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शीला ने अब अपनी गरम मुठ्ठी में मदन का लंड पकड़कर, ऊपर नीचे करते हुए, सुपाड़े को मुंह मे ले लिया.. शीला के मुंह का गीला गरम स्पर्श, सुपाड़े पर महसूस होते ही मदन ने कमर उचक ली.. थोड़ी ही चुसाई के बाद मदन का शरीर अकड़ने लगा.. होंठ टेढ़े-मेढ़े होने लगे.. और चरम सुख की प्राप्ति की स्वर्गीय अनुभूति को ज्यादा से ज्यादा लंबे समय तक महसूस करने के लिए, उसने अपने शरीर में एक कसाव सा पैदा कर लिया.. जिस तरह ज्वालामुखी में लावारस नीचे से ऊपर की तरफ जाकर बाहर निकलने की कोशिश करता है, बिल्कुल उसी तरह, मदन के गोटों से वीर्य, लंड की मुख्य नस से होते हुए सुपाड़े तक पहुँचने लगा था.. पिचकारी छूटने की बस तैयारी ही थी की तब शीला ने लंड मुंह से निकाल लिया और सुपाड़े को कसकर अपनी मुठ्ठी में भींच लिया.. एक पल के लिए मदन को ऐसा महसूस हुआ की वीर्य के बदले उसके प्राण ही निकल जाएंगे..

किनारे पर लाकर शीला ने उसकी कश्ती डुबो दी.. पर यही तो शीला की स्टाइल थी..!!
शीला ने मदन को अपनी गोद से खड़ा कर दिया.. और सोफ़े पर ही अपनी टांगें पसारकर बैठ गई.. दोनों हथेलियों से अपने भोसड़े को होंठों को चौड़ा कर.. वो मदन को चाटने का इशारा करने लगी.. उसकी चूत इतनी गीली हो गई थी की चूत के शहद की कुछ बूंदें.. उसके फुले हुए होंठों पर चमक रहे थे.. मदन उठा और शीला की दोनों जांघों के बीच अपना चेहरा सेट कर बैठ गया.. जैसे ही उसकी जीभ शीला के गदराए भोसड़े के अंदर घुसी.. शीला की आह्ह निकल गई.. !!


शीला की बुर का कसैला स्वाद लेते हुए मदन अंदरूनी हिस्सों पर अपनी जीभ रगड़ रहा था.. इठलाते और आनंद लेते हुए शीला अपनी चूत से रस की धाराएं बहा रही थी.. चूत के अंदर चाटते हुए मदन ने जब शीला के फूले हुए दाने को दोनों होंठों के बीच रखकर दबाया तब शीला "आईईईई माँ.. !!" कहते हुए चिहुँक उठी.. सिहरन के मारे उसका हाल बेहाल था.. फिर जैसे ही दाने को रगड़ना और चूमना शुरू हुआ.. तो मानों सारे बांध जैसे टूट ही गए.. झरझराती हुए, अटखेलियाँ करते हुए.. शीला की गुफा से स्त्री-वीर्य का झरना सा बहने लगा.. उसका शरीर अकड़कर मानों सिकुड़ रहा हो और भूकंप के झटके लग रहे हो ऐसा लग रहा था.. कपकपाते हुए शरीर ने दर्जनों झूले झूल लिए और रह रह कर गांड में घुस रही मदन की उंगली के साथ, शीला झड़ गई.. !! मदन का मुंह चूत रस से ऐसा सना हुआ था जैसे शिकार खाने के बाद शेर का मुंह खून से लथपथ होता है

करीब आधे मिनट तक उस ऑर्गजम का मज़ा लेने के बाद.. शीला ने आँखें खोली.. और सोफ़े से खड़ी हो गई.. मदन को पता चल गया की अब शीला के भोसड़े को तृप्त करने का समय आ चुका है..
शीला ने मदन को खींचकर सोफ़े पर लेटा दिया.. और खुद ऊपर चढ़ गई.. मदन के लंड के टोपे को हाथ से पकड़कर.. अपने लावा थूक रहे भोसड़े के गरम सुराख पर रख दिया.. थोड़ी देर सुपाड़े को अपने दाने पर रगड़कर उसने छेद के बीच में रख दिया.. और अपने शरीर का सारा वज़न डालते हुए मदन के लंड पर बैठ गई..

भारी भरकम शीला के शरीर का सारा वज़न एक साथ आ जाने से मदन को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसका पूरा शरीर ही पिचक गया हो.. वह एक क्षण के लिए प्राणहीन हो गया.. वो संभलता उससे पहले तो शीला ने अपने भारी चूतड़ों को आगे पीछे हिलाते हुए लंड-मंथन शुरू कर दिया..

कुछ देर ऐसा चलता रहा और मदन फिर से एक्टिव हो गया.. शीला के लटक रहे दोनों स्तनों की निप्पलों को पकड़कर खींचते हुए उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए..पर उसकी कोशिशें ऐसी ही थी जैसे छोटा बच्चा बरगद के पेड़ को हिलाने की कोशिश कर रहा हो.. शीला को उसके धक्कों से झांट फरक नहीं पड़ रहा था.. वो तो अपनी मस्ती में.. आँखें बंद कर.. अपने भोसड़े को नीचे घुसे लंड पर रगड़े जा रही थी..

शीला के गरम तंदूर जैसे भोसड़े में इतनी गर्मी थी की उसकी वजह से मदन सिर्फ एक ही मिनट में झड़ गया.. उसने शीला की ओर देखा.. वो तो आँखें बंद कर ऐसे हिल रही थी जैसे पागल घोड़े की सवारी कर रही हो.. मदन का तब तक छुटकारा नहीं होने वाला था जब तक शीला एक बार और स्खलित नहीं हो जाती..!!!!!
लाचार मदन, शीला के बड़े बड़े खरबूझों को अपने चेहरे के सामने उछलते हुए देख रहा था.. तीन मिनट और गुजर गए.. मदन के लंड मे दर्द होने लगा था.. उसका लंड अंदर मुरझा भी चुका था.. इसलिए शीला अब अंदर बाहर करने की जगह.. उस पिचके हुए लंड पर अपनी चूत को रगड़ रही थी..


