Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 5 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 38

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अब तक....



मैंने अनुराधा से कहा कि मैं कल का खाना यही खाऊंगा, वो भी उसके हाथ का बना हुआ। मेरी बात सुन कर अनुराधा ने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया। उसके बाद मैं ख़ुशी ख़ुशी घर से बाहर निकल गया। अनुराधा मेरे पीछे पीछे दरवाज़े तक आई। मैंने जब बुलेट में बैठ कर उसकी तरफ देखा तो हमारी नज़रें आपस में मिल ग‌ईं। मैं उसे देख कर मुस्कुराया तो उसके होठों पर भी शर्म मिश्रित हल्की मुस्कान उभर आई। उसके बाद मैंने बुलेट को आगे बढ़ा दिया। तेज़ आवाज़ करती हुई बुलेट कच्ची पगडण्डी पर दौड़ी चली जा रही थी। सारे रास्ते मैं अनुराधा के बारे में ही सोचता रहा। उसके साथ हुई हमारी बातों के बारे में सोचता रहा। आज उससे बातें कर के एक अलग ही तरह का एहसास हो रहा था मुझे।



अब आगे....



मैं जब मुंशी चंद्रकांत के घर के पास पहुंचा तो मुझे अचानक रजनी का ख़याल आया। उसे तो मैं जैसे भूल ही गया था। मुझे याद आया कि कैसे उस दिन वो रूपचंद्र से चुदवा रही थी। साली रांड मेरे पीठ पीछे उसका लंड भी गपक रही थी। मैंने बुलेट को मुंशी के घर की तरफ मोड़ा और खाली जगह पर खड़ी कर दिया। बुलेट की तेज़ आवाज़ शायद घर के अंदर तक गई थी इस लिए जैसे ही मैं दरवाज़े की कुण्डी को पकड़ कर खटखटाना चाहा वैसे ही दरवाज़ा खुल गया। मेरी नज़र दरवाज़ा खोलने वाली रजनी पर पड़ी। उसे देखते ही मेरे अंदर गुस्सा और नफरत दोनों ही उभर आई, लेकिन मैंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।

"छो..छोटे ठाकुर आप?" उसने धीमे स्वर में हकला कर मुझसे कहा तो मैंने सपाट लहजे में कहा____"क्यों क्या मैं यहाँ नहीं आ सकता?"

"न...नहीं ऐसा तो मैंने नहीं कहा आपसे।" वो एकदम से बौखला गई थी_____"आइए अंदर आइए।"

वो दरवाज़े से हटी तो मैं अंदर दाखिल हो गया। सहसा मेरी नज़र उसके चेहरे पर फिर से पड़ी तो मैंने देखा वो कुछ परेशान सी नज़र आ रही थी और साथ ही चेहरे का रंग भी उड़ा हुआ दिखा। मुझे उसकी ये हालत देख कर उस पर शंका हुई। ज़हन में एक ही ख़याल उभरा कि कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है?

"मुंशी जी कहां हैं?" मैंने उसकी तरफ ही गौर से देखते हुए पुछा।

"ससुर जी हवेली गए हैं।" रजनी ने खुद को सम्हालते हुए संतुलित लहजे में कहा____"और माँ की तबियत ख़राब थी तो ये (उसका पति रघु) उन्हें ले कर वैद जी के पास गए हैं।"

रजनी आज मुझे अलग ही तरह से नज़र आ रही थी। उसके चेहरे पर परेशानी के भाव अभी भी कायम थे। माथे पर पसीना झिलमिला रहा था। वो बार बार बेचैनी से अपने हाथों की उंगलियों को आपस में उमेठ रही थी। मैं समझ चुका था कि भारी गड़बड़ है। वो इस वक़्त घर में अकेली है और निश्चय की अंदर उसके साथ कोई ऐसा है जिसके साथ वो अपनी गांड मरवाने वाली थी लेकिन मेरे आ जाने से उसका काम ख़राब हो गया था।

"क्या हुआ तू इतनी परेशान क्यों दिख रही है?" मैंने उसको देखते हुए उससे पूछा____"सब ठीक तो है न?"

"जी...जी हाँ छोटे ठाकुर।" वो एकदम से चौंकी थी और फिर हकलाते हुए बोली____"स..सब कुछ ठीक है।"

"पर मुझे तो कुछ और ही लग रहा है।" मैंने उसकी हालत ख़राब करने के इरादे से कहा____"लगता है अपनी सास को अपने मरद के साथ भेज कर इधर तेरी भी तबियत ख़राब हो गई है। चल अंदर आ, तेरा इलाज़ करता हूं मैं।"

मेरी बात सुनते ही रजनी की मानो अम्मा मर गई। चेहरे पर जो पहले से ही परेशानी और बेचैनी थी उसमें पलक झपकते ही इज़ाफ़ा हो गया। वो मेरी तरफ ऐसे देखने लगी थी जैसे मैं अचानक ही किसी जिन्न में बदल गया होऊं।

"य...ये क्या कह रहे हैं छोटे ठाकुर?" फिर वो खुद को किसी तरह सम्हालते हुए बोल पड़ी____"मुझे भला क्या हुआ है? मैं तो एकदम ठीक हूं, हाँ थोड़ा सिर ज़रूर दुःख रहा है।"

मैं समझ चुका था कि उसके साथ कुछ तो भारी गड़बड़ ज़रूर है लेकिन क्या, ये देखना चाहता था मैं। इस लिए उसकी बात सुन कर मैं उसको बिना कोई जवाब दिए अंदर की तरफ चल पड़ा। मुझे अंदर की तरफ जाते देख वो और भी बुरी तरह बौखला गई। डर और घबराहट के मारे उसका बुरा हाल हो गया लेकिन उसकी बिवसता ये थी कि वो मुझे अंदर जाने से रोक भी नहीं सकती थी। ख़ैर जल्दी ही मैं अंदर आँगन में पहुंच गया।

आंगन में एक तरफ एक खटिया बिछी हुई थी लेकिन वो खाली थी। मैंने आस पास नज़र घुमाई पर कोई न दिखा। तभी मेरे पीछे पीछे रजनी भी आ गई। उसके चेहरे पर अभी भी डर और घबराहट के भाव तांडव सा करते दिख रहे थे। रजनी की जो हालत थी उससे मुझे यकीन हो चुका था कि वो मुझसे कोई बड़ी बात छुपाना चाहती थी। मेरी नज़रें हर तरफ घूम रहीं थी कि तभी सहसा मुझे कुछ दिखा। कुछ दूरी पर बने दो कमरों में से एक का दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था और वो कुछ पल मुझे हिलता सा प्रतीत हुआ था। मेरी नज़रें उसी जगह पर जम ग‌ईं। मुझे उस तरफ देखते देख रजनी और भी घबरा गई।

"अरे! खड़ी क्या है?" मैंने पलट कर रजनी से शख़्त लहजे में कहा____"घर आए इंसान से जल पान का भी नहीं पूछेगी क्या?"

"जी...जी माफ़ करना छोटे ठाकुर।" रजनी बुरी तरह हड़बड़ा कर बोली____"आप खटिया पर बैठिए मैं अभी आपके लिए पानी लाती हूं।"

रजनी दूसरी तरफ रखे मटके की तरफ तेज़ी से बढ़ी और इधर मैं उस कमरे की तरफ जिस कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था और थोड़ा सा हिलता प्रतीत हुआ था मुझे। रजनी को कुछ महसूस हुआ तो उसने पलट कर मेरी तरफ देखा। मुझे उस कमरे की तरफ जाता देख वो बुरी तरह घबरा गई। मारे दहशत के उसके माथे पर पसीना उभर आया। पलक झपकते ही उसकी हालत ऐसी हो गई मानो काटो तो खून नहीं। उसके होठ कुछ कहने के लिए खुले तो ज़रूर मगर आवाज़ न निकल सकी। मटके से पानी निकालना भूल गई थी वो।

मैं दरवाज़े के पास पहुंचा और एक झटके से उसे खोल कर अंदर दाखिल हो गया। अंदर दरवाज़े के अगल बगल मैंने निगाह घुमाई तो दाएं तरफ मुझे रूपचन्द्र छुपा खड़ा नज़र आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो बेजान सा खड़ा रह गया था। मारे डर के उसका चेहरा पीला ज़र्द पड़ गया था। उसकी हालत देख कर मैं मन ही मन मुस्कुराया लेकिन क्योंकि अब उससे और उसके पूरे परिवार वालों से मैंने अपने अच्छे सम्बन्ध बना लिए इस लिए ऐसे वक़्त में उससे कुछ उल्टा सीधा कहना मैंने ठीक नहीं समझा।

"रुपचंद्र तुम, यहाँ??" उसे देख कर मैंने बुरी तरह चौकने का नाटक किया और फिर हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"क्या बात है, लगता है रजनी को पेलने आए थे यहाँ लेकिन मैंने तुम्हारा काम ख़राब कर दिया, है ना?"

"ये...ये क्या कह रहे हो वैभव?" रूपचंद्र बुरी तरह हकलाते हुए बोला____"मैं तो यहाँ ब....।"

"अरे! यार मुझसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"अब तो तुम मेरे छोटे भाई भी हो और दोस्त भी। वैसे मुझे पहले से ही पता है कि तुम्हारा और रजनी का जिस्मानी सम्बन्ध है। ख़ैर मुझे तुम्हारे इस सम्बन्ध से कोई ऐतराज़ नहीं है और ना ही मैं किसी को बताऊंगा कि तुम्हारा मुंशी की बहू से ऐसा रिश्ता है।"

"क्...क्या तुम सच कह रहे हो वैभव?" रूपचंद्र के चेहरे पर राहत के साथ साथ आश्चर्य के भाव उभरे____"क्या सच में तुम्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है?"

"अब कितनी बार तुमसे कहूं भाई?" मैंने मुस्कुरा कर कहा____"ये सब तुम दोनों की रज़ामंदी से हो रहा है तो किसी को इससे क्या समस्या होगी भला? वैसे, तुम्हें पता है मैं भी उस रजनी को दबा के पेलता हूं। साली बड़ी चुदक्कड़ है। हुमच हुमच के चुदवाती है। एक काम करते हैं, चलो हम दोनों मिल के आज उसकी मस्त पेलाई करते है।"

मेरी बात सुन कर रूपचंद्र मुझे इस तरह देखने लगा था जैसे मेरे चेहरे पर अचानक ही उसे आगरे का ताजमहल नज़र आने लगा हो। मैं समझ सकता था कि मौजूदा परिस्थिति में उसका मुझ पर यकीन कर पाना संभव नहीं था लेकिन सच तो उसकी आँखें खुद ही देख रहीं थी और कान सुन रहे थे।

मैं रूपचंद्र को कंधे से पकड़ कर कमरे से बाहर ले आया। मुझे रूपचन्द्र को इस तरह साथ लिए आते देख रजनी एकदम से बुत बन गई थी। भाड़ की तरह मुँह खुला रह गया था। जिस तरह कुछ देर पहले रूपचंद्र का चेहरा मारे डर के पीला पड़ गया था उसी तरह अब रजनी का पीला पड़ गया था।

"इतना लम्बा मुँह क्यों फाड़ लिया अभी से?" मैंने रजनी को होश में लाने की गरज़ से कहा____"पहले हम दोनों के कपड़े तो उतार। उसके बाद हम दोनों तेरे हर छेंद में अपना लंड डालेंगे, क्यों रूपचंद्र?"

मैंने आख़िरी वाक्य रूपचंद्र को देख कर कहा तो वो एकदम से हड़बड़ा गया और फिर खुद को सम्हालते हुए ज़बरदस्ती मुस्कुरा कर बोला____"हां हाँ क्यों नहीं भाई।"

उधर रजनी को काटो तो खून नहीं। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी आँखें क्या देख रहीं थी और कान क्या सुन रहे थे। उसे तो शायद ये लगा था कि आज मैं उसकी और रूपचंद्र की मस्त गांड तोड़ाई करुंगा लेकिन अब जो होने जा रहा था उसकी तो उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी। बड़ी मुश्किल से उसे होश आया और उसके ज्ञान चच्छू जागे।

मैं जानता था कि हमारे पास समय नहीं है क्योंकि कोई भी यहाँ आ सकता था। मेरी बुलेट भी बाहर ही खड़ी थी और उसे देख कर किसी के भी मन में मुंशी के घर में आने का विचार आ सकता था इस लिए मैंने इस काम को फटाफट करने का सोचा। रजनी को शख़्त लहजे में बोला कि वो पूरी तरह नंगी हो जाए। मेरे कहने पर वो पहले तो झिझकी क्योंकि रूपचंद्र सामने था लेकिन मेरे आगे भला कहां उसकी चलने वाली थी। इस लिए जल्दी ही उसने अपना साड़ी ब्लाउज उतार दिया। रांड ने अंदर ना तो कच्छी पहन रखी थी और ना ही ब्रा। उसकी बड़ी बड़ी छातियां आँगन में आ रही धूप में चमक रहीं थी। जांघों के बीच उसकी चूत घने बालों में छुपी हुई थी। मेरी वजह से जहां रूपचंद्र को ये आलम थोड़ा असहज महसूस करा था वहीं रजनी का भी यही हाल था। वो अपनी छातियों और चूत को छुपाने का प्रयास कर रही थी।

"देखा रूपचंद्र।" मैंने रूपचंद्र को रजनी की तरफ इशारा करते हुए कहा____"ये रांड कितना करारा माल लग रही है। क्या लगता है तुझे, इसकी ये बड़ी बड़ी छातियां कितने लोगों की मेहनत का नतीजा होंगी?"

"म..मैं भला क्या बताऊं वैभव?" रूपचंद्र झिझकते हुए धीमी आवाज़ में बोला तो मैंने उससे कहा____"लगता है तू अभी भी मुझसे डर रहा है यार, जबकि अब हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं होनी चाहिए। अब से हम दोनों पक्के वाले यार हैं और जो कुछ करेंगे साथ ही करेंगे, क्या बोलता है?"

रूपचंद्र मेरी तरफ अपलक देखने लगा। शायद वो मेरे चेहरे के भावों को पढ़ कर ये समझने की कोशिश कर रहा था कि इस वक़्त मैं उससे जो कुछ कह रहा हूं उसके पीछे कितना सच है?

"हद है यार।" मैंने खीझने का नाटक किया____"तुझे अब भी मुझ पर यकीन नहीं हुआ है?"

"नहीं ऐसी बात नहीं है वैभव।" फिर उसने गहरी सांस लेते हुए कहा____"बात ये है कि हमारे बीच इतना जल्दी सब कुछ बदल गया है तो उसे मैं इतना जल्दी हजम नहीं कर पा रहा हूं।"

"अरे! तो पगले इसी लिए तो मैं कह रहा हूं कि हम दोनों मिल के इस रांड को पेलेंगे।" मैंने उसके दोनों कन्धों पर हाथ रख कर समझाते हुए कहा____"जब हम दोनों साथ मिल कर इसके साथ पेलम पिलाई करेंगे तो हमारे बीच सब कुछ खुल्लम खुल्ला वाली बात हो जाएगी। फिर न तुझे मुझसे झिझकने की ज़रूरत होगी और ना इस रांड को।"

रूपचंद्र को देर से ही सही लेकिन मैंने आस्वस्त कर दिया था। उसके बाद मेरे कहने पर रजनी ने फ़ौरन ही हम दोनों के कपड़े उतारे। रूपचंद्र नंगा हो जाने के बाद मेरे सामने थोड़ा शरमा रहा था। अपना मुरझाया हुआ लंड वो अपने ही हाथ से छुपाने की कोशिश कर रहा था जबकि मैं आराम से खड़ा था।

"चल अब पहले रूपचंद्र का लंड मुँह में ले कर चूस।" मैंने रजनी से कहा____"और हाँ थोड़ा जल्दी करना क्योंकि मैं नहीं चाहता कि किसी के आ जाने से हमारा ये खेल ख़राब हो जाए।"

रजनी मरती क्या न करती वाली हालत में थी। उसे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि ये सब आज हो क्या रहा है। उसने घुटनों के बल बैठ कर रूपचंद्र के मुरझाए हुए लंड को पकड़ा तो रूपचंद्र की सिसकी निकल गई। रजनी उसके लंड को पकड़ कर सहलाने लगी जिससे रूपचंद्र को धीरे धीरे आनंद आने लगा और उसने अपनी आँखें बंद कर ली। इधर मैं खुद ही अपने हाथ से अपने लंड को सहला रहा था। कुछ ही देर में रूपचन्द्र का लंड अपने अकार में आ गया। मैंने पहली बार उसके लंड पर नज़र डाली तो ये देख कर मन ही मन हँसा कि इसका तो मेरे लंड का आधा भी नहीं है।

रजनी रूपचंद्र के लंड को मुँह में ले कर चूस रही थी और रूपचंद्र मज़े में उसके सिर को थामे अपनी कमर हिलाए जा रहा था। रजनी अपने सिर को आगे पीछे कर के उसका लंड चूस रही थी। हिलने से उसकी बड़ी बड़ी चूंचियां भी हिल रहीं थी।

"चल अब क्या उसे ऐसे ही झड़ा देगी रांड?" मैंने रजनी से कहा तो दोनों को होश आया। रजनी ने उसका लंड अपने मुख से निकाल कर मेरी तरफ देखा।

"अब इसे भी अपने मुँह में ले कर चूस।" मैंने कहा_____"उसके बाद तेरी पेलाई शुरू करते हैं हम दोनों।"

रजनी चुप चाप मेरी तरफ सरकी और मेरे लंड को पकड़ कर सहलाने लगी। मैंने रूपचंद्र की तरफ देखा। वो आँखें फाड़े मेरे लंड को देख रहा था। मैं मन ही मन मुस्कुराया लेकिन लंड के बारे में उससे कुछ कहना ठीक नहीं समझा क्योंकि ऐसे में वो अपनी कमी महसूस करता। रजनी कुछ पलों तक मेरा लंड सहलाती रही उसके बाद उसने मेरे लंड को मुँह में भर लिया। उसका गरम मुख जैसे ही मेरे लंड के टोपे पर लगा तो मैंने उसकी तरफ देखा। मेरा लंड अभी अपने पूरे अकार में नहीं आया था इस लिए उसे अभी कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। मैंने रजनी के सिर को दोनों हाथों से पकड़ा और उसे अपने लंड की तरफ खींचने लगा। मेरा आधे से ज़्यादा लंड रजनी के मुँह में समां गया जिससे रजनी को झटका लगा और वो मेरी जाँघों को पकड़ कर ज़ोर लगाने लगी। एक तो रजनी के ऊपर पहले से ही मुझे गुस्सा था ऊपर से आज वो फिर से रूपचंद्र से चुदवाने जा रही थी इस लिए मेरे मन में अब उसे ऐसे ही सज़ा देने का ख़याल उभर आया था।

कुछ ही देर में रजनी की हालत ख़राब हो गई। मेरा लंड अपने पूरे आकार में आ चुका था और मैं मजबूती से उसके सिर को पकड़े उसके मुँह में अपने लंड को पेले जा रहा था। आँगन में रजनी के मुँह से निकलने वाली गूं गूं की आवाज़ें गूंजने लगीं थी। रूपचंद्र आश्चर्य से आँखें फाड़े कभी रजनी की हालत को देखता तो कभी मुझे। इधर मुझे रजनी को इस तरह पेलने में बड़ा मज़ा आ रहा था। जब मैंने देखा कि रजनी की आँखों से आंसू निकलने लगे हैं तो मैंने उसे छोड़ दिया। मुँह से लंड निकलते ही रजनी बुरी तरह खांसने लगी। उसके साँसें बुरी तरह उखड़ ग‌ईं थी। उसके थूक और लार से सना हुआ मेरा लंड धूप में अलग ही चमक रहा था। रूपचंद्र मेरे मोटे और लम्बे लंड को देख कर मानो सकते में आ गया था।

"छो...छोटे ठाकुर...खौं खौं...छोटे ठाकुर।" रजनी अपनी उखड़ी साँसों को सम्हालते हुए और खांसते हुए बोली____"आपने तो मेरी जान ही ले ली थी।"

"चिंता मत कर।" मैंने कहा_____"लंड लेने से कोई नहीं मरता, ख़ास कर तेरे जैसी रांड तो बिल्कुल भी नहीं।"

मैंने रूपचंद्र को आँगन में लेटने के लिए कहा तो उसने न समझने वाले भाव से मेरी तरफ देखा। मैंने उसे समझाया कि वो ज़मीन पर सीधा लेट जाए ताकि रजनी उसकी तरफ अपनी पीठ कर के उसके ऊपर लेट जाए। नीचे से वो रजनी की गांड में अपना लंड डाले और उसके बाद मैं ऊपर से रजनी की चूत में अपना लंड डाल कर उसकी चुदाई करुंगा। सारी बात समझ में आते ही रूपचंद्र झट से ज़मीन पर लेट गया। मैंने रजनी को इशारा किया तो वो रूपचंद्र के ऊपर अपनी पीठ कर के लेट गई। घुटनों को उसने ज़मीन पर टिका लिया था और दोनों हाथों को पीछे रूपचंद्र के सीने में। उसके लेटते ही रूपचंद्र ने नीचे से अपने लंड को रजनी की गांड में डाल दिया और फिर अपनी कमर को हिलाने लगा।

खिली धूप में वो दोनों इस आसान में अलग ही नज़ारा पेश कर रहे थे। रजनी की गोरी गोरी लेकिन भारी छातियां रूपचंद्र के धक्के लगाने से हिल रहीं थी। रजनी मुझे ही देख रही थी। मैं वक़्त को बर्बाद न करते हुए आगे बढ़ा और रजनी के ऊपर आसान ज़माने लगा। एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर मैंने रजनी की बालों से भरी चूत पर टिकाया और ज़ोर का झटका दिया जिससे रजनी उछल गई और नीचे उसकी गांड से रूपचंद्र का लंड निकल गया। रूपचंद्र ने जल्दी से अपने लंड को पकड़ कर उसकी गांड में डाला और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। इधर मैं अपने दोनों हाथ ज़मीन पर टिकाए तेज़ तेज़ कमर हिलाने लगा था। रजनी की पानी बहाती चूत पर मेरा लंड सटासट अंदर बाहर हो रहा था जिससे अब रजनी की सिसकियां और दर्द में डूबी आहें निकलने लगीं थी।

रजनी के लिए शायद ये पहली बार था जब वो दो दो लंड एक ही बार में अपनी चूत और गांड में ले रही थी। जल्दी ही वो मस्ती में आ गई और ज़ोर ज़ोर आहें भरने लगी। नीचे से रूपचंद्र अपना पिछवाड़ा उठा उठा कर रजनी की गांड में अपना लंड डाल रहा था और ऊपर से मैं रजनी की चूत को पेले जा रहा था। कुछ देर तक तो गज़ब का रिदम बना रहा लेकिन फिर रूपचंद्र हिच्च बोल गया। वो कहने लगा कि नीचे से कमर उठा उठा कर रजनी की गांड मारने से उसकी कमर दुखने लगी है इस लिए अब वो ऊपर आना चाहता है। मैंने भी सोचा चलो उसकी ही इच्छा पूरी कर देते हैं। जल्दी ही हमने अपना अपना आसन बदला। अब रूपचंद्र की जगह मैं रजनी के नीचे था और रूपचंद्र मेरी जगह पर। एक बार फिर से चुदाई का खेल शुरू हो गया। बीच में फंसी रजनी आँखें बंद किए अलग ही दुनिया में खो गई थी। वो ज़ोर से चिल्ला उठती थी जिससे मुझे उसको कहना पड़ता था कि साली रांड पूरे गांव को घर बुला लेगी क्या।

क़रीब दस मिनट भी न हुआ था कि रूपचंद्र बुरी तरह आहें भरते हुए रजनी की चूत में झड़ गया और उसके ऊपर पसर कर बुरी तरह हांफने लगा।

"क्या हुआ रूपचंद्र जी?" रजनी ने हांफते हुए किन्तु हल्की मुस्कान में कहा____"इतने में ही दम निकल गया तुम्हारा?"

"साली कुतिया।" रूपचंद्र उसके ऊपर से उठते हुए बोला____"मेरा दम निकल गया तो क्या हुआ, मेरा दोस्त तो लगा हुआ है न?"

"छोटे ठाकुर तो अपने दम पर लगे हुए हैं।" रजनी ने आहें भरते हुए कहा____"मैं तुम्हारी बात कर रही हूं। क्या तुम में भी छोटे ठाकुर जितना दम है?"

"साली रांड ये क्या बकवास कर रही है?" मैंने उसे अपने ऊपर से हटाते हुए कहा____"रुक अभी बताता हूं तुझे।"

"इस बुरचोदी की गांड फाड़ दो वैभव।" रूपचंद्र ने इस बार आवेश में आ कर कहा_____"इसके अंदर बहुत गर्मी भरी हुई है।"

मैंने रजनी को खटिया की बाट पर हाथ रख कर झुकने को कहा तो वो झुक गई। पीछे उसकी गांड उभर कर आ गई थी। मैंने जल्दी जल्दी चार पांच थप्पड़ उसकी गांड पर मारे जिससे वो दर्द से सिहर उठी। उसके बाद मैंने उसकी गांड को फैला कर अपने लंड को उसकी गांड के छेंद पर टिकाया और एक ही झटके में पूरा डाल दिया।

"आह्ह्ह्ह मररर गईईईई मां।" रजनी की दर्द भरी चीख फ़िज़ा में गूँज गई____"धीरे से डालिए...आह्ह्ह्ह मेरी गांड फट गई छोटे ठाकुर?"

"क्या हुआ रांड?" मैंने उसकी गांड पर ज़ोर का थप्पड़ लगाते हुए कहा____"दम निकल गया क्या तेरा?"

"आह्ह्ह्ह आपके ही करने से तो दम निकल जाता है मेरा।" रजनी आहें भरते हुए बोली____"आपका लंड किसी घोड़े के लंड से कम नहीं है। चूत और गांड में जब जाता है....आह्ह्ह्ह तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने गरमा गरम सरिया डाल दिया हो।"

"रुपचंद्र खटिया पर चढ़ो तुम।" मैंने रूपचंद्र से कहा____"और इसके मुँह में अपना लंड डालो। साली बहुत बोलती है।"

"अभी डालता हूं इस साली के मुँह में।" रूपचंद्र अपने लंड को सहलाते हुए फ़ौरन ही खटिया में चढ़ गया और रजनी के सिर को बालों से पकड़ कर उठाया। रजनी मेरी बात सुन चुकी थी इस लिए उसने अपना मुँह खोल दिया जिससे रूपचंद्र ने अपना लंड गप्प से उसके मुँह में डाल दिया।

एक तरफ से रूपचंद्र रजनी के सिर को पकड़े उसके मुँह की पेलाई कर रहा था और दूसरी तरफ से मैं रजनी की गांड फाड़ रहा था। सहसा मैंने अपना लंड उसकी गांड से निकाला और पलक झपकते ही नीचे उसकी चूत में एक झटके से डाल दिया। रजनी दर्द से कराही लेकिन मुँह में रूपचन्द्र का लंड होने की वजह से उसकी आवाज़ दब कर रह गई। मैं भीषण गति से उसकी चूत को चोदे जा रहा था। जल्दी ही रजनी का जिस्म थरथराता महसूस हुआ और फिर वो झटके खाते हुए झड़ने लगी। झड़ते वक्त वो बुरी तरह चिल्लाने लगी थी लेकिन रूपचंद्र ने जल्दी से उसके मुंह में अपना लंड घुसा दिया था। उसकी चूत का गरम पानी मेरे लंड को भिगोता चला गया मगर मैं रुका नहीं बल्कि तेज़ तेज़ लगा ही रहा। रूपचंद्र हैरानी से मुझे देख रहा था। कभी कभी मेरी नज़र उससे मिलती तो वो अपनी नज़रें हटा लेता था। शायद खुद को मुझसे कमज़ोर समझने लगा था जिससे वो नज़रें नहीं मिला पा रहा था।

"आह्ह्ह छोटे ठाकुर रुक जाइए थोड़ी देर।" रजनी रूपचंद्र का लंड मुँह से निकाल कर बोल पड़ी थी____"मुझे बहुत तेज़ जलन हो रही है...आह्ह्ह रुक जाइए कुछ देर के लिए।"

"चिंता मत कर बुरचोदी।" मैंने उसकी गांड में ज़ोर का थप्पड़ लगाते हुए कहा____"तेरी जलन को मैं अपने लंड के पानी से बुझा दूंगा।"

"आह्ह्ह छोटे ठाकुर।" रजनी दर्द से बोली____"झुके झुके मेरी कमर दुखने लगी है। आह्ह्ह भगवान के लिए थोड़ी देर रुक जाइए। मैं विनती करती हूं आपसे।"

"क्या बोलता है रूपचंद्र?" मैंने खटिया में खड़े रूपचंद्र से कहा____"छोड़ दूं उसे?"

"छोड़ ही दो यार।" रूपचंद्र ने रजनी की तरफ देखते हुए कहा____"इसके चेहरे से लग रहा है कि ये तकलीफ़ में है।"

मैंने एक झटके से अपना लंड रजनी की चूत से निकाल लिया। रजनी फ़ौरन ही सीधा खड़ी हो गई लेकिन अगले ही पल वो लड़खड़ा कर वापस खटिया पर झुक गई। शायद इतनी देर में उसके खून का दौड़ान रुक गया था या फिर उसकी कमर अकड़ गई थी। कुछ देर वो खटिया की बाट को पकड़े झुकी हुई गहरी गहरी साँसें लेती रही उसके बाद वो खड़ी हो कर खटिया में ही बैठ गई और मेरी तरफ देखते हुए गहरी गहरी साँसें लेती रही।

"अब इसको क्या तेरी अम्मा आ के शांत करेगी रांड?" मैंने शख़्त भाव से कहा तो रजनी ने जल्दी से मेरे लंड को पकड़ लिया और सिर को आगे कर के उसे मुँह में भर लिया।

उसके बाद रजनी की ना चूत में लंड डलवाने की हिम्मत हुई और ना ही गांड में। उसने मेरे लंड को चूस चूस कर ही मुझे शांत किया। इस बीच रूपचंद्र मेरी क्षमता देख कर बुरी तरह हैरान था। रजनी को पेलने के बाद हम दोनों ने अपने अपने कपड़े पहने और घर से बाहर आ गए। रजनी खटिया पर ही बैठी रह गई थी। उसमें उठ कर बाहर दरवाज़ा बंद करने के लिए आने की शक्ति नहीं थी।

बाहर आ कर मैं बुलेट में बैठ गया और रूपचंद्र से पूछा कि मेरे साथ घर चलेगा या उसका कहीं और जाने का इरादा है? मेरी बात सुन कर रूपचंद्र मुस्कुराते हुए बोला दोस्त अब तो घर ही जाऊंगा। उसके बाद मैं और रूपचन्द्र बुलेट से चल पड़े। थोड़ी ही दूरी पर उसका घर था इस लिए वो उतर गया और बाद में मिलने का बोल कर ख़ुशी ख़ुशी चला गया। मैं रास्ते में सोच रहा था कि अब रूपचंद्र मुझसे खुल गया है तो यकीनन अब वो ज़्यादातर मेरे साथ ही रहना पसंद करेगा। अगर ऐसा हुआ तो एक तरह से वो मेरी निगरानी में ही रहेगा। धीरे धीरे मैं इन सभी भाइयों से इसी तरह घुल मिल जाना चाहता था ताकि इनके मन से मेरे प्रति हर तरह का ख़याल निकल जाए। ये सब करने के बाद मैं अपने उस कार्य को आगे बढ़ाना चाहता था जिसके बारे में मैंने काफी पहले सोच लिया था।



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अध्याय - 39

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अब तक....



बाहर आ कर मैं बुलेट में बैठ गया और रूपचंद्र से पूछा कि मेरे साथ घर चलेगा या उसका कहीं और जाने का इरादा है? मेरी बात सुन कर रूपचंद्र मुस्कुराते हुए बोला दोस्त अब तो घर ही जाऊंगा। उसके बाद मैं और रूपचन्द्र बुलेट से चल पड़े। थोड़ी ही दूरी पर उसका घर था इस लिए वो उतर गया और बाद में मिलने का बोल कर ख़ुशी ख़ुशी चला गया। मैं रास्ते में सोच रहा था कि अब रूपचंद्र मुझसे खुल गया है तो यकीनन अब वो ज़्यादातर मेरे साथ ही रहना पसंद करेगा। अगर ऐसा हुआ तो एक तरह से वो मेरी निगरानी में ही रहेगा। धीरे धीरे मैं इन सभी भाइयों से इसी तरह घुल मिल जाना चाहता था ताकि इनके मन से मेरे प्रति हर तरह का ख़याल निकल जाए। ये सब करने के बाद मैं अपने उस कार्य को आगे बढ़ाना चाहता था जिसके बारे में मैंने काफी पहले सोच लिया था।



अब आगे....



