Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 20 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

अपकमिंग अपडेट 👇

माया की माया

वेडनेसडे मॉर्निंग (18/03/2026)


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प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 468-469



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #05

माया की माया

💥 हर्षिता की उसके जेठ जी यानि 'महेंद्र' द्वारा हुई उस चुदाई का रहस्य खुलने का समय आ गया है, आशा है वो अपडेट आप भूले नहीं होंगे 🙏

ये अपडेट उसी जगह से आगे बढ़ता है जहा हर्षिता बहार छप्पर नीचे बैठे हुए सभी व्यक्तियों क लिए हल्दी वाला दूध लेके आती है..

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हर्षिता क अंदर जाने क बाद भी वीरू का दिमाग पूरी तरह घूम सा रहा था, उसने अभी अभी जो देखा उसे उसपे यकीन नहीं हो रहा था की उसका बड़ा भाई उसकी पत्नी सलोनी सूरत वाली कामुक 'हर्षिता' को ऐसे घर रहा था जैसे उसकी गांड को खा hi जायेगा.. ये बात जहा उसको उलझा रही थी वही साथ hi साथ उसके अंदर एक कामुक गुदगुदी भी उत्पन्न कर रही थी

वीरू अब भी वही बैठा हुआ अपने बड़े भाई 'महेंद्र' क पेअर दबाते हुए उनकी सेवा किया जा रहा था पर रह रह क बार बार उसकी नज़रें उसके बड़े भाई की धोती की और घूम जा रही थी जहा थोड़ी दिएर पहले एक विशाल तम्बू बना हुआ था और उस तम्बू का कारन उसकी अपनी पत्नी 'हर्षिता' थी.. वीरू इस बारे में जितना सोच रहा था उसका लुंड उतना hi ज्यादा भागवत करने पे उतारू होता जा रहा था

वीरू अपनी hi सोच में उलझा हुआ था की तभी उस बारिश क बीच एक आदमी घर की और भागता हुआ नज़र आता है.. जिसपे सबसे पहले वीरू की hi नज़र पड़ी थी और वो उसे देखते hi पहचान जाता है

"अरे गेंदा भैया, इधर कैसे.. आओ आओ जल्दी से छप्पर नीचे आ जाओ वर्ण भीग जाओगे"

48 वर्षिये गेंदा जिसके खेत.. वीरू क खेतों से पहले hi पड़ते थे, वो पूरी तरह भीगा हुआ दौड़ता हुआ आया था, जिससे उसकी सांस बुरी तरह फूल रही थी और उस गेंदा को वह बैठे सभी लोग अचे से पहचानते थे.. इस बार बोलने का कार्य घर का मुखिया 'महेंद्र' करता है

"किया हुआ गेंदा, ऐसे हाफ क्यू रहे हो.. सब ठीक है न, एक काम करो पहले छप्पर नीचे आओ"

गेंदा जैसे hi महेंद्र की आवाज़ सुनता है पुरे सम्मान क साथ हाथ जोड़ क नमस्ते करते हुए अपनी बात रखता है

"अभी समय नहीं है महेंद्र भैया, वो में बताने आया था की बारिश क पानी से अपने वीरू क खेत की माइड कई जगह से काट गयी है.. कुछ जगह तोह मैंने खुद hi ठीक कर दी थी पर वीरू का खेत इतना विशाल है की मुझ अकेले से पूरा संभल नहीं पाया.."

वीरू जैसे hi ये सुनता है वो पूरी सजगता और पुरे सम्मान से गेंदा की और देखते हुए कहता है

"अरे आप क्यों परेशां हुआ भैया, मुझे बस आके बता दिया होता.."

48 साल का गेंदा अपने पुरे अनुभव क साथ मुस्कुरा क अपनी बात कहता है

"हमारा सुंदरपुर एक परिवार जैसा है वीरू.. इसमें परेशानी कैसी.."

गेंदा की बात सुनकर वह बैठे हर किसी क चेहरे पे मुस्कान खिल उठती है, जिसपे महेंद्र मुस्कुरा क कहता है

"बिलकुल सही कहा गेंदा, और तुम्हारी बेटी गुलाब कैसी है.. ?

.. पर पहले तोह तुम यहाँ छप्पर नीचे आओ, ऐसे बीमार पद जाओगे"

गेंदा- (महेंद्र से मिलने वाले प्रेम और सम्मान क लिए पुरे सम्मान से) नहीं भैया अभी मुझे जाने दीजिये मुझे.. आप तोह जानते है बिन माँ की बची है गुलाब, अकेली ऐसी बारिश और मौसम में सुबह से परेशां हो रही होगी..

और फिर गेंदा अपनी बात पूरी करते हुए आगे बाद चलता है.. वैसे महेंद्र ने उसे रुक क चाय पीना क लिए भी कहा था पर गेंदा को अपने घर पहुंचने की कुछ ज्यादा hi जल्दी थी

जल्दी hi वीरू वही छप्पर नीचे रखे काले छाते को उठाते हुए खेत की और निकल पड़ता है, जहा सत्तू ने खुद जाने की बात कही थी की..

"वो चला जाता है.. चाचा आप आराम करो.."

पर वीरू ने खुद hi मन कर दिया था, उसका एक कारन ये भी था की जबसे उसने अपने बड़े भाई को अपनी पत्नी की कामुक गांड घूरते हुए देखता था उसके पुरे बंदन में आग सी लगी हुई थी, पर ये घुसे या जलन की नहीं अपितु कामपिपास की अग्नि थी.. वीरू ने सोचा था की वो खेत पे काम निपटा क एक घूंट दारू की मार लेगा जिससे सायद उसका दिमाग बार बार अपनी पत्नी और उसके बड़े भाई की और न जाने, और ऐसी क चलते हुए वो खुद खेत की और चल पड़ा था..

जल्दी hi वीरू घर से दूर निकल आया था और उसके कदम अब उसके खेतों की और बाद चले थे..

बारिश ने सुबह से hi जो आतंक मचा रखा है उसके बारे में तोह आप सभी जानते है है.. खेत पे आगे बढ़ते हुए वीरू को काले काले बदल ऐसे नज़र आते है मानो अभी तक जितनी वर्षा हुई है वो बस आरम्भ hi थी, जिधर भी नज़र दौड़ाओ बस पानी hi पानी.. हर किसी क खेत की नालियां पूरी तरह भरी हुई थी और पानी मिड क ऊपर से बह रहा था और ऐसी hi एक माइड पे पूरी सावधानी से वीरू आगे बढ़ता जा रहा था

वो आगे बढ़ते हुए अपने काले छाते को मजबूती से थामे हुए था पर तेज़ हवा बार बार उस छाते को उसके हाथ से जुड़ा करने की पूरी कोशिश में लगी हुई थी

"पूरा तोह भीग hi जा रहा हु.. छाते का फायदा hi किया है ?"

वीरू आगे बढ़ते हुए खुद से कहता है, और उसका ऐसा कहना सही भी था ककी उसका पूरा कुरता और धोती पूरी तरह भीग चुकी थी असल में हवा क साथ पानी hi तीव्र बौछार उसे पूरी तरह भिगोये जा रही थी ऐसी क चलते हुए अब उसने छटा बंद hi कर लिया ककी और अब वो पूरी तरह भीगता हुआ तेज़ कदमो से अपने खेतों की और बढ़ता चला जाता था

वीरू पूरी गति से आगे बाद रहा था और उसका खेत ज्यादा दूर नहीं था, की तभी दूर कही पहाड़ पर बिजली कड़क उठती है और एक पल के लिए अस्स पास क सभी खेत ऐसे चमक उठते है जैसे रात क अँधेरे में किसी ने तीव्र रौशनी कर दी हो.. hari-hari फैसले इस समय तेज़ हवा क चलते पूरी तरह भूमि से चिपक सी गयी तोह कही सरसो क खेतों का बुरा हाल नज़र आ रहा था, कुलमुलकर पानी जहा खेतों क लिए वरदान था वही कभी कभी अभिशाप भी बन जाता है.. और ये बात सिर्फ एक किशन hi समझ सकता है

आखिरकार वीरू अपने खेत पे पहुंच क सबसे पहले वही बानी अपनी छोटी सी झोपडी में प्रवेश करता है जहा दरवाजा या ताले जैसी कोई चीज़ थी hi नहीं, अंदर घुसते hi सबसे पहले वो अपना वो काम न आने वाला छटा एक और रखता है और फिर अपनी हालत वही सामने एक आधे टूटे सीसे में देखता है तोह पता लगता है की वो पूरी तरह भीग चूका है.. कुर्ते और धोती से पानी तेज़ी से टपक रहा था और बदन ठण्ड से ठिठुर रहा था, वैसे उसने एक मोती शाऊल जरूर ले राखी थी पर अब उसका कोई फायदा नहीं बचा था इसलिए सबसे पहले उसे hi उतर क हर्षिता द्वारा कभी बंधी गयी उस रस्सी पे और तंग देता है

वीरू ने एक बार बहार की और देखा जहा बारिश अपना उग्र रूप लेती जा रही थी, और फिर तुरंत hi वही झोपडी क अंदर एक कोने में राखी सुखी लकड़ियों क ढेर की और बाद चलता है, झोपडी में चाय जैसी छोटी मोती चीज़ बनाने क लिए उसने पूरा प्रबंध किया हुआ था और ये सब भी हर्षिता की कार्यगुजारी का hi नतीजा था.. जल्दी hi वो वही मिटटी क चले में लड़किया भरना सुरु कर देता है पर अब दिक्कत ये थी की बारिश क इस मौसम क कारन लड़किया सीला सी गयी थी वो इतनी आसानी से जलने वाली नहीं थी, सबसे पहले वो वही तंगी एकलउटि लालटेन को लेता है पर ये तोह पूरी खली थी मिटटी क टेल की एक बून्द भी इसमें नहीं बची थी, पर उसी लालटेन में अटकी हुई माचिस जरूर उसके काम आने वाली थी

पर तभी उसके दिमाग में बिजली सी खोंधती है और वो टपक से उठता है और झोपडी क अंदर एक कोने में रखे घास क ढेर क पीछे अंदर हाथ घुसा देता है और जब उसका हाथ बहार आता है तोह उसमें एक देसी धरु की नारंगी बोतल थमी हुई थी जिसे देखते hi उसके अधरों पे मुस्कान खिल उठती है

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"आआह्ह्ह्ह.. माँ की छूट इस ठण्ड की.."

