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- Dec 5, 2013
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पिछले अपडेट में हमने पढ़ा की राजेश फाल्गुनी से मिलने फार्महाउस पर पहुंचता है.. शराब और शबाब के नशे में वह दोनों एक नए काम संबंध का आगाज करते है.. फाल्गुनी की भूख अप्रत्याशित है, इतनी अधिक की राजेश भी उसे पूरा करने में अक्षम रहा और जल्दी लौटने का बहाना बनाकर निकल गया
उधर रसिक के खेत से धुआंधार हिंसक चुदाई के बाद शीला घर पहुँचती है..
अब आगे...
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शाम तक घर पहुंचते पहुंचते शीला इतनी थक गई थी की जाते ही बिस्तर पर ढेर होकर गिर गई.. शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था उसका.. आज पहली बार रसिक ने उसे जानवर की तरह ठोका था.. भांग के अत्याधिक प्रभाव के तले..!! जिस्म का हर कतरा, हल्के पर मीठे दर्द से कराह रहा था.. यहाँ तक की चूत की दीवारें भी आज की भारी रगड़न के बाद चिलमिलाई हुई थी..
पर शीला को अच्छा लग रहा था.. इतने लंबे समय के बंधन के बाद.. आज मिली इस स्वतंत्रता ने शीला के दिल-ओ-जान को तरोताजा कर दिया था.. पतली सी चादर ओढ़े लेटी शीला, कांच की खिड़की से आ रही धूप सेंकते हुए.. मीठे मीठे दर्द को महसूस कर रही थी.. ऐसा लग रहा था की सख्त हो चुके शरीर की जोड़ें.. इस धमाकेदार चुदाई के बाद लचीली हो गई थी.. !!
काफी लंबे अरसे तक इस स्वतंत्रता से वंचित रहकर वह हर दिन नए संघर्ष का सामना करती रहती थी.. संघर्ष अपने आप से.. अपने मन से.. अपनी इच्छाओं से.. अपनी हवस से.. !! हर दिन उसका जिस्म नए मर्द के संसर्ग के लिए मचलता.. और हररोज वह अपने आप को समझाती.. रिश्तों की जिम्मेदारी की बेड़ियों में जकड़ी हुई, उसने अपने सपनों और इच्छाओं को कहीं बहुत गहरे दबा दिया था..
लेकिन अब, समय ने करवट ली है.. शीला ने उन बेड़ियों को तोड़ने का साहस जुटाया है और एक नई हवा में सांस लेना शुरू किया है.. यह हवा स्वतंत्रता की है, अपने अस्तित्व के एहसास की है.. और अब शीला खुद से एक वादा कर चुकी है—वह इस आज़ादी को खोने नहीं देगी.. चाहे कुछ भी हो जाए.. चाहे उसे कुछ भी करना क्यों न पड़ें.. !!!
शीला की आंखों में अब एक नई चमक है, उसके कदम आत्मविश्वास से भरे हुए हैं.. वह अपने जीवन की कहानी को खुद लिखने का निर्णय ले चुकी है.. यह उसकी जीत है—एक आजाद महिला की, जिसने खुद को पाया है और अपने भीतर के स्वतंत्र व्यक्तित्व को गले लगाया है.. अपने हिसाब से ज़िंदगी जीना यह उसका अधिकार है, उसका स्वाभिमान है.. वह अपने अंदर उस पुरानी शीला को को फिर से तलाश चुकी थी, खुद को पहचान चुकी थी.. अपनी इच्छाओं को वह किसी जिम्मेदारी के बोझ तले कुचलेगी नहीं.. उसने यह वादा किया था.. अपने आप से.. अपनी नई उड़ान से..!!
सो कर शीला शाम को उठी.. रात का खाना बनाने का उसे मूड नहीं था.. मदन तो राजेश के साथ गया था और वापिस लौटते देर होने वाली थी इसलिए वो खाना खाकर ही लौटेगा.. खुद के लिए कुछ बनाने का मन नहीं हो रहा था लेकिन पिंटू के लिए तो खाना बनाना ही था.. शीला ने मस्त गरम कॉफी बनाई और मग लेकर अपने झूले पर बैठ गई..
अपने कारनामों को यूं ही चलते रहने देने के लिए आगे क्या करना चाहिए वह सोच रही थी.. एक बात तो तय थी.. जब तक पिंटू और वैशाली उसके पड़ोस में थे तब तक वह कुछ भी कर नहीं पाएगी यह वो जानती थी.. अगर वह दोनों अपना घर कहीं ओर शिफ्ट कर ले फिर भी.. जब तक पिंटू इस शहर मे था उसकी नजर हमेशा शीला की इर्दगिर्द रहने ही वाली थी
एक ही तरीका था.. अगर पिंटू और वैशाली किसी और शहर में चले जाएँ तो लाइन क्लियर हो सकती थी.. पर वो होगा कैसे?? शीला काफी देर तक सोचती रही और उसके दिमाग में एक योजना आकार लेने लगी..
रात को शीला की मदन से फोन पर बात हुई तो पता चला की मदन आज की रात पीयूष के घर रुकने वाला था, क्योंकी राजेश को किसी पार्टी में जाना था और आने मे देर हो जाने की संभावना थी.. देर रात हाइवे पर ड्राइव करने से बेहतर, उन्हों ने रात पीयूष के घर ही रुक जाने का फैसला किया था.. मदन ने यह भी बताया की चूंकि पिंटू दूसरे दिन अपने घर आने वाला था, वैशाली के ससुर ने मदन को दोपहर के खाने पर न्योता दिया था.. इसलिए मदन अब कल शाम को ही लौटेगा..
मदन का फोन खतम होते ही.. दो बातों ने प्रमुखता से शीला का ध्यान खींचा.. पहली यह की पिंटू अपने घर वैशाली से मिलने जाने वाला था और दूसरी यह की मदन कल शाम से पहले घर लौटने वाला नहीं था..!! यह दोनों कारक, शीला को रोमांचित कर देने के लिए काफी थे.. कल शाम तक का दिन उसकी स्वच्छंदता के लिए आरक्षित था..!!
दूसरे दिन के लिए, किसी भी प्रकार की योजना बनाने से पहले, शीला यह सुनिश्चित करना चाहती थी की पिंटू सही में घर जाने वाला था या फिर शीला को रंगेहाथों पकड़ने की उसकी कोई नई चाल है..!!शाम के चार बज रहे थे और पिंटू रात का खाना शीला के साथ खाने वाला था.. अगर वो आज शाम को ही घर के लिए निकलने वाला होता, जैसा की वो हर बार करता था, तो अब तक उसका फोन आ जाना चाहिए था.. !!!
यह सब विचारों में घिरे हुए, शीला फ्रिज से भिंडी लेकर आई और झूले पर बैठे हुए काटने लगी.. ताकि पिंटू के लिए खाना बनाने की शुरुआत की जा सकें.. क्योंकी पिंटू का अब तक तो कोई मेसेज नहीं आया था..
वो सब्जी काट रही थी तभी उसका मोबाइल बजा.. स्क्रीन पर पिंटू का नाम देखते ही शीला के होंठों पर मुस्कान आ गई..
शीला: "हैलो.. !!"
पिंटू: "मम्मी जी, सॉरी मैं आपको जल्दी फोन करना भूल गया.. मैंने यह बताने के लिए फोन किया है की मैं आज शाम की बस से घर जा रहा हूँ.. मैंने कल की छुट्टी ले ली है.. वैशाली जिद कर रही थी तो सोचा चला जाऊँ.. पापा जी भी वहीं है और कल दोपहर खाने पर आ रहे है.. चाहें तो आप भी साथ चल सकती है.. कहों तो मैं आपको लेने आ जाऊँ??"
शीला: "नहीं बेटा.. मन तो बहोत है पर दोपहर से मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है.. पूरे बदन में दर्द हो रहा है.. इसलिए तुम ही चले जाओ"
पिंटू: "जैसी आपकी मर्जी.. वैसे आपने रात का खाना बना तो नहीं लिया है ना..!! अगर बना लिया हो तो फिर मैं घर आकर खाना खाकर फिर जाऊंगा.. खाना वेस्ट नहीं होना चाहिए"
शीला: "अरे बिल्कुल चिंता मत करो.. !! मैंने तो अभी शुरुआत भी नहीं की है.. हम दोनों का ही खाना बनाना था.. एक घंटे से ज्यादा समय नहीं लगता है.. इसलिए मैं आराम से शुरू करने वाली थी.. अब तुम भी नहीं आ रहे हो और मेरी तबीयत भी नासाज है.. इसलिए मैं कुछ सूप और सलाद जैसा हल्का फुल्का बना लूँगी.. तुम इत्मीनान से जा कर आओ"
पिंटू: "ठीक है मम्मी जी.. रखता हूँ फोन"
फोन काटते ही शीला ने चैन की सांस ली.. उसे तसल्ली हो गई की पिंटू अब परसों सुबह तक नहीं लौटने वाला..
