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- Dec 5, 2013
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अंदर पहुंचते hi मैंने एक लम्बी सांस भरी मानो जैसे अब मुझे किसी का कोई भी दर न हो.. कुछ पल रहत लेने क बाद मैंने अपने पल्लू को अपने हाथों में भरा और उसके खींचते हुए अपने कोमल आज जैम क मसले गए कामुक सरीर से धीरे से खींच क अलग कर दिया जिससे मेरे यौवन और उसकी उचाई अब सिर्फ मेरे ब्लाउज में अपनी खूबसूरती छुपाते हुए रह गयी थी.. पर अभी तोह सुरुवात मात्र थी, ककी बारिश क कारन पूरी तरह भीगी हुई साड़ी अब भी मेरे जिस्म से ऐसे चिपकी हुई थी जैसे जिस्म क एक एक कामुक अंग को कपड़ों क ऊपर से hi निवस्त्र दिखने की कोशिश कर रही हो.. बारिश की छोटी छोटी चमकती हुई बूंदें मेरे कोमल गोर जिस्म पे ऐसे दिख रही थी जैसे जल से निकली हुई किसी जलपरी क जिस्म पे सजी हुई मोतिया
पल्लू हट्टे hi मेरे कैसे हुए मजबूत उरोज जिनका आज जैम क मर्दन हुआ था.. वो उस ब्लाउज में ऐसे नज़र आ रहे थे जैसे किसी भी पल ब्लाउज खुद hi पहात जायेगा वो मेरे यौवन का निखार उस छोटे से स्नानघर में चमक उठेगा, पल्लू क हटने क बाद मैंने अपना एक हाथ अपने पेटीकोट में घुसी हुई अपनी साड़ी पे रखा और अगले hi वो मेरी साड़ी मेरे जिस्म से ऐसे अलग होती जा रही थी मानो जैसी बारिश से भरे ठन्डे मौसम में उसमे कामुकता की अग्नि लग चुकी हो और अगर मैंने उसे जल्दी से अपने सरीर से अलग नहीं किया तोह मैं फिर से जिस्म की मादक गर्मी में जलना सुरु हो जाउंगी, और इसका परिणाम ये हुआ की अब मैं सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में रह गयी थी और मेरी यौवन को छुपाने वाली मेरी साड़ी मेरे पैरों को चुम रही थी
अब बरी थी मेरे उस भीगे ब्लाउज की जो मेरे जिस्म से ऐसे चिपका हुआ था जैसे उसकी कामुकता का hi हिस्सा हो.. मैंने अपने दोनों हाथों को ब्लाउज क आगे किया और आगे लगे उन 3 बटन को बरी बरी से खोलना सुरु कर दिया, वैसे सायद मुझे गलत लग रहा हो पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे जैसे में अपने ब्लाउज को खोलती जा रही थी वैसे वैसे स्नानघर की ठंडक में गर्मी का तापमान बढ़ता जा रहा था, मेरे ब्लाउज क तीनो बटन खुल चुके थे वैसे तोह अब मेरा यौवन उछाल क बहार आ जाना चाइये था पर बारिश में भीगा ब्लाउज मेरे उरोजों पे चिपका हुआ अब भी मेरी लाज बचा था की तभी मुझे एक पल क लिए ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्नानघर क बहार मैंने कुछ आहत सुनी हो, आज एक hi दिन में इतना सब हो चूका था की हर छोटी चीज़ मेरे जिस्म क एक एक रोये को जगा दे रही थी
मेरा ब्लाउज जो आगे से पूरी तरह खुल चूका था पर भी मेरे बड़े बड़े उरोजों पे चिपका हुआ था.. मैंने अपने यौवन को उसी हालत में चोरते हुए अपने दिल की बढ़ती हुई गति को सँभालते हुए धीरे से कहा
"कोण है.. ?
कोई है.. वह..
मैंने पूछा कोई है किया.. ?"
पर हर बार सिर्फ बारिश का शोर hi था, मुझे कोई भी उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था.. पूर्ण सन्नाटा hi मिला उत्तर में, मैं खुद hi इस निष्कर्ष पे पहुंच चुकी थी
"लगता है.. हवा ज्यादा तेज़ चलने लगी है.."
