Erotica मोहे रंग दे - Page 11 - SexBaba
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Erotica मोहे रंग दे

घर आया मेरा परदेशी

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उस दिन गुड्डी भी दिन में आगयी थी वही उनकी ममेरी बहन , एलवल वाली , .

मुंडेर पर कोई कौवा मुआ पता नहीं कहाँ से , कांव कांव

और वो पीछे पड़ गयी ,

" भाभी , इस कौवे को दूध भात खिलाइये , कोई मेसेज ले आया है , लगता है कोई आने वाला है "

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आने वाला तो हजार किलोमीटर दूर , ...

मैं बस मुस्करा के रह गयी। कोई और दिन होता तो उसे दस सुनाती , लेकिन मन तो मेरा भी यही कर रहा था ,

पर

पर

और आज उनका कोई फोन भी दोपहर के बाद नहीं आया था ,

शाम को गुड्डी अपने घर गयी ,

रोज की तरह नौ बजे मैं ऊपर ,...और आज जेठानी सास भी जल्दी सो गयीं घण्टी बजी मेरे फोन की।

दस सवा दस बज रहा होगा की उनका फोन आया ,

वैसे तो हर घंटे दो घण्टे में उनका फोन व्हाट्सऐप आता था पर उस दिन दोपहर के बाद से नहीं आया था ,

घर में सब लोग सो रहे थे ,

उन्ही का फोन था , मैं उठ कर बैठ गयी।

आवाज एकदम हलकी सी , दबी दबी ,

" कहाँ हो , कैसे हो , फोन नहीं किया ,... "

मैंने आधे दर्जन सवाल कर डाले।

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उधर से धीमे से बहुत हलकी आवाज आयी ,

" दरवाजा तो खोलो , दरवाजे पर खड़ा हूँ "

मेरी कुछ समझ में नहीं आया , ...

वो , दरवाजे पर , कैसे ,

सपना तो नहीं देख रही हूँ।

" दरवाजे पर , कहाँ ,... "

और उनके जवाब ने बात साफ़ कर दी ,

" नीचे , सब लोग जग जायेंगे , इस लिए बेल नहीं बजा रहा हूँ , तुझे काल किया है , आ कर दरवाजा खोल दो न "

फिर तो मैं नंगे पैर , सीधे नीचे ,

और इस बात का ख्याल भी नहीं किया की मेरी देह पर बस एक छोटी सी नाइटी टंगी है , अंदर भी कुछ नहीं।

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दरवाजा खुलते ही ,

चुम्मियों की बौछार , ...

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लेकिन गनीमत थी उन्हें होश आ गया ,

कोई जग जाएगा ,

जिस लिए उन्होंने घण्टी नहीं बजायी थी ,

और बस हम दोनों को जैसे पंख लग गए , ...

अगले पल हम दोनों अपने कमरे में ,

और , और कहाँ , सीधे बिस्तर पर एक दूसरे की बाँहों में

बिना बोले बस एक दूसरे को भींचे रहे , दबोचे रहे ,

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ठीक सात दिन हुए थे उन्हें गए , लग रहा था सात युग बीत गए।

पता

नहीं कितने देर तक हम दोनों बिना बोले , बस एक दूसरे को पकडे दबोचे , भींचे ऐसे ही पड़े रहे ,

पहली चुम्मी मैंने ही ली।

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फिर तो वो लड़का कपड़ों का दुश्मन ,...

और मैं भी तो उनके रंग में रंग गयी थी अब तक बस शर्ट बनियाइन पैंट उनके सब फर्श पर बिखरे ,

वो सिर्फ चड्ढी में ,

न मैंने पूछा वो कैसे आधी रात को बंगलुरु से यहां आये , न उन्होंने बताया।

बातचीत सिर्फ चुम्मी में हो रही थी , ...

मैं रुकती तो वो शुरू हो जाते , और वो सांस लेते तो मैं चालू ,

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और वो बदमाश , उसे तो सिर्फ ,... कुछ ही देर में उसके होंठ , मेरे होंठों से सरक कर गालों पर , और गालों से सरक कर जुबना पर ,

मैंने न मना किया न पूछा ,

मुझे मालूम था वो पूछने पर हर बार की तरह वही बहाना बनाता

" मेरे होंठों की कोई गलती नहीं , अपने गालों को दोष दो , इतने चिकने हैं , मेरे होंठ सरक कर नीचे आ ही जाते है ,"

कुछ देर तो नाइटी के ऊपर से ही उन गोलाइयों को वो चूमते चूसते रहे फिर सरका कर सीधे निप्स पर ,

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लेकिन कुछ देर बाद मैंने उन्हें धक्का मार कर पलंग पे लिटा दिया , पीठ के बल और उन की आँखों में आँखे डाल के बोली

" दुष्ट , बदमाश , तूने एक हफ्ते तक रोज तड़पाया है , आज मेरी बारी है ,

अब तुम कुछ नहीं करोगे , लेटे रह चुपचाप , अगर ज़रा भी हिले डुले न तो कुछ भी नहीं मिलेगा। "


और वो लेटे लेटे मुस्कराते रहे ,

न उन्हें ध्यान था न मुझे , कमरे की लाइट जल रही है

की दरवाजा अंदर से बंद नहीं है

बदमाश तो वो पूरे थे , सर से पैर तक

लेकिन सबसे शैतान थीं उनकी आँखे , ...

चोर ,

पहली बार मेरी सहेली की शादी में जब उन्होंने मुंहे देखा , तभी मुझसे , मुझी को चुरा के ले गयीं ,

ऐसी चोरी जिसकी न रपट हो सकती है न थाना कचहरी ,

चोर नहीं बल्कि डाकू ,

इसलिए मैं पहले मैंने उस चोर की ही मुश्के कसीं ,

वो जिस तरह से मुझे देखते थे , मैं एकदम पानी पानी हो जाती थी , लाख सोच के जाऊं , ना कह ही नहीं पाती थी।




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इसलिए पहले मेरे होंठों ने उन होंठों के कपाट बंद किये और एक मीठे से चुम्बन से तगड़ी सी सांकल भी लगा दी।


और चैन की साँस ली , एक बड़ा ख़तरा टला , फिर उनके दोनों हाथ , उनके सर के नीचे ,

लड़के के अंदर हजार बुराइयां हो , लेकिन एक अच्छाई भी थी , मेरी सब बात मानता था , और वो भी मन से।