शीला उन बिना कटी भिंडी को लेकर घर के अंदर आई और सब्जियों को वापिस फ्रिज में रख दिया.. उसने घर का दरवाजा बंद किया और आराम से सोफ़े पर बैठ गई.. अब रसिक से बात करना चाहती थी.. बात तो उसे तब से करनी थी जब से वो लौटी थी.. लेकिन उसने तय किया था की उसका नशा उतर जाने के बाद ही बात करना मुनासिब होगा..
शीला ने रसिक को फोन लगाया.. दो बार रिंग बजकर फोन कट गया पर रसिक ने फोन उठाया नहीं.. एक पल के लिए शीला डर गई.. कहीं ज्यादा नशे के कारण वह कमीना मर तो नहीं गया होगा.. !!! अगर सच में मर गया होगा तो शीला की शामत आ जाएगी.. क्योंकी आखिरी बार रसिक से वो ही मिली थी..!!
शीला के पसीने छूटने लगे.. उसने तेज पंखा चला दिया और सोफ़े पर बैठ गई..
तभी रसिक का फोन आया देख उसकी जान में जान आई
शीला: "अबे भड़वे.. कहाँ माँ चुदवा रहा था?"
रसिक: "क्या भाभी.. आपने तो शुरुआत ही गाली-गलोच से कर दी"
शीला: "तो और क्या करूँ..!!! आरती उतारूँ तेरी?? फोन क्यों नहीं उठा रहा था कब से?"
रसिक: "अरे भाभी, आपके जाने के बाद सो गया था और अभी उठा.. सिर इतना भारी भारी लग रहा था इसलिए ट्यूबवेल के नीचे नहाने बैठ गया था"
शीला ने गुस्से से कहा "तो अपनी गांड मरवाने इतना नशा करता है..!! साले मादरचोद.. तुझे अंदाजा भी है की तूने मेरे शरीर के साथ क्या क्या कर दिया.. !! नोच खाया मुझे.. !! मेरे बबलों को तो ऐसा तोड़ा-मरोड़ा जैसे तेरी भेस के थन हो..!! पूरे शरीर पर तेरे नाखून और काटने के निशान बन गए है.. इतना दर्द हो रहा है मुझे.. !!"
यह सुनकर रसिक झेंप सा गया.. उसने कहा "माफ कर दीजिए भाभी.. नशे की हालत में, मुझे कुछ पता ही नहीं रहा.. वैसे तो रोज एकाद गोली ही लेता हूँ पर आपका इंतज़ार करते करते दूसरी गोली चढ़ा ली.. इसलिए ज्यादा नशा हो गया.. हो जाता है कभी कभी.. आप ऐसे गुस्सा मत कीजिए"
शीला: "मैं तेरी गांड में जलता हुआ सरिया डालकर कहूँगी की हो जाता है कभी कभी.. तो चलेगा? भेनचोद, आव देखा न ताव.. ऐसे टूट पड़ा जैसे औरत कभी देखी ही न हो.. वक्त रहते मैं निकल न गई होती तो आज तू मुझे मार ही देता.. और मेरी लाश को खेत के कोने में गाड़ देता.. !!"
रसिक: "कैसी बातें कर रही हो आप भाभी..!! माफी मांग रहा हूँ ना मैं.. अब हो गई गलती.. जो हो गया उसे तो मैं बदल नहीं सकता.. अगली बार मिलूँगा तो आपके पैर पकड़कर माफी मांग लूँगा, बस.. !! अब तो शांत हो जाइए.. !! आप सही कह रही हो.. भांग थोड़ी ज्यादा ही हो गई थी.. पर क्या आपको बिल्कुल भी मज़ा नहीं आया था??"
सुनकर शीला का गुस्सा शांत हुआ.. और वो मुसकुराते हुए बोली "हाँ.. मज़ा तो आया था.. पर ओर मज़ा आता अगर तू भांग खाकर जानवर बन नहीं गया होता तो.. खैर, अब जो हो गया उसे छोड़.. और सुन.. कल सुबह आ जाना.. घर पर कोई नहीं होगा"
रसिक: "और वो आपका दामाद.. !! उसका क्या..??"
शीला: "वह भी नहीं होगा.. आज शाम को चला जाएगा और परसों सुबह आएगा.. इसलिए हमारा रास्ता साफ है.. कल सुबह दूध देने आएगा तब मजे करेंगे"
रसिक: "अरे भाभी.. सुबह नहीं.. आपके चक्कर में बाकी ग्राहकों को दूध देने मे देरी हो जाती है और वो सब चिल्लाते है मुझ पर.. और जल्दी जल्दी में मज़ा नहीं आएगा.. मैं एक काम करता हूँ.. सब काम निपटाकर सुबह दस बजे आ जाता हूँ.. फिर कोई जल्दी नहीं होगी और आराम से करेंगे"
शीला ने कुछ देर सोचने के बाद कहा "हम्म ठीक है.. चलेगा, पर आ जाना टाइम पर"
रसिक: "पक्का भाभी.. आ जाऊंगा"
रसिक से फोन पर बात हो रही थी तभी शीला के घर की डोरबेल बजी.. फोन पर बात करते हुए ही उसने दरवाजा खोला तो सामने पिंटू खड़ा था.. घबराहट में शीला के हाथ से फोन गिर गया..!! पिंटू मोबाइल के स्क्रीन पर रसिक का नाम देख पाता उससे पहले शीला ने अपनी हथेली स्क्रीन पर रखकर फोन तुरंत उठा लिया.. रसिक अब भी "हैलो-हैलो" किए जा रहा था जो फोन के स्पीकर से स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था.. शीला ने फुर्ती से फोन काट दिया और कृत्रिम मुस्कान के साथ पिंटू की तरफ देखने लगी
पिंटू: "वो मैं अपने कपड़े लेने घर आया था.. और आपको घर की चाबी देने आया हूँ"
शीला: "ओह्ह.. हाँ.. वो.. क्या कहा.. अच्छा चाबी देने.. हाँ हाँ.. ठीक है"
शीला की बोली लड़खड़ाते हुए देख पिंटू को कुछ शक जरूर हुआ.. शीला की आँखों में आँखें डालकर देखते हुए उसने पूछा
पिंटू: "किसका फोन था?"
कोई और होता तो शीला ने अब तक तीखा जवाब दे दिया होता.. पर पिंटू के साथ यह मुमकिन नहीं था
शीला: "क्या.. वो.. फोन.. हाँ फोन पर बात कर रही थी.. अमम.. वो तो रेणुका का फोन था"
पिंटू को शक था की उसने किसी मर्द की आवाज सुनी थी.. पर उसे समय पर बस पकड़नी थी इसलिए हड़बड़ी में था.. शीला के हाथ में घर की चाबी थमाकर वो चला गया
यह पूरा वाकया करीब एक मिनट के अंदर हो गया था.. लेकिन शीला को ऐसा लगा जैसे एक घंटा बीत गया हो.. पसीने छूट गए शीला के.. ऐसी प्रति-पतीक्षा की आदि नहीं थी वो.. और खासकर तब जब वो झूठ बोल रही हो..
दरवाजा बंद करने के बाद वो वापिस सोफ़े पर आकर बैठ गई और सोचने लगी.. अगर पिंटू को शक हो गया होगा तो?? अगर पिंटू ने देखने के लिए फोन मांगा होता तो? अगर पिंटू अब भी कहीं छुपकर नजर रख रहा होगा तो?
घुटन सी महसूस हो रही थी शीला को.. ऐसा कब तक चलेगा..!! कुछ न कुछ उपाय तो करना पड़ेगा इस पिंटू का.. !! शाम को झूले पर बैठे बैठे उसने जो योजना सोची थी उसके बारे में फिर से सोचने लगी शीला.. अब उसे लग रहा था की समय से पहले ही उस योजना को अमल मे लाना होगा..
रात को शीला ने सिर्फ एक गिलास दूध पिया और सो गई.. सुबह साढ़े पाँच बजे रसिक की घंटी बजते ही वो दूध लेने आई.. दूध लेने के बाद रसिक के मूसल लंड को मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए उसने रसिक को अपनी तरफ खींचकर, अपने बबलों को उसकी मजबूत छाती पर रगड़कर, उसे जाने दिया..
शीला: "टाईम पर आ जाना"
रसिक ने मुसकुराते हुए कहा "आ जाऊंगा भाभी.. !!"
वो दूध का केन लेकर चला गया और शीला बिस्तर पर आकर लेट गई.. उसकी आँख लग गई और जब वह जागी तब सुबह के नौ बज चुके थे.. वो तुरंत उठकर बाथरूम मे घुस गई.. सुबह का नित्यक्रम निपटाकर वह रसिक के लिए तैयार होने लगी.. एक मस्त लाल रंग की साड़ी उसने जिस्म पर लपेट ली.. न पेटीकोट पहना.. और ना ही ब्रा.. सिर्फ ब्लाउज और पेन्टी के ऊपर साड़ी लपेट ली.. !!
तैयार होकर वो रसिक का इंतज़ार करने लगी..
दस बजकर पाँच मिनट पर घर की घंटी बजी.. दरवाजा खोलते ही रसिक नजर आया.. उसे अंदर खींचकर शीला ने दरवाजा बंद कर दिया..
शीला लाल साड़ी में बड़ी ही कातिल लग रही थी.. देखते ही रसिक को मज़ा आ गया.. वह शीला के करीब आया.. और उसे बाहों में भरकर अपने तंग लोड़े को शीला की जांघों के बीच रगड़ने लगा.. उस स्पर्श से शीला मदहोश हो उठी.. और रसिक के सर को पीछे से दबोचकर उसके काले होंठों को चूमने लगी..


