Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 30 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

वैशाली की शादी हो गई.. पीयूष की जिद पर, पिंटू को अपने किराये का मकान छोड़कर, वैशाली के साथ उनके पुराने घर, रहने आना पड़ा.. वैशाली को बिदा करते वक्त जब मदन कोने मे खड़ा रो रहा था तब पीयूष ने यह पेशकश की.. पीयूष का पुराना घर, जो मदन के घर के बगल में ही था, वह खाली पड़ा था.. पीयूष का कहना था की अगर पिंटू और वैशाली वहाँ रहने आ जाते है तो उनका किराया भी बच जाएगा और वैशाली उनकी आँखों के सामने भी रहेगी.. साथ ही साथ उनके घर की देखभाल भी होती रहेगी..

पीयूष के इस प्रस्ताव को मदन उपकारवश होकर सुन रहा था.. उसने खुशी खुशी हाँ कहने से पहले, वैशाली और पिंटू की इस बारे में राय जानकर जवाब देने का फैसला किया.. जब पिंटू ने यह बात जानी तब उसे कोई एतराज नहीं था.. उसने कसम देकर पीयूष को किराया लेने के लिए कहा पर पीयूष ने साफ इनकार कर दिया.. फिर मदन ने भी आग्रह किया तब पिंटू को आखिर मानना ही पड़ा..

इन सब बातों को बड़ी ही शांति से सुनते हुए शीला ने मौन रहना ही पसंद किया.. ऐसा नहीं था की शीला वैशाली को अपने करीब रखना नहीं चाहती थी, पर एक विचित्र सी झिझक उसे अस्वस्थ कर रही थी.. क्या कारण था, शीला खुद भी नहीं जानती थी.. पर जाहीर सी बात थी.. जिस तरह की स्वतंत्र ज़िंदगी जीने की वो आदि हो चुकी थी, वैशाली और पिंटू के पड़ोस मे रहने से, वह स्वतंत्रता उसे नहीं मिलने वाली थी

वैशाली की उस गंभीर गलती के बाद, पिंटू ने उसी शर्त पर शादी के लिए हाँ कही थी की वैशाली के साथ साथ उसके परिवार के सारे सदस्य भी बदचलनी से दूर रहे.. जाहीर था की उसका इशारा शीला की ओर ही था.. शीला की काफी सारी हरकतों से परिचित वैशाली ने भी शीला को अपनी पुरानी हरकतें छोड़ देने की हिदायत दी थी..

शीला के अधिकतर कारनामे तो उसके घर पर ही होते थे.. फिर वो रसिक के साथ हो, जीवा-रघु के साथ हो, रूखी के साथ हो या राजेश के साथ.. शीला जानती थी की पिंटू की नजर हर वक्त उस पर रहेगी और उसके पास अब सति-सावित्री बने रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.. चाहती तो वो भी नहीं थी की उसके कर्मों की सजा बेचारी वैशाली को मिलें.. वैसे भी वैशाली काफी भुगत चुकी थी.. कुछ अपनी गलतियों की वजह से और कुछ खराब पात्र से शादी की वजह से..

पिंटू ने अब वापिस नौकरी पर जाना शुरू कर दिया था.. लेकिन वैशाली की जिद के बावजूद उसने उसे नौकरी वापिस जॉइन नहीं करने दी.. वो अब वैशाली और राजेश के बीच दूरी बनाए रखना चाहता था.. राजेश अब पिंटू से नजरें चुराता रहता था यह पिंटू को पता था.. वो भी अब नई नौकरी की तलाश में था ताकि इस असाहजीक वातावरण से दूर जा सकें.. !!

शीला अब बेहद चौकन्ना रहती थी.. उसने रसिक को पहले ही बता दिया था सारी परिस्थिति के बारे में.. ताकि सुबह दूध देते समय रसिक अनजाने में कोई गलती न कर बैठे.. सुबह पाँच बजे ही पिंटू अपने घर के बरामदे मे आकर कसरत करता था..और तब तक बाहर रहता जब तक रसिक दूध देकर चला नहीं जाता.. शीला को पता था की उस पर नजर रखी जा रही थी.. शीला के लिए आस पास मुंह मारना असंभव सा हो गया था.. अपनी गलती के कारण वैशाली की शादी खतरे में पड़ जाने से शर्मिंदा राजेश भी अब शीला के घर आता नहीं था.. शीला की अईयाशी के सारे रास्ते बंद हो गए थे

तो दूसरी तरफ मदन की भी हालत खराब थी.. रूखी को अब घर बुला नहीं सकता था.. रेणुका के घर जाकर कोई फायदा नहीं था क्योंकि वह पेट से थी.. पिंटू ने ऐसे फँसाया था शीला और मदन को, की दोनों के पास, वैवाहिक संभोग के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं बचता था..

