Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 13 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 83

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"जिन लोगों ने ये सब किया था उनके साथ भी तो वैसा ही किया गया है।" मैंने सहसा सख़्त भाव से कहा____"अब वो लोग ख़्वाब में भी किसी के साथ ऐसा करने का नहीं सोचेंगे।"

थोड़ी देर इसी संबंध में कुछ बातें हुईं उसके बाद मैं भुवन से ये कह कर वहां से चला आया कि अगले दिन सभी मजदूरों से मिलना है जिसके लिए सारा इंतजाम कर दे। असल में अनुराधा की मौजूदगी से मैं कुछ ज़्यादा ही असहज हो रहा था। उसके चेहरे पर छाई उदासी मुझे अंदर ही अंदर कचोटने लगी थी। यही वजह थी कि मैं वहां से चल पड़ा था।


अब आगे....

अगले दो चार दिनों तक मैं काफी ब्यस्त रहा।

इस बीच मैंने खेतों पर काम करने वाले सभी मजदूरों से मिला और उनसे हर चीज़ के बारे में जानकारी लेने के साथ साथ उन्हें बताया भी कि अब से सब कुछ किस तरीके से करना है। मैं सभी से बहुत ही तरीके से बातें कर रहा था इस लिए सभी मजदूर मुझसे काफी खुश हो गए थे। मुझे इस बात का बखूबी एहसास था कि ग़रीब मजदूर अगर खुश रहेगा तो वो हमारे लिए कुछ भी कर सकता है और इसी लिए मैंने सबको खुश रखने का सोच लिया था।

पिता जी से मैंने एक दो नए ट्रेक्टर लेने को बोल दिया था ताकि खेती बाड़ी के काम में किसी भी तरह की परेशानी अथवा रुकावट न हो सके। पिता जी को मेरा सुझाव उचित लगा इस लिए उन्होंने दो ट्रैक्टर लेने की मंजूरी दे दी। अगले ही दिन मैं भुवन को ले कर शहर से दो ट्रैक्टर ले आया और साथ में उसका सारा समान भी। हमारे पास पहले से ही दो ट्रैक्टर थे किंतु वो थोड़ा पुराने हो चुके थे। हमारे पास बहुत सारी ज़मीनें थीं। ज़मीनों की जुताई करने में काफी समय लग जाता था, ऐसा मुझे मजदूरों से ही पता चला था।

आसमान में काले बादलों ने डेरा तो डाल रखा था किंतु दो दिनों तक बारिश नहीं हुई। तीसरे दिन थोड़ा थोड़ा कर के सारा दिन बारिश हुई जिससे ज़मीनों में पानी ही पानी नज़र आने लगा था। दूसरी तरफ मुरारी काका के घर को भी मैंने दो मजदूर लगवा कर छवा दिया था और उन्हीं मजदूरों को मैंने उसके खेतों की जुताई के लिए लगवा दिया। सरोज काकी मेरे इस उपकार से बड़ा खुश थी तो वहीं अनुराधा अब एकदम ख़ामोश और गुमसुम सी रहने लगी थी। उसे इस हालत में देख सरोज काकी को उसकी फ़िक्र होने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उसकी बेटी को हुआ क्या है?

मैं पिता जी के कहे अनुसार अब पूरी ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाने लगा था। मुझे इस तरह काम करता देख जहां मेरे माता पिता राहत भरी नज़रों से मुझे देखने लगे थे वहीं भाभी भी काम के प्रति मेरे इस समर्पण भाव से खुश थीं। आज कल मेरा ज़्यादातर समय हवेली से बाहर ही गुज़र रहा था जिसके चलते मैं भाभी को ज़्यादा समय नहीं दे पा रहा था।

एक दिन सुबह सुबह ही मैं हवेली से मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकला तो रास्ते में मुझे साहूकार हरि शंकर की बेटी रूपा नज़र आ गई। उसके साथ में गौरी शंकर की बेटी राधा भी थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही रूपा ने पहले इधर उधर देखा और फिर मुझे रुकने का इशारा किया। उसके इस तरह इशारा करने पर जहां मैं थोड़ा हैरान हुआ वहीं उसके पास ही खड़ी राधा भी उसे हैरत से देखने लगी थी। उसने उससे कुछ कहा जिस पर रूपा ने भी कुछ कहा। बहरहाल मैं कुछ ही पलों में उन दोनों के क़रीब पहुंच गया।

मैंने देखा रूपा पहले से काफी कमज़ोर दिख रही थी। उसके चेहरे पर पहले की तरह नूर नहीं था। आंखों के नीचे काले धब्बे से नज़र आ रहे थे। मुझे अपने पास ही मोटर साईकिल पर बैठा देख वो बड़े ही उदास भाव से मुझे देखने लगी। वहीं राधा थोड़ी घबराई हुई नज़र आ रही थी। इधर मुझे समझ न आया कि उसने मुझे क्यों रुकने का इशारा किया है और खुद मैं उससे क्या कहूं?

"क्या बात है?" फिर मैंने आस पास नज़र डालने के बाद आख़िर उससे पूछा____"मुझे किस लिए रुकने का इशारा किया है तुमने? क्या तुम्हें भय नहीं है कि अगर किसी ने तुम्हें मेरे पास यूं खड़े देख लिया तो क्या सोचेगा?"

"हमने किसी के सोचने की परवाह करना छोड़ दिया है वैभव।" रूपा ने अजीब भाव से कहा____"अब इससे ज़्यादा क्या बुरा हो सकता है कि हम सब ख़ाक में ही मिला दिए गए।"

"ख़ाक में मिलाने की शुरुआत तो तुम्हारे ही अपनों ने की थी।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"हमने तो कभी तुम लोगों से बैर भाव नहीं रखा था। तुम लोगों ने रिश्ते भी सुधारे तो सिर्फ इस लिए कि उसकी आड़ में धोखे से हम पर वार कर सको। सच कहूं तो तुम्हारे अपनों के साथ जो कुछ हुआ है उसके ज़िम्मेदार वो खुद थे। अपने हंसते खेलते और खुश हाल परिवार को अपने ही हाथों एक झटके में तबाह कर लिया उन्होंने। इसके लिए तुम हमें ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकती क्योंकि जब ऐसे वाक्यात होते हैं तो उसका अंजाम अच्छा तो हो ही नहीं सकता। फिर चाहे वो किसी के लिए भी हो।"

"हां जानती हूं।" रूपा ने संजीदगी से कहा____"ख़ैर छोड़ो, तुम कैसे हो? हमें तो भुला ही दिया तुमने।"

"तुम्हारी इनायत से ठीक हूं।" मैंने कहा____"और मैं उस शक्स को कैसे भूल सकता हूं जिसने मेरी हिफाज़त के लिए अपने ही लोगों की जान के ख़तरे को ताक पर रख दिया था।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपा सकपकाते हुए बोली।

"वो तुम ही थी ना जिसने मेरे पिता जी को इस बात की सूचना दी थी कि कुछ लोग चंदनपुर में मुझे जान से मारने के इरादे से जाने वाले हैं?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा____"वैसे शुक्रिया इस इनायत के लिए। तुम्हारा ये उपकार मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूंगा लेकिन मुझे ये नहीं पता है कि तुम्हारे साथ दूसरी औरत कौन थी?"

"मेरी भाभी कुमुद।" रूपा ने नज़रें झुका कर कहा तो मैंने उसे हैरानी से देखते हुए कहा____"कमाल है, वैसे मेरे लिए इतना कुछ करने की क्या ज़रूरत थी वो भी अपने ही लोगों की जान को ख़तरे में डाल कर?"

"क्या तुमने मुझे इतना बेगाना समझ लिया है?" रूपा की आंखें एकदम से नम होती नज़र आईं, बोली____"क्या सच में तुम्हें ये एहसास नहीं है कि मेरे दिल में तुम्हारे लिए क्या है?"

"ओह! तो तुम अभी भी उसी बात को ले के बैठी हुई हो?" मैंने हैरान होते हुए कहा____"क्या तुम्हें लगता है कि इतना कुछ होने के बाद भी तुम्हारी ख़्वाइश अथवा तुम्हारी चाहत पूरी होगी? अरे! जब पहले ऐसा संभव नहीं था तो अब भला कैसे संभव होगा?"

"होने को तो कुछ भी हो सकता है दुनिया में।" रूपा ने कहा____"दरकार सिर्फ इस बात की होती है कि हमारे अंदर ऐसा करने की चाह हो। अगर तुम ही नहीं चाहोगे तो सच में ऐसा संभव नहीं हो सकता।"

"दीदी चलिए यहां से।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही राधा बोल पड़ी____"देखिए उधर से कोई आ रहा है।"

"मेरे प्रेम को यूं मत ठुकराओ वैभव।" रूपा की आंखें छलक पड़ीं____"तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती। मैंने पहले ही तुम्हें अपना सब कुछ मान लिया था और अपना सब कुछ तुम्हें....।"

"तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने उसकी बात बीच में काट कर कहा____"मुझे पता है कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए बहुत कुछ है और इसका सबूत तुम पहले ही दे चुकी हो। दूसरी बात मैं तुम्हारे प्रेम को ठुकरा नहीं रहा बल्कि ये कह रहा हूं कि हमारा हमेशा के लिए एक होना संभव ही नहीं है। पहले थोड़ी बहुत संभावना भी थी किंतु अब तो कहीं रत्ती भर भी संभावना नहीं है। मुझे पूरा यकीन है कि ये सब होने के बाद तुम्हारे घर वाले किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहेंगे कि उनके घर की बेटी हवेली में बहू बन कर जाए।"

"मुझे किसी की परवाह नहीं है।" रूपा ने दृढ़ता से कहा____"परवाह सिर्फ इस बात की है कि तुम क्या चाहते हो? अगर तुम ही मुझे अपनाना नहीं चाहोगे तो मैं भला क्या कर लूंगी?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" मैंने संदेह पूर्ण भाव से उसे देखा।

"क्या तुम मुझसे ब्याह करोगे?" रूपा ने स्पष्ट भाव से पूछा।

"ये कैसा सवाल है?" मेरे माथे पर शिकन उभरी।

"बड़ा सीधा सा सवाल है वैभव।" रूपा ने कहा____"अगर तुम मुझसे ब्याह करने के लिए राज़ी हो तो फिर हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकेगा। मैं अपने परिवार से लड़ जाऊंगी तुम्हारी बनने के लिए।"

रूपा की बातें सुन कर मैं भौचक्का सा देखता रह गया उसे। यही हाल उसके बगल से खड़ी राधा का भी था। मैं ये तो जानता था कि रूपा मुझसे प्रेम करती है और मुझसे ब्याह भी करना चाहती है लेकिन इसके लिए वो इस हद तक जाने का बोल देगी इसकी कल्पना नहीं की थी मैंने।

"दीदी ये आप कैसी बातें कर रही हैं इनसे?" राधा से जब न रहा गया तो वो बोल ही पड़ी____"आप ऐसा कैसे कह सकती हैं? पिता जी और रूप भैया को पता चला तो वो आपकी जान ले लेंगे।"

"मेरी जान तो वैभव है छोटी।" रूपा ने मेरी तरफ देखते हुए गंभीरता से कहा____"मैं तो सिर्फ एक बेजान जिस्म हूं। इसका भला कोई क्या करेगा?"

"अच्छा चलता हूं मैं।" मैंने रास्ते में एक आदमी को आते देखा तो बोला और फिर बिना किसी की कोई बात सुने ही मोटर साईकिल को स्टार्ट कर आगे बढ़ चला।

मेरे दिलो दिमाग़ में आंधियां सी चल पड़ीं थी। मैंने इसके पहले रूपा को इतना आहत सा नहीं देखा था। मुझे एहसास था कि वो क्या चाहती है लेकिन मुझे ये भी पता था कि वो जो चाहती है वो उसे मिलना आसान नहीं है। मेरे दिल में उसके लिए इज्ज़त की भावना पहले भी थी और जब से मैंने ये जाना है कि उसी ने मेरी जान भी बचाने का काम किया है तब से उसके लिए और भी इज्ज़त बढ़ गई थी। मुझे उससे पहले भी प्रेम नहीं था और आज भी उसके लिए मेरे दिल में प्रेम जैसी भावना नहीं थी। मगर आज जिस तरह से उसने ये सब कहा था उससे मैं काफी विचलित हो गया था। मैं हैरान भी था कि वो मेरे राज़ी हो जाने की सूरत में अपने ही लोगों से लड़ जाएगी। ज़ाहिर है ये या तो उसके प्रेम की चरम सीमा थी या फिर उसका पागलपन।

दोपहर तक मैं खेतों में ही रहा और खेतों की जुताई करवाता रहा। बार बार ज़हन में रूपा की बातें उभर आती थीं जिसके चलते मुझे बड़ा अजीब सा महसूस होने लगता था। मैं एक ऐसे मरहले में आ गया था जहां एक तरफ रूपा थी तो दूसरी तरफ अनुराधा। दोनों ही अपनी अपनी जगह मेरे लिए ख़ास थीं। एक मुझसे बेपनाह प्रेम करती थी तो दूसरी को मैं प्रेम करने लगा था। अगर दोनों की तुलना की जाए तो रूपा की सुंदरता के सामने अनुराधा कहीं नहीं ठहरती थी किंतु यहां सवाल सिर्फ सुंदरता का नहीं था बल्कि प्रेम का था। बात जब प्रेम की हो तो इंसान को सिर्फ वही व्यक्ति सबसे सुंदर और ख़ास नज़र आता है जिससे वो प्रेम करता है, बाकी सब तो फीके ही लगते हैं। बहरहाल आज रूपा की बातों से मैं काफी विचलित था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उसके लिए क्या फ़ैसला करूं?

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दोपहर को खाना खाने के लिए मैं हवेली आया तो मां से पता चला कि पिता जी कुल गुरु से मिलने गए हुए हैं। हालाकि पिता जी के साथ शेरा तथा कुछ और भी मुलाजिम गए हुए थे किंतु फिर भी मैं पिता जी के लिए फिक्रमंद हो उठा था। ख़ैर खा पी कर मैं आराम करने के लिए अपने कमरे में चला आया। पलंग पर लेट कर मैं आंखें बंद किए जाने किन किन विचारों में खोने लगा था।

मेरे दिलो दिमाग़ से रूपा की बातें जा ही नहीं रहीं थी। पंचायत के दिन के बाद आज ही देखा था उसे। उसे इतने क़रीब से देखने पर ही मुझे नज़र आया था कि क्या हालत हो गई थी उसकी। मैं ये खुले दिल से स्वीकार करता था कि उसने अपने प्रेम को साबित करने के लिए बहुत कुछ किया था। एक लड़की के लिए उसकी आबरू सबसे अनमोल चीज़ होती है जिसे खुशी खुशी उसने सौंप दिया था मुझे। उसके बाद उसने मेरी जान बचाने का हैरतंगेज कारनामा भी कर दिया था। ये जानते हुए भी कि उसके ऐसा करने से उसके परिवार पर भयानक संकट आ सकता है। ये उसका प्रेम ही तो था जिसके चलते वो इतना कुछ कर गई थी। मैं सोचने लगा कि उसके इतना कुछ करने के बाद भी अगर मैं उसके प्रेम को न क़बूल करूं तो मुझसे बड़ा स्वार्थी अथवा बेईमान शायद ही कोई होगा।

प्रेम क्या होता है और उसकी तड़प क्या होती है ये अब जा कर मुझे समझ आने लगा था। मेरे अंदर इस तरह के एहसास पहले कभी नहीं पैदा हुए थे या फिर ये कह सकते हैं कि मैंने कभी ऐसे एहसासों को अपने अंदर पैदा ही नहीं होने दिया था। मुझे तो सिर्फ खूबसूरत लड़कियों और औरतों को भोगने से ही मतलब होता था। इसके पहले कभी मैंने अपने अंदर किसी के लिए भावनाएं नहीं पनपने दी थी। पिता जी ने गांव से निष्कासित किया तो अचानक ही मेरा सामना अनुराधा जैसी एक साधारण सी लड़की से हो गया। जाने क्या बात थी उसमें कि उसे अपने जाल में बाकी लड़कियों की तरह फांसने का मन ही नहीं किया। उसकी सादगी, उसकी मासूमियत, उसका मेरे सामने छुई मुई सा नज़र आना और उसकी नादानी भरी बातें कब मेरे अंदर घर कर गईं मुझे पता तक नहीं चला। जब पता चला तो जैसे मेरा कायाकल्प ही हो गया।

मुझे मुकम्मल रूप से बदल देने में अनुराधा का सबसे बड़ा योगदान था। उसका ख़याल आते ही दिलो दिमाग़ में हलचल होने लगती है। मीठा मीठा सा दर्द होने लगता है और फिर उसे देखने की तड़प जाग उठती है। कदाचित यही प्रेम था जिसे अब मैं समझ चुका था। आज जब रूपा को देखा और उसकी बातें सुनी तो मुझे बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ कि वो किस क़दर मेरे प्रेम में तड़प रही होगी। मेरे ज़हन में सवाल उभरा कि क्या मुझे उसके प्रेम को इस तरह नज़रअंदाज़ करना चाहिए? कदाचित नहीं, क्योंकि ये उसके साथ नाइंसाफी होगी, एक सच्चा प्रेम करने वाली के साथ अन्याय होगा। मैंने मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि मैं रूपा के प्रेम को ज़रूर स्वीकार करूंगा। रही बात उससे ब्याह करने की तो समय आने पर उसके बारे में भी सोच लिया जाएगा।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैं सोचो के गहरे समुद्र से बाहर आया और जा कर दरवाज़ा खोला। बाहर भाभी खड़ी थीं।

"भाभी आप?" उन्हें देखते ही मैंने पूछा।

"माफ़ करना, तुम्हारे आराम पर खलल डाल दिया मैने।" भाभी ने खेद पूर्ण भाव से कहा।

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैंने एक तरफ हट का उन्हें अंदर आने का रास्ता दिया____"आइए, अंदर आ जाइए।"

"और कैसा चल रहा है तुम्हारा काम धाम?" एक कुर्सी पर बैठते ही भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"काफी मेहनत हो रही है ना आज कल?"

"खेती बाड़ी के काम में मेहनत तो होती ही है भाभी।" मैंने कहा____"वैसे भी मेरे लिए ये मेरा पहला अनुभव है इस लिए शुरुआत में तो मुझे यही आभास होगा जैसे इस काम में बहुत मेहनत लगती है।"

"हां ये तो है।" भाभी ने कहा____"चार ही दिन में तुम्हारे चेहरे का रंग बदल गया है। काफी थके थके से नज़र आ रहे हो किंतु उससे ज़्यादा मुझे तुम कुछ परेशान और चिंतित भी दिख रहे हो। सब ठीक तो है न?"

"हां सब ठीक ही है भाभी।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"असल में एकदम से ही इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी मेरे कंधे पर आ गई है इस लिए उसी के प्रति ये सोच कर थोड़ा चिंतित हूं कि मैं सब कुछ अच्छे से सम्हाल लूंगा कि नहीं?"

"बिल्कुल सम्हाल लोगे वैभव।" भाभी ने जैसे मुझे प्रोत्साहित करते हुए कहा____"मानती हूं कि शुरुआत में हर चीज़ को समझने में और उसे सम्हालने में थोड़ी परेशानी होती है किंतु मुझे यकीन है कि तुम ये सब बेहतर तरीके से कर लोगे।"

"आपने इतना कह दिया तो मुझे सच में एक नई ऊर्जा सी मिल गई है।" मैंने खुश होते हुए कहा____"क्या आप कल सुबह मेरे साथ चलेंगी खेतों पर?"

"म...मैं??" भाभी ने हैरानी से देखा____"मैं भला कैसे वहां जा सकती हूं?"

"क्यों नहीं जा सकती आप?" मैंने कहा____"आपने मुझसे वादा किया था कि आप मेरे साथ चला करेंगी और अब आप ऐसा बोल रही हैं?"

"कहने में और करने में बहुत फ़र्क होता है वैभव।" भाभी ने सहसा बेचैन हो कर कहा____"तुम तो जानते हो कि इसके पहले मैं कभी भी इस हवेली से बाहर नहीं गई हूं।"

"हां तो क्या हुआ?" मैंने लापरवाही से कंधे उचकाए____"ज़रूरी थोड़ी ना है कि आप अगर पहले कभी नहीं गईं हैं तो आगे भी कभी नहीं जाएंगी। इंसान को अपने काम से बाहर तो जाना ही होता है, उसमें क्या है?"

"तुम समझ नहीं रहे हो वैभव।" भाभी ने मेरी तरफ चिंतित भाव से देखा____"पहले में और अब में बहुत अंतर हो चुका है। पहले मैं एक सुहागन थी, जबकि अब एक विधवा हूं। इतना सब कुछ होने के बाद अगर मैं तुम्हारे साथ कहीं बाहर जाऊंगी तो लोग मुझे देख कर जाने क्या क्या सोचने लगेंगे।"

"लोग तो सबके बारे में कुछ न कुछ सोचते ही रहते हैं भाभी।" मैंने कहा____"अगर इंसान ये सोचने लगे कि लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे तो फिर वो जीवन में कभी सहजता से जी ही नहीं सकेगा। आप इस हवेली की बहू हैं और सब जानते हैं कि आप कितनी अच्छी हैं। दूसरी बात, मुझे किसी के सोचने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मुझे सिर्फ इस बात की परवाह है कि मेरी भाभी हमेशा खुश रहें। इस लिए आप कल सुबह मेरे साथ खेतों पर चलेंगी।"

"मां जी को हवेली में अकेला छोड़ कर कैसे जाउंगी मैं?" भाभी ने जैसे फ़ौरन ही बहाना ढूंढ लिया____"नहीं वैभव ये ठीक नहीं है। मुझसे ये नहीं होगा।"

"आप कुछ ज़्यादा ही सोच रही हैं भाभी।" मैंने कहा____"अच्छा ठीक है, मैं इस बारे में मां से बात करूंगा। मां की इजाज़त मिलने पर तो आप चलेंगी न मेरे साथ?"

"बहुत ज़िद्दी हो तुम?" भाभी ने बड़ी मासूमियत से देखा____"क्या कोई इस तरह अपनी भाभी को परेशान करता है?"

"किसी और का तो नहीं पता।" मैंने सहसा मुस्कुरा कर कहा____"पर मैं तो अपनी प्यारी सी भाभी को परेशान करूंगा और ये मेरा हक़ है।"

"अच्छा जी?" भाभी ने आंखें फैला कर मुझे देखा____"मुझे परेशान करोगे तो मार भी खाओगे, समझे?"

"मंज़ूर है।" मैं फिर मुस्कुराया____"आपकी खुशी के लिए तो सूली पर चढ़ जाना भी मंज़ूर है मुझे।"

"सूली पर चढ़ें तुम्हारे दुश्मन।" भाभी ने कहा____"मेरे देवर की तरफ कोई आंख उठा कर देखेगा तो आंखें निकाल लूंगी उसकी।"

"फिर तो मुझे अपने लिए किसी अंगरक्षक को रखने की ज़रूरत ही नहीं है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मेरी बहादुर भाभी ही काफी हैं मेरे दुश्मनों से मेरी हिफाज़त करने के लिए।"

"क्यों तंग कर रहा है तू मेरी फूल सी बच्ची को?" कमरे में सहसा मां की आवाज़ सुन कर हम दोनों ही उछल पड़े।

मां को कमरे में आया देख भाभी जल्दी ही कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गईं। मैं और भाभी दोनों ही उन्हें हैरानी से देखे जा रहे थे। आज वो काफी समय बाद ऊपर आईं थी वरना वो सीढियां नहीं चढ़ती थीं। बहरहाल मां आ कर मेरे पास ही पलंग पर बैठ गईं।

"मां जी आप यहां?" भाभी ने मां से कहा____"कोई काम था तो किसी नौकरानी से संदेश भेजवा देतीं आप?"

"अरे! ऐसी कोई बात नहीं है बेटी।" मां ने बड़े स्नेह से कहा____"आज ठाकुर साहब भी नहीं हैं इस लिए मैंने सोचा कि तेरे पास ही कमरे में आ जाती हूं। सीढियां चढ़े भी काफी समय हो गया था तो सोचा इसी बहाने ये भी देख लेती हूं कि मुझमें सीढियां चढ़ने की क्षमता है कि नहीं।"

"वैसे मां, पिता जी किस काम से गए हैं कुल गुरु से मिलने?" मैंने मां से पूछा।

"पता नहीं आज कल क्या चलता रहता है उनके जहन में?" मां ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मुझे भी कुछ नहीं बताया उन्होंने। सिर्फ इतना ही कहा कि शाम तक वापस आ जाएंगे। अब तो उनके आने पर ही उनसे पता चलेगा कि वो किस काम से गुरु जी मिलने गए थे?" कहने के साथ ही मां ने भाभी की तरफ देखा फिर उनसे कहा____"अरे! बेटी तू खड़ी क्यों है? बैठ जा कुर्सी पर और ये तुझे तंग कर रहा था क्या?"

"नहीं मां जी।" भाभी ने कुर्सी में बैठे हुए कहा____"वैभव तो मेरा मन बहलाने की कोशिश कर रहे थे।"

"फिर तो ठीक है।" मां ने मेरी तरफ देखा____"मेरी बेटी को अगर तूने किसी बात पर तंग किया तो सोच लेना। ये मत समझना कि तू बड़ा हो गया है तो मैं तुझे पीटूंगी नहीं।"

"अरे! मां ये आप कैसी बात कर रही हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"आप बेशक मुझे पीट सकती हैं मेरी ग़लती पर। वैसे आपने ये कैसे सोच लिया कि मैं अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी भाभी को तंग कर सकता हूं?"

"तो फिर क्या बोल रहा था तू अभी इसे?" मां ने आंखें दिखाते हुए मुझसे पूछा।

"अरे! वो तो मैं ये कह रहा था कि भाभी को मेरे साथ खेतों पर चलना चाहिए।" मैंने कहा____"इससे इनका मन भी बहलेगा और हवेली के अंदर चौबीसों घंटे रहने से जो घुटन होती रहती है वो भी दूर होगी।"

"हां ये तो तू सही कह रहा है।" मां ने सिर हिलाते हुए कहा____"मुझे खुशी हुई कि तुझे अपनी भाभी की फ़िक्र है।" कहने के साथ ही मां भाभी से मुखातिब हुईं____"तुम्हारा देवर सही कह रहा है बेटी। मेरे ज़हन में तो ये बात आई ही नहीं कि तुम कैसा महसूस करती होगी इन चार दीवारियों के अंदर। तुम्हारे दुख का एहसास है मुझे। ये मैं ही जानती हूं कि तुम्हें इस सफ़ेद लिबास में देख कर मेरे कलेजे में कैसे बर्छियां चलती हैं। मेरा मन करता है कि दुनिया के कोने कोने से खुशियां ला कर अपनी फूल सी बेटी की झोली में भर दूं।"

"चिंता मत कीजिए मां जी।" भाभी ने अधीरता से कहा____"ईश्वर ने ये दुख दिया है तो किसी तरह इसे सहने की ताक़त भी देगा। वैसे भी जिसके पास आप जैसी प्यार करने वाली मां और इतना स्नेह देने वाला देवर हो वो भला कब तक दुखी रह सकेगी?"

"मैं तेरा जीवन खुशियों से भरा हुआ देखना चाहती हूं बेटी।" मां की आंखों से आंसू छलक पड़े____"मैं तुझे इस रूप में नहीं देख सकती। मैं तेरी ज़िंदगी में खुशियों के रंग ज़रूर भरूंगी, फिर भले ही चाहे मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े।"

"ये आप क्या कह रही हैं मां जी?" भाभी ने हैरत से मां की तरफ देखा। मैं भी मां की बातें सुन कर हैरत में पड़ गया था।

"तू फ़िक्र मत मेरी बच्ची।" मां पलंग से उठ कर भाभी के पास आ कर बोलीं____"विधाता ने तेरा जीवन बिगाड़ा है तो अब मैं उसे संवारूंगी। बस कुछ समय की बात है।"

"आप क्या कह रही हैं मां जी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?" भाभी का दिमाग़ जैसे चकरघिन्नी बन गया था। यही हाल मेरा भी था।

"तुझे इस हवेली में क़ैद रहने की ज़रूरत नहीं है मेरी बच्ची।" मां ने भाभी के मुरझाए चेहरे को अपनी हथेलियों के बीच ले कर कहा____"और ना ही घुट घुट कर जीने की ज़रूरत है। मैंने हमेशा तुझे बहू से ज़्यादा अपनी बेटी माना है और हमेशा तेरी खुशियों की कामना की है। मैं वैभव की बात से सहमत हूं। तेरा जब भी दिल करे तू इसके साथ खेतों में चली जाया करना। इससे तेरा मन भी बहलेगा और तुझे अच्छा भी महसूस होगा।"

"मैं भी यही कह रहा था मां।" मैंने कहा____"पर भाभी मना कर रहीं थी। कहने लगीं कि अगर ये मेरे साथ बाहर कहीं घूमने जाएंगी तो लोग क्या सोचेंगे?"