वो जल्दी से उस मिटटी क चूल्हे क समीप लौटता है और उस देसी दारू की सीसी का ढक्कन खोलते hi सबसे पहले उसे मुंह से लगा क अचे से घातक जाता है और जब वो बोतल को मुंह से हटाता है तोह वो आध से ज्यादा खली हो चुकी थी.. नारंगी ने अपना काम करना सुरु कर दिया था ककी अब वीरू क पुरे सरीर में एक मीठा सुरूर चढ़ने लगा था और साथ hi साथ गर्मी का तीव्र प्रवाह उसके सरीर में दौड़ने लगा, वो बाकि बची हुई दारू को उन लड़कियों पे उड़ेल देता है और फिर बस माचिस की एक तीली दिखने की दिएर थी और लड़किया ऐसे आग पकड़ लेती है जैसे मेरी Maa(Maalti) की छूट देखने क बाद मर्दो क लुंड आग में जल उठते है 😉

अगले hi पल पूरी झोपडी आग की हलकी लाल और पीली रौशनी से भर गयी थी, वीरू जल्दी से अपनी ठण्ड से कांपती हुई उँगलियाँ आग के पास ले जाकर सेकना सुरु कर देता है.. बाकि का काम तोह उसकी दारू कर hi रही थी

वीरू कुछ दिएर वही बैठा रहता है पर अपने भीगे कपड़ों को खुद से अलग नहीं करता, सायद दारू की गर्मी और उसका नशा उससे कह रहा था की अब इसकी जरुरत नहीं.. कुछ पलों बाद वो अपनी जगह से उठता है और वही झोपडी में राखी अपनी कुदाल उठा क उसी बारिश में काम पे जुट जाता है, देखते hi देखते अगले 1 जानते क अंदर hi खेत की साडी टूटी माइड सही हो चुकी थी और इस बीच वीरू एक पल क लिए भी नहीं रुकता था.. न वो न उसके हाथ

ये एक किशन की म्हणत थी जिसे समझना हर किसी क बस की बात भी नहीं

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वीरू पूरी तरह थक चूका था और उसी हालत में भीगा हुआ वापस अपनी झोपडी में पहुँचता है और कुदाल एक और रख क जैसे hi आग क सामने वापस से बैठने को होता है उसके लुंड में सिरहन सी दौड़ जाती है

"बहनचोद ये ठण्ड में कितना मूतना पड़ता है.."

एक बार फिर से वो वैसे hi भीगते हुए बहार निकल क झोपडी क पीछे वाले हिस्से में चल पड़ता है ककी सामने तोह उसकी फसल लहरा रही थी, वह पहुंचते hi वो बिना देरी क अपनी धोती को उठा क अपना मोटा लुंड बहार निकल लेता hi और वही जंगली घास पे मूतना सुरु कर देता है जिससे उसके लुंड से निकलती गरम गरम धार उस जंगली भीगी हुई झाड़ियों को और भिगोने लगती है

अपनी टंकी पूरी तरह खली करने क बाद वो वापस से अपने लुंड को अपनी भीगी धोती में कैद कर लेता है.. और सोचता है चलके एक और बोतल निकल लेता हु, वैसे वो हमेशा वह काम से काम 5-6 देसी दारू की बोतल छुपा क रखता है

तभी एक बार फिर से आसमान में तेज गर्जन सी होती है और वीरू अपना सर उठता है जहा बारिश की बंधे सीधा उसके चेहरे पे पड़ती हुई उसे ठण्ड का एहसास देती है

"न जाने आज ये बारिश किया करवा क मानेगी.."

पर वीरू को किया पता इस बारिश ने आज कितना कुछ करवा लिया है

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कंटिन्यू... 👇
 
वीरू अपनी धोती सही करते हुए सामने दरवाजे की और जैसे hi लौटता है की उसे कुछ ऐसा नज़र आता है की उसकी आँखें फैलती चली जाती है, ककी वह ठीक दरवाजे क सामने एक अनजान औरत कड़ी थी जो अपना सर उठाये हुए मानो बारिश की एक एक बून्द को अपने चेहरे पे महसूस कर रही हो.. उसका सरीर हर्षिता की तरह hi सावला था पर सरीर का हर नंगा अंग कुछ ज्यादा hi विशाल और कामुक था



उसके चेहरे और भीगे बालों से होता हुआ पानी उसकी उन्नत और ज्यादा hi बड़ी पर गोल चूचियों पे बेहटा हुआ उसकी काली काली झांटों तक पाहकः रहा था असल में इस समय वो औरत कुछ ऐसी कड़ी थी की उसका सर ऊपर आसमान की और उठा था और आँखें बंद थी.. उसके दोनों हाथ बालों में ऐसे चल रहे थे जैसे वो अपने सर की हलकी कामुक मालिश कर रही हो और इस सभी क कारन उसकी विशाल गोल चूचिया ठीक वीरू की और सर तने कड़ी थी

वीरू तोह जैसे सांस लेगा hi भूल जाता है.. उसका मुंह खुला का खुला रह जाता है जहा बारिश की तेज बूंदें उसके होंठों से टकराते हुए उसके मुंह में भर रही थी, वीरू मुश्किल से उन गोल सख्त चूचियों से अपनी नज़रों को हटा क थोड़ा नीचे कर्त है तोह उसे उस अनजान औरत का कामुक सावला पेट नज़र आता है जिसकी नाभि कुछ ज्यादा hi गहरी थी कुछ ऐसी जैसे वो छोटी सी छूट हो..

इस बारिश ने मानो उसकी सावली रंगत को और ज्यादा निखार दिया था, ककी जब वीरू की नज़रें उसकी गहरी नाभि को पार करते हुए नीचे की और सरकती है तोह उसे उस औरत की योनि क ऊपर उघि काली काली झांटें नज़र आती है जिनसे इस समय बारिश का पानी बेहटा हुआ नीचे गिर रहा था

एक बचे का बाप 'वीरू' भी ऐसा नज़ारा देखते हुए जैसे पत्थर की मूर्ति बन गया था.. वो बस एकटुक उस कामुक औरत को देखे जा रहा था जो पूरी तरह बारिश की हर बून्द का आनंद लेते हुए उसे अपने चेहरे अपनी विशाल और गोल चूचियों पे महसूस कर रही थी, तभी वो उसी हालत में धीरे से घूम जाती है मानो जैसे जान क वीरू को मौका दे रही हो अपने यौवन क दर्शन करने का

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और अब वीरू की आँखों क सामने थी उसकी मादक और गोल गांड जिसे देख क ऐसा लग रहा था जैसे 2 बड़े बड़े तरबूज को इन्शानि खाल पहना क उसके सरीर से चिपका दिया गया हो.. ककी वो वैसे hi सख्त और गोल थे, बारिश का पानी और तेज़ बुँदे उसकी पीट पे गिरती हुई उसके गांड की दरार में कही खोटी जा रही थी तभी उस औरत क चूतड़ों में हलकी सी थिरकन होती है और वीरू क कानो में स्वर सुनाई पड़ता है

"किया देख रहे है.. वीरू जी.. ?"

वीरू जैसे आसमान से धरा पे लौट आया था, वो जल्दी से अपना चेहरा उसके चूतड़ों से हटा क ऊपर करता है तोह उसका दिल dhak-dhak करने लगता है ककी वो औरत अपना चेहरा घुमाये हुए अब उसे hi निहार रही थी..

वीरू का हाल उस बचे जैसा हो चूका था जो जीवन में पहली बार कोई नंगी औरत डेक रहा हो

"वो.. मैं.. मैं… मतलब.."

वीरू की हालत क चलते उसके सब्द भी उसका साथ नहीं दे रहे थे, वो किसी बचे जैसे ऐसी ठण्ड में काँप उठा था, वही वो अनजान कामुक निवस्त्र स्त्री मुस्कुराते हुए पूरी तरह उसकी और मुद जाती है जहा एक बार फिर से वीरू को उसके मोठे कैसे और गोल दूध क दीदार मिलने लगते है साथी hi उन दूध पे वो काले ठप्पे वाले निप्पल्स वीरू क लुंड में सीधा करंट पहुंचने लगते है, वैसे सायद वीरू को पता नहीं है की उसका लुंड पूरी तरह सर उठा क खड़ा हो चूका है

वीरू महसूस करता है की न जाने कैसे पर वो उस अनजान औरत क प्रति अजीब सा खिचाव महसूस कर रहा था, जैसे दारू का नासा अचानक से कई गुना बाद गया हो.. वही वो कामुक नंगी बारिश में भीगती हुई औरत मुस्कुराते हुए अपना एक हाथ अपनी चुकी पे लती है और अपने निप्पल को अपनी उँगलियों क भींच भर क उससे खेलते हुए फिर से कहती है

"किया देख रहे है.. वीरू जी.. ?"