अवैद्य और अवैवाहिक संभोग का शीला को ऐसा चस्का लग चुका था की वो बिना कोकेन के तड़प रहे ड्रग-एडिक्ट की तरह तड़पती रहती.. उसका शातिर दिमाग हर रोज नई योजना बनाता पर फिर वैशाली के संसार की याद आते ही वो अपनी किसी भी योजना का अमल नहीं कर पाती थी..






इस तरफ मौसम और विशाल की शादी भी हो चुकी थी.. पीयूष ने अपने बिजनेस की एक ब्रांच ऑफिस बेंगलोर में खोलने का फैसला किया और वहाँ का सारा कारोबार विशाल और मौसम को संभालने के लिए सौंप दिया.. मौसम और विशाल दोनों ही बेंगलोर शिफ्ट हो गए..

मौसम के जाने के बाद, अब रमिलाबहन घर पर अकेली हो गई थी..वैसे कविता का घर ज्यादा दूर तो नहीं था और कविता दो-तीन दिनों में एक बार अपनी माँ से मिलने भी चली आती थी पर रमिलाबहन के घर का काम संभालने के लिए कविता ने एक नौकर नियुक्त कर दिया था..

मौसम की शादी की जिम्मेदारी निपटते ही, पीयूष फिर से अपने कारोबार को संभालने में व्यस्त हो गया.. कुछ महीनों के पीयूष के साथ के बाद अब कविता फिर से अकेली हो चुकी थी.. पहले तो वो मौसम के साथ बातें करके अपना दिल हल्का कर लेती थी लेकिन अब तो मौसम भी जा चुकी थी.. हाँ, फाल्गुनी अब कभी आती जाती रहती थी.. और कविता के बेडरूम मे दोनों अक्सर अपनी आग बुझा भी लेते थे.. लेकिन उन्हें जो चाहिए था.. वो नहीं मिल पा रहा था.. !!!






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एक दिन सुबह सुबह, मदन राजेश से मिलने गया था.. शीला घर पर अकेली थी और तभी रसिक का फोन आया

मोबाइल स्क्रीन पर रसिक का नाम देखकर, शीला ने पहले तो मोबाइल साइलेंट कर दिया.. बगल वाले पिंटू के घर पर नजर डाली.. वैसे इस वक्त पिंटू ऑफिस के लिए निकल चुका होता है ये पता होने के बावजूद शीला ने घर के उस तरफ की खिड़की बंद कर दी और फिर बेडरूम मे चली गई.. तब तक मिसकोल हो चुका था

शीला ने बिस्तर पर बैठकर रसिक को फोन लगाया

शीला: "हाँ बोल रसिक.. क्या काम था?"

रसिक: "भाभी, आप का मुझे कौन सा काम होता है.. !! आपको तो पता है ही.. फिर पूछती क्यों हो??"

शीला ने एक लंबी गहरी सांस ली.. वो समझ रही थी की रसिक क्या कहना चाहता था.. आग तो शीला के जिस्म को भी झुलसा रही थी.. पर वो क्या करती.. !!

शीला: "जानती हूँ रसिक, पर मैं क्या करूँ? तुझ से ज्यादा तो मैं बेचैन हूँ.. !! पर तुझे पता तो है.. मेरे दामाद के रहते हुए कुछ भी करना मुमकिन नहीं है..!!"

रसिक: "अरे भाभी, वो तो नौकरी पर चला जाता है.. फिर क्या दिक्कत है? दिन के समय तो मिल ही सकते है.. और वैसे भी साहब को तो सब पता ही है.. फिर आप क्यों नहीं बुलाती मुझे??"

