Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 29 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

यह देख, तरुण को बहोत बुरा लगा.. पर वो मौसम की स्थिति को समझ रहा था.. एक वक्त था जब मौसम बेहद लाचार और निःसहाय थी.. दिन मे पचास बार कॉल कर रही थी पर वो जवाब नहीं दे रहा था.. लेकिन आज वैसी स्थिति नहीं थी.. मौसम के पास विशाल था.. और अब तो तरुण भी उस कतार मे खड़ा नजर आ रहा था

बगल मे मुंह फेरकर खड़ी मौसम के जवान पुष्ट स्तनों पर उसकी काले घने बालों वाली चोटी ऐसे लग रही थी.. जैसे सांप दूध पी रहा हो.. बेहद आकर्षक अंगों की मलेका मौसम की भरी हुई छाती.. इस तंग वातावरण मे.. सांसें लेते हुए ऊपर नीचे हो रही थी..

मौसम से और बर्दाश्त न हुआ और वो उठकर कमरे से बाहर चली गई.. उसके पीछे पीछे फाल्गुनी और कविता भी उठकर बाहर निकलने गई.. छोटे से दरवाजे से साथ में बाहर निकलते हुए फाल्गुनी के स्तन कविता की पीठ पर रगड़ गए.. कविता और फाल्गुनी की नजरें एक हुई.. फाल्गुनी के स्तनों को देखकर कविता सोचने लगी.. पापा ने कितनी बार इन स्तनों को रगड़ा होगा.. !!!

बाहर आकर कविता ने मौसम से कहा "ऐसे बाहर क्यों आ गई?? उन लोगों को बुरा लगेगा.. !!"

फाल्गुनी: "देख मौसम, विशाल से तेरी सगाई की बात चल रही है, अभी सगाई हुई नहीं है.. तू चाहें तो अब भी तरुण के साथ बात बन सकती है.. शायद कुदरत को भी यही मंजूर होगा.. वरना ऐसा संयोग कैसे होता... !!! हमारा यहाँ फोरम की तबीयत देखने आना.. और उनका मिलना.. सिर्फ कहानियों मे ही ऐसा मुमकिन हो सकता है.. सोच ले मौसम.. तरुण के लिए तू कितनी पागल थी ये मैं जानती हूँ.. अब निर्णय तुझे करना है"

मौसम ने असमंजस भारी नज़रों से फाल्गुनी की ओर देखा.. उसकी आँखों मे हजार सवाल नजर उमड़ रहे थे.. पर उन सवालों को कैसे पेश करना.. वह उसे समझ नहीं आ रहा था

जीवन कभी कभी ऐसे ऐसे मोड पर लाकर खड़ा कर देता है, की अच्छे से अच्छे आदमी की बोलती बंद हो जाती है..

कविता: "मौसम, तू अंदर चल और अच्छे से पेश आना.. वरना उन लोगों को बुरा लग जाएगा"

उसका हाथ पकड़कर खींचते हुए अंदर ले गई कविता

रमिलाबहन अपनी बेटी की दुविधा को भलीभाँति समझ रही थी.. अभी कुछ दिनों पहले ही वो विशाल के घर गई थी उनके बेटे के हाथ मांगने.. और अब यह नई स्थिति आ खड़ी हुई थी..!!

तरुण के पापा ने बात आगे बढ़ाई "बहन जी, मैं आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ.. मौसम को मना करके हम लोगों ने बहोत बड़ी गलती कर दी थी.. मुझे मेरी गलती का एहसास हो रहा है.. तरुण और मौसम तो एक दूसरे को पहले से ही बेहद पसंद करते है.. कुछ कारणवश मुझे वह निर्णय लेना पड़ा था.. जिसका मुझे बहोत खेद है.. मैं अपने परिवार की ओर से हाथ जोड़कर माफी मांग रहा हूँ.. और विनती कर रहा हूँ की आप बीती बातों को भूल कर आप की बेटी का हाथ हमें दे दीजिए.. !!"

रमिलाबहन: "भाईसाहब, मुझे तो अब तक यही मालूम नहीं है की आप लोगों ने सगाई क्यों तोड़ दी थी.. !!"

तरुण: "आंटी, बीती बातें याद करने से क्या फायदा..!! जो हो गया सो हो गया..!!"

रमिलबहन: "ऐसे नहीं.. मुझे कारण तो पता होना ही चाहिए.. तभी मैं कुछ आगे के बारे मे सोचूँगी"

सब गंभीर हो गए.. सीधी-सादी रमिलबहन को किसी ने असली कारण बताया ही नहीं था.. ताकि उन्हें उनके स्वर्गस्थ पति की असलियत के बारे मे पता न चले..

पर तरुण के पापा ने बात को बखूबी संभाल लिया

तरुण के पापा: "असल मे ऐसा हुआ था की मेरे और सुबोधकांत के बीच कुछ व्यहवारिक बातों को लेकर कहा-सुनी हो गई थी और सुबोधकांत ने मेरा अपमान कर दिया था.. बात बहोत बिगड़ गई थी.. फिर तो ऐसा मौका ही नहीं मिला की कुछ संभल सकें.. जो भी हुआ उसमें तरुण और मौसम की कोई गलती नहीं थी.. जो कुछ भी हुआ था, हम बड़ों के बीच ही हुआ था, जिसका फल ईन बेचारे बच्चों को भुगतना पड़ा था"

रमिलाबहन काफी सरल प्रकृति की थी.. और उनके गले मे यह बात आसानी से उतर गई.. वो मौसम का हाथ पकड़कर एक तरफ ले गए

रमिलबहन: "बेटा, मैं समझ सकती हूँ की तू अभी क्या सोच रही है.. !! विशाल को तेरी ज़िंदगी मे आए हुए बस कुछ ही दिन तो हुए है..!! तेरी और तरुण की तो मंगनी तक हो गई थी.. शादी होना तय था.. !! याद कर.. उसके बगैर क्या हाल हो गया था तेरा.. !! तेरा प्यार वापिस लौटकर आया है और तू मुंह फेर रही है??"

मौसम: "और विशाल से क्या कहूँ?? की वो सब भूल जाएँ?? कोई खिलौना है क्या वो??"

रमिलाबहन चुप हो गई.. उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था.. मौसम की बात में भी दम था

रात के साढ़े बारह बज रहे थे.. तरुण के माता-पिता अब भी रमिलाबहन को समझाने की कोशिश कर रहे थे.. मौसम उस बातचीत का हिस्सा बनना नहीं चाहती थी इसलिए वो फाल्गुनी का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई और कहा "चल हम फोरम का हाल जानकर आते है"

जनरल रूम मे प्रवेश करते वक्त मौसम ने देखा.. सो रही फोरम के सर पर विशाल हाथ फेर रहा था.. इन दोनों को देखकर, विशाल उठा और बाहर आया

विशाल: "आप लोग यहाँ? इस वक्त? सब ठीक तो है ना?"

मौसम: "हमारी पहचान के एक व्यक्ति का एक्सीडेंट हुआ था.. अब ठीक है उसे.. फोरम की तबीयत कैसी है अब?"

विशाल: "अच्छी है.. रिकवर कर रही है"

मौसम: "सो तो है... तेरे जैसा केयर-टेकर हो तो फोरम की तबीयत तो सुधर ही जाएगी ना.. !! पूरी रात जागकर बेड के किनारे बैठने वाला, किस्मत से ही मिलता है"

विशाल समझ गया की मौसम क्या कहना चाहती थी.. !!

विशाल: "मौसम.. हम दोनों का रिश्ता होने वाला है उसका यह मतलब नहीं है की मैं अपने पुराने दोस्तों का ख्याल नहीं रख सकता.. तुझे पता तो है फोरम का हाल कैसा है.. !! उनके परिवार की मदद करने वाला कोई नहीं है.. और फोरम मेरी बेस्ट फ्रेंड है, यह तुम भी अच्छी तरह जानती हो.. !!"

विशाल की बात सुनकर मौसम ईर्ष्या से जल उठी, उसने कहा "सिर्फ फ्रेंड है या उससे भी ज्यादा कुछ है?"

सुनकर विशाल सहम गया.. पर बेझिझक उसने कहा "जिस तरह के हालात हुए है उसमें किसी की भी गलती नहीं है मौसम.. जिस दिन तुम्हारे घर वाले मेरे घर रिश्ता लेकर आए थे.. उसी दिन फोरम ने अपने प्यार का इजहार किया था.. तब तो मुझे पता भी नहीं था की तुम मुझे पसंद करती हो..!! मम्मी के समझाने के कारण मैंने तेरे लिए हाँ कह दी और फोरम से मुझे रिश्ता तोड़ना पड़ा.. यह बात सिर्फ मैं और फोरम ही जानते है.. और अब तुम दोनों..!!"

मौसम और फाल्गुनी स्तब्ध होकर विशाल को सुनते रहे

विशाल: "और एक बात, फोरम की बीमारी के लिए मैं जिम्मेदार हूँ, यह जानने के बाद भी अगर मैं उसकी मदद न करूँ तो ऊपर वाला मुझे कभी माफ नहीं करेगा.. उस बेचारी ने तो बिना कुछ कहें अपने प्यार को तुझे सौंप दिया... मैं तो बस उसे इस सदमे से बाहर आने मे मदद कर रहा हूँ.. जरूरत के इस समय क्या तुम मुझे इतना भी नहीं करने दोगी??"

मौसम: "ऐसी बात नहीं है विशाल.. पर मुझे हमेशा यह डर लगा रहता है की कहीं तुम दोनों के बीच नजदीकियाँ न बढ़ जाएँ.. !!"

विशाल: "जब तक हम दोनों की सगाई नहीं हो जाती तब तक मुझे मेरी किसी भी बात की सफाई तुम्हें देने की जरूरत महसूस नहीं हो रही"

परोक्ष रूप से अल्टिमेटम दे दिया विशाल ने

बात को बिगड़ता देख फाल्गुनी समझ गई और मौसम को खींचकर विशाल से दूर ले गई

फाल्गुनी: "अभी इन सब बातों का वक्त नहीं है मौसम.. जो होगा देखा जाएगा.. तू चिंता मत कर"

वह दोनों चले गए.. और विशाल फोरम के पास वापिस लौटकर आया..

फोरम की आँखों से आँसू बह रहे थे.. उनकी बातें फोरम ने सुन ली थी..

फोरम के सर पर हाथ फेरते हुए विशाल ने कहा "तू क्यों रो रही है फोरम.. !! तेरे लिए मेरे दिल मे अब भी जज़्बात है.. जिसे जो मन मे आए वो सोच सकता है.. मेरा प्रॉब्लेम नहीं है.. रो मत फोरम.. प्लीज"

फोरम ने रोना बंद कर दिया.. उसके सर पर रखा विशाल का हाथ अपने गाल पर दबाते हुए फोरम ने कहा "विशाल.. अगर तुम मुझे अब भी उतना ही चाहते हो तो मौसम से सगाई कर लो.. मैं तुझे कुछ भी नहीं दे पाऊँगी.. प्लीज.. मौसम के पास पैसा है और वो खूबसूरत भी है"

विशाल ने अपना हाथ झटकाते हुए कहा "पागल हो गई है क्या.. !! कुछ पाने के इरादे से प्यार कभी होता है क्या.. !! "

फोरम का इलाज भले ही डॉक्टर कर रहे थे.. पर उसके मर्ज की असली दवाई तो विशाल ही था..विशाल की प्रेम-वाणी का फोरम पर जादुई असर हुआ..

विशाल: "किसी इंसान के लिए प्यार बेश-किंमती होता है तो किसी के लिए सिर्फ टाइम-पास करने का जरिया.. प्यार की कोई किंमत नहीं होती.. इसीलिए तो उसे अनमोल कहा जाता है.. ये "अनमोल" शब्द भी कितना गहरा होता है ना.. !! एक ही शब्द के दो विपरीत अर्थ होते है.. शायद दुनिया का इकलौता शब्द होगा ऐसा.. "

विशाल की यह फ़िलोसोफीकल बातें फोरम को समझ नहीं आ रही थी..

विशाल ने समझाते हुए कहा "देख फोरम.. जिसकी किंमत तय की न जा सके उसे अनमोल कहते है, राइट?"

फोरम: "जैसे कोई तराशा हुआ हीरा.. तेरे जैसा"

विशाल: "वैसे ही, जिसकी कोई किंमत न हो उसे भी अनमोल ही कहते है"

फोरम उदास होकर बोली "जैसे की मैं.. !!"

विशाल: "बकवास बंद कर यार.. मैं तुझसे प्यार करता हूँ यह हकीकत है.. और मौसम से मुझे शादी करनी होगी यह मेरी वास्तविकता है.. !!" इतना बोलते बोलते विशाल हांफ गया

यह सुनकर, एक गहरी सांस लेकर फोरम ने विशाल का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया.. बिछड़ने की क्षण पर ही इंसान अपने साथी का हाथ और मजबूती से पकड़ लेता है.. !!

विशाल: "मैं अपने घरवालों को अच्छी तरह जानता हूँ.. वो कभी तेरा स्वीकार अपनी बहु के रूप मे नहीं करेंगे.. इसलिए नहीं की तुझ मे कोई खोट है.. मगर इसलिए की मौसम के परिवार के पास बहोत पैसा है.. और इस वक्त, मेरे परिवार की सारी समस्याओं का उपाय, पैसा ही है..!! अगर तेरा हाथ पकड़ूँगा तो मेरी दोनों छोटी बहनों की शादी नहीं हो पाएगी.. पापा ने जो घर का लोन लिया है वो भी चुकाने का और कोई रास्ता नहीं है.. मम्मी के इलाज मे भी बहोत पैसा जा रहा है.. !!" विशाल की आँखों से भी आक्रोश के रूप मे आँसू बहने लगे

फोरम: "और मेरे दिल मे जो जज़्बात और भावनाएँ है, उनकी कोई किंमत नहीं??"

विशाल: "दिल के जज़्बात?? वहाँ देख.. वो कोने में डस्टबिन पड़ा है.. उसमें जाकर डाल दे.. वहीं जगह होती है दिल के जज़्बातों की"

एक दूसरे से लिपटकर बहोत देर तक रोयें दोनों.. प्रेमियों के पास रोने के अलावा और कोई स्वतंत्रता नहीं होती..!!

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मौसम और फाल्गुनी दोनों रीसेप्शन पर बनी सीट पर बैठी थी

मौसम: "यार फाल्गुनी, मुझे पक्का शक है की विशाल अब भी फोरम से प्यार करता है"

फाल्गुनी: "हो सकता है.. प्यार पानी जैसा होता है.. प्रेमरूपी ढलान जिस ओर होती है, उसी ओर बहने लगता है"

मौसम: "तो फिर विशाल का झुकाव मेरी तरह होना चाहिए ना.. !! मैं तो उससे बहोत प्यार करती हूँ"

फाल्गुनी: "मौसम, मन के मंदिर मे एक बार भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई.. तो हो गई..!! फिर दूसरी मूर्तियों की स्थापना मुख्य प्रतिमा के इर्दगिर्द ही होती है"

मौसम: "मैं समझ रही हूँ फाल्गुनी.. पर अब इस स्थति में, मैं क्या करूँ, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.. !! तू ही कुछ रास्ता बता"

फाल्गुनी: "मौसम बेटा... !!" मौसम को इस तरह संबोधित करते ही पुरानी बातें याद आ गई.. मौसम ने चोंककर फाल्गुनी की ओर देखा

फाल्गुनी: "चोंक क्यों गई.. !! हमारा असली रिश्ता भूल गई क्या?"

मौसम: "ओह याद आ गया मम्मी.. !!"

फाल्गुनी ने हंसकर मौसम की छाती पर हाथ रखकर उसके स्तनों को हौले हौले दबाते हुए कहा "अब देखना ये है की तेरे यह सुंदर रसगुल्लों की चासनी कौन चूसेगा.. !! कौन दबाएगा.. कौन चखेगा.. किसके नसीब मे होंगे ये?"






मौसम: "अरे यार, इतने टेंशन मे भी तुझे ये सब सूझ रहा है.. !! यहाँ मेरी जान जा रही है और तुझे नीचे खुजली हो रही है?"

फाल्गुनी: "ऐसा नहीं है य आर.. जब किसी गंभीर समस्या का हल न दिखें.. तब सेक्स ही दिमाग को शांत और रिलेक्स करता है.. ऐसा तेरे पापा हमेशा कहते थे"

सुबोधकांत को याद करते हुए फाल्गुनी ने मजबूती से मौसम के स्तनों को दबा दिया..

देर रात हो गई थी.. रीसेप्शन के पास बने वैटिंग रूम मे फाल्गुनी और मौसम के अलावा कोई नहीं था.. मौसम चुपचाप फाल्गुनी के स्तन-मर्दन को महसूस करते हुए मौसम सोचने लगी.. तरुण की आँखों मे अब भी उसे अपने लिए प्यार नजर आ रहा था.. विशाल के लिए उसके मन मे प्यार उतना परिपक्व नहीं हुआ था.. पर विशाल उसे बेहद पसंद था.. दोनों की जोड़ी भी बड़ी ही जचती थी.. तरुण होनहार, गंभीर, आमिर और चार्टर्ड अकाउन्टन्ट था.. जब की विशाल बिन-अनुभवी, थोड़ा सा दिलफेंक और मध्यम परिवार से था.. देखने मे तरुण के मुकाबले विशाल हेंडसम था.. अब क्या करूँ? कीसे पसंद करूँ?

