Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 10 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

समीर राय एक बाप था और खुल...रोशन ख्यालों वाला बाप था ।उसकी मां ने रिश्ते को छेड़कर उसकी छिपी ख्वाहिश को जगा दिया था। हिना जवानी के आंगन में कदम रख चुकी थी और अब वक्त आ गया था कि उसके लिये एक उपयुक्त वर की तलाश की जाए और वह जानता था कि उसकी बेटी के लिए कैसा लड़का होना चाहिए। हिना एक आइडियल लड़की थी..ख्वाबों की शहजादी ! वह उसके लिए वर भी वैसा ही तलाश करना चाहता था। कोई आइडियल लड़का..कोई ख्वाबों का शहजादा ।समीर राय जानता था कि यह सिलसिला अब शुरू हुआ है तो आगे भी बढ़ेगा और उसे अपने आठों मामों की दिहाती-अनपढ़ पहलवान किस्म के काले बदरंग बेटों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह एक हूर को किसी लंगूर को सौंपने के बारे में सोच भी नहीं सकता था ।समीर राय का सोशल व कारोबारी सर्कल खासा विशाल था। मुम्बई के बड़े-बड़े घरानों व लोगों से सम्बन्ध थे। अब तक उसने इस नजर से इन घरानों को नहीं देखा था, लेकिन अब वह जहां जाता, हिना को अपने साथ रखता। लड़के एक-से-एक थे...लेकिन हिना के लिए जैसे वह की कल्पना समीर राय के जहन में थी...वैसा उसे अभी तक नजर नहीं आया था ।

फिर एक दिन जब हिना ने समीर राय से अपनी सहेली हेमा के घर जाने की इजाजत चाही वह बैठे-बैठे चौंक गया। अपनी बेटी को मुस्कुराकर देखने लगा।हिना चोर-सी बन गई। अब्बू ने जाने उसकी कौन-सी चोरी पकड़ ली...लेकिन बाप तो आने ही ख्यालों में मग्न था। हेमा नाम सुनकर अचानक उसके भाई गौतम का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूम गया ।लेकिन क्या उसे एक गैर बिरादरी में व दूसरे मजहब के लड़के के बारे में सोचना चाहिये? यह सोच भी उसके जहन में उभरी थी कि हिना ने घड़कते दिल के साथ पूछा था-"अब्बू..क्यों मुस्कुरा रहे हैं ? खैर तो है...?"

खैर ही खैर है...बेटी...।" समीर बड़ी खुशदिली से बोला-"तुम ऐसा करो ड्राइवर के साथ चली जाओ। हां...यह बताओ...तुम्हें वहां देर कितनी लगेगी..?''

"अब्बू.. | पहली बार जा रही हूं उसके घर...वह इतनी जल्दी तो जान छोड़ेगी नहीं। दो-ढाई घन्टे तो जरूर लगेंगे...।" हिना ने डरते-डरते कहा। उसे अंदेशा था कि कहीं अब्बू उसे मना न कर दें।

अच्छा..फिर ऐसा करते हैं..मैं तुम्हारे साथ चलता हूं। मैं तुम्हें छोड़कर आगे अपने एक दोस्त से मिलने चला जाऊंगा। फिर वापसी पर मैं तुम्हें ले लूंगा।

ओ.के..."अब्बू, जिन्दाबाद...।" हिना ने बच्चों की तरह ताली बजाई-"यह तो बहुत ही अच्छी बात है। हेमा आपको देखकर खुश हो जाएगी। वह आपको बहुत पसन्द करती है... । हिना ने देर नहीं लगाई। उसने फौरन हेमा को फोन किया और उसे यह भी बता दिया कि वह अपने पापा के साथ आ रही है। यह सुन हेमा वाकई खुश हो गई। हिना...फिर डिनर लेकर जाना...।""

अरे, नहीं...हेमा। पापा इतनी देर नहीं रुकेंगे। तुम बस, फर्स्ट क्लास चाय पिला देना।

"ठीक है. तुम आओ तो... ।'

"पापा को अपने किसी दोस्त के यहां जाना है। वह मुझे छोड़कर चले जाएंगे...फिर वापसी पर मुझे पिक-अप कर लेंगे। मैंने उनसे दो-ढाई घन्टे की इजाजत ली है, ठीक है ना? दो-ढाई घन्टों में तो हम दो ढाई सौ बातें कर लेंगे। क्यों मेरी हेमा मालिनी... ।'

हिना ने उसे सारा प्रोग्राम कह सुनाया। आज तो मुझे सिर्फ एक ही बात करनी है....।" हेमा हंस दी।

इतनी लम्बी बात कि दो-ढाई घन्टे तक चलेगी... ।” हिना ने पूछा ।

दो-ढाई घन्टे क्या..हो सकता है सारी उम्र चले... ।'

"ते तो अब शायरी पर उतर आई है। आखिर एक शायर की बहन है ना ?" हिना बोली ।

"वह शायर साहब आज घर पर ही हैं...।" हेमा ने जैसे सूचित किया।

"कहीं तूने उन्हें मेरे आने का तो नहीं बता दिया..?" हिना जोरों से हंसी। बताया तो नहीं.तू कहे तो बता दूं...।" हेमा ने छेड़ा।

बता दे..मुझे क्या..?" हिना ने एक खास लगावट के साथ जवाब दिया।

"भैया...वह आ रही है..?" हेमा की आवाज आई। उसने चिल्लाकर कहा था।

"ओ बेवकूफ ! क्या कर रही है...।'' हिना घबरा गई-"तुझे शर्म नहीं आती ?"

"बस, हिम्मत दे गई जवाब ।'

''हां, भई ऐसी बहादुरी में क्या रखा है। अच्छा, हेमा..तो मैं आ रही हूं..।"

"जल्दी आ..हम तेरा इंतजार कर रहे हैं...तेरी राह में पलकें बिछाये...।" हेमा के लहजे में शरारत थी।

हिना ने 'खुदा हाफिज' कह कर रिसीवर रखा

और बाथरूम में घुस गई। आज वह खास तवज्जो के साथ तैयार हुई। जब वह तैयार होकर कमरे से निकली तो उसे सितारा राहदारी में आती नजर आई । वह चाय की ट्रे लिये हुये थे।सितारा ने पहले तो हिना को बड़ी दिलचस्पी से देखा...फिर अर्थपूर्ण अंदाज में खांसी व बोली-"माशा अल्लाह, आज क्या इरादे हैं बीवी ?'

"मैं जरा हेमा के घर जा रही हूं...।'' हिना ने बताया।"

और इस चाय का क्या होगा..?" सितारा ने पूछा।

"तू पी ले...।" मैं अब चाय हेमा के यहां पीऊंगी...।'

"अच्छा...।'' सितारा ने उसे एकटक देखते हुये कहा, फिर बोली-"बीवी जरा एक मिनट रुक जाएं। मैं अम्मा को बुला लाऊं... ।

'"क्या मतलब.?" किस लिये..?" हिना की समझ में नहीं आया था।

आपकी नजर उतार देंगी...मिर्चे उतार कर, अल्लाह ! इतनी सोहणी लग रही हैं...मुझे डर है किसी की नजर न लग जाए।"

"चल, बेवाकूफ...।" कहती हुई हिना, पापा के कमरे की बढ़ गई-"सितारा, टेलीफोन का ध्यान रखना।'

"आप बेफिक्र रहें बीवी...।" सितारा बोली-"मैं सबके नाम नोट कर रखूगी...।
 
"हिना जल्दी-जल्दी चलती हुई अब्बू के कमरे में पहुंची ।समीर राय उसका प्रतीक्षक था। आज जब उसने हिना को एक नजर देखा तो...एकाएक उसके दिल में यह ख्याल जागा कि उसकी बेटी वाकई बड़ी हो गई है। यही अहसास हुआ जैसे हिना चंद दिनों में ही बड़ी हो गई है।

"तुम्हारी सहेली के वालिद क्या करते हैं..?" गाड़ी चलाते हुए समीर राय ने यूं ही से अंदाज में हिना से पूछा था।

वालिद (पिता) नहीं हैं...।" हिना ने बताया।

"ओह...।" समीर राय को अफसोस हुआ–“यहां फिर घर में कौन-कौन है ?"