"जिसे जो सोचना है सोचे।" मां ने हाथ झटकते हुए कहा____"मुझे किसी के सोचने की कोई परवाह नहीं है। मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि मेरी बेटी हर हाल में ख़ुश रहे।"

मां की बात सुन कर जहां मुझे बड़ा फक्र सा महसूस हुआ वहीं भाभी एकदम से ही मां से लिपट कर रोने लगीं। मां ने उन्हें किसी बच्ची की तरह अपने सीने से छुपका लिया। उनकी आंखें भी छलक पड़ीं थी। ये मंज़र देख मुझे ये सोच कर खुशी हो रही थी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं जो अपनी बहू को बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी मान कर उनकी खुशियों की परवाह कर रही हैं।



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अध्याय - 84

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"जिसे जो सोचना है सोचे।" मां ने हाथ झटकते हुए कहा____"मुझे किसी के सोचने की कोई परवाह नहीं है। मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि मेरी बेटी हर हाल में ख़ुश रहे।"

मां की बात सुन कर जहां मुझे बड़ा फक्र सा महसूस हुआ वहीं भाभी एकदम से ही मां से लिपट कर रोने लगीं। मां ने उन्हें किसी बच्ची की तरह अपने सीने से छुपका लिया। उनकी आंखें भी छलक पड़ीं थी। ये मंज़र देख मुझे ये सोच कर खुशी हो रही थी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं जो अपनी बहू को बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी मान कर उनकी खुशियों की परवाह कर रही हैं।


अब आगे....

मुंशी चंद्रकांत साहूकारों के खेत पहुंचा। गौरी शंकर अपने खेत में बने छोटे से मकान के बरामदे में बैठा हुआ था। रूपचंद्र मजदूरों से काम करवा रहा था। चंद्रकांत को आया देख गौरी शंकर एकदम से ही चौंक गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि चंद्रकांत अब दुबारा कभी उसके सामने आएगा। उसे देखते ही उसको वो सब कुछ एक झटके में याद आने लगा जो कुछ हो चुका था।

"कैसे हैं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत बरामदे में ही रखी एक लकड़ी की मेज़ पर बैठते हुए बोला____"आप तो हमें भूल ही गए।"

"तुम भूलने वाली चीज़ नहीं हो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने थोड़ा सख़्त भाव से कहा____"बल्कि तुम तो वो चीज़ हो जिसका अगर साया भी किसी पर पड़ जाए तो समझो इंसान बर्बाद हो गया।"

"ये आप कैसी बात कह रहे हैं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत ने हैरानी से उसे देखा____"मैंने भला ऐसा क्या कर दिया है जिसके लिए आप मुझे ऐसा बोल रहे हैं?"

"ये भी मुझे ही बताना पड़ेगा क्या?" गौरी शंकर ने उसे घूरते हुए कहा____"मैं ये मानता हूं कि हम लोग उतने भी होशियार और चालाक नहीं थे जितना कि हम खुद को समझते थे। सच तो ये है कि तुम्हें समझने में हमसे बहुत बड़ी ग़लती हुई।"

"आप ये क्या कह रहे हैं?" चंद्रकांत अंदर ही अंदर घबरा सा गया____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"

"अंजान बनने का नाटक मत करो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"सच यही है कि हमारे साथ मिल जाने की तुम्हारी पहले से ही योजना थी। अगर मैं ये कहूं तो ग़लत न होगा कि हमारे कंधों पर बंदूक रख तुम दादा ठाकुर से अपनी दुश्मनी निकालना चाहते थे और अपने इस मक़सद में तुम कामयाब भी हो गए। अपने सामने हम सबको रख कर तुमने सारा खेल खेला। ये उसी का परिणाम है कि हम सब तो मिट्टी में मिल गए मगर तुम्हारा बाल भी बांका नहीं हुआ।"

"आप बेवजह मुझ पर आरोप लगा रहे हैं गौरी शंकर जी।" चंद्रकांत अपनी हालत को किसी तरह सम्हालते हुए बोला____"जबकि आप भी जानते हैं कि मैंने और मेरे बेटे ने आपका साथ देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आप कहते हैं कि हमारा बाल भी बांका नहीं हुआ तो ये ग़लत है। हमारा भी बहुत नुकसान हुआ है। पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि मैं दादा ठाकुर के साथ ऐसा कर सकता हूं जबकि अब सबको पता चल चुका है। इस सब में अगर आप अकेले रह गए हैं तो मैं भी तो अकेला ही रह गया हूं। हवेली से मेरा हर तरह से ताल्लुक ख़त्म हो गया, जबकि पहले मैं दादा ठाकुर का मुंशी था। लोगों के बीच मेरी एक इज्ज़त थी मगर अब ऐसा कुछ नहीं रहा। हां ये ज़रूर है कि दादा ठाकुर के क़हर का शिकार होने से मैं और मेरा बेटा बच गए। किंतु ये भी ऊपर वाले की मेहरबानी से ही हो सका है।"

"बातें बनानी तुम्हें खूब आती हैं चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा_____"जीवन भर मुंशीगीरी किए हो और लोगों को जैसे चाहा चूतिया बनाया है तुमने। मुझे सब पता है कि तुमने इतने सालों में दादा ठाकुर की आंखों में धूल झोंक कर अपने लिए क्या कुछ बना लिया है।"

"इस बात से मैं कहां इंकार कर रहा हूं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत ने कहा____"सबसे पहले अपने बारे में और अपने हितों के बारे में सोचना तो इंसान की फितरत होती है। मैंने भी वही किया है। ख़ैर छोड़िए, मैंने सुना है कि कल आपके घर दादा ठाकुर खुद चल कर आए थे?"

"तुम्हें इससे क्या मतलब है?" गौरी शंकर ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा।

"म...मुझे मतलब क्यों नहीं होगा गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत हड़बड़ाते हुए बोला____"आख़िर हम दोनों उसके दुश्मन हैं और जो कुछ भी किया है हमने साथ मिल कर किया है। पंचायत में भले ही चाहे जो फ़ैसला हुआ हो किंतु हम तो अभी भी एक साथ ही हैं न? ऐसे में अगर आपके घर हमारा दुश्मन आएगा तो उसके बारे में हम दोनों को ही तो सोचना पड़ेगा ना?"

"तुम्हें बहुत बड़ी ग़लतफहमी है चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"इतना कुछ हो जाने के बाद और पंचायत में फ़ैसला हो जाने के बाद दादा ठाकुर से मेरी कोई दुश्मनी नहीं रही। दूसरी बात, हम दोनों के बीच भी अब कोई ताल्लुक़ नहीं रहा।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत बुरी तरह हैरान होते हुए बोला____"जिस इंसान ने आपका समूल नाश कर दिया उसे अब आप अपना दुश्मन नहीं मानते? बड़े हैरत की बात है ये।"

"अगर तुम्हारा भी इसी तरह समूल नाश हो गया होता तो तुम्हारी भी मानसिक अवस्था ऐसी ही हो जाती चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"मुझे अच्छी तरह एहसास हो चुका है कि हमने बेकार में ही इतने वर्षों से हवेली में रहने वालों के प्रति बैर भाव रखा हुआ था। जिसने हमारे साथ ग़लत किया था वो तो वर्षों पहले ही मिट्टी में मिल गया था। उसके पुत्रों ने अथवा उसके पोतों ने तो कभी हमारा कुछ बुरा किया ही नहीं था, फिर क्यों हमने उनसे इतना बड़ा बैर भाव रखा? सच तो यही है चंद्रकांत कि हमारी तबाही में दादा ठाकुर से कहीं ज़्यादा हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं। दादा ठाकुर सच में एक नेक व्यक्ति हैं जो इस सबके बावजूद खुद को हमारा अपराधी समझते हैं और खुद चल कर हमारे घर आए। ये उनकी उदारता और नेक नीयती का ही सबूत है कि वो अभी भी हमसे अपने रिश्ते सुधारने का सोचते हैं और हम सबका भला चाहते हैं।"

"कमाल है।" चंद्रकांत हैरत से आंखें फाड़े बोल पड़ा____"आपका तो कायाकल्प ही हो गया है गौरी शंकर जी। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि जिस व्यक्ति ने आप सबको मिट्टी में मिला दिया उसके बारे में आप इतने ऊंचे ख़याल रखने लगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इतना कुछ हो जाने के बाद आप दादा ठाकुर से कुछ इस क़दर ख़ौफ खा गए हैं कि अब भूल से भी उनसे बैर नहीं रखना चाहते, दुश्मनी निभाने की तो बात ही दूर है।"

"तुम्हें जो समझना है समझ लो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"किंतु तुम्हारे लिए मेरी मुफ़्त की सलाह यही है कि तुम भी अब अपने दिलो दिमाग़ से हवेली में रहने वालों के प्रति दुश्मनी के भाव निकाल दो वरना इसका अंजाम ठीक वैसा ही भुगतोगे जैसा हम भुगत चुके हैं।"

"यानि मेरा सोचना सही है।" चंद्रकांत इस बार मुस्कुराते हुए बोला____"आप सच में दादा ठाकुर से बुरी तरह ख़ौफ खा गए हैं जिसके चलते अब आप उन्हें एक अच्छा इंसान मानने लगे हैं। ख़ैर आप भले ही उनसे डर गए हैं किंतु मैं डरने वाला नहीं हूं। उनके बेटे ने आपके घर की बहू बेटियों की इज्ज़त को नहीं रौंदा है जबकि उस वैभव ने अपने दादा की तरह मेरे घर की इज्ज़त को रौंदा है। इस लिए जब तक उस नामुराद को मार नहीं डालूंगा तब तक मेरे अंदर की आग शांत नहीं हो सकती।"

"तुम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाओगे चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"अगर तुम ये मानते हो कि वो अपने दादा की ही तरह है तो तुम्हें ये भी मान लेना चाहिए कि जब तुम उसके दादा का कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो उसके पोते का क्या बिगाड़ लोगे? उसे बच्चा समझने की भूल मत करना चंद्रकांत। वो तुम्हारी सोच से कहीं ज़्यादा की चीज़ है।"

"अब तो ये आने वाला वक्त ही बताएगा गौरी शंकर जी कि कौन क्या चीज़ है?" चंद्रकांत ने दृढ़ता से कहा____"आप भी देखेंगे कि उस नामुराद को उसके किए की क्या सज़ा मिलती है?"

चंद्रकांत की बात सुन कर गौरी शंकर बस मुस्कुरा कर रह गया। जबकि चंद्रकांत उठा और चला गया। उसके जाने के कुछ ही देर बाद रूपचंद्र उसके पास आया।

"ये मुंशी किस लिए आया था काका?" रूपचंद्र ने पूछा____"क्या आप दोनों फिर से कुछ करने वाले हैं?"

"नहीं बेटे।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"मैं तो अब कुछ भी करने का नहीं सोचने वाला किंतु हां चंद्रकांत ज़रूर बहुत कुछ करने का मंसूबा बनाए हुए है।"

"क्या मतलब?" रूपचंद्र की आंखें फैलीं।

"वो आग से खेलना चाहता है बेटे।" गौरी शंकर ने कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी वो दादा ठाकुर को अपना दुश्मन समझता है, खास कर वैभव को। उसका कहना है कि वो वैभव को उसके किए की सज़ा दे कर रहेगा।"

"मरेगा साला।" रूपचंद्र ने कहा____"पर आपके पास किस लिए आया था वो?"

"शायद उसे कहीं से पता चल गया है कि दादा ठाकुर कल हमारे घर आए थे।" गौरी शंकर ने कहा____"इस लिए उन्हीं के बारे में पूछ रहा था कि किस लिए आए थे वो?"

"तो आपने क्या बताया उसे?" रूपचंद्र ने पूछा।

"मैं उसे क्यों कुछ बताऊंगा बेटे?" गौरी शंकर ने रूपचंद्र की तरफ देखा____"उससे अब मेरा कोई ताल्लुक़ नहीं है। तुम भी इन बाप बेटे से कोई ताल्लुक़ मत रखना। पहले ही हम अपनी ग़लतियों की वजह से अपना सब कुछ खो चुके हैं। अब जो शेष बचा है उसे किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहते हम। मैंने उससे साफ कह दिया है कि उससे अब मेरा या मेरे परिवार का कोई ताल्लुक़ नहीं है। दादा ठाकुर से अब हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। वो अगर उन्हें अपना दुश्मन समझता है तो समझे और उसे जो करना है करे लेकिन हमसे अब वो कोई मतलब ना रखे।"

"बिल्कुल सही कहा आपने उससे।" रूपचंद्र ने कहा____"वैसे काका, क्या आपको सच में यकीन है कि दादा ठाकुर हमें अपना दुश्मन नहीं समझते हैं और वो हमसे अपने रिश्ते जोड़ कर एक नई शुरुआत करना चाहते हैं?"

"असल में बात ये है बेटे कि जो व्यक्ति जैसा होता है वो दूसरे को भी अपने जैसा ही समझता है।" गौरी शंकर ने जैसे समझाने वाले अंदाज़ में कहा____"जबकि असलियत इससे जुदा होती है। हम दादा ठाकुर पर यकीन करने से इस लिए कतरा रहे हैं कि क्योंकि हम ऐसे ही हैं। जबकि सच तो यही है कि वो सच में हमें अपना ही समझते हैं और हमसे रिश्ता सुधार कर एक नई शुरुआत करना चाहते हैं। पहले भी तो यही हुआ था, ये अलग बात है कि पहले जब हमने रिश्ते सुधारने की पहल की थी तो उसमें हमारी नीयत पूरी तरह से दूषित थी।"

"तो क्या आपको लगता है कि दादा ठाकुर हमसे रिश्ते सुधारने के लिए एक नया रिश्ता जोड़ेंगे?" रूपचंद्र ने झिझकते हुए पूछा____"मेरा मतलब है कि क्या वो अपने छोट भाई की बेटी का ब्याह मेरे साथ करेंगे?"

"अगर वो ऐसा करें तो समझो ये हमारे लिए सौभाग्य की ही बात होगी बेटे।" गौरी शंकर ने कहा____"किंतु मुझे नहीं लगता कि ये रिश्ता हो सकेगा। कुसुम अगर उनकी अपनी बेटी होती तो यकीनन वो उसका ब्याह तुमसे कर देते किंतु वो उनके उस भाई की बेटी है जिसकी हमने हत्या की है। खुद सोचो कि क्या कोई औरत अपनी बेटी का ब्याह उस घर में करेगी जिस घर के लोगों ने उसके पति और उसकी बेटी के बाप की हत्या की हो? उनकी जगह हम होते तो हम भी नहीं करते, इस लिए इस बात को भूल ही जाओ कि ये रिश्ता होगा।"

"पर बड़ी मां ने तो दादा ठाकुर से यही शर्त रखी है ना?" रूपचंद्र ने कहा____"शर्त के अनुसार अगर दादा ठाकुर कुसुम का ब्याह मेरे साथ नहीं करेंगे तो हमारे संबंध भी उनसे नहीं जुड़ेंगे।"

"ऐसा कुछ नहीं है बेटे।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"तुम्हारी बड़ी मां ने तो दादा ठाकुर से शर्त के रूप में ये बात सिर्फ इस लिए कही थी क्योंकि वो देखना चाहती थीं कि दादा ठाकुर ऐसे संबंध पर अपनी क्या प्रतिक्रिया देते हैं? ख़ैर छोड़ो इन बातों को, सच तो ये है कि अगर दादा ठाकुर सच में हमसे रिश्ते सुधार कर एक नई शुरुआत करने को कहेंगे तो हम यकीनन ऐसा करेंगे। मर्दों के नाम पर अब सिर्फ हम दोनों ही बचे हैं बेटे और हमें इसी गांव में रहते हुए अपने परिवार की देख भाल करनी है। दादा ठाकुर जैसे ताकतवर इंसान से बैर रखना हमारे लिए कभी भी हितकर नहीं होगा।"

✮✮✮✮

चंद्रकांत गुस्से में अपने घर पहुंचा।

उसका बेटा रघुवीर घर पर ही था। उसने जब अपने पिता को गुस्से में देखा तो उसे किसी अनिष्ट की आशंका हुई जिसके चलते वो अंदर ही अंदर घबरा गया।

"क्या बात है बापू?" फिर उसने अपने पिता से झिझकते हुए पूछा____"तुम इतने गुस्से में क्यों नज़र आ रहे हो? कुछ हुआ है क्या?"

"वो गौरी शंकर साला डरपोक और कायर निकला।" चंद्रकांत ने अपने दांत पीसते हुए कहा____"दादा ठाकुर से इस क़दर डरा हुआ है कि अब वो कुछ करना ही नहीं चाहता।"

"तुम गौरी शंकर के पास गए थे क्या?" रघुवीर ने चौंकते हुए उसे देखा।

"हां।" चंद्रकांत ने सिर हिलाया____"आज जब तुमने मुझे ये बताया था कि दादा ठाकुर उसके घर गया था तो मैंने सोचा गौरी शंकर से मिल कर उससे पूछूं कि आख़िर दादा ठाकुर उसके घर किस मक़सद से आया था?"

"तो फिर क्या बताया उसने?" रघुवीर उत्सुकता से पूछ बैठा।

"बेटीचोद इस बारे में कुछ भी नहीं बताया उसने।" चंद्रकांत गुस्से में सुलगते हुए बोला____"उल्टा मुझ पर ही आरोप लगाने लगा कि उसके और उसके भाईयों को ढाल बना कर सारा खेल मैंने ही खेला है जिसके चलते आज उन सबका नाश हो गया है।"

"कितना दोगला है कमीना।" रघुवीर ने हैरत से कहा____"अपनी बर्बादी का सारा आरोप अब हम पर लगा रहा है जबकि सब कुछ करने की योजनाएं तो वो सारे भाई मिल कर ही बनाते थे। हम तो बस उनके साथ थे।"

"वही तो।" चंद्रकांत ने कहा____"सारा किया धरा तो उसके और उसके भाईयों का ही था इसके बाद भी आज वो हर चीज़ का आरोप मुझ पर लगा रहा था। उसके बाद जब मैंने इस बारे में कुछ करने को कहा तो उल्टा मुझे नसीहत देने लगा कि मैं अब कुछ भी करने का न सोचूं वरना इसका अंजाम मुझे भी उनकी तरह ही भुगतना पड़ेगा।"

"तो इसका मतलब ये हुआ कि अब वो दादा ठाकुर के खिलाफ़ कुछ भी नहीं करने वाला।" रघुवीर ने कहा____"एक तरह से उसने हमसे किनारा ही कर लिया है।"

"हां।" चंद्रकांत ने कहा____"उसने स्पष्ट रूप से मुझसे कह दिया है कि अब से उसका हमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है।"

"फ़िक्र मत करो बापू।" रघुवीर अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराया____"मैंने कुछ ऐसा कर दिया है कि उसका मन फिर से बदल जाएगा। बल्कि ये कहूं तो ज़्यादा बेहतर होगा कि वो फिर से दादा ठाकुर को अपना दुश्मन समझ बैठेगा।"

"क्या मतलब?" चंद्रकांत अपने बेटे की इस बात से बुरी तरह चौंका था, बोला____"ऐसा क्या कर दिया तुमने कि गौरी शंकर का मन बदल जाएगा और वो दादा ठाकुर को अपना दुश्मन मानने लगेगा?"

"आज मेरे एक पहचान वाले ने मुझे बहुत ही गज़ब की ख़बर दी थी बापू।" रघुवीर ने मुस्कुराते हुए कहा____"उसने बताया कि आज सुबह दादा ठाकुर का सपूत हरि शंकर की बेटी से मिला था। हरि शंकर की बेटी रूपा के साथ गौरी शंकर की बेटी राधा भी थी उस वक्त। मेरे पहचान के उस खास आदमी ने बताया कि वैभव काफी देर तक उन दोनों के पास खड़ा रहा था। ज़ाहिर है वो उन दोनों को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए ही फांसने की कोशिश करता रहा होगा।"

"उस हरामजादे से इसके अलावा और किस बात की उम्मीद कर सकता है कोई?" चंद्रकांत ने सख़्त भाव से कहा____"ख़ैर फिर क्या हुआ? मेरा मतलब है कि तुम्हारे उस आदमी के ये सब बताने के बाद तुमने क्या किया फिर?"

"मुझे जैसे ही ये बात पता चली तो मैं ये सोच कर मन ही मन खुश हो गया कि दोनों परिवारों के बीच दुश्मनी पैदा करने का इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता है?" रघुवीर ने गहरी मुस्कान के साथ कहा____"बस, फिर मैंने भी इस सुनहरे अवसर को गंवाना उचित नहीं समझा और पहुंच गया साहूकारों के घर। गौरी शंकर अथवा रूपचंद्र तो नहीं मिले लेकिन उसके घर की औरतें मिल गईं। मैंने उनसे सारी बातें बता दी। मेरी बातें सुनने के बाद मैंने देखा कि उन सभी औरतों के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए थे। मैं समझ गया कि अब वो औरतें खुद ही आगे का काम सम्हाल लेंगी, यानि आग लगाने का काम। वो गौरी शंकर और रूपचंद्र को बताएंगी कि कैसे दादा ठाकुर का सपूत उनकी दोनों बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए उन्हें रास्ते में रोके हुए था आज? मुझे पूरा यकीन है बापू कि सवाल जब इज्ज़त का आ जाएगा तो गौरी शंकर और रूपचंद्र चुप नहीं बैठेंगे। यानि कोई न कोई बखेड़ा ज़रूर होगा अब।"

"ये तो कमाल ही हो गया बेटे।" चंद्रकांत एकदम से खुश हो कर बोला____"इतने दिनों से मैं यही सोच सोच के कुढ़ सा रहा था कि आख़िर कैसे दादा ठाकुर के खिलाफ़ कुछ बोलने का मौका मिले मगर अब मिल चुका है। शाबाश! बेटा, यकीनन ये बहुत ही गज़ब का मौका हाथ लगा है और तुमने भी बहुत ही समझदारी से काम लिया कि सारी बातें साहूकारों के घर वालों को बता दी। अब निश्चित ही हंगामा होगा। मैं भी देखता हूं कि मुझे नसीहतें देने वाला गौरी शंकर अब कैसे शांत बैठता है?"

"मेरा तो ख़याल ये है बापू कि इसके बाद अब हमें कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।" रघुवीर ने कहा____"बल्कि गौरी शंकर अब इस बात के आधार पर खुद ही दादा ठाकुर को तबाह करने का समान जुटा लेगा। बात अगर पंचायत तक गई तो देखना इस बार दादा ठाकुर पर कोई रियायत नहीं की जाएगी।"

"मैं तो चाहता ही हूं कि उन लोगों पर कोई किसी भी तरह की रियायत न करे।" चंद्रकांत ने जबड़े भींचते हुए कहा____"अगर ऐसा हुआ तो पंचायत में दादा ठाकुर को या फिर उसके सपूत को इस गांव से निष्कासित करने का ही फ़ैसला होगा। अगर वो हरामजादा सच में इस गांव से निष्कासित कर दिया गया तो फिर उसे हम जिस तरह से चाहेंगे ख़त्म कर सकेंगे।"

"मैं तो उसे तड़पा तड़पा कर मारूंगा बापू।" रघुवीर ने एकाएक आवेश में आ कर कहा____"उसे ऐसी बद्तर मौत दूंगा कि वर्षों तक लोग याद रखेंगे।"

"वो तो ठीक है बेटे।" चंद्रकांत ने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन इसके अलावा मैंने एक और फ़ैसला कर लिया है जिसके बारे में मैं तुम्हें सही वक्त आने पर बताऊंगा।"



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Munshi chandrakant aur raghuvir ki harkate athwa unki soch alag hi level ki hai. Rupa ke madhyam se aag lagane ka sochna unki nazar me shayad galat nahi hai. Unhe abhi bhi lagta hai ki sahukar is vaibhav ki is harkat ko bardast nahi karenge aur wahi karenge jo in logon ne socha hai...well ab is matter me kya hota hai ye to aage hi pata chalega..

Sahukar ab koi khel khelenge ya nahi ye aane wala samay batayega. Safedposh ka kisi se connection hai ya nahi ye bhi ek sawaal hai...
 
अध्याय - 85

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"मैं तो उसे तड़पा तड़पा कर मारूंगा बापू।" रघुवीर ने एकाएक आवेश में आ कर कहा____"उसे ऐसी बद्तर मौत दूंगा कि वर्षों तक लोग याद रखेंगे।"

"वो तो ठीक है बेटे।" चंद्रकांत ने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन इसके अलावा मैंने एक और फ़ैसला कर लिया है जिसके बारे में मैं तुम्हें सही वक्त आने पर बताऊंगा।"


अब आगे....

साहूकारों के घर में सन्नाटा सा छाया हुआ था। जब से रघुवीर ने रूपा के संबंध में ये बताया था कि वो दादा ठाकुर के बेटे वैभव से खुले आम रास्ते में बातें कर रही थी तब से घर की औरतें गुस्से में थीं। राधा और रूपा के आने पर पहले तो ललिता देवी ने रूपा को खूब खरी खोटी सुनाई थी उसके बाद सबने जैसे अपनी अपनी भड़ास निकाली थी। रूपा को इस सबसे बड़ा दुख हुआ था। वो बस ख़ामोशी से सबकी बातें सुनते हुए आंसू बहाए जा रही थी। वो ख़ामोश इस लिए थी क्योंकि वैभव की तरफ से उसे वैसा जवाब नहीं मिला था जैसा कि वो चाहती थी। अगर वैभव उससे ब्याह करने के लिए हां कह देता तो कदाचित वो अपने घर वालों को खुल कर जवाब भी दे पाती।

गौरी शंकर और रूपचंद्र जैसे ही दोपहर को घर पहुंचे तो खाना खाते समय ही फूलवती ने उन दोनों को सब कुछ बता दिया। रूपचंद्र को तो पहले से ही अपनी बहन के बारे में ये सब पता था किंतु गौरी शंकर इस बात से हैरान रह गया था। इसके पहले उसे किसी ने इस बारे में बताया भी नहीं था कि रूपा को अपने ताऊ चाचा और पिता की सच्चाई पहले से ही पता थी और उसी ने कुमुद के साथ हवेली जा कर दादा ठाकुर को ये बता दिया था कि वो लोग वैभव के साथ क्या करने वाले हैं? असल में सब कुछ इतना जल्दी हो गया था कि दुख और संताप के चलते किसी को ये बात गौरी शंकर से बताने का ख़याल ही नहीं आया था। आज जब रघुवीर ने आ कर रूपा के संबंध में ये सब बताया तो सहसा एक झटके में उन्हें ये याद भी आ गया था और सारे ज़ख्म भी ताज़ा हो गए थे।

"बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे घर की बेटी ने उस लड़के से बात करने का दुस्साहस किया।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा मेरे घर की लड़की ने किया। क्या उसे पता नहीं था कि दादा ठाकुर का वो लड़का किस तरह के चरित्र का है?"