और फिर ,... मेरे भीगे रसीले होंठ ,... पलकों के दरवाजे पर बड़ा सा ताला लगाने के बाद , सीधे मेरे होंठ , गाल पर नहीं कान पर , बल्कि इयर लोब्स पर , एक लकी सी चुम्मी छोटी सी बाइट

मेरे होंठों ने बिना बोले आगे आने वाले पलों के बारे में सब कुछ कह दिया था ,

मेरे होंठ पर उनके होंठ पहला मौक़ा पाते ही हमला बोल देते थे , और आज मेरा मौका था तो मेरे होंठ क्यों चूकते ,

पहले एक छोटी सी , बहुत छोटी सी किस्सी लेकिन मेरे होंठ कौन कम लालची थे ,

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उनके निचले होंठो को अपने होंठो के बीच में लेकर उन्होंने कस कस के चूसना शुरू कर दिया ,

फिर मेरी जीभ क्यों पीछे रहती ,

स्वाद लेने का काम तो उसी का था ना ,

बस जीभ उनके मुंह में घुस गयी और अब तो मैं भी डीप फ्रेंच किस सीख लिया था , तो बस कभी मेरी जीभ उनके मुंह में घुस के स्वाद लेती तोकभी मेरे होंठ उनकी जीभ को पकड़ कर गन्ने की पोर की तरह चूसते

वो बिचारे तो हिल भी नहीं सकते थे ,

मैं बेईमान थी लेकिन इतनी नहीं , ... मैंने मना कर दिया था , अपने हाथों को बाकी अंगों को , एक बार में सिर्फ एक अंग ,...

होंठ तो होंठ ,

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बड़ी मुश्किल से मना जुना कर मैं अपने होंठों को उनके होंठों से अलग कर पायी और उसके बाद तो जैसे चुम्बन की बारिश उनकी चौड़ी छाती पर
 
चुम्बन की बारिश

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जैसे चुम्बन की बारिश उनकी चौड़ी छाती पर

और जैसे मेरे निप्स में चुंबक लगे थे , उनकी आँखे , होंठ हाथ सब वहीँ खिंच कर पहुँच जाते ,

बस मेरे होंठो के लिए उनके निप्स भी

अब मुझे मालूम पड़ गया था , कित्ते सेंसेटिव थे वो , उनकी हालत ख़राब हो जाती थी , जब मैं वहां छूती थी ,

हालत खराब होनी है तो हो , मुझे क्या ,...

मेरी क्या कम हालत खराब करते थे वो ,

बस पहले जीभ से , बल्कि जीभ की टिप से हल्के हल्के फ्लिक , फिर होंठों से कस कस के सक ,

उनकी देह काँप रही थी

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और जब मैंने एक हलकी सी बाइट ली तो बस उनकी सिसकी निकल गयी ,

और मेरी निगाह दक्षिण दिशा की ओर ,

उनकी ब्रीफ , फटने के कगार पर थी , मूसलचंद एकदम बावरे खूब तन्नाये , एकदम कड़क ,

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मुझसे रुका नहीं गया , ... और थोड़ी बेईमानी मैने की , उनके निप्स मैंने अपनी उँगलियों के के हवाले किये और मेरे लिप्स सीधे उनके ब्रीफ के ऊपर मोटे बौराये मूसलचंद के ऊपर ,

मन तो मेरा कर रहा था खोल कर सीधे गप्प कर लूँ , कित्ते दिन हो गए थे ,...

सुहागरात के अगले दिन बल्कि अगली रात ही तो ,

दिन में मंझली ननद और दुलारी ने अपने किस्से सुना सुना के , कैसे नन्दोई जी ने उन्हें अगली रात ही चमचम चुसाया था

और मैंने भी चमचम चूस लिया , ....

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अगली सुबह जब मैं ननदों के बीच गयी तो मंझली ननद ने पहला सवाल यही पूछा चूसा की नहीं ,

और मेरी मुस्कराहट ने उन्हें जवाब दे दिया।

लेकिन आज ,

मैं ऊपर से ही ,...

ब्रीफ के ऊपर से पहले तो मैंने 'उसे ' सिर्फ एक चुम्मी दी , वो भी छोटी सी ,

लेकिन जब मुंझसे नहीं रहा गया तो उस मुस्टंडे के मोटे मुंह को अपने मुंह में भर कर , पहले हलके , हलके , फिर जोर से ,

अब उनसे नहीं रहा जा रहा था , कसमसा रहे थे , सिसक रहे थे , चूतड़ पटक रहे थे , पर तड़पे तो तड़पें , मैं भी तो सात दिन से ,...
.....

लेकिन मुझे भी दया आ गयी , बिचारे आँखे मूंदे , हाथ दोनों सर के नीचे ,...

मेरी नाइटी भी अब उन के कपड़ो के साथ थी ,

वो एक छोटे से ब्रीफ में थे ,

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तो मैं भी बस एक पतली सी थांग में , ...

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माना की उनके मूसलचंद तड़प रहे थे पर मेरी गुलाबो भी तो गीली हो रही थी , जोर जोर से चींटी काट रही थी

और जिस दिन पांच दिन की छुट्टी ख़तम होती है उस दिन तो किसी भी लड़की से पूछिए ऐसी आग लगी रहती है की बस ,...

तो मैंने उनकी एक सजा ख़तम कर दी ,

मेरे होंठों ने एक बार फिर से पलकों को चूम कर सांकल को खोल दिया और मैं उस समय उन के ऊपर चढ़ी , बैठी

और उन्हें अपने जोबना दिखाती ललचाती ,

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वो लड़का एकदम पागल रहता था मेरे जोबन के लिए ब्लाउज के ऊपर से भी देख कर उसकी हालत खराब रहती थी ,

यह तो दोनों चाँद निरावृत्त

सिर्फ मेरे हाथों से ढंके , ...

और उसको दिखाते ललचाते मैंने दोनों हाथ हटा दिए ,

बस वो पागल नहीं हुआ ,

मेरे हाथ मेरे उभारों पर सरक रहे थे , उन्हें सहला रहे थे , मेरे निप्स को गोल गोल ,...

उनके आँखों की प्यास , ...

बस लग रहा था की वो नहीं रुक पाएंगे की मैंने हुक्म सुना दिया

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नहीं नहीं , सिर्फ देखने के लिए.,... छूने के लिए नहीं , ...

लेकिन में खुद झुक कर अपने उभार उनके होंठों के पास , ...