शीला: "तू समझ रहा है उतना आसान नहीं है रसिक.. मेरा दामाद नौकरी जाता है पर वैशाली तो घर पर ही होती है ना.. और वैसे मदन और वैशाली को सब पता है लेकिन उनके कहने पर ही मैं तुझ से दूर रह रही हूँ.. वो चाहते है की मैं ऐसा कोई भी कदम न उठाऊँ जिससे की मेरे दामाद को उंगली उठाने का मौका मिले.. और मैं भी नहीं चाहती की वैशाली के जीवन में, मेरी किसी हरकत की वजह से कोई बाधा आए"

रसिक परेशान होकर बोला "अगर घर पर मुमकिन नहीं है तो खेत पर चले आइए.. यहाँ पर तो आपके दामाद को पता नहीं चलेगा"

शीला: "समझने की कोशिश कर रसिक.. दामाद को पता नहीं चलेगा पर मदन को तो पता चल ही जाएगा ना.. !! झूठ बोलकर निकलूँगी फिर भी उसे भनक लग जाएगी"

रसिक ने अपना माथा पीटते हुए कहा "फिर क्या करूँ भाभी?? अब तो मुझसे रहा ही नहीं जाता.. दो महीने हो गए"

शीला: "साले तेरी बीवी मर गई है क्या?? रूखी पर चढ़कर अपनी भड़ास निकाल ले"

रसिक: "वही तो रोना है भाभी.. अपने भाई की शादी के लिए एक महीने से मायके जाकर बैठी है वो.. खेत मे फसल कट चुकी है इसलिए कोई मज़दूरन बाई भी हाथ में नहीं आती.. !! ऐसे ही चलता रहा तो मुझे कमंडल लेकर हिमालय की ओर चला जाना पड़ेगा"

मायूष रसिक की ऐसी बात सुनकर शीला को हंसी भी आई और तरस भी

शीला: "कहीं जाने की नोबत नहीं आएगी.. और वैसे भी हिमालय जाकर करेगा क्या?? वहाँ बर्फ की गुड़िया बनाकर पेलेगा? थोड़ा इंतज़ार कर.. कुछ न कुछ सेटिंग जरूर हो जाएगा"

रसिक: "जो भी करना है जल्दी कीजिए भाभी, मुझे तो डर लग रहा है.. कहीं इस तड़प की चक्कर में कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठूँ"

शीला: "अपने आप पर थोड़ा काबू रखना सीख.. और फिर भी रहा न जाए तो चकले पर जाकर किसी तीन सौ वाली रांड को चोद कर अपनी आग बुझा ले"

रसिक: "भाभी, एक बार काजू-बादाम खाने की आदत लग जाए फिर मूंगफली खाने मे कहाँ मज़ा आता है.. !!"

शीला: "हाँ तो काजू-बादाम इतने आसानी से नहीं मिलते.. इंतज़ार तो करना ही पड़ेगा"

निराश होकर रसिक ने कहा "ठीक है भाभी, पर हो सके उतना जल्दी करना"

एक लंबी सांस छोड़कर शीला ने कहा "ठीक है.. अब रख दे फोन"

शीला ने फोन काटा और बिस्तर पर लेट गई.. !! उसने अपने पैर फैलाए और पेटीकोट को जांघों तक ऊपर ले गई.. बिना पेन्टी के उसकी गदराई चूत उजागर हो गई.. शीला ने अपनी उंगली को मुंह में डालकर गीला किया और उस उंगली से अपनी अंगूर जैसी क्लिटोरिस को धीरे धीरे रगड़ने लगी..






आह्हहहहहहहह....!!!!

जिस्म की सारी हवस इकट्ठा होकर उसकी चूत से बाहर निकल रही हो ऐसा महसूस हो रहा था शीला को.. अपने भगोष्ठ को कुरेदते हुए दूसरा हाथ ब्लाउज के अंदर डालकर धुंडियों को मसलने लगी.. आँखें बंद कर सिसक रही शीला को अपनी नज़रों के सामने रसिक, जीवा, रघु और राजेश के तगड़े सख्त लंड नजर आने लगे.. जैसे वो चारों लाइन में खड़े हो शीला को चोदने के लिए.. और शीला अपनी टांगें पसारकर एक के बाद एक लंड से बारी बारी चुद रही हो.. !!






