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- Dec 5, 2013
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नवाज़ के गुस्से के बावजूद, आरती ने डर से कांपते हाथों से फ़ोन उठा hi लिया. पर जैसे hi उसने अरविन्द की आवाज़ सुनी, उसके अंदर का सारा बाँध टूट गया. दुकान वाली औरत को लेकर उसके अंदर दौड़ रही जलन, नवाज़ के साथ हुई बहस की खिचाई, और रस्ते पर गिरने का dard—Aarti ने उन सबका गुस्सा एक झटके में अपने पति पर उतर दिया.
"Hello आरती! कहाँ हो? क्या कर रही हो?"
अरविन्द ने आम आवाज़ में पूछा.
"क्या करुँगी?!"
आरती ने बारिश के बीच छीलते हुए कॉल पर गुस्सा उतरा,
"आपने तोह मुझे अकेला छोड़ दिया है! जब हस्बैंड साथ में नहीं होता, तोह साड़ी मुश्किल और सब काम मुझे hi अकेले करने पड़ते हैं!"
अरविन्द ने हड़बड़ाकर पूछा,
"अरे, पर हुआ क्या है? क्या अब किराना भी मैं hi लून?"
"नहीं! किराना तोह मैं खुद hi लुंगी,"
आरती ने गुस्से में पाँव पटका,
"पर आपको क्या पता, उस चक्कर में मुझे रस्ते पर लोग ताने मारते हैं, मुझ पर लाइन मारते हैं! उसका क्या?!"
अरविन्द ने बिना किसी परवाह के मज़ाक़ में कहा,
"अरे, अब तुम इतनी खूबसूरत हो, तोह लोग लाइन मरेंगे hi न! इसमें इतना गुस्सा क्यों होना?"
अरविन्द की इस लापरवाही ने आरती की आग में घी का काम किया. उसने बाइक पर baithe-baithe hi नवाज़ की तरफ देखा और अरविन्द से बोली,
"अच्छा हुआ आप साथ में नहीं थे! आज उस लफंगे ने मेरे साथ बत्तमीज़ी की , नवाज़ ने तोह आगे बढ़कर मुझे बचा लिया! आप होते तोह खाक नहीं बचते मुझे!"
अरविन्द ने थोड़ा चिढ़कर कहा,
"अरे, ऐसी कैसे बात कर रही हो? मैं क्यों नहीं बचता?"
"क्या खाक बचते!"
आरती ने धरतेदार अंदाज़ में तनाव बढ़ाया,
"आप होते तोह kehte—'jaane दो, ध्यान मत दो.' आपको कहाँ मेरी इज़्ज़त की परवाह है! नवाज़ को मेरी इज़्ज़त की परवाह है, आपको नहीं! और मेरी सबसे ज़्यादा फ़िक्र भी उसी को रहती है!"
अरविन्द उन दोनों की इस लगातार तारीफ और झगडे से तंग आ चूका था. उसने गुस्से और chid-chidepan में कह दिया,
"तोह अच्छा है न! अगर तुम्हे इतना hi लगता है, तोह आगे से हमेशा उसके साथ hi घूमा करो!"
आरती ने इस मौके का पूरा फ़ायदा उठाया और नखरे से बोली,
"हाँ, घूमींगी! डर्टी हूँ क्या आप से?!"
अरविन्द ने भी गुस्से में बात को आखिरी मोड़ देते हुए कहा,
"डर मत! और एकदम बिंदास घूम नवाज़ के साथ!"
आरती ने शर्त राखी,
"बाद में मत कहना की क्यों घूम रही हो नवाज़ के साथ!"
"नहीं कहूंगा!"
अरविन्द ने साफ़ कह दिया,
"अगर तुम्हे नवाज़ के साथ घूमना पसंद है, तोह घूम उसके साथ. आखिर तुम्हारी सेफ्टी वह करता है न!"
आरती ने पूरे हक़ और तिरछी नज़र से नवाज़ को देखते हुई कहा ,
"हाँ... करता है!"
अरविन्द ने जैसे hi नवाज़ के साथ घूमने की बात कही, तोह थोड़ी देर फ़ोन पर ख़ामोशी छ गयी. फिर थोड़ा शांत होते हुए अरविन्द ने नरम आवाज़ में पूछा,
"तोह... ले लिया क्या किराना?"