आखिर शीला की रगड़ने की गति बढ़ी.. वो मदन की छाती को नाखूनों से खरोंचते हुए अपने कूल्हें हिलाए जा रही थी.. उसका पूरा शरीर पसीने से तर होकर चमक रहा था.. मदन नीचे पड़ा पड़ा शीला के इस काम-यज्ञ को लाचार होकर देख रहा था..
एकाध मिनट की अधिक रगड़न के बाद,.. शीला ऐसे थरथराने लगी जैसे उसके अंदर कोई पिशाच घुस गया हो.. पागलों की तरह अपने स्तनों को नोचते हुए शीला आखिर चरमसीमा तक पहुँच ही गई.. !!! वो ऐसे हांफ रही थी जैसे अभी अभी मेरेथॉन दौड़कर आई हो.. उसकी गति धीरे धीरे कम हुई.. और कुछ देर बाद वो मदन की छाती पर गिर गई..

नीचे लेटा हुआ मदन इंतज़ार कर रहा था की कब उसका छुटकारा हो.. सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था.. ऊपरवाले ने जैसे उसकी सुन ली हो.. घर की डोरबेल बजी..!! शीला एकदम से जागृत हो गई.. वैसे उसने सारे कपड़े उतारे तो थे नहीं.. पर फिर भी ब्रा और ब्लाउज पहनने का समय नहीं था.. वो मदन के शरीर से उठी.. अपने कपड़े उठायें और बेडरूम की तरफ भागी..!! मदन भी उठकर अपनी शॉर्ट्स पहनने लगा.. तब तक दो बार और डोरबेल बज चुकी थी
मदन ने उठकर दरवाजा खोला.. सामने वैशाली खड़ी थी..
वैशाली: "कब से बेल बजा रही हूँ पापा.. !!! कितनी देर लगा दी खोलने में.. !!"
मदन: "वो.. बेटा.. अखबार पढ़ते हुए मेरी आँख लग गई थी इसलिए.. !!"
वैशाली: "मम्मी नहीं है क्या घर पर?"
मदन: "मेरे खयाल से तेरी मम्मी भी अंदर सो रही होगी.. !!" मदन ने जानबूझकर ऊंची आवाज मे कहा ताकि अंदर बैठी शीला सुन ले और हिसाब से तैयार रहें..
शीला तुरंत ही बेडरूम का दरवाजा खोलकर बाहर आई.. !! कपड़े तो वैसे भी उसके अस्त-व्यस्त थे.. दिन में दूसरी बार आई वैशाली को वह थोड़े से आश्चर्य से देखते हुए बाहर आई
शीला: "क्या हुआ वैशाली?"
वैशाली: "मैं आपको यह बताने आई थी की मेरी पिंटू से बात हो गई.. और वो मुझे ससुराल जाने देने के लिए मान गया है.. !!"
मदन ने चोंककर पूछा "अरे वाह.. ये कब तय हुआ?"
वैशाली: "आज सुबह ही वहाँ से फोन आया था.. मैंने पिंटू से पूछा और उसने हाँ कह दिया"
मदन: "चलो अच्छा है.. इस बहाने तेरी थोड़ी सैर भी हो जाएगी.. तेरे सास-ससुर को भी अच्छा लगेगा.. और वहाँ पर कविता-पीयूष से मिलना भी हो जाएगा"
वैशाली: सोच रही हूँ, कल सुबह की बस से निकल जाऊँ"
कुछ सोचकर मदन ने कहा "देख बेटा.. तुझे वहाँ पहुँचने की कोई जल्दी न हो तो एकाध दिन रुक जा.. मैं और राजेश वहाँ जाने ही वाले है पीयूष से मिलने.. तब तुझे ससुराल छोड़ देंगे.. उसी बहाने समधिजी से मिलना भी हो जाएगा"
वैशाली: "अरे ये तो सब से बढ़िया रहेगा.. मुझे बस के धक्के खाने नहीं पड़ेंगे.. मैं आप लोगों के साथ ही आऊँगी.. कब निकलना है?"
मदन: "राजेश से बात करके बताता हूँ.. एक दो दिन में जाना होगा"
वैशाली: "ठीक है पापा.. !!"
जिस गति से आई थी उसी गति से वापिस लौट गई वैशाली.. उसके जाते ही मदन सोफ़े पर लेट गया.. शीला से चुदाई की थकान उतारने.. मदन और वैशाली की बातें सुनते वक्त शीला चुपचाप सुनती रही.. उसके दिमाग मे कोई योजना आकार ले रही थी.. पर उस योजना के अमल के लिए कुछ पत्ते बिछाने पड़ेंगे.. उसका शातिर दिमाग काम पर लग गया.. !!
दो दिन बाद उनका जाना तय हुआ..
एक दिन पहले, शीला ने रसिक को फोन किया
रसिक: "कहिए भाभी, कैसे याद किया इस नाचीज़ को?"
शीला: "अबे भड़वे.. शायरी छोड़ और मेरी बात ध्यान से सुन.. कल मेरा घर खाली होगा.. सुबह तो कुछ मुमकिन नहीं होगा पर दिन के समय क्या तू घर आ सकता है?"
रसिक: "मैं तो आ जाऊंगा.. पर कहीं वो तुम्हारा दामाद टपक पड़ा तो?"
शीला: "वैसे वो नौ बजे ऑफिस चला जाता है.. उसके बाद शाम तक नहीं लौटता.. पर कुछ कह नहीं सकते उसका.. उसे तो अब भी मेरे ऊपर शक है.. तू देखता तो है.. रोज सुबह जब तू दूध देने आता है तब कैसे हम दोनों को देखता रहता है.. !!"
रसिक: "इसीलिए तो मैंने कहा भाभी.. कहीं ऐसा ना हो की बीच चुदाई मुझे लंगोट बांधकर भागना पड़ें..!!"
शीला ने कुछ सोचकर कहा "सही कह रहा है तू.. ऐसे डर डरके चुदवाने में मुझे भी मज़ा नहीं आएगा.. !! तेरे घर पर मिल सकते है क्या?"
रसिक: "घर पर तो मेरे चाचाजी और उनके बेटे-बहुओं का परिवार आया हुआ है.. पूरा दिन घर पर चहल-पहल रहती है.. घर पर मिलना तो नहीं हो पाएगा भाभी.. पर आप एक काम कीजिए.. खेत पर ही चले आइए.. एकदम सलामत.. कोई टेंशन भी नहीं.. !!"
शीला सोच में पड़ गई.. दिन दहाड़े खेत पर जाने मे उसे थोड़ा सा खतरा लग रहा था..
रसिक: "इतना सोचिए मत भाभी.. वैसे भी यहाँ कोई नहीं होता.. फसल कट चुकी है.. सुबह दूध दे देने के बाद, मैं पूरा दिन भांग की गोलियाँ खाकर खटिया पर पड़ा रहता हूँ.. !!"
शीला : "साले.. नशे की आदत कब से लग गई तुझे?"
