Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 48 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

मैक-आलू टिक्की का बर्गर है या डबल रोटी??



 
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

शीला अपनी बेटी वैशाली के घर आई है, जहाँ घर के सभी सदस्य अनुपस्थित हैं.. माँ-बेटी साथ समय बिताती हैं, जिससे वैशाली को सहारा मिलता है.. हालाँकि, तीसरे दिन, वैशाली इंस्टाग्राम पर उत्तेजक विडियो देखकर कामुक रूप से उत्तेजित हो जाती है.. अपनी तीव्र इच्छा को शांत करने के लिए, वह कविता की माँ के नौकर बाबिल को बुलाने की योजना बनाती है..

शीला को वैशाली एक प्रदर्शनी में साड़ियाँ देखने भेज देती है.. मौका मिलते ही वह बाबिल को अपने घर बुला लेती है और उसके साथ यौन संबंध शुरू कर देती है.. जैसे ही वे आपस में मग्न होते हैं, अचानक दरवाजे की घंटी बज उठती है, जिससे दोनों चौंक जाते हैं..

अब आगे..


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एक ही पल में वैशाली का हाथ बाबिल के ट्रेकपेंट के ऊपर से ही उसके मस्त लंड को सहलाने लग गया..





इससे पहले की बाबिल संभल पाता, वैशाली ने एक झटके में उसका पेंट, जांघिये समेट घुटनों तक उतार दिया.. और बाबिल के तने हुए हथियार के सामने उकड़ूँ अवस्था में बैठ गई

प्यारे गुलाबी लंड की मोटाई को अपनी मुठ्ठी में पकड़कर, उभरी हुई नसों को वह बेतहाशा चाटने लगी.. बाबिल के तो जैसे होश ही उड़ गए.. चमकते हुए गुलाबी टोपे के मूत्र-छेद पर अपनी जीभ की नोक से चाटना शुरू कर वैशाली ने कुछ ही पलों में उस लंबे लंड को अपने कंठ तक उतार दिया..!!





टिंग टॉंग..!!!

घर की डोरबेल बजी..

वैशाली ने तुरंत लंड को अपने मुंह से बाहर निकाला.. सोच में पड़ गई.. बेवक्त कौन टपक पड़ा..?? उसने अपने होंठ पर उंगली रखकर बाबिल को शांत खड़े रहने का इशारा किया.. पास बेड पर पड़ा टॉप पहन लिया.. और दरवाजे पर आई.. खोलने से पहले उसने दरवाजे में बने छेद से बाहर देखा... बाहर उसकी मम्मी शीला खड़ी थी..!!!!

अरे बाप रे..!!! मम्मी इतनी जल्दी कैसे वापिस आ गई?? अब क्या करें..??? बाबिल को कहाँ छुपाऊँ??

उसी उधेड़बुन के बीच शीला ने और दो तीन बार डोरबेल बजाई..

वैशाली भागकर बेडरूम में आई और बाबिल से कहा.. "जल्दी कपड़े ठीक कर ले.. और झाड़ू उठाकर सफाई शुरू कर"

बाबिल को पता नहीं चला की उसे असल में बुलाया किस लिए गया था..!!! वैशाली को इतनी घबराए हुए देखकर उसने तुरंत झाड़ू उठाया और फर्श पर लगाने लगा..

वैशाली ने दरवाजा खोला.. शीला अंदर आकर उसे आश्चर्य से देखती रही.. ऊपर से नीचे तक वैशाली का निरीक्षण करते हुए शीला के शातिर मन में सौ सवाल खड़े हो रहे थे.. पर वो गर्मी से बेहाल हो रही थी इसलिए उसने पंखा ऑन किया और धम्म से सोफ़े पर बैठ गई..

वैशाली की नज़रों में छुपा डर साफ नजर आ रहा था शीला को.. वह रुमाल से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए वैशाली की तरफ तीक्ष्ण नज़रों से देख रही थी

वैशाली ने कृत्रिम मुस्कान के साथ कहा "अरे मम्मी, इतनी जल्दी कैसे आ गई? सेल में गई नहीं क्या?"

शीला ने थोड़े गुस्से से कहा "मुझे वहाँ भेजने से पहले चेक तो करना था.. सेल तो कल ही खतम हो गया.. बेकार में आने जाने के २०० रुपये ले लिए ऑटो वाले ने.. पर तू बता.. तू तो ऑफिस जाने वाली थी ना..??"

वैशाली ने नजरें झुका ली और कहा "वो फिर आज ट्रक आया ही नहीं तो मटीरीअल कल ही जाएगा.. जाने का कोई मतलब नहीं था इसलिए..!!"

शीला को कुछ तो गंध आ रही थी पर पता नहीं चल पा रहा था की वैशाली आखिर क्या गुल क हिला रही है.. तभी बेडरूम से कुछ गिरने की आवाज आई.. शीला और वैशाली दोनों चोंक उठे..

शीला: "कौन है अंदर?"

अब वैशाली की कठिन परीक्षा होने वाली थी

वैशाली: "वो.. वो... काफी दिनों से कामवाली बाई नहीं आई थी.. तो मैंने कविता के नौकर को फोन करके बुला लिया..!!"

संशय भरी नज़रों से शीला वैशाली की ओर देखती रही.. घर तो पहले से ही साफ-सुथरा था.. उसने खुद ही पिछले दिन पूरी सफाई की थी.. और वैसे भी वैशाली पहले से सफाई के लिए उतनी उत्सुक नहीं रहती थी.. घर पर भी उसकी ज्यादातर चीजें अस्तव्यस्त ही पड़ी रहती थी.. शीला के लाख कहने के बाद ही वह सफाई करती थी.. ऐसे में वैशाली की कही बात शीला को हजम नहीं हुई

शीला तुरंत उठ खड़ी हुई.. और अंदर बेडरूम में गई.. अंदर उस नेपाली लड़के को काम करते हुए उसने कुछ मिनटों तक उसका गहराई से मुआयना किया.. और फिर वापिस बाहर आई तब तक वैशाली किचन में चली गई थी.. असल में वह शीला से नजर मिलाना नहीं चाहती थी

सोफ़े पर आकर बैठी शीला का दिमाग बुलेट ट्रेन की गति से चलने लगा..!! साड़ियों के सेल में भेजने के लिए वैशाली की उत्सुकता.. फिर अचानक ऑफिस जाने की बात... फिर आधे ही घंटे के अंदर सब केन्सल हो जाना और अकेली वैशाली एक गोरे-चिट्टे तंदूरस्त जवान लड़के के साथ..!!

शीला के दिमाग को दो और दो चार का गणित गिनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा.. उसने आवाज देकर वैशाली को बुलाना चाहा.. पर ड्रॉइंग रूम में उनकी बातचीत उस नौकर को भी सुनाई देती.. इसलिए वैशाली को बुलाने के बजाए उसने खुद ही अंदर कीचेन में जाकर बात करना मुनासिब समझा..

वह जब कीचेन में आई तो वैशाली बेफिजूल ही बर्तन ऊपर नीचे कर रही थी..

शीला: "क्या चल रहा है कुछ बताएगी मुझे तू?"

वैशाली का बदन पसीने से तर हो गया, वह जानती थी की अपनी मम्मी की नज़रों से यह छुपाना नामुमकिन था

उसने बनावटी हंसी के साथ कहा "किस बारे में बात कर रही हो मम्मी? मैं समझी नहीं"

अब शीला की भृकुटी तंग हो गई, उसने वैशाली का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए कहा "आधे घंटे पहले तक तो ऑफिस जाने की बहोत जल्दी थी तुझे.. मुझे अकेले नहीं जाना था फिर भी साड़ियों के सेल में धकेल दिया.. और अचानक से तुझे सफाई की इतनी फिकर कब से होने लगी? हुई तो हुई.. यह सब कुछ आधे ही घंटे में?? चलो माना की तुझे मेरे जाने के बाद सफाई का खयाल आया होगा.. उतनी देर में तूने कविता को फोन कर नौकर को बुलाया और वो आ भी गया..!!! कविता का घर इतना नजदीक तो है नहीं..!!"

वैशाली का मन कर रहा था की अभी धरती फटे और वो अंदर समा जाएँ.. शीला ने उसकी चोरी बखूबी पकड़ ली थी.. उसकी माँ के सभी शक जायज थे और उसका कोई जवाब नहीं था उसके पास

वैशाली: "आप गलत समझ रही हो मम्मी.. वो.. असल में... अम्म.. वो कविता को फोन किया तो उसका नौकर यहीं कुछ सामान लेने आया था तो मैंने बुला लिया.. वैसे और कुछ नहीं है"

शीला को अब गुस्सा चढ़ने लगा.. यह लड़की मुझे मूर्ख समझती है क्या..!! उतनी उसकी उम्र नहीं है जिससे ज्यादा तो मैं खुद ऐसे कांड कर चुकी हूँ.. और यह मुझे बेवकूफ बना रही है??

शीला ने गुस्से से तमतमाते हुए चेहरे से वैशाली को कहा "मेरे सामने देख.. नजरें क्यों छिपा रही है?"

बेमन से वैशाली ने घबराई हुई नज़रों से शीला की तरफ देखा.. शीला की आँखों का गुस्सा देखकर वैशाली की हालत खराब हो गई

शीला: "सच सच बता.. क्या माजरा है? क्या चल रहा है तेरे और उस नौकर के बीच?"

अब वैशाली से अपने आप को रोका न गया.. उसने शीला के कंधों पर अपना सिर रख दिया और फूटफुटकर रोने लग गई..

एक ही पल में शीला का शक यकीन में बदल गया.. रो रही वैशाली पर गुस्से से गुर्राई "तू पागल हो गई है क्या वैशाली? वो भी यहाँ अपने घर में? एक नौकर को बुलाकर? अक्ल है भी तुझे या बेच आई है? शादी से पहले जब पिंटू ने तुझे राजेश के साथ देख लिया था तब क्या हुआ था.. भूल गई क्या?? कितनी मिन्नतें.. कितने वादे किए थे.. खुद मैंने पैरों में पड़कर.. गिड़गिड़ाकर माफी मांगी थी, तब जाकर पिंटू माना था.. जरा सा भी अंदाजा है तुझे की पिंटू को पता चला तो क्या होगा??"

शीला के कंधों पर सिर रखकर रो रही वैशाली ने अपने आँसू पोंछे और डाइनिंग टेबल की कुर्सी खींचकर नजरें झुकाए बैठ गई.. शीला भी उसके सामने बैठ गई.. आखिर कारण तो जानना ही था की आखिर वैशाली ने ऐसी बेवकूफों वाली हरकत भला क्यों की.. शीला को दिक्कत उस बात से नहीं थी की उसकी बेटी किसी पराए मर्द के साथ पाई गई थी, तकलीफ इस बात की थी की पिंटू को पता चल गया तो कैसा अनर्थ हो जाएगा

रोते बिलखते हुए वैशाली ने अपनी आपबीती बताई.. पिंटू की नपुंसकता, उसके डॉक्टर के पास जाने से कतराना, उल्टा वैशाली पर गुस्सा करना.. पिछले कई महीनों से पिंटू उसे संतुष्ट नहीं कर पाया था.. सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई

सुनकर शीला स्तब्ध हो गई..

थोड़ी नरमी के साथ पर गंभीरतापूर्वक शीला ने कहा "समझ रही हूँ बेटी, समझ रही हूँ तेरी मजबूरी.. तू मेरी बेटी है, तेरे शरीर की आग मैं नहीं समझूंगी तो और कौन समझेगा? पर ये तूने जो किया, इतना बड़ा जोखिम उठाना.. ये बेवकूफी है वैशाली! बहुत बड़ी बेवकूफी..!! इतना भी नहीं समझती तू?"

वैशाली ने उखड़ते हुए कहा "तो क्या करूँ मम्मी? कब तक ऐसे ही बैठी रहूँ?? पिंटू का प्रॉब्लेम अपने आप तो ठीक होने वाला है नहीं.. और डॉक्टर के पास तो वो जाने से रहा..!! इतने महीने तड़पते हुए निकाले.. पर अब बर्दाश्त नहीं होता मुझसे"

शीला का गुस्सा अब अपनी बेटी के प्रति सहानुभूति में बदलने लगा..

शीला: "समझ सकती हूँ बेटा.. मैं तेरी जगह होती तो शायद मैं भी कुछ ऐसा ही करती.. पर मेरी बात और है.. तेरे सिर पर पिंटू नाम का पहरा है..!! तुझे याद है न राजेश वाला कांड? लाख माफ़ी-मिन्नतों के बाद, एक शर्त पर तेरी शादी टिकी है.. कि तू दोबारा ऐसी गलती नहीं करेगी!"

वैशाली अब भड़क पड़ी और बोली "तो क्या करूँ? ऐसे ही मर मरकर जीती रहूँ? पिंटू की खोखली मर्दानगी के लिए अपनी जवानी और अपने अरमानों को आग लगा दूँ?? क्या करूँ मैं, तुम्ही बताओ मुझे मम्मी"

शीला की बोलती बंद हो गई.. वैशाली की बात शत-प्रतिशत सही थी..

उसने एकदम धीरे से कहा "तेरी बात सुनकर अब समझ तो आ रहा है की तूने यह क्यों किया.. और उसपर मैं सवाल भी नहीं उठा रही.. मैं यह कह रही हूँ की यहाँ घर पर उसे बुलाकर यह सब करना खतरे से खाली नहीं है"

वैशाली: "पिंटू बेंगलोर है.. सास-ससुर मेरे दूसरे शहर है.. फिर कहाँ कोई डर की बात है मम्मी?"

शीला: "रे पगली! दुनिया में कुछ भी छुपता है? कल को यह नौकर खुद ही किसी को बता देगा तो..!! पड़ोसी ने देख लिया तो क्या होगा..!!! किसी की नजर पड़ गई तो क्या करेगी... एक बार शक हुआ ना पिंटू को, फिर वह तेरे पीछे पड़ जाएगा.. तू तो जानती है उसका गुस्सा! पिछली बार तो बस पकड़े गए थे, इस बार तो... सबूत मिल गया तो? तलाक! सरेआम बदनामी! और तेरी जिंदगी तबाह हो जाएगी! बेटी, मैं तेरे सुख के खिलाफ नहीं हूँ.. मैं तेरी माँ हूँ, तू खुश रहे, यही चाहती हूँ.. पर तू इतनी लापरवाही से काम मत कर.. अगर करना ही है, तो इतनी बेवकूफी से नहीं..चालाकी से कर"

वैशाली ने बेबस हो कर कहा "फिर क्या करूँ मैं मम्मी? आप ही बताओ"

शीला का खुराफाती दिमाग काम पर लग गया.. उस गोरे लड़के को देखकर नियत तो शीला की भी डोल उठी थी.. मन तो उसका भी कर गया था.. काफी समय से वह केवल राजेश और मदन के वही पुराने लंडों से खेलकर ऊब चुकी थी.. यह बढ़िया मौका था..वैशाली तो वैसे भी वहीं करने वाली थी जो शीला उससे कहेगी

बड़ी ही सावधानी से अपने पाँसे फेंकते हुए शीला ने कहा "देख वैशाली, अब जो हो गया सो हो गया.. लड़का यहाँ आ चुका है.. तो बिना उसका इस्तेमाल किए जाने तो नहीं देंगे..!! और वैसे भी.. अभी तू अकेली तो है नहीं.. तेरे साथ मैं हूँ.. कोई जानेगा तो भी शक नहीं होगा.. इसलिए रास्ता तो साफ है लेकिन.." शीला बीच में ही अटक गई

वैशाली: "लेकिन क्या मम्मी?"