फाल्गुनी मौसम के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके उरोजों के ब्रा के ऊपर से मसल रही थी.. मौसम को अपने करीब खींचकर उसके गुलाबी अधरों को चूमते हुए फाल्गुनी खुद भी गरम हो रही थी और मौसम को भी उत्तेजित कर रही थी.. मौसम ने अपना एक हाथ फाल्गुनी के स्कर्ट के अंदर डाल दिया था और पेन्टी के ऊपर से वो उसके गीले होंठों को महसूस कर रही थी.. तो उसका दूसरा हाथ टॉप के ऊपर से ही फाल्गुनी की निप्पल को ढूंढकर मसल रहा था..






रात के सन्नाटे मे वहाँ किसी के भी आने की गुंजाइश नहीं थी.. इसलिए दोनों की हवस उछलने लगी.. मौसम ने फाल्गुनी को अपनी बाहों मे दबा दिया.. दोनों के स्तन आपस मे भीड़ गए थे.. और होंठों से होंठ भी मिले हुए थे.. दोनों की आँखें बंद थी







तभी उन्हें ढूंढते हुए कविता वहाँ पहुंची.. मौसम और फाल्गुनी को इस हाल मे देखकर वह छुपकर उनकी हरकतें देखने लगी

छोटे से बल्ब की रोशनी में जवान लड़कियां एक दूसरे से लिपटते हुए अपने जिस्मों को गरम कर रही थी.. कविता को पीयूष की याद आ गई.. उसका मन कर रहा था की वह अभी घर जाए.. सारे कपड़े उतारकर, पीयूष के साथ नंगे बदन ही, कंबल के नीचे लिपटकर लेट जाए.. धीरे धीरे कविता उन दोनों के नजदीक आई.. फाल्गुनी मौसम के टॉप के नीचे से हाथ डालकर उसके स्तनों को मसल रही थी.. यह देखकर कविता से रहा नहीं गया.. कविता ने अपना टॉप और ब्रा एक साथ ऊपर कर दीये.. और अपने एक स्तन पर फाल्गुनी का हाथ पकड़कर रख दिया और दूसरे स्तन पर रखने के लिए मौसम का हाथ खींचने लगी.. इस तरह वह भी उन दोनों के साथ उस खेल में जुड़ गई






अचानक हुई इस हरकत से फाल्गुनी और मौसम दोनों चौंक गए.. कविता को इस अवस्था मे देख दोनों शरमा गई.. आज पहली बार मौसम ने अपनी सगी बहन को इस अवस्था मे देखा था..

फाल्गुनी: "अरे दीदी.. आप कब आए? मुझे तो पता ही नहीं चला"

मौसम तो कविता के आगमन से ज्यादा उसकी इस हरकत से ज्यादा अचंभित थी..

कविता: "जब इंसान सेक्स की दुनिया मे खोया हुआ हो तब उसे न कुछ दिखाई देता है और ना ही सुनाई देता है.. फाल्गुनी, तुझे सेक्स करने के लिए मेरे ही परिवार के लोग नजर आते है??"

फाल्गुनी चुप हो गई.. कविता के ताने का.. पर देने के लिए उसके पास कोई जवाब नहीं था

कविता: "इतनी देर हो गई और तुम दोनों आई नहीं इसलिए मुझे चिंता होने लगी और मैं ढूँढने चली आई.. पर यहाँ टेंशन कम और पलेजर ज्यादा नजर आ रहा है.. तो सोचा मैं भी शामिल हो जाऊँ.. !!"

मौसम ने मुसकुराते हुए कहा "दीदी, ठंड कितनी है.. !! आप को तो जीजू के साथ गर्मी मिल जाती होगी पर हमें तो इसी तरह अपनी ठंड मिटानी पड़ती है.. !!"

कविता ने हंसकर कहा "तेरे जीजू ही अब ठंडे पड़ चुके है.. इसलिए तो मुझे तुम दोनों के साथ शामिल होना पड़ा.. अब तेरी ठंडी उड़ाने की तैयारियां चल रही है.. बता.. तुझे तरुण के शरीर की गर्मी चाहिए या विशाल की?"

मौसम : "आप क्या कहती हो दीदी??"

कविता: "तरुण भोला-भाला सा पतला है.. विशाल का शरीर एकदम मजबूत और तंदूरस्त है.. जिस्मानी तौर पर विशाल तुझे ज्यादा खुश रख पाएगा.. जज्बाती तौर पर कौन ज्यादा बेहतर है ये कहना मुश्किल है.. उसके लिए तो मुझे उन दोनों से क्लोज होना पड़ेगा.. तब पता चलेगा.. पर तुम दोनों इधर ऐसे ही कब तक खड़ी रहोगी? ऊपर चलो, मम्मी राह देख रही है"

मौसम: "आप जीजू के बारे मे क्या बता रही थी??"

कविता: "पापा का बिजनेस संभालने के चक्कर में, तेरे जीजू मुझे भूल ही गए है.. पहले तो हम दोनों साथ में कितने खुश थे.. !! अब तो वो समय बस याद बनकर ही रह गया है.. मैं उस टाइम को बहोत ही मिस करती हूँ मौसम.. !"

कविता मायूष हो गई पर उसकी उदासी को ज्यादा देर टिकने नहीं दिया फाल्गुनी ने

फाल्गुनी: "दीदी, आपके पास तो एक हीटर है.. मौसम के लिए तो दो-दो हीटर लाइन में खड़े है.. पर मेरा क्या??"

कविता: "तू भी अपना कुछ सेटिंग कर ले.. नहीं तो फिर से किसी बाप के उमर के मर्द के साथ उलझ जाएगी.. " फाल्गुनी की निप्पल पर चिमटी काटते हुए कविता ने कहा






मौसम: "चलिए चलते है.. बहोत देर हो गई.. विशाल और तरुण के बारे मे कल सोचेंगे"

तीनों ऊपर तरुण के कमरे मे पहुंचे.. सब चुपचाप बैठे थे.. तरुण के पापा की एक ही प्रपोज़ल ने सारे समीकरण बदलकर रख दीये थे.. सुबह वापिस आने का वादा कर चारों निकल गए

दोपहर के बारह बजे तरुण को डिस्चार्ज देने की तैयारी हो रही थी.. रमिलबहन, मौसम और फाल्गुनी भी उस वक्त वहाँ पहुँच गए..

मौसम और फाल्गुनी एक कोने मे खड़े होकर कुछ बात कर रहे थे तभी तरुण वहाँ पहुंचा

तरुण: "मौसम, हमारी सगाई भले ही टूट गई थी पर मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाया था.. जो हो गया उसे भूलकर.. मुझे माफ करने के बाद क्या तुम मुझे फिर से स्वीकार करोगी?"

मौसम कुछ नहीं बोली पर फाल्गुनी ने जवाब दिया "तरुण, दरअसल बात ऐसी है की जब तुम ने सगाई तोड़ दी उसके बाद मौसम एक साल तक तुम्हारा इंतज़ार करती रही.. पर जब तुम्हारे तरफ से कोई पहल नहीं हुई तब उसकी दोस्ती, उनकी ऑफिस मे काम करते विशाल के साथ हो गई.. और दोनों काफी आगे भी बढ़ चुके है.. इसलिए अब मौसम के लिए तय कर पाना बहोत ही मुश्किल हो रहा है"

तरुण का चेहरा लटक गया.. उदास होकर वो बोला "ओह्ह.. यह तो मुझे दिमाग मे ही नहीं आया.. जैसे मैं नया साथी तलाश रहा हूँ वैसे मौसम भी किसी को ढूंढ रही हो इसमे कुछ गलत नहीं है.. आई एम सॉरी मौसम.. !! फिर भी, मैं एक हफ्ते तक तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करूंगा.. वरना, बेस्ट ऑफ लक तुम्हें और विशाल को.. बस इतना ही कहूँगा की किसी भी कारणवश विशाल के साथ बात आगे ना बढ़ें तो लौटकर जरूर आना.. क्योंकि तुम्हें प्यार करते रहने से मैं कभी अपने आप को रोक नहीं पाऊँगा"

तरुण अपने परिवार के साथ चला गया

मगर उस दिन के बाद मौसम का मन विचलित हो गया.. कभी वो विशाल की तरफ झुकती तो कभी तरुण की तरफ.. इसके बारे मे वो हररोज फाल्गुनी से बात करती.. और तरुण रोज रात को फाल्गुनी से फोन पर बात करता.. और मौसम के विचारों के बारे मे जानकारी लेता रहता.. मौसम के दिल मे दोनों के लिए जज़्बात थे.. पर पसंद तो किसी एक को ही करना था.. कुछ सूझ नहीं रहा था उसे.. एक सप्ताह का समय भी तेजी से पूरा हो रहा था.. दो दिन ही बचे थे.. दूसरी तरफ विशाल फोरम की तरफ खींचता चला जा रहा था.. तरुण का जीवन भी अब मौसम के फैसले पर निर्भर था

उस दिन शाम को मौसम और फाल्गुनी कविता के बारे मे बातें कर रहे थे

मौसम: "यार जीजू दीदी को ऐसे इग्नोर क्यों करते होंगे? क्या उनका सेक्स करने को दिल नहीं करता होगा?"

फाल्गुनी: "मर्दों के लिए ऐसा कभी नहीं हो सकता की उन्हें सेक्स करने का मन न होता हो... अंकल का तो हमेशा खड़ा ही रहता था.. मैंने कभी उनका बैठा हुआ लंड देखा ही नहीं है.. मैं तो बस इतना ही कहूँगी की जीजू को इच्छा न होती हो, ऐसा हो ही नहीं सकता.. बस काम के बोझ के कारण समय नहीं निकाल पाते होंगे.. और जब वो फ्री हो तब हो सकता है की दीदी के पास टाइम न हो.. !!"

मौसम: "हम्म.. बात तो तेरी सही है.. पर इसका उपाय कैसे निकालें?"

फाल्गुनी: "सिम्पल है यार.. तेरे और जीजू के बीच वैसे भी खुल कर बातें होती ही है.. जाके सीधा पूछ ले.. !!"

मौसम: "फोन करूँ जीजू को?"

फाल्गुनी: "ऐसी नाजुक बातें फोन पर नहीं की जाती... वैसे भी तुम दोनों ऑफिस मे एक साथ ही होते हो.. जब आसपास कोई न हो तब उनकी चेम्बर मे जाके बात कर लेना.. !"

मौसम: "दिन के वक्त तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन ही नहीं है.. पूरा दिन कोई न कोई होता ही है.. और जब वो फ्री हो तब मैं बिजी रहती हूँ.. शाम को छह बजे के बाद जब सारा स्टाफ घर चला जाता है उसके बाद ट्राय करती हूँ कल शाम को.. कुछ भी हो जाए दीदी और जीजू के बीच की इस दूरी को कम करना ही पड़ेगा"

दूसरे दिन की शाम को साढ़े छह बजे जब स्टाफ के सारे लोग घर जा चुके थे तब मौसम ने पीयूष की केबिन मे प्रवेश किया.. आज के दिन के लिए मौसम ने साड़ी और लो-कट ब्लाउज पहना हुआ था.. फ़ाइल को बड़ी बारीकी से पढ़ रहे पीयूष का तो ध्यान भी नहीं गया.. जानबूझ कर अपने पल्लू को सरकाकर मौसम जीजू के सामने झुककर बैठ गई..

मौसम: "जीजू, काम के अलावा भी बहुत कुछ होता है ज़िंदगी मे"

फ़ाइल से आँख उठाकर अपनी साली के गोल स्तनों की ओर देखकर मुसकुराते हुए पीयूष ने कहा "मेरी प्यारी साली साहेबा.. आपके इरादे आज कुछ ठीक नहीं लग रहे है.. तूफान बनकर आई हो आज.. मेनका की तरह विश्वामित्र का तपोभंग करने.. !!"






मौसम ने रूठने का नाटक करते हुए कहा "जीजू, सगाई वाली रात हम दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसके बाद तो आप मुझे जैसे भूल ही गए.. !!"

पीयूष: "मौसम, उस रात को तूने ही तो मुझे कहा था की वो बस आखिरी बार था.. इसलिए मैंने फिर कभी कुछ जिक्र किया ही नहीं और खामोश रहा.. बाकी तेरे ये होंठ.. तेरे ये कातिल बूब्स.. मुझे कितना उत्तेजित कर देते है.. ये बस मैं ही जानता हूँ"

मौसम: "अरे जीजू.. आखिरी बार का इसलिए कहा था की उस दिन मेरी तरुण से सगाई जो हो रही थी.. पर जब सगाई ही टूट गई उसके बाद तो आप मुझसे फिर से मिलने आ सकते थे ना.. !!"

पीयूष: "यार.. काफी समय तक तू इतने सदमे मे थी.. और ऐसी मुरझाई सी शक्ल लेकर घूमती रहती थी.. की सेक्स के लिए फिर से प्रपोज करने का दिल ही नहीं किया"

मौसम: "उस बात को कितना वक्त बीत चुका है.. और मैं तो उस सदमे से कब की उभर चुकी हूँ.. पर आप ही मुझे भूल गए है"

पीयूष: "ऐसा नहीं है मौसम.. !!" पीयूष ने फ़ाइल को एक तरफ रख दिया.. और मौसम के चेहरे के करीब आकर उसके होंठों को चूम लिया..

मौसम ने जरा सा भी विरोध नहीं किया.. बल्कि उसने पीयूष की कीस का जवाब सिसककर दे दिया.. और पीयूष का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रखते हुए बोली "आह्ह जीजू.. देखिए ना.. कितने टाइट हो गए है ये.. !! दबने के लिए कब से तरस रहे है.. प्लीज दबाइए ना.. !!"

मौसम का इतना कहते ही.. पीयूष की ऑफिस बेडरूम मे तब्दील हो गई.. वो खड़ा होकर मौसम के पीछे गया और उसे कमर से पकड़कर खड़ा कर दिया.. अपने लंड को उसकी गांड पर दबाते हुए उसकी साड़ी और पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर अपनी एक उंगली मौसम की मुनिया मे डाल दी..






मौसम की आह निकल गई.. जीजू का लंड उसके कूल्हें को छु रहा था और उनकी मर्दाना उंगली चूत के अंदर घुस चुकी थी.. गर्दन पर जीजू की सांसें भलीभाँति महसूस कर रही थी मौसम.. पीयूष ने अपनी जीभ निकालकर मौसम की गर्दन को चाट लिया.. !!!







चूत के अंदर फूल स्पीड से अंदर बाहर होती उंगली ने थोड़ी ही देर मे मौसम को स्खलित कर दिया.. और वो हांफने लगी.. पहला ऑर्गजम जल्दी हो जाने वाला था यह मौसम और पीयूष दोनों ही जानते थे..





अपनी अनियमित साँसों को अनदेखा कर.. मौसम हाथ पीछे ले गई और पीयूष का लँड पेंट के ऊपर से पकड़ लिया.. उस मर्दाना सख्ती को छूकर मौसम फिर से उत्तेजित होने लगी





पीयूष ने लहराती आवाज मे मौसम के कानों मे कहा "मौसम... !!"

मौसम: "हाँ जीजू.. !!"

पीयूष; "इतने दिनों तक क्यों तड़पाया मुझे?" पीयूष ने अपनी एफ.आई.आर दाखिल की

मौसम: "मैंने नहीं.. आपने ही मुझे तड़पाया है जीजू.. इतने महीनों से आपको मेरी तरफ देखने का समय ही नहीं मिला.. !!"

यह सुनते ही, पीयूष ने मौसम की साड़ी को उतारा और उसे धक्का देकर उलटे पेट टेबल पर लेटा दीया.. उसकी पेटीकोट और पेन्टी को उतार दिया.. पीयूष की नज़रों के सामने, मौसम के चाँद जैसे दो कूल्हें खुले हुए थे.. यह देखते ही पीयूष का लंड झटके खाने लगा..

पीयूष ने मौसम को टेबल से खड़ा किया और मौसम उसकी और मुड़ी.. साड़ी तो उतर चुकी थी.. पर ऊपर पहने टाइट ब्लाउज को उतारने में बड़ी मुशक्कत करनी पड़ी... क्योंकि हुक खुल ही नहीं रहे थे.. पर आखिर ब्लाउज उतर ही गई.. मौसम ने आज वही ब्रा पहनी थी जो पीयूष ने उसे सगाई से पहले गिफ्ट की थी

पीयूष: "ये तो वही ब्रा है ना.. !!"

मौसम: "हाँ जीजू.. मैंने संभालकर रखी हुई थी.. इसे देखकर मुझे आपके साथ बिताया वह अद्भुत समय याद आ जाता था.. इसलिए फिर कभी पहनी नहीं.. !!"

ब्रा की कटोरियों के ऊपर से मौसम के सुंदर स्तनों को दबाते हुए पीयूष ने पूछा "तो फिर आज क्यों पहन ली?"

मौसम ने सिसकते हुए कहा "आज तो मैं मन बनाकर आई थी.. कैसे भी करके आपको आज पाकर ही रहूँगी"

पीयूष ने मौसम की नाजुक निप्पलों को मरोड़ दिया..






