Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 11 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 66

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अब तक....



कुछ ही पलों में हमारा काफ़िला फिर से चल पड़ा लेकिन इस बार ये काफ़िला हवेली की तरफ चल पड़ा था। संपत, दयाल और मंगू जगन को घसीटते हुए फिर से ले चले थे। जगन की हालत बेहद ख़राब थी। उसके पैरों में अब मानों जान ही नहीं थी। वो लड़खड़ाते हुए चल रहा था। कभी कभी वो गिर भी जाता था जिससे तीनों उसे घसीटने लगते थे। कच्ची मिट्टी पर जब शरीर रगड़ खाता तो वो दर्द से चिल्लाने लगता था और फिर जल्दी ही उठने की कोशिश करता। मैंने मंगू से कह दिया था कि अब उसे ज़्यादा मत घसीटे क्योंकि ऐसे में उसकी जान भी जा सकती थी। फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। उससे बहुत कुछ जानना शेष था।



अब आगे....



हवेली में उस वक्त सन्नाटा सा गया जब पता चला कि वैभव अपने कमरे में नहीं है। सब के सब बदहवास से हो कर पूरी हवेली में वैभव को खोजने लगे। जब वो कहीं न मिला तो सबके सब सन्नाटे में आ गए। एक तो वैसे ही घर के दो दो अज़ीज़ व्यक्तियों की दुश्मनों ने हत्या कर दी थी जिसका दुख और ज़ख्म अभी पूरी तरह ताज़ा ही था दूसरे अब वैभव का इस तरह से ग़ायब हो जाना मानों सबकी जान हलक में अटका देने के लिए काफी था।

बात दादा ठाकुर के संज्ञान में आई तो वो भी सदमे जैसी हालत में आ गए। उनका मित्र अर्जुन सिंह और समधी बलभद्र सिंह उनके साथ ही बैठक में बैठे हुए थे। वो तीनों भी वैभव के इस तरह हवेली से ग़ायब होने की बात सुन कर सकते में आ गए थे। हवेली की औरतों का एक बार फिर से रोना धोना शुरू हो गया था। हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी रोते बिलखते हुए बैठक में आईं और दादा ठाकुर के सामने आ कर उन्हें इस तरह से देखने लगीं जैसे पल भर वो उन्हें भस्म कर देंगी।

"आप यहां अपने ऊंचे सिंहासन पर बैठे हुए हैं और मेरा बेटा हवेली से ग़ायब है।" सुगंधा देवी गुस्से में चीख ही पड़ीं____"एक बात कान खोल कर सुन लीजिए ठाकुर साहब अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आपकी इस हवेली को आग लगा दूंगी मैं और उसी आग में खुद भी जल कर ख़ाक हो जाऊंगी। उसके बाद आप शान से जीते रहना।"

"शांत हो जाएं ठकुराईन।" अर्जुन सिंह ने बड़ी नम्रता से कहा____"आपके बेटे को कुछ नहीं होगा। दुनिया का कोई भी माई का लाल आपके बेटे को हानि नहीं पहुंचा सकता। अरे! आपका बेटा शेर है शेर। वो ज़रूर यहीं कहीं आस पास ही होगा। थोड़ी देर में आ जाएगा। बस आप धीरज से काम लीजिए और ठाकुर साहब को कुछ मत कहिए। ये वैसे ही बहुत दुखी हैं।"

"अगर ये सच में दुखी होते।" सुगंधा देवी ने उसी तरह चीखते हुए कहा____"तो इस वक्त ये अपने बेटे की ग़ायब होने वाली बात सुन कर यूं चुप चाप बैठे न होते। दुश्मनों ने इनके भाई और इनके बेटे को मार डाला और ये ख़ामोशी से अपने सिंहासन पर बैठे हुए हैं। मैं हमेशा ये सोच कर खुश हुआ करती थी कि ये अपने पिता की तरह गुस्सैल और खूंखार स्वभाव के नहीं हैं लेकिन आज प्रतीत होता है कि इन्हें अपने पिता की तरह ही होना चाहिए था। आज मुझे महसूस हो रहा है कि ठाकुर खानदान का खून इनकी तरह ठंडा नहीं होना चाहिए जो अपने घर के दो दो सदस्यों की हत्या होने के बाद भी न खौले और अपने दुश्मनों का नामो निशान मिटा देने की क्षमता भी न रखे।"

"ये आप क्या कह रही हैं ठकुराईन?" अर्जुन सिंह सुगंधा देवी के तेवर देख पहले ही हैरान परेशान था और अब ऐसी बातें सुन कर आश्चर्य में भी पड़ गया था, बोला____"कृपया शांत हो जाइए और भगवान के लिए ऐसी बातें मत कीजिए।"

"कैसे मित्र हैं आप?" सुगंधा देवी अर्जुन सिंह से मुखातिब हुईं_____"कि इतना कुछ होने के बाद भी आप शांति की बातें कर रहे हैं। शायद आपका खून भी इनकी तरह ही ठंडा पड़ चुका है। अपने आपको दादा ठाकुर और ठाकुर साहब कहलवाने वाले दो ऐसे कायरों को देख रही हूं जो दुश्मनों के ख़ौफ से औरतों की तरह घर में दुबके हुए बैठे हैं। धिक्कार है ठाकुरों के ऐसे ठंडे खून पर।"

"समधन जी।" बलभद्र सिंह ने हिचकिचाते हुए कहा____"हम आपकी मनोदशा को अच्छी तरह समझते हैं किंतु ठाकुर साहब के लिए आपका ये सब कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है। आवेश और गुस्से में आप क्या क्या बोले जा रही हैं इसका आपको ख़ुद ही अंदाज़ा नहीं है। देखिए, हम आपकी बेहद इज्ज़त करते हैं और यही चाहते हैं कि ऐसे अवसर पर आप संयम से काम लें। एक बात आप अच्छी तरह जान लीजिए कि ये जो कुछ भी हुआ है उसका बदला ज़रूर लिया जाएगा। हत्यारे ज़्यादा दिनों तक इस दुनिया में जी नहीं पाएंगे।"

"क्या कर लेंगे ये?" सुगंधा देवी का गुस्सा मानों अभी भी शांत नहीं हुआ था, बोलीं____"सच तो ये है कि ये हत्यारों का कुछ बिगाड़ ही नहीं पाएंगे समधी जी। अरे! इन्हें तो ये तक पता नहीं है कि इनके अपनों की हत्या करने वाले आख़िर हैं कौन? आपको अभी यहां के हालातों के बारे में पता नहीं है। ये जो आस पास के गावों का फ़ैसला करते हैं न इन्हें खुद नहीं पता कि हवेली और हवेली में रहने वालों पर इस तरह का संकट पैदा करने वाला कौन है? आप खुद सोचिए कि जब इन्हें कुछ पता ही नहीं है तो ये आख़िर क्या कर लेंगे किसी का? अभी दो लोगों की हत्या की है हत्यारों ने आगे बाकियों की भी ऐसे ही हत्या कर देंगे और ये कुछ नहीं कर सकेंगे। क्या इनके पास इस बात का कोई जवाब है कि इनके यहां बैठे रहने के बाद भी मेरा बेटा हवेली से कैसे ग़ायब हो गया? और इनके पास ही क्यों बल्कि आप दोनों के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है।"

सुगंधा देवी की इन बातों को सुन कर बलभद्र सिंह को समझ ही न आया कि अब वो क्या कहें? ये सच था कि उन्हें यहां के हालातों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी किंतु जितनी भी अभी हुई थी और जो कुछ ठकुराईन द्वारा अभी उन्होंने सुना था उससे वो अवाक से रह गए थे।

"अर्जुन सिंह।" एकदम से छा गए सन्नाटे को चीरते हुए दादा ठाकुर ने अजीब भाव से कहा____"अब हम और सहन नहीं कर सकते। हम इसी वक्त अपने दुश्मनों को मिट्टी में मिलाने के लिए यहां से जाना चाहते हैं।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं ठाकुर साहब?" दादा ठाकुर को सिघासन से उठ गया देख अर्जुन सिंह चौंके, फिर बोले____"देखिए आवेश में आ कर आप ऐसा कोई भी क़दम उठाने के बारे में मत सोचिए। ठकुराईन की बातों से आहत हो कर आप बिना सोचे समझे कुछ भी ऐसा नहीं करेंगे जिससे कि बाद में आपको खुद ही पछताना पड़े।"

"हमें पछताना मंज़ूर है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहा____"लेकिन अब दुश्मनों को ज़िंदा रखना मंज़ूर नहीं है। आपकी ठकुराईन ने सच ही तो कहा है कि इतना कुछ होने के बाद भी हमारा खून नहीं खौला बल्कि बर्फ़ की मानिंद ठंडा ही पड़ा हुआ है। ऊपर से हमारे छोटे भाई और बेटे की आत्मा भी ये देख कर दुखी ही होंगी कि हम उनकी हत्या का बदला नहीं ले रहे। वो दोनों हमें माफ़ नहीं करेंगे। हमें अब मर जाना मंज़ूर है लेकिन कायरों की तरह यहां बैठे रहना हर्गिज़ मंज़ूर नहीं है।"

दादा ठाकुर की बातें सुन कर अर्जुन सिंह अभी कुछ बोलने ही वाले थे कि तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई और फिर चंद ही पलों में मैं बैठक के सामने आ कर खड़ा हो गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मां भागते हुए मेरे पास आईं और मुझे अपने सीने से छुपका कर रो पड़ीं।

"कहां चला गया था तू?" मुझे अपने कलेजे से लगाए वो रोते हुए कह रहीं थी____"तुझे हवेली में न पर कर मेरी तो जान ही निकल गई थी। तू इस तरह अपनी मां को छोड़ कर क्यों चला गया था? तुझे कुछ हुआ तो नहीं न?"

कहने के साथ ही मां ने मुझे खुद से अलग किया और फिर पागलों की तरह मेरे जिस्म के हर हिस्से को छू छू कर देखने लगीं। मां की इस हालत को देख कर मेरे दिल में बेहद पीड़ा हुई लेकिन फिर मैंने किसी तरह खुद को सम्हाला और मां से कहा____"मुझे कुछ नहीं हुआ है मां। मैं एकदम ठीक हूं, और मुझे माफ़ कर दीजिए जो मैं बिना किसी को कुछ बताए हवेली से यूं चला गया था।"

"अपने दो बेटों को खो चुकी हूं मैं।" मां की आंखें छलक पड़ीं, मेरे चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच ले कर करुण स्वर में बोलीं____"अब तुझे नहीं खोना चाहती। मुझे वचन दे कि आज के बाद तू कभी भी इस तरह कहीं नहीं जाएगा।"

"ठीक है मां।" मैंने कहा____"मैं आपको वचन देता हूं। अब शांत हो जाइए और अंदर जाइए।"

"पर तू इस तरह कहां चला गया था?" मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"और किसी को बताया क्यों नहीं?"

मैंने मां को किसी तरह बहलाया और उन्हें अंदर भेज दिया। असल में मैं उन्हें सच नहीं बताना चाहता था वरना वो परेशान भी हो जातीं और मुझ पर गुस्सा भी करतीं।

"वैभव बेटा आख़िर ये सब क्या है?" मां के जाने के बाद अर्जुन सिंह ने मुझसे कहा____"तुम बिना किसी को कुछ बताए इस तरह कहां चले गए थे? क्या तुम्हें मौजूदा हालातों की गंभीरता का ज़रा भी एहसास नहीं है? अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो जानते हो कितना गज़ब हो जाता?"

"माफ़ कीजिए चाचा जी।" मैंने शांत भाव से कहा और फिर पिता जी से मुखातिब हुआ____"आप भी मुझे माफ़ कर दीजिए पिता जी। मैं जानता हूं कि मुझे इस तरह हवेली से बाहर नहीं जाना चाहिए था लेकिन मैं ऐसी मानसिक अवस्था में था कि खुद को रोक ही नहीं पाया। हालाकि एक तरह से ये अच्छा ही हुआ क्योंकि मेरा इस तरह से बाहर जाना बेकार नहीं गया।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" पिता जी ने नाराज़गी से मेरी तरफ देखा।

"असल में बात ये है कि मेरे आदमियों ने मुरारी के भाई जगन को पकड़ लिया है।" मैंने कहा____"और इस वक्त वो बाहर ही है। मेरे आदमियों के कब्जे में।"

मेरी बात सुन कर सबके चेहरों पर हैरत के भाव उभर आए। उधर पिता जी ने कहा____"उसे फ़ौरन हमारे सामने ले कर आओ।"

पिता जी के कहने पर मैंने एक दरबान को भेज कर जगन को बुला लिया। जगन बुरी तरह डरा हुआ था और साथ ही उसकी हालत भी बेहद खस्ता थी। जैसे ही वो दादा ठाकुर के सामने आया तो वो और भी ज़्यादा खौफ़जदा हो गया। पिता जी ने क़हर भरी नज़रों से उसकी तरफ देखा।

"मुझे माफ़ कर दीजिए दादा ठाकुर।" जगन आगे बढ़ कर पिता जी के पैरों में ही लोट गया, फिर बोला____"मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं हर तरह से मजबूर हो गया था ये सब करने के लिए।"

"तुमने जो किया है उसके लिए तुम्हें कोई माफ़ी नहीं मिल सकती।" पिता जी ने कठोर भाव से कहा____"तुम्हें सज़ा तो यकीनन मिलेगी लेकिन उससे पहले हम तुमसे ये जानना चाहते हैं कि तुमने ये सब क्यों किया? किसके कहने पर किया और कैसे किया? हम सब कुछ विस्तार से जानना चाहते हैं।"

"सब मेरी बदकिस्मती का ही नतीजा है दादा ठाकुर।" जगन ने दुखी हो कर कहा____"कर्ज़ में ऐसा डूबा कि फिर कभी उबर ही नहीं सका उससे। खेत पात सब गिरवी हो गए इसके बावजूद क़र्ज़ न चुका। हालात इतने ख़राब हो गए कि परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल पड़ गया। अपनी ख़राब हालत के बारे में मुरारी भैया को बता भी नहीं सकता था क्योंकि वो नाराज़ हो जाते। उनसे न जाने कितनी ही बार मदद ले चुका था मैं, इस लिए अब उनसे सहायता लेने में बेहद शर्म आ रही थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह से अपने सिर पर से कर्ज़ का बोझ हटाऊं और किस तरह से अपने परिवार का भरण पोषण करूं? दूसरी तरफ मेरा बड़ा भाई था जिसके सिर पर कर्ज़ का बोझ तो था लेकिन मेरी तरह उसकी हालत ख़राब नहीं थी। उसके पास खेत पात थे जिनसे वो अपना परिवार अच्छे से चला रहा था। सच कहूं तो ये देख कर अब मैं अपने ही भाई से ईर्ष्या के साथ साथ घृणा भी करने लगा था।"

"तो क्या इसी ईर्ष्या और घृणा की वजह से तुमने अपने भाई की हत्या कर दी थी?" पिता जी बीच में ही उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए बोल पड़े थे।

"नहीं दादा ठाकुर।" जगन ने इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"ये सच है कि मैं अपने भाई से ईर्ष्या और घृणा करने लगा था लेकिन उसे जान से मार डालने के बारे में कभी नहीं सोचा था, बल्कि यही दुआ करता रहता था कि किसी वजह से उसे कुछ हो जाए ताकि उसका सब कुछ मेरा हो जाए। पर भला चमार के मनाए पड़वा थोड़ी ना मरता है, बस वही हाल था।"

"अगर ऐसी बात है।" अर्जुन सिंह ने कहा____"तो फिर अचानक से तुम्हारे मन में अपने भाई की हत्या करने का ख़याल कैसे आ गया था?"

"ये तब की बात है जब छोटे ठाकुर दादा ठाकुर के द्वारा गांव से निष्कासित किए जाने पर हमारे गांव के पास अपनी बंज़र पड़ी ज़मीन में रहते थे।" जगन ने गंभीर भाव से कहा____"इन्हें वहां पर रहते हुए काफी समय हो गया था। मैं ये भी जानता था कि मेरा भाई इनकी मदद करता था और मेरे भाई से इनके बेहतर संबंध थे जिसके चलते ये मेरे भाई के घर भी जाते रहते थे। मुझे ये देख कर भी अपने भाई से जलन होती थी कि उसके संबंध दादा ठाकुर के लड़के से थे। मैं जानता था कि उस समय भले ही छोटे ठाकुर निष्कासित किए जाने पर अपने घर से बेघर थे लेकिन एक न एक दिन तो वापस हवेली लौटेंगे ही और तब वो मेरे भाई के एहसानों का क़र्ज़ भी बेहतर तरीके से चुकाएंगे। ज़ाहिर है ऐसे में मेरे भाई की स्थिति पहले से और भी बेहतर हो जाती और मैं और भी बदतर हालत में पहुंच जाता। ये सब ऐसी बातें थी जिसके चलते मेरे मन में अपने भाई के प्रति और भी ज़्यादा जलन और नफ़रत पैदा होने लगी थी लेकिन इसके लिए मैं कुछ कर नहीं सकता था। बस अंदर ही अंदर घुट रहा था। फिर एक दिन वो हुआ जिसकी मैंने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी।"

"ऐसा क्या हुआ था?" जगन एकदम से चुप हो गया तो अर्जुन सिंह ने पूछ ही लिया____"जिसकी तुमने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी?"

"मैं बहुत ज़्यादा परेशान था।" जगन ने फिर से कहना शुरू किया____"अपने बच्चों को भूखा देख मैं उनके लिए बहुत चिंतित हो गया था। एक शाम मैं इसी परेशानी और चिंता में अपने उन खेतों में बैठा था जो गिरवी रखे हुए थे। शाम पूरी तरह से घिर चुकी थी और चारो तरफ अंधेरा फैल गया था। मैं सोचो में इतना खोया हुआ था कि मुझे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि एक रहस्यमय साया मेरे क़रीब जाने कहां से आ कर खड़ा हो गया था? जब उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में मुझे पुकारा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया और जब उस पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं बुरी तरह डर गया। मुझे समझ न आया कि आख़िर उसके जैसा व्यक्ति कौन हो सकता है और मेरे पास किस लिए आया है? मुझे लगा वो ज़रूर कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे मैंने कर्ज़ ले रखा है और कर्ज़ न चुकाने की वजह से अब वो मेरी जान लेने आया है। ये सोच कर मैं बेहद खौफ़जदा हो गया और फ़ौरन ही उसके पैरों में पड़ कर उससे रहम की भीख मांगने लगा। तब उसने जो कहा उसे सुन कर मैं एकदम से हैरान रह गया। उसने कहा कि मुझे उससे न तो डरने की ज़रूरत है और ना ही इस तरह रहम की भीख मांगने की। बल्कि वो तो मेरे पास इस लिए आया है ताकि मेरी परेशानियों के साथ साथ मेरे हर दुख का निवारण भी कर सके। मैं सच कहता हूं दादा ठाकुर, सफ़ेद कपड़ों में ढंके उस रहस्यमय व्यक्ति की बातें सुन कर मैं बुत सा बन गया था। फिर मैंने खुद को सम्हाला और उससे पूछा कि क्या सच में वो मेरी समस्याओं का निवारण कर देगा तो जवाब में उसने कहा कि वो एक पल में मेरी हर समस्या को दूर कर देगा लेकिन बदले में मुझे भी कुछ करना पड़ेगा। इतना तो मैं भी समझ गया था कि अगर कोई व्यक्ति इस रूप में आ कर मेरी समस्याओं को दूर करने को बोल रहा है तो वो ये सब मुफ्त में तो करेगा नहीं। यानि बदले में उसे भी मुझसे कुछ न कुछ चाहिए ही था। मैं अब यही जानना चाहता था उससे कि बदले में आख़िर मुझे क्या करना होगा? तब उसने मुझसे कहा कि बदले में मुझे अपने भाई मुरारी की हत्या करनी होगी और उस हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगाना होगा।"

जगन सांस लेने के लिए रुका तो बैठक में सन्नाटा सा छा गया। पिता जी, अर्जुन सिंह और भैया के चाचा ससुर यानि बलभद्र सिंह उसी की तरफ अपलक देखे जा रहे थे। पिता जी और अर्जुन सिंह के चेहरे पर तो सामान्य भाव ही थे किंतु बलभद्र सिंह के चेहरे कर आश्चर्य के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। ज़ाहिर है ये सब उनके लिए नई और हैरतअंगेज बात थी।

"उस सफ़ेदपोश आदमी के मुख से ये सुन कर तो मैं सकते में ही आ गया था।" इधर जगन ने फिर से बोलना शुरू किया____"मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के मेरी कनपटियों में बजती महसूस हो रहीं थी। मेरे मुंह से कोई लफ्ज़ नहीं निकल रहे थे। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने उससे कहा कि ये क्या कह रहे हैं आप? आप होश में तो हैं? तो उसने कहा कि होश में तो मुझे रहना चाहिए। सच तो ये था कि उसकी बातों से मेरे मन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे। उसने मुझे समझाया कि ऐसा करने से मुझ पर कभी कोई बात नहीं आएगी। जब मैंने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है तो उसने मुझे कुछ ऐसा बताया जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। उसने कहा कि छोटे ठाकुर के नाजायज संबंध मेरे भाई की बीवी से हैं।"

जगन, मादरचोद ने सबके सामने मेरी इज्ज़त का जनाजा निकाल दिया था। चाचा ससुर ने जब उसके मुख से ये सुन कर मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मेरा सिर शर्म से झुकता चला गया। ख़ैर, अब क्या ही हो सकता था।

"उस रहस्यमय व्यक्ति ने कहा कि छोटे ठाकुर के ऐसे नाजायज़ संबंध के आधार पर मुरारी की हत्या का इल्ज़ाम इन पर आसानी से लगाया जा सकता है।" उधर जगन मानों अभी भी मेरी इज्ज़त उतारने पर अमादा था, बोला____"यानि सबको ये कहानी बताई जाएगी कि छोटे ठाकुर ने मेरे भाई की हत्या इस लिए की है क्योंकि मेरे भाई को इनकी काली करतूत का पता चल गया था और वो दादा ठाकुर के पास जा कर इनकी करतूत बता कर उनसे इंसाफ़ मांगने की बात कहने लगा था। छोटे ठाकुर इस बात से डर गए और फिर इन्होंने ये सोच कर मेरे भाई की हत्या कर दी कि जब मुरारी ही नहीं रहेगा तो किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा। अपने मरद की हत्या होने के बाद सरोज भौजी को अगर ये पता भी हो जाता कि छोटे ठाकुर ने ही उसके मरद की हत्या की है तो वो इनसे कुछ कह ही नहीं सकती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि उसके मरद की हत्या हो जाने के लिए वो खुद भी ज़िम्मेदारी ही होती और बदनामी के डर से किसी से कुछ कहती ही नहीं। सफ़ेदपोश आदमी ने जब मुझे ये सब समझाया तो मेरे कुंद पड़े ज़हन के मानों सारे कपाट एकदम से खुल गए और मुझे अच्छी तरह ये एहसास हो गया कि अगर सच में मैं अपने भाई की हत्या कर के हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगा दूं तो यकीनन मुझ पर कभी कोई बात ही नहीं आएगी। सबसे बड़ी बात ये कि ऐसा करने से मेरी हर समस्या भी दूर हो जाएगी। ख़ैर, समझ तो मुझे उसी वक्त आ गया था लेकिन तभी मुझे ये भी आभास हुआ कि ऐसा करना कहीं मुझ पर ही न भारी पड़ जाए क्योंकि जिसके कहने पर मैं अपने भाई की हत्या करूंगा वो बाद में मुझे ही फंसा सकता था। मुझे तो पता भी नहीं है कि सफ़ेद कपड़ों में लिपटा वो व्यक्ति आख़िर है कौन और ये सब करवा कर वो छोटे ठाकुर को क्यों फंसाना चाहता है? मैंने उससे सोचने के लिए कुछ दिन का समय मांगा तो उसने कहा ठीक है। फिर वो ये कह कर चला गया कि मेरे पास सोचने के लिए दो दिन का वक्त है। दो दिन बाद मैं दादा ठाकुर के आमों वाले बाग में आ जाऊं क्योंकि वो मुझे वहीं मिलेगा। उसके जाने के बाद मैं घर आया और खा पी कर बिस्तर में लेट गया। बिस्तर में लेटे हुए मैं उसी के बारे में सोचे जा रहा था। रात भर मुझे नींद नहीं आई। मैंने बहुत सोचा कि वो रहस्यमय आदमी मुझसे ऐसा क्यों करवाना चाहता है लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। ऐसे ही दो दिन गुज़र गए।"

"मेरे भाई की हत्या में छोटे ठाकुर को फंसाने का मुझे एक ही मतलब समझ आया था।" कुछ पल रुकने के बाद जगन ने फिर से कहा____"मतलब कि वो रहस्यमय आदमी छोटे ठाकुर से या तो नफ़रत करता था या फिर वो इन्हें अपना दुश्मन समझता था। मुझे उस पर यकीन नहीं था इस लिए दो दिन बाद जब मैं आपके आमों वाले बाग़ में उस व्यक्ति से मिला तो मैंने उससे साफ कह दिया कि पहले वो मेरी समस्याएं दूर करे, उसके बाद ही मैं उसका काम करूंगा। हालाकि मेरे पास उसका काम करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि मैं ये भी समझ रहा था कि उसका काम अगर मैं नहीं करूंगा तो वो किसी और से करवा लेगा। यानि मेरे भाई का मरना तो अब निश्चित ही हो चुका था और यदि कोई दूसरा मेरे भाई की हत्या करेगा तो इससे मेरा ही सबसे बड़ा नुकसान होना था। मैंने यही सब सोच कर फ़ैसला कर लिया था कि जब मेरे भाई की मौत निश्चित ही हो चुकी है तो मैं ये काम करने से क्यों मना करूं? अगर मेरे ऐसा करने से मेरी सारी समस्याओं का अंत हो जाना है तो शायद यही बेहतर है मेरे और मेरे परिवार की भलाई के लिए। मेरी उम्मीद के विपरीत दूसरे ही दिन उस रहस्यमय व्यक्ति ने मेरे हाथ में नोटों की एक गड्डी थमा दी। मैं समझ गया कि नोटों की उस गड्डी से मेरा सारा कर्ज़ चुकता हो जाना था और साथ ही गिरवी पड़े मेरे खेत भी मुक्त हो जाने थे। इस बात से मैं बड़ा खुश हुआ और फिर मैंने एक बार भी ये नहीं सोचना चाहा कि अपने ही भाई की हत्या करना कितना बड़ा गुनाह होगा, पाप होगा।"

"मुरारी काका की हत्या कैसे की थी तुमने?" जगन के चुप होते ही मैंने उससे पूछा____"वो तो उस रात आंगन में सो रहे थे न फिर तुमने कैसे उनकी हत्या की और उनकी लाश को बाहर पेड़ के पास छोड़ दिया?"

"सब कुछ बड़ा आसान सा हो गया था छोटे ठाकुर।" जगन ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"मैं जानता था कि मेरा भाई लगभग रोज़ ही देशी पीता था और इतनी पी लेता था कि फिर उसे किसी चीज़ का होश ही नहीं रहता था। उस रात मैं आप दोनों पर नज़र रखे हुए था। मेरा भाई देशी पी कर आंगन में चारपाई पर लेटा हुआ था। इधर मैं सोचने लगा कि उसे बाहर कैसे लाऊं? हालाकि मैं घर के अंदर दीवार फांद कर आसानी से जा सकता था और फिर आंगन में ही उसकी हत्या कर सकता था लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि अगर थोड़ी सी भी आहट या आवाज़ हुई तो भौजी या फिर अनुराधा की नींद खुल सकती थी और तब मैं पकड़ा जा सकता था। इस लिए मैंने यही सोचा था कि मुरारी को बाहर बुला कर ही उसकी हत्या की जाए। उसे बाहर बुलाने का मेरे पास फिलहाल कोई उपाय नहीं था। इधर धीरे धीरे रात भी गुज़रती जा रही थी। वक्त के गुज़रने से मेरी परेशानी भी बढ़ती जा रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्या करूं जिससे मेरा भाई बाहर आ जाए? उस वक्त शायद भोर का समय था जब मैंने अचानक ही किवाड़ खुलने की आवाज़ सुनी। मैं फ़ौरन ही छुप गया और देखने लगा कि बाहर कौन आता है? कुछ ही देर में मैं ये देख कर खुश हो गया कि किवाड़ खोल कर मेरा भाई बाहर आ गया है और पेड़ की तरफ जा रहा है। मैं समझ गया कि उसे पेशाब लगा था इसी लिए उसकी नींद खुली थी उस वक्त। सच कहूं तो ये मेरे लिए जैसे ऊपर वाले ने ही सुनहरा मौका प्रदान कर दिया था और मैं इस मौके को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता था। मैंने देखा मेरा भाई पेड़ के पास खड़ा पेशाब कर रहा है तो मैं बहुत ही सावधानी से उसकी तरफ बढ़ा। मेरे हाथ में कुल्हाड़ी थी और मैंने उसी कुल्हाड़ी से अपने भाई की जीवन लीला को समाप्त कर देने का सोच लिया था। मेरा समूचा जिस्म ये सोच कर बुरी तरह कांपने लगा था कि मैं अपने भाई को जान से मार देने वाला हूं। इससे पहले कि मैं उसके पास पहुंच कर कुछ करता मेरा भाई पेशाब कर के फारिग़ हो गया और मेरी तरफ पलटा। अंधेरे में मुझ पर नज़र पड़ते ही वो बुरी तरह चौंका और साथ ही डर भी गया। होश तो मेरे भी उड़ गए थे लेकिन फिर मैंने खुद को सम्हाला और फिर तेज़ी से उसकी तरफ झपटा। मैंने तेज़ी से कुल्हाड़ी का वार उस पर किया तो वो ऐन मौके पर झुक गया जिससे मेरा वार खाली चला गया। उधर मैं सम्हल भी न पाया था कि मुरारी ने मुझे दबोच लिया। उसके मुख से अभी भी देशी की दुर्गंध आ रही थी। जब उसने मुझे दबोच लिया तो मैं ये सोच कर बुरी तरह घबरा गया कि शायद उसने मुझे और मेरी नीयत को पहचान लिया है और अब वो मुझे छोड़ने वाला नहीं है। मरता क्या न करता वाली हालत हो गई थी मेरी। मेरा भाई शरीर से और ताक़त से मुझसे ज़्यादा ही था इस लिए मुझे लगा कि कहीं मैं खुद ही न मारा जाऊं। ज़हन में इस ख़याल के आते ही मैंने पूरा जोर लगा कर उसे धक्का दे दिया जिससे वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर गया। मैं अवसर देख कर फ़ौरन ही उसके ऊपर सवार हो गया और कुल्हाड़ी को उसके गले में लगा कर उसके गले को चीर दिया। खून का फव्वारा सा निकला जो उछल कर मेरे ऊपर ही आ गिरा। उधर मेरा भाई जल बिन मछली की तरह तड़पने लगा था और इससे पहले की वो दर्द से तड़पते हुए चीखता मैंने जल्दी से उसे दबोच कर उसके मुख को बंद कर दिया। कुछ ही देर में उसका तड़पना बंद हो गया और मेरा भाई मर गया। कुछ देर तक मैं अपनी तेज़ चलती सांसों को नियंत्रित करता रहा और फिर उठ कर खड़ा हो गया। नज़र भाई के मृत शरीर पर पड़ी तो मैं ये सोच कर एकदम से घबरा गया कि ये क्या कर डाला मैंने किंतु फिर जल्दी ही मुझे समझ में आया कि अब इस बारे में कुछ भी सोचने का कोई मतलब नहीं है। बस, ये सोच कर मैं कुल्हाड़ी लेकर वहां से भाग गया।"

"और फिर जब सुबह हुई।" जगन के चुप होते ही मैंने कहा____"तो तुम अपने गांव के लोगों को ले कर मेरे झोपड़े में आ गए। मकसद था सबके सामने मुझे अपने भाई का हत्यारा साबित करना। मेरे चरित्र के बारे में सभी जानते थे इस लिए हर कोई इस बात को मान ही लेता कि अपने आपको बचाने के लिए मैंने ही मुरारी काका की हत्या की है।"

जगन ने मेरी बात सुन कर सिर झुका लिया। बैठक में एक बार फिर से ख़ामोशी छा गई थी। सभी के चेहरों पर कई तरह के भावों का आवा गमन चालू था।



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अध्याय - 67

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अब तक....



"और फिर जब सुबह हुई।" जगन के चुप होते ही मैंने कहा____"तो तुम अपने गांव के लोगों को ले कर मेरे झोपड़े में आ गए। मकसद था सबके सामने मुझे अपने भाई का हत्यारा साबित करना। मेरे चरित्र के बारे में सभी जानते थे इस लिए हर कोई इस बात को मान ही लेता कि अपने आपको बचाने के लिए मैंने ही मुरारी काका की हत्या की है।"

जगन ने मेरी बात सुन कर सिर झुका लिया। बैठक में एक बार फिर से ख़ामोशी छा गई थी। सभी के चेहरों पर कई तरह के भावों का आवा गमन चालू था।




अब आगे....



"उसके बाद तुमने क्या किया?" पिता जी ने ख़ामोशी को चीरते हुए जगन से पूछा____"हमारा मतलब है कि अपने भाई की हत्या करने के बाद उस सफ़ेदपोश के कहने पर और क्या क्या किया तुमने?"

