Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 24 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

बहार बारिश जैसे और तेज होती जा रही थी, हवा क थपेड़ों क साथ साथ पानी की तेज बौछार बार बार उस बंद पड़ी सीसे की खिड़की पे जोर से आके टकरा रही थी, पर यहाँ अंदर जो गर्मी बाद रही थी उसका इलाज न इस बारिश क पास था न hi इस ठण्ड क पास..



नसरीन का जवान बीटा 'खालिद' अभी भी उसके पीछे से पूरा चिपका हुआ था और उसका एक हाथ उसकी अम्मी की एक बड़ी bhari-bharkam चुकी पर जमा हुआ उसे जोर जोर से कभी खींच रहा था तोह कभी पूरी ताक़त से मसल और मरोड़ रहा था.. वही उसका दूसरा हाथ नीचे की और उस बुर पे जमा हुआ था जिससे वो खुद पैदा हुआ था.. खालिद पूरी ताक़त से अपनी अम्मी की बुर को मुठी में भरे हुए मसले जा रहा था जिसके चलते नसरीन की बुर से निकलने वाले पानी से खुद उसके बेटे का पूरा हाथ भीग चूका था

"Aaaaaaaaaaaaaahhh.. माआआआं.. Jaaaaaaaaaaaaaa… बीटा… मत कर न… "

वैसे नसरीन चाहती तोह एक हाथ को चौखट पे जमाये हुए दूसरे हाथ से अपने बेटे का हाथ पकड़ क उसे अपनी बुर से अलग कर सकती थी पर वो ऐसा कुछ कर नहीं प् रही थी.. या सायद करना नहीं चाहती थी, वो बस बार बार वही बात दोहराती है जहा इस बार सब्द थोड़े से अलग था

"रुक जा खालिद.. मत कर ये गुनाह.. तेर हाथ जोड़ती हु… ऊपर जाके तेरे अब्बा को क्या मुंह दिखाउंगी… आआअह्ह्ह… रुक जा बीटा.. आआआआह… चोर दे मुझे.."

ये सुनते hi न जाने क्यों, खालिद का जोश जैसे कई गुना बाद जाता है और वो उसी हालत में अपनी कमर को हल्का सा पीछे की और खींचता है जिससे उसका उसकी अम्मी की सलवार क ऊपर से hi उनके चूतड़ों क बीच घुसा वो अजगर हल्का सा बहार सा आता है और फिर उसी वेग से चूतड़ों क कैसे गलियारे को चीरता हुआ उस छेद पे जेक टकराया है जहा से आग का पूरा दरिया बहार चालक पड़ने की कोशिश कर रहा था.. वही जैसे hi नसरीन को इतना तेज़ प्रहार अपने उस मासूम गांड क छेद पे महसूस होता है उसकी आँखें बंद हो जाती है और मुंह से दर्द और कामुकता में सनी हुई वो आवाज़ फुट पड़ती है

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh… Khalidddddddddddddddd… किया कर रहा है ये……. Maaaaaaaarrrrrrrrrrrr.. गईइइइइइइइइ.. Jeeeeeeeeee… कमीना… मत कररररररररर… Ammiiiiiiiiiii.. हु में तेरी… मत कर ये….. Aaaaaaaaaaaaaaa.."

खालिद क उस प्रहार में इतनी शक्ति समय हुई थी थी सलवार का कुछ कपडा भी नसरीन क बेटे क मोठे बिना चमड़ी वाले सुपडे क साथ अंदर जेक उस छेद का मुंह खोल क अंदर तक घुस गया था

"Aaaaaaaaaaaaaahhhhh.. Ammiiiiiiiiiiiiiiiii… तुम्हारा ये छेद अंदर से कितना गरम है…. अम्मी किया में ऐसे देख लू…."

अपने बेटे की हरकत से पूरी तरह तड़प गयी नसरीन उसकी बात का तनिक भी मतलब नहीं समझ पति और अपने hi नसे में खोयी हुई बोल पड़ती है

"पीछे खींच कमीने.. फिर चाहे जो कर.. आआआआअह्ह्ह्ह.. पीछे खींच.."

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पियासे को किया चाहिए.. सिर्फ.. पानी, और एक जवान बेटे को किया चाइये.. सिर्फ.. उसकी माँ

खालिद जैसे hi उसकी अम्मी की बात सुनता है उसका पूरा सरीर ख़ुशी से झूम उठता है, उसने अब तक जिस हाथ को अपनी अम्मी की छूट पे रख क वह अपनी जन्मभूमि का मर्दन कर रहा था, उसी हाथ को हल्का सा ढीला करते हुए अपनी अम्मी की बुर को आज़ाद कर देता है और खुद भी पीछे हैट जाता है जिससे उसका मोटा अजगर जैसा लुंड जो उसकी अम्मी की सलवार क ऊपर से hi उनकी गांड क छेद में घुसा हुआ.. उसका मोटा सूपड़ा बहार निकल अत है और साथ hi वो फांसी हुई सलवार भी

पर असल खेल ये थोड़ी था, ककी अगले hi पल खालिद अपना हाथ छूट क स्तन से थोड़ा ऊपर सरकते हुए अपनी अम्मी की सलवार क नाड़े पे रोकता है और बिना किसी disha-nirdesh क एक hi पल में अपनी अम्मी की सलवार का नाडा खींच देता है, जिसके चलते नसरीन क कुछ भी समझ पाने से पहले hi उसकी सलवार उसे नीचे से नंगा करते हुए जमीन को चूमना सुरु हो जाती है

नसरीन अपनी सलवार क खुलते hi पूरी तरह हैरान रह जाती है और दिल जोरो से धक् धक् करने लगता है.." "आआआआअह्ह्ह.. ये.. ये किया कर रहा है कमीने.. चोर मुझे…"

पर खालिद अपनी अम्मी को कुछ करने नहीं देता है, ककी जैसे hi नसरीन एक हाथ उस चौखट से हटती है अपनी सलवार को उठाने क लिए खालिद तुरंत hi उनका वो हाथ पकड़ से उसे वापस से उसी चौखट पे जमा देता है और दूसरे हाथ से अपनी अम्मी की कमीज को पीछे से पकड़ से उठाते हुए कहता है

"अम्मी… आप मुझे क्यों रोकती हो.. जबकि आप खुद यानि चाहती हो वर्ण खेत और उससे पहले मामू क यहाँ वो सब करने क्यू देती मुझे.. और अभी तोह आपने खुद कहा न की जो चाहे करू.."

नसरीन बुरी तरह कामुकता क चलते थरथरा सी जाती है और अपनी भरी होती आवाज़ में कहती है

"मैंने ये थोड़ी कहा की तू मेरी सलवार.. उतर दे.. मुझे नंगी कर दे, मत कर ये सब अम्मी हु तेरी मैं…"

इधर खालिद जैसे hi पीछे से कमीज को उठता है उसे उसकी खूबसूरत अम्मी की नंगी गांड क दर्शन होते है जिसे देखते hi उसका अजगर जैसा लुंड फुफकार उठता है.. और किसी भी तरह उन चूतड़ों क बीच छुपे हुए उस बिल में घुस जाना चाहता था

"मैं जनता हु की आप मेरी अम्मी हो.. तभी तोह मैं आपसे पियर करना चाहता हु

..आपको पाना छठा हु, वो सब करना चाहता हु जो एक सोहर अपनी बेगम से करता है.. मैं आपके पेट से अपना बचा पैदा करना चाहता हुआ..

बताओ अम्मी.. मुझे करने डौगी.. ये सब ?"

खालिद क इस सवाल ने नसरीन क पुरे अस्तित्व को सूखे पत्ते सामान कंपकपी से भर दिया था, उसे समझ नहीं आता की भला वो अपने बेटे को कैसे समझाए की एक माँ बेटे क बीच ये सब संभव नहीं है, पर कही न कही ये बातें उसकी बुर से गरम दरिया भी बहा रही थी.. वो एक अजीब से मजधार में फास चुकी थी

खालिद अपना पहला हाथ जो उसने अपनी अम्मी क हाथ पे रख क उसे चौखट पे जमाया हुआ उसे वह से हटा क अब दोनों हाथों से उनकी नंगी कमर को पकड़ क हल्का सा पीछे की और खींच लेता है और इतनी दिएर से अपने बेटे क आगे रुकने की मिन्नत करने वाली नसरीन भी न जाने क्यू क हल्का सा पीच होक अपनी गांड को अपने बेटे की और निकल देती है.. जहा उसकी कमीज अब ऊपर छड़ी हुई थी और गांड पूरी की पूरी बहार निकल चुकी थी और सलवार क बारे में तोह आप जानते hi है की वो उसके पायल वाले पैरों को चूमने में पूरी तरह व्यस्त थी, पर फिर भी नसरीन अपनी कांपती सी आवाज़ में धीरे से कहती है

"मान जा…. खालिद.. मत कर ये गुनाह.."

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तभी खालिद अपनी अम्मी की नंगी हो चुकी गांड पे अपना एक हाथ फिरते हुए कहता है

"पर मुझे ये गुनाह करना है अम्मी…. करने दो मुझे ये गुनाह.."

वो अपनी बात कहते हुए धीरे से अपने घुटनो पे बैठ जाता है और अब उसका मुंह ठीक उसकी अम्मी क चूतड़ों क बीच वाली उस लम्बे और गहरे गलियारे क सामने था जिसे पार करने क बाद वो खूबसूरत दरवाजा अत है

कंटिन्यू... (भविष्य में कही..)

***

आशा करता हु 'माँ बेटे' का ये कामुक क्रियाकल्प आप सभी को पसंद आया होगा

🙏🙏

नष्ट अपडेट 👉 फिर से नहीं.. आआअह्ह

[On 24-04-26]

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अपकमिंग उपदटेस ✨ 🖋️

फिर से नहीं.. आआअह्ह (24-04-2026)


ये कैसा सपना था ? (30-04-2026) 🆕 Chapter
 
नई 🆕 अपडेट (पेज 📄 538)

अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #09

मत कर ये गुनाह है..




 
"वाह.. मेरी चिनार ये तोह और ज्यादा निखार गयी.."

दर्द से तड़पती हुई मालती भी एक पल क लिए अपना दर्द भूल क उस तकिये को अपने चेहरे पे शरमाते हुए ऐसे रख लेती है जैसे अपने चेहरे पे फैली लज्जा की लालिमा को छुपा रही हो, वो अलग बात थी की वो इस पल पूरी नंगी थी.. *** बिना देरी क दोनों हाथों से अपनी खूबसूरत कामुक मालती क पैरों को मजबूती से पकड़ता है और एक hi पल में उन्हें और ज्यादा फैला देता है जिससे आज दिन में 3 बार चूड़ी हुई छूट जो डबल रोटी सामान फूल गयी थी....

अपकमिंग अपडेट से....
 
प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 538



अपडेट #22

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

फिर से नहीं.. आआअह्ह

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अब इससे पहले की सुंदरपुर का भीगा हुआ दिन पूरा हो और रात सभी को नींद की सुकून भरी बाहों में भरे हमे वापस एक बार सुबह में लौटना होगा जहा गाओं क एक आलिशान घर में एक भरे जिस्म की औरत क इन शब्दों ने उसक घर को भर दिया था..