"इस बारे में मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं काका।" रूपचंद्र ने कहा____"और वो ये कि मुझे वैभव के साथ रूपा के इस संबंध का बहुत पहले से पता था।"

"क...क्या????" गौरी शंकर तो चौंका ही किंतु उसके साथ साथ घर की बाकी सब औरतें और बहू बेटियां भी चौंक पड़ी थीं। आश्चर्य से आंखें फाड़े वो रूपचंद्र को देखने लगीं थी।

"हां काका।" रूपचंद्र ने सहसा कठोरता से कहा____"और इतना ही नहीं बल्कि मुझे ये भी पता है कि इन दोनों के बीच ये सब बहुत पहले से चल रहा है।"

"हे भगवान!" ललिता देवी ने अपना माथा पीटते हुए कहा____"इस लड़की ने तो हमें कहीं मुंह दिखाने के लायक ही नहीं रखा। काश! पैदा होते ही ये मर जाती तो आज ये सब न सुनने को मिलता।"

"अगर तुम्हें पहले से इस बारे में सब पता था तो तुमने हमें बताया क्यों नहीं?" गौरी शंकर ने सख़्त भाव से रूपचंद्र को देखते हुए कहा।

"सिर्फ इसी लिए कि इससे बात बढ़ जाती और हमारी बदनामी होती।" रूपचंद्र ने कहा____"मुझे शुरू से पता था कि आप लोग दादा ठाकुर को बर्बाद करने के लिए क्या क्या कर रहे हैं। अगर मैं इस बारे में आप लोगों को कुछ बताता तो संभव था कि आप लोग गुस्से में कुछ उल्टा सीधा कर बैठते जिसके चलते आप फ़ौरन ही दादा ठाकुर द्वारा धर लिए जाते।"

"मुझे तुमसे ये उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी बेटा।" गौरी शंकर ने मानों हताश हो कर कहा____"इतनी बड़ी बात तुमने हम सबसे छुपा के रखी। अगर हमें पता होता तो उस दिन मैं इस मामले को पंचायत में सबके सामने रखता और वैभव को इसके लिए सज़ा देने की मांग करता।"

"नहीं काका, आपके ऐसा करने से भी उस वैभव का कोई कुछ नहीं कर पाता।" रूपचंद्र ने कठोरता से कहा____"बल्कि इससे सिर्फ हमारा ही नुकसान होता और हमारी ही बदनामी होती। आपको पता नहीं है काका, सच तो ये है कि इसी वजह से मैं वैभव को ख़ाक में मिला देना चाहता था और इसके लिए मैंने अपने तरीके से कोशिश भी की थी लेकिन इसे मेरा दुर्भाग्य ही कहिए कि हर बार वो कमीना बच निकला।"

"ऐसा क्या किया था तुमने?" गौरी शंकर ने हैरानी से उसे देखा।

"जिस समय वो दादा ठाकुर द्वारा निष्कासित किए जाने पर गांव से बाहर रह रहा था।" रूपचंद्र ने कहा____"उसी समय से मैं उसके पीछे लगा था। मैं उसके हर क्रिया कलाप पर नज़र रख रहा था। मेरे लिए ये सुनहरा अवसर था उसे ख़त्म करने का क्योंकि निष्कासित किए जाने पर वो अकेला ही उस बंज़र ज़मीन पर एक झोपड़ा बना कर रह रहा था। उसे यूं अकेला देख मैंने सोच लिया था कि किसी रोज़ रात में सोते समय ही उसे मार डालूंगा। अपनी इस सोच को असल में बदलने के लिए जब मैंने काम करना शुरू किया तो मुझे जल्द ही पता चल गया कि उस हरामजादे को ख़त्म करना आसान नहीं है। वो भले ही उस जगह पर अकेला रह रहा था मगर इसके बावजूद कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।"

"ऐसा क्यों?" गौरी शंकर पूछे बगैर न रह सका।

"क्योंकि उसकी गुप्त रूप से सुरक्षा की जा रही थी।" रूपचंद्र ने बताया____"और इसके बारे में खुद वैभव को भी नहीं पता था। मैं ये देख कर बड़ा हैरान हुआ था कि ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैंने इस बारे में सोचा तो मुझे यही समझ आया कि ये सब यकीनन दादा ठाकुर ने ही किया होगा। उन्होंने उसे भले ही कुछ समय के लिए निष्कासित कर दिया था किंतु था तो वो उनका बेटा ही। सुनसान जगह पर उसे अकेला भगवान के भरोसे कैसे छोड़ सकते थे वो? इस लिए उन्होंने उसकी सुरक्षा का इस तरीके से इंतजाम कर दिया था कि वैभव को इस बात की भनक तक ना लग सके।"

"पर मुझे तो कुछ और ही लग रहा है।" गौरी शंकर ने कुछ सोचते हुए कहा____"अगर तुम्हारी ये बात सच है तो इसका यही मतलब हो सकता है कि दादा ठाकुर ने अपने बेटे की इस तरह से सुरक्षा का इंतजाम सिर्फ इसी वजह से नहीं किया था कि वो उस जगह पर अकेला रहेगा बल्कि इस लिए भी किया हो सकता था कि उसे पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि कोई उनके परिवार पर ख़तरा बना हुआ है। मुझे अब समझ आ रहा है कि ये सब दादा ठाकुर की एक चाल थी।"

"ये आप क्या कह रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर देखा। बाकी सब भी हैरान रह गए थे।

"सोचने वाली बात है बेटा कि वैभव ने इतना भी बड़ा अपराध नहीं किया था कि उसे घर से ही नहीं बल्कि गांव से ही निष्कासित कर दिया जाता।" गौरी शंकर ने जैसे समझाते हुए कहा____"लेकिन दादा ठाकुर ने ऐसा किया। उनके इस फ़ैसले से उस समय हर कोई चकित रह गया था, यहां तक कि हम लोग भी। ये अलग बात है कि इससे हमें यही सोच कर खुशी हुई थी कि अब हम भी वैभव को आसानी से ठिकाने लगा सकते हैं। ख़ैर, उस समय हम ये सोच ही नहीं सकते थे कि दादा ठाकुर ने अपने बेटे को निष्कासित कर के एक गहरी चाल चली है।"

"आखिर किस चाल की बात कर रहे हैं आप काका?" रूपचंद्र ने भारी उत्सुकता से पूछा।

"दादा ठाकुर को शायद पहले ही इस बात का शक अथवा अंदेशा हो गया था कि कोई उनके परिवार के लिए ख़तरा बन कर खड़ा हो गया है।" गौरी शंकर ने स्पष्ट रूप से कहा____"ज़ाहिर है ऐसे में उनका ये कर्तव्य था कि वो इस तरह के ख़तरे से अपने परिवार की रक्षा भी करें और उस ख़तरे का नामो निशान भी मिटा दें। परिवार की रक्षा करना तो उनके बस में था किंतु ख़तरे को नष्ट करना नहीं क्योंकि उन्हें उस समय स्पष्ट रूप से ये पता ही नहीं था कि ऐसा वो कौन है जो उनके परिवार के लिए ख़तरा बन गया है? हमारा उनसे हमेशा से ही बैर भाव रहा था और कोई ताल्लुक़ नहीं था। ऐसे में इस तरह के ख़तरे के बारे में उनके ज़हन में सबसे पहले हमारा ही ख़याल आया रहा होगा किंतु ख़याल आने से अथवा शक होने से वो कुछ नहीं कर सकते थे। उन्हें ख़तरा पैदा करने वाले के बारे में जानने के लिए प्रमाण चाहिए था। इधर हम लोग कोई प्रमाण देने वाले ही नहीं थे क्योंकि हम अपना हर काम योजना के अनुसार ही कर रहे थे जिसके चलते हम अपना भेद किसी भी कीमत पर ज़ाहिर नहीं कर सकते थे। बहरहाल जब दादा ठाकुर ने देखा कि हवेली में बैठे रहने से कोई प्रमाण नहीं मिलेगा तो उन्होंने एक चाल चली। उन्होंने अपने ही बेटे को चारा बनाने का सोचा और फिर वैभव के उस मामूली से अपराध पर उसे गांव से निष्कासित कर दिया। कदाचित उनकी सोच यही थी कि उनका दुश्मन जब वैभव को इस तरह अकेला देखेगा तो यकीनन वो वैभव को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पास जाएगा और तब वो उस व्यक्ति को पकड़ लेंगे जो उनके परिवार के लिए ख़तरा बन गया था। जैसे तुम्हें नहीं पता था कि वैभव की सुरक्षा गुप्त रूप से की जा रही है वैसे ही हमें भी नहीं पता था। हमने कई बार अपने आदमियों को भेजा था किंतु हर बार वो वापस आ कर यही बताते थे कि वैभव की सुरक्षा गुप्त रूप से की जा रही है। ऐसे में वो उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते। ये तो हमारी सूझ बूझ का ही नतीजा था कि हमने सुरक्षा घेरे को तोड़ कर अंदर जाने का कभी प्रयास ही नहीं किया था वरना यकीनन पकड़े जाते।"

"आश्चर्य की बात है कि इस बारे में दादा ठाकुर ने हमारी सोच से भी आगे का सोच कर ऐसा कर दिया था।" रूपचंद्र ने हैरत से कहा।

"वो दादा ठाकुर हैं बेटे।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"उन्हें कम आंकने की भूल कभी मत करना। ख़ैर तो तुमने जब देखा कि वैभव की गुप्त रूप से सुरक्षा की जा रही है तो फिर तुमने क्या किया?"

"सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब क्या करूं?" रूपचंद्र ने कहा____"इस लिए सिर्फ उसकी निगरानी ही करता रहा। एक दिन मुझे पता चला कि मुरारी नाम का जो आदमी वैभव की हर तरह से मदद कर रहा था उसकी बीवी को वैभव ने अपनी हवस का शिकार बना लिया है।"

"हाय राम।" फूलवती का मुंह भाड़ की तरह खुल गया। उसके साथ साथ बाकियों का भी। इधर गौरी शंकर को रूपचंद्र की इस बात से कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि उसे पहले से ये बात पता थी।

"फिर एक दिन मैंने सुना कि उसी मुरारी की हत्या हो गई है।" रूपचंद्र ने आगे कहा____"और उसकी हत्या के लिए मुरारी का भाई जगन वैभव को हत्यारा कह रहा है। पहले तो मैं इस सबसे बड़ा हैरान हुआ किंतु फिर जल्दी ही मैं ये सोच कर खुश हो गया कि हत्या जैसे मामले में अगर वैभव को तरीके से फंसाया जाए तो शायद काम बन सकता है। मुझे ये भी पता चला कि वैभव मुरारी की बेटी को भी फंसाने में लगा हुआ है इस लिए एक दिन मैंने मुरारी की बीवी को धर लिया और उसे बता दिया कि मुझे उसके और वैभव के बीच बने नाजायज़ संबंधों के बारे में सब पता है इस लिए अब वो वही करे जो मैं कहूं। मुरारी की बीवी सरोज अपनी बदनामी के डर से मेरा कहा मान गई। मैं चाहता था कि वैभव हर तरफ से फंस जाए और उसकी खूब बदनामी हो।"

"फिर?" रूपचंद्र सांस लेने के लिए रुका तो गौरी शंकर पूछ बैठा।

"इसी बीच मुझसे एक ग़लती हो गई।" रूपचंद्र ने सहसा गहरी सांस ली।

"ग़लती??" गौरी शंकर के माथे पर शिकन उभर आई____"कैसी ग़लती हो गई तुमसे?"

"मैं क्योंकि वैभव से कुछ ज़्यादा ही खार खाया हुआ था।" रूपचंद्र ने कहा____"इस लिए मैंने उसकी उस फ़सल में आग लगा दी जिसे उसने बड़ी मेहनत कर के उगाई थी। उस समय मुझे लगा कि जब वो चार महीने की अपनी मेहनत को आग में जलता देखेगा तो पागल ही हो जाएगा। ख़ैर, पागल तो वो हुआ लेकिन उसके साथ उसे ये सोचने का भी मौका मिल गया कि कोई उसे फंसा रहा है। यही वो ग़लती थी मेरी, जिसके आधार पर उसने जगन और उसके गांव वालों को भी ये समझाया कि उसने ना तो मुरारी की हत्या की है और ना ही उसका किसी मामले में कोई हाथ है। यानि कोई दूसरा ही इस मामले में शामिल है जो उसे हत्या जैसे मामले में फंसाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। उसका कहना था कि अगर उसी ने ये सब किया होता तो उसे अपनी ही फ़सल को जलाने की क्या ज़रूरत थी? ज़ाहिर है कि कोई और ही है जो उसे हर तरह से फंसा देना चाहता है और उसे आहत करना चाहता है। ख़ैर उसके बाद तो वो वापस हवेली ही आ गया था। हवेली आने के बाद भला कोई उसका क्या ही कर लेता?"

"ये सब तो ठीक है।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन क्या फिर बाद में वैभव को ये पता चला कि उसकी फ़सल को किसने आग लगाई थी और उसे कौन फंसा रहा है?"

"हां, उसे पता चल गया था।" रूपचंद्र ने सहसा सिर झुका कर धीमें स्वर में कहा____"असल में इसमें भी मेरी ही ग़लती थी।"

"क्या मतलब?" गौरी शंकर चौंका।

"बात ये है कि मुरारी की लड़की मुझे भी भा गई थी।" रूपचंद्र ने सभी औरतों की तरफ एक एक नज़र डालने के बाद दबी आवाज़ में कहा____"जब मुझे पता चला कि वैभव मुरारी की लड़की को कुछ ज़्यादा ही भाव दे रहा है तो मुझे एकाएक ही उससे ईर्ष्या हो गई थी। मुरारी की बीवी क्योंकि मेरी धमकियों की वजह से कोई विरोध नहीं कर सकती थी इस लिए एक दिन मैंने उसके घर जा कर उसकी लड़की को दबोच लिया था। उसे पता नहीं था कि उसकी मां के नाजायज़ संबंध वैभव से हैं अतः मैंने उसे ये बात ये सोच कर बता दी कि इससे वो वैभव से नफ़रत करने लगेगी। उसके बाद मैं उस लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने ही लगा था कि तभी वहां वैभव आ गया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वो अचानक से इस तरह आ जाएगा। उसके आने से मैं बहुत ज़्यादा डर गया था। उधर जब उसने देखा कि मैंने मुरारी की लड़की को दबोच रखा है तो वो बेहद गुस्से में आ गया और फिर उसने मुझे बहुत मारा। उसके पूछने पर ही मैंने उसे सब कुछ बता दिया था।"

"ठीक किया था उसने।" रूपचंद्र की मां ललिता देवी गुस्से से बोल पड़ी____"किसी की बहन बेटी को बर्बाद करना तो दादा ठाकुर के लड़के का काम था किंतु मुझे नहीं पता था कि मेरा भी खून उसी के जैसा कुकर्मी होगा। कितनी शर्म की बात है कि तूने ऐसा घटिया काम किया। अच्छा किया वैभव ने जो तुझे मारा था।"

"फिर उसके बाद क्या हुआ?" गौरी शंकर ने उत्सुकतावश पूछा।

"मेरे माफ़ी मांगने पर वैभव ने मुझे ये कह कर छोड़ दिया था कि अब दुबारा कभी मुरारी के घर वालों को इस तरह से परेशान किया तो वो मुझे जान से मार देगा।" रूपचंद्र ने कहा____"उसके बाद मैंने फिर दुबारा ऐसा नहीं किया लेकिन वैभव पर निगरानी रखना नहीं छोड़ा। मुझे लगता है कि वैभव मुरारी की लड़की को पसंद करता है।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" गौरी शंकर हैरत से बोल पड़ा____"एक मामूली से किसान की लड़की को वैभव पसंद करता है? नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ज़रूर तुम्हें कोई ग़लतफहमी हुई है।"

"नहीं काका, मुझे कोई ग़लतफहमी नहीं हुई है।" रूपचंद्र ने ज़ोर दे कर कहा____"मुझे पूरा यकीन है कि मुरारी की लड़की के प्रति वैभव के मन में वैसा बिल्कुल भी नहीं है जैसा कि बाकी लड़कियों के प्रति हमेशा से उसके मन में रहा है।"

"तुम ये बात इतने यकीन से कैसे कह सकते हो?" गौरी शंकर को जैसे ये बात हजम ही नहीं हो रही थी____"जबकि मैं ये अच्छी तरह जानता हूं कि दादा ठाकुर का वो सपूत कभी किसी के लिए अपने मन में इस तरह के भाव नहीं रख सकता।"

"मैं भी यही समझता था काका।" रूपचंद्र ने दृढ़ता से कहा____"लेकिन फिर जो कुछ मैंने देखा और सुना उससे उसके बारे में मेरी सोच बदल गई। इतना तो आप भी जानते हैं न कि वैभव ने हमेशा ही दूसरों की बहन बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाया है। ये उसी का नतीजा था कि उसने मुरारी की बीवी को भी नहीं बक्शा लेकिन उसकी लड़की को छोड़ दिया। आप खुद सोचिए काका कि ऐसा क्यों किया होगा उसने? जो व्यक्ति मुरारी की औरत को फांस सकता था वो क्या मुरारी की भोली भाली लड़की को नहीं फांस लेता? यकीनन फांस लेता काका लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया उसने।"

"हो सकता है कि मुरारी की हत्या हो जाने से उसने ऐसा करना उचित न समझा हो।" गौरी शंकर ने जैसे संभावना ज़ाहिर की____"उसमें इतनी तो समझ है कि वो ऐसे हालात पर मुरारी की लड़की को अपनी हवस का शिकार बनाना हद दर्जे का गिरा हुआ काम समझे।"

"ये आप कैसी बातें कर रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने कहा____"जिस व्यक्ति को किसी चीज़ से फ़र्क ही नहीं पड़ता वो भला इतना कुछ कैसे सोच लेगा? मुरारी तो ज़िंदा रहा नहीं था और उसकी बीवी से उसके जिस्मानी संबंध ही बन चुके थे। ऐसे में अगर वो मुरारी की लड़की को भी फांस लेता तो उसका विरोध भला कौंन करता? सरोज भी कोई विरोध नहीं करती क्योंकि विरोध करने के लिए उसके पास मुंह ही नहीं बचा था।"

"तो तुम ये सब सोच कर ही ये मान रहे हो कि वैभव मुरारी की लड़की को पसंद करता है?" गौरी शंकर ने कहा____"बर्खुरदार पसंद करने का मतलब जानते हो क्या होता है? इंसान जब किसी को पसंद करने लगता है तो वो उसके साथ सम्पूर्ण जीवन जीने के सपने देखने लगता है और फिर उस सपने को पूरा भी करने की कोशिश करता है। कहने का मतलब ये हुआ कि अगर सच में वैभव उस लड़की को पसंद करता है तो फिर उसी के साथ जीवन जीने के सपने भी देखता होगा। ये ऐसी बात है जो कहीं से भी हजम करने वाली नहीं है। क्योंकि वैभव से उस लड़की का कोई मेल ही नहीं है, दूसरे अगर वैभव उस लड़की के साथ ब्याह करने का सोचेगा भी तो दादा ठाकुर ऐसा कभी नहीं करेंगे। वो एक मामूली किसान की लड़की से अपने बेटे का ब्याह हर्गिज़ नहीं करेंगे। वो अपनी आन बान और शान पर किसी भी तरह की आंच नहीं आने देंगे।"

"मानता हूं।" रूपचंद्र ने सिर हिलाया____"लेकिन आप भी जानते हैं कि वैभव भी कम नहीं है। उसने अब तक के अपने जीवन में वही किया है जो उसने चाहा है। दादा ठाकुर ने उस पर बहुत सी पाबंदियां लगाई थी मगर उसका कुछ नहीं कर पाए। इसी से ज़ाहिर होता है कि अगर वैभव ने सोच लिया होगा कि वो मुरारी की लड़की से ही ब्याह करेगा तो समझिए वो कर के ही रहेगा। दादा ठाकुर उसका विरोध नहीं कर पाएंगे।"

"चलो ये तो अब आने वाला समय ही बताएगा कि क्या होता है?" गौरी शंकर ने कहा____"वैसे वैभव में बदलाव तो हम सबने देखा था। अगर तुम्हारी बातें सच हैं तो यकीनन उसमें आए इस बदलाव की वजह यकीनन वो लड़की ही होगी। इंसान के अंदर जब किसी के लिए कोमल भावनाएं पैदा हो जाती हैं तो यकीनन उसमें आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आ जाता है। ख़ैर छोड़ो इस बात को, थोड़ा आराम कर लो उसके बाद हमें खेतों में भी जाना है।"

उसके बाद सब अपने अपने काम में लग गए। गौरी शंकर और रूपचंद्र अपने अपने कमरे में आराम करने के लिए चले गए। वहीं दूसरी तरफ ये सब बातें सुन कर रूपा के दिल पर मानों बिजली ही गिर गई थी। आंखों में आसूं लिए वो अपने कमरे की तरफ भागते हुए गई थी।

✮✮✮✮

शाम को जब मैं हवेली आया तो देखा पिता जी वापस आ गए थे। बैठक में उनके साथ दूसरे गांव के कुछ ठाकुर लोग बैठे हुए थे जिन्हें मैंने नमस्कार किया और फिर पिता जी के पूछने पर मैंने बताया कि खेतों की जुताई का काम शुरू है। उसके बाद मैं अंदर की तरफ आ गया।

मां और भाभी अंदर बरामदे में ही बैठी हुईं थी। मैं दिन भर का थका हुआ था इस लिए बदन टूट सा रहा था। सबसे पहले मैं गुशलखाने में गया और ठंडे पानी से रगड़ रगड़ कर नहाया तो थोड़ा सुकून मिला। नहा धो कर और कपड़े पहन कर मैं वापस नीचे मां के पास आ कर एक कुर्सी में बैठ गया। भाभी ने मुझे चाय ला कर दी।

"तुझे इस तरह से अपना काम करते देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।" मां ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"पिछले कुछ दिनों से कुछ ज़्यादा ही मेहनत कर रहा है मेरा बेटा। थक जाता होगा न?"

"ऐसे काम कभी किए नहीं थे मां।" मैंने चाय का एक घूंट पीने के बाद कहा____"इस लिए थोड़ी मुश्किल तो होगी ही। जब हर काम समझ में आ जाएगा तो फिर सब ठीक हो जाएगा। वैसे भी शुरू शुरू में तो हर काम मुश्किल ही लगता है।"

"हां ये तो है।" मां ने कहा____"अच्छा तू चाय पी के अपने कमरे में जा। मैं तेरी मालिश करने के लिए किसी नौकरानी को भेजती हूं। शरीर की बढ़िया से मालिश हो जाएगी तो तेरी थकावट भी दूर हो जाएगी और तुझे आराम भी मिलेगा।"

मां के द्वारा मालिश की बात सुन मैं मन ही मन चौंका। ऐसा इस लिए क्योंकि मेरे कमरे में किसी भी नौकरानी का जाना वर्जित था। इसका कारण यही था कि शुरू शुरू में मैं हवेली की कई नौकरानियों को अपनी हवस का शिकार बना चुका था। ख़ैर मां की इस बात से सहसा मैंने भाभी की तरफ देखा तो उन्हें अपनी तरफ घूरते पाया। ये देख मैं एकदम से असहज हो गया और साथ ही समझ भी गया कि वो मुझे क्यों घूरे जा रहीं थी।

"नहीं मां।" फिर मैंने जल्दी से कहा____"मैं इतना भी थका हुआ नहीं हूं कि मुझे मालिश करवानी पड़े। आप बेफ़िक्र रहें मैं एकदम ठीक हूं।"

कहने के साथ ही मैंने भाभी की तरफ देखा तो वो मेरी बात सुन कर हल्के से मुस्कुरा उठीं। मैंने उनसे नज़र हटा कर मां की तरफ देखा।

"मैं मां हूं तेरी।" मां ने दृढ़ता से कहा____"तुझसे ज़्यादा तुझे जानती हूं मैं। मुझे पता है कि काम कर कर के मेरे बेटे का बदन टूट रहा होगा। इस लिए तुझे मालिश करवानी ही होगी।"

अजीब दुविधा में फंस गया था मैं। मां की बात सुन कर मैंने एक बार फिर से भाभी की तरफ देखा तो इस बार उनकी मुस्कान गहरी हो गई। मुझे समझ न आया कि वो मुस्कुरा क्यों रहीं थी?

"आप सही कह रही हैं मां जी।" फिर भाभी ने मां से कहा____"इतने दिनों से वैभव लगातार मेहनत कर रहे हैं इस लिए ज़रूर थक गए होंगे। अगर मालिश हो जाएगी तो शरीर को भी आराम मिलेगा और मन को भी।"

भाभी की ये बात सुन कर मैंने उन्हें हैरानी से देखा तो वो फिर से मुस्कुरा उठीं। मेरी हालत अजीब सी हो गई। तभी मां ने कहा____"देखा, तुझसे ज़्यादा तो मेरी बेटी को एहसास है तेरी हालत का। अब कोई बहाना नहीं बनाएगा तू। चाय पी कर सीधा अपने कमरे में जा। मैं किसी नौकरानी को भेजती हूं मालिश के लिए। सरसो के तेल में लहसुन डाल कर वो उस तेल को गरम कर लेगी उसके बाद जब वो उस कुनकुने तेल से तेरी मालिश करेगी तो झट से आराम मिल जाएगा तुझे।"

"अ...आप बेकार में ही परेशान हो रहीं हैं मां।" मैंने ये सोच कर मना करने की कोशिश की कि अगर मैंने ऐसा न किया तो कहीं भाभी ये न सोच बैठें कि मैं तो चाहता ही यही हूं। उधर मेरी बात सुन कर मां ने मुझे आंखें दिखाई तो भाभी फिर से मुस्कुरा उठीं।

"मैं तेल गरम कर देती हूं मां जी।" भाभी ने कुर्सी से उठते हुए कहा और फिर वो रसोई की तरफ चली गईं।

इधर मेरी धडकनें अनायास ही बढ़ गईं थी। मां ने खेतों में काम के बारे में कुछ सवाल किए जिन्हें मैंने बताया और फिर मैं चाय ख़त्म कर के अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। मैं ये सोच कर भी हैरान था कि जब मां को भी मेरे बारे में सब पता है तो फिर उन्होंने मेरी मालिश के लिए किसी नौकरानी को मेरे कमरे में भेजने की बात क्यों कही? उधर भाभी जो पहले इस बात से मुझे घूर रहीं थी वो भी अब मेरी अजीब सी दशा पर मुस्कुराने लगीं थी। ऊपर से मेरी मालिश के लिए खुद भी मां से बात की और तो और तेल भी गरम करने चली गईं। मेरा दिमाग़ एकदम से ही अंतरिक्ष में परवाज़ करने लगा था।



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अध्याय - 86

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इधर मेरी धडकनें अनायास ही बढ़ गईं थी। मां ने खेतों में काम के बारे में कुछ सवाल किए जिन्हें मैंने बताया और फिर मैं चाय ख़त्म कर के अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। मैं ये सोच कर भी हैरान था कि जब मां को भी मेरे बारे में सब पता है तो फिर उन्होंने मेरी मालिश के लिए किसी नौकरानी को मेरे कमरे में भेजने की बात क्यों कही? उधर भाभी जो पहले इस बात से मुझे घूर रहीं थी वो भी अब मेरी अजीब सी दशा पर मुस्कुराने लगीं थी। ऊपर से मेरी मालिश के लिए खुद भी मां से बात की और तो और तेल भी गरम करने चली गईं। मेरा दिमाग़ एकदम से ही अंतरिक्ष में परवाज़ करने लगा था।

अब आगे....

मैं अपने कमरे में पलंग पर बैठा सोचो में गुम ही था कि तभी कमरे में भाभी ने प्रवेश किया। उन्हें अपने कमरे में आया देख मैं चौंका। असल में मैं ये सोच के चौंका था कि क्या वो खुद मेरी मालिश करने आई हैं? उनके हाथ में तेल की कटोरी देख मुझे मेरी सोच सच होती प्रतीत हुई। उधर वो कटोरी लिए पलंग के पास आईं और फिर उस कटोरी को लकड़ी के एक स्टूल पर रख दिया।

"भ...भाभी आप यहां?" मैं परेशान सा हो कर पूछ ही बैठा____"वो भी कटोरी में तेल ले कर? क्या मां ने मेरी मालिश करने के लिए आपको भेजा है? नहीं नहीं, ऐसा वो कैसे कर सकती हैं? उन्होंने तो कहा था कि वो किसी नौकरानी को भेजेंगी।"

"फ़िक्र मत करो।" भाभी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"तुम्हारी मालिश नौकरानी ही करेगी। वो आती ही होगी, मैं तो बस ये तेल गरम कर के लाई हूं। वैसे अगर मैं खुद तुम्हारी मालिश कर दूंगी तो क्या हो जाएगा? मैं भाभी हूं तुम्हारी, इतना तो अपने देवर के लिए कर ही सकती हूं।"

"नहीं नहीं।" मैं झट से बोल पड़ा____"मैं आपसे अपनी मालिश करवाऊं ऐसा तो सपने में भी नहीं सोच सकता मैं।"

"अरे! तो इसमें बुरा ही क्या है?" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"क्या एक भाभी अपने देवर की मालिश नहीं कर सकती?"