"कोई नहीं है...दोनों भाई-बहन अकेले रहते हैं। उनकी मम्मी भी नहीं है। यहां वे अपने मामू के साथ रहते हैं।

"मामू क्या करते हैं..?" समीर ने पूछा ।"

अब्बू.पता नहीं। इस बारे में कभी बात नहीं हुई उससे....।'' हिना ने जवाब दिया उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह अब्बू, हेमा के घरवालों में इस कदर दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं। वह अपने बाप की फितरत से अच्छी तरह वाकिफ थी। वह तो अपने काम-से-काम रखने वाले आदमी थे।फिर समीर राय इस विषय को छोड़ इधर-उधर की बातें करने लगा। बातों-बातों में नजीरा का जिक्र निकल आया तो वह उसी की चर्चा करने लगा। समीर राय, हिना से प्राय: नमीरा की बातें करता रहता था ।बेचारी हिना तो अपनी मां के बारे में कुछ नहीं जानती थी। उसने तो मां को देखा तक नहीं था। हां..उनकी तस्वीरें जरूर देखी थीं। एक बहुत बड़ी तस्वीर समीर राय के कमरे में लगी हुई थी। हिना प्रायः उस तस्वीर को खड़े होकर देखा करती थी। उसे अपनी मां के बारे में बातें करना व सुनना बहुत पसन्द था, और इस संदर्भ में ज्यादातर बातें समीर राय ही करता था और ये वे बातें थीं जो हिना जाने कितनी बार सुन चुकी थी, लेकिन इन बातों को ही बार-बार सुनकर वह कभी बोर नहीं होती थी, बल्कि हर बारऐसी दिलचस्पी से सुनती थी जैसे पहली बार सुन रही हो ।शायद यही कारण था कि समीर राय भी बार-बार नमीरा की चर्चा ले बैठता था कि हिना अपनी मां को अच्छी तरह जान ले और हकीकतन, हिना अपनी मां का जिक्र सुन-सुनकर उनके बारे में बहुत कुछ जान गई थी |अम्मी किस तरह रहती थी...किस तरह मुस्कुराती थी...किस तरह उठती थी..बैठती थी। क्या खाती और पीती थी, उनके शौक क्या थे..दिलचस्पियां क्या थीं। हिना इतना कुछ जान गई थी कि उसे अपनी मां आंखों के सामने चलती-फिरती नजर आने लगती थी |मां की बातों में रास्ते का पता ही नहीं चला और मंजिल आ गई। हेमा ने पूरी डिटेल के साथ अपने घर के बारे में बताया था। वे बड़ी आसानी से उसके घर पहुंच गये ।समीर राय ने गाड़ी गेट पर खड़ी करके कालबैल बजाई तो गेट फौरन खुल गया। असल में हेमा ने ऊपर से गाड़ी देख ली थी और अपने भाई गौतम को गेट पर भेज दिया था ।

गौतम को गेट पर देखकर समीर राय को खुशी हुई, उसने उससे बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया और पूछा-"कैसे हो बर्खरदार.?

''मैं बिल्कुल ठीक हूं। आइये तशरीफ लाइये...।"

गौतम को देखकर हिना भी गाड़ी से उतरकर गेट की तरफ आई।

"भई, हम तो आपकी बहन के मेहमान को छोड़ने आए हैं...।" समीर राय मुस्कुराते हुए बोला-"हमें आगे जाना है सो अभी नहीं...।"

"नहीं अंकल यह कैसे हो सकता है...।" गौतम बोला, हेमा भी गेट पर पहुंच चुकी थी। गौतम ने आगे कहा-"अन्दर तो आइये...फिर चले जाइयेगा...।'

'"ठीक है-" समीर राय हेमा के सलाम का जवाब देते बोला और फिर वे चारों बंगले में आ गये।खूबसूरत बंगला था। ऊपर की मंजिल बहन-भाई के पास थी। बाप-बेटी को बड़े आदर-सत्कार के साथ ड्राइंगरूम में बैठाया गया, हिना के साथ हेमा बैठ गई थी, और गौतम को समीर राय ने अपने पास बैठा लिया था।

अभी रास्ते में बात हो रही थी कि आप लोग अपने मामू के साथ रहते हैं...।"

समीर राय ने चुप्पी तोड़ी।"जी...।" गौतम ने संक्षिप्त-सा जवाब दिया।

आपके पापा का इंतकाल कब हुआ..?" समीर राय ने पूछा।

"दस-बारह साल हो गये होंगे...।"

"और मम्मी... ।'

"वह पापा से भी पहले चली गई थीं...।" गौतम ने बताया।"

आपके मामू क्या करते हैं..?"

"ठेकेदार हैं...बिल्डर भीर, कन्स्ट्रक्शन का काम है। मैं उनके साथ हूं... ।

समीर राय मुस्कुराये, बोले-“अच्छा, बच्चे, हम अब चलते हैं। फिर आऊंगा...इत्मीनान से बैलूंगा। आपके मामू से भी मिलेंगे...।" वह उठ खड़ा हुआ।

"अंकल, चाय आ रही है। दो मिनट और ठहरें.. । हेमा ने अनुरोध किया।

ठीक है। लेकिन दो मिनट का मतलब...दो मिनट ही होना चाहिये...।" समीर

राय फिर बैठ गया।
 
समीर राय मुस्कुराये, बोले-“अच्छा, बच्चे, हम अब चलते हैं। फिर आऊंगा...इत्मीनान से बैलूंगा। आपके मामू से भी मिलेंगे...।" वह उठ खड़ा हुआ।

"अंकल, चाय आ रही है। दो मिनट और ठहरें.. । हेमा ने अनुरोध किया।

ठीक है। लेकिन दो मिनट का मतलब...दो मिनट ही होना चाहिये...।" समीर

राय फिर बैठ गया।

दो मिनट बीते नहीं थे कि एक घरेलू नौकर चाय लेकर आ गया। चाय इधर-उधर की बातों में दी गई और फिर समीर राय ने इजाजत चाही। गौतम उन्हें नीचे गाड़ी तक छोड़ने गया और फिर जब वह वापिस आया तो ड्राइंगरूम में कोई नहीं था ।हेमा, हिना को अपने बैडरूम में ले गई थी और दरवाजा बंद कर लिया था। गौतम को अपनी बहन पर बहुत गुस्सा आया...लेकिन वह क्या कर सकता था। वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया और टी.वी. ऑन करके बैठ गया ।

उधर हेमा के कमरे में एकान्त मिलते ही हिना ने बात शुरू की-"लो, हम आ गये हैं, अब बात कर..क्या बात करने वाली थी...।"

उसने हेमा का हाथ पकड़ उसे बैड पर अपने पास ही बैठा लिया था।"बात यह है हिना, देख तू मेरी बहुत अच्छी दोस्त है और मैं किसी कीमत पर तुझे छोड़ना नहीं चाहती...।" हेमा उसके चेहरे पर नजरें गड़ाते बोली-"अगर तुझे मेरी बात बुरी लगे तो साफ व फौरन कह देना। मैं तेरी बात का बुरा नहीं मानंगी...।"

"अब यह लफ्फाजी छोड़ और बात कर... | सीधी व साफ...।"

और हेमा ने भी सीधे-साफ शब्दों में कह डाला-"बात यह है कि मेरा भाई तुझसे शादी करना चाहता है। जब से उसने तुझे देखा है तेरा दीवाना हो गया है...।"

. यह सुनते ही हिना हंस दी और हंसती चली गई। मारे हंसी के उसका बुरा हाल हो गया। हेमा की समझ में यह प्रतिक्रिया नहीं आई। वह खिसियानी सी हिना को घूरने लगी। जब हिना की हंसी थमने को नहीं आई तो वह परेशान-सी बोली...