हवेली पहुंचा तो बैठक में अपनी ऊँची कुर्सी पर बैठे पिता जी मुझे नज़र आए। उनके अलावा बैठक में जगताप चाचा और मुंशी चंद्रकांत भी बैठे थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही पिता जी ने मुझे अपने पास आने का इशारा किया। मैं उनके पास जा कर पहले उनके पाँव छुए और फिर जगताप चाचा के। दोनों ने खुश हो कर मुझे आशीर्वाद दिया।

"अब आप जाइए मुंशी जी।" पिता जी ने मुंशी की तरफ देखते हुए कहा____"कल पंचायत के लिए हम सुबह ही निकलेंगे। हमने फैसला किया है कि कल सुबह वैभव हमारे साथ जाएगा और आप जगताप के साथ जा कर उस मसले को सुलझाएं।"

"जैसी हुकुम की इच्छा।" मुंशी ने अदब से सिर झुकाते हुए कहा और फिर उठ कर बैठक से बाहर निकल गया।

"तो कैसा रहा साहूकारों के घर में हमारे प्यारे भतीजे का स्वागत सत्कार?" जगताप चाचा ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा____"वैसे सुना है बहुत वाह वाही कर रहे थे वो लोग तुम्हारी।"

"इस बारे में जानने के लिए हम भी बड़े उत्सुक हैं जागताप।" पिता जी ने कहा____"तुमने जिस तरह हमें इसकी वाह वाही वाली बातें बताई थी उससे हमें हैरानी हुई थी। वैसे तो हमने इसे ख़ास तौर पर समझा बुझा कर वहां भेजा था लेकिन अंदर ही अंदर हम इसके उग्र स्वभाव के चलते चिंतित भी थे कि ये कहीं वहां पर कोई बवाल न कर बैठे।"

"आप बेवजह ही चिंता कर रहे थे बड़े भइया।" जगताप चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा____"आप अभी भी मेरे भतीजे को नासमझ और गैरजिम्मेदार समझ रहे हैं जबकि मुझे इस पर पूरा यकीन था कि ये वहां पर ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जिससे किसी तरह का बवाल हो सके। ख़ैर उड़ती हुई ख़बर तो यही थी कि हमारे वैभव ने उन सभी साहूकारों का दिल जीत लिया है लेकिन हम अपने भतीजे के मुख से सुनना चाहते हैं कि इसने वहां क्या क्या किया अथवा इसके साथ वहां पर क्या क्या हुआ?"

मैंने देखा पिता जी के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी और ये मैंने पहली बार ही देखी थी। वो मेरी तरफ ही देख रहे थे। चेहरे पर ख़ुशी के भाव थे। मैंने देर न करते हुए वहां का सारा किस्सा उन्हें संक्षेप में बता दिया जिसे सुन कर पिता जी और जगताप चाचा हैरानी से मेरी तरफ देखने लगे थे। मैं समझ सकता था कि साहूकारों की तरह उन्हें भी मेरे बदले हुए चरित्र को हजम करना इतना आसान नहीं था।

"अगर तुम्हारी बातें सच है।" पिता जी ने कहा____"और तुमने वाकई में वहां धैर्य और नम्र स्वभाव का परिचय दिया है तो ये यकीनन अच्छी बात है। हम आगे भी तुमसे यही उम्मीद करते हैं।"

"आज मैं बहुत खुश हूं बड़े भइया।" जगताप चाचा ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा____"आज मेरा सबसे प्यारा और सबसे बहादुर भतीजा उसी रूप में अपना कार्य कर के लौटा है जिस रूप में और जैसे कार्य की मैं हमेशा इससे उम्मीद करता था।"

"अब तक मैंने जो कुछ भी किया है।" मैंने नम्र भाव से कहा____"उसके लिए मैं आप दोनों से माफ़ी मांगता हूं और यकीन दिलाता हूं कि आगे भी मैं वैसा ही कार्य करुगा जैसे ही आप दोनों मुझसे उम्मीद करते हैं।"

दोनों मेरी बात सुन कर ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे। हालांकि पिता जी अपनी ख़ुशी को छुपाने की पूरी कोशिश कर रहे थे लेकिन वो उनके छुपाए न छुप रही थी। ख़ैर पिता जी ने मुझे कल सुबह जल्दी तैयार हो कर चलने की बात कही तो मैंने हाँ में सर हिलाया अंदर चला गया।

अंदर माँ और मेनका चाची से मुलाक़ात हुई। थोड़ी देर उन दोनों से बातें करने के बाद मैं सीढ़ियों से ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ चला। सीढ़ियों से जैसे ही मैं ऊपर पहुंचा तो मुझे बड़े भैया आते हुए दिखे। उन्हें देखते ही मुझे उस दिन का किस्सा याद आ गया जब उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा था। मैं सोचने लगा कि आख़िर ऐसा कैसे किया होगा उन्होंने?

"अरे! वैभव आ गया तू?" बड़े भैया मेरे क़रीब पहुंचते ही बोले____"मैंने सुना कि तू साहूकारों के घर गया था? कैसा रहा वहां सब?"

"प्रणाम बड़े भइया!" मैं उनके बदले हुए ब्योहार और प्रसन्न चेहरे को देख कर मन ही मन हैरान हुआ था लेकिन ज़ाहिर नहीं होने दिया।

"हमेशा खुश रह।" उन्होंने मेरे बाएं कंधे को अपने हाथ द्वारा हल्के से थपकाते हुए कहा____"अभी तेरी भाभी से पता चला कि तुझे मणि शंकर काका अपने घर ले गए थे तेरा स्वागत सत्कार करने के लिए। कसम से वैभव इस बात से मैं बेहद खुश हूं लेकिन अब ये जानने को उत्सुक भी हूं कि वहां पर सब कैसा रहा?"

मैं बड़े भैया के चेहरे पर छाई ख़ुशी को देख कर हैरान था। समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या चक्कर है? कभी तो वो मुझसे इतना गुस्सा होते थे कि मुझे थप्पड़ तक मार देते थे और कभी वो मुझ पर इतना खुश होते थे कि लगता ही नहीं था कि उन्होंने कभी मुझ पर गुस्सा किया होगा।

"क्या हुआ?" मुझे सोच में डूबा देख वो बोल पड़े_____"क्या सोचने लगा तू? वहां सब ठीक तो था न मेरे भाई?"

"हां भइया।" मैंने सम्हल कर और नम्र भाव से उन्हें जवाब दिया____"आपके आशीर्वाद से वहां सब कुछ बढ़िया ही रहा और अब उन सबके मन में मेरे लिए कोई भी बैर भाव नहीं है। साहूकारों के सभी लड़के भी अब मुझसे अच्छी तरह घुल मिल गए हैं और मुझे अपना भाई और दोस्त समझने लगे हैं।"

"क्या सच में?" बड़े भैया ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा____"अगर ऐसा है तो ये बहुत ही ज़्यादा ख़ुशी की बात है वैभव। मेरे लिए तो सबसे बड़ी ख़ुशी की बात ये है कि मेरा भाई अब बदल गया है और अब अच्छे काम करने लगा है। आ मेरे गले लग जा।"

कहने के साथ ही उन्होंने मुझे खींच कर अपने गले से लगा लिया। मैं उनके इस बर्ताव से जहां एक तरफ बुरी तरह हैरान था वहीं खुश भी हुआ कि उन्होंने मुझे ख़ुशी से अपने गले लगाया। मन ही मन मैंने भगवान से यही दुआ की कि हम दोनों भाइयो के बीच हमेशा ऐसा ही प्रेम बनाए रखे और ये भी कि मेरे भैया के बारे में कुल गुरु ने जो भविष्यवाणी की है वो ग़लत हो जाए।

"मुझे जब तेरी भाभी ने इस बारे में बताया।" बड़े भैया ने मुझे खुद से अलग कर के कहा____"तो मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था लेकिन फिर मुझे होली वाला दिन आया कि कैसे तू अपने से बड़ों का आशीर्वाद ले रहा था और कैसे मेरे साथ ख़ुशी ख़ुशी भांग वाला शरबत पी रहा था। मैं जानता हूं मेरे भाई कि मैंने शायद कभी भी तुझे वैसा प्यार और स्नेह नहीं दिया जैसा एक बड़े भाई को देना चाहिए लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा। अब से मैं तुझे दुखी नहीं होने दूंगा। जितने समय का मेरा जीवन बचा है उतने दिन मैं तेरे साथ हंसी ख़ुशी रहना चाहता हूं। तेरे साथ वो सब कुछ करना चाहता हूं जो बड़े भाई के रूप में मैंने अब तक नहीं किया था।"

"मुझे भाभी ने आपके बारे में सब कुछ बता दिया है भइया।" मैंने थोड़ा दुखी भाव से कहा____"और मुझे इस बात से बहुत तकलीफ़ हो रही है कि मेरे जान से भी ज़्यादा प्यारे बड़े भैया के बारे में कुल गुरु ने ऐसी घटिया भविष्यवाणी की। आप उस गुरु की बातों पर विश्वास मत कीजिए भैया। उस धूर्त की भविष्यवाणी झूठी है। आपको कुछ नहीं होगा, आप हमेशा हमारे साथ ही रहेंगे। मुझे अपने बड़े भैया का हमेशा साथ चाहिए। मैं अपनी भाभी की खुशियां उजड़ने नहीं दूंगा।"

"नियति के लेख को कोई नहीं मिटा सकता छोटे।" बड़े भैया ने मेरे चेहरे को प्यार से सहला कर और साथ ही फीकी सी मुस्कान में कहा____"हम सारी दुनिया से लड़ सकते हैं लेकिन अपने नसीब और अपने प्रारब्ध से नहीं लड़ सकते। सच तो यही है कि बहुत जल्द मुझे तुम सबको छोड़ कर इस दुनिया से रुखसत होना पड़ेगा।"

"नहीं नहीं।" मेरी आँखें छलक पड़ीं। भावावेश में आ कर मैंने एक झटके में बड़े भैया को सीने से लगा लिया, बोला_____"ऐसा मत कहिए भैया। भगवान के लिए आप हमें छोड़ कर जाने की बात मत कीजिए। मैं आपको कहीं जाने भी नहीं दूंगा। अगर किसी ने आपको मुझसे छीनने की कोशिश की तो मैं सारी दुनिया को आग लगा दूंगा।"

"पगलपन की बातें मत कर छोटे।" बड़े भैया ने लरज़ते स्वर में मेरी पीठ को सहलाते हुए कहा____"मुझे ख़ुशी है कि तू मुझे इतना प्यार करता है लेकिन ये भी सच ही है कि तेरा ये प्यार ज़्यादा दिनों तक नसीब नहीं है मुझे। तुझसे एक बात कहना चाहता हूं, तू मेरी बात को समझने की कोशिश करना मेरे भाई। अपनी भाभी का हमेशा ख़याल रखना। उसके चेहरे पर कभी दुःख के बादलों को मंडराने न देना। वो किसी को अपने दुःख दर्द नहीं दिखाती बल्कि अंदर ही अंदर उस दुःख दर्द में जलती रहती है। ये मेरी बदकिस्मती है कि मैं उसे इस हाल में छोड़ कर चला जाऊंगा वरना जी तो यही चाहता है कि उसे संसार की हर वो खुशियां दूं जिससे कि उसके चेहरे का नूर कभी फीका न पड़ सके। तुझसे मेरी बस यही विनती है मेरे भाई कि तू अपनी भाभी का हमेशा ख़याल रखना।"

"ऐसा मत कहिए भइया।" मैं और भी ज़ोरों से फफक कर रो पड़ा____"भाभी का ख़याल आप ही रखेंगे और हमेशा रखेंगे। मैंने कहा न कि आपको कुछ नहीं होगा। आप हमेशा हमारे साथ ही रहेंगे।"

"भावनाओ में मत बह मेरे भाई।" बड़े भैया ने मुझसे अलग हो कर मेरी आँखों के आंसू पोंछते हुए कहा____"सच को किसी भी तरह से नाकारा नहीं जा सकता। तू मुझे वचन दे कि तू मेरे बाद अपनी भाभी का ख़याल रखेगा और उसे कभी भी दुखी नहीं होने देगा। मुझे वचन दे मेरे भाई।"

भैया ने अपनी हथेली मेरे आगे कर दी थी और मैं बेबस व लाचार सा दुखी भाव से उनकी उस हथेली को देखे जा रहा था। दिलो दिमाग़ में एकदम से बवंडर सा चल पड़ा था जो मुझे बुरी तरह हिलाए जा रहा था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे वक़्त में क्या करूं और क्या कहूं?

"धीरज से काम ले मेरे भाई।" भैया ने मेरी मनोदशा को महसूस करते हुए अधीरता से कहा____"अब सब कुछ तुझे ही सम्हालना होगा। पिता जी के बाद उनकी बागडोर भी तुझे ही सम्हालनी होगी और सच कहूं तो मैं खुद भी हमेशा यही चाहता था कि पिता जी के बाद तू ही उनकी बागडोर सम्हाले क्योंकि दादा ठाकुर बनने के लायक मैं कभी नहीं था। हमेशा मेरी आँखों के सामने तू ही दादा ठाकुर के रूप में नज़र आ जाता था और यकीन मान मैं तुझे उस रूप में देख कर बेहद खुश होता था। दुआ करता था कि कितना जल्दी वो दिन आए जब तू दादा ठाकुर बने और तेरे दादा ठाकुर बन जाने के बाद भी तेरा बड़ा भाई होने नाते मैं तुझ पर अपना रौब जमाऊं। तू जब खिसिया जाता तो मुझे बहुत मज़ा आता।"

"बस कीजिए भइया।" मैं बुरी तरह तड़प कर रो पड़ा____"मैं ये अब और नहीं सुन सकता।"

"चल ठीक है।" बड़े भैया ने फिर से मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया और कहा____"अब मुझे वचन दे कि अपनी भाभी का ख़याल हमेशा रखेगा तू।"

माहौल बहुत ही ग़मगीन था। मुझे भैया के लिए बहुत दुःख हो रहा था। मेरा बस नहीं चल रहा था वरना मैं एक पल में सब कुछ ठीक कर देता। फिर भी मैंने मन ही मन फैसला किया कि कुछ तो करना ही होगा मुझे। मैंने बड़े भैया की हथेली पर अपनी हथेली रखी और उन्हें वचन दिया कि मैं भाभी का हमेशा ख़याल रखूंगा। भैया अपनी नम आँखों को पोंछते हुए चले गए और मैं दुखी मन से अपने कमरे की तरफ चला ही था कि बगल में जो राहदारी थी वहां दीवार से चिपकी खड़ी भाभी नज़र आईं मुझे। शायद वो छुप कर हमारी बातें सुन रहीं थी। उनका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। उनकी ये हालत देख कर मैं एकदम से तड़प उठा। उधर वो मुझे देखते ही हड़बड़ाईं और जल्दी से अपनी साड़ी के छोर से अपने आंसुओं को पोंछने लगीं। मैं अभी उनसे कुछ कहने ही वाला था कि वो पलट कर वापस अपने कमरे में चली गईं।

भाभी को ऐसे जाते देख पहले तो मेरा मन किया कि मैं उनके पास जाऊं और उन्हें सांत्वना दूं लेकिन फिर ये सोच कर नहीं गया कि उन्हें इस वक़्त अकेले रहने देना ही उचित होगा। मैं भारी मन से चलते हुए अपने कमरे में दाखिल हुआ। नज़र बेड पर सोई पड़ी कुसुम और चंद्रभान की छोटी सी बच्ची पर पड़ी। वो बच्ची कुसुम से छुपकी सो रही थी और कुसुम भी गहरी नींद में थी। मैं सोचने लगा कि वो बच्ची उतने समय से मेरे यहाँ थी और अभी तक उसके घर वालों ने उसकी ख़बर तक नहीं ली या फिर ये कहें कि उस बच्ची को अपने लोगों की याद ही नहीं आई। दोनों को गहरी नींद में सोता देख मैंने उन्हें जगाना सही नहीं समझा इस लिए पलट कर बाहर आया और दरवाज़ा बंद कर के वापस चल दिया।

भाभी के कमरे के पास वाली राहदारी के पास पहुंच कर मैं रुका। ज़हन में ख़याल उभरा कि क्या भाभी के पास जाऊं या फिर नीचे चला जाऊं? मैं सोच ही रहा था कि सहसा मेरे ज़हन में एक ख़याल उभरा। मैं सीढ़ियों से उतरते हुए नीचे पहुंचा। माँ से पिता जी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वो अपने कमरे में आराम कर रहे हैं। मैं जानता था कि ये समय पिता जी के आराम का ही होता था इस लिए मैंने उनके आराम पर ख़लल डालना सही नहीं समझा। मुझे याद आया कि कल सुबह मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है। मैं उनके पास जिस मकसद से आया था उसके लिए मुझे कल का ही समय सही लगा। ये सोच कर मैं वापस माँ के ही पास बैठ गया।

मां और मेनका चाची कुर्सियों पर बैठी थीं और कुछ नौकरानियाँ उनके निर्देश पर कपड़े में कुछ आकृतियां बना रहीं थी। मैं जब कुर्सी पर बैठ गया तो माँ ने उन नौकरानियों को कहा कि वो यहाँ से दूसरी जगह जा कर अपना काम करें। माँ के कहने पर सब उठीं और अपना अपना सामान समेट कर चली गईं। मैं समझ गया कि माँ ने मेरी वजह से उनसे ऐसा कहा था।

"क्या बात है।" मेनका चाची ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा____"आज कल तो हमारे बेटे की बड़ी तारीफें होने लगी हैं। गांव के साहूकार हमारे बेटे को इज़्ज़त सम्मान देने के लिए खुद लेने आते हैं।"

"आपके बेटे में कोई तो ख़ास बात होगी ही चाची जिसके लिए वो लोग ऐसा कर रहे हैं।" मैंने भी मुस्कुरा कर चाची से कहा____"पर लगता है हमारी प्यारी चाची को उनके द्वारा अपने बेटे को यूं इज्ज़त सम्मान देना पसंद नहीं आया।"

"अरे! ये क्या कह रहे हो तुम?" मेनका चाची ने हैरानी से मेरी तरफ देखा____"भला मुझे अपने बेटे के लिए ये सब करना पसंद क्यों नहीं आएगा? तुम क्या जानो वैभव कि इस सबसे हमें कितनी ख़ुशी हुई है। तुम्हारे चाचा तो इतने खुश थे कि दीदी से कहने लगे कि इस ख़ुशी में हम एक बहुत बड़ा उत्सव करेंगे और आस पास के सभी गांव वालों को भोजन कराएंगे।"

"मेनका सही कह रही है बेटा।" माँ ने कहा_____"अभी कुछ ही देर पहले जगताप हमारे पास आए थे। जब उन्होंने तुम्हारे मुख से वहां का सारा किस्सा सुना तो वो सीधा हमारे पास आए और ख़ुशी ख़ुशी कहने लगे कि मेरे भतीजे ने बहुत बड़ा काम किया है और इस ख़ुशी में हम बहुत बड़ा उत्सव करेंगे।"

मैं माँ की बात सुन कर सोचने लगा कि जगताप चाचा सच में मुझे कितना प्यार करते हैं। वैसे ये सच ही था कि वो मुझे बचपन से ही बहुत मानते थे। माँ से उनके बारे में ऐसी बात सुन कर मुझे भी अंदर ही अंदर बेहद ख़ुशी महसूस हुई। मन में ख़याल उभरा अभी तक कौन सी दुनिया में खोया था मैं और क्यों खोया था मैं?

"हम सब अभी से उस बड़े उत्सव की तैयारी शुरू करने वाले हैं।" मेनका चाची ने ख़ुशी से चहकते हुए कहा____"कल जब दादा ठाकुर पंचायत से लौट कर हवेली आएंगे तो उनसे इसके बारे में बात करेंगे।"

"नहीं चाची।" मैंने एकदम से संजीदा हो कर कहा____"हवेली में ऐसा कोई उत्सव नहीं होगा और ना ही आप में से कोई पिता जी से इस बारे में बात करेगा।"

"अरे! ये क्या कह रहा है तू?" माँ ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा____"क्यों नहीं होगा उत्सव भला? तू नहीं जानता बेटा कि इस सबसे हमें कितनी ख़ुशी मिली है। गांव के साहूकारों से हमारे सम्बन्ध अच्छे हो गए हैं। हम चाहते हैं कि उस उत्सव में वो लोग भी हमारे साथ मिल कर इस ख़ुशी का आनंद लें।"

"मेरी नज़र में मैंने अभी ऐसा कोई भी बड़ा काम नहीं किया है मां।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"जिसके लिए इतने बड़े उत्सव का आयोजन किया जाए। हो सकता है कि ये सब आप लोगों के लिए ख़ुशी की बात हो लेकिन मेरे लिए नहीं है।"

"व...वैभव आख़िर बात क्या है" मेनका चाची ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"अचानक से तुम इतने गंभीर क्यों हो गए? अगर कोई बात है तो साफ़ साफ़ बताओ हमें।"

"ऐसी कोई बात नहीं है चाची।" मैं भला उन्हें कैसे बताता कि मैं अपने बड़े भैया की वजह से ऐसा कोई उत्सव नहीं होने देना चाहता था? मैं भला कैसे ऐसे उत्सव से खुश होता जबकि मेरे भैया और भाभी के जीवन में इतने बड़े दुःख के बादल छाए हुए थे।

"कुछ तो बात ज़रूर है बेटा।" माँ ने सहसा चिंतित भाव से कहा____"मुझे बता, आख़िर क्या छुपा रहा है हमसे?"

"कुछ नहीं मां।" मैं सहसा ये सोच कर अंदर ही अंदर घबरा गया कि मैंने ये कैसा माहौल बना दिया है, सम्हल कर बोला____"मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि अभी मैंने इतना बड़ा कोई भी काम नहीं है। अभी तो मुझे बहुत कुछ समझना है और बहुत कुछ करना है। जिस दिन वाकई में कोई बड़ा काम करुंगा उस दिन ख़ुशी ख़ुशी उत्सव मना लेना लेकिन अभी नहीं। "

मैं जानता था कि अब अगर और मैं उनके पास रुका तो वो दोनों मुझसे पूछती ही रहेंगी इस लिए मैं उठा और वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ चला। मैं अंदर से एकदम दुखी सा हो गया था। आज बड़े भैया ने जिस तरह से मुझसे बातें की थी उसने मुझे हिला कर रख दिया था। मैं ये सहन नहीं कर सकता था कि मेरे बड़े भैया हम सबको इस तरह छोड़ कर चले जाएंगे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? आख़िर कैसे मैं उनके जीवन को बचाऊं? एक तरफ भाभी थीं जो अंदर ही अंदर अपने पति के बारे में ये सब सोच सोच कर दुखी थीं और उनकी बिवसता ये थी कि वो अपना दुःख किसी को दिखा नहीं सकती थीं। मेरे सामने इतना कुछ मौजूद था जिसे मैं समेटने में सफल नहीं हो पा रहा था।

अपने कमरे में पहुंचा तो देखा कुसुम जग गई थी और किसी सोच में डूबी हुई नज़र आ रही थी। उसके कानों में दरवाज़ा खुलने की आवाज़ तक न पड़ी थी। ज़ाहिर है वो किसी गहरे ख़यालो में गुम थी। उसके मासूम से चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते हुए दिख रहे थे। मुझे याद आया कि वो भी अपने सीने में कोई ऐसी बात छुपाए हुए थी जो उसे अंदर ही अंदर दुखी किए हुए थी। अपनी लाड़ली बहन के उदास चेहरे को देख कर मेरे दिल में एक टीस सी उभरी। मैं सोचने लगा कि कैसा भाई हूं मैं जो अपनी मासूम बहन का दुःख भी दूर नहीं कर पा रहा? बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को सम्हाला और आगे बढ़ा।

"अब अगर मैं तेरा नाम सोचन देवी रख दूं तो कैसा रहेगा?" उसके सिरहाने पास बैठ कर मैंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा तो वो एकदम से चौंकी और फिर हड़बड़ा कर उठ बैठी।

"भ...भइया???" फिर वो खुद को सम्हालते हुए बोली_____"आप कब आए?"

"मुझे आए हुए तो ज़माना गुज़र गया।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन मैं ये समझने की कोशिश कर रहा था कि अपनी इस बहन का नया नाम सोचन देवी रखूं कि नहीं?"

"क्..क्या कहा आपने?" कुसुम ने आँखें फैलाते हुए कहा____"आप मेरा इतना गन्दा नाम कैसे रख सकते हैं? जाइए मुझे आपसे कोई बात नहीं करना।"

"यानि कि मुझे तेरा ये नया नाम नहीं रखना चाहिए।" उसके रूठ जाने पर मैंने उसे उसके कन्धों से पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और फिर प्यार से बोला____"पर भला ये कहां का इन्साफ़ हुआ कि मेरी प्यारी बहन ने अपने इस भाई का एक नाम सोचन देव रख दिया है?"

"वो तो आप पर जंचता है इस लिए रख दिया है मैंने।" कुसुम ने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा____"आप जब देखो तब कहीं न कहीं खोए ही रहते थे इस लिए मैंने आपका वो नाम रख दिया था। वैसे भैया क्या आप मुझे नहीं बताएँगे कि इतना क्या सोचते रहते थे आप कि मुझे मजबूर हो कर आपका नाम सोचन देव रखना पड़ा?"

"सच बताऊं या झूठ?" मैंने उसकी मासूमियत से भरी आँखों में देखते हुए पूछा तो उसने मासूमियत से ही जवाब दिया____"झूठ क्यों बताएँगे? एकदम सच्चा वाला सच बताइए मुझे।"

"ठीक है फिर।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"असल में मैं हमेशा ये सोचता रहता हूं कि ऐसी क्या बात हो सकती है जिसने मेरी मासूम सी बहन को इतना गंभीर बना दिया है और तो और उसे इतना बेबस भी कर दिया है कि वो अपने दिल की बात अपने इस भाई से बता भी नहीं सकती?"

मेरी बात सुन कर एकदम से कुसुम के चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए। उसका खिला हुआ चेहरा एकदम से बुझ सा गया। वो मुझसे नज़रें चुराने लगी। मैं उसी को देख रहा था। उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ थरथराए जा रहे थे।

"क्या हुआ?" मैंने उसे उसके कन्धों से पकड़ कर प्यार से ही पूछा____"मेरी बात सुन कर तेरा खिला हुआ चेहरा क्यों उतर गया? आख़िर ऐसी क्या बात है जो तुझे इतना परेशान कर देती है? तू जानती है न कि तेरा ये भाई तुझे किसी भी कीमत पर उदास नहीं देख सकता। तू जब शरारत से मुस्कुराती है तो लगता है जैसे हर तरफ खुशियों की बहार आ गई है और जब तू ऐसे उदास हो जाती है तो लगता है जैसे इस दुनिया में अब कुछ भी नहीं रहा।"

"भ...भइया।" कुसुम बुरी तरह फफक कर रोते हुए मुझसे लिपट गई। मैंने भी उसे अपने सीने से छुपका लिया और उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगा। उसे यूं रोता देख मेरी आँखें भी भर आईं। दिल में एक हूक सी उठी जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया।

"क्या तुझे अपने इस भाई पर ज़रा भी भरोसा नहीं है?" मैंने उसे खुद से छुपकाए हुए ही कहा____"क्या तुझे लगता है कि तेरा ये भाई तेरा दुःख दूर करने में असमर्थ है? तू जानती है न कि मैं तेरे एक इशारे पर सारी दुनिया को आग लगा सकता हूं।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भइया।" मेरी बातें सुन कर कुसुम और भी ज़्यादा सिसक उठी____"मैं आपको तकलीफ़ नहीं देना चाहती। मैं जानती हूं कि आप मेरे लिए दुनिया का कोई भी काम कर सकते हैं लेकिन मैं क्या करूं भैया? मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकती। मुझे माफ़ कर दीजिए।"

"अच्छा चल ठीक है।" मैंने उसे खुद से अलग किया और उसके आंसुओं को पोंछते हुए कहा____"तू रो मत। तू जानती है न कि मैं तेरी आँखों में आंसू नहीं देख सकता। चल अब शांत हो जा।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भइया।" कुसुम ने मेरी तरफ देखते हुए दुखी भाव से कहा। उसकी आँखें फिर से छलक पड़ीं थी जिन्हें मैंने अपने हाथों से पोंछा और फिर कहा_____"तुझे किसी बात के लिए मुझसे माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है और हाँ मैं वादा करता हूं कि अब तुझसे इस बारे में कुछ भी नहीं पूछूंगा। मैं बस ये चाहता हूं कि तू हमेशा खुश रहे और अपनी शरारतों से अपने इस भाई को परेशान करती रहे।"

कुसुम की आँखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे समझा बुझा कर शांत किया। सहसा मेरी नज़र दरवाज़े पर खड़ी मेनका चाची पर पड़ी। जब उन्होंने देखा कि मैं उन्हें देखने लगा हूं तो उन्होंने जल्दी से अपनी आँखों के आंसू पोंछे और फिर मुस्कुराती हुई कमरे के अंदर हमारे पास आ ग‌ईं।

"मैं नहीं जानती कि ऐसी कौन सी बात है जिसे तुम कुसुम से पूछ रहे थे।" फिर उन्होंने उसी मुस्कान में कहा____"और ये तुम्हें बताने की जगह इस तरह रोने लगी थी लेकिन ये देख कर मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि तुम इसे आज भी उतना ही मानते हो जितना पांच महीने पहले मानते थे।"

"सारी दुनिया से नफ़रत कर सकता हूं चाची।" मैंने कुसुम के चेहरे को प्यार से सहला कर कहा____"लेकिन अपनी इस बहना से कभी नाराज़ नहीं हो सकता और ना ही इसे कभी दुखी देख सकता हूं। ये मेरी जान है, मेरा गुरूर है, मेरी शान है।"

कुसुम मेरी बात सुन कर फिर से मुझसे छुपक गई। उसकी आँखें फिर से भर आईं थी। मेनका चाची ने मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया और कहा____"इस हवेली में एक तुम ही हो जो इसे इतना मानते हो। इसके बाकी भाई तो हमेशा इसे डांटते ही रहते हैं।"

"कोई मेरे सामने इसे डांट के दिखाए भला।" मैंने कहा____"मैं डाटने वाले का मुँह तोड़ दूंगा।"

"जिस तरह तुम इसे स्नेह करते हो।" मेनका चाची ने कहा____"मैं सोचती हूं कि जिस दिन ये ब्याह कर अपने ससुराल जाएगी तब क्या करोगे तुम?"

"समाज के बनाए नियमों का किसी तरह पालन तो करना ही पड़ेगा चाची।" मैंने गंभीरता से कहा____"पर इतना ज़रूर समझ लीजिए कि जिस दिन ये अपने भाई को छोड़ कर अपने ससुराल जाएगी उस दिन मेरा दिल टुकड़ों में बिखर जाएगा। इस हवेली में गूंजने वाली इसकी हंसी और इसकी शरारतें कहीं खो जाएंगी।"

कहते कहते सहसा मेरी आवाज़ भर्रा गई और मुझसे आगे कुछ बोला न गया। आँखों ने बगावत कर दी थी। मेरी बातें सुन कर जहां कुसुम रोते हुए मुझसे फिर से लिपट गई थी वहीं चाची ने मुझे खुद से छुपका लिया था। माहौल एकदम से ग़मगीन सा हो गया था।

"ताता बुआ त्यों लो लही है?" अचानक हम तीनों ही उस बच्ची की इस बात से चौंके। वो जग गई थी और अब बेड पर उठ कर बैठ गई थी। उसने कुसुम को रोते देखा तो मुझसे पूछ लिया था।

"अरे! मेरी प्यारी गुड़िया जग गई क्या?" कुसुम मुझसे अलग हुई तो मैंने उस बच्ची को उठा कर अपनी गोद में बैठाते हुए उससे पूछा तो वो बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए मुस्कुरा उठी।

"आप तहां तले द‌ए थे ताता?" उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"मैंने बुआ थे पूथा आपके बाले में तो बुआ ने तहा आप मेले लिए लद्दू लेने द‌ए हैं।"

"तो क्या अभी तक तुमने लड्डू नहीं खाया गुड़िया?" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए पूछा जिसका जवाब उसने मुस्कुराते हुए दिया____"मैंने तो बूत थाले लद्दू थाए ताता औल आपतो पता है बुआ ने मुधे मिथाई भी थिलाइ।"

"अरे वाह!" मैंने उसके गालों को सहलाते हुए कहा____"फिर तो हमारी गुड़िया का पेट भर गया होगा।"

"हां ताता।" उसने मासूमियत से कहा____"पल मुधे औल लद्दू थाने हैं।"

मेनका चाची और कुसुम उस बच्ची की बातों से मुस्कुरा रहीं थी। उस बच्ची की वजह से माहौल सामान्य और खुशनुमा सा हो गया था। मैंने कुसुम से कहा कि वो गुड़िया के लिए लड्डू ले आए। थोड़ी ही देर में कुसुम लड्डू और मिठाई ले कर आ गई और उसे दे दिया। बच्ची लड्डू और मिठाई देख कर बेहद खुश हुई और एक लड्डू उठा कर खाने लगी।

मेनका चाची और कुसुम कुछ देर बाद चली गईं। वो बच्ची लड्डू खाने में ब्यस्त थी और मैं ये सोचने में कि विभोर और अजीत के पास कुसुम की आख़िर ऐसी कौन सी कमज़ोरी है जिसके बल पर वो लोग कुसुम को मेरे खिलाफ़ मोहरा बनाए हुए हैं? आख़िर ऐसी क्या बात हो सकती है जिसके चलते कुसुम उनकी बात मानने के लिए इस हद तक मजबूर है कि वो अपने उस भाई को भी कुछ नहीं बता रही जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है? मैंने फैसला किया कि सबसे पहला काम मुझे इसी सच का पता लगाना होगा।



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अध्याय - 40

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अब तक....

मेनका चाची और कुसुम कुछ देर बाद चली गईं। वो बच्ची लड्डू खाने में ब्यस्त थी और मैं ये सोचने में कि विभोर और अजीत के पास कुसुम की आख़िर ऐसी कौन सी कमज़ोरी है जिसके बल पर वो लोग कुसुम को मेरे खिलाफ़ मोहरा बनाए हुए हैं? आख़िर ऐसी क्या बात हो सकती है जिसके चलते कुसुम उनकी बात मानने के लिए इस हद तक मजबूर है कि वो अपने उस भाई को भी कुछ नहीं बता रही जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है? मैंने फैसला किया कि सबसे पहला काम मुझे इसी सच का पता लगाना होगा।

अब आगे....