रसिक: "क्या करूँ भाभी.. !! आपको तो पता है.. रूखी है नहीं.. आप से मिलना हो नहीं रहा.. पिछले एक महीने से ऊपर हो गया मुझे.. !! दिन के समय कोई काम नहीं रहता.. समय बिताना मुश्किल हो जाता है.. भांग खाने से मस्ती सी छाई रहती है.. शाम कब हो जाती है, पता ही नहीं चलता.. !!"
शीला: "ठीक है, ठीक है.. तेरी कहानी सुनने फोन नहीं किया मैंने.. !!"
रसिक: "तो बताइए ना.. !! क्या तय किया आपने? खेत पर आ रही हो न कल??"
शीला: "हाँ वहीं मिलना पड़ेगा.. और कोई रास्ता नहीं है.. मैं कल सुबह तुझे फोन करती हूँ.. !!"
रसिक: "ठीक है भाभी, और हाँ भाभी, हो सकें तो थोड़ा मेकअप लाली करके आना.. आपको सजी धजी देखना चाहता हूँ, चलिए, रखता हूँ"
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रात को पेकिंग करने के बाद, वैशाली और पिंटू, शीला के घर खाने पर आए..
चारों साथ बैठकर खाना खाते हुए बातें कर रहे थे
शीला: "सुबह कितने बजे निकलने का प्लान है तुम दोनों का?"
मदन ने निवाला मुंह में डालते हुए कहा "सात बजे निकलने की सोच रहा हूँ.. वैसे राजेश से बात तो हो गई है.. वो सात या साढ़े सात बजे तक हमें लेने आ जाएगा"
शीला: "हाँ वही ठीक रहेगा.. दोपहर से पहले वहाँ पहुँच जाओ तो काम खतम करने का वक्त भी ठीक से मिलेगा"
शीला चाहती थी की जितनी जल्दी वो दोनों निकल जाएँ.. उतनी जल्दी वो घर का सारा काम निपटाकर रसिक के खेत पर पहुँच जाएँ..!!
शीला ने पिंटू से कहा "बेटा, मैं तुम्हारा टिफिन बना दूँगी.. और शाम को तो साथ ही खाना खाएंगे"
पिंटू: "टिफिन की जरूरत नहीं है मम्मी जी, मुझे वैसे भी कल काम से बाहर जाना रहेगा.. तो बाहर ही कुछ खा लूँगा.. हाँ, सुबह नाश्ता करने आ जाऊंगा.. !!"
वैशाली: "वही ठीक रहेगा.. सुबह ठीक से नाश्ता कर लेना ताकि बाहर का ज्यादा खाना न पड़ें.. और हाँ.. मम्मी का ध्यान रखना"
पिंटू ने शीला की आँखों में आँखें डालकर कहा "मम्मी जी का तो मैं एकदम ठीक से ध्यान रखूँगा.. उन्हें हिलने भी नहीं दूंगा"
सुनकर शीला सहम गई.. वैसे वो जानती थी की घर खाली होने के कारण पिंटू अब और कड़ी नजर रखेगा.. सावधान रहना होगा..!!
वैशाली: "हिलने भी नहीं देगा का क्या मतलब?"
पिंटू: "अरे मेरा मतलब है.. उन्हें कुछ बाहर से लाना हो या कोई काम हो तो मैं ही खत्म कर दूंगा.. ताकि उन्हें कहीं जाना न पड़ें और तकलीफ न हो.. !!"
पिंटू ने सफाई तो दी पर शीला समझ गई की उसका इशारा किस ओर था..
खाना खतम कर सब खड़े हुए.. वैशाली और पिंटू अपने घर चले गए और शीला-मदन भी सोने की तैयारी करने लगे
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दूसरी सुबह सवा-सात बजे, राजेश की गाड़ी मदन के घर आकर खड़ी हो गई.. मदन और वैशाली को अलविदा कहने शीला बाहर निकली.. और पड़ोस के घर से पिंटू भी.. हालांकि पिंटू इस बात से ज्यादा खुश नहीं था की वैशाली राजेश की गाड़ी में जा रही थी.. पर अपने ससुर के साथ होने की वजह से वह निश्चिंत था और इसलिए वैशाली को भेजने के लिए मान गया था.. पिंटू और राजेश अब भी एक दूसरे की आँखों में आँख डालकर नहीं देखते थे.. राजेश शर्म के कारण और पिंटू गुस्से के कारण..
तीनों को लेकर गाड़ी जैसे ही गली के छोर तक पहुंची.. हाथ हिलाते हुए बाय कह रही शीला के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई.. काफी लंबे अरसे के बाद, आज जाकर उसे आजादी के कुछ पल मिलें थे.. वो पलटकर दरवाजे की ओर मूडी तब पिंटू को उसकी तरफ गौर से देखता हूँ पाया.. उसके पैर थम गए और चेहरे की मुस्कान एक ही पल में गायब हो गई.. शायद, उसकी मुस्कान से पिंटू ने भांप लिया था की शीला के दिमाग मे जरूर कुछ खिचड़ी पक रही है..
शीला चौकन्नी हो गई.. उसका दिमाग पिंटू के प्रश्नों के लिए पहले से ही तैयारी करने लगा.. उसने सोच रखा था की वो जाएगी तो पिंटू के ऑफिस जाने के बाद ही.. पर जिस तरह पिंटू उसके सामने देख रहा था.. उसे पक्का यकीन था की वो उसका पीछा ऑफिस जाने के बाद भी छोड़ेगा नहीं..
फटाफट नाश्ता तैयार करके शीला नहाने चली गई.. एक मस्त साड़ी पहनकर, उसने रसिक की फरमाइश पर हल्का सा मेकअप भी किया.. थोड़ी लिपस्टिक लगा ली.. और तैयार होकर पिंटू का नाश्ते पर इंतज़ार करने लगी..
साढ़े-आठ बजे पिंटू आया..
तब तक तो शीला नाश्ते को टेबल पर सजा चुकी थी.. पिंटू शक भरी निगाहों से शीला के इस रूप के देख रहा था..बिना कुछ कहें वो नाश्ते के टेबल पर बैठ गया..
शीला उसके बिल्कुल सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई..
शीला: "बेटा, मैंने उपमा और आलू के पराठे बनाए है.. चलेगा ना"
पिंटू: "बेकार में आपने इतनी तकलीफ की.. कुछ हल्का-फुल्का बना दिया होता तो भी चल जाता"
शीला मुस्कुराकर एक प्लेट में उपमा भरने लगी.. उसका पल्लू हल्का सा सरक गया.. और ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी चूचियों के बीच की दरार उजागर हो गई..