शीला ने एक लंबी सांस छोड़कर कहा "तू उससे मिले उससे पहले मैं उस लड़के को परखूँगी"

वैशाली का दिमाग घूम गया.. इसमें परखना क्या?? ये कोई हीरे मोती है जो इन्हें मम्मी परखेगी?? पर फिर उसका माथा ठनका.. अपनी मम्मी के किस्से उसने भी बहोत सुने थे.. वह समझ गई.. की मम्मी का दिल बाबिल पर आ गया है.. चलो, कोई बात नहीं, इसी बहाने मम्मी मान तो गई.. खुद को तसल्ली देते हुए वैशाली ने कहा

वैशाली: "ठीक है मम्मी, तो पहले आप चले जाइए अंदर"

शीला: "नहीं वैसे सीधे सीधे नहीं"

वैशाली को कुछ समझ नहीं आया, उसने कहा "मतलब? आप कहना क्या चाहती हो?"

शीला ने बड़े ही कमीने अंदाज में कहा "मेरे कहने का मतलब यह है की पहले तू अंदर जा.. और ऊपर ऊपर से शुरुआत कर.. फिर ऐसा दिखावा करेंगे की मैंने तुम दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया..!!"

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वैशाली को कुछ समझ नहीं आ रहा था की शीला क्या खेल खेल रही थी, वह बोली "पर ऐसा क्यों मम्मी?"

शीला ने एक शैतानी मुस्कान के साथ कहा "ऐसा करने से लड़का हमारे दबाव में रहेगा.. किसी के सामने बकेगा नहीं.. मैंने अनुभव से सीखा है, ऐसे मामलों में अगर सामने वाला हमारे कंट्रोल में हो तो आसानी रहती है.. !!"

वैशाली ने जवाब नहीं दिया.. शीला के अगले आदेश के लिए वह तैयार बैठी थी

शीला: "एक काम कर, मैं घर से बाहर चली जाती हूँ, तू मुझे घर की चाबी दे दे.. और फिर मेरे जाने के बाद तू उसके साथ अंदर चली जाना.. फिर कहना की मैं चली गई हूँ और रास्ता साफ है"

वैशाली: "ओके मम्मी" कहते हुए घर के लैच-लॉक की चाबी शीला को दे दी.. शीला तुरंत दरवाजे के बाहर चली गई और वैशाली बेडरूम के अंदर चली आई.. अंदर बेड के पीछे डरा हुआ बाबिल दुबककर बैठा था.. उसकी बड़ी बड़ी आँखों से वैशाली की ओर देख रहा था.. देखकर मन ही मन वैशाली की हंसी छूट गई.. वैसे आधे घंटे पहले उसका हाल भी कुछ वैसा ही तो था..

बाबिल ने घबराते हुए कहा "मैं घर जाऊ?"

वैशाली ने मुस्कुराकर बाबिल के लंड को पकड़ते हुए कहा "जिस काम के लिए आया था वो करेगा नही??"

असमंजस में बाबिल ने पूछा "पर वो मेहमान..!! वो मेडम"

वैशाली: "वो तो कब की चली गई.. अब कोई नहीं है घर पर"

वैशाली उस लड़के का लंड दबोचकर उसके गले को चूमने लगी.. बाबिल की घबराहट धीरे धीरे कम हो रही थी.. गर्दन पर चूमते हुए वैशाली बाबिल के पीछे की तरफ चली गई और पीछे से उसे बाहों में भर लिया





वैशाली की चूचियाँ बाबिल के पीठ पर धँस गई.. वैशाली अपना हाथ आगे लाकर बाबिल के लंड पर ले आई और पतलून के बाहर निकालकर पकड़ कर मसलने लगी..

‘आहह.. मालकिन..’ बाबिल के मुँह से मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई और आँखें बंद हो गईं..

कुछ ही पलों में बाबिल का लंड तन कर अपनी औकात पर आ गया..

इस बात से अंजान कि दरवाजे पर खड़ी शीला ये सब देखते हुए अपने पेटीकोट के ऊपर से अपनी चूत को मसल रही थी..





शीला को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था..बाबिल का लंबा और मोटा लंड किसी मूसल के तरह खड़ा हुआ था.. जिसे देखते ही शीला की चूत पनियाने लगी..





वैशाली और बाबिल एक दूजे में खोए हुए थे की तभी अचानक से दरवाजा हिलने की आवाज़ से दोनों चौंक गए..

चौंका तो सिर्फ़ बाबिल था और वैशाली तो सब जानते हुए बनने का नाटक कर रही थी..

जैसे ही बाबिल की नज़र शीला पर पड़ी.. मानो उसकी गांड फट गई हो..

वैशाली तो कब से पीछे हट कर शीला की तरफ पीठ करके सर झुकाए खड़ी थी..

बाबिल कभी शीला की तरफ देखता.. कभी वैशाली की तरफ देखता.. तो कभी अपने झटके खाते हुए लंड की तरफ देखता..

डर के मारे थरथर कांप रहे बाबिल को देखकर शीला के होंठों पर वासना से भरी मुस्कान फ़ैल गई..

जिससे देख बाबिल उलझन में पड़ गया..!! यह भला गुस्सा होने की जगह मुस्कुरा क्यों रही है??

‘वो अपना पजामा ठीक कर..’ शीला ने बाबिल के लंड की तरफ इशारा करते हुए कहा..

‘और तुम वैशाली ज़रा बाहर आओ.. ये क्या गुल खिला रही थी?’

यह कह कर शीला वापिस ड्रॉइंग रूम में चली आई.. खेल शुरू हो चुका था.. वैशाली अपनी हँसी रोकते हुए कमरे से बाहर चली गई और बाबिल वहीं ठगा सा खड़ा रह गया.. कुछ पलों के लिए मानो उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया हो..

जब उसे होश सा आया तब उसने लपक कर अपनी ट्रेकपेंट को ऊपर किया.. उसका पूरा बदन डर से थरथर काँप रहा था.. अब क्या होगा?

बाबिल अपना सिर पकड़कर बिस्तर पर बैठ गया..

वैशाली के जाने के बाद बाबिल उस कमरा में ऐसा महसूस कर रहा था, जैसे वो किसी क़ैद खाने में बैठा हो और अभी बाहर से कुछ लोग आयेंगे और उसकी पिटाई शुरू हो जाएगी..

एक अजीब सा सन्नाटा उस कमरा में फैला हुआ था.. तभी कमरे के बाहर से कुछ क़दमों की आहट हुई..

जिससे सुन कर बाबिल के हाथ-पैर काँपने लगे.. लेकिन तभी वैशाली कमरे में दाखिल हुई, उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था.. जैसे उसको कोई फर्क ही ना पड़ा हो..

बाबिल ने हकलाते हुए पूछा "क्या.. क्या हुआ... कौन है वो? अब क्या होगा मालकिन?"

वैशाली ने एकदम गंभीर चेहरा बनाकर बिस्तर पर बैठते हुए कहा " वो मेरी मम्मी थी जिन्हों ने हमे पकड़ लिया.. बहोत गुस्से वाली है.. तेरी कंप्लेन पुलिस में कर देने वाली थी.. जैसे तैसे मैंने उन्हें रोक लिया है... सुन बाबिल, अब सब तेरे हाथ में है.. अगर तू चाहे तो ये बात माँ किसी को नहीं बताएगी.. पुलिस को भी नहीं"

बाबिल को कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह बोल "पर मैं.. मतलब? पर कैसे मालकिन?"

वैशाली: "तू एक काम कर.. यहाँ पर बैठ… मम्मी थोड़ी देर में यही आ रही हैं.. ध्यान रहें, वो तुझसे जो भी करने को कहें कर लेना.. मना मत करना वरना कहीं वो पुलिस में चली गई तो पूरी ज़िंदगी जेल की चक्की पिसेगा"

यह कह कर वैशाली बिना बाबिल से आँख मिलाए कमरे से बाहर निकल गई, एक बार फिर से वो जान निकाल देने वाला सन्नाटा कमरा में छा गया..

बाबिल को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.. वह दोनों क्या चाहते थे उससे आखिर..!!!

वैशाली जब बेडरूम से बाहर निकलकर दरवाजा अपने पीछे बंद कर रही थी तभी शीला उसके सामने खड़ी हुई थी..

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर दोनों के होंठों पर वासना से भरी मुस्कान फ़ैल गई..

‘ध्यान से मम्मी.. लड़का दिखने में भोला सा है पर उसका वो.. बहुत तगड़ा है..’ वैशाली ने शीला के पास से गुज़रते हुए कहा..

वैशाली की बात सुन कर शीला मुस्कुराई.. ‘अपनी माँ को कम आँकने की गलती मत करना कभी..’

वैशाली ने पीछे मुड़ कर शीला की तरफ देखा और एक बार फिर दोनों के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई, फिर वैशाली किचन की ओर चली गई..

उधर कमरे में बैठा, बाबिल अपनी किस्मत को कोस रहा था कि आख़िर वो वैशाली के साथ यहाँ क्यों आया.. क्यों कविता मालकिन के कहने पर वो चला आया.. आज अगर बच गया तो अब बड़ी वाली रमिला मालकिन के अलावा किसी के पास नहीं जाएगा..

एक बार फिर से कमरे के बाहर से आ रही क़दमों की आहट सुन कर बाबिल के रोंगटे खड़े हो गए..

वो जानता था कि अन्दर कौन आने वाला है और वो बिस्तर से खड़ा हो गया..

जैसे ही शीला उसके कमरा में आई तो उसने अपने सर को झुका लिया..

शीला ने एक बार सर झुकाए खड़े बाबिल की तरफ देखा, फिर पलट कर दरवाजे को बंद कर दिया.. दरवाजा बंद होने की आवाज़ सुन कर बाबिल एकदम से चौंक गया..

उसे समझ में नहीं आया कि आख़िर शीला ने दरवाजा किस लिए बंद किया है..

दरवाजा बंद करने के बाद शीला मदहोश अंगड़ाई लेकर बाबिल की तरफ देखते हुए, बिस्तर के पास जाकर खड़ी हो गई..





शीला का मांसल जिस्म अपने जलवे बिखेर रहा था, उसकी गदराई कमर का मांस बाहर निकला हुआ था और नाभि इतनी गहरी थी मानो कुदरत ने उसे दूसरी चूत से नवाजा हो

बाबिल ने तिरछी नज़रों से शीला की तरफ देखा, जो उसकी तरफ देख कर मंद-मंद मुस्करा रही थी..

अपने सामने खड़ी शीला का ये रूप देख उससे यकीन नहीं हो रहा था.. इतने बड़े बड़े स्तनों वाली स्त्री उसने आज तक नहीं देखी थी

उससे देखते ही, बाबिल का मन मचल उठा.. पर कुछ करने या कहने के हिम्मत कहाँ बाकी थी..वो तो किसी मुजरिम की तरह उसके सामने खड़ा था..

‘ओए छोरे इधर आ..’ शीला ने बिस्तर पर बैठते हुए कहा..

बाबिल ने एकदम से चौंकते हुए कहा "जी क्या..?"

शीला: "जी.. जी.. क्या लगा रखा है, इधर आकर खड़ा हो…ठीक मेरे सामने..!!"

बाबिल बिना कुछ बोले शीला के सामने बिस्तर के पास जाकर खड़ा हो गया.. अब भले ही वो सर झुका कर खड़ा था, पर ब्लाउज में से शीला की झाँकती विराट चूचियों का दीदार उसे साफ़ हो रहा था, क्योंकि शीला उसके सामने बिस्तर पर बैठी हुई थी..

‘क्या कर रहा था..तू मेरे बेटी के साथ?’ शीला ने कड़क आवाज़ में बाबिल से पूछा, जिसे सुनते ही बाबिल की गांड फटने को आ गई.. पर वो बिना कुछ बोले खड़ा रहा..

‘सुना नहीं.. क्या पूछा मैंने?’

इस बार बाबिल के लिए चुप रहना नामुनकिन था..

‘वो मैं नहीं.. मालकिन कर रही थीं..’ बाबिल ने शीला की तरफ देखते हुए कहा..

‘अच्छा तो तेरे मतलब सब ग़लती मेरी बेटी की है.. इधर आ..’

शीला ने बाबिल का हाथ पकड़ कर उसे और पास खींच लिया..

बाबिल अवाक सा उसकी ओर देख रहा था..

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

वैशाली और बाबिल के बीच चुदाई का खेल शुरू होने ही वाला था की तब डॉरबेल बजी.. शीला लौट चुकी थी.. हालांकि वैशाली ने अपने झूठ को छुपाने की भरसक कोशिश की पर शीला की शातिर आँखों से सच छुप नहीं पाया.. शीला पहले तो वैशाल पर उखड़ पड़ती है पर अपनी बेटी की समस्या को सुनने के बाद उसका मन बदलता है.. वैशाली से पहले वो बाबिल को परखना चाहती है..

अब आगे..

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इससे पहले कि उसे कुछ समझ आता, शीला ने उसके मुरझाए हुए लंड को पतलून के ऊपर से पकड़ लिया और ज़ोर से मसल दिया..

‘आह दर्द हो रहा.. मालकिन ओह्ह..’

बाबिल ने शीला का हाथ हटाने की कोशिश करते हुए कहा..

शीला ने बाबिल की तरफ वासना से भरी नज़रों से देखते हुए कहा "क्यों रे, अब तो ये ऐसे मुरझा गया है…जैसे इसमें जान ही ना हो…पहले कैसे इतना कड़क खड़ा था.. साले.. मेरी जवान बेटी पर ग़लत नज़र रखता है.." ये कहते हुए शीला ने उसके लंड को थोड़ा और ज़ोर से मसल दिया..





बाबिल की तो जैसे जान ही निकल गई, उसके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था कि वो कितने दर्द में है..

उसके चेहरे को देख कर शीला को अंदाज़ा हुआ कि उसने कुछ ज्यादा ही ज़ोर से उसके लंड को मसल दिया..