"मैं तो यही समझता था कि अपने भाई की हत्या कर के और छोटे ठाकुर को उसकी हत्या में फंसा कर मैं इस सबसे मुक्त हो गया हूं।" जगन ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"और ये भी कि कुछ समय बाद अपने भाई की ज़मीनों को ज़बरदस्ती हथिया कर अपने परिवार के साथ आराम से जीवन गुज़ारने लगूंगा लेकिन ये मेरी ग़लतफहमी थी क्योंकि ऐसा हुआ ही नहीं।"

"क्या मतलब?" अर्जुन सिंह के माथे पर सिलवटें उभर आईं।

"मतलब ये कि ये सब होने के बाद एक दिन शाम को काले कपड़ों में लिपटा एक दूसरा रहस्यमय व्यक्ति मेरे पास आया।" जगन ने कहा____"उसने मुझसे कहा कि उसका मालिक यानि कि वो सफ़ेदपोश मुझसे मिलना चाहता है। काले कपड़े वाले उस आदमी की ये बात सुन कर मैं सोच में पड़ गया था लेकिन ये भी समझता था कि मुझे उससे मिलना ही पड़ेगा, अन्यथा वो कुछ भी मेरे या मेरे परिवार के साथ कर सकता है। ख़ैर दूसरे दिन शाम को मैं आपके आमों वाले बाग़ में उस सफ़ेदपोश व्यक्ति से मिला तो उसने मुझसे कहा कि मुझे उसके कहने पर कुछ और भी काम करने होंगे जिसके लिए वो मुझे मोटी रकम भी देगा। मैं अपने भाई की हत्या भले ही कर चुका था लेकिन अब किसी और की हत्या नहीं करना चाहता था। मैंने जब उससे ये कहा तो उसने पहली बार मुझसे सख़्त लहजे में बात की और कहा कि अगर मैंने उसका कहना नहीं माना तो इसके लिए मुझे मेरी सोच से कहीं ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। एक बार फिर से मेरे हालत मरता क्या न करता वाले हो ग‌ए थे। इस लिए मैंने उसका कहना मान लिया। उसने मुझे काम दिया कि मैं गुप्त रूप से हवेली की गतिविधियों पर नज़र रखूं। मतलब ये कि आप, मझले ठाकुर, बड़े कुंवर और छोटे कुंवर आदि लोग कहां जाते हैं, किससे मिलते हैं और क्या क्या करते हैं ये सब देखूं और फिर उस सफ़ेदपोश आदमी को बताऊं। इतना तो मैं शुरू में ही समझ गया था कि वो सफ़ेदपोश हवेली वालों से बैर रखता है। ख़ैर ये क्योंकि ऐसा काम नहीं था जिसमें मुझे किसी की हत्या करनी पड़ती इस लिए मैंने मन ही मन राहत की सांस ली और उसके काम पर लग गया। कुछ समय ऐसे ही गुज़रा और फिर एक दिन उसने मुझे फिर से किसी की हत्या करने को कहा तो मेरे होश ही उड़ गए।"

"उसने तुम्हें तांत्रिक की हत्या करने को कहा था ना?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।

"हां।" जगन ने बेबसी से सिर झुका कर कहा____"मुझे भी पता चल गया था कि बड़े कुंवर पर किसी तंत्र मंत्र का प्रभाव डाला गया था जिससे उनके प्राण संकट में थे। उस सफ़ेदपोश को जब मैंने ये बताया कि आप लोग उस तांत्रिक के पास गए थे तो उसने मुझे फ़ौरन ही उस तांत्रिक को मार डालने का आदेश दे दिया। मेरे पास ऐसा करने के अलावा कोई चारा नहीं था। मुझे इस बात का भी ख़ौफ था कि मैं तांत्रिक की हत्या कर भी पाऊंगा या नहीं? आख़िर मुझे ये काम करना ही पड़ा। ये तो मेरी किस्मत ही अच्छी थी कि मैं तांत्रिक को मार डालने में सफल हो गया था अन्यथा मेरे अपने प्राण ही संकट में पड़ सकते थे।"

"अच्छा एक बात बताओ।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए कहा____"जैसा कि उस सफ़ेदपोश का मक़सद तुम्हारे द्वारा की गई मुरारी की हत्या में वैभव को फंसाना था तो जब ऐसा नहीं हुआ तो क्या इस बारे में तुम्हारे या उस सफ़ेदपोश के ज़हन में कोई सवाल अथवा विचार नहीं पैदा हुआ? हमारा मतलब है कि जब सफ़ेदपोश के द्वारा इतना कुछ करने के बाद भी वैभव मुरारी का हत्यारा साबित नहीं हो पाया तो क्या उसने तुमसे दुबारा इसे फंसाने को नहीं कहा?"

"नहीं, बिल्कुल नहीं।" जगन ने कहा___"हलाकि मैं ज़रूर ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि जिस मकसद से उसने मेरे द्वारा मेरे भाई की हत्या करवा कर छोटे ठाकुर को हत्या के इल्ज़ाम में फंसाना चाहा था वैसा कुछ तो हुआ नहीं तो फिर उसने फिर से छोटे ठाकुर को किसी दूसरे तरीके से फंसाने को मुझसे क्यों नहीं कहा? वैसे ये तो सिर्फ़ मेरा सोचना था, संभव है उसने खुद ही ऐसा कुछ किया रहा हो लेकिन ये सच है कि उसने मुझसे दुबारा ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कहा था।"

"सुनील और चेतन से क्या करवाता था वो सफ़ेदपोश?" मैंने जगन की तरफ देखते हुए पूछा तो उसने कुछ पल सोचने के बाद कहा____"मुझे ज़्यादा तो नहीं पता लेकिन एक बार मैंने ये ज़रूर सुना था कि वो उन दोनों को आपकी गतिविधियों पर नज़र रखने को कह रहा था और साथ ही ये भी कि इस गांव में आपके किस किस से ऐसे संबंध हैं जो आपके एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो जाएं?"

"क्या तुमने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि वो सफ़ेदपोश कौन है?" पिता जी ने जगन से पूछा____"कभी न कभी तो तुमने भी सोचा ही होगा कि तुम्हें एक ऐसे रहस्यमय व्यक्ति के बारे में जानना ही चाहिए जिसके कहने पर तुम कुछ भी करने के लिए मजबूर हो जाते हो?"

"सच कहूं तो ऐसा मेरे मन में बहुतों बार ख़याल आया था।" जगन ने कहा____"और फिर एक बार मैंने अपने मन का किया भी लेकिन जल्दी ही पकड़ा गया। मुझे नहीं पता कि उसको ये कैसे पता चल गया था कि मैं उसके बारे में जानने के लिए चोरी छुपे उसका पीछा कर रहा हूं? जब मैं पकड़ा गया तो उसने मुझे सख़्त लहजे में यही कहा कि अब अगर फिर कभी मैंने उसका पीछा किया तो मुझे अपने जीवन से हाथ धो लेना पड़ेगा। उसकी इस बात से मैं बहुत ज़्यादा डर गया था। उसके बाद फिर मैंने कभी उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की।"

"माना कि तुम कई तरह की परेशानियों से घिरे हुए थे और साथ ही उस सफ़ेदपोश के द्वारा मजबूर कर दिए गए थे।" पिता जी ने कठोरता से कहा____"लेकिन इसके बावजूद अगर तुम ईमानदारी और नेक नीयती से काम लेते तो आज तुम इतने बड़े अपराधी नहीं बन गए होते। तुमने अपने हित के लिए अपने भाई की हत्या की। उसकी ज़मीन जायदाद हड़पने की कोशिश की और साथ ही उस हत्या में हमारे बेटे को भी फंसाया। अगर तुम ये सब हमें बताते तो आज तुम्हारे हालात कुछ और ही होते और साथ ही मुरारी भी ज़िंदा होता। तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है जगन और इसके लिए तुम्हें कतई माफ़ नहीं किया जा सकता। हम कल ही गांव में पंचायत बैठाएंगे और उसमें तुम्हें मौत की सज़ा सुनाएंगे।"

"रहम दादा ठाकुर रहम।" पिता जी के मुख से ये सुनते ही जगन बुरी तरह रोते हुए उनके पैरों में गिर पड़ा____"मुझ पर रहम कीजिए दादा ठाकुर। मुझ पर न सही तो कम से कम मेरे बीवी बच्चों पर रहम कीजिए। वो सब अनाथ और असहाय हो जाएंगे, बेसहारा हो जाएंगे।"

"अगर सच में तुम्हें अपने बीवी बच्चों की फ़िक्र होती तो इतना बड़ा गुनाह नहीं करते।" पिता जी ने गुस्से से कहा____"तुम्हें कम से कम एक बार तो सोचना ही चाहिए था कि बुरे कर्म का फल बुरा ही मिलता है। अब अगर तुम्हें सज़ा न दी गई तो मुरारी की आत्मा को और उसके बीवी बच्चों के साथ इंसाफ़ कैसे हो सकेगा?"

"मैं मानता हूं दादा ठाकुर कि मेरा अपराध माफ़ी के लायक नहीं है।" जगन ने कहा____"लेकिन ज़रा सोचिए कि अगर मैं भी मर गया तो मेरे बीवी बच्चों के साथ साथ मेरे भाई के बीवी बच्चे भी बेसहारा हो जाएंगे।"

"उनकी फ़िक्र करने की तुम्हें कोई ज़रूरत नहीं है।" पिता जी ने सख़्त भाव से कहा____"मुरारी के परिवार की ज़िम्मेदारी अब हमारे कंधों पर है। रही तुम्हारे बीवी बच्चों की बात तो उन्हें भी हवेली से यथोचित सहायता मिलती रहेगी। तुम्हारे बुरे कर्मों की वजह से अब उन्हें भी जीवन भर दुख सहना ही पड़ेगा।" कहने के साथ ही पिता जी ने मेरी तरफ देखा और फिर कहा____"संपत से कहो कि इसे यहां से ले जाए और हवेली के बाहर वाले हिस्से में बने किसी कमरे में बंद कर दे। कल पंचायत में ही इसका फ़ैसला करेंगे हम।"

जगन रोता बिलखता और रहम की भीख ही मांगता रह गया जबकि मेरे बुलाने पर संपत उसे घसीटते हुए बैठक से ले गया। मैंने देखा पिता जी के चेहरे पर बेहद ही सख़्त भाव थे। शायद उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि अब किसी भी अपराधी पर कोई भी रहम नहीं करेंगे।



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रूपा अपने कमरे में पलंग पर लेटी हुई थी। हवेली में जो कुछ हुआ था उससे उसे बहुत बड़ा झटका लगा था। उसे अच्छी तरह इस बात का एहसास था कि इस सबके बाद हवेली में रहने वालों पर क्या गुज़र रही होगी। हवेली से रिश्ते सुधरने के बाद वो जाने कैसे कैसे सपने सजाने में लग गई थी किंतु जब उस शाम उसने अपने बाग़ में उन लोगों की बातें सुनी थी तो उसके सभी अरमानों पर मानों गाज सी गिर गई थी। अगर बात सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद किसी तरह से कोई संभावना बन भी जाती लेकिन हवेली में इतना बड़ा हादसा होने के बाद तो जैसे उसे यकीन हो गया था कि अब कुछ नहीं हो सकता। वैभव के साथ जीवन जीने के उसने जो भी सपने सजाए थे वो शायद अब पूरी तरह से ख़ाक में मिल चुके थे। ये सब सोचते हुए उसकी आंखें जाने कितनी ही बार आंसू बहा चुकीं थी। उसका जी कर रहा था कि वो सारी लोक लाज को ताक में रख कर अपने घर से भाग जाए और वैभव के सामने जा कर उससे इस सबके लिए माफ़ी मांगे। हालाकि इसमें उसका कोई दोष नहीं था लेकिन वो ये भी जानती थी कि ये सब उसी के ताऊ की वजह से हुआ है।

"कब तक ऐसे पड़ी रहोगी रूपा?" उसके कमरे में आते ही उसकी भाभी कुमुद ने गंभीर भाव से कहा____"सुबह से तुमने कुछ भी नहीं खाया है। ऐसे में तो तुम बीमार हो जाओगी।"

"सब कुछ ख़त्म हो गया भाभी।" रूपा ने कहीं खोए हुए कहा_____"मेरे अपनों ने वैभव के चाचा और उसके बड़े भाई को मार डाला। उसे तो पहले से ही इन लोगों की नीयत पर शक था और देख लो उसका शक यकीन में बदल गया। अब तो उसके अंदर हम सबके लिए सिर्फ़ नफ़रत ही होगी। मुझे पूरा यकीन है कि वो बदला लेने ज़रूर आएगा और हर उस व्यक्ति की जान ले लेगा जिनका थोड़ा सा भी हाथ उसके अपनों की जान लेने में रहा होगा।" कहने के साथ ही सहसा रूपा एक झटके से उठ बैठी और फिर कुमुद की तरफ देखते हुए बोली_____"अब तो वो मुझसे भी नफ़रत करने लगा होगा न भाभी? उसे मुझसे वफ़ा की पूरी उम्मीद थी लेकिन मैंने क्या किया? मैं तो ज़रा भी उसकी उम्मीदों पर खरी न उतर सकी। इसका तो यही मतलब हुआ ना भाभी कि उसके प्रति मेरा प्रेम सिर्फ़ और सिर्फ़ एक दिखावा मात्र ही था। अगर मेरा प्रेम ज़रा भी सच्चा होता तो शायद आज ऐसे हालात न होते।"

"तुम पागल हो गई हो रूपा।" कुमुद ने झपट कर उसे अपने सीने से लगा लिया। उसे रूपा की ऐसी हालत देख कर बहुत दुख हो रहा था, बोली____"जाने क्या क्या सोचे जा रही हो तुम, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। तुम्हारा प्रेम हमेशा से सच्चा रहा है। वो सच्चा प्रेम ही तो था जिसके चलते तुम अपने वैभव की जान बचाने के लिए मुझे ले कर उस रात हवेली चली गई थी। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि तुमसे जो हो सकता था वो तुमने किया है और यही तुम्हारा सच्चा प्रेम है। मुझे पूरा यकीन है कि वैभव के दिल में तुम्हारे लिए ज़रा सी भी नफ़रत नहीं होगी।"

"मुझे छोटी बच्ची समझ कर मत बहलाओ भाभी।" रूपा की आंखें फिर से छलक पड़ीं____"सच तो ये है कि अब सब कुछ ख़त्म हो चुका है। मेरे अपनों ने जो किया है उससे हर रास्ता और हर उम्मीद ख़त्म हो चुकी है। कोई इतना ज़ालिम कैसे हो सकता है भाभी? जब से होश सम्हाला है तब से देखती आई हूं कि दादा ठाकुर ने या हवेली के किसी भी व्यक्ति ने हमारे साथ कभी कुछ ग़लत नहीं किया है फिर क्यों मेरे अपने उनके साथ इतना बड़ा छल और इतना बड़ा घात कर गए?"

"मैं क्या बताऊं रूपा? मुझे तो ख़ुद इस बारे में कुछ पता नहीं है।" कुमुद ने मानों अपनी बेबसी ज़ाहिर करते हुए कहा____"काश! मुझे पता होता कि आख़िर ऐसी कौन सी बात है जिसके चलते हमारे बड़े बुजुर्ग हवेली में रहने वालों से इस हद तक नफ़रत करते हैं कि उनकी जान लेने से भी नहीं चूके। वैसे कहीं न कहीं मैं भी इस बात को मानती हूं कि कोई तो बात ज़रूर है रूपा, और शायद बहुत ही बड़ी बात है वरना ये लोग इतना बड़ा क़दम न उठाते।"

कुमुद की बात सुन कर रूपा कुछ न बोली। उसकी तो ऐसी हालत थी जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो और अब वो खुद को सबसे ज़्यादा बेबस, लाचार और असहाय समझती हो। वैभव के साथ अपने जीवन के जाने कितने ही हसीन सपने सजा लिए थे उसने, पर किस्मत को तो जैसे उसके हर सपने को चकनाचूर कर देना ही मंज़ूर था।

"मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा कि इन लोगों ने वैभव के चाचा और भाई की हत्या की होगी।" रूपा को चुप देख कुमुद ने ही जाने क्या सोचते हुए कहा____"इतना तो ये लोग भी समझते ही रहे होंगे कि दादा ठाकुर से हमारे रिश्ते भले ही सुधर गए थे लेकिन उनके अंदर हमारे प्रति पूरी तरह विश्वास नहीं रहा होगा। यानि अंदर से वो तब भी यही यकीन किए रहे होंगे कि हम लोगों ने भले ही उनसे संबंध सुधार लिए हैं लेकिन इसके बावजूद हम उनके प्रति नफ़रत के भाव ही रखे होंगे। तो सवाल ये है कि अगर हमारे अपने ये समझते रहे होंगे तो क्या इसके बावजूद वो दादा ठाकुर के परिवार में से किसी की हत्या करने का सोच सकते हैं? क्या उन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं रहा होगा कि ऐसे में दादा ठाकुर ही नहीं बल्कि गांव के लोग भी हमें ही हत्यारा समझेंगे और फिर बदले में वो हमारे साथ भी वैसा ही सुलूक कर सकते हैं?"

"उस रात बाग़ में मैंने स्पष्ट रूप से ताऊ जी की आवाज़ सुनी थी भाभी।" रूपा ने कहा____"और मैंने अच्छी तरह सुना था कि वो बाकी लोगों से वैभव को चंदनपुर जा कर जान से मारने को कह रहे थे। अगर ऐसा होता कि मैंने सिर्फ़ एक ही बार उनकी आवाज़ सुनी थी तो मैं भी ये सोचती कि शायद मुझे सुनने में धोखा हुआ होगा लेकिन मैंने तो एक बार नहीं बल्कि कई बार उनके मुख से कई सारी बातें सुनी थी। अब आप ही बताइए क्या ये सब झूठ हो सकता है? क्या मैंने जो सुना वो सब मेरा भ्रम हो सकता है? नहीं भाभी, ना तो ये सब झूठ है और ना ही ये मेरा कोई भ्रम है बल्कि ये तो एक ऐसी सच्चाई है जिसे दिल भले ही नहीं मान रहा मगर दिमाग़ उसे झुठलाने से साफ़ इंकार कर रह है। इन लोगों ने ही साज़िश रची और पूरी तैयारी के साथ वैभव के चाचा तथा उसके बड़े भाई की हत्या की या फिर करवाई।"

"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा रूपा।" कुमुद ने गहरी सांस ले कर कहा___"पर इतना जानती हूं कि ये जो कुछ हुआ है बहुत ही बुरा हुआ है और इसके परिणाम बहुत ही भयानक होंगे। शायद परिणामों की कल्पना कर के ही हमारे घर के सारे मर्द लोग कहीं चले गए हैं और अब इस घर में सिर्फ हम औरतें और लड़कियां ही हैं। हैरत की बात है कि ऐसे हाल में वो लोग हमें यहां अकेला और बेसहारा छोड़ कर कैसे कहीं जा सके हैं?"

"शायद वो ये सोच कर हमें यहां अकेला छोड़ गए हैं कि उनके किए की सज़ा दादा ठाकुर हम औरतों को नहीं दे सकते।" रूपा ने कहा____"अगर सच यही है भाभी तो मैं यही कहूंगी कि बहुत ही गिरी हुई सोच है इन लोगों की। अपनी जान बचाने के चक्कर में उन्होंने अपने घर की बहू बेटियों को यहां बेसहारा छोड़ दिया है।"

"तुम सही कह रही हो रूपा।" कुमुद ने कहा____"पर हम कर ही क्या सकते हैं? अगर सच में बदले के रूप में दादा ठाकुर का क़हर हम पर टूटा तो क्या कर लेंगे हम? वो सब तो कायरों की तरह अपनी जान बचा कर चले ही गए हैं। ख़ैर छोड़ो ये सब, जो होगा देखा जाएगा। तुम बैठो, मैं तुम्हारे लिए यहीं पर खाना ले आती हूं। भूखे रहने से सब कुछ ठीक थोड़ी ना हो जाएगा।"

कहने के साथ ही कुमुद उठी और कमरे से बाहर निकल गई। इधर रूपा एक बार फिर से जाने किन सोचो में खो गई। कुछ ही देर में कुमुद खाने की थाली ले कर आई और पलंग पर रूपा के सामने रख दिया। कुमुद के ज़ोर देने पर आख़िर रूपा को खाना ही पड़ा।



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हवेली में एक बार फिर से उस वक्त रोना धोना शुरू हो गया जब शाम के क़रीब साढ़े आठ बजे मेरी ननिहाल वाले तथा मेनका चाची के मायके वाले आ गए। जहां एक तरफ मेरी मां अपने पिता से लिपटी रो रहीं थी वहीं मेनका चाची भी अपने पिता और भाईयों से लिपटी रो रहीं थी। कुसुम और भाभी का भी बुरा हाल था। आख़िर बहुत समझाने बुझाने के बाद कुछ देर में रोना धोना बंद हुआ। उसके बाद औरतें अंदर ही रहीं जबकि मेरे दोनों ननिहाल वाले लोग बाहर बैठक में आ गए जहां पहले से ही पिता जी के साथ भैया के चाचा ससुर और अर्जुन सिंह बैठे हुए थे।

वैसे तो कहानी में ना तो मेरे ननिहाल वालों का कोई रोल है और ना ही मेनका चाची के मायके वालों का फिर भी दोनों जगह के किरदारों की जानकारी देना बेहतर समझता हूं इस लिए प्रस्तुत है।

मेरे ननिहाल वालों का संक्षिप्त पात्र परिचय:-

✮ बलवीर सिंह राणा (नाना जी)

वैदेही सिंह राणा (नानी जी)

मेरे नाना नानी को कुल चार संतानें हैं जो इस प्रकार हैं।

(01) संगवीर सिंह राणा (बड़े मामा जी)

सुलोचना सिंह राणा (बड़ी मामी)

मेरे मामा मामी को तीन संतानें हैं, जिनमें से दो बेटियां हैं और एक बेटा। तीनों का ब्याह हो चुका है।

(02) सुगंधा देवी (ठकुराईन यानि मेरी मां)

(03) अवधेश सिंह राणा (मझले मामा जी)

शालिनी सिंह राणा (मझली मामी)

मझले मामा मामी को दो संतानें हैं जिनमें से एक बेटा है और दूसरी बेटी। इन दोनों का भी ब्याह हो चुका है।

(04) अमर सिंह राणा (छोटे मामा जी)

रोहिणी सिंह राणा ( छोटी मामी)

छोटे मामा मामी को तीन संतानें हैं जिनमें से दो बेटियां हैं और एक बेटा। ये तीनों अभी अविवाहित हैं।

माधवगढ़ नाम के गांव में मेरा ननिहाल है जहां के जमींदार मेरे नाना जी के पिता जी और उनके पूर्वज हुआ करते थे। अब जमींदारी जैसी बात रही नहीं फिर भी उनका रुतबा और मान सम्मान वैसा का वैसा ही बना हुआ है। ज़ाहिर है ये सब मेरे नाना जी और उनके बच्चों के अच्छे आचरण और ब्यौहार की वजह से ही है। ख़ैर बलवीर सिंह राणा यानि मेरे नाना जी की इकलौती बेटी सुगंधा काफी सुंदर और सुशील थीं। बड़े दादा ठाकुर किसी काम से माधवगढ़ गए हुए थे जहां पर वो मेरे नाना जी के आग्रह पर उनके यहां ठहरे थे। वहीं उन्होंने मेरी मां सुगंधा देवी को देखा था। बड़े दादा ठाकुर को वो बेहद पसंद आईं तो उन्होंने फ़ौरन ही नाना जी से रिश्ते की बात कह दी। नाना जी बड़े दादा ठाकुर को भला कैसे इंकार कर सकते थे? इतने बड़े घर से और इतने बड़े व्यक्ति ने खुद ही उनकी बेटी का हाथ मांगा था। इसे वो अपना सौभाग्य ही समझे थे। बस फिर क्या था, जल्दी ही मेरी मां हवेली में बड़ी बहू बन कर आ गईं।

मेनका चाची के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय:-

✮ धर्मराज सिंह चौहान (चाची के पिता जी)

सुमित्रा सिंह चौहान (चाची की मां)

चाची के माता पिता को कुल तीन संतानें हैं।

(01) हेमराज सिंह चौहान (चाची के बड़े भाई)

सुजाता सिंह चौहान (चाची की बड़ी भाभी)

इनको दो संतानें हैं जिनमें से एक बेटा है और दूसरी बेटी। दोनों का ही ब्याह हो चुका है।

(02) अवधराज सिंह चौहान ( चाची के छोटे भाई)

अल्का सिंह चौहान (चाची की छोटी भाभी)

इनको तीन संतानें हैं, जिनमें से दो बेटे और एक बेटी है। दोनों बेटों का ब्याह हो चुका है जबकि बेटी पद्मिनी अभी अविवाहित है।

(03) मेनका सिंह (छोटी ठकुराईन यानि मेरी चाची)

कुंदनपुर नाम के गांव में चाची के पिता धर्मराज सिंह चौहान के पूर्वज भी ज़मींदार हुआ करते थे। आज के समय में जमींदारी तो नहीं है किंतु उनके विशाल भू भाग पर आज भी गांव के लोग मजदूरी कर के अपना जीवन यापन करते हैं। कुंदनपुर में एक प्राचीन देवी मंदिर है जहां पर हर साल नवरात्र के महीने में विशाल मेला लगता है। आस पास के गावों में जितने भी संपन्न ज़मींदार थे वो सब बड़े बड़े अवसरों पर बड़े दादा ठाकुर को आमंत्रित करते थे। ऐसे ही एक अवसर पर धर्मराज सिंह चौहान ने बड़े दादा ठाकुर को आमंत्रित किया था। बड़े दादा ठाकुर ने वहीं पर मेनका चाची को देखा था। मेनका चाची अपने नाम की तरह ही बेहद सुंदर थीं। बड़े दादा ठाकुर ने देर न करते हुए फ़ौरन ही धर्मराज से उनकी बेटी का हाथ अपने छोटे बेटे जगताप के लिए मांग लिया था। अब क्योंकि ऊपर वाला भी यही चाहता था इस लिए जल्दी ही मेनका चाची हवेली में छोटी बहू बन कर आ गईं।

तो दोस्तो ये था मेरे दोनों ननिहाल वालों का संक्षिप्त परिचय।



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अध्याय - 68

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अब तक....

कुंदनपुर नाम के गांव में चाची के पिता धर्मराज सिंह चौहान के पूर्वज भी ज़मींदार हुआ करते थे। आज के समय में जमींदारी तो नहीं है किंतु उनके विशाल भू भाग पर आज भी गांव के लोग मजदूरी कर के अपना जीवन यापन करते हैं। कुंदनपुर में एक प्राचीन देवी मंदिर है जहां पर हर साल नवरात्र के महीने में विशाल मेला लगता है। आस पास के गावों में जितने भी संपन्न ज़मींदार थे वो सब बड़े बड़े अवसरों पर बड़े दादा ठाकुर को आमंत्रित करते थे। ऐसे ही एक अवसर पर धर्मराज सिंह चौहान ने बड़े दादा ठाकुर को आमंत्रित किया था। बड़े दादा ठाकुर ने वहीं पर मेनका चाची को देखा था। मेनका चाची अपने नाम की तरह ही बेहद सुंदर थीं। बड़े दादा ठाकुर ने देर न करते हुए फ़ौरन ही धर्मराज से उनकी बेटी का हाथ अपने छोटे बेटे जगताप के लिए मांग लिया था। अब क्योंकि ऊपर वाला भी यही चाहता था इस लिए जल्दी ही मेनका चाची हवेली में छोटी बहू बन कर आ गईं।

तो दोस्तो ये था मेरे दोनों ननिहाल वालों का संक्षिप्त परिचय।


अब आगे....

"हालात बेहद ही ख़राब हो गए हैं बड़े भैया।" चिमनी के प्रकाश में नज़र आ रहे मणि शंकर के चेहरे की तरफ देखते हुए हरि शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"दादा ठाकुर ने तो आस पास के सभी गांवों में ये ऐलान भी करवा दिया है कि अगर चौबीस घंटे के अंदर हमने खुद को उनके सामने समर्पण नहीं किया तो वो हमारे घर की बहू बेटियों के साथ बहुत बुरा सुलूक करेंगे।"

"हरि चाचा सही कह रहे हैं पिता जी।" चंद्रभान ने गंभीर भाव से कहा____"अगर हम अब भी इसी तरह छुपे बैठे रहे तो यकीनन बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। हमें दादा ठाकुर के पास जा कर उन्हें ये बताना ही होगा कि उनके छोटे भाई और बड़े बेटे के साथ जो हुआ है उसके ज़िम्मेदार हम नहीं हैं।"

"हां बड़े भैया।" हरि शंकर ने कहा____"हमें अपनी सच्चाई तो बतानी ही चाहिए। ऐसे में तो वो यही समझते रहेंगे कि वो सब हमने किया है। अपनों को खोने का दुख जब बर्दास्त से बाहर हो जाता है तो परिणाम बहुत ही भयानक होता हैं। इस तरह से खुद को छुपा कर हम खुद ही अपने आपको उनकी नज़र में गुनहगार साबित कर रहे हैं। ये जो ऐलान उन्होंने करवाया है उसे हल्के में मत लीजिए। अगर हम सब फ़ौरन ही उनके सामने नहीं गए तो फिर कुछ भी सम्हाले नहीं सम्हलेगा।"

"मुझे तो आपका ये फ़ैसला और आपका ये कहना पहले ही ठीक नहीं लगा था पिता जी कि हम सब कहीं छुप जाएं।" चंद्रभान ने जैसे खीझते हुए कहा____"मुझे अभी भी समझ नहीं आ रहा कि ऐसा करने के लिए आपने क्यों कहा और फिर हम सब आपके कहे अनुसार यहां क्यों आ कर छुप गए? अगर हरि चाचा जी का ये कहना सही है कि हमने कुछ नहीं किया है तो हमें किसी से डर कर यूं एक साथ कहीं छुपने की ज़रूरत ही नहीं थी।"

"हम मानते हैं कि हमारा उस समय ऐसा करने का फ़ैसला कहीं से भी उचित नहीं था।" मणि शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन मौजूदा हालात को देख कर हमें यही करना सही लगा था और ऐसा करने का कारण भी था।"

"भला ऐसा क्या कारण हो सकता है पिता जी?" चंद्रभान के चेहरे पर हैरत के भाव उभर आए, बोला____"मैं ये बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं हूं कि बिना किसी वजह के दादा ठाकुर हमारे साथ कुछ भी ग़लत कर देते।"

"यही तो तुम में ख़राबी है बेटे।" मणि शंकर ने सिर उठा कर चंद्रभान की तरफ देखा, फिर कहा____"तुम सिर्फ वर्तमान की बातों को देख कर कोई नतीजा निकाल रहे हो जबकि हम वर्तमान के साथ साथ अतीत की बातों को मद्दे नज़र रख कर भी सोच रहे हैं। हमारा गांव ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांव वाले भी जानते हैं कि हवेली वालों से हमारे संबंध कभी भी बेहतर नहीं रहे थे। अब अगर हमने अपने संबंधों को बेहतर बना लिया है तो ज़रूर इसके पीछे कोई न कोई ऐसी वजह ज़रूर हो सकती है जिसके बारे में बड़ी आसानी से हर कोई अंदाज़ा लगा सकता है। भले ही वो लोग अंदाज़ा ग़लत ही क्यों न लगाएं पर हम दोनों परिवारों की स्थिति के मद्दे नज़र हर किसी का ऐसा सोचना जायज़ भी है। यानि हर कोई यही सोचेगा कि हमने हवेली वालों से अपने संबंध इसी लिए बेहतर बनाए होंगे ताकि कभी मौका देख कर हम पीठ पर छूरा घोंप सकें। अब ज़रा सोचो कि अगर हर कोई हमारे बारे में ऐसी ही सोच रखता है तो ज़ाहिर है कि ऐसी ही सोच दादा ठाकुर और उसके परिवार वाले भी तो रखते ही होंगे। दादा ठाकुर के छोटे भाई और बड़े बेटे के साथ जो हुआ है उसे भले ही हमने नहीं किया है लेकिन हर व्यक्ति के साथ साथ हवेली वाले भी यही सोच बैठेंगे होंगे कि ऐसा हमने ही किया है। इंसान जब किसी चीज़ को सच मान लेता है तो फिर वो कोई दूसरा सच सुनने या जानने का इरादा नहीं रखता बल्कि ऐसे हालात में तो उसे बस बदला लेना ही दिखता है। अब सोचो कि अगर ऐसे में हम सब अपनी सफाई देने के लिए उनके सामने जाते तो क्या वो हमारी सच्चाई सुनने को तैयार होते? हमारा ख़याल है हर्गिज़ नहीं, बल्कि वो तो आव देखते ना ताव सीधा हम सबकी गर्दनें ही उड़ाना शुरू कर देते। यही सब सोच कर हमने ये फैसला लिया था कि ऐसे ख़तरनाक हालात में ऐसे व्यक्ति के सामने जाना बिल्कुल भी ठीक नहीं है जो हमारे द्वारा कुछ भी सुनने को तैयार ही न हो। हम जानते हैं कि इस वक्त वो इस सबकी वजह से बेहद दुखी हैं और बदले की आग में जल भी रहे हैं किंतु हम तभी उनके सामने जा सकते हैं जब उनके अंदर का आक्रोश या गुस्सा थोड़ा ठंडा हो जाए। कम से कम इतना तो हो ही जाए कि वो हमारी बातें सुनने की जहमत उठाएं।"

"तो क्या आपको लगता है कि आपके ऐसा करने से दादा ठाकुर का गुस्सा ठंडा हो जाएगा?" चंद्रभान ने मानों तंज करते हुए कहा____"जबकि मुझे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता पिता जी। मैं ये मानता हूं कि हर किसी की तरह हवेली वाले भी हमारे संबंधों को सुधार लेने के बारे में ऐसा ही सब कुछ सोचते होंगे लेकिन माजूदा हालात में आपके ऐसा करने से उनकी वो सोच तो यकीन में ही बदल जाएगी। बदले की आग में झुलसता इंसान ऐसे में और भी ज़्यादा भयानक रूप ले लेता है। अगर उसी समय हम सब उनके पास जाते और उनसे अपनी सफाई देते तो ऐसा बिल्कुल नहीं हो जाता कि वो हम में से किसी की कोई बात सुने बिना ही हम सबको मार डालते। देर से ही सही लेकिन वो भी ये सोचते कि अगर हमने ही चाचा भतीजे की हत्या की होती तो अपनी जान को ख़तरे में डाल कर उनके पास नहीं आते।"

"चंद्र बिल्कुल सही कह रहा है बड़े भैया।" हरि शंकर ने सिर हिलाते हुए कहा____"उस समय हमें दादा ठाकुर के पास ही जाना चाहिए था। ऐसे में सिर्फ हवेली वाले ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांव वाले भी हमारे बारे में यही सोचते कि अगर हम ग़लत होते तो मरने के लिए दादा ठाकुर के पास नहीं आते बल्कि अपनी जान बचा कर कहीं भाग जाते। पर अब, अब तो हमने खुद ही ऐसा कर दिया है कि उन्हें हमें ही हत्यारा समझना है और ग़लत क़रार देना है। सच तो ये है बड़े भैया कि पहले से कहीं ज़्यादा बद्तर हालातों में घिर गए हैं हम सब और इससे भी ज़्यादा बुरा तब हो जाएगा जब हम में से कोई भी उनके द्वारा ऐसा ऐलान करवाने पर भी उनके सामने खुद को समर्पण नहीं करेगा।"

"वैसे देखा जाए तो बड़े शर्म की बात हो गई है हरि भैया।" शिव शंकर ने कुछ सोचते हुए कहा____"हम सभी मर्द लोग अपनी अपनी जान बचाने के चक्कर में यहां आ कर छुप के बैठ गए और वहां घर में अपनी बहू बेटियों को हम दादा ठाकुर के क़हर का शिकार बनने के लिए छोड़ आए। वो भी सोचती होंगी कि कैसे कायर और नपुंसक लोग हैं हमारे घर के सभी मर्द। इतना ही नहीं बल्कि ऐसे में तो उन लोगों ने भी यही मान लिया होगा कि हमने ही जगताप और अभिनव की हत्या की है और अब अपनी जान जाने के डर से कहीं छुप गए हैं। जीवन में पहली बार मुझे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे मैं सच में ही कायर और नपुंसक हूं।"

"अगर तुमसे ये सब नहीं सहा जा रहा।" मणि शंकर ने नाराज़गी वाले लहजे में कहा____"तो चले जाओ यहां से और दादा ठाकुर के सामने खुद को समर्पण कर दो।"

"अकेला तो कोई भी खुद को समर्पण करने नहीं जाएगा बड़े भैया।" शिव शंकर ने कहा____"बल्कि हम सभी को जाना पड़ेगा। दादा ठाकुर का ऐलान तो हम सबने सुन ही लिया है। अब अगर हमें अपने घर की बहू बेटियों को सही सलामत रखना है तो वही करना पड़ेगा जो वो चाहते हैं।"

"बिल्कुल।" गौरी शंकर ने जैसे सहमति जताते हुए कहा____"हम सबको कल सुबह ही अपने गांव जा कर दादा ठाकुर के सामने खुद को समर्पण करना होगा। मेरा ख़याल है दादा ठाकुर के अंदर का आक्रोश अब तक थोड़ा बहुत तो शांत हो ही गया होगा। उनके जान पहचान वालों ने यकीनन उन्हें ऐसे वक्त में धैर्य और संयम से काम लेने की सलाह दी होगी। वैसे, बड़े भैया ने इस तरह का फ़ैसला ले कर भी ग़लत नहीं किया था। उस वक्त यकीनन यही करना बेहतर था और यही बातें हम दादा ठाकुर से भी कह सकते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि अब वो सबके सामने हमारी बातें पूरे धैर्य के साथ सुनेंगे और उन पर विचार भी करेंगे।"

"और तो सब ठीक है।" पास में ही खड़े रूपचंद्र ने झिझकते हुए कहा____"लेकिन उस वैभव का क्या? मान लिया कि दादा ठाकुर आप सबकी बातों को धैर्य से सुनने के बाद आपकी बातों पर यकीन कर लेंगे मगर क्या वैभव भी यकीन कर लेगा? आप सब तो जानते ही हैं कि वो किस तरह का इंसान है। अगर उसने हमारे साथ कुछ उल्टा सीधा किया तब क्या होगा?"