शीला तुरंत अपना पल्लू ठीक नहीं कर पाई क्योंकि उसके एक हाथ में प्लेट थी और दूसरे हाथ में चम्मच..!! वैसे तो काफी समय पहले, शीला और चेतना, पिंटू के साथ चुदाई भी कर चुके थे.. जब कविता और पिंटू यहाँ पर मिले थे तब.. पर तब की बात और थी.. तब पिंटू एक अनजान नौसिखिया लड़का था.. अब वो उसका दामाद बन चुका था
अपनी गहरी क्लीवेज की ओर देखकर, शीला ने पिंटू की तरफ देखा.. यह देखने.. की पिंटू की प्रतिक्रिया क्या थी.. !! पर शीला का पल्लू सरकते ही पिंटू ने अपनी नजरें फेर ली थी
एक प्लेट मे उपमा और दूसरी प्लेट मे आलू के पराठे रखकर शीला ने पिंटू के सामने परोस दिए.. फ्लास्क से चाय के दो मग भरकर.. फिर अपना पल्लू ठीक कर वो भी सामने बैठकर नाश्ता करने लगी
कुछ देर तक तो दोनों की बीच कोई बातचीत नहीं हुई..
पिंटू की चुप्पी शीला को चुभ रही थी.. !! उसे पता था की पिंटू के दिमाग मे सवाल तो है ही.. अच्छा होगा की वो पूछ ले ताकि शीला अपनी सफाई देकर सारे शक दूर कर दे..
नाश्ता खतम होने तक पिंटू ने कुछ नहीं कहा..
आखिर पिंटू ने वो प्रश्न पूछ ही लिया जिसका शीला बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी..
पिंटू: "आप कहीं बाहर जा रही है?"
शीला को यह सुनकर चैन मिला.. पिंटू यह सवाल पूछे इसलिए तो वो जल्दी तैयार होकर बैठी थी
शीला: "हाँ.. आज वैसे भी घर पर अकेली हूँ.. बोर हो जाऊँगी.. तो सोचा, रेणुका के घर चली जाऊँ.. राजेश भी नहीं है इसलिए रेणुका अकेली होगी.. इसी बहाने मिलना भी हो जाएगा और उसका हाल भी जान लूँगी"
सुनकर पिंटू ने कुछ जवाब नहीं दिया और सर झुकाकर प्लेट से उपमा की आखिरी चम्मच खाकर पानी पीने लगा..
शीला की नजर पिंटू के चेहरे पर थी.. अपने जवाब के बाद पिंटू की क्या प्रतिक्रिया थी वो देखना चाहती थी.. उसी से पता चलता की पिंटू के गले उसका बहाना उतरा भी है या नहीं..
पिंटू के हावभाव सामान्य और नॉर्मल ही थे.. ये देखकर शीला के दिल को ठंडक मिली.. !!! चलो.. अच्छा हुआ जो पिंटू ने पूछ लिया और उसके जवाब से संतुष्ट भी हो गया.. !! अब, रसिक के लंड और उसके भोसड़े के बीच कोई नहीं आ सकता.. !!!
वॉश-बेज़ीन मे हाथ मुंह धोकर पिंटू जाने की तैयारी करने लगा.. शीला कनखियों से जाते हुए देख रही थी.. बस एक बार ये ऑफिस के लिए निकल जाए तो जान छूटें.. और रसिक के खेत पर जाने का रास्ता साफ हो जाए.. !!
दरवाजे से बाहर निकल रहा पिंटू.. अचानक कुछ सोचकर रुका.. और वापिस अंदर आया.. उसको वापिस आया देखकर शीला की धड़कनें तेज हो गई..
पिंटू: "चलिए मम्मी जी, मैं आपको राजेश सर के घर पर छोड़ देता हूँ"
खतम.. !!!! शीला को अपनी योजना पर पानी फिरता नजर आने लगा.. सब ठीक चल रहा था तब इस पिंटू को अचानक यह क्या सुझा?? चुपचाप चला गया होता तो अच्छा होता.. !!
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किनारे पर लाकर शीला ने उसकी कश्ती डुबो दी.. पर यही तो शीला की स्टाइल थी..!!
शीला ने मदन को अपनी गोद से खड़ा कर दिया.. और सोफ़े पर ही अपनी टांगें पसारकर बैठ गई.. दोनों हथेलियों से अपने भोसड़े को होंठों को चौड़ा कर.. वो मदन को चाटने का इशारा करने लगी.. उसकी चूत इतनी गीली हो गई थी की चूत के शहद की कुछ बूंदें.. उसके फुले हुए होंठों पर चमक रहे थे.. मदन उठा और शीला की दोनों जांघों के बीच अपना चेहरा सेट कर बैठ गया.. जैसे ही उसकी जीभ शीला के गदराए भोसड़े के अंदर घुसी.. शीला की आह्ह निकल गई.. !!


