो देखती है की वो कपडा और कुछ नहीं बल्कि एक अंडरवियर है.. जो यक़ीनन त्यागी जी की होगी

सविता अंडरवियर को दूर फिख्ते हुए

"आआआहहहहह... मोनू..... आआआहहहहह... उठ.. उठ बेटे... आआआह्ह्ह्ह"

सविता क जिस्म मैं मानो अचानक से ऊर्जा का प्रवाह बाद गया हो, वो जोर जोर से अपनी गांड मैं त्यागी का विशाल लुंड लेते हुए जल्दी जल्दी अपनी कमर चलते हुए मोनू को छोड़ना सुरु कर देती है

"आआआअह्हह्ह्ह्ह... देख बीटा.. आआआअह्ह्ह.... मैं तेरी बड़ी Maaaaaaaaaa"

सविता का उतावलापन देख क त्यागी मन hi मन हस्ता है और खुद से कहता है

'मोनू को पूरी तरह होश तभी आएगा जब मैं चाहूंगा'

वो सविता की दोनों चूचियों क निप्पल्स को अपनी उँगलियाँ क बीच लेके उसे मसलते हुए उसकी गांड क छेद को चौड़ा करने का अपना कार्य करते हुए कहता है

"भौजाई लगता है, मोनू ठीक हो रहा है.. आआआअह्ह्ह्हह... देखना जल्दी hi हमारा मोनू पूर्ण रूप से ठीक हो जायेगा... आआआअह्ह्ह्हह"

सविता अपने होंठों को आगे बड़ा क मोनू को चुम लेती है और उसके होंठों को ऐसे चूस लेती है मानो उनका रसपान कर रही है.. ऐसी हरकत देख क त्यागी जी का जिस्म पूरी तरह झनझना सा जाता है, वो अपना एक हाथ पीछे ले जेक सविता की नंगी पीठ पे चलते हुए जितना ज्यादा तेज़ी से संभव था उससे ज्यादा गति से उसकी गांड मरने लगते है

"आआआआहहहहह.... भौजाई.... आआआअह्ह्ह्ह.... भौजाई.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... आपकी.. गांड.... आआआह्ह्ह्ह... इतने सालों बाद जेक कही आपको छोड़ने का सपना पूरा हुआ है.... आआआअह्हह्ह्ह्ह... किया गांड है भौजाई आआआहहहहह... मज़ा आए रहा है....."

त्यागी एक पल क लिए हवस मैं इतना अँधा हो गया की उसने जोर जोर से सविता की गांड मरते हुए अपने दिल की बात बोल दी.. पर इस बात का उसे होश hi नहीं था की उसने किया बोल दिया है, पर सविता ने ये सब्द जरूर सुन लिए थे

सविता की आँखें फैलती चलती जाती है और वो मोनू क होंठों को चूसना चोर क वापस उसके लुंड पे उछाल क उसकी चुदाई करते हुए अपनी गांड क गहराई मैं त्यागी जी का विशाल लुंड महसूस कर रही थी

"आआआआह्ह्ह्हह्ह... और जोर जोर से छोड़ो त्यागी भैईयसाहबबबब.. ताकि मेरा मोनू जल्दी जल्दी ठीक हो... पहाड़ड़ड़ड़ दालों मेरी गांड.... कुटिया बना क छोड़ो.. मुझे... छोड़ दालों अपनी दोस्त की बीवी को... पहाड़ दो उसकी गांड... आआआआहहहहह"

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सविता समझ चुकी थी की त्यागी की रेस का अंतिम पड़ाव आने वाला है, पर उसे हैरानी भी हो रही थी की इतनी दिएर से वो मोनू क लुंड पे छड़ी हुई उसकी चुदाई कर रही है पर उसका वीर्य अब तक नहीं निकला था.. वही त्यागी जी जो बाद मैं उसकी गांड मैं अपना लुंड दाल क जुड़े थे वो अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचने वाले थे