"मुझे लगता है कि तुम बेवजह ही उसके लिए चिंतित हो रहे हो।" हरि शंकर ने कहा____"जबकि हम सबने ये भली भांति देखा है कि पिछले कुछ समय से उसका बर्ताव पहले की अपेक्षा आश्चर्यजनक रूप से बेहतर नज़र आया है। वैसे भी अब वो दादा ठाकुर के किसी भी फ़ैसले के खिलाफ़ जाने की हिमाकत नहीं करेगा।"

"अगर ऐसा ही हो तो इससे बेहतर कुछ है ही नहीं।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उसने जान बूझ कर तथा कुछ सोच कर ही अपने बर्ताव को ऐसा बना रखा हो। अब क्योंकि उसके चाचा और बड़े भाई की हत्या हुई है तो वो पूरी तरह पहले जैसा बन कर हम पर क़हर बन कर टूट पड़े।"

"जो भी हो।" हरि शंकर ने कहा____"पर इसका मतलब ये तो नहीं हो सकता ना कि ये सब सोच कर हम सब खुद को दादा ठाकुर के सामने समर्पण करने का अपना इरादा ही बदल दें। आने वाले समय में क्या होगा ये बाद की बात है लेकिन इस वक्त सबसे ज़्यादा ज़रूरी यही है कि हम सब दादा ठाकुर के सामने अपनी स्थिति को साफ कर लें अन्यथा इसके बहुत ही बुरे परिणामों से हमें रूबरू होना होगा।"

✮✮✮✮

उस समय रात के क़रीब ग्यारह बजने वाले थे। बैठक में अभी भी सब लोग बैठे हुए थे। खाना पीना खाने से सभी ने इंकार कर दिया था इस लिए बनाया भी नहीं गया था। मैं भाभी के लिए कुछ ज़्यादा ही फिक्रमंद था इस लिए उन्हीं के कमरे में उनके पास ही बैठा हुआ था। कमरे में लालटेन का मध्यम प्रकाश था। हमेशा की तरह बिजली इस वक्त भी नहीं थी। ख़ैर लालटेन की रोशनी में मैं साफ देख सकता था कि भाभी का चेहरा एकदम से बेनूर सा हो गया था। अपने पलंग पर वो मेरे ही ज़ोर देने पर लेटी हुई थीं और मैं उनके सिरहाने पर बैठा उनके माथे को हल्के हल्के दबा रहा था। ऐसा पहली बार ही हो रहा था कि मैं रात के इस वक्त उनके कमरे में उनके इतने क़रीब बैठा हुआ था। इस वक्त मेरे ज़हन में उनके प्रति कोई भी ग़लत ख़याल आने का सवाल ही नहीं था। मुझे तो बस ये सोच कर दुख हो रहा था कि उनके जैसी सभ्य सुशील संस्कारी और पूजा आराधना करने वाली औरत के साथ ऊपर वाले ने ऐसा क्यों कर दिया था? इस हवेली के अंदर एक मैं ही ऐसा इंसान था जिसने जाने कैसे कैसे कुकर्म किए थे इसके बाद भी मैं सही सलामत ज़िंदा था जबकि मुझ जैसे इंसान के साथ ही बहुत बुरा होना चाहिए था।

"व...वैभव??" अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि सहसा तभी गहरे सन्नाटे में भाभी के मुख से धीमी सी आवाज़ निकली तो मैं एकदम से सम्हल गया और जल्दी ही बोला____"जी भाभी, मैं यहीं हूं। आपको कुछ चाहिए क्या?"

"तु...तुम कब तक ऐसे बैठे रहोगे?" भाभी ने उठने की कोशिश की तो मैंने उन्हें लेटे ही रहने को कहा तो वो फिर से लेट गईं और फिर बोलीं____"अपने कमरे में जा कर तुम भी सो जाओ।"

"मुझे नींद नहीं आ रही भाभी।" मैंने कहा____"वैसे भी मैं आपको अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा। आप आराम से सो जाइए। मैं आपके पास यहीं बैठा रहूंगा।"

"क्..क्या तुम्हें इस बात का डर है कि मैं अपने इस दुख के चलते कहीं कुछ कर न बैठू?" भाभी ने लेटे लेटे ही अपनी गर्दन को हल्का सा ऊपर की तरफ कर के मेरी तरफ देखते हुए कहा।

"मैं भैया को खो चुका हूं भाभी।" मेरी आवाज़ एकदम से भारी हो गई____"लेकिन आपको नहीं खोना चाहता। अगर आपने कुछ भी उल्टा सीधा किया तो जान लीजिए आपका ये देवर सारी दुनिया को आग लगा देगा। किसी को भी ज़िंदा नहीं छोडूंगा मैं। इस गांव में लाशें ही लाशें पड़ी दिखेंगी।"

"इस दुनिया से तो सबको एक दिन चले जाना है वैभव।" भाभी ने उसी तरह मुझे देखते हुए अपनी मुर्दा सी आवाज़ में कहा____"तुम्हारे भैया चले गए, किसी दिन मैं भी चली जाऊंगी।"

"ऐसा मत कहिए न भाभी।" मैंने दोनों हथेलियों में उनका चेहरा ले कर अपनी नम आंखों से उन्हें देखते हुए कहा____"आप मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगी। अगर आपके दिल में मेरे लिए ज़रा सा भी स्नेह और प्यार है तो उस स्नेह और प्यार के खातिर आप मुझे छोड़ कर कहीं जाने का सोचिएगा भी मत। आपको क़सम है मेरी।"

"ठीक है।" भाभी ने अपना एक हाथ पीछे की तरफ ला कर मेरा दायां गाल सहला कर कहा____"लेकिन मेरी भी एक शर्त है।"

"आप बस बोलिए भाभी।" मैंने एक हाथ से उनके उस हाथ को थाम लिया____"वैभव ठाकुर अपनी जान दे कर भी आपकी शर्त पूरी करेगा।"

"नहीं।" भाभी ने झट से मेरे हाथ से अपना हाथ छुड़ा कर मेरे मुख पर रख दिया, फिर बोलीं___"ख़बरदार,अपनी जान देने वाली बातें कभी मत करना। इस हवेली और हवेली में रहने वालों के लिए तुम्हें हमेशा सही सलामत रहना है वैभव।"

"तो आप भी कभी कहीं जाने की बातें मत कहिएगा मुझसे।" मैंने कहा____"मैं हमेशा अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी भाभी को अपने पास सही सलामत देखना चाहता हूं। आप इस हवेली की आन बान शान हैं भाभी। ये तो मेरे बस में ही नहीं है कि मैं उस ऊपर वाले के फ़ैसलों को बदल दूं वरना मैं तो कभी भी अपनी भाभी के चांद जैसे चेहरे पर दाग़ न लगने दूं।"

"इतनी बड़ी बड़ी बातें मत किया करो वैभव।" भाभी ने फिर से मेरे दाएं गाल को सहलाया, बोलीं____"ख़ैर मेरी शर्त तो सुन लो।"

"ओह! हां, माफ़ कीजिए।" मैंने जल्दी से कहा____"जी बताइए क्या शर्त है आपकी?"

"अगर तुम मुझे सही सलामत देखना चाहते हो।" भाभी ने मेरी आंखों में देखते हुए इस बार थोड़े सख़्त भाव से कहा____"तो उन लोगों की सांसें छीन लो जिन लोगों ने मेरे सुहाग को मुझसे छीना है। जब तक उन हत्यारों को मुर्दा बना कर मिट्टी में नहीं मिला दिया जाएगा तब तक तुम्हारी भाभी के दिल को सुकून नहीं मिलेगा।"

"ऐसा ही होगा भाभी।" मैंने फिर से उनके उस हाथ को थाम लिया, बोला____"मैं आपको वचन देता हूं कि जिन लोगों ने आपके सुहाग की हत्या कर के उन्हें आपसे छीना है उन लोगों को मैं बहुत जल्द भयानक मौत दे कर मिट्टी में मिला दूंगा।"

"एक शर्त और भी है।" भाभी ने कहा____"और वो ये है कि इस सबके चलते तुम खुद को खरोंच भी नहीं आने दोगे।"

"मैं पूरी कोशिश करूंगा भाभी।" मैंने कहा तो भाभी कुछ पलों तक मुझे देखती रहीं और फिर बोलीं____"अब जाओ अपने कमरे में और आराम करो।"

मैं अब आश्वस्त हो चुका था इस लिए उनके सिरहाने से उठा और उन्हें भी सो जाने को बोल कर कमरे से बाहर आ गया। दरवाज़े को आपस में भिड़ा कर मैं कुसुम के कमरे की तरफ बढ़ गया। बाहर से ही मैंने उसे आवाज़ दी तो जल्दी ही कुसुम ने दरवाज़ा खोला। उसकी हालत देख कर मेरा कलेजा कांप गया। वो मेरी लाडली बहन थी और इतना कुछ हो जाने के बाद भी मैं उसे समय नहीं दे पाया था। मैंने उसे पकड़ कर अपने सीने से छुपका लिया। मेरा ऐसा करना था कि उसकी सिसकियां छूट पड़ीं। मैंने किसी तरह उसे शांत किया और फिर भाभी के साथ रहने को बोल कर अपने कमरे की तरफ बढ़ चला।

अभी मैं गलियारे से मुड़ा ही था कि तभी विभोर ने मुझे पीछे से आवाज़ दी तो मैं ठिठक गया और फिर पलट कर उसकी तरफ देखा।

"क्या बात है?" मैंने उसके क़रीब आ कर पूछा____"तू अपने कमरे में सोने नहीं गया?"

"वो भैया मैं नीचे पेशाब करने गया था।" विभोर ने बुझे स्वर में कहा____"वहां मैंने ताऊ जी को बंदूक ले कर बाहर जाते देखा तो मैं यही बताने के लिए आपके कमरे की तरफ आ रहा था।"

"क्या सच कह रहा है तू?" मैं उसकी बात सुन कर चौंक पड़ा था____"और क्या देखा तूने?"

"बस इतना ही देखा भैया।" उसने कहा____"पर मुझे लगता है कि कुछ तो बात ज़रूर है वरना ताऊ जी रात के इस वक्त बंदूक ले कर बाहर क्यों जाएंगे?"

विभोर की बात बिलकुल सही थी। रात के इस वक्त पिता जी का बंदूक ले कर बाहर जाना यकीनन कोई बड़ी बात थी।

"ठीक है।" मैंने कहा____"तू अपने कमरे में जा। मैं देखता हूं क्या माजरा है।"

"मैं भी आपके साथ चलूंगा भैया।" विभोर ने इस बार आवेश युक्त भाव से कहा____"मुझे भी पिता जी और बड़े भैया के हत्यारों से बदला लेना है।"

"मैं तेरी भावनाओं को समझता हूं विभोर।" मैंने उसके चेहरे को प्यार से सहलाते हुए कहा___"यकीन रख, चाचा और भैया के क़ातिल ज़्यादा देर तक जिन्दा नहीं रह सकेंगे। बहुत जल्द उनकी लाशें भी पड़ी नज़र आएंगी। तुझे और अजीत को हवेली में रह कर यहां सबका ख़याल भी रखना है और सबकी सुरक्षा भी करनी है।"

"पर भ...??" अभी वो कुछ कहने ही वाला था कि मैंने उसे चुप कराया और कमरे में जाने को कहा तो वो बेमन से चला गया। उसके जाते ही मैं तेज़ी से अपने कमरे में आया और अलमारी से पिता जी द्वारा दिया हुआ रिवॉल्वर ले कर उसी तेज़ी के साथ कमरे से निकल कर नीचे की तरफ बढ़ता चला गया।

मुझे नीचे आने में ज़्यादा देर नहीं हुई थी लेकिन बैठक में मुझे ना तो पिता जी नज़र आए और ना ही उनके मित्र अर्जुन सिंह। बैठक में सिर्फ भैया के चाचा ससुर, और मेरी दोनों ननिहाल के नाना लोग ही बैठे दिखे। दोनों जगह के मामा लोग भी नहीं थे वहां। मैं समझ गया कि सब के सब पिता जी के साथ कहीं निकल गए हैं। इससे पहले कि बैठक में बैठे उन लोगों की मुझ पर नज़र पड़ती मैं झट से बाहर निकल गया। बाहर आया तो एक दरबान के पास मैं ठिठक गया। उससे मैंने जब सख़्त भाव से पूछा तो उसने बताया कि कुछ देर पहले दो व्यक्ति आए थे। उन्होंने दादा ठाकुर को पता नहीं ऐसा क्या बताया था कि दादा ठाकुर जल्दी ही अर्जुन सिंह और मामा लोगों के साथ निकल गए।

✮✮✮✮

हवेली के बाहर वाले हिस्से में बने जिस कमरे में जगन को बंद किया गया था उस कमरे के बाहर दो व्यक्ति बैठे पहरा दे रहे थे। आज कल हवेली में जिस तरह के हालात बने हुए थे उसकी जानकारी हवेली के सभी नौकरों को थी इस लिए सुरक्षा और निगरानी के लिए वो सब पूरी तरह से चौकस और सतर्क थे।

"अबे ऊंघ क्यों रहा है?" लकड़ी की एक पुरानी सी स्टूल पर बैठे एक व्यक्ति ने अपने दूसरे साथी को ऊंघते देखा तो उसे हल्के से आवाज़ दी। उसकी आवाज़ सुन कर उसका दूसरा साथी एकदम से हड़बड़ा गया और फिर इधर उधर देखने के बाद उसकी तरफ देखने लगा।

"दिन में सोया नहीं था क्या तू?" पहले वाले ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा_____"जो इस वक्त इस तरह से ऊंघ रहा है।"

"हां यार।" दूसरे ने सिर हिला कर अलसाए हुए भाव से कहा____"असल में तेरी भौजी की तबियत ठीक नहीं थी इस लिए दिन में उसे ले कर वैद्य के पास गया था। उसे कुछ आराम तो मिला लेकिन उसकी देख भाल के चक्कर में दिन में सोया ही नहीं। मां दो दिन पहले अपने मायके चली गई है जिसके चलते मुझे ही सब देखना पड़ रहा है।"

"हम्म्म्म मैं समझता हूं भाई।" पहले वाले ने कहा____"पर इस वक्त तो तुझे जागना ही पड़ेगा न भाई।"

"मुझे कुछ देर सो लेने दे यार।" दूसरे ने जैसे उससे विनती की_____"वैसे भी बंद कमरे से वो ना तो निकल सकता है और ना ही निकल कर कहीं जा सकता है। फिर तू तो है ही यहां पर तो थोड़ी देर सम्हाल ले न यार।"

"साले मरवाएगा मुझे।" पहले वाले ने उसे घूरते हुए कहा____"तुझे तो पता ही है कि आज कल हालात बहुत ख़राब हैं। ऐसे में अगर कुछ भी उल्टा सीधा हो गया तो समझ ले दादा ठाकुर हमारे जिस्मों से खाल उतरवा देंगे।"

"हां मैं जानता हूं भाई।" दूसरे ने सिर हिलाया____"पर भाई तू तो है ही यहां पर। थोड़ी देर सम्हाल ले ना। मुझे सच में ज़ोरों की नींद आ रही है। अगर कुछ हो तो मुझे जगा देना।"

पहले वाला कुछ देर तक उसकी तरफ देखता रहा फिर बोला____"ठीक है कुछ देर सो ले तू।"

"तेरा बहुत बहुत शुक्रिया मेरे यार।" दूसरा खुश होते हुए बोला।

"हां ठीक है।" पहला वाला स्टूल से उठा और फिर अपनी कमर में एक काले धागे में फंसी चाभी को निकाल कर उसकी तरफ बढ़ते हुए बोला_____"इसे पकड़ ज़रा। मैं मूत के आता हूं और हां सो मत जाना वरना गांड़ मार लूंगा तेरी।"

पहले वाले की बात सुन कर दूसरे ने हंसते हुए उसे गाली दी और हाथ बढ़ा कर उससे चाभी ले ली। उधर चाभी दे कर पहला वाला व्यक्ति मूतने के लिए उधर ही एक तरफ बढ़ता चला गया। उसके जाने के बाद उसने आस पास एक नज़र डाली और फिर एक नज़र बंद कमरे की तरफ डाल कर वो थोड़ा ढंग से स्टूल पर बैठ गया।

रात के इस वक्त काफी अंधेरा था। हवेली के बाहर कई जगहों पर मशालें जल रही थी जिनकी रोशनी से आस पास का थोड़ा बहुत दिख रहा था। जिस जगह पर ये दोनों लोग बैठे हुए थे उससे क़रीब पांच क़दम की दूरी पर एक मशाल जल रही थी।

पहले वाला व्यक्ति अभी मुश्किल से कुछ ही दूर गया रहा होगा कि तभी एक तरफ अंधेरे में से एक साया हल्की रोशनी में प्रगट सा हुआ और दूसरे वाले आदमी की तरफ बढ़ चला। दूसरा वाला हाथ में धागे से बंधी चाभी लिए बैठा हुआ था। उसका सिर हल्का सा झुका हुआ था। ऐसा लगा जैसे वो फिर से ऊंघने लगा था। इधर हल्की रोशनी में आते ही साया थोड़ा स्पष्ट नज़र आया।

जिस्म पर काले रंग की शाल ओढ़ रखी थी उसने किंतु फिर भी शाल के खुले हिस्से से उसके अंदर मौजूद सफ़ेद लिबास नज़र आ रहा था। सिर पर भी उसने शाल को डाल रख था और शाल के सिरे को आगे की तरफ कर के वो अपने चेहरे को छुपाए रखने का प्रयास कर रहा था। जैसे ही वो स्टूल में बैठे दूसरे वाले ब्यक्ति के क़रीब पहुंचा तो रोशनी में इस बार शाल के अंदर छुपा उसका चेहरा दिखा। सफ़ेद कपड़े से उसका चेहरा ढंका हुआ था। आंखों वाले हिस्से से उसकी आंखें चमक रहीं थी और साथ ही नाक और मुंह के पास छोटे छोटे छिद्र रोशनी में नज़र आए। ज़ाहिर है वो छिद्र सांस लेने के लिए थे।

रहस्यमय साए ने पलट कर एक बार आस पास का जायजा लिया और फिर तेज़ी से आगे बढ़ कर उसने दूसरे वाले व्यक्ति की कनपटी पर किसी चीज़ से वार किया। नतीज़ा, दूसरा व्यक्ति हल्की सिसकी के साथ ही स्टूल पर लुढ़कता नज़र आया। साए ने फ़ौरन ही उसे पकड़ कर आहिस्ता से स्टूल पर लेटा दिया। उसके बाद उसने उसके हाथ से चाभी ली और बंद कमरे की तरफ बढ़ चला।

पहले वाला व्यक्ति अच्छी तरह मूत लेने के बाद जब वापस आया तो वो ये देख कर बुरी तरह चौंका कि उसका दूसरा साथी स्टूल पर बड़े आराम से लुढ़का पड़ा सो रहा है और जिस कमरे में जगन को बंद किया गया था उस कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ है। ये देखते ही मानों उसके होश उड़ गए। वो मशाल ले कर भागते हुए कमरे की तरफ गया और जब कमरे के अंदर उसे कोई नज़र ना आया तो जैसे इस बार उसके सिर पर गाज ही गिर गई। पैरों के नीचे की ज़मीन रसातल तक धंसती चली गई। शायद यही वजह थी कि वो अपनी जगह पर खड़ा अचानक से लड़खड़ा गया था किंतु फिर उसने खुद को सम्हाला और तेज़ी से बाहर आ कर वो अपने साथी को ज़ोर ज़ोर से हिला कर जगाने लगा। उसका अपना चेहरा डर और ख़ौफ की वजह से फक्क् पड़ा हुआ था।

उसका दूसरा साथी जब उसके ज़ोर ज़ोर से हिला कर जगाने पर भी न जागा तो वो और भी ज़्यादा घबरा गया। उसका अपना जिस्म ये सोच कर ठंडा सा पड़ गया कि कहीं उसका साथी मर तो नहीं गया? हकबका कर वो एक तरफ को भागा और जल्दी ही हवेली के मुख्य दरवाज़े के पास पहुंच गया। मुख्य द्वार पर खड़े दरबान को उसने हांफते हुए सारी बात बताई तो उस दरबान के भी होश उड़ गए। उसने फ़ौरन ही अंदर जा कर बैठक में बैठे भैया के चाचा ससुर को सारी बात बताई तो बैठक में बैठे बाकी सब भी बुरी तरह उछल पड़े।


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अध्याय - 69

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उसका दूसरा साथी जब उसके ज़ोर ज़ोर से हिला कर जगाने पर भी न जागा तो वो और भी ज़्यादा घबरा गया। उसका अपना जिस्म ये सोच कर ठंडा सा पड़ गया कि कहीं उसका साथी मर तो नहीं गया? हकबका कर वो एक तरफ को भागा और जल्दी ही हवेली के मुख्य दरवाज़े के पास पहुंच गया। मुख्य द्वार पर खड़े दरबान को उसने हांफते हुए सारी बात बताई तो उस दरबान के भी होश उड़ गए। उसने फ़ौरन ही अंदर जा कर बैठक में बैठे भैया के चाचा ससुर को सारी बात बताई तो बैठक में बैठे बाकी सब भी बुरी तरह उछल पड़े।

अब आगे....




उस वक्त रात के साढ़े बारह बज रहे थे जब दादा ठाकुर का काफ़िला पास के ही एक गांव माधोपुर के पास पहुंचा। गांव से कुछ दूर ही काफ़िले को रोक कर सब अपनी अपनी गाड़ियों से उतरे। कुल तीन जीपें थी। एक दादा ठाकुर की, दूसरी अर्जुन सिंह की और तीसरी मेरे नाना जी की। तीनों जीपों में आदमी सवार हो कर आए थे। किसी के हाथ में बंदूक, किसी के हाथ में पिस्तौल, किसी के हाथ में लट्ठ तो किसी के हाथ में तलवार। दादा ठाकुर के निर्देश पर सब के सब एक लंबा घेरा बना कर गांव के अंदर की तरफ उस दिशा में बढ़ चले जिधर साहूकारों के मौजूद होने की ख़बर मुखबिरों ने दादा ठाकुर को दी थी।

आधी रात के वक्त पूरे गांव में शमशान की तरह सन्नाटा फैला हुआ था। चारो तरफ अंधेरा तो था किंतु इतना भी नहीं कि किसी को कुछ दिखे ही न। आसमान में हल्का सा चांद था जिसकी मध्यम रोशनी धरती पर आ रही थी, ये अलग बात है कि क्षितिज पर काले बादलों की वजह से कभी कभी वो चांद छुप जाता था जिसकी वजह से उसके द्वारा आने वाली रोशनी लोप भी हो जाती थी।

"मैं अब भी आपसे यही कहूंगा ठाकुर साहब कि थोड़ा होश से काम लीजिएगा।" दादा ठाकुर के बगल से ही चल रहे अर्जुन सिंह ने धीमें स्वर में कहा____"कहीं ऐसा न हो कि आवेश और गुस्से में किए गए अपने कृत्य से बाद में आपको पछतावा हो।"

"हमें अब किसी बात का पछतावा नहीं होने वाला अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहा____"बल्कि हमें तो अब इस बात का बेहद अफ़सोस ही नहीं बल्कि दुख भी है कि हमने आज से पहले होश क्यों नहीं गंवाया था? अगर हमने इसके पहले ही पूरी सख़्ती से हर काम किया होता तो आज हमें ये दिन देखना ही नहीं पड़ता। हमारे दुश्मनों ने हमारी नरमी का फ़ायदा ही नहीं उठाया है बल्कि उसका मज़ाक भी बनाया है। इस लिए अब हमें किसी बात के लिए होश से काम नहीं लेना है बल्कि अब तो दुश्मनों के साथ वैसा ही सुलूक किया जाएगा जैसा कि उनके साथ होना चाहिए।"

"मैं आपकी बातों से इंकार नहीं कर रहा ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"यही वजह है कि इस वक्त मैं यहां आपके साथ हूं। मैं तो बस ये कह रहा हूं कि कुछ भी करने से पहले एक बार आपको उन लोगों से भी पूछना चाहिए कि ऐसा उन्होंने क्यों किया है?"

"पूछने की ज़रूरत ही नहीं है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने आवेशयुक्त भाव से कहा____"हमें अच्छी तरह पता है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया है। तुम शायद भूल गए हो लेकिन हम नहीं भूले।"

"क्या मतलब??" अर्जुन सिंह ने उलझन पूर्ण भाव से दादा ठाकुर की तरफ देखा____"मैं कुछ समझा नहीं। आप किस चीज़ की बात कर रहे हैं?"

"बहुत पुराना मामला है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमारे पिता जी के ज़माने का। अगर हम ये कहें तो ग़लत न होगा कि साहूकारों का मन मुटाव हमारे पिता जी की वजह से ही शुरू हुआ था। हमने एक बार तुम्हें बताया तो था इस बारे में।"

"ओह! हां याद आया।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"तो क्या साहूकार लोग अभी भी उसी बात को लिए बैठे हैं?"

"कुछ ज़ख्म इंसान को कभी चैन और सुकून से नहीं बैठने देते।" दादा ठाकुर ने कहा____"पिता जी ने उस समय भले ही सब कुछ ठीक कर के मामले को रफा दफा कर दिया था मगर सच तो ये है कि वो मामला साहूकारों के लिए कभी रफा दफा हुआ ही नहीं। उस समय पिता जी के ख़ौफ के चलते भले ही साहूकारों ने कोई ग़लत क़दम नहीं उठाया था मगर वर्षों बाद अब उठाया है। हमें हैरत है कि ऐसा कोई क़दम उठाने में उन लोगों ने इतना समय क्यों लगाया मगर समझ सकते हैं कि हर चीज़ अपने तय वक्त पर ही होती है।"

"आपका मतलब है कि इतने सालों बाद ही उनके द्वारा ऐसा करने का वक्त आया?" अर्जुन सिंह ने बेयकीनी से दादा ठाकुर की तरफ देखा____"पर सोचने वाली बात है कि क्या उन्हें ऐसा करने के बाद अपने अंजाम की कोई परवाह न रही होगी?"

"इंसान के सब्र का घड़ा जब भर जाता है तो उसकी नियति कुछ ऐसी ही होती है मित्र अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने कहा____"जैसे इस वक्त हम बदले की भावना में जलते हुए उन सबको ख़ाक में मिलाने के लिए उतावले हो रहे हैं उसी तरह उन लोगों की भी यही दशा रही होगी।"

अर्जुन सिंह अभी कुछ कहने ही वाला था कि दादा ठाकुर ने चुप रहने का इशारा किया और पिस्तौल लिए आगे बढ़ चले। सभी गांव में दाखिल हो चुके थे। हमेशा की तरह बिजली गुल थी इस लिए किसी भी घर में रोशनी नहीं दिख रही थी। हल्के अंधेरे में डूबे गांव के घर भूत की तरह दिख रहे थे। दादा ठाकुर की नज़र घूमते हुए एक मकान पर जा कर ठहर गई। मकान कच्चा ही था जिसके बाहर क़रीब पच्चीस तीस गज का मैदान था। उस मैदान के एक तरफ कुछ मवेशी बंधे हुए थे।

"वो रहा मकान।" दादा ठाकुर ने उंगली से इशारा करते हुए बाकी सबकी तरफ नज़र घुमाई____"तुम सब मकान को चारो तरफ से घेर लो। उनमें से कोई भी बच के निकलना नहीं चाहिए।"

अंधेरे में सभी ने सिर हिलाया और मकान की तरफ सावधानी से बढ़ चले। दादा ठाकुर के साथ में अर्जुन सिंह और मामा लोग थे जबकि बाकी हवेली के मुलाजिम लोग दूसरे छोर पर थे। उन लोगों के साथ में भैया के साले वीरेंद्र सिंह थे और जगताप चाचा का एक साला भी।

सब के सब मकान की तरफ बढ़ ही रहे थे कि तभी अंधेरे में एक तरफ से एक साया भागता हुआ उस मकान के पास पहुंचा और शोर करते हुए अंदर घुस गया। ये देख दादा ठाकुर ही नहीं बल्कि बाकी लोग भी बुरी तरह चौंक पड़े। दादा ठाकुर जल्दी ही सम्हले और सबको सावधान रहने को कहा और साथ ही आने वाली स्थिति से निपटने के लिए भी।

वातावरण में एकाएक ही शोर गुल गूंज उठा और मकान के अंदर से एक एक कर के लोग बाहर की तरफ निकल कर इधर उधर भागने लगे। हल्के अंधेरे में भी दादा ठाकुर ने भागने वालों को पहचान लिया। वो सब गांव के साहूकार ही थे। उन्हें भागते देख दादा ठाकुर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्हें ये सोच कर भी गुस्सा आया कि वो सब बुजदिल और कायरों की तरह अपनी जान बचा कर भाग रहे हैं जबकि उन्हें तो दादा ठाकुर का सामना करना चाहिए था।

इससे पहले कि वो सब अंधेरे में कहीं गायब हो जाते दादा ठाकुर ने सबको उन्हें खत्म कर देने का हुकुम सुना दिया। दादा ठाकुर का हुकुम मिलते ही वातावरण में बंदूखें गरजने लगीं। अगले ही पल वातावरण इंसानी चीखों से गूंज उठा। देखते ही देखते पूरे गांव में हड़कंप मच गया। सोए हुए लोगों की नींद में खलल पड़ गया और सबके सब ख़ौफ का शिकार हो गए। इधर दादा ठाकुर के साथ साथ अर्जुन सिंह और मामा लोगों की बंदूकें गरजती रहीं। जब बंदूक से निकली गोलियों से फिज़ा में गूंजने वाली चीखें शांत पड़ गईं तो दादा ठाकुर के हुकुम पर बंदूक से गोलियां निकलनी बंद हो गईं।

जब काफी देर तक फिज़ा में गोलियां चलने की आवाज़ नहीं गूंजी तो ख़ौफ से भरे गांव के लोगों ने राहत की सांस ली और अपने अपने घरों से निकलने की जहमत उठाई। लगभग सभी घरों के अंदर कुछ ही देर में रोशनी होती नज़र आने लगी। इधर दादा ठाकुर के कहने पर सब मकान की तरफ बढ़ चले।

"सम्हल कर ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"दुश्मन अंधेरे में कहीं छुपा भी हो सकता है और वो आप पर वार भी कर सकता है।"

"यही तो हम चाहते हैं।" दादा ठाकुर आगे बढ़ते हुए बोले____"हम चाहते हैं कि हमारे जिगर के टुकड़ों को छिप कर वार करने वाले एक बार हमारे सामने आ कर वार करें। हम भी तो देखें कि वो कितने बड़े मर्द हैं और कितना बड़ा जिगर रखते हैं।"

थोड़ी ही देर में सब उस मकान के क़रीब पहुंच गए। मकान के दोनों तरफ लाशें पड़ीं थी जिनके जिस्मों से निकलता लहू कच्ची ज़मीन पर अंधेरे में भी फैलता हुआ नज़र आ रहा था।

"अंदर जा कर देखो तो ज़रा।" दादा ठाकुर ने अपने एक मुलाजिम से कहा____"कि इस घर का वो कौन सा मालिक है जिसने हमारे दुश्मनों को अपने घर में पनाह देने की जुर्रत की थी?"