जैसे वो चेहरा उठाते , उचकाते मैं अपने उरोज दूर कर लेती , ज्यादा नहीं बस इंच भर , और वो और

लेकिन मेरी देह अब कौन सी मेरी रह गयी थी ,

किसी शाख की तरह मेरी देह झुकी

और जैसे कोई तितली पल भर के लिए किसी फूल पर बैठे और फिर फुर्र् हो जाए उसी तरह उनके होंठों पर

मेरे निप्स ,

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जस्ट टच ,

और जब तक उनके होंठ खुले , मेरे उभार हलके हलके उनकी छाती को रगड़ रहे थे ,

और मेरी उँगलियाँ , ... जी सही समझा आपने ,...

बस वो भी हलके हलके ब्रीफ के ऊपर से , मूसलचंद को ,... सहला रही थीं , सुबह की हवा की तरह कभी एक ऊँगली , कभी दो ऊँगली

और मूसलचंद पर असली हमला तो बाकी था ,

मेरे जोबन ,...

छाती से टहलते हुए दोनों नीचे और सीधे उनकी तनी ब्रीफ के ऊपर से पहले हलके हलके फिर कस के

मुझे मालूम था इस लड़के को टिट फक कितना पसंद है , तो , और

जब मेरी दोनों गदरायी रसीली भरी चूँचियाँ , उनके मोटे पागल लंड को और पागल कर रही थीं ,

मेरे हाथ उनके सीने के ऊपर , मेरी उँगलियाँ , लम्बे नाख़ून उनके निप्स को फ्लिक कर रहे थे स्क्रैच कर रहे थे ,

लेकिन मेरी गुलाबो भले ही वो छिपी ढकी थी , लेकिन वो क्यों इस खेल में अलग रहती ,

तो बस अब जैसे सावन भादों में बादल धरती पर छा जाते हैं मेरी देह उनके ऊपर ,

सिर्फ मेरी हथेलियां उनके कन्धों को पकडे थीं , बस देह का कोई भी हिस्सा उनकी देह को छू नहीं रहा था ,

फिर जैसे बादल का कोई टुकड़ा सीधे धान के खेतों में उतर पड़े , ...

मेरी गुलाबो थांग में ढंकी छुपी , सीधे अपने मूसलचंद के ऊपर ( वो भी ब्रीफ के ढक्कन में बंद )

जबरदस्त ग्राइंड , ब्रीफ के ऊपर से जोर जोर से रगड़ घिस्स ,

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घडी देखके पांच मिनट से ज्यादा ,

मुझे लगा की अब बेचारे की ब्रीफ फट जायेगी , तो मुझे दया आ गयी।

और एक बार फिर मेरे होंठ , ...

होंठों से पकड़ कर , ...हलके हलके मैंने उनकी ब्रीफ उतार दी

जैसे सपेरे की टोकरी से कड़ियल नाग भूखा बावरा , फन उठाये अचानक निकल पड़े , ... बस उसी तरह से बित्ते भर का वो

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मोटा , कड़ा , तगड़ा और एकदम पागल

उनकी ब्रीफ उनके बाकी कपड़ों के साथ फर्श पर ,
 
तड़पन

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लेकिन अब गुलाबो को छिपा के रखना बेईमानी होती न ,

तो बस एक बार फिर उनके ऊपर चढ़ कर , उन्हें दिखाते ,

मैंने ठीक उनके चेहरे के ऊपर थांग न सिर्फ खोल दी ,

बल्कि एक बार उनके चेहरे से रगड़ कर सीधे उनके मूसलचंद के ऊपर फेंक दिया

मेरी गुलाबो उनके होंठों से सिर्फ एक इंच दूर ,... गीली भीगी प्यासी

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और वो इतनी ही तड़प रही थी , जितने मेरे बावरे साजन के मूसलचंद ,

उन्होंने अपने होंठ उठाये बस एक किस्सी के लिए , ...

मैंने उन्हें बस जस्ट टच करने दिया और गुलाबो को हटा लिया ,

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गुलाबो का दोस्त , खड़ा एकदम तन्नाया बेक़रार

लेकिन बजाय निचले होंठों के अभी ऊपर वाले होंठों का नंबर था ,

मेरे होंठों ने सुपाड़े पर किस किया , उन्हें लगा मैं खोल दूंगी उसे

पर मैंने नहीं खोला ,

मेरे होठ सरक कर उस चर्मदण्ड को लिक करते रहे चाटते रहे ,

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फिर उनके मोटे तगड़े लंड के बेस पर मेरी जीभ और

और

और उसके बाद उनकी बॉल्स ,

मेरे होंठों के बीच , हलके हलके मैं चुभला रही थी , चूस रही थी।

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मैंने मूसलचंद को ऐसे ही नहीं छोड़ दिया था ,

मेरी उँगलियाँ उसे सहला रही थीं , छेड़ रही थी , फिर कस के पकड़ कर मैंने मुठियाना शुरू कर दिया।

मुश्किल से तो मेरी मुट्ठी में आ पाता था , इतना मोटा ,... मेरी कलाई से कम नहीं होगा ,

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वो कसमसा रहे थे , बेताब हो रहे थे और मैं भी , और अब मुझसे भी नहीं रहा गया ,

मेरे होंठों ने सीधे सुपाड़े का घूंघट खोल दिया

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कितना मोटा , लाल , मांसल , मन तो कर रहा था ,

थोड़ी देर तो मैं बस अपनी जीभ की टिप सुपाड़े के पी होल ( पेशाब के छेद ) पर छेड़ती रही , पर मुझसे नहीं रहा गया

और मैंने गप्प कर लिया , एक बार में पूरा सुपाड़ा ,

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बड़ा मजा आ रहा था चूसने चुभलाने में

लेकिन एक चीज होती है जलन

मेरे ऊपर वाले होंठ तो रस ले रहे थे और नीचे वाले होंठ , जल रहे थे ,

एक तो पांच दिन वाली छुट्टी के बाद आज ,.. और ऊपर से वो इन्तजार में ,...