शीला की बुर का कसैला स्वाद लेते हुए मदन अंदरूनी हिस्सों पर अपनी जीभ रगड़ रहा था.. इठलाते और आनंद लेते हुए शीला अपनी चूत से रस की धाराएं बहा रही थी.. चूत के अंदर चाटते हुए मदन ने जब शीला के फूले हुए दाने को दोनों होंठों के बीच रखकर दबाया तब शीला "आईईईई माँ.. !!" कहते हुए चिहुँक उठी.. सिहरन के मारे उसका हाल बेहाल था.. फिर जैसे ही दाने को रगड़ना और चूमना शुरू हुआ.. तो मानों सारे बांध जैसे टूट ही गए.. झरझराती हुए, अटखेलियाँ करते हुए.. शीला की गुफा से स्त्री-वीर्य का झरना सा बहने लगा.. उसका शरीर अकड़कर मानों सिकुड़ रहा हो और भूकंप के झटके लग रहे हो ऐसा लग रहा था.. कपकपाते हुए शरीर ने दर्जनों झूले झूल लिए और रह रह कर गांड में घुस रही मदन की उंगली के साथ, शीला झड़ गई.. !! मदन का मुंह चूत रस से ऐसा सना हुआ था जैसे शिकार खाने के बाद शेर का मुंह खून से लथपथ होता है

करीब आधे मिनट तक उस ऑर्गजम का मज़ा लेने के बाद.. शीला ने आँखें खोली.. और सोफ़े से खड़ी हो गई.. मदन को पता चल गया की अब शीला के भोसड़े को तृप्त करने का समय आ चुका है..
शीला ने मदन को खींचकर सोफ़े पर लेटा दिया.. और खुद ऊपर चढ़ गई.. मदन के लंड के टोपे को हाथ से पकड़कर.. अपने लावा थूक रहे भोसड़े के गरम सुराख पर रख दिया.. थोड़ी देर सुपाड़े को अपने दाने पर रगड़कर उसने छेद के बीच में रख दिया.. और अपने शरीर का सारा वज़न डालते हुए मदन के लंड पर बैठ गई..

भारी भरकम शीला के शरीर का सारा वज़न एक साथ आ जाने से मदन को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसका पूरा शरीर ही पिचक गया हो.. वह एक क्षण के लिए प्राणहीन हो गया.. वो संभलता उससे पहले तो शीला ने अपने भारी चूतड़ों को आगे पीछे हिलाते हुए लंड-मंथन शुरू कर दिया..

कुछ देर ऐसा चलता रहा और मदन फिर से एक्टिव हो गया.. शीला के लटक रहे दोनों स्तनों की निप्पलों को पकड़कर खींचते हुए उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए..पर उसकी कोशिशें ऐसी ही थी जैसे छोटा बच्चा बरगद के पेड़ को हिलाने की कोशिश कर रहा हो.. शीला को उसके धक्कों से झांट फरक नहीं पड़ रहा था.. वो तो अपनी मस्ती में.. आँखें बंद कर.. अपने भोसड़े को नीचे घुसे लंड पर रगड़े जा रही थी..

शीला के गरम तंदूर जैसे भोसड़े में इतनी गर्मी थी की उसकी वजह से मदन सिर्फ एक ही मिनट में झड़ गया.. उसने शीला की ओर देखा.. वो तो आँखें बंद कर ऐसे हिल रही थी जैसे पागल घोड़े की सवारी कर रही हो.. मदन का तब तक छुटकारा नहीं होने वाला था जब तक शीला एक बार और स्खलित नहीं हो जाती..!!!!!
लाचार मदन, शीला के बड़े बड़े खरबूझों को अपने चेहरे के सामने उछलते हुए देख रहा था.. तीन मिनट और गुजर गए.. मदन के लंड मे दर्द होने लगा था.. उसका लंड अंदर मुरझा भी चुका था.. इसलिए शीला अब अंदर बाहर करने की जगह.. उस पिचके हुए लंड पर अपनी चूत को रगड़ रही थी..