शीला ने उसके लंड को छोड़ दिया, फिर उसके लंड को हथेली से रगड़ने लगी..

बाबिल को जैसे लकवा मार गया हो.. वो बुत की तरह शीला को देख रहा था, जो उसकी तरफ देखते हुए, एक हाथ से अपनी चूची को ब्लाउज के ऊपर से मसल रही थी और दूसरे हाथ से बाबिल के लंड को सहला रही थी..

शीला "क्यों रे.. मेरे बेटी को चोदने वाला था..!! एक बार मुझे भी चोद कर देख.. देख फिर कितना ज्यादा मज़ा दूँगी.." ये कह कर उसने एक झटके से बाबिल की पतलून उतार दी..

इससे पहले कि घबराए हुए बाबिल को कुछ समझ आता.. उसकी पेंट घुटनों तक आ चुकी थी और उसका अधखड़ा लंड शीला के हाथ की मुठ्ठी में था..





"ये… ये आप क्या रही हैं मालकिन… ओह्ह नहीं मालकिन आ आहह.."

शीला ने उसके लंड के सुपाड़े पर चमड़ी पीछे सरका दी और गुलाबी सुपाड़े जो कि किसी छोटे सेब जितना मोटा था, उसे देख शीला कर आँखों में वासना छा गई..

शीला के मदमस्त भोसड़े की फांकें फड़फने लगीं और उनकी दीवारों ने कामरस की बूंदे बहाना शुरू कर दिया..







क्योंकि अब बाबिल का लंड अपने असली विकराल रूप में आना शुरू हो गया था, शीला ने अपने अंगूठे के नाख़ून से बाबिल के लंड के सुपाड़े के चारों तरफ कुरेदा..

तो बाबिल की मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई और अगले ही पल उसे अपने लंड का सुपाड़ा किसी गरम और गीली जगह में जाता हुआ महसूस हुआ..

उससे ऐसा लगा जैसे किसी नरम और रसीले अंग ने उसके लंड के सुपाड़े को चारों तरफ से कस लिया हो..

जब बाबिल ने अपनी मस्ती से भरी आँखों को खोल कर नीचे देखा..

तो जो हो रहा था, उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ..

शीला ने एक हाथ से उसके टट्टों को मुठ्ठी में पकड़ रखा था.. उसके लंड का सुपाड़ा शीला के होंठों के अन्दर था और दूसरे हाथ से शीला अपनी चूची को मसल रही थी..





ये नज़ारा देख बाबिल एकदम से हैरान रह गया, शीला ने उसके लंड के सुपाड़े को चूसते हुए.. ऊपर बाबिल की तरफ देखा.. दोनों की नज़रें आपस में जा मिलीं..

बाबिल का लंड अपनी पूरी औकात पर आ चुका था..

जिस हाथ की मुठ्ठी में शीला ने बाबिल के लंड को भर रखा था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस उम्र के लड़के का लंड भी इतना बड़ा हो सकता है..!!

अचानक से शीला ने बाबिल के फनफनाते हुए लंड को अपने मुँह से बाहर निकाला और बिस्तर पर लेट गई..

उसकी टाँगें बिस्तर के नीचे लटक रही थीं..उसने अपनी टाँगों को उठा कर घुटनों से मोड़ा और अपने पेटीकोट को टाँगों से ऊपर उठाते हुए, अपनी कमर तक चढ़ा लिया..





यह देख कर बाबिल की हालत और खराब हो गई..

शीला की चूत की फाँकें फैली हुई थीं और उसमें से कामरस एक पतली सी धार के रूप में बह कर उसकी गांड के छेद की तरफ जा रहा था..उसकी चूत का छेद कभी सिकुड़ता और कभी फैलता..





बाबिल बिना अपनी पलकों को झपकाए हुए, उसकी तरफ देख रहा था..

यह देख कर शीला के होंठों पर कामुकता भरी मुस्कान फ़ैल गई..

‘देख.. तेरे लंड के लिए पानी छोड़ रही है..’ शीला ने अपनी चूत की फांकों को फ़ैलाते हुए अंदर के गुलाबी छेद को दिखाते हुए कहा..





यह सुन कर बाबिल की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा.. अब उसे समझ में आ रहा था यह दोनों माँ-बेटी उसके साथ खेल रही थी

बाबिल को यूँ खड़ा देख कर शीला से रहा नहीं गया, उसने अपना हाथ आगे बढ़ा कर बाबिल के लंड को पकड़ा और उसके लंड के गुलाबी मोटे सुपाड़े को अपनी गीली चूत के छेद पर रगड़ने लगी..





बाबिल के लंड के गरम और मोटे सुपाड़े का स्पर्श अपनी चूत के छेद पर महसूस करते ही.. शीला के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई..

शीला की वासना से भरी हुई आँखें बंद हो गईं..

उसने बड़ी ही अदा के साथ एक बार अपने होंठों को अपने दाँतों से चबाया और काँपती हुई आवाज़ में बाबिल से बोली "ओह्ह.. बेटा डाल दे.. मेरी चूत में अपना ये मोटा लंड पेल दे… चोद मुझे साले ओह्ह..!!"

बाबिल का लंड अब पूरी तरह से तन चुका था और पूरे जोश में आ चुका था..

शीला उसके लंड को अपनी दो उँगलियों और अंगूठे के मदद से पकड़े हुए, अपनी चूत के छेद पर उसका लंड का सुपाड़ा टिकाए हुए थी..

बाबिल ने शीला की टाँगों को घुटनों से पकड़ कर मोड़ कर ऊपर उठाया और अपनी पूरी ताक़त के साथ एक जोरदार झटका मारा..





बाबिल का लंड शीला की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ तेज़ी के साथ अन्दर घुसता चला गया.. और धनाधन चोदने लगा.. इतनी अनुभवी और चुदक्कड़ शीला भी इन प्रचण्ड प्रहारों से स्तब्ध हो कर रह गई.. वह एकदम से कराह उठी.. पर तब तक बाबिल का ८ इंच लंबा पूरा का पूरा लंड शीला के भोसड़े की गहराईयों में उतर चुका था..

शीला: "हइई.. आह्ह.. ओह्ह.... ओह हरामी.. धीरे कर थोड़ा.. ओह्ह ओह्ह निकाल साले.. फाड़ के रख दी.. मादरचोद.. मेरी चूत ओह्ह..!!"

शीला ने अपने कंधों और गर्दन को बिस्तर से उठा कर अपनी चूत की तरफ देखने की कोशिश करते हुए कहा..

बाबिल भी शीला के कराहने की आवाज़ सुन कर थोड़ा डर गया और अपना लंड शीला की चूत से बाहर निकालने लगा..

अभी उसने अपना लंड आधा ही बाहर निकाला था कि शीला ने उससे कंधों से पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया..

जिससे बाबिल का लंड एक बार फिर शीला की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ अन्दर घुस कर उसके बच्चेदानी के मुँह से जा टकराया..

शीला ने अपने ब्लाउज के बटन खोले.. ब्रा को सरकाया और सिसकते हुए बाबिल के चेहरे को अपनी चूचियों में दबा लिया.. इतने विशाल बबलों के बीच अपना चेहरा दबा हुआ पाकर बाबिल तो जैसे धन्य ही हो गया..

बाबिल अब जैसे पागल हो चुका था… निप्पलों को चूसते हुए वह शीला के खरबूजों को मसलने लगे..

शीला का रोम-रोम रोमांच से भर उठा.. नीचे से उसके चूतड़ ऊपर की तरफ उछल पड़े.. यह सीधा संकेत था कि वो बाबिल का पहला जोरदार वार झेल कर अब चुदवाने के लिए तड़प रही है..

बाबिल शीला के ऊपर लेटा हुआ दोनों हाथों से शीला के मम्मों को मसलते हुए हुमच रहा था.. शीला की आँखें फिर से मस्ती में बंद होने लगी थीं.. उसकी मादक सिसकियाँ पूरे कमरे में गूँज रही थीं..

अपनी निप्पल को पकड़कर बाबिल के मुंह में ठुसते हुए शीला बोली "ओह्ह ये ले.. ठीक से चूस्स्स इसे.. ओह्ह ओह्ह ह आह्ह..!!" शीला ने नीचे से अपनी कमर को हिलाते हुए कहा..

बाबिल ने भी झट से शीला की चूची को आधे से ज्यादा मुँह में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से चूसना चालू कर दिया..इतने विशाल स्तन थे की उसकी दोनों हथेलियों में मिलाकर भी शीला का एक स्तन नहीं आता था..





बाबिल ने अपने लंड को आधे से ज्यादा बाहर निकाला और फिर पूरी ताक़त से अन्दर पेल दिया.. बाबिल का लंड पिछले आधे घंटे से खड़ा था.. शीला का भोसड़ा किसी तंदूर से भी ज्यादा गरम था और वह गर्मी अब बाबिल के बर्दाश्त से बाहर हो रही थी..

वो बिस्तर के किनारे खड़ा हो गया और शीला की टाँगों को घुटनों से मोड़ कर ऊपर उठा कर पूरी तरह से फैला दिया..

जिससे उसकी चूत ठीक उसके लंड के लेवल पर आ गई और बाबिल तेज़ी से अपने लंड को शीला की चूत की अन्दर-बाहर करने लगा..





बरसों बाद शीला इतने जवान लंड से चुद रही थी.. इससे पहले इतना जवान साथी जो था.. वह था.. उसका खुद का दामाद पिंटू.!!! तब वो कविता का आशिक था.. और उन दोनों के मिलने का जुगाड़ शीला के घर पर ही होता था चूंकि तब मदन अमरीका गया हुआ था.. तभी एक बार मौका पाकर, शीला और रेणुका ने साथ मिलकर पिंटू को ऐसा रगड़ा था की वो रो दिया था..

बाबिल का मोटा लंड पाकर शीला के मानो ख़ुशी के आँसू बाहर निकालने लगी.. ऐसा तगड़ा लंड तो केवल रसिक का ही था..

शीला का भोसड़ा सरपट गीला हो चुका था और बाबिल का लंड भी शीला की चूत से निकल रहे गाढ़े पानी से एकदम सन गया था..

अब बाबिल का लंड ‘फच-फच’ की आवाज़ करता हुआ तेज़ी से शीला की चूत के अन्दर-बाहर हो रहा था और वह भी अपनी गांड को उछाल कर बाबिल का साथ दे रही थी..





उसका पूरा बदन बाबिल के लगाए हुए हर धक्के के साथ हिल रहा था.. उसके बबले यहाँ वहाँ झूल रहे थे और शीला अपने सर को इधर-उधर पटकते हुए मछली के जैसे तड़प रही थी..

शीला कभी अपनी दोनों चूचियों को मसलती, कभी वो बिस्तर की चादर को अपने हाथों में दबोच लेती..

उसकी चूचियाँ हर धक्के के साथ हिल रही थीं, जिससे देख कर बाबिल का जोश और बढ़ता जा रहा था..

शीला "ओह बेटा धीरेए ओह्ह ओह्ह ह आह्ह.. उँघह धीरेए ऊहह निकाल जाएगा तेरा.. ओह्ह मज़ा आ गया .. ओहह.. आह्ह.. धीरेए ओह्ह ओह्ह ओह्ह..!!"

शीला की भोसड़े ने भरसक पानी छोड़ना चालू कर दिया और वो अपनी गांड को पागलों की तरह उछालते हुए झड़ने लगी..

उसने अपने बिखरे हुए बालों को नोचना शुरू कर दिया..

पर बाबिल अभी भी पूरी रफ़्तार के साथ शीला की चूत में अपना लंड अन्दर-बाहर कर रहा था..

शीला का पूरा बदन एकदम से ऐंठ चुका था, पर बाबिल के ताबड़तोड़ धक्कों ने एक बार फिर से उसकी चूत को ढीला कर दिया था..

शीला झड़ने के बाद पूरी तरह शांत हो चुकी थी और अपनी टाँगों को फैलाए हुए बाबिल के लंड को अपनी चूत में मज़े से ले रही थी..

आख़िर ५ मिनट की और चुदाई के बाद शीला दूसरी बार झड़ गई और इस बार बाबिल के लंड ने भी उसकी भोसड़े में अपना वीर्य उड़ेल दिया..





जैसे ही बाबिल का लंड सिकुड़ कर बाहर आया.. शीला जल्दी से उठ कर बाथरूम चली गई..

बाबिल ने अपने मुरझाए हुए लंड की ओर देखा, वो शीला की चूत की कामरस से एकदम भीगा हुआ था..

उसने कमरे में इधर-उधर नज़र दौड़ाई.. तो उसे फर्श पर पड़ी शीला की साड़ी नज़र आई.. वो साड़ी के पास गया और उसके एक छोर को पकड़ कर उससे अपना लंड साफ़ करने लगा.. तभी वैशाली अचानक से कमरे में आ गई..

उसने बाबिल के लंड की तरफ देखा.. जो शिकार करने के बाद लटक रहा था..

वैशाली ने शैतानी मुस्कान के साथ कहा "क्यों मज़ा आया ना?"

बाबिल वैशाली की बात सुन कर एकदम से हैरान रह गया.. उससे यकीन नहीं हो रहा था कि वैशाली उससे अपनी माँ के बारे में पूछ रही है..

हँसते हुए वैशाली कमरे से बाहर चली गई..

बाबिल खड़ा हुआ और बिना अपना पेंट पहने नंगा ही बाथरूम की ओर गया.. दरवाजा सिर्फ अटका हुआ था, बंद नहीं था.. अंदर से कुछ आवाज़ सुनाई दे रही थी..

उसने दरवाजे पर कान लगाया तो शीला के मूतने की सुरीली सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी… वह दरवाजे के पास खड़ा होकर अन्दर झाँकने लगा..

अन्दर का नज़ारा देख कर एक बार फिर से बाबिल का लंड पूरे उफान पर आ गया..

बड़े बड़े गोरे चूतड़ों को उजागर कर शीला मूतने के बाद झुक कर अपनी चूत को एक कपड़े से साफ़ कर रही थी.. पीछे खड़े बाबिल के सामने शीला के बड़े-बड़े चूतड़ों के बीच लबलबा रही चूत का गुलाबी छेद उस पर कहर बरपा रहा था..





शीला को इस बात का पता नहीं था कि बाबिल उसके पीछे खड़े होकर उसकी बड़ी गांड को देख रहा है..

अगले ही पल बाबिल का लंड किसी सांप की तरह फुंफकारने लग गया ..

शीला अपनी चूत की फांकों को अपनी उँगलियों से सहला रही थी, उसके होंठों पर ख़ुशी से भरी हुई मुस्कान फैली हुई थी..

अचानक से उससे अपनी चूत पर एक बार फिर से बाबिल के लंड के मोटे और गरम सुपाड़े का अहसास हुआ.. जिसे महसूस करते ही.. उसके पूरे बदन में मस्ती की कंपकंपी दौड़ गई..