"आखिर तुझे हुआ क्या है ? क्यों यूं पागलों की तरह हंसे जा रही है..?"

"कुछ नहीं...।" कह कर हिना फिर हंसने लगी।

"ठीक है..तू अच्छी तरह हंस ले। तब तक मैं नीचे होकर आती हूं...।" हेमा उठते हुए बोली।

हिना हंसते-हंसते एकदम रुक गई और उसका हाथ पकड़ कर बैठते हुए बोली-"यह तो तूने मेरे दिल की बात कही है मेरी हेमा मालिनी। मैं भी यही चाहती हूं... ।

'"क्या...क्या...तू मेरे भैया गौतम से शादी करना चाहती है..?" हिना के अप्रत्याशित जवाब पर हेमा उसे अविश्वासभरी नजरों से घूरने लगी। उसने जैसे हिना से पुष्टी चाही थी।

हिना से बड़ी अदा से सिर हिला हामी भरी, मुंह से कुछ न बोली।

"ओह, मेरी हिना... । हेमा ने उसे दीवानों की तरह खुश होकर गले से लगाया।'ओये...तेरी नहीं..।"

हिना ने उसके बाजू पर चुटकी काटी-"किसी और की हिना... ।

'"अच्छा, अच्छा, चल गौतम भैया की हिना सही...।" हेमा से खुशी संभाले नहीं संभल रही थी-"आह ! तू क्या जाने तेरा जवाब सुनकर मेरे सीने से कितना बड़ा बोझ हट गया है। मैं अपने भाई की छोटी बहन जरूर हूं..लेकिन जो कुछ हूं मैं ही हूं... | मैं उनके लिए बहुत परेशान थी। हालांकि तूने फोन पर मेरे भैया के बारे में काफी बेतकल्लुफ बातें की थीं...लेकिन मैं उसे तेरा मजाक ही समझी। मुझे नहीं मालूम था कि तू भी भैया के बारे में सीरियस है। खैर, जो हुआ, अच्छा ही हुआ। तेरे जवाब ने मेरे दिल में बर्फ सी भर दी है। लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई...।"

"वह क्या...?" हिना मुस्कुरा दी।
 
"एक ही मुलाकात में तुम दोनों एक-दूसरे पर मर मिटे । न तुम भैया के बारे में कुछ जानती हो और ना भैया तुम्हारे बारे में कुछ जानते हैं। इसके बावजूद तुम दोनों ने एक-दूसरे को चुन लिया...।" "मेरी हेमा मालिनी..कभी-कभी जानने कि लिए एक लम्हा ही बहुत होता है, और कभी-कभी यूं भी होता है कि सदियां गुजर जाती है साथ रहते हुये...फिर भी लोग एक-दूसरे को नहीं जान पाते....।" हिना ने बदस्तूर मुसकुराते हुए जवाब दिया।

"हाय ! यह मुहब्बत भी क्या चीज है। बन्दे को क्या से क्या बना देती है। उधर मेरा भाई भी कुछ ऐसा ही फलसफा झाड़ने लगा है और इधर है कि तू उसी की सुरताल में बात कर रही है।

"अरे, हम क्या जानें...यह मुहब्बत क्या है। मुहब्बत की ग्रेटनेस तो कोई मेरे अब्बू से पूछे..जिन्होंने मम्मी की खातिर अपनी भरपूर जवानी उनकी याद में बिता दी। सच, हेमा अपने अब्बू का भी जवाब नहीं...किस्से-कहानियों में ही मिल सकता है उनका किरदार...।''

"हिना एक बात बता.. ।” हेमा उसे घूरते हुये संजीदगी से बोली-"क्या तुझे नहीं लगता कि तू अक्सर अपनी उम्र से बड़ी-बड़ी बातें करती है।

"हां, शायद हेमा।” हिना ने कबूला-"हो सकता है कि इसकी वजह यह हो कि मैं कोई आम-सी मामूली लड़की नहीं हूं। मैं बड़ी भावुक लड़की हूं। जहीन हूं। मेरी फितरत दूसरों से जुदा है। मेरा बचपन एक गैर मामूली माहौल में बीता है। बचपन से जवानी का सफर भी कोई आम सफर नहीं।

आज भी असाधारण, गैरमामूली हालात से दो-चार हूं और सच तो यह है कि सब ही मुझे मेरी बड़ी-बड़ी बातों पर टोकते रहे हैं। मेरी दादी जान मुझे दादी अम्मा कहकर पुकारती रही हैं, मेरे पापा ने भी कई बार टोका है। अक्सर मेरी किसी-न-किसी बात पर यही हैरत दर्शाते हैं कि-"हमारी हिना कुछ ज्यादा ही बड़ी नहीं हो गई है।" अब प्राब्लम यह है कि मैं क्या करूं | मेरे चैतन्य में पुख्तगी है तो अब मैं बच्चों जैसी बातें तो नहीं करूंगी ना...।'

"तुझे बच्चा बनने की जरूरत नहीं है..तू दादी-अम्मा ही बन..तुझे भला कौन रोक सकता है...।" हेमा ने उसे घूरा।

"ओये...अदब से... ।' हिना ने जैसे चेताया-"देखती नहीं है कि अब रिश्ता क्या-से-क्या हो चुका है...।'

'"रिश्ता कुछ भी हो जाये...।" हमा की अकड़ बरकरार रही-"पर इतना याद रख कर कि मैं तुझसे उम्र में बड़ी हूं...।

"लो भई...यह क्या बात हुई...कल कोई मैन्स मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो जाए और कहे कि हिना बीवी मैं तुमसे बहुत बड़ी हूं, मेरा अदब करो..तो तेरा क्या ख्याल है कि मैं उसके रूआब में आ जाऊंगी...।" हिना ने संजीदगी से एकदम परखच्चे उड़ा दिये ।

हिना...तेरा जवाब नहीं। रब्ब, तुम दोनों की जोड़ी को सलामत रखे... । हेमा जज्बाती हो उठी।

"वाह, दादी अम्मा... । इतनी जल्दी हमारा असर हो गया। इसे कहते हैं खरबूजे को देखकर खरबूजे का रंग बदलना...।" मीठा-सा कहकहा उगला था हिना ने।

"ऐसा ही समझ लो...।' हेमा ने उसका हाथ पकड़कर उसे उठाते हुए कहा ।

“क्या इरादा है..?" हिना ने पलकें उठा पूछा ।

"आओ नीचे चलें। तुझे अपनी मामी और उनके बच्चों से मिलवाऊं...।

''चलो...।" हिना उठ खड़ी हुई ।
 
गौतम अपने कमरे में बैठा टी.वी. देख रहा था। उसके दरवाजे के बाहर कदमों की आवाज गूंजी तो उसने दरवाजे की तरफ देखा। वे दोनों दरवाजे के सामने से गुजरी थीं।

हिना ने एक क्षण के लिए गर्दन घुमाई। गौतम इधर ही देख रहा था। उसने फौरन गर्द सीधी कर ली।

हेमा...।" जब वे दोनों दरवाजा क्रास कर गईं तो पीछे से आवाज आई।“

जी भैया...।" हेमा ने पलटकर उसके कमरे में झांका।

कहां जा रही हो..?''