मौसम: "आह्ह.. !!! जरा धीरे धीरे करो जीजू.. दर्द हो रहा है मुझे"

पीयूष: "धीरे से तो कर रहा हूँ... ये तो बहुत दिनों से किसी ने छूए नहीं इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है वरना बबलों को तो ऐसे ही दबाया जाता है.. वैसे तरुण ने सगाई के बाद दबाए नहीं थे तेरे?"

मौसम: "चांस ही नहीं मिला... !!"

पीयूष: "किस तो की होगी.. "

मौसम: "वो भी नहीं.. आपने जो पहली बार मुझे लीप किस की थी उसके बाद से मेरे ये होंठ अभी भी कोरा कागज ही है"

यह सुनते ही, ताव मे आकर, पीयूष ने अपने पेंट की चैन खोल दी और लंड बाहर निकालकर मौसम के हाथों में दे दिया..

मौसम: "वाऊ जीजू... इट इस सो हार्ड एंड हेंडसम"






एक लंबे अरसे बाद लंड को देखकर मौसम जोश मे आ गई और झुककर उसने लंड के टोपे पर किस कर दिया.. धीरे धीरे वो पीयूष के लंड को मुंह मे लेकर चूसने लगी..

सिसकते हुआ पीयूष, मौसम के बालों मे उँगलिया फेरते हुए अपने लंड को मौसम के मुंह के अंदरूनी हिस्सों पर रगड़ता रहा.. कभी अपनी कमर से ठेलता तो कभी मौसम के सर को दोनों हाथों से पकड़कर लंड को गर्दन तक अंदर धकेलता..






मौसम के मुंह को चोदते हुए पीयूष ने पूछा "मौसम, तुझे विशाल ज्यादा पसंद है या तरुण?"

जवाब देने के लिए खुद को पीयूष की गिरफ्त से छुड़ा कर, मुंह से लंड बाहर निकालते हुए मौसम ने कहा "वही तो कन्फ़्युशन है जीजू.. पता ही नहीं चल रहा की मैं क्या करूँ.. !! आप का क्या सजेशन है?"

पीयूष: "अब इसमें मैं भला क्या कहूँ? जो भी तय करना है वो तुझे करना है.. जीना तुझे है या मुझे? हाँ इतना कह सकता हूँ की दोनों ही लड़के होनहार है.. तुझे खुश रखेंगे... अगर तरुण को चुनेगी तो तुझे शहर छोड़ना होगा.. अपनी मम्मी से दूर जाना पड़ेगा.. उन्हें कभी कुछ जरूरत पड़ी तो तू समय पर पहुँच नहीं पाएगी.. विशाल को पसंद करेगी तो इसी शहर मे रहेगी.. हम सब की नज़रों के सामने.. तुझे कभी भी, कुछ भी जरूरत पड़ी तो हम सब दौड़ कर तेरे पास आ सकेंगे"

मौसम: "आप की बात सौ फीसदी सच है जीजू.. विशाल की ओर ही मेरा रुझान है.. पर तरुण के साथ मेरा टयूनिंग बहुत अच्छा था.. और हम दोनों काफी क्लोज भी थे.. इसलिए मुझे पता नहीं चल रहा है की कीसे पसंद करूँ.. !!"

पीयूष मौसम के स्तनों से खेलते हुए बोला "सोच समझकर तय करना.. अगर इसी शहर मे रहेगी तो यह तेरा सुंदर जोबन मुझे देखने तो मिलेगा.. वरना फ़ोटो देखकर ही मन मनाना पड़ेगा.. यार मौसम, शादी हो जाने के बाद तू मुझे कुछ नहीं देगी?"

मौसम: "पागल हो क्या जीजू?? शादी के बाद कैसे दे पाऊँगी?"

पीयूष ने मौसम को खड़ा किया और टेबल पर सुला दिया.. उसकी दोनों टांगों को जितना हो सकता था उतना चौड़ा कर अपनी गर्दन के इर्दगिर्द उन्हें सेट कर.. बड़े ही चाव से मौसम की चूत को चाटने लगा.. मौसम कराहने लगी..






चूत चाटते हुए पीयूष ने सवाल किया "क्यों नहीं दे पाएगी.. !! चूत नहीं दे पाएगी.. पर दबाने तो देगी ना.. !! दबाने से तेरे बूब्स घिस नहीं जाएंगे"

मौसम: "वैसे देखने जाओ तो चूत भी कहाँ देने से घिस जाने वाली है... !! आह्ह.. अब बातें छोडो जीजू.. और डाल दो अंदर.. !!

पीयूष खड़ा हो गया.. और अपने लंड को मौसम की चूत की सिलवटों पर रगड़ने लगा..






गरम गरम मर्दाना स्पर्श अपने निजी अंग पर महसूस होते ही मौसम की छातियाँ ओर टाइट हो गई.. और उसकी निप्पलें बंदूक की कारतूस जैसे कडक हो गई.. पीयूष का गरम सुपाड़ा उसकी क्लिटोरिस को सुलगा रहा था तो दूसरी तरफ उसकी क्लिटोरिस पर लंड का लावारस, मरहम का काम कर रहा था..

मौसम से अब और बर्दाश्त न हुआ "ओह्ह जीजू, अब खेलना बंद भी कीजिए.. डाल दीजिए अंदर.. वरना मैं कपड़े पहनकर यहाँ से चली जाऊँगी.. !!" मौसम इतनी नाराज हो गई थी.. नाराजगी से ज्यादा बेताबी थी.. एक साल तरसने के बाद आखिर लंड उसकी योनि मे प्रवेश करने जा रहा था.. !!

मौसम के दोनों स्तनों को पकड़कर पीयूष ने अपने लंड को धीरे से उसके गुलाबी गरम छेद के अंदर डाल दिया.. और मस्ती पूर्वक धक्के लगाने लगा.. पहले से पसीज चुकी चूत के अंदर काफी गीलापन था.. मक्खन मे गरम छुरी की तरह उसका लंड अंदर घुस गया






मौसम सातवे आसमान मे उड़ते हुए अपनी गांड की नीचे से उठाते हुए गोल गोल घुमाकर.. लंड के नायाब स्पर्श का लाभ, चूत के हर अंदरूनी हिस्से को देने लगी.. !! उसकी सिसकियों से पता चल रहा था की वह अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ पलों को अनुभवित कर रही थी..

तीन-चार मिनट के अनोखे समागम के बाद पीयूष ने लंड बाहर निकाल लिया और अपने पेंट पर ही वीर्य गिरा दिया.. और इस कामोत्सव को परिपूर्ण कर दिया..






दोनों जवान शरीर हांफने लगे.. कुछ मिनटों के बाद मौसम ने कपड़े पहनने की शुरुआत करते हुए पेन्टी हाथ मे ली.. और सवाल जवाब शुरू किए.. जिस उद्देश्य के लिए वो यहाँ आई थी वो मौसम भूली नहीं थी

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दोनों जवान शरीर हांफने लगे.. कुछ मिनटों के बाद मौसम ने कपड़े पहनने की शुरुआत करते हुए पेन्टी हाथ मे ली.. और सवाल जवाब शुरू किए.. जिस उद्देश्य के लिए वो यहाँ आई थी वो मौसम भूली नहीं थी

मौसम: "जीजू, सच सच बताना.. दीदी के साथ आपका सब कैसा चल रहा है?"

पीयूष: "सब कुछ एकदम बढ़िया चल रहा है.. कविता से मुझे कोई शिकायत नहीं है.. हम दोनों ही खुश है"

मौसम: "नहीं जीजू... सिर्फ आप खुश है.. दीदी नहीं.. और उसी वजह से मैं आज आपसे मिलने आई थी.. आप सोच रहे होंगे की ऐसा कुछ हुआ नहीं है तो फिर दीदी आपसे नाराज क्यों है?? हैं ना.. !! पर मैं वही कहने आई हूँ.. की कभी कभी कुछ न होने की वजह से भी नाराजगी हो सकती है.. जीजू, आप दीदी के साथ महीने मे कितनी बार सेक्स करते हो?"

पीयूष: "महीने मे एक या दो बार तो ही ही जाता होगा"

मौसम: "और बाकी के दिन दीदी का मन करे तो वो क्या करेगी?? किसके पास जाएगी?"

सुनकर पीयूष चुप हो गया

मौसम: "जीजू, मर्दों के लिए यह आसान होता है.. मन किया तो कह दिया.. पर हम लड़कियों के लिए ऐसा नहीं होता.. हमें मन हो, तो हम शब्दों से नहीं पर अपने हाव-भाव और हरकतों से व्यक्त करती है.. खुलकर कभी नहीं कहती.. अब ऐसे में उनका मन हो तो क्या करें वो?? आपकी इच्छा हो तब तक इंतज़ार करती रहें? और जब आपका मन करे तब हो सकता है की वो थक गई हो, तबीयत ठीक न हो या फिर किसी और कारणवश वो करना न चाहती हो.. तब भी वो अपना मन मारकर आपको सहकार देती है.. !! आपको तो अगर घर पर संतोष न मिले तो किसी कॉलगर्ल के साथ आग बुझा लोगे.. पर हम लड़कियां कहाँ जाएँ?"

जाहीर था की पीयूष के पास इसका कोई जवाब नहीं था

पीयूष: "मौसम, मैंने कभी कविता की इच्छाओं को अनदेखा नहीं किया है.. अगर कभी उसका मन हो तो उसे मुझे कहना चाहिए.. बिना कहें मुझे कैसे पता चलेगा? मैं क्या अंतर्यामी हूँ??"

मौसम: "बिना कहें आपको पता चल जाना चाहिए जीजू.. आप क्या दूध पीते बच्चे हो.. !! इतने साल हो गए शादी के.. अपनी पत्नी की इच्छाओं के बारे मे उसके हाव-भाव देखकर क्यों पता नहीं चलता आपको?? पत्नी शारीरिक रूप से संतुष्ट है या नहीं इसके लिए क्या आपको लेबोरेट्री के टेस्ट की जरूरत है?? यही सब दर्शाता ही की बिजनेस आप पर कितना हावी हो गया है.. मीटिंगों की भरमार में और बिजनेस की जाल में इतना भी नहीं घुसे रहना चाहिए की आपको अपनी पत्नी की चूत और साली के बूब्स की याद भी न आए.. !! आज तो हम दोनों ऑफिस मे बिल्कुल अकेले थे.. फिर भी पहल मुझे करनी पड़ी.. आपके दिमाग मे क्यों ये बात नहीं आई? आप यहाँ शिफ्ट हुए तब मैं इतनी खुश थी.. की चलो अब जीजू से छेड़खानियाँ करने का भरपूर मौका मिलेगा.. इसी चक्कर में तो मैंने ऑफिस आना शुरू किया.. पर आपको तो फुरसत ही नहीं है.. !!!"

पीयूष: "मेरी प्यारी सेक्सी साली साहेबा.. मैं तुम्हारी बात समझ गया.. तू फिक्र मत कर.. आज मेरी और कविता की सुहागरात होगी.. और हम दोनों की सुहाग-शाम.. !!" कहते हुए आक्रामक होकर पीयूष ने मौसम को अपनी बाहों मे जकड़ लिया और अपने चुंबनों से नहला दिया..

मौसम ने ब्लाउज पहन लिया था पर कमर से नीचे वह अब भी नग्न ही थी..!!

पीयूष ने उसे चूमते हुए एक उंगली उसकी गुनगुनी प्यारी चूत के अंदर डाल दी.. संभोग के पश्चात चूत आद्रता से भरपूर थी..






मौसम नीचे झुककर पीयूष का लंड फिर से मुंह में लेना चाहती थी पर पीयूष ने उसे छोड़ा ही नहीं..!! ब्लाउज को ऊपर कर उसने स्तनों को बाहर निकाला और उस पर झपट पड़ा.. प्यारी नाजुक निप्पलें जो अभी कुछ देर पर पहले हुई मसलन के कारण लाल लाल थी.. उसे मुंह में लेकर चूसने लगा..





पीयूष के बालों में अपनी उँगलियाँ फेरते हुए मौसम ने अपनी आँखें बंद कर ली.. पीयूष उसके स्तनों को अच्छी तरह चूसकर.. उसकी नाभि को चूमते हुए जंघाओं के मध्य पहुँच गया.. मौसम ने खड़े खड़े ही अपनी टांगें थोड़ी से खोल दी.. पीयूष ने उसकी मुनिया को उंगलियों से टटोला.. चूत के होंठों को हल्के से फैलाया और अपनी जीभ अंदर डाल दी..





मौसम छटपटाते हुए इस मस्त चुसाई का मज़ा ले रही थी.. वह खुद अपने अमरूद जैसे सख्त स्तनों की निप्पलें मरोड़ रही थी..





थोड़ी देर तक मौसम की चूत चाटने के बाद, पीयूष खड़ा हुआ..!! उसका हथियार तैयार था.. मौसम के किले को एक बार और फतेह करने के लिए.. मौसम टेबल पर टांगें फैलाकर बैठ गई.. और पीयूष ने अपना लंड उसके छेद पर रखकर हल्के से धक्का लगाया..





मौसम की कराहों और सिसकियों के बीच एक और सुंदर संभोग हुआ.. इस बार चुदाई की अवधि भी अधिक थी.. जो अमूमन दूसरी चुदाई में होना अनुमानित होता है..!!! काफी देर तक शॉट लगाने के बाद जब पीयूष झड़ने की कगार पर था तब उसने सहसा अपना लंड बाहर खींच लिया और मौसम के सपाट पेट पर अपनी वीर्य का फव्वारा उड़ाने लगा..!!!





संतुष्ट होकर दोनों घर के लिए साथ ही निकल लिए

गाड़ी जब पीयूष के घर के करीब पहुँच रही थी तब दोनों ने देखा.. दरवाजे पर उदास मन से कविता खड़ी हुई थी.. उसका चेहरा मुरझाया हुआ था

मौसम: "देखिए जीजू.. दीदी के चेहरे से नूर गायब हो गया है.. और उसकी तबीयत सुधारने के लिए किस टॉनिक की जरूरत है वो आपको और मुझे दोनों को पता है"

पीयूष का लंड पकड़कर मौसम ने कहा "इस टॉनिक की जरूरत है.. !! कुछ भी करो पर कल सुबह मुझे दीदी का चेहरा खिला हुआ दिखना चाहिए"

पीयूष: "जो हुक्म मेरे आका.. !! अब हाथ हटा ले.. वरना तेरी दीदी ने देख लिया तो उसका चेहरा खिलने से पहले, मैं मुरझा जाऊंगा"

उस दिन के बाद से... कविता को पीयूष मे काफी बदलाव आता हुआ महसूस होने लगा.. किसी भी संबंध को बिगड़ने से रोकना हो तो योग्य समय पर क्षति नियंत्रण के कदम उठाने ही पड़ते है..

कविता बेहद आकर्षक तो थी ही.. और पीयूष भी असली मर्द था.. जरूरत थी तो बस एक चीनगारी की.. आग और घी को मिलाने का काम मौसम ने कर दिया और कविता-पीयूष के संसार-यज्ञ की अग्नि, एक बार फिर प्रज्वलित हो उठी..

कविता के भूखे शरीर को पीयूष ने अपने कडक लंड से ताकतवर धक्के लगाकर मदहोश कर दिया.. जो कविता अब तक सुखी भिंडी जैसी रहती थी वो अब खिलकर ताजे सुगंधित गुलाब जैसी हो गई.. !!

मौसम और फाल्गुनी ने भी कविता के चाल-ढाल और हाव भाव मे यह सकारात्मक बदलावों को महसूस किया

फाल्गुनी: "देखा मौसम.. !! स्त्री के जीवन मे पुरुष का.. उसके स्पर्श का.. उसके लंड का... कितना महत्व होता है..!!! मुझे अब भी याद है.. अंकल के साथ सेक्स करने के बाद जब मैं घर लौटती तब ऐसा महसूस करती, जैसे मैं दुनिया की सबसे संतुष्ट लड़की हूँ.. !! दुनिया का कोई दुख मुझे दुखी न कर पाता.. और जब.. काफी दिनों तक.. चूत को उसकी खुराक न मिलती.. तब मैं छोटी छोटी बातों मे गुस्सा करने लग जाती.. !! बेशक, उंगली से भी काम चल सकता है, पर जो मज़ा दो जिस्म एक होने पर आता है.. वो नहीं मिलता.. पुरुष को स्त्री के और स्त्री को पुरुष के आधिपत्य को मानते हुए एक दूसरे की अनिवार्यता का स्वीकार करना ही पड़ता है"

मौसम बड़े ही ध्यान से फाल्गुनी की बात सुन रही थी.. इस मामले मे फाल्गुनी का अनुभव उससे कई ज्यादा था.. !!