पर वो इतने पे hi नहीं रूकती, अब वो अपना दूसरा हाथ अपने भीगे पेट से सरकती हुई अपनी गहरी नाभि को पार करती है, और फिर धीरे से उसका हाथ उसकी काली काली झाटों से खेलते हुए धीरे से उन्हें फैलता देता है जिससे अगले hi पल वीरू को उस सावली छूट क अंदर का गुलाबी भाग दिख जाता है पर उसने खेल तोह बस सुरु hi किया था ककी वो अपने उसी हाथ की एक ऊँगली को धीरे से अपनी योनि क अंदर प्रवेश करवा देती है

"Aaaaaaaaaaahhh.. वीरू Jiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.."

उस औरत क होंठ कामुकता क चलते ऐसे काँप रहे थे जैसे किसी कुवारी लड़की की छूट में पहली बार ऊँगली गयी हो, पर असल जुल्म तोह हमारे वीरू पे हो रहा था उसके मुख से तोह जैसे सब्द hi बहार आना बंद हो चुके थे, वो बस एकटुक उस औरत को उसके अपने अंगों से खेलते हुए देखे जा रहा था.. जो न जाने कहा से उसके खेत पे आ गयी थी

जहा वो औरत अपने खेल और गरम बनाते हुए पानी में आग लगाने का काम करते हुए अपनी उस ऊँगली को योनि में घुसा क अब धीरे धीरे अंदर बहार करने लगती है और धीरे से आआह्ह भरते हुए वीरू से कहती है.. जहा एक एक सब्द ऐसा लग रहा था जैसे वो वीरू क सरीर पे काबू प् रहा हो

"Aaaaaaaaaaahhh… देखिये न वीरू जी मेरी छूट आपके लिए कबसे रो रही है, और आप है की न जाने कहा गायब थे.. "

वीरू बड़ी मुश्किल से ऐसा नज़ारा देखते हुए खुद क शब्दों को आज़ाद कर पता है, वो अपनी कांपती हुई आवाज़ में कहता है

"कोण.. कोण है.. ाआपपपप.. ?"

वो मुस्कुरा पड़ती है

"मैं वही हु जिसने इस खेत पे आपको आपकी पत्नी क साथ तब देखा था जब आप बेहरहमी से उसकी गांड का द्वार चौड़ा कर रहे थे..

गर्मियों की वो रात, याद है न ?"

वीरू का पूरा जिस्म थरथरा जाता है, ककी वो अनजान औरत करीब 16-17 महीने पुराणी उस रात की बात कर रही थी जब उसके अंदर से वो नया बीज अंकुरित होना सुरु हुआ था

तभी वो बारिश में भीगती हुई नंगी औरत आगे कहती है

"उस दिन मैंने जाना की एक मर्द कैसा होना चाहिए..

अपनी पत्नी को छोड़ने का काम तोह हर पति कर लेता, पर उसे दूसरों से छुड़वाना की लालशा रखने वाला hi असली मर्द होता है"

वीरू का पूरा चेहरा पीला पद जाता है, ककी जो कल्पना बस उसके और उसकी पत्नी क बीच थी आज वो एक तीसरे व्यक्ति को पता चल गयी है.. पर वो रहस्य्मय औरत मुस्कुरा पड़ती है और धीरे से हस्ते हुए वीरू की और आगे बढ़ती है और मुस्कुरा क आगे कहती है

"अरे आप तोह ऐसे दर रहे है जैसे मैं ये राज़ पुरे गाओं को बताने वाली हु.. भरोषा करिये मुझपे"

पर तभी वो अपनी नज़रें नीचे झुकाती है और मुस्कुरा क कहती है

"हीी सैतान कसम.. ये इतना बड़ा किया खड़ा कर रखा है आपने ?"

वो धीरे से अपने होंठों पे अपनी जीभ फिरते हुए वीरू क सरीर में दौड़ते खून की रफ़्तार को मानो महसूस सी करती हुई कहती है

"वैसे किया ये मेरे लिए है.. ?"

उस औरत ने बात वीरू की भीगती हुई धोती में उस विशाल उभर को देख क कही थी, जिससे वीरू क पुरे सरीर में कामुकता की सिरहन दौड़ गयी.. पर असली हैरानी तोह तब हुई जब वो उसके इतना पास आके कड़ी हो गयी की उसकी चूचियों पे गिरती बारिश की बंधे पानी क रूप में उछलते हुए 'सोनू क बाप' क चेहरे पे पड़ने लगी

आप कितने भी मजबूत और ताक़तवर क्यों न हो, पर अगर ऐसी बारिश और ऐसे हड्डी तक कंपकपा देनी वाली ठण्ड में आपके सामने कोई ऐसी गर्दै बड़ी बड़ी चूचियों वाली सावली औरत अपने सख्त दूध को लिए कड़ी हो जिसकी काली काली झांटों क बीच उसकी गुलाबी छूट में उसकी ऊँगली गपागप अंदर बहार हो रही तोह आप अपनी सुधबुध खो hi डोज, फिर ये तोह 'मालती का देवर' वीरू hi था

"ये.. ये तुम किया कर रही हो.. कोण.. कोण हो, और यहाँ मेरे खेत पे क्यों आयी हो ?"

पर सबसे बड़ा सवाल

"किया चाहिए.. ?"

वीरू आखिर अपने सभी सवाल पूछ hi लेता है जिसे सुनकर वो कामुक नंगी औरत अपना दूसरा हाथ जो अब तक उसकी गरम चुकी पे उसके अपने निप्पल को मसल रहा था वह से हैट क नीच की और अत है और वीरू क पैरों क बीच आगे बढ़ते हुए अगले hi पल उसकी कड़ी मीनार को दबोच लेता है

"ये……"



कंटिन्यू... 👇
 
बेचारा वीरू पूरी तरह बौखला सा जाता है

"किया.. मतलब.."

पर वो एक कदम भी पीछे नहीं हत्ता, और फिर वो रहस्मय औरत अगला कामुक प्रहार करती है.. वो पियर से गीली धोती क ऊपर से hi वीरू क लुंड को अचे से मुठी में दबोच लेती है और जैसे hi उसे उस लुंड की मोटाई का अनुमान होता है उसकी चुकी में दिखने वाली थिरकन उसकी खुसी को बताने का काम करती है

"हैईईई… उस दिन जब ये यही खेत पे 'हर्षिता' की गांड में घुस रहा था, तब इसकी मोटाई इतनी नहीं लग रही थी.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़… ये तोह किसी कुवारी लौंडिया की जान hi निकल दे.."

वीरू जैसे hi ये सुनता है उसकी आँखों क सामने गर्मी की उस रात का दृश्य फिर से घूम जाता है जब उसने अपने ऐसी खेत में हर्षिता को नंगी करके उसकी गांड मरी थी.. पर वो रात क अँधेरे में हुआ था करीब 12:00 बजे, और उसने ये भी अचे से पक्का किया था की कोई अस्स पास है तोह नहीं जो उसकी और उसकी पत्नी की ये कामुक रासलीला देख ले

वीरू- (अपने लुंड पे अब भी, उस अनजान औरत क हाथों का गरम स्पर्श महसूस करते हुए कहता है) तुमने ये सब कब देखा.. कैसे.. कोण हो.. ?

वो अनजान औरत जोर से वीरू क लुंड को मुठी में भरने का पूरा प्रयास करती है पर लुंड की मोटाई उसे ऐसा नहीं करने देती और मुस्कुरा क वीरू क पैरों में बैठने लगती है.. जिससे वीरू तोह बस हैरान hi रह जाता है उसे समझ नहीं आता जिसे वो जनता तक नहीं वो उसके बारे में इतना सब जानती है और अब उसके पैरों में ऐसे क्यों बैठ रही थी पर उसके सवाल का जवाब वो औरत खुद hi दे देती है.. ककी जैसे hi वो बैठती है तुरंत hi अपना मुंह आगे करके वीरू क लुंड क टोपे को उसकी गीली धोती क ऊपर सी चुम लेती है

"Ummmmmmmmmmmmmm………………"

वीरू तोह जैसे हैरान hi रह जाता है वो कई सवाल पूछना च रहा था पर जैसे उस औरत की उस हरकत ने उसके सरे सवालों को उसके दिमाग से hi गायब कर दिया था वो बस हैरानी से भरा हुआ उस बारिश में भीगता हुआ कुछ कह hi नहीं पाटा, वही वो औरत जिसने अभी तक अपना नाम तक नहीं बताया था और बात वीरू क लुंड को चूमने तक पहुंच चुकी थी वो अपना चेहरा ऊपर उठती है और वीरू की आँखों में देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"बहार निकल लू ऐसे.. ?"

वीरू तोह जैसे किसी बहुपस में बंद चूका था, मानो जैसे कोई काला जादू हुआ हो उसपे वो बस अपनी तेज़ होती साँसों को सँभालने की कोशिश करते हुए धीरे से 'है' में अपना सर हिला देता है.. वैसे उस औरत को देख क लग नहीं रहा था की उसे किसी अनुमति की जरुरत हो ककी वीरू क सर हिलने से पहले hi उसने धोती को किनारे खिसकना सुरु कर दिया था और जल्दी hi उसकी आँखों क सामने हर्षिता क हक़ वाला लुंड था

"Aaaaaaaaaaahhh.. कितना मोटा hai….Ummmmmmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmm… Slllluuuuuuuuuuuupp.."