दिन ढलने लगा था।

भाभी मेरे कमरे में आईं और मुझे बताया कि गुड़िया को लेने के लिए उसकी दादी फूलवती अपने दूसरे बेटे सूर्यभान के साथ आई हैं। मैंने देखा भाभी का चेहरा अब थोड़ा सामान्य था। मैंने भाभी से उनके हाथ की बनी चाय पिलाने को कहा तो वो सिर हिला कर चली गईं। इधर उनके जाने के बाद मैं भी उस बच्ची को ले कर नीचे आ गया।

नीचे आया तो देखा मणि शंकर की बीवी फूलवती माँ और मेनका चाची से बातें कर रही थी। तीनों के चेहरों पर ख़ुशी के भाव थे। बच्ची को लिए जब मैं उनके पास पहुंचा तो फूलवती मुझे और अपनी पोती को देख कर मुस्कुरा उठी।

"ये अभी तक तुमसे ही चिपकी हुई है?" फूलवती ने मुस्कुराते हुए किन्तु हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"लगता है तुमसे कुछ ज़्यादा ही घुल मिल गई है ये।"

"आप क्या इसे लेने आई हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा____"पर अब तो ये मेरे पास ही हवेली में रहेगी। है न मेरी प्यारी गुड़िया?"

"हां ताता।" उस बच्ची ने मेरी तरफ देखते हुए मासूमियत से कहा____"मैं आपते पाथ ही लहूंगी।"

"हाय राम!" फूलवती उसकी बात सुन कर चकित भाव से कह उठी____"ये तो सच में तुमसे घुल मिल गई है बेटा। देखो तो एक ही दिन में अपनी उस दादी को भी भूल गई जिसके बिना ये रहती ही नहीं थी।"

मां और चाची उनकी बात सुन कर हंसने लगीं। जबकि फूलवती उस बच्ची से कहने लगी कि चल बेटा घर चल तेरी माँ तुझे बहुत याद कर रही है और तेरे बिना घर भी सूना सूना लगता है। फूलवती की ये बातें सुन कर भी वो बच्ची मेरी गोद से उतर कर उसके पास न गई। आख़िर मैंने जब उसे प्यार से समझाया और ये कहा कि मैं उसके लिए उसके घर लड्डू ले कर आऊंगा तो वो मान गई और फिर ख़ुशी ख़ुशी अपनी दादी के पास चली गई।

रागिनी भाभी सबके लिए चाय ले कर आईं। चाय पीने के बाद मैं बाहर बैठक में आ गया। बैठक में सूर्यभान जगताप चाचा के पास बैठा था और चाय पी रहा था। मैं भी उनके पास ही बैठ गया। कुछ देर हम तीनों के बीच इधर उधर की बातें होती रहीं उसके बाद फूलवती जब आई तो सूर्यभान उन्हें ले कर चला गया।

"तो कैसा चल रहा है हमारे भतीजे के मकान का निर्माण कार्य?" जगताप चाचा ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा____"ब्यस्तता के चलते उधर जा ही नहीं पाए हम।"

"आधे से ज़्यादा कार्य हो गया है चाचा जी।" मैंने कहा____"जल्द ही शेष कार्य भी पूरा हो जाएगा।"

"चलो अच्छी बात है फिर।" चाचा जी ने कहा____"अच्छा अब तुम बैठो, हमें एक ज़रूरी काम से जाना पड़ेगा।"

चाचा जी के जाने के बाद मैं भी उठा और पैदल ही हवेली से बाहर चल पड़ा। कुछ दूरी से ही सड़क के दोनों तरफ लोगों के कच्चे मकान शुरू हो जाते थे। दिन ढल रहा था इस लिए धुप में ज़्यादा तपिश नहीं रह गई थी। मैं सोचता जा रहा था कि मेरे सामने सबसे महत्वपूर्ण दो मामले थे और दोनों ही मामले गंभीर थे, ख़ास कर बड़े भैया वाला मामला। बड़े भैया का जब भी ख़याल आता था तब मेरे दिल में एक दर्द सा जाग उठता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि भैया का जीवन काल इतना जल्दी ख़त्म हो जाएगा। मेरे लिए सबसे बड़ी हैरानी की बात ये थी कि भैया का बर्ताव एकदम से कैसे बदल जाता था? कभी वो बहुत अच्छे से बात करते थे और कभी ऐसे हो जाते थे कि वो गुस्से में आ कर मुझ पर हाथ ही उठा देते थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर ये क्या माजरा है? मैं ये सब सोचता चला ही जा रहा था कि सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे कहीं से आवाज़ आई हो। मैं रुक कर इधर उधर देखने लगा और तभी मेरी नज़र दाएं तरफ जा रही एक संकरी गली पर पड़ी। गली के किनारे एक नीम का पेड़ था उसी पेड़ के पास एक आदमी खड़ा था। वो आदमी हमारे ही गांव का था। मैंने देखा वो मुझे अपनी तरफ बुला रहा था। मुझे उसका बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उत्सुकतावश मैं उसकी तरफ बढ़ ही गया।

"क्या बात है काका?" उस आदमी के पास पहुंचते ही मैंने उससे पूछा____"तुम मुझे इस तरह क्यों बुला रहे थे?"

"मेरी इस धृष्टता के लिए मुझे माफ़ कर देना छोटे ठाकुर।" उसने इधर उधर देखते हुए कहा_____"अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल ग‌ए। मैं कई दिनों से हवेली में आना चाहता था लेकिन बड़ी कोशिश के बाद भी आ नहीं पाया अथवा ये समझ लीजिए कि हवेली में आने की मैं हिम्मत ही नहीं जुटा पाया।"

"आख़िर बात क्या है?" मैं उसकी बात सुन कर सोच में पड़ गया था, बोला_____"तुम किस लिए हवेली आना चाह रहे थे?"

"यहां नहीं छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने इधर उधर देखते हुए धीमें स्वर में कहा____"आप मेरे साथ मेरे घर चलिए। मुझे आपको बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"

उस आदमी की बात सुन कर मैं चौंका। एकाएक मेरे ज़हन में कई तरह के ख़याल उभरने लगे। मैं फ़ौरन ही उस आदमी के साथ चल पड़ा। जिस गली में हम थे वो ज़्यादा चौड़ी नहीं थी। अगल बगल बने घरों के बगल की दीवार थी गली की तरफ। आगे जा कर वो गली बाएं तरफ मुड़ जाती थी जहां पर निम्न वर्ग के लोगों के घर बने हुए थे। कुछ ही देर में मैं उस आदमी के साथ एक घर में पहुंच गया। आदमी ने इधर उधर नज़र घुमाई और एक तरफ देख कर हाथ से एक इशारा किया। मैंने उस तरफ देखा तो एक और आदमी परली तरफ खड़ा था। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन इतना ज़रूर सोचा कि कुछ तो बात ज़रूर है।

"वो मेरा छोटा भाई है छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने कहा____"मैंने उसे निगरानी में लगा रखा है। असल में कुछ दिनों से मुझे एक बड़े ख़तरे का आभास हो रहा है।"

"आख़िर बात क्या है काका?" मैं बेचैन भाव से बोल पड़ा____"तुम साफ़ साफ़ बताते क्यों नहीं मुझे?"

"अन्दर आ जाइए।" उसने कहा और घर के अंदर दाखिल हो गया। उसके पीछे मैं भी सोच में डूबा दाखिल हो गया। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे।

"अरे! ओ धनिया।" आदमी ने अंदर तरफ किसी को पुकारा____"जल्दी से जल पान ला, छोटे ठाकुर आए हैं।"

"काका इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है।" मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था, इस लिए उतावलेपन से बोल पड़ा_____"तुम मुझे बस वो बताओ जिसके लिए तुम हवेली आना चाहते थे या फिर मुझे यहाँ ले कर आए हो।"

"तीन दिन पहले की बात है छोटे ठाकुर।" मैं जब खटिया में बैठ गया तो वो मेरे पास ही ज़मीन पर बैठने के बाद गंभीर भाव से बोला_____"मेरी भैंस घर नहीं आई थी तो मैं उसे खोज रहा था। आख़िर बड़ी खोज के बाद वो शाम को मुझे नदी के पास मिली। मेरे साथ मेरा छोटा भाई कलुवा भी था। मैंने कलुवा को भैंस ले कर घर चले जाने को कहा और खुद दिशा मैदान के लिए वहीं रुक गया। आप तो जानते हैं कि नदी से कुछ दूरी पर ही गांव के साहूकारों का बगीचा शुरू होता है। मैं डर तो रहा था कि मुझे उस जगह पर दिशा मैदान करते हुए साहूकारों का कोई नौकर न देख ले लेकिन क्योंकि मेरा ज़ोरों से पेट चढ़ा हुआ था इस लिए मजबूरन मुझे वहीं बैठ जाना पड़ा। दिशा मैदान से फुर्सत होने के बाद मैं उनके बगीचे से ही घुस कर घर की तरफ चल दिया। मैंने सोचा था कि बगीचे से हो कर अगर जाऊंगा तो जल्दी ही गांव की मुख्य सड़क पर पहुंच जाऊंगा। अँधेरा घिर चुका था पर मैं अंदाज़न चलता ही जा रहा था। थोड़ी दूर ही आया था कि अँधेरे में मुझे थोड़ी देर के लिए हवा में आग जलती दिखी और फिर बूझ गई। मैं समझ गया कि किसी ने बीड़ी सुलगाया होगा लेकिन तभी ख़याल आया कि अँधेरे में उस वक़्त भला वहां पर कौन हो सकता है? जहां तक मुझे पता था दिन ढले ही बगीचा सुनसान हो जाता था। ख़ैर मैंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ चला। कुछ दूर ही आया था कि तभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुन कर मैं एकदम से उछल पड़ा। चिल्लाने की आवाज़ किसी लड़की या औरत की थी। मैंने सोचा अँधेरे में उस वक़्त कौन हो सकती थी जो इस तरह चिल्लाई थी? मन में एक उत्सुकता जाग उठी थी इस लिए दबे पाँव उस तरफ को मुड़ गया। डर तो बहुत लग रहा था छोटे ठाकुर क्योंकि साहूकारों का बगीचा था पर शायद नियति यही चाहती थी इस लिए मैं दबे पाँव उस तरफ बढ़ता ही चला गया।"

वो आदमी सांस लेने के लिए कुछ देर रुका। मैं गौर से उसकी बातें सुन रहा था। अभी वो फिर से बोलने ही वाला था कि अंदर से एक लड़की हाथ में एक थाली लिए आई। मैंने देखा लड़की जवान थी। सांवली रंगत वाले जिस्म पर घाघरा चोली था। चोली में कैद उसकी चूचियां साफ़ बता रहीं थी कि लड़की अब भरपूर जवान हो चुकी है। शायद इसी का नाम धनिया था और उस आदमी की बेटी थी। उसने झुक कर मेरी तरफ थाली बढ़ाई जिसमें एक गिलास पानी रखा हुआ था। वो झुकी हुई थी तो मेरी नज़र एकदम से उसके उभारों पर चली गई। चोली का गला झुकने से नीचे की तरफ फ़ैल सा गया था जिससे मुझे साफ़ साफ़ उसके उभार दिखने लगे थे। मेरे मन में एक हलचल सी हुई तो मैंने जल्दी से उसके उभारों से नज़र हटा कर ग्लास उठा लिया। मेरे ग्लास उठाते ही वो सीधा हुई और अंदर चली गई।

"आगे बताओ काका।" उसके जाते ही मैंने उस आदमी से कहा____"उसके बाद क्या हुआ?"

"बगीचे की ज़मीन पर सूखे पत्ते पड़े हुए थे इस लिए मेरे चलने से आवाज़ पैदा हो रही थी।" काका ने कहना शुरू किया____"और इस आवाज़ के चलते मैं ये सोच कर और भी डर रहा था कि कहीं मैं पकड़ा न जाऊं। उधर किसी लड़की या औरत के चिल्लाने की आवाज़ बीच बीच में आ रही थी। मैंने साफ़ सुना था कि वो खुद को छोड़ देने के लिए मिन्नतें कर रही थी, रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी। मैं किसी तरह उस तरफ पहुंचा। अचानक चिल्लाने की आवाज़ बंद हो गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने जादू किया हो और शोर गुल शांत हो गया हो। मैं एक पेड़ के पीछे छुप कर खड़ा हो गया था। मुझसे क़रीब दस या पंद्रह क़दम की दूरी पर अँधेरे में मुझे तीन लोग खड़े दिखाई दिए। अँधेरे की वजह से उनकी शकल नहीं दिख रही थी और ना ही उनके कपड़े ठीक से समझ में आ रहे थे। उनमें से एक आदमी थोड़ा झुका हुआ दिख रहा था। शायद वो उस लड़की या औरत को पकड़े हुए था जो कुछ देर पहले चिल्ला रही थी।"

"मैंने तो पहले ही कहा था कि इस रांड के बस का नहीं है हवेली से उन कागज़ातों को निकाल कर लाना।" सन्नाटे को चीरती उनमें से एक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी थी____"लेकिन आप ही नहीं माने और इसे हवेली की नौकरानी बना कर वहां रखवा दिया।"

"ग़लती तो हो ही गई मुझसे।" दूसरे की आवाज़ आई____"मुझे क्या पता था कि ये अपनी खूबसूरती और अपने मादक जिस्म का सही उपयोग ही नहीं कर पाएगी। इससे ज़्यादा समझदार तो वो शीला निकली जिसने अपने काम को अच्छे तरीके से अंजाम देना शुरू कर दिया है।"

"मुझे लगता है इसे थोड़ा और वक़्त देना चाहिए।" तीसरे की आवाज़ थी ये____"मत भूलिए कि इसी की वजह से हमारा एक महत्वपूर्ण काम सफलता से हुआ है। हवेली में आज कल जिस तरह के हालात हैं उसमें इसके लिए ये काम करना फिलहाल आसान नहीं हो सकता। उस कम्बख्त दादा ठाकुर को अब यकीन हो चला है कि कोई तो है जो उसके खानदान को बर्बाद करने के लिए शातिर खेल खेल रहा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो पूरी तरह सतर्क हो गया होगा।"

"ये सही कह रहा है।" पहले वाले की आवाज़____"मामला थोड़ा पेंचीदा है इस लिए इसे थोड़ा वक़्त देना चाहिए हमें।"

"मुझ पर यकीन कीजिए।" सहसा वो लड़की या औरत की आवाज़ आई जो पहले चिल्ला रही थी____"मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूं लेकिन क्या करूं वहीं की दोनों ठकुराईनें हर वक़्त वहीं जमी रहती हैं। इस वजह से मुझे दादा ठाकुर के कमरे में जाने का मौका ही नहीं मिलता।"

"क्या एक बार भी उसके कमरे में जाने का तुझे मौका नहीं मिला?" दूसरे वाले की आवाज़ आई तो उस औरत ने कहा____"ऐसे तो कई बार मिला है और मैं गई भी हूं लेकिन ज़्यादा समय तक कमरे में रह ही नहीं पाई वरना उस कमरे में उन कागज़ातों को ज़रूर तलाश करती।"

"उसके कमरे को देख कर क्या समझ आया था तुझे?" दूसरे वाले ने उससे पूछा।

"समझ आया मतलब? मैं कुछ समझी नहीं?" उस औरत की उलझी हुई आवाज़।

"अरे! मतलब ये कि उस दादा ठाकुर के कमरे को देख कर।" दूसरे वाले की आवाज़ में इस बार थोड़ा गुस्सा था____"क्या तुझे ऐसा लगा कि उसी कमरे में वो कागज़ात रखे हो सकते हैं?"

"उनके कमरे में तो चारो तरफ बहुत कुछ है।" उस औरत की आवाज़____"लेकिन ठीक से देखने का मौका ही नहीं मिल पाया मुझे।"

"देख मैं इन दोनों के कहने पर तुझे आख़िरी मौका दे रहा हूं।" दूसरे वाले कठोरता से कहा____"अगर तूने वहां से कागज़ात निकाल कर हमें नहीं दिया तो सोच लेना कि तू और तेरा परिवार इस दुनिया में नहीं रहेगा।"

"वो तीनों लोग कौन थे काका?" वो आदमी जब सब कुछ बता कर चुप हुआ तो मैंने गहरी सांस लेते हुए उससे पूछा____"क्या उन तीनों की आवाज़ों से तुम उन्हें पहचान पाए?"

"यही तो नहीं हो पाया छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने बेबस भाव से कहा____"अँधेरे की वजह से उनकी शकल तो वैसे भी नहीं दिख रही थी लेकिन बातें भी वो धीमें स्वर में ही कर रहे थे इस लिए साफ़ साफ़ उनकी आवाज़ मेरे कानों में नहीं पहुंच पा रही थी, अगर वो खुल कर बातें करते तो शायद उनकी आवाज़ से मैं कुछ अंदाज़ा लगा पाता।"

"और वो औरत कौन थी?" मैंने कहा___"क्या उसे भी नहीं पहचान पाए?"

"मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे ठाकुर।" वो आदमी बेबसी बोल पड़ा____"औरत को पहचानना तो वैसे भी मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मैंने इस गांव की ज़्यादातर औरतों की आवाज़ें सुनी ही नहीं हैं।"

"ख़ैर उसके बाद क्या हुआ?" मैंने काका की तरफ देखते हुए पूछा____"क्या वो लोग वहीं रहे या फिर उनके जाने के बाद तुमने उनका पीछा भी किया था?"

"पीछा करने की नौबत ही नहीं आई छोटे ठाकुर।" काका ने कहा____"उनको पता चल गया कि वहां पर उनके अलावा भी कोई है जो उनकी बातें सुन रहा है।"

"अरे! पर उन्हें पता कैसे चल गया?" मैंने काका की बात सुन कर हैरानी से पूछा।

"मेरे दुर्भाग्य की वजह से छोटे ठाकुर।" काका ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मैं पेड़ के पीछे खड़ा उनकी बातें सुन रहा था कि तभी मेरे पैर में से कोई चीज़ एकदम सर्र से निकल गई जिसके चलते मैं डर के मारे उछल ही पड़ा था और मेरे मुख से आवाज़ भी निकल गई थी। बस उसके बाद तो जैसे मुझ पर क़यामत ही टूट पड़ी थी। मैं भी अपनी जान बचा कर इस तरह वहां से भाग खड़ा हुआ था जैसे सैकड़ों भूत मेरे पीछे पड़ गए हों। पीछे मुड़ कर एक बार भी नहीं देखा था मैंने। सीधा घर पर ही आ कर रुका था।"

"तो इस बात को बताने के लिए तुम हवेली आना चाहते थे?" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा___"और अपने छोटे भाई को निगरानी में लगा रखे हो?"

"हां छोटे ठाकुर।" काका ने गंभीरता से कहा____"मैं यही सोच कर डर गया था कि क्या उन लोगों ने मुझे पहचान लिया होगा? आज तीसरा दिन है और अब यही लगने लगा है कि उस दिन उन लोगों ने मुझे पहचाना नहीं था। अगर पहचान गए होते तो संभव है कि आज मैं आपके सामने जीवित न बैठा होता। मैंने कई बार ये सब दादा ठाकुर से बताने के लिए हवेली जाने का मन बनाया लेकिन हिम्मत न हुई। क्योंकि मुझे कहीं न कहीं यही लगता है कि वो हवेली की तरफ जाने वाले हर ब्यक्ति को जांच परख रहे होंगे और जब मुझ जैसा नीच जाति का आदमी हवेली की तरफ जाता हुआ उन्हें दिखेगा तो वो फ़ौरन समझ जाएंगे कि उस रात उनकी बातें सुनने वाला शायद मैं ही था।"

"शायद तुम सही कह रहे हो काका।" मैंने काका की बुद्धि की मन ही मन सराहना की, फिर बोला____"तुम्हारी इस बुद्धिमानी ने ही तुम्हें अब तक सही सलामत रखा है और मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम अब हवेली की तरफ देखना भी नहीं। अच्छा हुआ कि इत्तेफ़ाक से आज पैदल चलते हुए मैं इधर से गुज़र रहा था और तुमने मुझे देख लिया। सही कहते हैं बूढ़े बुजुर्ग लोग कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद काका ये सब बताने के लिए। आज तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारे इस खूबसूरत उपकार को मैं कभी नहीं भूलूंगा। तुमने हमारे प्रति जो वफ़ादारी दिखाई है उसका मोल एक दिन ज़रूर मिलेगा तुम्हें। ख़ैर, अब चलता हूं काका, अपना ख़याल रखना।"

"रूकिए छोटे ठाकुर।" मेरे उठते ही काका ने झट से कहा____"एक और बात उनके मुख से सुनी थी मैंने। मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा कि कोई ऐसा भी कर सकता है।"

"ऐसी कौन सी बात सुनी थी तुमने?" मैंने उत्सुकतावश पूछा।

और काका ने मुझे जो बात बताई उसे सुन कर मैं बुरी तरह अचम्भे में पड़ गया था किन्तु अगले ही पल मेरे चेहरे पर पत्थर जैसी शख़्ती उभर आई। गुस्से के मारे मेरी आँखें लाल सुर्ख पड़ने लगीं थी। काका ने मुझे किसी तरह समझा बुझा कर शांत किया।

सूरज डूब चुका था और अँधेरे की चादर चारो तरफ फैलने लगी थी। मैं गहरी सोच में डूबा हवेली की तरफ चला जा रहा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि कोई इतना बड़ा षड़यंत्र या इतना बड़ा खेल भी रच सकता है। दिलो दिमाग़ में जो तूफ़ान मचल रहा था उसे मैं बड़ी मुश्किल से दबाए हुए हवेली पहुंचा। आज बहुत कुछ पता चल गया था मुझे। मैं मन ही मन भगवान से उस काका के लिए दुआएं मांग रहा था जिसने मुझे इतने बड़े रहस्य के बारे में बताया था।

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रात का वक़्त था।

गांव से थोड़ा दूर जंगल के बीचों बीच चार इंसानी साए दो दो फिट के अंतराल में खड़े थे। यूं तो आसमान में आधे से थोड़ा कम ही चाँद मौजूद था जिसकी हल्की रौशनी हर तरफ फैली हुई थी लेकिन जंगल के बीच चाँद की वो हल्की रौशनी नहीं पहुंच पा रही थी। इस वजह से सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। रात के सन्नाटे में हवा के चलने से पेड़ों के पत्तों की सरसराने की ही आवाज़ें गूंज रहीं थी।

"अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारे सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा।" उन चारों में से एक साए की धीमी आवाज़ गूंजी_____"शुरु से ले कर अब तक हमने जो कुछ भी किया है उसका कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ। उस कम्बख्त दादा ठाकुर ने अपनी पहुंच का फ़ायदा उठा कर सारा मामला ही रफा दफा कर दिया है।"

"बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?" एक दूसरे साए की कर्कश आवाज़ गूंजी____"एक दिन तो वो हमारे लपेटे में आएगा ही। फिलहाल एक अच्छी बात ये है कि एक चिड़िया पूरी तरह हमारे बस में है। जल्द ही हवेली में एक ऐसा मातम छाने वाला है जिसकी भरपाई हवेली का कोई भी सदस्य नहीं कर पाएगा।"

"मुझे तो डर है कि कहीं वक़्त से पहले दादा ठाकुर को ऐसे किसी काम का शक न हो जाए।" तीसरे साए की सोचपूर्ण आवाज़ गूंजी____"अगर ऐसा हुआ तो समझो ये खेल भी बिगड़ जाएगा।"

"चिंता मत करो।" दूसरे वाले ने कहा____"दादा ठाकुर ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता कि ऐसा कुछ हो सकता है। हमने शतरंज की बिसात ही ऐसी बिछाई है कि वो इस तरीके से सोच ही नहीं सकता। इस लिए इस बारे में फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि फ़िक्र तो अब इस बात की है कि उसका दूसरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अच्छा बन गया है। आज कल वो बुद्धि से कुछ ज़्यादा ही काम लेने लगा है। समझ में नहीं आ रहा कि वो आश्चर्यजनक रूप से इतना कैसे बदल सकता है?"

"उसके इस तरह बदल जाने से ही तो हमारे लिए मुश्किलें पैदा हो गई हैं।" चौथे ने कहा____"मुझे तो रातों में ये सोच सोच कर नींद नहीं आ रही कि उसका गरम खून इतना जल्दी ठंडा कैसे पड़ गया? अपने बाप से भी भिड़ जाने वाला वो छोकरा आख़िर कैसे यूं अचानक अपने बाप की जी हुज़ूरी करने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके बाप ने उसे कोई सम्मोहन करने वाली दवा खिला दी है?"

"यकीनन ऐसा हो सकता है।" दूसरे साए ने कहा_____"क्योंकि इतने कम समय में किसी का इस तरह से कायाकल्प हो जाना लगभग असंभव बात है। जो छोकरा हमेशा अय्याशियां करने में ही मगन रहता था और अपने परिवार वालों की एक नहीं सुनता था उसका इस तरह पलक झपकते ही बदल जाना बिलकुल भी हजम नहीं होता। तुम सच कहते हो, ज़रूर दादा ठाकुर ने उसको कोई ऐसी ही दवा खिला दी है वरना किसी इंसान की फितरत इतना जल्दी बदल जाए ये असंभव है।"

"ये सब छोड़िए।" पहले वाले साए की आवाज़ गूंजी____"और ये सोचिए कि अब आगे हमें क्या करना चाहिए? एक बात और, मेरे एक ख़ास आदमी से मुझे पता चला है कि दादा ठाकुर ने दरोगा को गुप्त रूप से मुरारी के हत्यारे का पता लगाने का काम सौंपा है।"

"हां पता है मुझे।" दूसरे वाले साए ने कहा____"एक दिन तो उस साले दरोगा ने पकड़ ही लिया था मुझे। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि वो किसी पत्थर से टकरा कर गिर गया और मुझे उसके होने का पता चल गया था। उसके बाद मैंने बड़ी सफाई से अपने उस आदमी का काम तमाम किया और फिर उड़न छू हो गया था।"

"ऐसा नहीं होना चाहिए था।" तीसरे वाले साए ने कहा____"क्योंकि अब उस दरोगा के अलावा दादा ठाकुर को भी यकीन हो गया है कि मुरारी की हत्या करने के पीछे किसी का यही मकसद था कि उस हत्या में दादा ठाकुर के उस छोकरे को फंसा दिया जाए।"

"सही कहा तुमने।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन अच्छी बात यही है कि ये पता लगने के बाद भी वो दरोगा और दादा ठाकुर ये नहीं जान सकते कि ऐसा किसने किया होगा? हाँ ये ज़रूर है कि अब हमें पूरी तरह से सावधान रहना होगा और अपने किसी भी काम को पूरी सतर्कता से ही करना होगा।"

"क्या ये पता चल सका कि वो नक़ाबपोश कौन था जो उस दिन बगीचे में उस छोकरे का बचाव कर रहा था?" चौथे साए की आवाज़____"मुझे पूरा यकीन है कि वो नक़ाबपोश दादा ठाकुर का ही कोई आदमी है लेकिन हमारे लिए ये पता करना ज़रूरी है कि वो आख़िर है कौन? वो हमारे लिए बहुत ही बड़ा ख़तरा है।"

"मेरे आदमी उसका पता लगाने में लगे हुए है।" दूसरे साए ने कहा____"अभी तक उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली है। ऐसा लगता है वो नक़ाबपोश बहुत ही शातिर है।"

"कितना भी शातिर क्यों न हो।" चौथे साए की आवाज़____"उसका पता करना ज़रूरी है हमारे लिए।"

"एक बात समझ में नहीं आ रही।" दूसरे वाले साए ने कहा____"वो छोकरा उस बंज़र ज़मीन पर मकान क्यों बनवा रहा है? क्या अपनी अय्याशियों के लिए या फिर उसके ज़हन में कुछ और चल रहा है?"

"सुना तो यही है कि वो उस जगह पर महज शान्ति और सुकून के लिए मकान बनवाना चाहता है।" पहले वाले साए ने कहा____"बाकि असल बात क्या है ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा।"

"जो भी हो।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन एक बात निश्चित है कि जिस तरह से वो बदल गया है और बुद्धि से काम लेने लगा है उससे हमारा बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। इस लिए कुछ ऐसा करो कि उसका खेल ही ख़त्म हो जाए। मैं उसे अब और बरदास्त नहीं कर सकता। मुझे उस हवेली में ऐसा मातम छाया हुआ देखना है जो कभी खुशियों में तब्दील ही न हो सके।"

"ये इतना आसान नहीं है।" पहले वाले साए ने कहा____"पहले की बात और थी क्योंकि पहले वो पूरी तरह लापरवाह रहता था लेकिन अब वो सम्हल गया है या यूं कहें कि उसे सम्हल कर चलने के लिए प्रेरित किया गया है। दूसरी बात दादा ठाकुर भी ये समझ चुका है कि कोई तो ऐसा ज़रूर है जो उसके बेटे को मोहरा बनाए हुए है और उसके साथ साथ पूरे ठाकुर खानदान को भी। ऐसे में वो पूरी तरह सम्हल गया है और ये भी यकीन करो कि वो गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा रहा होगा। अब तुम लोग समझ सकते हो कि ऐसी परिस्थिति में हवेली के किसी भी ब्यक्ति का शिकार करना आसान नहीं होगा।"

"ये सब जान कर हम हार नहीं मान सकते।" दूसरे वाले साए ने शख़्त भाव से कहा____"और ना ही अपने प्रतिशोध को भूल सकते हैं।"

"मैं भी कहां अपने प्रतिशोध को भूला हूं?" पहले वाले ने कहा____"प्रतिशोध तो मैं ले कर ही रहूंगा फिर चाहे आख़िर में मुझे सब कुछ खुल कर ही क्यों न करना पड़े।"

"शांत हो जाओ।" तीसरे साए ने कहा_____"किसी को भी अपना संयम खोने की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए अभी यही ज़रूरी है कि परिस्थितियों को देख कर हमें पूरे होशो हवास में काम लेना है। हमारी थोड़ी सी चूक हमारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती है। इस लिए माहौल को देख कर काम करो। फिलहाल यही सोच कर तसल्ली रखो कि एक तो बहुत जल्द विदा होने ही वाला है। उसके बाद मौका देख कर दूसरे को भी वैसे ही विदा करवा देंगे।"

"अगर उसको भी उसी तरह विदा करवाना होता तो ये काम पहले ही कर दिया गया होता।" दूसरे साए ने कठोर भाव से कहा____"मगर किया इसी लिए नहीं कि उसे मैं अपने हाथों से तड़पा तड़पा कर इस दुनिया से विदा करना चाहता हूं और ये हो कर ही रहेगा चाहे इसके लिए मुझे कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।"

"वैसे मेरा ख़याल है कि ऐसा खूबसूरत वक़्त जल्द ही आ सकता है।" चौथे साए ने कहा_____"अब तो दोनों परिवारों के बीच अच्छे सम्बन्ध बन चुके हैं और वो छोकरा भी अपने दुश्मनों को दोस्त बना कर उनसे ख़ुशी ख़ुशी घुल मिल रहा है। हमारे लिए ऐसी परिस्थिति में कोई ऐसा सुनहरा मौका ज़रूर मिल सकता है कि हम उस छोकरे को अपने लपेटे में बड़ी आसानी से ले सकें।"

"बेवक़ूफ़ी भरी बात मत करो तुम।" तीसरे साए ने कहा____"तुम्हें क्या लगता है ये सब दाल चावल खाने जैसा आसान है? इस बात को सबसे पहले याद रखो कि दादा ठाकुर को ऐसे ही किसी ख़तरे का आभास हो चुका है इस लिए ये भी यकीन ही करो कि वो इस सबके लिए पूरी तरह से सतर्क हो गया होगा और गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा ही रहा होगा। मुझे तो अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उस छोकरे की फितरत को बदलने के पीछे उसके बाप दादा ठाकुर का ही महत्वपूर्ण हाथ है और मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा है कि उसने किसी ख़ास योजना के तहत ही अपने छोकरे को मणि शंकर के यहाँ भेजा होगा।"

"तुम्हारी बातों में यकीनन भारी वजन है।" दूसरे वाले साए ने कहा____"मुझे भी यही आशंका है। ख़ैर तो इन सब बातों का निचोड़ यही है कि फिलहाल हमें कुछ नहीं करना है बल्कि अच्छे वक़्त का इंतज़ार करना है।"

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।



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अध्याय - 41

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अब तक....

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"




दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।

अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"

"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"

"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"

"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।

"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।



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अध्याय - 42

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अब तक....



जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।



अब आगे....