"दुनिया में कोई भाभी करती होगी पर मैं आपसे अपनी मालिश नहीं करवा सकता।" मैंने स्पष्ट रूप से कहा____"आप मेरी भाभी हैं, मेरी पूज्यनीय हैं। आपके प्रति मेरे मन में बेहद सम्मान की भावना है। आपका स्थान मेरी नज़रों में बहुत ऊंचा है। मैं सपने में भी ये नहीं सोच सकता कि में आपसे मालिश करवाऊं। आप दुबारा ऐसी बात कभी मत कीजिएगा।"

"मेरे प्रति तुम ऐसा सोचते हो ये बहुत अच्छी बात है वैभव।" भाभी ने बड़े स्नेह से कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे मुख से अपने लिए ये सब सुन कर बहुत अच्छा भी लगा है। किंतु मेरे द्वारा मालिश किए जाने से तुम्हें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। मां जी और चाची जी भी तो तुम्हारी मालिश किया करती थीं। वो भी तो तुम्हारी पूज्यनीय थीं? तुम मेरे देवर हो लेकिन उससे भी ज़्यादा तुम मेरे छोटे भाई की तरह हो और एक बहन अपने भाई की मालिश कर सकती है।"

"मैं आपकी बात मानता हूं भाभी।" मैंने बेचैनी से कहा____"लेकिन फिर भी मैं आपसे मालिश नहीं करवा सकता। बात सिर्फ मान सम्मान की ही बस नहीं है बल्कि हालातों की भी है। पहले आप एक सुहागन थीं किंतु अब आप एक विधवा के रूप में हैं। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता कि किसी को ये पता चले कि हवेली की बहू से नौकरों वाला काम करवाया जाने लगा है। लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे भाभी और मैं तो सपने में भी ये नहीं सोच सकता कि कोई मेरी भाभी के बारे में कुछ भी उल्टा सीधा सोचे। मैं अपने ऊपर हर तरह का दाग़ लगवा सकता हूं मगर आपके दामन पर अपनी वजह से कोई दाग़ नहीं लगने दे सकता। अगर ऐसा हुआ तो समझ लीजिए मैं अपने हाथों से अपनी हस्ती मिटा दूंगा।"

"ख़बरदार वैभव।" भाभी ने एकाएक गुस्से में आ कर कहा____"आइंदा कभी अपनी हस्ती मिटाने की बता मत कहना। अपने पति को खो चुकी हूं मगर अपने उस देवर को नहीं खोना चाहती जो मुझे इतना मान सम्मान देता है और मेरी इज्ज़त की परवाह करता है।"

मैंने देखा भाभी की आंखें छलक पड़ीं थी। मैं फ़ौरन ही पलंग से नीचे उतरा और उनके पास जा कर अपने हाथों से उनके आंसू पोंछे फिर कहा____"आप इस हवेली की सिर्फ इज्ज़त ही नहीं हैं भाभी बल्कि आन बान और शान भी हैं। हम सब बड़े ही खुशनसीब हैं जिन्हें आपके जैसी सभ्य सुशील और संस्कारी बहू मिली है। ईश्वर ने आपके साथ ऐसा कर के बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया है। आपको इस हाल में देख कर मेरा कलेजा फटने लगता है भाभी। मेरे बस में ही नहीं है वरना यमराज के पास जा कर भैया को वापस ले आता।"

"तुम खुद को हलकान मत करो वैभव।" भाभी ने जैसे खुद को सम्हाला____"ऊपर वाले ने मुझे दुख ज़रूर दिया है लेकिन उसने मुझे इतना अच्छा परिवार भी तो दिया है। इस परिवार के लोग मुझे अपनी पलकों पर बिठा कर रखते हैं। जिसे इतना प्यार और स्नेह मिलेगा वो भला कैसे दुखी रह सकेगा?"

भाभी की बात पर मैं अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी दरवाज़े पर हवेली की एक नौकरानी आ कर खड़ी हुई। भाभी ने उसे अंदर बुलाया तो वो अंदर आ गई। वो एक सांवली सी औरत थी जिसकी उम्र यही कोई तीस या पैंतीस के आस पास की थी।

"करुणा, मेरे देवर की अच्छे से मालिश करना तुम।" भाभी ने नौकरानी से कहा____"ताकि इनकी थकान पूरी तरह से दूर हो जाए।"

"आप चिंता मत कीजिए बहू रानी।" करुणा ने कहा____"मैं छोटे कुंवर की बहुत अच्छे से मालिश करूंगी। शिकायत का कोई भी मौका नहीं दूंगी।"

"ठीक है।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ डालने के बाद उससे कहा____"मैंने तेल को गुनगुना कर के स्टूल में रख दिया है। अब तुम मालिश करना शुरू करो।"

भाभी के कहने पर करुणा ने मेरी तरफ देखा। मैं अभी भी अपने कपड़े पहने खड़ा था। भाभी ने मुझे कपड़े उतारने को कहा तो मैं उनके सामने कपड़े उतारने पर झिझकने लगा। ये देख भाभी हल्के से मुस्कुराई और फिर बोली____"क्या हुआ? कपड़े उतारो ताकि करुणा तुम्हारी मालिश कर सके। जल्दी करो, उसे फिर अपने घर भी वापस जाना है।"

"पर भाभी मैं आपके सामने कैसे अपने कपड़े उतारूं?" मैंने झिझकते हुए कहा____"आप जाइए, मैं करुणा से मालिश करवा लूंगा।"

मेरी बात सुन कर भाभी कुछ पलों तक मुझे देखती रहीं फिर बोली____"ठीक है, मैं जा रही हूं।"

कहने के साथ ही भाभी दरवाज़े की तरफ बढ़ चलीं। जब वो बाहर निकल गईं तो मैंने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। दूसरी तरफ करुणा भी अपनी साड़ी के पल्लू को निकाल कर उसे अपनी कमर में बांधने लगी। पल्लू के हटते ही ब्लाउज में कैद उसकी बड़ी बड़ी चूचियां मेरी आंखों के सामने उजागर हो गईं। ये देख मेरे जिस्म में हलचल सी होने लगी। मैंने फ़ौरन ही उस पर से नज़रें हटाई और कपड़े उतार कर पलंग पर पेट के बल लेट गया। मेरे जिस्म में अब सिर्फ कच्छा ही रह गया था।

कुछ ही देर में करुणा कटोरी ले कर पलंग के किनारे पर आ गई। गुनगुना तेल मेरी पीठ में डाल कर उसने दोनों हाथों से मेरी मालिश करनी शुरू कर दी। इसके पहले मेनका चाची ने आख़िरी बार मेरी मालिश की थी। मेरी आंखों के सामने वो दृश्य उजागर हो उठा जब वो मेरी मालिश कर रहीं थी और उनके जिस्म के गुप्तांग को देख कर मेरी हालत ख़राब हो गई थी। ख़ैर तब की बात अलग थी और अब की अलग क्योंकि अब मैंने भाभी से वादा किया था कि अब से कोई ग़लत काम नहीं करूंगा।

मैं ख़ामोशी से लेटा हुआ था और करुणा पूरी ईमानदारी से ज़ोर लगा कर मालिश करने में लगी हुई थी। पीठ के बाद कंधे और फिर पैरों में मालिश की उसने। उसके बाद उसने मुझे सीधा लेटने को कहा तो मैं सीधा हो के लेट गया। इसके पहले मैं पेट के बल लेटा हुआ था इस लिए कोई समस्या नहीं हुई थी किंतु अब सीधा लेटने से मैं असहज महसूस करने लगा। कारण, अब मैं स्पष्ट रूप से करुणा को देख सकता था और मैं जानता था कि जैसे ही मेरी नज़र ब्लाउज से झांकती उसकी चूचियों पर पड़ेगी तो मेरा लिंग सिर उठाने लगेगा। अगर ऐसा हुआ तो करुणा को भी पता चल जाएगा। हालाकि उसका मुझे कोई डर नहीं था किंतु मैं ये भी समझता था कि संभव है कि उसे मां ने अथवा भाभी ने पहले ही ऐसी चीज़ों से सचेत कर दिया हो और ये भी कह दिया हो कि अगर मैं कुछ उल्टा सीधा करने का सोचूं तो वो फ़ौरन ही शोर मचा कर उन्हें ख़बर कर दे। बस यही नहीं चाहता था मैं और इसी बात का डर था मुझे।

अचानक ही मेरे ज़हन में विचार आया कि मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं। इससे होगा ये कि मैं करुणा की तरफ देखूंगा ही नहीं और जब देखूंगा ही नहीं तो कोई समस्या वाली बात होगी ही नहीं। इस विचार के आते ही मैंने अपनी आंखें बंद कर ली और अपने मन को कहीं और लगाने की कोशिश करने लगा।

आख़िर मैं अपनी कोशिश में कामयाब रहा और करुणा मेरी मालिश कर के मेरे कमरे से चली गई। मैंने राहत की लंबी सांस ली और फिर बेफ़िक्र हो कर उसी अवस्था में लेटा रहा। कुछ ही देर में मेरी आंख लग गई और मैं गहरी नींद में चला गया।

रात में जब खाना खाने का समय हुआ तो भाभी के जगाने पर ही मेरी आंख खुली। मैं हड़बड़ा कर उठा। कमरे में लालटेन जल रही थी जिसके पीले प्रकाश से कमरे में उजाला था। मैंने देखा भाभी पलंग के पास ही खड़ीं थी। अचानक ही मुझे अपनी हालत का एहसास हुआ तो मैंने जल्दी से चादर को अपने ऊपर ओढ़ कर अपनी नग्नता को उनसे छुपाया। मालिश के दौरान मैं सिर्फ कच्छे में था और करुणा के जाने के बाद मैं वैसे ही सो गया था।

"अब कैसा महसूस हो रहा है तुम्हें?" भाभी ने पूछा____"करुणा की मालिश से आराम मिला कि नहीं?"

"हां भाभी, काफी आराम मिला है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"उसके जाने के बाद पता ही नहीं चला कब मेरी आंख लग गई और मैं सो गया।"

"चलो ये तो अच्छी बात है।" भाभी ने कहा____"कल फिर से उससे मालिश करवा लेना। इससे तुम्हें और भी आराम मिलेगा।"

"नहीं भाभी।" मैंने कहा____"अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" भाभी ने कहा____"ख़ैर अब जाओ गुसलखाने में नहा लो। खाना बन गया है। पिता जी जल्दी ही खाना खाने के लिए आने वाले हैं।"

भाभी के जाने के बाद मैं पलंग से उतरा और गमछे को लपेट कर नीचे गुशलखाने में चला गया। नहा धो कर और कपड़े पहन कर मैं जल्दी ही नीचे खाना खाने के लिए पहुंच गया। पिता जी अपनी कुर्सी पर पहले से ही बैठे थे, इस लिए मैं भी जा कर एक कुर्सी पर बैठ गया। भाभी ने खाना परोसा तो हम दोनों खाने लगे। खाने के बीच पिता जी ने काम के बारे में थोड़ी बहुत पूछताछ की जिसका जवाब मैंने दिया। मुझे याद आया कि पिता जी कुल गुरु जी से मिलने गए थे। मैं सोचने लगा कि आख़िर वो किस लिए उनसे मिलने गए रहे होंगे? पहले लगा कि उनसे इस बारे में पूछूं फिर अपना इरादा बदल दिया। जल्दी ही हम दोनों खा पी कर फुरसत हो गए और फिर मैं अपने कमरे में चला गया।

✮✮✮✮

अगली सुबह नाश्ता कर के मैं अपनी मोटर साईकिल से खेतों की तरफ जाने के लिए निकल पड़ा। रात में फिर से बारिश हुई थी और अब खेतों में पर्याप्त पानी हो गया था जिससे धान बोने में कोई समस्या नहीं थी। मैं अपनी मोटर साइकिल से जल्दी ही उस जगह पर पहुंचा जहां पिछले दिन मुझे रूपा मिल गई थी। मैंने देखा आज भी वो किसी के साथ चली आ रही थी। उसके साथ में एक औरत थी जिसने सिर पर घूंघट किया हुआ था। मैं समझ गया कि शायद उसकी कोई भाभी होगी। सफ़ेद रंग की साड़ी में यकीनन वो उसकी भाभी ही थी। जैसे ही मैं तिराहे पर पहुंचा तो उसने आवाज़ दे कर मुझे रुकने को कहा तो मुझे मजबूरन रुकना ही पड़ा। उसके आवाज़ देने पर उसके साथ आ रही औरत ने झट से उसकी तरफ गर्दन घुमा कर देखा था। इधर मेरी भी धड़कनें बढ़ गईं थी।

"प्रणाम भाभी।" वो दोनों जैसे ही मेरे पास पहुंचीं तो मैंने रूपा के साथ आई उसकी भाभी को देख कर कहा।

मेरे प्रणाम करने पर उसने मुझसे कुछ न कहा। मैं समझ सकता था कि इस वक्त मेरे प्रति उसके मन में कैसे विचार होंगे। वो रूपा की सगी भाभी थी। यानी रूपचंद्र के बड़े भाई मानिकचंद्र की बीवी नीलम। मानिकचंद्र का अभी डेढ़ साल पहले ही ब्याह हुआ था। कोई औलाद नहीं हुई थी और इतने कम समय में ही वो विधवा हो गई थी। उसे देख मुझे अपनी भाभी का ख़याल आ गया। मेरी भाभी का ब्याह हुए तो कुछ साल हो भी गए थे किंतु नीलम का ब्याह हुए अभी डेढ़ साल ही हुआ था। मानिकचंद्र यूं तो इतना भी बुरा नहीं था किंतु जिन बच्चों को उनके मां बाप ने बचपन से ही ये सिखाया पढ़ाया हो कि हम उनके दुश्मन हैं उनकी फितरत भला अच्छी कैसे हो सकती थी? बहरहाल मर्दों की वजह से घर की औरतों का जीवन बर्बाद हो चुका था।

"रूपा चलो यहां से।" नीलम ने अपनी ननद रूपा से बड़ी कठोरता से कहा____"मां जी ने मना किया था न तुम्हें कि तुम इस लड़के से अब कोई ताल्लुक़ नहीं रखोगी?"

"भाभी जी ठीक कह रहीं हैं रूपा।" मैंने कहा____"तुम्हें मुझ जैसे लड़के से कोई ताल्लुक़ नहीं रखना चाहिए। अपने घर वालों का कहना मानो और उनकी मान मर्यादा का ख़याल रखो।"

"और मेरा क्या?" रूपा एकाएक दुखी भाव से बोल पड़ी____"मेरा क्या वैभव? तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैंने तुम्हें बहुत पहले ही अपना सब कुछ मान लिया था फिर क्यों मुझे ग़ैर समझ कर ठुकरा देना चाहते हो? क्या तुम्हें ज़रा भी मेरे प्रेम का एहसास नहीं है? क्या तुम्हें ज़रा सा भी नहीं लगता कि जिस लड़की ने अपना सब कुछ तुम्हें सौंप दिया है उसका भी अपना कोई हक़ है?"

"रूपा ये तुम क्या बकवास कर रही हो?" नीलम ने गुस्से से रूपा को देखा____"चुपचाप चलो यहां से वरना ठीक नहीं होगा।"

"मुझे किसी की परवाह नहीं है भाभी।" रूपा की आंखें छलक पड़ीं____"अगर घर वाले मुझे जान से ही मार देना चाहते हैं तो मार दें। मैं तो वैसे भी वैभव के बिना जीने की कल्पना नहीं कर सकती।"

रूपा की बातें सुन कर मैं एक बार फिर से चिंता और परेशानी में घिर गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर मैं क्या करूं उसके लिए? मैं अच्छी तरह जानता था कि जो वो चाहती है वो उसके घर वाले कभी मंज़ूर नहीं करेंगे और मैं ऐसा कोई काम करना ही नहीं चाहता था जिससे कि कोई नया तमाशा खड़ा हो जाए।

"ऐसा क्या है उस लड़की में जो मुझ में तुम्हें नहीं मिला वैभव?" रूपा की इस बात से मैं चौंका____"तुम एक बार बता दो कि मुझमें वो चीज़ नहीं है जो उस लड़की में है तो यकीन मानो इसी वक्त तुमसे अपने प्रेम की दुहाई देना बंद कर दूंगी।"

"क...किस लड़की की बात कर रही हो तुम?" मैंने धड़कते दिल से उसकी तरफ देखा।

"अंजान बनने का दिखावा मत करो वैभव।" रूपा ने आहत भाव से कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम्हारे दिल में किस लड़की के लिए प्रेम है। वो दूसरे गांव के किसी मुरारी नाम के आदमी की लड़की है ना? तुम उसी से प्रेम करते हो न?"

रूपा की बातें सुन कर मैं कुछ न बोल सका। आश्चर्य से आंखें फाड़े देखता रह गया उसे। पलक झपकते ही दिलो दिमाग़ में विस्फोट से होने लगे थे। मैं ये सोच कर चकित हो गया था कि उसे अनुराधा के बारे में कैसे पता है?

"तुम्हारी ख़ामोशी बता रही है कि तुम सच में उसी लड़की से प्रेम करते हो।" मुझे कुछ न बोलता देख रूपा ने दुखी भाव से कहा____"ज़रूर उस लड़की में कोई ऐसी बात होगी जो मुझमें नहीं है। तभी तो तुम मेरे प्रेम को स्वीकार नहीं कर रहे। तभी तो तुम मुझे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बनाना चाहते।"

"ए..ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने कमज़ोर सी आवाज़ में कहते हुए उससे नज़रें चुराई।

"कोई बात नहीं वैभव।" रूपा ने कहा____"मैं ही पागल थी जो ये नहीं समझ पाई थी कि प्रेम कभी मांगने से नहीं मिलता बल्कि वो तो किस्मत से मिला करता है। अब जा के समझी हूं कि प्रेम भी कमबख्त उसी से होता है जो किस्मत में नहीं होते मगर तुम चिंता मत करो। तुम्हें तुम्हारा प्रेम ज़रूर मिलेगा वैभव। तुम्हारे लिए देवी मां से दुआ मागूंगी कि वो तुम्हें तुम्हारे प्रेम से मिला दे। मेरी तरह अपने प्रेम में तड़पने वाला तुम्हारा मुकद्दर न बनाए। जाओ वैभव, हमेशा खुश रहो। ईश्वर करे कि तुम्हारा नाम आसमान से भी ऊंचा हो जाए। बस एक ही विनती है कि जीवन के किसी मोड़ पर अगर मेरा कभी ख़याल आए तो अपने मन में मेरे लिए नफ़रत अथवा घृणा के भाव मत लाना बल्कि थोड़ा सा ही सही लेकिन सम्मान का भाव रख लेना।"

रूपा के आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। उसकी भाभी नीलम उसे हैरत से देखे जा रही थी। इधर मैं खुद को बहुत ही छोटा और असहाय सा महसूस करने लगा था। उसका एक एक शब्द जैसे मेरे दिल के पार हुआ जा रहा था। इससे पहले कि मैं कुछ कहता रूपा अपने आंसू पोंछते हुए मेरे बगल से निकल गई। उसके साथ नीलम भी चली गई। मैं ठगा सा दोनों को देखता रह गया। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने मोटर साइकिल स्टार्ट की और भारी मन से आगे बढ़ चला।

रूपा में कोई ख़राबी नहीं थी। वो जितनी सुंदर थी उतनी ही गुणवान भी थी। साहूकारों के घर की लड़कियां एक से बढ़ कर एक थीं। मैंने आज तक उनमें से किसी के भी बारे में ग़लत अफवाह तक नहीं सुनी थी। ज़ाहिर है ये या तो अच्छे संस्कारों का नतीजा था या फिर वो सब अपने घर के मर्दों से कुछ ज़्यादा ही डरती थीं। रूपा की बात अलग थी। इसे उसकी बदकिस्मती कहें या नियति की कोई साज़िश कि वो मेरे जाल में फंस गई थी। शुरू शुरू में तो ऐसा ही था किंतु बाद में मुझे भी एहसास हुआ कि रूपा उन लड़कियों में से हर्गिज़ नहीं है जिन्हें मैं एक बार स्तेमाल करने के बाद भुला देता था। उसने जब शुरू में मुझे बताया था कि वो मुझसे प्रेम करने लगी है तो मुझे बड़ी हंसी आई थी। उस समय प्रेम जैसी भावनाओं को मैं वाहियात ही समझता था और यही वजह थी कि मुझे उसकी इस बात पर हंसी आई थी। मैंने उसको समझाया था कि वो प्रेम जैसे लफड़े में न पड़े। बहरहाल कुछ समय तक ठीक रहा मगर फिर उसने बार बार इस बात का ज़िक्र करना शुरू कर दिया। मुझे इस बात से गुस्सा आने लगा था। मैंने एक दिन उससे पूछ लिया कि अगर वो सच में मुझसे प्रेम करती है तो मेरे लिए वो क्या कर सकती है? मैंने तो बस मज़ाक में अथवा चिढ़ कर ही ये पूछ लिया था। ख़ैर मेरा ऐसा कहना था कि उसने झट से चाकू द्वारा अपनी कलाई काट कर कहा था____"तुम्हारे लिए बिना सोचे समझे अपनी जान दे सकती हूं।"

उस दिन के बाद से उसके प्रति मेरे जज़्बात बदल गए थे। मुझे उससे प्रेम भले ही नहीं हुआ था लेकिन ये सोच कर उसके लिए एक सम्मान की भावना ज़रूर आ गई थी कि वो मेरे प्रति कितनी संवेदनशील और समर्पित है। उसी समय मैंने उसे यही सब समझाया था कि प्रेम तक तो ठीक है लेकिन अगर वो इससे आगे बढ़ने का सोचेगी तो ये संभव नहीं है क्योंकि ऐसा उसके घर वाले कभी नहीं होने देंगे। वक्त गुज़रा और फिर उसने वो किया जो मेरी कल्पना से भी परे था। वो मेरी जान बचाने के लिए अपने ही परिवार के खिलाफ़ चली गई और भरी पंचायत में मेरी बातों का समर्थन किया। कोई बच्चा भी होगा तो समझ जाएगा कि ये सब उसने अपने प्रेम की वजह से ही किया था।

सच कहूं तो मुझे रूपा के लिए अब काफी सहानुभूति होने लगी थी और दुख भी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसे अनुराधा के बारे में कैसे पता चला होगा लेकिन इस संबंध में उसने जो कुछ कहा था वो मेरे लिए हैरतअगेज था। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या सच में प्रेम ऐसा होता है कि प्रेम करने वाला सिर्फ अपने प्रेमी की ही खुशी के बारे में सोचता है? यहां तक कि अपनी सबसे बड़ी चाहत का भी बलिदान दे देता है?

यही सब सोचते विचारते मैं खेतों पर पहुंच गया। वहां पर भुवन मेरा ही इंतज़ार कर रहा था। उसने बताया कि सारे मजदूर आ चुके हैं और मेरे निर्देशों का इंतज़ार कर रहे हैं। मुझे खेती किसानी का कोई तजुर्बा नहीं था इस लिए मैंने यही कहा कि जैसे अब तक करते आए हो वैसे ही करो। हमारे पास बहुत सी ज़मीनें थीं जिनमें ट्रैक्टर से तो जुताई हो ही रही थी किंतु बैलों को नाथ कर हल से भी जुताई हो रही थी। बहरहाल, मेरे आदेश पर सभी मज़दूर धान की बोआई में लग गए और कुछ रोपा लगाने लगे। खेतों को बढ़िया तरीके से तैयार कर दिया था मजदूरों ने। दोपहर तक मैं उनके साथ ही रहा और उनका हर काम बारीकी से देखता रहा। मैं खुद को बहलाने की कोशिश कर रहा था लेकिन सच तो यही था कि मेरे ज़हन से ना तो रूपा जा रही थी और ना ही अनुराधा।

मेरे अंदर से बार बार आवाज़ आ रही थी कि जिस लड़की ने मेरे लिए इतना कुछ किया है और खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया है उसको मुझे यूं ठुकराना नहीं चाहिए। दोपहर में खाना खाने मैं हवेली आ गया। नहा धो कर मैंने खाना खाया और अपने कमरे में आ कर आराम करने लगा। बार बार आंखों के सामने रूपा का रोता हुआ चेहरा दिखने लगता और कानों में उसकी बातें गूंजने लगतीं। तभी किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी मैं सोचो के भंवर से बाहर आया और फिर जा कर दरवाज़ा खोला।



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अध्याय - 87

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मेरे अंदर से बार बार आवाज़ आ रही थी कि जिस लड़की ने मेरे लिए इतना कुछ किया है और खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया है उसको मुझे यूं ठुकराना नहीं चाहिए। दोपहर में खाना खाने मैं हवेली आ गया। नहा धो कर मैंने खाना खाया और अपने कमरे में आ कर आराम करने लगा। बार बार आंखों के सामने रूपा का रोता हुआ चेहरा दिखने लगता और कानों में उसकी बातें गूंजने लगतीं। तभी किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी मैं सोचो के भंवर से बाहर आया और फिर जा कर दरवाज़ा खोला।

अब आगे....

दरवाज़े के बाहर भाभी खड़ीं थी। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे। जब वो मुझे अजीब तरह से घूरने लगीं तो मैं मन ही मन चौंका। एकदम से मेरे ज़हन में जाने कैसे कैसे विचार उभरने लगे।

"क्या हुआ भाभी?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"आख़िर कब बाज आओगे तुम अपनी हरकतों से?" भाभी ने सख़्त भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"अगर यही सब करना था तो अच्छा इंसान बनने का मुझसे झूठा वादा क्यों किया था तुमने?"

"य...ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं उनकी बात से बुरी तरह चौंका____"मैंने ऐसा क्या कर दिया है जिससे आप मुझे ये सब कह रही हैं?"

"मेरे सामने भोला बनने की कोशिश मत करो वैभव।" भाभी ने गुस्से से कहा____"मुझे लगा था कि जिस तरह से तुम आज कल अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे हो और खेतों में मेहनत कर रहे हो उससे यकीनन तुम अब अच्छे इंसान बन गए हो मगर नहीं, मैं ग़लत थी। तुम आज भी वैसे ही हो जैसे हमेशा से थे। तुमने मेरा दिल दुखाया है वैभव और इसके लिए मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूंगी।"

मैं भौचक्का सा देखता रह गया भाभी को। सच कहूं तो उनकी बातें सुन कर मेरा सिर ही चकरा गया था। दिमाग़ ने बिल्कुल काम ही करना बंद कर दिया था। मैंने जल्दी से अपने सिर को झटका दिया तो जैसे मेरे होश ठिकाने आए।

"मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है जिसके लिए आप मुझे ये सब कह रही हैं।" मैंने मजबूती से कहा____"मैं क़सम खा कर कहता हूं भाभी कि मैंने ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जो आपकी नज़र में ग़लत हो और ना ही मैंने आपको दिया हुआ अपना वादा तोड़ा है। मेरा यकीन कीजिए भाभी।"

"अगर तुमने सच में ऐसा कुछ भी नहीं किया है।" भाभी ने आहत भाव से कहा____"तो पिता जी के पास गौरी शंकर क्यों आया है तुम्हारी शिकायत करने?"

"क...क्या???" मैं भाभी की बात सुन कर बुरी तरह उछल पड़ा____"ये क्या कह रही हैं आप? गौरी शंकर पिता जी के पास आया है?"

"हां।" भाभी ने कहा____"मुझे नहीं पता कि उसने पिता जी से ऐसा क्या कहा है लेकिन जिस तरह गुस्से में पिता जी ने अंदर आ कर मां जी से तुम्हें बुलाने को कहा है उससे तो यही लगता है कि तुमने ज़रूर गौरी शंकर के साथ अथवा उसकी बहू बेटियों के साथ कुछ ग़लत किया है।"

"ओह! तो ये बात है।" मैं जैसे सब कुछ समझ गया____"मैं सब समझ गया भाभी कि वो पिता जी के पास क्यों आया है। आप फ़िक्र मत कीजिए और हां मेरा यकीन कीजिए मैंने किसी के साथ कोई भी ग़लत काम नहीं किया है। मैंने आपको वचन दिया है तो यकीन मानिए मैं हर कीमत पर आपको दिया हुआ अपना वचन निभाऊंगा।"

मेरी बात सुन कर भाभी के चेहरे पर नज़र आ रहा गुस्सा ठंडा पड़ता नज़र आया। वो अपलक मेरे चेहरे को ही देखे जा रहीं थी। शायद मेरे चेहरे पर मौजूद भावों को समझने की कोशिश कर रहीं थी।

"क्या तुम सच कह रहे हो?" फिर उन्होंने बड़ी मासूमियत से पूछा।

"आपकी क़सम भाभी।" मैंने कहा____"मेरा यकीन कीजिए। मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है।"

"तो फिर वो गौरी शंकर क्यों आया है पिता जी के पास?" भाभी ने व्याकुलता से पूछा____"और ऐसा क्या कह दिया उसने पिता जी से कि वो इतने गुस्से में तुम्हें बुलाने के लिए मां जी से बोले हैं?"