वो तोह जैसे टूट hi पड़ती है, वो पहले तोह उस नंगे हो चुके लुंड पे अपने लाल होंठों को रख क पियर से चूमती है जिससे अभी कामुक की अधिकता से वीरू की आँखें बंद होना सुरु hi हुई थी की वो अपनी जीभ निकल क पुरे मोठे सुपडे पे चला क उसे ऐसे चाट लेती है मानो उसपे सेहद लगा हुआ हो

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वीरू को अपने ऊपर मानो जैसे विश्वास hi नहीं हो रहा था, वो बस अपना थूक गटकते हुए पूरी परिस्तिथि पे यकीन करने की कोशिश करते हुए अपनी धोती से बहार निकले हुए लुंड क ठीक सामने उस औरत क होंठों और उसके मुंह से निकलने वाली गरम साँसों से गरम होता हुआ खुद को ये यकीन दिला रहा था की सब सत्य है

"देखिये.. आप… मतलब कोण है.. ?

और इतनी बारिश में यहाँ कैसे, घर जाइए बारिश में भीग क बीमार पद जाएगी"

"तुम इस जरा से बारिश क पानी की परवा मत करो, यु समझो मैं तोह रहती hi पानी में हु.."

वो अपनी आँखों को ऊपर किये हुए वीरू की आँखों में देखते हुए धीरे से सबसे महत्वपूर्ण बात कहती है

"और तुम मुझे 'माया' कह सकते हो.."

इतना कहते हुए वो कैसे बदन की बड़ी बड़ी आँखों वाली उन्नत और नंगी औरत जो इस समय वीरू क सामने खेत की भूमि पे बैठी हुई थी, वो अपने लाल लरजते हुए होंठों को आगे बड़ा क 'सोनू क बाप' क लुंड क लाल टोपे पे एक बार फिर से पियर से चुम लेती है

"Ummmmmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmmmm.."

एक अनजान औरत से यु पहली बार मिलना और ऐसे इतनी जल्दी उसके द्वारा अपने लुंड का टोपा चुना जाना.. वीरू क लिए किसी सपने जैसा था, उसे अब भी अपनी किस्मत पे यकीन नहीं हो रहा था.. वही जब माया ने उसके लुंड क मोठे टोपे पे अपने होंठों को रखा तोह वीरू क पुरे सरीर में ऐसी सिरहन भर गयी थी जैसे किसी ने दुनिया की सबसे ठंडी चीज़ को उसके सुपडे से चुवा दिया हो, न जाने क्यू वीरू को माया में वो गर्माहट नहीं दिखी पर कुछ तोह था उसमें जो उसे नशीला बना रहा था सायद उस दारू का असर..

पर वो औरत जिसने अपना नाम माया बताया था वो इतने पे hi नहीं रूकती, धीरे से अपना मुंह खोलती है और अपने लाल गीले होंठों को पूरा खोल क हर्षिता क पति का मोटा लाल सूपड़ा उन होंठों में भर क ऐसे चूस लेती है जैसे उसपे सेहद लगा हो और पूरा सेहरल्ड एक hi बार में उसे चूसना हो

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh………"

माया नमक जिस स्त्री की माया से वो अनजान था, उसकी एक झलक जग्गू कोहरे में मालती क रूप में पहले hi देख चूका था..

(ये अपडेट याद है की भूल गए 😉)

साथ hi वीरू ये भी नहीं जनता था की ये वही 'सर्प नदी' की यक्षिणी है जिससे कुंदन ने मोनू को बचा क उसकी आत्मा को उसका आहार बनने से रूक दिया था

माया एक बार फिर से अपना होंठों को खोलती है और इस बार सुपडे क थोड़ा ऊपर तक अपने होंठों को ले जेक पूरा लाल सूपड़ा अपने मुंह में भर लेती है और फिर सोनू क बाप क सुपडे पे अपने होंठों का भरपूर दबाव डालते हुए उसे एक बार फिर से चुस्ती है जैसे दशेरी आम से एक hi बार में पूरा गुदा चूस लिया जा रहा हो

"Ummmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm…… Sssssssssssrrrrrrrrppppppppp……. Ummmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm…"

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माया की एक कामुक माया का जादू कुछ ऐसा था की वीरू का पूरा सरीर थरथरा सा जाता है, ऐसा प्रतीत हो की किसी भी पल उसके लुंड से गरम वर्षा सुरु हो जाएगी.. जबकि खेल तोह अभी प्रारम्भ तक नहीं हुआ था, उस घनघोर बारिश में भीगती हुई माया न जाने कोनसा खेल खेलने आयी थी

उसकी की ऐसी कामुक हरकत की वजह से वीरू क सरीर में कामवासना का अलग hi संचार होने सुरु हो चूका था.. और आनंद की अधिकता क चलते उसकी आँखें बंद होती चली जाती है, पर माया वापस से वही दोहराती है और हर बार उसके होंठों की गिरफ्त पहले से ज्यादा मजबूत होती जा रही थी…. "Slllllllllllllllllluuuuuuurrrrrrrrrrrrrrpp…………."

वीरू अपनी आँखों को बंद किये हुए जैसे एक नयी दुनिया की सैर पे निकल जाता है, और आनंद की अधिकता उसके मुख से उन शब्दों को आज़ाद कर देती है

"आआआआहहहहहहह..... Maaaaaaaaaaaaaaaa…… यकीन नहीं होताआ… मेरी किस्मत इतनी अछि है……. Aaaaaaaaaaahhhh......

पर मैं तुम्हे जनता भी नहीं.. आखिर कोण हो तुम ?

कहा से आयी हो.. ?"



कंटिन्यू... 👇
 
माया, वीरू क सुपडे को जोर से चूसने क बाद अपने होंठों को अलग कर्कटी है और अपना चेहरा ऊपर उठाते है जहा की तेज बूंदें सीधा उसके होंठों और माथे पे गिरती है.. वो मुस्कुरा क कहती है

"तुम मुझे अचे से जानते हो वीरू.. और रही बात मैं कहा से आयी हु, तोह जान लो मैं ऐसी गाओं की हु"

वो ये कहते हुए फिर से वीरू क सुपडे को मुंह में भर क जोर से चूस लेती है

"उम्मम्मम्मम..... सल्ल्ल्लूऊप्प..........."

वीरू- (इतनी बेहरमी से अपना सूपड़ा चूसने वाली से फिर से दूसरा सवाल कर देता है) पर मैंने तोह कभी तुम्हे इस गाओं में नहीं देखा, कही बहार की हो ?

माया एक बार फिर से अपने होंठों को अलग करते हुए उसकी आँखों में देखते हुए कहती है

"नहीं मैं हमेशा से ऐसी गाओं में राहु हु, बल्कि अगर चहु भी तोह ये गाओं चोर क नहीं जा सकती.."

और एक पल क लिए उसके चेहरे का रंग जैसे ग़ुस्से से लाल हो जाता है

"उस बुड्ढे की वजह से..."

पर ये सब्द इतने कमजोर थे की वीरू तक नहीं पहुंच पाते

वीरू फिर से कुछ पूछना च रहा था पर इस बार माया पहले hi उसके लुंड पे अपना हाथ आगे से पीछे की और फिरते हुए बोल पड़ती है

"वैसे वीरू जी, सोचो अगर.. मेरी जगह तुम्हारी पत्नी हर्षिता होती, और तुम्हारे लुंड की जगह किसी और का लुंड होता..

जैसे उस रात हर्षिता कह रही थी"

माया की इस बात को सुनकर एक बार क लिए जैसे वीरू उस 16-17 महीने पहले की गर्मी भरी रात में लौट जाता है और उसके कानो में उसकी पत्नी क वो सब्द गूंज उठते है जो उसने उस दिन पहली बार कहे थे

"आआह्ह्ह... जी सोचिये अगर आपकी जगह कोई और होता.. तोह आपको कैसा लगता ?"

ऐसी रात से तोह सब सुरु हुआ था, वैसे इस अनोखी ीचा क भीज तोह बचपन में बोये थे उसके अंदर.. पर वो अंकुरित उस रात को हुए थे उसकी पत्नी क सब्दो क साथ

माया समझ चुकी थी की वीरू कहा खोता जा रहा है, इसलिए वो उसके लुंड पे अपने हाथों का दबाव बनाते हुए उसे वापस लौटा लती है और मुस्कुरा क कहती है

"जैसे मान लो.. तुम्हारे बड़े भाई 'महेंद्र' का"

वीरू ये सुनता है तोह हैरानी की अधिकता में उसकी बंद आँखें खुलती चली जाती है ककी जिस उलझन क चलते वो इतनी बारिश में यहाँ खेत पे आया था, माया क मुख से वही सब्द बनकर निकल रहे थे

वही माया मंद मंद मुस्कुरा पड़ती है और खुद से कहती है

'वीरू तुम सोच रहे होंगे की मुझे इतना सब कैसे पता चल रहा है.. अब तुम्हे कैसे समझौ

ये मेरी यानि माया की माया है, की जिसके सरीर को मैं चुटी हु उस पल उसके दिमाग में चलती हर चीज़ को पढ़ सकती हु'

वही वीरू इस पल ये सोचने पे मजबूर हो गया था की जो बात आज तक उसने सिर्फ अपनी पत्नी हो hi बताई थी वो इस औरत को कैसे पता है ?

ये औरत कोण है जो उसके दिल में छुपी इतनी बड़ी कामना को जानती है, पर वीरू जैसे hi सवाल करने क लिए अपना मुंह खोलता है उसके मुख से सब्द नहीं बस कामुकता और आनंद की सिसकारी hi बहार आती है ककी माया ने इस बार पूरा मुंह खोल दिया था और देखते hi देखते वो वीरू का पूरा मोटा लुंड एक hi बार में गले तक हजम करती चली जाती है..