"हाँ, ले लिया!"
आरती ने चिढ़ते हुए, पूरे हक़ से जवाब दिया.
आरती ने जिस तरह दुकान वाली औरत की जलन, नवाज़ के साथ हुई बहस का गुस्सा, और कीचड़ में गिरने की पूरी भड़ास अपने पति अरविन्द पर निकाल दी थी... उससे अरविन्द पूरी तरह दबे पाऊँ पीछे हैट चूका था. अरविन्द ने अपनी लापरवाही में खुद hi नवाज़ के साथ घूमने की इजाज़त दे दी थी, और इस वजह से आरती और नवाज़ के बीच का सामाजिक डर ख़तम हो गया था, जिसने उनके रिश्ते को और भी आसान बना दिया था.
आरती ने अब लोहा गरम देख कर आखिरी और सबसे बड़ा डाव खेला. उसने थोड़े नखरे से पूछा,
"फिर... कल मैं नवाज़ के साथ जाऊं क्या?"
अरविन्द ने बिना soche-samjhe पूछा,
"कहाँ?"
"खेत में... वहां कुछ काम है न,"
आरती ने तिरछी नज़र से नवाज़ को देखते हुए कॉल पर कहा.
अरविन्द ने अपनी उसी be-parwah और थके हुए लहजे में साफ़ कह दिया,
"हाँ, जा न... मन किसने किया है!"
अरविन्द का यह शब्द सुनते hi आरती अंदर से बहुत खुश हो गयी, और उधर नवाज़ के चेहरे पर एक बेहद hi कुटिल, शैतानी और जीतने वाली मुस्कान आ गयी. उनका कल का रास्ता अब बिलकुल साफ़ हो चूका था.
पर अभी आरती सुकून की सांस लेती, तभी अरविन्द ने थोड़ा झिझकते हुए आगे बताया,
"पर आरती... वह जो शहर से कल लोग आने वाले थे न, उन्होंने अपना आना कैंसिल कर दिया है."
"क्या?!"
आरती का गुस्सा एक बार फिर आसमान छू गया. उसके होश उड़ गए की जिस प्रोजेक्ट के बहाने वह इतनी तयारी कर रही थी, वह कैंसिल हो गया.
अरविन्द ने धीरे से कहा,
"हाँ..."
"क्या हाँ?!"
आरती ने बारिश के शोर में छीलते हुए अपना सारा गुस्सा निकाला,
"आपके इस 'हाँ' के चक्कर में मैं पागलों की तरह भागती हुई आयी! घर पर गाडी का ड्राइवर नहीं था, तोह मुझे मजबूरी में नवाज़ के साथ बाइक पर आना पड़ा! और jaldi-jaldi सामान लेने के चक्कर में मैं मार्किट में कीचड़ में जोर से गिर गयी!"
अरविन्द यह सुनकर घबरा गया, उसने फ़िक्र से पूछा,
"ओह no... ज़्यादा लगा तोह नहीं न?!"
"क्या ज़्यादा लगा नहीं!"
आरती ने झूट बोलते हुए अपने नखरे और बढ़ाये,
"मेरे पेअर में बोहोत जोर की मोच आयी है! भला हो इस नवाज़ का, जिसने समय पर मेरी हेल्प की और मुझे संभाला... मैं तोह इस वक़्त ठीक से चलने के काबिल भी नहीं हूँ!"
अरविन्द ने परेशानी में कहा,
"तोह फिर तुम रस्ते में किसी डॉक्टर के पास जाओ न."
"नहीं जाना मुझे किसी डॉक्टर के पास!"
आरती ने गुस्से में साफ़ मन कर दिया.
अरविन्द ने भांपते हुए कहा,
"अच्छा एक काम करो, फ़ोन ज़रा नवाज़ के पास दो... मैं उसे समझाता हूँ की तुम्हें कैसे लेकर आना है."
आरती ने फ़ौरन बात को काट दिया ताकि नवाज़ और अरविन्द के बीच कोई बात न हो और उनका झूट पकड़ा न जाये. उसने तेज़ आवाज़ में कहा,
"किसी को कुछ समझने की ज़रुरत नहीं है! यह सब आपकी लापरवाही और आपके चक्कर में हुआ है!"