एक बार फिर से अपने आप को निवस्त्र करने का कार्यक्रम फिर से सुरु कर दिया, मेरे ब्लाउज क सरे बटन तोह खुले hi थी इसलिए अगला पड़ाव अब अपने आप को ऊपर से पूरी तरह नंगा करना hi था.. इसलिए बिना किसी अतिरिक्त देरी क मैंने अपने ब्लाउज को पहले दाए कंधे से नीचे सरकाया और फिर बाए कंडे से उतारते हुए वही जमीन पे गिरने दिया, जिसके चलते अब में पूरी तरह ऊपर से नंगी हो चुकी थी मेरी नज़रें एक पल क लिए मेरी उन्नत चूचियों पे अटक सी गयी जिनका आज भरपूर मर्दन हुआ था और अभी भी वो मजबूत हाथों की पकड़ क कारन लाल नज़र आ रही है.. जैसे उनपे होली का रंग चढ़ा हो
अब बरी थी आगे बढ़ने की यानि पेटीकोट को उतर क पूर्ण नंगे होने ककी.. ककी ऊपर से तोह मैं मादरजात नंगी हो hi चुकी थी जहा मेरी गोरी चूचिया जिनकी हाल कुछ एशिया था जैसे उसपे हल्का गुलाबी रंग मॉल दिया गया हो पर उसके साथ hi मेरी काले जामुन सामान तने हुए निप्पल्स अब भी मेरी कामुकता का बखान करते नहीं थक रहे थे
जल्दी hi मेरे हाथ एक बार फिर से मेरे पेटीकोट क नाड़े तक पहुंच चुके थे जहा बिना रुके मैं एक पल क लिए एक लम्बी सी सांस लेती हु और फिर उसे खींच देती है जिसके चलते मेरा बारिश में भीगा हुआ पेटीकोट मेरे जिस्म को पूर्ण नंगा करते हुए मेरे पैरों में आके अपना दम तोड़ने लगता है
अब उस ठन्डे और छोटे से स्नानघर में में पूरी तरह निवस्त्र कड़ी हुई थी जहा मेरा गोरा जिस्म मेरे जवान भतीजे क हाथों आज इतना रगड़ा गया था की वो हल्का गुलाबी नज़र आने लगा थे जैसे गुलहड़ क फूल को मेरे पुरे जिस्म में जोरो से रगड़ा गया हो.. वही मेरी सूज चुकी छूट अब भी अपने होंठों को खोले हुए अपनी बेहरहम कुटाई की कहानी खुद hi बता रही थी
मेरी योनि क ऊपर उघि हुई मेरी काली काली सुन्दर झांटें पूरी तरह सत्यम क वीर्य से सनी हुई थी, सायद ऐसे ठन्डे मौसम क कारन मेरे जवान भतीजे का गाड़ा वीर्य अभी तक नहीं सूखा था और मेरे योनि स्थल को पूरी तरह गीला किये थे.. जिसे अगर कोई देख ले तोह यक़ीनन उसका लुंड बगावत करने पे उतारू हो जाएग, कुलमिला क कहु तोह मेरे जिस्म का हर हिस्सा फिर चाहे वो मेरे जोरो से मसली गयी चूचिया हो या बेहरहमी से छोड़ी गयी बुर जिसका मेरे भतीजे ने आज भोषड़ा बना दिया था वो अपनी हालत क द्वारा सत्यम की म्हणत क निशाँ लिए हुए और ज्यादा खिल उठी थी
मैंने धीरे से अपनी योनि पे अपना हाथ सरकाया तोह मेरी काली झांटों क बीच से होती हुई मेरी उंगलिया जब योनि द्वार पे पहुंची तोह मुझे एक मीठे मीठे दर्द की गहरी तीस महसूस होती है जिसके चलते मेरी आँखें स्वतः hi बंद होती चली जाती है और मुंह से कामुक सिसकारी फुट पड़ती है
"आआआआअह्ह्ह्ह.. कमीने ने सच में बुर का भोषड़ा बना दिया.. ेस्शह्ह्ह्ह.. अभी तक दर्द है.. हैईईईई"
पर मुझे इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था की दरवाजे क बहार कोई छुपा हुआ ये सब देख रहा था और इस पल उसकी साँसें लगातार तेज़ होती चली जा रही थी.. और वो मेरे जिस्म को अपनी आँखों से hi छोड़ने की कल्पना करने लगा था
ऐसी क साथ बहार बारिश का शोर लगातार बढ़ता hi जा रहा था, स्नानघर क ऊपर वाली तीन की छत्त पे गिरती हुई बूंदें कुछ ज्यादा hi शोर पैदा कर रही थी और धीरे धीरे फिर से मौसम में ठंडक बाँड्ने लगी थी
यहाँ से आगे बढ़ने से पहले आपको वापस सविता और सोनू क पास लौटना होगा.. तोह चलिए जाइए और देखिये वह किया हो रहा है
कंटिन्यू...