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उसने लुंड को मुंह में इतने अंदर तक भर लिया था की वीरू को अपना मोटा सूपड़ा उसके गले क अंदर तक जाता हुआ महसूस होता है और एक बार फिर से उसकी आँखें बंद होती चली जाती है और सवालों की जगह बस कामुक सिसकारियां hi बहार आती है

"Aaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh… माआआआ………"

नारी आम हो या कोई यक्षणी वो मर्द से खेलना ाचा से जानती है

माया पूरा लुंड अपने गले तक उतरने क बाद अपनी आँखों को ऊपर उठा क वीरू की बंद होती आँखों को देखती है जिससे उसकी आँखों में आयी वो चमक उसकी पहली जीत का ध्वजारोहण करने लगती है.. वो वीरू क लुंड को अचे से मुंह में भरते हुए उसके होंठों का चला सा बनती है और मुंह की गर्मी का पूरा कमल दिखते हुए जोर से चूस लेती है

"Srrrrrrppppppppppplllllllllllllllluuuuuuuuuuupppppppppp...... उम्मम्मम्मम्मम......"

वीरू तोह जैसे एक hi पल में सातवे आसमान पे पहुंच चूका था.. उसे अपनी किस्मत पे यकीन hi नहीं होता की इतनी कामुक औरत जो उससे पहली बार मिली है वो ऐसी बारिश में आज उसका लुंड कैसे चूस ले रही है

पर माया ने तोह अभी खेलना सुरु hi किया था ककी वो पुरे लुंड को जोर से चूसते हुए सुपडे तक बहार लाती है और फिर एक हाथ आगे बड़ा क 'सोनू क बाप' क दोनों मोठे ाँद से खेलते हुए वापस से अपने मुंह की गहराई में भर लेती है

"Ummmmmmmmmmmm.. Gllllllluuuuuuuuuuuurrrrrrrrrrrppp….. Ssssssssssllllluuuuuurrrrrrrrppp…. गरररररररररुऊललललल्लूऊऊऊऊप्प्प…. Ssssssssssrrrrrrrrppp.."

वीरू तोह उस मुंह की गर्मी क आगे सब कुछ भूल सा जाता है, उसे कुछ समझ hi नहीं आता.. किसी क मुंह क अंदर ऐसी गर्मी उसने आखिरी बार अपनी जवानी क दिनों में महसूस की थी जब वो खुद खुद सोनू की उम्र का था और ऐसे hi उसके लुंड को उसने अपने मुंह में लिया था जिसके सपने उसने जवान होते hi देखने सुरु कर दिए थे.. उस औरत को वीरू का पहला प्रेम भी कह सकते है, और आज इतने सालों क बाद उसे वही मुंह क अंदर की गर्मी महसूस हो रही थी जो योनि से भी ज्यादा गर्माहट उसके अंदर भर रही थी

“Aaaaaaaaaahhhhhhhhh…. माआआआ…. जोर से चुसो…. आआआआह्ह्ह्ह…. पूरा भर लो… मुंह में…. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh…. घुसा लो मेरा लुंड.. पूरा मुंह में…. Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh…”

सर्प या माया क नाम से जाने जानी वाली वो यक्षणी जो गाओं की एकलउटि जीवन रेखा यानि सर्प नदी की स्वामिनी थी, वो आज अपने सालों क अनुभव की पूरी चाप चोर रही थी.. एक hi बार में पूरा लुंड गले की गहराई तक घुसा लेती, इतना hi एक hi पल में वीरू को उसके गले क अंदर की संकरी गली में अपना लुंड फास्ट हुआ महसूस होता और अगले hi पल वो वह से निकल क गालों की गीली और गरम दिवार से आके टकराता और फिर पुरे मोठे लुंड पे जीभ का गीलापन महसूस करवाते हुए वो उसके लुंड को जैसे hi बहार निकलती तोह तुरंत hi मानो बिना सांस लिए अपनी जीभ निकल क पुरे सुपडे पे ऐसे चला देती की वीरू का पूरा जिस्म कैंप उठता..

पर जल्दी hi वो इस कला को दिखते हुए दोहरे हमले भी करने लगी थी, यानि जहा लुंड को अपने गरम मुंह से आनंद देती रही, वही अपने एक हाथ से 'सोनू क बाप' क दोनों ांडों से ऐसे खेलने लगती की हर्षिता क पति क पुरे सरीर में कामुकता की बिजली दौड़ उठती

अपने पुरे जीवन में सिर्फ 2 योनि की गर्मी लेने वाला वीरेंदर आज इस तीसरी आग क आगे पिघलता जा रहा था, उसके आनंद की कोई सीमा hi नहीं दिख रही थी.. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो फिर से एक जवान अल्हड लड़का हो जिसे एक कामुकता से भरी औरत जवानी का मतलब सीखा रही हो

वो अपने बड़े भाई 'महेंद्र' जैसा नहीं था, जिसने न जाने कितनी कुवारी कालिया खिलाई होंगी..

वो अपने मंझले भाई 'कुंदन' जैसा भी नहीं था, जिसके लुंड क वार क आगे बड़ी बड़ी गदराई खुद को रैंड कहने वाली औरतों ने भी रोना सुरु कर दिया हो.. वो बस एक ऐसा मर्द रहा है जिसे जवान होते hi उसके सपनों की वो गदराई औरत मिली जो उसका पहला प्रेम थी और फिर जब शादी की उम्र हुई थी 'हर्षिता' का सलोना साथ उसे मिला

बस यही उसके जीवन की पूरी कहानी थी.. पर ऐसा भी नहीं की उसे कभी और कोई पसंद न आयी हो या किसी और क लिए उसके लुंड ने फुफकार न मरी हो पर परिवार का दर और उस नारी क प्रति उसके सम्मान क चलते उसने कभी आगे बढ़ने की हिम्मत hi नहीं जुताई आखिर वो औरत उसके सेज भाई कुंदन की पत्नी जो थी.. यानि मेरी माँ 'मालती'

पर तभी माया पुरे लुंड को गले तक भर क वापस अपने होंठों से चूसते हुए ऐसे बहार निकलती है जैसे कोई बचा लॉलीपॉप को जोर से चूसते हुए मुंह से खींचता है

"पुक्क्सक्ककककककककक……………. सल्ल्ल्लूऊप्प…."

वीरू तोह जैसे पूरा पागल hi हो गया था इस हरकत पे उसका पूरा सरीर थरथराहट से भर गया जिसमें कामुकता का भरपूर अंश था

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh………………….."

बाकि उसकी सिसकारी और कामुकता से भरी उसकी आअह्ह्ह ने खुद hi सब बता दिया था

"किया हुआ.. मालती की याद आ रही है… ?"

कंटिन्यू... 👇
 
माया अपना चेहरा उठा क, वीरू क दोनों ाँद एक साथ मसलते हुए उसकी और देखते हुए कहती है.. जहा वो नाम सुनकर वीरू पहले से ज्यादा हैरान रह जाता है ककी ये नाम तोह उसने कभी 'हर्षिता' क सामने भी नहीं लिया था, ये तोह उसके दिल में छुपी वो कामना थी जिसके बारे में वो किसी को बता hi नहीं सकता था और वो कहता भी किया.. की जब उसकी मंझली भाभी ने उस दिन अपने घर क पीछे उसे गले लगाया था तोह भले hi मालती क मन में ऐसा कुछ न हो.. पर वीरू क दिल में उस दिन वो दबी हुई आग फिर से भड़क गयी थी जिसे वो न जाने कबसे छुपाये हुए था, पर उसके खड़े होते लुंड ने उसके दिला का हाल बता hi दिया था तभी तोह मालती तुरंत hi हैरानी से भरी हुई उससे अलग हो गयी थी और एक पल क लिए तोह बेचारा वीरू अपनी मंझली भाभी से नज़रें भी नहीं मिला पाया था

(अगर किसी को ये अपडेट याद नहीं तोह मुझे बता देना 🙏)

माया की जीभ में न जाने किया था जो वीरू की हर दबी ीचा को उजागर करती जा रही थी, वो सवाल करना च रहा था पर ठीक पहले की hi भांति इस बार भी उसे सवाल करने का मौका नहीं दिया जाता.. ककी माया ने वापस से उसके पुरे गीले हो चुके लुंड पे अपने दूसरे हाथ को रख क सुपडे से लेके झांटों की जड़ों तक फिराया और फिर देखते hi देखते वापस से उस मस्त स्वाद से भरे हुए लुंड को पूरा जातक गयी पर इस बार वो पुरे वेग से चूसै का खेल खेलने वाली थी और ये बात उसने तुरंत hi समझा दी थी

"सलल्लूऊऊऊरररररररप्पप्प….. सरररररूप्प…. Ummmmmmmmmmmmm…… Slllllllluuuurrrrrrrrrrppp…. Ummmmmmmmmmmmmm….. सररररचक्कछहहाआप…. गलललललललूऊऊररररररप्प…. Ghuuuuuuuuuuuu….. Ghuurrrrrrrrpp…Sllllluuuupp…"

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अचानक से तीव्र हो चुके माया क प्रहार क आगे वीरू पूरी तरह अपने हतियार डालने पे मजदुर हो जाता है, और एक बार फिर से मालती का नाम सुनकर उसकी जो आँखें हैरानी से खुली थी वो फिर से बंद होती चली जाती है, और इस बार वो भी पीछे नहीं रहता.. अपना एक हाथ उसके बालों पे लेक जोर से उसके भीगे हुए कोमल काले बालों में अपनी उँगलियों को फसा क जोर जोर उसका सर अपने लुंड पे दबाना सुरु कर देता है, अब ये कहना मुश्किल हो रहा था की माया तेज़ी से लुंड चूस रही थी या वीरू उसके मुंह में तेज़ी से अपना लुंड घुसा रहा था.. ककी अब दोनों hi पूरी रफ़्तार से इस खेल में लग चुके थे, बारिश अब भी दोनों को भिगो रही थी.. ठंडी हवाएं अब भी उसके जिस्म से टकरा रही थी पर उन्हें उससे कोई फर्क पड़ता हुआ नज़र नहीं आ रहा था

इस समय वीरू क सुनसान खेत पे अगर कोई आवाज़ दूर दूर तक गूंज रही थी तोह वो माया क द्वारा एक मर्द का लुंड चूसने की सबसे सुरीली आवाज़ थी

"Srrrrrrppppppppppp...... घुम्म्म्मम्म्म्म..... घुम्म्म्मम्म्म्म... ह्ह्ह्हह्हहपपपपपू........ Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्म.... उम्मम्मम्मम्म....."