रसिक ने शीला की साड़ी का पल्लू हटाया और उसके ब्लाऊज़ के ऊपर से ही उसके मम्मों को दबाने लगा.. उसके होंठों को, अपने होंठों में दबाते हुए उसने एक हाथ उसके मम्मों पर रख दिया और दूसरे हाथ से उसकी साड़ी को ऊँचा उठा कर उसकी गांड को ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगा.. उसने शीला को एक दम जकड़ लिया.. शीला उसके लंड को अपनी चूत पर महसूस कर सकती थी और उसकी तो जैसे साँस अटक रही थी.. इसी दौरान शीला बेहद मस्ती में भर गई थी.. शीला का छोटा सा ब्लाऊज़ भी ज़मीन पर एक तरफ पड़ा था और रसिक उसके नंगे भरे-भरे बबलों को भींचते हुए उसके निप्पल चूसते हुए दाँतों से काट रहा था..


रसिक फिर उसे बेडरूम में ले गया और खड़े-खड़े ही उसकी साड़ी को खींच कर निकाल दिया.. पेटीकोट तो शीला ने पहना ही नहीं था.. रसिक उसकी टाँगों के बीच बैठ गया और उसकी पेन्टी उतार दी..

अब उसका मुँह शीला की नाभि को चूस रहा था और उसका एक हाथ शीला की दोनों टाँगों के बीच उसकी जाँघों पर सैर कर रहा था.. उसने शीला की जाँघ पर दबाव बनाया और शीला ने अपने पैर फ़ैला दिये.. अब वो रसिक को अपनी चूत खिलाने के लिये तैयार थी.. उसने अपनी चूत आगे की तरफ़ ढकेल दी.. रसिक ने अपने दोनों हाथों को उसकी टाँगों के बीच से लेकर उसकी गांड पर रख दिये..
शीला की टाँगें और फ़ैल गईं और उसकी आगे की तरफ़ निकली हुई चूत अब रसिक के मुँह के ठीक सामने थी.. “ससीसीईईऽऽऽ!” सिसकारी छूट गई शीला की जब रसिक की जीभ ने उसकी चूत को चाटा और उसके किनारों पर ज़ोर से जीभ रगड़ दी.. रसिक की जीभ शीला की चूत में घुसती जा रही थी और शीला के पैर जैसे उखड़ने को थे.. रसिक के हाथ जो शीला की टाँगों के बीच से पीछे की तरफ़ थे, उनसे शीला के हाथों की कलाइयों को पकड़ लिया.. अब शीला की चूत और आगे की तरफ़ निकल आयी और रसिक की जीभ उसकी चूत में और अंदर धंस गई..