अरविन्द ने शर्मिंदा होते हुए धीरे से कहा,
"सॉरी..."
पर आरती अब उसकी कोई बात सुनने के मूड में नहीं थी. उसने बिना जवाब दिए झटके से कॉल कट कर दिया और फ़ोन को ज़ोर से बैग में दाल दिया.
कॉल काटते hi नवाज़ ने बाइक की रफ़्तार थोड़ी काम की और पीछे मुड़कर आरती के इस शांति और धरतेदार अंदाज़ को देख कर एक बड़ी सी शैतानी मुस्कराहट दी.
अब कल खेत में उन्हें परेशां करने वाला कोई नहीं था.
आरती ने फ़ोन को ज़ोर से बैग में दाल कर चैन की सांस ली. बारिश अभी भी चल रही थी, पर अब उनके दिमाग से पकडे जाने का डर बिलकुल निकल गया था. नवाज़ ने बाइक की रफ़्तार थोड़ी काम की और पीछे मुड़कर आरती के इस शांति और धरतेदार अंदाज़ को देखा. उसके चेहरे पर एक बड़ी सी शैतानी और जीतने वाली मुस्कराहट आ गयी.
"वाह रानी! मान गए तेरे दिमाग को,"
नवाज़ ने बाइक चलते हुए थोड़ा पीछे झुक कर छेड़ते हुए कहा,
"पति ने तोह खुद hi खेत जाने की इजाज़त दे दी! अब तोह कल खेत में मुझे अपना पूरा हक़ जताने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती."
आरती ने भीगे बाल झटकते हुए नखरे से अपनी आँखें बड़ा किया,
"आप ज़्यादा हवा में मत ुड़िये नवाज़ जी... मैं तोह बस रस्ते से निकलने के लिए झूट बोल रही थी."
नवाज़ ने हैंडल पर अपनी पकड़ कास ली और एक कुटिल मुस्कान के साथ बोलै,
"झूट भले hi हो रानी... पर अब 'मोच' का बहाना है, तोह कल खेत में चलने में दिक्कत होगी न? मुझे तोह लगता है कल मुझे तुम्हे अपनी बाहों में उठा कर hi बीएड तक ले जाना पड़ेगा."
आरती का चेहरा इस बात पर शर्म से फिर से लाल हो गया. उसने नवाज़ के भीगे कंधे पर एक हलकी चपत मारी,
"धत्त बेशरम! हर वक़्त बस वही बात..."
तभी आरती के बैग के अंदर से फ़ोन एक बार फिर zor-zor से विबरते करने लगा. स्क्रीन पर फिर से अरविन्द का नाम चमक रहा था. अरविन्द लगातार कॉल कर रहा था, शायद वह आरती के गुस्से को शांत करने या पेअर की मोच के बारे में और पूछने के लिए be-chain था.
आरती ने फ़ोन को बजते हुए देखा, पर इस बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था. उसने घंटी बजने दी और गुस्से का नाटक करते हुए फ़ोन को इग्नोर कर दिया.
"उठाओ रानी... तुम्हारा बेचारा हस्बैंड परेशां हो रहा है,"
नवाज़ ने हँसते हुए मज़ाक़ उदय.
आरती ने तिरछी नज़र से नवाज़ को घूरा और नखरे से बोली,
"नहीं उठाउंगी! उन्हें लग्न चाहिए की मैं सच में बोहोत गुस्से में हूँ और चलने के काबिल नहीं हूँ. तभी तोह कल वह मुझे आपके साथ खेत जाने से नहीं रोकेंगे."
नवाज़ ने एक शैतानी ठहाका लगाया और एक्सेलरेटर घुमाया. बाइक बारिश को चीरते हुए तेज़ी से उनके घर की तरफ बढ़ने लगी, जहाँ कल की सबसे बड़ी रात का इंतज़ार अब और भी बेसब्री से हो रहा था.
नवाज़ के चेहरे पर एक बेहद hi कुटिल, शैतानी और जीतने वाली मुस्कान आ गयी. उसने बाइक का एक्सेलरेटर और तेज़ी से घुमाया और बाइक बारिश के बीच तनाव से मुक्त होकर आगे बढ़ने लगी. अरविन्द को अंदाज़ा भी नहीं था की उसके इस 'जा न' कहने से कल खेत में उन दोनों की सुहागरात का रास्ता पूरी तरह साफ़ हो चूका है.