"अब ये तो उनके पास जा कर ही पता चलेगा भाभी।" मैंने कहा____"हालाकि मुझे थोड़ा बहुत अंदाज़ा हो गया है।"

"कैसा अंदाज़ा?" भाभी के माथे पर शिकन उभर आई।

"पहले पिता जी के पास जाता हूं।" मैंने कहा____"उसके बाद आपको सब कुछ बताऊंगा।"

उसके बाद मैं भाभी के साथ ही कमरे से बाहर आ गया। मेरे मन में तरह तरह की बातें चलने लगीं थी। ख़ैर कुछ ही देर में मैं बैठक में पहुंच गया। मैंने देखा बैठक में पिता जी के अलावा गौरी शंकर और रूपचंद्र अलग अलग कुर्सियों में बैठे हुए थे। मैंने गौरी शंकर को हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और फिर पिता जी की तरफ देखा। पिता जी के चेहरे पर बेहद ही सख़्त भाव थे।

"आख़िर कब तुम हमारा कहना मानोगे?" पिता जी ने सख़्त भाव से मुझसे कहा____"हमने तुम्हें समझाया था न कि अब से तुम सिर्फ वही करोगे जो हम कहेंगे, फिर क्यों तुमने ऐसा काम किया जिसके लिए हमें गौरी शंकर के सामने शर्मिंदा होना पड़ा?"

"मैंने अपनी तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं किया है पिता जी जिसकी वजह से आपको किसी के सामने शर्मिंदा होना पड़े।" मैंने बेझिझक हो कर कहा____"आपने मुझे जो नसीहतें दी थीं मैं उनका पूरी ईमानदारी से पालन कर रह हूं। मुझे नहीं पता कि गौरी शंकर काका ने आपको मेरे बारे में क्या बताया है जिसके लिए आप ऐसा कह रहे हैं।"

"गौरी शंकर ने हमें बताया है कि तुमने उनकी भतीजी को गांव के बीच रास्ते में रोका और फिर उससे वाहियात बातें की।" पिता जी ने सख़्त नज़रों से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुमने कल भी इनकी लड़की को रोका था और आज सुबह भी। क्या तुम इस बात से इंकार कर सकते हो?"

"जी बिल्कुल इंकार करता हूं पिता जी।" मैंने गौरी शंकर और रूपचंद्र को बारी बारी से देखते हुए कहा____"मैंने इनकी लड़की को ना तो कल रोका था और ना ही आज। सच तो ये है कि उसने खुद मुझे रोका था।"

"देख रहे हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर झट से बोल पड़ा____"आपका बेटा मेरी भतीजी के बारे में क्या कह रहा है? क्या आप सोच सकते हैं कि मेरी भतीजी इतनी निर्लज्ज है कि वो गांव के बीच रास्ते में किसी लड़के को रोकेगी?"

"बड़े आश्चर्य की बात है काका कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी आपको अपनी ग़लतियों का एहसास नहीं हुआ।" मैंने गौरी शंकर से कहा____"और ना ही इस बात का एहसास है कि सच को किसी भी कीमत पर झुठलाया नहीं जा सकता। ये बात आप भी जानते हैं कि इस संबंध में कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ।"

"तुम कहना क्या चाहते हो?" रूपचंद्र बोल पड़ा।

"यही कि आप लोगों ने पिता जी को सच नहीं बताया है।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"बल्कि खुद को और अपनी भतीजी को पूरी तरह निर्दोष बता कर सिर्फ मुझे ही दोषी ठहराया है। अगर आप लोग यहां पर सच में न्याय मांगने आए हैं तो पहले अपनी भतीजी को भी यहां बुलाइए। उसके बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है और न्याय भी तभी हो सकेगा।"

"मतलब अब तुम मेरी भतीजी को बदनाम करना चाहते हो?" गौरी शंकर मुझे घूरते हुए बोला।

"बिल्कुल भी नहीं।" मैंने कहा____"न्याय चार दीवारी के अंदर होगा। बाहर वाले को इस बारे में जब कुछ पता ही नहीं चलेगा तो आपकी भतीजी कैसे बदनाम हो जाएगी भला?"

"ये बहसबाजी छोड़ो।" पिता जी ने सख़्ती से कहा____"और हमें सच सच बताओ कि तुम गौरी शंकर की भतीजी से मिले थे कि नहीं?"

"मैं आपको पूरा किस्सा ही बता देता हूं पिता जी।" मैंने दोनों चाचा भतीजे को बारी बारी से देखने के बाद कहा____"असल में बात ये है कि काका की भतीजी रूपा मुझसे प्रेम करती है और वो चाहती है कि मैं उससे ब्याह करूं। मैं ये नहीं कहता कि रूपा में कोई ख़राबी है या फिर उसमें कोई दोष है। वो यकीनन बहुत अच्छी लड़की है किंतु इस मामले में मैंने उसे पहले ही समझाया था कि उसके घर वाले मेरे जैसे लड़के के साथ उसका ब्याह किसी कीमत पर नहीं करेंगे इस लिए मेरे प्रति प्रेम की भावना को निकाल दे। मेरे लाख समझाने पर भी वो ऐसा नहीं कर सकी। ख़ैर ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा। मेरा उससे मिलना भी बंद हो गया था, उसके बाद आपने मुझे गांव से निष्कासित ही कर दिया था। वापस आने के बाद आपको भी पता है कि हम सब किस मामले में फंस गए थे। ऐसे में मैं रूपा से मिला ही नहीं। मुझे नहीं पता था कि आज भी उसके मन में वही सब है या नहीं, जबकि सच यही था कि वो आज भी मेरे प्रति अपने दिल में प्रेम की भावना रखे हुए थी। ये उसी भावना का असर था कि वो अपनी भाभी के साथ उस रात हमारी हवेली में आपसे मिलने आई थी। आप खुद सोचिए पिता जी कि जिस घर का बच्चा बच्चा हमसे नफ़रत या घृणा करता था उस घर की किसी लड़की को हमारे बारे में अच्छा सोचने की क्या ज़रूरत थी? आज जब सारी कहानी का हमें पता चल चुका है तो हमें ये भी समझ आ गया है कि ये सब कैसे हुआ होगा। सवाल उठता है कि रूपा को ये कैसे पता चला था कि कोई मुझे जान से मारने के लिए अगली सुबह चंदनपुर जाने वाला है? अगर गहराई से सोच कर कड़ियों को जोड़ा जाए तो सारी तस्वीर आईने की तरह साफ दिखने लगेगी। मुझे यकीन है कि उस रात रूपा ने अपने घर वालों को कहीं से मुझे जान से मारने की योजना बनाते हुए सुन लिया था, तभी तो वो उसी समय अपनी भाभी के साथ आपसे मिलने यहां हवेली आई थी।"

"हां हमें भी अब ये सारी बातें समझ आ गई हैं।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"किंतु इस वक्त इन सब बातों का क्या मतलब है अब?"

"इन्हीं सब बातों का ही तो मतलब है पिता जी।" मैंने ज़ोर देते हुए कहा____"इन्हीं सब बातों से तो पता चलता है कि काका की भतीजी ने ऐसा क्यों किया? उसने ऐसा इसी लिए किया क्योंकि वो मुझसे प्रेम करती थी और वो ये कैसे चाह सकती थी कि जिसे वो प्रेम करती है उसकी हत्या हो जाए? उसे उसी रात पता चल गया था कि मुझे जान से मारने की योजना बनाने वाले उसके अपने ही हैं लेकिन मुझे यकीन है कि उसने यहां आ कर आपसे ये नहीं बताया होगा कि वो लोग कौन थे? बताती भी कैसे? इतना आसान नहीं होता अपने ही हाथों अपने ही परिवार को ख़तरे में डाल देना। हां पिता जी, अगर वो उसी समय सब कुछ बता देती तो क्या ये सब हो पाता जो हो चुका है? ख़ैर, इतना कुछ होने के बाद कल जब उसने मुझे देखा तो उसने मुझे आवाज़ दे कर रोका। मैं तो अपनी मोटर साईकिल से खेतों की तरफ जा रहा था मगर उसने जब रोका तो मुझे रुकना ही पड़ा। हालाकि मैं हैरान ज़रूर हुआ था कि इतना कुछ होने के बाद भी वो मुझसे कोई ताल्लुक़ कैसे रख सकती है? बहरहाल मैं इस लिए रुक गया क्योंकि उसी की वजह से आज मैं जीवित हूं। मुझे नई ज़िंदगी दिलाने वाली को मैं कैसे नज़रअंदाज़ कर देता? उसके साथ में उस वक्त इनकी बेटी राधा भी थी। मैं जब रुका तो उसने एक बार फिर से वही सब कहना शुरू कर दिया जो पहले भी कहा करती थी कि मैं उसके प्रेम को स्वीकार कर लूं और उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लूं। उसकी ये बात सुन कर मैं ये सोच कर हैरान हुआ कि वो इतना कुछ होने के बाद भी मुझसे प्रेम करती है और मेरी बनना चाहती है। उसकी इन बातों पर मैंने एक बार फिर से उसे समझाया कि पहले ऐसा होने की संभावना भी थी किंतु अब तो कोई संभावना ही नहीं है इस लिए उसे इस तरह का पागलपन छोड़ देना चाहिए। यही बात आज सुबह भी हुई। मैं अपनी मोटर साइकिल से खेतों की तरफ जा रहा था और वो नीलम भाभी के साथ कहीं जा रही थी। उसने जब मुझे जाते देखा तो फिर से आवाज़ दे कर मुझे रोक लिया। अब आप ही बताइए कि इसमें मेरी क्या ग़लती है? काका कहते हैं कि मैंने उसे रोका था जबकि सच तो यही है कि उसने ही मुझे रोका था और ये सब कहा था।"

मेरी बातें सुनने के बाद बैठक में सन्नाटा सा छा गया। जहां एक तरफ पिता जी काफी गंभीर नज़र आने लगे थे वहीं दूसरी तरफ गौरी शंकर और रूपचंद्र अजीब से भाव लिए चुप रह गए थे।

"हम ये जानना चाहते हैं कि जिस तरह वो तुमसे प्रेम करती है।" पिता जी ने मेरी तरफ देखा___"तो क्या तुम भी उसी तरह उससे प्रेम करते हो?"

"मैं झूठ नहीं बोलूंगा पिता जी।" मैंने स्पष्ट लहजे में कहा____"सच ये है कि मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम जैसी कोई भावना नहीं है लेकिन हां सम्मान और आदर की भावना बहुत ज़्यादा है। उसकी वजह से ही आज मैं जीवित हूं तो उमर भर उसका ऋणी रहूंगा।"

"सिर्फ़ ये कह देने से बात ख़त्म नहीं हो जाती कि तुम जीवन भर उसके ऋणी रहोगे।" पिता जी ने कहा____"अगर तुम सच में समझते हो कि तुम्हारा जीवन उसी का दिया हुआ है और तुम उसके ऋणी हो तो तुम्हें उसके प्रेम को स्वीकार कर के उसे अपनाना होगा। आख़िर वो तुमसे प्रेम करती है। हम उससे मिल चुके हैं और हम जानते हैं कि वो बहुत ही नेक और प्यारी बच्ची है। जिस रात उसने हमें वो ख़बर दी थी तो हम भी उसके एहसानमंद हो गए थे।"

कहने के साथ ही पिता जी ने गौरी शंकर की तरफ देखा और फिर कहा____"गौरी शंकर, हम तुम्हारे पास हमारे संबंधों को फिर से सुधार लेने के उद्देश्य से आए थे। अब जबकि हमें इस बात का भी पता लग गया है तो क्यों न इस रिश्ते को जोड़ कर एक मजबूत संबंधों की शुरुआत कर लें।"

"लेकिन मुझे ये मंज़ूर नहीं है।" गौरी शंकर ने सपाट लहजे में कहा____"मैं ये हर्गिज़ मंजूर नहीं करूंगा कि मेरी भतीजी उस खानदान की बहू बने जिस खानदान के व्यक्ति ने हमारा समूल विनाश कर दिया हो।"

"हमें आश्चर्य हो रहा है कि इस सबके बाद भी तुम सिर्फ हमें ही दोषी मान रहे हो।" पिता जी ने आहत भाव से कहा____"जबकि सच यही है कि शुरुआत तुम लोगों ने ही की थी। हमारी जगह कोई दूसरा होता तो वो भी बदले की भावना में ऐसा ही करता। हां ये हो सकता है कि वो गुस्से में सबकी जान न लेता मगर किसी न किसी की जान तो वो ले ही लेता। गौरी शंकर, हम सब कुछ भुला कर उस दिन भी तुम्हारे पास आए थे और आज भी सब कुछ भुला कर यही कह रहे हैं कि तुम भी सब कुछ भूल जाओ और एक नए सिरे से शुरुआत करो। किसी के जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि ऊपर वाला कब किसे अपने पास बुला ले। न तुम्हें दुश्मनी कर के कुछ मिल गया और न ही हमें कुछ मिल गया। बेहतर यही है कि हम दोनों एक नई शुरुआत करें और कुछ इस तरीके से करें कि उसमें दोनों ही परिवार के सदस्यों के बीच सिर्फ प्रेम और सम्मान की ही भावना हो।"

"हमने भी तो आपसे कहा था कि अगर संबंध सुधारना ही है तो अपनी बेटी का ब्याह मेरे भतीजे से कर दीजिए।" गौरी शंकर ने कहा____"मगर मैं जानता हू कि आप ऐसा नहीं करेंगे।"

"अगर कुसुम हमारी बेटी होती तो हम यकीनन उसका ब्याह तुम्हारे भतीजे से कर देते।" पिता जी ने अधीरता से कहा____"किंतु वो हमारे मरहूम भाई की बेटी है। हम भले ही उसे उसके मां बाप से ज़्यादा प्यार और स्नेह करते हैं लेकिन जहां हक़ की बात है तो हमारा पक्ष बेहद ही कमज़ोर है। हां अगर उसकी मां चाहे तो वो कर दे, हमें कोई समस्या नहीं होगी।"

"फिर तो आपका और मेरा एक जैसा ही हाल है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"रूपा भी तो मेरे मरहूम भाई की बेटी है। इस लिए मेरा भी उस पर इस हिसाब से कोई हक़ नहीं है।"

"नहीं गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हमारे और तुम्हारे हाल में काफी अंतर है। वो अंतर ये है कि तुम्हारी भतीजी खुद ही चाहती है कि उसका ब्याह वैभव से हो, जबकि हमारी भतीजी के मन में ऐसी कोई बात नहीं है। हमारा ख़याल है कि बेमतलब का हमें तर्क कुतर्क नहीं करना चाहिए। जहां संभावना हो वहां पर रिश्ता जोड़ कर एक नया संबंध बना लेना चाहिए।"

"माफ़ कीजिए ठाकुर साहब लेकिन ये संभव नहीं है।" गौरी शंकर ने कुर्सी से उठते हुए कहा____"अच्छा अब आज्ञा दीजिए।"

"हर माता पिता अपने बच्चों की खुशी ही चाहते हैं गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हम तुमसे यही कहेंगे कि अगर तुम्हारी भतीजी की खुशी हमारे बेटे की बन जाने में ही है तो उसे उसकी खुशी दे दो। हमें तो अब ये लगता है कि शायद यही सब सोच कर ऊपर वाले ने उस मासूम बच्ची के दिल में हमारे बेटे के प्रति प्रेम का अंकुर पैदा किया रहा होगा।"

पिता जी की बात का गौरी शंकर ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि पिता जी को प्रणाम करने के बाद वो अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ बैठक से बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद पिता जी कुछ देर तक जाने क्या सोचते रहे फिर मेरी तरफ देखा।

"हम तुमसे सिर्फ इतना ही चाहते हैं कि तुम बाकी सभी फ़िज़ूल बातों से अपना ध्यान हटा कर सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारियों की तरफ ध्यान दो।" पिता जी ने कहा____"अब तुम जा सकते हो।"

पिता जी की बात सुन कर मैंने सिर हिलाया और फिर मैं पलट कर अंदर की तरफ बढ़ चला। अभी मैं कुछ ही क़दम आगे बढ़ा था कि मैंने देखा मां और भाभी दीवार से सट कर खड़ी थीं। मैं समझ गया कि वो दोनों हम सबकी बातें सुन रहीं थी।

मैं अपने कमरे में पहुंचा ही था कि तभी मेरे पीछे भाभी भी आ गईं। उन्हें आया देख मैं थोड़ा असहज हो गया। उधर वो मुझे अजीब तरह से देखे जा रहीं थी।

"तो आपने और मां ने सुन लिया न कि गौरी शंकर क्यों आया था यहां?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए कहा____"और ये भी कि कैसे वो मुझे दोषी ठहरा रहा था?"

"मैं तुमसे सिर्फ एक ही बात जानना चाहती हूं वैभव।" भाभी ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा____"क्या तुम रूपा से ब्याह करना चाहते हो?"

"ये कैसा सवाल है भाभी?" मैंने कहा____"आप भी जानती हैं कि उसके घर वाले उसका ब्याह मुझसे किसी भी कीमत पर नहीं करेंगे।"

"वो करेंगे कि नहीं ये बाद की बात है।" भाभी ने कहा____"तुम बताओ कि क्या तुम उससे ब्याह कर सकते हो?"

"अगर उसके एहसानों का कर्ज़ उससे ब्याह कर के ही चुकाया जा सकता है तो बेशक मैं उससे ब्याह कर लूंगा।" मैंने कहा____"वैसे भी पिता जी भी तो यही चाहते हैं। इस लिए अब उनकी बात मानने के सिवा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।"

"मतलब अगर तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता होता तो तुम उस लड़की से ब्याह नहीं करते?" भाभी ने आंखें सिकोड़ते हुए पूछा।

"बिल्कुल।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"जिस लड़की से मैं प्रेम ही नहीं करता उससे ब्याह क्यों करूंगा? हां ये ज़रूर है कि मैं उसका बेहद सम्मान करता हूं और उसके प्रेम की कद्र करता हूं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं उससे ब्याह ही कर लूं।"

"एक बात हमेशा याद रखो वैभव कि इंसान को उसी से ब्याह करना चाहिए जो व्यक्ति उसे दिलो जान से प्रेम करता हो।" भाभी ने कहा____"तुम्हें किसी से प्रेम है ये उतना मायने नहीं रखता। बैठक में तुम्हारी सारी बातें सुनने के बाद मुझे पता चल गया है कि वो लड़की सच में तुम्हें बहुत चाहती है। तुम खुद मानते हो कि ये उसकी चाहत ही थी जिसके चलते उसने अपने प्रेमी के लिए क्या क्या नहीं कर डाला। ऐसी लड़की को ठुकरा देना सबसे बड़ी मूर्खता होगी। उसके साथ अन्याय करना होगा,।"

"तो आप चाहती हैं कि मैं उस लड़की से ब्याह करूं?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा तो भाभी ने मेरे क़रीब आ कर कहा____"बिल्कुल। जिसने अपना सब कुछ अपने प्रेमी को सौंप दिया हो उसका सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि उसे हमेशा के लिए अपना बना लिया जाए। मुझे तो खुशी हो रही है कि कोई लड़की तुम्हें इस हद तक चाहती है कि वो तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती है। उस दिन पंचायत में मैंने देखा था उसे किंतु तब मैं ये नहीं जानती थी कि तुम दोनों के बीच का असल सच क्या है। सच कहूं तो मेरा मन उसे देखने को कर रहा है। क्या तुम मुझे मिलवाओगे उससे?"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं हैरान परेशान सा बोल पड़ा____"आप जानती हैं कि उसके घर वाले ऐसा कुछ भी नहीं चाहते हैं। आप बेकार में ही उसके लिए इतना अधीर हो रही हैं।"

"कुछ भी कहो लेकिन मुझे तो मिलना है उससे।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं उस लड़की को देखना चाहती हूं जिसने मेरे देवर की जान बचाने का सबसे महान काम किया है। काश! ऊपर वाला साहूकारों की बुद्धि को ठीक कर दे ताकि वो खुशी खुशी अपनी लड़की का ब्याह तुमसे कर दें। मुझे भी एक प्यारी सी देवरानी मिल जाएगी। वो कहने के लिए मेरी देवरानी होगी मगर मैं उसे अपनी छोटी बहन की तरह प्यार और स्नेह दूंगी।"

"हे भगवान!" मैं चकित भाव से कह उठा____"पता नहीं आप क्या क्या सोचे जा रहीं हैं। अपने आपको सम्हालिये भाभी, ये सब महज ख़्वाब हैं जो पूरे नहीं हो सकते।"

"अरे! ज़रूर पूरे होंगे वैभव।" भाभी ने दृढ़ता से कहा____"पिता जी को भी ये रिश्ता मंज़ूर है और उन्होंने कह भी दिया है इस लिए देखना एक दिन ज़रूर वो लड़की इस हवेली में मेरी देवरानी बन के आएगी।"

"क्या आप ये मानती हैं कि मुझमें पहले की अपेक्षा काफी बदलाव आया है?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए पूछा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए झट से कहा____"ज़ाहिर है उसी लड़की की वजह से।"

"नहीं भाभी।" मैंने इंकार में सिर हिला कर कहा____"उसकी वजह से मुझमें रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया था कभी।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" भाभी ने हैरत से देखा मुझे____"फिर किसकी वजह से बदलाव आया है तुममें?"

"मैं ये दिल से मानता हूं कि रूपा ने अपने प्रेम के चलते मेरे लिए बहुत बड़ा काम किया है जिसके लिए मैं जीवन भर उसका एहसानमंद रहूंगा।" मैंने कहा____"लेकिन मुझे मुकम्मल रूप से बदल देने वाली कोई और है भाभी।"

"क्या????" भाभी बुरी तरह उछल पड़ीं।

"यही सच है भाभी।" मैंने उन्हें सब कुछ बता देने का इरादा कर लिया था इस लिए बोला____"मेरी नज़र में उसकी रूपा से भी ज़्यादा अहमियत है क्योंकि उसने मेरे चरित्र को बदल कर मुझे एक नया रूप ही दे दिया है। इंसान को चाहे हज़ारों बार नया जीवन मिल जाए लेकिन अगर उसका चरित्र निम्न दर्जे का ही रहे तो कोई मतलब का नहीं रहता उसका जीवन।"

"कौंन है वो लड़की?" भाभी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखा____"जिसने तुम्हारे चरित्र को बदल कर तुम्हारा कायाकल्प कर दिया है?"

"वो एक मामूली से किसान की बेटी है।" मैंने धड़कते दिल से उन्हें बताया____"उसी मामूली से किसान की बेटी जिसकी हत्या कर दी गई थी और उसकी हत्या का इल्ज़ाम मुझ पर लगाया गया था। ये तब की बात है जब मैं इस गांव से निष्कासित किए जाने पर यहां से दूर अपनी बंज़र ज़मीन पर रहता था।"

मेरी बात सुन कर भाभी मुझे आश्चर्य से देखने लगीं। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। इधर मेरी धड़कनें ये सोच कर तेज़ हो गईं थी कि जाने भाभी क्या कहेंगी अब?

"उस मामूली से किसान की लड़की ने आख़िर तुम्हारे चरित्र को कैसे बदल दिया?" भाभी को जैसे यकीन नहीं हुआ____"मैं उसके बारे में सब कुछ जानने को उत्सुक हूं। मुझे बताओ कि उसका क्या किस्सा है?"

मैंने भाभी को अनुराधा के बारे में वो सब कुछ बताया जो मेरे और उसके बीच हुआ था और वर्तमान में भी जो कुछ हो रहा है। मैंने उन्हें ये नहीं बताया कि उसके पहले मैंने उसकी मां के साथ नाजायज़ संबंध भी बना लिए थे।

"बड़ी दिलचस्प कहानी है ये तो।" सारी बातें सुनने के बाद भाभी ने गहरी सांस ले कर कहा____"यानि ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि पिता जी के द्वारा निष्कासित किया जाना काफी फ़ायदेमंद रहा। तुम्हारी मुलाक़ात एक ऐसी लड़की से हुई जो दिखने में भले ही एक आम लड़की थी लेकिन इसके बावजूद उसमें कुछ ऐसा था कि तुम उसके साथ ग़लत न कर सके। मैं तो ये सोच सोच के ही हैरान हूं कि तुम उस लड़की की वजह से बदल गए। ख़ैर तो अब उसके बारे में क्या ख़याल है तुम्हारा? क्या तुम उससे ब्याह करना चाहते हो?"

"ब्याह करना तो फिलहाल बाद की बात है भाभी।" मैंने कहा____"अभी तो मैं ये समझने की कोशिश कर रहा हूं कि आज के वक्त में क्या सचमुच उसके दिल में मेरे प्रति प्रेम पैदा हो चुका है?"

"तुम्हारी बातें सुनने के बाद तो मुझे यही लगता है कि वो तुम्हें बहुत ज़्यादा प्रेम करने लगी है।" भाभी ने कहा____"ये प्रेम ही तो है कि वो तुम्हें देखने के लिए हर रोज़ उस मकान तक आती है। ये प्रेम ही तो है कि तेज़ बारिश में भी वो भीगती है और तुमसे वो सब कहती है। अब सवाल ये है कि क्या तुम भी उसी के जैसे उससे प्रेम करते हो या फिर उसके प्रति सिर्फ आकर्षित हो तुम?"

"नहीं भाभी।" मैंने स्पष्ट रूप से कहा____"ये सिर्फ आकर्षण नहीं है। इतने समय में इतना तो मैं भी खुद के बारे में समझ गया हूं कि मैं भी उससे प्रेम करता हूं। उसे तकलीफ़ होती है तो मुझे भी तकलीफ़ होती है। शायद यही प्रेम है।"

"चलो मुझे तो इसी बात की खुशी है कि वैभव जैसे इंसान को प्रेम का एहसास तो हुआ।" भाभी ने जैसे मुझे छेड़ते हुए कहा____"तुम्हें पता तो चल गया कि प्रेम किसे कहते हैं? शुक्र है ऊपर वाले का जो उसने तुम्हें ऐसी लड़की से मिला दिया जिसने तुम्हें बदल भी दिया और प्रेम का पाठ भी सिखा दिया।"

"अभी पूरी तरह कहां सीखा हूं भाभी?" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"अभी तो प्रेम की डगर में खड़ा ही हुआ हूं। डगर में चलना तो अभी बाकी ही है। अभी तो मुझे ये देखना और समझना है कि प्रेम की इस डगर में क्या क्या देखना और सहना पड़ेगा मुझे?"

"ये तो तुमने सही कहा।" भाभी ने कुछ सोचते हुए कहा____"उस लड़की के साथ प्रेम का सफ़र करना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा क्योंकि अगर पिता जी को इसका पता चला तो संभव है कि वो उस लड़की से तुम्हारे इस प्रेम प्रसंग पर नाराज़ हो जाएं और तुम्हें उसको भुला देने के लिए कह दें। कहने का मतलब ये कि सचमुच प्रेम की इस डगर पर तुम्हें बहुत कुछ सहना पड़ सकता है।"

भाभी की इन बातों ने मुझे एकाएक चिंता में डाल दिया। वो मुझे आराम करने का बोल कर चली गईं जबकि मैं पलंग पर लेटने के बाद गहरी सोच में डूब गया।



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अध्याय - 88

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"ये तो तुमने सही कहा।" भाभी ने कुछ सोचते हुए कहा____"उस लड़की के साथ प्रेम का सफ़र करना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा क्योंकि अगर पिता जी को इसका पता चला तो संभव है कि वो उस लड़की से तुम्हारे इस प्रेम प्रसंग पर नाराज़ हो जाएं और तुम्हें उसको भुला देने के लिए कह दें। कहने का मतलब ये कि सचमुच प्रेम की इस डगर पर तुम्हें बहुत कुछ सहना पड़ सकता है।"

भाभी की इन बातों ने मुझे एकाएक चिंता में डाल दिया। वो मुझे आराम करने का बोल कर चली गईं जबकि मैं पलंग पर लेटने के बाद गहरी सोच में डूब गया।


अब आगे....




"क्या हुआ?" चंद्रकांत अपने बेटे रघुवीर को बाहर से मुस्कुराते हुए आते देखा तो पूछ बैठा____"किस बात से इतना खुश हो जो इतना मुस्कुरा रहे हो तुम?"