"सुबह सुबह कहा चल दिए.. मौसम का हाल तोह देख लीजिये कही जाने से पहले"

वैसे उस समय सुबह क 8:30 हो रहे थे

अपने पति को सुबह सुबह घर से बहार जाने की तैयारी करते हुए देख, उसकी भरे जिस्म वाली पत्नी उसे टोकते हुए ये कहती है ये

"कितनी बार कहा है, जब कही बहार जाने वाला राहु तोह टोका मत करो, पता है न कितना बड़ा अपशगुन होता है"

सायद अब आप समझ hi गए होंगे की मैं बात कर रहा हु..

अपडेट #19, सन 03 & 04

(पेज No. 361)

की और अब यही से हम भी उसी व्यक्ति क साथ hi घर क बहार चलते है.. वैसे आपको याद hi होगा उसने निकलने से पहले अपनी पत्नी को किया कहा था, और अगर नहीं भी याद है तोह ये रहे वो सब्द

"मंदिर जा रहा हु.. फिर सोच रहा हु वह से खेतों की और नज़र दौड़ा लूंगा"

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इसके अलावा और किया किया बात हुई उन पति पत्नी क बीच ये आप अपडेट को पद क जान सकते है.. हम अब आगे बढ़ते है

इधर वो व्यक्ति गाओं क उसी मंदिर की और चल पड़ता है, जहा मालती आगे बाद रही थी और गौरैया वह से वापस लौट रही थी.. वो अभी अपने घर से निकल क गाओं क बड़े बाजार को पार करता हु आगे hi बाद रहा की तभी सामने चाय की दुकान पे चाय बनता हुआ आदमी उन्हें देखते hi मुस्कुरा क कहता है

"कैसे है पहलवान भैया.."

जी है ये व्यक्ति और कोई नहीं पहलवान hi है, वैसे ज्यादातर लोगों ने ये पहले hi अंदाज़ा लगा लिया था, बरहाल वो उस चायवाले को देख क धीरे से मुस्कुरा क ऐसे सर हिला देता है जैसे राजा अपनी प्रजा का अभिनन्दन स्वीकार रहा हो, जिसपे उसके आगे बढ़ते hi वो चाय वाला भी मुंह बनाते हुए बड़बड़ा सा बढ़ता है

"बहनचोद.. ये ठाकुर का खास न होता तोह इसकी गांड में केतली का मुंह लगा क पूरी चाय भर देता.."

और फिर खुद hi अपनी बात पे है पड़ता है

वही 'मंगल सिंह' यानि पहलवान अपनी hi धुन में आगे बढ़ते हुए मंदिर की और चल पड़ता है पर रस्ते में उसे ठाकुर का एक खास आदमी मिल दिख जाता है जो सायद उसकी और hi बाद रहा था

"किया बात है.. माखन, तुम जंगल चोर क यहाँ.. ?"

माखन नाम का वो आदमी जल्दी से पहलवान की और आगे बढ़ता है और इधर उधर देखते हुए धीरे से कहता है

"आपको बुलाया गया है.. पुलिस ने सेहर में हमारा एक आदमी पकड़ लिया है"

पहलवान ये सुनते hi तुरंत hi जहां चिंतन में मानो खो सा जाता है और फिर कुछ सोचते हुए धीरे से कहता है

"और माल.. ?"

जिसपे वो माखन तुरंत hi इधर उधर देखते हुए किसी गहरे राज़ को खोलने क अंदाज़ में बोलते हुए कहता है

"थोड़ा तोह पुलिस क हाथ लग रहा है, पर बाकि अभी भी उसने कही छुपा रखा है, जिसके बारे में सिर्फ वही आदमी जनता है"

पहलवान अब उसके साथ की गाओं क जंगल की और बाद चला था, और रस्ते में उसकी और देखते हुए कहता है

"वैसे कोण है वो आदमी.. नाम किया है ?"

माखन भी पहलवान क साथ साथ आगे बढ़ते हुए

"नाम तोह नहीं पता, पर सुना है पुलिस जिसे प्रमुख आदमी समझ रही है, असल में वो तोह खुद ऐसी आदमी क लिए काम करता है"

पहलवान जैसे उसकी बात को समझने की कोशिश सा करते हुए

"मतलब.. मतलब पुलिस को असली आदमी का नहीं पता है ?"

माखन, पहलवान की बात पे सहमति में सर हिलते हुए

"है.. पर वो आदमी भी पुलिस क पास hi है, इससे पहले की पुलिस को सच का पता चले कुछ करना होगा ?"

पहलवान उसके साथ आगे बढ़ते हुए सुंदरपुर क उस घने जंगल में प्रवेश कर जाता है

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और आगे बढ़ते हुए एक बार फिर से माखन से बात करते हुए कहता है

"वैसे इतनी बड़ी खबर बहार कैसे गयी.. ?"

माखन एसपी थोड़ा सोचते हुए कहता है

"वही तोह बड़ी बात है.. ऐसा लगता है जैसे को हमारी खबर बहार भेज रहा हो"

पहलवान अपनी मुट्टिया भींचते हुए पर मुस्कुरा क कहता है

"गुफरान की जो हालत हमने की थी उसके बाद सायद कोई पागल hi होगा जो ऐसी गलती करने की सोचेगा भी"

इसके बाद उस जंगल क अंदर किया होता है, अभी क लिए ये एक रहस्य hi रहने देते है.. और जब इस दिन का एक पहर पूरा होने क बाद पहलवान वापस लौटता है तोह उस पल वर्षा ने भी कुछ सांस सी ले राखी थी, वैसे पहलवान इस पल पूरी तरह भीगा हुआ था और उसकी वो महंगी जुतिया पूरी तरह कीचड़ से सनी हुई थी पर सबसे बड़ी बात की उसपे खून क छोटे और हलके धब्बे भी नज़र रहे थे.. जो एक बार फिर से सुरु हो चुकी बारिश क तेज पानी में धीरे धीरे धुलती जा रही थी

पहलवान अभी थोड़ा hi आगे बड़ा था की उस घनघोर वर्षा क कारन वो वही एक किनारे रुक जाता है और जब एक बार फिर से वर्षा कुछ सांस लेने क लिए थमती है तोह आगे बाद चलता है की तभी जैसे उसे कुछ याद आता है

"चलो खेतों से होक चलता हुआ.. देखु तोह वो बुद्धा आज आया भी था की नहीं.."

पहलवान ने अपने खेत पे काम करने क लिए एक आदमी को रख रखा था जो वही रहता और खेत की पहरेदारी करता, जैसे उस खेत की मिटटी में फसल नहीं बाकि न जाने कोनसा सोना उगता हो

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जल्दी hi पहलवान अपने खेतों क सामने खड़ा था जहा उसे दूर दूर तक उसके खेत का काम सँभालने वाला वो आदमी नहीं दीखता और इस कारन पहलवान का ग़ुस्सा जैसे सातवे आसमान पे पहुंच जाता है

"बहनचोद ये फिर ने कही दारू पिके पड़ा होगा.. इसकी तोह माँ छोड़नी पड़ेगी मुझे"

पहलवान इतना बोलते hi तुरंत आगे बढ़ता है और जैसे खेत पे उस तखत क समीप पहुँचता है उसे अजीब की कामुक पर भीनी भीनी खूबसू का एहसास होता है जिसमें बारिश का सोंधापन और खेतों की मिटटी की ताज़ी खुसबू भी मिली हुई थी

"लगता है बुद्धा आज कोई रंडी लाया था.."

पहलवान को ऐसा लगता है की उसके उस आदमी ने आज वह कोई रंडी छोड़ी थी, पर हम सब तोह ये जानते hi है वह उस तखत पे आज कोण चूड़ी है

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पहलवान इधर उधर देखता है और फिर धीरे से तखत क पास बैठ क उसके नीच वाले हिस्से को देखता है जहा हरी हरी घास hi नज़र आ रही थी और फिर जब वो उस घर पे हाथ फिरता है तोह देखते hi देखते उसके हाथ में एक लोहे का कड़ा सा आ जाता है और जब वो उसे पकड़ क उठता है तोह उस जगह एक छोटा सा हिस्सा खुलता चला जाता है

पहलवान वह घुटनो क बल बैठे हुए अपने घुटनो पे लगने वाली मिटटी और कीचड़ की परवा किये बिना अंदर झाँक क देखता है तोह उसके अधरों पे मुस्कान खिलती सी चली जाती है, वो जल्दी से वापस उस हिस्से को वैसे hi बंद कर देता है और अब ऐसा लग रहा था जैसे वह सिर्फ हरी हरी घास hi हो.. पहलवान उठने hi वाला होता है की तभी उसे बिस्तर क दूसरी और कोई एक कपडा जैसा नज़र आता है, वो बिना देरी क वह से उठता है और घूम क जब वह पहुंच क उस कपडे को उठता है तोह उसे समझते दिएर नहीं लगती की वो किसी नारी का ang-vastra है यानि एक पेंटी है.. जो पूरी तरह मिटटी और कीचड़ में सनी हुई थी, उस पेंटी को देखते हुए न जाने पहलवान को किया होता है की वो उसे अपनी नाक क पास ले आता है और धीरे से एक लम्बी सांस भरते हुए मानो उसके अंदर की खुसबू लेने लगता है

"आअह्ह्ह्हह… अभी तक छूट की खूबू आ रही है इससे.."

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फिर इधर उधर देखने क बाद वही खेत में भरे हुए पानी से जल्दी जल्दी उस पेंटी को धुलता है और कुछ hi पल में वो पेंटी पूरी तरह साफ़ हो चुकी थी, वो उसको कसके दबा क उसका पानी निचोड़ता है और फिर पूरी पेंटी को फैला क अचे से देखते हुए कहता है

"साला जिसकी भी होगी, पूरी माल होगी.. बहनचोद इतनी रगड़ रगड़ क धूलि है तब भी उसकी छूट की कामुक खुसबू आ रही.."

वो उस नरन पेंटी क कपडे को अपनी उँगलियों पे महसूस करता है और फिर उसे अपनी जेब में रखते हुए मुस्कुरा क घर की और चल पड़ता है, जहा वो अब भी अपने आदमी पे भड़का हुआ था

"इस मादरचोद की गांड फडनी पड़ेगी, यहाँ लाखों का माल है और ये माँ का लोढ़ा न जाने कहा गांड मरवा रहा है.."