इधर उन के नीली पीली फिल्मों के कनेक्शन में मैंने कई फिल्में , ' वोमेन ऑन टॉप ' वाली देखीं ,

विपरीत रति के बारे में भी पढ़ा ( प्रैक्टिस नहीं हो पाए रही थी तो थ्योरी ही सही )

लेकिन आग में घी डाला मेरी जेठानी ने ये बोल कर की हफ्ते में दो तीन बार तो वो जेठ जी के ऊपर ' चढ़ ' ही जाती हैं , खासतौर से अगर वो बहुत थके हों , तो बस लिप्स सर्विस से झंडा खड़ा किया और ऊपर चढ़ कर ,

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लेकिन तब तक मेरी सास भी आ गयीं , जाड़े की दुपहर ,

... अब वो भी एक बड़ी सहेली की तरह ' इन मामलों ' में खुल कर अपने एक्सपीरियंस और राय शेयर करती थीं

उन्होंने भी इस बात की ताईद की और ये भी बोला की

खास कर रात के आखिरी राउंड , तीसरे राउंड में जब मरद थोड़ा थका हो , ,... और फिर उन्होंने तो खुलासा बयान किया ,

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तीसरे राउंड की बात जेठानी

ने भी कबूली , और मेरे कान में बोलीं सिर्फ मेरा देवर ही हैट ट्रिक नहीं करता , घर की खानदानी परम्परा है ,

मैं शर्मा कर रह गयी , ...

लेकिन मैंने उन्हें ये नहीं बताया की उनका देवर सिर्फ रात में हैट ट्रिक कर के नहीं छोड़ता ,

सुबह सुबह बिना नागा गुड मॉर्निंग भी करता है.

आज मैंने तय कर लिया था आज मैं ही ऊपर चढूँगी।

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आखिर मेरी सास ,जेठानी दोनो तो मैं क्यों नहीं , ...

मैंने 'अच्छी वाली ' फिल्मों में देखा था , फिर शादी के पहले कितनी बार रीतू भाभी ने अरथा अरथा कर बाकी आसनों के साथ इसे भी समझाया था , और अब जाड़े की दुपहरी में जेठानी जी ने एकदम डिटेल में , कैसे वो खुद ,... जेठ जी के ऊपर चढ़ कर ,...

बिचारे उस लड़के का मन बहुत कर रहा था , भूखी तो मेरी गुलाबो भी थी ,

और एक तो उसी दिन सुबह मेरी पांच दिन वाली छुट्टी ख़त्म हुयी थी , बहुत तेज खुजली मच रही थी , ... पर

मैं अब कस कस के चूस रही थी , आधे से भी थोड़ा ज्यादा ,

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६ इंच से ऊपर मेरे मुंह में था , साथ में मेरी कोमल कोमल उँगलियाँ कभी उनके बॉल्स को तभी कभी पिछवाड़े छेड़ रही थीं ,

और फिर मैं उनके ऊपर चढ़ गयी ,

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अब हम दोनों में इतना परफेक्ट कम्युनिकेशन था की बस मेरा इशारा काफी था ,

और थोड़ा सा जो मैंने उनकी ओर आँख तरेर कर देखा , थोड़ा सा मुस्करायी , ... बस इतना काफी था , उन्हें समझने के लिए ,

उन्हें उठना नहीं है , बस पीठ के बल लेटे रहना है , जो करुँगी मैं करुँगी , वो समझ गए , और ऊपर से उनके ऊपर चढ़ने के बाद पहला काम मैंने ये किया की उनके दोनों हाथ उनके सर के नीचे रख कर दबा दिए ,

बस अब वो मुझे छू भी नहीं सकते थे , ललचाते रहो , ...आखिर पूरे हफ्ते भर से मैं तो तड़प रही थी ,

और सबसे ज्यादा जिस चीज के लिए वो ललचाते थे वही चीज, मेरे दोनों जोबन ,..

बेचारा ,

उनके दोनों कंधे पकड़ कर मैं बार बार अपने निप्स उनके लिप्स तक ले जाती थी ,

और जैसे ही वो सर उठाकर उसे छूने की कोशिश करते मैं उसे थोड़ा सा ऊपर , बस मुश्किल से इंच भर दूर ,... और वो और सर ऊपर करने की कोशिश करते ,

कुछ देर तड़पाने के बाद मैंने अपने निप्स नीचे करके उनके लिप्स के पास ,

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लेकिन टच जस्ट एक टच , और फिर मैंने ऊपर हटा लिया और उन्हें छेड़ना शुरू कर दिया ,

" हे लोगे , ... "

" हाँ दो न , ... "

बहुत तड़प रहा था बेचारा।

" मैं इसकी नहीं ,... उसकी बात कर रही हूँ , "

अपने हाथों से मैं अपने निप्स फ्लिक करती बोली ,

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समझ तो वो गए थे लेकिन शरमा रहे थे , ....

' जिसकी छोटी छोटी है , एलवल में रहती है , ... तुम्ही तो कहते थे की उसकी अभी छोटी है , ....बोल लेगा न ,... "

वो एकदम शरम से बीर बहूटी ,...
 
चौथी नहीं तीसरी रात , ... लेकिन अगर मिस भी कर गए तो कोई बात नहीं , पन्ने पलटिये

पेज ३६ और पेज ३८ पर तीसरी रात को जो जो चुन चुन कर गारियाँ मैंने अपनी ननदों को सुनाई थीं , सब की सब , एक बार फिर से पढ़ लीजिये ,

और उन गारियों का उन पर क्या असर हुआ , गाने के बाद की बातें पेज ४० से , ...

हाँ , जैसा मैंने कहानी के शुरू में ही लिखा था , मेरी कहानी और होली का प्रसंग न हो ,... पर यह सबा पाठक पाठिकाओं के साथ , स्नेह और उत्साह पर निर्भर करेगा ,

कहानी अभी चल रही है , लेटेस्ट पोस्ट पर आपकी कमेंट की प्रतीक्षा हमेशा रहती है
 
आप कुछ भी लिखिए लेकिन लिखिए जरुर ,... कमेंट नहीं आने पर लगता है मैंने सन्नाटे में बैठी कहानी सुना रही हूँ , बचपन में भी अगर कोई कहानी सुनाता था , तो हुंकारी भरनी कम्पलसरी थी , वरना लगता था सुनने वाला सो गया , ...

इसलिए हर पोस्ट के बाद कमेंट कम्पलसरी है ,

और मैं वेटिंग ,... वाले आठ दस कमेंट का इन्तजार भी नहीं करती पोस्ट कर देती हूँ ,

इसलिए प्लीज , एकदम कमेंट करिये , कुछ भी करिये , लेकिन करिये
 
विपरीत रति

स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा।

गलित-कुसुम-वर-विलुलित-केशा

शोभित है युवती री कोई।

हरि से विलस रही जो खोई॥

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कोई सुन्दर रमणी काम-संग्राम के अनुकूल वेश धारण कर मधुरिपु के साथ विलास कर रही है। रतिक्रीड़ा में उसके केशपाश ढीले होकर इधर-उधर लहरा रहे हैं, उसमें से ग्रंथित पुष्प भी झर गये हैं।

स्मरसमर-रतिकेलि को स्मर-समर कहा गया है। रतिक्रीड़ा में रति-विमर्दन आदि क्रिया होती है, जिससे नायिका का कबरी बन्धन खुल जाता है, उसमें सन्निहित पुष्प झर जाते हैं, विशृंखलित हो जाते हैं।

........