वापस हवेली आते आते दोपहर हो गई थी। माँ ने खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने उन्हें ये कह कर इंकार कर दिया था कि मुझे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है। अपनी बुलेट ले कर मैं सीधा मुरारी के गांव निकल गया था। जैसा कि मैंने पहले भी बताया था कि इधर से जाने पर सबसे पहले गांव से बाहर मुरारी का ही घर पड़ता था। उसके घर के क़रीब पहुंचा तो घर के बाहर ही मुझे सरोज काकी मिल गई थी। मैंने उससे कहा कि थोड़ी देर में लौट कर आऊंगा और अनुराधा के हाथ का बना खाना खाऊंगा। सरोज काकी मेरी बात सुन कर मुस्कुराई और फिर हाँ में सिर हिला दिया था। उसके बाद मैं सीधा जगन के घर पहुंच गया था। जगन घर पर नहीं था। उसकी बीवी ने बताया कि गांव तरफ गए हैं। मेरे कहने पर उसने अपने बेटे को भेजा था जगन को बुला कर लाने के लिए। थोड़ी देर में जब जगन आया तो मुझे अपने घर में देखते ही पहले तो चौंका था फिर ख़ुशी से मुस्कुराने लगा था। उसने मेरे स्वागत के लिए खुद ही जल्दी से जल पान की ब्यवस्था कर दी थी।

जल पान करने के बाद मैंने जगन को बताया कि मैं उसके पास एक ख़ास काम से आया हूं। जगन मेरी बात सुन कर ख़ुशी ख़ुशी बोला कि ये उसकी खुशनसीबी है कि मैं उसके पास किसी काम से आया हूं। ख़ैर मैंने जगन को एक काम सौंपा और कहा कि जल्द से जल्द वो काम कर के मुझे बताए। जगन काम के बारे में सुन कर थोड़ा चौंका भी था और हैरान भी हुआ था लेकिन फिर बोला कि ठीक है वैभव बेटा मैं जल्दी ही ये काम कर के बताता हूं।

जगन के यहाँ कुछ देर मैं रुका और उसके घर का भी हाल चाल लिया उसके बाद मैं अपनी बुलेट ले कर मुरारी काका के घर की तरफ चल पड़ा। कल जब मैं यहाँ आया था तो अनुराधा से कह कर गया था कि दूसरे दिन मैं उसके हाथ का बना खाना खाने आऊंगा। सुबह क्योंकि मुझे पिता जी के साथ पंचायत पर जाना पड़ गया था इस लिए मुझे कुछ ज़्यादा ही देर हो गई थी। ख़ैर मुरारी काका के घर के बाहर मैंने बुलेट खड़ी की। दरवाज़ा खुला ही था तो मैं अंदर दाखिल हो गया। अंदर सरोज काकी अपने बेटे अनूप के पास बैठी थी।

"बड़ी देर लगा दी आने में बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"अनु ने बताया था कि आज तुम यहाँ पर खाना खाने आओगे तो मैं बड़ा खुश हुई थी।"

"माफ़ करना काकी।" काकी ने उठ कर बरामदे में रखी चारपाई को बिछाया तो मैं उसमें बैठते हुए बोला____"असल में सुबह पिता जी के साथ पंचायत पर चला गया था इस वजह से आने में देर हो गई वरना तुम तो जानती ही हो कि अनुराधा के हाथ का बना खाना खाने के लिए मैं भागता हुआ यहाँ आता।"

"मैंने उसे समझाया था कि खाना अच्छे से बनाना और सब कुछ तुम्हारी पसंद का ही बनाए।" काकी ने कहा____"इस चक्कर में ये सुबह जल्दी ही उठ गई थी और जल्दी नहा भी लिया था। उसके बाद खाना बनाने की तैयारी में जुट गई थी। जब तुम सुबह नहीं आए तो मैं समझ गई कि कहीं किसी काम में फंस गए होगे। तुम्हारे चक्कर में हम लोगों ने भी नहीं खाया। बस अनूप खाने के लिए रोने लगा था तो इसे खिलाया।"

"तुम भी हद करती हो काकी।" मैंने हैरानी से कहा____"मेरे चक्कर में तुम लोगों को भूखा रहने की भला क्या ज़रूरत थी? वैसे तुम्हें पता है हवेली में माँ ने मुझसे खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने मना कर दिया उन्हें। अब तुम ही बताओ काकी कि यहाँ के खाने को भुला कर मैं कैसे हवेली का खाना खा लेता और वो भी तब जबकि मैंने अनुराधा से कहा हो कि मैं ज़रूर आऊंगा।"

"यानी हम लोगों की तरह तुम भी भूखे ही घूम रहे हो?" सरोज काकी हंसते हुए बोली____"ख़ैर, अब बातें छोड़ो और चलो जल्दी से हाथ मुँह धो लो। मैं तब तक बैठका लगाती हूं।"

सरोज काकी ने अनुराधा को आवाज़ दी तो वो रसोई से निकल कर बाहर आई। काकी ने उससे कहा कि वो मुझे पानी दे ताकि मैं हाथ पैर धो लूं। काकी की बात सुन कर अनुराधा कोने में रखी बाल्टी का पानी उठा कर नर्दे के पास रख दिया। मैं नर्दे के ही पास आ गया था। मैंने देखा अनुराधा के चेहरे पर अलग ही चमक थी। जैसे ही मुझसे नज़र मिलती तो वो झट से नज़रें हटा लेती और अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगती। मैंने उसे छेड़ने का सोचा।

"कहो ठकुराईन क्या हाल चाल हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में ये कहा तो अनुराधा बुरी तरह चौंकी और आँखें फाड़ कर मेरी तरफ देखने लगी। चेहरे पर घबराहट के भाव लिए वो धीमें से ही बोली____"मु..मुझे इस नाम से मत पुकारिए।

"ना, मैं तो अब इसी नाम से पुकारूँगा तुम्हें।" उसने लोटे में भर कर पानी दिया तो मैंने लेते हुए कहा।

"नहीं न।" अनुराधा ने बेबस भाव से कहा____"मां ने सुन लिया तो वो बहुत डाँटेगी मुझे।"

"अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें ठकुराईन न कहूं।" मैंने हाथ धोते हुए कहा____"तो तुम भी मुझे छोटे ठाकुर नहीं कहोगी और काकी के सामने मेरा नाम ले कर पुकारोगी।"

"पर बिना वजह कैसे पुकारूंगी मैं?" अनुराधा ने उलझनपूर्ण भाव से कहा____"वैसे मैंने कहा तो है आपसे कि अब से मैं आपका नाम ले कर ही आपको पुकारुंगी।"

"चलो अब यही तो देखना है।" मैंने खड़े होते हुए कहा____"कि तुम मुझे काकी के सामने मेरे नाम से पुकारती हो कि नहीं।"

"पर मैं बिना वजह कैसे आपको पुकारूंगी भला?" अनुराधा ने मासूमियत से कहा____"ऐसे में तो माँ गुस्सा हो जाएगी।"

"यार तुम काकी से इतना डरती क्यों हो?" मैंने उसे घूरते हुए कहा____"अच्छा मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। उपाय ये है कि जब मैं खाना खा रहा होऊंगा तो तुम रसोई से ही मेरा नाम लेकर मुझसे पूछना कि मुझे और कुछ चाहिए कि नहीं, ठीक है?"

"और अगर मेरे ऐसा कहने पर माँ ने डांटा तो?" अनुराधा ने मेरी तरफ नज़र उठा कर देखा।

"अरे! मैं हूं न।" मैंने उसे आस्वस्त किया____"काकी अगर तुम्हे डाँटेगी तो मैं काकी को अच्छे से समझा दूंगा।"

मेरी बात सुन कर अनुराधा ने हाँ में सिर हिलाया और चली गई। हाथ पैर धो कर मैं आया तो देखा काकी ने बरामदे की ज़मीन पर एक चादर बिछा दी थी और उसके सामने एक लकड़ी का पीढ़ा रख दिया था जिसके बगल से लोटा ग्लास में पानी रखा हुआ था। मैं आया और उसी चादर में बैठ गया। काकी मेरे पास ही कुछ दूरी पर बैठ गई। कुछ ही देर में अनुराधा थाली ले कर आई और उस लकड़ी के पीढ़े पर रख दिया। थाली में वो सब कुछ था जो मुझे इस घर में सबसे ज़्यादा खाना पसंद था।

खाना शुरू हुआ और खाने के दौरान काकी से इधर उधर की बातें भी शुरू हो ग‌ईं। ये अलग बात है कि मेरा ध्यान काकी से बातों में कम बल्कि इस बात पर ज़्यादा था कि अनुराधा कब रसोई से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारती है। इस बीच कई बार अनुराधा रसोई से निकल कर आई और थाली में कुछ न कुछ रख कर चली गई लेकिन एक बार भी उसने वो न किया जो कहने का हमारे बीच समझौता हुआ था। यहाँ तक कि मैं खाना भी खा चुका और हाथ धो कर चारपाई पर भी जा बैठा। इस बात से मुझे अनुराधा पर बेहद गुस्सा आया हुआ था। अभी मैं अपने अंदर उभरे इस गुस्से को काबू में कर ही रहा था कि तभी सरोज काकी का बेटा अनूप काकी से कहने लगा कि उसे दिशा मैदान जाना है। वो पेट पकड़े काकी के सामने आ कर खड़ा हो गया था।

"बेटा तुम यहीं बैठना।" काकी मेरी तरफ देखते हुए बोली____"मैं इसे दिशा मैदान करा के लाती हूं।"

"ठीक है काकी।" मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि काकी के चले जाने से मुझे अनुराधा के साथ अकेले रहने का मौका मिल गया है लेकिन प्रत्यक्ष में बोला____"लेकिन जल्दी ही आना क्योंकि मुझे हवेली जल्दी जाना है।"

काकी अनूप को ले कर दूसरे वाले दरवाज़े से घर के पीछे की तरफ चली गई। काकी के जाते ही मानो फ़िज़ा में सन्नाटा छा गया। मेरा दिल किया कि अभी उठूं और पलक झपकते ही रसोई में अनुराधा के पास पहुंच जाऊं। अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अनुराधा रसोई से निकल कर बाहर आई।

"मुझे माफ़ कर दीजिए।" फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए दीन हीन भाव से कहा____"मां के सामने आपका नाम ले कर आपको पुकारने की मुझमें हिम्मत ही न हुई थी। हर बार सोचती थी कि अब पुकारूंगी आपको लेकिन माँ के डर से पुकारा ही नहीं गया मुझसे। माफ़ कर दीजिए मुझे।"

"तुम्हें पता है इस वक़्त मुझे कैसा महसूस हो रहा है?" मैंने संजीदा भाव से कहा____"ऐसा लग रहा है जैसे सरे-बाज़ार लुट गया हूं मैं। भरी महफ़िल में जैसे किसी ने मेरी इज़्ज़त का जनाजा निकाल दिया हो।"

"भगवान के लिए ऐसा मत कहिए।" अनुराधा ने सहसा दुखी भाव से कहा____"मुझे खुद भी बहुत बुरा लग रहा है कि मैंने आपका कहा नहीं माना लेकिन यकीन मानिए माँ के सामने मुझसे कुछ बोला ही नहीं गया।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने जब देखा कि अनुराधा की आँखें नम हो गई हैं तो मुझे एहसास हुआ कि ग़लती उसकी नहीं थी। यकीनन अपनी माँ के सामने उससे बोला नहीं गया होगा। उसकी हालात को समझते हुए मैंने आगे कहा____"मैं समझ सकता हूं कि तुम्हारे लिए ये इतना आसान नहीं था। तुमने कोशिश की यही बड़ी बात है।"

"क्या आप नाराज़ हैं?" उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।

"यही तो समस्या है कि मैं तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम वो लड़की हो जिसने मुझ जैसे इंसान को मुकम्मल तौर पर बदल दिया है। तुम सच में एक अच्छी लड़की हो अनुराधा। मैं अगर चाहूं भी तो तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता। कभी कभी सोचता हूं कि क्या तुमने कोई जादू कर दिया है मुझ पर?"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा बुरी तरह चौंकी।

"वही जो मैं महसूस करता हूं।" मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा____"कुछ तो किया ही है तुमने। कभी खुद भी सोचना इस बारे में।"

"पता नहीं आप ये क्या बोले जा रहे हैं।" अनुराधा ने सिर झुका कर कहा____"मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं किसी के साथ कुछ भी करने का सोच भी नहीं सकती।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने कहा____"मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि आज कल वक़्त और हालात ठीक नहीं हैं इस लिए अपना और अपने परिवार का ख़याल रखना। एक बात और, अगर किसी भी तरह की ऐसी वैसी कोई बात समझ में आए तो सीधा उस जगह पर चली जाना जहां पर मेरा नया मकान बन रहा है। वहां पर तुम्हें भुवन नाम का एक आदमी मिलेगा, उसे तुम बता देना।"

"क्या कुछ होने वाला है वैभव जी?" अनुराधा ने मेरा नाम ले कर कहा____"क्या वो साहूकार का लड़का फिर से कुछ करने वाला है?"

"किसी का भरोसा नहीं है अनुराधा।" मैंने कहा____"कौन कब क्या करेगा इस बारे में ठीक से कुछ नहीं कह सकते। इसी लिए कह रहा हूं कि ख़याल रखना। रात में दरवाज़े अच्छे से बंद कर के रखना, और अगर कोई दरवाज़ा खुलवाए तो पहले ये जान लेना कि बाहर कौन है। कोई अजनबी कितना भी ज़ोर देकर कहे मगर दरवाज़ा मत खोलना।"

"आपकी ये बातें सुन कर तो मुझे अब घबराहट होने लगी है वैभव जी।" अनुराधा ने चिंतित भाव से कहा____"आज तक मेरे बाबू जी के हत्यारे का पता नहीं चला। हमारा ये घर वैसे भी गांव से बाहर अलग बना हुआ है जिससे अगर कोई ऐसी बात हुई भी तो जल्दी से कोई हमारी मदद के लिए नहीं आ सकता।"

"फ़िक्र मत करो।" मैंने कहा____"मेरे रहते ऐसी वैसी कोई बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों की सुरक्षा का कोई अच्छा सा इंतजाम कर दूंगा।"

अभी मैं उससे बात ही कर रहा था कि तभी अनुराधा का भाई अनूप दूसरे वाले दरवाज़े से आँगन में दाखिल हुआ। उसे देख अनुराधा जल्दी से मुझसे दूर चली गई। अनूप के पीछे सरोज काकी भी आ गई। थोड़ी देर मैं वहां रुका उसके बाद बुलेट ले कर शहर की तरफ निकल गया। समय आ गया था कुछ अलग करने का और कुछ ज़रूरी काम करने का।

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उस वक़्त शाम ढल चुकी थी।

हमारे गांव से क़रीब तीस किलो मीटर की दूरी पर एक गांव था जिसका नाम था नाहरपुर। नाहरपुर के पास ही एक जंगल था। उस जंगल के बीच में ही वो तांत्रिक अपने परिवार के साथ रहता था जिसके बारे में जगन काका ने पता कर के मुझे बताया था। मैं और जगताप चाचा अपने कुछ आदमियों के साथ जीप में वहां पहुंचे थे। जंगल के अंदर जीप नहीं जा सकती थी इस लिए जीप को बाहर ही खड़ी कर के हम सब जंगल के अंदर की तरफ गए थे। हम सबके हाथों में बड़ी बड़ी बन्दूखें थी जबकि मेरे पास पिता जी द्वारा दिया हुआ रिवाल्वर था। जंगल के बीचो बीच तांत्रिक की एक बड़ी सी कुटिया बनी हुई थी। उस कुटिया के अगल बगल और भी दो कुटिया बनी हुईं थी। हम सब के अंदर बेहद गुस्सा भरा हुआ था, ख़ास कर मेरे अंदर मगर जैसे ही हम सब तांत्रिक की कुटिया के पास पहुंचे तो वहां के वातावरण में गूंजते चीखो पुकार को सुन कर हम सब एकदम से रुक गए थे।

हम लोगों को समझ न आया था कि आख़िर ये चीखो पुकार किस बात का था? एक दो औरतें थी और दो तीन लड़के लड़कियां। सबके सब दहाड़ें मार मार कर रो रहे थे। मुझे किसी बात की आशंका हुई तो मैंने जगताप चाचा को फ़ौरन ही कुटिया के पास पहुंचने को कहा था। जब हम सब वहां पहुंचे तो रोने धोने की आवाज़ और भी तेज़ सुनाई देने लगी। जगताप चाचा ने हमारे एक आदमी को कुटिया के अंदर जा कर पता करने को कहा। आदमी गया और थोड़ी ही देर में उसने बताया कि अंदर एक औरत है जो किसी की लाश के पास बैठी बुरी तरह रो रही है और उसके साथ उसके छोटे बड़े बच्चे भी रोए जा रहे हैं।

हम सब तेज़ी से अंदर दाख़िर हुए। हम लोगों को देख कर उन सबका रोना धोना एकदम से बंद हो गया। जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि किसी ने उसके तांत्रिक पति की हत्या कर दी है। उसकी बात सुन कर जहां जगताप चाचा स्तब्ध रह गए थे वहीं मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों तले से ज़मीन ही गायब हो गई हो। दिलो दिमाग़ कुछ पलों के लिए मानो कुंद सा पड़ गया था। फिर जब ज़हन ने काम करना शुरू किया तो मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात आई कि षड्यंत्रकारियों को शायद पता चल गया होगा कि उनका भेद खुल चुका है इस लिए उन्होंने उस तांत्रिक की भी जान ले ली जिसके द्वारा हम उनके पास पहुंच सकते थे। पलक झपकते ही सारे किए कराए पर पानी फिर गया था। सारी मेहनत और सारी होशियारी बेकार साबित हो गई थी।

जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि सुबह के क़रीब ग्यारह बजे उसका तांत्रिक पति किसी काम के सिलसिले से कुटिया से गया था। जब वो दिन ढलने के बाद भी वापस न आया तो उसने अपने सोलह वर्षीय बेटे को उसका पता लगाने के लिए भेजा था। उसके बाद जब उसका बेटा वापस आया तो उसके साथ में उसका मरा हुआ पति भी था जिसके पेट में किसी तेज़ धार वाले हथियार के कई सारे गहरे घाव थे। उसका बेटा अपने पिता की लाश को बड़ी मुश्किल से बांस की बनाई गई अर्थी में लिटा कर लाया था।

तान्त्रिक की बीवी कोई पचास के आस पास वाली उम्र की औरत थी। उसके चार बच्चे थे। जिनमें से पहले एक पच्चीस वर्षीय शादी शुदा बेटी थी और फिर एक सोलह वर्षीय वही बेटा जो अपने पिता की लाश को ले कर आया था। उसके बाद दो और बच्चे थे जिनमें से एक लड़का और एक लड़की थी। तांत्रिक की बीवी ने बताया कि अभी डेढ़ घंटे पहले ही उसका बेटा अपने पिता की लाश ले कर आया था। बेटे के अनुसार तांत्रिक की लाश जंगल में ही एक जगह पड़ी मिली थी।

मैंने और जगताप चाचा ने उस औरत से ज़्यादातर यही जानने की कोशिश की थी कि तांत्रिक की हत्या किसने की होगी और पिछले कुछ समय से ऐसे कौन से लोग उससे मिलने आए थे। हमारे पूछने पर उस औरत का जवाब यही था कि उसके तांत्रिक पति के पास बहुत से लोग आते थे इस लिए वो ये नहीं बता सकती कि किसने उसके पति की हत्या की होगी। मैं समझ गया था कि अब यहाँ पर हमें ऐसी कोई भी जानकारी नहीं मिल सकती थी जिससे ये पता चल सके कि तांत्रिक को किसने मेरे बड़े भाई और मुझ पर तंत्र क्रिया करने के लिए कहा होगा?

किसी हारे हुए जुआंरी की तरह हम सब वहां से वापस चल पड़े थे। मुझे उम्मीद थी कि हवेली में पिता जी से इस बारे में ज़रूर कुछ ऐसा पता चलेगा क्योंकि वो कुछ आदमियों के साथ कुल गुरु से मिलने गए हुए थे। हम रात के क़रीब आठ बजे हवेली पहुंचे थे। हमें नहीं पता था कि हवेली में एक नया ही काण्ड हुआ देखने को मिलेगा।

पिता जी वापस आ चुके थे। ये देख कर मेरे मन में सब कुछ जानने की ब्याकुलता और उत्सुकता भर गई थी लेकिन जल्दी ही पता चला कि हवेली की एक नौकरानी ने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली है। हवेली में इस बात के चलते बड़ा अजीब सा माहौल छाया हुआ था।

"ये सब कैसे हुआ बड़े भैया?" जगताप चाचा ने उस नौकरानी की लाश को देखते हुए पूछा____"ऐसी क्या बात हुई कि इसने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली?"

"यही तो हमारी समझ में भी नहीं आ रहा जगताप।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"अभी कुछ देर पहले जब हम यहाँ आए तभी हमें पता चला कि ये नौकरानी हवेली के एक कमरे में मेनका को मरी हुई मिली थी।"

"बड़ी हैरत की बात है।" जगताप चाचा ने सोचपूर्ण भाव से कहा____"पर इसने ऐसा क्यों किया होगा? वैसे ये मेनका को कब मिली थी?"

"जब तुम लोग यहाँ से गए थे तब।" पिता जी ने कहा____"किसी काम के लिए जब इसको हवेली में खोजा गया तो ये किसी को नज़र ही नहीं आई थी। तुम्हें तो पता ही है कि कुछ नौकरानियाँ शाम का अपना काम करने के बाद अपने अपने घर चली जाती हैं। मेनका ने बाकी नौकरानियों को भी इसकी खोज में लगाया और खुद भी खोजती रही। काफी खोजबीन के बाद मेनका को ये ऊपर के उस कमरे में मिली जो हमेशा खाली ही रहता है।"

"इसके घर वालों को सूचित किया गया या नहीं?" सहसा मैंने पूछने की हिमाक़त की।

"हवेली में इस तरह इसकी लाश को देख कर सब घबरा गए थे।" पिता जी ने बताया____"इस लिए किसी ने इसके घर वालों तक ख़बर नहीं भेजवाई थी लेकिन अब भेजवाना ही पड़ेगा।"

"हवेली में इस तरह किसी नौकरानी का खुद ख़ुशी कर लेना बहुत सी संगीन बात है पिता जी।" मैंने कहा____"गांव वालों को पता चला तो लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे। गांव के साहूकार तो और भी इस मामले को उछालेंगे। हमें बहुत ही सोच समझ कर इस बारे में कोई काम करना होगा।"

"हमने दरोगा को इत्तिला भेजी है।" पिता जी ने कहा____"वो आएगा और इस मामले की जांच करेगा। जगताप तुम इसके घर वालों तक ख़बर भेजवा दो और उन्हें समझाओ कि ये जो कुछ भी हुआ है उसकी पूरी ईमानदारी से जांच करवाई जाएगी। हालांकि मामला खुद ख़ुशी का है लेकिन ये पता करने की ज़रूर कोशिश की जाएगी कि इसने खुद ख़ुशी क्यों की अथवा इसे खुद ख़ुशी करने पर किसने मजबूर किया था?"

"जो हुकुम बड़े भइया।" जगताप चाचा ने सिर नवा कर कहा और हवेली से बाहर चले गए।

मुझे इस सबकी ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। न तो उस तांत्रिक की इस तरह हत्या हो जाने की और ना ही इस नौकरानी के इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने की। सहसा मुझे उस नौकरानी का ख़याल आया जो उस रात विभोर और अजीत के साथ मज़े कर रही थी। मैंने आस पास नज़र घुमाई लेकिन वो नज़र न आई। मैंने सोचा इस नौकरानी की इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने से कहीं वो भी न कुछ कर बैठे या फिर उसके साथ कोई कुछ कर न दे। मैं फ़ौरन ही अंदर की तरफ भागा और उसकी खोज करने लगा लेकिन वो मुझे नज़र न आई। उसके न मिलने से मेरे मन में तरह तरह की आशंकाए उभरने लगीं और साथ ही ये सोच कर मुझे घबराहट सी भी होने लगी कि अगर वो न मिली या उसके साथ कुछ हो गया तो मेरे हाथ से एक और मौका निकल जाएगा। मैं पागलों की तरह हवेली के ज़र्रे ज़र्रे पर उसे खोज रहा था लेकिन उसे तो मानो मिलना ही नहीं था। अचानक मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि कहीं वो हवेली से खिसक न गई हो। उसने देखा होगा कि एक नौकरानी ने खुद ख़ुशी कर ली है तो उसके मन में भी यही ख़याल आया होगा कि कहीं वो भी पकड़ी न जाए इस लिए मौका देख कर भाग निकली होगी।

मैं फ़ौरन ही हवेली से बाहर निकला। अपने साथ एक आदमी को लिया और तेज़ क़दमों से चलते हुए उस औरत के घर की तरफ चल पड़ा। मैं उसे इस तरह हाथ से नहीं निकल जाने देना चाहता था। अगर उसके साथ कुछ हो गया तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जानी थी। एक वही थी जो मुझे बता सकती थी कि वो कुसुम को किस बात पर मजबूर किए हुए थी या फिर ये कहूं कि विभोर और अजीत उसे कौन सी पट्टियां पढ़ा कर मेरे खिलाफ़ किए हुए हैं?

क़रीब दस मिनट लगे मुझे उस औरत के घर तक पहुंचने में। वो औरत हमारे गांव की ही थी। उसके घर वाले हमारे खेतों में काम करते थे। उसका पति बाहर ही चारपाई पर बैठा मिल गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो जल्दी से चारपाई से उठा और हाथ जोड़ कर सलाम किया। मैंने बिना किसी भूमिका के उससे पूछा कि उसकी बीवी कहां है? वो मेरे पूछने पर थोड़ा घबरा सा गया और बोला कि अभी अभी वो दिशा मैदान के लिए गई है। मैंने उस आदमी से दूसरा सवाल यही पूछा कि दिशा मैदान के लिए वो किस तरफ गई है। उस आदमी के बताने पर मैं अपने आदमी के साथ फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ चला। औरत का पति बुरी तरह डर गया था और उलझन में पड़ गया था। इधर मैं यही सोच रहा था कि रात के साढ़े आठ बजे उस औरत का दिशा मैदान के लिए जाना क्या स्वभाविक हो सकता है या इसके पीछे कोई और वजह हो सकती है? आम तौर पर गांव की औरतें दिन ढले ही दिशा मैदान के लिए निकल जाती थीं।

इसे किस्मत कहिए या इत्तेफ़ाक़ कि मैं अपने आदमी के साथ बिल्कुल सही दिशा में ही आया था क्योंकि वो औरत हल्की चांदनी रात में मुझे कुछ दूरी पर दिख गई थी। वो तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। मैंने अपने आदमी को इशारा किया कि वो भाग कर जाए और उसे पकड़ ले। मेरा हुकुम मिलते ही शम्भू नाम का मेरा आदमी उस औरत की तरफ भाग चला। अपने क़रीब जैसे ही किसी के दौड़ते हुए आने का आभास हुआ तो उस औरत ने पलट कर देखा और बुरी तरह डर कर उसने भागना ही चाहा था कि लड़खड़ा कर वहीं ज़मीन पर गिर गई। जब तक वो सम्हल कर खड़ी होती तब तक शम्भू किसी जिन्न की तरह उसके सिर पर जा खड़ा हुआ था। उसके बाद शम्भू ने उस औरत की कलाई पकड़ी और ज़बरदस्ती खींचते हुए उसे मेरे पास ले आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मानो उस औरत की नानी मर गई।



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Vaibhav abhi daav pench ke is field me kachcha hai lekin aane wale samay me wo bhi ye sab samajh aur seekh jaayega. Haan sahi kaha jungle me huyi taantrik ki hatya se koi suraag milna filhaal asambhav kaarya hi hai :approve:

Aisi hi paristhitiyo se insaan sochne majboor hota hai. Vaibhav aur dada thakur ko ab ye baat clear samajh aa gayi hai ki unke beech hi koi aisa hai jo unki khabar leak karta hai. Ab unke liye mukhya kaarya yahi hai ki us bhediye ka pata lagaye. Well dekhte hain is bare me kya karyawahi karte hain ye log :dazed:

Agree :approve:

Maybe :dazed:

Bahut kuch andhere me hai. Haweli ke andar sirf do hi mohre aise nazar aate hain jo clear roop se vaibhav ke khilaf kuch kar rahe hain...jagtap par shak karna jayaz hai...aur iske kayi reasons bhi ho sakte hain. Well dekhiye kya hota hai :smokin:

Ab ye to vaibhav ki kismat ki hi baat hogi ki wo uski pakad me aa jaye aur uske dwara use kuch pata chal jaaye :D

Vibhor aur ajeet ka to clear hai ki unki gaand todaayi ek din zarur hogi :lol1:

Agree :approve:

Prem prasang hamesha se hi rochak raha hai fir chahe wo kaisa bhi ho. Dono ke beech jo bhi possibilities aapne bataayi hain wo ekdam sahi hain. Well Anuradha ki maa ka character kaisa hai ye samay aane par hi pata chalega :dost:

Agree :approve:

Kahani ki jab aisi khubsurat sameeksha hoti hai to padh kar aisa aanand milta hai jaise ki mujhe likhne par bhi nahi milta. Ek writer hi samajh sakta hai ki aisi sameeksha se kisi bhi writer ko kitna kuch haasil ho jata hai. Death Kiñg you are great bhai, SANJU ( V. R. ) Bhaiya bhi aisi sameeksha nahi kar sakte, hats off you bro 🙇
 
अध्याय - 43

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अब तक....



इसे किस्मत कहिए या इत्तेफ़ाक़ कि मैं अपने आदमी के साथ बिल्कुल सही दिशा में ही आया था क्योंकि वो औरत हल्की चांदनी रात में मुझे कुछ दूरी पर दिख गई थी। वो तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। मैंने अपने आदमी को इशारा किया कि वो भाग कर जाए और उसे पकड़ ले। मेरा हुकुम मिलते ही शम्भू नाम का मेरा आदमी उस औरत की तरफ भाग चला। अपने क़रीब जैसे ही किसी के दौड़ते हुए आने का आभास हुआ तो उस औरत ने पलट कर देखा और बुरी तरह डर कर उसने भागना ही चाहा था कि लड़खड़ा कर वहीं ज़मीन पर गिर गई। जब तक वो सम्हल कर खड़ी होती तब तक शम्भू किसी जिन्न की तरह उसके सिर पर जा खड़ा हुआ था। उसके बाद शम्भू ने उस औरत की कलाई पकड़ी और ज़बरदस्ती खींचते हुए उसे मेरे पास ले आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मानो उस औरत की नानी मर गई।



अब आगे....



शीला नाम की वो नौकरानी मुझे देख कर बुरी तरह डर गई थी। इससे पहले कि वो शंभू की पकड़ से छूट कर भागने की कोशिश करती मैंने शंभू को उसे बेहोश करने को कहा। हट्टे कट्टे शंभू ने मेरे हुकुम का फौरन ही पालन किया। उसने बिजली की सी तेज़ी दिखाते हुए शीला की कनपटी पर एक कराट मारी। परिणामस्वरूप शीला अगले ही पल उसकी बाहों में झूलती नज़र आई। मैंने शंभू से कहा कि इसे फ़ौरन ही अपने कंधे पर लाद कर हमारे बगीचे वाले मकान में ले चले।

कुछ ही समय में हम अपने बगीचे वाले मकान में थे। मकान के एक कमरे में शंभू ने शीला को एक चारपाई पर लेटा दिया। मैं क्योंकि समझ चुका था कि शीला भी उस नौकरानी की ही तरह हमारे दुश्मन का काम कर रही थी इस लिए मैंने शंभू से कहा कि वो शीला की तलाशी ले। मुझे अंदेशा था कि कहीं इसके पास भी कोई ज़हर वगैरा न हो जिसकी वजह से होश में आते ही वो अपनी जान लेने की कोशिश करे। मेरे कहने पर शंभू ने शीला की तलाशी ली लेकिन उसके पास से कुछ भी नहीं मिला। उसके बाद मैंने शंभू से उसको होश में लाने के लिए कहा तो शंभू तेज़ी से बाहर गया और फौरन ही कुएं से बाल्टी में पानी ले आया और उस पानी को शीला के चेहरे पर छिड़कने लगा। जल्दी ही शीला को होश आ गया। मैंने शंभू से कहा कि अब वो बाहर जाए और बाहर से निगरानी रखे।

"मु...मुझे यहां क्यों लाए हैं छोटे ठाकुर?" होश में आते ही शीला बुरी तरह घबराई हुई आवाज़ में बोल पड़ी थी____"क्..क्या आप मेरे साथ कुछ ऐसा वैसा करने वाले हैं?"

"क्या लगता है तुझे?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए सर्द लहजे में कहा____"क्या तू इतनी खूबसूरत है कि तुझे देख कर मेरा ईमान डोल जाएगा? क्या तेरा जिस्म ऐसा है कि विभोर और अजीत की तरह मैं भी तुझे चाटना शुरू कर दूंगा?"

"ये...ये आप क्या कह रहे हैं छोटे ठाकुर?" शीला एकदम से बौखला कर बोली____"देखिए, मैं ऐसी वैसी नहीं हूं। भगवान के लिए मुझे छोड़ दीजिए।"

"तू कैसी है ये मैं अपनी आंखों से देख चुका हूं साली रण्डी।" मैंने ज़ोर से उसके गाल पर थप्पड़ मार कर कहा। थप्पड़ लगते ही वो लड़खड़ा गई थी, और मारे डर के उसके माथे पर पसीना उभर आया था। जबकि मैंने शख़्त लहजे में कहा____"उस रात तू ही थी ना जो सीढ़ियों से नीचे भागते हुए गई थी और जब मैंने तेरा पीछा किया तो तू नीचे कहीं छिप गई थी? उसके बाद दूसरी बार मैंने कुसुम के कमरे से तुम लोगों की सारी बातें सुनी थी जब तू विभोर और अजीत के साथ मज़े कर रही थी।"

"मु...मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे ठाकुर।" मेरी बातें सुनते ही शीला जल्दी से मेरे पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए बोल पड़ी____"मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई है, लेकिन इसमें भी मेरा कोई दोष नही है। वो तो आपके उन दोनों भाइयों ने मुझे अपने जाल में फांस लिया था और मैं भी थोड़े धन के लालच में आ गई थी। भगवान के लिए मुझे इस सबके लिए माफ़ कर दीजिए। मैं क़सम खाती हूं कि आज के बाद ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी।"

"मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि तू विभोर और अजीत दोनों के ही साथ गुलछर्रे उड़ा रही है।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"मुझे सिर्फ ये बता कि तू उन दोनों के कहने पर कुसुम को किस बात पर मजबूर कर रही थी? आख़िर ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते कुसुम चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर हर रोज़ मुझे देने आती है?"