अरविन्द ने अनजाने में hi उन दोनों को एक दुसरे के और क़रीब आने का सबसे बड़ा रास्ता दे दिया था.
"Hello आरती! कहाँ हो? क्या कर रही हो?"
अरविन्द ने आम आवाज़ में पूछा.
"क्या करुँगी?!"
आरती ने बारिश के बीच छीलते हुए कॉल पर गुस्सा उतरा,
"आपने तोह मुझे अकेला छोड़ दिया है! जब हस्बैंड साथ में नहीं होता, तोह साड़ी मुश्किल और सब काम मुझे hi अकेले करने पड़ते हैं!"
अरविन्द ने हड़बड़ाकर पूछा,
"अरे, पर हुआ क्या है? क्या अब किराना भी मैं hi लून?"
"नहीं! किराना तोह मैं खुद hi लुंगी,"
आरती ने गुस्से में पाँव पटका,
"पर आपको क्या पता, उस चक्कर में मुझे रस्ते पर लोग ताने मारते हैं, मुझ पर लाइन मारते हैं! उसका क्या?!"
अरविन्द ने बिना किसी परवाह के मज़ाक़ में कहा,
"अरे, अब तुम इतनी खूबसूरत हो, तोह लोग लाइन मरेंगे hi न! इसमें इतना गुस्सा क्यों होना?"
अरविन्द की इस लापरवाही ने आरती की आग में घी का काम किया. उसने बाइक पर baithe-baithe hi नवाज़ की तरफ देखा और अरविन्द से बोली,
"अच्छा हुआ आप साथ में नहीं थे! आज उस लफंगे ने मेरे साथ बत्तमीज़ी की , नवाज़ ने तोह आगे बढ़कर मुझे बचा लिया! आप होते तोह खाक नहीं बचते मुझे!"
अरविन्द ने थोड़ा चिढ़कर कहा,
"अरे, ऐसी कैसे बात कर रही हो? मैं क्यों नहीं बचता?"
"क्या खाक बचते!"
आरती ने धरतेदार अंदाज़ में तनाव बढ़ाया,
"आप होते तोह kehte—'jaane दो, ध्यान मत दो.' आपको कहाँ मेरी इज़्ज़त की परवाह है! नवाज़ को मेरी इज़्ज़त की परवाह है, आपको नहीं! और मेरी सबसे ज़्यादा फ़िक्र भी उसी को रहती है!"
अरविन्द उन दोनों की इस लगातार तारीफ और झगडे से तंग आ चूका था. उसने गुस्से और chid-chidepan में कह दिया,
"तोह अच्छा है न! अगर तुम्हे इतना hi लगता है, तोह आगे से हमेशा उसके साथ hi घूमा करो!"
आरती ने इस मौके का पूरा फ़ायदा उठाया और नखरे से बोली,
"हाँ, घूमींगी! डर्टी हूँ क्या आप से?!"
अरविन्द ने भी गुस्से में बात को आखिरी मोड़ देते हुए कहा,
"डर मत! और एकदम बिंदास घूम नवाज़ के साथ!"
आरती ने शर्त राखी,
"बाद में मत कहना की क्यों घूम रही हो नवाज़ के साथ!"
"नहीं कहूंगा!"
अरविन्द ने साफ़ कह दिया,
"अगर तुम्हे नवाज़ के साथ घूमना पसंद है, तोह घूम उसके साथ. आखिर तुम्हारी सेफ्टी वह करता है न!"
आरती ने पूरे हक़ और तिरछी नज़र से नवाज़ को देखते हुई कहा ,
"हाँ... करता है!"
अरविन्द ने जैसे hi नवाज़ के साथ घूमने की बात कही, तोह थोड़ी देर फ़ोन पर ख़ामोशी छ गयी. फिर थोड़ा शांत होते हुए अरविन्द ने नरम आवाज़ में पूछा,
"तोह... ले लिया क्या किराना?"
"हाँ, ले लिया!"
आरती ने चिढ़ते हुए, पूरे हक़ से जवाब दिया.