"लगता है मेरी लगाई हुई आग भड़कने वाली है बापू।" रघुवीर ने खुशी के आवेश में मुस्कुराते हुए कहा____"ऐसा प्रतीत होता है जैसे जल्द ही दादा ठाकुर और गौरी शंकर के बीच कलह शुरू होने वाली है।"

"ऐसा किस आधार पर कह रहे हो तुम?" चंद्रकांत अपने बेटे की बात से मन ही मन चौंक पड़ा था।

"मेरे एक ख़ास आदमी ने अभी अभी आ कर मुझे बताया है कि गौरी शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ हवेली गया था।" रघुवीर ने कहा____"और वापस आते समय दोनों ही चाचा भतीजे गुस्से में नज़र आ रहे थे। ज़ाहिर है हवेली में दादा ठाकुर से उनकी कोई तो ऐसी बात ज़रूर हुई है जिसके चलते वो दोनों गुस्से में वहां से लौटे हैं।"

"यानि गौरी शंकर दादा ठाकुर के पास वैभव की शिकायत ले कर गया था।" चंद्रकांत ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"हवेली में यकीनन दादा ठाकुर ने उसकी शिकायत को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया होगा तभी तो दोनों चाचा भतीजे गुस्से में आए वहां से। हमारे लिए ये जानना ज़रूरी है कि दादा ठाकुर और गौरी शंकर के बीच इस संबंध में क्या बातें हुईं हैं?"

"मेरा ख़याल है कि तुम्हें एक बार फिर गौरी शंकर से मिलना चाहिए बापू।" रघुवीर ने जैसे राय दी____"और उसी से किसी तरह इस बारे में जान लेना चाहिए। अगर ये लगे कि दोनों पक्षों के बीच मामला तनातनी का बन चुका है तो फ़ौरन ही आग में घी डालने का काम कर देना।"

"सही कह रहे हो तुम।" चंद्रकांत ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें अपने लिए ढाल के रूप में गौरी शंकर का साथ हर कीमत पर चाहिए। भले ही उनका समूल विनाश कर दिया है दादा ठाकुर ने लेकिन अभी भी साहूकार इतने समर्थ हैं कि वो दादा ठाकुर से भिड़ सकते हैं।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है बापू।" रघुवीर ने कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि गौरी शंकर अब हमें अपने साथ नहीं मिलाएगा। हालाकि मैंने उसे दादा ठाकुर के खिलाफ़ भड़काने का समान तो तरीके से जुटा दिया है लेकिन मुझे लगता है कि अपनी ये लड़ाई वो खुद ही अकेले लड़ना चाहेगा।"

"असल में दादा ठाकुर ने जिस तरह से उसके अपनों का नर संघार किया है उससे वो पूरी तरह से ख़ौफ खा गया है।" चंद्रकांत ने कहा____"उसमें अब इतना जल्दी दादा ठाकुर के खिलाफ़ जाने का साहस नहीं हो सकता। ख़ैर, देखते हैं क्या होता है। मैं आज ही उससे मिलूंगा और उससे जानने की कोशिश करूंगा कि उसकी दादा ठाकुर से इस सिलसिले में क्या बातें हुईं हैं? अगर सच में दादा ठाकुर से उसकी तनातनी हुई है तो मेरी कोशिश यही रहेगी कि उसे मैं फिर से अपने साथ मिला लूं।"

"और अगर वो फिर भी हमारे साथ न मिला तो?" रघुवीर ने जैसे संदेह ज़ाहिर किया____"तब हम क्या करेंगे बापू? तब तो हमें अकेले ही दादा ठाकुर के उस सपोले का किस्सा ख़त्म करने के बारे में सोचने पड़ेगा।"

"फ़िक्र मत करो बेटा।" चंद्रकांत ने कठोरता से कहा____"गौरी शंकर अगर साथ में न भी मिला तब भी हम उस नामुराद वैभव का किस्सा ख़त्म करेंगे।"

"वो कैसे बापू?" रघुवीर ने उत्सुकता से पूछा।

"मेरे दिमाग़ में एक ज़बरदस्त योजना ने जन्म लिया है।" चंद्रकांत ने कहा____"वो ऐसी योजना है कि वैभव बच नहीं सकेगा और उसका बाप अपने बेटे को बचा भी नहीं पाएगा। यूं समझो कि वैभव नाम के कुकर्मी का जीवन एक झटके में समाप्त हो जाएगा और फिर वो हमेशा के लिए एक इतिहास बन के रह जाएगा।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर हमें गौरी शंकर के साथ की क्या ज़रूरत है बापू?" रघुवीर ने आवेश में आ कर कहा____"हम जल्द से जल्द उस हरामजादे का किस्सा ही ख़त्म कर देते हैं।"

"नहीं बेटे, ये काम ज़ल्दबाज़ी में तो हर्गिज़ नहीं होगा।" चंद्रकांत ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"क्योंकि ज़ल्दबाज़ी में किया गया कोई भी काम अक्सर बिगड़ जाता है और मुसीबत का सबब बन जाता है। ये सच है कि मेरी योजना के अनुसार वैभव का किस्सा ख़त्म हो जाएगा लेकिन उससे पहले मैं ये चाहता हूं कि अगर गौरी शंकर का साथ मिल जाए तो अच्छा हो जाए। ऐसा इस लिए क्योंकि इससे बाद में हम सारा दोष उसके ऊपर ही मढ़ सकते हैं। गौरी शंकर की भतीजी और वैभव का मामला एक तरह से इस बात का सबूत रहेगा कि उसने इसी बात के चलते वैभव को मार डाला। इधर हम निर्दोष हो कर बच जाएंगे।"

"ओह! तो इस लिए तुम गौरी शंकर को अपने साथ मिला लेने पर इतना ज़ोर दे रहे हो?" रघुवीर जैसे सब कुछ समझ गया था____"वाकई में तुम्हारी ये योजना तो ज़बरदस्त है बापू।"

चंद्रकांत अपने बेटे द्वारा की गई इस तारीफ़ से अपनी बुद्धिमानी पर गर्व महसूस किया। उसके मन में कई तरह के विचार आ जा रहे थे।

"हम एक महत्वपूर्ण बात तो भूल ही रहे हैं बापू।" गहरे विचारों में खोया चंद्रकांत अपने बेटे की इस बात को सुन कर चौंका, बोला____"कौन सी बात?"

"उस दिन पंचायत में दादा ठाकुर हम लोगों से किसी सफ़ेदपोश के बारे में पूछ रहा था।" रघुवीर ने अजीब भाव से अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा____"और उसने ये भी बताया था कि उस सफ़ेदपोश व्यक्ति ने कई बार वैभव को जान से मारने का प्रयास किया था।"

"हां हां याद आया मुझे।" चंद्रकांत ये सोच कर खुद पर हैरान हुआ कि वो इतनी बड़ी बात कैसे भूल गया था?

"तुम्हें क्या लगता है बापू?" रघुवीर ने कहा____"क्या सच में ऐसा कोई सफ़ेदपोश व्यक्ति है जो दादा ठाकुर के बताए अनुसार वैभव को कई बार जान से मारने की कोशिश की होगी? या फिर ये दादा ठाकुर की कोई चाल है? मेरा मतलब है कि अपने पक्ष को किसी तरह से दीन हीन दिखाने की उसकी ये चाल थी?"

"हो भी सकता है बेटे कि ये सब उसकी चाल ही हो।" चंद्रकांत ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"लेकिन मुझे नहीं लगता है कि दादा ठाकुर इस तरह की कोई चाल चल के पंचायत में खुद को दीन हीन दर्शाने की कोशिश करेगा।"

"यानि तुम मानते हो कि सफ़ेदपोश की बात सच है?" रघुवीर ने कहा____"और उसने कई बार वैभव को जान से मारने की कोशिश की होगी?"

"इस बात को न मानने का कोई मतलब ही नहीं है बेटे।" चंद्रकांत ने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"वैभव जैसे कुकर्मी लड़के के कई सारे ऐसे दुश्मन हो सकते हैं जो उसकी जान लेना चाहते होंगे।"

"फिर तो हमें वैभव को ख़त्म करने की ज़रूरत ही नहीं है बापू।" रघुवीर ने कहा____"कथित सफ़ेदपोश खुद ही उसे जान से मार देगा। हर बार तो उस हरामजादे की किस्मत अच्छी नहीं हो सकती ना। किसी न किसी दिन तो वो सफ़ेदपोश के हाथ लग ही जाएगा और फिर निश्चय ही वो अपनी जान से जाएगा। इस लिए हमें वैभव को मारने का इरादा त्याग देना चाहिए। इससे हम पर बाद में कोई बात भी नहीं आएगी।"

"नहीं बेटे।" चंद्रकांत ने दृढ़ता से कहा____"उस नामुराद को तो हम अपने हाथों से ही ख़त्म करेंगे। तभी हमारे अंदर की आग ठंडी होगी। तुम चिंता मत करो, मेरी योजना ऐसी है कि हम वैभव का किस्सा भी ख़त्म कर देंगे और उसका कोई इल्ज़ाम भी हम पर नहीं आएगा।"

"ठीक है बापू।" रघुवीर ने कहा____"अगर हम पर कोई इल्ज़ाम ही नहीं आने वाला तो इससे अच्छा कुछ है ही नहीं। मैं भी उसे अपने हाथों से ही मौत देना चाहता हूं।"

✮✮✮✮

साहूकारों के घर में सबके सामने गहन विचार विमर्श चल रहा था। गौरी शंकर और रूपचंद्र ने सभी को संक्षेप में वो किस्सा सुना दिया था जो हवेली में दादा ठाकुर के बीच हुआ था। सारी बातें सुन कर सभी सोच में पड़ गए थे। तभी शिव शंकर की सबसे छोटी बेटी स्नेहा सबके पास आई और फिर उसने गौरी शंकर से कहा कि दादा जी बुला रहे हैं। स्नेहा की बात सुन कर गौरी शंकर फ़ौरन ही अपने पिता चंद्रमणि के कमरे की तरफ बढ़ गया। उसके पीछे रूपचंद्र और बाकी औरतें भी बढ़ चलीं। कुछ ही देर में गौरी शंकर और रूपचंद्र उस कमरे में पहुंच गए जिस कमरे में चंद्रमणि पलंग पर लेटे हुए थे। वो वृद्ध हो चुके थे और चल फिर नहीं सकते थे।

"आपने मुझे बुलाया पिता जी?" गौरी शंकर अपने पिता के पास ही पलंग के किनारे पर बैठते हुए उनसे बोला।

"आख़िर कब अपनी मनमानियां करना बंद करोगे तुम लोग?" चंद्रमणि ने अपनी कमज़ोर सी आवाज़ में खांसने के बाद कहा____"क्या चाहते हो कि तुम्हारे घर की औरतें और बहू बेटियां सब अनाथ और बेसहारा हो जाएं?"

"ये आप क्या कह रहे हैं पिता जी?" गौरी शंकर ने हैरानी से कहा____"हम भला ऐसा क्यों चाहेंगे?"

"तुम लोगों ने अपनी मनमानी के चलते अपने भाइयों को और अपने बच्चों को खो दिया।" चंद्रमणि ने कहा____"अब मेरा भी गला दबा दो ताकि जल्दी से मर जाऊं। मुझे तुम लोगों ने वैसे ही मरा हुआ समझ रखा है इस लिए गला दबा दो मेरा।"

"पिता जी ये कैसी बातें कर रहे हैं आप?" गौरी शंकर झट से बोला____"आप ये कैसे सोच सकते हैं कि हम सबने आपको मरा हुआ समझ लिया है?"

"तुम लोगों ने जो किया है उससे बहुत तकलीफ़ हुई है मुझे।" चंद्रमणि ने आहत भाव से कहा____"मेरे घर के इतने सारे लोग मर गए और तुम लोगों ने मुझे एक बार उनकी शकल तक नहीं दिखाई। जब से मैंने ये बिस्तर पकड़ा है तबसे मैं तुम लोगों के लिए मरा हुआ ही तो हूं। विधाता ने मुझे इतना बड़ा परिवार दिया था लेकिन सब ख़त्म हो गया। इतना कुछ होने के बाद भी मेरी जान नहीं गई। पता नहीं अभी और क्या क्या देखना सुनना बाकी है मुझे।"

"माफ़ कर दीजिए पिता जी लेकिन हमने आपको उन सबकी शकल इसी लिए नहीं दिखाई थी ताकि आपको उन्हें देख कर तकलीफ़ न हो।" गौरी शंकर ने कहा____"बाकी हमने जो किया वो तो आप भी चाहते थे। हां ये ज़रूर है कि हमने जिस तरह से सब कुछ सोचा था उस तरीके से नहीं हुआ।"

"यही तो विडंबना है गौरी।" चंद्रमणि ने कहा____"इंसान जो सोचता है अथवा जो चाहता है वैसा कुछ भी नहीं हुआ करता। होता तो वही है जो इंसानों के लिए ऊपर वाले ने सोचा होता है। मेरे दिल में हवेली वालों से नफ़रत ज़रूर थी लेकिन मैंने उसी दिन अपने अंदर से उस नफ़रत को निकाल दिया था जिस दिन सूर्य प्रताप का बेटा प्रताप सिंह मेरे पास अपने बाप के किए गए गुनाह की माफ़ी मांगने आया था। गुनाह तो उसके बाप सूर्य प्रताप सिंह ने किया था और उसे ईश्वर ने खुद ही सज़ा दे दी थी। उसके बाद उसके बेटों ने कभी किसी के साथ ग़लत नहीं किया। वर्षों तक जब मैंने ये जाना सुना तो मेरे दिल से बदले की भावना खुद ही चली गई। मैंने मणि शंकर को भी क‌ई बार समझाया था कि अब वो उन लोगों से बदला लेने का ख़याल अपने दिल से निकाल दे मगर उसने ऐसा कभी नहीं किया। तुम लोगों ने हमेशा मनमानी की और ये उसी का नतीजा है कि आज मेरा ये भरा पूरा परिवार अनाथ हो गया है। इस घर की औरतें और बहू बेटियां सब तुम लोगों की करनी की वजह से बेसहारा हो गई हैं। क्या अभी भी तुम्हारे मन में प्रताप सिंह से बदला लेने की ही भावना है? क्या अपने ही हाथों अपने परिवार को मिट्टी में मिलाने से तुम्हारा पेट नहीं भरा?"

"माफ़ कर दीजिए पिता जी।" गौरी शंकर ने गंभीर हो कर कहा____"असल में हवेली वालों के प्रति हमारे दिलो दिमाग़ में घृणा और नफ़रत ही इतनी ज़्यादा भरी हुई थी कि उसकी वजह से हमें दूसरा कुछ दिखता ही नहीं था। कहते हैं न कि इंसान को तभी अकल आती है जब उसे ठोकर लगती है। हमने ठोकर के रूप में बहुत बड़ी कीमत चुकाई पिता जी और तब जा कर हमें एहसास हुआ कि हमने वास्तव में क्या किया है और इसके पहले कितना ग़लत कर रहे थे।"

"तो अगर तुम्हें एहसास हो गया है तो अब ऐसा रास्ता चुनो जिससे इस परिवार का भला हो सके।" चंद्रमणि ने कहा____"और साथ ही इस गांव में इज्ज़त के साथ सब लोग जी सको।"

"इतना कुछ हो जाने के बाद अब ये इतना आसान नहीं है पिता जी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"दूर दूर तक के लोगों को पता चल चुका है कि हमने दादा ठाकुर के साथ क्या किया है और उन्होंने हमारे साथ क्या किया है।"

"मानता हूं इस बात को।" चंद्रमणि ने कहा____"लेकिन ऐसा सोच कर बैठे रहने से कुछ हासिल भी नहीं होगा। इस गांव में अगर इज्ज़त सम्मान के साथ रहना है तो कुछ ऐसा करना होगा तुम्हें जिससे कि लोगों के ज़हन से इस परिवार के बारे में पैदा हुई ग़लत धारणाएं दूर हो जाएं और लोग तुम सब पर भरोसा करने लगें।"

"आप कहना क्या चाहते हैं पिता जी?" गौरी शंकर को जैसे समझ न आया था।

"यही कि दादा ठाकुर से माफ़ी मांग कर उनसे अपने बेहतर संबंध बना लो।" चंद्रमणि ने कहा____"तुम भी ये मानते ही होगे कि उनके साथ ग़लत करने की शुरुआत तुम लोगों ने ही की थी। उसके लिए जो भी अंजाम तुम्हें भुगतना पड़ा उसमें भी तुम लोगों की ही ग़लती है। इस लिए खुद जा कर अपने किए की माफ़ी मांगो और उनसे अपने रिश्ते बेहतर बना लो। वो बड़े लोग हैं गौरी, इतना कुछ हो जाने के बाद भी उनकी आन बान और शान में कोई कमी नहीं आएगी। जबकि तुम अगर अपनी ज़िद पर अड़े रहोगे तो हमेशा हमेशा के लिए अकेले ही रह जाओगे और ये भी यकीन करो कि एक दिन ऐसा भी वक्त आएगा जब लोग इस घर के लोगों की तरफ देखना भी पसंद नहीं करेंगे। इसी लिए कहता हूं कि इससे पहले कि ऐसा कोई दिन आए तुम दादा ठाकुर से अपने रिश्ते बेहतर बना कर उनसे घुल मिल जाओ। उनके साथ का बहुत बड़ा असर पड़ेगा। उनके साथ साथ लोग तुम लोगों की भी इज्ज़त करेंगे।"

अपने पिता की बातें सुन कर गौरी शंकर गहरी सोच में पड़ गया। यही हाल बाकी सबका भी था। कमरे में एकदम से सन्नाटा छा गया था। उधर चंद्रमणि कुछ देर तक गौरी शंकर को देखते रहे फिर उन्होंने एक गहरी सांस ली।

"मुझे मेरी नातिन स्नेहा ने कुछ बातें बताई हैं जो अभी वर्तमान में चल रही हैं।" चंद्रमणि ने सन्नाटे को चीरते हुए कहा____"अगर वो सब बातें वाकई में सच हैं तो उन्हीं के आधार पर तुम उनके साथ अपने रिश्ते बेहतर और मजबूत बना सकते हो।"

"क्या मतलब है आपका?" फूलवती सहसा बोल पड़ी____"कहीं आप ये तो नहीं कह रहे हैं कि हम दादा ठाकुर के बेटे से अपनी बेटी रूपा का ब्याह कर दें और एक मजबूत रिश्ता बना लें उनसे?"

"हां बहू, मैं सच में यही कहना चाहता हूं।" चंद्रमणि ने सिर हिलाते हुए कहा____"मैं जानता हूं कि इस वक्त तुम लोगों के दिलो दिमाग़ में इस संबंध के बारे में कैसे कैसे विचार उत्पन्न होते रहते हैं लेकिन मैं यही कहूंगा कि उन विचारों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल दो। इसी में सबका भला है। एक बात हमेशा याद रखो कि अतीत की बातों को ले कर बैठे रहने से ना तो कभी खुश रह पाओगे और ना ही कभी उन्नति कर पाओगे। जो हो गया उसे भूलने की कोशिश करो और उन लोगों की तरफ देखो जिनका भविष्य तुम लोगों के ही द्वारा अच्छा या बुरा बन सकता है।"

"हमने भी तो कल दादा ठाकुर से ऐसा ही संबंध बनाने की बात की थी पिता जी।" फूलवती ने कहा____"हमने उनसे कहा था कि अगर वो अपने भाई की बेटी का ब्याह हमारे बेटे रूपचंद्र से कर दें तो हमारे बीच बेहतर रिश्ता बन जाएगा।"

"तुम्हें ऐसा दुस्साहस नहीं करना चाहिए था बहू।" चंद्रमणि ने कहा____"वो हमसे बड़े लोग हैं और बड़े लोग कभी अपने से छोटे को सिर पर नहीं बिठाते। शुकर मनाओ कि तुम्हारे इस दुस्साहस पर दादा ठाकुर ने तुम पर गुस्सा नहीं किया वरना अनर्थ हो जाता।"

"आप बेकार में ही इतनी चिंता कर रहे हैं पिता जी।" फूलवती ने कहा___"जबकि सच तो ये है कि दादा ठाकुर जब मेरे सामने आया था तो हाथ जोड़ कर मुझसे माफ़ियां मांग रहा था। फिर जब हमने उससे अपनी बेटी का ब्याह हमारे बेटे से करने को कहा तो वो राज़ी भी हो गया।"

"ये क्या कह रही हो तुम बहू?" चंद्रमणि की कमज़ोर आंखें आश्चर्य से फैल गईं।

फूलवती ने कल का सारा किस्सा उन्हें बता दिया जिसे सुन कर चंद्रमणि हैरत के भाव लिए काफी देर तक कुछ न बोल सका था।

"तो तुम उसकी नर्मी और नेकदिली को उसकी दुर्बलता और अपराध बोझ से दबा हुआ समझ बैठी हो?" फिर चंद्रमणि ने कहा____"हैरत की बात है बहू कि तुम ऐसा समझी हो। ख़ैर ये तो उसके विशाल हृदय की बात है कि उसने खुद को तुम लोगों का दोषी माना और वो सब कहा मगर तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए था। इंसान ग़लतियों से सबक लेता है जबकि ऐसा लगता है कि यहां अभी भी तुम लोगों ने कोई सबक सीखा ही नहीं है। एक बार खुद सोचो कि उसे क्या ज़रूरत है भला तुम लोगों से अपने संबंध बेहतर बनाने की? जबकि उसके संबंध तो बड़े बड़े लोगों से हैं जो उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं? वो चाह ले तो एक झटके में तुम सबकी ज़िंदगी को नर्क बना सकता है और तुम लोग कुछ नहीं कर पाओगे लेकिन नहीं, उसने इस सबके बाद भी तुम सबकी बेहतरी के बारे में सोचा और खुद आ कर वो सब कहा। तुम लोगों को उसका शुक्र गुज़ार होना चाहिए था। ये उसके विशाल हृदय की ही बात है। वो नहीं चाहता कि उसके गांव के इतने संपन्न साहूकारों का परिवार किसी गर्त में डूब जाए।"

चंद्रमणि की बातों ने एक बार फिर से कमरे में सन्नाटा खींच दिया। पहली बार फूलवती को अपने परिवार की वस्तुस्थिति का एहसास हुआ और साथ ही अपनी ग़लती का भी जो उसने दादा ठाकुर से ब्याह की बातें कर के की थी।

"तो आप ये चाहते हैं कि हम लोग सब कुछ भुला कर उससे संबंध बना लें?" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"और इसके लिए उसके कहे अनुसार हम अपनी बेटी रूपा का ब्याह दादा ठाकुर के बेटे से करने को तैयार हो जाएं?"

"इसी में तुम सबका भला है गौरी।" चंद्रमणि ने कहा____"इस घर की बेटी जब हवेली में बहू बन कर रहेगी तो उसकी एक शान बन जाएगी और उसके साथ साथ तुम सबके भी उस हवेली से गहरे संबंध बन जाएंगे। वो भी ऐसे संबंध जो हमेशा के लिए एक मजबूत रिश्ते में बंधे रहेंगे। उनके साथ साथ लोग तुम लोगों के बारे में भी अच्छा ही सोचने लगेंगे और तुम लोगों की हर जगह पूछ होने लगेगी। इससे बेहतर भला और क्या चाहिए इस परिवार के लिए? क्या ऐसा किसी दूसरे रास्ते से कभी कर पाओगे तुम लोग? तुम लोगों ने जो किया है उसके चलते कोई तुम्हारी बेटियों से ब्याह भी नहीं करेगा। वो सब यही सोचेंगे कि तुम लोग हत्यारे हो तो तुम्हारी बेटियां भी तुम्हारे जैसी ही सोच और मानसिकता वाली होंगी। ऐसे में कौन भला तुम्हारी बेटियों को अपने घर की बहू बनाना चाहेगा? सच तो ये है गौरी कि इस घर की बेटियां जीवन भर कुंवारी ही बैठी रह जाएंगी। इस लिए अगर तुम लोग चाहते हो कि तुम्हारी बेटियों का कहीं घर बस जाए और वो खुश रहें तो अपने दिलो दिमाग़ से दादा ठाकुर के प्रति बैर भाव निकाल दो और उससे ये रिश्ता बना लो। बाकी जैसी तुम लोगों की मर्ज़ी।"

कहने के साथ ही चंद्रमणि ने एक बार सबकी तरफ देखा और फिर दूसरी तरफ को करवट ले ली। गौरी शंकर समझ गया कि उसके पिता को जो कहना था वो कह चुका है। अपने पिता की तरफ देखते हुए उसने गहरी सांस ली और फिर उठ कर कमरे से बाहर आ गया। उसके पीछे बाकी लोग भी आ गए थे।


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अध्याय - 89

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कहने के साथ ही चंद्रमणि ने एक बार सबकी तरफ देखा और फिर दूसरी तरफ को करवट ले ली। गौरी शंकर समझ गया कि उसके पिता को जो कहना था वो कह चुका है। अपने पिता की तरफ देखते हुए उसने गहरी सांस ली और फिर उठ कर कमरे से बाहर आ गया। उसके पीछे बाकी लोग भी आ गए थे।

अब आगे....

खेती बाड़ी के काम में मैं ऐसा उलझा कि फिर मुझे किसी और चीज़ के लिए समय ही नहीं मिला। थका हारा हवेली आता और खा पी कर सो जाता। सुबह नाश्ता कर के फिर से खेतों की तरफ निकल जाता। मेरे अंदर एकदम से जैसे जुनून सा सवार हो गया था। सबसे ज़्यादा इस बात का जुनून कि मुझे अपनी भाभी की नज़रों में एक अच्छा इंसान बनना है और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना है। इसी के चलते जब काम में खुद को समर्पित किया तो जैसे ज़िम्मेदारी अपने आप ही निभाने लग गया था मैं। इस बात का भी बोध था कि अब से सब कुछ मुझे ही सम्हालना है इस लिए अगर ये सब ईमानदारी से नहीं किया तो सब कुछ बर्बाद भी हो सकता है।

पिता जी मेरे इस समर्पित भाव से काफी खुश और प्रभावित थे। वो बीच बीच में मुझसे काम के बारे में पूछते रहते थे। दूसरे गांव के ठाकुर जो पिता जी के मित्र लोग थे वो उनसे मिलने आते रहते थे। दिन ऐसे ही गुज़रने लगे। इस बीच कोई भी ऐसी बात नहीं हुई जिससे हमें किसी तरह का नुकसान हो। इतने दिनों में एक और बात समझ में आई कि काफी दिनों से सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं था। ऐसा इस लिए कहा जा सकता है क्योंकि काफी समय से उसकी तरफ से न तो कोई प्रतिक्रिया हुई थी और ना ही हमें उसके कहीं होने का पता चला था। समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों था? अगर सफ़ेदपोश वाकई में मेरी जान का सबसे बड़ा दुश्मन था तो वो इस तरह से ख़ामोश अथवा लापता क्यों था? क्या वो किसी ऐसे मौके की तलाश में था जिसमें वो मुझे एक झटके में ही ख़त्म कर सके? या फिर वो कोई बड़ा खेल खेलने वाला था? ये दो सवाल ऐसे थे जो हमें सोचने पर मजबूर किए हुए थे और इसी के चलते पिता जी अक्सर मुझे सतर्क रहने की भी हिदायत देते रहते थे। मेरी हिफाज़त के लिए हमेशा मेरे चुनिंदा मुलाजिम मेरे आस पास ही रहते थे।

ऐसे ही बीस दिन गुज़र गए। इस बीच रूपा मुझे नज़र नहीं आई थी। जाने क्यों मुझे उसकी फ़िक्र सी होने लगी थी। उसके प्रति बेहद सहानुभूति थी मुझे। दूसरी तरफ अनुराधा से भी मेरी मुलाक़ात नहीं हुई थी क्योंकि मैं अपने नए वाले मकान में गया ही नहीं। मेरा सारा समय खेतों पर ही गुज़र जाता था। हालाकि भुवन से मुझे उसका और उसके घर वालों का हाल चाल पता चल जाता था।

खेतों में धान बो दी गई थी और साथ ही मूंग उड़द बाजरा आदि सब बो दिया गया था। पुराने जो किसान थे उन सबका कहना था कि इस बार ये सब काम करने में आनंद भी आया और समय भी कम लगा।

एक दिन मां ने कहा कि मैं मेनका चाची के मायके चला जाऊं और उन सबको लिवा लाऊं। दूसरे ही दिन मैं चाची के मायके कुंदनपुर निकल गया। मेरी हिफाज़त के लिए पिता जी ने मेरे साथ कुछ आदमियों को भी भेज दिया था।

मैं पहले भी कई बार कुंदनपुर आ चुका था इस लिए सभी मुझे पहचानते थे और साथ ही आस पास के बाकी लोग भी। इस बार मेरे आने पर मेरा कोई खास स्वागत नहीं हुआ। ज़ाहिर है इसकी मुख्य वजह मेरे चाचा की अकस्मात हुई मौत थी जिसके चलते अभी भी सब दुखी थे। बहरहाल सब बड़े ही आत्मीयता से मिले। मेरे साथ आए आदमियों को भी हवेली के दूसरी तरफ बने कमरों में ठहराया गया। हाल चाल के बाद भोजन पानी हुआ, उसके बाद मैं एक कमरे में आराम करने चला गया।

पहले जब मैं चाची के मायके आया करता था तो अलग ही जलवा रहता था मेरा। यहां भी मैंने झंडे गाड़े थे और इसका पता मेरे मामा मामी लोगों को भी था। वो मेरी फितरत से अच्छी तरह वाक़िफ थे। वो ज़्यादा कुछ तो नहीं कहते थे बस यही हिदायत देते थे कि ऐसे काम मत किया करो क्योंकि इससे व्यक्ति के साथ साथ खानदान का भी नाम ख़राब होता है। मैं उनकी बातों को एक कान से सुन कर दूसरे वाले कान से निकाल देता था। अपने बारे में तो बस एक ही कहावत थी कि घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या?