"मु...मुझे कुछ नहीं पता छोटे ठाकुर।" शीला एकदम से हड़बड़ा गई, बोली____"भगवान के लिए मुझ पर यकीन कीजिए।"

"अगर तू सच नहीं बताएगी।" मैंने उसके सिर के बालों को पकड़ कर उठाते हुए कहा जिससे वो दर्द से बिलबिला उठी____"तो तू सोच भी नहीं सकती कि मैं तेरा क्या हाल कर सकता हूं। तुझे शायद पता नहीं है कि कुसुम मेरी बहन ही नहीं बल्कि मेरी जान भी है और कोई उसे किसी तरह से मजबूर कर के दुख दे तो ये मैं किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता। मेरी मासूम बहन को दुख देने वाले को मैं एक पल भी ज़िंदा नहीं रहने दूंगा।"

मेरी बात सुन कर शीला का चेहरा डर और दहशत से पीला ज़र्द पड़ गया था। वो थरथर कांप रही थी। नज़र उठा कर मुझे देखने की भी हिम्मत नहीं थी उसमें। जब काफी देर तक भी वो कुछ न बोली तो मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

"मैं तुझसे आख़िरी बार पूंछ रहा हूं।" मैंने कठोरता से कहा____"मुझे बता कि मेरी बहन को किस बात पर इतना मजबूर करती है कि वो मुझे चाय में नामर्द बना देने वाली दवा मिला कर पिलाने पर मजबूर हो जाती है? बता वरना तुझे नंगा कर के पूरे गांव में दौड़ाऊंगा और अपनी जिस चूंत पर तू विभोर और अजीत का लंड लेती है न उसमें लोहे का गरमा गरम सरिया डाल दूंगा।"

"अ...अगर मैंने आपको इस बारे में कुछ बताया तो वो लोग मुझे जान से मार देंगे।" शीला ने रोते हुए कहा____"भगवान के लिए मुझ पर दया कीजिए। मैं क़सम खाती हूं कि अब से ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी। आप कहेंगे तो मैं ये गांव ही छोड़ कर चली जाऊंगी।"

"तेरे जैसी घटिया औरत को ज़िंदा रहने का कोई हक़ नहीं है।" मैंने गुस्से में दांत पीसते हुए कहा____"अब तक तूने जो पाप किए हैं उसका प्रायश्चित यही है कि तू मुझे सब कुछ सच सच बता दे। अगर नही बताएगी तो यहां से भी तू ज़िंदा नहीं जा पाएगी।"

मेरी बात सुन कर शीला ने बेबसी का घूंट पिया और अपने आंसू पोंछने लगी। उसके चेहरे के बदलते भावों से ऐसा ज़ाहिर हुआ मानों वो कोई फ़ैसला कर रही हो। जितना वो बताने में देरी कर रही थी उतना ही मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था जिसे मैं बड़ी मुश्किल से रोके हुए था।

"ठ..ठीक है छोटे ठाकुर।" फिर उसने लरज़ते स्वर में कहा____"मैं आपको सब कुछ बताऊंगी लेकिन क्या फिर आप मुझे यहां से जाने देंगे?"

"पहले तू मुझे सब कुछ सच सच बता।" मैंने गुस्से से कहा____"तेरी बातें सुनने के बाद ही मैं सोचूंगा कि मुझे तेरे साथ क्या करना है।"

"ये बात तब की है जब आपको दादा ठाकुर ने गांव और समाज से बहिष्कृत कर के निकाल दिया था।" शीला ने गहरी सांस लेते हुए कहा_____"आपको इस तरह निकाले जाने से हवेली में लगभग सभी दुखी थे, खास कर आपकी लाडली बहन कुसुम। दिन ऐसे ही गुज़र रहे थे और गुज़रते समय के साथ सब कुछ सामान्य होता जा रहा था। आपकी बहन से मिलने उनकी कुछ सहेलियां हवेली आती थीं और वो घंटों कुसुम जी के कमरे में रहती थीं। आपके दोनों चचेरे भाई कुसुम जी की उन सहेलियों को भोगना चाहते थे लेकिन डर की वजह से उनका मंसूबा पूरा नहीं हो पा रहा था। मैं जो कि पहले से ही उनकी दासी बनी हुई थी इस लिए मैं उनके मंसूबों से अंजान नहीं थी। मैंने सोचा कि अगर मैं उन दोनों का काम कर दूं तो शायद वो खुश हो कर मुझे और भी रुपया पैसा देंगे। ये सोच कर मैं कुसुम जी पर नज़र रखने लगी। जब भी उनकी सहेलियां उनसे मिलने आतीं तो मैं चुपके से उनके कमरे के पास पहुंच जाती और ये जानने समझने की कोशिश करती कि अंदर कमरे में वो क्या बातें करती हैं। यूं तो मुझे इस तरह से कोई फ़ायदा नही हो रहा था लेकिन अचानक से एक दिन मुझे कुछ ऐसा पता चला जो मेरे लिए चकित कर देने वाला था।"

"ऐसा क्या पता चला था तुझे?" मैं उससे पूंछे बगैर न रह सका था।

"दिन के समय आपके दोनों चचेरे भाई और आपके बड़े भाई साहब हवेली में नहीं रहते थे।" शीला ने बताना शुरू किया____"शायद यही वजह थी कि उन लोगों को ऐसा कुछ करने की हिम्मत हुई थी। उस दिन जब कुसुम जी की सहेलियां उनसे मिलने आईं तो मैं भी कुछ देर बाद सबकी नज़र बचा कर ऊपर उनके कमरे के पास पहुंच गई और दरवाज़े से कान लगा कर उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगी। असल में उनकी बातें सुनने का मेरा सिर्फ़ यही मतलब था कि मैं जान सकूं कि कुसुम जी की सहेलियां हवेली के सभी लड़कों के बारे में किस तरह की बातें करती हैं? अगर बातें करती हैं तो ये मेरे लिए अच्छी बात होती क्योंकि उस सूरत में में सीधे उनसे बात कर सकती थी या फिर उन्हें आपके दोनों चचेरे भाईयों के लिए तैयार कर सकती थी। ख़ैर, मैं दरवाज़े पर कान लगाए अंदर की बातें सुनने लगी थी। तभी मुझे अंदर से ऐसी आवाज़ें सुनाई दीं जिन्हें सुन कर पहले तो मुझे यकीन न हुआ लेकिन फिर जब आवाज़ें अनवरत आती ही रहीं तो मैं बुरी तरह आश्चर्य चकित रह गई। मैं कुसुम जी को बहुत ही सीधी सादी और शरीफ़ लड़की समझती थी जबकि कमरे के अंदर से जिस तरह की आवाज़ें आ रही थीं उससे मैं हैरान हो गई थी। आवाज़ों से साफ था कि अंदर कमरे में कुसुम जी अपनी दोनों सहेलियों के साथ एक अनोखे सुख का आनंद ले रहीं थी। जिसके चलते उनके मुख से आनन्द भरी आहें और सिसकियां निकल रही थीं। मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि कुसुम जैसी शरीफ़ लड़की अपनी सहेलियों के साथ ऐसा करने का सोच भी कैसे सकती है? पर क्योंकि मैं ये समझती थी कि ऐसा इस उमर में होता ही है। मैं ये भी समझ गई थी कि ऐसे आनंद का ज्ञान ज़रूर उनकी सहेलियों ने ही उन्हें दिया होगा। ख़ैर, बाहर खड़े हो कर सुनने से मेरे मन में अब ये देखने की उत्सुकता जाग गई कि कमरे के अंदर वो किस तरह से इस तरह का आनंद ले रही होंगी? उनके कमरे में कोई खिड़की तो थी नहीं जिससे मैं उन्हें देख पाती, लेकिन सहसा मैं उस वक्त चौंकी जब अंजाने में ही मेरा हाथ लग जाने से कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुल गया। मैं ये देख कर हैरान हुई कि उन्होंने कमरे का दरवाज़ा तक अंदर से बंद नहीं किया था। शायद उस स्वर्गिक आनंद को पाने की उनमें इतनी जल्दी रही होगी कि वो दरवाज़े को अंदर से बंद करना ही भूल गईं थी। अंजाने में ही मेरा हाथ दरवाज़े पर लग गया था और वो थोड़ा सा खुल गया था। कमरे के अंदर वो सब आनंद में डूबी हुईं थी इस लिए उन्हें दरवाज़ा खुलने का कोई आभास ही नहीं हो पाया था। ख़ैर, मैंने सतर्कता से उस थोड़े से खुले दरवाज़े से अंदर की तरफ देखने की कोशिश की लेकिन ठीक से कुछ दिखा नहीं तो मैंने सावधानी पूर्वक दरवाज़े को थोड़ा और ढकेल कर खोल दिया। दरवाज़ा लगभग आधा खुल चुका था इस लिए मुझे अंदर देखने में कोई परेशानी नहीं हुई। मैंने पूरी सतर्कता से जैसे ही अंदर देखा तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। कमरे के अंदर कुसुम जी पलंग पर पूरी तरह नंगी लेटी हुईं थी और उनकी दोनों सहेलियां उनके ऊपर झुकी हुईं थी। दोनों सहेलियों के संगमरमरी जिस्मों पर सिर्फ़ काली और लाल रंग की कच्छियाँ थी। एक सहेली कुसुम जी की छाती पर झुकी हुई थी और दूसरी सहेली उनकी टांगों के बीच में। पलंग पर लेटी कुसुम जी बुरी तरह मचल उठतीं थी और उनके मुख से आनन्द में डूबी सिसकियां निकल पड़ती थीं। कमरे के अंदर पलंग पर जो कुछ हो रहा था उसे देख कर मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन उस सच पर भला मैं कब तक यकीन न करती?"

"तो सिर्फ़ इस वजह से तुम कुसुम को मजबूर किए हुए थी?" मैं अपनी बहन के बारे में ये सब सुन कर अंदर ही अंदर बेहद चकित था, मगर क्योंकि वो मेरी लाडली बहन थी इस लिए उसके बारे में ऐसी बातें मैं और ज्यादा सुनना नहीं चाहता था इस लिए बीच में ही बोल पड़ा था____"और क्या तुमने ये सब बातें विभोर और अजीत को भी बताई थी?"

"पहले तो ये सब उनसे बताने की मुझमें हिम्मत ही नहीं हो रही थी क्योंकि मुझे डर था कि अपनी बहन के बारे में ऐसी बातें सुन कर कहीं वो मुझ पर गुस्सा ही न हो जाएं।" शीला ने एक लंबी सांस ले कर कहा_____"लेकिन फिर ये सोच कर बताने का सोचा कि इस तरह में कुसुम जी की दोनों सहेलियों को उन्हें भोगने का बेहतरीन अवसर भी तो मिल जायेगा। ख़ैर उससे पहले ये सुनिए कि उस दिन आगे क्या हुआ। वो तीनों अपनी मस्ती और अपने आनंद में मगन थीं, लेकिन मुझे इस बात का एहसास था कि मैं ज़्यादा देर तक वहां नहीं ठहर सकती थी क्योंकि आपकी भाभी जी कभी भी आ सकतीं थी। मैंने फ़ौरन ही उन तीनों के सिर पर गाज गिराने का सोचते हुए दोनों हाथों से ज़ोर ज़ोर से ताली बजाना शुरू कर दिया। ताली बजने की आवाज़ से उन तीनों पर सच मुच में ही गाज गिर पड़ी थी। तीनों की तीनों ही बुरी तरह उछल पड़ीं थी। पलक झपकते ही उन तीनों की हालत ऐसी हो गई थी मानों उन तीनों के जिस्म में प्राण ही न रह गए हों। चेहरे एकदम सफ़ेद पड़ गए थे। काफी देर तक तो उन्हें अपनी नग्नता का आभास तक न हुआ लेकिन मैंने जैसे ही ये कहा कि ये सब यहां क्या हो रहा है तो उन तीनों में जैसे पलक झपकते ही जान आ गई। उसके बाद वो जल्दी जल्दी अपने अपने कपड़े पहनने लगीं। कुसुम जी तो इतनी घबरा गईं थी कि उन्होंने पलंग पर बिछी चादर को ही अपने ऊपर डाल लिया था। चेहरे पर डर, घबराहट और शर्मिंदगी के भाव गर्दिश करते हुए नज़र आ रहे थे। उनकी दोनों सहेलियां तो फ़ौरन ही अपने अपने कपड़े पहन कर कमरे से निकल कर भाग गईं थी लेकिन कुसुम जी में इतनी हिम्मत ही ना बची थी कि वो अपनी जगह से हिल डुल भी सकें। मुझे उनकी उस हालत पर मन ही मन मज़ा तो बहुत आया लेकिन फिर तरस भी आया। उधर कुसुम जी मुझसे नज़रें नहीं मिला पा रहीं थी। कुछ ही पलों में उनके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए मानों अभी रो देंगी। मेरी आत्मा तो चीख चीख कर कह रही थी कि उस मासूम को उस हालत में छेड़ना ठीक नहीं है लेकिन क्योंकि मुझे धन का लालच था इस लिए मैंने ऐसे मौके को हाथ से गंवाना भी उचित नहीं समझा। मैं जैसे ही उनकी तरफ बढ़ने लगी तो वो और भी ज़्यादा उस चादर में सिमटने लगीं लेकिन मुझे उनकी कोई परवाह नहीं थी। उनके पास पहुंच कर मैंने उनसे सिर्फ इतना ही कहा कि क्या हो अगर आपके इस खूबसूरत खेल के बारे में हवेली में किसी को पता चल जाए, खास कर उनके अपने दोनों भाईयों को? मैं जानती थी कि उनके दोनों भाई अक्सर उनको डांटते रहते थे। ख़ैर मेरी ये बात सुन कर कुसुम जी के चेहरे का रंग ही उड़ गया। बुरी तरह घबरा गईं वो। कुछ कहने के लिए उनके होंठ कांपे तो ज़रूर लेकिन होठों से कोई लफ्ज़ खारिज़ न हो सका। मुझे लगा कि ऐसी हालत में अगर मैंने उनको कुछ और भी कहा तो शायद कोई अनर्थ जैसी बात न हो जाए। इस लिए मैं मुस्कुराते हुए वापस पलटी और दरवाज़े की तरफ बढ़ चली। ये उनके अंदर समाया हुआ डर ही था कि वो हिम्मत जुटा कर जल्दी से ही बोल पड़ीं थी_____'र...रु...रुको।' उनके ऐसा कहने पर मैं अपनी जगह पर रुक गई थी लेकिन उनकी तरफ पलटी नहीं। मैं जानती थी कि अब वो इस सबके बारे में किसी से न कहने के लिए मुझसे मिन्नतें करेंगी और अगले ही पल ऐसा हुआ भी। जब उन्होंने डरे सहमे हुए भाव से इस बारे में किसी से कुछ न बताने के लिए मुझसे कहा तो इस बार मैंने पलट कर उनकी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए कहा____'ठीक है, मैं किसी को भी इस बारे में नहीं बताऊंगी लेकिन इसके लिए उनको भी एक कीमत चुकानी पड़ेगी। कीमत की बात सुन कर उनके चेहरे पर जल्दी ही राहत और खुशी के भाव उभर आए, कहा____'तुम्हें अपना मुंह बंद रखने के लिए जितना पैसा लेना हो ले लो लेकिन इस बारे में कभी किसी से कुछ मत कहना।' उनकी भोली और लुभावनी बात पर मैं ये सोच कर मुस्कुराई कि ये भी अपने दोनों भाईयों की तरह हर चीज़ की कीमत धन से ही चुकाने की बात करती हैं जबकि उनको तो ख़्वाब में भी ये उम्मीद नहीं हो सकती कि कीमत के रूप में मैं उनसे क्या मांगने वाली थी?"

शीला बोलते हुए एकदम से चुप हो गई और गहरी गहरी सांसें लेने लगी। मुझे उसकी बातें सुन कर उस पर ये सोच कर गुस्सा आ रहा था कि वो मेरी बहन के साथ कैसा गंदा खेल खेल रही थी। ख़ैर, मैंने अपने गुस्से को किसी तरह सम्हाला और उसके आगे बोलने का इंतज़ार करने लगा।

"मैंने कुसुम जी से कहा कि मुझे उनसे ना तो धन चाहिए और ना ही कोई रुपया पैसा।" शीला ने एक बार फिर से बताना शुरू किया____"अगर वो चाहती हैं कि मैं उनके ऐसे कृत्य के बारे में किसी को कुछ भी न बताऊं तो उन्हें इसके लिए अपनी उन दोनों सहेलियों से ये कहना होगा कि वो दोनों उनके दोनों भाईयों को संभोग का सुख दें। मेरी ये बात सुन कर कुसुम जी के चेहरे का रंग एक बार फिर से उड़ गया। काफी देर तक उनके मुख से कोई अल्फाज़ न निकला। इधर मैंने एक बार फिर से अपनी बात दोहरा दी, वो भी कुछ इस अंदाज़ और लहजे में कि कुसुम जी के पास अब मेरी बात को मान लेने के सिवा कोई चारा ही ना रह जाए। कुसुम जी बुरी तरह फंस चुकीं थी। उनके जैसी लड़की अपनी इज्ज़त को बचाने की ख़ातिर अब शायद कुछ भी कर सकती थी। मैंने भी उन्हें समझाया कि इसके लिए उन्हें कोई समस्या नहीं होगी क्योंकि वो अपनी सहेलियों से कह सकती हैं कि अगर वो ऐसा नहीं करेंगी तो ये उनके लिए भी अच्छा नहीं होगा। उस दिन मैं बेहद खुश थी कि चलो आपके दोनों चचेरे भाईयों के लिए दो कोरी लड़कियों का जुगाड़ कर दिया मैंने जिसके लिए यकीनन वो दोनों मुझे अच्छी खासी कीमत भी देंगे। मैंने कुसुम जी को समझा दिया था कि इसमें उनका कहीं नाम नहीं आएगा और ना ही उनके दोनों भाईयों को उनके ऐसे कृत्य का पता चलेगा। ख़ैर शाम को जब आपके दोनों चचेरे भाई आए तो मैं खुशी खुशी उनके कमरे में पहुंच गई और उनसे कहा कि मैंने आज उनके लिए दो कोरी लड़कियों का मस्त इंतजाम कर दिया है। औरत के जिस्म के भूखे आपके दोनों चचेरे भाई मेरी ये बात सुन कर बेहद खुश हुए और पूछने लगे कि ऐसी कोरी लड़कियां कब ला रही हूं मैं उनके हरम में? मैंने उनसे झूठ मूठ का कहा कि इसके लिए उन्हें थोड़ा धन ज़्यादा देना पड़ेगा क्योंकि वो दोनों लड़कियां धन के लालच में ही उनके नीचे लेटने के लिए और उनको खुश करने के लिए तैयार हुई हैं। उन्हें भला इससे क्या आपत्ति होनी थी इस लिए फ़ौरन ही रुपया पैसा देने को तैयार हो गए। मैं इस सबसे इतना खुश थी कि मैंने उन्हें बिना रुके सारी कहानी ही बता दी। होश तो मुझे तब आया जब एकदम से वो दोनों मुझ पर गुस्से से चिल्ला पड़े। मैं एकदम से सहम गई, और मुझे अपनी भारी ग़लती का एहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे सपने में देखा गया ढेर सारा रुपया पैसा आंख खुलते ही पल भर में गायब हो गया हो। मैं सिर झुकाए खड़ी ही थी कि सहसा अगले ही पल चमत्कार हो गया। उन दोनों के द्वारा खी खी कर हंसने की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी थी। मैं मूर्खों की तरह उन्हें देखने लगी थी, जबकि उन्होंने कहा कि पहली बार तुमने कोई अच्छा काम किया है। उसके बाद इसी खुशी में दोनों ने मेरे साथ जी भर के संभोग किया और फिर मुझे जाने को कह दिया। दो चार दिन वो दोनों जाने कहां व्यस्त रहे। एक दिन उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया और कहा कि मैंने उस दिन जिन दो कोरी लड़कियों के इंतजाम की बात कही थी उन्हें बगीचे वाले मकान में बुलाओ। उनकी ये बात सुन कर मैंने हां में सिर हिलाया और फिर कुसुम जी के पास पहुंच गई। कुसुम जी मुझे देखते ही घबरा गईं। मैंने उनसे कहा कि वो अपनी उन दोनों सहेलियों से कहें कि आज उन्हें बगीचे वाले मकान में जा कर उनके दोनों भाईयों को खुश करना है। कुसुम जी इस बात से भारी कसमकस में पड़ गईं लेकिन उनके पास ऐसा करने के सिवा कोई चारा नहीं था इस लिए उन्होंने बेबस भाव से हां में सिर हिलाया और अपनी सहेलियों के घर चली गईं। उसके बाद वही हुआ जैसा होना तय हो गया था। आपके दोनों चचेरे भाईयों ने कुसुम जी की दोनों सहेलियों के साथ बगीचे वाले मकान में संभोग का खूब आनंद लिया। उसके बाद तो ये क्रम ऐसा चला कि फिर रुका ही नहीं। जब भी उनका मन होता तब वो मुझसे कहते और मैं जा कर कुसुम जी से कहती। कुसुम जी अपनी इज्ज़त और मर्यादा को बचाए रखने के ख़ातिर वो सब करने को मजबूर थीं। मुझे क्योंकि इसके लिए खूब रुपए पैसे मिल रहे थे इस लिए मैंने भी कभी ये सोचने की कोशिश नहीं की थी कि इस सबसे कुसुम जी के दिलो दिमाग़ पर क्या असर पड़ रहा होगा। आपके दोनों चचेरे भाइयों ने भी इस बारे में कभी कुछ सोचना ज़रूरी नहीं समझा। वो ये जानते थे कि एक तरह से उनके लिए उन लड़कियों का इंतजाम उनकी अपनी ही बहन कर रही है लेकिन उन्हें जैसे इससे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था। समय ऐसे ही गुज़रता रहा और फिर एक दिन आप भी वापस हवेली आ गए। आपके आ जाने से आपके वो दोनों भाई काफी ज़्यादा असहज हो गए और उनका ये पसंदीदा खेल मजबूरीवश रुक गया। सबकी तरह मैं भी जानती थी कि वो दोनों आपसे बहुत डरते हैं और आपको ज़रा भी पसंद नहीं करते हैं। आपको वापस हवेली आए एक हफ्ता भी न हुआ था कि एक दिन आपके उन दोनों भाईयों ने मुझे फिर बुलाया और कहा कि इस बार मैं कुसुम को एक खास काम के लिए मजबूर करूं। उनकी ये बात मुझे बिलकुल भी समझ नहीं आई थी। मेरे पूछने पर उन्होंने विस्तार से बताया कि मैं उनकी बहन कुसुम जी से ये कहूं कि जब वो आपके लिए चाय ले कर जाएं तो वो पहले उस चाय में एक दवा मिला लिया करें। जब मैंने कुसुम जी से इस बारे में बात की तो उन्होंने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया। मैंने उन्हें कठोरता से समझाया कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो मैं उनकी करतूत के बारे में उनके उसी भाई को जा कर बता दूंगी जो भाई उन्हें अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करता है। मैंने उन्हें समझाया कि सोचो उस सूरत में क्या होगा? अपनी जिस बहन को वो दुनिया की सबसे अच्छी लड़की समझते हैं उसके बारे में ये सब जान कर उन्हें कैसा लगेगा और क्या खुद वो इस सबके बाद अपने उन भाई से नज़र मिला पाएंगी? मेरी बातों ने कुसुम जी के मानों प्राणों का हरण कर लिया था। अचानक ही उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। रोते हुए बोली कि आख़िर मेरे उस कृत्य के लिए मुझे और कितना जलील होना पड़ेगा और किस हद तक ऐसे गिरे हुए काम करने पड़ेंगे जिसकी वजह से उसकी आत्मा तक ज़ख्मी हो जाए? देर से ही सही लेकिन कुसुम जी एक बार फिर से वो सब करने के लिए मजबूर हो गईं। जब उन्हें पता चला कि चाय में मिलाने वाली दवा असल में उनके सबसे अच्छे वाले भाई को नामर्द बना देने वाली है तो वो मेरे पैरों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं कि ऐसा भयंकर पाप वो हर्गिज़ नहीं करेंगी, भले ही इसके बदले उन्हें अपनी इज्ज़त के हज़ारों टुकड़े कर के पूरे गांव में फेंक देने पड़ें। उनकी ये बातें सुन कर मुझे लगा कि अगर ऐसा हुआ तो सबसे ज़्यादा नुकसान मेरा ही हो जाएगा क्योंकि भारी रकम के रूप में मिलने वाला रुपया पैसा मुझे एकदम से मिलना बंद हो जाएगा। ये सब सोच कर मैंने उन्हें समझाया कि भावनाओं में बह कर ऐसी बातें कहने का कोई फ़ायदा नहीं है बल्कि ठंडे दिमाग़ से सोचने वाली बात है। उन्हें सोचना चाहिए कि जिनकी नज़र में वो पाक साफ़ हैं और जो उन्हें अपनी पलकों पर बिठा के रखते हैं वो उनकी ऐसी करतूत के बारे में जान कर क्या क्या सोचने लगेंगे। उस दिन कुसुम जी को इस बात के लिए राज़ी करना मेरे लिए काफी मुश्किल काम रहा लेकिन आख़िर वो ऐसा काम करने को राज़ी हो ही गईं जिस काम के करने से यकीनन उनकी आत्मा तक ज़ख्मी हो जाने वाली थी। बस, उसके बाद ऐसा ही होने लगा। उन्हें स्पष्ट रूप से हिदायत दी गई थी कि वो आपको इस बारे में कुछ न बताएं कि जो चाय आप पीते हैं उसमें नामर्द बनाने वाली दवा मिली हुई होती है। उन्हें ये भी समझा दिया गया था कि उन पर हर पल नज़र रखी जाएगी।"

मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा शीला नाम की ये नौकरानी हरामन निकली थी। सारा किस्सा बताने के बाद वो सिर झुका कर चुप हो गई थी। मेरा मन कर रहा था कि उसे इस सबके लिए ऐसी भयानक सज़ा दूं कि वो ऐसा करने के बारे में अगले कई जन्मों तक न सोच सके। वो मेरी मासूम बहन को इतने समय से मजबूर किए हुए थी और मेरी बहन मुझे नामर्द बना देने वाली दवा चाय में मिला कर पिलाने पर मजबूर थी। मैं अच्छी तरह महसूस कर सकता था कि इसके लिए उस पगली ने अपने दिल को कितनी मुश्किल से पत्थर का बनाया रहा होगा। मैं ये भी महसूस कर सकता था कि इसके लिए वो अकेले में कितना रोती रही होगी। उसके अपने भाइयों ने उससे क्या क्या करवा लिया था। अपनी सहेलियों के साथ इस तरह का कृत्य करना कोई गुनाह नहीं था, कोई पाप नही था। दुनिया का हर व्यक्ति इस उमर में ऐसा काम करता है, उसने अगर किया तो कौन सा ग़लत किया था? अब मुझे समझ आया कि क्यों वो मुझे इस सबके बारे में बता नहीं रही थी। वो किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहती थी कि उसकी ऐसी करतूत जान कर मैं उसके बारे में ग़लत सोचने लगूं। वो मेरी भोली भाली और मासूम बहन थी और मेरी नज़रों में वो वैसी ही बनी रहना चाहती थी।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि सहसा बाहर कुछ आवाज़ों को सुन कर मैं चौंका। ऐसा लगा जैसे कुछ बज रहा हो और साथ ही कुछ अजीब सी आवाज़ें भी थीं। मैं फ़ौरन ही दरवाज़ा खोल कर बाहर आया। हल्की चांदनी रात में बाहर मुझे जो कुछ दिखा उसे देख कर मैं बुरी तरह चौंका। बाहर दो काले नकाबपोश आपस में भिड़े हुए थे और उनके साथ भिड़ा हुआ था शंभू। यूं तो शंभू खुद भी हट्टा कट्टा आदमी था किंतु उन दो नकाबपोशों के मुकाबले वो कमज़ोर सा ही नज़र आया। मैंने महसूस किया कि जैसे ही शंभू उन दोनों के बीच हमले में कूदता था वैसे ही उन दो नकाबपोशों में से कोई न कोई उसको बड़ी दक्षता से किसी न किसी दांव के द्वारा दूर गिरा देता था। मैं समझ गया कि उन दो में से एक नकाबपोश मेरी सुरक्षा करने वाला पिता जी का कोई रहस्यमई आदमी था जबकि दूसरा नकाबपोश वही था जिसकी हमें तलाश थी। दोनों में से कोई भी कमज़ोर होता नहीं दिख रहा था। मेरे पास पिता जी का दिया हुआ रिवॉल्वर था लेकिन समस्या ये थी कि मैं उसका उपयोग नहीं कर सकता था। ऐसा इस लिए क्योंकि उनमें से मेरी सुरक्षा करने वाला नक़ाबपोश कौन था ये मुझे खुद नहीं पता था। दोनों के ही जिस्मों पर एक जैसा ही काला कपड़ा और नक़ाब था।

वो दोनों एक दूसरे पर लट्ठ का प्रहार कर रहे थे लेकिन लट्ठ किसी के जिस्म पर नहीं लग रहा था। दोनों किसी न किसी तरह एक दूसरे के प्रहार को अपने लट्ठ से रोक ही लेते थे। ये सब देख कर मैं असमंजस में पड़ गया था और सोचने लगा था कि मुझे इस हालत में क्या करना चाहिए? वैसे सवाल तो ये भी था कि दूसरा नकाबपोश यहाँ किस लिए आया था? क्या मुझे मारने के लिए या फिर शीला को.....। ओ तेरी, शीला का नाम ज़हन पर आते ही मेरे मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी। मुझे याद आया कि वो भी तो षड्यंत्रकारियों के हाथ की कठपुतली थी। मैं तेज़ी से पलटा और कमरे के खुले हुए दरवाज़े के अंदर की तरफ देखा मगर मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि अंदर शीला नहीं थी। ज़हन में सवाल कौंधा कि ये अचानक से कहां गायब हो गई? मैंने शंभू को आवाज़ दी और शीला के भाग जाने की बात उसको बताई। शंभू जल्दी ही मेरे पास आया। मैंने देखा उसके माथे से खून बह रहा था। ज़ाहिर है उन दो नकाबपोशों में से किसी ने उसको चोट पहुंचाई थी। मैंने शंभू को हुकुम दिया कि वो शीला को खोजे। मेरा हुकुम मिलते ही शंभू तेज़ी से एक तरफ दौड़ गया। उसके जाते ही मैं भी दूसरी तरफ तेज़ी से भागा।

शीला से मुझे इस तरह भाग निकलने की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। मैं हैरान था कि वो कितनी होशियारी से भाग निकली थी। चारो तरफ बगीचे के पेड़ पौधे थे जिसके चलते चांद की रोशनी कम थी। अंधेरे का फ़ायदा उठा कर शीला जाने किस तरफ निकल गई थी? मैं पागलों की तरह उसको इधर उधर खोज रहा था लेकिन वो कहीं नज़र ही नहीं आ रही थी। नज़र आती भी कैसे, उसे तो मुझसे छिप कर ही भागना था। अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी वातावरण में एक हृदयविदारक चीख गूंजी। ऐसा लगा जैसे किसी का गला चीर दिया गया हो। मैं जिस तरफ था उसके बाएं तरफ से चीख की ये आवाज़ आई थी। मैं तेज़ी से उस तरफ भागा। ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर भागने से आवाज़ हो रही थी। जल्दी ही मैं उस तरफ पहुंचा जहां से चीखने की आवाज़ आई थी। हल्के अंधेरे में ऐसा लगा जैसे किसी ने किसी को धक्का दिया हो जिससे कोई इंसानी आकृति लहरा कर कच्ची ज़मीन पर भरभरा कर जा गिरी थी। धक्का देने वाला फ़ौरन ही भागा, क्योंकि उसके भागने की आवाज ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों से स्पष्ट आई थी। मैंने जोर से शंभू को पुकारा और तेज़ी से उस तरफ भागा।

क़रीब पहुंचा तो देखा शीला ज़मीन पर लुढ़की पड़ी थी। मैंने झुक कर देखा, उसके गले से भल्ल भल्ल कर के खून बहता हुआ वहीं ज़मीन पर फैलता जा रहा था। शीला के जिस्म में कोई हलचल नहीं हो रही थी। मैंने ये सोच कर ज़मीन पर गुस्से में आ कर ज़ोर से अपना हाथ पटका कि दुश्मन ने कितनी आसानी से मेरे हाथ से अपना शिकार छीन कर उसका शिकार कर लिया था और मैं कुछ न कर सका था। अभी तो मुझे शीला से और भी बहुत कुछ जानना था। कुछ ही पलों में शंभू और मेरी रक्षा करने वाला नकाबपोश आ गए। मैंने दोनों को गुस्से में ही हुकुम सुनाया कि इस औरत का हत्यारा उस तरफ को भागा है इस लिए उसे खोजो। हुकुम मिलते ही शंभू तो उस तरफ को तेज़ी से दौड़ गया मगर नकाबपोश अपनी जगह से हिला तक नहीं। मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखा और कहा____"तुमने सुना नहीं मैंने क्या कहा है?"

"मैंने अच्छी तरह सुना है छोटे ठाकुर।" उसने अजीब सी आवाज़ में कहा____"लेकिन मेरा काम उसके पीछे जा कर उसको खोजना नहीं है बल्कि तुम्हारी सुरक्षा करना है। मैं तुम्हें यहां पर अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाला।"

मैं जानता था कि उसे मेरे पिता जी से ऐसा ही करने का हुकुम मिला था इस लिए गुस्से का घूंट पी कर रह गया। क़रीब दस मिनट बाद शंभू आया। वो बुरी तरह हांफ रहा था। आते ही उसने मुझसे कहा कि पता नहीं वो नकाबपोश कहां गायब हो गया। मुझसे कुछ दूरी पर खड़े जब एक दूसरे नकाबपोश पर उसकी नज़र पड़ी तो वो चौंका। मैंने शंभू को शांत रहने को कहा और ये भी कि वो शीला के घर में जा कर उसके पति को बता दे कि उसकी बीवी का किसी ने क़त्ल कर दिया है।



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अध्याय - 44

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अब तक....

"मैंने अच्छी तरह सुना है छोटे ठाकुर।" उसने अजीब सी आवाज़ में कहा____"लेकिन मेरा काम उसके पीछे जा कर उसको खोजना नहीं है बल्कि तुम्हारी सुरक्षा करना है। मैं तुम्हें यहां पर अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाला।"




मैं जानता था कि उसे मेरे पिता जी से ऐसा ही करने का हुकुम मिला था इस लिए गुस्से का घूंट पी कर रह गया। क़रीब दस मिनट बाद शंभू आया। वो बुरी तरह हांफ रहा था। आते ही उसने मुझसे कहा कि पता नहीं वो नकाबपोश कहां गायब हो गया। मुझसे कुछ दूरी पर खड़े जब एक दूसरे नकाबपोश पर उसकी नज़र पड़ी तो वो चौंका। मैंने शंभू को शांत रहने को कहा और ये भी कि वो शीला के घर में जा कर उसके पति को बता दे कि उसकी बीवी का किसी ने क़त्ल कर दिया है।

अब आगे....