समरति में स्त्री वीर्य धारण कर गर्भवती होती है। विपरीत रति में पुरुष उर्ध्वरेता हो ब्रह्मपद प्राप्त करता है। आसन के अर्थ में विपरीत रति कामशास्त्रियों की सूझ होगी। उसके सौंदर्य पक्ष को स्वीकार करते हुए भी कवियों ने विपरीत रति के आध्यात्मिक संकेत ही दिए हैं।

उरसि मुरारे उपहितहारे धन इव तरल बलाके

तडिदिवपीते रतिविपरीते राजसि सुकृत विपाके।।

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बिनती रति बिपरीत को करो परसि पिय पाइ।

हँसि अनबोलैं ही दियौ ऊतरु दियौ बुताइ॥341॥

परसि = स्पर्श कर, छूकर। प्रिय = प्रीतम। पाइ = पैर। अनबोलैं ही = बिना कुछ कहे ही। ऊतरु दियो = जवाब दिया। दियौ बुताइ = दीपक बुझाकर।

प्रीतम ने (नायिका के) पैर छूकर विपरीत रति के लिए विनती की। (इस पर नायिका ने) बिना कुछ मुँह से बोले ही (केवल) हँसकर दीपक बुझाकर उत्तर दे दिया (कि मैं तैयार हूँ, लीजिए-चिराग भी गुल हुआ!)

मेरे बूझत बात तूँ कत बहरावति वाल।

जग जानी बिपरीत रति लखि बिंदुली पिय भाल॥342॥

कत = क्यों। बहरावति = बहलाती है, चकमा देती है। जग जानी = दुनिया जान गई। बिंदुली = टिकुली, चमकी या सितारा।

मेरे पूछने पर अरी बाला! तू क्यों चकमा देती है? प्रीतम के ललाट में (तेरी) टिकुली देखकर संसार जान गया कि (तुम दोनों ने) विपरीत रति की है।

नोट - विपरीत रति में ऊपर रहने के कारण नायिका की टिकुली गिरकर नीचे पड़े हुए नायक के ललाट पर सट गई।

परयो जोर विपरीत रति , सूरत करत रणधीर।

बाजत कटि की किन्कडि , मौन रहत मंजीर।

बिहारी सतसई

..........................



कुछ देर तड़पाने के बाद मैंने अपने निप्स नीचे करके उनके लिप्स के पास ,

लेकिन टच जस्ट एक टच , और फिर मैंने ऊपर हटा लिया और उन्हें छेड़ना शुरू कर दिया ,

" हे लोगे , ... "

" हाँ दो न , ... "

बहुत तड़प रहा था बेचारा।

" मैं इसकी नहीं उसकी बात कर रही हूँ , "

अपने हाथों से मैं अपने निप्स फ्लिक करती बोली ,

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समझ तो वो गए थे लेकिन शरमा रहे थे , ....

' जिसकी छोटी छोटी है , एलवल में रहती है , ... तुम्ही तो कहते थे की उसकी अभी छोटी है , बोल लेगा न ,... "



वो एकदम शरम से बीर बहूटी ,...

" अच्छा चल ये तो बता दे , किसके बारे में बोल रही हूँ , .. बोल न ,... "



अब मुश्किल से बोल फूटे उनके ,

" गुड्डी की ,... "

"गुड्डी की क्या ,.. "

मैंने और चिढ़ाया

" गुड्डी की ,... "

वो हिचक रहे थे लेकिन जैसे मैं उन्हें देख रही थी , वो समझ गए की रात भर वो तड़पेंगे लेकिन मैं दूंगी नहीं , ... और बूब्स और उभार बोलने से काम नहीं चलेगा

' बोलो न ,.. " मैं फिर बोली और उन्हें बोलना पड़ा ,

"गुड्डी की चूँची "

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यही तो मैं चाहती थी , एक बार अपनी ममेरी बहन के बारे में ऐसा बोलना शुरू कर दें , फिर तो सोचना और उसके बाद ,...

बस मारे ख़ुशी के मैंने उन्हें इनाम दे दिया ,

मेरी निप्स सीधे उनके लिप्स के बीच ,

जैसे पहली बार लिक कर रहे हों , ऐसे चाट चूस रहे थे थे , ...

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उनका मुंह बंद था लेकिन मेरा तो खुला था , उनके बाल बिगाड़ते , अपने लम्बे नाख़ून उनके गाल पे चुभाते मैं बोली ,

' उफ़ उफ़्फ़ , कैसे चूसते हो , ... ओह्ह ,.. चलो ऐसे ही उसकी कच्ची अमिया भी कुतरवाउंगी , बहुत जल्दी ,.. सच में बहुत मज़ा आएगा मेरे बालम को

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ननद के , कच्चे टिकोरों में ,... "

फिर तो जैसे उनके तन बदन में आग लग गयी हो जैसे , खूंटा उनका खड़ा था और मेरी गुलाबो सीधे उसके ऊपर ग्राइंड कर रही थी ,

मैं बहुत तड़पी थी इस मोटे मूसलचंद के लिए , और अब मैं तड़पा रही थी।

मैंने गुलाबो की दोनों फांके थोड़ी अलग की अपनी ऊँगली से और एक बार फिर सीधे खड़े बौराये सुपाड़े पर , बहुत हलका सा अंदर घुसा ,

और था भी वो कितना मोटा , पहाड़ी आलू ऐसा ,

उनका तो पता नहीं लेकिन मैं पागल हो गयी , सुपाड़े के टच से , पर मैंने अपने पर कंट्रोल किया और बस वैसे ही , हलके हलके ,

पागल वो भी हो रहे थे , नीचे से उचक रहे थे , उचका रहे थे ,

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पर मैंने कस के अपने दोनों हाथों से उनके कन्धों को दबोच रखा था

और हलके हलके अपनी गुलाबो को उनके आधे घुसे हुए सुपाड़े पर भींच रही थी उसे दबोच रही थी , उन्हें देख कर मुस्करा रही थी ,

और उनकी आँखों में जबरदस्त प्रणय निवेदन था किसी तरह मैं और , पूरा अंदर ,...