दादा ठाकुर के कहने पर मुलाजिम फ़ौरन ही घर के अंदर चला गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर आगे बढ़े और लाशों का मुआयना करने लगे। ज़ाहिर है उनके साथ बाकी लोग भी लाशों का मुआयना करने लगे थे।

इधर कुछ ही देर में गांव के लोग भी एक एक कर के अपने अपने घरों से बाहर निकल आए थे। कुछ लोगों के हाथ में लालटेनें थी जिसकी रोशनी अंधेरे को दूर कर रही थी। लालटेन की रोशनी में जिसके भी चेहरे दिख रहे थे उन सबके चेहरों में दहशत के भाव थे। तभी मुलाजिम अंदर से बाहर आया। उसने एक आदमी को पकड़ रखा था। मारे ख़ौफ के उस आदमी का चेहरा पीला ज़र्द पड़ा हुआ था। उसके पीछे रोते बिलखते एक औरत भी आ गई और साथ में उसके कुछ बच्चे भी।

"मालिक ये है वो आदमी।" मुलाजिम ने दादा ठाकुर से कहा____"जिसने इन लोगों को अपने घर में पनाह देने की जुर्रत की थी।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए दादा ठाकुर।" वो आदमी दादा ठाकुर के पैरों में ही लोट गया, रोते बिलखते हुए बोला____"लेकिन ऐसा मैंने खुद जान बूझ के नहीं किया था बल्कि ये लोग ज़बरदस्ती मेरे घर में घुसे थे और मुझे धमकी दी थी कि अगर मैंने उनके बारे में किसी को कुछ बताया तो ये लोग मेरे बच्चों को जान से मार डालेंगे।"

"कब आए थे ये लोग तुम्हारे घर में?" अर्जुन सिंह ने थोड़ी नरमी से पूछा तो उसने कहा____"कल रात को आए थे मालिक। पूरा गांव सोया पड़ा था। मेरी एक गाय शाम को घर नहीं आई थी इस लिए उसे देखने के लिए मैं घर से बाहर निकला था कि तभी ये लोग मेरे सामने आ धमके थे। बस उसके बाद मुझे वही करना पड़ा जिसके लिए इन्होंने मुझे मजबूर किया था। मुझे माफ़ कर दीजिए मालिक। मैं अपने बच्चों की क़सम खा के कहता हूं कि मैंने आपसे कोई गद्दारी नहीं की है।"

"मेरा ख़याल है कि ये सच बोल रहा है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"इस सबमें यकीनन इसका कोई दोष नहीं है।"

"ठीक है।" दादा ठाकुर ने सपाट लहजे में उस आदमी की तरफ देखते हुए कहा____"हम तुम पर यकीन करते हैं। ख़ैर ज़रा अंदर से लालटेन ले कर तो आओ।"

"जी अभी लाया मालिक।" जान बची लाखों पाए वाली बात सोच कर उस आदमी ने राहत की सांस ली और फ़ौरन ही अंदर भागता हुआ गया। कुछ ही पलों में लालटेन ले कर वो दादा ठाकुर के सामने हाज़िर हो गया।

दादा ठाकुर ने उसके हाथ से लालटेन ली और उसकी रोशनी में लाशों का मुआयना करने लगे। घर से बाहर कुछ ही दूरी पर एक लाश पड़ी थी। दादा ठाकुर ने देखा वो लाश साहूकार शिव शंकर की थी। अभी दादा ठाकुर उसे देख ही रहे थे कि तभी वो आदमी ज़ोर से चिल्लाया जिसकी वजह से सब के सब चौंके और साथ ही सावधान हो कर बंदूखें तान लिए।

दादा ठाकुर ने पलट कर देखा, वो आदमी अपने एक मवेशी के पास बैठा रो रहा था। भैंस का एक बच्चा था वो जो किसी की गोली का शिकार हो गया था और अब वो ज़िंदा नहीं था। वो आदमी उसी को देख के रोए जा रहा था। उसके पीछे उसकी बीवी भी आंसू बहा रही थी। ये देख दादा ठाकुर वापस पलटे और फिर से लाशों का मुआयना करने लगे।

कुछ ही देर में सभी लाशों का मुआयना कर लिया गया। वो क़रीब आठ लाशें थीं। शिनाख्त से पता चला कि वो लाशें क्रमशः शिव शंकर, मणि शंकर, हरि शंकर तथा उनके बेटों की थी। मणि शंकर अपने दोनों बेटों के साथ स्वर्ग सिधार गया था। हरि शंकर और उसका बड़ा बेटा मानिकचंद्र स्वर्ग सिधार गए थे जबकि रूपचंद्र सिंह लाश के रूप में नहीं मिला, यानि वो ज़िंदा था और भागने में कामयाब हो गया था। शिव शंकर और उसका इकलौता बेटा गौरव सिंह मर चुके थे। इधर लाशों में गौरी शंकर तो नहीं मिला लेकिन उसके इकलौते बेटे रमन सिंह की लाश ज़रूर मिली। सभी लाशें बड़ी ही भयानक लग रहीं थी।

अभी सब लोग लाशों की तरफ ही देख रहे थे कि तभी वातावरण में धाएं की आवाज़ से गोली चली। गोली चलते ही एक इंसानी चीख फिज़ा में गूंज उठी। वो इंसानी चीख दादा ठाकुर के पास ही खड़े उनके सबसे छोटे साले अमर सिंह राणा की थी। उनके बाएं बाजू में गोली लगी थी। इधर गोली चलने की आवाज़ सुनते ही गांव में एक बार फिर से हड़कंप मच गया। जो लोग अपने अपने घरों से बाहर निकल आए थे वो सब चीखते चिल्लाते हुए अपने अपने घरों के अंदर भाग लिए। इधर मामा को गोली लगते ही सब के सब सतर्क हो गए और जिस तरफ से गोली चलने की आवाज़ आई थी उस तरफ ताबड़तोड़ फायरिंग करने लगे।

"तुम ठीक तो हो न अमर?" दादा ठाकुर ने अपने सबसे छोटे साले अमर को सम्हालते हुए बोले____"तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं न?"

"मैं बिल्कुल ठीक हूं जीजा जी।" अमर सिंह ने दर्द को सहते हुए कहा____"आप मेरी फ़िक्र मत कीजिए और दुश्मन को ख़त्म कीजिए।"

"वो ज़िंदा नहीं बचेगा अमर।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहने के साथ ही बाकी लोगों की तरफ देखते हुए हुकुम दिया____"सब जगह खोजो उस नामुराद को। बच के निकलना नहीं चाहिए।"

दादा ठाकुर के हुकुम पर सभी मुलाजिम फ़ौरन ही उस तरफ दौड़ पड़े जिधर से गोली चली थी। इधर दादा ठाकुर ने फ़ौरन ही अपने कंधे पर रखे गमछे को फाड़ा और उसे अमर सिंह की बाजू में बांध दिया ताकि खून ज़्यादा न बहे।

"हमारा ख़याल है कि हमें अब यहां से निकलना चाहिए जीजा श्री।" चाची के छोटे भाई अवधराज सिंह ने कहा____"हमारा जो दुश्मन यहां से निकल भागा है वो कहीं से भी छुप कर हमें नुकसान पहुंचा सकता है। मुलाजिमों को आपने उन्हें खोजने का हुकुम दे ही दिया है तो वो लोग उन्हें खोज लेंगे। हवेली चल कर अमर भाई साहब की बाजू से गोली निकालना बेहद ज़रूरी है वरना ज़हर फैल जाएगा तो और भी समस्या हो जाएगी।"

"अवधराज जी सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"यहां से अब निकलना ही हमारे लिए उचित होगा।"

"ठीक है।" दादा ठाकुर ने कहा____"मगर यहां पर पड़ी इन लाशों को भी तो यहां से हटाना पड़ेगा वरना इन लाशों को देख कर गांव वाले ख़ौफ से ही मर जाएंगे।"

"हां सही कहा आपने।" अर्जुन सिंह ने सिर हिलाया____"इन लाशों को ठिकाने लगाना भी ज़रूरी है। अगर पुलिस विभाग को पता चला तो मुसीबत हो जाएगी।"

"पुलिस विभाग को तो देर सवेर पता चल ही जाएगा।" दादा ठाकुर ने कहा___"मगर इसकी हमें कोई फ़िक्र नहीं है। हम तो ये सोच रहे हैं कि लाशों को ऐसी जगह रखा जाए जिससे इन गांव वालों को भी समस्या ना हो और साथ ही हमारे बचे हुए दुश्मन भी हमारी पकड़ में आ जाएं।"

"ऐसा कैसे होगा भला?" अर्जुन सिंह के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।

"इन लाशों का क्रिया कर्म करने के लिए इनके घर वाले इन लाशों को लेने तो आएंगे ही।" दादा ठाकुर ने कहा____"अब ऐसा तो होगा नहीं कि मौत के ख़ौफ से वो लोग इनका अंतिम संस्कार ही नहीं करेंगे। इसी लिए हमने कहा है कि लाशों को ऐसी जगह रखा जाए जहां से इनके चाहने वालों को इन्हें ले जाने में कोई समस्या ना हो किंतु साथ ही वो आसानी से हमारी पकड़ में भी आ जाएं।"

दादा ठाकुर की बात सुन कर अभी अर्जुन सिंह कुछ कहने ही वाला था कि तभी कुछ मुलाजिम दादा ठाकुर के पास आ गए। उन्होंने बताया कि गोली चलाने वाले दुश्मन का कहीं कोई अता पता नहीं है। दादा ठाकुर ने उन्हें हुकुम दिया कि वो सब लाशों को बैलगाड़ी में लाद कर ले चलें।

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"रुक जाओ वरना गोली मार दूंगा।" अंधेरे में भागते एक साए को देख मैंने उस पर रिवॉल्वर तानते हुए कहा तो वो साया एकदम से अपनी जगह पर ठिठक गया।

एक तो अंधेरा दूसरे उसने अपने बदन पर काले रंग की शाल ओढ़ रखी थी इस लिए उसकी परछाईं मुझे धुंधली सी ही नज़र आ रही थी। उधर मेरी बात सुनते ही वो ठिठक गया था किंतु पलट कर मेरी तरफ देखने की जहमत नहीं की उसने। मैं पूरी सतर्कता से उसकी तरफ बढ़ा तो एकदम से उसमें हलचल हुई।

"तुम्हारी ज़रा सी भी हरकत तुम्हारी मौत का सबब बन सकती है।" मैंने सख़्त भाव से उसे चेतावनी देते हुए कहा____"इस लिए अगर अपनी ज़िंदगी से बेपनाह मोहब्बत है तो अपनी जगह पर ही बिना हिले डुले खड़े रहो।"

मगर बंदे पर मेरी चेतावनी का कोई असर न हुआ। वो अपनी जगह से हिला ही नहीं बल्कि पलट कर उसने मुझ पर गोली भी चला दी। पलक झपकते ही मेरी जीवन लीला समाप्त हो सकती थी किंतु ये मेरी अच्छी किस्मत ही थी कि उसका निशाना चूक गया और गोली मेरे बाजू से निकल गई। एक पल के लिए तो मेरी रूह तक थर्रा गई थी किंतु फिर मैं ये सोच कर जल्दी से सम्हला कि कहीं इस बार उसका निशाना सही जगह पर न लग जाए और अगले ही पल मेरी लाश कच्ची ज़मीन पर पड़ी नज़र आने लगे। इससे पहले कि वो मुझ पर फिर से गोली चलाता मैंने रिवॉल्वर का ट्रिगर दबा दिया। वातावरण में धाएं की तेज़ आवाज़ गूंजी और साथ ही उस साए के हलक से दर्द में डूबी चीख भी।

गोली साए की जांघ में लगी थी और ये मैंने जान बूझ कर ही किया था क्योंकि मैं उसे जान से नहीं मारना चाहता था। मैं जानना चाहता था कि आख़िर वो है कौन जो रात के इस वक्त इस तरह से भागता चला जा रहा था और मेरी चेतावनी के बावजूद उसने मुझ पर गोली चला दी थी। बहरहाल, जांघ में गोली लगने से वो लहराया और ज़मीन पर गिर पड़ा। पिस्तौल उसके हाथ से निकल कर अंधेरे में कहीं गिर गया था। उसने दर्द को सहते हुए ज़मीन में अपने हाथ चलाए। शायद वो अपनी पिस्तौल ढूंढ रहा था। ये देख कर मैं फ़ौरन ही उसके क़रीब पहुंचा और उसके सिर पर किसी जिन्न की तरह खड़ा हो गया।

"मुद्दत हुई पर्दानशीं की पर्दादारी देखते हुए।" मैंने शायराना अंदाज़ में कहा____"हसरत है कि अब दीदार-ए-जमाले-यार हो।"

कहने के साथ ही मैंने हाथ बढ़ा कर एक झटके में उसके सिर से शाल को उलट दिया। मेरे ऐसा करते ही उसने बड़ी तेज़ी से अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। ये देख कर मैं मुस्कुराया और अगले ही पल मैंने अपना एक पैर उसकी जांघ के उस हिस्से में रख कर दबा दिया जहां पर गोली लगने से ज़ख्म बन गया था। ज़ख्म में पैर रख कर जैसे ही मैंने दबाया तो वो साया दर्द से हलक फाड़ कर चिल्ला उठा।

"शायद तुमने ठीक से हमारा शेर नहीं सुना।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"अगर सुना होता तो हमारी नज़रों से अपनी मोहिनी सूरत यूं नहीं छुपाते।"

कहने के साथ ही मैंने अपने पैर को फिर से उसके ज़ख्म पर दबाया तो वो एक बार फिर से दर्द से चिल्ला उठा। इस बार उसके चिल्लाने से मुझे उसकी आवाज़ जानी पहचानी सी लगी। उधर वो अभी भी अपना चेहरा दूसरी तरफ किए दर्द से छटपटाए जा रहा था और मैं सोचे जा रहा था कि ये जानी पहचानी आवाज़ किसकी हो सकती है? मुझे सोचने में ज़्यादा समय नहीं लगा। बिजली की तरह मेरे ज़हन में उसका नाम उभर आया और इसके साथ ही मैं चौंक भी पड़ा।



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अध्याय - 70

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"शायद तुमने ठीक से हमारा शेर नहीं सुना।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"अगर सुना होता तो हमारी नज़रों से अपनी मोहिनी सूरत यूं नहीं छुपाते।"

कहने के साथ ही मैंने अपने पैर को फिर से उसके ज़ख्म पर दबाया तो वो एक बार फिर से दर्द से चिल्ला उठा। इस बार उसके चिल्लाने से मुझे उसकी आवाज़ जानी पहचानी सी लगी। उधर वो अभी भी अपना चेहरा दूसरी तरफ किए दर्द से छटपटाए जा रहा था और मैं सोचे जा रहा था कि ये जानी पहचानी आवाज़ किसकी हो सकती है? मुझे सोचने में ज़्यादा समय नहीं लगा। बिजली की तरह मेरे ज़हन में उसका नाम उभर आया और इसके साथ ही मैं चौंक भी पड़ा।


अब आगे....

गांव से बाहर एक बड़े से पेड़ के पास पहुंचते ही सफ़ेदपोश ने जगन को रुकने को कहा तो जगन रुक गया। वो बुरी तरह हांफ रहा था और उसी के जैसे सफ़ेदपोश भी हांफ रहा था। यूं तो हल्के अंधेरे में जगन को उसकी कोई प्रतिक्रिया ठीक से समझ नहीं आ रही थी किंतु उसने इतना ज़रूर महसूस किया था कि सफ़ेदपोश उससे तेज़ नहीं भाग पा रहा था। बहरहाल, वो इसी बात से बेहद खुश था कि उस सफ़ेदपोश ने उसे दादा ठाकुर की क़ैद से निकाल लिया है। एक तरह से उसने उसकी जान बचा ली थी वरना वो तो अब यही समझ चुका था कि कल का दिन उसकी ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा।

"आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने मेरी जान बचा ली।" जगन ने हांफते हुए सफ़ेदपोश की तरफ देख कर कहा____"मैं जीवन भर अब आपकी गुलामी करूंगा।"

"अगर तुम ऐसा समझते हो।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"तो ये भी समझते होगे कि तुम्हें ये जो नई ज़िंदगी मिली है उस पर सबसे ज़्यादा अब हमारा अधिकार है।"

"बिल्कुल है मालिक।" जगन ने सफ़ेदपोश को मालिक शब्द से संबोधित करते हुए कहा____"आपने मेरी जान बचा कर मुझे नई ज़िंदगी दी है इस लिए मेरी इस ज़िंदगी में अब आपका ही हक़ है। अब से आप मेरे मालिक हैं और मैं आपका गुलाम जो आपके हर हुकुम का बिना सोचे समझे पालन करेगा।"

"बहुत बढ़िया।" सफ़ेदपोश ने कहा____"अगर तुम हमारे हर हुकुम का पालन करोगे तो यकीन करो आज के बाद तुम्हारे अपने बीवी बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी हम ख़ुद लेते हैं। उन्हें अब किसी भी चीज़ का अभाव नहीं होगा।"

"आपका बहुत बहुत शुक्रिया मालिक।" जगन इस बात से बेहद खुश और बेफ़िक्र सा हो गया, बोला____"आप सच में बहुत महान हैं। मुझे हुकुम दीजिए कि अब मुझे क्या करना है?"

"तुम्हें इसी वक्त माधोपुर की तरफ जाना है।" सफ़ेदपोश ने कहा____"हमारा ख़याल है कि माधोपुर के रास्ते में ही कहीं तुम्हें वैभव सिंह मिलेगा। तुम्हारा काम उसको जान से मार डालना है। क्या तुम ये कर सकोगे?"

"मैं आपके इस हुकुम को अपनी जान दे कर भी पूरा करुंगा मालिक।" जगन वैभव का नाम सुन कर अंदर ही अंदर कांप गया था किंतु अपनी घबराहट को छुपाते हुए बड़ी ही गर्मजोशी से बोला____"और अगर उसके साथ कोई और भी हुआ तो उसको भी जान से मार दूंगा।"

"बहुत बढ़िया।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"हम उम्मीद करते हैं कि कल का सूरज वैभव सिंह की मौत का पैग़ाम ले कर ही उदय होगा। अगर तुम सच में उसको मारने में कामयाब हुए तो तुम्हें उपहार के रूप में मुंह मांगी मुराद मिलेगी।"

"धन्यवाद मालिक।" जगन मन ही मन गदगद होते हुए बोला।

"इसे अपने पास रखो।" सफ़ेदपोश ने अपने लिबास के अंदर से एक पिस्तौल निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा____"इसके माध्यम से तुम्हें वैभव सिंह को जान से मारने में आसानी होगी। अब तुम जाओ।"

सफ़ेदपोश से पिस्तौल ले कर जगन ने अदब से सिर झुका कर सफ़ेदपोश को सलाम किया और पलट कर तेज़ी से एक तरफ को बढ़ता चला गया। कुछ ही पलों में वो अंधेरे में गायब हो गया। उसके जाने के बाद सफ़ेदपोश पलटा और वो भी उसी की तरह कुछ ही देर में अंधेरे में कहीं गायब हो गया।

✮✮✮✮

मैं चौंकने के बाद सोच में डूब ही गया था कि तभी अचानक मैं लड़खड़ा कर गिर गया। ज़मीन पर पड़े साए ने मेरा पैर पकड़ कर उछाल दिया था। मुझे उससे ऐसी हरकत की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी इस लिए मैं इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। कच्ची ज़मीन पर गिरते ही मैं बिजली की सी तेज़ी से उठ कर खड़ा हो गया। तभी मेरी नज़र साए पर पड़ी जो अपने दर्द को सहते हुए मुझे दबोचने के लिए मुझ पर झपट ही पड़ा था। इससे पहले कि वो मुझ तक पहुंचता मैंने दाएं घुटने का वार उसके जबड़े में किया तो वो दर्द से बिलबिलाते हुए एक तरफ को उलट गया।

"लगता है मरने की बहुत ही जल्दी है तुझे।" मैंने उसके पास पहुंचते ही उसकी ज़ख्म वाली जांघ पर पैर की ठोकर मारते हुए कहा तो वो एक बार फिर से दर्द से चिल्ला उठा। इधर झुक कर मैंने उसकी गर्दन को पीछे से अपने हाथ की कैंची बना कर दबोच लिया और फिर गुर्राते हुए बोला____"तेरे जैसे नामर्द ठाकुर वैभव सिंह को मारने के ख़्वाब कब से देखने लगे? वैसे मुझे शक तो था लेकिन यकीन नहीं कर पा रहा था कि तू ऐसा कुछ कर सकता है।"

"तेरे जैसे मंद बुद्धि वाले लोग सोच भी नहीं सकते वैभव सिंह।" साया दर्द में भी नफ़रत से गुर्राया____"तू तो बस दूसरो की बहू बेटियों की इज्ज़त लूटना ही जानता है। ये उसी का परिणाम है कि आज तुम सब इस हाल में पहुंच गए हो।"

"मान लिया कि मुझे सिर्फ दूसरो की बहू बेटियों की इज्ज़त लूटना ही आता है।" मैंने उसी लहजे में कहा___"मगर ठाकुर वैभव सिंह उस जियाले का नाम है जो अपना हर काम डंके की चोट पर करता है। तेरे जैसे नामर्द तो छुप कर ही वार करते हैं।"

मेरी बात सुन कर साया बुरी तरह कसमसा कर रह गया। इधर मैं उसकी बेबसी को देखते हुए बोला___"ख़ैर ये तो बता क्या तेरी बीवी भी इस खेल में शामिल है?"

"नहीं।" साया ढीला पड़ते हुए बोला____"होगी भी कैसे? उसे तो तेरा मोटा लंड मिल रहा था। बुरचोदी बड़े मज़े से तुझसे चुदवाती थी। मैंने और मेरे बापू ने लोगों से सुना तो था पर यकीन नहीं था कि दादा ठाकुर का पूत मेरे ही घर की इज्ज़त को इस तरह लूट सकता है। एक दिन जब मैंने अपनी आंखों से देख लिया तो यकीन करना ही पड़ा। रजनी पर गुस्सा तो बहुत आया था मुझे, जी किया कि जान से मार दूं उसे लेकिन फिर सोचा कि क्यों न उसी के हाथों उसके यार को मरवाया जाए। मैंने एक दिन धर लिया उसे और उससे खुल कर पूछा। पहले तो साली मुकर रही थी और कह रही थी कि मैं बेवजह ही अपनी बीवी पर ऐसा घटिया आरोप लगा रहा हूं। फिर जब मैंने तबीयत से उसको कूटना शुरू किया तो जल्दी ही क़बूल कर लिया उसने। तब मैंने कहा कि अब वो वही करे जो मैं कहूं, अगर उसने ऐसा नहीं किया तो मैं उसे बेइज्ज़त कर के घर से निकाल दूंगा। उसके मायके में भी सबको बता दूंगा कि वो पूरे गांव के मर्दों का बिस्तर गरम करती है। मेरी इस धमकी से वो डर गई थी इस लिए उसने वो सब कुछ करना मंज़ूर कर लिया जो करने के लिए मैं उसे बोल रहा था।"

"अपनी बीवी के हाथों।" मैंने बीच में ही उसे टोकते हुए कहा____"तू किस तरह मुझे मरवा देना चाहता था?"

"तू जब अपनी हवस मिटाने के लिए मेरे घर आता।" रघुवीर ने नफ़रत से कहा____"तो वो मेरे कहे अनुसार तेज़ धार वाले खंज़र से तेरा गला चीर देती। उसके बाद मैं तेरी लाश को सबकी नज़रों से छुपा कर कहीं दफ़ना देता।"

"वाह! बहुत खूब।" मैं उसकी बात सुन कर हल्के से मुस्कुराया, फिर बोला____"अगर तेरा यही मंसूबा था तो फिर तूने अपने इस मंसूबे को पूरा क्यों नहीं किया?"

"हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे कि ऐसा कुछ करने का मौका ही नहीं मिल सका मुझे।" रघुवीर ने जैसे अफ़सोस जताते हुए कहा____"दूसरी बात ये भी कि उसके बाद से तू भी मेरे घर नहीं आया। मैं तो हर रोज़ तेरे आने की राह देखता था। इधर हालात कुछ ऐसे हो गए कि तू अपने बाप चाचा और भाई के साथ किसी और ही काम में उलझ गया। इसी बीच मुझे और बापू को एक और बात पता चली।"

"कौन सी बात?" मेरे माथे पर शिकन उभरी।

"मेरा मंसूबा पूरा नहीं हो पा रहा था इस लिए मैं बेहद गुस्से में था।" रघुवीर ने कहा____"और इसी गुस्से में मैंने एक दिन रजनी को फिर से कूटना शुरू कर दिया तो उसके मुख से अंजाने में ही कुछ ऐसा निकल गया जो मेरी कल्पनाओं में भी नहीं था।"

"क्या मतलब??" मैं पूछे बग़ैर न रह सका____"ऐसा क्या निकल गया था तेरी बीवी के मुख से?"

"शायद वो मेरे द्वारा बेमतलब कूटे जाने से गुस्से में आ गई थी।" रघुवीर ने कहा____"इसी लिए उसने गुस्से में मुझसे कहा कि मैं सिर्फ उसे ही क्यों मार रहा हूं जबकि मेरी मां के भी तो तेरे साथ उसी के जैसे संबंध हैं। रजनी के मुख से ये सुन कर मैं एकदम से सुन्न सा पड़ गया था। मुझे लगा वो मेरी मां पर झूठा इल्ज़ाम लगा रही है इस लिए मैंने गुस्से में उसे फिर से कूटना शुरू कर दिया तो उसने कहा कि अगर मुझे यकीन नहीं है तो मैं खुद जा कर अपनी मां से इस बारे में पूछ लूं।"

"तो फिर तुमने अपनी मां से पूछा?" रघुवीर एकदम से चुप हो गया तो मैंने उत्सुकतावश उससे पूछ ही लिया।

"हिम्मत तो नहीं पड़ रही थी लेकिन मेरे अंदर गुस्सा भी था इस लिए जैसे ही मां गांव से आई तो मैंने उससे पूछ लिया।" रघुवीर ने कहा____"पहले तो मां मेरे मुख से ऐसी बातें सुन कर गुस्सा होते हुए मुझ पर खूब चिल्लाई मगर जब मैंने दहाड़ते हुए उसको मारने दौड़ा तो वो डर गई। ऊपर से रजनी भी आ गई और मेरे सामने ही मां को बताने लगी कि उसे सब पता है कि कैसे वो तेरे साथ अकेले में गुलछर्रे उड़ाती है। रजनी की बात सुन कर मां से कुछ कहते ना बन पड़ा था। मैं समझ गया कि रजनी मां के बारे में सच बोल रही है। मुझे इतना ज़्यादा गुस्सा आया कि मैं मां को मारने के लिए दौड़ पड़ा उसकी तरफ मगर तभी बापू की आवाज़ सुन कर रुक गया।"

"यानि इस सबकी वजह से तेरे बाप को भी सब पता चल गया?" मैंने पूछा तो उसने कहा____"उन्हें ये सब पहले से ही पता था किंतु ये बात उनके लिए भी हैरान कर देने वाली थी कि उनकी बूढ़ी बीवी ने अपने बेटे समान लड़के से यानि तुझसे ऐसा गंदा संबंध बनाया हुआ है। उस दिन बापू का गुस्सा भी सातवें आसमान पर पहुंच गया और फिर उनके अंदर वर्षों से जो कुछ दबा हुआ था वो सब गुस्से में निकल गया।"

"ऐसा क्या था तेरे बाप के अंदर?" मैंने भारी उत्सुकता के साथ पूछा____"जो वर्षों से दबा हुआ था?"

"उस दिन उन्हीं के मुख से मुझे पता चला कि मेरी मां का हवेली से बहुत पुराना संबंध रहा है।" रघुवीर ने कहा____"बड़े दादा ठाकुर अपने मुंशी यानि मेरे बाप की बीवी को अपनी रखैल बनाए हुए थे।"

रघुवीर के मुख से ये सुनते ही मेरे पिछवाड़े से धरती गायब हो गई। साला मुंशी की बीवी प्रभा तो छुपी रुस्तम थी। मेरे दादा जी यानी बड़े दादा ठाकुर की रखैल थी वो और उनके बाद उनके पोते यानि मेरे साथ मज़े कर रही थी। मेरा तो ये सोचते ही सिर चकराने लगा था। तभी मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि क्या प्रभा के ऐसे संबंध मेरे अपने पिता से भी हो सकते हैं? इस ख़याल ने मेरे जिस्म में झुरझरी सी पैदा कर दी। मुझे अपने पिता पर यकीन तो नहीं हुआ मगर ये सब सुन कर यही लगने लगा कि कुछ भी हो सकता है।

"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है।" फिर मैंने रघुवीर से कहा____"लेकिन ये समझ नहीं आया कि जब तेरे बाप को अपनी बीवी के बारे में पहले से ही सब पता था तो वो इतने वर्षों से चुप क्यों था? क्या तेरे बाप का खून इतने वर्षों में कभी नहीं खौला?"

"उस दिन गुस्से में मैंने भी बापू से यही सब कहा था।" रघुवीर ने कहा____"जवाब में बापू ने यही कहा कि वो कुछ नहीं कर सकते थे। असल में बापू का ब्याह बड़े दादा ठाकुर ने ही मां से करवाया था। जब बापू को बड़े दादा ठाकुर के साथ अपनी बीवी के संबंधों का पता चला तो वो बहुत ख़फा हुए थे मां से। पूछने पर मां ने बताया था कि बड़े दादा ठाकुर से उनके संबंध तब से हैं जब उनका बापू से ब्याह भी नहीं हुआ था। मैंने भी लोगों से ही सुना था कि बड़े दादा ठाकुर ऐसे ही ठरकी आदमी थे। उन्हें जो भी लड़की या औरत पसंद आ जाती थी उसे वो फ़ौरन ही अपने हरम में पेश करवा लेते थे। दूर दूर तक के लोगों में उनका ख़ौफ था इस लिए कोई उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जा भी नहीं सकता था। यही वजह थी कि मेरे बापू कभी इस बारे में कुछ नहीं कर सके थे। जब बड़े दादा ठाकुर की मृत्यु हुई तब मेरे बापू ये सोच कर खुश हुए थे कि ऊपर वाले ने उनकी सुन ली और बड़े दादा ठाकुर जैसे पापी को उसके अपराध के चलते मौत मिल गई। बड़े दादा ठाकुर के बाद तेरे पिता दादा ठाकुर बन कर गद्दी पर बैठे। दादा ठाकुर के बारे में बापू बचपन से जानते थे इस लिए उन्होंने ये सोच कर कभी बदला लेने का नहीं सोचा कि वो अपने पिता के जैसे नहीं हैं। बस उसके बाद वो हमेशा शांत ही रहे और दादा ठाकुर की सेवा करते रहे मगर उस दिन जब उन्हें पता चला कि बड़े दादा ठाकुर के बाद बड़े दादा ठाकुर के पोते ने उनकी बीवी को अपनी हवस का शिकार बना लिया है तो उनके पुराने ज़ख्म फिर से ताज़ा हो गए।"

"वाह! काफी दिलचस्प कहानी है।" मैंने कहा____"मगर इस कहानी से मैं बस यही समझा हूं कि तेरा बापू एक नंबर का चूतिया और डरपोक आदमी था। बड़ी हैरत की बात है कि उसे अपनी बीवी के बारे में शुरू से सब पता था इसके बावजूद कभी उसका खून नहीं खौला। बड़े दादा ठाकुर के ख़ौफ ने उसके खून को पानी बना के रख दिया था। चलो मान लिया कि वो बड़े दादा ठाकुर का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था मगर क्या वो अपनी बीवी का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता था? अरे! ऐसी बेवफ़ा बीवी को कभी भी वो ज़हर दे कर मार सकता था मगर नहीं उसने सब कुछ सह लिया और वर्षों तक कायरों का तमगा लिए घूमता रहा। ख़ैर, तो उस दिन तेरे बापू का पानी बना खून फिर से खून में तब्दील हुआ जिस दिन उसे ये पता चला कि उसकी बीवी ही नहीं बल्कि उसकी बहू भी मेरे साथ मज़े कर रही है?"

"हां।" रघुवीर ने जैसे क़बूल किया____"हम दोनों बाप बेटे इस सबसे बहुत दुखी थे। ये कैसी अजीब बात थी कि हम दोनों बाप बेटे की बीवियां तेरे साथ संबंध बनाए हुए थीं और हम नामर्द से बन गए थे। उसी दिन मैंने और बापू ने मिल कर ये फ़ैसला कर लिया था कि अब चाहे जो हो जाए इसका बदला हम ले कर रहेंगे।"

अभी मैं रघुवीर की बात सुन कर उससे कुछ कहने ही वाला था कि तभी एक तरफ से अजीब सी आवाज़ हुई जिसे सुन कर मैं चौंक पड़ा। पलट कर मैंने दूर दूर तक अंधेरे में नज़र दौड़ाई मगर अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया। मैंने गौर किया कि आवाज़ स्वाभाविक रूप से नहीं हुई थी। मैं एकदम से सतर्क हो गया। वैसे भी इस समय हालात अच्छे नहीं थे। मैंने रघुवीर को छोड़ा और इससे पहले कि वो कुछ कर पाता मैंने तेज़ी से रिवॉल्वर के दस्ते का वार उसकी कनपटी के खास हिस्से पर कर दिया। रघुवीर के मुख से घुटी घुटी सी चीख निकली और अगले कुछ ही पलों में वो अपने होश खोता चला गया। उसके बेहोश होते ही मैंने उसके जिस्म को उठा कर अपने कंधे पर डाला और अंधेरे में एक तरफ को बढ़ता चला गया।

✮✮✮✮

कुसुम अपनी भाभी के बिस्तर पर गहरी नींद में सो ही रही थी कि तभी किसी के द्वारा ज़ोर ज़ोर से हिलाए जाने पर उसकी आंख खुल गई। वो हड़बड़ा कर उठी और फिर बदहवास हालत में उसने इधर उधर देखा तो जल्दी ही उसकी नज़र अपने एकदम पास झुकी रागिनी पर पड़ी।

"भ...भाभी आप?" कुसुम एकदम से चौंकते हुए बोली____"क्या हुआ, आप इस तरह खड़ी क्यों हैं? सोई नहीं आप?"

"नींद ही नहीं आ रही थी मुझे।" रागिनी ने बुझे मन से कहा____"इस लिए तुम्हें सोता देख मैं कमरे से बाहर चली गई थी। बाहर गई तो मेरे मन में वैभव का ख़याल आ गया। वो पहले भी बहुत देर तक मेरे पास ही सिरहाने पर बैठा हुआ था। उसे भी नींद नहीं आ रही थी। मैंने उसे आराम करने के लिए भेजा था तो सोचा देखूं वो आराम कर रहा है या अभी भी जाग रहा है? जब मैं उसके कमरे में पहुंची तो देखा वहां उसके कमरे में बिस्तर पर विभोर सो रहा था जबकि वैभव नहीं था?"

"क...क्या???" कुसुम अपनी भाभी की बात सुन कर बुरी तरह चौंकी____"ये क्या कह रही हैं आप? वैभव भैया अपने कमरे में नहीं थे?"

"हां कुसुम।" रागिनी ने सहसा चिंतित भाव से कहा____"वो अपने कमरे में नहीं था। अब तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे वो हवेली से चला गया है, शायद मेरी शर्त पूरी करने।"

"श...शर्त...पूरी करने???" कुसुम का जैसे दिमाग़ ही चकरा गया____"ये सब आप क्या कह रही हैं भाभी? मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"

रागिनी ने संक्षेप में कुसुम को वो बातें बता दी जो उसकी और वैभव के बीच हुईं थी। सारी बातें सुन का कुसुम के चेहरे पर भी चिंता की लकीरें उभर आईं।

"अब क्या होगा भाभी?" कुसुम घबराए हुए भाव से बोली____"कहीं वैभव भैया सच में ही न आपकी शर्त पूरी करने चले गए हों मगर उन्हें रात के इस वक्त हवेली से बाहर नहीं जाना चाहिए था।"

"यही तो मैं भी सोच रही हूं कुसुम।" रागिनी ने चिंतित और परेशान भाव से कहा____"उसे मेरी शर्त को पूरा करने के लिए इस तरह का पागलपन नहीं दिखाना चाहिए था। अगर उसे कुछ हो गया तो उसकी ज़िम्मेदार मैं ही तो होऊंगी। अगर हवेली में किसी को इस बारे में पता चला तो कोई भी मुझे माफ़ नहीं करेगा। कोई क्या मैं ख़ुद अपने आपको कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगी।"

कहने के साथ ही रागिनी की आंखें छलक पड़ीं। ये देख कुसुम झट से उठी और रागिनी को बिस्तर पर बैठा कर उसे दिलासा देने लगी।

"शांत हो जाइए भाभी।" फिर उसने कहा____"वैभव भैया को कुछ नहीं होगा। भगवान इतना भी बेरहम नहीं हो सकता कि वो हम सबको एक ही दिन में इतना सारा दुख दे दे।"

"कौन भगवान? कैसा भगवान कुसुम?" रागिनी ने हताश भाव से कहा____"नहीं, कहीं कोई भगवान नहीं है। सब झूठ है। ये सब लोगों का फैलाया हुआ अंधविश्वास है। अगर सच में कहीं भगवान होता तो अपने होने का कोई तो सबूत देता। जब से मैंने होश सम्हाला है तब से उसकी पूजा आराधना करती आई हूं मगर क्या किया भगवान ने? नहीं कुसुम, सच तो यही है कि इस दुनिया में भगवान जैसा कुछ है ही नहीं। आज मैं भी एक वादा करती हूं कि अगर इस भगवान ने वैभव के साथ कुछ भी बुरा किया तो मैं अपने हाथों से हवेली में मौजूद भगवान की हर मूर्ति को उठा कर हवेली से बाहर फेंक दूंगी।"

"ऐसा मत कहिए भाभी।" रागिनी की बातें सुन कर कुसुम के समूचे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई, बोली____"आपकी ज़ुबान पर इतनी कठोर बातें ज़रा भी अच्छी नहीं लगती। यकीन कीजिए वैभव भैया के साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। अब चलिए आराम कीजिए आप।"

कुसुम ने ज़ोर दे कर रागिनी को बिस्तर पर लिटा दिया और खुद किनारे पर बैठी जाने किन ख़यालों में खो गई। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन कमरे के अंदर मौजूद दो इंसानों के अंदर जैसे कोई आंधी सी चल रही थी।






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अध्याय - 71

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"ऐसा मत कहिए भाभी।" रागिनी की बातें सुन कर कुसुम के समूचे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई, बोली____"आपकी ज़ुबान पर इतनी कठोर बातें ज़रा भी अच्छी नहीं लगती। यकीन कीजिए वैभव भैया के साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। अब चलिए आराम कीजिए आप।"

कुसुम ने ज़ोर दे कर रागिनी को बिस्तर पर लिटा दिया और खुद किनारे पर बैठी जाने किन ख़यालों में खो गई। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन कमरे के अंदर मौजूद दो इंसानों के अंदर जैसे कोई आंधी सी चल रही थी।


अब आगे....