मैंने दोपहर में ही सबको बता दिया था कि मैं चाची के साथ साथ उनके बच्चों को भी लेने आया हूं इस लिए सुबह जाने को तैयार रहें। छोटे मामा मेरी बदली हुई फितरत से थोड़ा हैरान थे और रात में मज़ाक करते हुए मुझसे पूछा भी कि मुझमें इतना बदलाव कैसे तो मैंने हंस कर उनकी बात को टाल दिया था।

सुबह हमारी रवानगी हुई। नाना नानी और मामा मामी सब दो चार दिन रुकने को बोल रहे थे लेकिन मैंने उन्हें बताया कि रुकना संभव नहीं है क्योंकि हवेली में भी सब अकेले ही हैं और वैसे भी मुझे खेतों पर जाना होता है। ख़ैर उन्हें भी सभी चीज़ों का एहसास था इस लिए सुबह हमारी रवानगी हो गई। चाची सबसे विदा ले रहीं थी। अपनी मां और भाभियों से लिपट कर रो रहीं थी वो। कुसुम का भी यही हाल था। उसके बाद हम सब वहां से चल पड़े। इस बार मेरी वाली जीप पर मेनका चाची और कुसुम थीं जबकि विभोर और अजीत दूसरी जीप में मेरे आदमियों के साथ थे।

एक घंटे बाद हम अपनी हवेली पहुंच गए। सभी के आ जाने से हवेली में एकदम से चहल पहल हो गई। पहले की अपेक्षा अब हवेली में थोड़ी रौनक सी आ गई थी वरना पूरी हवेली सुनसान सी लगती थी। मेनका चाची से मां हाल चाल पूछने लगीं। रागिनी भाभी भी उनके पास आ गईं थी। चाची ने अपना और अपने मायके वालों का हाल चाल बताया और फिर मां के कहने पर वो अपने कमरे में अपना झोला रखने तथा आराम करने चली गईं। रागिनी भाभी रसोई में दोपहर का खाना बनाने में लग गईं। कुछ देर में कुसुम आई तो वो भी रसोई में भाभी की मदद करने लगी।

मैं बैठक में पिता जी के पास बैठ गया था। पिता जी ने मुझसे चाची के मायके वालों का हाल चाल पूछा और ये भी कि सफ़र में कोई परेशानी तो नहीं हुई? उसके बाद उन्होंने बताया कि अगले दिन एक आदमी मेरे ननिहाल माधवगढ़ से आएगा। उस आदमी के साथ उसकी बीवी और उसके दो बच्चे भी होंगे। पिता जी ने बताया कि उन्होंने एक दिन मेरे ननिहाल में नाना जी को अपने एक मुलाजिम द्वारा संदेश भिजवाया था जिसमें उन्होंने नाना जी को लिखा था कि उन्हें अपने हिसाब किताब की देख रेख के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो भरोसेमंद और सच्चा हो। पिता जी के संदेश पर नाना जी का संदेश आया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि कल तक एक आदमी हमारे पास पहुंच जाएगा जो पिता जी के इस काम को बेहतर तरीके से देखेगा।

"इसका मतलब वो आदमी अपने बीवी बच्चों के साथ यहीं हवेली में रहेगा?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"और साथ ही आपके बही खातों का सारा हिसाब किताब भी देखेगा?"

"वक्त की नज़ाकत को देखते हुए हमने यही फ़ैसला लिया है कि वो व्यक्ति हवेली में ही अपने बीवी बच्चों के साथ रहे।" पिता जी ने कहा____"अगर हम उसके रहने का इंतजाम इस गांव में ही कहीं करेंगे तो बहुत हद तक संभव है कि वो हमारे किसी दुश्मन का शिकार हो सकता है। इसी लिए हमने सोचा है कि जब तक सफ़ेदपोश जैसे रहस्यमय व्यक्ति का ख़तरा समाप्त नहीं हो जाता तब तक हम उस आदमी को हवेली में ही रखेंगे। इससे वो हमारी नज़रों के सामने भी रहेगा और हमें उसकी तथा उसके परिवार की फ़िक्र भी नहीं करनी पड़ेगी।"

"हां ये ठीक किया आपने।" मैंने सिर हिलाया____"वो हवेली में रहेगा तो चंद्रकांत जैसे व्यक्तियों का साया भी उस पर नहीं पड़ सकेगा।"

खाना बन गया तो मां हमें बुलाने बैठक में आईं। मैं और पिता जी उठ कर अंदर की तरफ चल पड़े। आज काफी दिनों बाद हम दोनों के अलावा विभोर और अजीत भी हमारे साथ खाना खाने बैठे थे। खाने के बाद मैं आराम करने के लिए अपने कमरे में चला गया।

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दो हफ़्ते ऐसे ही गुज़र गए। सब कुछ सामान्य चल रहा था। इस बीच विभोर और अजीत भी मेरे साथ खेतों की तरफ घूमने आ जाते थे। वो दोनों अब कुछ हद तक सामान्य नज़र आने लगे थे। मैं भी यही कोशिश करता था कि दोनों को ये महसूस न हो कि पिता का साया हट जाने के बाद वो दोनों अकेले अथवा अनाथ हो गए हैं।

एक दिन सुबह सुबह हम सब नाश्ता कर रहे थे कि तभी बाहर से एक दरबान अंदर आया और उसने पिता जी को जो कुछ बताया उसे सुन कर हम सबके जैसे होश ही उड़ गए। दरबान के अनुसार रात किसी ने चंद्रकांत के बेटे रघुवीर की हत्या कर दी जिसका इल्ज़ाम चंद्रकांत ने साहूकार हरि शंकर के बेटे रूपचंद्र पर लगाया है और ये भी कि इसमें दादा ठाकुर का भी हाथ है।

पूरे गांव में हड़कंप सा मच गया था। जल्दी ही ये ख़बर दूर दूर तक के गांवों में भी फैल गई। पिता जी और मैं दोनों साथ ही अपना अपना नाश्ता छोड़ कर सीधा मुंशी के घर की तरफ चल पड़े। हमारे लिए ये बड़े ही आश्चर्य की बात थी कि किसी ने रघुवीर की हत्या कर दी और उसकी हत्या का इल्ज़ाम रूपचंद्र के साथ साथ हमारे ऊपर भी लगा रहा था चंद्रकांत।

कुछ ही समय में हम मुंशी के घर के बाहर पहुंच गए। मुंशी की बीवी, बहू और बेटी दहाड़ें मार मार कर रोए जा रहीं थी। साहूकारों का घर क्योंकि मुंशी के घर के पास ही था इस लिए उनके घर वाले भी वहीं जमा थे और साथ ही गांव के बहुत सारे लोग भी।

"आख़िर आपने मेरे बेटे को मरवा ही दिया दादा ठाकुर।" चंद्रकांत पिता जी को देखते ही आक्रोश में बोल पड़ा____"आपने अपना बदला ले ही लिया ना। मेरे घर के इकलौते चिराग़ की हत्या करवा के आपके कलेजे को ठंडक मिल गई ना?"

"होश में रह कर बात करो चंद्रकांत।" पिता जी ने सख़्त भाव से कहा____"दुनिया जानती है कि हम इस तरह की गिरी हुई हरकत ख़्वाब में भी नहीं कर सकते। तुम अपने बेटे की हत्या का इल्ज़ाम हम पर नहीं लगा सकते।"

"आप मुझे डराने की कोशिश मत कीजिए दादा ठाकुर।" चंद्रकांत ने चिल्लाते हुए कहा____"मैं आपसे डरने वाला नहीं हूं। मैं चीख चीख कर कहूंगा कि आपने ही साहूकार गौरी शंकर के साथ मिल कर मेरे बेटे की हत्या का षड्यंत्र रचा और फिर उसकी हत्या रूपचंद्र के हाथों करवाई है।"

"ये सब कोरी बकवास है।" पिता जी ने कहा____"तुम्हारी अपनी मनगढ़ंत कहानी है ये। सच तो ये है कि हमने ना तो किसी के साथ इस तरह का कोई षडयंत्र रचा है और ना ही तुम्हारे बेटे की हत्या करवाई है।"

"तुम ये कैसे कह सकते हो कि पिता जी ने गौरी शंकर काका के साथ इस तरह का कोई षडयंत्र रचा है और फिर तुम्हारे बेटे की हत्या करवाई है?" इससे पहले कि चंद्रकांत कुछ बोलता मैंने उससे पूछा____"क्या तुम्हारे इस आरोप को गौरी शंकर काका स्वीकार करते हैं? इससे भी पहले तुम ये बताओ कि आख़िर किस आधार पर तुम मेरे पिता जी पर और गौरी शंकर काका के साथ रूपचंद्र पर इस तरह का आरोप लगा रहे हो? क्या तुमने अपनी आंखों से देखा है रूपचंद्र को तुम्हारे बेटे की हत्या करते हुए?"

"मैंने देखा नहीं है लेकिन अच्छी तरह जानता हूं कि ये सब तुम्हारे पिता जी ने और गौरी शंकर जी ने साथ मिल कर किया है?" चंद्रकांत ने भीड़ की तरफ देखते हुए कहा____"और मेरी बहू ने खुद बताया है कि रूपचंद्र ने ही मेरे बेटे की हत्या की है।"

"क्या तुम्हारी बहू ने रूपचंद्र को रघुवीर की हत्या करते अपनी आंखों से देखा है?" पिता जी ने पूछा।

"देखा नहीं है लेकिन उसे यकीन है कि रूपचंद्र ने ही उसके पति की हत्या की है।" चंद्रकांत इस बार थोड़ा ठंडा सा पड़ते हुए बोला।

"इस यकीन की वजह?" पिता जी ने पूछा।

"मैं बताती हूं दादा ठाकुर।" रजनी एकदम से सामने आ कर बोल पड़ी। इस वक्त उसके सिर पर साड़ी का घूंघट नहीं था। शायद ऐसे वक्त में रोने धोने से उसे घूंघट करने का ख़याल ही नहीं रह गया था, बोली____"कल शाम को जब मैं दिशा मैदान कर के वापस लौट रही थी तब इस रूपचंद्र ने अंधेरे में मेरा रास्ता रोक लिया था।"

"क्या ये सच है?" गौरी शंकर बुरी तरह चौंकते हुए रूपचंद्र की तरफ देखा____"क्या सच में तुमने इसका रास्ता रोका था?"

बेचारा रूपचंद्र। उससे कुछ बोला ना गया। शर्म से सिर झुका लिया उसने। मैं तो जानता ही था कि उसके रजनी के साथ नाजायज़ संबंध थे। जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो गौरी शंकर की आश्चर्य से आंखें फैल गईं।

"ये क्या बोलेगा।" रजनी किसी शेरनी की तरह गुर्राई____"सच तो ये है कि ये शुरू से ही मुझे मजबूर कर के मेरी इज्ज़त लूटता रहा है। कल भी ये मेरा रास्ता रोक कर मेरी इज्ज़त को लूटना चाहता था मगर मैंने इसे धमकी दी कि अगर इसने मुझे हाथ लगाया तो सारे गांव वालों को चीख चीख कर इसकी करतूत बता दूंगी। मेरी बात सुन कर ये उस वक्त गुस्से से चला गया था लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि इसी ने मेरी उस धमकी का बदला लेने के लिए रात के किसी समय मेरे पति की हत्या की है।"

रजनी की बातें सुन कर इतनी सारी भीड़ के बावजूद सन्नाटा छा गया। उधर गौरी शंकर और उसके घर की औरतें भौचक्की सी देखती रह गईं थी रजनी को। फिर जैसे सभी को होश आया तो सबके चेहरे गुस्से से आग बबूला होते नज़र आए।

"इसने जो कुछ तेरे बारे में बताया क्या वो सब सच है?" गौरी शंकर गुस्से से दहाड़ते हुए रूपचंद्र से पूछा।

"हां।" रूपचंद्र मरी हुई आवाज़ में बोला____"मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने रजनी को मजबूर कर के इसके साथ संबंध बनाए थे लेकिन मैं ये स्वीकार नहीं करता कि मैंने इसके पति की हत्या की है।"

रूपचंद्र की बात सुन कर गौरी शंकर गुस्से से चिल्ला ही पड़ा उस पर। उसने खूब खरी खोटी सुनाई अपने भतीजे को। रूपचंद्र सिर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा।

"मैं तो समझता था कि इस गांव में एक दादा ठाकुर का लड़का ही है जो दूसरों की बहू बेटियों की इज्ज़त के साथ खेलता है।" फिर वो हताश भाव से बोला____"किंतु मुझे क्या पता था कि इस तरह का एक हैवान मेरे घर में भी मौजूद है। आख़िर क्यों किया तूने ऐसा? बता वरना इसी वक्त तेरा गला दबा कर तेरी जान ले लूंगा।"

"मैं वैभव से नफ़रत करता था।" रूपचंद्र ने सिर उठा कर एक बार मेरी तरफ देखा और फिर खीझते हुए बोला____"इसने मेरी बहन की इज्ज़त ख़राब की थी तो मैं भी इससे बदला लेना चाहता था। इसके लिए मुझे जो सूझा वही किया मैंने।"

रूपचंद्र की बात सुन कर पिता जी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा तो इस बार सिर झुकाने की बारी मेरी थी। इतने सारे लोगों के सामने एक बार फिर से मेरी इज्ज़त का कचरा हो गया था लेकिन अपनी इज्ज़त का कचरा करवाने का काम तो मैंने खुद ही अपने हाथों किया था। अगर मैंने ऐसे काम ही नहीं किए होते तो भला आज ये सब क्यों होता?

"तुमने एक बार फिर से हमारे सिर को लोगों के सामने झुका दिया है।" पिता जी ने अपने गुस्से को किसी तरह जज़्ब करते हुए मुझसे कहा____"हमें आज तक समझ नहीं आया कि ऊपर वाले ने हमें तुम्हारी जैसी औलाद क्यों दी थी? हमने तो कभी किसी की बहू बेटी पर ग़लत दृष्टि नहीं डाली थी फिर क्यों हमारी औलाद ऐसी वाहियात पैदा हुई? आख़िर हमारी परवरिश में कहां कमी रह गई थी?"

"मैं मानता हूं पिता जी कि मेरा अतीत बहुत बुरा रहा है और मैंने बहुत ही ग़लत कर्म किए हैं।" मैंने गंभीरता से कहा____"लेकिन मेरा यकीन कीजिए कि अब मैं ऐसा नहीं हूं। रही बात रूपचंद्र की बहन की इज़्ज़त को ख़राब करने की तो मैंने उसके साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की थी। उसकी सहमति से ही सब कुछ हुआ था। उसने अपनी सहमति से अपने प्रेम के चलते खुद को मुझे समर्पित किया था। अगर इसके बावजूद आपको लगता है कि मैंने उसकी इज्ज़त ख़राब की है तो मैं उसे अपनाने को तैयार हूं।"

"ये सब नाटक बंद कीजिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत सहसा चीखते हुए बोला____"यहां मेरे बेटे की हत्या की गई है और ये सब आप लोगों की ही वजह से हुआ है। मुझे इंसाफ़ चाहिए और जिसने मेरे बेटे की हत्या की है उसको मौत की सज़ा मिलनी चाहिए।"

"वैसे तो हमारा इस मामले में कोई हाथ नहीं है चंद्रकांत।" पिता जी ने कहा____"फिर भी तुम्हारे इंसाफ़ के लिए तुम जहां कहोगे हम हाज़िर हो जाएंगे। अब क्योंकि हम मुखिया नहीं हैं इस लिए इस मामले के लिए तुम जिसे चाहे पंच बना सकते हो और पंचायत में इस मामले को रख सकते हो।"

"वो तो मैं करूंगा ही।" चंद्रकांत ने कहा____"ये मत समझिए कि आप बड़े लोग हैं और आपकी पहुंच बहुत ऊपर तक है तो आप अपने किए गए गुनाह से बच जाएंगे। एक घंटे के अंदर पंचायत लगेगी और यहीं पर फ़ैसला होगा।"

चंद्रकांत कहने के साथ ही अपने घर के अंदर गया और थोड़ी देर में बाहर आ कर वो लट्ठ लिए पैदल ही एक तरफ को बढ़ता चला गया। ज़ाहिर है वो पंच लोगों को बुलाने गया था। उसके जाने के बाद भीड़ में खुसुर फुसुर शुरू हो गई।

"ये बात मैं बहुत पहले से जानता था काका कि रूपचंद्र का रजनी के साथ नाजायज़ संबंध है।" मैंने गौरी शंकर की तरफ देखते हुए कहा____"फिर भी उस दिन पंचायत में मैंने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था। जानते हैं क्यों? क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि आपके भतीजे की गांव समाज में बदनामी हो। मैं तो पहले से ही बदनाम था इस लिए मेरी वजह से रूपचंद्र क्यों बदनाम हो? मैं जानता था कि ये मुझसे बदला लेने के लिए ही ये सब कर रहा था तो मैं भी देखना चाहता था कि ये किस हद तक जाता है? आपको पता है ये किस हद तक गया? इसने दूसरे गांव के मुरारी काका की मासूम बेटी की भी इज्ज़त लूटने को कोशिश की थी। वो तो शुक्र था कि मैं सही वक्त पर वहां पहुंच गया था वरना ये मुझसे बदला लेने के लिए उस निर्दोष लड़की को बर्बाद ही कर देता। चलो मान लिया कि मैं इसका दोषी था और ये मुझसे बदला लेना चाहता था तो इससे पूछिए कि बदला लेने का भला ये कौन सा तरीका था इसका? अरे! इसे अगर मुझसे इतनी ही नफ़रत थी तो सीधे मुझसे बात करता या फिर मुझसे मुक़ाबला करता।"

रूपचंद्र सिर झुकाए खड़ा रहा। वहीं गौरी शंकर अहसाय भाव से देखता रहा मुझे। भीड़ में खड़े लोग अजीब भाव से हम सबको देख रहे थे।

क़रीब एक घंटे बाद हमने देखा कि कुछ जीपें हमारी तरफ चली आ रहीं हैं। जल्दी ही वो जीपें हमारे पास आ कर रुकीं और फिर उन जीपों से एक एक कर के लोग उतरे। ठाकुर महेंद्र सिंह के साथ कुछ और लोग भी थे जो ठाकुर ही थे। पिता जी को देखते ही सबने उनका अभिवादन किया। चंद्रकांत उनके साथ ही जीप में बैठ कर आया था। वो फ़ौरन ही अंदर जा कर कुछ कुर्सियां ले आया और सबको उनमें बैठाया।

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"वैसे तो हमें मामले के बारे में चंद्रकांत ने रास्ते में सब कुछ बता दिया है।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"फिर भी आप सबके मुख से हम जानना चाहते हैं कि आख़िर ये मामला क्या है?"

"मामला चंद्रकांत के बेटे की हत्या का है ठाकुर साहब।" पिता जी ने कहा____"इनका आरोप है कि हमने गौरी शंकर के साथ मिल कर इनके बेटे की हत्या की साज़िश रची और फिर उसकी हत्या करवा दी। जबकि सच ये है कि हमारा रघुवीर की हत्या से दूर दूर तक कोई ताल्लुक़ ही नहीं है। हमें तो पता ही नहीं था इस बारे में । हम हवेली में अपने बच्चों के साथ सुबह नाश्ता कर रहे थे तभी हमारे दरबान ने आ कर हमें इस बारे में बताया। हमें तो यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा भी कुछ हो गया है। ख़ैर हमने अपना नाश्ता वहीं छोड़ा और भागते हुए यहां चले आए। यहां आए तो चंद्रकांत ने बिना किसी भूमिका के सीधा हम पर अपने बेटे की हत्या करने का आरोप लगा दिया। हमें इस बात पर अत्यंत आश्चर्य हो रहा है कि चंद्रकांत ने ये कैसे सोच लिया कि हम गौरी शंकर के साथ मिल कर कोई साज़िश कर सकते हैं?"

"दादा ठाकुर सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"सबसे पहला सवाल तो यही है कि हम भला इनके साथ कैसे मिल सकते हैं जबकि सबको पता है कि ये वही हैं जिन्होंने हमारे परिवार के इतने सारे सदस्यों की हत्या की थी। क्या आप में से कोई ये सोच सकता है कि हम किसी हत्यारे के साथ मिल जाने का सोच सकते हैं और फिर उसके साथ किसी की हत्या करने की साज़िश भी रच सकते हैं? नहीं ठाकुर साहब ये सब चंद्रकांत की अपनी एक मनगढ़ंत कहानी है। ना तो हमने दादा ठाकुर के साथ मिल कर कोई साज़िश रची है और ना ही हमने किसी की हत्या की है। इतना ही नहीं मुझे इस बात का भी यकीन है कि रघुवीर की हत्या में दादा ठाकुर का भी कोई हाथ नहीं हो सकता?"

गौरी शंकर की आख़िर वाली बात सुन कर पिता जी ने हैरानी से गौरी शंकर की तरफ देखा। मुझे भी उसकी इस बात से बड़ा आश्चर्य हुआ।

"देखा ठाकुर साहब।" चंद्रकांत एकदम से बोल पड़ा____"ये कहते हैं कि ये अपने लोगों के हत्यारे के साथ मिल जाने का कैसे सोच सकते हैं जबकि इस वक्त ये अपने लोगों के हत्यारे का ही पक्ष ले कर कह रहे हैं कि इन्होंने मेरे बेटे की हत्या नहीं को हो सकती। क्या आपको गौरी शंकर जी की बातों में दो तरह ही बातें नहीं समझ आ रहीं?"

"तुम बेवजह ही मुझे दादा ठाकुर के खिलाफ़ भड़काने की कोशिश कर रहे हो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"असल में तुम चाहते हो कि हमारा दादा ठाकुर से कभी सुलह ही न हो। तभी तो तुम कुछ दिन पहले मेरे पास आए थे और मुझे फिर से दादा ठाकुर के खिलाफ़ भड़काने की कोशिश कर रहे थे।"

"इस बात का क्या मतलब है?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने पूछा____"क्या तुम्हारी इन बातों का संबंध इस मामले से है?"

"बेशक है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने पुरज़ोर लहजे में कहा____"असल में कुछ दिन पहले दादा ठाकुर मेरे घर आए थे। ये चाहते थे कि सब कुछ भुला कर हम फिर से अपने संबंधों को बेहतर बना लें। मुझे नहीं पता कि चंद्रकांत को इस बात का कैसे पता चला किंतु ये उसी दिन दोपहर को मेरे खेत में मेरे पास पहुंच गए थे। मुझे समझाने लगे कि मैं ऐसे व्यक्ति से अपने संबंध कैसे बना सकता हूं जिसने मेरे भाइयों और बच्चों की एक साथ हत्या की हो? ये चाहते थे कि मैं इस सबके बाद भी दादा ठाकुर को अपना दुश्मन समझूं। जब मैंने इंकार किया तो इन्होंने कहा कि मैं दादा ठाकुर से ख़ौफ खा गया हूं इस लिए उनके ख़िलाफ़ जाने का सोच भी नहीं सकता मगर ये ज़रूर जाएंगे क्योंकि इनकी नज़र में दादा ठाकुर इनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। जब तक ये वैभव को जान से नहीं मार डालेंगे तब तक ये चैन से नहीं बैठेंगे।"

"ये सब झूठ है।" चंद्रकांत बुरी तरह बौखला कर एकदम से ही चीख पड़ा____"पता नहीं ये क्या क्या मनगढ़ंत बातें बोले जा रहे हैं ठाकुर साहब। सच तो ये है कि ना तो मैं इनसे मिलने इनके खेत गया था और ना ही इनसे ऐसी बातें की थीं।"

"ऊपर वाले के ख़ौफ से डरो चंद्रकांत।" गौरी शंकर उसके सफ़ेद झूठ बोलने पर पहले तो बड़ा हैरान हुआ फिर बोला____"अपने बेटे की मौत के बाद भी तुम्हें एहसाह नहीं हुआ कि हमने और तुमने मिल कर कितना ग़लत किया था दादा ठाकुर के साथ। मुझे तो अब ऐसा लग रहा है कि अपने बदले की आग में अंधे हो कर तुमने खुद ही अपने बेटे की हत्या की है और उसका इल्ज़ाम मेरे भतीजे रूपचंद्र के साथ साथ दादा ठाकुर पर भी लगाया है। अगर वाकई में ये सच है तो तुम्हें अपनी इस नीचता के लिए चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए।"



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अध्याय - 90

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"ऊपर वाले के ख़ौफ से डरो चंद्रकांत।" गौरी शंकर उसके सफ़ेद झूठ बोलने पर पहले तो बड़ा हैरान हुआ फिर बोला____"अपने बेटे की मौत के बाद भी तुम्हें एहसाह नहीं हुआ कि हमने और तुमने मिल कर कितना ग़लत किया था दादा ठाकुर के साथ। मुझे तो अब ऐसा लग रहा है कि अपने बदले की आग में अंधे हो कर तुमने खुद ही अपने बेटे की हत्या की है और उसका इल्ज़ाम मेरे भतीजे रूपचंद्र के साथ साथ दादा ठाकुर पर भी लगाया है। अगर वाकई में ये सच है तो तुम्हें अपनी इस नीचता के लिए चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए।"

अब आगे....

"चंद्रकांत, इस मामले के बारे में ईमानदारी से अपनी बात पंचायत के सामने रखो।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से कहा____"अगर तुम झूठ के आधार पर किसी निर्दोष को फंसाने का सोच रहे हो तो समझ लो इसका बहुत ही बुरा ख़ामियाजा तुम्हें भुगतना पड़ सकता है।"

"मैं मानता हूं ठाकुर साहब कि मैं गौरी शंकर जी से मिलने इनके खेत पर गया था और इनसे वो सब कहा भी था।" चंद्रकांत ने महेंद्र सिंह की बात पर एकदम से घबरा कर कहा____"किंतु ये सच है कि मैं बेवजह अथवा झूठ के आधार पर किसी को फंसा नहीं रहा हूं। मैं बदले की भावना में इतना भी अंधा नहीं हुआ हूं कि अपने ही हाथों अपने इकलौते बेटे की हत्या करूंगा और फिर उसकी हत्या का इल्ज़ाम इन लोगों पर लगाऊंगा। चलिए मैं मान लेता हूं कि दादा ठाकुर ने मेरे बेटे की हत्या नहीं की होगी लेकिन मैं ये नहीं मान सकता कि रूपचंद्र ने भी मेरे बेटे की हत्या नहीं की होगी।"

"ऐसा तुम किस आधार पर कह रहे हो?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने पूछा____"क्या तुमने अपनी आंखों से रूपचंद्र को तुम्हारे बेटे की हत्या करते हुए देखा है या फिर तुम्हारे पास कोई ऐसा गवाह है जिसने रूपचंद्र को तुम्हारे बेटे की हत्या करते हुए देखा हो?"

"नहीं ठाकुर साहब।" चंद्रकांत एकदम हताश हो कर बोला____"यही तो मेरा दुर्भाग्य है कि ना तो मैंने ऐसा देखा है और ना ही किसी और ने। किंतु मेरी बहू ने जो कुछ बताया है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि रूपचंद्र ने ही मेरे बेटे रघुवीर की हत्या की है।"

"ऐसा क्या बताया है तुम्हारी बहू ने?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने हैरानी से देखते हुए कहा____"अपनी बहू को बुलाओ, हम उसके मुख से ही सुनना चाहेंगे कि उसने तुम्हें ऐसा क्या बताया था जिसके आधार पर तुमने ये मान लिया कि रूपचंद्र ने ही तुम्हारे बेटे की हत्या की है?"