‘आह क्या कर रहा है ओह्ह..छोड़ मुझे!’

इसके पहले कि शीला कुछ संभल पाती.. बाबिल का लंड उसकी चूत की फांकों को फैला कर चूत के छेद पर जा लगा..

‘ओह्ह आह सीईईई..’ शीला के मुँह से मस्ती भरी ‘आह’ निकल गई..

शीला ने एक बार अपनी गर्दन पीछे घुमा कर बाबिल की तरफ अपनी वासना से भरी मस्त आँखों से देखा और मुस्करा कर फिर से आगे देखते हुए.. अपने दोनों हाथों को उस पुराने मेज पर टिका कर झुक गई..

फिर बड़ी ही अदा के साथ अपने पैरों को फैला कर पीछे से अपनी गांड ऊपर की तरफ उठा लिया..

अब बाबिल का लंड बिल्कुल शीला की चूत के सामने था..

बाबिल ने शीला के चूतड़ों को दोनों तरफ से पकड़ कर फैला दिया और अपने लंड को चूत के छेद पर टिका दिया..

इससे पहले कि बाबिल अपना लंड शीला की चूत में पेलने के लिए धक्का मारता.. शीला ने कामातुर होकर अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया..





बाबिल के लंड का मोटा सुपाड़ा शीला की चूत के छेद को फ़ैलाता हुआ अन्दर घुस गया.. शीला अपनी चूत के छेद के छल्ले को बाबिल के लंड के मोटे सुपाड़े पर कसा हुआ साफ़ महसूस कर पा रही थी..

कामवासना का आनन्द चरम पर पहुँच गया.. शीला की चूत ने एक बार फिर से अपने कामरस का खजाना खोल दिया..

शीला की मस्ती का कोई ठिकाना नहीं था, उसकी चूत में सरसराहट बढ़ गई थी और वो बाबिल के लंड को जड़ तक अपनी चूत में लेने के लिए मचल रही थी..

"ओह्ह आह.. घुसाआ.. दे रे.. छोरे ओह फाड़ दे.. मेरी चूत ओह्ह आह… और ज़ोर से मसल मेरे गांड को ओह्ह हाँ.. ऐसे ही…"

बाबिल बुरी तरह से अपने दोनों हाथों से शीला की गांड को फैला कर मसल रहा था.. उसके लंड का सुपाड़ा शीला की चूत में फँसा हुआ, शीला को मदहोश किए जा रहा था.. बाबिल को भी अपने लंड के सुपाड़े पर शीला की चूत की गरमी साफ़ महसूस हो रही थी..

उसने शीला के चूतड़ों को दबोच कर दोनों तरफ फैला लिया और अपनी गांड को तेज़ी से आगे की तरफ धकेला.. बाबिल के लंड का सुपाड़ा शीला की चूत की दीवारों को चीरता हुआ आगे बढ़ गया, शीला के मुँह से एक घुटी हुई चीख निकल गई.. जो बाथरूम के दीवारों में ही दब कर रह गई..

बाबिल का आधे से अधिक लंड शीला की चूत में समा चुका था..

शीला ने पीछे की तरफ अपनी गांड को ठेल कर अपनी चूत में बाबिल का मोटा लंड लेते हुए कहा "आहह.. आह जालिम मेरी चूत.. ओह फाड़ दी… ओह्ह ओह तेरे इस मूसल लंड की तो मैं आह.. आह.. कायल हो गई उह्ह.. ओह्ह चोद दे.. मुझे.. और तेज धक्के मार.."

बाबिल भी अब नौकर और मालकीं की मर्यादाओं को भूल कर शीला के चूतड़ों को फैला कर अपने लंड को उसकी चूत में अन्दर-बाहर कर रहा था..बाबिल के हर जबरदस्त धक्के के साथ उसकी चूचियाँ तेज़ी से हिल रही थीं..





"ओह रुक बेटे.. ज़रा ओह्ह ओह्ह.. मैं खड़ी-खड़ी थक गई हूँ..ओह्ह ओह्ह आह्ह.."

बाबिल ने अपने लंड को शीला की चूत से बाहर निकाल लिया.. शीला सीधी होकर उसकी तरफ पलटी और बाबिल के होंठों पर अपने रसीले होंठों को रखते हुए उसे से चिपक गई..

बाबिल ने उसकी कमर से अपनी बाँहों को पीछे ले जाकर उसके चूतड़ों को दबोच-दबोच कर मसलना शुरू कर दिया..

बाबिल का विकराल लंड शीला के पेट के निचले हिस्से पर रगड़ खा रहा था..

‘चल अंदर कमरे में चलते हैं..’ शीला ने चुंबन तोड़ते हुए कहा और फिर बाथरूम से निकल कर एक बेड के पास आ गई..

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बाबिल और शीला के बीच की यौन मुठभेड़ अपने उफान पर है.. वैशाली और बाबिल को साथ में रंगेहाथों पकड़ने के बहाने, शीला बाबिल को दंडित करने के बहाने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने लगती है.. शीला पहले बाबिल के साथ मौखिक क्रिया करती है और फिर वे दोनों अलग अलग यौन-क्रिया में लिप्त हो जाते हैं.. संभोग का एक राउंड खतम होने के बाद जब शीला गुसलखाने में चली जाती है तब शीला की बेटी वैशाली कमरे में आती है और मुस्कुराते हुए बाबिल से पूछती है कि उसे मज़ा आया या नहीं.. अंत में, बाबिल बाथरूम में शीला के पीछे जाता है, जहाँ वे फिर से दमदार चुदाई की ओर आगे बढ़ते है..

अब आगे..

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बाबिल का विकराल लंड शीला के पेट के निचले हिस्से पर रगड़ खा रहा था..

‘चल अंदर कमरे में चलते हैं..’ शीला ने चुंबन तोड़ते हुए कहा और फिर बाथरूम से निकल कर एक बेड के पास आ गई..

बाबिल उसके पीछे कमरे में दाखिल हुआ और शीला ने उसे पकड़ कर बिस्तर पर धक्का दे दिया..

शीला ने अपनी हथेली में थूका और अपनी चूत के लबों पर लगाकर किसी रंडी की तरह बाबिल के ऊपर सवार हो गई.. बाबिल शीला का ये रूप देख कर भावविभोर हो रहा था.. उसने अपनी जिंदगी में कभी कल्पना भी नहीं की थी, उसे इतने कम समय में इतनी सारी चूतें चोदने को मिल जायेंगी..





शीला ने बाबिल के ऊपर आते ही उसका लंड पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर लगा कर.. उस पर अपनी चूत को दबाना चालू कर दिया..

शीला की चूत पहले से बाबिल के लंड के आकार के बराबर खुल चुकी थी, चूत को लंड पर दबाते ही बाबिल का लंड शीला की चूत की गहराईयों में उतरने लगा..





"ऊहह माआ.. ओह्ह ओह क्या कमाल का लंड पाया है तूने.. ओह्ह…" शीला ने अपने चूतड़ों को ऊपर-नीचे उछालते हुए कहा..

शीला ने तेज़ी से सीसियाते हुए बाबिल के लंड पर अपनी चूत पटकती है..





शीला "हाँ मेरे राजा.. ओह आह्ह.. ओह्ह तेरे लंड का कमाल है रे.. बहुत गहरी टक्कर मार कर चूत को खोदता है रे..ईई तेरा लंड आह.. आह्ह.. ओह्ह देख ना एक बार फिर से झड़ने वाली हूँ…ओह्ह चोद मुझे.. और ज़ोर से चोद आह्ह.. ओह्ह सीईइ मैं गइई… ओह ओह..!!"

शीला का बदन एक बार फिर से अकड़ गया और उसकी चूत से पानी का सैलाब बह निकला.. बाबिल भी शीला की चूत में झड़ गया..





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जहां अंदर शीला अपनी हवस की आग में उस जवान नौकर को झोंक रही थी वहीं बाहर बैठी वैशाली इस बात से परेशान थी की कविता को क्या जवाब दे.. कविता के फोन पर फोन आ रहे थे.. और वह बाबिल को वापिस बुला रही थी क्योंकी उसकी माँ रमिलाबहन ने दो बार फोन कर अपने नौकर के लिए पूछा था..

एक बार फिर कविता का फोन आया वैशाली पर.. कुछ देर के लिए तो वैशाली ने उठाया ही नहीं.. उठाकर बोलती भी क्या?? अपनी माँ की लीलाओ के बारे में वो कैसे बताती कविता को..!! और उसकी बारी तो अब तक आई भी नहीं थी..

आखिर जब कविता ने फोन रखने का नाम ही नहीं लिया तब मजबूरन वैशाली को फोन उठाना ही पड़ा..

वैशाली बाहर बैठी है.. कविता के फोन पर फोन आ रहे है.. बाबिल को उसकी माँ बुला रही है.. वैशाली क्या जवाब देती

कविता ने परेशान स्वर में कहा "अरे यार, अब तेरा हो गया हो तो उसे भेज वापिस.. मम्मी के फोन पर फोन आ रहे है.."

वैशाली: "बस यार.. उसे अभी भेज ही देती हूँ, तू चिंता मत कर.. पैसे देकर ऑटो से ही भेजूँगी ताकि तुरंत पहुँच जाएँ"

कविता: "हम्म.. बड़ा निचोड़ा लगता है बेचारे को.. दो घंटों से तू लगी पड़ी थी"

वैशाली बेचारी क्या बताती..!! की उसका तो आज नंबर ही नहीं आया.. उसकी माँ बेडरूम में ऐसे गई जैसे मेमने के कमरे में भूखी शेरनी गई हो.. बस केवल उनकी आवाज़ें ही सुनाई पड़ रही थी..!!

वैशाली ने केवल "हम्ममम" कहकर फोन काट दिया और तुरंत उठकर बेडरूम के दरवाजे की तरफ गई.. उसने हल्के से दस्तक देते हुए कहा.. "अब हो गया हो तो बाहर आ जाइए.. कविता का बार बार फोन आ रहा है.. बाबिल को तुरंत वापिस भेजना होगा"

करीब एकाद मिनट तक कोई हरकत नहीं हुई और फिर दरवाजे की सिटकनी खोलने की आवाज आई.. दरवाजा खुलते ही वैशाली ने अपनी मम्मी शीला की ओर देखा.. बिखरे हुए बाल, अस्तव्यस्त कपड़े, कंधे तक उतरा हुआ ब्लाउज जिसमें से उसकी काले ब्रा की पट्टी नजर आ रही थी.. वैशाली ने सोचा की अगर शीला का हाल ऐसा है तो उस बेचारे बाबिल का हश्र तो देखने लायक होगा..!!

शीला मुस्कुराते हुए वैशाली के करीब से गुजरकर ड्रॉइंगरूम के सोफ़े पर बैठ गई.. वैशाली अब भी बेडरूम के दरवाजे पर खड़ी थी बाबिल के इंतज़ार में.. तभी बाबिल भी अपनी टीशर्ट और ट्रेक-पेंट पहने बाहर आया.. उसके चेहरे पर थकान तो नहीं थी.. हाँ, संतुष्टि भरी मुस्कान जरूर थी.. और थोड़ी शर्म भी..!!

बाबिल चुपचाप वैशाली के करीब से गुज़रता हुआ ड्रॉइंगरूम की तरफ जाने लगा.. अपने करीब से उसे गुज़रता देख एक पल के लिए वैशाली का मन कर गया की उसे दबोचकर फिर से बेडरूम में ले जाएँ.. पर समय ही कहाँ था?? इससे पहले की कविता का एक ओर फोन आ जाएँ, बाबिल को भेज देना जरूरी था..

वैशाली ड्रॉइंगरूम की तरफ आई और उसने बाबिल से कहा "तुरंत निकल ऑटो से... और कविता के घर जाने की जरूरत नहीं, सीधे आंटी के घर ही पहुंचना"

बाबिल ने सिर झुकाए हामी भरी और मुख्य दरवाजे की ओर जाने लगा की तभी शीला ने उसे आवाज देकर रोक लिया.. बाबिल और वैशाली आश्चर्यसह शीला की तरफ देखने लगे की तभी शीला ने अपने पर्स से ५०० के तीन नोट निकाले और बाबिल के हाथों में थमा दिए.. बाबिल असमंजस में उन पैसों की तरफ देख रहा था

शीला: "देख क्या रहा है.. ये तेरी मेहनत का इनाम है, ले ले और जा जल्दी, तेरी मालकिन राह देख रही है" हँसते हुए उसने कहा

बाबिल घर से बाहर गया और वैशाली ने दरवाजा बंद कर दिया.. वह एकटक अपनी माँ के चेहरे की ओर देख रही थी, जो काफी खिला-खिला सा नजर आ रहा था.. जाहीर सी बात थी की उसके पीछे का कारण क्या था

शीला के बगल में बैठकर वैशाली ने रूठे हुए स्वर में कहा "कितनी देर लगा दी मम्मी तुमने.. मेरी तो बारी ही नहीं आई..!!"

शीला ने वैशाली की गाल पर हाथ फेरते हुए कहा "अरे मैं तो यहाँ कुछ दिनों के लिए ही आई हूँ.. और चली भी जाऊँगी.. तू तो यहीं है, जब मन चाहे इससे खेल सकती है"

वैशाली ने थोड़े गुस्से से कहा "इतना आसान भी नहीं है ना.. इस तरह घर का खाली मिलना, फिर उसे यहाँ बुलाना.. वो भी ऐसे की रमिला आंटी को शक न हो.. ऐसे मौके बार बार थोड़े ही मिलते है"

अपनी बेटी के क्रोध को भांप चुकी शीला ने उसके माथे पर स्नेहपूर्वक हाथ फेरते हुए कहा "क्यों इतना टेंशन ले रही है..!! यह नहीं तो कोई और सही"

शीला के मुंह से यह सुनते ही वैशाली बेहद चोंक उठी, उसने अपने माथे से शीला का हाथ झटकाते हुए कहा "क्या मतलब यह नहीं तो और सही? तुम्हें क्या लगता है मम्मी, की मैं कितने लोगों के साथ यह कर रही हूँ?"

वैशाली के इस रवैये से शीला एक पल के लिए झेंप जरूर गई, पर अपनी लाक्षणिक अदा में वापिस आते हुए कहा "इतनी भी भोली नहीं है तू वैशाली..!!"

वैशाली को अब सही में बहोत गुस्सा आया.. एक तरफ तो हवस की आग लगने के बाद बिना बुझे ही रह गई.. और ऊपर से उसकी माँ के ताने ने उसे और उकसा दिया..!!