मौसम: "बिल्कुल सच कहा तूने.. इतनी छोटी सी तेरी उम्र मे तुझे कली से खिलाकर गुलाब बनाने वाला भी पुरुष ही था ना.. वरना अठारह-उन्नीस साल की लड़कियां तो कितनी अल्हड़ और बेफिक्र सी होती है.. तुझ में इतना ठहराव आने की वजह, पापा ही है"

फाल्गुनी: "नहीं मौसम.. मुझ मे सूझ-बुझ लाने का काम, तेरे पापा के अंदर के मर्द ने नहीं पर उनके प्यार ने किया है.. प्यार एक ऐसी चीज है जो सख्त से सख्त इंसान को अपना ग़ुलाम बना सकती है.. नादान को सुलझा हुआ बना सकती है.. प्यार की ताकत किसी एटम-बॉम्ब से जरा भी कम नहीं होती"

मौसम: "यार, मैं तो बस दीदी को खुश देखकर ही बहुत खुश हूँ.. और किसी माथा-पच्ची मे पड़ने की जरूरत नहीं है"

कविता ने भी मौसम के सामने कुबूल किया की उसे उसका पुराना पीयूष वापिस मिल गया था

मौसम अब सोच रही थी.. सब के जीवन धीरे धीरे स्थिर होने लगे है.. अब मुझे भी किसी का सहारा लेकर अपना जीवन सुरक्षित कर लेना चाहिए.. फिर वो विशाल के साथ हो या तरुण के साथ

फाल्गुनी: "मौसम, अपने दिल मे झांक कर देख.. किसके लिए ज्यादा मोहब्बत है तेरे दिल मे?? तरुण या विशाल??"

मौसम: "बेशक, तरुण के लिए.. सगाई के बाद, हम दोनों घंटों बात-चीत करते रहते थे.. बहोत ही अच्छी तरह जान चुके थे हम एक दूजे को.. जाहीर सी बात है की मेरा झुकाव उसके प्रति होगा.. लेकिन उलझन की बात यह है की तरुण को खो देने के बाद की वास्तविकता को मैंने स्वीकार लिया और उसके बाद ही मैंने विशाल को अपने दिल मे जगह दी थी.. तरुण के जाने से लेकर विशाल के आने तक का मेरा सफर थका देने वाला था.. बड़ी मुश्किल से मैंने तरुण को भुलाया और अपने मन-मंदिर मे विशाल को स्थापित किया था.. आसान नहीं था मेरे लिए.. और जब विशाल के साथ अपना जीवन व्यतीत करने के लिए मन बना लिया तब तरुण लौट आया.. !! अब मैं क्या करूँ वही समझ नहीं आ रहा फाल्गुनी.. तरुण भी मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा है.. ज्यादा वक्त नहीं है मेरे पास"

कविता के घर की टेरेस पर बैठे हुए मौसम और फाल्गुनी इस तनाव से गुजर रहे थे.. कविता दोनों के लीये कॉफी बनाने नीचे गई थी.. थोड़ी ही देर मे वो ट्रे मे तीन मग लेकर लौटी

मौसम: "मैंने तय कर लिया है फाल्गुनी.. तरुण को हाँ कह दूँगी"

कविता: "देख मौसम.. तू कीसे भी पसंद कर.. बस एक बार तय करने के बाद तुझे पछतावा नहीं होना चाहिए.. अब भी सोच ले.. दोनों मे से कौन ज्यादा पसंद है?"

मौसम ने परेशान से चेहरे के साथ कहा "दोनों ही पसंद है दीदी"

फाल्गुनी: "दो पति रखने की पर्मिशन नहीं देती गवर्नमेंट हमें.. पता है ना.. !!" मौसम के मजे लेते हुए फाल्गुनी ने कहा

मौसम का मज़ाक उड़ाने मे कविता भी शामिल हो गई.. "गवर्नमेंट अनुमति दे भी दे.. तो मौसम दो दो एक साथ कैसे डलवाएगी??"

मौसम का सुंदर चेहरा शर्म से लाल लाल हो गया.. ढलते हुए सूरज की संध्या के रंग जैसा.. !!!

फाल्गुनी: "दो छेद तो कुदरत ने हमें दीये ही है ना दीदी.. !!"

कविता: "अभी तेरी शादी नहीं हुई इसलीये तुझे ठीक से पता नहीं है फाल्गुनी... पति नाम के इस प्राणी को कभी कभी दो छेद भी कम पड़ जाते है.. अंदर बेडरूम मे बिस्तर पर क्या क्या खेल होते है वो तो तुझे शादी के बाद ही पता चलेगा.. हमारे शरीर मे जीतने भी छेद है.. उन सब मे अपना घुसाने का जन्म-सिद्ध अधिकार समझते है ये पति लोग..!!"

भोला सा चेहरा बनाकर फाल्गुनी ने कहा "मुझे ये सब कहाँ से पता होगा दीदी?? मेरी तो शादी भी नहीं हुई"

फाल्गुनी की कमर पर चिमटी काटते हुए मौसम ने कहा "साली, तू हमारे पापा की पत्नी ही तो थी.. !! शादी भले ही न हुई हो.. फिर भी उनका लेने का साहस तो तूने किया ही था ना.. !! एक पत्नी होने के नाते मेरी मम्मी को जितने अधिकार थे, उससे कई ज्यादा तो तू भुगत रही थी.. !!

कविता: "फाल्गुनी, तू पापा के साथ सब कुछ करती थी? अब तू खुलकर बता मुझे.. शर्म नहीं आती थी तुझे?"

फाल्गुनी: "दीदी, शर्म तो किस लड़की को नहीं आएगी... !!! पर वो सब शुरू शुरू में.. एक बार आदत लग जाए फिर तो मज़ा आने लगता है.. दीदी, मैं अंकल की अनधिकृत पत्नी की तरह ही रहती थी.. उनके साथ मैंने सभी प्रकार के सेक्स का आनंद लीया था"

थोड़ी सी घिन के साथ कविता ने कहा "ओरल सेक्स भी करते थे?"

फाल्गुनी: "वो तो सब से ज्यादा होता था दीदी.. कभी कभी जब अंदर डालने जितना समय न हो तो अब अंकल ओरल सेक्स ही प्रीफर करते थे"

मौसम: "मतलब तू उन्हें ओरल देती थी या वो तुझे?"

फाल्गुनी: "ज्यादातर मैं ही उन्हें देती थी.. मुझे तो ओरल तभी मिल पाता था जब हम उनकी ऑफिस मे मिलते थे.. यार हम लड़कियों को कपड़े उतारने और पहनने के लिए ढंग की जगह भी तो चाहिए ना.. !! मर्दों का क्या है.. बस चैन खोली और ओरल शुरू... कोई आता हुआ दिखे तो चैन बंद.. !!! हम लड़कियां इतनी आसानी से थोड़े ही यह सब कर सकती है.. !!

कविता: "तुम दोनों का ज्यादातर ओरल कार मे ही होता था क्या?"

मौसम: "अब ये सारी बातों मे तुम दोनों मेरी शादी की चिंता तो भूल ही गए.. फाल्गुनी और पापा की स्टोरी तो बहोत लंबी है.. मैंने और वैशाली ने पूरी सुनी हुई है.. फाल्गुनी, तुम कभी फुरसत मे दीदी को सब कुछ बताना.. !! एक बार मेरी शादी हो जाए फिर तो फाल्गुनी के पास टाइम ही टाइम होगा.. दीदी, तुम फाल्गुनी को रोज दोपहर बेडरूम मे बुलाना.. उसकी बातें सुनना.. सिर्फ सुनकर ही पानी निकल जाएगा"

मौसम: "तू चली जाएगी तो मैं क्या पूरी ज़िंदगी यहीं बैठी रहूँगी?? मेरी भी तो शादी होगी और मैं चली जाऊँगी"

मौसम: "अरे यार.. वो सब बातें छोडो.. और अभी मेरी समस्या का हाल ढूंढो"

कविता: "इसका हाल है मेरे पास.. रुको एक मिनट"

कविता नीचे गई.. और थोड़ी ही देर मे ऊपर आ गई.. दो बंद मुट्ठियाँ मौसम के सामने रखकर उसने चुनने के लिए कहा

मौसम ने थोड़ा सोचकर एक मुट्ठी को पसंद किया.. मुठ्ठी खोलते ही अंदर.. लाल स्केचपेन से विशाल का नाम लिखा हुआ नजर आया.. दूसरे हाथ मे तरुण का नाम लिखा हुआ था

कविता: "देखा मौसम, किस्मत भी यही चाहती है की तू विशाल को चुनें.. अब तू चाहे तो नसीब को अनदेखा कर सकती है.. आखिरी निर्णय तुझे करना है.. किस्मत ने तो अपना फैसला सुना दिया है"

मौसम ने झुककर कविता की दोनों हथेलियों को बारी बारी चूम लिया.. और फिर दोनों हथेलियों को अपने सीने से लगा दिया..

मौसम: "तय हो गया दीदी.. अब विशाल ही मेरा हमसफ़र बनेगा.. विशाल ही इन छातियों को दबाएगा.. " और फिर आँखें बंद कर धीरे से बोली "सॉरी तरुण... !!"

मौसम: "अब तय हो गया.. दीदी, इस बारे मे हम अब और कोई बहस नहीं करेंगे.. बहोत हो गया.. इतना तय करते हुए मैं ऐसे तनाव से गुजरी हूँ.. यह मेरा मन ही जानता है.. !!"

खुश होकर फाल्गुनी मौसम से लिपट गई और उसे लीप किस दे दी "कॉंग्रेटस मौसम.. " कविता ने दोनों की कमर पर चिमटे काटते हुए कहा "साली नालायकों.. एकदम बेशर्म हो दोनों.. पहले छुप छुपकर सब कुछ बेडरूम मे करती थी अब खुलेआम कर रही हो... !!!"

"दीदी.. जब प्यार किया तो डरना क्या.. !!" मौसम ने जवाब दिया

फाल्गुनी: "आहाहा देखो तो सही.. मौसम रानी कैसे मूड मे आ गई.. !!! अभी आधे घंटे पहले तो सिट्टी-पीट्टी गूम हो गई थी मैडम की"

कविता; "अंधेरा हो गया है.. अब नीचे चलें.. !!"

मौसम ने सब के आगे अपना निर्णय घोषित कर दिया..

उस रात उसने तरुण को फोन कर अपने इस निर्णय के बारे मे बता दिया.. तरुण ने बिना किसी दुख या शिकवे के.. मौसम के इस निर्णय का स्वागत किया

तरुण ने मज़ाक करते हुए मौसम से कहा "मौसम.. अपनी शादी मे न्योता देना भूलना मत.. जो पति बन नहीं सकता उसे अपना दोस्त या फिर माना हुआ भाई बनाना इस दुनिया की बड़ी पुरानी प्रथा है"

तरुण की मित्रता का आभारसह स्वीकार कर मौसम ने फोन रख दिया

मौसम इस जद्दोजहत से गुजर रही है इसके बारे मे विशाल या उसके परिवार को कुछ पता ही नहीं था.. !! वो तो यही समझ रहे थे के सब कुछ फाइनल ही है.. आखिर वही हुआ जो होना चाहिए था इसलिए मौसम के घर पर सब बहुत ही खुश थे.. रमिलबहन ने भी अब राहत की सांस ली.. अपने स्वर्गस्थ पति की आखिरी जिम्मेदारी पूरी करने का मौका जो मिलने वाला था.. !!

अच्छा सा मुहूरत देखकर विशाल और मौसम की सगाई तय की गई.. मौसम ने छाती पर पत्थर रखकर अपने ह्रदय के सिंहासन पर तरुण की जगह विशाल को बीठा दिया था.. !!!

विशाल और मौसम की शादी तय हो जाने पर फोरम बेहद उदास होकर अपने घर की छत पर खड़ी थी.. ऊपर वाले से शिकायत कर रही थी.. तभी उसने एक टूटता हुए तारा देखा और उसे अपने भविष्य का अंदाजा लग गया.. एक गहरी सांस छोड़कर वो नीचे आ गई.. दिल मे बेहद बेचैनी हो रही थी.. विशाल से उसका रिश्ता बस एक झटके मे ही खतम हो गया था.. वो तड़प रही थी.. बेबस महसूस कर रही थी.. ज़िंदगी जीने का और कोई अवलंबन नजर नहीं आ रहा था

दोनों के बीच आखिरी मुलाकात... शहर के एक गार्डेन मे हुई थी.. उस चहिते पेड़ के नीचे.. जहां वह दोनों मित्रता होने के बाद पहली बार मिले थे.. हर पार्क या बागीचे के कोने मे ऐसे अनगिनत वृक्ष होंगे जो ऐसी कई प्रेम-कहानियों को अपने नीचे पनपते हुए देख चुके होंगे.. प्रेमियों के बीच प्यार, झगड़ें, बहस, रूठना, मनाना.. सब के गँवाह है यह वृक्ष.. उन्हें सिर्फ एक वनस्पति नहीं पर एक संस्था का दर्जा देना चाहिए.. !!

बीमार फोरम के पास अब कुछ नहीं बचा था.. विशाल नाम का आकाशी छत्र हमेशा के लिए छीन चुका था.. हमेशा के लिए बिछड़ने से पहले एक आखिरी बार मिलने के लिए दोनों यहाँ आए थे.. प्यार मे नाकाम लोग जुदाई को भी बड़ी ही भाव्ययता से करते है.. क्योंकि वह फिर उन्हें पूरी ज़िंदगी याद रहता है

"क्यों कुछ बोल नहीं रही?" विशाल ने बेवकूफ जैसा सवाल किया.. फोरम क्यों कुछ नहीं बोल रही यह जानने के बावजूद उसने यह वाहियात सवाल किया.. पर कभी कभी जब बोलने के लिए कुछ बचा न हो.. तब अक्सर ऐसे बेतुके सवालों से ही संवाद की शुरुआत होती है

प्यार कभी कभी परैलिसिस जैसा होता है.. इंसान की दिलों दिमाग को निश्चेतन कर देता है.. खासकर जुदाई के वक्त.. !!

फोरम: "क्या बोलूँ?? क्या कहूँ तुझसे विशाल.. !!" कहते हुए फोरम फुटफूटकर रोने लगी.. एक घंटे के लिए मिलना तय हुआ था.. पर इतनी सी बातचीत के बाद.. न विशाल कुछ बोल सका और ना फोरम कुछ बोल पाई.. !!!

काफी देर तक दोनों बिना कुछ कहें.. एक दूसरे का हाथ पकड़कर बैठे रहें..

विशाल: "फोरम.. अब हमें जाना चाहिए.. पहले तू यहाँ से निकल जा.. थोड़ी देर बाद मैं निकलूँगा"

फोरम: "क्यों? हर बार तो हम दोनों साथ ही निकलते है"

विशाल: "तब की बात और थी फोरम.. समझने की कोशिश कर यार.. मैं थोड़ी देर यहाँ अकेले बैठना चाहता हूँ.. तू प्लीज चली जा"

रोता-बिलखता दिल लेकर फोरम खड़ी हो गई.. विशाल ने आज तक फोरम को हाथ नहीं लगाया था.. किस भी नहीं की थी कभी.. आज भी उस रसम मे कोई बदलाव आने की उम्मीद नहीं थी.. पर फिर भी.. दोनों के दिलों मे एक ऐसी टीस उभरकर आई थी.. दोनों एक दूसरे से लिपटकर रोना चाहते थे पर वो भी नहीं कर पाए दोनों..!!

आखिर फोरम विशाल को पार्क मे छोड़कर चली गई.. कौन किसे छोड़कर जा रहा था यह दोनों को पता था.. !!! अभी अभी बीमारी से उभरी हुई फोरम.. इस सदमे के कारण फिर से कमजोर हो गई.. फिर भी उसने हँसते हँसते विशाल को अपने प्रेमी की नौकरी से रुखसत दे दी

एक और प्रेम-कथा का दुःखद अंत हुआ.. !!!

कुछ दिनों बाद, मौसम और विशाल की बड़े ही सादगीपूर्ण ढंग से सगाई हुई.. मौसम की सहेली होने के नाते फोरम को भी बुलाया गया था.. मौसम ने तरुण को भी न्योता भेजा था और ताज्जुब की बात यह की तरुण आया भी.. उसने खेल भावना के साथ मौसम और विशाल को बधाई दी..

सगाई की अंगूठी पहनाते वक्त सभी के चेहरे खुशी से झूम उठे.. सिर्फ तरुण और फोरम को छोड़कर.. मौसम ने एक नजर तरुण की और देखा और फिर नजरें झुका ली.. तो दूसरी तरफ विशाल ने भी फोरम की ओर देखा.. एक नकली मुस्कान के साथ फोरम ऐसा जताने की कोशिश कर रही थी जैसे वह इस रिश्ते से बहुत खुश थी.. पर.. !!!

मौसम और विशाल दोनों सब समझते थे.. पर इस बात पर चर्चा करना मतलब मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ने के बराबर था.. सगाई की विधि के दौरान फोरम अपने आप को और संभाल न सकी और धीरे से खिसककर बाहर बरामदे मे आ गई.. वो चाहती थी की यह रसम जल्दी से जल्दी खत्म हो और वो यहाँ से जा सकें..

अभी और रस्म बाकी थी और लोगों की हर्ष-सभर आवाज़ें बर्दाश्त न कर पाने के कारण फोरम कोने मे खड़ी रहकर रोने लगी..

अचानक उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा.. अपने आँसू पोंछकर फोरम ने देखा.. वो तरुण था.. !! तरुण को तो वो जानती भी नहीं थी.. !!

"जी, आप.. कौन??" अभी भी फोरम के आँसु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे..