तोह अब आप जान hi चुके है की मेरी माँ ‘'मालती' क दोनों ang-vastra इस समय कहा और किसके पास पहुंच चुके है, और अगर अब भी नहीं पता तोह मुझसे पूछ लेना 😉

चलिए एक बार फिर से हम लौट चलते है महेंद्र क घर में जहा अब सभी लोग नींद की बाहों में सामना सुरु हो चुके थे.. और ऐसी अपडेट क साथ इस दिन को पूर्ण भी करते है



कंटिन्यू... 👇
 
ठण्ड क मौसम की रातें अक्सर और ज्यादा लम्बी और ठंडी हुआ करती है, उसपे आज तोह घनघोर बारिश हुई है यानी आप समझ hi सकते है ऐसे मैं आज का मौसम कितना अधिक ठंडा और सार्ड होगा.. वैसे इस पुरे दिन माल्ट और सविता को कई बार अचे से गर्मी मिली है पर एक कामुक औरत क सरीर का तापमान कभी भी काम कहा होता है, उसे तोह वो गर्मी जितनी भी मिले बस काम hi है और इस समय रात का अंतिम पहर अपने चरम पे पहुंच चूका था जहा किसी भी पल गाड़ी 12 बजने का संकेत देते हुए इस दिन क अंत और नए दिन की और प्रस्थान करने की सुचना देने वाली थी और ऐसे में सिर्फ महेंद्र क उस निवास में hi नहीं अपितु पुरे गाओं क लिए ये गहरी निंद्रा का समय था



सेहरों क लिए भले hi ये समय रात सुरु होने का सिर्फ एक सूचक मन जाता हो पर गाओं में ये रात्रि का ये पहर पूर्ण शांति क साथ अपनी निंद्रा की लहर दौड़ा चूका होता है, जहा ज्यादातर घर में kaam-kreda का खेल खेला जा चूका होगा या ये भी संभव हो की कुछ घरो में घर क बड़ों या बच्चों क सोने की hi प्रतीक्षा की जा रही हो ताकि कुछ ऐसे सम्बंद बनाये जा सके जो सायद सामाजिक तौर पे मान्य न हो..

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वैसे आप तोह भली भांति जानते hi है की इस मामले में 'स्वर्गवासी मुरली दस' का घर कुछ ज्यादा hi आगे है

ठण्ड क इस पहर में गाओं क बाकि घर की hi तरह अपने महेंद्र क घर का हाल भी औरों से जुड़ा नहीं था.. गाओं क बाकि घरों की तरह hi यहाँ भी पूर्ण शांति च चुकी थी और हर कोई गहरी नींद क साये में खोया हुआ था, वैसे भी इतने समय बाद इस घर में खुशियों ने कदम रखा था ऐसे में सभी का चैन से सोना तोह बनता hi है साथ hi साथ कल मोनू अपने पिता और फूफाजी क साथ अगले 15-20 दिनों क लिए दिल्ली भी जाना वाला था तोह सभी लोग काफी समय तक घर क बहार hi छप्पर नीचे बातें करते रहे और जब नींद की झोंकों ने उन्हें हिलना सुरु किया तोह हर किसी ने अपने पाने स्तन पकड़ लिए.. बाकि आज की रात कोण कहा सोने वाला है ये तोह मैंने बता hi दिया था और अगर फिर से थोड़ा बताऊ तोह महेंद्र, वीरू, भानु और सत्तू घर क बहार छप्पर नीचे पसरे हुए थे और रज़ाई की गर्मी क चलते ये सभी गहरी पर सुकून भरी नीदं का हिस्सा बन चुके थे.. जहा सुरक्षा का भी पूरा धियान रखा गया था और वीरू क बिस्तर क नीचे एक तेज़ धार हसिया जमी हुई थी वही महेंद्र क सिरहाने उसका वो मोटा डंडा उसके साथ hi सो रहा था

बाकि अगर मोनू वाले की बात करू तोह वह उसका पिता कुंदन वही नीचे बिस्तर लगा क सोया हुआ था, और अंदर वाले छप्पर क नीचे सोनू और सत्यम गहरी नींद में खो चुके थे.. अब अगर घर की शक्ति यानि नारियों की बात करू तोह सविता, हर्षिता और शीला 'महेंद्र' वाले कमरे में एक hi बिस्तर पे लगभग चिपके हुए से सोये थे और रही बात हमारी मालती की तोह उसने आज खुद hi अपनी थकन को ख़तम करने क घर क पीछे सबसे अलग और एकांत में बानी उस कोठरी को चुना था जिसके लिए पहले तोह सविता ने मन hi किया पर अंत में वो भी जानती थी की उसके जवान बेटे ने आज अपनी चची की टंगे कई बार उठाई है और यही सोच क वो मान गयी थी, कुलमिला क दिन भर चली इस कामुक वर्षा ने पुरे घर की व्यवस्था को आज क लिए पूरी तरह बदल सा दिया था

वैसे अगर उस छोटी सी कोठरी की बात करू तोह घर क बिलकुल पिछले हिस्से में थी जिसमें बस एक छोटा सा दरवाजा है, न hi कोई खिड़की न hi कोई और दरवाजा.. असल में इस जगह पे घर का फालतू सामान रखा हुआ था और साथ hi कुछ महत्वपूर्ण चीज़े भी जैसे जरुरत पड़ने पे इस्तिमाल की जाने वाली अतिरिक्त रज़ाई, बिस्तर.. साथ hi साथ खेत में प्रयोग की जाने वाली जरुरत की ज्यादातर चीज़े भी यही राखी जाती थी

इतना hi नहीं यही पे एक तरफ गेहू और चावल की बोरिया भी लगी हुई थी और ऐसी सब क चलते ये जगह ज्यादातर बंद hi राखी जाती थी और सफाई का भी खास धियान नहीं रखा जाता था, आसान भाषा में आप ऐसे 'Store-Room' कह सकते है..

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वही अगर अंदर जगह की बात करे तोह यहाँ मुश्किल से बस एक व्यक्ति क लिए hi जगह थी और आज मालती की जो हालत सत्यम ने करि है उसके बाद उसे गहरी नींद की जरुरत भी थी इसलिए उसने जान क यहाँ सोने का फैसला लिया था, साथ hi साथ सत्यम ने रसोईघर में जो खास चाय पिलाई थी उसके चलते खुद मालती क अंदर भी एक प्रकार से अग्नि की कामुक लपटे फिर से उतनी सुरु हो चुकी थी और उसे दर था की कही एक बार फिर वो अपनी kaam-agni से परेशान होक कुछ ऐसा न कर बैठे की किसी को मुंह दिखने लायक hi न रह जाये.. और यही सबसे बड़ा कारन भी था

वैसे मालती ने जब यहाँ सोने की बात कही थी तब घर की सभी औरतों ने लगभग एक hi स्वर में उसे मन किया था जिसपे से सबसे पहले सविता hi बोली थी

"पागल है किया, वह सोने की किया जरुआत है.. हमारे साथ hi सो जा, वैसे भी आज शील और हर्षिता ने पीछे वाला कमरा धूल hi दिया है, बस 1-2 दिन में अचे से सुख जाये फिर उसमें आराम से रहने की व्यवस्था कर hi लेंगे"

सविता जैसी hi रुकी, हर्षिता बोल पड़ी पर थोड़ा सा मज़ाकिये अंदाज़ में

"कही ऐसा तोह नहीं आज रात कुंदन भैया क साथ कुछ... किया पता इसलिए भाभी अकेले एकांत में सोने की बातें कर रही है"

हर्षिता की इस बात पे सभी औरते जहा है पड़ती है वही आज इतने समय बाद खुद मालती भी शर्मा सी उठी थी, वैसे भी इतने समय बाद आज खुद कुंदन ने उससे बात की और उसकी परवा करते हुए नज़र आया था.. सविता और हर्षिता क बाद अब बरी थी बची हुई शीला की

"भाभी वह उस कोठरी में कितनी गंदगी है, वह कैसे सो पाओगी.. ?"

पर अंत मैं मालती सबको मन hi लेती है

"अरे आज की hi तोह बात है, कल मौसम ठीक हो जायेगा तोह वापस से अपनी पुराणी जगह सोना सुरु कर दूंगी, एक hi रात की तोह बात है.. इतनी ठण्ड में मोती मोती रज़ाई ओढ़े हम चारो एक साथ कहा एक hi बिस्तर पे सो पाएंगे ?"

मालती की इस बार कही गयी बात से सभी सहमत से होते है, पर फिर भी शीला और हर्षिता ये भी कहती है की

"उनमें से वह कोई सो जाता है.. आप आराम से सविता भाभी क साथ सो जाओ"

जिसपे इस बार मालती खुद भी अपनी बड़की भौजाई की चुटकी लेते हुए कहती है

"न बाबा.. मैं इनके साथ तोह कभी भी अकील नहीं सोने वाली, इनका किया भरोषा"

उसकी इस बात पे वह सभी लोग है पड़ते है, पर असल बात तोह ये थी की मालती.. सविता से पूरी तरह नज़रें नहीं मिला प् रही थी

वैसे आपको पता hi है पर फिर भी बता देता हु की महेंद्र क घर मैं सिर्फ यही 2 कमरे नहीं है, बल्कि ये एक पुस्तैनी घर है जो किसी छोटी मोती हवेली से काम नहीं है पर जब दुनियादारी क चलते तीनो भाई अलग हुए तोह महेंद्र और सविता ने बाकि कमरों को हमेशा हमेशा क लिए बंद कर दिया था जहा अब मकड़ी का जाल और धूल मिटटी और गंदगी ने अपना साम्राज्य इस्थापित कर लिया है.. और इन्हे में से एक कमरे की सफाई आज की गयी थी, वैसे इस घर क अलावा भी एक और घर पिछले हिस्से क ठीक पीछे बना हुआ है जहा पहले क समय जानवर बंधे जाते थे पर मालती की सांस यानि 'सुरीली देवी' की मौत क बाद उसे पूरी तरह बंद कर दिया गया था.. बरहाल हम वापस कहानी पे आते है, ककी इस घर की बातें तोह अभी बहुत होनी है..

इस वक़्त रात क 12 बजने में सायद कुछ hi समय बचा होगा की.. तभी पुरे पसरे हुए सन्नाटे में एक सरीर धीरे से हरकत में आता है, और वो धीरे से अपनी जगह से हिलता है और बिना कोई आवाज़ किया रज़ाई से बहार आते हुए हर तरफ अपनी नज़रों को घूमते हुए मानो जैसे पहले पक्का करता है की मैदान साफ़ है की नहीं और फिर जब उसे पूर्ण विश्वाश हो जाता है की सभी गहरी नींद में सो रहे है तोह वो चुपचाप अपने बिस्तर से बहार आके किसी बिल्ली जैसे साढ़े कदमो से आगे बढ़ना सुरु हो जाता है



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वही हमारी खूबसूरत मालती उस छोटी सी संकरी कोठरी क अंदर अपनी थकन क चलते गहरी नींद मैं खोयी हुई थी और ऐसा होता भी कैसे नहीं, आज एक hi दिन मैं उसकी 3-3 बार घमाशान चुदाई जो हुई है.. उसकी छूट पूरी तरह लाल और सूजी हुई थी पर ये सूजन उसे दर्द से ज्यादा आननद और कामुकता का सुकून दे रही थी, उसके चेहरे पे दिखने वाला सुकून इस बात की गवाही दे रहा था की उसे जो कामुक दर्द आज मिला है उसके साथ hi उसे एक अनोखा आनंद भी प्रधान हुआ है, जिसको कोई भी नारी खुद भी शब्दों में समझा नहीं सकती थी.. उसके अपने बेटे सामान भतीजे ने आज उसकी योनि को ऐसे रगड़ रगड़ क छोड़ा था की उसका कॉमर्स निकलना बंद नहीं हो रहा था



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कुलमिलकर सत्यम क तगड़े और मोठे लुंड ने उसकी योनि की गहराई को बहुत अचे से नापा था और जो कसार रह गयी थी वो सोनू की उस कामुक हरकत और फिर उस अनोखी चाय ने पूरी कर दी थी, जिसके बारे में हम सभी अचे से जानते hi है

रज़ाई क अंदर ऊपर नीचे होती उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को भी उसके जवान भतीजे ने आज खूब जोर जोर से रगड़ क चूसा था और उसकी छूट को अपने भयंकर लुंड से छोड़ छोड़ क और ज्यादा फैला दिया था, पर इन सब क चलते हुए इस पल हमारी खूबसूरत मालती कुछ ज्यादा सी सुकून और शांति की नींद मैं खोयी हुई थी.. उसके खूबसूरत चेहरे पे असीम शांति नज़र आ रही थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसके चेहरे की खूबसूरती में निखार और ज्यादा बाद गया हो

करीब 15 मं बाद...