आखिर शीला की रगड़ने की गति बढ़ी.. वो मदन की छाती को नाखूनों से खरोंचते हुए अपने कूल्हें हिलाए जा रही थी.. उसका पूरा शरीर पसीने से तर होकर चमक रहा था.. मदन नीचे पड़ा पड़ा शीला के इस काम-यज्ञ को लाचार होकर देख रहा था..
एकाध मिनट की अधिक रगड़न के बाद,.. शीला ऐसे थरथराने लगी जैसे उसके अंदर कोई पिशाच घुस गया हो.. पागलों की तरह अपने स्तनों को नोचते हुए शीला आखिर चरमसीमा तक पहुँच ही गई.. !!! वो ऐसे हांफ रही थी जैसे अभी अभी मेरेथॉन दौड़कर आई हो.. उसकी गति धीरे धीरे कम हुई.. और कुछ देर बाद वो मदन की छाती पर गिर गई..

नीचे लेटा हुआ मदन इंतज़ार कर रहा था की कब उसका छुटकारा हो.. सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था.. ऊपरवाले ने जैसे उसकी सुन ली हो.. घर की डोरबेल बजी..!! शीला एकदम से जागृत हो गई.. वैसे उसने सारे कपड़े उतारे तो थे नहीं.. पर फिर भी ब्रा और ब्लाउज पहनने का समय नहीं था.. वो मदन के शरीर से उठी.. अपने कपड़े उठायें और बेडरूम की तरफ भागी..!! मदन भी उठकर अपनी शॉर्ट्स पहनने लगा.. तब तक दो बार और डोरबेल बज चुकी थी
मदन ने उठकर दरवाजा खोला.. सामने वैशाली खड़ी थी..
वैशाली: "कब से बेल बजा रही हूँ पापा.. !!! कितनी देर लगा दी खोलने में.. !!"
मदन: "वो.. बेटा.. अखबार पढ़ते हुए मेरी आँख लग गई थी इसलिए.. !!"
वैशाली: "मम्मी नहीं है क्या घर पर?"
मदन: "मेरे खयाल से तेरी मम्मी भी अंदर सो रही होगी.. !!" मदन ने जानबूझकर ऊंची आवाज मे कहा ताकि अंदर बैठी शीला सुन ले और हिसाब से तैयार रहें..
शीला तुरंत ही बेडरूम का दरवाजा खोलकर बाहर आई.. !! कपड़े तो वैसे भी उसके अस्त-व्यस्त थे.. दिन में दूसरी बार आई वैशाली को वह थोड़े से आश्चर्य से देखते हुए बाहर आई
शीला: "क्या हुआ वैशाली?"
वैशाली: "मैं आपको यह बताने आई थी की मेरी पिंटू से बात हो गई.. और वो मुझे ससुराल जाने देने के लिए मान गया है.. !!"
मदन ने चोंककर पूछा "अरे वाह.. ये कब तय हुआ?"
वैशाली: "आज सुबह ही वहाँ से फोन आया था.. मैंने पिंटू से पूछा और उसने हाँ कह दिया"
मदन: "चलो अच्छा है.. इस बहाने तेरी थोड़ी सैर भी हो जाएगी.. तेरे सास-ससुर को भी अच्छा लगेगा.. और वहाँ पर कविता-पीयूष से मिलना भी हो जाएगा"
वैशाली: सोच रही हूँ, कल सुबह की बस से निकल जाऊँ"
कुछ सोचकर मदन ने कहा "देख बेटा.. तुझे वहाँ पहुँचने की कोई जल्दी न हो तो एकाध दिन रुक जा.. मैं और राजेश वहाँ जाने ही वाले है पीयूष से मिलने.. तब तुझे ससुराल छोड़ देंगे.. उसी बहाने समधिजी से मिलना भी हो जाएगा"
वैशाली: "अरे ये तो सब से बढ़िया रहेगा.. मुझे बस के धक्के खाने नहीं पड़ेंगे.. मैं आप लोगों के साथ ही आऊँगी.. कब निकलना है?"
मदन: "राजेश से बात करके बताता हूँ.. एक दो दिन में जाना होगा"
वैशाली: "ठीक है पापा.. !!"
जिस गति से आई थी उसी गति से वापिस लौट गई वैशाली.. उसके जाते ही मदन सोफ़े पर लेट गया.. शीला से चुदाई की थकान उतारने.. मदन और वैशाली की बातें सुनते वक्त शीला चुपचाप सुनती रही.. उसके दिमाग मे कोई योजना आकार ले रही थी.. पर उस योजना के अमल के लिए कुछ पत्ते बिछाने पड़ेंगे.. उसका शातिर दिमाग काम पर लग गया.. !!
दो दिन बाद उनका जाना तय हुआ..
एक दिन पहले, शीला ने रसिक को फोन किया
रसिक: "कहिए भाभी, कैसे याद किया इस नाचीज़ को?"
शीला: "अबे भड़वे.. शायरी छोड़ और मेरी बात ध्यान से सुन.. कल मेरा घर खाली होगा.. सुबह तो कुछ मुमकिन नहीं होगा पर दिन के समय क्या तू घर आ सकता है?"
रसिक: "मैं तो आ जाऊंगा.. पर कहीं वो तुम्हारा दामाद टपक पड़ा तो?"
शीला: "वैसे वो नौ बजे ऑफिस चला जाता है.. उसके बाद शाम तक नहीं लौटता.. पर कुछ कह नहीं सकते उसका.. उसे तो अब भी मेरे ऊपर शक है.. तू देखता तो है.. रोज सुबह जब तू दूध देने आता है तब कैसे हम दोनों को देखता रहता है.. !!"
रसिक: "इसीलिए तो मैंने कहा भाभी.. कहीं ऐसा ना हो की बीच चुदाई मुझे लंगोट बांधकर भागना पड़ें..!!"
शीला ने कुछ सोचकर कहा "सही कह रहा है तू.. ऐसे डर डरके चुदवाने में मुझे भी मज़ा नहीं आएगा.. !! तेरे घर पर मिल सकते है क्या?"
रसिक: "घर पर तो मेरे चाचाजी और उनके बेटे-बहुओं का परिवार आया हुआ है.. पूरा दिन घर पर चहल-पहल रहती है.. घर पर मिलना तो नहीं हो पाएगा भाभी.. पर आप एक काम कीजिए.. खेत पर ही चले आइए.. एकदम सलामत.. कोई टेंशन भी नहीं.. !!"
शीला सोच में पड़ गई.. दिन दहाड़े खेत पर जाने मे उसे थोड़ा सा खतरा लग रहा था..
रसिक: "इतना सोचिए मत भाभी.. वैसे भी यहाँ कोई नहीं होता.. फसल कट चुकी है.. सुबह दूध दे देने के बाद, मैं पूरा दिन भांग की गोलियाँ खाकर खटिया पर पड़ा रहता हूँ.. !!"
शीला : "साले.. नशे की आदत कब से लग गई तुझे?"