रसिक ने इसी स्थिति में उसे उठा लिया और एक धक्का देकर बेड के बिल्कुल किनारे पर पटक दिया और खुद बेड के नीचे घुटनों के बल बैठ गया.. शीला की गांड के नीचे से निकले हुए रसिक के हाथों की वजह से उसकी चूत एक दम उठ गई थी, उसके पैर हवा में लहरा रहे थे और उसकी टाँगें एक दम फ़ैली हुई थीं.. उसकी चूत में रसिक की जीभ धंसती जा रही थी.. रसिक ने उसकी चूत में छुपे गुलाबी दाने को अपने होंठों में जकड़ लिया और उसपर बेतहाशा अपनी जीभ रगड़ कर चूमने लगा..

शीला की सिसकारियाँ फूट गई और उसकी चूत में खलबली मच गई.. उसकी मस्ती पूरे परवान पर थी और वो हिल भी नहीं सकती थी.. उसकी कलाइयों को रसिक ने पूरी ताकत से पकड़ रखा था और उसकी गांड बिस्तर से हवा में पूरी उठी हुई थी.. उसकी गांड ने एक ज़ोर का झटका दिया और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. अब रसिक ने उसकी कलाइयों को छोड़ा और अपने हाथ उसकी टाँगों के बीच से निकाल लिये.. अब वो बिल्कुल धराशायी हो गई बिस्तर पर.. “ओह गॉड...मज़ा आ गया रसिक!”
रसिक ऊपर चढ़ गया और उसके होंठों को चूमने लगा.. शीला ने रसिक की बालों से भरी छाती पर हाथ फिराने शुरू कर दिये.. अच्छा लगता था उसे जब रसिक की बालों से भरी छाती उसके चिकने और भरे हुए बबलों को रगड़ती थी.. अजीब तरह की गुदगुदी सी होती थी उसे.. अब शीला बैठ गई और उसने रसिक की पैंट के बटन खोले और उसकी पैंट और अंडरवेर निकाल कर फेंक दिये.. उसने रसिक के तगड़े लंड को अपने हाथों में लिया और उसकी जड़ से टोपे तक अपना हाथ ऊपर नीचे करने लगी.. उसके लंड की चमड़ी के पीछे होते ही उसका लाल-लाल गोल सुपाड़ा जैसे हमले की तैयारी में नज़र आता था.. शीला झुकी और रसिक का लंड चूसना शुरू कर दिया.. उसने रसिक के लंड के सुपाड़े को मुँह में लिया और उसका स्वाद अपनी जीभ पर महसूस करने लगी.. उसकी जीभ रसिक के लंड के मूतने वाले छेद में घुसने की कोशिश कर रही थी.. उसके सुपाड़े को अपनी जीभ में लपेट कर शीला उसके हर हिस्से का मज़ा ले रही थी..

रसिक उसके सर पर हाथ रख कर उसे दबाने लगा.. अब शीला रसिक के पूरे लंड को अपने मुँह में ले रही थी.. रसिक का लंड उसके गले तक जा रहा था और उसकी आँखें जैसे बाहर आने को हो गईं.. उसने लंड को थोड़ा बाहर निकाला और फिर थोड़ी कोशिश के बाद वो अब उसके लंड को अपने मुँह में एडजस्ट कर चुकी थी.. अब रसिक को पूरा मज़ा मिल रहा था.. शीला बिल्कुल रंडी की तरह अच्छे तरीके से उसका लंड चूस रही थी - नीचे से ऊपर... ऊपर से नीचे.. फिर रसिक ने उसे बिस्तर से नीचे उतरने को कहा..

शीला बड़ी ही मस्ती में झूमती हुई बिस्तर से उतर कर नीचे खड़ी होकर झुक गई और अपने हाथ बेड पर रख दिये.. अब वो बेड का सहारा लेकर गांड उठाये खड़ी थी.. रसिक उसके पीछे आकर खड़ा हो गया.. शीला की गांड उठ कर उघड़ी हुई थी और वो गांड मटकाते हुए आराम से रसिक के लंड का अपनी चूत में घुस जाने का इंतज़ार करने लगी.. रसिक ने शीला के पैरों को और फैलाया और अपने लंड को पकड़ कर शीला कि उठी गांड पर रगड़ने लगा.. वो उसके पीछे खड़ा होकर उसकी उठी हुई गांड से लेकर उसकी चूत तक अपने लंड को रगड़ रहा था.. शीला की सिसकारियों से कमरा गूँज रहा था.. शीला की चूत के मुँह पर उसने अपने लंड को एडजस्ट किया और धीरे-धीरे बड़े प्यार से लंड के सुपाड़े को उसकी चूत में पहुँचा दिया..

शीला ने मदहोश होकर अपनी गांड ओर उठा दी और रसिक ने अपना लंड एक झटके से पूरा का पूरा शीला की चूत में ढकेल दिया.. शीला को एक झटका सा लगा और उसकी सिसकारियाँ फूटने लगीं.. रसिक ने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़ा और नीचे से जोर-जोर से झटके मारने शुरू कर दिये और शीला की कमर को पकड़ कर एक लय में उसके जिस्म को हिलाने लगा.. शीला का पूरा जिस्म हिल रहा था.. उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी चूत को कोई उठा-उठा कर रसिक के लंड पर पटक रहा था, और रसिक का लंड उसकी चूत को चीरते हुए उसके पेट में घुस रहा था..

शीला की सिसकारियाँ अब मदहोशी की चीखों में बदल चुकी थी.. उसकी चूत के थपेड़े रसिक के लंड पर बेतहाशा पड़ रहे थे.. रसिक ने उसकी कमर को कस कर पकड़ रखा था और शीला की गांड से लेकर उसके कंधों तक उसके जिस्म को झकझोर कर रख दिया था.. रसिक उसे बुरी तरह चोदे जा रहा था और शीला के पैर ज़मीन से उठने लगे थे.. रसिक ने उसकी कमर को छोड़ दिया और उसकी जाँघों को अंदर की तरफ़ से पकड़ कर उसे ऊपर उठा लिया.. अब शीला अपने हाथों को बेड पर टिकाये हवा में लहरा रही थी और रसिक उसकी चूत में बेतहाशा धक्के लगाये जा रहा था.. रसिक के धक्के एक दम तेज़ हो गये और शीला की चूत में जैसे ज्वालामुखी फट गया..