वीरू जहा आनंद की अधिकता क चलते अपनी आँखों को खुला नहीं रख प् रहा था वही दूसरी और माया बार बार अपनी आँखों को ऊपर की और उठा क वीरू क नसे से भरे हुए चेहरे को देख क ऐसे मुस्कुरा पड़ती जैसे वो जीत रही हो

"ह्ह्ह्हूऊऊऊरररररररपुप्पप… सरररररूप्प… गलललललललूऊऊररररररप्प… Srrrrrrppppppppppp...... घुम्म्म्मम्म्म्म..... घुम्म्म्मम्म्म्म... ह्ह्ह्हह्हहपपपपपू........ Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्म.... उम्मम्मम्मम्म..... गलललललललूऊऊररररररप्प…."

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जहा कुछ दिएर पहले अपनी किस्मत पे यकीन न कर पाने वाला वीरू अब पुरे वेग से उस अनजान औरत क मुंह की गहराई को अपने लुंड से नापे जा रहा था

"आआआअह्ह्ह...... खा ले साली मेरा लुंड… आअह्हह्ह्ह्ह कितना गरम मुंह है तेरा

… Aaaaaaaaaaaaaahhhhh.... इतनी गर्मी तोह छूट में भी नहीं होती… जितनी गर्मी तेरे मुंह में है…. कोण है तुम.. इतना सब कैसे जानती हो… आआअह्ह्ह्हह… और मालती भाभी को लेके तोह मैंने कभी कुछ किसी से कहा hi नहीं… आआआअह्ह्ह्हह…. गन्ने क कोल्हू जैसा है तुम्हारा मुंह… आआह्ह्ह्हह… मेरा पूरा रास निचोड़ लेगा ये… आआआअह्ह्ह्ह… हीी....... उफ्फ्फ्फ़..... है ऐसे hi.... आआह्ह्ह्ह....."

इस बार माया जोर से उसका लुंड चूसते हुए अपने मुंह से बहार खींच लेती है और उसकी आँखों में देखते हुए कहती है.. ककी जैसे hi लुंड बहार आया था वीरू की आँखें भी स्वतः hi खुलती चली गयी थी

"मालती क प्रति तुम्हारी वासना जानने क लिए कोई जादू थोड़ी चाहिए.. वो तोह तुम्हारी आँखों में hi दिखती है..

और हर्षिता क साथ किसी और को देखने की तुम्हारी ीचा तुमने खुद यही ऐसी खेत में उसे छोड़ते हुए बयां की थी.. भूल गए… ?"

वीरू एक पल क लिए तोह कुछ भी समझ hi नहीं पाटा पर तभी उसे उस दिन का वो पल याद आता है जब उसका लुंड उसकी पत्नी हर्षिता की गांड में अपना वीर्य भरना सुरु करता है और उसके मुख से वो सब्द अंततः निकल hi पड़ते है

"है मैं तुम्हारी छूट में कोई दूसरा लुंड देखना चाहता हु, जो तुम्हे एक रंडी जैसे चोदे... और फिर में उसका गाड़ा गरम वीर्य तुम्हारी छूट से चेतना चाहता हु

ाःह.. बताओ 'हर्षिता' मुझे ये सुख डौगी न.. ?"

ये वो सब्द थे जो उस रात उसके वीर्य क बहार आने क साथ साथ उस दिन उसके मुख से बहार निकल पड़े थे.. पर साथ hi उसे ये भी यकीन था की वह उस समय उस रात 'वो और हर्षिता' hi थे पर फिर वो खुद hi इसका उत्तर देता है

"यानि तुमने उस दिन वो सब सुन लिया था… ?"

वीरू ये बात पियर से उसके बालों में अपनी ऊँगली चलते हुए कहता है, तोह माया भी उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"और देखा भी था…."

वो इतना hi कहती है और एक बार फिर से उसके अपने थूक से पूरी तरह गीले और चमकते हुए लुंड को मुंह में भर लेती है, वो इतनी सरलता से पुरे लुंड को गले क अंतिम चोर तक उतर ले रही थी जैसे वो उसके लिए कोई बड़ी बात न हो.. और एक बार फिर से कामुकता का ये कामुक खेल सुरु हो जाता है

"Grrrrrrruuuuulllllppp……Srrrrrrppppppppppp..... Srrrrrrppppppppppp...... चावआपपप…… Slllllllluuuurrrrrrrrrrppp…. उम्मम्मम्मम्म..... Srrrrrrppppppppppp....... गलललललललूऊऊररररररप्प….. गुपपपपपहहहहहह…. गलललललललूऊऊररररररप्प…. उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp....... उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp........ गररररररररललललललूउपपपप…. Grrrrrrrrrrrr…. सल्ल्ल्लूऊप्प… उम्मम्मम्मम... Srrrrrrppppppppppp......."

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वीरू अब जोर जोर से अपने हाथ से उसका सर दबाते हुए जितनी अधिकता तक अपना लुंड घुसा सकता था.. घुसा रहा था, वो पुरे वेग से जोर जोर से अपना लुंड होंठों तक खींचता और फिर पूरी गति से उसके गरम मुंह में भरता चला जाता

वैसे ऐसा सायद वो समझ रहा था, ककी खेल पूरी तरह माया क हाथों… मुंह में था

"Srrrrrrppppppppppp..... Srrrrrrppppppppppp…… Slllllllluuuurrrrrrrrrrppp…. उम्मम्मम्मम्म..... Srrrrrrppppppppppp....... गलललललललूऊऊररररररप्प….. गुपपपपपहहहहहह…. गलललललललूऊऊररररररप्प…. उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp....... उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp.…. Grrrrrrrrrrrr…. सल्ल्ल्लूऊप्प… उम्मम्मम्मम... Srrrrrrppppppppppp......."

माया इतनी बेहरहमी से कुंदन क छोटे भाई का लुंड चूस रही थी जैसे उसके लुंड क द्वारा उसकी पूरी ऊर्जा को खींच ले रही हो और वीरू पूरी तरह ऐसी गरम नंगी और गरम मुंह वाली अनजान औरत क मुंह में अपना लुंड घुसाए हुए पूरा आनंद लेता जा रहा था

जैसे जैसे उस भीसाद बारिश क बीच वीरू क हरे भरे तेजी से लहराते खेत में ये कामुकता का चूसै वाला खेल आगे बढ़ते जा रहा था, वैसे वैसे वीरू क लुंड की रफ़्तार माया की मुंह की गहराई क और अंदर तक घुसते हुए नाप लेता जा रहा था.. वही माया भी अपने अनुभव का पूरा प्रयोग करते हुए एक बचे क बाप का लुंड ऐसे चूस रही थी जैसे वो खुद hi युवा अवस्ता का भरपूर आनंद ले रही हो

जैसे जैसे बारिश की बूंदों में थोड़ी कमी आती जा रही थी, वैसे वैसे माया लुंड को पूरा मुंह में भर क अंडा तक उतारते हुए चुस्ती जा रही थी

"Ggggllllllllllluurrrrrrrrrrrppp… Sllllllllluuuuuuuuurrrrrrrrrrrrrrpp…… ummmmmmmmmmmm….. Srrrrrrppppppppppp..... Srrrrrrppppppppppp…… Slllllllluuuurrrrrrrrrrppp…. उम्मम्मम्मम्म..... Srrrrrrppppppppppp….. गुपपपपपहहहहहह…. गलललललललूऊऊररररररप्प…. उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp....... उम्मम्मम्मम.…. Grrrrrrrrrrrr…. सल्ल्ल्लूऊप्प… उम्मम्मम्मम... Srrrrrrppppppppppp......."