तरुण: "आपके आँसू और मेरी खामोशी मे एक सा दर्द है, ऐसा मुझे लग रहा है.. समान दुख वाले जब मिलते है तब पहचान देने की जरूरत नहीं पड़ती.. सिर्फ ऊपर वाले का शुक्रिया करने का दिल करता है.. तनाव और उदासी के वक्त पर बातचीत एक बेहतरीन इलाज साबित होता है.. ऐसे मौकों पर अकेलापन काटने को दौड़ता है"

फोरम स्तब्ध होकर तरुण की बातें सुनती रही.. वैसे विशाल ने उसे बताया था तरुण और मौसम के बीच जो कुछ भी हुआ उसके बारे मे.. उसे समझने मे देर नहीं लगी.. इस अकेलेपन के दौर मे.. इस बाँके नौजवान के साथ बात करके उसे बहुत सुकून मिला.. एक पल के लिए ही सही.. उदासी के बादल छटते हुए नजर आ रहे थे

फोरम ने तसल्ली करने के लिए पूछा "मैंने आपको पहचाना नहीं"

"जी, मैं कौन हूँ यह तो फिलहाल मुझे भी नहीं पता.. पर आप मौसम को कैसे जानती हो?" पीड़ा के इस संबंध को और गाढ़ा बनाते हुए तरुण ने फोरम से पूछा.. अपनी जेब से रुमाल निकालकर फोरम को आँसू पोंछने का इशारा किया उसने

रुमाल से चेहरे के आँसू पोंछते हुए फोरम ने कहा "मौसम मेरी बॉस है.. है नहीं.. थी.. !! अब नहीं है.. मैं उनकी ऑफिस मे जॉब करती थी.. अब अपने बारे मे भी कुछ बताइए"

हंसकर तरुण ने कहा "मैं भी मौसम के पास जॉब मांगने गया था.. पर वो नौकरी विशाल को मिल गई.. इसलिए फिलहाल फ्री हूँ.. और नई जॉब की तलाश मे हूँ"

फोरम के साथ बातचीत के दौरान तरुण ने अपनी पूरी कहानी बयान कर दी.. और फोरम ने भी अपनी बात कही.. दोनों को बातें करते हुए एक अनोखे सुकून का एहसास हो रहा था.. एक समान दुख वाले व्यक्तियों को यह तसल्ली होती है की सामने वाला उसके दुख को महसूस कर चुका है इसलिए उसकी स्थिति को अच्छे से जानता है.. बात करना ज्यादा आसान हो जाता है

तभी सगाई की रस्म पूरी हुई.. सब बाहर आए.. मौसम और विशाल भी.. !! खाना खाने के बाद सब लौटने लगे..

जाने से पहले तरुण फिर से फोरम के पास आया.. और कहा "फोरम, पुराने संबंधों को भूलने मे और नए संबंध के बनने मे बड़ा वक्त लगता है.. पर पुराने रिश्तों के घावों के भरने के लिए नए संबंधों के मरहम की जरूरत पड़ती ही है.. ये मेरा मोबाइल नंबर है.. मेरी तरफ से मैं कभी पहल नहीं करूंगा.. मुझे कोई जल्दी नहीं है.. सिर्फ और सिर्फ.. मौसम के सदमे से बाहर निकलने के लिए मुझे एक दोस्त की जरूरत है.. आप चाहें तो मुझे कॉल कर सकती हो.. अगर आप को ठीक लगे"

फोरम ने मुस्कुराकर तरुण के विजिटिंग कार्ड को अपने पर्स मे रख दिया.. और थैंक्स कहकर वो भी निकल गई.. जाते वक्त उसने ना तो मौसम को और ना ही विशाल को बाय कहने की जरूरत महसूस की.. !!

मौसम की सगाई मे शीला या मदन आ नहीं सकें.. क्योंकि वह दोनों वैशाली की शादी की तैयारियों मे जुटे हुए थे.. शीला और मदन दोनों ने मौसम को फोन पर बधाईयां दी..


सब के चले जाने के बाद.. मौसम सुबोधकांत की तस्वीर के सामने खड़े रहकर.. देखती रही.. और रोती रही.. !!!

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उस दिन के बाद.. फोरम ने कभी विशाल को ना तो मेसेज किया और ना ही कॉल किया.. विशाल ने एक-दो बार उसे कॉल किया पर फोरम ने उठाया नहीं.. आखिर विशाल ने वास्तविकता का स्वीकार कर लिया

इस दौरान वैशाली और पिंटू की शादी की तैयारियां बड़े जोर-शोर से चल रही थी.. रेणुका और राजेश अक्सर पूरा दिन मदन-शीला के साथ रहते और इन तैयारियों मे उनकी मदद करते.. जब वैशाली घर पर ना हो तब मदन रेणुका के साथ और राजेश शीला के साथ भरपूर चुदाई भी कर लेते थे.. शीला के बबले राजेश को इतने पसंद थे की जब चारों अकेले हो तब राजेश शीला की छातियों से अपने हाथ हटाता ही नहीं था.. शीला भी मौका देखकर राजेश के पास पहुँच जाती थी

रेणुका प्रेग्नन्ट थी इसलिए उसका विशेष ध्यान रखा जा रहा था.. शीला से उम्र मे पंद्रह साल छोटी रेणुका की यह पहली प्रेग्नन्सी थी.. मदन भी बहुत ही संभालकर उसके साथ संभोग करता.. यह ध्यान रखते हुए की उसके पेट पर जरा सा भी वज़न न आए.. !!

वैशाली अब रोज पाँच बजे उठ जाती.. शीला की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए.. वो रसिक और अपनी माँ की छेड़खानियों को देखना चाहती थी.. रसिक के लंड का नशा अब भी उसके सर पर चढ़कर बोल रहा था.. और वो शादी से पहले एक और बार रसिक के मूसल लंड से चुदना चाहती थी.. पर मौका कैसे मिलता.. !!!

राजेश और रेणुका अब ज्यादातर शीला के घर पर ही रहते... सब लोग एक बड़े परिवार की तरह घुलमिलकर रहते.. रात को सोने के लिए जगह कम पड़ जाती थी इसलिए वैशाली कविता के खाली पड़े घर मे सोने चली जाती.. वैशाली के चले जाने के बाद.. यह चारों शीला-मदन के बेडरूम मे घुस जाते और पार्टनर बदलकर पूरी रात चोदते रहते.. चुदाई सम्पन्न होने के बाद.. दोनों जोड़े.. अपने अपने साथी के साथ अलग बेडरूम मे सो जाते.. ताकि वैशाली को जरा सी भी गंध न लगे.. !!

वैशाली अब राजेश को अंकल कहकर ही बुलाने लगी थी.. अपना पुराना काम खतम करने के लिए उसे कभी कभी राजेश की ऑफिस जाना पड़ता था.. राजेश की आँखों मे अपने स्तनों के प्रति जो आकर्षण था वह अच्छे से देख पाती थी वैशाली.. !! वैशाली अक्सर सोचती.. की सामान्य पुरुषों को जैसे उसके बड़े स्तनों का आकर्षण होता था वैसा ही राजेश की आँखों मे था या कुछ और था??






राजेश की नज़रों की नियत को तय कर पाने की कोशिश करती रहती थी वैशाली.. माउंट आबू मे दोनों के बीच जो नशीला एनकाउंटर हुआ था.. वह अब भी वैशाली की स्मृति मे ताज़ा था.. जब राजेश और वैशाली अकेले होते तब किसी न किसी बहाने राजेश उसे छूने की कोशिश कर ही लेता था.. और जब शीला-मदन घर पर न हो तब कभी वैशाली के नितंबों को छु लेता तो कभी उसका हाथ पकड़ लेता..





पता नहीं क्यों.. पर वैशाली को राजेश की यह छेड़खानियाँ बहुत अच्छी लगती थी.. वैसे चंचल तो वह पहले से ही थी.. राजेश को ऐसा करने से कभी वो रोक देती तब राजेश एक ही बात कहता "वैशाली, तूने मुझे माउंट आबू में सब कुछ करने ही दिया था एक बार.. कभी कभी तुझे देखकर इक्साइट हो कर थोड़ा बहुत छु लेता हूँ, तो इसमें हर्ज ही क्या है??"

वैशाली के दिमाग मे भी यह बात उतर गई.. अब वो कभी कभी जान बूझकर ऐसे मौके ढूँढने लगी थी.. एक बार तो उसने राजेश का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया.. और दबवाने का पूरा मज़ा भी लिया

दिन की यह सारी घटनाएं याद करते हुए.. वैशाली कविता के बेडरूम मे अकेले उंगली कर अपनी चूत को शांत कर लेती.. पिंटू सामने से वैशाली के साथ कुछ भी नहीं करता था.. वह ये सब कुछ शादी के बाद ही करना चाहता था.. वैशाली आखिर शीला की बेटी थी.. ज्यादा देर तक बिना मर्द के संसर्ग के रहने की उसे आदत नहीं थी






रात को अपनी गीली चूत मे उंगली करते हुए उसे रसिक के मजबूत लंड के दमदार धक्कों की याद आ जाती, तब उसकी चूत मे हलचल सी मच जाती थी.. उसकी चूत लंड के प्रवेश के लिए तड़पने लगती थी.. पर रसिक तो क्या.. किसी और पुरुष के लंड का घुसना भी अभी मुमकिन नहीं था.. शादी की तारिख अब नजदीक आती जा रही थी..

वैशाली से अब यह भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी.. वह पहले से ही बड़ी कामुक थी.. और उसके पुराने पति संजय ने उसे चोद चोदकर और भी हवसखोर बना दिया था.. संजय जब शराब पीकर उसे नए नए अंदाज मे चोदता था तब वैशाली को बहोत मज़ा आता था.. वैशाली को वही खुशी फिर से चाहिए थी.. और उसके लिए वो सुहागरात तक इंतज़ार नहीं कर पा रही थी.. अकेले रसिक के खेत पर कोई उसे जाने नहीं देगा वो उसे पता था.. कविता ने उसे बता दिया था की शीला को उनके कारनामे के बारे मे पता चल चुका था

कविता ने जब उसे बताया की लौटते समय वो एक बार और रसिक के खेत पर गई थी और उसने बहुत मजे किए थे.. यह जानने के बाद वैशाली अपना आपा खोते जा रही थी.. वह मौका ढूंढ रही थी.. पर शीला की नजर हर वक्त वैशाली पर रहती थी.. जब वो बाहर जाती तब भी शीला उस पर नजर रख रही थी.. शीला किसी भी सूरत मे रसिक के विकराल लंड को वैशाली की चूत के करीब जाने देना नहीं चाहती थी.. वो वैशाली का परछाई की तरह पीछे पड़ी रहती थी

रसिक के लंड से चुदने के लिए वैशाली बेताब हो गई थी.. पर वो कैसे हो पाएगा ये पता नहीं चल रहा था उसे..

दूसरे दिन वैशाली नजदीक के मार्केट मे शॉपिंग करने जा रही थी तभी राजेश ऑफिस के लिए निकल रहा था.. उसने वैशाली को मार्केट छोड़ने के लिए गाड़ी मे बीठा दिया..

आज फिर से दोनों अकेले मिले थे.. राजेश रोमेन्टीक हो गया

राजेश: "बड़ी कातिल लग रही आज तो तू वैशाली.. !!"

वैशाली: "थैंक्स.. !!"

राजेश: "पता नहीं क्यों.. आज तुझे देखकर, मुझे माउंट आबू वाली वैशाली की याद आ गई.. जिसने मुझे सब कुछ करने की पर्मिशन दी थी"

वैशाली: "उस बात को भूल जाइए.. तब की बात अलग थी.. तब पिंटू मेरे जीवन मे नहीं था"

राजेश: "अब तक शादी कहाँ हुई है तुम्हारी?" कहते हुए राजेश ने गियर से हाथ हटाकर वैशाली की जांघ पर रख दिया

रोमांच से कांप उठी वैशाली.. उसने ड्राइव कर रहे राजेश की तरफ देखा..

राजेश ने उसकी आँखों मे देखते हुए शरारत भरे अंदाज मे कहा "तेरे जैसे गदराए जिस्म वाली लड़की बगल मे बैठी हो और जिसकी मर्दानगी जाग न जाए.. उसे तो अपनी मेडिकल जांच करा लेनी चाहिए.. अब मुझ से और कंट्रोल नहीं होता वैशाली.. माउंट आबू के उस टॉइलेट मे बिताए वह यादगार पल.. जिस तरह तूने मेरा मुंह मे लिया था.. आहाहा.. आज भी याद आता है तो मज़ा आ जाता है.. आज वैसे ही ओरल सेक्स की बड़ी इच्छा हो रही है.. मना मत करना प्लीज"

"आज नहीं.. आज मेरा मूड नहीं है" अपनी जांघ से राजेश का हाथ हटाते हुए वैशाली ने कहा.. जिस्म तो वैशाली का भी वासना से तप रहा था.. लेकिन पता नहीं क्यों.. वैशाली को ऐसा करना ठीक नहीं लग रहा था..

खाली रोड पर तेज स्पीड से भाग रही गाड़ी राजेश की ऑफिस की ओर जा रही थी.. एक सुने कोने मे गाड़ी खड़ी रखकर राजेश ने बड़ी ही मस्ती से वैशाली के भरे भरे बबले दबाकर कहा "वाऊ यार.. क्या मस्त है यह तेरे गोले.... जी तो करता है की इन दोनों के बीच मेरा लंड दबाकर पूरी रात रगड़ता रहूँ.. !!"

अब वैशाली के सब्र का बांध भी टूट गया.. वह भी दूध की धुली तो थी नहीं.. राजेश के स्पर्श ने.. उसकी हवस को बेतहाशा भड़का दिया था.. सेक्स की एक अदम्य सी भूख जाग गई थी उसके अंदर.. जिस्म की आग से वैसे भी काफी दिनों से झुलस रही थी.. राजेश के स्पर्श ने उस आग मे पेट्रोल डालने का काम कर दिया

वैशाली: "ओह्ह सर.. कितना ट्राफिक है?? कोई देख लेगा तो??"

राजेश: "अरे मेरी जान.. जब लंड खड़ा हो जाए तब ये किसी की नहीं सुनता.. अभी बस इतना ही चाहता हूँ की तू मेरा मुंह मे लेकर चूस.. और कुछ कहाँ करने को कह रहा हूँ तुझे.. !! एक बार पकड़कर तो देख.. देख कितना सख्त हो गया है.. !!" कहते हुए राजेश ने वैशाली का हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया..






सख्त लंड को अपनी मुट्ठी मे दबाकर वैशाली ने सिसकते हुए कहा "ओह्ह सर.. आपने तो मुझे भी गरम कर दिया"

राजेश: "आह्ह वैशाली.. उस रात माउंट आबू मे तुझे चोदने के बाद.. बहोत बार मन किया था तुझे फिर से चोदने का.. !! ऑफिस मे तेरे बड़े बड़े बबलों को देखकर अक्सर मेरा लंड खड़ा हो जाता था.. पर क्या करता.. !! आज तो मौका भी है और दस्तूर भी.. !! वैसे भी तू शॉपिंग के लिए निकली है इसलिए थोड़ी सी देरी हो भी गई तो कोई दिक्कत नहीं होगी.. और अगर शीला या मदन का फोन आ गया तो कह देना की अर्जेंट काम के सिलसिले मे मैंने तुझे ऑफिस बुला लिया था.. मैं गँवाही दे दूंगा उसके बाद किसी को कोई शक नहीं होगा"

वैशाली: "बात तो सही है सर.. पर यहाँ खुली सड़क मे मेरी हिम्मत नहीं हो रही"

राजेश ने कुछ सोचकर गाड़ी चला दी.. और अपने ऑफिस तक ले गया.. बाहर पार्किंग मे देखा.. सब लोग जा चुके थे.. उसने वैशाली को एक मस्त लिप किस कर दी और इशारे से उतारने के लिए कहा.. ऑफिस मे आज कोई नहीं था.. और वैसे भी वो बार बार ऑफिस आते जाते रहती थी इसलिए बाहर से देखने वाले को भी कोई शक होने की गुंजाइश नहीं थी

पहले राजेश ऑफ़िस के अंदर गया और अपनी केबिन मे जाकर बैठ गया.. थोड़ी देर के बाद वैशाली अपना पर्स लेकर ऑफिस मे घुसी.. अभी एक दो लोग थे ऑफिस के अंदर.. वैशाली बिंदास राजेश की केबिन मे घुस गई.. और अंदर सोफ़े पर जाकर बैठ गई.. जो करने आए थे वो कुर्सी पर मुमकिन नहीं था इसलिए वो जानबूझकर सोफ़े पर बैठी थी..

प्युन आकर पानी के दो गिलास रख गया.. राजेश एक-दो काम निपटा रहा था तब वैशाली ने शीला को फोन कर दिया की वो ऑफिस आई थी कुछ काम के सिलसिले मे.. चालाक शीला ने तुरंत पिंटू को फोन किया वैशाली के बारे मे पूछने के लिए.. पिंटू ने बताया की वैशाली तो आज शॉपिंग पर जाने वाली थी

खतम.. !!! शीला के दिमाग की बत्ती तुरंत ही जल गई.. और साथ ही साथ उसे अपनी आँखों के सामने रसिक का लंड नजर आने लगा.. !!! जरूर वैशाली रसिक के पास गई होगी..!!! ये मादरचोद रसिक का मैं क्या करूँ?? वैशाली की चूत का कुआं बना देगा साला.. !! मुझे पता था.. एक बार अगर वैशाली उससे चुद गई तो दोबारा जरूर जाएगी..!!!