वैशाली: "तुम भूल गई क्या मेरी शादी के पहले क्या हुआ था..!! राजेश सर के साथ जब पिंटू ने मुझे देख लिया था उसके बाद मेरी शादी तो ल लगभग टूट ही गई थी.. और इतना बड़ा लेक्चर भी सुनाया था तुमने.. उसके बाद अभी भी तुम्हें लगता है की मैं वो सब कर रही हूँ??"

शीला ने अपनी आँखें छोटी करते हुए कहा "गुस्सा क्यों हो रही है..!! मैंने तो बस एक बात कही.. और वैसे राजेश एकलौता तो था नहीं जिसके साथ तू ये सब कर रही थी..!!"

अब चौंकने की बारी वैशाली की थी.. वह स्तब्ध होकर बस सुनती ही रही

शीला: "हैरान मत हो.. मुझे पता ही तेरे और पीयूष के चक्कर के बारे में"

शीला की बात सुनकर वैशाली का खून जम गया.. मम्मी को इस बारे में कैसे पता लगा???

शीला ने एक शैतानी मुस्कान के साथ कहा "तुझे क्या लगता है, घर के अंदर मेरे पीठ पीछे सब चल रहा हो और मुझे ही न पता हो..!! ऐसा कभी हो सकता है क्या..!!"

वैशाली ने नजरें झुका ली और कोई जवाब नहीं दिया..

शीला: "डरने की कोई बात नहीं है बेटा.. एक औरत होने के नाते मैं जानती हूँ की तूने वो सब क्यों किया.. जवान शरीर बिना मर्द के लंबे समय तक कैसे रह पाता भला..!!"

वैशाली ने एक लंबी गहरी सांस ली और कहा "वो सब पुरानी बातें हैं मम्मी.. तब संजय से मेरा कोई नाता था नहीं.. पर पिंटू के साथ शादी के बाद मैंने ऐसी कोई हरकत नहीं की थी अब तक.. पूरी शिद्दत से मैं पिंटू के प्रति वफादार रही.. पर उसे भी तो समझना चाहिए ना.. तुम जानती नहीं हो माँ, की मेरे साथ क्या हो रहा है..!!"

सुनकर शीला के चेहरे पर चिंता की लकीरें दौड़ पड़ी

शीला: "क्या हुआ बेटा? यहाँ पर तुझे कोई तकलीफ है?"

वैशाली ने विस्तार पूर्वक पिंटू की उस समस्या के बारे में बताया जिसके कारण वह उसे तृप्त नहीं कर पा रहा था.. सुनकर शीला गहरी सोच में पड़ गई.. यह तो वाकई चिंता का विषय था.. पिंटू की शारीरिक समस्या और उससे निजाद पाने में असमर्थता.. यह तो वैशाली और पिंटू के सांसारिक जीवन को भंग करने का कारण बन सकती थी

काफी देर तक शीला और वैशाली दोनों चुप ही रहें

वैशाली ने नजरें झुकाकर कहा "मम्मी, मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि क्या करूँ.. पिंटू... वो... डॉक्टर के पास जाने को तैयार ही नहीं है.. बड़ा गुरूर है अपनी मर्दानगी पर.. मैं तो उससे बात कर करके थक गई..!!"

शीला ने एक गहरी साँस लेकर, वैशाली के बाल सहलाते हुए कहा "बेटा, तेरी बातें सुनकर... मुझे तेरी तकलीफ समझ आ रही है.. तू चुपचाप कब तक सहती रहेगी? शरीर की भूख... वो कोई छोटी चीज़ थोड़े ही है.. उसे अनदेखा करने से वह गायब तो हो नहीं जाती, बल्कि और तड़पाती है.."

वैशाली शरमाते हुए चुपचाप सुनती रही..

शीला ने वैशाली की आँखों में आँखें डालकर देखा और बोली "क्यों शर्मा रही है? मैं तेरी माँ हूँ, और एक औरत भी.. जवानी का जोश, शरीर की भूख... ये सब कुदरत की माया है.. तू पहले भी शादीशुदा रह चुकी है, फिर भी ऐसे मुद्दे पर बात करने में हिचक?"

वैशाली: "पर मम्मी, ऐसे ही मेरा पैर फिलसता रहा तो गलत होगा न?"

शीला ने थोड़े कड़क स्वर में कहा "वफादारी तब होती है जब सामने वाला भी अपनी ज़िम्मेदारी समझे.. अगर पति अपनी पत्नी की ज़रूरतों को अनदेखा करे, तो यह तो एक तरह का अब्यूज़ ही है.. तू पहले भी एक नाकाम शादी झेल चुकी है.. और अब तेरी उम्र भी हो चली है.. क्या तू चाहती है कि इसी तरह तड़पती रहे, और एक दिन तेरा चेहरा, तेरी जिंदगी से रौनक चली जाए?"

वैशाली: "तो क्या करूँ मम्मी? तलाक लेना तो विकल्प नहीं है.. पिंटू अच्छा इंसान है, बस यही एक समस्या है.."

शीला ने धीमे से कहा "देख बेटा, ज़िंदगी सिर्फ सहने के लिए नहीं होती.. कभी-कभी हमें अपने लिए, अपनी खुशी के लिए भी कदम उठाने पड़ते हैं.. तू शादीशुदा रह... पिंटू का साथ निभा... पर अपनी शारीरिक ज़रूरतों को नजरअंदाज मत कर... दूसरे रास्ते भी तो हैं..!!"

वैशाली: "पर कितना रिस्क है इन सब चीजों में.. तुम्हें तो पता है पिंटू का स्वभाव"

शीला ने गंभीर होते हुए कहा "हाँ.. जानती हूँ, इसलिए तुझे दो चीजों का अमल करना होगा.. एहतियात और चुप्पी.. किसी के साथ भी कोई इमोशनल अफेयर नहीं होना चाहिए.. सिर्फ... एक फिजिकल नीड का समाधान.. बिल्कुल डिस्क्रीट.. कोई जाने नहीं, खासकर पिंटू को तो बिल्कुल नहीं पता चलना चाहिए.."

वैशाली ने घबराते हुए कहा "मैं... मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी.. बहोत डर लगता है.. किसी को पता चल गया तो? लोग क्या कहेंगे?"

शीला ने दृढ़ स्वर में कहा "तू कुछ कर न कर.. लोग तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं.. और अगर तू इतनी सतर्क रही कि पता ही न चले, तो कौन कहेगा? यह तेरा शरीर है, तेरी ज़िंदगी है.. तू कब तक दूसरों के डर से अपने आप को सुखाएगी? मैं तुझे यह कह रही हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ कि एक औरत की भूख क्या होती है, और समाज उस भूख को कैसे दबाना चाहता है.."

वैशाली ने कुछ देर चुप रहकर फिर कहा "जितनी आसानी से तुम कह रही हो, पता नहीं.. मैं खुद को कंविन्स ही नहीं कर पा रही"

शीला ने थोड़ा रिलैक्स होते हुए कहा "देख.. पहला कदम है मन में ठान लेना कि तू अपने हक के लिए यह कर रही है.. फिर... सावधानी से.. किसी ऐसे को चुनना जो तेरी इस जरूरत को समझें.. कभी ब्लैक्मैल न करें.. हाँ सबकुछ केवल फिजिकल होना चाहिए.. कोई इमोशनल लगाव नहीं.. सबसे ज़रूरी - सेफ सेक्स.. हमेशा कंडोम का इस्तेमाल.. अगर कुछ अचानक हो जाए तो आफ्टर सेक्स पिल भी बड़ी आसानी से मिल जाती है"

वैशाली: "वो सब तो मैं भी समझती हूँ मम्मी.. पर ये सब कैसे हो पाएगा.. समझ में नहीं आता"

शीला: "धीरे धीरे सबकुछ होगा बेटा.. यह कोई लव स्टोरी नहीं है.. यह तेरी एक जरूरत का समाधान है, जो तेरा पति तुझे नहीं दे पा रहा.. इससे तेरा घर बचा रहेगा, तेरी शांति बची रहेगी.. कभी-कभी एक सफेद झूठ... एक छोटा सा रास्ता... पूरी जिंदगी को संभाल देता है.."

वैशाली ने गहरी साँस लेते हुए कहा "तुम्हारी बात में दम तो है... मैं इन्हीं उलझनों में घुट रही थी.. बस... एक अजीब सा डर लगा रहता है.."

वैशाली का हाथ थामकर शीला ने कहा "डर तो लगेगा ही.. पहली बार में मुझे भी लगा था.. पर जब तू देखेगी कि इससे तेरा मन हल्का हो रहा है, तेरे और पिंटू के रिश्ते में तनाव कम हो रहा है... क्योंकि तू उस पर गुस्सा नहीं करेगी... तो तुझे समझ आ जाएगा कि मैंने जो सलाह दी, वह सही थी.. बस याद रख - दिल पर कभी कब्ज़ा मत होने देना.. दिल तो पिंटू के पास ही रहना चाहिए.. बस शरीर... कभी-कभार... एक ब्रेक ले सकता है.."

वैशाली ने मुस्कुराते हुए, आँखों में थोड़ी चमक के साथ कहा "तुम सचमुच बहुत अलग हो माँ.. समाज क्या कहेगा, इसकी तुमने कभी परवाह नहीं की.."

शीला ने हल्के से हँसते हुए कहा "समाज की परवाह करती तो कब की बूढ़ी हो चुकी होती.. इस समाज ने हमेशा औरतों को बाँधा है.. पर हमें खुद ही अपनी आज़ादी के रास्ते बनाने पड़ते हैं.. बस, समझदारी से.. अब तू सोच.. मैं हूँ तेरे साथ..!"

वैशाली ने अपनी माँ शीला की तरफ देखा.. एक नई समझ और संकल्प उसकी आँखों में उतरता दिखाई दे रहा था..

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बाबिल और शीला के बीच संभोग का दूसरा दौर शुरू होता है, जिसमें शीला पूरी तरह से अपनी हवस का इस्तेमाल करते हुए बाबिल पर हावी हो जाती है.. इस बीच, बाहर बैठी वैशाली परेशान है क्योंकि कविता के लगातार फोन पर फोन आ रहे हैं और वह बाबिल को वापस भेजने के लिए कह रही है.. वैशाली आखिरकार दरवाजा खटखटाकर उन्हें रोकती है..

जब शीला और बाबिल बेडरूम से बाहर आते हैं, तो शीला बाबिल को १५०० रुपये इनाम के तौर पर देती है.. बाबिल के जाने के बाद वैशाली अपनी माँ से नाराज होती है कि उसकी बारी ही नहीं आई.. बातचीत के दौरान शीला वैशाली के पुराने शारीरिक संबंधों (राजेश सर और पीयूष के साथ) का जिक्र कर देती है, जिससे वैशाली हैरान रह जाती है..

वैशाली अपनी माँ को बताती है कि उसके पति पिंटू को शारीरिक समस्या है और वह डॉक्टर के पास जाने को तैयार नहीं है, जिससे वह तृप्त नहीं हो पा रही है.. शीला अपनी बेटी को सलाह देती है कि वह अपनी शारीरिक जरूरतों को नजरअंदाज न करे, बल्कि पूरी सावधानी और गोपनीयता के साथ किसी ऐसे व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाए जो उसकी इस जरूरत को समझे, बिना किसी भावनात्मक लगाव के.. शीला वैशाली को समझाती है कि इससे उसकी शादी और मानसिक शांति दोनों बनी रहेगी..

दूसरी तरफ, शीला की गैर-मौजूदगी में उसके घर क्या-क्या हो रहा है, चलिए आगे पढ़ते है..

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रूखी के गरम खरबूजों के बीच अपना लंड दबाकर मदन धक्के पर धक्का लगाए जा रहा था.. प्रत्येक धक्के के साथ रूखी अपने दोनों हाथ की उंगलियों के बीच निप्पलों को दबा रही थी.. और अपने गरम दूध की पिचकारी पर पिचकारी छोड़े जा रही थी.. श्वेत दूध के फव्वारे, रूखी के उपजाऊ बबलों से निकलकर मदन के शरीर और उसके लंड को भिगोए जा रहे थे.. दूध की हर पिचकारी का स्पर्श मदन में और अधिक जोश भरता जा रहा था.. रूखी के दोनों स्तन इतने बड़े थे की उसकी चर्बी के बीच मदन का लंड नजर भी नहीं आ रहा था.. उन मुलायम मांस के गद्दों के बीच लंड घुसाने में मदन को अत्याधिक आनंद आ रहा था..





जब मदन से ओर रहा न गया तब उसने रूखी के स्तनों के बीच से अपना लंड निकाला.. और उसकी मोटी मांसल जांघों के बीच सटकर बैठ गया.. दूध से सराबोर लोड़े को उसने रूखी के गरम गीले सुराख पर रखा और एक ही धक्के में उसे जड़ तक घुसेड़ दिया.. रूखी की छाती पर अपने शरीर का पूरा वज़न डालते हुए उसने एक निप्पल को अपने मुंह में लिया और होंठों से हल्के से दबाया.. गरम तरल प्रवाही से उसका मुंह भर गया.. दूध को हलक से उतारते हुए वह पागलों की तरह रूखी की निप्पलों को दांत से काटने लगा..





"आह्ह शेठ.., काटो मत, कितनी जोर से काटते हो? खा जाओगे क्या मेरे बबले?" गुस्से से रूखी चिल्लाई और फिर हंसने लगी.. मदन उस पर चढ़कर उसे चोद रहा था और उसके खरबूजे जीतने बड़े बबले की निप्पल मुँह में लेकर चूस रहा था.. रूखी का छरहरा और गदराया शरीर मदन के नीचे दबा हुआ था और रूखी की घोड़ी जैसी मजबूत टाँगें उसकी कमर के इर्द-गिर्द लिपटी हुई थीं.. मदन इतनी मस्ती में था कि उसने रूखी के निप्पल को दाँतों के बीच दबाकर चबा डाला और वो दर्द के मारे चिल्ला उठी..





मदन ने उसकी बात को अनसुनी करते हुए उसके स्तन को दाँतों से काटना जारी रखा. इससे पहले की रूखी फिर से चीखती मदन ने अपने मुँह से उसकी चूची निकाली और उसके होंठों को अपने होंठों से दबा दिया और उसकी आवाज़ बंद कर दी.. उसके होंठों को चूसते हुए वह अब उसे कस कर चोदने लगा..

वो भी "आह-ह-ह, न-आह-ह-ह, सस्स-ह" की दबी हुई आवाज़ें निकालते हुए उससे चिपक कर छटपटाने लगी.. यह उसके झड़ने के करीब आने की निशानी थी.. दो-तीन धक्कों के बाद ही उसके बंद मुँह से एक चीख निकली और उसने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी.. उसका शरीर कड़ा हो गया था और वो थरथराने लगी.. उसकी गांवठी चूत में से अब ढेर सारा खारा पानी बह रहा था..