शरीर में तेजी से दौड़ रहे खून के कारण शीला के पसीने छूटने लगे थे.. एक स्तन को ब्लाउज से बाहर निकालकर शीला ने अपनी चूत पर हमला और तेज कर दिया था.. क्लिटोरिस से होते हुए योनि के छेद में उसने दो उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर करना शुरू कर दिया था.. गीले चिपचिपे छेद के अंदर पच-पच की आवाज करते हुए उँगलियाँ शीला की हवस बुझाने की व्यर्थ कोशिश कर रही थी





अब शीला ने एक साथ तीन उँगलियाँ डाल दी अंदर.. !! शीला की हथेली भर गई उसकी चूत के रस से.. बिस्तर पर एक बड़ा सा गीला धब्बा बन गया था.. अपनी निप्पल को खींच खींचकर लाल कर दिया था..

बेड पर पड़े जल-बिन मछली की तरह फड़फड़ाते हुए शीला हस्त-मैथुन की लहरों में बहती जा रही थी.. धीरे धीरे उसे अपना चरमोत्कर्ष करीब आता हुआ नजर आ रहा था.. वो जल्द से जल्द अपनी मंज़िल पर पहुंचकर जिस्म की आग को अस्थायी तौर पर बुझाना चाहती थी..

तेजी से अपने भोसड़े को रगड़ते हुए वो झड़ने की करीब ही थी की तब..

अचानक डोरबेल बजी..

सरपट दौड़ती शीला की गाड़ी अचानक रुक गई.. वह उलझन मे पड़ गई.. की पहले झड़ लिया जाए या दरवाजा खोला जाएँ.. !!

शीला आगे कुछ सोच पाती उससे पहले दो-तीन बार और डोरबेल बजी..

शीला एक झटके से उठ खड़ी हुई.. अपने पेटीकोट और साड़ी को ठीक किया, ब्लाउज के बटन बंद किए.. और दरवाजे की तरफ गई.. !!

दरवाजा खोला तो सामने वैशाली खड़ी थी

वैशाली ने शीला की तरफ देखा.. लाल लाल आँखें.. बिखरे हुए बाल.. अस्त-व्यस्त कपड़ें.. सरका हुआ पल्लू.. तेजी से चल रही सांसें..!! बड़े ही विस्मय से शीला की ओर देखती रही वैशाली..!!

वैशाली के आँखों मे उमड़े प्रश्न देखकर शीला समझ गई की उसे क्या शक हो रहा था

बिना कुछ कहें वैशाली अंदर आई और सोफ़े पर बैठ गई.. शीला भी उसके सामने बैठ गई

वैशाली: "अंदर बेडरूम में पापा है क्या?"

शीला: "नहीं, पापा तो राजेश अंकल से मिलने गए है"

वैशाली: "तो??"

शीला: "क्या तो?" शीला समझ रही थी की वैशाली यह पूछना चाहती थी की अगर पापा अंदर बेडरूम में नहीं है तो कौन है.. !!

वैशाली बोलने में लड़खड़ा गई "नहीं मतलब.. मैं तो ये पूछना.. कुछ नहीं.. जाने दीजिए"

शीला: "नहीं नहीं.. पूछ ले.. की अंदर किसी को घुसाकर तो नहीं बैठी हु ना.. !!"

वैशाली सहम गई, उसने कहा "मेरा कहने का वो मतलब नहीं था मम्मी..!!"

शीला ने थोड़े गुस्से से कहा "फिर क्या मतलब था तेरा?"

वैशाली एक पल के लिए चुप हो गई.. फिर उसने कहा "मम्मी, घुमा-फिराकर बात नहीं करूंगी.. आप भी जानती ही की आपने पास्ट में क्या क्या किया है.. और ये बातें अब पिंटू भी जानता है.. मुझे अक्सर डर लगा रहता है की आप कहीं फिसल न जाए.. बात मुझ तक रहती है तो ठीक है पर अगर पिंटू को कुछ पता चला तो फिर क्या होगा, ये आप भी जानती हो"

शीला ने एक गहरी सांस ली और धीरे से बोली "जानती हूँ बेटा.. मेरा यकीन कर.. मैं ऐसा कुछ नहीं कर रही थी.. भरोसा न हो तो अंदर जाकर देख ले"

वैशाली: "ऐसा नहीं है मम्मी.. ये तो आप के कपड़े और बाल बिखरे हुए थे.. इसलिए मैंने सोचा की.. खैर छोड़िए उस बात को.. मैं तो आपको ये बताने आई थी की मेरी सास का फोन आया था.. वो मुझे कुछ दिन के लिए वहाँ रहने बुला रहे है"

शीला: "ये तो अच्छी बात है.. चली जा.. !!"