मालती को ऐसा लगता है जैसे उसका गरम और रज़ाई में ढाका सरीर अचानक से ठंडा पड़ने लगा हो और उसके पैरों में लगने वाली ठंडी हवा का झोका आके उसकी नींद को तोड़ने की कोशिश कर रहा हो.. और इस कारन उसकी गहरी नींद हलकी हलकी करके उसका साथ चूर्ण सुरु कर देती है और उसका जिस्म हलके से हरकत करना सुरु hi करता है की अचानक से जैसे मालती की नींद कही गायब सी हो जाती है ककी उसे महसूस होता है की उसके टंगे किसी ने पूरी फैला दी हो और तभी उसे अपनी योनि पे कुछ गीला गीला महसूस होता है जैसे कोई खुरदुरी सी जीभ उसकी कामुक योनि पे प्रहार करने लगी हो

मालती की नींद एक hi पल में मानो हवा हो चुकी थी वो जल्दी से उठने को होती hi है की एक मरदाना हाथ उसकी नाभि से होता हु ठीक उसकी चूचियों क बीच आके उसे वापस से लेते रहने का इशारा करता है और तब कही जेक मालती की आँखें उस चेहरे को देखती है जो इस समय उसकी पैरों क ऊपर उसकी गरम भट्टी जैसी योनि क ऊपर उपस्थित था और जैसे hi वो उस इन्शान का चेहरा देखती है वो बुरी तरह घबरा सी जाती है

"सत्यम.. तुम यहाँ इस समय किया..."

पर मालती इसके आगे कुछ बोलने hi वाली थी तभी उसकी नज़रें उसके अपने hi सरीर पे पड़ती है और उसका सरीर किसी पेड से टूटे हुए पत्ते सामान काँप उठता है ककी अब उसे एहसास हो चूका था की वो पूरी तरग नंगी है, उसे अपनी हालत पे जैसे यकीन hi नहीं होता की इतना सब हो गया और उसे कुछ खबर hi नहीं हुई.. हर पल उसकी हैरानी बढ़ती hi जा रही थी ककी उसकी जिस्म से सिर्फ साड़ी hi नहीं बल्कि ब्रा पेंटी क साथ साथ कपडे का ek-ek धागा तक गायब था, तभी उसकी नज़रें अपने बगल की और घूमती है जहा उसे गर्मी देने वाली वो रज़ाई तक वही एक और पड़ी हुई थी

मालती अपनी ऐसी हालत देख क हैरान hi रह जाती है ककी सोने से पहले उसने अपनी साड़ी जरूर उतर दी थी, और ब्रा पेंटी भी उसने याद से पेहेन ली थी जब वो सविता वाले कमरे में सोई थी पर अब उसके सरीर पे कुछ नहीं था.. कुछ भी नहीं, पर इस पल जब उसकी आँखें खुलती है तोह उसके सामने उसका जवान भतीजा और उसपे उसे अपना सरीर पूरा नंगा मिला था, मानो किसी ने जादू से उसके जिस्म से सरे कपडे गायब कर दिए हो.. और जादूगर यक़ीनन सत्यम hi था

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मालती तुरंत hi अपनी इस्थ्ती को समझने की कोशिश करते हुए

"मेरे.. मेरे कपडे.. कैसे मतलब.. ेस्स्स्सह्ह्हह्हह्ह्ह्ह... आअह्हह्ह्ह्ह.. सत्यम…"

पर उसका जवान भतीजा उसे अपनी बात पूर्ण करने का कोई भी मौका नहीं देता ककी उसका चेहरे जो पहले hi उसकी खूबसूरत मंझली चची की योनि क ऊपर उपस्थित था वो थोड़ा सा और नीचे होता है और 'मोनू की माँ' की सुगन्धित योनि की फाकों पे उसकी खुरदुरी जीभ चला देता है जिससे सूजी हुई योनि की मालकिन मालती का जिस्म कामुकता और दर्द से भरता चला जाता है पर सत्यम तोह जैसे ये पूरा खेल खेलने hi यहाँ आया था

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"सल्ल्ल्लूऊऊप्प्परररपपपपपपपप……. Ummmmmmmmmmm…. Glllllllllllllllluuuuuuuuurrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrppppppppppp…. Ssssssssssssslllllllllluuuuuurrrrrppppp.."

सत्यम ने बिलकुल किसी माझ्ने हुए खिलाडी जैसे ठीक उस सूजी हुई योनि की फाकों क बीच अपनी जीभ को घुसा दिया था और सूजन क कारन ज्यादा hi गुलाबी नज़र आती उस योनि को नीचे से ऊपर तक उसकी फाकों क बीच अपनी खुरदुरी जीभ को ऐसे चला दिया जैसे उसे वह सेहद जैसी मिठास मिल रही हो, पर अचानक से सुरु हुए इस खेल ने जहा मालती को अचंभित किया था वही एक जवान लड़के द्वारा उसकी 38" पुराणी योनि को ऐसे कहते जाने से वो बुरी तरह मचल भी पड़ी थी.. ये एक अनोखा एहसास था जिसमें दर्द और कामुकता का मिला जुला संगम था

"आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. किया कर रहा है कुत्त्तीीी… ेस्स्स्सस्स्स्शह्ह्ह… Maaaaaaaaaaaaa…. हैट जा कुत्त्तीीी….."

पर सत्यम यहाँ इतनी रात को चोरी छुपे बस ये खेल को सुरु करके चोर्ने क लिए नहीं आया था, वो तोह ये खेल अंतिम बिंदु तक ले जाने क इरादे ये यहाँ पंहुचा था.. और उसकी यही हरकते मालती को बुरी तरह पागल करती जा रही थी और उसकी नींद से बंद पड़ी आँखें अब उसकी कामुकता क कारन मानो बंद सी होने लगी थी

"Aaaaaaaaaaahhhh.. रुक जा बीटा…. आआआअह्ह्ह… किया कर रहा है सत्यम.. ेस्स्स्सस्स्स्स.. माआआआआ… मान जा.. बीटा... essshhhhhhhhhhhhh... माआ...... मत्तत्त कर... हैईईईई"

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पर सत्यम तोह रुकने की जगह और ज्यादा गहराई तक अपनी जीभ को अंदर घुसते हुए आनंद का एहसास देने लगा था मालती को, और ऐसी कारन उस छोटी सी कोठरी में 'मोनू की माँ' की गीली होती छूट का चुसन और उसकी कामुक आवजें भरने लगी थी

"उम्मम्मम्मम्मम… Sllllrrrrrrrrrrrruuuuuuuuuuu…ppp.. Ummmmmmmmmmm… उम्मम्मम्म… Grrrrrrrrrrrrlllllluuuurrrrrrrrpppppppp…. Srrrrrrrrrrrrrrrrpppppppp… ससससससललललललललूऊऊऊप्प्प………."

मालती का पूरा सरीर कामुकता की बढ़ती अग्नि क आगे झुलसने से लगा था पर वो जैसे तैसे खुद पे काबू बनाये रखते हुए पूरी हिम्मत जूता क कुछ कहने को hi होती है की एक बार फिर से सत्यम ने अपनी कामुक हरकत क चलते उसे बोलने का मौका नहीं दिया, बल्कि इस बार जो किया उससे मालती बुरी तरह लगभग चीख hi पड़ी थी पर वो ये भी नहीं भूल रही थी वो कहा है और उसकी चीख उसकी इज्जत का कैसे मज़ाक बनवा सकती है

"Aaaaaaaahhhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaa….. Kutttttttttttteeeeeeeeeeeeeeeeeee…"

असल में ेस्क बार सत्यम ने 'मोनू की माँ' की आज दिन मैं 3 बार छोड़ी हुई बुर जो अब भोषड़ा बानी पड़ी थी, उसकी फाकों को हलके से अपने होंठों क बीच भर लिया और धीरे से अपने होंठों का दबाव बनाते हुए उन सूजन से भरे हुए होंठों को थोड़ा खींच सा लिया था.. ऐसे में एक औरत की इस्तिथि किया होगी मुझे समझने की तनिक भी जरुरत नहीं आपको

"ेस्शह्ह्ह्ह.. Maaaaaaaaaaaaa…… kutttttttttteeeeee… किया कर रहा है…….. आआआआअह्ह्ह… marrrrrrrrrrrrrr… gayiiiiiiiiiii.. Haiiiiiiiiii.. Reeeeeeeeee… हरामजादे… चोर उसे… Aaaaaaaaaaaaahhh… मातटटट कर कुत्ते हम घर में है... उफ्फ्फ्फ़.. किसी को पता चल गया तोह मैं किसी को मुंह दिखने लायक नहीं.. हैईईई... माआ......... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़..... बेताआए...... क्यू परेशां कर रहा है.. आआआआअह्ह्ह… हाथ जोड़ती हु चोर दे kuttteeeeeeeeeeeee… Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhh.."

पर सत्यम जैसे ये तय करके आया हो की वो आज हमारी खूबसूरत मालती को बोलने का कोई भी मौका नहीं देने वाला था, उसने एक बार फिर से अपने होंठों को लाल छूट क उन गुलाबी होंठों पे लगा दिया जहा अभी हलके हलके उगते हुए बालों की झाडिया दिख रही थी.. जिन्हे देखते hi उसका जोश जैसे एक hi पल में दुगना हो जाता है और वो बिना समय नस्ट किये अपनी 'माँ की देवरानी' की गुलाबी योनि की पंखुड़ियों क बीच पूरी गहराई तक अपनी जीभ घुसा देता है

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इस बार मालती को भी ऐसा प्रतीत होता है जैसे सत्यम ने उसकी छूट क दाने को रगड़ सा दिया हो अपनी जीभ से, और ये वो पल था जब उसकी कामुकता ने उसपे अपनी पकड़ बनानी सुरु कर दी थी

"Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh… Maaaaaaaaaaaaaaa… marrrrrrrrrrrrrrrr… गईइइइइइइइइ… kutttttttttttttteeeeeeeeeeeee… esssssssssssssshhhhhhhhhhhh… mattttttttttttt… कर हरामी…………. Aaaaaaaaaaaaaaaaaahhh.. ऐसे hi………….. uffffffffffffff… और गहराई तक…. Aaaaaaaaaaaaaaahhh.. फारद हो रहा है बीटा……….. Aaaaaaaaaahhh… रुकना… रुकना नहीं………… Aaaaaaaaaaaaaaahhh… रुक जा कुत्तेईईई… Esssssssssssshhhhh.. Maaaaaaaaaaaaa.."