आरती ने जिस तरह दुकान वाली औरत की जलन, नवाज़ के साथ हुई बहस का गुस्सा, और कीचड़ में गिरने की पूरी भड़ास अपने पति अरविन्द पर निकाल दी थी... उससे अरविन्द पूरी तरह दबे पाऊँ पीछे हैट चूका था. अरविन्द ने अपनी लापरवाही में खुद hi नवाज़ के साथ घूमने की इजाज़त दे दी थी, और इस वजह से आरती और नवाज़ के बीच का सामाजिक डर ख़तम हो गया था, जिसने उनके रिश्ते को और भी आसान बना दिया था.
आरती ने अब लोहा गरम देख कर आखिरी और सबसे बड़ा डाव खेला. उसने थोड़े नखरे से पूछा,
"फिर... कल मैं नवाज़ के साथ जाऊं क्या?"
अरविन्द ने बिना soche-samjhe पूछा,
"कहाँ?"
"खेत में... वहां कुछ काम है न,"
आरती ने तिरछी नज़र से नवाज़ को देखते हुए कॉल पर कहा.
अरविन्द ने अपनी उसी be-parwah और थके हुए लहजे में साफ़ कह दिया,
"हाँ, जा न... मन किसने किया है!"
अरविन्द का यह शब्द सुनते hi आरती अंदर से बहुत खुश हो गयी, और उधर नवाज़ के चेहरे पर एक बेहद hi कुटिल, शैतानी और जीतने वाली मुस्कान आ गयी. उनका कल का रास्ता अब बिलकुल साफ़ हो चूका था.
पर अभी आरती सुकून की सांस लेती, तभी अरविन्द ने थोड़ा झिझकते हुए आगे बताया,
"पर आरती... वह जो शहर से कल लोग आने वाले थे न, उन्होंने अपना आना कैंसिल कर दिया है."
"क्या?!"
आरती का गुस्सा एक बार फिर आसमान छू गया. उसके होश उड़ गए की जिस प्रोजेक्ट के बहाने वह इतनी तयारी कर रही थी, वह कैंसिल हो गया.
अरविन्द ने धीरे से कहा,
"हाँ..."
"क्या हाँ?!"
आरती ने बारिश के शोर में छीलते हुए अपना सारा गुस्सा निकाला,
"आपके इस 'हाँ' के चक्कर में मैं पागलों की तरह भागती हुई आयी! घर पर गाडी का ड्राइवर नहीं था, तोह मुझे मजबूरी में नवाज़ के साथ बाइक पर आना पड़ा! और jaldi-jaldi सामान लेने के चक्कर में मैं मार्किट में कीचड़ में जोर से गिर गयी!"
अरविन्द यह सुनकर घबरा गया, उसने फ़िक्र से पूछा,
"ओह no... ज़्यादा लगा तोह नहीं न?!"
"क्या ज़्यादा लगा नहीं!"
आरती ने झूट बोलते हुए अपने नखरे और बढ़ाये,
"मेरे पेअर में बोहोत जोर की मोच आयी है! भला हो इस नवाज़ का, जिसने समय पर मेरी हेल्प की और मुझे संभाला... मैं तोह इस वक़्त ठीक से चलने के काबिल भी नहीं हूँ!"
अरविन्द ने परेशानी में कहा,
"तोह फिर तुम रस्ते में किसी डॉक्टर के पास जाओ न."
"नहीं जाना मुझे किसी डॉक्टर के पास!"
आरती ने गुस्से में साफ़ मन कर दिया.
अरविन्द ने भांपते हुए कहा,
"अच्छा एक काम करो, फ़ोन ज़रा नवाज़ के पास दो... मैं उसे समझाता हूँ की तुम्हें कैसे लेकर आना है."
आरती ने फ़ौरन बात को काट दिया ताकि नवाज़ और अरविन्द के बीच कोई बात न हो और उनका झूट पकड़ा न जाये. उसने तेज़ आवाज़ में कहा,
"किसी को कुछ समझने की ज़रुरत नहीं है! यह सब आपकी लापरवाही और आपके चक्कर में हुआ है!"
अरविन्द ने शर्मिंदा होते हुए धीरे से कहा,
"सॉरी..."
पर आरती अब उसकी कोई बात सुनने के मूड में नहीं थी. उसने बिना जवाब दिए झटके से कॉल कट कर दिया और फ़ोन को ज़ोर से बैग में दाल दिया.