पल्लू हट्टे hi मेरे कैसे हुए मजबूत उरोज जिनका आज जैम क मर्दन हुआ था.. वो उस ब्लाउज में ऐसे नज़र आ रहे थे जैसे किसी भी पल ब्लाउज खुद hi पहात जायेगा वो मेरे यौवन का निखार उस छोटे से स्नानघर में चमक उठेगा, पल्लू क हटने क बाद मैंने अपना एक हाथ अपने पेटीकोट में घुसी हुई अपनी साड़ी पे रखा और अगले hi वो मेरी साड़ी मेरे जिस्म से ऐसे अलग होती जा रही थी मानो जैसी बारिश से भरे ठन्डे मौसम में उसमे कामुकता की अग्नि लग चुकी हो और अगर मैंने उसे जल्दी से अपने सरीर से अलग नहीं किया तोह मैं फिर से जिस्म की मादक गर्मी में जलना सुरु हो जाउंगी, और इसका परिणाम ये हुआ की अब मैं सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में रह गयी थी और मेरी यौवन को छुपाने वाली मेरी साड़ी मेरे पैरों को चुम रही थी
अब बरी थी मेरे उस भीगे ब्लाउज की जो मेरे जिस्म से ऐसे चिपका हुआ था जैसे उसकी कामुकता का hi हिस्सा हो.. मैंने अपने दोनों हाथों को ब्लाउज क आगे किया और आगे लगे उन 3 बटन को बरी बरी से खोलना सुरु कर दिया, वैसे सायद मुझे गलत लग रहा हो पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे जैसे में अपने ब्लाउज को खोलती जा रही थी वैसे वैसे स्नानघर की ठंडक में गर्मी का तापमान बढ़ता जा रहा था, मेरे ब्लाउज क तीनो बटन खुल चुके थे वैसे तोह अब मेरा यौवन उछाल क बहार आ जाना चाइये था पर बारिश में भीगा ब्लाउज मेरे उरोजों पे चिपका हुआ अब भी मेरी लाज बचा था की तभी मुझे एक पल क लिए ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्नानघर क बहार मैंने कुछ आहत सुनी हो, आज एक hi दिन में इतना सब हो चूका था की हर छोटी चीज़ मेरे जिस्म क एक एक रोये को जगा दे रही थी
मेरा ब्लाउज जो आगे से पूरी तरह खुल चूका था पर भी मेरे बड़े बड़े उरोजों पे चिपका हुआ था.. मैंने अपने यौवन को उसी हालत में चोरते हुए अपने दिल की बढ़ती हुई गति को सँभालते हुए धीरे से कहा
"कोण है.. ?
कोई है.. वह..
मैंने पूछा कोई है किया.. ?"
पर हर बार सिर्फ बारिश का शोर hi था, मुझे कोई भी उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था.. पूर्ण सन्नाटा hi मिला उत्तर में, मैं खुद hi इस निष्कर्ष पे पहुंच चुकी थी
"लगता है.. हवा ज्यादा तेज़ चलने लगी है.."