मन तो मेरा भी यही कर रहा था , और मैंने अपनी पूरी ताकत से अपनी देह को उनके ऊपर दबाया ,

और मुझे अहसास हुआ कितनी ताकत लगती होगी पूरा सुपाड़ा अंदर ठेलने में

और लेकिन अब वो भी साथ दे रही थी , और मैं उन्हें नहीं रोक भी रही थी , दो तीन धक्कों के बाद ,

पूरा सुपाड़ा मेरी रसमलाई ने घोंट लिया।

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और अब मैदान उन्होंने सम्हाल लिया था ,

उनके दोनों हाथ मेरी पतली कमर पर कस के पकडे जकड़े , ... मुझे वो अपनी ओर खींच रहे थे

मैं भी उन्हें पकड़ के अपनी पूरी ताकत से अपने को उस मोटे मूसलचंद के ऊपर ,..

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सूत सूत कर वो अंदर जा रहा था , ...

था भी तो वो मोटा बांस बहुत लम्बा , पूरे मेरे बित्ते की साइज का ,

मेरी और उनकी दोनों की पूरी ताकत के बाद भी सुपाड़े के बाद मुश्किल से एक डेढ़ इंच घुस पाया होगा ,

आधे से ज्यादा अभी भी बाकी था ,

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अब मुझसे नहीं रहा जा था , ...

मेरी आँखों ने उनकी आँखों से बिन बोले कुछ कहा ,

और उनकी आँखे तो शादी के पहले से ही बिन बोले मेरी आँखों की हर बात समझ लेती थीं , बस

अगले ही पल , वो ऊपर , मैं नीचे ,... एक पल के लिए वो रुके ,

सच में देखने में बात करने में वो लड़का जितना भी अनाड़ी लगे , लेकिन था पूरा खिलाड़ी ,...

एक सूत भी जो बाहर सरका हो
 
बलमा अनाड़ी पक्का खिलाड़ी

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अगले ही पल , वो ऊपर , मैं नीचे ,... एक पल के लिए वो रुके ,

सच में देखने में बात करने में वो लड़का जितना भी अनाड़ी लगे , लेकिन था पूरा खिलाड़ी ,... एक सूत भी जो बाहर सरका हो ,

और फिर पूरे बिस्तर पर के तकिये कुशन , मेरे हिप के नीचे ,... मेरी दोनों टाँगे खूब फैली , उस दुष्ट के कंधे पर ,

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मैं समझ गयी थी क्या होने वाला है , .... मैंने कस के चादर को दोनों हाथों से पकड़ लिया , आँखे भींच ली , ...

और और और

रोकते रोकते ही मेरी जोर की चीख निकल गयी ,

पहला धक्का ही और सीधे सुपाड़े का करारा धक्का सीधे मेरी बच्चेदानी पर , पूरा का पूरा साढ़े आठ इंच मेरे अंदर ,

जिस तरह रगड़ते दरेरते वो मेरी चूत फाड़ते अंदर घुसा था , जान नहीं निकली थी मेरी बस ,

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दर्द से भी , मजे से भी।

कुछ सेकेण्ड के लिए रुके होंगे वो बस , जब तक मैं चीख रही थी , चिल्ला रही थी , और फिर उनके होंठ मेरे पलकों पर ,

समझ गयी बात मैं उनकी , शर्माने की नहीं होती , आँख खोलना ही पड़ा मुझे ,

और उनकी खुश , नाचती गाती मुस्कराती आँखो को देख कर मेरी आँखे एक बार फिर शर्मा कर बंद हो गयीं।

पर उस शैतान लड़के के तरकश में कोई एक ही तीर था क्या , ...

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उसके लालची होंठ बाज से कम नहीं थे , सीधे मेरे जोबन पर मेरे झप्पटा मारा ,

और जिस तरह से उसकी जीभ मेरे फ्लिक कर रही थी , मैं एक बार फिर सिसकने लगी ,

मूसल अभी भी पूरा अंदर धंसा घुसा था। और पता नहीं कहाँ से क्या क्या सीखते थे वो , उस मूसल का बेस , मेरी गुलाबो के मुहाने पर ,

बस सीधे मेरे जादू के बटन पर ,

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बस मैं जोर जोर से सिसकने लगी , बिना हाथ लगाए उस लड़के ने तिहरा हमला कर दिए , मेरे जोबन और क्लिट के साथ साथ , सीधे मेरी बच्चेदानी पर

मैं कसमसा रही थी , सिसक रही थी हलके हलके अपने छोटे छोटे किशोर चूतड़ उचका रही थी ,

बस धीमे धीमे उन्होंने अपने काम दंड को बाहर निकाला और उस समय भी मेरी त्वचा से रगड़ते , ... क्या कहूं ,...

मैंने कस के उन्हें अपनी बाँहों में भींच लिया मेरे नाखून उनके कन्धों में धस गए ,

मैं खुद अपने उभार उनके सीने में रगड़ने लगी ,

बस फिर तूफ़ान आ गया , हर दूसरा धक्का , पहले वाले से और जोर से ,

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हर बार आलमोस्ट सुपाड़े तक निकाल के वो कस कस के ठेल रहे थे , पेल रहे थे

दर्द के मारे मेरी हालत खराब थी , पर मेरी देह अब मेरी थी क्या , ....

मैं हर धक्के पर उनका साथ दे रही थी , उन्हें अपनी ओर खींच कर भींच कर ,

अपनी देह उनकी देह से रगड़ते हुए ,

और अब हम दोनों के होठ एकदम लॉक्ड थे ,कभी मेरी जीभ उनके मुंह में तो कभी उनकी जीभ मेरे मुंह में ,

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जो लोग कहते हैं , लड़कों के पास सिर्फ एक सेक्सुअल पार्ट होता है , वो एकदम गलतहोते हैं ,

उनकी उँगलियाँ , जीभ , होंठ और सबसे बढ़कर आँख , ...

और इस समय उस काम के रूप ने , पुष्प धन्वा ने अपने सारे तीर एक साथ , और वही हुआ जो होना था

आठ दस मिनट के बाद ,

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मेरी देह तूफ़ान में पत्ते की तरह काँप रही थी , मैं एकदम उनकी देह से चिपकी

डिस्चार्ज हो रही थी , झड़ रही थी , एक बार नहीं बार बार, बार बार

उन्होंने अपने धक्के रोक दिया , पर उँगलियाँ होंठ उसी तरह ,

कुछ चुम्बनों का असर ,

कुछ मेरी कोमल कोमल चूँची की कस कस के हो रही रगड़ाई मसलाई का असर , मैं बस दो चार मिनट में एक बार फिर से ,...