जगन हल्के अंधेरे में बढ़ता ही चला जा रहा था। आसमान में काले बादल न होते तो कदाचित इतना अंधेरा न होता क्योंकि थोड़ा सा ही सही मगर आसमान में चांद ज़रूर था जिसकी रोशनी अंधेरे को दूर कर देती थी। कुछ देर पहले उसने गोली चलने की आवाज़ सुनी थी। गोली चलने की आवाज़ से वो डर तो गया था लेकिन सफ़ेदपोश के हुकुम का पालन करना उसके लिए हर कीमत पर अनिवार्य था। जिस तरफ उसने गोली चलने की आवाज़ सुनी थी उसी तरफ वो बढ़ चला था। अभी कुछ ही देर पहले उसे ऐसा लगा था जैसे कुछ दूरी पर दो लोग बातें कर रहे हैं। रात के सन्नाटे में उसे आवाज़ें साफ सुनाई दी थीं इस लिए वो तेज़ी से उस तरफ बढ़ता चला गया था मगर फिर अचानक से आवाज़ें आनी बंद हो गईं।

आसमान में मौजूद चांद के वजूद से थोड़ी देर के लिए बादल हटे तो रोशनी में उसने दो सायों को देखा। इसके पहले वो क़दम दर क़दम चल रहा था किंतु अब उसने दौड़ लगा दी थी। उसके हाथ में पिस्तौल थी इस लिए उसे किसी का डर नहीं लग रहा था। जल्दी ही वो उन सायों के क़रीब पहुंच गया और अगले ही पल वो ये देख कर चौंका कि वो असल में एक ही साया था। जगन ने स्पष्ट देखा कि साया अपनी पीठ पर कोई भारी चीज़ को ले रखा था और बड़े तेज़ क़दमों से आगे बढ़ता ही चला जा रहा था। ये देख जगन और भी तेज़ी से उसकी तरफ दौड़ने लगा। अचानक ही अंधेरा हो गया, जाहिर है काले बादलों ने फिर से थोड़े से चमकते चांद को ढंक लिया था।

जगन दौड़ते दौड़ते बुरी तरह हांफने लगा था। जैसे ही अंधेरा हुआ तो उसे वो साया दिखना बंद हो गया। इसके बावजूद वो आगे बढ़ता रहा। कुछ ही देर में उसे आस पास कई सारे पेड़ नज़र आने लगे। उसने एक जगह रुक कर इधर उधर निगाह दौड़ाई मगर वो साया उसे कहीं नज़र न आया। जगन एकदम से बेचैन और परेशान हो गया। हाथ में पिस्तौल लिए अभी वो परेशानी की हालत में इधर उधर देख ही रहा था कि अचानक वो एक तरफ हुई आहट से बुरी तरह चौंका। मारे घबराहट के उसने एकदम से उस तरफ हाथ कर के गोली चला दी। गोली चलने की तेज़ आवाज़ से फिज़ा गूंज उठी और खुद जगन भी बुरी तरह खौफ़जदा हो गया। उधर गोली चलने पर आवाज़ तो हुई मगर उसके अलावा कोई प्रतिक्रिया ना हुई। ये देख वो और भी परेशान हो गया।

जगन अपनी समझ में बेहद चौकन्ना था जबकि असल में वो घबराहट की वजह से घूम घूम कर इधर उधर नज़रें दौड़ा रहा था। इतना तो वो समझ गया था कि वो साया यहीं कहीं है। उसे डर भी था कि कहीं वो उसे कोई नुकसान न पहुंचा दे किंतु फिर वो ये सोच कर खुद को तसल्ली दे लेता था कि उसके पास पिस्तौल है। अभी वो ये सोच ही रहा था कि तभी एक तरफ से गोली चलने की तेज़ आवाज़ गूंजी और इसके साथ ही उसके हलक से दर्द भरी चीख वातावरण में गूंज उठी। गोली उसकी कलाई में लगी थी जिससे उसके हाथ से पिस्तौल छूट कर कच्ची ज़मीन पर ही कहीं छिटक कर गिर गई थी। वो दर्द से बुरी तरह चिल्लाने लगा था।

"मादरचोद कौन है जिसने मुझे गोली मार दी?" वो दर्द में गुस्सा हो कर चिल्लाया___"सामने आ हरामजादे।"

"ये तो कमाल ही हो गया जगन काका।" जगन की आवाज़ सुन कर मैं बड़ा हैरान हुआ था। मेरी समझ में तो वो हवेली के बाहर वाले एक कमरे में क़ैद था। बहरहाल मैं एक पेड़ से बाहर निकल कर उसकी तरफ बढ़ते हुए बोला____"बल्कि कमाल ही नहीं, ये तो चमत्कार ही हो गया। तुम तो हवेली के एक कमरे में क़ैद थे न, फिर यहां कैसे टपक पड़े?"

मुझे एकदम से अपने सामने आ गया देख जगन की नानी ही नहीं बल्कि उसका पूरा का पूरा खानदान ही मर गया। वो अपनी कलाई को थामें दर्द से कराह रहा था। मैं एकदम से किसी जिन्न की तरह उसके सामने आ कर खड़ा हो गया।

"तुमने जवाब नहीं दिया काका?" मैंने क़रीब से उसकी आंखों में देखते हुए पूछा____"हवेली से बाहर कैसे निकले और यहां कैसे टपक पड़े?"

"व...व....वो मैं।" जगन बुरी तरह हकलाया, उससे आगे कुछ बोला ना गया।

"अभी तो बड़ा गला फाड़ कर गाली दे रहे थे तुम।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"अब क्या हुआ?"

मेरी बात सुन कर जगन मुझसे नज़रें चुराने लगा। उसका जिस्म जूड़ी के मरीज़ की तरह कांपने लगा था। उधर उसकी कलाई में जहां पर गोली लगी थी वहां से खून बहते हुए नीचे ज़मीन पर गिरता जा रहा था।

"मादरचोद बोल वरना इस बार तेरी गांड़ में गोली मारूंगा।" उसे कुछ न बोलता देख मैं गुस्से से दहाड़ उठा____"हवेली के कमरे से बाहर कैसे निकला तू और यहां कैसे पहुंचा?"

"म...म...माफ़ कर दो छोटे ठाकुर।" जगन एकदम से मेरे पैरों में गिर पड़ा, फिर गिड़गिड़ाते हुए बोला___"बहुत बड़ी ग़लती हो गई मुझसे।"

"मैंने जो पूछा उसका जवाब दे बेटीचोद।" मैंने गुस्से में उसको एक लात मारी तो वो पीछे उलट गया। फिर किसी तरह वो सम्हल कर उठा और बोला____"मुझको सफ़ेदपोश ने हवेली के कमरे से बाहर निकाला है छोटे ठाकुर और यहां भी मैं उसके ही कहने पर आया हूं।"

"स..सफ़ेदपोश???" मैं जगन के मुख से ये सुन कर बुरी तरह चकरा गया, फिर बोला____"वो वहां कैसे पहुंचा? सब कुछ बता मुझे।"

"म..मुझे कुछ नहीं पता छोटे ठाकुर।" जगन ने कहा____"मैं तो उस कमरे में ही क़ैद था। अचानक ही दरवाज़ा खुला तो मैं ये देख कर घबरा गया कि हाथ में मशाल लिए सफ़ेदपोश कैसे आ गया? उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में मुझे कमरे से बाहर निकल कर अपने साथ चलने को कहा तो मैं चल पड़ा। आख़िर अपनी जान मुझे भी तो प्यारी थी छोटे ठाकुर। सुबह दादा ठाकुर मुझे मौत की सज़ा देने वाले थे। जब सफ़ेदपोश ने मुझे अपने साथ चलने को कहा तो मैं समझ गया कि वो मुझे बचाने आया है। बस, यही सोच कर मैं उसके साथ वहां से निकल आया।"

"तो यहां उसी ने भेजा है तुझे?" मैं अभी भी ये सोच कर हैरान था कि सफ़ेदपोश हवेली में इतने दरबानों की मौजूदगी में जगन को निकाल ले गया था, बोला____"तुझे कैसे पता कि मैं यहां मिलूंगा तुझे?"

"मुझे नहीं पता छोटे ठाकुर।" जगन ने कहा____"वो तो सफ़ेदपोश ने मुझसे कहा कि आप मुझे यहीं कहीं मिल सकते हैं।"

कहने के साथ ही जगन ने सारी बात मुझे बता दी। मैं ये जान कर चौंका कि सफ़ेदपोश ने जगन को मुझे जान से मारने के लिए भेजा था। मेरे लिए ये बड़े ही हैरत की बात थी कि सफ़ेदपोश को इतना कुछ कैसे पता रहता है? आख़िर है कौन ये सफ़ेदपोश? क्या दुश्मनी है इसकी हमसे?

"उस दिन तो तुझे बड़ा अपने किए पर पछतावा हो रह था।" मैंने गुस्से से बोला____"और अब फिर से वही कर्म करने चल पड़ा है जिसके लिए तू दादा ठाकुर से रहम की भीख मांग रहा था। पर शायद तेरा कसूर नहीं है जगन काका। असल में तेरी किस्मत में मेरे हाथों मरना ही लिखा था। तभी तो घूम फिर कर तू इस तरीके से मेरे सामने आ गया। तुझ जैसे इंसान को अब जीने का कोई हक़ नहीं है।"

"मुझे माफ़ कर दो छोटे ठाकुर।" जगन ने रोते हुए मेरे पैर पकड़ लिए, बोला____"सफ़ेदपोश ने मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया था। तुम कहो तो मैं उसे ही जान से मार दूं?"

"तेरे जैसे लतखोर जो बात बात पर नामर्दों की तरह पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगते हैं।" मैंने रिवॉल्वर को उसके माथे पर लगाते हुए कहा____"वो सफ़ेदपोश जैसे शातिर इंसान का क्या ही उखाड़ लेंगे। तूने निर्दोष मुरारी काका की हत्या कर के उसके परिवार को अनाथ कर दिया है इस लिए अब तू भी उन्हीं के पास जा। शायद वो ही तुझे माफ़ कर दें.....अलविदा।"

कहने के साथ ही मैंने ट्रिगर दबा दिया। फिज़ा में गोली चलने की आवाज़ गूंजी और साथ ही जगन की जीवन लीला समाप्त हो गई। उसकी लाश को वहीं छोड़ मैं पलटा और उस तरफ चल पड़ा जिधर मैंने रघुवीर को रखा था। कुछ ही पलों में मैं उस पेड़ के पीछे पहुंच गया मगर अगले ही पल मैं ये देख कर चौंका कि वहां से रघुवीर गायब है। मैंने तो उसे बेहोश कर दिया था, फिर वो होश में कैसे आया? मेरे ज़हन में बड़ी तेज़ी से ये सवाल तांडव सा करने लगा।

अंधेरे में मैं उसे खोजने लगा। रघुवीर का मिलना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। अगर वो हाथ से निकल गया तो बहुत बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता था वो। इधर उधर खोजते हुए मैं सोचने लगा कि आख़िर कहां गया होगा वो? क्या सच में उसे होश आ गया रहा होगा या कोई और ही ले गया उसे? किसी और का सोचते ही मैं एकदम से परेशान हो गया। तभी बादलों ने चांद को आज़ाद किया तो थोड़ी रोशनी फैली जिससे दूर मुझे एक साया नज़र आया। उसे देख मैं तेज़ी से उस तरफ दौड़ पड़ा। कुछ ही देर में मैं उसके क़रीब पहुंच गया।

रघुवीर को मैंने उसकी जांघ पर गोली मारी थी इस लिए वो लंगड़ा कर चल रहा था। दर्द की वजह से वो ज़्यादा तेज़ नहीं चल पा रहा था। पीछे से किसी के आने की आहट सुन वो बुरी तरह उछल पड़ा और लड़खड़ा कर वहीं गिर गया।

"आज तो चमत्कार ही चमत्कार देखने को मिल रहे हैं भाई।" उसके सामने पहुंचते ही मैं बोला____"पहले जगन का हवेली के कमरे से बाहर आना ही नहीं बल्कि यहां मुझ तक पहुंच भी जाना और दूसरा तेरा होश में आ जाना। कमाल ही हो गया न? बहरहाल ये तो बता, तू इतना जल्दी होश में कैसे आया?"

"गोली चलने की आवाज़ से होश आया मुझे।" रघुवीर बोला____"जब मैंने देखा कि तुम जगन से बातें करने में व्यस्त हो तो मैं चुपके से खिसक गया।"

"बड़ा बेवफ़ा है यार तू।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अपने दुश्मन को अकेला ही छोड़ कर चला जा रहा था?"

रघुवीर मेरी बात सुन कर कुछ न बोला। बस कसमसा कर रह गया था। उसकी कसमसाहट पर मेरी मुस्कान और भी गहरी हो गई मगर फिर अचानक ही मुझे उसके किए गए कर्म याद आ गए जिसके चलते मेरे अंदर उसके प्रति गुस्सा उभर आया।

"आगे की कहानी सुनने के लिए ना तो अभी वक्त है और ना ही ये कोई माकूल जगह है।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"इस लिए तुझे एक बार फिर से बेहोशी की गहरी नींद में जाना होगा।"

इससे पहले कि रघुवीर मेरी बात सुन कर कुछ कर पाता मैंने बिजली की सी तेज़ी से रिवॉल्वर के दस्ते का वार उसकी कनपटी पर कर दिया। वातावरण में उसकी घुटी घुटी सी चीख गूंजी और इसके साथ ही वो बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया।

✮✮✮✮

"छ...छोटे कुंवर आप यहां??" भुवन ने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो बाहर अंधेरे में मुझे देख कर चौंकते हुए बोल पड़ा था____"ऐसे हालात में आपको इस तरह कहीं नहीं घूमना चाहिए।"

"हां मुझे पता है।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"अच्छा ये बताओ कि तुम अपने घर क्यों नहीं गए? बाकी लोग तो थे ही यहां पर।"

"आपने ही तो कहा था कि मैं मुरारी के घर वालों की सुरक्षा व्यवस्था का ख़याल रखूं।" भुवन ने कहा____"आज कल जिस तरह के हालात हैं उससे मैं नावाकिफ नहीं हूं। यही सोच कर मैं पिछले कुछ दिनों से रात में भी यहीं रुकता हूं और एक दो बार मुरारी के घर का चक्कर भी लगा आता हूं।"

"ये सब तो ठीक है भुवन।" मैं भुवन के इस काम से और उसकी ईमानदारी से मन ही मन बेहद प्रभावित हुआ, बोला____"लेकिन तुम्हें ख़ुद का भी तो ख़याल रखना चाहिए। आख़िर हालात तो तुम्हारे लिए भी ठीक नहीं हैं। मेरे दुश्मनों को भी पता ही होगा कि तुम मेरे आदमी हो और मेरे कहने पर कुछ भी कर सकते हो। ऐसे में वो तुम्हारी जान के भी दुश्मन बन जाएंगे।"

"मैं किसी बात से नहीं डरता छोटे कुंवर।" भुवन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"ख़ास कर किसी होनी या अनहोनी से तो बिल्कुल भी नहीं। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि जीवन में जिसके साथ जो भी होना लिखा है उसे कोई चाह कर भी मिटा नहीं सकता। ख़ैर आप बताइए इस वक्त मेरे लिए क्या हुकुम है?"

"कोई ख़ास बात नहीं है।" मैंने कहा____"बस एक दुश्मन मेरे हाथ लगा है तो मैं चाहता हूं कि आज रात भर के लिए उसे यहां पर रख दूं। कल दिन में मैं उसे ले जाऊंगा यहां से।"

"जैसी आपकी इच्छा।" भुवन ने कहा____"वैसे कौन है वो?"

"रघुवीर सिंह।" मैंने कहा____"मुंशी चंद्रकांत का बेटा।"

"क...क्या???" भुवन उछल ही पड़ा, बोला____"तो क्या वो भी इस सब में शामिल है? हे भगवान! ये सब क्या हो रहा है?"

"ज़्यादा मत सोचो।" मैंने कहा____"उसको यहां पर बाकी लोगों की नज़रों से छुपा कर ही रखना है। मैं नहीं चाहता कि बेवजह कोई तमाशा हो जाए और बाकी लोग घबरा जाएं।"

मेरी बात सुन कर भुवन ने सिर हिलाया और फिर मेरे कहने पर उसने रघुवीर को उठा कर मेरे नए बन रहे मकान के उस हिस्से में ले जा कर बंद कर दिया जिसे बाकी लोगों से छुपा कर बनवाया था मैंने। उसके बाद मैं और भुवन बाहर आ गए।

"क्या अब आप हवेली जा रहे हैं?" भुवन ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए पूछा तो मैंने कहा____"हां, हवेली जाना ज़रूरी है। वैसे भी पिता जी और बाकी लोग बाहर गए हुए हैं तो ऐसे में मेरा हवेली में रहना ज़रूरी है।"

"पर मैं रात के इस वक्त आपको अकेले नहीं जाने दूंगा।" भुवन ने चिंतित भाव से कहा____"मैं भी आपके साथ चलूंगा।"

"अरे! तुम मेरी फ़िक्र मत करो यार।" मैंने कहा____"मुझे किसी से कोई ख़तरा नहीं है और अगर है भी तो कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"

"अगर बात दिन की होती तो कोई बात नहीं थी छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"मगर ये रात का वक्त है। आसमान में बादल छाए हुए हैं जिसकी वजह से अंधेरा भी है। ऐसे में दुश्मन कहीं भी घात लगाए बैठा हो सकता है। इस लिए मेरी बात मानिए इस वक्त अकेले मत जाइए।"

"यहां भी तुम्हारे लिए रहना ज़रूरी है।" मैंने कहा____"दुश्मन कहीं भी घात लगाए बैठा हो सकता है। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता कि रघुवीर के साथ कोई अनहोनी हो जाए। उससे अभी बहुत कुछ जानना बाकी है।"

"उसकी आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए छोटे कुंवर।" भुवन ने पूरे आत्म विश्वास के साथ कहा____"उस तक कोई नहीं पहुंच पाएगा। मैं जानता हूं कि आपका हवेली में जाना ज़रूरी है इस लिए मैं आपको रोकूंगा नहीं किंतु अकेले जाने भी नहीं दूंगा। भगवान के लिए मेरी बात मान जाइए।"

"अच्छा ठीक है।" भुवन के ज़ोर देने पर आख़िर मुझे मानना ही पड़ा____"तुम भी चलो मेरे साथ किंतु किसी और को भी साथ ले लो वरना वापसी में तुम अकेले हो जाओगे। मैं भी तो नहीं चाहता कि तुम्हें कुछ हो जाए।"

भुवन मेरी बात मान गया। वो अंदर गया और एक आदमी को जगा कर ले आया। भुवन के कहने पर उस आदमी ने पानी से अपना चेहरा धोया ताकि उसका आलस और नींद दूर हो जाए। उसके बाद भुवन मोटर साईकिल ले कर चल पड़ा। उसने मोटर साइकिल को स्टार्ट नहीं किया था बल्कि उसे पैदल ही ठेलते हुए ले चला। मेरे पूछने पर उसने बताया कि ऐसा वो सावधानी के तौर पर कर रहा है। मुझे उसकी समझदारी पर बड़ा फक्र हुआ। क़रीब आधा किलो मीटर पैदल आने के बाद उसने मुझे मोटर साइकिल पर बैठाया और फिर मेरे पीछे एक दूसरा आदमी बैठा। उसके बाद भुवन ने मोटर साइकिल को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।

भुवन मेरा सबसे वफ़ादार आदमी था। वो मेरे लिए खुशी से अपनी जान दे सकता था। एक साल पहले मैंने उस पर एक उपकार किया था। उसकी बीवी बहुत ज़्यादा बीमार थी और वो उस वक्त शहर में उसका इलाज़ करवा रहा था। डॉक्टर के अनुसार उसकी बीवी को कोई ऐसी बीमारी थी जिसके लिए ज़्यादा रूपये लगने थे। भुवन के पास जो भी पैसा था वो पहले ही उसकी बीवी के इलाज़ में ख़र्च हो गया था। ये एक इत्तेफ़ाक ही था कि उसी समय मैं अपने दोस्त सुनील के साथ उस अस्पताल में गया हुआ था। भुवन की नज़र जब मुझ पर पड़ी तो वो दौड़ते हुए मेरे पास आया और मुझसे अपनी बीवी के इलाज़ के लिए पैसे मांगने लगा। मैं भुवन को जानता था क्योंकि वो हमारी ही ज़मीनों पर काम किया करता था। वो जिस तरह से रो रो कर पैसे के लिए मुझसे मिन्नतें कर रहा था उसे देख मैंने फ़ौरन ही उसे नोटों की एक गड्डी थमा दी थी और कहा था कि अगर और पैसों की ज़रूरत पड़े तो वो बेझिझक मुझसे मांग ले। बस, इतना ही उपकार किया था मैंने उसके ऊपर और कमबख़्त उसी उपकार के लिए उसने ख़ुद को मेरा कर्ज़दार मान लिया था। बाद में मैंने उसको बोला भी था कि उसे ऐसा नहीं सोचना चाहिए पर वो नहीं माना और बोला कि अब से वो मेरे लिए कुछ भी करेगा।

कुछ ही देर में भुवन की मोटर साईकिल हवेली पहुंच गई। रास्ते में कहीं कोई परेशानी जैसी बात नहीं हुई थी। मैं जब नीचे उतर कर हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ जाने लगा तो भुवन जल्दी से मेरे पीछे आया और मुझे रुकने को बोला।

"एक बात कहना चाहता हूं आपसे।" भुवन ने भारी झिझक के साथ कहा____"मैं जानता हूं कि उसके लिए ये समय सही नहीं है फिर भी कहना चाहता हूं।"

"कोई बात नहीं भुवन।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा___"तुम बेझिझक कहो, क्या कहना चाहते हो?"

"मुझे लगता है कि मुरारी की बेटी अनुराधा के मन में आपके लिए प्रेम जैसी भावना है।" भुवन ने झिझकते हुए कहा___"मैं जानता हूं कि वो अभी नादान और नासमझ है और आपसे उसका कोई मेल भी नहीं है। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उसे किसी भ्रम में मत रखिएगा। उस मासूम को मैंने दिल से अपनी छोटी बहन मान लिया है। अगर उसे किसी तरह की दुख तकलीफ़ हुई तो मुझे भी होगी। इस लिए....।"

"फ़िक्र मत करो भुवन।" मैंने उसकी बात को काटते हुए कहा____"तुमसे कहीं ज़्यादा मुझे उसके दुख तकलीफ़ की फ़िक्र है। अगर नहीं होती तो तुम्हें उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी न देता।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद छोटे कुंवर।" भुवन ने खुश हो कर कहा____"अच्छा अब मैं चलता हूं, नमस्कार।"

उसके जाने के बाद मैं भी आगे बढ़ चला। ज़हन में भुवन की ही बातें गूंज रहीं थी। ख़ैर, मुख्य द्वार पर मौजूद दरबानों ने मुझे देखते ही दरवाज़ा खोल दिया। मैं अंदर दाखिल हो कर जैसे ही बैठक के पास पहुंचा तो नाना जी और भैया के चाचा ससुर मुझे देखते ही खड़े हो गए।

"आ गया मेरा बच्चा।" नाना जी ने नम आंखों से देखते हुए मुझसे कहा____"बिना किसी को बताए कहां चले गए थे तुम? तुम्हें पता है हम सब यहां कितना घबरा गए थे?"

"चिंता मत कीजिए नाना जी।" मैंने कहा____"मैं ठीक हूं और जहां भी गया था कुछ न कुछ कर के ही आया हूं।"

"क...क्या मतलब??" नाना जी के साथ साथ बाकी लोग भी चौंके____"ऐसा क्या कर के आए हो तुम और तुम्हारे पिता जी लोग मिले क्या तुम्हें?"

उनके पूछने पर मैंने उन्हें आराम करने को कहा और इस बारे में कल बात करने का बोल कर अंदर चला गया। असल में मैं किसी को इस वक्त परेशान नहीं करना चाहता था। ये अलग बात है कि वो फिर भी परेशान ही नज़र आए थे। इधर मैं दो बातें सोचते हुए अंदर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। एक ये कि कल का दिन नरसिंहपुर के लिए कैसा होगा और दूसरी ये कि भुवन ने अनुराधा के संबंध में जो कुछ कहा था क्या वो सच था?



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अध्याय - 72

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उनके पूछने पर मैंने उन्हें आराम करने को कहा और इस बारे में कल बात करने का बोल कर अंदर चला गया। असल में मैं किसी को इस वक्त परेशान नहीं करना चाहता था। ये अलग बात है कि वो फिर भी परेशान ही नज़र आए थे। इधर मैं दो बातें सोचते हुए अंदर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। एक ये कि कल का दिन नरसिंहपुर के लिए कैसा होगा और दूसरी ये कि भुवन ने अनुराधा के संबंध में जो कुछ कहा था क्या वो सच था?

अब आगे....

पता नहीं रात का वो कौन सा पहर था किंतु मेरी आंखों से नींद कोसों दूर थी। मैं अपने कमरे में बिस्तर पर विभोर के बगल से लेटा हुआ था। विभोर गहरी नींद में था। तभी गहन सन्नाटे में कहीं दूर से उठता शोर सुनाई दिया। मेरे कान एकदम से उस शोर को ध्यान से सुनने के लिए मानों खड़े हो गए। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो शोर असल में कुछ लोगों के रोने धोने का है। मुझे समझते देर न लगी कि पिता जी जिस काम से इतने लोगों के साथ गए थे वो काम कर आए हैं। ये उसी का नतीजा था कि इतने वक्त बाद ये रोने धोने का शोर ख़ामोश वातावरण में गूंजने लगा था। अचानक ही मेरे ज़हन में कुछ सवाल उभर आए और उनके साथ ही कुछ ख़याल भी जिन्होंने मुझे थोड़ा विचलित सा कर दिया।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। रात के इस वक्त किसी दस्तक से मैं एकदम से सतर्क हो गया। बिस्तर से मैं बहुत ही सावधानी से उतरा और दबे पांव दरवाज़े के पास पहुंचा। कुंडी खोल कर जब मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर पिता जी को खड़े पाया।

"बैठक में आओ।" पिता जी ने सपाट लहजे में कहा____"कुछ बात करनी है तुमसे।"

"जी ठीक है।" मैंने कहा तो वो पलट कर चल दिए।

कुछ ही देर में मैं बैठक में पहुंच गया जहां पर बाकी सब लोग भी बैठे हुए थे। हवेली में जो लोग सो रहे थे वो जाग चुके थे, सिवाय अजीत और विभोर के।

"हमारी इजाज़त के बिना।" पिता जी ने सख़्त भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और बिना किसी को बताए आख़िर तुम हवेली से बाहर क्यों गए थे?"

"आप यहां थे नहीं इस लिए आपसे इजाज़त ले नहीं सका।" मैंने बेख़ौफ भाव से कहा____"और यहां किसी को बताता तो कोई मुझे बाहर जाने ही नहीं देता। अब क्योंकि मेरे लिए बाहर जाना ज़रूरी था इस लिए चला गया।"

"वैभव।" नाना जी ने नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"ये क्या तरीका है अपने पिता से बात करने का?"

"आप ही बताइए नाना जी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"कि ये सब बताने के लिए मुझे कौन सा तरीका अपनाना चाहिए था?"

"हमें तो ख़बर मिली थी कि तुम पहले से काफी बदल गए हो।" नाना जी ने उसी नाराज़गी से कहा____"लेकिन तुम तो अभी भी वैसे ही हो। ख़ैर क्या कह सकते हैं हम।"

"आख़िर कब तुम अपनी मनमानियां करना बंद करोगे?" पिता जी ने गुस्से से कहा____"क्या चाहते हो तुम? हम सबको ज़िंदा मार देना चाहते हो?"

"शांत हो जाइए ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा____"ये समय इन सब बातों का नहीं है।"

"अरे! कैसे नहीं है अर्जुन सिंह?" पिता जी ने कहा____"हम अपने दो जिगर के टुकड़ों को खो चुके हैं और ये जिस तरीके से यहां से बिना किसी को बताए चला गया था अगर इसे कुछ हो जाता तो? क्या फिर हम ज़िंदा रह पाते?"

"मैं समझता हूं ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने पिता जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"किंतु ये अच्छी बात है न कि वैभव के साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ। हम उम्मीद करते हैं कि अब से ये ऐसा नहीं करेगा।" कहने के साथ ही अर्जुन सिंह मुझसे मुखातिब हुए____"हम ठीक कह रहे हैं न वैभव बेटा?"

"जी चाचा जी।" मैंने सिर झुकाते हुए कहा____"और मैं माफ़ी चाहता हूं आप सबसे अपने बर्ताव के लिए। मैं जानता हूं कि मुझे इस तरह बाहर नहीं जाना चाहिए था किंतु उस वक्त मेरी भी मानसिक अवस्था ऐसी थी कि मुझे कुछ और सूझा ही नहीं। जब मुझे पता चला कि मेरे पिता जी रात के वक्त आप सबको ले कर चले गए हैं तो मैं ये सोच कर एकदम से घबरा गया था कि कहीं आप में से किसी के साथ कुछ हो न जाए। मैं अपने चाचा और बड़े भैया को खो चुका हूं चाचा जी, और अब मैं अपने पिता जी को नहीं खोना चाहता। मेरे अकेले चले जाने पर तो इन्होंने कह दिया कि मुझे कुछ हो जाता तो क्या होता लेकिन क्या आप में से किसी ने ये सोचा कि अगर मेरे पिता जी को कुछ हो जाता तो हम सबका क्या होता?"

मेरी ये बात सुन कर किसी के मुख से कोई अल्फाज़ न निकला। बात छोटे मुंह से भले ही निकली थी लेकिन थी बड़ी।

"आप सब तो मुझसे बड़े हैं।" मैंने सबको ख़ामोश देख कहा____"फिर भी किसी ने ये नहीं सोचा कि रात के वक्त इस तरह से हुजूम ले कर निकल पड़ना भला कौन सी समझदारी की बात थी? हमारा समय बहुत ख़राब चल रहा है चाचा जी। हमें नहीं पता कि हमारा कौन कौन दुश्मन है और कहां कहां से हम पर घात लगाए बैठा है? जगताप चाचा और बड़े भैया तो दिन के समय ढेर सारे आदमियों के साथ निकले थे इसके बावजूद दुश्मनों ने उन सबकी हत्या कर दी। जब दिन के समय वो लोग अपना बचाव नहीं कर पाए तो क्या रात के वक्त आप लोग अपना बचाव कर पाते?"

"पर हमारे साथ कुछ हुआ तो नहीं वैभव।" अर्जुन सिंह ने ये कहा तो मैंने कहा____"कुछ हुआ नहीं तो इसका एक ही मतलब है चाचा जी कि आप सबकी किस्मत अच्छी थी। हालाकि अमर मामा जी को गोली तो लग ही गई न। अगर वही गोली पिता जी के सीने में लग जाती तो क्या होता? समय जब ख़राब होता है तो कुछ भी अच्छा नहीं होता। मैं आपसे पूछता हूं कि अगर आप सब यही काफ़िला दिन में ले कर जाते तो क्या बिगड़ जाता? क्या हमारा दुश्मन रात में ही कहीं भाग जाता और आप लोग उसे पकड़ नहीं पाते?"

"शायद तुम सही कह रहे हो वैभव।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस ले कर कहा____"रात के वक्त हमारा यहां से जाना वाकई में सही फ़ैसला नहीं था। ख़ैर छोड़ो, जो हुआ सो हुआ। अच्छी बात यही हुई कि हमने अपने दुश्मन को नेस्तनाबूत कर दिया है।"

"क...क्या सच में??" मैं उनकी बात सुनते ही हैरानी से बोल पड़ा____"कौंन लोग थे वो?"

"और कौन हो सकते हैं?" अर्जुन सिंह ने कहा____"वही थे तुम्हारे गांव के साले वो साहूकार लोग। सबके सब मारे गए, बस दो ही लोग बच गए।"

"बहुत जल्द उनको भी मौत नसीब हो जाएगी अर्जुन सिंह।" पिता जी ने सहसा सर्द लहजे में कहा____"बच कर जाएंगे कहां?"

"जो लोग मुझे मारने के लिए चंदनपुर गए थे।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"उनमें से एक को पकड़ा था मैंने। उसने मुझे बताया था कि उन लोगों को मुझे जान से मारने के लिए साहूकार गौरी शंकर ने भेजा था।"

"और ये तुम अब बता रहे हो हमें?" पिता जी ने मुझे घूरते हुए कहा____"इतने लापरवाह कैसे हो सकते हो तुम?"

"बताने का समय ही कहां मिला था पिता जी।" मैंने कहा____"मैं तो चंदनपुर से तब आया जब जगताप चाचा और बड़े भैया की दुश्मनों ने हत्या कर दी थी।"

"गौरी शंकर और वो हरि शंकर का बेटा रूपचंद्र बच गए हैं।" पिता जी ने कहा____"ख़ैर कोई बात नहीं, जल्द ही उनका भी किस्सा ख़त्म हो जाएगा।"

"क्या उन दोनों को भी जान से मार देना सही होगा?" नाना जी ने कहा____"हमारा ख़याल है कि उन्हें कोई दूसरी सज़ा दे कर जीवित ही छोड़ देना चाहिए। वैसे भी उनके घर की बहू बेटियों को सहारा देने के लिए उनके घर में किसी न किसी मर्द का होना आवश्यक है।"

"उनके घर की बहू बेटियों को शायद पता चल गया है कि उनके घर के मर्द अब नहीं रहे।" मामा जी ने कहा____"ये रोने धोने का शोर शायद वहीं से आ रहा है?"