मालती पूरी तरह बैचैन हो चुकी थी, सायद ऐसी कारन वो अपने शब्दों पे काबू भी नहीं रख प् रही थी और कभी रुकने को कहती तोह कभी अपने जवान भतीजे को आगे बढ़ने को.. वो खुद किसी निर्णय पे नहीं पहुंच प् रही थी वही महेंद्र का छोटा बीटा तोह अब खेल को पुरे जोश से खेलता hi जा रहा था

"सलल्लूऊऊऊप्प्प.... सररर्रूऊऊऊप्प्प्प..... स्स्स्सस्स्स्सल्लूऊऊप्प्प..... सरररररूऊऊऊरररऊऊऊप्प्प्पप्प......"



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मालती जो अभी अभी कुछ पलों पहले अपनी थकन क चलते गहरी निंद्रा का सिखर बानी हुई थी, अब वो एक बार फिर से अपने बेटे सामान भतीजे की सिखर बन चुकी थी, वैसे अगर ये बात आये की यहाँ तक खेल पंहुचा कैसे तोह वो कुछ ऐसे हुआ की.. सत्यम धीरे से अपनी चारपाई से उठता और वो चारो और अचे से देखता है जहा ठण्ड की उस रात में गहरा सन्नाटा चाय हुआ था, वो धीरे से अपनी रज़ाई को अपने सरीर से उठता है और फिर पास की hi चारपाई पे गहरी नींद में सोते हुए 'सोनू' की और देखता है फिर बिलकुल शांति क साथ वो अपने खड़े लुंड क लिए गीली योनि का सिखर करने चल पड़ता है, जहा उसे अचे से पता था उसके लुंड क आगे हर बार हरने वाली उसकी चची 'मालती' इस पल कहा है



जल्दी hi सत्यम एक एक कदम ऐसे रखते हुए की उससे तनिक भी शोर उप्टन न हो और जल्दी hi वो घर क पिछले हिस्से की और आगे बढ़ने लगता है जहा ठंडी हवा क झोंके बार बार उसके सरीर को बेहरमी से कंपकपा दे रही थी और डाट ऐसे बज पड़ते जैसे किसी व्यक्ति को नंगा करके सर्पना नदी क ठन्डे जल में खड़ा कर दिया गया हो.. वैसे सत्यम बहादुरी का पूरा परिचय देते हुए आगे बाद रहा था पर पकडे जाने का दर उसपे इस कदर हावी था की ऐसी ठण्ड में भी उसके कान क पास पसीने की कुछ बंधे देखि जा सकती थी, वो अब अपने गंतव्य क बिलकुल पास पहुंच चूका था की तभी बुरी तरह काँप उठता है असल मैं दूर कही किसी सियार तेज़ आवाज़ आस पास क वातावरण में गूंज गयी थी

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सत्यम एक पल क लिए वही रुक सा जाता है और फिर अपने कदम आगे बढ़ाता है और जल्दी hi वो उस कोठरी क सामने खड़ा था जहा उसके अंदर आज hi बानी उसकी रखेल चची 'मालती' सो रही थी.. स बात से पूरी तरह बेखराब की जल्दी hi उसे गर्माहट का असली आनंद मिलने वाला है

सत्यम धीरे से दरवाजे पे दस्तक देता है जो अंदर से बंद था, पर ये कोई बड़ी परेशानी वाली बात नहीं थी.. असल में वो दरवाजा और उसकी पुराणी समय की वो कुंडहि जो ऊपर की और चैन की तरह लगाई जाती थी वो इतने समय क चलते इतनी ढीली हो चुकी थी की अगर दरवाजे क दोनों किवाड़ों पे एक साथ जोर लगाया जाये तोह वो चैन वाली कुंडहि खुद hi खुल जाती है

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और सत्यम वही करता है और जल्दी hi एक धीमी से आवाज़ क साथ सत्यम क मुख पे मुस्कान बिखर जाती है और फिर जैसे hi वो दोनों किवाड़ों पे एक साथ जोर देता है वो खुलते चले जाते है.. किवाड़ क खुलते hi ठंडी हवा क एक तेज़ झोंका उस छोटी पर गरम कोठरी में भरता चला जाता है जहा गहरी नींद का सिखर हुई मालती को इस बात का पता तक नहीं चलता, जल्दी hi सत्यम उस कोठरी क अंदर खड़ा था और वो किवाड़ बंद हो चुके थे और उसकी वो कुंडहि वापस लग चुकी थी

सत्यम सामने की और देखता है तोह वह जमीन पे hi एक पुराणी रज़ाई को बिछा क उसपे बिस्तर लगाया गया था और उसके ऊपर बिछे बिस्तर पे गाओं की सबसे खूबसूरत औरत 'मालती' अपने होंठों तक रज़ाई को चढ़ाये हुए बेसुध सी सोई पड़ी थी..

सत्यम भले hi कमीना था पर अपने सामने इतनी खूबसूरत औरत को ऐसे सोता हुआ देख क एक पल क लिए तोह वो भी जैसे उस खूबसूरती में खो hi पड़ता है, जहा पास hi जलती उस लालटेन की हलकी रौशनी में 'मोनू की माँ' की खूबसूरती जैसे कई गुना बड़ी हुई सी प्रतीत होती है और उसका पहले hi खड़ा लुंड ऐसा नायब हुस्न देख क और ज्यादा सख्ती से खड़ा हो पड़ता है

"सच में मन्ना पड़ेगा.. इतनी खूबसूरत औरत कोई हो hi नहीं सकती.."

मालती क हुस्न की तारीफ करते हुए सत्यम का हाथ खुद hi उसके लोअर क ऊपर से उसके लुंड पे पहुंच चूका था जहा वो उसकी मोटाई का अनुमान लेते हुए सामने लेती हुई मोनू की माँ की दिलकश खूबसूरती को देखे जा रहा था.. पर जल्दी hi उसके अंदर का जानवर उस खूबसूरती में बस हवस ढूँढना सुरु कर देता है और जिसके चलते सत्यम को लोअर क अंदर कैद अपने लुंड क मोठे सुपडे पे कुछ कॉमर्स की बंधे बहार आती हुई महसूस होती है, वो खुद hi धीरे से अपना लोअर नीचे करता है और फिर किया था उसका लुंड एक hi पल में बहार ऐसे उछाल पड़ता है जैसे वो सीधा सामने लेती हुई मालती क होंठों क बीच hi जेक रुकेगा

सत्यम अपने तने हुए लुंड पेज अब अपनी उंगलिया फिरता है तोह उसे उसका कॉमर्स जो बून्द की सकल में बहार आया था

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उसे वो महसूस होता है और वो इतना अधिक था की उसकी दोनों उँगलियों क पोर पूरी तरह उससे भीग से जाते है.. वो धीरे से अपने हाथ को अपनी नाक तक लता है और जैसे hi उसे अपने hi कॉमर्स की खुसबू महसूस होती है उसकी आँखें आनंद से बंद होती चली जाती है

"आआह्ह्ह्हह.. किया खुसबू है मेरे वीर्य की.. उफ्फ्फ.."

सत्यम अपने hi कॉमर्स की खुद hi बड़ाई करते हुए धीरे से अपने होंठों को खुलता है और बरी बरी से अपनी उन दोनों उँगलियों को मुंह में रखते हुए उसका ऐसे सेवन करने लगता है जैसे उनपे सेहद लगा हो

"उम्मम्मम्मम्मम.. Aaaaaaaaaaaaaaaahhh….. उउउउउ… मममममममम.. Ummmmmmmmmm.."

वो तब तक अपनी उन दोनों उँगलियों को चुस्त रहता है जबतक उसपे लगे उसके अपने कॉमर्स की खुसबू तक ख़तम नहीं हो जाती, फिर धीरे से अपने लुंड को सेहलते हुए बरी बरी से अपने पैरों को उठा क लोअर को निकल देता है और वही एक और हवा में उछाल क फेंक सा देता है.. अब वो गहरी नींद में सोती हुई मालती क ठीक सामने खड़ा था वो भी पूरी तरह नंगा, ककी बिस्तर पे लेटने से पहले hi उसके अपनी T-Shirt उतर दी थी और लोअर अब उतर चूका था

पूरी तरह मादरजात नंगा खड़ा सत्यम उस छोटी सी कोठरी में किसी पियासे पिशाच जैसे लग रहा था, वो धीरे से झुकता है और मालती क सरीर को गर्माहट देती उस रज़ाई को धीरे धीरे खींच देता है.. एक पल क लिए मालती का सरीर कुनमुनाता जरूर है पर उस छोटी कोठरी क अंदर गर्मी का माहौल किसी भट्टी सामान था जिस कारन वो अब भी सोई hi रहती है, वैसे भी उसके सरीर की थकन आज इतनी अधिक थी की ऐसी छोटी मोती चीज़े उसकी नींद को उससे चुरा नहीं सकती थी

"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. किया कमल का हुस्न है इस माँ की लोदी का.."



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सत्यम अब गहरी नींद में सोती हुई मालती को अचे से देखते हुए अपने शब्दों को रोक नहीं पाटा, और फिर धीरे से उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ क खींचता है तोह मातलि नींद में hi घूम जाती है.. पर वो इतने में कहा रुकता है और जल्दी hi पूरी तरह नींद की बाहों में समय हुई मालती की साड़ी जो अब उसके भतीजे क हाथों में थी वो एक पल क लिए उस साड़ी को देखता है और फिर मुस्कुरा क जल्दी hi वो साड़ी मालती क पास hi जमीन पे गिर चुकी थी, अब वो धीरे से मालती क करीब बैठ जाता है और धीरे से अपने हाथों को उसके उठे हुए योबन पे रखते हुए बस गोल गोल घूमता है

"आअह्ह्ह्ह.. साली की चूचिया कितनी कासी है, इन्हे तोह सोनू और झींगुर दोनों से चुसवाऊँगा.."

पर ऐसी जोश में उसके हाथों की जकड थोड़ी ज्यादा बाद जाती है और मालती नींद में hi मचल सी पड़ती है और करवट बदल लेती है, सत्यम एक पल क लिए अपने हाथ को आगे बड़ा क मालती को नींद से जगाने hi वाला था की तभी उसके मन में एक ऐसा विचार आता है की उसके अधरों की मुस्कान किसी सैतान की तरह खिल उठती है.. वो बिना समय नष्ट किये हुए तुरंत hi अपनी जगह से उठता है और उस कोठरी में चारो और नज़र दौड़ने लगता है, ताकि उसे वो दिख जाता है जो चाहिए था यानि एक बड़ी घास काटने वाली कैची.. असल में पिछले साल जब महेंद्र ने अपने खेतों क किनारे किनारे पहली बार फूल की खेती सुरु की थी तब उसे पौधे की चटाई क चलते ये खास कैची सेहर ले मंगवानी पड़ी थी जो कुंदन ने hi लेक दी थी

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सत्यम बिना देरी क वो बड़ी कैची उठा लेता है और उसके अधरों पे फैली सैतानी ख़ुशी लगातार बढ़ती चली जाती है, वो धीरे से वापस बैठ क कैची का एक सिरा ब्लाउज क नीचे ले जाता है और देखते hi देखते धीरे धीरे करके 'मोनू की माँ' का ब्लाउज काटना सुरु हो जाता है.. अगले 15 मं की म्हणत क बाद अब सत्यम सीधा खड़ा था हाथ में वो कैची लिए हुए जहा मालती क सरीर को छुपाने वाला एक एक कपडा अब कटा हुआ वही उसकी उत्तरी हुई साड़ी क पास पड़ा था

"आआह्ह्ह्ह.. ये हुई न बात"

इसके बाद खेल कैसे आगे बढ़ते हुए यहाँ तक पहुंचा ये आप ऊपर पद hi चुके है, इसलिए चलिए आगे बढ़ते है..