वैशाली का फोन आने पर शीला उसके घर पहुँच गई थी.. वैसे जाने का कारण उसने मदन को बताया नहीं था पर इतना कहकर गई थी की एक हफ्ते तक वहाँ रुकेगी.. मदन को नई स्वतंत्रता मिल गई.. देखने जाएँ तो शीला और मदन के बीच किसी भी प्रकार की कोई दीवार नहीं थी.. दोनों उन्मुक्त होकर विभिन्न पात्रों के साथ संभोग करते थे और वह भी एक दूसरे की मौजूदगी में.. पर मदन का यह अवलोकन था की जब भी वो रूखी के बारे में बात करता तब शीला अवश्य बीच में रोड़े डालती.. और कैसे भी प्रयत्न करती की रूखी और मदन मिल न पाएं..

शीला का यह व्यवहार मदन को बेहद अचंभित करता.. बिस्तर पर पराई औरतों को उसे बेधड़क चोदते हुए देखकर शीला का सिर पर जु तक न रेंगती पर जैसे ही रूखी का जिक्र होता तब शीला के चेहरे पर क्रोध की भावना तुरंत झलक पड़ती..

मदन का मन एक अजीब सी उलझन और आश्चर्य से भर जाता.. वह अक्सर सोच में पड़ जाता, शीला के द्वारा दी गई उस स्वतंत्रता के विरोधाभास को निहारता.. यह कैसा विरोधाभास है? वह अपने आप से संवाद करता.. शीला तो मुझे सब बातों में खुली छूट देती है... न जाने कितनी स्त्रियों के साथ, उसकी मौजूदगी में भी, संबंध बनाने की इजाज़त थी.. उसे कभी कोई एतराज़ नहीं हुआ.. बल्कि, कई बार तो वह खुद ही उत्साहित होकर शामिल हो जाती और सह-संभोग के मजे लेती.. पर बात जब रूखी की आती... सिर्फ़ उस एक नाम से ही उसके चेहरे का रंग बदल जाता, आँखों में एक अजीब सी चिंगारी दौड़ जाती है.. पता नहीं क्या कारण था..!!

मदन का मन इस पहेली को सुलझाने की कोशिश करता रहता.. वह पिछले कई दृश्यों को याद करने लगा.. शीला का वह उन्मुक्त हँसता हुआ चेहरा जब वह दूसरी स्त्रियों को उसकी मौजूदगी में ही चोदता... और फिर वही चेहरा, जब भी रूखी का ज़िक्र आता, कठोर और तनाव से भरा हो जाता.. यह रुखावट, यह रोड़े अटकाना... यह सब इतना स्पष्ट और इरादतन था कि इसे अनदेखा करना असंभव था..!!

क्या शीला को रूखी से व्यक्तिगत द्वेष है? मदन ने सोचा.. पर उन दोनों के बीच ऐसा कोई झगड़ा तो नहीं दिखा था.. या फिर... क्या रूखी उसे कुछ ऐसा दे रही है जो शीला को पसंद नहीं था? यह सवाल उठते ही मदन का दिमाग एक ठोस दिशा में भागने लगा..

दूध रिसते विराट लचीले स्तनों के प्रति मदन के आकर्षण और जुनून से शीला वाकिफ थी.. वह अनोखी निकटता और तृप्ति का अहसास..!! यह उसके लिए सिर्फ़ शारीरिक सुख से कहीं ज़्यादा था.. यह एक प्रकार का भावनात्मक, लगभग आदिम स्तर का आकर्षण था.. और फिर उसे अपनी विदेश की मकान मालकिन की याद आई.. वह भी तो ठीक इसी वजह से उसके जीवन में विशेष थी.. दूध देने वाले स्तनों के प्रति उसका आकर्षण कोई नया या अलग था ही नहीं; यह तो उसकी एक गहरी, अंतरंग पसंद थी..!!

और तभी, जैसे कोई बिजली कौंध गई, एक नया विचार उसके मन में आया.. शीला के स्तनों से तो दूध नहीं आता.. यह साधारण सा शारीरिक तथ्य अचानक एक गहरे मनोवैज्ञानिक सत्य का द्वार खोलने लगा.. क्या यही वह कमी है? क्या यही वह चीज़ है जो शीला को रूखी के प्रति इतनी असुरक्षित बना रही है?

मदन ने इस विचार को ओर टटोला.. उनकी खुली, उन्मुक्त ज़िंदगी में, जहाँ शरीर सिर्फ़ मज़े का साधन था, वहाँ अचानक एक ऐसी चीज़ आ गई थी जो शीला के बस में नहीं थी.. वह मदन को हर वो सुख दे सकती थी जो एक साथी दे सकता है.. प्यार, साहचर्य, उत्तेजना, भरपूर संभोग.. केवल यह एक खास अनुभूति नहीं दे सकती थी, जो रूखी स्वाभाविक रूप से दे पाती थी..

शायद, मदन ने मन ही मन सोचा, इस बात का सेक्स से कुछ लेना-देना नहीं था.. यह तो लेन-देन की प्रक्रिया के बारे में था.. रूखी मदन को एक ऐसा तरल पदार्थ, एक ऐसा सार दे सकती है जो जीवन का प्रतीक है... और शीला वह देने में असमर्थ थी.. हो सकता है, शीला को लगता हो कि यह एक ऐसा बंधन है जो उसके और मेरे बीच की स्वतंत्रता से भी ज़्यादा मज़बूत है.. एक ऐसी देने-लेने की प्रक्रिया जिसमें वह भागीदार नहीं बन सकती थी..

शायद यह असुरक्षा की भावना सिर्फ़ शारीरिक न रहकर भावनात्मक हो गई थी.. अन्य स्त्रियाँ तो बस मौज-मस्ती के लिए थीं, जिनसे किसी भी प्रकार के गहरे बंधन का कोई खतरा नहीं था.. पर रूखी..!! रूखी एक ऐसी कमी को पूरा कर सकती थी जो शीला में थी.. और शायद शीला डर रही थी कि कहीं यह पूर्ति मदन को उससे दूर न ले जाए.. कहीं वह इस अनोखे आकर्षण में इतना खो न जाए कि उनकी साझा की हुई उन्मुक्त दुनिया ही पीछे छूट जाए..

मदन इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि शीला का रूखी के प्रति क्रोध, वास्तव में, अपनी एक सीमा के प्रति क्रोध था.. एक ऐसी सीमा जो प्रकृति ने बनाई थी और जिसे वह पार नहीं कर सकती थी.. रूखी मदन को वह दूध दे सकती थी, वह कोमल पोषण और एक अद्वितीय शारीरिक अनुभव दे सकती थी, जो शीला नहीं दे पा रही थी.. और इस न दे पाने की पीड़ा, इस असुरक्षा ने ही शीला के मन में ईर्ष्या और विरोध की आग को हवा दी थी.. यह उनकी स्वतंत्रता के सिद्धांतों और मदन की गहरी, अव्यक्त इच्छाओं के बीच की एक अनकही लड़ाई थी, जिसमें शीला स्वयं को असमर्थ पा रही थी..

रूखी को लेकर शीला के मन में जो भाव आ जाते वह देख मदन समझ चुका था की अगर उसे इस उन्मुक्त जीवन को शीला के साथ जीना हो तो रूखी को भूल जाना ही बेहतर होगा.. पर रूखी के दूध टपकाते विशाल खरबूजों जैसे स्तनों की याद आते ही वह बेकरार हो उठता.. कई बार उसका मन करता की वह चुपके से रूखी को कहीं बाहर होटल में ले जाएँ और उसके दूध-युक्त उरोजों को मन भरकर चूसें.. पर शातिर शीला को इसकी भनक कभी न कभी लग ही जाती.. मदन वह जोखिम उठाना नहीं चाहता था.. जो मिल रहा था उसी से संतोष प्राप्त कर खुश रहता..

पर जब शीला एक हफ्ते के लिए वैशाली के घर गई.. तब मदन के मन में मोतीचूर के लड्डू फूटने लगे.. उसने अपने तरीके से रूखी का संपर्क किया और उसे अपने घर बुला लिया.. रूखी के आते ही वह उसके बबलों पर ऐसे टूट पड़ा जैसे रेगिस्तान में कुआं मिल गया हो..

मदन ने भी तीन-चार और करारे धक्के लगाए और अपना लंड उसकी चिपचिपी गदराई मुनिया में पूरा अंदर घुसेड़कर झड़ गया.. उसके लंड ने रूखी की गहरी गुफा में वीर्य की कुछ बौछारें की और शांत होकर बाहर पिचक गया.. थोड़ी देर बाद वह लुढ़क कर उसके ऊपर से अलग हुआ और लेट कर सुस्ताने लगा..





लेटी हुई रूखी बिस्तर पर बैठ गई.. बड़े बड़े बबलों पर मदन के दाँतों के गहरे निशान थे, उन्हें सहलाते हुए वह मदन से शिकायत करने लगी, "शेठजी, क्यों काटते हो मेरी चूची को बार-बार, मुझे बहुत दुखता है, कल तो आपने थोड़ा खून भी निकाल दिया था.." उसकी आवाज़ में शिकायत के साथ-साथ हल्का सा नखरा भी था.. उसे दर्द तो हुआ होगा पर मदन की इस हरकत पर मजा भी बहोत आया था..

मदन ने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुस्कुराते हुए उसे बाहों में खींच कर उसके गुलाबी होंठों का चुंबन लेते हुए सोचने लगा कि क्या उसकी तक़दीर है जो इतनी गरम, चुदैल, दूध भरी रूखी को रगड़ने का मौका मिल गया..

अचानक रूखी ने मदन की गोद में सिर झुकाया उसका सुपाड़ा अपने मुँह में ले लिया और उसके लंड को चूसने लगी.. अभी अभी एक बढ़िया वीर्य स्खलन से उभर रहे उस लंड को अपने गीले तपते मुँह और मछली सी फुदकती जीभ से ऐसा तड़पाया कि वह फिर से फड़फड़ाने लग गया.. मदन यूं ही सुस्ताते हुए पड़ा रहा और मज़ा लेने लगा.. हाथ बढ़ा कर उसने उसके मटके जैसे स्तन को पकड़ लिया.. क्या माल था! मटकों से कड़े थे उसके स्तन.. सुपाड़ा चूसते-चूसते वह अपनी एक मुठ्ठी में लंड का डंडा पकड़कर सरका लगा रही थी, बीच में आँखें ऊपर करके मदन की आँखों में देखती और फिर चूसने लग जाती..





उसकी आँखों में इतनी शैतानी खिलखिला रही थी कि दो मिनट में मदन का लंड फिर खड़ा हो गया..

"रूखी, मुँह हटा ले, अभी अभी झड़ा हूँ..फिर खड़ा कर दिया.. दर्द हो रहा है.. ओ-ओ,"

वह कहता रह गया पर रूखी ने तो लंड का ओर अधिक हिस्सा मुँह में अंदर तक ले लिया और तब तक चूसती रही जब तक मदन ने उसे पकड़कर अपने लंड से अलग नहीं किया..

मदन ने हाँफते हुए कहा, "इतना जुल्म मत कर रूखी.. जान निकल जाएगी मेरे हथियार की"

रूखी ने खिलखिला कर हँसते हुए कहा "अरे मैं क्या पगली हूँ शेठजी, मैं तो इसे प्यार कर रही थी.."

मदन: "एक बात बता रूखी.. तेरे पति रसिक का तो खूँटे जैसे मोटा तगड़ा हथियार है.. फिर भला तुझे मेरे लंड में क्या नजर आता है जो इतना प्यार दिखा रही है..!!"

सुनकर रूखी फिर हंस पड़ी और बोली " अरे साहेब, आपके जैसा खूबसूरत गोरा गुलाबी लोडा कहाँ हम ग़रीबों को नसीब होता है..! हमारे नसीब में तो बस काले कलूटे मूसल ही आते है जो नीचे के अंजर-पंजर को ढीला कर देते है.. आपका ये प्यारा सा लंड तो प्रसाद है मेरे लिए" वह बड़े लाड़ के अंदाज़ में बोली..

उसकी इस अदा पर फिदा होकर मदन ने उसे बाहों में जकड़ लिया और चूमने लगा पर वह छूट कर खड़ी हो गई और खिलखिला उठी "अभी नहीं शेठजी.. मजे से चूस रही थी तब रोक दिया.. और चुम्मा-चाटी कर रहे..!! हटिए, मुझे घर जाना है.. बहोत देर हो गई"

कहते हुए रूखी बिस्तर से उठी और कपड़े पहनने लगी.. रूखी को लंड चूसते हुए रोकने के लिए मदन खुद को कोसने लगा.. पर करता भी क्या..!! उसका लंड दर्द करने लगा था.. आराम चाहता था..!!

"रूखी, और कुछ नहीं तो थोड़ा सा दूध तो पिलाती जा.." मदन ने आशा भारी आँखों से ब्लाउज पहन रही रूखी को देखते हुए कहा

"दूध तो सारा आप चूस गए.. और अब पहले जितना दूध कहाँ निकलता है..!! दो साल हो गए लल्ला को जनम दिए.. अब तो दूध जाने को है.. जब तक थोड़ा बहोत निकलता है तब तक आप मजे लीजिए.. अभी तो सारा माल खतम है" महाकाय बबलों को बड़ी मुश्किल से ब्लाउज में कैद कर के हुक बंद करते हुए रूखी ने जवाब दिया

"मतलब अब तेरा दूध सूख जाएगा..!! अरे यार.. ऐसा मत कर.. कोई तो तरीका होगा इसे चालू रखने का"

रूखी हंस पड़ी "एक ही तरीका है.. फिर से गाभिन होने का.. पर दूसरा बच्चा तो मैं अब करने से रही.. एक को संभालने में ही जान निकल जाती है.." रूखी ने कहा.. फिर थोड़ी देर तक कुछ सोचते रहने के बाद वह बोली "पर चिंता मत कीजिए सेठजी, आपके लिए कुछ न कुछ जुगाड़ तो जरूर करूंगी.. पर अभी तो मुझे जाना होगा" कहते हुए रूखी उठकर जाने लगी..

मदन मुंह लटकाए उसे जाते हुए देखता रहा

जाते-जाते मदन के चेहरे की निराशा देखकर बोली, "ऐसे मुँह मत लटकाइए.. फिर कभी मौका मिलेगा"

मदन: "फिर कभी की बात मत कर.. तुझे तो पता है, तेरा नाम सुनकर ही शीला कैसे भड़कती है..!! कितने सालों के बाद मुश्किल से ऐसा मौका मिला है.. एक काम कर.. आज रात को आजा.. फिर यही रहना पूरी रात.. तेरे थनों को पूरी रात दुहना चाहता हूँ.." अपनी जीभ लपलपाते हुए मदन ने कहा

रूखी: "साहब, पागल हो गए हो क्या.. घर पर क्या बोलूँ?? चलो मेरे मरद को तो संभाल लूँगी पर मेरी सास को क्या जवाब दूँ? ऐसे पूरी रात बिना वजह बाहर कैसे रह सकती हूँ?? कुछ तो सोचिए"

मदन को रूखी की बात ठीक लगी.. ऐसा कौन सा बहाना बनाया जाए की रूखी पूरी रात उसके साथ बीता सकें..!! काफी यत्न करने पर भी दिमाग में कोई आइडिया नहीं आया.. दिमाग और लंड दोनों रक्त से ही काम करते है.. और एक बार में दोनों में से कोई एक ही अंग काम कर सकता है..!!