पता नहीं किसका पानी कब गिरा, दोनों के जिस्म अब शाँत पड़ने लगे.. रसिक ने शीला की जाँघें छोड़ दीं तो शीला के पैर ज़मीन पर पड़े.. शीला घूमी और धड़ाम से बेड पर गिर गई.. “रसिक, मज़ा आ गया..!” रसिक भी उसकी बगल में लेट गया और शीला ने उसके होंठों को चूम लिया..
शीला की मौज हो चली थी.. पिछले दो दिन से मजे ही मजे थे शीला के...
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उधर रसिक के खेत से धुआंधार हिंसक चुदाई के बाद शीला घर पहुँचती है..
अब आगे...
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शाम तक घर पहुंचते पहुंचते शीला इतनी थक गई थी की जाते ही बिस्तर पर ढेर होकर गिर गई.. शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था उसका.. आज पहली बार रसिक ने उसे जानवर की तरह ठोका था.. भांग के अत्याधिक प्रभाव के तले..!! जिस्म का हर कतरा, हल्के पर मीठे दर्द से कराह रहा था.. यहाँ तक की चूत की दीवारें भी आज की भारी रगड़न के बाद चिलमिलाई हुई थी..
पर शीला को अच्छा लग रहा था.. इतने लंबे समय के बंधन के बाद.. आज मिली इस स्वतंत्रता ने शीला के दिल-ओ-जान को तरोताजा कर दिया था.. पतली सी चादर ओढ़े लेटी शीला, कांच की खिड़की से आ रही धूप सेंकते हुए.. मीठे मीठे दर्द को महसूस कर रही थी.. ऐसा लग रहा था की सख्त हो चुके शरीर की जोड़ें.. इस धमाकेदार चुदाई के बाद लचीली हो गई थी.. !!
काफी लंबे अरसे तक इस स्वतंत्रता से वंचित रहकर वह हर दिन नए संघर्ष का सामना करती रहती थी.. संघर्ष अपने आप से.. अपने मन से.. अपनी इच्छाओं से.. अपनी हवस से.. !! हर दिन उसका जिस्म नए मर्द के संसर्ग के लिए मचलता.. और हररोज वह अपने आप को समझाती.. रिश्तों की जिम्मेदारी की बेड़ियों में जकड़ी हुई, उसने अपने सपनों और इच्छाओं को कहीं बहुत गहरे दबा दिया था..
लेकिन अब, समय ने करवट ली है.. शीला ने उन बेड़ियों को तोड़ने का साहस जुटाया है और एक नई हवा में सांस लेना शुरू किया है.. यह हवा स्वतंत्रता की है, अपने अस्तित्व के एहसास की है.. और अब शीला खुद से एक वादा कर चुकी है—वह इस आज़ादी को खोने नहीं देगी.. चाहे कुछ भी हो जाए.. चाहे उसे कुछ भी करना क्यों न पड़ें.. !!!
शीला की आंखों में अब एक नई चमक है, उसके कदम आत्मविश्वास से भरे हुए हैं.. वह अपने जीवन की कहानी को खुद लिखने का निर्णय ले चुकी है.. यह उसकी जीत है—एक आजाद महिला की, जिसने खुद को पाया है और अपने भीतर के स्वतंत्र व्यक्तित्व को गले लगाया है.. अपने हिसाब से ज़िंदगी जीना यह उसका अधिकार है, उसका स्वाभिमान है.. वह अपने अंदर उस पुरानी शीला को को फिर से तलाश चुकी थी, खुद को पहचान चुकी थी.. अपनी इच्छाओं को वह किसी जिम्मेदारी के बोझ तले कुचलेगी नहीं.. उसने यह वादा किया था.. अपने आप से.. अपनी नई उड़ान से..!!
सो कर शीला शाम को उठी.. रात का खाना बनाने का उसे मूड नहीं था.. मदन तो राजेश के साथ गया था और वापिस लौटते देर होने वाली थी इसलिए वो खाना खाकर ही लौटेगा.. खुद के लिए कुछ बनाने का मन नहीं हो रहा था लेकिन पिंटू के लिए तो खाना बनाना ही था.. शीला ने मस्त गरम कॉफी बनाई और मग लेकर अपने झूले पर बैठ गई..
अपने कारनामों को यूं ही चलते रहने देने के लिए आगे क्या करना चाहिए वह सोच रही थी.. एक बात तो तय थी.. जब तक पिंटू और वैशाली उसके पड़ोस में थे तब तक वह कुछ भी कर नहीं पाएगी यह वो जानती थी.. अगर वह दोनों अपना घर कहीं ओर शिफ्ट कर ले फिर भी.. जब तक पिंटू इस शहर मे था उसकी नजर हमेशा शीला की इर्दगिर्द रहने ही वाली थी
एक ही तरीका था.. अगर पिंटू और वैशाली किसी और शहर में चले जाएँ तो लाइन क्लियर हो सकती थी.. पर वो होगा कैसे?? शीला काफी देर तक सोचती रही और उसके दिमाग में एक योजना आकार लेने लगी..
रात को शीला की मदन से फोन पर बात हुई तो पता चला की मदन आज की रात पीयूष के घर रुकने वाला था, क्योंकी राजेश को किसी पार्टी में जाना था और आने मे देर हो जाने की संभावना थी.. देर रात हाइवे पर ड्राइव करने से बेहतर, उन्हों ने रात पीयूष के घर ही रुक जाने का फैसला किया था.. मदन ने यह भी बताया की चूंकि पिंटू दूसरे दिन अपने घर आने वाला था, वैशाली के ससुर ने मदन को दोपहर के खाने पर न्योता दिया था.. इसलिए मदन अब कल शाम को ही लौटेगा..
मदन का फोन खतम होते ही.. दो बातों ने प्रमुखता से शीला का ध्यान खींचा.. पहली यह की पिंटू अपने घर वैशाली से मिलने जाने वाला था और दूसरी यह की मदन कल शाम से पहले घर लौटने वाला नहीं था..!! यह दोनों कारक, शीला को रोमांचित कर देने के लिए काफी थे.. कल शाम तक का दिन उसकी स्वच्छंदता के लिए आरक्षित था..!!
दूसरे दिन के लिए, किसी भी प्रकार की योजना बनाने से पहले, शीला यह सुनिश्चित करना चाहती थी की पिंटू सही में घर जाने वाला था या फिर शीला को रंगेहाथों पकड़ने की उसकी कोई नई चाल है..!!शाम के चार बज रहे थे और पिंटू रात का खाना शीला के साथ खाने वाला था.. अगर वो आज शाम को ही घर के लिए निकलने वाला होता, जैसा की वो हर बार करता था, तो अब तक उसका फोन आ जाना चाहिए था.. !!!
यह सब विचारों में घिरे हुए, शीला फ्रिज से भिंडी लेकर आई और झूले पर बैठे हुए काटने लगी.. ताकि पिंटू के लिए खाना बनाने की शुरुआत की जा सकें.. क्योंकी पिंटू का अब तक तो कोई मेसेज नहीं आया था..
वो सब्जी काट रही थी तभी उसका मोबाइल बजा.. स्क्रीन पर पिंटू का नाम देखते ही शीला के होंठों पर मुस्कान आ गई..
शीला: "हैलो.. !!"
पिंटू: "मम्मी जी, सॉरी मैं आपको जल्दी फोन करना भूल गया.. मैंने यह बताने के लिए फोन किया है की मैं आज शाम की बस से घर जा रहा हूँ.. मैंने कल की छुट्टी ले ली है.. वैशाली जिद कर रही थी तो सोचा चला जाऊँ.. पापा जी भी वहीं है और कल दोपहर खाने पर आ रहे है.. चाहें तो आप भी साथ चल सकती है.. कहों तो मैं आपको लेने आ जाऊँ??"
शीला: "नहीं बेटा.. मन तो बहोत है पर दोपहर से मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है.. पूरे बदन में दर्द हो रहा है.. इसलिए तुम ही चले जाओ"
पिंटू: "जैसी आपकी मर्जी.. वैसे आपने रात का खाना बना तो नहीं लिया है ना..!! अगर बना लिया हो तो फिर मैं घर आकर खाना खाकर फिर जाऊंगा.. खाना वेस्ट नहीं होना चाहिए"
शीला: "अरे बिल्कुल चिंता मत करो.. !! मैंने तो अभी शुरुआत भी नहीं की है.. हम दोनों का ही खाना बनाना था.. एक घंटे से ज्यादा समय नहीं लगता है.. इसलिए मैं आराम से शुरू करने वाली थी.. अब तुम भी नहीं आ रहे हो और मेरी तबीयत भी नासाज है.. इसलिए मैं कुछ सूप और सलाद जैसा हल्का फुल्का बना लूँगी.. तुम इत्मीनान से जा कर आओ"
पिंटू: "ठीक है मम्मी जी.. रखता हूँ फोन"
फोन काटते ही शीला ने चैन की सांस ली.. उसे तसल्ली हो गई की पिंटू अब परसों सुबह तक नहीं लौटने वाला..