वीरू (जीवन की तेस्री औरत क मुंह की गर्मी का भरपूर आनंद लेते हुए)- आआआअह्ह्ह्हह........ उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... कितना गरम मुंह है तुम्हारा.. आआआआहहह.. ऐसा लग रहा है जैसे मेरा लुंड जला देगा.. आआह्ह.. हैईईई... मायआ..... मज़ा...... आए रहा है... आआअह्ह ....तुम्हारा नाम.. तुम्हारा नाम.. किया था.. आआआआह्ह्ह्ह

वीरू जिस औरत क मुंह में अपना लुंड घुसाए हुए अपना मोटा सूपड़ा उसके गले क नीचे तक उतर रहा था उसे उसका सही से नाम तक नहीं याद था.. एक बार फिर से माया उसके तने और गन्ने की मोती जड़ वाले हिस्से जैसे लुंड को मुंह से निकलती है तोह उसके साथ साथ बहुत सा थूक, लार बांके उसके मुंह से निकलते हुए उसकी बड़ी बड़ी चूचियों पे गिरने लगता है और वो हफ्ते हुए कहती है

"किया फर्क पड़ता है.. मेरा किया नाम है, बल्कि तुम्हे तोह ये सोचना चाहिए की…"

माया उसके पूरी तरह गीले लुंड को अपने हाथ से जकड़ते हुए पियर से सहलाती है और मुस्कुरा क कहती है

"तुम्हारा ये लुंड अगर तुम्हारे बड़े भाई महेंद्र का हो.. और मेरी जगह तुम्हारी पत्नी हर्षिता होती तोह सोचो कितना ाँद आता.."

माया ये कहते हुए एक बार फिर से बिना किसी विलम्ब और वीरू को कुछ भी सोचने का समय दिए बिना वापस से उसका अकड़ चूका मोटा लुंड मुंह में भर लेती है..

वीरू का लुंड भले hi उसके बड़े भाई 'महेंद्र' जैसा लम्बा नहीं था जो अछि अछि औरत की चीख निकल दे, और न hi उसके दूसरे भाई कुंदन जैसा जो जिसके लुंड की मार अछि अछि गदराई सेह नहीं पाती.. पर जो एक चीज़ वीरू क लुंड को दोनों क बराबर लेक खड़ा करती थी वो थी उसके लुंड की मोटाई जो ऐसी थी जैसे गन्ने की अंतिम मोती और शाक्त जड़ हो



कंटिन्यू... 👇
 
माया ने मानो मनोहर और हर्षिता की कल्पना की बात करके अपने पेअर पे hi कुल्हाड़ी मरने वाली कहावत को चरित्तार्थ कर लिया था, ककी इस बार वो जैसे hi वीरू का मोटा लुंड अपने मुंह की गहराई में उतरती है वीरू किसी भूखे सैर जैसा अपना लुंड उसके मुंह में इतनी जोर से घुसता है की माया को उसके गले की दिवार पे खरोच जैसी महसूस होती है.. पर अभी तोह उसने सोते सैर हो जगाया था, वीरू इस बार जोर से माया क गीले बालों में अपनी उँगलियों की पकड़ बना लेता है और अपनी गांड को जोर जोर से हिलाते हुए पुरे वेग से माया क मुंह का छोडन सुरु कर देता है

"आआआआअह्ह्ह्ह.. ये le………………Harhsita.. Aaaaaaaaaaaaaaaahhhhhh… ले तोह अपने जेठ जी का मोटा लुंड.. आआआअह्ह्ह्ह.. ये लो…….. आह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. चुसो.. और जोर से चुसो… आआआआअह्ह्ह्ह.. लो खा जाओ ऐसे…. आआआआअह्ह्ह… आज में महेंद्र तेरा मुंह छोड़ छोड़ क लाल कर दूंगा.. aaaaaaaaaahhh.. ये ले… आआआआअह्हह्ह्ह्ह.. मेरी गरमा गरम भानु.. Aaaaaaaaaahhh.. किया मस्त मोती गांड है तेरी.. aaaaaaaaaaahhh… ले.. और ले….. माँ छोड़ दूंगा आज मैं तेरी.. Aaaaaaaaaahhhh"

माया को जरा भी उम्मीद नहीं थी अपनी कल्पना क संसार में खोता हुआ वीरू अचानक से इतना खूंखार हो जायेगा, उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे अगर उसने जल्दी कुछ नहीं किया तोह कही वीरू का लुंड उसके सर को फाड़ता हुआ बहार न निकल जाये, आज एक यक्षणी एक मनुस्य क लुंड से हार रही थी

"Aaaaaaaaaaahhhh.. हर्षिता बहु.. आआआअह्ह्ह्ह.. salliiiiiiiiiiii.. मेरी गरम बहु.. आज तेरा ये जेठ तेरा मुंह पहाड़ देगा… Aaaaaaaaaaahhh.."

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वीरू माया को जरा भी सँभालने का मौका नहीं दे रहा था, उसके भनायकर प्रहार माया क चेहरा को लाल करते जा रहे थे और उसका हाल ऐसा होता जा रहा था जैसे उसकी आँखें मानो बहार निकल पड़ेगी, बारिश की हलकी होती रिमझिम सी बूदें इस समय माया क मुंह में घुसते वीरू क लुंड से आके टकरा रही थी

"Ssssssssssssllrrrrrrrrrruuuuuuuupp… Grrrrrrrrrrrrrrrruuuuuuuuppp….. ह्ह्हह्ह्ह्हह्हूऊऊऊप्प्प……….. Ghhhhhhhhhhhhhhooooooooooooppppp… Ssssssssssssllluuuuuuuuuuppppppppppp.. Ummmmmmmmmmmmmmm… अह्ह्ह्ह… Ummmmmmmmmmmmmmm… गल्लुरररररररररपपपप…"

वीरू अपनी आँखों को बंद किये हुए खुद को अपना बड़ा भाई महेंद्र और माया को अपनी पत्नी हर्षिता समझ क इतनी बेहरमी से माया का मुख छोडन कर रहा था की माया जैसी यक्षणी की आँखों से भी आंसू टपकने लगे थे, वो पूरी तरह जानवर बनता जा रहा था

"Aaaaaaaaaaaahhh.. Saaaaaaaaaaalliiiiiiiiiiiiiii… मेरी गरम बहु… आआआआअह्ह्ह्ह.. मुंह पहाड़ दूंगा….. Saaliiiiiiiiiiiii… कितना गरम मुंह है तेरा…… Aaaaaaaaaaaaaahhh"

धीरे धीरे वीरू का जिस्म तेज़ी से अकड़ने लगा था जिसके चलते उसके लुंड की फूलती हुई सांसों की हलकी हरकत भी माया पहचान गयी थी, इसलिए अपनी हालत को भूल क वो भी अपने इस खेल में जीत हासिल करने क लिए एक बार फिर से कमर कास क उतर पड़ती है

"Aaaaaaaaaaaaahhhhh… Ummmmmmmmmmmmmm.. गललललललुर्ररररररररप्प….. Sssssssssllluurrrrrrrrrrrppp…. Gllluuuuuuuuuuuuppp… Grrrrrrrrrrrrrrrrrppp.. Ghooooooopppppppppp… हूऊऊऊऊरररररररपप्पप्पप्प.."

वीरू का हाल अब कुछ ऐसा हो चूका था जहा किसी भी पल उसके अंदर का लावा फुट सकता था.. इसलिए वो और जोर जोर से उस अनजान औरत का मुख छोडन करने लगता है, जैसे ये दुनिया की आखिर स्त्री हो

माया भी खुद को सँभालते हुए इस खेल में लौट चुकी थी वो भी किसी पिसाचिनि जैसे वीरू क लुंड को जोर जोर से चूसते हुए उसके ाँद में भरे वीर्य क एक एक कतरे को निचोड़ लेना च रह थी

"Srrrrrrppppppppppp.... Srrrrrrppppppppppp...... हूऊऊऊलललूउपप्पूवू..... घूउपपपपपप.... Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्मम्मम.... Srrrrrrppppppppppp........"

वीरू क लुंड की सभी नसे पूरी तरह तन जाती है उसे पता चल चूका था की किसी भी पल उसका लुंड गरम सफ़ेद बारिश सुरु कर सकता है इसलिए वो खुद को सँभालते हुए जल्दी से माया क मुंह से अपना मोटा लुंड खींच लेता है.. माया जो अब अपने मुंह में वीरू क लुंड क प्रहार झेलना सीख रही थी वो ऐसे अचानक से अपने मुंह से लुंड खींच लिए जाने पे हैरान रे जाती है, पर बोलने का काम वीरू hi करता है

"वो... मेरा निकलने वाला है.. तोह..."

वीरू ने ऐसे समय में भी मर्दानगी और सिस्टचार का सबूत देते हुए अपने बात कही थी, जिसे सुनकर एक पल क लिए तोह माया भी हैरान रह जाती है

'की मनुष्य आखिर है किया चीज़..'

पर अगले hi पल उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है

"तोह लुंड मुंह से बहार निकलने की किया जरुरत थी, आज हर्षिता को उसके जेठ का गरम माल पीना है.."

माया ये कहते हुए फिर से उसके लुंड क टोपे को चुम लेती है, और फिर मुस्कुरा क अपने मुंह से बहती लार को हाथ से साफ़ करते हुए उसके लुंड क आगे अपना मुंह खोल देती है, जैसे कोई भीकरण लुंड से निकलने वाले प्रसाद की भीख मांग रही हो..

वीरू को जैसे यकीन hi नहीं होता की वो ऐसा कुछ सुन रहा है, एक ऐसी औरत जिसे वो जनता भी नहीं है वो उसके लुंड की गरम मलाई क लिए उसके आगे मुंह खोले बैठी हुई है, पर फिर भी वो एक और बार पक्का कर लेता है

"पक्का.... न.. देखिये आपको ये करने की जरुरत नहीं है...."

"पर मुझे तुम्हारे वीर्य की एक एक बून्द चाहिए, ककी ऐसी से मेरी कमजोरी कुछ काम हो सकती है.. तुम बस ये समझो की इस समय.. यहाँ मैं नहीं बल्कि तुम्हारी कामुक भाभी 'मालती' है..."