रसिक: "क्या करूँ भाभी.. !! आपको तो पता है.. रूखी है नहीं.. आप से मिलना हो नहीं रहा.. पिछले एक महीने से ऊपर हो गया मुझे.. !! दिन के समय कोई काम नहीं रहता.. समय बिताना मुश्किल हो जाता है.. भांग खाने से मस्ती सी छाई रहती है.. शाम कब हो जाती है, पता ही नहीं चलता.. !!"
शीला: "ठीक है, ठीक है.. तेरी कहानी सुनने फोन नहीं किया मैंने.. !!"
रसिक: "तो बताइए ना.. !! क्या तय किया आपने? खेत पर आ रही हो न कल??"
शीला: "हाँ वहीं मिलना पड़ेगा.. और कोई रास्ता नहीं है.. मैं कल सुबह तुझे फोन करती हूँ.. !!"
रसिक: "ठीक है भाभी, और हाँ भाभी, हो सकें तो थोड़ा मेकअप लाली करके आना.. आपको सजी धजी देखना चाहता हूँ, चलिए, रखता हूँ"
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रात को पेकिंग करने के बाद, वैशाली और पिंटू, शीला के घर खाने पर आए..
चारों साथ बैठकर खाना खाते हुए बातें कर रहे थे
शीला: "सुबह कितने बजे निकलने का प्लान है तुम दोनों का?"
मदन ने निवाला मुंह में डालते हुए कहा "सात बजे निकलने की सोच रहा हूँ.. वैसे राजेश से बात तो हो गई है.. वो सात या साढ़े सात बजे तक हमें लेने आ जाएगा"
शीला: "हाँ वही ठीक रहेगा.. दोपहर से पहले वहाँ पहुँच जाओ तो काम खतम करने का वक्त भी ठीक से मिलेगा"
शीला चाहती थी की जितनी जल्दी वो दोनों निकल जाएँ.. उतनी जल्दी वो घर का सारा काम निपटाकर रसिक के खेत पर पहुँच जाएँ..!!
शीला ने पिंटू से कहा "बेटा, मैं तुम्हारा टिफिन बना दूँगी.. और शाम को तो साथ ही खाना खाएंगे"
पिंटू: "टिफिन की जरूरत नहीं है मम्मी जी, मुझे वैसे भी कल काम से बाहर जाना रहेगा.. तो बाहर ही कुछ खा लूँगा.. हाँ, सुबह नाश्ता करने आ जाऊंगा.. !!"
वैशाली: "वही ठीक रहेगा.. सुबह ठीक से नाश्ता कर लेना ताकि बाहर का ज्यादा खाना न पड़ें.. और हाँ.. मम्मी का ध्यान रखना"
पिंटू ने शीला की आँखों में आँखें डालकर कहा "मम्मी जी का तो मैं एकदम ठीक से ध्यान रखूँगा.. उन्हें हिलने भी नहीं दूंगा"
सुनकर शीला सहम गई.. वैसे वो जानती थी की घर खाली होने के कारण पिंटू अब और कड़ी नजर रखेगा.. सावधान रहना होगा..!!
वैशाली: "हिलने भी नहीं देगा का क्या मतलब?"
पिंटू: "अरे मेरा मतलब है.. उन्हें कुछ बाहर से लाना हो या कोई काम हो तो मैं ही खत्म कर दूंगा.. ताकि उन्हें कहीं जाना न पड़ें और तकलीफ न हो.. !!"
पिंटू ने सफाई तो दी पर शीला समझ गई की उसका इशारा किस ओर था..
खाना खतम कर सब खड़े हुए.. वैशाली और पिंटू अपने घर चले गए और शीला-मदन भी सोने की तैयारी करने लगे
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दूसरी सुबह सवा-सात बजे, राजेश की गाड़ी मदन के घर आकर खड़ी हो गई.. मदन और वैशाली को अलविदा कहने शीला बाहर निकली.. और पड़ोस के घर से पिंटू भी.. हालांकि पिंटू इस बात से ज्यादा खुश नहीं था की वैशाली राजेश की गाड़ी में जा रही थी.. पर अपने ससुर के साथ होने की वजह से वह निश्चिंत था और इसलिए वैशाली को भेजने के लिए मान गया था.. पिंटू और राजेश अब भी एक दूसरे की आँखों में आँख डालकर नहीं देखते थे.. राजेश शर्म के कारण और पिंटू गुस्से के कारण..
तीनों को लेकर गाड़ी जैसे ही गली के छोर तक पहुंची.. हाथ हिलाते हुए बाय कह रही शीला के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई.. काफी लंबे अरसे के बाद, आज जाकर उसे आजादी के कुछ पल मिलें थे.. वो पलटकर दरवाजे की ओर मूडी तब पिंटू को उसकी तरफ गौर से देखता हूँ पाया.. उसके पैर थम गए और चेहरे की मुस्कान एक ही पल में गायब हो गई.. शायद, उसकी मुस्कान से पिंटू ने भांप लिया था की शीला के दिमाग मे जरूर कुछ खिचड़ी पक रही है..
शीला चौकन्नी हो गई.. उसका दिमाग पिंटू के प्रश्नों के लिए पहले से ही तैयारी करने लगा.. उसने सोच रखा था की वो जाएगी तो पिंटू के ऑफिस जाने के बाद ही.. पर जिस तरह पिंटू उसके सामने देख रहा था.. उसे पक्का यकीन था की वो उसका पीछा ऑफिस जाने के बाद भी छोड़ेगा नहीं..
फटाफट नाश्ता तैयार करके शीला नहाने चली गई.. एक मस्त साड़ी पहनकर, उसने रसिक की फरमाइश पर हल्का सा मेकअप भी किया.. थोड़ी लिपस्टिक लगा ली.. और तैयार होकर पिंटू का नाश्ते पर इंतज़ार करने लगी..
साढ़े-आठ बजे पिंटू आया..
तब तक तो शीला नाश्ते को टेबल पर सजा चुकी थी.. पिंटू शक भरी निगाहों से शीला के इस रूप के देख रहा था..बिना कुछ कहें वो नाश्ते के टेबल पर बैठ गया..
शीला उसके बिल्कुल सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई..
शीला: "बेटा, मैंने उपमा और आलू के पराठे बनाए है.. चलेगा ना"
पिंटू: "बेकार में आपने इतनी तकलीफ की.. कुछ हल्का-फुल्का बना दिया होता तो भी चल जाता"
शीला मुस्कुराकर एक प्लेट में उपमा भरने लगी.. उसका पल्लू हल्का सा सरक गया.. और ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी चूचियों के बीच की दरार उजागर हो गई..