"हां हो सकता है।" अर्जुन सिंह ने कहा।

"वैसे मुझे भी कुछ ऐसा पता चला है।" मैंने कहा____"जिसकी आप लोग शायद कल्पना भी नहीं कर सकते।"

"क...क्या पता चला है तुम्हें?" पिता जी ने मेरी तरफ उत्सुकता से देखा।

"हमारे दुश्मनों की सूची में सिर्फ साहूकार लोग ही नहीं हैं पिता जी।" मैंने कहा____"बल्कि आपका मुंशी चंद्रकांत और उसका बेटा रघुवीर भी है।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी के साथ साथ सभी के चेहरों पर आश्चर्य उभर आया।

"यही सच है पिता जी।" मैंने कहा____"मुंशी और उसका बेटा रघुवीर दोनों ही हमारे दुश्मन बने हुए हैं।"

"पर तुम्हें ये सब कैसे पता चला?" अर्जुन सिंह ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।

"जब मैं यहां से आपके पीछे गया था।" मैंने कहा____"तो रास्ते में मुझे एक साया भागता हुआ अंधेरे में नज़र आया। मैंने उस पर रिवॉल्वर तान कर जब उसे रुकने को कहा तो उल्टा उसने मुझ पर ही गोली चला दी। वो तो अच्छा हुआ कि गोली मुझे नहीं लगी मगर फिर मैंने उसे सम्हलने का मौका नहीं दिया। आख़िर वो मेरी पकड़ में आ ही गया और तब मैंने जाना कि वो असल में मुंशी का बेटा रघुवीर है।"

"वो दोनो बाप बेटे।" अर्जुन सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"भला किस वजह से ऐसी दुश्मनी रखे हो सकते हैं?"

"बड़े दादा ठाकुर जी की वजह से।" मैंने कुछ सोचते हुए पिता जी की तरफ देखा____"शायद आप समझ गए होंगे पिता जी।"

"हैरत की बात है।" पिता जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"अगर वो दोनों हमारे स्वर्गीय पिता जी की वजह से हमसे दुश्मनी रखे हुए हैं तो उन्होंने अपनी दुश्मनी के चलते हमारे साथ कुछ भी बुरा करने के लिए इतना समय क्यों लिया? हमें आशंका तो थी लेकिन यकीन नहीं कर पा रहे थे। ऐसा इस लिए क्योंकि हमने कभी भी ऐसा महसूस नहीं किया कि चंद्रकांत के मन में हमारे प्रति कोई बैर भाव है।"

"कुछ लोग अपने अंदर के भावों को छुपाए रखने में बहुत ही कुशल होते हैं ठाकुर साहब।" मामा अवधराज जी ने कहा____"जब तक वो ख़ुद नहीं चाहते तब तक किसी को उनके अंदर की बातों का पता ही नहीं चल सकता।"

"हम्म सही कह रहे हैं आप।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ख़ैर रात काफी हो गई है। आप सभी को अब आराम से सो जाना चाहिए। इस बारे में बाकी बातें कल पंचायत में होंगी।"

पिता जी के कहने पर सभी ने सहमति में अपना अपना सिर हिलाया और फिर पिता जी के उठते ही बाकी सब भी उठ गए। कुछ ही देर में बैठक कक्ष खाली हो गया। इधर मैं भी ऊपर अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेट गया।

✮✮✮✮

अगले दिन।

हवेली के विशाल मैदान में लोगों की अच्छी खासी भीड़ थी। वातावरण में लोगों का शोर गूंज रहा था।। भीड़ में साहूकारों के घरों की बहू बेटियां भी मौजूद थीं जो दुख में डूबी आंसू बहा रहीं थी। लगभग पूरा गांव ही हवेली के उस बड़े से मैदान में इकट्ठा हो गया था। एक तरफ ऊंचा मंच बना हुआ था जिसमें कई सारी कुर्सियां रखी हुई थीं और उन सबके बीच में एक बड़ी सी कुर्सी थी जिसमें दादा ठाकुर बैठे हुए थे। मंच में रखी बाकी कुर्सियों में नाना जी, मामा जी, भैया के साले, और अर्जुन सिंह बैठे हुए थे। मंच के सामने लोगों की भीड़ थी और भीड़ के आगे साहूकारों के घरों की बहू बेटियां खड़ी हुई थीं। मंच के सामने ही एक तरफ मुंशी चंद्रकांत और उसका बेटा खड़ा हुआ था। दोनों ही बाप बेटों के सिर झुके हुए थे। उनके दूसरी तरफ मैं खड़ा हुआ था। सुरक्षा का ख़याल रखते हुए हर जगह क‌ई संख्या में हमारे आदमी हाथों में बंदूक लिए खड़े थे और साथ ही पूरी तरह सतर्क भी थे।

भीड़ में ही आगे तरफ मुरारी और जगन के घरों से उनकी बीवियां और बच्चे थे। अपनी मां और छोटे भाई अनूप के साथ अनुराधा भी आई हुई थी जिनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भुवन के कंधों पर थी। वो ख़ुद भी उनके पास ही खड़ा था। ऐसे संवेदनशील वक्त में ना चाहते हुए भी मेरी नज़र अनुराधा की तरफ बारहा चली जाती थी और हर बार मैं ये देख कर विचलित सा हो जाता था कि उसकी नज़रें मुझ पर ही जमी होती थीं। मेरा ख़याल था कि वो पहली बार ही हवेली आई थी। बहरहाल, सरोज के बगल से जगन की बीवी गोमती और उसके सभी बच्चे खड़े हुए थे। गोमती और उसकी बेटियों की आंखों में आसूं थे।

वातावरण में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी। तभी हवेली के हाथी दरवाज़े से दो जीपें अंदर आईं और एक तरफ आ कर रुक गईं। उन दो जीपों से कुछ लोग नीचे उतरे और भीड़ को चीरते हुए मंच की तरफ आ गए। उन्हें देखते ही मंच पर अपनी कुर्सी में बैठे मेरे पिता जी उठ कर खड़े हो गए।

"नमस्कार ठाकुर साहब।" आए हुए एक प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा तो पिता जी ने भी जवाब में उनका अभिवादन किया। कुछ मुलाजिमों ने फ़ौरन ही पिता जी के इशारे पर कुछ और कुर्सियां ला कर मंच पर रख दी। मेरे पिता जी के आग्रह पर वो सब बैठ गए।

"पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है।" दादा ठाकुर ने अपनी कुर्सी से खड़े हो कर अपनी भारी आवाज़ में कहा____"और पिछली रात जो कुछ हुआ है उससे दूर दूर तक के गांव वालों को पता चल चुका है कि वो सब कुछ हमसे ताल्लुक रखता है। यूं तो आस पास के कई सारे गावों के मामलों के फ़ैसले हम ही करते आए हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है उसका फ़ैसला आज हम ख़ुद नहीं करेंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि हम नहीं चाहते कि कोई भी व्यक्ति हमारे फ़ैसले को ग़लत माने या उस पर अपनी ग़लत धारणा बना ले, या फिर ये समझ ले कि हमने अपनी ताक़त और पहुंच का नाजायज़ फ़ायदा उठाया है। इस लिए हमने सुंदरगढ़ से ठाकुर महेंद्र सिंह जी को यहां आमंत्रित किया है। हम यहां पर मौजूद हर ब्यक्ति से यही कहना चाहते हैं कि ठाकुर महेंद्र सिंह जी हर पक्ष के लोगों की बातें सुनेंगे और फिर उसके बारे में अपना निष्पक्ष फ़ैसला सुनाएंगे। हम लोगों के सामने ये वचन देते हैं कि अगर इस मामले में हम गुनहगार अथवा अपराधी क़रार दिए गए तो फ़ैसले के अनुसार जो भी सज़ा हमें दी जाएगी उसे हम तहे दिल से स्वीकार करेंगे। अब हम आप सभी से जानना चाहते हैं कि क्या आप सब हमारी इस सोच और बातों से सहमत हैं?"

दादा ठाकुर के ऐसा कहते ही विशाल मैदान में मौजूद जनसमूह ने एक साथ चिल्ला कर कहा कि हां हां हमें मंज़ूर है। जनसमूह में से ज़्यादातर ऐसी आवाज़ें भी सुनाई दीं जिनमें ये कहा गया कि दादा ठाकुर हमें आपकी सत्यता और निष्ठा पर पूरा भरोसा है इस लिए आप ख़ुद ही इस मामले का फ़ैसला कीजिए। ख़ैर दादा ठाकुर ने ऐसी आवाज़ों को सुन कर इतना ही कहा कि फिलहाल वो ख़ुद एक मुजरिम की श्रेणी में हैं इस लिए इस मामले में फ़ैसला करने का हक़ वो ख़ुद नहीं रखते।

इतना कह कर पिता जी ने ठाकुर महेन्द्र सिंह जी को अपनी कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया तो वो थोड़े संकोच के साथ आए और बैठ ग‌ए। उनके बैठने के बाद पिता जी मंच से नीचे उतर आए। ये देख कर लोग हाय तौबा करने लगे जिन्हें देख पिता जी ने सबको शांत रहने को कहा।

"इस मामले से जुड़े सभी लोग सामने आ जाएं।" पिता जी की कुर्सी पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"और एक एक कर के अपना पक्ष रखें।"

महेंद्र सिंह जी की बात सुन कर साहूकारों के घरों की औरतें थोड़ा आगे आ गईं। उनको देख जहां सरोज और गोमती भी आगे आ गईं वहीं मुंशी और उसका बेटा भी दो क़दम आगे आ गया।

"ठाकुर साहब।" मणि शंकर की बीवी फूलवती देवी ने दुखी भाव से कहा____"सबसे ज़्यादा बुरा हमारे साथ हुआ है। हमारे घर के मर्दों और बच्चों को रात के अंधेरे में गोलियों से भून दिया दादा ठाकुर ने। अब आप ही बताइए कि हमारा क्या होगा? हम सब तो विधवा हुईं ही हमारे साथ हमारी जो बहुएं थी वो भी विधवा हो गईं। इतना ही नहीं हमारी बेटियां अनाथ हो गईं। हम अकेली औरतें भला इस दुख से कैसे उबर सकेंगी और कैसे अपने साथ साथ अपनी अविवाहित बेटियों के जीवन का फ़ैसला कर पाएंगी?"

"ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"इस बारे में आप क्या कहना चाहते हैं? इतना ही नहीं, इनके घरों के मर्द और बच्चों की इस तरह से हुई हत्या के लिए क्या आप खुद को कसूरवार मानते हैं?"

"बेशक कसूरवार मानते हैं।" पिता जी ने बेबाक लहजे में सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन ये भी सच है कि वो सब अपनी मौत के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार थे। उन्हें अपने किए गए कर्मों का फल मिला है।"

"कैसे?" महेंद्र सिंह ने सवालिया भाव से उन्हें देखते हुए पूछा____"इस मामले में क्या आप सबको खुल कर तथा विस्तार से बताएंगे कि उन्हें उनके कौन से कर्मों का फल दिया है आपने?"

"उन्होंने हमारे छोटे भाई जगताप और हमारे बड़े बेटे अभिनव सिंह के साथ जाने कितने ही लोगों की हत्या की थी।" पिता जी ने कहा____"इतना ही नहीं उन्होंने हमारे छोटे बेटे वैभव को भी जान से मारने की कोशिश की थी जिसके लिए वो चंदनपुर तक पहुंच गए थे।"

"क्या आपके पास।" महेंद्र सिंह ने पूछा____"इन बातों को साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण है?"

"बिल्कुल है।" पिता जी ने मुंशी चंद्रकांत और उसके बेटे रघुवीर की तरफ इशारा करते हुए कहा____"ये दोनों पिता पुत्र खुद हमारी बात का प्रमाण देंगे। ये दोनों खुद इस बात को साबित करेंगे। अगर ये कहा जाए तो बिल्कुल भी ग़लत न होगा कि ये दोनों खुद भी साहूकारों के साथ मिले हुए थे और गहरी साज़िश रच कर हमारे जिगर के टुकड़ों की हत्या की।"

पिता जी की इस बात को सुनते ही जहां भीड़ में खड़े लोगों में खुसुर फुसुर होने लगी वहीं फूलवती और उसके घरों की बाकी बहू बेटियां हैरत से उन्हें देखने लगीं थी।

"ठाकुर साहब ने जो कुछ कहा।" महेंद्र सिंह ने मुंशी की तरफ देखते हुए पूछा____"क्या वो सच है? क्या आप दोनों क़बूल करते हैं कि आप दोनों साहूकारों से मिले हुए थे और उनके साथ मिल कर ही मझले ठाकुर जगताप सिंह और बड़े कुंवर अभिनव सिंह की हत्या की थी?"

"हां हां यही सच है ठाकुर साहब।" मुंशी हताश भाव से जैसे चीख ही पड़ा____"हम दोनों बाप बेटों ने साहूकारों के साथ मिल कर ही वो सब किया है लेकिन यकीन मानिए मुझे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। अगर मेरा बस चले तो मैं इस हवेली में रहने वाले हर व्यक्ति को जान से मार डालूं। ख़ास कर इस लड़के को जिसका नाम वैभव सिंह है?"

"हम तुम्हारा इशारा अच्छी तरह समझ रहे हैं चंद्रकांत।" पिता जी ने कहा____"लेकिन तुम्हें भी ये अच्छी तरह पता है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से ही बजती है। कसूर सिर्फ एक हाथ का नहीं होता।"

"कहना बहुत आसान होता है ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने फीकी सी मुस्कान होठों पर सजा कर कहा____"और सुनने में भी बड़ा अच्छा लगता है लेकिन असल ज़िंदगी में जब किसी के साथ ऐसी कोई बात होती है तो यकीन मानिए बहुत तकलीफ़ होती है। धीरे धीरे वो तकलीफ़ ऐसी हो जाती है कि नासूर ही बन जाती है। एक पल के लिए भी वो इंसान को चैन से जीने नहीं देती।"

"चलो मान लिया हमने।" पिता जी ने कहा____"मान लिया हमने कि बेहद तकलीफ़ होती है लेकिन जिसने तुम्हें तकलीफ़ दी थी सज़ा भी सिर्फ उसी को देनी चाहिए थी ना। हमारे भाई जगताप और बेटे अभिनव का क्या कसूर था जिसके लिए तुमने साहूकारों के साथ मिल कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया?"

"आपने भी सुना ही होगा ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने कहा____"कि गेंहू के साथ हमेशा घुन भी पिस जाता है। मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की मौत घुन की तरह पिस जाने जैसी ही थी।"

"हम इस मामले से संबंधित सारी बातें विस्तार से जानना चाहते हैं।" महेंद्र सिंह जी ने ऊंची आवाज़ में मुंशी की तरफ देखते हुए कहा____"इस लिए सबके सामने थोड़ा ऊंची आवाज़ में बताओ कि जो कुछ भी आप दोनों पिता पुत्र ने किया है उसे कैसे और किस किस के सहयोग से अंजाम दिया है?"

"असल में ये रंजिश और ये दुश्मनी बहुत पुरानी है ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"बड़े दादा ठाकुर के समय की रंजिश है ये। उन्होंने जो कुछ किया था उसका बदला उनके ज़िंदा रहते कोई भी होता तो लेने का सोच ही नहीं सकता था। मैं भी नहीं सोच सका, बस अंदर ही अंदर घुटता रहा। कुछ सालों बाद वो अचानक से बीमार पड़ गए और फिर ऐसा बीमार पड़े कि शहर के बड़े से बड़े चिकित्सक भी उनका इलाज़ नहीं कर पाए। अंततः बीमारी के चलते उनकी मृत्यु हो गई। उनकी ऐसी मृत्यु हो जाने के बारे में कोई कुछ भी सोचे लेकिन मैं तो यही समझता आया हूं कि उन्हें अपने पाप कर्मों की ही सज़ा इस तरह से मिल गई थी। बहरहाल, जिनसे मैं बदला लेना चाहता था वो ईश्वर के घर पहुंच गया था। मैंने भी ये सोच कर खुद को समझा लिया था कि चलो कोई बात नहीं। उसके बाद ठाकुर प्रताप सिंह जी ने दादा ठाकुर की गद्दी सम्हाल ली। शुकर था कि ये अपने पिता के जैसे नहीं थे। मैं खुद भी इन्हें बचपन से जानता था। ख़ैर उसके बाद आगे चल कर इनके द्वारा कभी कुछ भी बुरा अथवा ग़लत नहीं हुआ तो मैंने सोचा काश! इस दुनिया का हर इंसान इनके जैसा ही हो जाए। कहने का मतलब ये कि जब इनके द्वारा किसी के साथ बुरा नहीं हुआ तो मैं भी सब कुछ भुला कर पूरी ईमानदारी से हवेली की सेवा में लग गया था। वक्त गुज़रता रहा, फिर एक दिन मुझे पता चला कि वर्षों पुराना किस्सा फिर से दोहराया जा रहा है और वो किस्सा पुराने वाले किस्से से भी कहीं ज़्यादा बढ़ चढ़ कर दोहराया जा रहा है। जिन ज़ख्मों को मैंने किसी तरह मरहम लगा कर दिल में ही कहीं दफ़न कर दिया था वो ज़ख्म गड़े हुए मुर्दे की मानिंद दिल की कब्र से निकल आए। पहले बड़े दादा ठाकुर थे इस लिए उनके ख़ौफ के चलते मैं कुछ न कर सका था लेकिन इस बार मैं ख़ुद ही किसी तरह से ख़ुद को समझाना नहीं चाहता था। सोच लिया कि अब चाहे जो हो जाए लेकिन उस इंसान का नामो निशान मिटा कर ही रहूंगा जिसने बड़े दादा ठाकुर का किस्सा दोहराने की हिमाकत ही नहीं की बल्कि पाप किया है।"

"गुस्से में इंसान बहुत कुछ सोच लेता है लेकिन जब दिमाग़ थोड़ा शांत होता है तो वैसा कर लेना आसान नहीं लगता।" सांस लेने के बाद मुंशी ने फिर से बोलना शुरू किया____"यही हाल हम दोनों बाप बेटे का था। वैभव सिंह दादा ठाकुर का बेटा था जोकि पूरा का पूरा अपने दादा पर गया था। वही ग़ुस्सा, वही अंदाज़ और वही हवसीपन। छोटी सी उमर में ही दूर दूर तक उसके नाम का डंका ही नहीं बज रहा था बल्कि उसका ख़ौफ भी फैल रहा था। मैंने गुप्त रूप से पता किया तो पाया कि इसकी पहुंच भी कम नहीं है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इसके इशारे पर कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं। हम दोनों चिंता में पड़ गए कि आख़िर अब करें तो करें क्या? अचानक ही मुझे साहूकारों का ख़याल आया और बस मैंने उनसे मिल जाने का मन बना लिया।"

"उनसे कैसे मिल ग‌ए तुम?" पिता जी ने पूछा____"क्या तुम्हें पहले से पता था कि वो हमारे खिलाफ़ ग़लत करने का इरादा रखते हैं?"

"बिल्कुल पता था ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"सच तो ये है कि वो बहुत पहले से मुझे अपनी तरफ मिलाने की पहल कर रहे थे। वो तो मैं ही उनकी बात नहीं मान रहा था क्योंकि मैं आपसे गद्दारी करने का ख़याल भी ज़हन में नहीं लाता था। यही वजह थी कि साहूकारों से मेरी हमेशा अनबन ही रहती थी मगर मैं ये कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक दिन मुझे उन्हीं साहूकारों से मदद लेनी पड़ जाएगी। बहरहाल, ये तो जग ज़ाहिर बात है कि इंसान किसी के सामने तभी झुकता है जब या तो वो झुकने के लिए मजबूर हो या फिर उसे उसकी कोई ज़रूरत हो। मैं भी खुशी से झुक गया लेकिन इसके लिए पहल मैं ख़ुद नहीं करना चाहता था। असल में मैं चाहता था कि हमेशा की तरह साहूकार एक बार फिर से मेरे पास अपना इरादा ले कर आएं। मैं नहीं चाहता था कि वो ये समझने लगें कि मैं उनके बिना कुछ कर ही नहीं सकता। ख़ैर, काफी लंबे समय तक इंतज़ार करना पड़ा मुझे। एक दिन मणि शंकर से अचानक ही मुलाक़ात हो गई। पहले तो हमेशा की तरह औपचारिक बातें ही हुईं। उसके बाद उसने फिर से अपना इरादा मेरे सामने ज़ाहिर कर दिया और साथ ही प्रलोभन भी दिया कि इस सबके बाद वो और मैं मिल कर एक नए युग की शुरुआत करेंगे। थोड़ी ना नुकुर के बाद आख़िर मैं मान ही गया।"

"साहूकार लोग तुमसे क्या चाहते थे?" चंद्रकांत सांस लेने के लिए रुका तो पिता जी ने पूछा।

"सबसे पहले तो यही कि आपके और उनके बीच के संबंध बेहतर हो जाएं और दोनों परिवार पूरी सहजता के साथ एक दूसरे के यहां आने जाने लगें।" चंद्रकांत ने कहा____"संबंध सुधार लेने का एक कारण ये भी था कि मणि शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के लिए आपकी भतीजी कुसुम का हाथ मांगना चाहता था। उसने मुझे बताया था कि कुसुम के साथ रूपचंद्र का ब्याह कर के वो इससे बहुत कुछ लाभ लेना चाहता था।"

"किस तरह का लाभ?" पिता जी पूछे बगैर न रह सके।

"इस मामले में ठीक से कुछ नहीं बताया था उसने।" चंद्रकांत ने कहा____"दूसरी वजह थी आपके दोनों बेटों को बदनाम कर देना। ज़ाहिर है इसके लिए वो कोई भी हथकंडा अपना सकता था। तीसरी वजह थी ज़मीनों के कागज़ात जोकि मेरे द्वारा चाहता था वो।"

"ज़मीनों के कागज़ात क्यों चाहिए थे उसे?" पिता जी के चेहरे पर हैरानी उभर आई थी।

"ज़ाहिर है आपकी ज़मीनों को हथिया लेना चाहते थे वो।" मुंशी ने कहा____"हालाकि ये इतना आसान नहीं था लेकिन उसके अपने तरीके थे शायद। वैसे भी उसका असल मकसद तो यही था आपके पूरे खानदान को मिटाना। जब आपके खानदान में कोई बचता ही नहीं तो लावारिश ज़मीन को कब्ज़ा लेने में ज़्यादा समस्या नहीं हो सकती थी।"

"ख़ैर।" पिता जी ने गहरी सांस ली____"उसके बाद तुम दोनों ने मिल कर क्या क्या किया?"

"उसका और मेरा क्योंकि एक ही मकसद था इस लिए मैंने उसे ये बताया ही नहीं कि असल में मेरी आपसे या आपके परिवार के किसी सदस्य से क्या दुश्मनी है?" मुंशी ने कहा____"सिर्फ़ इतना ही कहा कि बदले में ज़मीन का कुछ हिस्सा मुझे भी मिलना चाहिए।"



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अध्याय - 73

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"ख़ैर।" पिता जी ने गहरी सांस ली____"उसके बाद तुम दोनों ने मिल कर क्या क्या किया?"

"उसका और मेरा क्योंकि एक ही मकसद था इस लिए मैंने उसे ये बताया ही नहीं कि असल में मेरी आपसे या आपके परिवार के किसी सदस्य से क्या दुश्मनी है?" मुंशी ने कहा____"सिर्फ़ इतना ही कहा कि बदले में ज़मीन का कुछ हिस्सा मुझे भी मिलना चाहिए।"


अब आगे....

रूपा अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी आंसू बहा रही थी। उसे इस बात का बेहद दुख था कि उसके पिता के साथ साथ उसके ताऊ चाचा और भाईयों की हत्या कर दी गई किंतु वो ये भी जानती थी कि इसके लिए वो खुद ही ज़िम्मेदार थे। कहते हैं कि अपने लाख बुरे हों लेकिन होते तो वो अपने ही हैं। खून के रिश्तों से जुड़ाव अलग ही होता है और जब अपनों की इस तरह से हत्याएं हो जाएं तो कलेजा हाहाकार कर उठता है।

अब तक रूपा जाने कैसे कैसे विचारों के मंथन से गुज़र चुकी थी। एक तरफ वो ये भी सोच रही थी कि उसके ये वही अपने थे जिन्होंने वैभव के चाचा और भाई की हत्या की थी। उसे बखूबी एहसास था कि जब किसी के अपनों के साथ ऐसा होता है तो कैसा महसूस होता है।

रूपा के घर की सभी औरतें और सभी बहू बेटियां आज हवेली में होने वाली पंचायत में गई हुईं थी किंतु उसे कोई अपने साथ नहीं ले गया था। बल्कि बड़ी ही सख़्ती के साथ उसको उसके ही कमरे में क़ैद कर दिया गया था। उसकी देख रेख के लिए सिर्फ उसकी भाभी कुमुद ही घर पर थी। यूं तो कुमुद उसकी भाभी से कहीं ज़्यादा उसकी सहेली जैसी थी किंतु अब वो भी उसके खिलाफ़ हो गई थी। सुबह से लाखों बार उसने उसे पुकारा था किंतु कुमुद ने उसकी तरफ देखा तक नहीं था। रूपा ये बात समझ गई थी कि उसकी मां और ताई चाची वगैरह उसे अपने साथ हवेली की पंचायत में क्यों नहीं ले गईं। शायद कुमुद ने उन्हें सारी बात बता दी थी और अब वो ये समझती थीं कि रूपा अपने परिवार के खिलाफ़ जा सकती है। आख़िर वो दादा ठाकुर के लड़के वैभव सिंह से बेहद प्रेम जो करती है। प्रेम में पड़ा व्यक्ति अपने परिवार से कहीं ज़्यादा अपने प्रेम और प्रेमी को ही अहमियत देता है। ज़रूरत पड़ने पर वो अपने ही परिवार से बगावत कर बैठता है। शायद यही सब सोच कर उसे उसके ही कमरे में बंद कर दिया गया था।

जैसे जैसे समय गुज़र रहा था रूपा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी और साथ ही एक भय उसके अंदर घर करता जा रहा था। उसने अपनी भाभी कुमुद को आवाज़ें लगा कर दरवाज़ा खोल देने की बहुत मिन्नतें की मगर कुमुद ने दरवाज़ा खोलना तो दूर जवाब में एक लफ्ज़ भी अपने मुंह से नहीं निकाला था। रूपा को ये सोच कर रोना आ जाता था कि उसकी सहेली इतनी कठोर कैसे हो सकती है?

रूपा अचानक ही अपने बिस्तर से उठी। उसके चेहरे पर किसी दृढ़ निश्चय जैसे भाव नुमायां होते नज़र आए। उसने कमरे में चारो तरफ निगाहें दौड़ाना शुरू कर दिया। एकाएक ही उसकी नज़र खिड़की पर जा कर ठहर गई। वो एक झटके में बिस्तर से उठी और खिड़की के पास जा पहुंची। उसने खिड़की को खोल कर बाहर की तरफ झांक कर देखा। ये वही खिड़की थी जहां से एक समय वैभव उससे मिलने उसके कमरे में आया करता था। रूपा ने झांक कर देखा नीचे की ज़मीन क़रीब आठ दस फीट नीचे थी। उसके जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई। वो एकदम से पलटी और बिस्तर में पड़े कपड़ों को समेटने लगी। कुछ ही देर में उसने कपड़ों को जोड़ जोड़ कर एक रस्सी बना ली। उस रस्सी को ले कर वो खिड़की के पास आई। कपड़े की रस्सी के एक सिरे को उसने खिड़की के बीचो बीच लगे लकड़ी के मोटे डंडे पर बांधा और दूसरे सिरे के साथ साथ बाकी सारी रस्सी को उस पार उछाल दिया। रस्सी लहराते हुए जल्दी ही नीचे की ज़मीन तक पहुंच गई।

रूपा एक बार फिर से पलट कर अपने बिस्तर के पास आई और बिस्तर के सिरहाने के पास पड़े अपने दुपट्टे को उठा कर उसे अपने सीने पर डाल लिया। उसके बाद वो तेज़ी से खिड़की के पास आ गई। खिड़की के उस पार रस्सी के सहारे झूल जाने के ख़याल ने एकदम से उसके जिस्म में सर्द लहर पैदा कर दी। उसने आंख बंद कर के गहरी गहरी सांसें ली और साथ ही मन ही मन खुद को तैयार करने लगी।

रूपा आंखें खोल कर आगे बढ़ी और खिड़की के बीच लगे लकड़ी के मोटे डंडे को पकड़ते हुए उस पार जाने का प्रयास करने लगी। ये निश्चित था कि उसकी ज़रा सी चूक उसे सीधा नीचे ला कर पटक सकती थी जिसके चलते उसके साथ कुछ भी हो सकता था। रूपा को अंदर से भय और घबराहट तो बहुत हो रही थी किंतु उसने ठान लिया था कि वो यहां से निकल कर हवेली ज़रूर जाएगी।

रूपा ने खिड़की के उस पार आने के बाद कपड़े की रस्सी को मजबूती से थाम लिया और फिर धीरे धीरे झूल गई। जैसे ही वो झूली तो कपड़े की रस्सी उसके हाथ से फिसलने लगी जिससे उसकी जान हलक में आ कर फंस गई। मारे डर के उसकी चीख निकलते निकलते रह गई। अपनी पकड़ को जल्दी ही उसने मजबूत बनाया ताकि कपड़े की रस्सी उसकी मुट्ठियों से फिसले न। रस्सी को पकड़े झूले रहना उसके लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा था। उसकी लाख कोशिश के बाद भी उसकी मुट्ठी से रस्सी थोड़ा थोड़ा कर के फिसलती ही जा रही थी। दूसरी तरफ अपने वजन को थामे रखना भी अब उसे भारी लगने लगा था। दीवार पर कभी उसके पैर टकरा जाते तो कभी उसके जिस्म का कोई दूसरा हिस्सा। आख़िर बड़ी मेहनत के बाद वो किसी तरह नीचे पहुंच ही गई। नीचे कच्ची ज़मीन पर आ कर उसने राहत की सांस ली। उसके बाद उसने पहले चारो तरफ निगाह घुमाई और फिर तेज़ी से एक तरफ को बढ़ती चली गई।

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"वाह! बहुत खूब।" मुंशी चंद्रकांत की बात सुनते ही पिता जी बोल उठे____"ख़ैर हमारे भाई जगताप और बेटे अभिनव की हत्या कैसे की तुम लोगों ने जबकि वो दोनों अपने साथ काफी सारे आदमी ले कर गए थे? हमें पूरा यकीन है कि उन लोगों पर तुमने अचानक से तो हमला नहीं कर दिया होगा बल्कि यकीनन पहले से ही रणनीति बना कर उनके आने की ताक में रहे होगे।"

"चंदनपुर में मिली नाकामी के बाद।" चंद्रकांत ने कहा____"हम लोग अपने आदमियों पर ही नहीं बल्कि खुद पर भी बेहद गुस्सा थे। मेरा बेटा रघुवीर तो खुद ही चंदनपुर जा कर वैभव की हत्या करना चाहता था लेकिन मणि शंकर ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया था। शायद वो नहीं चाहता था कि हम में से किसी की ज़रा सी भी चूक अथवा लापरवाही के चलते हमारा भेद आप सबके सामने खुल जाए। यही वजह थी कि वैभव की हत्या करने के लिए हमने अपने ऐसे चुनिंदा आदमियों को चंदनपुर भेजा था जो ऐसे कामों को अंजाम देने में सक्षम थे। जब हमारे आदमी चंदनपुर में वैभव की हत्या करने में नाकाम हो गए तो हमें बड़ी निराशा हुई और साथ ही हम ये सोच कर हैरान भी हुए कि चंदनपुर में वैभव की सुरक्षा के लिए अचानक से इतने सारे लोग कहां से और कैसे आ गए थे? बाद में हमने सोचा कि वैभव की सुरक्षा के लिए इतने सारे लोग तभी वहां पहुंच सकते थे जब उन्हें पहले से ही पता हो कि वैभव के साथ ऐसा कुछ होने वाला है। हमारे लिए ये बड़ी हैरानी की बात बन गई थी कि ये बात उन्हें कैसे पता चल गई होगी जबकि वैभव की हत्या करने की योजना हमने अपने सामने बेहद ही गुप्त तरीके से बनाई थी।"

"ये शेर तो तुमने भी सुना ही होगा कि मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है।" पिता जी ने अजीब भाव से कुछ सोचते हुए कहा____"कहने का मतलब ये कि जिस समय तुम लोगों ने ये योजना बनाई थी उसके कुछ ही समय बाद हमें इस बात की ख़बर मिल गई थी। रात के वक्त हमसे मिलने दो औरतें हवेली आईं थी और उन्होंने ही हमें इस मामले में ये बताया था कि कुछ लोग अगली सुबह हमारे बेटे वैभव की हत्या करने के लिए चंदनपुर जाने वाले हैं। वैसे बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे ज़हन में उन औरतों के संबंध में ये ख़याल उसी समय क्यों नहीं आया था?"

"क...कौन सी औरतें हैं??" मुंशी चंद्रकांत हैरत से पिता जी की तरफ देखते हुए पूछ बैठा था।

"हमने उन्हें वचन दिया था कि उनके बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताएंगे।" पिता जी ने कहा____"बस इतना समझ लो कि वैभव का जीवन उन्हीं की बदौलत बच सका है और उन्हें हवेली में रहने वालों के भले का ख़याल था।"

पिता जी की बातें सुन कर मैं खुद भी बड़ा हैरान हुआ और साथ ही सोचने लगा कि मेरी सलामती की चाह रखने वाली वो दोनों औरतें कौन रही होंगी? बहुत सोचा मगर ऐसी किसी औरत का ख़याल मेरे ज़हन में न आ सका।

"चंद्रकांत जी।" सहसा फिज़ा में ठाकुर महेन्द्र सिंह की भारी आवाज़ गूंजी____"आप सबको ये बताइए कि ठाकुर जगताप सिंह और कुंवर अभिनव सिंह के साथ साथ उनके साथ मौजूद उनके उतने सारे आदमियों की हत्या कैसे की आप लोगो ने?"