वैशाली: "पिंटू को छोड़कर जाने का मन नहीं कर रहा.. उसका खयाल कौन रखेगा?"

शीला: "तू उसकी चिंता छोड़.. खाना तो वो यहाँ भी खा सकता है.. हाँ, बाकी बातों का खयाल मैं नहीं रख सकती"

वैशाली हंस पड़ी

वैशाली: "क्या मम्मी.. !! कुछ भी बोलती हो.. !!"

शीला: "तू बेफिक्र होकर जा अपने ससुराल.. पिंटू पूरा दिन तो ऑफिस होता है.. मैं सुबह उसका टिफिन बनाकर दे दूँगी और रात को मेरे और मदन के साथ खाना खा लेगा.. !!"

वैशाली: "हम्म.. बात तो ठीक है.. मैं एक बार पिंटू से बात कर लेती हूँ"

शीला: "जैसा तुझे ठीक लगे"

वैशाली चली गई.. और शीला वापिस अपने विचारों में खो गई.. पुराने रंगीन दिनों की यादें अभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी..

शीला सोफ़े पर बैठकर अपने स्तनों से खेलना शुरू ही कर रही थी तब मदन वापिस लौटा

शीला: "मिल आयें राजेश से?"

मदन: "हाँ, काफी लंबी मीटिंग चली.. पीयूष के उस एक्सपोर्ट ऑर्डर के बारे में.. उस ऑर्डर का काफी सारा माल राजेश सप्लाइ करने वाला है.. और एक्सपोर्ट की विधि के लिए मेरी जरूरत पड़ेगी.. हो सकता है कुछ समय के लिए हमें अमरीका जाना भी पड़ें.. देखते है क्या होता है.. !!"

शीला मदन के करीब आकर बोली "मदन, हमारे पास इतना पैसा तो है की हम आराम से अपना गुजारा चला सकें.. फिर क्या जरूरत है तुझे ये सब करने की?"

मदन: "यार, अभी हाथ-पैर चल रहे है.. तो खाली बैठे रहने का क्या मतलब? मेरे हुनर का सही इस्तेमाल भी होगा और अच्छा खासा पैसा भी मिलेगा.. साथ में पीयूष और राजेश की मदद भी हो जाएगी.. तो इसमें क्या बुराई है?"

शीला: "बुराई कुछ भी नहीं है.. पर अब इतने सालों की मेहनत के बाद आखिर हमें वो समय नसीब हुआ है जब हम आराम से बैठकर अपनी ज़िंदगी जी सकें.. तू ऐसे ही कामों मे उलझा रहेगा तो मेरे लिए वक्त कब निकालेगा?"

मदन: "अरे यार.. कुछ दिनों की ही बात है.. जाना होगा तो ज्यादा से ज्यादा एक महीने के लिए, फिर तो मैं तेरे साथ ही हूँ.. और अब मैं राजेश और पीयूष को हाँ बोल चुका हूँ..!!"

शीला: "अब तूने तय कर ही लिया है तो मैं और क्या कहूँ.. !!"

मदन: "शीला, गुस्सा मत कर.. मैं जानता हूँ की तू अपनी पुरानी स्वतंत्रता को मिस कर रही हूँ.. और सच कहूँ तो मैं भी मिस कर रहा हूँ.. पर क्या करें.. !! अपनी बेटी की खुशी के लिए हमें ये सब करना ही होगा.. !!"

शीला: "हम्म.. !!"