सविता को मोनू की मर्दानगी पे नाज़ सा होता है और वो दोहरी चुदाई का आनंद लेते हुए.. जी है अब उसे इसमें मज़ा भी आने लगा था

सविता प्रेम से अपने हाथ से मोनू क बालों को सवारते हुए

"आआआआह्ह्ह्ह... उठ मेरे बचे... देख तेरी बड़ी मा.. तेरे लिए किया किया कर रही है... Aaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh"

त्यागी जी की रफ़्तार अब ट्रैन क इंजन की तरह भाग रही थी और वो पागलों की तरह सविता की नंगी पीठ को चूमते तोह कभी उसे मोनू क ऊपर पूरी तरह लिटा क जोर जोर से अपना लुंड अंदर बहार करते.. तोह कभी दोनों हाथों से सविता क मोठे मोठे दूध मसलते हुए उसकी गांड मरने का कामुक कार्य करते

त्यागी जी- आआआहहहहह.. भौजाई... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... असीम आनंद है आपकी गांड छोड़ने मैं.. आआआहहहहहहह

सविता- (उन्हें और उकसाते हुए, ककी उसे अब लगने लगा था त्यागी जी जितना उसे छोड़ेंगे मोनू उतनी जल्दी ठीक होगा) आआह्ह्ह्ह... तोह और दम लगा क छोड़िये न... आआआह्ह्ह्ह... किस्मत वाले होते है जो अपने मित्र की पत्नी को छोड़ पाते है, आआआआह्ह्ह्हह्ह... छोड़ छोड़ क लाल कर दीजिये मेरी गांड को... आआआह्ह्ह्ह... पहाड़ड़ड़ड़ड़ड़ दीजिये आज मेरी गांड को... आआआआह्ह्ह्ह... गांड से घु निकल दीजिये त्यागी जी.. आआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... और जोर जोर से छोड़िये त्यागी जी... आआआह्ह्ह्ह

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सविता जब ऐसी बातों की बौछार सी करती है, तोह उसे महसूस होता कई नीचे से मोनू भी हरकत मैं आ रहा है और उसका जिस्म भी उसकी छूट मैं झटके देने लगा है

वही त्यागी जी अगले और कुछ मिनट तक अपना खेल पूरी हिम्मत से खेलते है.. पर मन की उनका लुंड अजगर सामान विशाल है

पर सविता की गांड की गहराई भी अनंत है.. उसमें कुछ भी समां जायेगा, और जल्दी hi ये बात एक बार फिर से सत्य साबित होती है

त्यागी जी ने अचानक से दोनों हाथों ने सविता क निप्पल्स को इतनी जोर से पकड़ क खींच लिया की सविता की जान hi निकल गयी, पर इस बार उसने अपनी चीख को दबा लिया वैसे उसे दर्द तोह हुआ था

सविता कुछ बोलने hi वाली थी की उसे अपनी गांड की गहराई मैं गाड़ा चिपचिपा गरम गरम वीर्य भरता हुए महसूस होता है.. यानि त्यागी जी की दौड़ ख़तम हो चुकी थी

अपनी गांड मैं इतना गरम वीर्य भरता हुआ महसूस करके सविता की भी आँखें बंद होती चली गयी थी

त्यागी जी- Aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhh.... भौजाई.....

सविता- (कामुकता से आँखें बंद होती चली गयी थी) Aaaaaaaaaahhhh... भर दीजिये मेरी गांड को अपने गाड़े गरम वीर्य से भाईसाहब... आआआआह्ह्ह्ह

पर सविता का मोनू क लुंड पे उछलना बंद नहीं हुआ था.. त्यागी जी कुछ पलों तक उसकी गांड मैं अपना लुंड डाले हुए यही उससे चिपके रहते है और फिर अपना लुंड बहार खींच लेते है और उससे अलग हो जाते है

गांड से लुंड बहार आते hi बहुत सारा कॉमर्स बहते हुए मोनू क लुंड को भिगोने लगता है.. जिसपे लगातार उछलने क कारन अब त्यागी जी का वीर्य भी धीरे धीरे ऊपर नीचे होती सविता क कारन उसकी योनि से लगते हुए उसे और चिकना करने का काम कर रहा था