मैं थका हुआ सा और कुछ हारा हुआ सा हवेली पहुंचा। शंभू तो मेरे साथ ही बगीचे से आया था लेकिन मेरी सुरक्षा करने वाला वो नकाबपोश जाने कब गायब हो गया था इसका मुझे पता ही नहीं चला था। शीला की इस तरह हत्या हो जाएगी इसकी मुझे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी। मेरी नज़र में एक वही थी जो षड्यंत्रकारियों तक मुझे पहुंचा सकती थी लेकिन उसकी हत्या हो जाने से मानों फिर से हमारे लिए मुश्किलें खड़ी हो गईं थी। ख़ैर अब भला क्या हो सकता था।

हवेली में पहुंचा तो देखा धनंजय नाम का दारोगा अपने दो तीन हवलदारों के साथ आया हुआ था। जिस नौकरानी ने ज़हर खा कर खुद खुशी की थी वो उसकी जांच कर चुका था और अब उसे पोस्टमार्टम के लिए भेजने वाला था। कुछ ही देर में उन हवलदारों ने रेखा नाम की उस नौकरानी की लाश को जीप में लादा और दारोगा के आदेश पर चले गए। उनके जाने के बाद दारोगा पिता जी के साथ उस कमरे की तरफ फिर से चल पड़ा था जिस कमरे में रेखा को मेनका चाची ने मृत अवस्था में देखा था। मैं उनके साथ ही था इस लिए देख रहा था कि कैसे वो दारोगा कमरे की बड़ी बारीकी से जांच कर रहा था। कुछ ही देर में उसे कमरे के एक कोने में एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा पड़ा हुआ मिला जिसे उसने एक चिमटी की मदद से बड़ी सावधानी से उठाया और अपनी जेब से एक छोटी सी पन्नी निकाल कर उस कागज़ को उसमें सावधानी से डाल दिया।

जब तक हम सब वापस बैठक में आए तब तक जगताप चाचा भी आ गए थे। उनके साथ में रेखा के घर वाले भी थे जो बेहद ही दुखी लग रहे थे। ज़ाहिर है, जगताप चाचा ने जब उन्हें बताया होगा कि रेखा ने खुद खुशी कर ली है तो वो भीषण सदमे में चले गए होंगे। पिता जी ने रेखा के घर वालों को आश्वासन दिया कि वो इस बात का पता ज़रूर लगाएंगे कि रेखा ने आख़िर किस वजह से खुद खुशी की है? कुछ देर तक पिता जी रेखा के घर वालों को समझाते बुझाते रहे उसके बाद उन्हें ये कह कर वापस अपने घर जाने को कह दिया कि रेखा का मृत शरीर पोस्टमार्टम के बाद जल्दी ही उन्हें मिल जाएगा।

गांव के लोग अच्छी तरह जानते थे कि हम कभी भी किसी के साथ कुछ भी बुरा नहीं करते थे बल्कि हमेशा गांव वालों की मदद ही करते थे। यही वजह थी कि गांव वाले पिता जी को देवता की तरह मानते थे लेकिन आज जो कुछ हुआ था उससे बहुत कुछ बदल जाने वाला था। हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियों की मौत हो चुकी थी और ये कोई साधारण बात नहीं थी। पूरे गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के गांवों में भी ये बात जंगल की आग की तरह फ़ैल जानी थी और इसका सबसे बड़ा प्रभाव ये होना था कि लोगों के मन में हमारे प्रति कई तरह की बातें उभरने लग जानी थी। स्थिति काफी बिगड़ गई थी लेकिन अब जो कुछ हो चुका था उसे न तो बदला जा सकता था और ना ही मिटाया जा सकता था।

ख़ैर पिता जी ने दारोगा को भी ये कह कर जाने को कहा कि वो बाद में उससे मुलाक़ात करेंगे। दरोगा के जाने के बाद बैठक में बस हम तीन लोग ही रह गए। अभी हम सब बैठक में ही बैठे थे कि तभी बड़े भैया के साथ विभोर और अजीत बाहर से अंदर दाखिल हुए। उन्हें रात के इस वक्त हवेली लौटने पर पिता जी तथा जगताप चाचा दोनों ही नाराज़ हुए और उन्हें डांटा भी। वो तीनों उनके डांटने पर सिर झुकाए ही खड़े रहे और जब पिता जी ने अंदर जाने को कहा तो वो चुप चाप चले गए। इधर मैं ये सोचने लगा था कि बड़े भैया ज़्यादातर विभोर और अजीत के साथ ही क्यों घूमते फिरते रहते हैं?

हवेली की दो नौकरानियों की आज मौत हो चुकी थी इस वजह से पूरी हवेली में एक अजीब सी ख़ामोशी छाई हुई थी। पिता जी ने जगताप चाचा से तांत्रिक के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उसका किसी ने क़त्ल कर दिया है। पिता जी ये सुन कर स्तब्ध रह गए थे। उसके बाद जगताप चाचा ने पिता जी से पूछा कि कुल गुरु के यहां जाने पर क्या पता चला तो पिता जी ने हमें जो कुछ बताया उससे हम और उलझ गए।

पिता जी के अनुसार ये सच है कि कुल गुरु को डराया धमकाया गया था लेकिन उन्हें डराने धमकाने का काम पत्र के माध्यम से किया गया था। किसी ने उनके पास पत्र में लिख कर अपनी धमकी भेजी थी कि पिता जी को बड़े भैया के बारे में वैसी भविष्यवाणी तो करनी ही है लेकिन विस्तार से ये नहीं बताना है कि उनके बेटे की मौत वास्तव में किस वजह से होगी। पत्र में साफ़ साफ़ धमकी लिखी हुई थी कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनके पूरे परिवार को ख़त्म कर दिया जाएगा। पिता जी की ये बातें सुन कर मैं और जगताप चाचा गहरी सोच में पड़ गए थे। कहने का मतलब ये कि कुल गुरु के यहां जाने का भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ था। कुल गुरु को खुद भी नहीं पता था कि उन्हें इस तरह की धमकी देने वाला कौन था? अब जब उन्हें ही नहीं पता था तो भला वो पिता जी को क्या बताते?

अभी हम इस बारे में बातें ही कर रहे थे कि हवेली के बाहर पहरे पर खड़ा एक आदमी अंदर आया और उसने बताया कि साहूकारों के घर से दो लोग आए हैं। पिता जी उसकी बात सुन कर बोले ठीक है उन्हें अंदर भेज दो। कुछ ही पलों में साहूकार मणि शंकर अपने बड़े बेटे चंद्रभान के साथ अंदर बैठक में आया। दुआ सलाम के बाद पिता जी ने उन दोनों को पास ही रखी कुर्सियों पर बैठने को कहा तो वो दोनों शुक्रिया कहते हुए बैठ गए।

"क्या बात है पिता और पुत्र दोनों एक साथ इस वक्त हमारे यहां कैसे?" पिता जी ने शालीनता से किंतु हल्की मुस्कान के साथ कहा।

"गांव के एक दो हिस्सों में रोने धोने की आवाज़ें सुनाई दी थीं ठाकुर साहब।" मणि शंकर ने कहा____"पूछने पर पता चला कि आपकी हवेली में दो दो नौकरानियों की अकस्मात मौत हो गई है इस वजह से उन दोनों नौकरानियों के घरों में ये मातम का माहौल छा गया है। ये ख़बर ऐसी थी कि मुझे यकीन ही नहीं हुआ, पर कई लोगों का यही कहना था इस लिए यहां आने से खुद को रोक नहीं सका। मुझे एकदम से चिंता हुई कि आख़िर ऐसा कैसे हो गया आपके यहां?"

"सब उस ऊपर वाले की माया है मणि शंकर जी।" पिता जी ने कहा____"कब किसके साथ क्या हो जाए ये कौन जानता है भला? हम सब तो किसी काम से बाहर गए हुए थे। शाम को जब वापस आए तो इस सबका पता चला। हमें ख़ुद समझ नहीं आ रहा कि आख़िर ऐसा कैसे हो गया? ख़ैर ये सब कैसे हुआ है इसका पता ज़रूर लगाएंगे हम। आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि हवेली में काम करने वाली किसी नौकरानी की इस तरह से मौत हुई हो।"

"आते समय गांव के कुछ लोगों से पता चला कि एक नौकरानी ने हवेली में ज़हर खा कर खुद खुशी कर ली थी।" मणि शंकर ने कहा____"और एक नौकरानी के बारे में उन लोगों ने बताया कि शाम को देवधर की बीवी शीला की किसी ने हत्या कर दी है। ये भी पता चला कि उसकी लाश आपके ही बगीचे में पड़ी मिली थी।"

"सही कहा।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"शाम को वैभव उसकी खोज में उसके घर गया था। असल में वो समय से पहले ही हवेली से चली गई थी। हम जानना चाहते थे कि आख़िर ऐसी क्या बात हो गई थी जिसके चलते वो बिना किसी को कुछ बताए ही यहां से चली गई थी? वैभव ने उसके पति से उसके बारे में पूछा था, उसके बाद ये जब उसकी खोज में आगे गया तो हमारे ही बगीचे में इसे उसकी लाश मिली। हमारे लिए ये बड़ी ही हैरानी की बात है कि एक ही दिन में हमारी हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियों की इस तरह कैसे मौत हो सकती है? ख़ैर, इस सनसनीखेज़ माजरे का पता तो निश्चय ही करना पड़ेगा। हमें दुख इस बात का है कि दोनों के घर वालों पर अकस्मात ही इतनी भारी विपत्ति आ गई है।"

"मैं भी यही चाहता हूं ठाकुर साहब कि इसका जल्द से जल्द पता लगाया जाए।" मणि शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"क्योंकि ये जो कुछ भी हुआ है बिलकुल भी ठीक नहीं हुआ है। लोग हम पर भी उंगली उठाएंगे। वो यही सोचेंगे कि इस सबके जिम्मेदार हम ही होंगे क्योंकि हम हमेशा आपसे मन मुटाव रखते थे। ठाकुर साहब, हमारे बीच पहले कैसे संबंध थे इस बात को हम और आप दोनों ही भूल चुके हैं और इसी लिए हमने हमारे बीच एक अच्छे रिश्ते का आधार स्तंभ खड़ा किया है। मैं किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहता कि हमारे बीच किसी और की वजह से फिर से कोई मन मुटाव हो जाए।"

"इस बात से आप बेफ़िक्र रहें मणि शंकर जी।" पिता जी ने कहा____"हम भी समझते हैं कि इस हादसे के बाद लोगों के जहन में कैसे कैसे ख़्याल उभर सकते हैं। हमें लोगों के ख़्यालों से कोई मतलब नहीं है बल्कि उस सच्चाई से मतलब है जिसके तहत हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियों की मौत हो गई है। हम उन दोनों की मौत की असल वजह का पता ज़रूर लगाएंगे।"

"मैं यही सब सोच कर इस वक्त यहां आया था ठाकुर साहब।" मणि शंकर ने कहा____"सच कहूं तो मेरे मन में ये ख़्याल भी उभर आया था कि कहीं आप भी ना इस हादसे के लिए हम पर शक करने लगें। अभी अभी तो हमारे बीच अच्छे संबंध बने हैं और अगर किसी ग़लतफहमी की वजह से हमारे संबंधों में फिर से दरार पड़ गई तो सबसे ज़्यादा तकलीफ़ मुझे ही होगी।"

"आप इस बात से निश्चिंत रहें मणि शंकर जी।" पिता जी ने कहा____"हम अच्छी तरह जानते हैं कि आप ऐसा कुछ करने का सोच भी नहीं सकते हैं। ख़ैर, छोड़िए इन बातों को और चलिए साथ में बैठ कर भोजन करते हैं। अभी हम में से भी किसी ने भोजन नहीं किया है।"

"शुक्रिया ठाकुर साहब।" मणि शंकर ने मुस्कुराते हुए कहा____"पर हम तो भोजन कर चुके हैं। आप लोग भोजन कीजिए, और अब हमें जाने की इजाज़त भी दीजिए।"

पिता जी ने एक दो बार और मणि शंकर से भोजन के लिए कहा लेकिन उसने ये कह कर इंकार कर दिया कि फिर किसी दिन। उसके बाद मणि शंकर अपने बेटे चंद्रभान के साथ दुआ सलाम कर के चला गया। इस हादसे के बाद भोजन करने की इच्छा तो किसी की भी नहीं थी लेकिन थोड़ा बहुत खाया ही हमने। मेरे ज़हन में बस यही बातें गूंज रहीं थी कि मणि शंकर आख़िर किस इरादे से हमारे यहां आया था? उसने जो कुछ हमारे संबंधों के बारे में कहा था क्या वो सच्चे दिल से कहा था या फिर सच में ही उसका इस मामले में कोई हाथ हो सकता है? क्या उसकी मंशा ये थी कि यहां आ कर अपनी सफाई दे कर वो अपना पक्ष सच्चा कर ले ताकि हमारा शक उस पर न जाए?

मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कुछ कहना ही चाहा था कि उन्होंने इशारे से ही मुझे चुप रहने को कहा। मुझे ये थोड़ा अजीब तो लगा किन्तु जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो शायद जगताप चाचा की मौजूदगी में कोई बात नहीं करना चाहते थे। ख़ैर उसके बाद हमने खाना खाया और अपने अपने कमरों में सोने के लिए चल दिए।

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पता नहीं उस वक्त रात का कौन सा प्रहर था किंतु नींद में ही मुझे ऐसा आभास हुआ मानों कहीं से कोई आवाज़ आ रही हो। मेरी नींद में खलल पड़ चुका था। नींद टूटी तो मैंने आखें खोल कर चारो तरफ देखा। कमरे में बिजली का मध्यम प्रकाश था और छत के कुंडे पर लटक रहा पंखा मध्यम गति से चल रहा था। मैं समझने की कोशिश करने लगा कि आवाज़ किस चीज़ की थी? तभी फिर से हल्की आवाज़ हुई। रात के सन्नाटे में मेरे कानों ने फ़ौरन ही आवाज़ का पीछा किया। आवाज़ दरवाज़े की तरफ से आई थी। ज़हन में ख़्याल उभरा कि कमरे के बाहर ऐसा कौन हो सकता है जो इस तरह से दरवाज़ा थपथपा रहा है?

मैं सतर्कता से पलंग पर उठ कर बैठ गया। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था और मैं ये समझने की भरपूर कोशिश कर रहा था कि रात के इस वक्त कौन हो सकता है? मन में सवाल उभरा, क्या मेरा कोई दुश्मन हवेली में घुस आया है लेकिन अगर ऐसा होता तो वो मेरे कमरे का दरवाज़ा क्यों थपथपाता? मेरा दुश्मन तो पूरी ख़ामोशी अख़्तियार कर के ही मुझ तक पहुंचने की कोशिश करता। ज़ाहिर है ये जो कोई भी है वो मेरा दुश्मन नहीं हो सकता, बल्कि कोई ऐसा है जो इस वक्त किसी ख़ास वजह से मुझ तक पहुंचना चाहता है। ये सोच कर एक बार फिर से मैं सोचने लगा कि ऐसा कोई व्यक्ति कौन हो सकता है?

मैं ये सोच ही रहा था कि दरवाज़े को फिर से हल्की आवाज़ में थपथपाया गया। इस बार चुप रहना ठीक नहीं था, अतः मैं बड़ी ही सावधानी से पलंग से नीचे उतरा। दरवाज़े के क़रीब पहुंच कर मैंने बड़े आहिस्ता से और बड़ी ही सतर्कता से दरवाज़े को खोला। मेरे दिल की धड़कनें अनायास ही तीव्र गति से चलने लगीं थी। ख़ैर, जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर नीम अंधेरे में खड़े जिस शख़्स पर मेरी नज़र पड़ी उसे देख कर मैं बुरी तरह हैरान रह गया।

बाहर पिता जी खड़े थे। अपने पिता यानी दादा ठाकुर को रात के इस वक्त अपने कमरे के दरवाज़े के बाहर इस तरह से आया देख मेरा हैरान हो जाना लाज़मी था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि पिता जी मेरे कमरे में रात के वक्त इस तरह से आए हों। ख़ैर मैंने उन्हें अंदर आने का रास्ता दिया तो वो ख़ामोशी से ही अंदर आ गए। मैंने दरवाज़े को वापस बंद किया और पलट कर उनकी तरफ देखा। वो जा कर पलंग पर बैठ चुके थे। अपने पिता को अपने कमरे में आया देख मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं थी और साथ ही ज़हन में कई तरह के ख़्याल भी उभरने लगे थे।

"बैठो।" पिता जी ने धीमें स्वर में मुझे हुकुम सा दिया तो मैं ख़ामोशी से आगे बढ़ कर पलंग पर उनसे थोड़ा दूर बैठ गया। अब तक मैं ये समझ गया था कि कोई बेहद ज़रूरी और गंभीर बात ज़रूर है जिसके चलते पिता जी मेरे कमरे में रात के इस वक्त आए हैं।

"हम जानते हैं कि हमारे इस वक्त यहां आने से तुम्हारे मन में कई तरह के सवाल उभर आए होंगे।" पिता जी ने जैसे भूमिका बनाते हुए कहा_____"लेकिन क्योंकि हालात ही कुछ ऐसे हैं कि हमें रात के इस वक्त इस तरह से यहां पर आना पड़ा।"

"जी, मैं समझता हूं पिता जी।" मैंने उनकी तरह ही धीमें स्वर में कहा_____"अब तक तो मैं भी इतना समझ चुका हूं कि जो कोई भी हमारे साथ ये सब कर रहा है वो बहुत ही शातिर है। वो इतना शातिर है कि अब तक हर क़दम पर हम उसके द्वारा सिर्फ मात ही खाते आए हैं। हमें अगर कहीं से उससे ताल्लुक रखता कुछ भी पता चलता है तो वो उस जड़ को ही ख़त्म कर देता है जिसके द्वारा हमें उस तक पहुंचने की संभावना होती है। इससे एक बात तो साबित हो चुकी है कि उसे हमारे हर क्रिया कलाप की पहले से ही ख़बर हो जाती है और ऐसा तभी हो सकता है जब उस तक ख़बर पहुंचाने वाला कोई हमारे ही बीच में मौजूद हो।"

"तुमने बिल्कुल सही कहा।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"आज जो कुछ भी हुआ है उससे हमें भी ये बात समझ आ गई है। निश्चित तौर पर हमारे उस दुश्मन का कोई भेदिया हमारे ही बीच मौजूद है, ये अलग बात है कि हम उस भेदिए को फिलहाल पहचान नहीं पाए हैं। तुमने मुरारी के भाई जगन के द्वारा उस तांत्रिक का पता लगवाया लेकिन जब तुम लोग उस तांत्रिक के पास पहुंचे तो वो तांत्रिक स्वर्ग सिधार चुका था। ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि हम उसके पास पहुंचते हैं और वो उससे पहले ही किसी के द्वारा कत्ल किया हुआ पाया जाता है। ज़ाहिर है कि हमारे दुश्मन को पहले ही पता चल चुका था कि हमें उसकी करतूत पता चल गई है जिसके चलते हम उस तांत्रिक के पास पहुंच कर उसके बारे में मालूमात करेंगे, किंतु ऐसा न होने पाए इस लिए हमारे दुश्मन ने पहले ही उस तांत्रिक को मार दिया। अब सवाल ये है कि हमारे दुश्मन को ये कैसे पता चला कि हमें उसकी करतूत के बारे में पता चल चुका है, जिसके लिए उसे फ़ौरन ही उस तांत्रिक का काम तमाम कर देना चाहिए? क्या जगन उसका भेदिया हो सकता है? क्या उसी ने इस बारे में हमारे दुश्मन को बताया होगा? लेकिन हमें नहीं लगता कि जगन ने ऐसा किया होगा या फिर ये कहें कि वो भेदिया हो सकता है क्योंकि हमारे हर क्रिया कलाप की दुश्मन तक ख़बर पहुंचाना उसके बस का नहीं हो सकता। ऐसा काम तो वही कर सकता है जो हमारे क़रीब ही रहता हो, जबकि जगन कभी हवेली नहीं आया और ना ही उससे हमारा कभी मिलना जुलना रहा था।"

"तो क्या लगता है आपको?" मैंने गहरी सांस लेते हुए धीमें स्वर में कहा____"इस तरह का भेदिया कौन हो सकता है जो हमारी पल पल की ख़बर हमारे दुश्मन तक पहुंचा सकता है? वैसे आप जगन के बारे में इतना जल्दी इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच सकते हैं कि वो हमारे दुश्मन का भेदिया नहीं हो सकता? मेरा मतलब है कि ज़रूरी नहीं कि हमारे बीच की ख़बर प्राप्त करने के लिए उसे हमारे बीच ही मौजूद रहना पड़े। किसी और तरीके से भी तो वो हमारे क्रिया कलापों की ख़बर प्राप्त कर सकता है।"

"कहना क्या चाहते हो?" पिता जी के माथे पर सहसा बल पड़ गया था।

"यही कि जगन ऐसा भेदिया हो सकता है जिसे किसी अन्य भेदिए के द्वारा हमारी ख़बरें दी जाती होंगी।" मैंने बेहद संतुलित भाव से कहा____"यानि कि एक भेदिया वो होगा जो हमारे बीच मौजूद रहता है और यहां की ख़बरों को वो अपने दूसरे साथी भेदिए जगन के द्वारा हमारे दुश्मन तक बड़ी ही सावधानी से पहुंचा देता होगा।"

"हां, ऐसा भी हो सकता है।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हारे इस तर्क़ को हम इस लिए मान रहे हैं क्योंकि अब तक जिस तरह से हमारे शातिर दुश्मन ने कारनामें किए हैं उससे इस बात को स्वीकार करने में हमें कोई झिझक नहीं है। ख़ैर अब सोचने वाली बात ये है कि जगन जैसा व्यक्ति हमारे खिलाफ़ हो कर किसी और के लिए ऐसा काम क्यों करेगा?"

"ज़ाहिर है किसी मज़बूरी की वजह से।" मैंने सोचने वाले भाव से कहा_____"या फिर धन के लालच की वजह से। वैसे मेरा ख़्याल यही है कि वो इन दोनों ही वजहों से ऐसा काम कर सकता है। मज़बूरी ये हो सकती है कि वो किसी के कर्ज़े तले दबा होगा और धन का लालच इस लिए कि उसकी आर्थिक स्थिति ज़्यादा ठीक नहीं है।"

"यानि हम ये कह सकते हैं कि जगन हमारे दुश्मन का भेदिया हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"फिर भी अपने शक की पुष्टि के लिए ज़रूरी है कि उस पर नज़र रखी जाए, लेकिन कुछ इस तरीके से कि उसे अपनी नज़र रखे जाने का ज़रा भी शक न हो सके।"

मैं पिता जी की बातों से पूर्णतया सहमत था इस लिए ख़ामोशी से सिर हिला दिया। कहीं न कहीं मैं भी इस बात को समझ रहा था कि जगन ने ऐसा काम यकीनन किया जो सकता है। मुरारी की हत्या के बाद अब उसकी ज़मीन जायदाद को कब्जा लेने का भी अगर वो सोच ले तो ये कोई हैरत की बात नहीं हो सकती थी। इसके लिए अगर उसे किसी की सरपरस्ती मिली होगी तो यकीनन वो इससे पीछे हटने का नहीं सोचेगा। ख़ैर, मेरे जहन में इस संबंध में और भी बातें थी इस लिए इस वक्त मैं पिता जी से उस सबके बारे में भी विचार विमर्श कर लेना चाहता था।

"मुंशी चंद्रकांत के बारे में आपका क्या ख़्याल है?" कुछ सोचते हुए मैंने पिता जी से कहा____"बेशक उसके बाप दादा हवेली और हवेली में रहने वालों के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार रहे हैं लेकिन क्या मुंशी चंद्रकांत भी अपने बाप दादाओं की तरह हमारे प्रति वफ़ादार हो सकता है?"

"बेशक, वो वफ़ादार है।" पिता जी ने कहा____"हमें कभी भी ऐसा आभास नहीं हुआ जिससे कि हम ये सोच सकें कि वो हमसे या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य से नाखुश हो। हम आज भी कभी कभी उसकी गैरजानकारी में उसकी वफ़ादारी की परीक्षा लेते हैं और परिणाम के रूप में हमने हमेशा यही पाया है कि वो अपनी जगह पर पूरी तरह सही है और हवेली के प्रति पूरी तरह वफ़ादार भी है।"

"संभव है कि वो इस हद तक चालाक हो कि उसे हमेशा आपकी परीक्षा लेने वाली मंशा का आभास हो जाता हो।" मैंने तर्क़ किया____"और वो उस समय पर पूरी तरह से ईमानदार हो जाता हो ताकि वो आपकी परीक्षा में खरा उतर सके।"

"चलो मान लेते हैं कि वो इतना चालाक होगा कि वो हमेशा परीक्षा लेने वाली हमारी मंशा को ताड़ जाता होगा।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अब तुम ये बताओ कि वो हमारे खिलाफ़ ऐसा कुछ करेगा ही क्यों? आख़िर हमने उसका ऐसा क्या बुरा किया है जिसके चलते वो हमसे इतनी भारी दुश्मनी निभाने पर तुल जाएगा?"

"संभव है कि हमारे द्वारा उसके साथ कुछ तो ऐसा बुरा हो ही गया हो।" मैंने कहा____"जिसका कभी हमें एहसास ही ना हुआ हो जबकि वो हमें अपना दुश्मन समझने लगा हो?"

"ये सिर्फ ऐसी संभावनाएं हैं।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"जिनमें कोई वास्तविकता है कि नहीं इस पर पूरी तरह संदेह है।"

"बेशक है।" मैंने कहा____"पर संभावनाओं के द्वारा ही तो हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। वैसे अगर मैं ये कहूं कि मुंशी चंद्रकांत का संबंध गांव के साहूकारों से भी हो सकता है तो इस बारे में आप क्या कहेंगे?"

"ऐसा संभव नहीं है।" पिता जी ने कहा____"क्योंकि गांव के साहूकारों से हमेशा ही उसके ख़राब संबंध रहे हैं। जिन साहूकारों ने जीवन भर उसे सिर्फ दुख ही दिया हो वो उन्हीं को अपना मित्र कैसे बना लेगा?"

"गांव के साहूकारों से उसका ख़राब संबंध आपको और दुनिया वालों को दिखाने के लिए भी तो हो सकता है।" मैंने फिर से तर्क़ किया____"जबकि असल बात ये हो कि उनके बीच गहरा मैत्री भाव हो। ऐसा भी हो सकता है कि हमारी तरह साहूकारों ने मुंशी से भी अपने संबंध सुधार लिए हों और अब वो उनके साथ मिल कर हमारे खिलाफ़ कोई खेल खेल रहा हो।"

"अगर ऐसा कुछ होता।" पिता जी ने कहा____"तो कभी न कभी हमारे आदमियों को ज़रूर उस पर संदेह होता। अब तक ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया है तो ज़ाहिर है कि उसका साहूकारों से कोई ताल्लुक नहीं है।"

"चलिए मान लेता हूं कि वो ऐसा नहीं हो सकता।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"लेकिन आप भी ये समझते हैं कि पहले में और अब में ज़मीन आसमान का फ़र्क हो गया है। पहले हम मुंशी के प्रति इतने सजग नहीं थे क्योंकि पहले कभी ऐसे हालात भी नहीं थे किंतु अब हैं और इस लिए अब हमें हर उस व्यक्ति की जांच करनी होगी जिसका हमसे ज़रा सा भी संबंध है।"

"मौजूदा समय में जिस तरह के हालात हैं।" पिता जी ने कहा____"उसके हिसाब से यकीनन हमें मुंशी पर भी खास तरह से निगरानी रखनी ही होगी।"

"दोनों नौकरानियों की मौत के बाद" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"मणि शंकर का अपने बेटे के साथ उसी समय हमारी हवेली पर यूं टपक पड़ना क्या आभास कराता है आपको? रात को उसने उन दोनों की मौत हो जाने से उस संबंध में जो कुछ कहा क्या आप उसकी बातों से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं?"

"उन दोनों नौकरानियों की मौत के संबंध में उसने जो कुछ कहा उससे उसका यही मतलब था कि उसका उस कृत्य से या उस हादसे से कोई संबंध नहीं है।" पिता जी ने सोचने वाले भाव से कहा____"यानि वो चाहता है कि हम किसी भी तरीके से उस पर इस हादसे के लिए शक न करें। हालाकि अगर उसका उन दोनों नौकरानियों की मौत में कोई हाथ भी होगा तब भी हमारे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे हम ये पक्के तौर पर कह सकें कि उन दोनों की हत्या उसी ने की है अथवा करवाई है।"

"चोर की दाढ़ी में तिनका वाली बात भी तो हो सकती है पिता जी।" मैंने कहा____"इस हादसे के संबंध में हमारे पास कोई सबूत नहीं है ये बात सिर्फ़ हम जानते हैं किंतु वो इस बारे में पूरी तरह आस्वस्त नहीं होगा। संभव है कि उसे शक हो कि हमारे पास ऐसा कोई सबूत हो इस लिए उसने खुद ही आ कर इस संबंध में अपनी सफाई देना अपनी बुद्धिमानी समझी। या ये भी हो सकता है कि उसने यहां आ कर यही जानने समझने की कोशिश की हो कि इस हादसे के बाद उसके प्रति हमारे कैसे विचार हैं?"

"संभव है कि ऐसा ही हो।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए कहा____"किंतु ये बात तो सत्य ही है कि हमारे पास इस हादसे के संबंध में कोई सबूत नहीं है और ना ही हम पक्के तौर पर ये कह सकते हैं कि ऐसा किसने किया होगा?"

"क्या आप ये मानते हैं कि हमारी हवेली में उन दोनों नौकरानियों को रखवाने वाले साहूकार हो सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ गौर से देखते हुए कहा____"और क्या आपको ये भी शक है कि हमारे खिलाफ़ षडयंत्र करने वाले गांव के ये साहूकार ही होंगे?"

"क्या फ़र्क पड़ता है?" पिता जी ने मानों बात को टालने की गरज से कहा____"शक होगा भी तब भी क्या हो जाएगा? हमारे पास ऐसा कोई सबूत तो है ही नहीं।"

"यानि आप ये मानते हैं कि हमारे खिलाफ़ षडयंत्र करने वाले गांव के ये साहूकार ही हो सकते हैं?" मैंने फिर से उनकी तरफ गौर से देखा।

"किसी और से हमारी कोई दुश्मनी ही नहीं है।" पिता जी ने कहा____"जब से हमने होश सम्हाला है तब से हमने यही देखा है कि गांव के साहूकारों के अलावा बाकी सबसे हमारे अच्छे संबंध रहे हैं। हमसे पहले बड़े दादा ठाकुर के समय में भी यही हाल था। ये अलग बात है कि उनकी सोच में और हमारी सोच में काफ़ी फ़र्क है। जब तक वो थे तब तक दूर दूर तक लोगों के मन में उनके प्रति ऐसी दहशत थी कि कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ़ जाने का सोच भी नहीं सकता था। उनके बाद जब हमने दादा ठाकुर का ताज पहना तो हमने अपनी सोच के अनुसार लोगों के मन से उनकी उस छवि को दूर करने की ही कोशिश की। हमें ये बिलकुल पसंद नहीं था कि लोगों के अंदर हमारे प्रति बड़े दादा ठाकुर जैसी दहशत हो बल्कि हमने हमेशा यही कोशिश की है कि लोग बेख़ौफ हो कर हमारे सामने अपनी बात रखें और हम पूरे दिल से उनकी बातें सुन कर उनका दुख दूर करें। ख़ैर तो हमारे कहने का यही मतलब है कि हमारी कभी किसी से ऐसी कोई दुश्मनी नहीं हुई जिसके चलते कोई हमारे खिलाफ़ इस तरह का षडयंत्र करने लगे। गांव के साहूकारों से भी हमारा ऐसा कोई झगड़ा नहीं रहा है। ये अलग बात है कि उनकी बुरी करनी के चलते ही हमें कई बार उनके खिलाफ़ ही पंचायत में फ़ैसला सुनाना पड़ा है। अब अगर वो सिर्फ इसी के चलते हमें अपना दुश्मन समझने लगे हों तो अलग बात है।"

"जैसा कि आपने बताया कि आपके पहले बड़े दादा ठाकुर की दहशत थी लोगों के अंदर।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"तो क्या ये नहीं हो सकता कि बड़े दादा ठाकुर के समय में कभी ऐसा कुछ हुआ हो जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने को मिल रहा है? आपने एक बार बताया था कि गांव के साहूकारों से हमारे संबंध बहुत पहले से ही ख़राब रहे हैं तो ज़ाहिर है कि इन ख़राब संबंधों की वजह इतनी मामूली तो नहीं हो सकती। संभव है कि बड़े दादा ठाकुर के समय में इन लोगों में इतनी हिम्मत न रही हो कि ये उनके खिलाफ़ कुछ कर सकें किंतु अब उनमें यकीनन ऐसी हिम्मत है।"

"पिता जी के समय का दौर ही कुछ अलग था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"हर तरफ उनकी तूती बोलती थी। यह तक कि शहर के मंत्री लोग भी हवेली में आ कर उनके पैरों के नीचे ही बैठते थे। उनकी दहशत का आलम ये था कि हम दोनों भाई कभी भी उनकी तरफ सिर उठा कर नहीं देखते थे। गांव के ये साहूकार उन्हें देख कर जूड़ी के मरीज़ की तरफ कांपते थे। ख़ैर, हमारे संज्ञान में तो ऐसा कोई वाक्या नहीं है जिसके चलते हम ये कह सकें कि उनके द्वारा गांव के साहूकारों का क्या अनिष्ट हुआ था जिसका बदला लेने के लिए वो आज इस तरह से हमारे खिलाफ़ षडयंत्र कर रहे होंगे।"

"मुझे तो अब यही लग रहा है कि अगर गांव के साहूकार ही ये सब कर रहे हैं तो ज़रूर इस दुश्मनी के बीज बड़े दादा ठाकुर के समय पर ही बोए गए थे।" मैंने गंभीरता से कहा____"किंतु एक बात समझ नहीं आ रही और वो ये कि हमारा दुश्मन उस रेखा नाम की नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से कागज़ात क्यों निकलवाना चाहता था? भला उसका कागज़ात से क्या लेना देना?"