माया अपनी बात कहते हुए पूरा मुंह खोल देती है और जीभ बहार निकल क वीरू क लुंड को आगे का और अंतिम कार्य पूरा करने का आदेश सा देती है

अपनी सबसे खूबसूरत भाभी 'मालती' क बारे में ऐस बात सुनकर भला वीरू कैसे खुद को रोक सकता था, ये नाम hi ऐसा है जिसे सुनते hi हवस का तूफ़ान सरीर पे थपेड़े मरने लगता है और यही हाल इस समय 'सोनू क बाप' का भी हो रहा था.. वो बिना किसी विलम्ब क जोर जोर से अपने लुंड को मुठी में भर लेता है और उसे हिलना सुरु कर देता है, वैसे उसे ज्यादा म्हणत करने की जरुरत नहीं पद रही थी ककी सामने पूरी नंगी बैठी माया क बड़े बड़े सख्त नंगे दूध और उसके गिरती उसकी लार का कामुक दृश्य hi अपना काम करता जा रहा था

"आआअह्ह्ह.. मालती भाभी.. आआआअह्ह्ह्ह.. मेरी गरम मस्त चूचियों वाली भाभी.. आआआअह्ह्ह्हह...... मेरी पियरी कामुक भाभी.. आआआआअह्ह्ह.... मालती भाभी… Aaaaaaaaaahhh... aaahhhhhhhhhhhhhhhhh......."

वीरू को बस कुछ hi पलों की म्हणत करने की जरुरत पड़ती है, ककी बाकि का काम तोह बस मालती क नाम ने hi कर दिया था.. और देखते hi देखते उसके लुंड से गरम आग सफ़ेद लावा बनकर गिरनी सुरु हो जाती है

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जैसे hi उसके लुंड से गरम सफ़ेद लावे की पिचकारी निकालनी सुरु होती है माया लपक क उसके लुंड को अपने कोमल पर ठन्डे हाथ में जकड लेती है और उसका टोपा अपने होंठों से मिला देती है जिससे लुंड से निकलने वाली हर गरम पिचकारी सीधा उसके मुंह में गिर रही थी.. साथ hi साथ माया उसके लुंड पे अपना हाथ भी चलती जा रही थी ताकि वीर्य की एक एक बून्द उसकी हलक तक उतरती चली जाये

वीरू को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आज उसके लुंड से वीर्य कुछ ज्यादा hi निकल रहा हो, और उसका पूरा सरीर ऐसे थकन से भरता चला जा रहा था जैसे उसके सरीर से पूरी जान खींच ली गयी हो.. जिसके चलते उसकी आँखें खुद hi बंद होती चली जाती है..

अगले कुछ पलों तक वो ऐसी दशा में खड़ा रहता है पर तभी आसमान में तेज गर्जन होती है और जैसे hi उसकी आँख खुलती है वो उलझता चला जाता है, ककी उसके लुंड पे जहा पहले उस स्त्री क ठन्डे कोमल हाथ थे वह अब उसका अपना हाथ रखा हुआ था, और उसके लुंड से निकलने वाला गरम वीर्य वही जमीन पे उघि नन्ही नही घास पे जमा हुआ था

"किया में कोई सपना डेक रहा था.. ?"



कंटिन्यू... 👇
 
वीरू पूरी तरह उलझ चूका था, उसे समझ नहीं आता की अभी जो हुआ वो सपना था या कोई हक़ीक़त.. वो कुछ पल वही अपना लुंड पकडे हुए खड़ा रहता है कभी नीचे घास पे अपने वीर्य को देखता तोह कभी अपनी मुठी में जकड़े अपने लुंड को

और अंत में वो न च क भी वापस अपने खेत की उसी झोपड़ी की और चल पड़ता, ककी बारिश इस समय लगभग बंद सी हुई पड़ी थी पर बादल को देख क साफ़ पता चल रहा था की ये फिर से बरसेंगे

इधर वीरू क अंदर जाते hi खेत क बहार उस नीम क पेड क पीछे से पूरी नंगी अवस्था वाली माया मुस्कुराते हुए बहार आती है उसके होंठों पे अब भी सफ़ेद वीर्य बह रहा था, वो अपनी लम्बी सी जीभ निकल क उस गरम वीर्य का भरपूर आनंद लेते हुए मुस्कुरा क कहती है

"वीरू तुम अभी से उलझन में पद गए, अभी तोह माया ने अपनी माया का झाड़ू चलना सुरु hi किया है"

माया क इन सड़बों क साथ hi उसके अधरों पे कुटिल मुस्कान च जाती है, वो फिर से अपनी जीभ बहार निकल क अपने लाल होंठों पे रह गए वीरू क वीर्य क अंश छत्ते हुए खुद से बोल पड़ती है

"वैसे स्वाद तोह है.. लगता है सही से चखना होगा.."

वह वीरू वापस झोपडी में पहुंच क वही पड़ी एकलौती पुराणी सी चारपाई पे ढेर हो जाता है, उसे समझ नहीं आ रहा था की किया वो बस एक सपना था.. पर वो इतना सच जैसा कैसे था

तभी वीरू को याद आता है की उसने अपना कुछ नाम बताया था

"किया.. था नाम, बताया तोह था उसने.. किया था ?"

पर बहुत जोर देने क बाद भी उसे कुछ भी याद नहीं आता, थोड़ी दिएर वही आराम करने क बाद वो वापस से अपना छटा उठता है और बहार आ जाता है जहा मौसम अब भी पूरी तरह काला सा बना हुआ था पर इस पल क लिए बारिश ने रुक क कुछ सांस ले राखी थी

वीरू जल्दी hi तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है.. अभी वो गेंदा क खेतों क पास से hi गुजर रहा था की उसे माइड एक जगह से पानी क बहाव क चलते कटती हुई नज़र आती है, वो बिना विलम्ब क छत एक और रखता है और जल्दी से बिना किसी बात की परवा किये वो पानी से भरी उस नाली में खुद पड़ता है.. नाली अछि खासी गहरी थी पानी उसके घुटनो तक आ रहा था पर वो बिना किसी कुदाल या कुरपे क बस हाथों से नाली की मिटटी निकल क मिड पे रखना सुरु कर देता है, फिर उसे अचे से हाथों की ताक़त से दबा क जमा देता है और जल्दी hi पानी का बहाव फिर से एक दिशा में उसी नाली में बहना सुरु हो जाता है

वीरू एक पल क लिए सीधा खड़ा होक अपनी म्हणत पे खुस होता है की तभी आसमान वापस से गर्जन क साथ साथ बुँदे बरसाना सुरु कर देता है

"हद है यार.. बारिश है की हर्षिता की छूट

जरा जरा दिएर पे गीला करने आ जाती है"

फिर वो अपनी hi बात पे है पड़ता है और वही गेंदा क खेत पे बानी उसकी कोठरी की और भाग पड़ता है, जहा पहुंच क उस पुराणी सी लगभग टूटी सी चारपाई पे लेत जाता है ककी उसे साफ़ पता चल रहा था की अबकी बार ये दिएर तक बरसाने वाली बारिश है

अभी वो लेता hi था की तभी झोपडी का वो दरवाजा हवा क चलते अपने आप hi बंद सा हो जाता है.. और वीरू पूरी तरह अपने पेअर उसी दरवाजे की और फैला क अंगदी सा लेता हु खुद से कहता है

"साला आज कल देसी ज्यादा hi सुरूर देने लगी है.. थोड़ी दिएर आँख बंद कर लेता हुआ"

और उसे पता hi नहीं चलता की उसकी थकन कब उसपे हावी होती चली जाती है, और कब वो गहरी नींद का सिखर होता चला जाता है पर उस नींद में उसे दुनिया का सबसे खूबसूरत सपना दीखता है

उसकी पत्नी उसके बड़े भाई क साथ..

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हर्षिता- आआअह्ह्ह... माआ... भर दीजिये जेठ जी.... मेरी गांड... आआह्ह्ह्ह... भर दीजिये अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड को अपने माल से……. Aaaaaaaaaaaahhhh

महेंद्र एक आखिरी जोर का दार दक्का मरता है.. और अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड मैं अपना वीर्य भरना सुरु कर देते है

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhh…… Maaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

हर्षिता की ऐसी कामुक सिसकारी भरी चीख क साथ hi वीरू का सपना टूट चूका था, और वो सब उठता है वो खुद को गेंदा क खेत की उसी कोठरी में पाटा है और जब उसे समझ आता है की वो बस एक सपना देख रहा था तोह उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है और सब्द बहार निकल पड़ते है

"न जाने मेरे ये सपने कब पुरे होंगे... "

जल्दी hi वीरू फिर से रुक चुकी बारिश क बीच भागता हुआ सा अपने घर लौट आता है, जहा जब वो कपडे बदल क वापस बहार चारपाई पे आके बैठता hi है की उसे सामने से मालती और सत्यम मंदिर से वापस आते हुए नज़र आते है

*** ** **

वैसे तोह ये अपडेट मैंने छोटा रखने क बारे में सोचा था, पर लिखने बैठा तोह सब्दो की माला कब बनती चली गयी पता hi नहीं चला


आशा है ऐसी अपडेट क साथ कई सवालों क जवाब भी मिल गए होंगे, बाकि कोई भी सवाल हो तोह आपका भाई है न.. अपनी कलम से उसका जवाब देने क लिए

- आपका मित्र


मोनू

🙏🙏

*मैं तोह अपना काम कर दिया, अब आपकी बरी है 🤞

और सबसे महत्वपूर्ण बात तोह बताना भूल hi गया, अगले अपडेट में माँ आपसे मिलने आ रही है.. तोह तैयार रहना 😉 (बहुत पियासी है)

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