त्यागी जी कुछ कदम पीछे खड़े होक अपनी अंडरवियर को पेहेनते हुए मन hi मन

'इस मोनू का वीर्य अब तक नहीं निकला.. बहनचोद अपने बाप जैसा hi है'

जल्दी hi त्यागी जी ने वापस से पुरे कपडे पेहेन लिए थे, पर उन्हें देख क हैरानी हो रही थी की सविता अब भी लगातार मोनू क वीरकाल लुंड पे उछाल रही थी.. सविता की हालत ऐसी हो चुकी थी मानो उसका गाला सुख रहा हो उसे पानी की जरुरत हो

पर मोनू का लुंड था की अपना वीर्य उगलना hi नहीं च रहा था.. की तभी एक बार फिर से उसका सरीर हरकत करता है

"आआआअह्हह्ह्ह्हह... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

मुंह क मुंह से ये सब्द निकलते है पर उसकी आँखें नहीं खुलती और थकन की वजह से धीमी पड़ी सविता एक बार से ये सुनते hi पूरी रफ़्तार से उसके लुंड पे उछलना सुरु कर देती है

"है...... हआ... मेरे... बचे... अपनी आँखें खोल... Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhh"

त्यागी जी- लगता है जड़ी बूटियों से बना टेल काम कर गया है, हमरा मोनू ठीक हो चूका है

सविता- (मोनू क सीने पे हाथ चलते हुए उसके लुंड पे पूरी ताक़त से उछलते हुए) आआआअह्ह्ह्ह..... पर ये आँखें नहीं खोल रहा.. ऐसे पूरी तरह होश नहीं आ रहा.. आआआह्ह्ह्ह

त्यागी जी- है ऐसे पूरी तरह होश आने मैं अभी थोड़ा और समय लगेगा, जिसके लिए ऐसे वापस से घर ले जेक एक खास बूटी का धुआँ देना पड़ेगा.. पर आपको अपना अंतिम कार्य करना है

सविता- (मोनू क लुंड पे छड़ी हुई उसकी चुदाई करते हुए) आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... जल्दी बताइए किया करना है... आआआह्ह्ह्ह

त्यागी मन hi मन हस्ते हुए

"जैसे hi मोनू अपने वीर्य से आपकी योनि भरे आपको तुरंत hi अपनी योनि को खोल क मोनू क मुंह पे बैठ जाना है... ताकि आप दोनों क सरीर की गर्मी से भरा हुआ कॉमर्स मोनू क मुंह मैं जा सके, ककी उसमें सरीर की पूरी गर्मी का निचोड़ होता है"

सविता- (जोर जोर से लुंड पे उछलते हुए) पर.. aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh.. पर इसका लुंड तोह झड़ने का नाम hi नहीं ले रहा है.... आआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह

सविता की बात सही थी, और ये बात त्यागी जी क दिमाग मैं भी चल रही थी की आखिर अब तक मोनू का वीर्य निकलना क्यू नहीं

त्यागी कुछ सोचता है की अचानक जैसे उसे कुछ याद अत है, वो जल्दी से अपने झोले से कुछ सूखे पत्ते निकलता है और उन्हें हाथों क बीच लेके रगड़ने लगता है

जब उन सूखे पत्तों का कचूमर सा बन जाता है तोह उसमें से एक तीव्र गंध सी आने लगती है.. त्यागी जी बिना विलम्ब क जल्दी से अपने हाथों को मोनू की नाक क आगे कर देते है

अब त्यागी अपने हाथों को उसके चेहरे क पास hi किये हुए थे की अचानक से सविता को महसूस होता है की मोनू का लुंड जोरो से झटका खता है और उसकी योनि मैं मानो कोई सैलाब आ गया हो

सविता- Aaaaaaahhhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaaaaaaa....