शीला तुरंत अपना पल्लू ठीक नहीं कर पाई क्योंकि उसके एक हाथ में प्लेट थी और दूसरे हाथ में चम्मच..!! वैसे तो काफी समय पहले, शीला और चेतना, पिंटू के साथ चुदाई भी कर चुके थे.. जब कविता और पिंटू यहाँ पर मिले थे तब.. पर तब की बात और थी.. तब पिंटू एक अनजान नौसिखिया लड़का था.. अब वो उसका दामाद बन चुका था
अपनी गहरी क्लीवेज की ओर देखकर, शीला ने पिंटू की तरफ देखा.. यह देखने.. की पिंटू की प्रतिक्रिया क्या थी.. !! पर शीला का पल्लू सरकते ही पिंटू ने अपनी नजरें फेर ली थी
एक प्लेट मे उपमा और दूसरी प्लेट मे आलू के पराठे रखकर शीला ने पिंटू के सामने परोस दिए.. फ्लास्क से चाय के दो मग भरकर.. फिर अपना पल्लू ठीक कर वो भी सामने बैठकर नाश्ता करने लगी
कुछ देर तक तो दोनों की बीच कोई बातचीत नहीं हुई..
पिंटू की चुप्पी शीला को चुभ रही थी.. !! उसे पता था की पिंटू के दिमाग मे सवाल तो है ही.. अच्छा होगा की वो पूछ ले ताकि शीला अपनी सफाई देकर सारे शक दूर कर दे..
नाश्ता खतम होने तक पिंटू ने कुछ नहीं कहा..
आखिर पिंटू ने वो प्रश्न पूछ ही लिया जिसका शीला बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी..
पिंटू: "आप कहीं बाहर जा रही है?"
शीला को यह सुनकर चैन मिला.. पिंटू यह सवाल पूछे इसलिए तो वो जल्दी तैयार होकर बैठी थी
शीला: "हाँ.. आज वैसे भी घर पर अकेली हूँ.. बोर हो जाऊँगी.. तो सोचा, रेणुका के घर चली जाऊँ.. राजेश भी नहीं है इसलिए रेणुका अकेली होगी.. इसी बहाने मिलना भी हो जाएगा और उसका हाल भी जान लूँगी"
सुनकर पिंटू ने कुछ जवाब नहीं दिया और सर झुकाकर प्लेट से उपमा की आखिरी चम्मच खाकर पानी पीने लगा..
शीला की नजर पिंटू के चेहरे पर थी.. अपने जवाब के बाद पिंटू की क्या प्रतिक्रिया थी वो देखना चाहती थी.. उसी से पता चलता की पिंटू के गले उसका बहाना उतरा भी है या नहीं..
पिंटू के हावभाव सामान्य और नॉर्मल ही थे.. ये देखकर शीला के दिल को ठंडक मिली.. !!! चलो.. अच्छा हुआ जो पिंटू ने पूछ लिया और उसके जवाब से संतुष्ट भी हो गया.. !! अब, रसिक के लंड और उसके भोसड़े के बीच कोई नहीं आ सकता.. !!!
वॉश-बेज़ीन मे हाथ मुंह धोकर पिंटू जाने की तैयारी करने लगा.. शीला कनखियों से जाते हुए देख रही थी.. बस एक बार ये ऑफिस के लिए निकल जाए तो जान छूटें.. और रसिक के खेत पर जाने का रास्ता साफ हो जाए.. !!
दरवाजे से बाहर निकल रहा पिंटू.. अचानक कुछ सोचकर रुका.. और वापिस अंदर आया.. उसको वापिस आया देखकर शीला की धड़कनें तेज हो गई..
पिंटू: "चलिए मम्मी जी, मैं आपको राजेश सर के घर पर छोड़ देता हूँ"
खतम.. !!!! शीला को अपनी योजना पर पानी फिरता नजर आने लगा.. सब ठीक चल रहा था तब इस पिंटू को अचानक यह क्या सुझा?? चुपचाप चला गया होता तो अच्छा होता.. !!
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