शीला उन बिना कटी भिंडी को लेकर घर के अंदर आई और सब्जियों को वापिस फ्रिज में रख दिया.. उसने घर का दरवाजा बंद किया और आराम से सोफ़े पर बैठ गई.. अब रसिक से बात करना चाहती थी.. बात तो उसे तब से करनी थी जब से वो लौटी थी.. लेकिन उसने तय किया था की उसका नशा उतर जाने के बाद ही बात करना मुनासिब होगा..
शीला ने रसिक को फोन लगाया.. दो बार रिंग बजकर फोन कट गया पर रसिक ने फोन उठाया नहीं.. एक पल के लिए शीला डर गई.. कहीं ज्यादा नशे के कारण वह कमीना मर तो नहीं गया होगा.. !!! अगर सच में मर गया होगा तो शीला की शामत आ जाएगी.. क्योंकी आखिरी बार रसिक से वो ही मिली थी..!!
शीला के पसीने छूटने लगे.. उसने तेज पंखा चला दिया और सोफ़े पर बैठ गई..
तभी रसिक का फोन आया देख उसकी जान में जान आई
शीला: "अबे भड़वे.. कहाँ माँ चुदवा रहा था?"
रसिक: "क्या भाभी.. आपने तो शुरुआत ही गाली-गलोच से कर दी"
शीला: "तो और क्या करूँ..!!! आरती उतारूँ तेरी?? फोन क्यों नहीं उठा रहा था कब से?"
रसिक: "अरे भाभी, आपके जाने के बाद सो गया था और अभी उठा.. सिर इतना भारी भारी लग रहा था इसलिए ट्यूबवेल के नीचे नहाने बैठ गया था"
शीला ने गुस्से से कहा "तो अपनी गांड मरवाने इतना नशा करता है..!! साले मादरचोद.. तुझे अंदाजा भी है की तूने मेरे शरीर के साथ क्या क्या कर दिया.. !! नोच खाया मुझे.. !! मेरे बबलों को तो ऐसा तोड़ा-मरोड़ा जैसे तेरी भेस के थन हो..!! पूरे शरीर पर तेरे नाखून और काटने के निशान बन गए है.. इतना दर्द हो रहा है मुझे.. !!"
यह सुनकर रसिक झेंप सा गया.. उसने कहा "माफ कर दीजिए भाभी.. नशे की हालत में, मुझे कुछ पता ही नहीं रहा.. वैसे तो रोज एकाद गोली ही लेता हूँ पर आपका इंतज़ार करते करते दूसरी गोली चढ़ा ली.. इसलिए ज्यादा नशा हो गया.. हो जाता है कभी कभी.. आप ऐसे गुस्सा मत कीजिए"
शीला: "मैं तेरी गांड में जलता हुआ सरिया डालकर कहूँगी की हो जाता है कभी कभी.. तो चलेगा? भेनचोद, आव देखा न ताव.. ऐसे टूट पड़ा जैसे औरत कभी देखी ही न हो.. वक्त रहते मैं निकल न गई होती तो आज तू मुझे मार ही देता.. और मेरी लाश को खेत के कोने में गाड़ देता.. !!"
रसिक: "कैसी बातें कर रही हो आप भाभी..!! माफी मांग रहा हूँ ना मैं.. अब हो गई गलती.. जो हो गया उसे तो मैं बदल नहीं सकता.. अगली बार मिलूँगा तो आपके पैर पकड़कर माफी मांग लूँगा, बस.. !! अब तो शांत हो जाइए.. !! आप सही कह रही हो.. भांग थोड़ी ज्यादा ही हो गई थी.. पर क्या आपको बिल्कुल भी मज़ा नहीं आया था??"
सुनकर शीला का गुस्सा शांत हुआ.. और वो मुसकुराते हुए बोली "हाँ.. मज़ा तो आया था.. पर ओर मज़ा आता अगर तू भांग खाकर जानवर बन नहीं गया होता तो.. खैर, अब जो हो गया उसे छोड़.. और सुन.. कल सुबह आ जाना.. घर पर कोई नहीं होगा"
रसिक: "और वो आपका दामाद.. !! उसका क्या..??"
शीला: "वह भी नहीं होगा.. आज शाम को चला जाएगा और परसों सुबह आएगा.. इसलिए हमारा रास्ता साफ है.. कल सुबह दूध देने आएगा तब मजे करेंगे"
रसिक: "अरे भाभी.. सुबह नहीं.. आपके चक्कर में बाकी ग्राहकों को दूध देने मे देरी हो जाती है और वो सब चिल्लाते है मुझ पर.. और जल्दी जल्दी में मज़ा नहीं आएगा.. मैं एक काम करता हूँ.. सब काम निपटाकर सुबह दस बजे आ जाता हूँ.. फिर कोई जल्दी नहीं होगी और आराम से करेंगे"
शीला ने कुछ देर सोचने के बाद कहा "हम्म ठीक है.. चलेगा, पर आ जाना टाइम पर"
रसिक: "पक्का भाभी.. आ जाऊंगा"
रसिक से फोन पर बात हो रही थी तभी शीला के घर की डोरबेल बजी.. फोन पर बात करते हुए ही उसने दरवाजा खोला तो सामने पिंटू खड़ा था.. घबराहट में शीला के हाथ से फोन गिर गया..!! पिंटू मोबाइल के स्क्रीन पर रसिक का नाम देख पाता उससे पहले शीला ने अपनी हथेली स्क्रीन पर रखकर फोन तुरंत उठा लिया.. रसिक अब भी "हैलो-हैलो" किए जा रहा था जो फोन के स्पीकर से स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था.. शीला ने फुर्ती से फोन काट दिया और कृत्रिम मुस्कान के साथ पिंटू की तरफ देखने लगी
पिंटू: "वो मैं अपने कपड़े लेने घर आया था.. और आपको घर की चाबी देने आया हूँ"
शीला: "ओह्ह.. हाँ.. वो.. क्या कहा.. अच्छा चाबी देने.. हाँ हाँ.. ठीक है"
शीला की बोली लड़खड़ाते हुए देख पिंटू को कुछ शक जरूर हुआ.. शीला की आँखों में आँखें डालकर देखते हुए उसने पूछा
पिंटू: "किसका फोन था?"
कोई और होता तो शीला ने अब तक तीखा जवाब दे दिया होता.. पर पिंटू के साथ यह मुमकिन नहीं था
शीला: "क्या.. वो.. फोन.. हाँ फोन पर बात कर रही थी.. अमम.. वो तो रेणुका का फोन था"
पिंटू को शक था की उसने किसी मर्द की आवाज सुनी थी.. पर उसे समय पर बस पकड़नी थी इसलिए हड़बड़ी में था.. शीला के हाथ में घर की चाबी थमाकर वो चला गया
यह पूरा वाकया करीब एक मिनट के अंदर हो गया था.. लेकिन शीला को ऐसा लगा जैसे एक घंटा बीत गया हो.. पसीने छूट गए शीला के.. ऐसी प्रति-पतीक्षा की आदि नहीं थी वो.. और खासकर तब जब वो झूठ बोल रही हो..
दरवाजा बंद करने के बाद वो वापिस सोफ़े पर आकर बैठ गई और सोचने लगी.. अगर पिंटू को शक हो गया होगा तो?? अगर पिंटू ने देखने के लिए फोन मांगा होता तो? अगर पिंटू अब भी कहीं छुपकर नजर रख रहा होगा तो?
घुटन सी महसूस हो रही थी शीला को.. ऐसा कब तक चलेगा..!! कुछ न कुछ उपाय तो करना पड़ेगा इस पिंटू का.. !! शाम को झूले पर बैठे बैठे उसने जो योजना सोची थी उसके बारे में फिर से सोचने लगी शीला.. अब उसे लग रहा था की समय से पहले ही उस योजना को अमल मे लाना होगा..
रात को शीला ने सिर्फ एक गिलास दूध पिया और सो गई.. सुबह साढ़े पाँच बजे रसिक की घंटी बजते ही वो दूध लेने आई.. दूध लेने के बाद रसिक के मूसल लंड को मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए उसने रसिक को अपनी तरफ खींचकर, अपने बबलों को उसकी मजबूत छाती पर रगड़कर, उसे जाने दिया..
शीला: "टाईम पर आ जाना"
रसिक ने मुसकुराते हुए कहा "आ जाऊंगा भाभी.. !!"
वो दूध का केन लेकर चला गया और शीला बिस्तर पर आकर लेट गई.. उसकी आँख लग गई और जब वह जागी तब सुबह के नौ बज चुके थे.. वो तुरंत उठकर बाथरूम मे घुस गई.. सुबह का नित्यक्रम निपटाकर वह रसिक के लिए तैयार होने लगी.. एक मस्त लाल रंग की साड़ी उसने जिस्म पर लपेट ली.. न पेटीकोट पहना.. और ना ही ब्रा.. सिर्फ ब्लाउज और पेन्टी के ऊपर साड़ी लपेट ली.. !!
तैयार होकर वो रसिक का इंतज़ार करने लगी..
दस बजकर पाँच मिनट पर घर की घंटी बजी.. दरवाजा खोलते ही रसिक नजर आया.. उसे अंदर खींचकर शीला ने दरवाजा बंद कर दिया..
शीला लाल साड़ी में बड़ी ही कातिल लग रही थी.. देखते ही रसिक को मज़ा आ गया.. वह शीला के करीब आया.. और उसे बाहों में भरकर अपने तंग लोड़े को शीला की जांघों के बीच रगड़ने लगा.. उस स्पर्श से शीला मदहोश हो उठी.. और रसिक के सर को पीछे से दबोचकर उसके काले होंठों को चूमने लगी..