और अबकी उन्होंने मुझे दुहरा कर दिया , एक बार अपना मूसल बाहर निकाल के फिर सेट कर दिया ,

पहली बार वाला तो कुछ नहीं था ,

अबकी जो धक्के उन्होंने मारे , मेरी चीख की वो कोई परवाह नहीं कर रहे थे ,

वो जानते थे थोड़ी देर में मेरी चीखे सिसकियों में बदल जाएंगी , और हुआ वही।

मैं एक बार फिर उनका साथ दे रही थी , और अबकी मैं झड़ी तो मेरे साथ वो भी ,

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कटोरी भर थक्केदार मलाई ,

मेरी गुलाबी कटोरी भर कर छलक गयी ,

मलाई मेरी जांघों पर छलक गयी ,

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पर न उन्हें फरक पड़ रहा था न मुझे ,

मुझे मालूम था हजार किलोमीटर से भी ज्यादा चल कर ये लड़का इसी लिए तो आया था।

और अब तक न मैंने पूछा न उसने बताया की कैसे बंगलौर से वो आया ,

उस समय तो बस एक तूफ़ान मचा था , और अब तूफ़ान थमा तो मैं उनके चौड़े सीने पर रखे ,

थोड़ी देर तक तो मैं उन्हें देखती रही और वो मुझे , फिर मुझे अचानक ख्याल आया

" हे आये कैसे , ... "

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....एकदम पागल

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फिर मुझे अचानक ख्याल आया

" हे आये कैसे , ... "

वो बस मुस्करा दिए , ... और मेरा गाल सहलाने लगे।

" बोल न यार ,... "

मैंने बहुत जोर दिया और तब उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया।

शनिवार को हाफ डे होता है तो उन्होंने एक फ्लाइट बुक की थी , बनारस की डायरेक्ट फ्लाइट थी बैंगलोर से शाम चार बजे की , ...

साढ़े छह तक वो बनारस पहुँच जाते पर १२ बजे मालूम हुआ की वो फ्लाइट कैंसल हो गयी।

और साढ़े बारह से पहले कैम्पस से निकल भी नहीं सकते थे ,... लेकिन चार बजे की उन्हें दिल्ली की फ्लाइट मिल गयी बस , ...

वो फ्लाइट पकड़ कर दिल्ली आये और साढ़े छह बजे वहां से बनारस की एक फ्लाइट दौड़ते भागते उन्होंने पकड़ी।

सवा आठ बजे बाबतपुर एयरपोर्ट पहुंचे , वहां से टैक्सी पकड़ कर ,

लेकिन रस्ते में एक दो जगह बहुत जाम था , तो सवा ग्यारह बजे आज़मगढ़।

ये लड़का भी न एकदम पागल है , ...

मैं बस यही सोच रही थी ,

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तभी वो मुस्कराने लगे , और मैंने जोर से चिकोटी काटी तब असली बात बताई उन्होंने।

बंगलौर एयर पोर्ट पांच किलोमीटर रह गया था और उनकी टैक्सी ख़राब हो गयी थी ,

बोर्डिंग बंद होने में बस बीस मिनट रह गए थे , डेढ़ किलोमीटर तो वो पैदल दौड़ते हुए ,

फिर एक बाइक वाले से लिफ्ट मिली। जब ऐयरपॉर्ट पहंचे तो बस ४५ मिनट बचे थे। बोर्डिंग बंद हो रही थी।

तुम भी न , एकदम पागल हो।

मैं उनसे लिपट गयी और चूमते बोली।

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पर वो भी न , बदमाशी का मौका मिल जाए , कस के चूम के बोले ,

" और पागल बनाया किसने " .

मैं छुड़ाते बड़े इतरा के बोली , ...

' वो तो है। "

और तभी मुझे कुछ याद आया , ...

"कैम्पस से कब निकले थे , "मैंने पूछा।

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साढ़े बारह बजे , ... जैसे क्लास क्लोज हुआ। तुम्हे मालूम है एयरपोर्ट कितना दूर है , चार की फ्लाइट थी तो ढाई बजे पहुंचना था , और दो घंटा कम से कम लगता है वहां से , ऊपर से टैक्सी खराब हो गयी , लेकिन सवा तीन बजे ,... पहुँच गए।

उन्होंने कबूला।

"और खाना , ... साढ़े बारह बजे तो खाना मिलता नहीं होगा?"

मैंने फिर पूछा।

" यार ब्रेकफास्ट जम के किया था न , ... खाने के चक्कर में पड़ता तो फ्लाइट छूट जाती। " वो हँसते हुए बोले। \

"और मुझे मालूम है न तुमने फ्लाइट में कुछ खाया होगा न ,... "

पर मेरी बात काटते वो बोले ,

" बोला तो ब्रेकफास्ट कस के किया था , और फ़्लाइट सब सिर्फ पानी वाली थीं , फिर ये डर लग रहा था की कहीं कनेक्टिंग फ्लाइट छूट न जाए , ... और बाबतपुर में उतर के बस दौड़ते भागते ,... एक ही दो टैक्सी रहती हैं वहां , ... लेकिन देखो बारह बजे के पहले पहुँच गया। "

उन्होंने कबूल किया और जैसे अपनी सफलता का ऐलान किया ,

लेकिन मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था।

ये भी कोई बात हुयी , सुबह आठ साढ़े बजे के बाद , एक दाना पेट में नहीं ,...

ब्रेकफास्ट के बाद न लंच न डिनर न शाम को कुछ ,... और भागते दौड़ते ,...

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वो समझ गए , मुझे पुचकारते , चूमते बोले ,

" तुम भी न बेकार परेशान हो रही हो , ... देख अभी तो जबरदस्त दावत हो गयी न। "

ये लड़का न इससे तो गुस्सा होना भी मुश्किल , और उनकी आंखे , जिस तरह से वो देखते थे , ...