चंद्रकांत ने बेबस भाव से रजनी को इशारे से अपने पास बुलाया। रजनी सिर पर घूंघट डाले आ कर खड़ी हो गई। चेहरा घूंघट के चलते ढंका हुआ था इस लिए ये पता नहीं चल पाया कि इस वक्त उसके चहरे पर किस तरह के भाव थे? बहरहाल महेंद्र सिंह के पूछने पर रजनी ने झिझकते हुए पिछली रात की सारी बात बता दी जिसे सुन कर महेंद्र सिंह के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए।

"इस बात से कहां साबित होता है कि रूपचंद्र ने ही रघुवीर की हत्या की है?" फिर उन्होंने चंद्रकांत से कहा____"क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा गवाह है जिसने अपनी आंखों से रघुवीर की हत्या करते हुए देखा है? पंचायत में बिना किसी सबूत अथवा प्रमाण के तुम किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकते और ना ही किसी को हत्यारा कह सकते हो।"

"मैं मानता हूं ठाकुर साहब कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है।" चंद्रकांत ने सहसा दुखी भाव से कहा____"लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है ना कि मेरे बेटे की किसी ने हत्या की ही नहीं है। इन लोगों के अलावा मेरी किसी से कोई दुश्मनी अथवा बैर नहीं है फिर कोई दूसरा क्यों मेरे बेटे की हत्या करेगा?"

"अगर तुम मानते हो कि किसी दूसरे ने तुम्हारे बेटे की हत्या नहीं की है बल्कि इन लोगों ने ही की है तो इसे साबित करने के लिए तुम पंचायत के सामने सबूत अथवा प्रमाण पेश करो।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने स्पष्ट भाव से कहा____"बिना किसी प्रमाण के किसी को भी हत्यारा नहीं माना जाएगा। हमारा ख़याल है कि इस मामले में तहक़ीकात करने की ज़रूरत है। हम खुद देखना चाहेंगे कि तुम्हारे बेटे की हत्या किस जगह पर हुई और साथ ही उसे किस तरीके से मारा गया है? तब तक के लिए पंचायत बर्खास्त की जाती है।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह जी कुर्सी से उठ गए। उनके साथ बाकी लोग भी उठ गए। भीड़ में मौजूद लोग दबी आवाज़ में तरह तरह की बातें करने लगे थे। इधर महेंद्र सिंह के पूछने पर चंद्रकांत ने बताया कि उसे अपने बेटे की लाश कहां और किस हालत में मिली थी?

महेंद्र सिंह के साथ पिता जी, मैं, गौरी शंकर, रूपचंद्र, और खुद चंद्रकांत चल पड़े। जल्दी ही हम उस जगह पर पहुंच गए जहां पर रघुवीर की लाश मिली थी।

चंद्रकांत का घर गांव में दाखिल होते ही सबसे पहले पड़ता था जबकि गांव से बाहर की तरफ जाने पर सबसे आख़िर में। उसके घर से कुछ ही दूरी पर साहूकारों के घर थे। बहरहाल हम सब चंद्रकांत के घर के पीछे पहुंचे। घर के चारो तरफ क़रीब चार फीट ऊंची चार दिवारी थी जो कि लकड़ी की मोटी मोटी बल्लियों द्वारा बनाई गई थी। सामने की तरफ बड़ा सा चौगान था जिसके एक तरफ गाय भैंस बंधी होती थीं। पीछे की तरफ एक कुआं था और साथ ही दूसरी तरफ छोटा सा सब्जी और फलों का बाग़ था।

रघुवीर की लाश जिस जगह मिली थी वो घर के बगल से जो खाली जगह थी वहां पर पड़ी हुई थी। उस जगह पर ढेर सारा खून फैला हुआ था। क़रीब से देखने पर एकदम से ही दुर्गंध का आभास हुआ। वो दुर्गंध पेशाब की थी। ज़ाहिर है उस जगह पर पेशाब किया जाता था। लाश को क्योंकि चंद्रकांत ने सुबह ही वहां से हटा लिया था इस लिए वहां पर सिर्फ खून ही फैला हुआ दिख रहा था जोकि ज़्यादातर सूख गया था और जो बचा था उसके ऊपर मक्खियां भिनभिना रहीं थी।

"हमारा ख़याल है कि हत्या रात में ही किसी पहर की गई थी।" पिता जी ने सहसा महेंद्र सिंह से कहा____"ज़्यादातर खून सूख चुका है जिससे यही ज़ाहिर होता है। हमें लगता है कि रघुवीर रात के किसी पहर पेशाब लगने के चलते घर से बाहर यहां आया होगा। हत्यारा पहले से ही उसकी ताक में यहां कहीं मौजूद रहा होगा और फिर जैसे ही रघुवीर यहां पेशाब करने के लिए आया होगा तो उसने उसकी हत्या कर दी होगी।"

"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"किंतु सबसे बड़ा सवाल ये है कि हत्यारे को ये कैसे पता रहा होगा कि रघुवीर रात के कौन से पहर पेशाब करने घर से बाहर आएगा?"

"हो सकता है कि ये इत्तेफ़ाक ही हुआ हो कि जिस समय हत्यारा यहां पर मौजूद था उसी समय रघुवीर पेशाब लगने के चलते बाहर आया।" पिता जी ने जैसे संभावना ज़ाहिर की____"या फिर हत्यारे ने रघुवीर के हर क्रिया कलाप को पहले से ही अच्छी तरह गौर फरमा लिया रहा होगा। हमारा मतलब है कि उसने पहले ये जांचा परखा होगा कि रघुवीर पेशाब करने के लिए रात के कौन से वक्त पर घर से बाहर निकलता है। कुछ लोगों की ये आदत होती है कि उनकी पेशाब लगने की वजह से अक्सर रात में नींद खुल जाती है और फिर वो बिस्तर से उठ कर पेशाब करने जाते हैं। संभव है कि रघुवीर के साथ भी ऐसा ही होता रहा हो। हत्यारे ने उसकी इसी आदत को गौर किया होगा और फिर उसने एक दिन अपने काम को अंजाम देने का सोच लिया।"

"क्या रघुवीर अक्सर रातों को उठ कर पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकलता था?" महेंद्र सिंह ने पलट कर चंद्रकांत से पूछा।

"हां ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने स्वीकार किया____"उसकी तो शुरू से ही ऐसी आदत थी। मैं खुद भी रात में एक दो बार पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकलता हूं। मेरा बेटा भी लगभग रोज ही रात में पेशाब करने के लिए उठता था और फिर घर से बाहर आता था।"

"यानि आपका सोचना एकदम सही था।" महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"वाकई में रघुवीर पेशाब करने के चलते ही बाहर आया। हत्यारा जोकि रघुवीर की इस आदत से परिचित था वो यहां पर उसी की प्रतीक्षा कर रहा था। जैसे ही रघुवीर पेशाब करने के लिए बाहर आया तो उसने उसे एक झटके में मार डाला।"

"तुम्हें कब पता चला कि रघुवीर की हत्या हो गई है?" पिता जी ने चंद्रकांत से पूछा।

"सुबह ही पता चला था।" चंद्रकांत की आवाज़ भारी हो गई____"रात में तो मुझे किसी तरह का आभास ही नहीं हुआ। सुबह जब मैं पेशाब करने के लिए इस जगह पर आया तो अपने बेटे की खून से लथपथ पड़ी लाश को देख कर मेरी जान ही निकल गई थी।"

"यानि हत्यारे ने एक झटके में ही रघुवीर को मार डाला था।" महेंद्र सिंह ने कहा____"हमारा ख़याल है कि रघुवीर को ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ होगा कि कोई उसकी हत्या करने के लिए उसके पास ही मौजूद है। उधर हत्यारा भी अच्छी तरह समझता था कि अगर उसने ग़लती से भी रघुवीर को सम्हलने का मौका दिया तो वो शोर मचा देगा जिससे वो पकड़ा जाएगा। ख़ैर चलिए देखते हैं कि हत्यारे ने रघुवीर को किस तरीके से मारा होगा?"

हम सब जल्दी ही घर के सामने आ गए। घर के बाएं तरफ एक लकड़ी के तखत पर रघुवीर की लाश को रख दिया गया था। तखत में भी उसका बचा कुचा खून फैल गया था। बाहर काफी संख्या में भीड़ थी जो लाश को देखने के लिए आतुर हो रही थी किंतु हमारे आदमियों ने उन्हें रोका हुआ था।

रघुवीर के गले पर एक मोटा सा चीरा लगा हुआ था जो कि सामने की तरफ से था और पूरे गले में था। ज़ाहिर है रघुवीर बुरी तरह तड़पा होगा किंतु हत्यारे ने उसे शोर मचाने का कोई भी मौका नहीं दिया होगा। चंद्रकांत के बयान से तो यही ज़ाहिर होता था क्योंकि उसे भनक तक नहीं लगी थी। भनक तो तब लगती जब रघुवीर कोई आवाज़ कर पाता। यानि हत्यारे ने रघुवीर का गला तो काटा ही किंतु उसके मुख को तब तक दबाए रखा रहा होगा जब तक कि तड़पते हुए रघुवीर की जीवन लीला समाप्त नहीं हो गई होगी।

"काफी बेदर्दी से जान ली है हत्यारे ने।" महेंद्र सिंह ने रघुवीर के गले में दिख रहे मोटे से चीरे को देखते हुए कहा____"ऐसा तो कोई बेरहम व्यक्ति ही कर सकता है।"

"इन लोगों के अलावा इतनी बेरहमी कौन दिखा सकता है ठाकुर साहब?" चंद्रकांत दुखी भाव से बोल पड़ा____"इन लोगों ने ही मेरे बेटे की इस तरह से हत्या की है। इन्होंने अपने भाई और बेटे की हत्या का बदला मेरे बेटे की हत्या कर के लिया है। मुझे इंसाफ़ चाहिए ठाकुर साहब।"

"अगर हमें तुम्हारे बेटे की हत्या ही करनी होती तो यूं चोरी छुपे नहीं करते।" पिता जी ने इस बार सख़्त भाव से कहा____"बल्कि डंके की चोट पर करते, जिस तरह गौरी शंकर के अपनों की हत्या की थी। हालाकि अब हमें अपने किए गए कर्म पर बेहद अफसोस और दुख है लेकिन सच यही है कि हमने ये सब नहीं किया है। हमने अपने जीवन में पहले कभी किसी के साथ कुछ ग़लत नहीं किया था और ये बात तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता। तुम हमें हमारे बचपन से जानते हो। फिर ये कैसे सोच सकते हो कि हमने तुम्हारे बेटे की हत्या की है?"

"जब तक कोई प्रमाण नहीं मिलता तब तक तुम किसी पर भी अपने बेटे की हत्या का इल्ज़ाम नहीं लगा सकते।" महेंद्र सिंह ने कहा____"बेहतर यही है कि पहले प्रमाण खोजो और फिर पंचायत में इंसाफ़ की मांग करो।"

"मैं भला कहां से प्रमाण खोजूंगा ठाकुर साहब?" चंद्रकांत ने आहत भाव से कहा____"मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब कभी भी मेरे बेटे का हत्यारा नहीं मिलेगा और जब वो मिलेगा ही नहीं तो भला कैसे कोई इंसाफ़ होगा?"

"अगर तुम ठाकुर साहब पर भरोसा करते हो तो इनसे आग्रह करो कि ये तुम्हारे बेटे के हत्यारे का पता लगाएं।" महेंद्र सिंह ने जैसे सुझाव दिया।

"नहीं ठाकुर साहब।" पिता जी ने कहा____"हम ऐसे किसी भी मामले को अपने हाथ में नहीं लेना चाहते। हम ये भी जानते हैं कि चंद्रकांत को हम पर कभी भरोसा नहीं हो सकता। बेहतर यही है कि चंद्रकांत खुद अपने बेटे के हत्यारे का पता लगाए और फिर अपने बेटे की हत्या का इंसाफ़ मांगे।"

"अगर ऐसी बात है तो यही बेहतर होगा।" महेंद्र सिंह कहने के साथ ही चंद्रकांत से मुखातिब हुए____"ख़ैर हमें ये बताओ कि तुमने ये कैसे सोच लिया कि तुम्हारे बेटे की हत्या ठाकुर साहब ने गौरी शंकर के साथ साज़िश कर के की है?"

"सुबह जब मैंने अपने बेटे की खून से लथपथ लाश देखी तो मेरी चीख निकल गई थी।" चंद्रकांत ने दुखी भाव से कहा____"मेरी चीख सुन कर रघुवीर की मां, मेरी बहु और बेटी तीनों ही बाहर भागते हुए आईं थी। जब उन लोगों ने रघू की खून से लथपथ लाश देखी तो उनकी भी हालत ख़राब हो गई। उसके बाद हम सबका रोना धोना शुरू हो गया। इसी बीच मेरी बहू रजनी ने रोते हुए कहा कि ये सब रूपचंद्र ने किया है। उसकी बात सुन कर मैं उछल ही पड़ा था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि कैसे पिछले दिन शाम को जब वो दिशा मैदान कर के वापस लौट रही थी तो रास्ते में रूपचंद्र ने उसे रोक लिया था। रूपचंद्र उसकी इज़्ज़त के साथ खेलना चाहता था जिसके लिए उसने उसे सबको बता देने की धमकी दी थी। मेरी बहू के अनुसार उसकी इस धमकी की वजह से रूपचंद्र बहुत गुस्सा हुआ था तो ज़ाहिर है कि इसी गुस्से में उसने मेरे बेटे की हत्या की होगी।"

"तो फिर तुम ये क्यों कह रहे थे कि ये सब दादा ठाकुर ने गौरी शंकर के साथ साज़िश कर के किया है?" महेंद्र सिंह ने कहा____"क्या तुम बेवजह ही इन्हें अपने बेटे की हत्या में जोड़ कर लोगों के बीच इन्हें बदनाम करना चाहते थे?"

"नहीं ठाकुर साहब।" चंद्रकांत हड़बड़ा कर जल्दी से बोला____"असल में कुछ दिन पहले मैंने सुना था कि ये गौरी शंकर जी के घर गए थे सुलह करने और फिर गौरी शंकर जी भी इनकी हवेली गए थे। मुझे लगा ये दोनों आपस में मिल गए हैं। दूसरी बात साहूकारों का विनाश कर के तो इन्होंने अपने भाई और बेटे की हत्या का बदला ले लिया था किंतु मुझसे और मेरे बेटे से नहीं ले सके थे। मुझे यकीन हो गया कि इन्होंने गौरी शंकर के साथ साज़िश कर के मेरे बेटे की हत्या की है। गौरी शंकर जी क्योंकि अब इनके खिलाफ़ जा ही नहीं सकते इस लिए वो इनके पक्ष में ही बोलेंगे। यही सब सोच कर मैंने इन दोनों पर अपने बेटे की हत्या का आरोप लगाया था।"

"ये सब तुम्हारी अपनी सोच है चंद्रकांत।" पिता जी ने कहा____"तुम्हें भले ही हम पर यकीन न हो लेकिन सच तो यही है कि तुम्हारे बेटे की हत्या से हमारा दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। तुम लोगों ने हमारे भाई और बेटे की हत्या की थी उसके लिए हमने गुस्से में आ कर जो कुछ किया उसके लिए हमें अफ़सोस तो है लेकिन हम ये भी समझते हैं कि हमारी जगह कोई भी होता तो यही करता। शुकर मनाओ कि उस दिन हमें ये पता ही नहीं था कि साहूकारों के साथ तुमने भी हमारे भाई और बेटे की हत्या की थी वरना उस दिन तुम बाप बेटे भी हमारे गुस्से का शिकार हो गए होते। ख़ैर जो हुआ सो हुआ किंतु इस मामले में हमारा कोई हाथ नहीं है। बाकी तुम्हें जो ठीक लगे करो।"

चंद्रकांत कुछ न बोला। महेंद्र सिंह ने अपनी तरफ से इस मामले की तह तक जाने का फ़ैसला किया और चंद्रकांत को आश्वासन दिया कि वो उसके बेटे के हत्यारे को जल्द ही खोज लेंगे और उसके साथ इंसाफ़ करेंगे। उसके बाद सबको अपने अपने घर जाने को बोल दिया गया। चंद्रकांत दुखी हृदय से अपने बेटे की लाश के पास आ कर आंसू बहाने लगा।

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साहूकारों के घर के बाहर सड़क के किनारे जो बड़ा सा पेड़ था उसके नीचे बने चबूतरे के पास हम सब आ कर रुके। गौरी शंकर ने रूपचंद्र को भेज कर अपने घर से कुछ कुर्सियां मंगवा ली जिनमें पिता जी, गौरी शंकर, महेंद्र सिंह और उनके साथ आए लोग बैठ गए। जबकि मैं और रूपचंद्र ज़मीन में ही खड़े रहे।

"आपको क्या लगता है ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा____"चंद्रकांत के बेटे की हत्या किसने की होगी?"

"ये सवाल हमारे ज़हन में भी है मित्र।" पिता जी ने कहा____"हम खुद इस सवाल पर गहराई से विचार मंथन कर रहे हैं किंतु फिलहाल कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।"

"इतना तो आप भी समझते हैं कि दुनिया में कुछ भी बेवजह नहीं होता।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस खींचते हुए कहा____"ज़ाहिर है चंद्रकांत के बेटे की हत्या भी बेवजह नहीं की होगी हत्यारे ने। अब सवाल ये है कि आख़िर वो कौन सी वजह रही होगी जिसके चलते हत्यारे ने रघुवीर को जान से मार डाला? अगर वजह का पता चल जाए तो कदाचित हमें हत्यारे तक पहुंचने में आसानी हो जाएगी।"

"एक बात और है बड़े भैया।" महेंद्र सिंह के छोटे भाई ने कुछ सोचते हुए कहा____"और वो ये कि क्या चंद्रकांत के बेटे की हत्या का मामला दादा ठाकुर अथवा गौरी शंकर जी से ही जुड़ा हुआ है या उसकी हत्या का मामला इनसे अलग है?"

"कहना क्या चाहते हो ज्ञानेंद्र?" महेंद्र सिंह ने उसकी तरफ देखा।

"मौजूदा समय में इस मामले के बारे में हर कोई यही सोचेगा कि रघुवीर की हत्या का मामला दादा ठाकुर अथवा गौरी शंकर जी से ही जुड़ा हुआ होगा।" ज्ञानेंद्र सिंह ने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"ज़ाहिर है इस सोच के चलते हम उसके हत्यारे को भी इन्हीं दोनों के बीच तलाश करने का सोचेंगे। हो सकता है कि उसकी हत्या किसी और ने ही की हो, ये सोच कर कि उसकी तरफ किसी का ध्यान जा ही नहीं सकेगा। आख़िर चंद्रकांत और उसके बेटे ने कुछ समय पहले दादा ठाकुर के भाई और बेटे की हत्या की थी तो ज़ाहिर है कि सब तो यही सोचेंगे कि इन्होंने ही रघुवीर की हत्या की होगी। उधर असल हत्यारा हमेशा के लिए एक तरह से महफूज़ ही रहेगा।"

"हम ज्ञानेंद्र की इन बातों से सहमत हैं मित्र।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए महेंद्र सिंह से कहा____"यकीनन काबीले-गौर बात की है इन्होंने। हमें भी यही लगता है कि रघुवीर का हत्यारा कोई और ही है जिसने मौजूदा समय में हमारी स्थिति का फ़ायदा उठा कर उसकी हत्या की और सबके ज़हन में ये बात बैठा दी कि ऐसा हमने ही किया है अथवा हमने गौरी शंकर के साथ मिल कर उसकी हत्या की साज़िश की है।"

"अब सोचने वाली बात ये है कि ऐसा वो कौन हो सकता है जिसने इस तरह से आपकी मौजूदा स्थिति का फ़ायदा उठा कर तथा रघुवीर की हत्या कर के अपना काम कर गया?" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"मेरे हिसाब से अब हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपके अथवा गौरी शंकर जी के अलावा रघुवीर के और किस किस से ऐसे संबंध थे जिसके चलते कोई उसकी हत्या तक करने की हद तक चला गया?"

"हम्म्म्म सही कहा तुमने।" महेंद्र सिंह ने कहा____"कुछ समय पहले तक चंद्रकांत ठाकुर साहब का मुंशी था। उसका बेटा भी इनके लिए वफ़ादार था। हमें यकीन है कि चंद्रकांत ने मुंशीगीरी करने के अलावा भी ऐसे कई काम ठाकुर साहब की चोरी से किए होंगे जो उसके लिए फ़ायदेमंद रहे होंगे। ऐसे में उसके संबंध काफी लोगों से बने हो सकते हैं और उसके साथ साथ उसके बेटे के भी। हमें चंद्रकांत के ऐसे संबंधों के बारे में जांच पड़ताल करनी होगी। चंद्रकांत से भी उसके ऐसे संबंधों के बारे में पूछना होगा।"

"ठीक है आपको जो उचित लगे कीजिए।" पिता जी ने कहा____"अगर कहीं हमारी ज़रूरत महसूस हो तो बेझिझक हमें ख़बर कर दीजिएगा। हम भी चाहते हैं कि रघुवीर का हत्यारा जल्द से जल्द पकड़ा जाए और ये भी पता चल जाए कि उसने रघुवीर की हत्या क्यों की?"

इस संबंध में कुछ और बातें हुईं उसके बाद महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई और बाकी लोगों के साथ उठ कर चले गए। मैं और पिता जी भी जाने लगे तो सहसा गौरी शंकर ने पिता जी को रोक लिया।

"मैं आपसे अपने उन अपराधों की माफ़ी मांगना चाहता हूं दादा ठाकुर।" गौरी शंकर ने अपने हाथ जोड़ कर कहा____"जो मैंने अपने भाइयों और चंद्रकांत के साथ मिल कर आपके साथ किया है। बदले की भावना में हम सब इतने अंधे हो चुके थे कि आपकी नेक नीयती और उदारता को जानते हुए भी आपके साथ हमेशा बैर भाव रखा और फिर वो सब कर बैठे। बदले में आपने हमारे साथ जो किया उसके लिए वास्तव में हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं। ये आपके विशाल हृदय का ही सबूत है कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी आप हमसे रिश्ते सुधार लेने को कह रहे थे जबकि आपकी जगह कोई और होता तो यकीनन वो ख़्वाब में भी ऐसा नहीं सोचता। हमें हमारे अपराधों के लिए माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब। मैं अपने बच्चों की क़सम खा कर कहता हूं कि अब से मैं या मेरे घर का कोई भी सदस्य आपसे या आपके परिवार के किसी भी सदस्य से बैर भाव नहीं रखेगा। अब से हम आपकी छत्रछाया में ही रहेंगे।"

मैं गौरी शंकर की ये बातें सुन कर आश्चर्य चकित हो गया था। मुझे यकीन है कि पिता जी का भी यही हाल रहा होगा। वो उसकी बातें सुन कर काफी देर तक उसकी तरफ देखते रहे थे। दूसरी तरफ रूपचंद्र सामान्य भाव से खड़ा था।

"चलो देर आए दुरुस्त आए।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"हालाकि सोचने वाली बात है कि इसके लिए हम दोनों को ही भारी कीमत चुकानी पड़ी है। काश! इस तरह का हृदय परिवर्तन तुम सबका पहले ही हो गया होता तो आज वो लोग भी हमारे साथ होते जिन्हें हमने अपनी दुश्मनी अथवा नफ़रत के चलते भेंट चढ़ा दिया। कल्पना करो गौरी शंकर कि महज इतनी सी बात को तुम लोगों ने दिल से स्वीकार नहीं किया था और नफ़रत के चलते हमारे साथ साथ खुद अपने ही परिवार के लोगों को मिट्टी में मिला डाला। ऐसा क्यों होता है कि इंसान को वक्त रहते सही और ग़लत का एहसास नहीं होता? ख़ैर कोई बात नहीं, शायद हमारे एक होने के लिए हमें इतनी बड़ी कीमत को चुकाना ही लिखा था।"

"आप सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने संजीदगी से कहा____"हम इंसान वक्त से पहले प्रेम और नफ़रत के परिणामों का एहसास ही नहीं कर पाते। शायद यही हम इंसानों का दुर्भाग्य है।"

"इंसान अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हर इंसान के बस में होता है अच्छा और बुरा कर्म करना। हर इंसान अच्छी तरह जान रहा होता है कि वो कैसा कर्म कर रहा है। कभी प्रेम से, कभी नफ़रत से तो कभी स्वार्थ के चलते। ख़ैर छोड़ो, हम चाहते हैं कि हम सब एक नई शुरुआत करें। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते हैं कि हमारे गांव के साहूकारों का इतना सम्पन्न परिवार नफ़रत की वजह से अपने ही हाथों खुद को गर्त में डुबा ले।"

"आप बहुत महान हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से कहा____"हम जैसे बुरी मानसिकता वाले लोगों के लिए भी इतना कुछ सोचते हैं तो ये आपकी महानता ही है। अब मुझे पूरा भरोसा है कि हम जितने भी लोग बचे हैं आपकी छत्रछाया में खुशी से फल फूल जाएंगे।"

"एक बात और।" पिता जी ने कहा____"तुम्हारी भतीजी ने हमारे बेटे की जान बचा कर इसके ऊपर ही नहीं बल्कि हमारे ऊपर भी बहुत बड़ा उपकार किया है। पहले हमें कुछ पता नहीं था किंतु अब हमें सब कुछ मालूम हो चुका है इस लिए हम उस प्यारी सी बच्ची को अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इस रिश्ते से अब तुम्हें कोई समस्या नहीं होगी।"

"मुझे कोई समस्या नहीं है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर झट से बोल पड़ा____"बल्कि ये तो मेरे और मेरी भतीजी के लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि आप उसे अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं।"

"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"अगले वर्ष हम बारात ले कर तुम्हारे घर आएंगे और तुम्हारी भतीजी को अपनी बहू बना कर ले जाएंगे।"

पिता जी की इस बता को सुन कर गौरी शंकर सहसा घुटनों के बल बैठ गया और फिर अपने सिर को पिता जी के चरणों में रख दिया। ये देख कर पिता जी पहले तो चौंके फिर झुके और उसे दोनों हाथों से पकड़ कर उठा लिया। उधर रूपचंद्र तो सामान्य ही दिख रहा था लेकिन इधर मेरी स्थिति थोड़ा अजीब हो गई थी। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो बात असंभव थी वो पलक झपकते ही संभव कैसे हो ग‌ई थी? एकाएक ही मेरा सिर अंतरिक्ष में परवाज़ करता महसूस होने लगा था।

"तुम्हारी जगह हमारे पैरों में नहीं।" सहसा पिता जी की आवाज़ से मैं धरातल पर आया____"बल्कि हमारे हृदय में बनने वाली है गौरी शंकर। अगले वर्ष हम दोनों समधी बन जाएंगे।"

"आप जैसा महान इस धरती में कोई नहीं हो सकता दादा ठाकुर।" गौरी शंकर की आंखें नम होती नज़र आईं____"अब जा कर मुझे एहसास हो रहा है कि इसके पहले हम सब कितने ग़लत थे। काश! पहले ही हम सबको सद्बुद्धि आ गई होती। काश! हमने अपने अंदर नफ़रत को इस तरह से पाला न होता।"

कहते कहते गौरी शंकर का गला भर आया और उससे आगे कुछ बोला ना गया। पिता जी ने किसी तरह उसे शांत किया और फिर समझा बुझा कर उसे घर भेज दिया। उसके बाद मैं और पिता जी बग्घी में बैठ कर अपनी हवेली की तरफ बढ़ चले। इधर मेरे दिलो दिमाग़ में एक अलग ही मंथन चलने लगा था।



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Thanks

Maine pahle bhi hint diye the aur aage bhi doonga. Ab aap log kayaas lagaao ki kisne kya Kiya aur kyo kiya... ;)

Agar ye rajni ne kiya hai to roj ghar me milne wala uska maza bhi band. Aise wakt me ab wo baahar kiske sath :sex: maza karne jayegi. Rupchandra ko to usne khud hi laat maar ke bhaga diya hai aur apna vaibhav to aaj kal laude par taala lagaye huye to ab sawaal ye hai ki kaun wo khush naseeb hai jo rajni ko :sex: pelne wala kaam karega ya kar raha hai :D

Oont ek din pahaad ke niche aata hi hai aur tab use pata chalta hai ki uska bhi koi baap hai. Baaki sahukaar to mar Gaye lekin achha hua ki gauri shankar ko apne baap baate samajh aa gai.... :lol:

Ek wakt tha jab vaibhav ke liye ladkiyo ki line lag jane me koi samasya nahi hoti thi magar aaj mamuli si line ke lagne se uski gaand fat gai hai....upar wala aise dorahe par kisi ko na laaye deva... :lol1:
 
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