रसिक ने शीला की साड़ी का पल्लू हटाया और उसके ब्लाऊज़ के ऊपर से ही उसके मम्मों को दबाने लगा.. उसके होंठों को, अपने होंठों में दबाते हुए उसने एक हाथ उसके मम्मों पर रख दिया और दूसरे हाथ से उसकी साड़ी को ऊँचा उठा कर उसकी गांड को ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगा.. उसने शीला को एक दम जकड़ लिया.. शीला उसके लंड को अपनी चूत पर महसूस कर सकती थी और उसकी तो जैसे साँस अटक रही थी.. इसी दौरान शीला बेहद मस्ती में भर गई थी.. शीला का छोटा सा ब्लाऊज़ भी ज़मीन पर एक तरफ पड़ा था और रसिक उसके नंगे भरे-भरे बबलों को भींचते हुए उसके निप्पल चूसते हुए दाँतों से काट रहा था..


रसिक फिर उसे बेडरूम में ले गया और खड़े-खड़े ही उसकी साड़ी को खींच कर निकाल दिया.. पेटीकोट तो शीला ने पहना ही नहीं था.. रसिक उसकी टाँगों के बीच बैठ गया और उसकी पेन्टी उतार दी..

अब उसका मुँह शीला की नाभि को चूस रहा था और उसका एक हाथ शीला की दोनों टाँगों के बीच उसकी जाँघों पर सैर कर रहा था.. उसने शीला की जाँघ पर दबाव बनाया और शीला ने अपने पैर फ़ैला दिये.. अब वो रसिक को अपनी चूत खिलाने के लिये तैयार थी.. उसने अपनी चूत आगे की तरफ़ ढकेल दी.. रसिक ने अपने दोनों हाथों को उसकी टाँगों के बीच से लेकर उसकी गांड पर रख दिये..
शीला की टाँगें और फ़ैल गईं और उसकी आगे की तरफ़ निकली हुई चूत अब रसिक के मुँह के ठीक सामने थी.. “ससीसीईईऽऽऽ!” सिसकारी छूट गई शीला की जब रसिक की जीभ ने उसकी चूत को चाटा और उसके किनारों पर ज़ोर से जीभ रगड़ दी.. रसिक की जीभ शीला की चूत में घुसती जा रही थी और शीला के पैर जैसे उखड़ने को थे.. रसिक के हाथ जो शीला की टाँगों के बीच से पीछे की तरफ़ थे, उनसे शीला के हाथों की कलाइयों को पकड़ लिया.. अब शीला की चूत और आगे की तरफ़ निकल आयी और रसिक की जीभ उसकी चूत में और अंदर धंस गई..