मदन: "फिलहाल तो तू घर जा.. मैं कोई तरीका सोचकर तुझे फोन करता हूँ" कहते हुए मदन उठा और अपने वॉलेट से ५०० के चार नोट निकालकर रूखी के हाथों में थमा दिए.. इतने पैसे देखते ही रूखी की आँखें चमक उठी.. मदन के हाथ से नोट लेकर उसने अपने दोनों बबलों के बीच की गहरी खाई में रुपये छुपा दिए..

रूखी: "ठीक है शेठजी, पर कोई ढंग का बहाना सोचना.. चलती हूँ"

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जब शीला कुछ समय के लिए वैशाली के घर जाती है, मदन रूखी को घर बुला लेता है और वे दोनों कई बार शारीरिक संबंध बनाते हैं.. रूखी उसके बच्चे के जन्म के दो साल हो चुके है और उसका दूध अब सूखता सा जा रहा है.. मदन इस बात से मायूष है की अब उसे पर्याप्त मात्रा में रूखी का दूध चूसने नहीं मिलेगा.. अंत में, मदन उसे रात भर रुकने के लिए मनाने की कोशिश करता है और पैसे भी देता है, लेकिन रूखी को घर जाना पड़ता है..

अब चलिए देखते है की शीला के साथ क्या हो रहा है..

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अंगड़ाई लेकर वैशाली अपने बेड से उठी.. मोबाइल उठाकर उसने समय देखा.. ०८:३० बज चुके थे.. आज तो ऑफिस जाना था.. जल्दी उठकर तैयार होना पड़ेगा

पिछले कुछ दिनों से जब से उसकी मम्मी शीला आई थी तब से वैशाली ने छुट्टी ले रखी थी.. शीला अब भी यहीं थी पर छुट्टिया खतम हो चुकी थी.. और ऑफिस पर काम भी ढेर सारा पड़ा था

वैशाली झटपट उठी.. शीला किचन में शायद नाश्ता बना रही थी.. वैशाली बाथरूम में घुसी और ब्रश पर टूथपेस्ट लगाकर जैसे तैसे दांतों पर रगड़ने लगी.. गीजर का स्विच ऑन कर वह कपड़े उतारने लगी.. शावर का नॉब घुमाते ही, पानी की कई बारीक फव्वारियाँ उसके श्वेत मांसल जिस्म को भिगोने लगी..





गरम पानी ने जिस्म में रक्त संचार को तेज कर दिया.. शावर जेल को शरीर पर रगड़ते हुए वैशाली सोच रही थी.. दो दिन पहले जब बाबिल के साथ मम्मी ने उसे रंगेहाथों पकड़ लिया.. तब पहले तो वह बेहद घबरा गई थी.. फिर मम्मी के साथ हुई बातचीत के बाद सब सामान्य जरूर हो गया.. लेकिन बाबिल को अपने जिस्म की आग बुझाने बुलाया था वहाँ परिस्थिति का निर्माण कुछ ऐसा हुआ की मजे तो सारे मम्मी ने ही उठा लिए.. वो कहते है न.. दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम.. खाना पका तो था वैशाली के लिए और सारा माल चट कर गई शीला..!!

नहाते हुए अपनी जांघों के बीच चूत की लकीर पर उँगलियाँ फेरते हुए वैशाली के मन में आया.. आह्ह.. इस सुराख तक बाबिल का लंड लगभग पहुँच चुका था.. निवाला मुंह तक आने से पहले ही दूर हो गया.. उस दिन की बातें याद करते हुए उसकी क्लिटोरिस फुदकने लगी.. मन तो कर रहा था की उसे रगड़कर पानी निकाल दे.. पर कमबख्त टाइम कम था.. अभी तो तैयार होना था.. नाश्ता करना था.. और ऑफिस तक जाने के १५ मिनट जोड़ लो तो काफी देर हो चुकी थी..







वैशाली ने शावर बंद किया, अपना बदन तौलिए से पोंछा और झटपट बाथरूम से बाहर आई.. आईने के सामने खड़े रहकर एक पल के लिए उसकी नजर अपने जिस्म की गोलाइयों पर अटक सा गया.. एक लंबी आह भरकर उसने ब्रा में बड़े बड़े उरोजों को मजबूती से ठुसा.. बाकी के कपड़े पहने.. हल्का सा मेकअप लगाया और पर्स लेकर किचन में आ गई

"तैयार हो गई तू?" तवे पर गरम हो रही ब्रेड पर पिघला हुआ मक्खन लगाते हुए शीला ने पूछा

"हाँ मम्मी.. पता नहीं आँख ही नहीं खुली.. और अलार्म लगाना भी भूल गई थी.. देर हो गई.. जल्दी नाश्ता दे दो.." वैशाली ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए कहा

शीला ने झटपट दो ब्रेड-टोस्ट उसकी प्लेट में रख दिए और साथ में गरमागरम चाय भरा हुआ मग भी..

"तू तो चली जाएगी ऑफिस.. अब मैं क्या करूँ पूरा दिन घर बैठकर?" अपनी चाय पीते हुए शीला ने कहा

मुंह में ब्रेड का टुकड़ा ठूँसते हुए वैशाली ने कहा "कहीं घूम आओ.. नहीं तो कविता से मिलने चली जाओ"

शीला ने जवाब नहीं दिया और चाय पीने लगी..

कुछ देर बाद वह बोली "सोच रही हूँ, तेरी ऑफिस का चक्कर लगाऊँ आज"

सुनकर एक पल के लिए थोड़ी सी चोंक गई वैशाली, फिर ब्रेड का टुकड़ा चबाते हुए बोली "मेरी ऑफिस आकर क्या करोगी तुम?"

शीला ने मुसकुराते हुए कहा "तेरी ऑफिस मैंने देखी ही नहीं है आज तक.. देखना भी हो जाएगा और पीयूष से भी मिल लूँगी.. सुना है, मौसम भी आई है बेंगलोर से..!! वो भी तो होगी वहाँ.. सबसे मिल भी लूँगी और टाइम भी पास हो जाएगा मेरा"

वैशाली को शीला की बात ठीक लगी, उसने कहा "ठीक है, तैयार होकर आ जाना.. मैं ऑफिस का अड्रेस भेजती हूँ आपको.. और हाँ, खाना भी हम साथ ही खा लेंगे.. ऑफिस के नजदीक ही एक अच्छा रेस्टोरेंट है.. लंच टाइम में वहाँ चले जाएंगे.. चलो, अब मैं चलती हूँ, देर हो रही है मुझे"

कहते हुए वैशाली ने अपना पर्स उठाया और लगभग भागते हुए चली गई

शीला ने इत्मीनान से अपनी चाय खत्म की और नहाने चली गई.. नहाकर उसने अपनी पसंदीदा लाल रंग की साड़ी पहनी और ऊपर सजा लिया टाइट ब्लाउज.. वैसे शीला कोई हर ब्लाउज टाइट ही पड़ता था.. उसके खरबूजे थे ही इतने बड़े बड़े..!! हल्की सी लिपस्टिक और मेकअप लगाकर वह वैशाली की ऑफिस जाने निकल पड़ी

बाहर आकर वह ट्राफिक से लबालब भरी सड़क के किनारे चलते हुए मुख्य रास्ते तक आई.. फूटपाथ पर चलकर आ रहे लोगों की नजरें इस कमाल के स्तनों वाली सुंदर स्त्री पर चिपक जा रही थी.. लाल साड़ी में वाकई शीला कहर ढा रही थी.. उसके हर कदम पर जिस तरह उसके बड़े बड़े मांसल नितंब और विराट स्तन थिरक रहे थे, देखने वाला अपनी जांघों के बीच हाथ दबाने को मजबूर सा हो जाता था..





मटकती हुई चाल से चलती हुई शीला ने बड़े ही नखरीले अंदाज में एक ऑटो वाले को रोका.. वैसे ऑटोवाला जाते जाते उसे ही देख रहा था.. वो न भी रोकती तो उसे देखने के लिए वह खुद सड़क के किनारे ऑटो रोक देने वाला था..

ललचाई नज़रों से शीला के गदराए हुए मदमस्त जोबन को बेशर्मी से तांक रहे रिक्शेवाले की ओर देखते हुए शीला ऑटो की तरफ आगे बढ़ी.. शीला के करीब आते ही ऑटो वाले ने मीटर गिरा दिया

"बैठिए मेडम"

शीला ने थोड़े ताज्जुब से कहा "पूछोगे नहीं की कहाँ जाना है..??" वैसे शीला को यकीन था की उसके नशीले बदन का जादू कुछ इस कदर ऑटोवाले पर चल गया था की वो कहीं भी जाने के लिए मना नहीं कर पाएगा

"अरे मैडम जी, हमारा तो काम ही है ले जाना.. आप जहन्नुम में भी कहोगी तो साथ चलेंगे"

"साले मैं क्यों जहन्नुम जाऊँगी, जाएँ मेरे दुश्मन" शरारती मुस्कान के साथ शीला अंदर बैठ गई और वैशाली की ऑफिस का पता बताया

ऑटोवाले ने जेट की स्पीड से ऑटो चला दी.. वैसे तो उसे धीरे धीरे चलाना था ताकि ज्यादा से ज्यादा देर तक वो मिरर से शीला का हुस्न देख सकें.. पर खस्ता हाल सड़कों पर तेज गति से चलाने पर गड्ढों में जब ऑटो उछलता था तब साथ ही साथ शीला के बड़े बड़े मम्मे भी उछलते थे.. देखने में बड़ा मज़ा आ रहा था

शीला को तो पता ही था की वो ऑटोवाला कनखियों से उसे देख रहा था और शीला को ऐसी शरारतें करना बहोत पसंद भी था.. जानबूझकर उसने अपना पल्लू नीचे कर लिया और अनजान बनकर अपना मोबाइल चलाती रही

ऑटो वाले का एक हाथ हेंडल पर और दूसरा हाथ उसके लंड पर था.. शीला के जलवे देखते हुए उसका लंड ऐसा खड़ा हो गया की उसका मन कर गया की वहीं लंड बाहर निकालकर मुठ्ठी मार ले

तभी एक गड्ढे पर ऑटो ऐसे उछला की पलटते पलटते बच गया.. शीला उछलकर सीट पर टेढ़ी हो गई.. मुश्किल से ऑटोवाले ने रिक्शे को पलटने से बचाया

शीला गुस्से से चिल्ला पड़ी "भोसड़ी के, तेरा लंड खुजाने के चक्कर में जान चली जाती मेरी.."

एक पल के लिए वह ऑटो वाला शीला की इस बेवाक भाषा से सहम कर रह गया.. पर वो भी था पक्का लोफ़र

"क्या कहूँ मैडम, आप हो ही ऐसी.. नजर ही नहीं हटती"

शीला: "बकवास बंद कर और चुपचाप ऑटो चला"

ऑटो वैशाली की ऑफिस के बाहर पहुँच गया.. शीला उतरी और किराया चुकाने के लिए उनसे अपना पर्स खोला

"कितना हुआ?"

रिक्शेवाले ने शरारती अंदाज में कहा "पैसे नहीं चाहिए.. पर अगर तुम मेरे साथ चलोगी तो मैं सामने से पैसे देने को तैयार हूँ"

सुनते ही शीला के तेवर बदल गए.. जैसे ही उसने झुककर अपना सेंडल निकाला, रिक्शेवाला दूम दबाकर भाग गया





मन ही मन उसे गालियां देते हुए शीला उसे जाते हुए देखती रही

"अरे शीला भाभी, आप यहाँ?? और ये सेंडल हाथ में पकड़कर क्यों खड़ी हो?" अपनी गाड़ी से उतरते हुए पीयूष ने शीला को खड़े हुए देखा और उसके करीब आ पहुंचा

"ओह पीयूष तुम..!! अरे कुछ नहीं, सेंडल में कुछ फंस गया था तो निकाल रही थी.. हाँ, कुछ दिन वैशाली से मिलने आई थी.. वैशाली की छुट्टी खतम हो गई और मैं घर पर अकेले बैठे बैठे बोर हो रही थी.. सोचा यही चली आऊँ.. ऑफिस भी देख लूँगी और तुम सब से मिलना भी हो जाएगा..!! वैसे कविता कैसी है? काफी टाइम हो गया उसे देखे हुए" शीला ने कहा

पीयूष: "कविता वैसी ही है जैसे पहले थी.. आप तो जानती हो उसे.. खेर, वो सब छोड़िए और आप अंदर चलिए.. बैठकर आराम से बातें करते है"

पीयूष शीला को ऑफिस की अंदर ले गया.. शीला ने पूरी ऑफिस को मुआयना एक ही नजर में कर लिया.. बड़ा ही शानदार ऑफिस था.. शीला को देखते ही वैशाली दौड़कर उसके पास आ गई

"आ गई मम्मी, चलो में तुम्हें मेरा डेस्क दिखाती हूँ" वैशाली ने शीला का हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा

"अरे वैशाली, बाद में आराम से दिखाना, शीला भाभी की पहले कुछ खातिरदारी तो करने दो, आइए भाभी, मेरी केबिन में चलिए.. और वैशाली, तुम भी आओ अंदर.. बैठकर मस्त कॉफी पीते है" पीयूष ने दोनों से कहा

"ये भी ठीक है, आजा वैशाली" शीला ने कहा और दोनों पीयूष के पीछे पीछे उसके आलीशान केबिन के अंदर दाखिल हुए

पीयूष अपनी कुर्सी पर बैठ गया और सामने वाली चेयर्स पर शीला और वैशाली बैठ गए.. लाल साड़ी में कहर ढा रही शीला को देखकर पीयूष के होश ही गूम हो गए थे लेकिन फिलहाल वैशाली की मौजूदगी में वह बड़ी ही शालीनता से पेश आ रहा था

पीयूष ने चपरासी को बोलकर तीन कप कॉफी मँगवाई और फिर तीनों के बीच बातों का दौर शुरू हुआ.. थोड़ी ही देर में कॉफी आ गई..