"यही तो सब बातें हैं जो हमें सोचने पर मजबूर किए हुए हैं।" पिता जी ने कहा_____"मामला सिर्फ़ किसी का किसी से दुश्मनी भर का नहीं है बल्कि मामला इसके अलावा भी कुछ है। साहूकार लोग अगर हमसे अपनी किसी दुश्मनी का बदला ही लेना चाहते हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा वो हमें और हमारे खानदान को ख़त्म कर देने का ही सोचेंगे। उनका हमारे कागज़ातों से कोई लेना देना नहीं हो सकता।"

"लेना देना क्यों नहीं हो सकता पिता जी?" मैंने संतुलित भाव से कहा____"ज़ाहिर है हमारे ख़त्म हो जाने के बाद हमारी सारी ज़मीन जायदाद लावारिश हो जाएगी, इस लिए वो चाहते होंगे कि हमारे बाद हमारा सब कुछ उनका हो जाए।"

"हां ऐसा भी हो सकता है।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए हामी भरी।

"वैसे क्या आपने भी एक बात पर गौर किया है?" मैंने उनकी तरफ देखा तो उन्होंने सिर उठा कर मुझे देखा और पूछा____"कौन सी बात पर?"

"यही कि हमारा जो भी दुश्मन है।" मैंने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"उसने अब तक सिर्फ़ और सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही अपना शिकार बनाने की कोशिश की है। यदि इसे स्पष्ट रूप से कहूं तो वो ये है कि उसने आपके बेटों को ही मौत के मुंह तक पहुंचाने की कोशिश की है जबकि जगताप चाचा के दोनों बेटों में से किसी पर भी आज तक किसी प्रकार की आंच तक नहीं आई है। आपकी नज़र में इसका क्या मतलब हो सकता है?"

"यकीनन, हमने तो इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया था।" पिता जी के चेहरे पर एकाएक चौंकने वाले भाव उभर आए थे, बोले____"तुम बिलकुल सही कह रहे हो। अभी तक हमारे दुश्मन ने सिर्फ़ हमारे बेटों को ही नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। इससे यही ज़ाहिर होता है कि हमारा दुश्मन सिर्फ़ हमें और हमारी औलाद को ही अपना दुश्मन समझता है, जबकि जगताप को नहीं।"

"क्या लगता है आपको?" मैंने उनकी तरफ अपलक देखते हुए कहा____"ऐसा क्यों होगा अथवा ये कहें कि ऐसा कैसे हो सकता है? क्या इसका ये मतलब हो सकता है कि जगताप चाचा हमारे दुश्मन से मिले हुए हो सकते हैं या फिर जगताप चाचा ही वो शख़्स हैं जो हमें अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं? अगर ऐसा है तो ये भी समझ आ जाता है कि उन्हें कागज़ातों की ज़रूरत क्यों होगी? ज़ाहिर है वो सब कुछ अपने नाम पर कर लेना चाहते हैं, किंतु जब तक आप हैं या आपकी औलादें हैं तब तक उनका अपने मकसद में कामयाब होना लगभग असम्भव ही है।"

मेरी इन बातों को सुन कर पिता जी कुछ न बोले। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो किसी गहरे समुद्र में डूब गए हों। कुछ पलों तक तो मैं उनकी तरफ से किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करता रहा किन्तु जब वो सोच में ही डूबे रहे तो मैंने उनका ध्यान भंग करते हुए कहा____"क्या अभी भी आप उन्हें त्रेता युग के भरत या लक्ष्मण समझते हैं जो अपने बड़े भाई को ही अपना सब कुछ समझते हैं और खुद के बारे में किसी भी तरह की चाहत नहीं रखते?"

"हमारा दिल तो नहीं मानता।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"लेकिन आज कल हम जिस तरह के हालातों के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं उसकी वजह से हम अपनों पर ही संदेह करने पर मजबूर से हो गए हैं। यही वजह थी कि उस समय बैठक में जगताप की मौजूदगी में हमने तुम्हें चुप रहने का इशारा किया था। हम हमेशा जगताप को त्रेता युग के भरत और लक्ष्मण की तरह ही मानते आए हैं और अब तक हमें इस बात का यकीन भी था कि जगताप जैसा हमारा भाई हमें ही अपना सब कुछ समझता है। हमें हमेशा उसके जैसा भाई मिलने का गर्व भी था लेकिन हमारे लिए ये बड़े ही दुख की बात है कि अब हम अपने उसी भाई पर संदेह करने पर मजबूर हो गए हैं। अगर आने वाले समय में उसके प्रति हमारा ये संदेह मिथ्या साबित हुआ तो हम कैसे अपने उस भाई से नज़रें मिला पाएंगे?"

इतना सब कहते कहते सहसा पिता जी की आवाज़ भारी हो गई। मैंने पहली बार उन्हें इतना भावुक होते देखा था। मेरी नज़र में उनकी छवि एक पत्थर दिल वाले इंसान की थी लेकिन आज पता चला कि वो सिर्फ़ बाहर से ही पत्थर की तरह कठोर नज़र आते थे जबकि अंदर से उनका हृदय बेहद ही कोमल था। मुझे समझ न आया कि उनकी इन बातों के बाद अब मैं क्या कहूं लेकिन मैं ये भी जानता था कि ये समय भावुकता के भंवर में फंसने का हर्गिज़ नहीं था।

"मैं इतना बड़ा तो नहीं हो गया हूं कि आपको समझा सकूं।" फिर मैंने झिझकते हुए कहा____"लेकिन ये तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि एक अच्छा इंसान कभी भी अपनों के प्रति ऐसी नकारात्मक सोच नहीं रख सकता। हमें वक्त और हालात के आगे मजबूर हो जाना पड़ता है और उसी के चलते हम कुछ ऐसा भी कर गुज़रते हैं जो सामान्य वक्त में हम करने का सोच भी नहीं सकते।"

"हमें खुशी हुई कि जीवन के यथार्थ के बारे में अब तुम इतनी गंभीरता से सोचने लगे हो।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हारे बदले हुए इस व्यक्तित्व के बारे में हम जब भी सोचते हैं तो हमें हैरत होती है। ख़ैर, तो अब हमें न चाहते हुए भी जगताप के क्रिया कलापों पर भी नज़र रखनी होगी।"

"उससे भी पहले कल सुबह हमें बड़े भैया को किसी ऐसे तांत्रिक या झाड़ फूंक करने वाले के पास ले कर जाना होगा।" मैंने कहा____"जो बड़े भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का बेहतर इलाज़ कर सके। इस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से जाने वो कैसा कैसा बर्ताव करने लगे हैं। एक बात और, मुझे लगता है कि उनकी तरह मुझ पर भी कोई तंत्र मंत्र किया गया है।"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी मेरी आख़िरी बात सुन कर चौंक पड़े थे, बोले____"तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम पर भी तंत्र मंत्र का प्रयोग किया गया है?"

"पिछले कुछ समय से मुझे एक ही प्रकार का सपना आ रहा है।" मैंने गंभीर भाव से कहा____"आप तो जानते हैं कि हर किसी को कोई न कोई सपना आता ही रहता है लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है कि किसी को एक ही सपना बार बार आए। ज़ाहिर है इसके पीछे कुछ तो वजह होगी ही। मुझे अंदेशा है कि ज़रूर इसके पीछे कोई तंत्र मंत्र वाला चक्कर है।"

"अगर ऐसा है तो यकीनन ये बहुत ही गंभीर बात है।" पिता जी ने गहन विचार के साथ कहा____"हमारा दुश्मन जब हमारा या तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाया तो उसने ऐसे तंत्र मंत्र का सहारा लिया जिसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। ख़ैर, कल सुबह तुम भी अपने बड़े भाई के साथ चलना। तुमने जब हमें अपने बड़े भाई के साथ तंत्र मंत्र की क्रिया होने के बारे में बताया था तब पिछली रात हमें यही सोच सोच कर रात भर नींद नहीं आई थी कि दुनिया में लोग किसी के साथ क्या कुछ कर गुज़रते हैं।"

"दुनिया में ऐसे न जाने कितने ही अजीब लोग भरे पड़े हैं।" मैंने कहा____"जो ऐसी ही मानसिकता वाले हैं। ख़ैर, कल सुबह जब हम यहां से किसी तांत्रिक या झाड़ फूंक करने वाले के पास जायेंगे तो हमें अपनी सुरक्षा का भी ख़ास इंतजाम रखना होगा। संभव है कि अपनी नाकामी से बौखलाया या गुस्साया हुआ हमारा दुश्मन रास्ते में कहीं हम पर हमला करने का न सोचे। दूसरी बात, जगताप चाचा को भी हमें अपने साथ ही ले चलना होगा। ऐसा न हो कि उन्हें किसी तरह का शक हो जाए हम पर।"

"कल शाम उस नौकरानी के साथ क्या हुआ था?" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए पूंछा____"हम जानना चाहते हैं कि उस नौकरानी के द्वारा हमारा दुश्मन हमारे साथ असल में क्या करवा रहा था?"

"माफ़ कीजिएगा पिता जी।" मैंने इस बार थोड़ा शख़्त भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता लेकिन फ़िक्र मत कीजिए, जल्दी ही इस बारे में आपको सारी बातों से अवगत करा दूंगा।"

पिता जी मेरी बात सुन कर मेरी तरफ एकटक देखने लगे थे। उनके इस तरह देखने से मेरी धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं थी। ख़ैर, उन्होंने इस बारे में मुझसे कुछ नहीं कहा और फिर वो पलंग से उतर कर चल दिए। दरवाज़े तक मैं उन्हें छोड़ने आया। उनके जाने के बाद मैंने दरवाज़े को अंदर से बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें चलने लगीं थी। उस दूसरी वाली नौकरानी के सारे चक्कर को मैं अपने तरीक़े से सम्हालना चाहता था। अब समय आ गया था कि अपने दोनों चचेरे भाईयों का हिसाब किताब ख़ास तरीके से किया जाए।



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अध्याय - 45

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अब तक....



"माफ़ कीजिएगा पिता जी।" मैंने इस बार थोड़ा शख़्त भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता लेकिन फ़िक्र मत कीजिए, जल्दी ही इस बारे में आपको सारी बातों से अवगत करा दूंगा।"




पिता जी मेरी बात सुन कर मेरी तरफ एकटक देखने लगे थे। उनके इस तरह देखने से मेरी धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं थी। ख़ैर, उन्होंने इस बारे में मुझसे कुछ नहीं कहा और फिर वो पलंग से उतर कर चल दिए। दरवाज़े तक मैं उन्हें छोड़ने आया। उनके जाने के बाद मैंने दरवाज़े को अंदर से बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें चलने लगीं थी। उस दूसरी वाली नौकरानी के सारे चक्कर को मैं अपने तरीक़े से सम्हालना चाहता था। अब समय आ गया था कि अपने दोनों चचेरे भाईयों का हिसाब किताब ख़ास तरीके से किया जाए।



अब आगे.....



पिता जी के जाने के बाद रात बड़ी मुश्किल से गुज़री थी। अपनी बदली हुई ज़िंदगी और मौजूदा वक्त के बारे में सोचते सोचते ही जाने कब मेरी आंख लग गई थी। सुबह किसी ने दरवाज़ा खटखटाया तो मेरी आंख खुली। अलसाए मन से मैं उठा और जा कर दरवाज़ा खोला। बाहर मेरी लाडली और मासूम बहन कुसुम खड़ी थी। उसे देखते ही मेरे जहन में शीला के द्वारा बताई गई वो सब बातें उभरने लगीं जो उसने कुसुम के संबंध में बताई थी। पलक झपकते ही उन बातों के चलते मेरे मन में उसके प्रति अजीब से ख़्याल उभरे किंतु मैंने फ़ौरन ही उन ख़्यालों को शख़्ती से दबा दिया। उसके बाद मैंने अपने होठों पर हल्की सी मुस्कान सजा कर उसे देखा जिसे देख वो भी मुस्कुरा उठी।

"मेरे सबसे अच्छे वाले भैया के लिए गरमा गर्म चाय हाज़िर है।" उसने मेरी तरफ अपना एक हाथ बढ़ाया जिसमें उसने चाय का कप लिया हुआ था। मैंने मुस्कुराते हुए उसके हाथ से चाय का वो कप लिया तो उसने आगे कहा____"चाय पी कर जल्दी से नित्य क्रिया से फुर्सत हो जाइए। दादा ठाकुर जी का आदेश है कि जल्द से जल्द आप तैयार हो कर उनके सामने हाज़िर हो जाएं।"

"जो हुकुम मेरी बहना।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"वैसे देख रहा हूं कि आज तेरे चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी झलक रही है। कुछ ख़ास बात है क्या?"

"अपने सबसे अच्छे वाले भैया को सुबह सुबह देख लिया।" कुसुम ने मेरी तरफ देखते हुए उसी मुस्कान में कहा_____"मेरे लिए यही खुशी की और ख़ास वाली बात होती है, पर लगता है मेरे सोचन देव भैया को अपनी इस मासूम सी बहन को खुश देखना अच्छा नहीं लगा।"

"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है?" मैंने उसकी गहरी आंखों में झांकते हुए कहा____"अरे! पगली मेरा बस चले तो मैं अपने हिस्से की सारी खुशियां तुझे दे दूं और तेरे हिस्से के सारे दुख दर्द को अपनी किस्मत बना लूं।"

"ऐसा मत कहिए भैया।" कुसुम एकदम से मुझसे छुपक गई और फिर गंभीर भाव से बोली____"भगवान ऐसा कभी न करे कि मेरे सबसे अच्छे वाले भैया को कोई दुख दर्द मिले और जहां तक मेरी बात है तो आपका ये प्यार और स्नेह ही काफी है मुझे खुशियां देने के लिए।"

"अच्छा एक बात बता।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"अगर कोई किसी को जान बूझ कर ऐसा दुख दे जिससे कि सामने वाले की आत्मा तक उसके द्वारा दिए गए दुख से छलनी हो जाए तो ऐसे इंसान को कैसी सज़ा मिलनी चाहिए?"

"ये...ये आप क्या कह रहे हैं भैया?" कुसुम ने मुझसे छुपके हुए ही कहा था। मैंने महसूस किया कि मेरी बात सुन कर उसका समूचा जिस्म कांप गया था। फिर जैसे अंजान बन कर बोली____"आख़िर किस बारे में बात कर रहे हैं आप?"

"महत्वपूर्ण ये नहीं है बहना कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूं।" मैंने कहा____"महत्वपूर्ण ये है कि मेरे द्वारा पूछे गए सवाल पर तेरा जवाब क्या है? मैं तुझसे जानना चाहता हूं कि ऐसे इंसान की कैसी सज़ा होनी चाहिए?"

"मेरे हिसाब से तो।" कुसुम ने मुझसे अलग हो कर मासूम अंदाज़ से कहा____"ऐसे इंसान को कोई सज़ा नहीं मिलनी चाहिए भैया, बल्कि ऐसे इंसान के उस कर्म को उसकी पहली और आख़िरी ग़लती मान कर उसे माफ़ कर देना चाहिए।"

"और यदि उसका कर्म इतना संगीन हो जिसकी कोई माफ़ी ही ना हो तो?" मैंने कुसुम के चेहरे पर बदल रहे भावों को देखते हुए कहा____"क्या तब भी उसे माफ़ कर देना चाहिए?"

"ह्...हां तब भी।" कुसुम ने उसी मासूमियत से किन्तु लरज़ते स्वर में कहा___"कर्म भले ही संगीन से संगीन हो किंतु पहली दफा माफ़ कर के उसे आइंदा ऐसा कर्म न करने की हिदायत दे देनी चाहिए।"

कुसुम की इस बात से मैं तुरंत कुछ न बोला बल्कि उसके चेहरे पर गर्दिश कर रहे भावों को समझने की कोशिश करता रहा। इस वक्त जिस तरह के भाव उसके चेहरे पर तैर रहे थे उससे साफ़ ज़ाहिर था कि वो अंदर ही अंदर किसी बात से जद्दोजहद कर रही थी। मैं ये भी समझ गया था कि वो मेरे सवाल का असली मतलब समझ गई थी और मतलब समझ लेने के बाद ही उसने ऐसा जवाब दिया था। यानि वो चाहती थी कि मैं उसके दोनों भाईयों को माफ़ कर दूं। मुझे उसके जैसे पाक चरित्र वाली लड़की से यही उम्मीद थी। मैं ये सोचने लगा कि जिन भाईयों ने उसकी आत्मा तक को छलनी कर दिया था ये उन्हीं भाईयों को माफ़ कर देने की बात कह रही थी। ख़ैर मैंने इस वक्त उसको ज़्यादा परेशान या व्यथित करना ठीक नहीं समझा इस लिए उसे ये कह कर वापस भेज दिया कि मैं जल्दी ही तैयार हो कर आता हूं।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं अपने कमरे से निकला। यूं तो मैं कभी भी किसी देवी देवता की पूजा अर्चना नहीं करता था लेकिन आज मन ही मन मैं ईश्वर से फ़रियाद कर रहा था कि जिस काम से आज मैं बड़े भैया को ले कर जाने वाला था वो काम पूरी सफलता से पूर्ण हो जाए। अपने कमरे से निकल कर मैं लंबी राहदारी से चलते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ चला। आगे चल कर एक ऐसा मोड़ आया जिस तरफ भैया भाभी का कमरा था। मैंने दो पल रुक कर भाभी के कमरे की तरफ नज़र डाली और फिर आगे बढ़ चला। अभी मैं सीढ़ियों पर उतरने ही वाला था कि नीचे से भाभी ऊपर की तरफ आती हुई दिखीं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। उन्हें ऊपर की तरफ आते देख मैं अपनी जगह पर रुक गया। रागिनी भाभी की नज़र भी मुझ पर पड़ चुकी थी।

"प्रणाम भाभी।" वो जैसे ही ऊपर मेरे पास पहुंचीं तो मैंने बड़े अदब से उन्हें प्रणाम किया जिस पर वो हल्की मुस्कान में बोलीं____"हमेशा खुश रहो और ईश्वर तुम्हें हर क़दम पर कामयाबी प्रदान करे।"

"बड़े भैया कहां हैं भाभी?" मैंने उनसे पूछा।

"वो अभी कुछ देर पहले ही तैयार हो कर नीचे गए हैं।" भाभी ने कहा____"पिता जी ने उन्हें तलब किया था। शायद वो उन्हें अपने साथ कहीं ले जाने वाले हैं।"

"हां भाभी।" मैंने कहा____"और पिता जी के साथ मैं भी जा रहा हूं। बहुत जल्द आपको एक खुश ख़बरी सुनने के मिलेगी।"

"ऐसा मेरा नसीब कहां।" भाभी ने सहसा उदास भाव से कहा_____"बल्कि मेरा भाग्य तो बहुत जल्द एक ऐसे दुख का दामन थाम लेने वाला है जो ताउम्र मुझे बस दुख ही देता रहेगा।"

"ऐसा कुछ भी नहीं होगा भाभी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"और ऐसा मैं होने भी नहीं दूंगा। मेरे रहते ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता जिसकी वजह से मेरी भाभी का चांद की मानिंद चमकता हुआ चेहरा मलिन पड़ जाए।"

"अपने नसीब पर किसी का ज़ोर नहीं होता वैभव।" भाभी ने गंभीरता से कहा____"तुम ये सब सिर्फ़ भावनाओं में बह कर कह रहे हो और मुझे अच्छा भी लगता है कि थोड़ी देर के लिए ही सही तुम अपनी इन बातों से मेरा मन बहला देते हो।"

"शायद आपको अपने इस देवर पर यकीन नहीं है भाभी।" मैंने उनके चेहरे को देखते हुए कहा____"पर बहुत जल्द आपको यकीन भी हो जाएगा। हमारी वापसी का इंतज़ार कीजिएगा। अच्छा अब चलता हूं, प्रणाम।"

भाभी से आशीर्वाद ले कर मैं तेज़ी से सीढ़ियां उतरता हुआ नीचे आया। उनकी बेयकीनी के चलते मेरे मन में एक अजीब तरह की दृढ़ता पैदा हो गई थी। मैंने निश्चय कर लिया था कि अब चाहे जो भी करना पड़े लेकिन भाभी को इस बात का यकीन दिला के रहूंगा कि जो कुछ मैंने उनसे कहा है वो सिर्फ़ उनका मन बहलाने के लिए नहीं कहा है बल्कि मेरे हर लफ्ज़ में कूट कूट कर सच्चाई भरी हुई थी।

नीचे पिता जी के साथ जगताप चाचा और बड़े भैया नास्ते के लिए बैठे हुए थे। मैं भी जा कर एक कुर्सी पर बैठ गया। जल्दी ही हम सबके सामने नास्ते की थाली आ गई और हम सबने नास्ता शुरू कर दिया। खाते वक्त हमेशा की तरह ख़ामोशी ही छाई रही। नाश्ता खत्म होने के बाद पिता जी ने मुझे जीप निकालने को कहा। मां और मेनका चाची को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था कि हम लोग कहां और किस सिलसिले में जा रहे हैं और न ही उन्होंने पूछने की कोशिश की थी। पिता जी के किसी भी काम में या कहीं आने जाने के बारे में कोई कुछ भी नहीं पूछता था। जगताप चाचा को पिता जी ने शायद इस बारे में बता दिया था। ख़ैर जल्दी ही हवेली से हमारा काफ़िला निकल पड़ा। एक जीप में मैं पिता जी और बड़े भैया बैठे हुए थे जबकि दूसरी जीप में जगताप चाचा थे। उनके पीछे दो जीपों में हमारे वो आदमी थे जो हथियारों से लैस थे।

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उस दिन जब मैंने जगन को किसी तांत्रिक का पता लगाने का काम सौंपा था तब उसने मुझे दो तांत्रिकों के बारे में पता कर के बताया था। पिछले दिन जब हम लोग तांत्रिक के पास गए थे तो सबसे पहले उस तांत्रिक से मिले थे जिसका आशियाना थोड़ा पास में पड़ता था। उससे जब हमने पुछतांछ की थी तो यही पता चला था कि उसके यहां ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं आया था जिसने उससे किसी पर तंत्र मंत्र करने के लिए कहा हो। उसका कहना था कि वो तंत्र मंत्र और झाड़ फूंक वाला काम सिर्फ लोगों के हित के लिए करता है। आस पास के कुछ लोगों से भी इस बात की पुष्टि हुई थी। हमारे पूछने पर उसने बताया था कि नाहरपुर के जंगल में एक तांत्रिक ज़रूर ऐसा है जो धन के लालच में किसी के भी कहने पर तंत्र मंत्र या जादू टोना जैसी क्रिया करता है। जगन से मुझे पहले ही नाहरपुर वाले तांत्रिक के बारे में पता चल चुका था किंतु उसने ये नहीं बताया था कि वो तांत्रिक किसी के कहने पर ऐसा कुछ करता है। संभव है जगन को ये सब न पता रहा हो।

हमारे गांव से बीस या बाईस किलो मीटर की दूरी पर बजरंगपुर नाम का एक गांव था। बजरंगपुर गांव पहाड़ी इलाका था किंतु उन पहाड़ों पर पेड़ पौधे न के बराबर ही थे। उन पहाड़ों में ज्यादातर कंकड़ पत्थर या मुरुम जैसी कंक्रीट की भरमार थी। कई रंग के गेरु और सफेद छुई की छोटी बड़ी खदानें भी थीं उन पहाड़ों में। गांव के समीप ही एक टीलेनुमा छोटा सा पहाड़ था जिसमें हनुमान जी का एक बड़ा सा मंदिर बना हुआ था। लोगों का कहना था कि हनुमान जी के मंदिर में रहने वाला पुजारी ही झाड़ फूंक का काम करता था। कुछ लोग उसे तांत्रिक भी मानते थे। उसके द्वारा की गई झाड़ फूंक से लोगों पर छाया हुआ जादू टोना एकदम छू मंतर हो जाता था।

हम क्योंकि पिछले दिन भी यहां आ चुके थे इस लिए हमें यहां पहुंचने में कोई समस्या नहीं हुई थी। यद्यपि सारे रास्ते हमें इसी बात का अंदेशा था कि हमारा शातिर दुश्मन कहीं रास्ते में हम पर हमला न करे लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ था और ये हमारे लिए हैरानी की बात भी थी। ख़ैर हमारा काफ़िला उस हनुमान जी के मंदिर के पास ही जा कर रुका था। गांव से हो कर जब हमारा काफ़िला गुज़रा था तो गांव के लोग चकित से हमें ही देखने लगे थे। ज्यादातर लोग पिता जी और जगताप चाचा के बारे में जानते थे और उन्हें पहचानते भी थे इस वजह से सब उन्हें सलाम भी कर रहे थे।

सारे रास्ते बड़े भैया शांत बैठे हुए थे जबकि मैं पिता जी से थोड़ी बहुत बातें करता रहा था। ख़ैर मंदिर में पहुंचने के बाद हम सब जीप से उतरे। हमारी सुरक्षा के लिए आए हमारे कुछ आदमियों को पिता जी ने जीपों के पास ही रुक कर कड़ी निगरानी रखने के लिए कह दिया था और कुछ आदमी हमारे साथ चल पड़े थे।

सुबह का समय था इस लिए मंदिर में गांव के लोग पूजा अर्चना के लिए आ जा रहे थे और कुछ लोग पुजारी से झाड़ फूंक करवाने के लिए थोड़ी दूरी पर बैठे थे। हम लोग जैसे ही वहां पहुंचे तो पुजारी ने हमें देख कर दूर से ही अभिनंदन किया और अपने बाएं तरफ खड़े एक आदमी से कुछ कहा जिस पर उस आदमी ने आ कर हमें एक जगह बैठाया। पुजारी एक औरत के साथ झाड़ फूंक कर रहा था। कुछ समय बाद जब वो फारिग़ हुआ तो खड़े हो कर हमें बुलाया। पिता जी ने जगताप चाचा से कुछ कहा जिस पर जगताप चाचा उठे और हम दोनों भाईयों को इशारे से अपने पीछे आने को कह कर पुजारी के पास चल दिए। कुछ ही देर में मैं और बड़े भैया जगताप चाचा के साथ उस पुजारी के पास पहुंच गए। जगताप चाचा ने पहले बड़े भैया को उस जगह पर बैठने को कहा जहां पर कुछ देर पहले वो औरत बैठी झाड़ फूंक करवा रही थी। चाचा जी के कहने पर बड़े भैया चुप चाप उस जगह पर बैठ गए। मैंने पलट कर देखा तो पिता जी भी अपनी जगह से उठ कर हमारे पीछे आ गए थे।

पुजारी के इशारे पर उसका एक आदमी मंदिर के अंदर गया और जब वापस आया तो उसके हाथ में एक पन्नी थी जिसमें कुछ चीज़ें डली हुई थीं। जिनमें नारियल अगरबत्ती और कुछ फूल थे। पुजारी ने उस पन्नी को जगताप चाचा को दिया और कहा कि वो मंदिर में जा कर बजरंगबली की पूजा करें। जगताप चाचा के जाने के बाद पुजारी ने बड़े भैया की दाहिनी कलाई अपने हाथ में ली और फिर अपनी आंखें बंद कर ली।

"क्या बात है पुजारी जी?" पुजारी ने बड़े भैया की कलाई छोड़ कर जैसे ही अपनी आंखें खोली तो पिता जी पूंछ बैठे____"क्या सच में हमारे बेटे पर उसी का असर है जिसके चलते हम यहां आए हैं?"

"जी बिलकुल ठाकुर साहब।" पुजारी ने गंभीर भाव से कहा____"इन पर काला जादू किया गया है। शुक्र है कि आप इन्हें समय पर यहां ले आए अन्यथा अनर्थ हो जाता। इन पर किए गए काले जादू का अब अंतिम चरण लगने वाला था और उस चरण में पहुंचने के बाद इनका बच पाना संभव नहीं होता।"

पुजारी की ये बातें सुन कर हम सब स्तब्ध रह गए थे। मुझे तो पक्का यकीन था कि बड़े भैया पर तंत्र मंत्र का ही प्रभाव था किन्तु पिता जी को शायद अभी भी संदेह था और यही वजह थी कि पुजारी की ऐसी बातें सुन कर वो अवाक से रह गए थे। उधर जगताप चाचा का भी कुछ उनके जैसा ही हाल था। बड़े भैया पर इस बारे में क्या प्रतिक्रिया हुई थी ये हम में से कोई नहीं देख सकता था क्योंकि उनका चेहरा पुजारी की तरफ था।

"फ़िक्र मत कीजिए ठाकुर साहब।" पिता जी को यूं अवाक देख पुजारी ने कहा____"जैसा कि मैंने कहा आप इन्हें समय पर ले आए हैं इस लिए अब कोई अनर्थ नहीं हो पाएगा।"

"आप हमारे बेटे को इस काले जादू से मुक्त कीजिए पुजारी जी।" पिता जी अधीरता से बोले____"और साथ ही ये भी बताने का कष्ट करें कि हमारे बेटे पर काले जादू का प्रयोग करने वाला वो दुष्ट कौंन है, ताकि हम उसे ऐसी भयावह मौत दे सकें जिसकी उसने कल्पना भी ना की हो।"

"धीरज से काम लीजिए ठाकुर साहब।" पुजारी ने नम्रता से कहा____"आपके बेटे को मैं पूरी तरह काले जादू से मुक्त कर दूंगा। रही बात इन पर काला जादू करने वाले के बारे में बताने की तो माफ़ कीजिए ये मैं नहीं बता सकता।"

"क्यों?" पिता जी से पहले जगताप चाचा थोड़े नाराज़ लहजे में बोल पड़े____"क्यों नहीं बता सकते आप? क्या कोई मजबूरी है आपकी जो आप उस दुष्ट व्यक्ति के बारे में बता नहीं सकते?"

"ऐसा ही समझ लीजिए ठाकुर साहब।" पुजारी ने कहा____"मैं अपने बजरंगबली की कृपा से सिर्फ़ लोगों के कष्ट दूर करता हूं। मुझे मेरे ईष्ट का ये आदेश नहीं है कि मैं कष्ट देने वाले का नाम पता बताऊं। वो कहते हैं कि बुरा कर्म करने वालों को सजा देने का अधिकार इंसानों को नहीं है। मैं आपसे इतना ज़रूर कह सकता हूं कि ये सब आपके दुश्मनों का ही किया हुआ है।"

पुजारी की इन बातों ने हम सबको मानों गहरी सोच में डाल दिया था। उसने जो कहा था वो अपनी जगह यकीनन सही था लेकिन हमारे लिए ये जानना बेहद ज़रूरी था कि बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवाने वाला कौन है? ये तो स्पष्ट हो चुका था कि उन पर काले जादू का प्रयोग नाहरपुर के जंगल में रहने वाले उस तांत्रिक ने ही किया था किंतु उसे ऐसा करने के लिए किसने कहा था ये जानना अति आवश्यक था।

पुजारी ने बड़े भैया पर किए गए काले जादू को दूर करने की क्रिया शुरू कर दी थी। हम लोगों के पास ख़ामोशी से वो सब देखने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था। क़रीब आधे घंटे बाद पुजारी की क्रियाएं समाप्त हुई और उसने बड़े भैया को उठ जाने का इशारा किया।

"इसको आप हमेशा अपने गले पर ही पहने रहिएगा।" पुजारी ने बड़े भैया को एक विशेष तरह का धागा देते हुए कहा____"इसके प्रभाव से किसी भी तरह का जादू आप पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेगा।"

पुजारी के ऐसा कहने पर बड़े भैया ने उस विशेष धागे को सिर से डाल कर गले में धारण कर लिया और फिर हाथ जोड़ कर पुजारी को प्रणाम कर वो हमारे पास आ गए। मैंने देखा उनका चेहरा पहले से कुछ अलग ही नज़र आ रहा था।

"अब हमारे इस बेटे को भी देखिए।" पिता जी ने मेरी तरफ संकेत करते हुए पुजारी से कहा____"क्या इस पर भी ऐसा कोई जादू किया गया है?"

पिता जी के इशारे पर मैं आगे बढ़ा और उसी जगह पर जा कर बैठ गया जहां इसके पहले बड़े भैया बैठे हुए थे। पुजारी ने मुझे अपना दाहिना हाथ बढ़ाने को कहा तो मैंने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया। पुजारी ने मेरी कलाई पकड़ अपनी आंखें बंद कर ली। मेरी धड़कनें ये सोच कर थोड़ा तेज़ हो गईं थी कि क्या सच में मुझ पर भी ऐसा कोई जादू किया गया होगा या फिर ये सिर्फ़ मेरा वहम था?