मैं मुस्करा पड़ी , लेकिन बोली ,

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" ठीक है दावत हो गयी लेकिन अभी इसका, भी कुछ इंतजाम करती हूँ मैं ,... "

और उनके पेट को चूम कर के मैं उठ गयी।लेकिन इतने आसानी से वो लड़का छोड़ने वाला नहीं था ,

उन्होंने कस के हाथ पकड़ के अपनी ओर मुझे खींच लिया।

मैं समझ रही थी , मन तो मेरा भी बहुत कर रहा था , लेकिन सुबह से ये बेचारा एकदम भूखा , ...

मैंने छुड़ाते हुए नीचे देखा , ... वो मूसलचंद , एक बार फिर थोड़ा सोया , थोड़ा जागा ,... एक बार फिर कुनमुना रहा था।

बस मैंने उसे ही पकड़ा , और सीधे खुले सुपाड़े पर एक पुच्ची लेते उसे समझाया ,

" बस आ रही हूँ , अरे यार बिना पेट्रोल डीजल के गाडी नहीं चलती , बस एक बार टंकी फुल कर दूँ , इस लड़के की , ... फिर मैं कहीं नहीं जाने वाली। "

जवाब उन्होंने दिया , एकदम बेताब बेकरार , ...

" जल्दी आना , ... " वो बोले।

फर्श पर उनके कपडे फैले थे , उसे समेटते बोली , ...

" बस दस मिनट "

" नहीं नहीं , पांच मिनट बस ,... मुझे एकदम भूख नहीं है "

वो लड़का बोला।

मुझे अच्छी तरह मालुम था जनाब को किस चीज की भूख है।

उनके कपडे उठा के मैंने बाथरूम में रखे , और अपनी नाइटी बस फर्श से उठा कर देह पर टांग लिया ,

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और उनकी ओर मुड़ के बोली ,

ठीक बस पांच मिनट , अभी गयी , अभी आयी। और मुझे मालूम है तुझे किस चीज़ की भूख है , बस गयी आयी ,

उनके कपडे तो मैंने सब टांग दिए थे बस एक चादर पतली सी उन्हें उढ़ा दी , और दरवाजा उठँगा कर सीधे सीढ़ी से नीचे ,

लेकिन किचेन में पहुँचते ही मुझे अंदाज हो गया ,... कुछ नहीं मिलने वाला।

असल में सासू जी का व्रत था ,...

बस मैंने और जेठानी जी ने एक पिज्जा मंगा कर खा लिया था। सुबह का भी कुछ नहीं था। फ्रिज मैंने अच्छी तरह खोल कर देख लिया।

,..

और उस लड़के ने पांच मिनट की शर्त भी लगा दी थी , कुछ बनाने का टाइम नहीं था ,

ऊपर से मैं एकदम दबे पाँव ,... ज्यादा खड़खड़ होती तो सासू जी , जेठानी के जग जाने का खतरा , और फिर पूछ ताछ ,...

और अगर मैं कह देती की वो आये हैं , तो सासू जी अपने बेटे से मिलने कही ऊपर चली जातीं तो,

किचेन की मैंने लाइट भी नहीं जलाई , बस फ्रिज खोल के उसी की लाइट में किचेन में , ...

दूध था थोड़ा सा बस उसे मैंने औटाने के लिए चढ़ा दिया , वो गर्म हो गया तो कुछ केसर उसमें डाल दी। पर आधे ग्लास दूध से क्या होना था

सच में एकदम पागल लड़का , ... सुबह से कुछ नहीं खाया जनाब ने ,...

कुछ समझ में नहीं आ रहा था , तभी याद आया सासू जी का व्रत था ,

उन के लिए रबड़ी आयी थी , व्रत तोड़ने के लिए , शाम को उन्होंने खायी थी। बाकी काफी रबड़ी बची हुयी रखी थी ,

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लेकिन एक और प्रॉब्लम ,

रबड़ी उनको पसंद नहीं थी।

सिर्फ नापंसद नहीं थी , बल्कि सख्त नापसंद , मैंने देखा था रिसेप्शन वाले दिन , उनकी इमरती की प्लेट में किसी ने जरा सा एक आधी चमच रबड़ी डाल दी ,

बस प्लेट उन्होंने जस की तस छोड़ दी।

मैं फ्रिज के सामने खड़ी देख रही थी ,

एक बड़े से बाउल में रबड़ी रखी थी , एकपाव से ज्यादा ही थी। पांच सौ ग्राम आयी थी , सासू जी ने थोड़ी सी ही खायी थी बाकी सब बची थी।

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क्या करूँ , कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

फिर मैंने तय कर लिए , कोमल अब ये लड़का क्या पसंद करता है क्या नापसंद , उसको नहीं तय करना है , ये कोमल तय करेगी।

मैं मुस्करायी , उनकी नो नो वाली पूरी लिस्ट मेरे दिमाग में घूम गयी।

बस मैंने ड्राई फ्रूट वाले डिब्बे खोले , और कतरे हुए काजू , बादाम , पिस्ता, केसर ,...

और तभी मुझे एक और डिब्बा दिख गया बड़ा छोटा सा और मेरे चेहरे पर हंसी दौड़ गयी , मंझली ननद ने उस डिब्बे का राज बताया था ,

जो रोज रात को सुहाग रात के पहले दिन से हमारे कमरे में दूध रखा जाता था , उसमें ये ,... पता नहीं क्या क्या हर्ब्स थीं , ... शिलाजीत , अस्तावर , ... मंझली ननद ने बताया तो हम दोनों हँसते हुए लोट पोट हो गए

' शक्तिवर्धक , वीर्यवर्धक , कामोत्तेजक , मदन चूर्ण '

मैंने एक मिटटी का बड़ा सा सकोरा उठाया और पहले सबसे नीचे वही उसी डिब्बे से , ढेर सारी ,

और फिर बाउल से रबड़ी , और उसके ऊपर कतरे काजू बादाम , केसर , पिस्ता और फिर उसी हर्ब वाले डिब्बे से और ढेर सारा छिड़क दिया , ...

मैंने बस एक सावधानी बरती , एक अल्युमिनियम फ्वायल से उसे कवर कर लिया ,

फिर वो दूध वाला ग्लास और मिटटी का रबड़ी से भरा सकोरा लेकर दबे पांव ऊपर कमरे में ,...

कमरे में घुसते ही पहले मैंने ट्रे अंदर मेज पर रखा और दरवाजा बंद कर लिया।

बेताब , बेसबरा , उनका चेहरा एकदम , .... भुकरा बोले ,

"पूरे आठ मिनट हो गए हैं। "
 
बहुत बहुत शुभकामनाएं , बहुत बहुत धन्यवाद

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