पीयूष: "और बताइए, वहाँ पर सब कैसे है? मदन भैया से भी काफी टाइम हुआ कोई बातचीत नहीं हुई.. राजेश सर भी कहाँ खोए हुए है पता नहीं"

गरम कॉफी की चुस्की लगाते हुए कहा "सब ठीक है.. अपनी दुनिया में मस्त.. तू बता.. तू तो हमारे शहर का रास्ता ही भूल गया.. जब से यहाँ आया है, यहाँ का ही होकर रह गया"

तभी वैशाली के मोबाइल पर एक कॉल आया, स्क्रीन पर नाम देखकर वह बोली "मुझे मेरे डेस्क पर जाना होगा, क्लाइंट का फोन है.. आज उनका बहोत बड़ा कंसाइनमेंट निकलने वाला है तो मुझे सारी डिटेल्स भेजनी है.. आप दोनों आराम से बातें करो और हाँ, पीयूष, मैं और मम्मी दोपहर को फूड-किंग में लंच करने जा रहे है.. तुम भी साथ चलो"

पीयूष ने मुस्कुराकर कहा "हाँ हाँ, क्यों नहीं"

वैशाली ने जल्दी से केबिन के दरवाजे की ओर जाते हुए कहा "ठीक है फिर, दोपहर को मिलते है" कहते हुए वो आनन-फानन में बाहर चली गई

पीयूष ने एक गहरी सांस ली.. वैशाली के चले जाने से वो थोड़ा खुश भी हुआ था.. अब वो आराम से शीला भाभी के साथ बातें कर सकेगा

शीला: "हाँ तो मैं कह रही थी, तुम तो जाने के बाद हमारे यहाँ का रास्ता ही भूल गए.. कभी याद नहीं आती हमारी?" आँखें नचाते हुए शीला ने पीयूष से पूछा

पीयूष: "भाभी, आप तो जानती ही हो की कैसे हालात में मेरा यहाँ आना हुआ.. पापा जी (सुबोधकांत) की मौत के बाद बिजनेस का सारा भार मुझ पर आ गिरा.. और उस वक्त तो मैं राजेश सर की ऑफिस में मामूली सा मुलाजिम था.. न बिजनेस की कोई समझ थी और ना ही स्टाफ को संभालने का कोई अनुभव.. उनके अचानक देहांत से काफी कुछ बिजनेस बिखर भी रहा था.. सबकुछ पटरी पर लाते लाते इतना टाइम निकल गया.. और फिर जब सब कुछ ठीक से संभल गया तो बिजनेस इस हद तक बढ़ गया की सांस लेने की भी फुरसत मिलती नहीं थी.. वरना आप लोगों को मैं कभी भूल सकता हूँ.. खासकर आपको..!!" पीयूष ने भी शैतानी मुस्कान के साथ जवाब दिया

सुनते ही शीला हंस पड़ी.. पीयूष के संग उसने बड़े गुल खिलाए थे अपने घर.. जब मदन विदेश था तब..!! दोनों के दिमाग में वही सारी पुरानी यादें फिल्म की तरह चल रही थी पर कोई भी उसके बारे में कुछ बोल नहीं रहा था

शीला की साड़ी के पारदर्शी पल्लू से उसके दोनों बबलों के बीच की नशीली खाई को देखते ही पीयूष ने अपनी कुर्सी टेबल के करीब खिंच ली ताकि उसके और शीला के बीच की दूरी घट कर एक फुट से भी काम रह जाए.. टेबल की एक तरफ शीला थी, जो अपनी कुहनियाँ टेबल पर जमाए बैठी थी और दूसरी तरफ था पीयूष जो शीला के भारी भरकम बबलों को देखकर मन ही मन आहें भर रहा था





"भाभी, क्या कहूँ.. आपका जलवा तो अभी भी कायम ही है" पीयूष ने मसखरे अंदाज में कहा

"हट झूठे.. फिजूल की तारीफ करना तो कोई तुझसे सीखे" शीला ने मुसकुराते हुए कहा

"सच भाभी.. आप को तो पहले से ही पता है.. आपके ये (उंगलियों से शीला के स्तनों की ओर इशारा करते हुए) मुझे कितने पसंद थे.. पसंद थे क्या आज भी पागल हूँ मैं.. देखकर ही मेरा दिमाग खराब हो जा रहा.. कैसे संभालती हो आप इतना वजन से भरा हुआ हुस्न" पीयूष ने अपनी आशिक मिजाजी दिखाई

शीला खिलखिलाकर हंस पड़ी "जब संभालने वाला हो तो सब कुछ संभल ही जाता है.. वैसे तू कविता को ठीक से संभाल पाता है या नहीं..?? जब तू पड़ोस में रहता था तब तुझे खुश करने की काफी ट्रैनिंग दी थी मैंने कविता को"

कविता का नाम सुनते ही पीयूष का मुंह ऐसा हो गया जैसे उसके मुंह के अंदर किसी ने जबरन नीम का कड़वा रस डाल दिया हो

"छोड़िए न भाभी कविता की बातें" पीयूष ने नजरें फेर ली

"अरे, क्या हुआ.. सब ठीक तो है ना तुम दोनों के बीच?" थोड़े चिंतित स्वर में शीला ने पूछा

"कहने को सब ठीक भी है और नहीं भी..!!"

"मतलब.. समझी नहीं.. साफ साफ बता" शीला ने कहा

एक लंबी गरम सांस छोड़कर पीयूष ने कहा "भाभी, मनोविज्ञान कहता है की हर पुरुष को अपनी स्त्री को समझने की नहीं पर चाहने की कोशिश करनी चाहिए और स्त्री को चाहिए की वह अपने पति को भले कम ज्यादा चाहें पर समझना जरूर चाहिए"

शीला: "ये सब मनोविज्ञान का ज्ञान मुझे मत सीखा.. साफ साफ बोल"

पीयूष: "अब क्या कहूँ.. बिजनेस मुझे इतना व्यस्त रखता है की हमें एक दूसरे के लिए उतना वक्त ही नहीं मिलता.. और जब साथ गुजारने का वक्त मिलता है तब वह किसी न किसी बात पर रूठी ही रहती है.. अब आप ही बताइए, मैं यह इतना सारा झमेला किसके लिए कर रहा हूँ?? उसकी लिए ही न.. मैं कमा रहा हूँ ताकि वो ऐशों-आराम की ज़िंदगी जी सके.. उसकी सारी जरूरतें पूरी हो.. किसी भी चीज की कमी न हो.. पर वो है की समझने को तैयार ही नहीं..!! जब देखो तब किसी न किसी बात पर उखड़ती ही रहती है.. काफी समय से हम दोनों के बीच केवल काम की ही बातें होती है"

शीला बिना कुछ बोले सोचती ही रही.. पीयूष शीला की ओर थोड़ा और झुका.. लोलुप नजरों से शीला के विराट बबलों की ओर देखते हुए वह बोला

"भाभी, बहोत टाइम हो गया.. आपके इन धुरंधरों के दर्शन नहीं हुए.. दर्शन तो करवा दो"

सुनकर शीला हंस पड़ी.. इस बला की खूबसूरत गदराई भाभी को हँसते हुए देख पीयूष मंत्रमुग्ध हो गया

"पागल हो गया है तू.." शीला ने अपना पल्लू ठीक करने के बहाने उसे थोड़ा सा और दिखा दिया.. द्रश्य बिल्कुल वैसा ही था जैसे स्पेन में सांड को लाल कपड़ा दिखाके उकसाने का खेल होता है.. और शीला ने तो आज साड़ी भी लाल कलर की पहन रखी थी.. फिर पीयूष नाम का सांड भला कैसे काबू में रहता..!!

एक भारी सांस लेते हुए पीयूष ने कहा "ठीक कहा अपने भाभी.. आपके इन दोनों को देखकर मैं पागल ही हो गया हूँ.. मुझे तो आज भी याद आते है वो दिन..!! याद है, एक बार हम सब मूवी देखने गए थे..!! आप, मैं और कविता.. तब कितना मज़ा आया था..!!"

शीला को तो सब कुछ याद था.. सेटिंग तो उस दिन कविता और उसके प्रेमी पिंटू की करनी थी.. पिंटू, जो अब उसका दामाद था..!! कविता के विनती करने पर शीला उन दोनों के साथ मूवी देखने चली थी.. शीला पीयूष को उलझाकर रखने वाली थी ताकि कविता अपने प्रेमी के साथ मजे कर सके.. इसके लिए पीयूष का ध्यान भटकाना जरूरी था.. और फिर अंधेरे में जब उसके दोनों बबले ४४० वॉल्ट के बल्ब की तरह खुलकर झगमगाए तब पीयूष को पहली बार उनके दर्शन हुए थे.. दर्शन क्या हुए थे, पीयूष ने मसल मसलकर लाल कर दिए थे..!!

शीला ने नाटक करते हुए कहा "मूवी देखने..!! हम कब गए थे मूवी देखने..!! मुझे तो कुछ याद नहीं"

पीयूष: "अरे क्या बात कर रही हो आप भाभी? भूल गए..!! आप, मैं और कविता साथ गए थे.. मैं आपकी बगल मैं बैठा था.. उस दिन पहली बार आपने मुझे इन हुस्न से भरे गोलों से इन्ट्रोडक्शन करवाया था.. आह्ह.. क्या नजारा था..!! पहली बार मैंने छुआ था और फिर क्या क्या नहीं किया था..!! आप चाहें भूल गई हो पर मैं उस दिन को कभी भूल नहीं सकता"

सुनकर शीला हंस पड़ी और फिर बोली "याद है मुझे सब कुछ.. मैं तो बस तेरे मजे ले रही थी"

पीयूष: "क्या भाभी आप भी..!! आपने तो मजे ले लिए.. अब मुझे भी थोड़े मजे करवा दो ना.. प्लीज..!!" ललचाई भूखी नज़रों से, टेबल पर टीके हुए शीला के भरे भरे स्तनों को देखते हुए वह बोला

शरारत भरी नज़रों से देखते हुए शीला ने दोनों हथेलियों से अपने स्तनों को दबाते हुए उसके मांस को उभारा और आँख मारते हुए बोली "क्या करना चाहता है तू?"

यह देखकर, पीयूष की आह निकल गई.. क्या नजारा था..!! शीला के बबलों में ऐसा जादू था की देखने वालों का एक ही पल में वशीकरण कर लें.. एक बार नजर चिपक जाने के बाद कोई नामर्द ही अपनी नजर हटा पाएं..!!

पीयूष: "एक बार खोलकर दिखा दो भाभी" अपनी जीभ लपलपाते हुए बोला

"दिमाग खराब है क्या तेरा..!! ये कोई जगह है ऐसा सब करने की" शीला ने जवाब दिया और स्तनों को और उभारने लगी.. यही स्टाइल थी शीला की.. मना भी करेगी और ललचाएगी भी..

खूबसूरत स्त्रियों की यह अदा बड़ी जानीमानी है.. पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करना और फिर एक नजाकत भरी दूरी बना लेना, स्त्री का अपनी सत्ता और सौंदर्य के प्रभाव को परखने का एक तरीका है.. इसमें एक प्रकार के नियंत्रण का आनंद छिपा होता है.. यह देखने का सुख, कि उनका एक इशारा, किसी को किस हद तक विचलित कर सकता है..!! अपनी कामुक सुंदरता के जादू को साक्षात दिखाना और फिर पुरुष के धैर्य की परीक्षा लेना, उन्हें अपनी शक्ति का अहसास कराता है.. वह जानती है की सीधे समर्पण में वह रोमांच नहीं होता, जो हाँ और ना के बीच झुलाने वाले इस खेल में होता है..!! खुद को आसानी से उपलब्ध न कराकर वे अपनी गरिमा को बढ़ाती हैं, जिससे पुरुष के मन में उन्हें पाने की तड़प और भी तीव्र हो जाती है.. देखा जाए तो यह एक प्रकार का जज्बाती खेल ही है, जहाँ मना करना पूरी तरह से अंत नहीं, बल्कि आकर्षण को और गहरा करने की एक कलात्मक शैली होती है..!!





स्तनों को हाथों से दबाने पर जिस तरह से वह उभरे और दोनों की बीच दिख रही गहरी नशीली क्लीवेज को देखकर पीयूष का मन चकरा गया.. उसका लंड तो पतलून के अंदर ही ताता-थैया करने लग गया..!! एक हाथ से अपने लंड के उभार को दबाकर पीयूष भारी आहें भरने लगा

"कोई नहीं आएगा भाभी.. एक बार खोलकर दिखा दीजिए ना..!!" पीयूष का दिमाग काम नहीं कर रहा था.. वैसे उसकी केबिन का दरवाजा अटकाया हुआ था और कांच पर ब्लाइन्डर भी लगे हुए थे जिससे की बहार वालों को अंदर का द्रश्य न दिखाई दे.. पर दरवाजा तो कोई भी खोलकर कभी भी आ सकता था.. बहरहाल पीयूष ऐसा कुछ भी सोच पाने की स्थिति में नहीं था.. धनुर्धारी की नजर जैसे चिड़िया की आँख पर चिपक जाती है वैसे ही उसकी नजर शीला के जादुई स्तनों पर चिपक गई थी

"पागल मत बन.. कोई अंदर आ गया तो" शीला की बात तर्कपूर्ण थी

"मैं दरवाजा बंद कर देता हूँ.. फिर तो कोई दिक्कत नहीं है ना.." पीयूष ने कहा और दरवाजा बंद करने के लिए उठने ही वाला था की शीला ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया

"हम दोनों इस केबिन में अकेले और फिर दरवाजा भी बंद.. क्या कहेंगे तेरी ऑफिस वाले?"

"भाभी, मैं यहाँ का मालिक हूँ.. भला मुझसे कौन ऐसा सवाल करेगा?" पीयूष की बेतुकी बात पर शीला को अब गुस्सा आने लगा था

"तेरे कर्मचारी क्या कहेंगे इस बात से तो मुझे भी घंटा फर्क नहीं पड़ता.. पर वैशाली..!! उसके बारे मे तो सोच" शीला की बात अब पीयूष के दिमाग में उतरी

पीयूष: 'हाँ, ये तो मैंने सोचा ही नहीं..!!" पीयूष अब सहमकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया.. उसका चेहरा उतर गया.. पर यह देखकर शीला को बड़ा मज़ा आ रहा था

"ऐसे मुंह क्यों बना रहा है पीयूष..!! चिंता मत कर.. अभी मैं कुछ दिन यहाँ हूँ.. मौका मिलेगा" शीला ने अपने तीखे नयन नचाते हुए कहा

निराश पीयूष ने कहा "कैसे मिलेगा मौका भाभी??"

शीला ने हँसकर कहा "मौका ढूँढना और बनाना तेरा काम है.. दिमाग पर जोर लगा और सोच कुछ..!!"

तभी वैशाली दरवाजा खोलकर अंदर आई.. शीला ने अपना पल्लू ठीक कर लिया और पीयूष लेपटॉप पर कुछ करने की एक्टिंग करने लगा

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