शीला का दिमाग बड़ी तेजी से चल रहा था.. रसिक से बात करने के लिए उसने फोन उठाया.. और फिर उसे विचार आया की उसे फोन करने का क्या मतलब? अगर वैशाली वहाँ उसके साथ होगी तो वो थोड़े ही सच बताएगा?? उसी तरह वैशाली को भी फोन करने का कोई अर्थ नहीं था.. शीला ने खुद ही रसिक के खेत पर जाकर जांच करने का ते किया और घर के बाहर निकली.. उसका दिमाग घूम रहा था.. अगर वैशाली वहाँ हुई तो वो रसिक का क्या हाल करेगी.. उसे समझ मे नहीं आ रहा था.. जो भी हो.. तब की तब सोचेंगे..

उसने रूखी को फोन किया और बात बात में रसिक के खेत का पक्का पता ले लिया.. फिर ऑटो में बैठकर वो करीब बीस मिनट बाद उस चौराहे पर पहुँच गई जहां से रसिक के खेत की ओर जाने का कच्चा रास्ता जाता था.. अंदाजे से उस और जाने लगी शीला.. बीच में ही उसे एक खेत-मजदूर मिल गया.. जिसके कहने के मुताबिक.. वही रास्ता आगे जाकर रसिक के खेत से मिलता था..

शीला चलते चलते रसिक के खेत तक पहुंची.. वहाँ बड़े से खेत के कोने मे एक कमरा बना हुआ था.. और उस कमरे के बाहर एक खटिया थी.. अब शीला संभालकर कदम रख रही थी.. छुपते छुपाते वो उस कमरे तक पहुँच गई.. कमरे का दरवाजा अटकाया हुआ था.. वो उसे खोलने जाती उससे पहले ही दरवाजे से रसिक बाहर आया

शीला को देखकर चोंक गया रसिक और बोला "अरे भाभी?? आप यहाँ?? दिन-दहाड़े मन हो गया क्या?? मुझे बुला लिया होता.. !! आपने क्यों तकलीफ की??"

एक पल के लिए सकपका गई शीला.. पर तुरंत ही स्वस्थ होकर बोली "हाँ रसिक.. घर पर तो अब सेटिंग होना नामुमकिन है.. जब से वैशाली रहने आई है तुझ से मिल पाना मुश्किल हो गया है.. इसलिए यहाँ आने के अलावा और कोई चारा नहीं था.. अब तो वैसे भी उसकी शादी की तैयारियों के कारण वक्त मिल नहीं पाएगा"

"मेरे लायक कोई काम हो तो बताना भाभी.. मैं तुरंत आ जाऊंगा" शीला के दोनों स्तनों को बेरहमी से मसलते हुए रसिक ने कहा..

"आह्ह.. साले जरा धीरे से दबा.. कविता को चोदकर बड़े जोश मे आ गया है तू.. !!" शीला ने कहा

रसिक: "कविता भाभी ने तो अंदर डालने ही नहीं दिया.. बहोत डरती है वो"

शीला ने आसपास देखते हुए कहा "अभी अकेला है तू?"

रसिक: "मैं कभी अकेला नहीं होता भाभी.. हम दो हमेशा साथ ही होते है.. एक मैं.. और के ये मेरा साथी" कहते हुए रसिक ने अपनी धोती हटाकर लंगोट के अंदर से अपना नरम काला लंड निकालकर शीला को दिखाया






शीला: "साले बेशर्म.. अंदर रख इसे.. "

रसिक: "अब आप के साथ कैसी शर्म भाभी.. !! आपके बबले देखकर अब रहा नहीं जा रहा"






रसिक ने अपना लंड शीला के हाथ मे थमा दिया और उसके स्तनों को दबाते हुए बोला "कमरे मे चले?? मैं खटिया अंदर ले लेता हूँ.. या आप चाहे तो फर्श पर भी मज़ा आएगा"

शीला: "अभी नहीं रसिक.. किसी और दिन करेंगे.. अभी मुझे बहोत काम है.. मैं तो रेणुका को ढूँढने यहाँ आई थी.. वो तेरे इस मूसल की ऐसी दीवानी हो गई है की मैंने सोचा की वो यहाँ होगी.. पिछले दो घंटों से मैं उसे ढूंढ रही हूँ.. पर उसका कोई पता ही नहीं है.. अभी मैं चलती हूँ"

रसिक: "ठीक है भाभी.. कोई बात नहीं.. पर थोड़ा सा चूस तो लीजिए.. !!"

रसिक से पीछा छुड़ाने के लिए वो तुरंत घुटनों के बल बैठ गई और रसिक के लंड को चूसकर सख्त कर दिया..






लंड कडक होने के बाद शीला का भी चुदवाने का मन हो गया.. पर आज मुमकिन नहीं था.. इसलिए न चाहते हुए भी वो खड़ी हो गई.. और ब्लाउज से अपना एक स्तन बाहर निकालकर रसिक को चूसने के लिए दे दिया.. रसिक बड़े ही चाव से शीला की निप्पल को चूस रहा था की तभी शीला ने अपना स्तन खींचकर अंदर रख दिया.. और जल्दबाजी मे निकल गई.. जा रही शीला के मटकते हुए कूल्हों को देखकर अपना लंड हिलाता रहा रसिक.. !!

शीला बाहर मैन रोड तक चलकर आइ और वहाँ से ऑटो पकड़कर घर पहुंची.. समझ मे नहीं आ रहा था की वैशाली कहाँ होगी.. !!! जहां भी हो.. रसिक के साथ तो नहीं थी.. यह जानकर उसका मन थोड़ा सा शांत जरूर हो गया

कहाँ होगी वैशाली....!!!


वैशाली तो राजेश की ऑफिस मे बैठकर इंतज़ार कर रही थी.. की कब बाकी का स्टाफ घर चला जाए और राजेश उसकी टांगें फैलाकर चोद दे.. !!

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जब भाभियाँ झुकने के लिए कुछ ज्यादा ही उतावली हो रही हो..!!





















 
शीला बाहर मैन रोड तक चलकर आइ और वहाँ से ऑटो पकड़कर घर पहुंची.. समझ मे नहीं आ रहा था की वैशाली कहाँ होगी.. !!! जहां भी हो.. रसिक के साथ तो नहीं थी.. यह जानकर उसका मन थोड़ा सा शांत जरूर हो गया

कहाँ होगी वैशाली....!!!

वैशाली तो राजेश की ऑफिस मे बैठकर इंतज़ार कर रही थी.. की कब बाकी का स्टाफ घर चला जाए और राजेश उसकी टांगें फैलाकर चोद दे.. !!

जब ऑफिस का पूरा स्टाफ चला गया तब राजेश ने पयुन को भी यह कहकर घर भेज दिया की ऑफिस आज वो बंद कर देगा.. मैदान साफ हो जाने के बाद राजेश केबिन मे आया..

रिवॉलविंग चैर में बैठकर राजेश ने अपने पेन की छैन खोली.. और लंड बाहर निकाला.. वैशाली की ओर देखकर उसने कहा "ओह वैशाली.. आजा इधर.. और मुंह मे ले ले इसे.. !!"

राजेश के नरम लंड को देखकर वैशाली मन ही मन तुलना करने लगी.. कितना फर्क था.. !! राजेश सर के और रसिक के लंड में.. !!

वो चलते चलते राजेश की चैर के करीब आई.. और लंड पकड़कर हिलाते हुए अपने टी-शर्ट ऊपर कर स्तन को बाहर निकालते हुए बोली "सर.. जरा जल्दी करना.. पता नहीं पर आज मुझे थोड़ा दर लग रहा है.. !!"








वैशाली के दोनों स्तनों को ब्रा से बाहर खींचकर मसलते हुए राजेश ने कहा "अरे मेरी जान.. अभी तो शुरुआत हो रही है.. और तुम खत्म करने की बात कर रही हो.. !! चल अब जल्दी जल्दी मुंह मे लेकर मेरी इच्छा पूरी कर दे.. !!"

वैशाली की हथेली के स्पर्श से राजेश का लंड एक ही मिनट मे खड़ा हो गया..

वैशाली फर्श पर बैठ गई.. और लंड को बड़े ही प्यार से चूमते हुए मुस्कुराई और एक ही बार मे पूरे लंड को मुंह मे लेकर चूसने लगी.. सोच रही थी.. रसिक का लंड तो जब नरम होता है तब भी इससे बड़ा होता है.. रसिक.. रसिक.. रसिक.. जादू ही कर दिया है उसने तो.. डरते हुए कविता भी तैयार हो गई थी.. कोई बच नहीं सकता रसिक के लंड के जादू से..

राजेश के लंड को चूसते हुए वैशाली बहोत गरम हो गई.. उसकी चूत गीली हो गई.. और अंदर इतनी खुजली होने लगी की वो चूसते हुए अपनी चूत खुजा रही थी.. थोड़ा सा नीचे झुककर राजेश बारी बारी से वैशाली के मदमस्त स्तनों को मसल रहा था.. और सिसकियाँ भरते हुए अपनी कमर हिला रहा था








"ओह्ह वैशाली.. क्या मस्त बॉल है तेरे.. इन दोनों के बीच अपना लंड दबाकर रगड़ने का मन कर रहा है.. " राजेश ने आह भरते हुए कहा





राजेश की तमन्ना को पूरा करने के लिए वैशाली ने अपने दोनों उरोजों को हाथों से दबा दिया और बीच की सेक्सी लकीर मे उसके लंड को जकड़ लिया..

"ओह माय गॉड वैशाली.. !!! ये क्या कर दिया तूने यार.. !!! तेरी चूत मे जितनी गर्मी है उतनी ही गर्मी तेरे इन बबलों के बीच है.. !!! आह्ह.. !!" थोड़ी देर तक स्तन-संभोग वैसे ही चलता रहा और वैशाली ने फिर से मुख-मैथुन शुरू कर दिया.. राजेश के सख्त लंड से टपकता चिपचिपा प्रवाही का स्वाद भले ही वैशाली को पसंद न आ रहा हो.. पर अभी वो उत्तेजक टॉनिक का काम कर रहा था.. जितना प्रवाही राजेश के लंड से लीक हो रहा था उससे दोगुना वैशाली की चूत से बह रहा था..






मुंह से लंड बाहर निकालकर वैशाली ने कहा "सर, जल्दी करना.. मुझे अभी मार्केट जाना है और फिर घर भी पहुंचना है" वैशाली की इस रीक्वेस्ट का राजेश पर कोई असर नहीं हुआ.. वो तो आज बड़े ही आराम से वैशाली की गदराई मांसल जवानी का लुत्फ उठाना चाहता था.. एक के बाद एक.. उसने वैशाली के सारे कपड़े उतार दिए.. अपनी नज़रों से वैशाली की नंगी जवानी का रस पीते हुए वो उसके बड़े बड़े स्तनों को चूस रहा था.. उसका हाथ वैशाली की चूत के गिलेपन की जांच करने मे जुट गया था







राजेश की सिसकियाँ पूरी केबिन मे गूंज रही थी.. हवस मे अंध होकर दोनों एक दूसरे को पागलों की तरह चूम रहे थे.. वैशाली कभी राजेश के होंठों को चूमती तो कभी नीचे जाकर उसके खड़े लंड के सुपाड़े को चूस लेती.. राजेश फिर से अपनी चैर में बैठ गया और नग्न वैशाली टेबल की उस तरफ नीचे बैठकर उसके लंड को अपनी लार से गीला करने लगी.. वो अपनी उंगलियों से क्लिटोरिस को कुरेद भी रही थी..





वैशाली इतना जोर जोर से चूस रही थी की उसकी इस हरकत की वजह से राजेश की पूरी चैर आगे पीछे हो रही थी.. वैशाली की मुठ्ठी ने राजेश के लंड को अब ज्यादा जोर से पकड़े रखा था.. दोनों की उत्तेजना अब चरमसीमा पर पहुँचने वाली थी..

तभी, राजेश की केबिन का दरवाजा खुला.. और पिंटू ने अंदर प्रवेश किया.. !!!!

एक पल के लिए तो किसी का भी दिमाग चला नहीं.. जिस वक्त पिंटू ने दरवाजा खोला तब राजेश असामान्य पोजीशन मे कुर्सी पर बैठा हुआ था.. उसकी आँखें बंद थी.. और वैशाली भी आँखें बंद कर बड़े ही चाव से उसके लंड को चूस रही थी.. राजेश के शर्ट के सारे बटन खुले हुए थे.. और बाल भी बिखरे पड़े थे.. उसकी आँखें हवस के कारण लाल लाल हो गई थी..

राजेश सर को ऐसी अवस्था मे देखने के बारे मे पिंटू ने कभी सपने मे भी नहीं सोचा था.. गनीमत थी की वैशाली टेबल के उस तरफ थी इसलिए पिंटू को नजर नहीं आई.. पर केबिन के अंदर की परफ्यूम की खुशबू काफी जानी पहचानी सी लग रही थी पिंटू को.. !!

"ओह्ह सॉरी सर.. !!" कहते हुए उसने केबिन का दरवाजा बंद कर दिया.. वो चाहकर भी टेबल के उस तरफ देख नहीं पाया की वो आखिर कौन था जिसके साथ राजेश सर लगे हुए थे.. !!!

पिंटू की आवाज सुनते ही वैशाली खड़े होने लगी.. राजेश ने उसे पकड़कर नीचे बिठा दिया

"पिंटू ने देख लिया.. जो होना था सो हो गया वैशाली.. अब कुछ नहीं हो सकता.. !!" राजेश ने कहा

वैशाली की सारी उत्तेजना बर्फ की तरह पिघल गई.. उसके चेहरे का सारा नूर एक पल मे गायब हो गया.. रोने जैसी शक्ल हो गई उसकी "सर, उसने मुझे देख लिया होगा तो?? अब क्या होगा??"

राजेश: "चिंता मत कर.. तू टेबल के इस तरफ बैठी थी इसलिए वो तुझे देख नहीं पाया.. !!"

वैशाली बेहद घबरा गई "अब मुझसे और कुछ नहीं हो पाएगा" कहते हुए वैशाली ने फटाफट अपने कपड़े पहनने लगी..

हवस मे अंधे हो चुके राजेश ने उसका हाथ पकड़कर खींचा और उसे धक्का देकर टेबल पर लेटा दिया.. एक ही पल मे उसने वैशाली के चूतड़ों के बीच अपना लंड डाल दिया.. गीली चूत के अंदर घुसने मे लंड को जरा भी तकलीफ नहीं हुई.. !!! एक धक्के मे लंड अंदर डालकर राजेश तेजी से चोदने लगा.. आठ-दस दमदार धक्के लगाकर राजेश वैशाली की चूत के अंदर ही झड़ गया.. सिर्फ दो मिनट मे पूरा खेल खत्म हो गया.. सिर्फ अपने लंड को समझाने के लिए राजेश ने यह खेल खेला था.. उसे पता था की पिंटू के जाने के बाद वैशाली का जरा सा भी मन नहीं होगा.. !!! पर चरमोत्कर्ष के आखरी पलों मे हर कोई अपना कंट्रोल खो बैठता है..








वैशाली ने फटाफट कपड़े पहने और जल्दबाजी मे केबिन से बाहर निकलने लगी

राजेश: "एक मिनट रुक जा यार.. मैं तुझे घर ड्रॉप कर देता हूँ"

राजेश की बात अनसुनी कर वैशाली तुरंत बाहर निकली.. ऑफिस के दरवाजे से वो लगभग दौड़ते हुए सड़क तक आई और तब तक नहीं रुकी जब तक की वो बस-स्टैन्ड तक पहुँच न गई.. !!

वैशाली को पता नहीं था की कोने की दुकान के पास पिंटू खड़े खड़े सिगरेट फूँक रहा था और सोच रहा था "राजेश सर?? इस कन्डिशन मे?? वो भी ऑफिस के अंदर? कौन था उनके साथ?? परफ्यूम तो जाना पहचाना सा था.. !!! कहीं वैशाली तो नहीं होगी उनके साथ.. !!! नहीं.. नहीं.. वैशाली नहीं हो सकती.. मेरी वैशाली ऐसा कर ही नहीं सकती.. अपनी सोच गलत निकले उसके लिए प्रार्थना करते हुए पिंटू ने एक बार आसमान की ओर देखा..

और तभी ऑफिस के गेट से उसने वैशाली को भागते हुए बाहर निकलते देखा.. जैसे पैरों तले से जमीन खिसक गई पिंटू के.. !! कभी सिगरेट नहीं पीने वाले पिंटू को दम पर दम लगाते हुए देखकर टपरी वाला भी स्तब्ध हो गया था..

सिगरेट फेंककर पिंटू ऑटो मे बैठ गया..

दो बस बदलकर घबराई हुई वैशाली घर पहुंची.. वह बेहद टेंशन मे थी.. उसका टेंशन तब जबरदस्त बढ़ गया जब उसने घर पहुंचकर वहाँ पिंटू को ड्रॉइंग-रूम मे बैठे हुए देखा.. !!