एक बार फिर से अपने आप को निवस्त्र करने का कार्यक्रम फिर से सुरु कर दिया, मेरे ब्लाउज क सरे बटन तोह खुले hi थी इसलिए अगला पड़ाव अब अपने आप को ऊपर से पूरी तरह नंगा करना hi था.. इसलिए बिना किसी अतिरिक्त देरी क मैंने अपने ब्लाउज को पहले दाए कंधे से नीचे सरकाया और फिर बाए कंडे से उतारते हुए वही जमीन पे गिरने दिया, जिसके चलते अब में पूरी तरह ऊपर से नंगी हो चुकी थी मेरी नज़रें एक पल क लिए मेरी उन्नत चूचियों पे अटक सी गयी जिनका आज भरपूर मर्दन हुआ था और अभी भी वो मजबूत हाथों की पकड़ क कारन लाल नज़र आ रही है.. जैसे उनपे होली का रंग चढ़ा हो
अब बरी थी आगे बढ़ने की यानि पेटीकोट को उतर क पूर्ण नंगे होने ककी.. ककी ऊपर से तोह मैं मादरजात नंगी हो hi चुकी थी जहा मेरी गोरी चूचिया जिनकी हाल कुछ एशिया था जैसे उसपे हल्का गुलाबी रंग मॉल दिया गया हो पर उसके साथ hi मेरी काले जामुन सामान तने हुए निप्पल्स अब भी मेरी कामुकता का बखान करते नहीं थक रहे थे
जल्दी hi मेरे हाथ एक बार फिर से मेरे पेटीकोट क नाड़े तक पहुंच चुके थे जहा बिना रुके मैं एक पल क लिए एक लम्बी सी सांस लेती हु और फिर उसे खींच देती है जिसके चलते मेरा बारिश में भीगा हुआ पेटीकोट मेरे जिस्म को पूर्ण नंगा करते हुए मेरे पैरों में आके अपना दम तोड़ने लगता है
अब उस ठन्डे और छोटे से स्नानघर में में पूरी तरह निवस्त्र कड़ी हुई थी जहा मेरा गोरा जिस्म मेरे जवान भतीजे क हाथों आज इतना रगड़ा गया था की वो हल्का गुलाबी नज़र आने लगा थे जैसे गुलहड़ क फूल को मेरे पुरे जिस्म में जोरो से रगड़ा गया हो.. वही मेरी सूज चुकी छूट अब भी अपने होंठों को खोले हुए अपनी बेहरहम कुटाई की कहानी खुद hi बता रही थी
मेरी योनि क ऊपर उघि हुई मेरी काली काली सुन्दर झांटें पूरी तरह सत्यम क वीर्य से सनी हुई थी, सायद ऐसे ठन्डे मौसम क कारन मेरे जवान भतीजे का गाड़ा वीर्य अभी तक नहीं सूखा था और मेरे योनि स्थल को पूरी तरह गीला किये थे.. जिसे अगर कोई देख ले तोह यक़ीनन उसका लुंड बगावत करने पे उतारू हो जाएग, कुलमिला क कहु तोह मेरे जिस्म का हर हिस्सा फिर चाहे वो मेरे जोरो से मसली गयी चूचिया हो या बेहरहमी से छोड़ी गयी बुर जिसका मेरे भतीजे ने आज भोषड़ा बना दिया था वो अपनी हालत क द्वारा सत्यम की म्हणत क निशाँ लिए हुए और ज्यादा खिल उठी थी
मैंने धीरे से अपनी योनि पे अपना हाथ सरकाया तोह मेरी काली झांटों क बीच से होती हुई मेरी उंगलिया जब योनि द्वार पे पहुंची तोह मुझे एक मीठे मीठे दर्द की गहरी तीस महसूस होती है जिसके चलते मेरी आँखें स्वतः hi बंद होती चली जाती है और मुंह से कामुक सिसकारी फुट पड़ती है
"आआआआअह्ह्ह्ह.. कमीने ने सच में बुर का भोषड़ा बना दिया.. ेस्शह्ह्ह्ह.. अभी तक दर्द है.. हैईईईई"
पर मुझे इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था की दरवाजे क बहार कोई छुपा हुआ ये सब देख रहा था और इस पल उसकी साँसें लगातार तेज़ होती चली जा रही थी.. और वो मेरे जिस्म को अपनी आँखों से hi छोड़ने की कल्पना करने लगा था
ऐसी क साथ बहार बारिश का शोर लगातार बढ़ता hi जा रहा था, स्नानघर क ऊपर वाली तीन की छत्त पे गिरती हुई बूंदें कुछ ज्यादा hi शोर पैदा कर रही थी और धीरे धीरे फिर से मौसम में ठंडक बाँड्ने लगी थी
यहाँ से आगे बढ़ने से पहले आपको वापस सविता और सोनू क पास लौटना होगा.. तोह चलिए जाइए और देखिये वह किया हो रहा है
कंटिन्यू...