शीला को पटाने और मनाने के लिए, मदन उसके करीब सोफ़े पर बैठ गया.. वो जानता था की शीला दो वजहों से अपसेट थी.. पहली यह की उनकी सेक्स लाइफ बेहद नीरस और सुस्त सी हो गई थी.. पिछले एक हफ्ते में शीला ने एक भी बार चुदाई की डिमांड नहीं की थी.. दूसरी यह की अब शायद मदन का एक महीने के लिए फिर से अमरीका जाना होगा.. वैसे पहले वो दो साल के लिए और फिर आठ महीने के लिए विदेश जा चुका था.. पर तब शीला को काफी सारे लंडों का सहारा था.. अब परिस्थिति बिल्कुल अलग है.. इस बार तो शीला को पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ेगा ऐसा प्रतीत हो रहा था.. जाहीर सी बात थी शीला की शीला यह विचार मात्र से ही कांप उठी थी

मुंह फुलाकर बैठी शीला के करीब जाते हुए मदन ने सब से पहले तो उसके कानों और गर्दन के पिछले हिस्सों को चूम-चूमकर शीला की अंगीठी में चिंगारी डालना शुरू कर दिया.. धीरे धीरे वो शीला के गालों को चाटते हुए उसके पल्लू को हटाने लगा.. ब्लाउज में कैद दो मदमस्त खरगोश, अपनी धूँडियाँ ऊंची कर मदन को और तांक रही थी..








शीला के उन विराटकाय स्तनों का वैभव देखते ही मदन ने एक लंबी सांस ली और शीला के दोनों स्तनों के बीच की खाई में अपना हाथ डालकर उन्हें मसलने लगा.. चर्बी के दो मदमस्त गोले.. !!! वाह.. आटे की तरह दोनों बबलों को गूँदने मे मदन को तो मज़ा आ ही रहा था.. अब शीला भी गरमाने लगी थी.. शीला ने आँखें बंद कर ली थी और गहरी साँसे लेने लगी थी..

जब मदन के हाथ अंदर मम्मों से खिलवाड़ कर रहे थे तब शीला ने बाहर से, ब्लाउज के एक के बाद एक हुक खोलना शुरू कर दिया.. यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक ब्लाउज और ब्रा से शीला के स्तन मुक्त नहीं हो गए..!!

मदन के स्पर्श से, शीला को अब मीठी मीठी गुदगुदी होने लगी थी.. उस गुदगुदी का असर उसकी गरम चूत पर भी होने लगा था.. झनझनाहट उसके शरीर में रह रहकर कंपन पैदा कर रही थी.. मदन ने धीरे से.. एकदम हल्के हाथों से.. शीला की एक निप्पल को पकड़कर खींचा.. एक सिहरन सी दौड़ पड़ी, जिसने शीला के जिस्म को झकझोर कर रख दिया






शीला ने आँखें खोलते हुए कहा "मदन, बड़ा मज़ा आ रहा है यार.. !! उफ्फ़.. दूसरी निप्पल को भी जरा मसल दे.. !! तेरी ठंडी ठंडी उंगलियों के छूते ही बिजली के करंट की तरह सनसनाहट होने लगती है.. मेरे शरीर के एक एक अंग को तो इतने भलीभाँति जानता है की तुझे सब पता है की कहाँ छूना है और कब छूना है.. !! "

मदन का लंड पूरी तरह उत्तेजित होकर तन चुका था.. लंड अपने हाथों से सहलाते हुए, उसने अपना सर, शीला की गोद में रख दिया और बड़े धीरे धीरे शीला के बबलों को चूसने लगा.. उसके मुंह का स्पर्श, शीला को उत्तेजित करता जा रहा था.. मदन दोनों स्तनों को बारी बारी चूसता और जब शीला की आवाज़ें तेज हो जाती तब वह रुक जाता..






शीला तड़प उठी, उसके लिए यह असहनीय था.. वह चाहती थी की मदन लगातार उसकी एक निप्पल को चूसता रहे और दूसरी निप्पल को साथ ही साथ मसलें.. लेकिन मदन आज शीला को तरसाने के मूड में था.. वह आज शीला के सब्र के बांध को तोड़कर उसे बेकाबू करना चाहता था.. वह जानता था.. शीला को उसी तरह चुदने में मज़ा आता है.. और उसे मनाने का यही सब से सटीक और कारगर तरीका है.. उसे संभोग से तृप्त करने का.. !!!