कॉल काटते hi नवाज़ ने बाइक की रफ़्तार थोड़ी काम की और पीछे मुड़कर आरती के इस शांति और धरतेदार अंदाज़ को देख कर एक बड़ी सी शैतानी मुस्कराहट दी.
अब कल खेत में उन्हें परेशां करने वाला कोई नहीं था.
आरती ने फ़ोन को ज़ोर से बैग में दाल कर चैन की सांस ली. बारिश अभी भी चल रही थी, पर अब उनके दिमाग से पकडे जाने का डर बिलकुल निकल गया था. नवाज़ ने बाइक की रफ़्तार थोड़ी काम की और पीछे मुड़कर आरती के इस शांति और धरतेदार अंदाज़ को देखा. उसके चेहरे पर एक बड़ी सी शैतानी और जीतने वाली मुस्कराहट आ गयी.
"वाह रानी! मान गए तेरे दिमाग को,"
नवाज़ ने बाइक चलते हुए थोड़ा पीछे झुक कर छेड़ते हुए कहा,
"पति ने तोह खुद hi खेत जाने की इजाज़त दे दी! अब तोह कल खेत में मुझे अपना पूरा हक़ जताने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती."
आरती ने भीगे बाल झटकते हुए नखरे से अपनी आँखें बड़ा किया,
"आप ज़्यादा हवा में मत ुड़िये नवाज़ जी... मैं तोह बस रस्ते से निकलने के लिए झूट बोल रही थी."
नवाज़ ने हैंडल पर अपनी पकड़ कास ली और एक कुटिल मुस्कान के साथ बोलै,
"झूट भले hi हो रानी... पर अब 'मोच' का बहाना है, तोह कल खेत में चलने में दिक्कत होगी न? मुझे तोह लगता है कल मुझे तुम्हे अपनी बाहों में उठा कर hi बीएड तक ले जाना पड़ेगा."
आरती का चेहरा इस बात पर शर्म से फिर से लाल हो गया. उसने नवाज़ के भीगे कंधे पर एक हलकी चपत मारी,
"धत्त बेशरम! हर वक़्त बस वही बात..."
तभी आरती के बैग के अंदर से फ़ोन एक बार फिर zor-zor से विबरते करने लगा. स्क्रीन पर फिर से अरविन्द का नाम चमक रहा था. अरविन्द लगातार कॉल कर रहा था, शायद वह आरती के गुस्से को शांत करने या पेअर की मोच के बारे में और पूछने के लिए be-chain था.
आरती ने फ़ोन को बजते हुए देखा, पर इस बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था. उसने घंटी बजने दी और गुस्से का नाटक करते हुए फ़ोन को इग्नोर कर दिया.
"उठाओ रानी... तुम्हारा बेचारा हस्बैंड परेशां हो रहा है,"
नवाज़ ने हँसते हुए मज़ाक़ उदय.
आरती ने तिरछी नज़र से नवाज़ को घूरा और नखरे से बोली,
"नहीं उठाउंगी! उन्हें लग्न चाहिए की मैं सच में बोहोत गुस्से में हूँ और चलने के काबिल नहीं हूँ. तभी तोह कल वह मुझे आपके साथ खेत जाने से नहीं रोकेंगे."
नवाज़ ने एक शैतानी ठहाका लगाया और एक्सेलरेटर घुमाया. बाइक बारिश को चीरते हुए तेज़ी से उनके घर की तरफ बढ़ने लगी, जहाँ कल की सबसे बड़ी रात का इंतज़ार अब और भी बेसब्री से हो रहा था.
नवाज़ के चेहरे पर एक बेहद hi कुटिल, शैतानी और जीतने वाली मुस्कान आ गयी. उसने बाइक का एक्सेलरेटर और तेज़ी से घुमाया और बाइक बारिश के बीच तनाव से मुक्त होकर आगे बढ़ने लगी. अरविन्द को अंदाज़ा भी नहीं था की उसके इस 'जा न' कहने से कल खेत में उन दोनों की सुहागरात का रास्ता पूरी तरह साफ़ हो चूका है.
अरविन्द ने अनजाने में hi उन दोनों को एक दुसरे के और क़रीब आने का सबसे बड़ा रास्ता दे दिया था.