"नीचे जा रही हूं, भैया ! हिना को मामी से मिलाने।

"अरे, इन्हें पहले हमारा कमरा तो दिखाओ...।"

गौतम ने इतने जोर से कहा कि हिना तक उसकी आवाज पहुंच गई।

"मैं लड़कों के कमरे में नहीं जाती...मुझे एलर्जी हो जाती है...।" हिना ने हंसकर कहा ।

"सुन लिया भैया..?" हेमा ने शोखी दिखाई।“

नहीं, मैंने नहीं सुना...क्या कह रही है..?" गौतम लपककर दरवाजे पर आ गया था।"

हिना..अब बोल...।'' हेमा ने उसकी तरफ देखकर कहा।

मैंने तो कुछ नहीं कहा...।" हिना साफ मुकर गई।

तो फिर आइये ना...कुछ देर हमारे कमरे में भी बैठें..।" गौतम सीधे हिना से सम्बोधित हुआ ।

इससे पहले कि हिना कोई जवाब देती, हेमा झट से बोली-"चल, हिना आ जा ! भैया का कमरा भी देख लें...।

"नाक पर हाथ रखकर जाना पड़ेगा...।'' हिना ने बहुत आहिस्ता से हेमा के कान में कहा। हेमा बरबस ही खिलखिला कर हंस पड़ी।

क्या हुआ..?" गौतम परेशान होकर अपनी बहन को देखने लगा।

कुछ नहीं, भैया...।" हेमा सूखा-सा मुंह बनाकर बोली, फिर हिना से सम्बोधित हुई-"आओ, हिना....हिना कमरे में दाखिल हुई तो उसे खुशगवार हैरत हुई। गौतम का कमरा बड़ा खूबसूरती से सजा हुआ था। हर चीज बड़े सलीके से रखी थी और हर शो-पीस गौतम की ऊंची अभिरुचि व पसंद का प्रतिनिधित्व करता था। हकीकतन, गौतम की ही तरह उसका कमरा भी बड़ा खूबसूरत था। एक तरफ पूरी दीवार में शैल्फ बना हुआ था और उसमें किताबें बड़े करीने से लगी हुई थीं और हिना तो किताबों की दीवानी थी...वह सीधे किताबों की शैल्फ की तरफ गई।

आपको भी लगाव है किताबों से.?" गौतम उसके बराबर आ खड़ा हुआ–“क्या पढ़ती हैं आप ?'"

"जी, वह...कुकिंग की किताबें पढ़ती हूं...।" हिना ने यह जवाब इतनी संजीदगी से दिया था कि गौतम उसका मुंह देखता रह गया ।और हेमा के लिए अपनी हंसी रोकनी मुश्किल हो गई। उसने हिना के करीब होकर उसके बाजू में चुटकी ली व बोली-“शरारती बाज आ जा...।"

यह सुनकर गौतम को हौसला हुआ। समझ में आ गया कि हिना मजाक कर रही है, वर्ना वह उसका जवाब सुनकर परेशान हो गया था। उसने शैल्फ से एक किताब निकालकर हिना की तरफ बढ़ा दी। हिना किताब देखने लगी वह रोमांटिक कहानियों का संग्रह था। नाम था-'तुम मेरी हो' |किताब का नाम पढ़कर हिना ने तिरछी नजरों से गौतम की तरफ देखा। कुछ कहे बिना किताब उसके हाथ में थमाई और फिर हेमा का हाथ पकड़ कर बोली-"चलो, हेमा। नीचे चलते हैं।"वे कमरे से निकल आईं।
 
पहला चरण बाखूबी गुजर गया था ।दोनों ही राजी थे। हिना और गौतम एक-दूसरे के लिए बेकरार थे। शादी करना चाहते थे, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। गौतम की अपने खानदान की नेहा से मंगनी हो चुकी थी और इस मंगनी का टूटना आसान न था ।फिर अभी हिना की ही रजामंदी थी...समीर राय के राजी होने का भी मसला था। मामी एक मीठे स्वभाव की औरत थी। उसने अपने पति की भांजी-भांजे को बड़े मान से रखा था। मामा भी इन दोनों का बहुत ख्याल रखते थे और इस सिलसिले में अब आगे का काम घर के इन बड़ों का ही था। इसलिए हेमा ने सोचा कि वह शोभा मामी से बात कर ले।और हेमा ने जब उनसे बात की तो मामी एकदम चौंक गई-"हेमा, यह तू क्या कर रही है...?

"भैया, हिना से शादी करना चाहते हैं...यह कह रही हूं मैं...।" हेमा ने अपनी बात दोहराई।

"यह मुमकिन है। गौतम और नेहा की मंगनी हो चुकी है। नेहा के बाप के कानों में जरा-सी भी भनक पड़ गई कि गौतम को इस रिश्ते से इंकार है और वह कहीं और शादी करना चाहता है। तो वह तो हंगामा खड़ा कर देंगे... ।'

"जानती हूं, मामी ! इसीलिए तो आपसे सलाह ले रही हूं... ।'"

"गौतम को तुम्हारी इस सहेली का ख्याल छोड़ना होगा...।" मामी ने मशवरा दिया।

यह नामुमकिन है, मामी... । हेमा ने स्थिति समझाई ।

“यह नामुमकिन है तो फिर अपने मामू से बात करो...।'' मामी ने अपनी जान बचाने को गेंद मामू के पाले में उछाल दी।

"मामा जी...मैं मामू से बात नहीं कर सकती। आप बात करके देखें...।"

हेमा ने गेंद बीच में ही पकड़ ली।"ठीक है..मैं कोशिश करूंगी...।" मामी ने कुछ सोच वायदा किया।और फिर शोभा मामी ने रात को जब यह बात छेड़ी तो मामू की प्रतिक्रिया भी तीखी ही थी।

"यह क्या बकवास है। मैं भाई राजा वकार को क्या जवाब दूंगा। क्या इस तरह मंगनियां टूटती हैं। शोभा रानी..तुम जानती नहीं तूफान आ जाएगा... ।'"

"मैं तो जानती हूं..अपने भांजे को समझाओ...।" मामी बोली ।

गौतम मामू के साथ ही आफिस में होता था। गौतम इस कन्स्ट्रक्शन कम्पनी में मामू का पार्टनर था। मामू ने सुबह-सुबह ही गौतम को अपने कमरे में बुलवा लिया। गौतम को इस बात का ख्याल भी नहीं था कि मामू सुखदेव उससे क्या बात करने वाले हैं। उसने समझा था कि किसी काम के सिलसिले में बुलाया होगा।गौतम के बैठते ही मामू सुखदेव बोले-"यह मैं क्या सुन रहा हूं..?'