सत्यम अपने पुरे मुंह को ऐसे खोलता है जैसे वो अलीबाबा की गुफा हो और फिर अपने होंठों और थोड़ा सा दाँतों की चुंबन को एक साथ मिलते हुए मालती की फूली हुई लाल योनि को जोर से एक hi बार में मुंह में भरे हुए जैसे उसका सेवन सा सुरु कर लेता है

"Ummmmmmmmmmm…….. Ggrrrrrrrrrrrrrrrruuuuuuupp….. Mmmmmmmmmm……. Slllrrrrrrrrrrrrpppppppuuuuuuppp…"

पहले hi अपने जवान भतीजे की हरकतों से पूरी तरह मचलती हुई मालती इस बार तोह जैसे बस कामुकता क अंधे कुवे में गिर hi पड़ती है

"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. किया कर रहा है... kuttteeeeeeeeeee… हराम क चोदे… चोर मेरी छूट… Aaaaaaaaaaaaaaahhh.. डाट लग रहे है.. भड़वे.. चोर मेरी छूट को…. Aaaaaaaaaaaaaahhh…. ेस्स्स्सह्ह्हह्ह... ऐसा मत करो सत्यम... uffffffffffff….. जोर से सुवर कही क.. Aaaaaaaaaahhh… ले खा ले मेरी छूट.. आआआआह्ह्ह्ह.. ले खा ले… हराम क चोदे.. ले खा.. Aaaaaaaaaahhh.. Uffffffffffff…."

कामुकता क अंधे कुवे में गिरती हुई मालती खुद hi अपनी इस्तिथि को समझने में सक्षम नहीं थी, वो कभी उसे रोकने की कोशिश करती तोह कभी उसे जैसे ललकार रही हो

"ले खा न.. भड़वे.. ले खा मेरी छूट.. Aaaaaaaaaaaaaahhhh.. हरामी.. kuttteeeeeeeeeee… esssssssssssssshhhhhhhhhhh.."

'मोनू की माँ' का हाल अब कुछ ऐसा हो चूका था की वो नीचे से अपनी कमर को उठाते हुए जोर जोर से अपनी छूट को सत्यम क मुंह पे दबाना सुरु कर चुकी थी पर अब भी उसके दोनों हाथ उसके बिस्तर पे पकड़ते hi जा रहे थे

"Aaaaaaaaaaaahhh.. Kuttttttttttttttteeeeeeeeeeeeeeee… esssssssssssssshhhh… मत कर रंडी की औलाद.. रुक जा.. Kuttteeeeeeeeeeeeeee…"

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मालती क मुख से निकलने वाली हर गन्दी गाली, इस पल सत्यम क लिए किसी ईंधन जैसी काम कर रही थी, वो उसके अंदर का जोश और जाता बढ़ती जा रही थी.. खास करके जब उसने 'रंडी की औलाद' वाला सब्द सुना तोह उसका जोश इतना ज्यादा बाद गया की उसने अपने दाँतों को मालती की सूजी हुई छूट पे जोर से दबा दिया जिसके चलते मालती बुरी तरह दर्द से तड़प उठी थी और उसकी आँखों से कुछ मोती सामान आंसुओं की बून्द भी गिर पड़ी थी.. वो तुरंत hi अपने सर क नीचे राखी हुई तकिया खींच क अपने मुंह पे खुद hi दबा लेती है ककी वो अचे से जानती थी अब वो अपनी चीख रोकने में और सक्षम नहीं होगी

"Grrrrrrrrrrrrrrrrruuuuuuuuuuummmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmmmm… gggggggggggggggggrrrrrrrrrrrrrmmmmmmmmmmm.."

उस कमरे में बस मालती की घुटी घुटी चीख hi हलकी सी सुनाई पड़ती है



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वैसे एक हैरानी की बात ये भी थी की आज ठंडक बाकि दिनों से ज्यादा hi थी और ऐसे में हमारी दूध जैसी गोरी मालती पूर्ण नंगी अवस्था में पड़ी हुई थी पर उसने एक बार भी ये नहीं कहा की

'मुझे थैंक लग रही है'

सायद ये कामुकता की वो गर्मी थी जो अचे ाचों को जला चुकी है

सत्यम मुस्कुराते हुए अपने होंठों और दाँतों को कुंदन की पत्नी की योनि से हटाता है और फिर उसका हाल यानि पूरी तरह उसके थूक से सनी हुई अपनी चची की योनि को देखते हुए मुस्कुरा क कहता है

"वाह.. मेरी चिनार ये तोह और ज्यादा निखार गयी.."

दर्द से तड़पती हुई मालती भी एक पल क लिए अपना दर्द भूल क उस तकिये को अपने चेहरे पे शरमाते हुए रख लेती है जैसे अपने चेहरे पे फैली लज्जा की लालिमा को छुपा रही हो, वो अलग बात थी की वो इस पल पूरी नंगी थी.. सत्यम बिना देरी क दोनों हाथों से अपनी खूबसूरत कामुक चची क पैरों को मजबूती से पकड़ता है और एक hi पल में उन्हें और ज्यादा फैला देता है जिससे आज दिन में 3 बार चूड़ी हुई छूट जो डबल रोटी सामान फूल गयी और उसपे अब सत्यम क थूक भी सना हुआ था वो पहले से ज्यादा निखार क और खुल क सामने आ जाती है.. और ऐसा होते hi उस योनि की ऐसी दुर्दशा करने वह सत्यम पीछे नहीं रहता, अबकी बार वो अपनी पूरी जीभ को बहार निकलता है और योनि क छेद क अंदर तक चलना सुरु कर देता है, बिलकुल किसी आवारा कुत्ते जैसे जब वो पानी को अपनी जीभ से चाट चाट क पीटा है

"सलल्लूऊऊऊप्प्प.... स्सल्ल्ल्रररऊऊऊप्प्प... चाहहहहहाआपपप... लल्लूऊऊरररापपपप... सररररूउपपप..... सससललल्लूऊऊऊललूउपपपप… ummmmmmmmmmmmm.. Ggglllllllllllllluurrrrrrrrrppp.. Slllllllllllrrrrrrrrrrrrruuuuuuuupp… Srrrrrrrrrrrrrpppppp…"

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महेंद्र क घर मैं कामुकता का खेल एक बार फिर से सुरु हो चूका था और घर मैं किसी को इसका पता भी नहीं.. वैसे एक बात तोह सच hi है की कामुकता का नासा सच मैं कुछ भी करवा सकता है

सत्यम मुस्कुराते हुए अपना मुंह ऊपर करता है और फिर धीरे से मालती से कहता है

"तकिया हटा चिनार.. और देख मैं तेरी छूट क साथ किया कर रहा हु"

फिर मालती की गीली योनि क ऊपर उसके काले काले मुलायम बालों में उंगलिया फिरते हुए कहता है

"झींगुर ये खेती देख ले तोह साला पागल hi हो जायेगा.."

एक बार फिर से अपनी खूबसूरती की ऐसी कामुक तारीफ ने मालती क पुरे सरीर में मानो आग भड़का दी हो, फिर वो सत्यम की बात नहीं टलती और एक आज्ञाकारी कामुक औरत की भांति धीरे से अपने तकिये हो हटा क किनारे रखने लगती है तोह उसे वही कोठरी की दिवार क पास hi वो बड़ी वाली कैंची दिखती है जिसे देख वो समझ hi नहीं पाती की

'आखिर ये यहाँ कैसे आ गयी, सोने से पहले तोह नहीं थी'

पर सत्यम अब और कोई देरी किये बिना फिर से अपनी पूरी जीभ बहार निकल क एक क बाद एक लगतार मोनू की माँ की छूट को उसकी काली काली खेती क ऊपर से hi चेतना सुरु कर देता और साथ hi साथ उस खुली और सूजी हुई योनि की फांकों क बीच अपनी जीभ घुसते हुए अंदर क कामुक बहते हुए कॉमर्स को चखने लगता है जो वैसे तोह नमकीन था पर उसका असर ऐसा था जिसे समझाया नहीं जा सकता था

"उम्मम्मम्मम्मम.. Aaaaaaaaaaaaahhh… सलल्लूऊऊऊरररपप्प.... सल्ल्ल्लूऊऊरररररर.... Gggllllllllllllllluuuuurrrrrrrppp…. उम्मम्मम्मम्म… सलललललललूऊऊऊप्प्प्पप्प...... छहहाआपपपपपप.... गग्गलललूउपपपप.... ससससललल्लूऊऊप्प्परररपपपपपपप...."

सत्यम जोर जोर से अपने 'चाचा कुंदन' की धर्मपत्नी की योनि की चूसै सुरु कर चूका था, उसकी हरकतों क आगे अंततः हमारी खूबसूरत 'मोनू की माँ' ने भी हतियार दाल hi दिए और उसका एक हाथ न जाने कब सत्यम क बालों में चलना सुरु हो चूका था और आँखें कामुकता की अधिकता क चलते पूरी तरह बंद हो चुकी थी

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"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह... essshhhhhhhhhhh.... उफ्फ्फ्फ़..... बीटा... aaahhhhhhhhhhhh... माआ..... किया करता है... .ेस्शह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़.... खा जायेगा किया... आआह्ह्हह्ह्ह्ह… ऐसे hi.. आआआअह्ह्ह.. यही पे अपनी जीभ को रगड़.. आआआआहहह.. haiiiiiiiiiiii.. माआआआआ… ufffffffffff….haiiiiii.... उफ्फ्फ्फ़....."

सत्यम जोर जोर से छूट को चूसते हुए अपने दोनों हाथों से मालती की कोमल और खूबसूरत नंगी जाँघों को भी जोर जोर से मसलना सुरु कर चूका था, और जब उसकी मोती मजबूत उंगलिया मालती को अपनी जाँघों क मार्श में धास्ति हुई सी प्रतीत होती तोह उसे एक साथ दोहरे हमले वाली भावना मिलती और कामुकता का अंतहीन भरा सागर उसकी योनि से कभी कभी चालक भी पड़ता.. वो कामुकता से आह्ह्ह्ह भर्ती हुई सत्यम क बालों में अपनी उंगलिया फिरते हुए कहती है

"आआआआअह्ह्ह.. ऐसे hi.. ufffffffffffff.. आआआहहह.. कुटटटटटटटी…. ऐसे hi……….. ेस्स्स्सस्स्स्शह्ह्ह… Maaaaaaaaaaaaaa… आआआआअह्ह.. दिन मैं तूने ऐसी छूट को छोड़ छोड़ क लाल कर दिया था और अब उसे चूस चूस क ठंडक दे रहा है.. आअह्ह्ह्हह... हैईईई... मेरे बचे... ेस्शह्ह्ह.. ऐसे hi... उफ्फ्फ..... मा.... माअररररर... गयीईई... रीई.... ेस्शह्ह्हह्ह… खा ले कुत्त्तेईईईई… पूरी छूट का पानी चूस क पि ले हरमजादे…. Aaaaaaaaaahhhh…"

सत्यम एक बार फिर से अपनी चची को कामुकता क रंग मैं रंगता हुआ पाटा है तोह उसकी खुसी का ठिकाना नहीं रहता ककी वो अब समझ चूका था की मालती पूरी तरह उसके काबू में आ चुकी है और वो और जोर जोर से छूट की चूसै सुरु कर देता है

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"चहहहहाआपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प....... उम्मम्मम्मम्म... सलल्लूऊऊऊरररपप्प.... सल्ल्ल्लूऊऊरररररर.... सलललललललूऊऊऊप्प्प्पप्प...... छहहाआपपपपपप.... गग्गलललूउपपपप.... ससससललल्लूऊऊप्प्परररपपपपपपप.... चहहहहाआपपप........... सलल्लूऊऊऊप्प्प्पप"

पर तभी वो एक पल क लिए रुकता है और अपना चेहरा ऊपर उठा क देखता है जहा मालती बुरी तरह मचलती जा रही और उसकी हालत देखते हुए कहता है

"तुम्हे ऐसी हालत में अगर झींगुर देख ले तोह उसका तोह ऐसे hi निकल जायेगा.."