शीला ने अपने होंठ, मदन के होंठों पर रख दिए और हल्के हल्के उन्हें चूमने लगी.. मदन ने अपने दोनों लबों को जोड़कर O आकार बनाकर बाहर की और होंठ निकाल लिए.. शीला के लिए अब, दोनों लबों को अपने मुंह में लेकर चूसना आसान हो गया.. और वो धीरे धीरे मदन के होंठों को बड़ी मस्ती से चूमने लगी.. मदन उसके बोब्बों के आगे के हिस्से को अपने मुंह में भरकर उसकी निप्पल पर अपनी जीभ से गोलाकार बनाते हुए धीरे धीरे हर भाग को चूसने लगा.. निप्पल को जीभ और डांट के बीच में दबाकर हल्के से काटने लगा.. यह ध्यान रखते हुए की निप्पल को चोट भी न पहुंचे और शीला को मज़ा भी आए..

शीला की आँखें फिर से बंद हो गई.. उसकी चूत नम होने लगी.. मदन अपने लंड को सहलाने लगा और धीरे धीरे मसलते हुए उसको आगे पीछे हिलाने लगा.. यह इस बात का इशारा भी था की शीला अब उसके लंड पर भी थोड़ा प्यार बरसाए

लेकिन शीला अब अपनी मस्ती में थी.. अपनी गोद को फैलाते हुए, जांघों के बीच जगह बनाकर, अपनी उंगली चूत मे डालकर अपने आप को मजे देने लगी शीला.. आखिर उसने मदन के लंड पर अपनी कृपादृष्टि डाल ही दी.. मदन के लंड को अपने मादक बबलों से टकरा टकराकर उकसाने लगी.. उसकी खड़ी निप्पल से वो बार बार मदन को सुपाड़े को रगड़ भी रही थी.. मदन अपने लंड को हथेली में पकड़कर, जैसे शीला के बोब्बों को एक एक कार लंड से दायें-बाएं कर हिला रहा था.. शीला ने अपने हाथ से मदन के आँड़ों को पकड़ लिया और उसकी नरम थैली को उंगलियों के बीच में हल्के हल्के गुदगुदाने लगी






गोटों पर मर्दन शुरू होते ही मदन की आँखें बंद हो गई.. शीला एक एक्सपर्ट की तरह, उसके अंडकोशों की त्वचा को कभी एक उंगली से धीरे धीरे सहलाती तो कभी अपनी उंगलियों के बीच सिर्फ त्वचा को ले कर मसलती.. तो कभी अपनी मुठ्ठी में दोनों आँड़ों को ले कर भींच लेती.. मदन को तो झुरझुरी सी छूटने लगी.. उस थैली में जमा वीर्य बाहर आने के लिए तड़प रहा था..

शीला ने अब अपनी गरम मुठ्ठी में मदन का लंड पकड़कर, ऊपर नीचे करते हुए, सुपाड़े को मुंह मे ले लिया.. शीला के मुंह का गीला गरम स्पर्श सुपाड़े पर महसूस होते ही मदन ने कमर उचक ली.. थोड़ी ही चुसाई के बाद मदन का शरीर अकड़ने लगा.. होंठ टेढ़े-मेढ़े होने लगे.. और चरम सुख की प्राप्ति की स्वर्गीय अनुभूति को ज्यादा से ज्यादा लंबे समय तक महसूस करने के लिए, उसने अपने शरीर में एक कसाव सा पैदा कर लिया.. जिस तरह ज्वालामुखी में लावारस नीचे से ऊपर की तरफ जाकर बाहर निकलने की कोशिश करता है, बिल्कुल उसी तरह, मदन के गोटों से वीर्य, लंड की मुख्य नस से होते हुए सुपाड़े तक पहुँचने लगा था.. पिचकारी छूटने की बस तैयारी ही थी की तब शीला ने लंड मुंह से निकाल लिया और सुपाड़े को कसकर अपनी मुठ्ठी में भींच लिया.. एक पल के लिए मदन को ऐसा महसूस हुआ की वीर्य के बदले उसके प्राण ही निकल जाएंगे..






किनारे पर लाकर शीला ने उसकी कश्ती डुबो दी.. पर यही तो शीला की स्टाइल थी

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