'क्या सुन रहे हैं..?" गौतम ने हैरान हो दोहराया ।

मामू सुखदेव ने कुछ सोच बात पलट दी, बोले-"मैं कल कंगन-पुर जा रहा हूं, भाई राजा वकार से तुम्हारी शादी की तारीख तय करनी है... ।'

"मामू मैं यह शादी नहीं करूंगा...।" गौतम ने तुरन्त जवाब दिया, उसके लहजे में दृढ़ता थी-"और मामू एक बात मैं और आपको बता दूं। मुझे किसी भयानक अंजाम से डराने की कोशिश मत कीजिएगा। मैंने जो इरादा दिल में बांध लिया है.उसे हर कीमत पर पूरा करके रहूंगा...।'

"हिना का बाप राजी है इस रिश्ते के लिए... ।" मामू सुखदेव ने पैंतरा बदला ।

"मुझे नहीं मालूम...लेकिन मुझे यह मालूम है कि लड़की राजी है...।" गौतम ने बताया।

"बस तो फिर क्या है। मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी...।" मामू सुखदवे ने तीखे लहजे में टिप्पणी की।

मामू..।" गौतम नर्म पड़ते बोला-“मैं चाहता हूं कि आप हिना के बाप से बात करें।

"यह नेक काम तुम खुद क्यों नही कर लेते..?" मामू ने उसे घूरा ।

"मैं कर लेता...लेकिन प्राब्लम यह है कि रिश्तो कोई घर का बड़ा ही डालता है. ।'

"ठीक है... ।” सुखदेव मामू कुछ सोचते हुए बोला-"मैं रिश्ता लेकर जाता हूं, लेकिन लड़की के बाप को यह जरूर बता दूंगा कि तुम्हारी मंगनी हो चुकी है..।

'"फिर तो वह फौरन इंकार कर देंगे...।"

"तो क्या तुम चाहते हो कि मैं इस बात को छिपा कर रखू। लड़की वालों को धोखा दूं...। उन्हें सब कुछ बताना होगा, यह भी कि तुम गौतम कैसे हो और तुम्हारी हकीकत क्या है...क्योंकि यह बात तुम्हारे हक में है। गैर धर्म वाली बात नहीं उठेगी। शादी के मामले में हम किसी प्रपंच से काम नहीं ले सकते...।'

'"मामू...मामू...।" गौतम लफ्फाजी पर उतर आया-"आप जानते हैं कि न मेरी मां है न बाप... | आप ही मेरी मां हैं और आप ही बाप...। मैं आपकी इकलौती बहन की निशानी हूं। अगर आप भी मेरा साथ न देंगे तो फिर और कौन देगा। आप ही बातइये... ।'"

"ज्यादा फिल्मी डायलाग बोलने की जरूरत नहीं है।" मामू के तेवर बदल गए।

"ठीक है मामू..।'' गौतम ने एक्टिंग जारी रखी-“फिर मैं खुद ही कुछ करता हूं।" उसने निराशापूर्ण लहजे में कहा और जवाब का इंतजार किए बिना उठकर दरवाजे की तरफ बढ़ा ।

“गौतम... ।' मामू ने अचानक आवाज दी।

“जी, मामू..।" वह रुक गया।"

हिना के अब्बू से कल शाम का कोई वक्त ले लो। हम उनसे मिलने चलेंगे।"

मामू ने बदस्तूर संजीदगी के साथ कहा।"मामू जिन्दाबाद...।" गौतम फूल की तरह खिल उठा-"अब मालूम हुअए कि मेरा भी कोई है।

"बेटे.वैसे तुमने बड़े खतरनाक रास्ते को चुना है। भगवान ही मालिक है।" मामू बोले-“देखो, क्या होता है...?'

"मामू...कुछ पाने के लिये खतरा तो लेना ही पड़ता है... ।' गौतम उत्साहित-सा बोला, उसने पूछा-“मामू..आज शाम का वक्त ले लूं..?"

"ले लो...।" मामू उसकी बेताबी पर मुस्कुराते हुए बोला ।टाइम लेना कोई मुश्किल नहीं था ।गौतम ने आफिस से ही फोन किया। संयोग से काल खुद समीर राय ने रिसीव की।

गौतम ने उन्हें बातया कि वह अपने मामू के साथ उनसे मिलने आना चाहता है।

समीर राय को भला क्या एतराज हो सकता था।"हमें खुशी होगी बेटा। उसने कहा-"हम इंतजार करेंगे...।"समीर राय इस मुलाकात का मतलब समझ सकता था। रिसीवर रखने के बाद उसने फौरन हिना को बुलवाया। वह अभी स्कूल से आई थी..अभी ड्रेस भी नहीं बदला था, बाप के बुलावे पर वह फौरन उनके कमरे में पहुंची ।

“जी, अब्बू... | आपने बुलाया।"

"भई, वह गौतम अपने मामू को लेकर आ रहा है आज शाम ।" समीर राय ने उसे सूचित किया।

"क्यों अब्बू..?" हिना भीतर-ही-भीतर खुश होते बोली-“कोई खास बात है क्या..?''

अब वह आएंगे तो पता चलेगा..अभी मैं क्या कह सकता हूं, मैंने सोचा तुम्हें बता दूं. मेहमानों की आवभगत का इंतजाम कर रखना ।

“गौतम के अपने मामू के साथ आने का मकसद हिना भी समझ रही थी और वह मन-ही-मन में खुश भी थी। अपने कमरे में आते ही उसने हेमा को फोन किया।"ऐ, हेमा मालिनी ! यह क्या चक्कर है ?" वह फोन पर बोली।

"क्यों, क्या हुआ..?" हेमा की समझ में कुछ नहीं आया था।

"तुम्हारे भैया अपने मामू को लेकर आ रहे हैं... | पापा से शाम का टाइम लिया है। आखिर चक्कर क्या है...कुछ तो बता...।" हिना ने पूछा।

हिना, इसका मतलब है कि आज उनके आफिस में ही कोई बात हुई है। मुझे कुछ नहीं मालूम । मैं भैया को फोन करके पूछती हूं कि वो अगर आ रहे हैं तो क्यों आ रहे हैं। वैसे जो मैं समझ रही हूं..शायद तू भी समझ रही होगी कि क्यों आ रहे हैं...।" हेमा शोखी पर उतर आई।

समझती होती तो तुझसे पूछती।" हिना इठलाई-"तू बता ना...।''

"यकीनन तुझे मांगने के लिये...।" हेमा ने साफ शब्दों में कहा।

"हाय. मैं मर जाऊं...।" यह कहकर हिना ने फौरन सम्बन्ध विच्छेद कर लिये।
 
और फिर इस शाम बड़ा गजब हुआ। एक अनहोनी थी जिसका सामना समीर राय को करना पड़ा |सुखदेव मामू ने इस मुलाकात पर भूमिका बांधते हुए जो बुनियादी जानकारी दी...उसे सुनकर ही समीर राय के होश उड़ गये। उसकी रूह में सन्नाटे उतर गये। गौतम को उसने अपने तौर पर अपनी हिना के लिए पसन्द कर लिया था। उसके गैरधर्मी होने के बारे में भी गम्भीरता से नहीं सोचा था। वह तो गौतम के घर गया भी इसलिए था कि जरा घर देख ले। उस दिन गौतम के मामा से मुलाकात नहीं हो सकी थी, और समीर राय सोच ही रहा था कि वह इस मामले को किस तरह आगे बढ़ाये। वह जल्द-से-जल्द हिना की किसी से मंगनी कर देना चाहता था। ताकि उसकी मां और सारे मामू ठण्डे होकर बैठ जाएं।शादी वह अभी नहीं करना चाहता था। यही सोचा था कि हिना बी.ए. कर ले, फिर उसकी शादी करेगा ।उसकी ख्वाहिश के अनुसार अब बात खुद-ब-खुद आगे बढ़ गई थी।