"ह्म्म्म।" पूजारी ने अपनी आंखें खोल कर हुंकार सी भरी____"उसका असर तो तुम भी डाला गया है लेकिन वैसा नहीं जैसा तुम्हारे बड़े भाई पर डाला गया था।"

"हम कुछ समझे नहीं पुजारी जी।" पिता जी ने उलझनपूर्ण भाव से पूछा।

"आपके बड़े बेटे पर काले जादू का प्रभाव डाला गया था जिससे एक निश्चित समय आने पर उनकी मौत होनी तय थी।" पुजारी ने मानों समझाते हुए कहा____"लेकिन आपके दूसरे बेटे पर काले जादू का असर थोड़ा सा ही डाला गया था। काले जादू के उस थोड़े प्रभाव से इन्हें बस थोड़ा बहुत ही प्रभाव पड़ता रहा होगा। ख़ैर चिंता करने की कोई बात नहीं है ठाकुर साहब, मैं इन्हें भी एक ताबीज बना के दे देता हूं।"

पुजारी की बात सुन कर पिता जी ने सहमति में सिर हिलाया। उधर पुजारी अपने पास रखी कुछ अजीब सी चीज़ों को ले कर कुछ करने लगा। जल्दी ही उसने एक छोटी सी ताबीज बना दी और मेरी तरफ बढ़ाया जिसे मैंने उसके हाथ से उठा लिया।

"ये क्या है?" पुजारी ने अचानक मेरी उंगली में फंसी अंगूठी को देखते हुए कहा____"ज़रा इसे उतार कर दिखाइए मुझे।"

"क्या बात है पुजारी जी?" पुजारी के ऐसा कहने पर पिता जी एकदम से बोल पड़े थे जबकि पुजारी कुछ देर तक मेरी अंगूठी को देखता रहा उसके बाद सिर उठा कर पिता जी से बोला____"ज़्यादा गंभीर बात नहीं है ठाकुर साहब लेकिन थोड़ी बहुत तो है ही। आपके बेटे ने जो अंगूठी पहनी हुई है वो मामूली अंगूठी नहीं है। इस अंगूठी पर जड़ा हुआ ये पत्थर बहुत ही खास है। इसकी खासियत ये है कि अगर इसे सही मात्रा में कोई धारण करता है तो उसके बहुत से लाभ होते हैं किंतु अगर इसकी मात्रा उचित न हो तो इसको धारण करने से हानि भी होती है।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" जगताप चाचा चौंकते हुए बोल पड़े____"भला किसी अंगूठी से ऐसा कैसे हो सकता है?"

"आप बड़े लोग हैं ठाकुर साहब।" पुजारी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"संभव है कि आप इन सब बातों को नहीं मानते होंगे लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी भी होती हैं जो अप्रतक्ष रूप से अपना असर दिखाती हैं। ये अलग बात है कि लोगों का ध्यान उस तरफ नहीं जाता या लोग उस पर यकीन नहीं करते।"

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं पुजारी जी?" पिता जी ने कहा____"आखिर इस अंगूठी में ऐसा क्या है जिसके बारे में आप ऐसा कह रहे हैं?"

"इस अंगूठी में लगे पत्थर में खास बात है ठाकुर साहब।" पुजारी ने अंगूठी को पिता जी की तरफ उठा कर दिखाते हुए कहा____"इस पत्थर को सुलेमानी हकीक पत्थर कहा जाता है। यूं तो ये जिसके भी पास होता है वो बेहद ही भाग्यशाली होता है लेकिन इस पत्थर को अंगूठी के साथ पहनने के भी कुछ धार्मिक नियम होते हैं। बिना किसी ज्योतिषी की सलाह लिए इसे नहीं पहनना चाहिए। अगर कोई इंसान इस पत्थर को अंगूठी के रूप में धारण करने का इच्छुक है तो सबसे पहले किसी अच्छे ज्योतिषी के पास जा कर उसे अपनी कुंडली दिखानी चाहिए, उसके बाद ज्योतिषी की सलाह और उसके निर्देश पर ही इस पत्थर को धारण करना चाहिए।"

"बड़ी अजीब और हैरत की बात है।" पिता जी ने हैरानी भरे भाव से कहा____"तो क्या इसकी वजह से भी हमारे बेटे के साथ कुछ बुरा होता रहा होगा?"

"आप मानें या न मानें किंतु मुझे पूरा यकीन है ठाकुर साहब।" पुजारी ने दृढ़ता से कहा____"जैसा कि मैंने पहले बताया कि सुलेमानी हकीक जिसके पास भी होगा वो बहुत ही भाग्यशाली होगा किंतु ऐसा तभी होगा जब उस पत्थर को धारण करने वाले इंसान ने उसे ज्योतिषी के परामर्श से उचित माप में पहना हो, अन्यथा इसके दुष्प्रभाव भी होते हैं।"

"शायद आप सही कह रहे हैं।" पिता जी ने ठंडी सांस लेते हुए कहा____"संभव है इस पत्थर का ही प्रभाव हो कि इसके साथ अब तक जो कुछ भी हुआ है वो बुरा ही हुआ है। हालाकि ऐसा हमेशा से नहीं था, इसका क्या मतलब हो सकता है?"

"हो सकता है कि इन्होंने सुलेमान हकीक पत्थर वाली ये अंगूठी अभी कुछ समय पहले ही अपनी उंगली पर पहनी हो।" पुजारी ने मानों अपनी संभावना ज़ाहिर की थी और उसकी ये बात सुन कर मैं चौंकते हुए एकदम से बोल पड़ा था____"आपने बिलकुल सही कहा। ये अंगूठी मैंने आज से क़रीब छह महीने पहले पहनी थी। असल में मेरा एक पूराना मित्र था जो मुझे शहर में मिला था। ये अंगूठी उसी की है, मुझे पसंद आ गई थी तो उसने खुशी से मुझे दे दिया था।"

"इसका मतलब मेरा अंदेशा सही था।" पुजारी ने मुस्कुराते हुए कहा____"ये अंगूठी आपके मित्र की है और निश्चित तौर पर उसने किसी ज्योतिषी की सलाह से ये पत्थर एक निश्चित और उचित माप पर अंगूठी में डलवाया रहा होगा।"

"अब ये तो मुझे नहीं पता।" मैंने कहा___"लेकिन इतना ज़रूर कहूंगा कि वो काफी खुश था और उसका काम धंधा भी ठीक ठाक चल रहा है।"

"ख़ैर जो भी हो।" सहसा पीछे से पिता जी ने कहा____"लेकिन अब से तुम इस अंगूठी को नहीं पहनोगे।"

"ठाकुर साहब, आज के युग में इंसान ऐसी बातों को नहीं मानता।" पुजारी ने कहा____"जबकि इस बात को सच मनाइए कि इंसान जिन्हें छोटी और मामूली चीज़ें समझता है और उन पर ध्यान नहीं देता असल में वही मामूली चीज़ें हमारा बहुत कुछ नुकसान कर रही होती हैं।"

कुछ देर और पुजारी से बात चीत हुई उसके बाद हम सब ने मंदिर में पूजा अर्चना की। इस सबसे फुर्सत होने के बाद हमारा काफ़िला वापस हमारे गांव की तरफ चल पड़ा। यहां आने का सिर्फ यही एक फ़ायदा हुआ था कि बड़े भैया पर छाया हुआ मौत का संकट अब पूरी तरह से टल गया था किंतु इस बात से हमें निराशा ही हुई थी कि हमारे साथ ये सब करने या करवाने वाला आख़िर कौन था?



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अध्याय - 46

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अब तक....



कुछ देर और पुजारी से बात चीत हुई उसके बाद हम सब ने मंदिर में पूजा अर्चना की। इस सबसे फुर्सत होने के बाद हमारा काफ़िला वापस हमारे गांव की तरफ चल पड़ा। यहां आने का सिर्फ यही एक फ़ायदा हुआ था कि बड़े भैया पर छाया हुआ मौत का संकट अब पूरी तरह से टल गया था किंतु इस बात से हमें निराशा ही हुई थी कि हमारे साथ ये सब करने या करवाने वाला आख़िर कौन था?



अब आगे....



हमें अपने दुश्मनों के द्वारा भले ही शिकस्त मिली हो लेकिन बड़े भैया के पूरी तरह ठीक हो जाने पर हम सब बेहद खुश थे। पिता जी का चेहरा एक अलग ही तरह से चमक रहा था। वो बार बार मेरी तरफ ऐसी नज़रों से देखने लगते थे मानों मुझसे बहुत कुछ कहना चाहते हों लेकिन फिर कुछ सोच कर जैसे अपना इरादा बदल लेते थे। बड़े भैया भी बेहद खुश थे। मंदिर से जब हम चले थे तो उन्होंने सबसे पहले मुझे अपने गले से लगाया था। उस समय वो बहुत ही ज़्यादा भावुक हो गए थे और बार बार मुझे इस सबके के लिए धन्यवाद दे रहे थे। अपने बड़े भैया को वापस पा कर मैं भी बहुत खुश था। मुझे ये सोच सोच कर अब कुछ ज्यादा ही खुशी महसूस हो रही थी कि मैंने भाभी से किए गए अपने वादे को पूरा कर दिया था और उनसे जो कहा था वो कर दिखाया था। मेरा जी चाह रहा था कि कितना जल्दी मैं भाभी के पास पहुंच जाऊं और उनसे कहूं कि आपने जिस दुख को अपना भाग्य समझ लिया था उस भाग्य को मैंने उनसे इतना दूर कर दिया है कि अब वो फिर से उन्हें दुख देने के लिए वापस लौट कर नहीं आएगा।

दोपहर का समय था। हवेली में पहुंच कर हमारा काफ़िला रुका। पिता जी बड़े भैया को ले कर हवेली के अंदर की तरफ चल दिए। जीप को खड़ी कर के मैं भी भागते हुए उनके पास ही आ गया था। पीछे से जगताप चाचा भी आ गए थे। उनके चेहरे पर भी खुशी के भाव उजागर हो रहे थे। यूं तो बड़े भैया पिता जी के सामने ज़्यादा नहीं बोलते थे लेकिन आज वो खुल कर बातें करते हुए आए थे। ज़ाहिर है अब वो किसी बुरी शक्ति के प्रभाव में नहीं थे। ख़ैर हम सब अंदर पहुंचे। मां, मेनका चाची, कुसुम और रागिनी भाभी हमारा ही इंतज़ार कर रहीं थी।

अंदर एक तरफ एक लंबा चौड़ा हाल था जहां पर किनारे किनारे कतार से कुर्सियां लगी हुईं थी और उन सभी कुर्सियों के सामने लकड़ी के नक्काशीदार स्टूल रखे हुए थे। हम सब उस हाल में आ कर ही अपनी अपनी जगह पर बैठ गए। पिता जी का आसन बाकी सबसे अलग था। हम लोगों के बैठते ही हवेली की नौकरानियां जल्दी जल्दी काम पर लग गईं। पिता जी के कहने पर मां, मेनका चाची, कुसुम और रागिनी भाभी भी वहीं आ कर बैठ गईं। विभोर और अजीत हवेली में नहीं थे, जिसके लिए जगताप चाचा फिर से नाराज़ हो गए लेकिन पिता जी ने उन्हें शांत किया। सब लोगों के बैठ जाने के बाद पिता जी ने मां, मेनका चाची और कुसुम को वो सब बताना शुरू किया जो कुल गुरु ने बड़े भैया के संबंध में भविष्यवाणी के रूप में पिता जी को बताया था। सारा किस्सा बताने के बाद पिता जी ने उन्हें ये भी बताया कि कैसे मुझे बड़े भैया पर तंत्र मंत्र किए होने का पता चला और फिर कैसे आज हम उस सबके लिए एक ख़ास पुजारी के पास गए थे जिसने बड़े भैया पर किए गए तंत्र मंत्र को दूर किया है।

पिता के बताने के बाद हाल में कुछ पलों के लिए सन्नाटा सा छा गया था लेकिन फिर एकदम से मां के चिल्ला उठने और उनके रोने की आवाज़ों से पूरा हाल गूंज उठा। मां अपनी जगह से उठ कर भागती हुई बड़े भैया के पास आईं और उन्हें अपने कलेजे से लगा कर बुरी तरह रोने लगीं थी। मेनका चाची और कुसुम भी रो रहीं थी। रागिनी भाभी को तो पहले से ही ये सब पता था लेकिन जब उन्हें पिता जी के द्वारा ये ज्ञात हुआ कि बड़े भैया अब ठीक हैं और उन्हें कुछ नहीं होगा तो वो जैसे स्तब्ध रह गईं थी। उन्हें जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था मगर सच तो सच ही था। उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो उनकी आंखों से आसूं छलक पड़े। वो दुख के आंसू नहीं थे बल्कि खुशी के थे और मेरे प्रति कृतज्ञता के थे। अगर उनका बस चलता तो वो सबके सामने दौड़ कर मेरे पास आतीं और मुझे खुशी के मारे गले से लगा लेतीं।

काफी देर तक मां बड़े भैया को अपने कलेजे से लगाए रोती रहीं। उधर बड़े भैया मां को ये कह कर शांत्वना देते रहे कि अब वो ठीक हैं और उन्हें छोड़ कर कभी कहीं नहीं जाएंगे, बल्कि हमेशा वो उनकी और पिता जी की सेवा में हाज़िर रहेंगे। आख़िर बड़ी मुश्किल से मां शांत हुईं। उनके बाद मेनका चाची और कुसुम भी बड़े भैया के पास आ कर मां के जैसे ही उनसे लिपटी रोती रहीं। कुछ देर बाद जब सब कुछ सामान्य हो गया तो पिता जी ने सबसे कहा कि आज कल जिस तरह के हालात हैं उससे हवेली के हर सदस्य को सतर्क रहने की ज़रूरत है। रात में कोई भी अकेले हवेली से बाहर न जाए और अगर जाए भी तो अपने साथ अपने सुरक्षा करने वाले आदमियों को साथ ले कर जाए।

पिता जी काफी देर तक सबको इस सबके के बारे में समझाते बुझाते रहे उसके बाद खाना खाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। भोजन के बाद हम सब आराम करने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए।

अपने कमरे में पलंग पर लेटा मैं आज जो कुछ हुआ उसके बारे में ही सोच रहा था। पिछली रात पिता जी से हुई बातों के बाद हम इसी नतीजे पर पहुंचे थे कि ये सब करने वाले यकीनन जगताप चाचा ही होंगे। शक की सुई सबसे ज़्यादा जगताप चाचा की तरफ ही घूम रही थी और इसके कई सारे कारण थे। पहला यही कि अब तक सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही मौत के मुंह में पहुंचाने की कोशिश की गई थी जबकि जगताप चाचा के बेटों पर किसी प्रकार की कोई आंच तक नहीं आई थी। अगर कोई हमें और हमारे सुमूचे खानदान को ही ख़त्म कर देना चाहता है तो वो हम दोनों भाईयों के साथ साथ जगताप चाचा के बेटों को भी क्षति पहुंचाने की कोशिश करता, जबकि ऐसा आज तक न हुआ था। ज़ाहिर है या तो जगताप चाचा दुश्मन से मिले हुए थे या फिर वो खुद ही ये सब कर रहे थे। ज़मीन जायदाद के कागज़ातों को प्राप्त करना सबसे ज़्यादा उनके लिए ही ज़रूरी था और इसी बात से शक की सुई उन पर ही घूम कर रुक जा रही थी। दूसरी बात, उनके दोनों बेटे जिस तरह से बर्ताव कर रहे थे अथवा जिस तरह से मुझे नामर्द बना देने की कोशिश में लगे हुए थे उससे यही लगता था कि वो ये सब किसी के कहने पर ही कर रहे थे। संभव है जगताप चाचा गुप्त रूप से ऐसा करने के लिए उन्हें कह रखा हो किंतु प्रत्यक्ष में वो उन दोनों पर नाराज़गी और गुस्सा इसी लिए दिखाते होंगे ताकि हम उन पर शक न कर सकें। अब सवाल ये है कि अगर ऐसा ही है तो इसके लिए उन्होंने अपनी बेटी या अपनी बहन का सहारा क्यों लिया? कुसुम से ऐसा घटिया काम क्यों करवाया होगा? ये ऐसी बात थी जो मुझे सोचने पर मजबूर कर रही थी और यही लगता था कि नहीं वो इस हद तक नहीं गिर सकते कि अपनी ही बेटी को ऐसे गंदे दलदल में डुबाने का सोचेंगे। यकीनन वो इसके लिए कोई दूसरा रास्ता चुनते। विभोर और अजीत का तो समझ में आता था कि वो कुसुम से ऐसा करवाने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाएंगे लेकिन इसके लिए जगताप चाचा ने भी सहमति दी होगी ये मैं मानने को तैयार नहीं था। इससे यही बात स्पष्ट होती थी कि ये सब विभोर और अजीत ने खुद ही किया होगा, ये अलग बात है कि इसके लिए उन दोनों ने साहूकार के बेटे गौरव से हाथ मिलाया था। अब सवाल ये भी है कि क्या गौरव अपनी मर्ज़ी से विभोर और अजीत का साथ दे रहा है या इसके लिए उसे अपने घर वालों की भी सहमति प्राप्त है? मुझे गौरव और रूपचंद्र पर ज़रा भी भरोसा नहीं था। हालाकि रूपचंद्र को मैंने शीशे में उतारा था लेकिन वो कुत्ते की दुम की तरह था। यानि वो अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं था। मौजूदा वक्त में भले ही उसने मुझे अपना दोस्त स्वीकार कर लिया था लेकिन मुझे यकीन था कि इसके बावजूद उसके मन में मेरे प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना ही होगी।

मेरे मन में एक ख़्याल और भी उभर रहा था और वो ये कि जिस तरह से जगताप चाचा पर सबसे ज़्यादा शक की सुई घूम कर अटकी हुई थी उससे क्या ये नहीं हो सकता कि हमारा असली दुश्मन यही चाहता हो कि हम उन पर ही शक करें? मौजूदा हालात में तर्क वितर्क के द्वारा भले ही हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हों कि ये सब जगताप चाचा ही कर रहे होंगे पर ऐसा भी तो संभव है कि हमारा दुश्मन जान बूझ कर उन्हें हमारे शक के दायरे में ला रहा हो। दुश्मन का मकसद यही हो सकता है कि वो हमारे बीच फूट डालना चाहता होगा ताकि हम आपस में ही मन मुटाव रखने लगें जिससे नौबत यहां तक पहुंच जाए कि एक दिन हम एक दूसरे के ही दुश्मन बन जाएं। एक दूसरे का दुश्मन बन जाने के बाद क्या होगा ये किसी को भी समझने या समझाने की ज़रूरत नहीं थी।

इस सबके बारे में सोचते विचारते जाने कब मेरी आंख लग गई। उसके बाद किसी के द्वारा दरवाज़ा खटखटाए जाने पर ही मेरी आंखें खुली। दरवाज़ा खोला तो देखा बाहर रागिनी भाभी खड़ी थीं। मैंने देखा वो अपलक मुझे ही देखे जा रहीं थी। उनकी आंखों में आंसू झिलमिलाते हुए नज़र आए। उनके सुंदर से चेहरे पर ग्रहण पड़ा हुआ नज़र आया तो मैं सहसा चौंका।

इससे पहले कि मैं उनसे कुछ कहता वो तेज़ी से आगे बढ़ीं और एक झटके से मुझसे लिपट गईं। मैं उनके इस बर्ताव से पहले तो हड़बड़ा ही गया था किंतु अगले ही पल उनकी सिसकियां सुन कर शांत पड़ गया। मुझे समझते देर न लगी कि वो मेरे द्वारा किए गए कार्य पर इस तरह से अपनी खुशी और अपना दुख व्यक्त कर रहीं थी।

"ये...ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने शिकायती लहज़े में कहा____"आपने मुझसे वादा किया था कि आप मेरी प्यारी सी भाभी को बिलकुल भी नहीं रुलाएंगी और अब आप अपना वो वादा तोड़ रहीं हैं।"

"न..नहीं वैभव।" भाभी ने मुझसे छुपके हुए ही रूंधे गले से कहा____"मैं रो नहीं रही हूं और ना ही तुम्हारा वादा तोड़ रही हूं। ये तो खुशी के आंसू हैं। तुमने मुझे खुशी ही इतनी ज़्यादा दे दी है कि ये मुझसे सम्हाले ही नहीं गई। तुमने मेरी वीरान पड़ी दुनिया में बहार ला दी है। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि मेरे भाग्य में जो दुख लिख गया था वो पलक झपकते ही मुझसे दूर हो गया है। ऐसा लगता है जैसे मैं कोई ख़्वाब देख रही हूं।"

"शांत हो जाइए भाभी।" मैंने अपने हाथों को बढ़ा कर उनकी पीठ को सहलाते हुए कहा____"मुझे ये बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा कि आप मेरी इतनी प्यारी भाभी को रुला रही हैं।"

मेरी बात सुन कर भाभी मुझसे अलग हुईं तो मैंने देखा उनका चेहरा आंसुओं से भींग गया था। मुझे उनकी ऐसी हालत देख कर ज़रा भी अच्छा नहीं लगा। मैंने अपने दोनों हाथों से उनके आंसू पोंछे। वो बड़ी मासूमियत से मुझे ही देखे जा रही थीं।

"ये वो चेहरा है जिसे न तो उदास होने का हक़ है और ना ही इस तरह आंसुओं से भींग जाने का।" मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"बल्कि इस चेहरे को तो हर वक्त और हर पल सिर्फ़ और सिर्फ़ चांद की तरह चमकते ही रहना चाहिए।"

"अब से मेरा ये चेहरा तुम्हारे कहे अनुसार चांद की तरह ही चमकता रहेगा वैभव।" भाभी ने अपने एक हाथ से मेरे दाएं गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा____"आज तुमने मुझे वो खुशी दी है जिसके मिलने की मुझे ज़रा सी भी उम्मीद नहीं थी।"

"मैंने सिर्फ़ अपना फर्ज़ निभाया है भाभी।" मैंने कहा____"जबकि सच तो ये है कि ये खुशी आपके भाग्य में पहले से ही लिखी हुई थी। ख़ैर ये सब छोड़िए और ये बताइए कि अब बड़े भैया कैसे हैं?"

"वो अब ठीक हैं वैभव।" भाभी ने कहा____"जब से आए हैं तब से खुशी उनके चेहरे से जा ही नहीं रही है। मुझसे बहुत ही अच्छे से बातें की उन्होंने। अपने रूखे बर्ताव के लिए उन्होंने मुझसे माफ़ी भी मागी। ये भी कह रहे थे कि उनके छोटे भाई ने उन्हें नया जीवन दिया है और वो इसके लिए बहुत खुश हैं। उनके चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक दिख रही है।"

"चलिए अच्छी बात है भाभी।" मैंने कहा____"और हां, आप उनका ख़ास ख़्याल रखिएगा। काले जादू की वजह से उनके अंदर काफी कमज़ोरी आ गई होगी इस लिए ज़रूरी है कि उनका अच्छे से ख़्याल रखा जाए।"

"तुम्हें ये कैसे पता चला था वैभव कि उन पर तंत्र मंत्र किया गया है?" भाभी ने पूछा____"दादा ठाकुर के जहन में ऐसा विचार क्यों नहीं आया था?"

"बड़े भैया के बारे में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी ऐसी थी जिस पर मुझे बिलकुल भी यकीन नहीं हो रहा था।" मैंने कहा____"पता नहीं क्यों पर मुझे यही लगता था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है? यानि इसके पीछे कोई तो कारण ऐसा ज़रूर है जो फिलहाल समझ से परे है। ख़ैर ये तो संयोग की बात है कि एक दिन मेरी गांव के एक ऐसे आदमी से मुलाक़ात हो गई जिसने इस तरह के रहस्य के बारे में बताया। उसके बाद बड़े भैया को ठीक करवाना कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन इस सबकी वजह से हमें ये भी समझ आया कि कोई ऐसा ज़रूर है जो हमें नुकसान पहुंचाना चाहता है।"

"आख़िर ये सब क्या हो रहा है वैभव?" भाभी ने सोचने वाले भाव से कहा____"हमारी हवेली की दो दो नौकरानियों की अचानक से मौत हो गई। हम सब तो घबरा ही गए थे उस दिन।"

"फ़िक्र मत कीजिए भाभी।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आपसे बस इतनी ही गुज़ारिश है कि बड़े भैया का ख़्याल रखिए और उन्हें विभोर तथा अजीत के साथ कहीं भी आने जाने से रोक के रखिए।"

"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?" भाभी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा____"विभोर और अजीत के साथ उन्हें कहीं आने जाने से रोकने से तुम्हारा क्या मतलब है?"

"ज़्यादा मत सोचिए भाभी।" मैंने कहा____"जल्दी ही कुछ बातें आपको भी पता चल जाएंगी।"

कुछ देर और भाभी से बातें हुईं उसके बाद भाभी वापस चली गईं। भाभी के जाने के बाद मैं कुछ पलों तक उनके बारे में सोचता रहा फिर कपड़े पहन कर और पिता जी का दिया हुआ रिवॉल्वर शर्ट में छुपा कर कमरे से निकल गया।

नीचे आया तो देखा सब चाय पी रहे थे। कुसुम ने मुझे भी चाय दी। चाय के दौरान सबसे थोड़ी बहुत बातचीत हुई उसके बाद मैं बाहर की तरफ चल पड़ा। अभी मैं बैठक से होते हुए बाहर ही निकला था कि तभी एक दरबान सामने से आता हुआ दिखा। मुझ पर नज़र पड़ते ही पहले उसने मुझे सलाम किया और फिर बताया कि बाहर एक आदमी मुझसे मिलना चाहता है। मैं दरबान की बात सुन कर फ़ौरन ही बाहर उस आदमी के पास पहुंचा। वो आदमी मुझे देख कर थोड़ा एकांत में जा कर खड़ा हो गया। मैं जब उसके क़रीब पहुंचा तो उसने धीमी आवाज़ में मुझे जो कुछ बताया उसे सुन कर मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई। अंत में मैंने उसे अपना ख़्याल रखने को कहते हुए विदा किया और खुद वापस हवेली के अंदर की तरफ चल पड़ा।



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आसमान में चांद नहीं था इस लिए चारो तरफ अंधेरा फैल चुका था। उसी अंधेरे में दो इंसानी साए तेज़ी से एक तरफ को बढ़े चले जा रहे थे। दोनों के चेहरे पर चिंता और परेशानी के साथ साथ डर और घबराहट के भाव भी गर्दिश कर रहे थे। जल्दी ही वो पेड़ों के बीच से चलते हुए एक मकान के पास पहुंचे। दरवाज़े पर लगी लोहे की शांकल को पकड़ कर उन्होंने उसे दरवाज़े पर सावधानी से बजाया। परिणामस्वरूप कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुला। दरवाज़े के दूसरी तरफ एक युवक नज़र आया। युवक के चेहरे पर भी वैसे ही भाव थे जैसे उन दो इंसानी सायों के चेहरे पर थे। दरवाज़ा खुलते ही वो दोनों इंसानी साए जल्दी से अन्दर दाखिल हो गए। दोनों के अंदर जाते ही युवक ने दरवाज़ा बंद कर दिया। अंदर लालटेन का पीला प्रकाश फैला हुआ था जिसके चलते तीनों के चेहरे अब स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

"क्या हुआ तुम दोनों अभी तक वापस हवेली नहीं गए?" युवक ने चिंतित भाव से उन दोनों की तरफ देखते हुए पूछा था।

"कैसे जाएं गौरव?" दो में से एक ने घबराए हुए लहजे से कहा____"हवेली जाने का मतलब है अपनी दुर्दशा करवाना। अब तो भगवान भी हम दोनों को बचा नहीं सकता। हमने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि वक्त और हालात अचानक से यूं बदल जाएंगे और पलक झपकते ही हमारी गर्दनें किसी तेज़ धार वाली तलवार के निशाने पर आ जाएंगी।"

"सब कुछ ख़त्म हो गया विभोर।" गौरव ने हताश हो कर कहा____"तुम्हारी मित्रता के चलते मैंने तुम दोनों के साथ मिल कर जो कुछ किया है उसका अंजाम अब मुझे भी भुगतना पड़ेगा। दुनिया की कोई भी ताक़त अब हमें नहीं बचा सकती।"

"ऐसा मत कहो गौरव।" विभोर ने सहमे हुए भाव से कहा____"तुम तो शायद किसी तरह बच भी जाओ लेकिन हम दोनों तो सच में अब किसी भी तरह से नहीं बचने वाले। वो हरामज़ादा वैभव हम दोनों का बहुत बुरा हाल करेगा। पता नहीं कैसे उसे शीला पर शक हो गया? उसने उससे सब कुछ उगलवा लिया होगा।"

"आज मेरे एक दोस्त ने बताया कि शीला की हत्या एक ऐसे रहस्यमई आदमी ने की है जिसके समूचे जिस्म पर काला कपड़ा था।" गौरव ने कहा____"और हम यही समझ रहे थे कि शीला के द्वारा जब वैभव को सारा सच पता चला होगा तो वैभव ने गुस्से में आ कर उसकी हत्या कर दी होगी। मेरे दोस्त ने बताया कि वो शाम को दिशा मैदान के लिए गया हुआ था और उसने साफ देखा था कि एक काले कपड़ों से ढंके हुए आदमी ने एक औरत के गले को पलक झपकते ही अपने चाकू से चीर दिया था। पहले उसे उस औरत के बारे में पता नहीं था किंतु जब गांव में शीला की हत्या हो जाने की ख़बर फैली तो वो समझ गया कि जिस औरत को उसने देखा था वो शीला ही थी। ख़ैर अब सोचने वाली बात ये है कि काले कपड़ों से ढंका हुआ वो आदमी कौंन था और उसने शीला की हत्या क्यों की होगी?"

गौरव की बातें सुन कर विभोर और अजीत भौचक्के से उसकी तरफ देखते रह गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन दोनों के दिमाग़ ने काम ही करना बंद कर दिया था। शायद ये उन दोनों के लिए ऐसी ख़बर थी जिसके बारे में उन्होंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था।

"ये तो सच में हैरतंगेज बात है गौरव।" फिर अजीत ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आख़िर कौन हो सकता है वो काले कपड़े वाला और उसने शीला की इस तरह से हत्या क्यों की होगी?"

"मैं क्या बताऊं?" गौरव ने कहा____"मैं तो खुद ही दोपहर से इस बारे में सोच सोच कर परेशान हूं। वैसे इतना तो समझा ही जा सकता है कि शीला से उसकी कोई तो दुश्मनी ज़रूर रही होगी या फिर ये भी हो सकता है कि शीला से उसको किसी बात का ख़तरा रहा होगा।"

"अगर तुम्हारी बात सच है।" विभोर ने कुछ सोचते हुए कहा____"तो शायद हम बेकार में ही इतना परेशान और डरे हुए हैं।"

"क्या मतलब??" गौरव और अजीत ने एक साथ चौंक कर विभोर की तरफ देखा था।

"मतलब ये कि हो सकता है कि शीला वैभव के हाथ ही न लगी हो।" विभोर ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"बल्कि उससे पहले ही उस काले कपड़े वाले के द्वारा मार दी गई हो। अब जबकि शीला वैभव के हाथ ही न लगी होगी तो उसके द्वारा वैभव को कुछ पता चलने का सवाल ही नहीं पैदा होता। यानि हम सब बेकार में ही उससे इतना डरे हुए हैं।"

"हां, शायद तुम सही कह रहे हो।" गौरव के चेहरे पर सहसा चमक उभर आई थी, किंतु फिर जल्दी ही वो चमक गायब हो गई, बोला____"लेकिन एक समस्या तो अभी भी है।"

"कौन सी समस्या?" अजीत पूछे बगैर न रह सका था।

"तुम्हारी बहन कुसुम।" गौरव ने उन दोनों की तरफ देखते हुए कहा____"जैसा कि तुमने बताया था कि शीला के द्वारा मजबूर किए जाने पर ही कुसुम वैभव को चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर देती थी। अब जबकि उसको मजबूर करने वाली ही नहीं रही तो संभव है कि कुसुम वैभव के पूछने पर हमारा भेद खोल दे।"

"मेरे ख़्याल से वो ऐसा नहीं करेगी।" विभोर ने कहा____"क्योंकि उसे भी पता है कि भेद खोलने पर उसे ये भी बताना पड़ेगा कि वो किस बात से मजबूर थी? मैं अपनी बहन को अच्छी तरह जानता हूं। वो मजबूरी में कोई भी काम करने को तैयार हो जाएगी लेकिन वैभव को इस बारे में कुछ नहीं बताएगी। वो किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहेगी कि जो भाई उसे सबसे ज़्यादा प्यार करता है उसकी नज़र में उसकी कोई औकात ही न रह जाए।"

"हो सकता है कि ऐसा ही हो।" गौरव ने कहा____"पर मुझे वैभव पर भरोसा नहीं है। अगर उसे शीला पर शक हुआ है तो वो कहीं न कहीं से सब कुछ पता कर ही लेगा और अगर ऐसा हुआ तो समझो हमारा अंजाम बहुत बुरा होगा।"

विभोर की बातों ने जहां कुछ पलों के लिए उनको राहत का आभास कराया था वहीं गौरव की इन बातों ने एक बार फिर से उनकी हालत ख़राब कर दी। विभोर और अजीत के चेहरों पर एक बार फिर से डर और घबराहट ने कब्जा कर लिया था।

"तुम दोनों को यहां नहीं आना चाहिए था।" दोनों को ख़ामोश देख कर गौरव ने कहा____"बल्कि वापस हवेली जाना चाहिए था। चेहरे पर ऐसे भाव रखने चाहिए ताकि किसी को भी किसी बात का शक ना हो। बाकी अब तो ये निश्चित है कि जो होना होगा वो हो के ही रहेगा। तुम दोनों की तरह मेरी भी हालत ख़राब है। अगर मेरे ऐसे कार्य की ख़बर मेरे घर वालों को लग गई तो बहुत कुछ बुरा हो जाएगा। तुम्हें तो पता है कि अब हम दोनों के परिवारों के बीच अच्छे संबंध बन गए हैं। मेरे इस कार्य से यकीनन हमारे परिवार के बीच फिर से दुश्मनी की दीवार खड़ी हो जाएगी।"

विभोर अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बाहर से किसी के द्वारा दरवाज़ा बजाए जाने से तीनों के तीनों ही उछल पड़े। पलक झपकते ही तीनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ती हुई नज़र आने लगीं। दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए वो अपलक देखने लगे थे। डर और घबराहट के मारे कुछ ही पलों में तीनों का बुरा हाल हो गया। सबकी आंखों में एक ही सवाल मानों ताण्डव सा करने लगा था कि कौन हो सकता है बाहर?



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