"हम तो असल में अभिनव की हत्या करने का ही सोचे हुए थे।" चंद्रकांत ने कहा____"हमारी योजना थी कि एक तरफ चंदनपुर में वैभव का किस्सा ख़त्म करेंगे और यहां पर इसके बड़े भाई का। मझले ठाकुर की हत्या करने की कोई योजना नहीं थी बल्कि उनका नंबर तो बाद में आना था। ख़ैर जब हमारे मुखबिर ने हमें बताया कि अभिनव अपने चाचा तथा कई सारे आदमियों के साथ हवेली से निकल पड़ा है तो हम लोग अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार हो गए। हमने अंदाज़ा लगाया था कि हो न हो मझले ठाकुर अपने भतीजे तथा कई सारे आदमियों के साथ चंदनपुर ही जा रहे होंगे। इस लिए हम भी उनके पीछे लग जाना चाहते थे और फिर मौका देख कर रास्ते में ही उनका किस्सा ख़त्म कर देना चाहते थे।"

"कई बार की नाकामियों के बाद इस बार हम हर हाल में अपने मकसद में पूरी तरह से सफल होना चाहते थे।" चंद्रकांत ने दो पल रुकने के बाद कहा____"इस लिए हमने भी बहुत से आदमियों को इकट्ठा किया और फिर उनके पीछे लग गए। जल्दी ही हमारा काफ़िला मझले ठाकुर के क़रीब पहुंच गया। हमें अपने पीछे आते देख वो दोनों चाचा भतीजे बड़ा हैरान हुए और साथ ही सतर्क भी हो गए थे। इधर हमने पहले ही योजना बना ली थी कि सब कुछ कैसे करना है। जब हम सब मझले ठाकुर के काफ़िले के कुछ पास पहुंच गए तो हमने उन्हें आवाज़ दे कर ये बताया कि हम सब भी उनकी मदद करने के लिए चंदनपुर जाना चाहते हैं। हमारी बातें सुन कर मझले ठाकुर और बड़े कुंवर पहले तो बड़ा हैरान हुए फिर खुश दिखाई देने लगे। उसके बाद वो पूरी तरह से बेफ़िक्र हो कर हमारे आगे आगे चलने लगे। हम समझ गए कि उन्होंने हम पर भरोसा कर लिया है, तभी तो इतनी बेफ़िक्री से चल पड़े हैं।"

"योजना के अनुसार हमें यहीं पर अब आगे का काम करना था।" मुंशी के चुप होते ही रघुवीर ने कहा____"हमने पहले ही सबको सब कुछ समझा दिया था इस लिए गौरी शंकर का इशारा मिलते ही हम सबने एक साथ अपनी अपनी बंदूकों का मुंह खोल दिया। मझले ठाकुर या अभिनव को हमसे इस तरह अचानक हमला कर देने की ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी इस लिए जब तक वो सम्हल पाते तब तक देर हो चुकी थी। हमने अपने आदमियों को उनके आदमियों को ढेर करने का काम दे दिया था और इधर मैं बापू और गौरी शंकर ने मझले ठाकुर और अभिनव को ख़त्म करने का काम ले रखा था। सबने बचने की बहुत कोशिश की और जवाब में गोलियां भी चलाई मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अंततः मझले ठाकुर अपने भतीजे अभिनव के साथ हमारे द्वारा मारे ही गए। इधर एक दो आदमी हमारे भी मरे मगर उसका हमें कोई अफ़सोस नहीं था। बल्कि इस बात की खुशी थी कि हम अपने दुश्मन को मार डालने में आख़िर कामयाब हो गए। उसके बाद हम जल्दी ही वहां से निकल लिए। हमें डर था कि गोलियां चलने की आवाज़ों को सुन कर आस पास के गांव के लोग हमारी तरफ न आ जाएं। इस लिए हमने अपने मारे गए आदमियों को लिया और फिर वहां से निकल गए।"

"हम सब जानते थे कि जब इस हत्याकांड की ख़बर आपके पास पहुंचेगी।" रघुवीर सांस लेने के लिए रुका तो चंद्रकांत ने बात आगे बढ़ाई____"तो हर तरफ तहलका मच जाएगा। गौरी शंकर और मणि शंकर का कहना था कि इस हत्याकांड का आरोप उन पर ही लगाया जाएगा। इतना ही नहीं बल्कि दूर दूर तक के लोग भी यही मानेंगे कि उन्होंने ही चाचा भतीजे की हत्या की है। ऐसे में पूरी तरह संभव था कि आपका क्रोध और आक्रोश दोनों ही उनके लिए घातक हो जाएगा इस लिए उन्होंने फ़ैसला किया कि वो अपने सभी भाइयों और बच्चों को ले कर कहीं छुप जाएंगे। जब मामला थोड़ा ठंडा हो जाएगा तब वो आपके सामने आ कर अपनी बेगुनाही की सफ़ाई दे देंगे।"

"बहुत खूब।" दादा ठाकुर ने कहा____"और हम ये मान भी लेते कि उन्होंने हमारे जिगर के टुकड़ों की हत्या नहीं की है बल्कि वो तो गंगा जल की तरह निर्दोष और पाक हैं, है ना?"

दादा ठाकुर के इस तरह कहने पर चंद्रकांत कुछ न बोला। विशाल मैदान में लोगों की इतनी भीड़ के बाद भी सन्नाटा सा छा गया था। ये अलग बात है कि अगले कुछ ही पलों में लोग आपस में खुसुर फुसुर करने लगे थे।

"ये सब झूठ है।" मणि शंकर की पत्नी फूलवती एकदम से चिल्ला उठी____"ना मेरे पति ने कुछ किया है और ना ही मेरे देवरों ने। सब कुछ इन दोनों बाप बेटों का ही किया धरा है। पकड़े गए तो अब ये हमारे घर के मर्दों पर ही आरोप लगा रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ है ही नहीं। ये सच है कि हमारे घर के मर्द और बच्चे हवेली में रहने वालों से ईर्ष्या और बैर रखते थे लेकिन फिर उन्हें भी लगने लगा था कि उनका इस तरह से ईर्ष्या या बैर रखना ठीक नहीं है। हमारे साथ तो बड़े दादा ठाकुर ने बुरा किया था, लेकिन वो तो अब रहे नहीं। उनके बाद भी अगर हवेली में रहने वाला कोई हमारे साथ बुरा करता तो हमारा ईर्ष्या या बैर रखना जायज़ है। यही सब सोच कर हमने दादा ठाकुर से अपने रिश्तों को सुधार लिया था और अपने अंदर से हर तरह का बैर भाव निकाल दिया था। आपका ये मुंशी हमारे घर के मर्दों और बच्चों पर झूठा आरोप लगा रहा है दादा ठाकुर, हमारा यकीन कीजिए।"

"मैं किसी पर झूठा आरोप नहीं लगा रहा हूं ठाकुर साहब।" मुंशी ने मंच में सिंहासन पर बैठे महेंद्र सिंह की तरफ देखते हुए कहा____"बल्कि मेरा कहा गया एक एक शब्द सच है। आप खुद सोचिए कि अगर इनके घर के मर्द और बच्चे इतने ही पाक साफ थे तो अपनी अपनी जान बचाए रखने के लिए छुपते क्यों फिर रहे थे? अगर सच में उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था तो वो सब दादा ठाकुर के सामने आने की बजाय रातों रात कहीं भाग क्यों गए थे? ये कहती हैं कि उन्होंने दादा ठाकुर से अपने रिश्ते सुधार लिए थे तो आप ही बताइए कि ये किस तरह का रिश्तों में सुधार किया था उन्होंने कि मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की हत्या की बात सुन कर भी दादा ठाकुर का दुख बाटने उनके पास नहीं आए? सच तो यही है ठाकुर साहब कि वो भी उतने ही अपराधी हैं जितना कि मैं और मेरा बेटा। मैं पहले ही बता चुका हूं कि मुझे अपने किए का कोई अफ़सोस नहीं है। अतः आप मुझे और मेरे बेटे को जो भी सज़ा देंगे वो मुझे मंज़ूर होगा मगर दूसरी तरफ उन्हें निर्दोष मान कर छोड़ देना मेरे साथ नाइंसाफी होगी।"

"फ़िक्र मत करो।" महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"हर अपराधी को उसके किए की सज़ा मिलेगी किंतु हमारा ख़याल ये है कि साहूकारों को भी यहां मौजूद होना चाहिए। उनकी मौजूदगी में उनसे ही पूछा जाएगा कि उनका इस मामले में कोई हाथ है अथवा नहीं। इस लिए इस पंचायत के पंच होने के नाते हम ये आदेश देते हैं कि साहूकारों में जो जीवित बचे हैं उन्हें जल्द से जल्द खोज कर यहां पर हाज़िर किया जाए।"

"साहूकारों में से अब दो ही लोग बचे हैं ठाकुर साहब।" दादा ठाकुर ने कहा____"गौरी शंकर और हरि शंकर का बेटा रूपचंद्र। हमारे आदमी उन दोनों को खोजने में लगे हुए हैं। जल्दी ही वो यहां नज़र आएंगे।"

"हमने तो आपको देवता समझा था दादा ठाकुर।" फूलवती ने दुखी हो कर कहा____"मगर आपने पिछली रात जो किया उससे आपने साबित कर दिया है कि आप में और आपके पिता बड़े दादा ठाकुर में कोई अंतर नहीं है। वो भी जल्लाद थे और आप भी जल्लाद बन ग‌ए। अपने अहंकार और गुस्से के चलते आप इतने अंधे हो गए कि आपने हमारे घर की औरतों के सुहाग ही नष्ट कर दिए। एक झटके में हमें अनाथ और असहाय बना दिया। इसकी भयंकर बद्दुआ लगेगी आपको।"

"हमें बद्दुआ मंज़ूर है भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने कहा____"मगर ये भी सच है कि उन सबको उनके किए गए कर्मों की ही सज़ा दी है हमने। उनकी हत्या होने पर अब आप ऐसे आरोप लगा कर हमें ऐसी बातें कह रहीं हैं जबकि आपकी तरह हम भी यही कह सकते हैं कि आपके पति और देवरों ने हमारे भाई और बेटे की हत्या कर के कौन सा महान काम कर दिया था? एक मां बाप से उनका बेटा छीन लिया, एक पत्नी से उसका पति छीन लिया। बच्चों से उसका पिता छीन लिया। क्या आपको ये एहसास नहीं है कि हमारी तरह जल्लाद तो वो भी थे? हम पूछते हैं कि आख़िर हमारे भाई और बेटे ने किसी के साथ क्या बुरा कर दिया था जिसके लिए उन दोनों की इस तरह से हत्या कर दी आपके घर वालों ने? बदले में अगर हमने भी वही कर दिया तो अब आप हमें बद्दुआ लगने की बात कह रही हैं?"

"हमें आपके भाई और बेटे की हत्या हो जाने का दुख है दादा ठाकुर।" फूलवती ने कहा____"मगर हम ये नहीं मान सकते कि उनकी हत्या हमारे घर के मर्दों ने आपके मुंशी के साथ मिल कर की है। ये हमारे घर वालों पर झूठा आरोप लगा रहे हैं।"

"आप उमर में मेरी मां से बड़ी हैं।" सहसा मैंने फूलवती के क़रीब जाते हुए कहा____"इस लिए आपको बड़ी मां कह सकता हूं। यकीन मनाइए मेरे दिल में आप में से किसी के लिए भी कोई ग़लत भावना अथवा बैर भाव नहीं है। मैं आपसे ये कहना चाहता हूं कि दुनिया में हर किसी को अपने बच्चे और अपने घर वाले दूसरों से कहीं ज़्यादा अच्छे और पाक साफ लगते हैं। आप कहती हैं कि आपके घर के मर्दों ने कुछ नहीं किया है जबकि मैं कहता हूं कि इसका सबूत मैं इसी वक्त आपको दे सकता हूं।"

मेरी बात सुनते ही फूलवती की आंखें फैल गईं और सिर्फ उसी की ही क्यों बल्कि बाकी सबकी भी। इधर फूलवती और उसके घर की बाकी बहू बेटियां मुझे इस तरह देखने लगीं थी जैसे मेरे सिर पर अचानक से ही सींग उग आए हों।

"ये तुम क्या कह रहे हो वैभव?" मंच पर बैठे महेंद्र सिंह ने कहा____"क्या सच में तुम ऐसा कोई सबूत यहां सबके सामने पेश कर सकते हो?"

"हां।" मैंने बेझिझक हो कर कहा____"किंतु उससे पहले ये जान लीजिए कि मेरे पास वो सबूत आया कैसे? असल में जब यहां से कुछ लोग मुझे जान से मारने के इरादे से चंदनपुर गए थे तो शायद उन लोगों को ये बिल्कुल भी नहीं पता था कि वहां पर भी मेरी रक्षा करने के लिए मेरे कई सारे आदमी मौजूद होंगे जिनसे उनका टकराव हो जाएगा। ख़ैर टकराव हुआ और अच्छा खासा हुआ। आख़िर में मुझे जान से मारने के इरादे से आए हुए लोग मारे गए और एक दो भाग गए लेकिन एक आदमी मेरे हाथ भी लगा। मेरे ये पूछने पर कि मुझे जान से मारने के लिए उसे किसने भेजा है उसने कोई जवाब नहीं दिया। उल्टा मुझसे ये कहने लगा कि मैं उसका या किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उस नामुराद को पता ही नहीं था कि वो किससे ऐसी बात कह रहा था। ख़ैर फिर मैंने अपने तरीके से उससे सच उगलवा ही लिया। ये अलग बात है कि सच बोलने से पहले उसे अपने एक कान से हाथ धोना पड़ गया था। उसने बताया कि वो ये सब करने के लिए मजबूर था और उसे मजबूर करने वाले कोई और नहीं बल्कि हमारी इन्हीं बड़ी मां के देवर गौरी शंकर काका थे। गौरी शंकर काका ने उसे धमकी दे रखी थी कि अगर उसने उनके कहे अनुसार काम नहीं किया तो वो अपना कर्ज़ तो उससे वसूलेंगे ही साथ में उसके बीवी बच्चों को भी जान से मार देंगे। ज़ाहिर है, आदमी अपने बीवी बच्चों की जान बचाने के लिए कुछ भी करने के लिए मजबूर हो जाएगा।"

"पंचायत के सामने उस आदमी को पेश करो वैभव।" महेंद्र सिंह ने कहा____"इस मामले में सारी बात उसके मुख से ही सुनी जाएंगी। तुम्हारे इस बयान का न तो कोई मतलब है और ना ही वो इस पंचायत में मान्य होगा।"

"जैसा आपका हुकुम।" मैंने अदब से सिर नवाते हुए कहा और फिर अपने एक आदमी को इशारा कर दिया।

कुछ ही देर ने मेरा आदमी उस आदमी को ले कर आ गया जिसे मैंने चंदनपुर में पकड़ा था और उसे वहीं पर रखे हुए था। सबकी नज़रें उस आदमी पर ठहर गईं। उसका एक कान मैंने काट दिया था इस लिए इस वक्त उसके उस कान में पट्टी लगी हुई थी। सबके सामने आते ही वो बेहद घबराया हुआ नज़र आने लगा था। फूलवती और उसके घर की बाकी बहू बेटियां भी उसे देख रहीं थी। सहसा मेरी निगाह कुछ ही दूरी पर अपनी मां के साथ खड़ी अनुराधा पर पड़ गई। इसे इत्तेफ़ाक कहूं या कुछ और लेकिन ये सच है कि वो अब भी मुझे ही देखे जा रही थी। मैंने जल्दी ही उससे नज़रें हटा ली। मेरे अंदर एक बेचैनी सी पैदा होने लगी थी।

"कौंन हो तुम?" तभी फिज़ा में महेंद्र सिंह की आवाज़ गूंजी____"और किस गांव के रहने वाले हो और ये भी बताओ कि तुम यहां पर इस हाल में क्यों हो?"

महेंद्र सिंह के पूछने पर उस व्यक्ति ने बताया कि वो पास के ही एक गांव सिंहपुर का रहने वाला है और उसका नाम मनसुख यादव है। उसके बाद वो वही सब बताता चला गया जो उसने चंदनपुर में मुझे बताया था। उसकी बातें सुन कर भीड़ में खड़े लोग एक बार फिर से खुसुर खुसुर करने लगे। वहीं फूलवती का चेहरा देखने लायक हो गया।

"मैं नहीं मानती इस आदमी की इन बातों को।" गौरी शंकर की बीवी सुनैना ने सहसा तीखे भाव से कहा___"ज़रूर दादा ठाकुर के इस बेटे ने इस आदमी को मेरे पति के खिलाफ़ ऐसा बोलने के लिए मजबूर किया होगा। मैं अपने पति को अच्छी तरह जानती हूं। वो ऐसा कुछ कर ही नहीं सकते।"

"नहीं ठाकुर साहब।" मनसुख एकदम से बोल पड़ा____"मुझे किसी ने ऐसा बोलने के लिए मजबूर नहीं किया है। हां ये सच है कि इसके पहले छोटे कुंवर ने मुझसे सच जानने के लिए गुस्से में आ कर मेरा ये कान काट दिया था लेकिन सच यही है कि इन्होंने मुझे ऐसा बोलने के लिए मजबूर नहीं किया है। सच वही है जो मैंने अभी सबके सामने आप सबको बताया है। अगर मेरा कहा एक भी शब्द झूठ हो तो मेरे झूठ बोलने के चलते मैं अपने बच्चों का मरा हुआ मुंह देखूं।"

मनसुख की इस बात से सनसनी सी फैल गई फिज़ा में।

"क्या अब भी आपको यकीन नहीं है काकी?" मैंने सुनैना की तरफ देखते हुए कहा___"आप भी जानती हैं कि चाहे जैसी भी परिस्थिति हो मगर कोई भी मां बाप अपने बच्चों की झूठी क़सम नहीं खा सकते। इसके बावजूद अगर आपको यकीन नहीं है तो ठीक है। बहुत जल्द गौरी शंकर काका और रूपचंद्र को खोज लिया जाएगा और उन्हें यहां ला कर उन्हीं के द्वारा सच का पता चल जाएगा आपको।"

"हां हां आप सब तो चाहते ही हैं कि हमारे घर के सभी मर्द और बच्चों को सूली पर लटका दिया जाए।" सुनैना बिफरे हुए लहजे से एकाएक रोने ही लगी, बोली____"और हम सबको अनाथ, बेसहारा और लाचार बना दिया जाए।"

"ऊपर वाला ही जानता है काकी कि हम सब क्या चाहते हैं।" मैंने कहा____"मेरे जैसा इंसान भी उस दिन बड़ा खुश हुआ था जब आप लोगों से हमारे रिश्ते सुधर गए थे। ये अलग बात है कि मुझे संबंधों का इस तरह से सुधर जाना हजम नहीं हो रहा था लेकिन फिर भी ये सोच कर खुश हो गया था कि चलो दोनों परिवार अब एक साथ हो गए हैं तो दोनों मिल कर एक नए सिरे से एक नए युग का निर्माण करेंगे। जीवन बहुत छोटा होता है काकी। इंसान अपने छोटे से जीवन में न जाने किस किस के साथ कैसा कैसा बैर बना लेता है और फिर दोनों ही उस बैर के चलते अपना वही छोटा सा जीवन बर्बाद कर बैठते हैं जिस छोटे से जीवन में वो अगर प्रेम भाव से रहते तो शायद वो एक सुनहरा इतिहास ही बना डालते।"

"तुमने सही कहा वैभव।" मैं ये सब बोल कर पलटा ही था कि तभी मेरे कानों में किसी लड़की की चिर परिचित मधुर आवाज़ पड़ी। मैं बिजली की तरह वापस मुड़ा तो देखा भीड़ को चीरते हुए रूपा अपनी ताई और चाची सुनैना के बगल में आ कर खड़ी हो गई। उसको देख जहां एक तरफ मैं चौंक पड़ा था वहीं उसके घर वाले भी चौंक पड़े थे। रूपा को यहां देख जाने क्यों मेरी नज़र उससे हट कर अनायास ही अनुराधा की तरफ चली गई। मैंने देखा वो रूपा को गौर से देखें जा रही थी। ये देख मेरे अंदर अजीब तरह की हलचल शुरू हो गई।

"तुमने बिल्कुल सही कहा वैभव कि अगर दोनों ही परिवार के लोग प्रेम भाव से रहते तो एक सुनहरा इतिहास बना डालते।" उधर रूपा मेरी तरफ देखते हुए दुखी भाव से बोली____"मगर शायद ऐसा इतिहास बनाने के लिए वैसा प्रेम भाव ही नहीं था मेरे घर वालों के अंदर।"

"र...रूपा।" हरि शंकर की पत्नी और रूपा की मां ललिता देवी ने गुस्से से रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"ये तू क्या बकवास कर रही है और....और तू यहां आई कैसे?"

"बड़े दुख की बात है मां।" रूपा की आंखों से आंसू बह चले, बोली____"कि आप सब भी ताऊ चाचा और पिता जी के जैसी ही हैं। इतना कुछ होने के बाद भी आप सब ऐसा बर्ताव कर रही हैं?"

"तू चुप होती है कि नहीं?" ललिता ने गुस्से से चीखते हुए कहा____"और तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस तरह बात करने की?"

"आप जानती थी न कि मुझे सब पता है?" रूपा ने कहा____"इसी लिए तो आपने मुझे मेरे कमरे में बंद कर दिया था ताकि मैं यहां ना आ सकूं और किसी को सच न बता सकूं? आख़िर क्या सोच कर अब आप सब सच को छुपा रही हैं मां? क्या आप सब ये चाहती हैं कि जो ज़िंदा बचे हुए हैं उनकी भी हत्या हो जाए?"

रूपा की बात सुन कर ललिता देवी कुछ न बोल सकी। बस अपने दांत पीस कर रह गईं। यही हाल उनकी जेठानी और बाकी देवरानियों का भी था। फिर सहसा जैसे उन्हें किसी बात का एहसास हुआ तो एक एक कर के सभी चेहरों के भाव बदलते नज़र आए।



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अध्याय - 74

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"आप जानती थी न कि मुझे सब पता है?" रूपा ने कहा____"इसी लिए तो आपने मुझे मेरे कमरे में बंद कर दिया था ताकि मैं यहां ना आ सकूं और किसी को सच न बता सकूं? आख़िर क्या सोच कर अब आप सब सच को छुपा रही हैं मां? क्या आप सब ये चाहती हैं कि जो ज़िंदा बचे हुए हैं उनकी भी हत्या हो जाए?"

रूपा की बात सुन कर ललिता देवी कुछ न बोल सकी। बस अपने दांत पीस कर रह गईं। यही हाल उनकी जेठानी और बाकी देवरानियों का भी था। फिर सहसा जैसे उन्हें किसी बात का एहसास हुआ तो एक एक कर के सभी चेहरों के भाव बदलते नज़र आए।


अब आगे....

"मुझमें अब यहां से कहीं जाने की हिम्मत नहीं है रूप बेटा।" पास ही के जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठे गौरी शंकर ने असहाय भाव से कहा____"मुझे समझ आ गया है कि हम अपनी मौत से दूर नहीं भाग सकते। मेरे भाई मेरे बच्चे सब मर चुके हैं और अब मैं भी जीना नहीं चाहता।"

"बदला लिए बिना हम मर नहीं सकते काका।" रूपचंद्र ने गुस्से से कहा____"हिसाब तो बराबर का करना ही पड़ेगा। उन्होंने हमारे इतने सारे अपनों की जान ली है तो उनमें से भी किसी को ज़िंदा रहने का हक़ नहीं है।"

"नहीं रूप बेटा।" गौरी शंकर जाने किस चीज़ की कल्पना से कांप उठा था, बोला____"अब ऐसा सोचना भी मत। हमने अपने सभी लोगों को खो दिया है। खानदान का वंश बढ़ाने के लिए अब सिर्फ तुम ही बचे हो मेरे बच्चे। इस लिए अब अपने ज़हन में बदले का कोई भी ख़याल मत लाओ।"

"ये आप कैसी बातें कर रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने चीखते हुए कहा____"नहीं, हर्गिज़ नहीं। मैं उनमें से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोडूंगा। जैसे हमारा खानदान पूरी तरह से मिटा दिया है दादा ठाकुर ने उसी तरह मैं उसके भी खानदान का नामो निशान मिटा दूंगा। हवेली के ज़र्रे ज़र्रे में करुण क्रंदन गूंजेगा।"

"नहीं बेटा ऐसा मत कह।" गौरी शंकर बेबस भाव से कह उठा____"तुझे मरे हुए हमारे अपनों की क़सम है। तू ऐसा कुछ भी करने का नहीं सोचेगा। हमारी स्थिति अब बेहद कमज़ोर हो गई है बेटा। तू अकेला उनका कुछ नहीं कर सकेगा, उल्टा होगा ये कि तू भी बाकी सबकी तरह अपनी जान से हाथ धो बैठेगा। अगर ऐसा हुआ तो खानदान का वंश ही नष्ट हो जाएगा। मेरी जांघ में गोली लगी है जिसके चलते अब मैं अपाहिज सा हो गया हूं। एक तू ही है जिसे अब अपने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी। तेरी मां, तेरी चाचियां, तेरी भाभी और तेरी बहनें उन सबका ख़याल रखना होगा तुझे। सोच अगर तुझे कुछ हो गया तो उन सबका क्या होगा? हमारी बेसहारा बहू बेटियों का जीवन नर्क सा हो जाएगा बेटा। इस लिए कहता हूं कि अब अपने अंदर किसी से भी बदला लेने का ख़याल मत ला।"

रूपचंद्र को पहली बार एहसास हुआ कि उसकी और उसके परिवार की स्थिति वास्तव में कितनी गंभीर और दयनीय हो गई है। ये एहसास होते ही उसके चेहरे पर मौजूद आक्रोश और गुस्सा किसी झाग की तरह बैठता नज़र आया।

"हमें बिल्कुल भी ये अंदाज़ा नहीं था कि अचानक से ऐसा भी कुछ हो जाएगा।" गौरी शंकर ने बेहद गंभीरता से कहा____"जो सोचा था वैसा बिल्कुल भी नहीं हुआ। शायद ऊपर वाला हमेशा से ही हमारे खिलाफ़ रहा है या फिर हकीक़त यही है कि हमने बेवजह ही इतने वर्षों से अपने अंदर उनके प्रति दुश्मनी को पाले रखा था।"

"ये आप क्या कह रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने हैरत से गौरी शंकर को देखा।

"तुझे तो बताया ही था हमने कि वर्षों पहले बड़े दादा ठाकुर की वजह से ये सब शुरू हुआ था।" गौरी शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"उसी की वजह से हमने हमारी बहन गायत्री को खोया था। उसने हमारी बहन को अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर उसे अपने ही एक किसान के साथ जाने कहां भेज दिया। अपने कुकर्म को छुपाने के लिए उसने हर तरफ ये ख़बर फैला दी थी कि साहूकारों की बहन एक किसान के साथ भाग गई। उस समय बड़े दादा ठाकुर की तूती बोलती थी। वो खुद तो ताकतवर और जल्लाद था ही किंतु उसके ताल्लुक बड़ी बड़ी हस्तियों से भी थे। ये उसके ख़ौफ का ही असर था कि बाद में सब कुछ जान लेने के बाद भी हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके थे। हालाकि एक बार पिता जी अपनी इस ब्यथा को ले कर उसके पास गए भी थे लेकिन उसने स्पष्ट रूप से उन्हें धमकी दे कर कहा था कि अगर उन्होंने इस बारे में ज़्यादा हो हल्ला करने की हिमाकत की तो इसका अंजाम उनकी सोच से भी कहीं ज़्यादा उन्हें भुगतना पड़ जाएगा। बस, उसके बाद पिता जी कभी हवेली की दहलीज़ पर नहीं गए। हम लोग भी इतने परिपक्व अथवा ताकतवर नहीं थे जिसके चलते हम अपनी बहन के साथ हुए इस जघन्य अत्याचार का बदला ले लेते। वो तो अच्छा हुआ कि उस कुकर्मी को ऊपर वाले ने ही सज़ा दे दी। ऊपर वाले ने उसे ऐसा बीमार किया कि बड़ा से बड़ा वैद्य भी उसका इलाज़ न कर सका। उसके बाद उनकी गद्दी पर उनका बड़ा बेटा प्रताप सिंह बैठा। आश्चर्य की बात थी कि इतने बड़े कुकर्मी और जल्लाद का बेटा प्रताप सिंह अपने पिता की सोच और विचारों से बिल्कुल उलट था। हालाकि उसका भाई जगताप थोड़ा गुस्सैल स्वभाव का ज़रूर था किंतु ये सच है कि उसमें भी अपने पिता जैसे गुण नहीं थे। दोनों ही भाई अपनी मां पर गए थे।"

"जब प्रताप सिंह दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठा तो हमें फिर से इस बात का ख़ौफ होने लगा कि गद्दी में बैठने के बाद कहीं प्रताप सिंह की भी मानसिकता न बदल जाए।" कुछ पल रुकने के बाद गौरी शंकर ने कहा____"सत्ता और ताक़त का नशा ही ऐसा होता है बेटे कि अच्छे अच्छे शरीफ़ और संस्कारी लोग गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते हैं। हालाकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और ये हमारे लिए आश्चर्य की बात तो थी ही किंतु हम ये भी समझते थे कि प्रताप सिंह बहुत ही धीर वीर और गंभीर प्रकृति का इंसान है। उस दिन तो हम सबको और भी ज़्यादा आश्चर्य हुआ जब प्रताप सिंह दादा ठाकुर बनने के कुछ दिन बाद ही हमारे घर खुद ही आया और हमारे पिता जी से अपने पिता के द्वारा किए गए कुकर्म के लिए माफ़ी मांगी। वो मेरे पिता जी के पैरों को पकड़ के माफ़ियां मांग रहा था और यही कह रहा था कि अब से ऐसा कुछ भी नहीं होगा बल्कि दोनों ही परिवारों के बीच गहरा प्रेम भाव रहे ऐसी वो हमेशा कोशिश करेगा। प्रताप सिंह पिता जी से माफ़ी मांग कर और ये सब कह कर भले ही चला गया था लेकिन इसके बावजूद हमारे अंदर से हवेली में रहने वालों के प्रति घृणा न गई। हवेली में रहने वाले लोग हमें कभी पसंद ही नहीं आए और यही वजह थी कि हमने अपने बच्चों के अंदर भी हवेली वालों के लिए ज़हर ही भरा। आज इतना कुछ हो जाने के बाद एहसास हो रहा है कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमारे गुनहगार तो बड़े दादा ठाकुर थे और उसने जो कुकर्म किए थे उसकी सज़ा ऊपर वाले ने खुद ही दे दी थी उसे। यानि हमारा प्रतिशोध उसके मर जाने पर ही ख़त्म हो जाना चाहिए था। उसके बेटे ने या उसके भाई ने तो कभी हमारे साथ कुछ बुरा नहीं किया था। अगर वो सच में अपने पिता की तरह होता तो दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठने के बाद वो खुद हमारे घर आ कर हमारे पिता जी से माफ़ी नहीं मांगता। ख़ैर शायद ये हमारा दुर्भाग्य ही था कि हम कभी अपने अंदर से उनके प्रति गहराती घृणा को नहीं निकाल पाए जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने और भोगने को मिला है।"

"माना कि हम अपने अंदर से उनके प्रति घृणा को नहीं निकाल पाए काका।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन ये घृणा भी तो उन्हीं के द्वारा मिली थी हमें? अगर यही सब उनके साथ हुआ होता तो क्या वो इतने वर्षों तक चुप बैठे रहते? नहीं काका, वो तो पहले ही हमारा क्रिया कर्म कर चुके होते। हमने मान लिया कि हमसे ग़लती हुई लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि उस ग़लती के लिए हमारे पूरे खानदान को ही मिटा दिया जाए? ये कैसा न्याय है काका?"

"वहां पर कोई है शायद।" रूपचंद्र की बात पर गौरी शंकर अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी एक मर्दाना आवाज़ सुन कर चौंक पड़ा। उसके साथ रूपचंद्र भी चौंक पड़ा था।

"लगता है उन्होंने हमें खोज लिया है काका।" रूपचंद्र ने एकदम से आवेश में आते हुए कहा____"हमें फ़ौरन ही यहां से निकल लेना चाहिए।"

"नहीं बेटा।" गौरी शंकर ने शांत भाव से कहा____"अब हम कहीं नहीं जाएंगे। अगर यहां से हमने भागने की कोशिश की तो संभव है कि वो लोग हम पर गोली चला दें जिससे हम दोनों ही मारे जाएं। बेहतर यही है कि हम खुद को उनके सामने आत्म समर्पण कर दें।"

"आत्म समर्पण करने से भी तो वो हमें मार ही डालेंगे काका।" रूपचंद्र के चेहरे पर एकाएक ख़ौफ के भाव उभरते नज़र आए____"क्या आपको लगता है कि वो हमें जीवित छोड़ देंगे?"

"सब ऊपर वाले पर छोड़ दो बेटा।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"अब जो होगा देखा जाएगा। आत्म समर्पण करने से बहुत हद तक संभव है कि हमारे साथ वैसा सलूक न हो जैसा हमारे अपनों के साथ हुआ है।"

"वो रहे।" तभी दाएं तरफ से एक आदमी की आवाज़ आई____"घेर लो उन दोनों को किंतु सम्हल कर।"

गौरी शंकर ने जब महसूस किया कि आवाज़ एकदम पास से ही आई है तो वो अपनी जगह से किसी तरह उठा और पेड़ के पीछे से निकल कर बोला____"गोली मत चलाना, हम खुद को आत्म समर्पण करने को तैयार हैं।"

अगले कुछ ही देर में गौरी शंकर और रूपचंद्र को गिरफ़्त में ले लिया गया। शेरा के साथ पांच आदमी और थे जिन्होंने दोनों को रस्सियों में जकड़ लिया था। तलाशी में शेरा के हाथ एक पिस्तौल लगी जो रूपचंद्र के पास थी। शेरा के इशारे पर बाकी लोग दोनों चाचा भतीजे को ले कर चल पड़े।

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जैसे ही गौरी शंकर और रूपचंद्र को लिए शेरा हवेली के विशाल मैदान में लगी पंचायत के सामने पहुंचा तो लोग बड़ी तेज़ी से तरह तरह की बातें करने लगे। उधर दोनों चाचा भतीजे को देख साहूकारों के घर की औरतें और बहू बेटियों के चेहरे देखने लायक हो गए। उन सभी के चेहरों पर डर और घबराहट साफ दिखाई देने लगी थी। ज़ाहिर है उन सभी को ये एहसास हो गया था कि उनके घर के अंतिम बचे हुए मर्द भी अब मौत के मुंह में आ गए हैं।

वातावरण में एक सनसनी सी फैल गई। मंच पर बैठे महेंद्र सिंह के कहने पर गौरी शंकर और रूपचंद्र को बेड़ियों से आज़ाद कर दिया गया। दोनों चाचा भतीजे सिर झुकाए खड़े थे। ये अलग बात है कि इसके पहले वो दोनों एक एक कर के वहां उपस्थित सभी का चेहरा देख चुके थे।

"गौरी शंकर सिंह।" मंच में कुर्सी पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में गौरी शंकर को देखते हुए कहा____"क्या तुम क़बूल करते हो कि तुमने मुंशी चंद्रकांत के साथ मिल कर हवेली में रहने वालों के ख़िलाफ़ गहरी साज़िश रची और फिर उसी साज़िश के तहत ठाकुर जगताप सिंह और बड़े कुंवर अभिनव सिंह की हत्या की? इतना ही नहीं चंदनपुर में अपने आदमियों को भेज कर ठाकुर साहब के छोटे बेटे वैभव को भी जान से मारने का प्रयास किया था?"

"नहीं नहीं।" गौरी शंकर की बीवी सुनैना सिंह तेज़ी से भागती हुई गौरी शंकर के पास आई, फिर उसे देखते हुए लगभग रोते हुए बोली____"कह दीजिए कि आप पर लगाए गए ये सारे आरोप झूठ हैं। बता दीजिए सबको कि आपने किसी के भी साथ मिल कर न तो कोई साज़िश रची है और ना ही किसी की हत्या की है।"

सुनैना की बातों को सुन कर गौरी शंकर ने सख़्ती से अपने होठ भींच लिए। चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते और लोप होते नज़र आए। तभी मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से सुनैना देवी से कहा____"आप एक तरफ हट जाएं, हमने जिससे सवाल किया है उसे जवाब देने दें।"

सुनैना देवी तब भी न हटीं। वो अपने पति को आशा भरी नज़रों से देखती रहीं। उधर कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद गौरी शंकर ने कहा____"हां, मैं क़बूल करता हूं ठाकुर साहब कि मुंशी चंद्रकांत के साथ मिल कर हमने ही ये सब किया है।"

"नहीं.....नहीं।" सुनैना देवी पूरी ताक़त से चिल्ला उठी____"ये सच नहीं हो सकता। कह दीजिए कि ये सब झूठ है। कह दीजिए कि आपने कुछ नहीं किया है।"

सुनैना देवी कहने के साथ ही वहीं घुटनों के बल बैठ कर फूट फूट कर रोने लगी। यही हाल उनके घर की बाकी औरतों और बहू बेटियों का भी था। गौरी शंकर ने जब अपनी बीवी को यूं सरे आम फूट फूट कर रोते देखा तो उसका कलेजा हिल गया। अपने अंदर उमड़ उठे भयंकर तूफ़ान सतत को उसने अपनी आंखें बंद कर के जज़्ब करने की कोशिश की। उधर रूपचंद्र का चेहरा अजीब तरह से सख़्त नज़र आ रहा था।

"क्यों? आख़िर क्यों?" मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह तेज़ आवाज़ में बोले____"पंचायत ही नहीं बल्कि यहां उपस्थित सब लोग भी ये जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों किया तुमने?"