गौतम अपने मामा को लेकर आ गया था और मामा सुखेदव ने औपचारिक बातचीत के बाद गौतम के मां-बाप के बारे में बताने को अपनी बात शुरू की थी। समीर राय साहब... ! मैं यहां एक खास मकसद से आया हूं। पहले मैं चाहूंगा कि आपको गौतम की हकीकत व उसके खानदान के बारे में आगाह कर दूं। पहली बात तो यह है कि गौतम का असली नाम सुहेल है और वह एक मुस्लिम परिवार से है...। मैं इसका सगा मामा हूं क्योंकि मेरी इकलौती बहन ही इसकी मां थी...।

"यह रहस्योद्घाटन सचमुच ही बहुत-सी समस्याओं को खत्म कर देने वाला था। गौतम की इस हकीकत ने समीर राय को खुश ही किया था। पर आगे की जानकारियों ने धमाके ही किये थे ।मामू सुखदेव ने आगे बताया-"हां, समीर साहब ! गौतम का असली नाम सुहेल राजा नसीम है। मेरे बहनोई के पिता, यानी गौतम के दादा एक मशहूर हस्ती थे। उनका नाम राजा सलीम था। वह कंगनपुर के जागीरदार थे। गौतम या सुहेल की मां यानी मेरी बहन को किडनेप करके कत्ल किया गया। मेरी बहन ने लव मैरिज की थी। हमने इसे उनके किसी ससुराली मतभेद का नतीजा समझा था। पर फिर उसके कुछ ही समय बाद राजा नसीम को अगवा करके उसका भी कत्ल कर दिया गया। असल में गौतम के दादा राजा सलीम की रोशनगढ़ी के जागीरदार रोशन राय से दुश्मनी हो गई थी और आप देहातों की ऐसी दुश्मनियों के अंजाम से तो वाकिफ ही होंगे। पता चला कि गौतम के मां-बाप का कत्ल इसी दुश्मनी के चलते जागीरदार रोशन राय ने ही करवाया था। इसके बाद इसी दुश्मनी के खौफ से बहन-भाई हेमा और सुहेल को हम अपने पास यहां ले आए और सुहेल का नाम तक बदल दिया। ताकि खानदानी इंतकाम की आग इन मासूमों तक न पहुंच सके...।" इसके बाद मामा सुखदेव जाने क्या-क्या बताते रहे। समीर राय को वह कहानी सुननी पड़ी थी जिसकी आग में वह स्वयं एक मुद्दत से सुलगते रहे थे। यह दास्तान और इसकी विभीषिका उसके लिए नई नहीं थी। उसका तो दिमाग ही जैसे ठस्स होकर रह गया था। सुखदेव आगे क्या-क्या कहता रहा वह सब तो जैसे समीर राय सुन ही नहीं पाया था। वह मामू सुखदेव के होठ तो हिलते देख रहा था...लेकिन उसे सुनाई कुछ नहीं दे रहा था।दिल पर आरी-सी चल रही थी, जिन मानसिक यातनाओं से बचकर वह यहां आया था...यातनाओं के वही साये अब वह अपनी बेटी के सिर पर मंडराते देख रहा। था ।कैसी हौलनाक हकीकत थी कि यह गौतम उर्फ सुहेल राजा..राजा सलीम का पौत्र था। उसी राजा सलीम का पौत्र जिसने उसकी नमीरा और हिना की मां को एक शर्मनाक दर्दनाक मौत दी थी और फिर उसकी खुद की जान का दुश्मन बना रहा था वह तो अल्लाह ने समीर की जिन्दगी बचाई थी कि उसकी मौत बनकर आया राजा सलीम दुर्भाग्य से अपने ही बन्दे के हाथों गलती से मारा गया था। वरना आज खुद समीर राय का वजूद न होतांसमीर राय की नमीरा के कातिल राजा सलीम के पौत्र..आज उसके सामने सवाल बना बैठा थाहाय, क्या कयामत की शाम थी ।समीर राय के हवास जवाब दे चले थे। लेकिन यह वक्त खुद को सम्भालने का था। वह अपने आपको संभालने की कोशिश करने लगा |मामू सुखदेव.गौतम की हकीकत व सारी बैक-ग्राउण्ड बयान करने के बाद अब अपने असली मकसद पर आ गये थे। वह कह रहे थे-"समीर साहब. मैं चाहता हूं कि आप गौतम यानी सुहेल को अपना बेटा बना लें। इसके सिर पर अपना हाथ रख कर... ।'

"जी...।" समीर राय ने एक ठण्डा सांस लिया। उसने खुद को संभाल लिया था। वह शांत-संयत स्वर में बोले-"मुझे आप थोड़ा वक्त दें। मैं आपको सोचकर बताऊंगा...।

'"बिल्कुल...बिल्कुल... ।' सुखदेव बोला-"यह जरूरी भी है। आप इत्मीनान से सोचें लेकिन अगर आपका फैसला गौतम के हक में होगा तो यह हमारा सौभाग्य होगा...।" यह कहकर मामू सुखदेव उठ गये ।

समीर राय ने कोई जवाब नहीं दिया। बड़ी खामोशी व दिखावे की मुस्कुराहट के साथ ही उसने अपने इन मेहमानों को रुख्सत किया था
 
गौतम को ही नहीं, मामू सुखदेव को भी यकीन था कि समीर साहब का फैसला उनके हक में होगा। वे खुश-खुश ही वापिस लौटे थे।वे गाड़ी में अपने बंगले की तरफ मुड़े तो उन्हें दूर ही से बंगले के गेट पर एक कार नजर आई।

"अरे...मारे गये...।" गौतम उछल पड़ा व एकदम बोला ।

“क्या हुआ..?" मामू सुखदेव अपने ही किसी ख्याल में गुम थे। उनकी नजर उस कार पर नहीं पड़ी थी।

"वो...ताया जी...।" गौतम ने परेशान होकर मामू की तरफ देखा ।तब मामू सुखदेव ने सामने देखा तो उन्हें अपने बंगले के गेट पर वह लम्बी-विदेशी कार खड़ी नजर आई। इस कार को वह भी पहचानते थे।

''गौतम...यह तो सिर मुंडाते ही ओले पड़ते दिखाई दे रहे हैं...।" वह बोले ।

यह ताया जी अचानक कैसे आ गये। ताया जी तो हमेशा इत्तला देकर आते हैं...।" गौतम ने गाड़ी रोकी ।“

यार..! तेरे ताया जी मनमौजी आदमी हैं। उन्हें अपने दामाद की याद आ गई होगी...ऐसा भी तो हो सकता है...।" मामू सुखदेव ने गाड़ी से उतरते हुए सोचपूर्ण लहजे में कहा ।

'मामू...कुछ तो रब्ब से डरें...।" गौतम घबरा कर बोला।"मैं तो तेरे रब्ब और अपने भगवान का खौफ कर लूंगा..पर अपने ताया राजा वकार से तुम खौफ की तवक्की मत रखना...।

'"इस वक्त आए क्यों हैं. ?" गौतम ने गाड़ी लॉक की।

इन्हें मालूम हो गया होगा कि हम इनकी बेटी का भविष्य अंधकारमय करने की कोशिशों में हैं... ।'

"मामू.इन्हें इस बात की भनक भी न पड़े...।" गौतम ने घबरा कर कहा और कालबेल का बटन दबा दिया।“कोशिश करूंगा...।"

मामू संजीदा होते बोले-"वैसे तुम जानते हो कि तुम्हारा ताया बड़ा ही घाघ आदमी है...।

"गेट में दाखिल हो गौतम ने सोचा कि सीधे ताया के सामने जाने से कतराना चाहिए...लेकिन मामू सुखदेव तो ऐसा नहीं कर सकते थे। राजा वकार उनका मेहमान था। वह स्थिति का सामना करने की सोचते हुए ड्राइंगरूम के खुले दरवाजे पर पहुंच गये।ड्राइंगरूम के दरवाजे के बाहर दो हथियारबंद बन्दे मौजूद थे। ये राजा वकार के बॉडीगार्ड थे। उन्होंने मामू सुखदेव को देखा तो उन्हें आदरपूर्ण अंदाज में सलाम किया ।मामू सुखदेव उन्हें सलाम का जवाब देते हुए बैठक में दाखिल हुए तो उन्हें अपनी पत्नी शोभा और हेमा बातें करती दिखाई दी.उनके सामने ही राजा वकार बैठा था और किसी बात पर अपना भाड़-सा मुंह खोले हंस रहा था। सुखदेव को देखते ही उसने अपना कहकहा रोका

और अससे हाथ मिलाने को खड़ा हो गया।"कैसे हो सुखदेव.?" राजा वकार ने उससे हाथ मिलाते हुए पूछा।

"ठीक हूं भाई। आप कब आए..?"