ये सोच की गाओं का कोई जवान लड़का उसे ऐसे देख सकता है, न जाने क्यों ये बात मालती को और ज्यादा गरम कर रही थी जैसे कोई आग अब भी ऐसी थी जो अभी जलनि बाकि हो और इन बातों क चलते उस आग में हलकी चिंगारियां लगनी सुरु हो चुकी हो.. सायद ऐसी कारन सत्यम जब फिर से अपनी कामुक और खूबसूरत चची की छूट पे अपना मुंह लगता तोह मालती पहले से कही ज्यादा गर्मी महसूस करने लगती है और इस कारन पूरी पागल सी होने लगती थी और जोर जोर से अपने भतीजे क बालों में अपनी उंगलिया चलते हुए धीरे धीरे उसका सर अब अपनी योनि पे दबाने लगी थी, की तभी एक पल क लिए उसकी आँखें हलकी सी खुलती है और उसी कोठरी की एक दिवार पे सालों पुराणी लटक रही घडी पे उसकी नज़रें पड़ती है, जो न जाने कैसे आज भी समय बता रही थी

मालती देखती है की इस समय रात क 11:55 हो रहे थे, यानि अगर यहाँ उसे सत्यम एक बार फिर से छोड़ देता है तोह आज वो एक hi दिन में 4 बार चुद जाएगी.. और न जाने इस सोच में ऐसा किया था की वो खुद hi वो अजीब सा सवाल कर लेती है

"आअह्हह्ह्ह्ह... माआ....... essshhhhhhhhhh... उफ्फफ्फ्फ़..... Kutteeeeeeeeeee.. Aaaaaaaaaahhhh…. किया करना चाहता है.. उफ्फफ्फ्फ़... मायआ... किया फिर से अपनी चची को छोड़ेगा.. ेस्सशशःठह्ह्ह्ह.. किया एक hi दिन में 4 बार छोड़ना चाहता है.. आअह्हह्ह्ह्हह.."

सत्यम जो पूरी तरह इस पल अपनी चची की छूट को चाटने में व्यस्त था वो ये सुनते hi अपना सर ऊपर करते हुए उस कामुक गीली योनि को चेतना चोर क मुस्कुरा क कहता है

"आअह्ह्ह्हह.. इतनी रात को चोरी से यहाँ आके आपको नंगा किया है, किया लगता है.. बिना चोदे चोर दूंगा.. सससलल्लूऊऊप्प्प....... गररऱऊऊप्प्प.... ललललापपप.... छहहाआपप.... सलल्लूऊऊप्प्प्प… वैसे में बस छोड़ने आया था.. पर लगता है साली रैंड तुझे एक hi दिन में 4 बार चुद क कोई पत्थर लगवाना है अपने नाम का… उम्मम्मम… सल्ल्ल्लूररररररप्प.. वैसे अगर ज्यादा आग है तोह कहो.. Ummmmmmmmmmmm.. ग्र्रूऊऊऊप्प्प….."

पर इस बार मालती, सत्यम को उसकी बात पूरी नहीं करने देती ककी उससे पहले hi वो उसका सर पकड़ क जोर से अपनी छूट पे लगा देती है और कामुकता का कामुक संगम फिर से सुरु हो जाता है

"सलल्लूऊऊऊप्प्प्पपप्पप्प... गग्गलललूउपप..... सररर्रूऊऊऊप्प्प.... उम्मम्मम्मम्म.... सल्ल्ल्लूऊऊऊऊप्प्प..........."

वो छोटी सी सालों से वीरान पड़ी कोठरी आज एक कामुक खेल की साक्षी बन चुकी थी, सत्यम अपनी जीभ निकल क उसे अपनी चची की छूट की गहराई मैं अंदर घुसा क कभी चत्ताह तोह कभी बस ऊपर से ऐसे जीभ चलता जैसे कोई कुत्ता अपनी मालकिन को छत्त क अपने प्रेम का साबुत दे रहा हो

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वैसे मालती की आज दिन में 3 बार घनघोर चुदाई हुई थी जिस कारन उसकी योनि में मीठा मीठा दर्द भी हो रहा था पर इतनी दिएर से सत्यम क द्वारा छूट की चटाई क कारन उसका वो दर्द न जाने कहा हवा हो चूका था

"सल्ल्ल्लूऊऊऊप्प्प..... Hmmmmmmmmmm.. गललललरररररररपपप… सरररररूऊऊऊप्प्प..... गग्गललल्लूऊऊऊऊप्प्प............. सससललल्लूऊऊऊप्प्प....."

मालती की आग अब पूरी तरह भड़क चुकी थी तभी तोह वो जोर से अपने भतीजे का सर अपनी योनि पे दबा लेती है और सत्यम भी अपनी चची की आज्ञा का पूरा सम्मान करते हुए जोर जोर से उनकी छूट क अंदर अपनी जीभ घुसा क अंदर तक चेतना और चूसना सुरु कर देता है

"सल्ल्ल्लूऊऊप्प्प.... सलललललललररररूऊऊऊप्प्प... उम्मम्मम्मम्म..... चहहहहाआपपप..... लल्लाहूऊऊररररपपपपप"

मालती की इस कामुक छूट चूसै क चलते उसकी योनि अब भर भर क अपना कॉमर्स चूर्ण सुरु कर चुकी थी, जिस कारन मालती का पूरा सरीर अकड़ने लगता है और उसकी आँखें चढ़ने सी लगती है

"आअह्ह्ह्हह... और जोर से... आआआआअह्ह्ह.. जोर से चूस कुत्त्तेईईईई… भड़वे दम नहीं है किया.. आआआआहहह.. और जोर से.. aaaaaaaaaahhh.. आअह्ह्ह्ह और जोर जोर से चूस बीटा.. आअह्ह्ह्हह... चूस ले अपनी रंडी चची की छूट.. आअह्ह्ह्ह.. चिनार क पिल्लै अंदर तक अपनी जीभ घुसा क चुस्स्स... आअह्ह्ह्ह.. छहट्ट ले... बुरचात्ते.. चाट मेरी छूट.. खा जा अपनी चची की छूट को... आअह्ह्ह्ह... माआ... ऐसे hi.. उफ्फ्फ्फ़.... पूरी तरह निचोड़ दे मेरी छूट को.. आआह्ह्ह्ह.. माआ..... सारा रास पि ले सुवर की औलाद.. आआआहहह.."

पर सत्यम तोह खेल को आराम से खेलने का मज़ा ले रहा था, इसलिए वो अपना मुंह अपनी चची की छूट से अलग करता है जो हमारे 'मोनू की माँ' को जरा भी पसंद नहीं आता.. पर सत्यम उसकी परवा किये बिना मुस्कुरा क कहता है, वैसे इस समय उसका पूरा मुंह पूरी तरह मालती क कॉमर्स से चमक रहा था

"आअह्ह्ह... किया स्वाद है अपनी छूट का.. आअह्ह्ह्हह.. मज़ा आ गया.. चची, वैसे समय किया हो रहा है.. ?"

सत्यम एक अजीब और अटपटा सा सवाल करता है, पर दूसरी और मालती को सच मैं सत्यम का यु छूट चेतना बंद करना जरा भी ाचा नहीं लगता जिससे वो चीड़ सी जाती है पर फिर भी वो सामने दिवार पे तंगी गाड़ी मैं समय देखती है तोह सायद 12 बजने मैं बस 1 मं hi बचा था, मालती ग़ुस्से से सत्यम का सर पकड़ती है और जोर से अपनी पानी चोरटी हुई छूट पे दबाते हुए कहती है

"मादरचोद कुट्टी.... समय क्यू पूछ रहा है.. आअह्हह्ह्ह्ह.. छूट छत्त हमरजादे मेरी.. बस छूट चत्तत्त न... चत्तत्त भड़वे.. चाट मेरी छूट.. चट्ट्ट्ट.. कुट्टी... सुवर कही क.. चट्ट्ट्ट... चत्तत्त मेरी छूट.."

मालती की हालत देख क ऐसा लग रहा था जैसे वो कामुकता की अग्नि में जलती जा रही हो और अगर जल्दी hi उसके कॉमर्स की सही से वर्षा नहीं हुई तोह वो पूरी तरह राख में बदल जाएगी.. इसलिए तोह वो जोर से अपने भतीजे का सर अपनी छूट पे दबाने की कोशिश सी करती है पर सत्यम एक बार फिर से अपना चेहरा अपनी चची की भट्टी जैसी जलती छूट से हटा hi लेता है और तुरंत पीछे गाड़ी को देखता है जिसमें अब किसी भी पल 12 बजने को थे, इसलिए वो अपने अगले पड़ाव की तरफ बाद चलता है



कंटिन्यू... 👇
 
सत्यम हल्का सा पीछे होता है और अपनी चची क पैरों को जोर से पकड़ क पहले से और ज्यादा फैला देता है फिर अपना खड़ा लुंड जो न जाने कबसे मालती क हुस्न को सलामी दिए जा रहा था और रह रह क उसमें से कामुकता की लसलसी बुँदे टपकती जा रही थी.. वो अपने उस मोठे भीमकाय काले लुंड को हाथों से पकड़ क उसका मोटा टोपा 'मोनू की माँ' की छूट पे टिका देता है और मुस्कुरा क कहता है

"साली रनडीई कही की.. मुझे गालिया दे रही थी न... बेहेन की लोदी.. चिनार कही की.. आज मैं तुझे एक बार और छोड़ क एक hi दिन में 4 बार छोड़ने का मरदाना काम पूरा करूँगा

.. वैसे भी तेरी जैसी Maha-Rand को जितना छोड़ा जाये काम hi है.."

और इतना कहते hi वो अपनी पूरी शक्ति को इक्कठा करता है और एक जोरदार दक्का जड़ देता है, जिसके चलते उसका मोटा काला भीमकाय लुंड 'कुंदन की पत्नी' की आज दिन मैं 3 बार चूड़ी हुई छूट मैं एक hi दुमदार दकके क कारन अंदर तक भरता चला जाता है.. पर सायद मालती को भी ये अचे से पता था की सत्यम उसपे कोई भी रेहम नहीं करेगा.. इसलिए वो खुद hi जल्दी से उसी टिकिया को उठा लेती है और अपने मुंह पे रख क दोनों हाथों से दबा लेती है, मेरी माँ की ये हरकत कितनी कामुक थी ये मैं चहु तोह भी नहीं समझा सकता..