शीला और मदन यह देखकर चकित हो गए की वैशाली ने पिंटू से कोई बात नहीं की और अपने बेडरूम मे घुस गई..

शीला सोचने लगी.. क्या हुआ होगा ऐसा.. !!! होगा कुछ.. जवान बच्चे है.. कोई छोटी मोटी नोक-झोंक हो गई होगी दोनों के बीच.. दोनों को एकांत देना चाहिए.. ताकि आराम से बात कर सब सुलझ जाए

शीला: "मदन, मुझे मार्केट से थोड़ा शॉपिंग करना है.. हम दोनों चलते है"

मदन भी समझ गया और बोला "हाँ चलो चलते है.. पिंटू.. तुम आराम से बैठो.. हम दोनों मार्केट होकर आते है"

पिंटू ने खड़े होकर कहा "नहीं.. आप दोनों बैठिए.. मुझे आप से एक जरूरी बात करनी है.. दरअसल मैं वैशाली के आने का ही इंतज़ार कर रहा था.. !!"

पिंटू का गंभीर चेहरा देखकर शीला और मदन टेंशन मे आ गए.. शीला सोचने लगी.. जरूर कुछ बड़ा झमेला हुआ है.. !!

मदन ने सोफ़े पर बैठते हुए कहा "हाँ बताओ बेटा.. क्या बात है?"

पिंटू ने शीला से कहा "आप वैशाली को बाहर बुलाइए.. फिर बात करते है"

चिंतित होकर शीला ने वैशाली को आवाज लगाई "वैशालीईईईई.. बेटा बाहर आना.. पिंटू कुछ बात करना चाहता है"

पर वैशाली न तो बाहर आई और ना ही उसने शीला को कोई जवाब दिया

अब शीला और मदन भी घबरा गए.. अचानक क्या हो गया?? वैशाली बाहर क्यों नहीं आ रही??

मदन: "वैशाली तो बाहर नहीं आ रही.. अब तुम ही बता दो पिंटू.. आखिर बात क्या है?? हमारी कोई भूल हो गई है कोई??"

पिंटू: "आप वैशाली को बाहर बुलाइए.. मैं यहाँ आखिरी बार आया हूँ.. वैशाली को कह दो की बाहर आकर एक आखिरी बार मेरी बात सुन ले.. फिर मैं चला जाऊंगा और कभी वापिस लौटकर नहीं आऊँगा.. !!"

कांप उठे शीला और मदन..!!!!!

मदन ने घबराकर कहा "ये क्या कह रहे हो तुम बेटा?? तुम्हारी शादी की निमंत्रण पत्रिकाएं तक बाँट चुके है हम.. और तुम कह रहे हो की यहाँ आखिरी बार आए हो??"

घबराकर शीला दौड़कर वैशाली के बेडरूम मे गई और उसका हाथ पकड़कर खींचते हुए बाहर ले आई..

वैशाली का रो-रोकर बुरा हाल हो गया था..

उसे देखते ही पिंटू का ज्वालामुखी फटा, उसने कहा "वैशाली.. !!! तूने ऐसा क्यों किया?? मैंने तुझे इतनी मोहब्बत की और बदले मे तूने मुझे क्या दिया?? अब मुझे यह शादी नहीं करनी.. आप सब कान खोलकर सुन लीजिए.. मैं यह शादी नहीं करूंगा.. " फिर शीला-मदन के सामने हाथ जोड़कर पिंटू ने कहा "माफ कीजिए अंकल-आंटी.. पर इस सब के लिए आपकी बेटी जिम्मेदार है"

मदन ने लगभग चिल्लाते हुए कहा "अरे पर कोई मुझे बताएगा की आखिर हुआ क्या है??"

पिंटू ने भी उतने ही क्रोध के साथ कहा "आपकी बेटी से ही पूछ लीजिए.. !!" गुस्से से पैर पटकते हुए पिंटू चला गया

उसके जाते ही पूरे घर मे स्मशानवत शांति छा गई.. !!

फुट-फुटकर रो रही वैशाली की पीठ पर बड़े ही स्नेह से हाथ फेरते हुए मदन ने पूछा "बेटा.. क्या बात है?" वैशाली ने जवाब नहीं दिया और रोती ही रही.. शायद कुछ ऐसी बात थी जो अपने बाप से कहने मे हिचकिचा रही होगी.. यह सोचकर मदन ने शीला को इशारा किया और घर के बाहर चला गया..

अब घर पर शीला और वैशाली दोनों ही अकेले थे.. वैशाली के पास न बताने का और कोई बहाना नहीं बचा था.. !! काफी देर तक रोते रहने के बाद.. बड़ी हिम्मत जुटाकर.. उसने शीला को सब कुछ सच सच बता दिया.. !!

वैशाली की दास्तान सुनकर ही शीला को चक्कर आने लगे.. !!! हे भगवान.. क्या कर दिया इस लड़की ने?? अपनी इज्जत की धज्जियां उड़ते हुए नज़रों के सामने नजर आते ही शीला नर्वस हो गई.. शादी के कार्ड बांटें नहीं होते तो कोई बहाना बना लेते.. पर अब क्या करें? मदन को क्या जवाब दूँगी मैं? क्या हो गया ये.. !!!

उस रात किसी ने खाना नहीं खाया.. सिर्फ कहने के लिए रात थी पर तीनों मे से किसी की भी आँख में नींद नहीं थी..

शीला को कोने मे ले जाकर जब मदन ने पूछा तब शीला ने सिर्फ इतना ही कहा की "हाँ, वैशाली ने कारण बता दिया है.. पर मैं तुझे बता नहीं सकती.. बहोत बड़ा प्रॉब्लेम हुआ है.. और इसका कोई हल नहीं है.. अपनी इज्जत चने के भाव बिक जाना अब तय है मदन.. बहोत बदनामी होगी.. और हाँ.. अब पिंटू किसी भी हाल मे वैशाली से ब्याह करने के लिए तैयार नहीं होगा.. !!"

सुनकर मदन घबराहट के कारण कांपने लगा.. ऐसी क्या बात हुई है जो शीला मुझे नहीं बता सकती?? बाप का दिल था.. घबरा रहा था पर फिर भी अपनी बेटी की फिक्र कर रहा था.. उसे डर था की कहीं वैशाली कोई गलत कदम न उठा ले.. !! कारण जानने से ज्यादा जरूरी था वैशाली का इस नाजुक समय मे ध्यान रखना..

वैशाली का ध्यान रखने के लिए मदन ने शीला को उसके बेडरूम मे सोने भेज दिया और खुद अकेले ही सो गया..

अकेले बेड पर लेटे हुए मदन का दिमाग शांत ही नहीं हो रहा था.. ऐसा तो आखिर क्या हुआ है? कहीं वैशाली ने कोई गलत कदम तो नहीं उठा लिया.. !! वैशाली ऐसा कर तो नहीं सकती पर क्या पता.. कहीं कोई उसे ब्लैकमेल कर रहा हो.. !! कहीं संजय तो लौटकर नहीं आ गया?? इन विचारों ने मदन की नींद हराम कर दी

वैशाली के बेडरूम मे..

शीला ने गुस्से से काँपते हुए वैशाली को कहा "देख बेटा.. गलती तो तूने बहोत बड़ी कर दी है.. और तू रंगेहाथों पकड़ी भी गई.. अब पिंटू कभी तुझ पर विश्वास नहीं करेगा.. और उस बेचारे की कोई गलती भी नहीं है.. !! जिस विश्वास को हासिल करने मे एक उम्र लग जाती है.. उसे टूटने मे तो एक पल भी नहीं लगता.. यह सब तुझे भुगतना ही पड़ेगा.. कुछ दिन गुजरने दे.. अभी पिंटू से बार करके कोई फायदा नहीं है.. वो बहोत गुस्से मे है.. थोड़े टाइम के बाद सब शांत हो जाएगा.. दिक्कत ये है की हमारे पास अब ज्यादा दिन का समय ही नहीं है.. तू कोई ऐसा तरीका सोच जीससे तू चंद दिनों मे ही पिंटू का विश्वास फिर से जीतकर उसे मना सकें.. !!"

वैशाली ने रोते हुए कहा "मम्मी, मुझसे बहोत बड़ी गलती हो गई है.. अब मैं पिंटू की नज़रों का सामना भी कैसे करूँ??"

शीला: "वैशाली, पिंटू समझदार लड़का है.. एक बार हमें कोशिश तो करनी ही होगी"

वैशाली: "वो कभी भी दिल से मुझे माफ नहीं कर पाएगा मम्मी.. !!"

शीला: "हमारे इस पुरुष प्रधान समाज की यही तो विडंबना है बेटा.. मर्द चाहें दस लड़कियों के साथ घूम ले.. कोई कुछ नहीं कहता.. पर अगर उसे पता चले की उसकी बीवी किसी के साथ फोन पर मेसेज कर रही है तो बस खत्म.. बात तलाक तक पहुँच जाएगी.. मर्द कितना भी दिलफेंक और अईय्याश क्यों न हो अपनी बीवी की एक गलती माफ नहीं करता है.. पिंटू को मनाने के लिए तुझे अपनी जान लगा देनी होगी बेटा..!!"

रोते हुए वैशाली ने कहा "अगर पिंटू चला गया तो उसके जैसा और कोई मुझे कभी नहीं मिलेगा मम्मी.. वो लड़का करोड़ों मे एक है.. मैं ही उसके लायक नहीं हूँ.. अगर पिंटू मेरी यह एक गलती माफ करने को राजी हो जाएँ.. तो मैं ज़िंदगी भर उसकी ग़ुलामी करने को तैयार हूँ और फिर कभी ऐसी गलती नहीं दोहराऊँगी"

शीला: "तेरा पछतावा और पश्चाताप अगर सच हुआ तो पिंटू तुझे मिलकर ही रहेगा.. फिलहाल अब तू वैसा कर जैसा मैं तुझे कहती हूँ"

शीला ने आँखें बंद की.. मन ही मन अपनी बेटी के भविष्य के लिए.. अपनी इज्जत बचाने के लिए.. ऊपर वाले से मन्नत मांगी.. और फिर वैशाली को समझाते हुए बोली "तू पिंटू को मेसेज कर और जो भी हुआ उसके लिए सॉरी बोल.. और आगे फिर कभी ऐसा नहीं होगा उसकी गारंटी दे.. कुबूल कर की तुझसे बहोत बड़ी गलती हो गई है.. जब तक पिंटू का दिल पिघलता नहीं है तब तक तुझे ये करते रहना पड़ेगा.. इस दौरान तू उससे कॉल भी करते रहना.. अगर फोन न उठाए तो मेसेज कर.. वो रिप्लाय करे या नआ करे.. पर तू रुकना मत"

वैशाली ने तुरंत फोन उठाया और पिंटू को कॉल किया.. जाहीर से बात है की पिंटू ने फोन नहीं उठाया.. शीला की सीख के अनुसार उसने मेसेज किया..

वैशाली: "मम्मी, मुझे लगता है की तुम सही कह रही हो.. अपने जुर्म का एकरार करने के बाद मुझे अच्छा महसूस हो रहा है.. पिंटू के बगैर मैं एक पल भी नहीं रह सकती.. अगर पिंटू मुझे नहीं मिला तो जीने का कोई फायदा नहीं है.. उससे अच्छा तो वही होगा की मैं मर जाऊँ.. अब तो १४ फरवरी को या तो मेरी डोली निकलेगी या फिर मेरी अर्थी.. "

शीला की आँखों से आँसू टपक पड़े.. उसकी आँखों में भी पश्चाताप और की कुबूलनामे नजर आ रहे थे.. !! मन ही मन मे उसने ईश्वर के आगे गुहार लगाई.. अपनी बेटी के जीवन मे ये जो पहाड़ जैसी समस्या आ पड़ी है उसके निराकरण के लिए वो प्रार्थना करने लगी..

इन्ही विचारों मे उसकी आँख लग गई.. वो इतना सोई की सुबह दूध लेने के लिए भी नहीं जागी.. मदन ने उठकर दूध लिया..

सुबह जागकर शीला ने कविता को फोन लगाया और सारी बात बताई..

शीला: "कविता, पिंटू तेरा पुराना प्रेमी था.. मुझे पता है.. जो काम दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती वो प्यार ही करवा सकती है.. तू कुछ भी कर पर पिंटू को समझा.. जरूरत पड़े तो यहाँ आ जा.. पर इस प्रश्न का हाल जल्द से जल्द ढूँढना होगा वरना हमारी इज्जत का जनाज़ा निकल जाएगा.. चौदह फरवरी को ज्यादा दिन नहीं बचे है.. मेरेज हॉल बुक हो गया है.. केटरिंग के पैसे भी दे दिए है.. कार्ड बाँट दिए है हमने.. अब अगर शादी नहीं हुई तो हम किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं बचेंगे" रोते रोते शीला ने कहा

बात की गंभीरता को समझकर, कविता, मौसम और फाल्गुनी उसी दिन शीला के घर पहुँच गए.. वैसे भी कुछ दिनों के बाद शादी के लिए आना ही था..

पूरा दिन बैठकर सब ने वैशाली की इस समस्या के बारे मे गंभीरता से सोचा.. और सब अपना अपना योगदान देने लगे

कविता ने सब से पहला काम पिंटू से मिलने का किया.. अपने पुराने घर के बंद कमरे मे दोनों मिलें..

कविता: "तुम मुझसे कितना प्यार करते हो पिंटू?"

पिंटू: "करता था कविता.. अब तो मैं वैशाली को प्यार करता हूँ.. अरे.. वो भी अब कहाँ रही.. !! अब तो मैं किसी से प्यार नहीं करता.. बल्कि प्यार शब्द पर से मेरा विश्वास ही उठ गया है"

कविता: "यार, इतना समझदार होने के बावजूद तो वैशाली की एक गलती माफ नहीं करेगा.. !!! मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूँ पिंटू, प्लीज.. !!"

पिंटू की आँखों से आँसू बहने लगे.. वो बोल "कविता, मुझे पता नहीं चल रहा की मेरे प्यार में ऐसी कौन सी कमी रह गई जो वैशाली को ऐसा करना पड़ा.. !! मैं समझदार हूँ यह मेरा कोई गुनाह तो नहीं है ना.. !!"

कविता: "नहीं यार.. तू समझदार है इसलिए तो मैं तुझसे प्यार करती थी.. और इसीलिए वैशाली भी तेरे पीछे पागल है.. !!"

पिंटू: "और इसीलिए उसने राजेश सर के साथ ये सब किया??"

कविता: "पिंटू, सिर्फ एक गलती के बलबूते पर तू किसी के चारित्र को खराब मानने की गलती मत कर.. मैं कुबूल करती हूँ की वैशाली ने बड़ी ही गंभीर गलती की है.. गलती क्या.. मैं तो कहूँगी की अपराध किया है.. !! पर वो माफी भी तो मांग रही है.. उसे पछतावा है अपनी गलती का.. तू शांत होकर एक बार सोच.. वैशाली जवान है.. उसे भी पुरुष का साथ चाहिए.. अब एक पल की उत्तेजना के कारण, अगर उसका पैर फिसल गया तब अगर तुम सहारा नहीं दोगे तो कौन देगा.. !! तुझे तो पता है की उसके पहले पति से कितनी दुखी थी वो बेचारी.. !!!"

पिंटू: "वो जो कुछ भी हो कविता.. वैशाली को ऐसा नहीं करना चाहिए था.. !!"

कविता: "वैशाली आज भी तुझे उतना ही प्यार करती है पिंटू.. और यह हकीकत है"

पिंटू: "मुझे नहीं, वो राजेश सर से प्यार करती है"

कविता: "ऐसा लगता है तुझे..!!! तो फिर ये सुन.. !!" कहते हुए कविता ने अपने मोबाइल का रिकॉर्डिंग सुनाया.. पिछली रात जब वैशाली उससे रोते हुए ये कह रही थी की १४ फरवरी को अगर उसे पिंटू नहीं मिला तो वो जहर खा लेगी..

सुबक सुबककर रोती वैशाली की आवाज सुनकर पिंटू व्यथित हो गया..

पिंटू: "ऐसे काम ही क्यों करना जिनके कारण ऐसे रोना पड़े?" पिंटू थोड़ा सा नरम जरूर हुआ पर वो अभी भी अपनी बात पर अड़ा हुआ था..

कविता ने बात को खत्म करने के इरादे से कहा "देख पिंटू.. मैं तुझे ज्यादा फोर्स नहीं करूंगी.. तेरी लाइफ है, तुझे जो ठीक लगे वही करना.. मैं कौन होती हूँ तुम्हारी लाइफ मे दखल देने वाली.. !! पर वैशाली को मैं बेहद नजदीक से जानती हूँ.. मुझे अगर ये गलती उतनी बड़ी लगती तो मैंने ही तुझे शादी करने से मना कर दिया होता.. पर सिर्फ इस एक गलती के लिए तू शादी केन्सल कर रहा है, ये बात मुझे कुछ ठीक नहीं लग रही.. तुम दोनों की जोड़ी कितनी सुंदर लगती है..!! दोनों मेईड फॉर इच अधर हो.. इसलिए एक आखिरी बार तुझे रीक्वेस्ट करूंगी.. तू बहोत समझदार है.. आज तक मैंने तुझसे कुछ भी नहीं मांगा.. अगर तूने कभी मुझसे इतना सा भी प्यार किया हो तो मेरे खातिर वैशाली को अपना ले.. अगर वो लड़की कोई गलत कदम उठा लेगी तो हम सब पूरी ज़िंदगी पछताते रहेंगे.. किसी भी समस्या को जीवन-मरण का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए, ये तूने ही मुझे सिखाया है ना..!!"