रसिक ने इसी स्थिति में उसे उठा लिया और एक धक्का देकर बेड के बिल्कुल किनारे पर पटक दिया और खुद बेड के नीचे घुटनों के बल बैठ गया.. शीला की गांड के नीचे से निकले हुए रसिक के हाथों की वजह से उसकी चूत एक दम उठ गई थी, उसके पैर हवा में लहरा रहे थे और उसकी टाँगें एक दम फ़ैली हुई थीं.. उसकी चूत में रसिक की जीभ धंसती जा रही थी.. रसिक ने उसकी चूत में छुपे गुलाबी दाने को अपने होंठों में जकड़ लिया और उसपर बेतहाशा अपनी जीभ रगड़ कर चूमने लगा..

शीला की सिसकारियाँ फूट गई और उसकी चूत में खलबली मच गई.. उसकी मस्ती पूरे परवान पर थी और वो हिल भी नहीं सकती थी.. उसकी कलाइयों को रसिक ने पूरी ताकत से पकड़ रखा था और उसकी गांड बिस्तर से हवा में पूरी उठी हुई थी.. उसकी गांड ने एक ज़ोर का झटका दिया और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. अब रसिक ने उसकी कलाइयों को छोड़ा और अपने हाथ उसकी टाँगों के बीच से निकाल लिये.. अब वो बिल्कुल धराशायी हो गई बिस्तर पर.. “ओह गॉड...मज़ा आ गया रसिक!”
रसिक ऊपर चढ़ गया और उसके होंठों को चूमने लगा.. शीला ने रसिक की बालों से भरी छाती पर हाथ फिराने शुरू कर दिये.. अच्छा लगता था उसे जब रसिक की बालों से भरी छाती उसके चिकने और भरे हुए बबलों को रगड़ती थी.. अजीब तरह की गुदगुदी सी होती थी उसे.. अब शीला बैठ गई और उसने रसिक की पैंट के बटन खोले और उसकी पैंट और अंडरवेर निकाल कर फेंक दिये.. उसने रसिक के तगड़े लंड को अपने हाथों में लिया और उसकी जड़ से टोपे तक अपना हाथ ऊपर नीचे करने लगी.. उसके लंड की चमड़ी के पीछे होते ही उसका लाल-लाल गोल सुपाड़ा जैसे हमले की तैयारी में नज़र आता था.. शीला झुकी और रसिक का लंड चूसना शुरू कर दिया.. उसने रसिक के लंड के सुपाड़े को मुँह में लिया और उसका स्वाद अपनी जीभ पर महसूस करने लगी.. उसकी जीभ रसिक के लंड के मूतने वाले छेद में घुसने की कोशिश कर रही थी.. उसके सुपाड़े को अपनी जीभ में लपेट कर शीला उसके हर हिस्से का मज़ा ले रही थी..

रसिक उसके सर पर हाथ रख कर उसे दबाने लगा.. अब शीला रसिक के पूरे लंड को अपने मुँह में ले रही थी.. रसिक का लंड उसके गले तक जा रहा था और उसकी आँखें जैसे बाहर आने को हो गईं.. उसने लंड को थोड़ा बाहर निकाला और फिर थोड़ी कोशिश के बाद वो अब उसके लंड को अपने मुँह में एडजस्ट कर चुकी थी.. अब रसिक को पूरा मज़ा मिल रहा था.. शीला बिल्कुल रंडी की तरह अच्छे तरीके से उसका लंड चूस रही थी - नीचे से ऊपर... ऊपर से नीचे.. फिर रसिक ने उसे बिस्तर से नीचे उतरने को कहा..

शीला बड़ी ही मस्ती में झूमती हुई बिस्तर से उतर कर नीचे खड़ी होकर झुक गई और अपने हाथ बेड पर रख दिये.. अब वो बेड का सहारा लेकर गांड उठाये खड़ी थी.. रसिक उसके पीछे आकर खड़ा हो गया.. शीला की गांड उठ कर उघड़ी हुई थी और वो गांड मटकाते हुए आराम से रसिक के लंड का अपनी चूत में घुस जाने का इंतज़ार करने लगी.. रसिक ने शीला के पैरों को और फैलाया और अपने लंड को पकड़ कर शीला कि उठी गांड पर रगड़ने लगा.. वो उसके पीछे खड़ा होकर उसकी उठी हुई गांड से लेकर उसकी चूत तक अपने लंड को रगड़ रहा था.. शीला की सिसकारियों से कमरा गूँज रहा था.. शीला की चूत के मुँह पर उसने अपने लंड को एडजस्ट किया और धीरे-धीरे बड़े प्यार से लंड के सुपाड़े को उसकी चूत में पहुँचा दिया..

शीला ने मदहोश होकर अपनी गांड ओर उठा दी और रसिक ने अपना लंड एक झटके से पूरा का पूरा शीला की चूत में ढकेल दिया.. शीला को एक झटका सा लगा और उसकी सिसकारियाँ फूटने लगीं.. रसिक ने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़ा और नीचे से जोर-जोर से झटके मारने शुरू कर दिये और शीला की कमर को पकड़ कर एक लय में उसके जिस्म को हिलाने लगा.. शीला का पूरा जिस्म हिल रहा था.. उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी चूत को कोई उठा-उठा कर रसिक के लंड पर पटक रहा था, और रसिक का लंड उसकी चूत को चीरते हुए उसके पेट में घुस रहा था..

शीला की सिसकारियाँ अब मदहोशी की चीखों में बदल चुकी थी.. उसकी चूत के थपेड़े रसिक के लंड पर बेतहाशा पड़ रहे थे.. रसिक ने उसकी कमर को कस कर पकड़ रखा था और शीला की गांड से लेकर उसके कंधों तक उसके जिस्म को झकझोर कर रख दिया था.. रसिक उसे बुरी तरह चोदे जा रहा था और शीला के पैर ज़मीन से उठने लगे थे.. रसिक ने उसकी कमर को छोड़ दिया और उसकी जाँघों को अंदर की तरफ़ से पकड़ कर उसे ऊपर उठा लिया.. अब शीला अपने हाथों को बेड पर टिकाये हवा में लहरा रही थी और रसिक उसकी चूत में बेतहाशा धक्के लगाये जा रहा था.. रसिक के धक्के एक दम तेज़ हो गये और शीला की चूत में जैसे ज्वालामुखी फट गया..


पता नहीं किसका पानी कब गिरा, दोनों के जिस्म अब शाँत पड़ने लगे.. रसिक ने शीला की जाँघें छोड़ दीं तो शीला के पैर ज़मीन पर पड़े.. शीला घूमी और धड़ाम से बेड पर गिर गई.. “रसिक, मज़ा आ गया..!” रसिक भी उसकी बगल में लेट गया और शीला ने उसके होंठों को चूम लिया..
शीला की मौज हो चली थी.. पिछले दो दिन से मजे ही मजे थे शीला के...
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