"अभी कोई आधा घन्टा हुआ..तुम कहीं सैर-वैर को निकले थे क्या...?"

"ओह, नहीं भाई। मैं जरा धन्धे के सिलसिले में किसी से मिलने गया था।" सुखदेव बोला ।मामू सुखदेव के कमरे में आते ही शोभा व हेमा उठकर जाने लगी तो राजा वकार बोल उठा-"अरे, तुम कहां जा रही हो, शोभा?"

"भाई, आप बैठे. इनसे बातें करें, मैं जरा आपके खाने का बन्दोबस्त करूं...।" वह बोली।"

अरे नहीं, शोभा... | मैं खाना नहीं खाऊंगा ! मुझे फौरन वापिस जाना है।"

"यह कैसे हो सकता है भाई कि आप अभी आए और अभी चले जाए... ।''

"भई, मैं सुबह का आया हुआ हूं। एक मुकद्दमें के सिलसिले में वकील से मिलना था। फिर एक-दो काम और भी थे। उन्हें निपटा कर सोचा कि तुम लोगों से भी मिलता जाऊं। नेहा की मां ने भी कहा था कि मिले बगैर न आऊं...सो चला आया। रात तक कंगनपुर पहुंचना बहुत जरूरी है। अच्छा यह बताओं यह तुम्हारे गौतम और हमारे राजा सुहेल कहां हैं ? उसे अभी धंधे की समझ आई कि नहीं...या उसे कंगनपुर वापिस ले जाऊं? नेहा की मां तो उसके शहर में रहने के हक में नहीं है। वह तो चाहती थी कि सुहेल कंगनपुर आए और अपनी जमीनें संभाले, पर मैं जोर-जबरदस्ती नहीं चाहता। अगर शहर में ही रहकर धन्धे के काबिल हो जाए तो कोई हर्ज नहीं है। वैसे वो है कहां..?" वह तुम्हारे साथ ही गया था ना।

"जी भाई जी...वह मेरे साथ ही गया था। जरा ऊपर कपड़े बदलने गया है, आता होगा...।"

"ओह, अच्छा..अच्छा । भई यह शहर वालों को कपड़े बदलने से ही फुर्सत नहीं होती। घर के कपड़े और...बाहर जाने के कपड़े और... | भई, हम तो जैसे बैठे होते हैं, वैसे ही चल देते हैं।" राजा वकार ने हंसते हुए कहा-“अब तुम को भी कपड़ बदलने होंगे ?

'"हां, भाई जी ! बदलने तो हैं..पैंट में आदमी 'इजी नहीं रहता।'

"सलाम ताया अब्बू..।" गौतम ने आते ही सलाम केया व फिर सिर झुकाकर उनके सामने खड़ा हो गया |

राजा वकार ने बैठे-बैठे उसके सिर पर हाथ फेरा-"जीते रहो बेटा...खुश रहो... |"

ताया जी..हवेली में तो सब खैर है ना ?"

"हां, बेटा ! सब खैर है, पर तेरी ताई तुझे बहुत याद करती है। उसने ही मुझे इधर भेजा है।"

राजा वकार उसे मुहब्बत से देखते हुए बोले-"बेटा, हवेली के चक्कर जरा जल्दी-जल्दी लगाया करो... |

"जी, ताया अब्बू.. | मैं मौका मिलते ही आऊंगा...।"

राजा वकार तो फौरन वापिस चला जाना चाहता था, लेकिन शोभा ने उन्हें खाना खाये बिना नहीं जाने दिया। जब वह खाना खाकर जाने को तैयार हुआ तो अपने मामा सुखदेव से अलग से बात की

“भई, बात यह है कि नेहा की मां नेहा की विदाई जल्दी चाहती हैं। अभी तक तो अपना सुहेल पढ़ रहा था.. इसलिए मैं भी चुप था। लेकिन अब तो वह पढ़-लिखकर धंधे में आ गया है। अब शादी में भला क्या रुकावट है। मैं तुम्हें उसका सरपरस्त समझता हूं। मेरा भाई जिन्दा होता तो यह बात मैं उससे करता। लेकिन अब तो तुम्हीं उसके बाप की जगह हो कि वह बहन-भाई तुम्हारे पास ही पेल-बढ़े हैं। अब तो सारी बात तुमसे ही करनी होगी कि तुम इस मान के हकदार हो। जरा सुहेल से बात करके बताओं कि वह कब शादी करने का इरादा रखता है। आखिर हम भी कब तक अपनी बेटी को बैठाए रखेंगे...।" आखिरी शब्द कहते हुए राजा वकार बेहद संजीदा थे।और उसकी यह संजीदगी देखकर मामू सुखेदव अंदर ही अंदर परेशान हो उठे। अगर बीच में गौतम की पसन्द का मामला न होता तो उन्होंने खड़े-खड़े शादी की तारीख दे देनी थी। पर हालात की यह करवट चिन्ताजनक था। राजा वकार शीघ्र-अति-शीघ्र अपनी बेटी की रुख्सती चाहता था और इधर गौतम के मन्सूबे कुछ और ही थे।
 
"अच्छा, भई...मैं गौतम से बात करूंगा... |" मामू सुखदेव ने पहले तो तसल्ली दी, फिर बोला-“वैसे अपना कारोबार करने के चक्कर में..उसका तो ख्याल है कि कंगनपुर की अपनी जमीन बेचकर बड़े पैमाने पर कन्स्ट्रक्शन का काम करे। वह कोलोनाइजर बनने के सपने देखर रहा है...किसी बड़े प्रोजेक्ट पर काम करना चाहता है।'"अरे नहीं सुखदेव..उसे मना करना...जीमनें हर्गिज न बेचे । थोड़ा बहुत सरमाया चाहिये तो वह मैं दे दूंगा। उससे कहो कि कारोबार फैलाने की न सोचे। आखिर लौटकर उसने जमीनों पर ही जाना है। यहां इस शहर का माहौल भी मजहबी जुनूनी धंधेबाजों ने गर्मा रखा है। आये दिन की टैंशन...दंगा-फसाद ! और फिर यहां रखा भी क्या है। रहने लायक जगह भी तो नहीं है। यहां तो हर वक्त धुवां-ही-धुवां है। मेरा तो यहां आते ही दम घुटने लगता है...।" राजा वकार ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा और फिर कमरे से निकल आया ।मामू सुखदेव और गौतम ने उसे गेट तक छोड़ा जाते-जाते राजा वकार ने सुखदेव को फिर चेताया-"सुखदेव, मुझे बातर करके जल्दी बताना,

अच्छा, मैं दो दिन बाद फोन करूंगा।

'"ठीक है, भाई...।" सुखदेव नम्रता से बोला |

जब वे लोग चले गये और उनकी विदेशी लम्बी गाड़ी नजरों से ओझल हो गई तो गौतम ने

परेशान लहजे में मामू से पूछा-"किससे बात करनी है..?"