पिंटू: "ये समझदार लोगों के हिस्से मे ही हर बार भुगतना क्यों लिखा होता है कविता?? मेरी समझदारी ही अब मुझे थकाने लगी है.. नासमझ लोग अपनी मर्जी के हिसाब से जी रहे है.. गलती कर रहे है.. और भुगतना मुझ जैसे लोगों को पड़ रहा है.. इसी समझदारी के कारण मैं तुझे खो बैठा.. अब मुझे नहीं बनना समझदार"

कविता: "ऐसा नहीं है पिंटू.. जिस समझदारी के चलते तूने मुझे छोड़ा है.. आज वही समझदारी तूने न दिखाई तो तू मुझे हमेशा के लिए गंवा बैठेगा.. मैंने कितने आत्मविश्वास के साथ शीला भाभी और वैशाली से कहा था की पिंटू जैसा लड़का आपको कहीं नहीं मिलेगा.. और वो वैशाली की गलती भूलकर उसका स्वीकार करेगा.. खैर.. हम आज शाम को फिर से मिलेंगे.. तब तक तू मेरी बातों पर गौर करना" कहकर कविता उठ गई और बाहर आ गई

कविता ने अपनी और पिंटू की इस सारी बात को मोबाइल पर रेकॉर्ड कर लिया था.. उस दोपहर को उसने वह पूरा रिकॉर्डिंग वैशाली, शीला, मौसम और फाल्गुनी को सुनाया.. पिंटू की सारी बातों से सब सहमत थे.. उस शाम पिंटू से दोबारा होने वाली मीटिंग मे मौसम और फाल्गुनी को भी शामिल करने का तय किया गया.. वैशाली को फिलहाल इन सब से दूर ही रखने का फैसला किया गया.. उसकी तबीयत खराब हो गई थी.. बुखार से उसका बदन तप रहा था.. पिंटू और वैशाली की शादी पर अब भी तलवार लटक रही थी.. सब अपने अपने तरीके से इस रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे.. पर किसी के पास भी ऐसा कोई फेविकोल नहीं था जिससे पिंटू का टूटा हुआ दिल जुड़ सकें..!!

एक तरफ कविता पिंटू को रिझाने के प्रयत्नों मे जुटी हुई थी.. तब शीला, रेणुका को लेकर राजेश की ऑफिस मिलने पहुँच गई.. मदन को इस पूरे झमेले से दूर ही रखा गया था.. रेणुका और शीला को एक साथ ऑफिस मे देखकर राजेश को काफी आश्चर्य हुआ..

राजेश कुछ सोच या समझ पाता उससे पहले रेणुका ने केबिन का दरवाजा बंद किया और बरस पड़ी "राजेश, तेरी एक गलती के कारण वैशाली की ज़िंदगी जहर बन चुकी है, कुछ पता भी है तुझे?? पिंटू ने तुम दोनों को साथ देख लिया और अब वो शादी करने से इनकार कर रहा है.. कुछ ही दिन बचे है शादी को.. पता है कितना बड़ा प्रॉब्लेम हो गया है तेरे कारण?"

राजेश-रेणुका और शीला-मदन के बीच फ्री सेक्स का दौर इतना आगे बढ़ चुका था की राजेश ने वैशाली के साथ ऐसा क्यों किया, उसका जिक्र भी कोई कर नहीं रहा था.. बस, इस आ पड़ी विपदा का हल ढूँढने मे ही सब लगे पड़े थे

राजेश: "हाँ यार.. मेरी भूल हो गई.. रेणुका, मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था की ऐसा कुछ हो जाएगा.. पर अब जो हो गया उसे बदल भी तो नहीं सकते"

शीला: "राजेश, कुछ भी कर पर पिंटू को शादी करने के लिए मना ले.. वरना वैशाली अपनी जान दे देगी.. हम तो किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहे"

राजेश ने व्यथित होकर कहा "यह सब मेरे कारण हो रहा है इसका मुझे बेहद दुख है भाभी"

रेणुका: "फिलहाल दुख व्यक्त करने का समय नहीं है राजेश.. तुम्हें जल्द से जल्द पिंटू को समझाना होगा"

राजेश: "ठीक है.. आप लोग बुलाइए पिंटू को.. मैं मिलने के लिए तैयार हूँ"

उसके बाद वाले दिन रेणुका ने पिंटू को मिलने अपने घर बुलाया.. तब शीला और राजेश भी वहाँ मौजूद थे

राजेश ने सब से पहले पिंटू से माफी मांगते हुए कहा "मेरी बात ध्यान से सुन पिंटू.. फिर तुझे जो निर्णय लेना हो वो लेना.. तूने उस रात जो कुछ भी देखा उसमें वैशाली का ज्यादा दोष नहीं था.. हम दोनों के बीच ये पहली बार हुआ.. और गलती मेरे कारण ही हुई थी.. मैं ही होश खो बैठा और जो नहीं करना चाहिए था वो कर दिया.. तू ऐसा मत सोचना की हम दोनों के बीच ये रोज रोज होता है.. !! ये पहली और आखिरी बार हुआ था.. और वो भी मेरी हवस के कारण.. वरना वैशाली ऐसी लड़की है ही नहीं.. मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ.. और भीख माँगता हूँ.. मेरी गलती की सजा मुझे दे.. पर वैशाली को इतनी बड़ी सजा मत दे.. !!" कहते हुए राजेश की आँखों में आँसू आ गए

पिंटू थोड़ा सा पिघल रहा था पर उसके चेहरे पर अब भी दृढ़ निश्चय के हाव भाव देख शीला ने आखिरी दांव खेला

शीला: "पिंटू, मैं यह बात निकालना तो नहीं चाहती थी पर अब कोई उपाय नहीं बचा इसलिए कह रही हूँ.. तुझे तो याद ही होगा की मैंने अपने घर तेरे और कविता के मिलने का सेटिंग किया था.. !! उस दिन सेक्स के पाठ सीखने के बहाने तुमने मेरे और मेरी सहेली चेतना के साथ सेक्स किया ही था ना.. !! ये जानने के बावजूद क्या मैंने तुम्हारे और वैशाली के रिश्ते के लीये मना किया?? नहीं किया.. !!! क्यों?? क्योंकि सिर्फ एक घटना के आधार पर, मैं किसी इंसान के चारित्र का मूल्यांकन नहीं करती.. !!! ये तो तुमने देख लिया इसलिए की यह सब हो रहा है.. सोचों, अगर तुम्हारी पीठ पीछे वैशाली यह सब कर रही होती तो?? उसने अपनी गलती मान ली है और दोबारा कभी ऐसी गलती न दोहराने का वचन भी दे रही है.. फिर तुम इस बात को इतना क्यों खींच रहे हो?? जवानी के जोश में वैशाली से गलती हो गई पर जिस्म की भूख इंसान के दिमाग को बंद कर देती है ये तुम नहीं जानते क्या?? अगर तुम कविता को दिल से चाहते थे.. तो उस दिन, मेरे और चेतना के साथ तुम्हारा खड़ा कैसे हो गया?? मैं ये नहीं कह रही की इसमे तुम्हारी कोई गलती थी.. बस इतना कहना चाहती हूँ की जिस्म की भूख के आगे अक्सर इंसान बेबस हो जाता है.. !! जैसे तुम्हारी उस गलती के बावजूद मैंने वैशाली के लिए तुम्हारा स्वीकार किया वैसे ही मैं चाहती हूँ की वैशाली की इस गलती को भूलकर तुम भी उसे अपना लो"

शीला की बात सुनकर पिंटू स्तब्ध और चुप हो गया

शीला: "और अगर फिर भी अगर तुम वैशाली को माफ करना न चाहो तो इंसानियत के नाते हमारी एक मदद करो.. सब कुछ तय हो चुका है.. कार्ड्स भी बंट चुके है.. तुम एक बार वैशाली से शादी कर लो. और फिर अगर तुम को ऐसा लगे तो तुम वैशाली को डीवोर्स दे देना.. हालांकि वैशाली तुम्हें ऐसा मौका ही नहीं देगी.. बस इतनी मदद कर दो.. मैं जीवन भर तुम्हारे एहसान तले दबी रहूँगी.. !!"

रेणुका: "एक पल की उत्तेजना वर्षों के विश्वास को नष्ट कर देती है पिंटू.. फ्रेंकली कहूँ तो यह रास्ता है ऐसा फिसलन भरा है.. राजेश और वैशाली की इस एक गलती को माफ कर दो प्लीज.. !!"

पिंटू: "मैडम, ये सब कहना आपके लिए जितना आसान है.. उतना ही मेरे लिए करना मुश्किल है"

रेणुका: "मैं समझ सकती हूँ पिंटू.. पर इस बार दिल बड़ा रखकर वैशाली को माफ कर दो.. मैं गारंटी देती हूँ की आगे से तुम्हें शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा"

पिंटू आखिर पिघला "ठीक है.. मैं वैशाली के साथ एक बार मीटिंग करने के लिए तैयार हूँ.. पर अकेले मे नहीं.. सब के सामने"

रेणुका: "मंजूर है पिंटू.. हमें सब मंजूर है.. !! बस इतनी रीक्वेस्ट है की उसके साथ तुम ज्यादा कठोरता से पेश मत आना, प्लीज.. !!"

पिंटू: "कठोर तो मैं जरूर बनूँगा मैडम.. आप और मम्मी जी भी कुछ कम नहीं हो.. मुझे आप लोगों के काफी सारे गुलछर्रों के बारे मे पता है.. पर इतना याद रखना.. जिस दिन किस्मत ने साथ देना बंद कर दिया.. उस दिन आप न घर के रहोगे न घाट के.. अभी भी वक्त है.. सुधर जाइए आप सब..!! यह रास्ता ठीक नहीं है.. और हाँ.. !! ऐसा नहीं है की मुझे सिर्फ चारित्रशील लड़की चाहिए.. मुझे ऐसे परिवार से लड़की चाहिए जहां सब चारित्रवान हो.. परिवार के सिर्फ एक व्यक्ति की बदचलनी का क्या परिणाम आता है, ये तो आप सब ने मौसम के केस मे देख ही लिया है.. ज्यादा नहीं कहूँगा.. पर इतने मे आप सब समझ जाएँ तो बेहतर होगा.. !! मैं वैशाली की ज़िंदगी और आपकी इज्जत बचाने की इस सौदे में, आपके पास सिर्फ वैशाली की ईमानदारी ही नहीं.. पूरे परिवार की ईमानदारी की अपेक्षा रखता हूँ.. अगर यह मंजूर हो तभी यह रिश्ते की डोर आगे बढ़ पाएगी.. वरना आप जैसों के लिए संजय जैसा दामाद ही ठीक था"

पिंटू नॉन-स्टॉप बोले जा रहा था.. फिलहाल शीला कटघरे मे थी इसलिए जवाब नहीं दे पाई.. पिंटू की बात सुनकर उसकी नजरें झुक गई

यह देखकर पिंटू फिर शुरू हो गया "मम्मी जी, अगर बड़े ही ऐसे काम करेंगे जिससे आँखें झुका लेनी पड़े, तो बच्चे तो ऐसे काम करेंगे ही.. !! वैशाली की गलती का मूल कारण ढूँढोगे तो आप और पापा जी के अंदर, कहीं न कहीं मिल ही जाएगा"

आज शीला की आँखें खुल गई.. जिस पिंटू के साथ एक समय पर, उसने और चेतना ने भरपूर चुदाई की थी, वह आज उसका दामाद बनने जा रहा था.. और अपने शब्दों के बाणों से बींधता चला जा रहा था

पिंटू: "सुधरने का मौका हर किसी को ईश्वर एक बराबर ही देता है.. व्यक्ति उसका कितना उपयोग करता है यह देखना जरूरी है.. अभी भी वक्त है मम्मी जी, सुधर जाइए.. अपने सारे गोरख धंधे बंद कर दीजिए.. तभी मैं वैशाली का स्वीकार करूंगा"

यह सुनते ही शीला पिंटू के पैर में पड़ गई..

रोते हुए शीला ने कहा "आज से.. बल्कि अभी से.. मैं तुम्हें वचन देती हूँ.. की आज के बाद सब कुछ बंद कर दूँगी पिंटू.. तुम जो कहोगे वो सब मानने के लिए तैयार हूँ.. बस मेरी बेटी की ज़िंदगी बचा लो.. " कहते हुए शीला फुट-फूटकर रोने लगी

पिंटू ने शीला को रोने दिया.. शीला के शब्दों में सच्चाई की खनक सुनाई दी उसे.. शीला के आंसुओं मे पश्चाताप की परछाई नजर आई उसे..

कुछ देर के बाद, पिंटू ने शीला को कंधों से पकड़कर खड़ा किया और कहा "मम्मी जी, अब चलें.. !! वैशाली को भी यह खुशखबरी सुना देते है

सुनकर शीला की आँखों मे अब खुशी के आँसू उमड़ आए.. राजेश ने खुश होकर रेणुका को गले लगा लिया.. और पिंटू की पीठ थपथपाने लगे..

राजेश: "चलो अब देर नहीं करनी चाहिये.. जल्दी से घर पहुंचते है और सबको यह खुशखबरी देते है"

चारों रेणुका की कार मे शीला के घर पहुंचे..

अंदर जाते ही सब ने देखा.. वैशाली सोफ़े पर बीमार लेटी हुई थी और एक डॉक्टर उसकी जांच कर रहा था.. उनके इर्दगिर्द मदन, कविता और फाल्गुनी चिंतित होकर खड़े थे.. किसी का भी ध्यान इन चारों पर नहीं गया

डॉक्टर: "एक सौ दो जितना बुखार है.. मुझे इंजेक्शन देना पड़ेगा"

पीछे से पिंटू ने कहा "रुकिए सर.. इंजेक्शन देने की कोई जरूरत नहीं है.. असल में हम दोनों के बीच हुए मन-मुटाव के कारण यह बीमार हो गई है.. इसका जिम्मेदार मैं हूँ.. अब मुझे ही इसका इलाज करने दीजिए.. "

डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा "जैसा आप चाहें.. वैसे, ऐसा मन-मुटाव होना ही नहीं चाहिए जिसके कारण कोई इतना बीमार हो जाए.. !! मेरे लिए भी यह देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा की बिना किसी इलाज के मरीज कैसे ठीक हो सकता है"

सब के आश्चर्य के बीच, पिंटू वैशाली के सिर के पास बैठ गया.. और उसके माथे पर बड़े ही प्यार से सहलाते हुए बोला "वैशु.. आई एम सॉरी.. माफ कर दे मुझे, जो मैं तुझे छोड़कर चला गया था.. अब मैं वापिस आ गया हूँ.. प्लीज.. जल्दी जल्दी ठीक हो जा.. वादा करता हूँ, आज के बाद कभी तुझे हर्ट नहीं करूंगा.. !!"

इस बेहद भावुक द्रश्य को जितने भी लोग देख रहे थे.. सब की आँखों मे आँसू थे.. सिर्फ उस डॉक्टर को छोड़कर.. !! कविता एक ट्रे मे डॉक्टर और पिंटू के लिए कॉफी लेकर आई.. और तब तक प्रेम की संजीवनी ने वैशाली के बुखार को ही नहीं.. उसकी उदासी को भी गायब कर दिया..!! वैशाली की आँखों से पश्चाताप के आँसू सावन-भादों की तरह बह रहे थे.. लेटी हुई वैशाली को बैठाकर पिंटू ने उसे कॉफी पिलाई..

कॉफी का एक सीप लेने के बाद थोड़ी सी सामान्य होते हुए वैशाली ने कहा "थेंक्स पिंटू.. आई लव यू.. मुझे माफ कर दे.. दोबारा ऐसा कभी नहीं होगा.. " कहते हुए वो पिंटू के कंधे पर सर रखकर रोने लगी..

कविता उसे शांत करने गई पर उसे डॉक्टर ने रोक लिया "अरे मैडम.. आप देख नहीं रही?? ट्रीटमेंट चल रही है.. उन्हे रोकिए मत.. प्यार एक ऐसी दवाई है जिससे मरीज तो क्या.. मरा हुआ आदमी भी खड़ा हो सकता है" एक स्माइल देकर डॉक्टर ने अपना बेग उठाया और चला गया


चौदह फरवरी को वैशाली की शादी बड़ी ही धूमधाम के साथ पिंटू से हो गई.. तरुण और फोरम ने भी अपने प्यार के डॉक्युमेंट्स पर दस्तखत कर दिए.. मौसम और विशाल भी एक हो गए.. सिर्फ फाल्गुनी और कविता.. पास खड़े रहकर.. फेरों के बीच की अग्नि की ज्वाला को शून्यमनस्क होकर देखते रहे.. !! शादी की विधि मे जलाए जाते अग्नि से कई सपने साकार होते है.. पर उसके साथ साथ कई सपने जलकर राख भी हो जाते है.. यह कोई नहीं जानता था.. सिवाय फाल्गुनी और कविता के.. !!!

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