"हम चारो भाई।" गौरी शंकर ने अजीब भाव से कहा____"अपने अंदर से वर्षों पहले पैदा हुई नफ़रत को कभी मिटा नहीं पाए ठाकुर साहब। वर्षों पहले जो ज़ख्म बड़े दादा ठाकुर ने हमें हमारी बहन गायत्री को बर्बाद कर के दिया था वो ज़ख्म कभी भरा ही नहीं बल्कि हर गुज़रते वक्त के साथ वो नासूर ही बनता चला गया। बहुत कोशिश की हमने हवेली में रहने वालों के प्रति अपनी नफ़रत को दूर करने की मगर कभी कामयाब न हो सके। ये उसी का नतीजा है ठाकुर साहब कि हमारे द्वारा ये सब हो गया और हमारे साथ भी इतना कुछ हो गया।"

"तुम जिस ज़ख्म की बात कर रहे हो गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"उसका पहले भी हमें बेहद दुख और अफ़सोस था और उसके लिए हमारे पिता भले ही खुद को गुनहगार न समझते रहे हों मगर हम ज़रूर समझते थे। तभी तो उनके बाद जब हम दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठे तो हम खुद तुम्हारे घर आए और उनके द्वारा किए गए जघन्य अपराध के लिए तुम्हारे पिता जी से हमने माफ़ी मांगी थी। इतना ही नहीं ये वचन भी दिया था कि अब से कभी भी हमारे द्वारा तुम में से किसी के भी साथ बुरा नहीं होगा। ऊपर वाले की क़सम खा कर कहो कि क्या हमने अपने इस वचन को नहीं निभाया? बच्चों के लड़ाई झगड़े की बातें छोड़ो क्योंकि बच्चे तो अक्सर झगड़ते ही हैं लेकिन क्या कभी किसी ने उस नीयत से तुम्हारे साथ बुरा किया कभी?"

"माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" गौरी शंकर सहसा घुटनों के बल बैठ गया____"ये हमारा दुर्भाग्य ही था कि हम चारो भाई उस बात को कभी अपने दिल से निकाल नहीं सके और हमेशा आपसे नफ़रत करते रहे। ऐसा शायद इस लिए भी कि इतने वर्षों की खोज के बाद भी जब हमें हमारी बहन कहीं नहीं मिली तो मन में हवेली में रहने वालों के प्रति नफ़रत में और भी इज़ाफा होता गया। एक ही तो बहन थी हमारी। वर्षों से हम चारो भाइयों की कलाइयां सूनी थी। जब भी रक्षाबंधन का पावन त्यौहार आता था तो बहन की याद आती थी और अपनी अपनी कलाइयां देख कर हम चारो भाइयों के अंदर टीस सी उभरती थी। बस, जिस ज़ख्म को भरने की कोशिश करते थे वो ये सब सोच कर फिर से हरा हो जाता था। ज़हन में बस यही सवाल उभरते थे कि आख़िर क्या कसूर था हमारी बहन का? क्यों वो बड़े दादा ठाकुर की हवस का शिकार हो गई और क्यों उसे इस तरह से गायब कर दिया गया कि आज इतने वर्षों बाद भी उसका कहीं कोई पता तक नहीं है? वो इस दुनिया में कहीं है भी या उसे जान से ही मार दिया गया? दादा ठाकुर, कहने के लिए अक्सर लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं मगर जिनके साथ गुज़रती है उसका दर्द वही जानते हैं।"

"माना कि तुम्हारी बहन के साथ गुनाह ही नहीं बल्कि संगीन अत्याचार हुआ था।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"लेकिन किसी और के द्वारा किए गए गुनाह के लिए किसी दूसरे की हत्या कर देना क्या उचित था?"

"उचित तो ये भी नहीं था न ठाकुर साहब कि हमने जो किया वही दादा ठाकुर ने भी कर दिया।" गौरी शंकर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"मान लिया मैंने कि हम चारो भाइयों ने किसी और के द्वारा किए गए अपराध के चलते बदले की भावना में मझले ठाकुर और बड़े कुंवर की हत्या कर दी। मगर इन्होंने जो किया क्या वो सही था? अगर इन्हें सच में पता चल गया था कि हमने ही वो सब किया था तो क्या इन्हें इतना जल्दी नर संघार ही कर देना चाहिए था? क्या इन्हें एक बार भी ये नहीं सोचना चाहिए था कि हमें भी अपनी बात रखने का मौका देना चाहिए? ये तो मुखिया हैं ठाकुर साहब और सिर्फ इसी गांव बस के ही नहीं बल्कि आस पास कई गावों के भी। इसके बावजूद इन्होंने इस मामले का फ़ैसला किसी पंचायत में नहीं बल्कि जंग के मैदान में कर डाला। क्या ये अन्याय और अपराध नहीं है?"

"बेशक है।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"और यकीन मानो हर अपराधी को उचित दंड दिया जाएगा, फिर चाहे वो खुद दादा ठाकुर ही क्यों न हों।"

"हमें हमारे अपराध के लिए मिलने वाली सज़ा से इंकार नहीं है।" पिता जी ने कहा____"किंतु उससे पहले हम कुछ और भी जानना चाहते हैं। अभी भी कुछ ऐसा बाकी है जिसे हमारे लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए जानना ज़रूरी है।"

"आपके मन में अगर अभी कुछ सवाल हैं तो बेशक पूछ सकते हैं।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"हम भी उत्सुक हैं ये जानने के लिए कि इस मामले में अभी और क्या शेष है?"

"ये तो समझ आया कि अपनी नफ़रत के चलते अथवा ये कहें कि बदले की भावना के चलते गौरी शंकर ने अपने भाइयों सहित हमारे मुंशी चंद्रकांत के साथ गठजोड़ कर के ये सब किया।" पिता जी के कहा____"किंतु हम इन लोगों से ये भी जानना चाहते हैं कि इन लोगों ने अपने साथ किसी सफ़ेदपोश का ज़िक्र क्यों नही किया? जबकि शुरू से ही वो रहस्यमय आदमी हमारे छोटे बेटे वैभव को जान से मारने की फ़िराक में रहा है और इतना ही नहीं कई बार उसने उसके ऊपर जान लेवा हमला भी किया। और तो और अभी पिछली रात वो हमारी हवेली के बाहर बने कमरे से मुरारी के भाई जगन को भी छुड़ा ले गया।"

"मैं किसी सफ़ेदपोश को नहीं जानता ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"बल्कि ये जान कर तो अब मैं खुद ही हैरान हो गया हूं कि हमारे अलावा भी कोई ऐसा था जो हवेली के किसी व्यक्ति को जान से मारना चाहता था।"

"तो आप ये कहना चाहते हैं कि ऐसे किसी सफ़ेदपोश को आप नहीं जानते?" पिता जी ने कहा____"और ना ही उससे आपका कोई ताल्लुक है?"

"अगर जानता तो क़बूल करने में मुझे भला क्या आपत्ति होती ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने कहा____"जब इतना सब क़बूल कर लिया है तो उसके बारे में भी क़बूल कर लेता।"

"तुम्हारा क्या कहना है उस सफ़ेदपोश के बारे में?" पिता जी ने मुंशी की तरफ पलट कर उससे पूछा____"क्या तुम्हें भी उसके बारे में कुछ नहीं पता?"

"हाहाहाहा।" पिता जी के पूछने पर मुंशी पहले तो ज़ोर से हंसा फिर बोला____"वैसे तो मैं ऐसे किसी सफ़ेदपोश के बारे में नहीं जानता और ना ही मेरा उससे कोई संबंध है लेकिन इस बात से मैं खुश ज़रूर हूं कि हमारे बाद भी अभी कोई है जो हवेली में रहने वालों से इस क़दर नफ़रत करता है कि उनकी जान तक लेने का इरादा रखता है। ख़ास कर इस वैभव सिंह की। ये तो कमाल ही हो गया, हाहाहा।"

मुंशी चंद्रकांत जिस तरीके से हंस रहा था उसे देख मेरा खून खौल उठा। गुस्से से मेरी मुट्ठियां भिंच गईं। जी किया कि अभी जा के उसकी गर्दन मरोड़ दूं मगर फिर किसी तरह अपने गुस्से को पी कर रह गया।


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अध्याय - 75

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"हाहाहाहा।" पिता जी के पूछने पर मुंशी पहले तो ज़ोर से हंसा फिर बोला____"वैसे तो मैं ऐसे किसी सफ़ेदपोश के बारे में नहीं जानता और ना ही मेरा उससे कोई संबंध है लेकिन इस बात से मैं खुश ज़रूर हूं कि हमारे बाद भी अभी कोई है जो हवेली में रहने वालों से इस क़दर नफ़रत करता है कि उनकी जान तक लेने का इरादा रखता है। ख़ास कर इस वैभव सिंह की। ये तो कमाल ही हो गया, हाहाहा।"

मुंशी चंद्रकांत जिस तरीके से हंस रहा था उसे देख मेरा खून खौल उठा। गुस्से से मेरी मुट्ठियां भिंच गईं। जी किया कि अभी जा के उसकी गर्दन मरोड़ दूं मगर फिर किसी तरह अपने गुस्से को पी कर रह गया।


अब आगे....

मुंशी चंद्रकांत और गौरी शंकर ने जिस तरह से सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता जताई थी उससे दादा ठाकुर ही नहीं बल्कि मैं खुद भी सोच में पड़ गया था। ये तो स्पष्ट था कि सफ़ेदपोश के बारे में वो दोनों झूठ नहीं बोल रहे थे क्योंकि अब झूठ बोलने का ना तो कोई समय था और ना ही इससे उन्हें कोई फ़ायदा था। तो अब सवाल ये था कि अगर सच में उन दोनों का संबंध अथवा कोई ताल्लुक सफ़ेदपोश से नहीं है तो फिर कौन है सफ़ेदपोश? आख़िर वो कौन हो सकता है जो खुद को सफ़ेदपोश के रूप में हमारे सामने स्थापित कर चुका है और हमसे दुश्मनी रखता है?

सफ़ेदपोश एक ऐसा रहस्यमय किरदार है जो हमारे लिए गर्दन में लटकी तलवार की तरह साबित हो चुका है। अगर ये पता चल जाए कि वो कौन है तो ज़ाहिर है कि ये भी समझ में आ ही जाएगा कि वो हमें अपना दुश्मन क्यों समझता है? इतना कुछ होने के बाद लगा था कि अब सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल गया है किंतु नहीं, ऐसा लगता है जैसे सबसे बड़ी मुसीबत और ख़तरा तो वो सफ़ेदपोश ही है। समझ में नहीं आ रहा कि वो अचानक कहां से आ टपकता है और फिर कैसे गायब हो जाता है?

"यहां किसी और को भी अगर कुछ कहना है तो कह सकता है।" मंच पर बैठे महेंद्र सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"अगर किसी को लगता है कि उसके साथ ठाकुर साहब ने अन्याय किया है अथवा उसके साथ किसी तरह का इंसाफ़ नहीं हुआ है तो बेझिझक वो अपनी बात इस पंचायत के सामने रख सकता है।"

ठाकुर महेंद्र सिंह की ये बात सुन कर भीड़ में खड़े लोग एक दूसरे की तरफ देखने लगे। कुछ देर बाद दो आदमी भीड़ से निकल कर बाहर आए। ये वही थे जिनकी बीवियां हवेली में काम करती थीं और कुछ दिन पहले जिनकी हत्या हो गई थी।

"प्रणाम ठाकुर साहब।" उनमें से एक ने कहा____"हम दोनों ये कहना चाहते हैं कि दादा ठाकुर की हवेली में हम दोनों की बीवियां काम करती थीं और कुछ दिनों पहले उनकी हत्या हो गई। हमारे छोटे छोटे बच्चे बिना मां के हो गए। क्या हमें ये जानने का हक़ नहीं है कि किसने उनकी हत्या की और क्यों की?"

"ठाकुर साहब आपका क्या कहना है इस बारे में?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने पिता जी से पूछा।

"ये सच है कि इन दोनों की बीवियां हमारी हवेली में काम करती थीं।" पिता जी ने कहा____"कुछ समय पहले उन दोनों की आश्चर्यजनक रूप से हत्या कर दी गई थी। हमने उनकी हत्या की तहक़ीकात की तो जल्द ही हमें पता चल गया कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ? असल में वो दोनों औरतें किसी अज्ञात व्यक्ति के द्वारा मजबूर किए जाने पर हवेली में ग़लत काम को अंजाम दे रहीं थी। हमें तो इसका पता भी न चलता किंतु कहते हैं ना कि ग़लत करने वाले के साथ ही बुरा होता है फिर चाहे वो जैसे भी हो। उन दोनों को जिसने मजबूर किया हुआ था उसने उन्हें साफ तौर पर ये समझाया हुआ था कि अगर पकड़े जाने का ज़रा सा भी अंदेशा हो तो वो अपनी जान ले लें। एक ने तो हवेली में ही ज़हर खा कर अपनी जान ले ली थी जबकि दूसरी हवेली से भाग गई थी। शायद उस वक्त उसके पास ज़हर नहीं था इस लिए पकड़े जाने के डर से वो हवेली से भाग गई। हमारे बेटे ने उसका पीछा किया किंतु लाख कोशिश के बावजूद ये उसे बचा नहीं सका। ऐसा इस लिए क्योंकि दोनों औरतों को मजबूर करने वाला वहां पहले से ही मौजूद था और उसने इसकी बीवी की हत्या कर दी। ये सब बातें हमारे छोटे भाई जगताप ने इन दोनों को बताया भी थी। कहने का मतलब ये है ठाकुर साहब कि इन दोनों की बीवियों की हत्या से हमारा कोई संबंध नहीं है बल्कि सच ये है कि उन्हें खुद ही उनके ग़लत कर्म करने की सज़ा मिल गई। हमारे लिए ये जानना ज़रूरी था कि आख़िर उन दोनों को मजबूर करने वाला वो व्यक्ति कौन हो सकता है किंतु अब हम समझ चुके हैं कि वो कौन है?"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने चौंकते हुए पूछा। इधर पिता जी की बात सुन कर भीड़ में खड़े लोग भी हैरानी से देखने लगे थे। जबकि महेंद्र सिंह जी के पूछने पर पिता जी ने गौरी शंकर की तरफ देखा। गौरी शंकर ने झट से सिर झुका लिया।

"उन दोनों औरतों की जब हत्या हो गई थी तो हमारे गांव के साहूकार मणि शंकर जी हमारी हवेली पर हमसे मिलने आए थे।" पिता जी ने कहा____"उस समय जिस तरह से उन्होंने अपना पक्ष रख कर हमसे बातें की थी उससे हमें भी यही लगा था कि यकीनन किसी और ने ही उन औरतों की कुछ इस तरह से हत्या की है कि हमारे ज़हन में उनके हत्यारे के रूप में गांव के साहूकारों का ही ख़याल आए। हमने सोचा कि हो सकता है कि वो हम दोनों परिवारों के संबंध सुधर जाने से नाराज़ हो गया होगा और हर्गिज़ नहीं चाहता होगा कि हमारा आपस में ऐसा प्रेम संबंध हो। बहरहाल दिमाग़ भले ही नहीं मान रहा था लेकिन हमने दिमाग़ की जगह दिल की सुनना ज़्यादा बेहतर समझा। आख़िर हम भी तो नहीं चाहते थे कि दोनों परिवारों के बीच एक दिन में ही बैर भाव अथवा किसी तरह का संदेह भाव पैदा हो जाए। सच तो ये है कि हमें उस दिन दिल की नहीं बल्कि दिमाग़ की ही सुननी चाहिए थी और समझ जाना चाहिए था कि साहूकारों का हमसे अपने रिश्ते सुधार लेना सिर्फ और सिर्फ एक दिखावा था। बल्कि ये कहना ज़्यादा उचित होगा कि रिश्तों को सुधार लेना उनकी योजना का एक हिस्सा था। क्यों गौरी शंकर हमने सच कह न?"

"हां।" गौरी शंकर ने हताश भाव से कहा____"मगर अब समझे तो क्या समझे ठाकुर साहब? पर शायद सच यही है कि उस समय अगर आपने दिल की सुनी तो ये आपकी नेक नीयती और उदारता की ही बात थी। यानि आप सच में यही चाहते थे कि हमारे रिश्ते ऐसे ही बेहतर बने रहें मगर हम इतने नेक और उदार नहीं थे। हमारे अंदर तो वर्षों से बदले की भावना धधक रही थी जिसके चलते हमने कभी ये सोचना गवारा ही नही किया कि बदला लेने की जगह अगर हम दोनों परिवार मिल कर एक नई शुरुआत करें तो कदाचित दोनों ही परिवारों का भविष्य बेहद सुखद हो सकता है। ख़ैर ये सच है कि हमने ही इन लोगों की औरतों को मजबूर कर के हवेली में नौकरानी के रूप में स्थापित किया था। एक का काम था वैभव को चाय में थोड़ा थोड़ा मिला कर ऐसा ज़हर देना जिसकी वजह से वैभव की मर्दानगी हर रोज़ कम होती जाए और फिर एक दिन वो पूरी तरह से नामर्द ही बन जाए। दूसरी का काम था हवेली में गुप्त रूप से आपकी ज़मीनों के कागज़ात खोज कर उन्हें हासिल करना। उन दोनों को सख़्त आदेश था कि अगर उन्हें ज़रा सा भी लगे कि उनका भेद खुल गया है अथवा उनका पकड़े जाना निश्चित है तो वो हमारे द्वारा दिए गए ज़हर को खा कर अपनी जान ले लें।"

"बस कीजिए।" सुनैना देवी रोते हुए चीख ही पड़ी____"और कितने गुनाहों का बखान करेंगे आप? यकीन नहीं होता कि इतना सब कुछ मेरे घर के मर्दों ने किया है। काश! मुझे थोड़ा सा भी इल्म हो जाता तो मैं ये सब आपको करने ही नहीं देती। हे ईश्वर! किसी इंसान की बुद्धि इतनी भ्रष्ट कैसे हो सकती है? कोई खुशी खुशी इतने बड़े बड़े पाप कैसे कर सकता है?"

"चुप हो जाइए मां।" गौरी शंकर की बेटी राधा ने दुखी भाव से अपनी मां से कहा____"ये सब सोच कर इस तरह आंसू बहाने से अब क्या होगा? कितना गर्व करते थे हम कि हमारे अपने कितने अच्छे हैं लेकिन क्या पता था कि अच्छी सूरतों के पीछे कितने बड़े शैतान छुपे हुए हैं।"

कहने के साथ ही राधा अपने पिता गौरी शंकर से मुखातिब हुई और फिर बोली____"मैंने कभी भी आप में से किसी के भी सामने कुछ बोलने की हिमाकत नहीं की पिता जी। ऐसा सिर्फ इस लिए क्योंकि ये सब आप लोगों द्वारा दिए गए अच्छे संस्कार थे। मैं आपसे सिर्फ इतना जानना चाहती हूं कि आख़िर क्या हासिल कर लिया आपने बदला ले कर? क्या इस बदले से आप अपने उस परिवार को अपार खुशियां दे पाए जो अब तक सबके साथ हंसी खुशी जी रहे थे?"

"म...मुझे माफ़ कर दे बेटी।" गौरी शंकर अपनी बेटी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था, बोला____"ऊपर बैठा विधाता हमसे यही करवाना चाहता था। कहते हैं कि वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं होता। वो बड़े से बड़े नासूर बन गए ज़ख्मों को भी भर देता है मगर कदाचित वो हमारे ज़ख्म नहीं भर सका। अगर भर दिया होता तो क्या आज हम सब ऐसी हालत में होते?"

"मैं ज़्यादा तो कुछ नहीं जानती पिता जी।" राधा ने कहा____"किंतु आप लोगों से ही सुना है कि इंसान के हाथ में सिर्फ कर्म करना ही होता है। तो अब आप ही बताइए अगर इंसान के बस में सिर्फ कर्म करना था तो आपने ऐसे कर्म क्यों किए जिसकी वजह से हमारा पूरा परिवार मिट्टी में मिल गया? अपने कर्म को विधाता अथवा किस्मत का लिखा मत बताइए। विधाता आपसे ये कहने नहीं आया कि आप बदले की आग में जलिए और किसी की हत्या कर दीजिए।"

गौरी शंकर अवाक सा देखता रह गया अपनी बेटी को। कुछ कहना तो चाहा उसने लेकिन जुबान ने साथ नहीं दिया। उसके बगल से रूपचंद्र किसी पुतले की तरह खड़ा था।

"अब हम सबका क्या होगा पिता जी?" राधा की आंखें छलक पड़ीं____"आप लोगों ने तो बदला लेने के चक्कर में खुद को ही मिटा दिया मगर हमारा क्या? आपके घर की ये औरतें और आपकी बहू बेटियां किसके सहारे जियेंगी अब?"

राधा की बातें सुन कर और उसका रोना देख भीड़ में खड़े जाने कितने ही लोगों की आंखें नम हो गईं। मुझे खुद भी बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था। तभी मैंने देखा रूपा आगे आई और उसने राधा को अपने से छुपका लिया। राधा उससे छुपक कर और भी ज़्यादा रोने लगी। गौरी शंकर अपनी बेटी और अपने घर की बाकी औरतों को नम आंखों से देखता रहा।

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"पंच के रूप में हमने आप सबकी बातें और साथ ही दुख तकलीफ़ों को बड़े ध्यान से सुना है।" मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह ने मैदान में खड़े समस्त जन समूह को देखते हुए ऊंचे स्वर में कहा____"ये एक ऐसा मामला है जिसका फ़ैसला करना बिल्कुल भी आसान नहीं हैं। अगर गहराई से सोचा जाए तो इस मामले का फ़ैसला किसी के लिए भी बेहतर नहीं हो सकता। माना कि कुछ लोगों को इसके फ़ैसले से आत्मिक शांति मिल सकती है लेकिन ये भी सच है कि महज आत्मिक शांति से किसी के भी परिवार के सदस्यों का जीवन बेहतर तरीके से नहीं चल सकता।"

"यहां ऐसे भी हैं जो हमारे फ़ैसले पर पक्षपात करने का आरोप भी लगा सकते हैं।" कुछ पल की ख़ामोशी के बाद महेंद्र सिंह ने पुनः कहा____"ऐसे व्यक्तियों से हमारा यही कहना है कि अगर वो चाहें तो इस मामले को हमारे देश के कानून के समक्ष रख सकते हैं और उसी कानून के द्वारा इंसाफ़ हासिल कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करने से पहले ये भी अच्छी तरह सोच लें कि देश का कानून जो फ़ैसला सुनाएगा उससे किसी का भी भला नहीं हो सकेगा जबकि हमने इस मामले में ऐसा फ़ैसला करने का सोचा है जिससे सबका भला भी हो सके। क्या आप सब हमारी इस बात से सहमत हैं?"

ठाकुर महेंद्र सिंह की इन बातों को सुन कर पूरे जन समूह में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे उनमें से किसी को भी महेंद्र सिंह जी की बातें समझ नहीं आईं थी।

"इसमें इतना सोच विचार करने की ज़रूरत नहीं है किसी को।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने किसी को कुछ न बोलता देख कहा____"बहुत ही सरल और साधारण सी बात है जिसे आप सबको समझने की ज़रूरत है। आप सब जानते हैं कि इस मामले से जुड़ा हर व्यक्ति गुनहगार है। इस मामले से जुड़े हर व्यक्ति ने एक दूसरे के अपनों की हत्याएं की हैं और हत्याएं करना सबसे बड़ा अपराध है जिसकी कोई माफ़ी नहीं हो सकती। अगर ये सोच कर हम फ़ैसला करें कि हर हत्यारे को मौत की सज़ा दी जाए तो क्या ये उचित होगा? एक तरफ इस गांव के साहूकार हैं जिन्होंने अपनी वर्षों पुरानी दुश्मनी के चलते ठाकुर साहब के छोटे भाई और बड़े बेटे की हत्या की और इतना ही नहीं उनके छोटे बेटे का भी जीवन बर्बदाद कर देना चाहा। बदले में ठाकुर साहब ने भी बदले के रूप में साहूकारों का संघार कर दिया। दोनों परिवारों में गुनहगार के रूप में एक तरफ गौरी शंकर और रूपचंद्र हैं तो दूसरी तरफ ठाकुर साहब। अब अगर इनके अपराधों के लिए इन्हें मौत की सज़ा सुना दी जाए तो क्या ये उचित होगा? सवाल है कि गौरी शंकर और रूपचंद्र की मौत हो जाने के बाद इनके घर परिवार की औरतों और बहू बेटियों का क्या होगा? वो सब किसके सहारे अपना जीवन बसर करेंगी? यही सवाल ठाकुर साहब के बारे में भी है कि अगर इन्हें मौत की सज़ा दी जाएगी तो हवेली में रहने वाले किसके सहारे जिएंगे? दूसरी तरफ मुंशी चंद्रकांत हैं जिन्होंने अपनी दुश्मनी ठाकुर साहब से निकाली और इन्होंने साहूकारों के साथ मिल कर मझले ठाकुर जगताप और बड़े कुंवर अभिनव की हत्या की। हालाकि बदले में ठाकुर साहब ने इनकी अथवा इनके बेटे की हत्या नहीं की। इस हिसाब से देखा जाए तो वास्तव में ये दोनो पिता पुत्र ठाकुर साहब के अपराधी हैं और इन्होंने जो किया है उसके लिए इन्हें यकीनन मौत की सज़ा ही मिलनी चाहिए लेकिन सवाल वही है कि क्या इन्हें भी ऐसी सज़ा देना उचित होगा? आखिर इनके बाद इनके घर की औरतों का क्या होगा?"

ठाकुर महेंद्र सिंह इतना सब कहने के बाद भीड़ में खड़े लोगों की तरफ देखने लगे। इतने बड़े जन समूह में आश्चर्यजनक रूप से सन्नाटा फैला हुआ था। किसी को भी महेंद्र सिंह से ऐसी बातों की उम्मीद नहीं थी।

"पंच के रूप में बिना कोई पक्षपात किए न्याय करना हमारा फर्ज़ है।" उन्होंने फिर से कहना शुरू किया____"किंतु हमारा ये देखना भी फ़र्ज़ है कि इस सबके बाद भी किसी के लिए क्या उचित है? देखिए, जो बीत गया अथवा जो कर दिया गया वो सिर्फ दुश्मनी या बदले की भावना से किया गया। हम अच्छी तरह जानते हैं कि इतना कुछ करने के बाद भी किसी को भी सुख चैन नहीं मिला होगा बल्कि सिर्फ दुख और ज़माने भर की निंदा ही मिली है। इस लिए हम व्यक्तिगत रूप से ये चाहते हैं कि सब कुछ भुला कर आप सब एक नए सिरे से शुरुआत कीजिए। किसी से बैर रख कर किसी की हत्या करने से कभी कोई खुशी हासिल नहीं हो सकती। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते कि आप लोगों की वजह से आपके घर परिवार के बाकी सदस्यों का जीवन नर्क के समान हो जाए। इस लिए अगर आप सबको हमारी ये बातें समझ आ रही हैं तो बेझिझक हो कर हमें बता दें। बाकी पंच के रूप में तो हमें फ़ैसला करना ही है लेकिन ये भी सच है कि उस फ़ैसले से यही होगा कि जो कुछ बचा है वो भी बर्बाद हो जाएगा।"

इस बार जन समूह में खुसुर फुसुर की आवाज़ें आनी शुरू हो गईं। साहूकार गौरी शंकर और रूपचंद्र के चेहरों पर अजीब तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। यही हाल मुंशी चंद्रकांत और उसके बेटे रघुवीर का भी था।

"ठाकुर साहब।" सहसा गौरी शंकर ने कहा____"अगर ऐसा सच में हो सकता है तो ये हमारे लिए खुशी की ही बात होगी लेकिन इसका यकीन भला हम कैसे करें कि इसके बाद हम पर या हमारे परिवार के किसी सदस्य पर ठाकुर साहब का क़हर नहीं बरपेगा?"

"मेरा भी यही कहना है ठाकुर साहब।" मुंशी चंद्रकांत ने महेंद्र सिंह से कहा____"हम कैसे भरोसा करें कि हमारे द्वारा इतना कुछ किए जाने के बाद ठाकुर साहब द्वारा हम पर कभी कोई आंच नहीं आएगी? ठाकुर साहब का तो हम एक घड़ी के लिए यकीन भी कर सकते हैं किंतु हमें छोटे कुंवर पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।"

"बेशक आप लोगों का ऐसा सोचना जायज़ है चंद्रकांत।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"किंतु यही बात आप लोगों पर भी तो लागू होती है। ये तो सभी जानते हैं कि जब से दादा ठाकुर की कुर्सी पर ठाकुर प्रताप सिंह बैठे हैं तब से इनके द्वारा कभी भी किसी का अनिष्ट नहीं हुआ। इन्होंने हमेशा सबकी भलाई का ही काम किया है और हर ज़रूरतमंद की हर तरह से मदद की है। ज़ाहिर है इतना कुछ होने के बाद भी आम जनता को इन पर भरोसा होगा कि इसके बाद भी इनके द्वारा आप लोगों के साथ ही नहीं बल्कि किसी के साथ भी अनिष्ट नहीं होगा। हां, आम जनता को आप लोगों पर ही भरोसा नहीं हो सकेगा क्योंकि हत्या जैसे अपराध तो आप लोगों ने ही करने शुरू किए थे। इस बारे में क्या कहेंगे आप लोग?"

ठाकुर महेंद्र सिंह की ये बातें सुन कर गौरी शंकर और चंद्रकांत कुछ न बोले। कदाचित उन दोनों को ही इस बात का एहसास हो गया था कि उनके बारे में जो कुछ महेंद्र सिंह ने कहा है वो एक कड़वा सच है। तभी सहसा जन समूह में से कुछ लोग चिल्लाने लगे। एक साथ कई लोगों के स्वर वातावरण में गूंज उठे। सबका यही कहना था कि उन्हें साहूकार गौरी शंकर और मुंशी चंद्रकांत पर भरोसा नहीं है।

"कमाल है।" मंच पर बैठे ठाकुर महेंद्र सिंह मुस्कुराते हुए बोल उठे____"हमने तो बस अपना अंदेशा ज़ाहिर किया था लेकिन हमारे अंदेशे की पुष्टि तो यहां मौजूद लोगों ने ही कर दी। क्या अब भी आप लोगों को लगता है कि इस तरह का सवाल आप लोगों को करना चाहिए था?"

गौरी शंकर और मुंशी चंद्रकांत ने सिर झुका लिया। इधर महेंद्र सिंह ने पिता जी से कहा____"आपका क्या कहना है ठाकुर साहब? हमारा मतलब है कि क्या आप हमारी व्यक्तिगत राय से सहमत हैं? क्या आप भी ये समझते हैं कि सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से शुरुआत की जाए ताकि जो कुछ बचा है वो बर्बाद होने से बच जाए? अगर आप सहमत हैं और आपकी इजाज़त हो तो इस मामले का यही फ़ैसला हम सुना देते हैं।"

"हम आपकी बातों से सहमत हैं।" पिता जी ने कहा____"हम खुद भी नहीं चाहते कि किसी कठोर फ़ैसले की वजह से गौरी शंकर के परिवार की औरतें और उनकी बहू बेटियां अनाथ और बेसहारा हो जाएं। हम तो पहले भी यही चाहते थे कि दोनों परिवार प्रेम पूर्वक रहें और ऐसा हमेशा ही चाहेंगे। हां ये सच है कि हमने गुस्से में आ कर इनके भाइयों और बच्चों को मार डाला जिसका अब हमें बेहद अफ़सोस ही नहीं बल्कि बेहद दुख भी हो रहा है। हम चाहते हैं कि किसी और को उनके अपराधों की सज़ा मिले या न मिले लेकिन हमें ज़रूर मिलनी चाहिए। इतना बड़ा नर संघार करने के बाद हम कभी चैन से जी नहीं पाएंगे। अच्छा होगा कि हमें मौत की सज़ा सुना दी जाए।"

पिता जी की बात सुन कर मैं तो हैरान हुआ ही था किंतु गौरी शंकर और मुंशी चंद्रकांत भी आश्चर्य से देखने लगे थे उन्हें। कदाचित उन्हें मेरे पिता जी से ऐसा सुनने की सपने में भी उम्मीद नहीं थी।

"ऐसा नहीं हो सकता ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"अगर सज़ा मिलेगी तो फिर हर अपराधी को सज़ा मिलेगी अन्यथा किसी को भी नहीं। वैसे आपके लिए ये सज़ा जैसा ही होगा कि आप अपने गुनाहों का जीवन भर पश्चाताप करते रहें। एक और बात, आज के बाद अब आप कभी भी पंच अथवा मुखिया नहीं बन सकते।"

"हत्या जैसा अपराध करने के बाद तो हम खुद भी पंच अथवा मुखिया बने रहना पसंद नहीं करेंगे ठाकुर साहब।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"पंच अथवा मुखिया तो परमेश्वर का रूप होता है, हमारे जैसा हत्यारा नहीं हो सकता।"

उसके बाद जब सभी पक्ष राज़ी हो गए तो यही फ़ैसला किया गया कि सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से शुरआत की जाए। ज़ाहिर है ये फ़ैसला इसी बिना पर किया गया कि इससे सभी के परिवारों का भला हो सके। पंच के रूप में ठाकुर महेन्द्र सिंह ने सभी पक्षों को ये सख़्त हिदायत दी कि अब से कोई भी एक दूसरे का बुरा नहीं करेगा अन्यथा कठोर दण्ड दिया जाएगा।

गौरी शंकर इस फ़ैसले से खुश तो हुआ लेकिन अपने भाइयों तथा बच्चों की मौत से बेहद दुखी भी था। दूसरी तरफ मुंशी चंद्रकांत सामान्य ही नज़र आया। सफ़ेदपोश के बारे में यही कहा गया कि उसे जल्द से जल्द तलाश कर के पंच के सामने हाज़िर किया जाए। हालाकि ये अब हमारा मामला था जिसे देखना हमारा ही काम था। ख़ैर इस फ़ैसले से मुझे भी खुशी हुई कि चलो एक बड़ी मुसीबत टल गई वरना इतना कुछ होने के बाद कुछ भी हो सकता था। सहसा मेरे मन में ख़याल उभरा कि _____'इस तरह का फ़ैसला शायद ही किसी काल में किसी के द्वारा किया गया होगा।'


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