सत्यम का मोटा काला भयंकर लुंड एक hi जोरदार वार क साथ उस सूजी हुई योनि को एक बार फिर से चीरते हुए अंदर तक घुसता चला जाता है.. वो भीमकाय लुंड मालती की पहले hi गीली और रास चोरटी छूट की दिवार को बेहरहमी से रगड़ते हुए जब पूरा अंदर जेक बच्चेदानी को चूमता है तोह मालती का जिस्म दर्द से तरप उठता है और ऐसा लगता है जैसे किसी ने उसके जख्मों पे लाल मिर्च मॉल दी हो, पर ये उसका अनुभव hi था जो उसने समय रहते उस तकिये से अपना मुंह बंद कर लिया था पर फिर भी उसकी घुटी घुटी चीख हलकी सी निकल hi जाती है.. जो किस्मत से उसी छोटी सी कोठरी में hi अपना दम तोड़ क रह जाती है

“आअह्हह्ह्ह्हह... माआ..... Kutttttttttttttttttttteeeeeeeeeee… kuttteeeeeeeeee…. क pilleeeeeeeeeeeee… हराम क चोदे… भड़वे…. Ummmmmmmmmmmm… गररऱऊऊऊऊप्प्प्प...... मारर्र..... उम्मम्मम्मम्म... गगगगुणूपपपपपप…"

पर सत्यम तोह अपनी चची की ऐसी हालत देख क है पड़ता है और अपना लुंड वापस बहार खींचते हुए हस्ता है और फिर कहता है

"क्यू साली रंडी.. अब बता मुझे सुवर बोल रही थी न.. अब पता चला मैं सुवर नहीं शेर हु.. ले सालियी.. चिनार..... कुटिया.. रंडी कही की.. ये ले… हरामजादी…"

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सत्यम एक बार फिर से ये बोलते हुए वापस से अपना लुंड एक hi झटके से अंदर तक घुसा देता है.. जिससे उसका बड़े बड़े ाँद मालती की योनि क नीचे जोर से टकराते है और उस कोठरी की छोटी दीवारें उस शोर से भर उठती है

"चतत्ताआक्ककककककक"

वो मधुर स्वर उस कोठरी क हर कोने में गूंज पड़ता है, और ऐसी क साथ सत्यम का विकराल लुंड एक hi दिन में एक बार फिर से मोनू की माँ की छूट मैं अंदर तक घुस चूका था

मालती का पूरा जिस्म उस अनोखे सुख और उस तीव्र पर मीठी पीड़ा से भरता चला जाता है.. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसकी छूट अंदर से चील सी गयी हो, और ऐसे में जब वो मोटा लुंड अंदर की दीवारों को चीरते और फैलते हुए और अंदर घुसता है तोह उसे सब्दो में बया न किया जा सकता.. कुलमिलाकर इस समय मालती को दर्द और सुकून एक साथ मिलता है, सत्यम ये अंदर बहार वाला कार्य इसके बाद ऐसे hi 2-3 बार और करता है और उतनी hi म्हणत और सिद्दत क साथ.. वो अपना लुंड बहार तक खींचता पर छूट का मुख से उसका टोपा हैट नहीं पाटा ककी उससे पहले hi वो फिर से पूरी ताक़त क साथ पूरा लुंड अंदर उतर देता, जिससे उसके ाँद मालती की छूट क पास जोर से टकराते और मधुर आवाज़ से वो छोटी सी कोठरी पूरी की पूरी भर्ती चली जाती

"चत्तत्ताआआककककक...... फाआट्ट्ट्ट........ फायतततताआयकककककककक...... पायतत्तत... पायतत्तत....."

धीरे धीरे मालती की दर्द भरी और घुटी हुई कामुक सिसकारियों और चीखों क बीच ये

'फट.. चत्ताकक..'

का स्वर तेज़ होता जा रहा था, सत्यम पूरा दम दिखते हुए

"साली रंडी.. चिनार कही की.. ये मत भूलना की तू मेरी रखेल है.. मेरी कुटिया है तू.. .. ये ले... आआआहहहहह कितनी गरम छूट है मादरचोद तेरी.. आआह्ह.. बहनचोद.. तभी तोह झींगुर तेरे लिए पागल रहता है.. जब देखो तब बस तेरी बातें करना चाहता है.. हर पल तेरी खूबसूरती क गन जाता रहता है… आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह… सच में भट्टी जैसी देहक रही है तेरी छूट.. आआआआहहह.."

मालती, सत्यम की बातें सुनते हुए जहा एक और शर्म से लाल होती जा रही थी वही उसका सरीर उसके अंदर की अग्नि क चलते कामुकता से भरता जा रहा था.. पर वो अब भी अपने मुंह पे वो तकिया रखे हुए अपनी छूट में उतारते हुए उस मोठे लुंड का सुकून भरा एहसास अपने अंदर भर्ती जा रही थी.. वही सामने से आते सत्यम क दुमदार दकके उसके पुरे जिस्म में अनोखी थिरकन भरते जा रहे थे और चूचियों में कामुक उछाल उप्टन कर रहे थे

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सत्यम अब अपने हाथों को मालती की कमर पे लेक जमा चूका था और पूरी सिद्दत और म्हणत से 'मोनू की माँ' छोड़ते हुए उसे खेत पे कही मालती की वो बात याद आती है

'कमीना आज दुरबा तोह सोचना भी नहीं.. एक hi दिन में 3 बार चुदाई करि है मेरी, कमीने अपनी चची को रैंड बना डाला'

और ये सोचते हुए सत्यम को खुद hi हसी आ जाती है, और उसके दक्कों की रफ़्तार अचानक से दूंगी हो जाती है, कामुकता का ये कामुक खेल और कुछ धक्कों तक ऐसी प्रकार से चलता है और जल्दी hi दिन में 3 बार चुद चुकी मालती की योनि एक बार फिर से अपने भतीजे का लुंड खाने को पूरी तरह तैयार हो चुकी थी.. उसका बेहटा कॉमर्स और सत्यम क जोरदार दक्कों की रफ़्तार हमारी मालती को असीम शक्ति सी प्रदान कर रहा था और ऐसी कारन मालती अपने मुंह से वो तकिया हटा क उसे दूर फेक देती है, सायद अब उसे यकीन था की वो अपनी चीखों पे काबू रख सकती है.. भले hi वो इस खेल में कुछ सालों से दूर थी पर वो कोई नयी खिलाडी नहीं थी, वो अपनी छूट की गहराई में आज चौथी बार अपने भतीजे का लुंड महसूस करती हुई कामुकता से भर उठती थी और उस कामुक param-anand क एहसास क साथ कहती है

"आआह्ह्हह्ह्ह्ह.. उफ्फ्फ्फ़... माआ.... हा..... पहाड़ड़ड़ड़.... डायलललल कुट्ट्टीी... अपनी चची की छूट को... आअह्ह्ह्हह... माआ... कमीने कोई अपनी चची को ऐसे छोड़ता है.. आअह्ह्ह्हह... एक hi बार मैं पूरा लुंड घुसा दिया... ये भी नहीं सोचा की आज एक hi दिन मैं चौथी बार छोड़ रहा है.. मेरी छूट का किया हाल हुआ पड़ा होगा... आअह्हह्ह्ह्ह... पर अब छोड़ कुट्टी.. छोड़ अपनी चची को.. आअह्ह्ह्ह.. जोर जोर से छोड़... छोड़ भड़वे.. छोड़ मादरचोद.. छोड़.. छोड़.. छोड़.. छोड़...."

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सत्यम भी अपनी चची की बात टालता नहीं और अपना लुंड फिर से बहार खींच क उसी गति से अंदर घुसा देता है.. जिससे की उसके बड़े बड़े ाँद मालती की छूट से जोरो से टकराने लगते है, और वो मधुर स्वर किसी मधुर धुन की तरह बजना सुरु हो जाता है

"फाआजतततततत.... पाहात्त्टटटटटट.... चाहात्त्टक्कककककक..... पहाअट्ट.... पाहात्त्त्तत्त..."

तभी सत्यम अपने एक हाथ मालती की कमर से सरकते हुए उसकी नाभि पे लेके जाता है और गहरी नाभि में अपनी ऊँगली को घुसा को वह अटखेलिया सी करते हुए कहता है

"आआआआहहह… Uffffffffff…. बहनचोद कितनी गरम छूट है मादरचोद तेरी.. आआअह्हह्ह्ह्हह.. वैसे पता है मुझे लगता है.. की.."

मालती जो उसके जोरदार दक्कों को सेहती हुई अब खुल क उस आनंद को लेते हुए उसकी आँखों में डेक्टि है और कहती है

"किया… बोल कुटी… आआआअह्ह्ह.. Maaaaaaaaaa.. ऐसी हीईईई.. आआआहहह… पहाड़ दे मेरी छूट को.. आआआआअह्ह्ह.."

सत्यम, मालती का हाल देख क मुस्कुराते हुए उसे वैसे hi जोर जोर से छोड़ते हुए कहता है

"मुझे लगता है.. सोनू को सक हो गया है.."

मालती उन बेहरहम दक्कों को सेहती हुई हैरान रह जाती है, उसकी आंखें पूरी तरह फ़ैल जाती है और आवाज़ एक पल क लिए काँप पड़ती है, वो कुछ कहने क लिए मुंह hi खोलती है की उसे स्नानघर का वो दृस्य याद आने लगता है जब उसे वो वीर्य से सनी हुई टॉवल मिली थी.. बिना सवाल पूछे hi सायद मालती को जवान मिल गया था

मालती एक पल शांत रहने क बाद कनपटी हुई आवाज़ में कहती है

"ये तू किया कह रहा है.. उसने कुछ कहा किया ?"

सत्यम अपना एक हाथ और आगे बड़ा क उनकी नंगी भरी हुई मोती चुकी को बेहरमी से जकड लेता है और उनके निप्पल्स को जोर से मसलते हुए कहता है

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"कहा तोह उसने कुछ नहीं.. पर शाम से देख रहा हु साला बार बार मुझे देख क मुस्कुर रहा है.."

मालती भी छुड़वाते हुए उस कामुक गर्मी से भरी हुई थोड़ा परेशां सा तोह होती है पर साथ hi साथ उसकी योनि में एक नयी ऊर्जा और आग सी भी सुलग उठती है

"हो.. हो.. सकता है वो किसी और बात पे मुस्कुराता हो.."

सत्यम जोर जोर से उसे छोड़ते हुए और उसकी चुकी को बेहरमी से मसलते हुए

"साली तू चुटिया है किया.. हम लड़के किया सोचते है मैं अचे से जनता हु.."

सत्यम ये कहते हुए अब दोनों हाथों से मोनू की माँ की दोनों चूचियों को जकड लेता है और जोर जोर से मसलने लगता है जिससे मालती की योनि एक बार फिर से भरभरा क झड़ना सुरु हो जाती है और उसका जिस्म बुरी तरह कांपने लगता है



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