त्यागी जी जल्दी से अलग हैट जाने है और सबसे पहले अपना हाथ साफ़ करते है मानो जैसे उन्हें दर hi की कही उन्होंने वो गांड सुंग ली तोह जाने किया होगा

त्यागी जी मन hi मन

'इन खास जड़ी बूटियों क पत्तों की यही खूबी है.. ये किसी भी मर्द का वीर्य बहा सकती है'

सविता जोर जोर से मोनू क लुंड पे उछाल रही थी.. पर अब अपना वजन दाल क उसके लुंड पे रुक गयी थी, मानो उसके लुंड पे निकलने वाले वीर्य का एक एक कटरा अपने गर्भा मैं समां लेना च रही हो.. पर उसके आनंद मैं त्यागी जी अपनी टांग ऐडा देते है

"भौजाई जल्दी करो"

सविता को जैसे होश आता है, वो मोनू क लुंड से अपने योनि को निकलते हुए जल्दी hi बिना समय नस्ट किये घूम क अपनी योनि का मुख उसके चेहरे क ऊपर करते हुए बैठ जाती है.. वो देखती है की मोनू का लुंड अब भी हलकी हलकी पिचकारी जैसी मार रहा था, उसके मन मैं आता है की काश वो ऐसे छत्त क साफ़ कर पाती पर वह त्यागी जी को खड़ा देख क वो अपनी ये खुवाईश दबा जाती है

इधर जैसे hi वो मोनू क हलके खुले मुंह पे अपनी योनि को रखती है.. उसकी योनि भी अपना कॉमर्स बहाना सुरु कर देती है, जिससे उसकी खूब चूड़ी हुई योनि से उसका कॉमर्स और मोनू का गाड़ा वीर्य आपस मैं समागम करते हुए बहार आके सीधा मोनू क मुंह मैं उतरना सुरु हो जाता है

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सविता का कॉमर्स बहने क कारन उसके आनंद की अलग सी अनुभूति होती है.. और वो अपनी आँखों को बंद करके अपनी योनि को जोर जोर से मोनू क मुंह पे मसलना सुरु कर देती है

इतना कामुक नज़ारा देख क त्यागी जी का लुंड एक बार फिर से उछाल मरने लगता है

त्यागी जी अपने लुंड की हरकत देख क धीरे से खुद से कहते है

"आज पहली बार बिना जड़ी बूटी खाये ये इतना हिलोरे मार रहा है"

सायद त्यागी जी ने अपने विशाल लुंड से जुड़ा कोई राज़ बोल दिया था.. पर इस समय सविता अपनी बहती योनि का कॉमर्स मोनू को पिलाते हुए उसकी मुंह पे बैठी हुई अलग hi दुनिया का आनंद ले रही थी

कुछ पलों बाद त्यागी जी मुस्कुराते हुए

"अब उठ भी जाओ भौजाई.. बेचारे सांस नहीं ले प् रहा हो"

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सविता को जैसे अपनी गलती का एहसास होता है और वो शरमाते हुए जल्दी से उठ क कड़ी हो जाती है.. वो देखती है की मोनू का पूरा मुंह उसके कॉमर्स से भरा हुआ चमक रहा है

सविता ये देख क शर्म से लाल हो जाती है

त्यागी- जल्दी से कपडे पेहेन लीजिये, तब तक मैं मोनू को साफ़ करके उसे कपडे पहना देता है.. ककी अब जल्दी से ऐसे वापस घर ले जाना होगा

इसके बाद समय और नस्ट नहीं होता.. जल्दी hi सविता अपने कपडे पेहेन चुकी थी और मोनू को भी पहले जैसे तैयार कर दिया गया था

फिर त्यागी जी वह से निकल क खुले मैं आते है जहा से उन्हें दूर पुलिया क पास घर क सभी लोग नज़र आते है वो उन्हें हाथ देके बुलाते है और जल्दी hi मोनू वापस महेंद्र क घर क आँगन में एक चारपाई पे लेता हुआ था

त्यागी जी- (रहस्य्मय माहौल का निर्माण करते हुए) अब अंतिम क्रिया बाकी है.. ?



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