"गौतम साहब...आपसे शादी की बात करनी है...। आपके ताया अब्बू शादी की तारीख मांग रहे हैं...।" मामू सुखदेव ने उसे छेड़ा।

मामू डरायें नहीं... ।” वह खौफजदा हो गया।"

तुम आने ताया की डरावनी सूरत देखकर नहीं डरते तो अब किस चीज से डर गये।" मामू हंसे।

मामू सही बताएं ना...आखिर बात क्या है..?" गौतम उलझ गया।

"बात यही है जो मैंने बताई है। वह अपनी बेटी नेहा की विदाई चाहते हैं।"

"तो कर दें अपनी बेटी को विदा. मैंने रोका है क्या..?

"ठीक है...फिर मैं कल ही उन्हें फोन पर कहे देता हूं कि उनका राजा सुहेल और अपना गौतम राजी है...बोलें हम कब बारात लाएं..?"

“मामू मैं खुदकशी कर लूंगा। मामू गम्भीर हो गए, बोले-"बेटा, खुदकशी बुजदिल लोग करते हैं। मेरा ख्याल है कि मेरा भांजा कायर हर्गिज नहीं है...।

"गौतम क्षणिक सोच बाद बोला-"तो फिर...मैं इस रिश्ते से इंकार कर दूं.?"

"अभी थोड़ा इंतजार करो। हिना का रिश्ता तो ओ.के. हो जाए...

''मामू.वह रिश्ता मंजूर हो या नामंजूर । लेकिन अब मैंने नेहा से शादी हर्गिज नहीं करनी...।''

"अच्छा..सारी बातें गेट पर खड़े होकर तय कर लोगे...चलो अंदर चलो...सोचते हैं क्या करना है।" मामू सुखदेव अंदर की तरफ कदम बढ़ाते हुए बोले।

…………………………

सोच में अब समीर राय पड़ गया थांगौतम उसे पसन्द आ गया था। इस रिश्ते को वह आंखें बंद करके मंजूर करने के मूड में था। फिर इस रहस्योद्घाटन के बाद कि गौतम, गौतम नहीं सुहेल है और एक मुस्लिम खानदान का चश्मे चिराग है...बाकी की दुविधाएं भी खत्म थीं। पर फिर जैसे ताश का यह महल...फरफरा कर गिर गया था |सारी बात ही कुछ-से-कुछ हो गई थी गौतम या सुहेल उन शख्स का पौत्र निकला, जिसने उसकी नमीरा की जिन्दगी छीनी थी। ऐसे कातिल घराने में वह अपनी बेटी कैसे व्याह दे। समझ नहीं आ रहा था क्या फैसला करे...किससे मशवरा ले ।गौतम को उसके दादा के जुर्मों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था। क्योंकि आखिर उसका अपना बाप भी तो कातिल था। समीर राय को याद आया कि राजा सलीम की बहू व बेटे को...यानी कि गौतम के मां-बाप को उसके बाप रोशन राय ने ही तो कत्ल करवाया था। यह बात अगल खुली...जोकि खुलनी ही थी, तो फिर गौतम उर्फ सुहेल की प्रतिक्रिया क्या होगी? यह किस तरह एक पौत्री को कबूल करेगा...जिसका दादा उसके मां-बाप का कातिल था ।अब यह मामला एकतरफ नहीं दोतरफा थांअभी तो समीर राय को ही गौतम को कबूल करने में हिचकिचाहट थी..और जब यह भेद खुलेगा कि 'समीर राय' का बाप कौन है तो तब उस वक्त क्या होगा ?उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस मामले को किस तरह संभाले, हकीकतन वह ऐसे लड़के को हाथ से भी निकलने नहीं देना चाहता था |इस बारे में सोचते हुए

ही कई दिन बीत गये थे...पर वह किसी फैसले पर नहीं पहुंच पाया था |उलझन का शिकार हिना भी थी। उसे अपने अब्बू की खामोश उलझन में डाले हुए थी। उधर हेमा स्कूल में मिलती और फिर घर में भी फोन करती तो एक ही सवाल किया जाता-"अरी क्या हुआ..?"

"कुछ नहीं...।" हिना का भी एक ही जवाब होता।

तुम्हारे पापा के दिल में आखिर है क्या ?' फिर सवाल होता।

मैं क्या जानूं..अभी तो उन्होंने मुझे यह भी नहीं बताया है कि मेरा कोई रिश्ता अन्डर कन्सीडरेशन है...।" हिना जवाब

देती।

"तेरा क्या ख्याल है...वह इस रिश्ते पर तुझसे बात करेंगे..?" पूछा जाता।

"जरूर करेंगे। मेरे अब्बू मेरी शादी मुझसे पूछे बिना नहीं करेंगे...।" हिना विश्वास जतलाती-"यहां तक कि मैं इस रिश्ते से इंकार कर दूं तो मुझे मजबूर भी नहीं करेंगे। ऐसे हैं मेरे अब्बू..।"

"तो फिर सवाल यह उठता है कि उन्होंने अभी तक तुझसे बात क्यों नहीं की..?" हेमा ने चिन्ता दर्शायी ।

“मैं खुद हैरान हूं। मेरा ख्याल है कि कहीं गड़बड़ी जरूर है...।" हिना शंका व्यक्त करती।

कैसी गड़बड़..?"

"अब यह तो मुझे नहीं मालूम...लेकिन उनकी खामोशी यही बता रही है... ।

''रब्ब मेहर करे...।" हेमा कहती-“देख जैसे ही कोई बात हो मुझे बताना...।"

"ठीक है...।" लेकिन बात कोई भी सामने नहीं आ रही थी। स्कूल में छुट्टियां थीं और अब हेमा के सुबह-शाम फोन चले आ रहे थे। पर हिना उसे क्या खबर सुनाती। उसके पास कोई खबर होती तो ही तो वह कुछ कहती ।इधर हेमा, हिना को फोन कर रही थी

उधर राजा वकार, मामू सुखदेव के नाम में दम किये हुये था। वह कई

दिन से फोन कर रहा था। फोन पर औपचारिक बातों के बाद उसका पहला सवाल यही होता था-"हां, भई ! सुहेल से बात हुई ?“मामू सुखदेव फैसला नहीं कर पा रहे थे कि वह राजा वकार को किन शब्दों में क्या कहे। वह रोज ही कोई बहाना तराश कर अपनी जान बचा जाते थे। लेकिन यह बहानेबाजी भी आखिर कब तक चलती। उन्होंने एक दिन तो जवाब देना ही था |जब राजा वकार को महसूस हुआ कि फोन पर साफ जवाब नहीं मिल रहा है तो वह एक दिन खुद ही मुम्बई आ गया और तब मामू, और गौतम दोनों ही राजा वकार के सामने सिर झुकाए बैठे थे

और राजा वकार बारी-बारी से उन दोनों को घूर रहा था। वह इन दोनों की खामोशी से इतना तो समझ गया था कि मामला कुछ गड़बड़ है, लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि मामला निपट चुका है और फैसला हो चुका है। ऐसा फैसला जो उसकी बेटी के हक में नहीं था। उसका अपना ख्याल था कि सुहेल अपना बिजनेस जामने की खातिर साल-दो साल की मोहलत चाहेगा...और वह सोचकर आया था कि वह मौहलत वह सुहेल को नहीं देगा।

"हां, भई...बोलो...।" राजा वकार ने अपनी मूंछ पर ताव देते हुए अपनी नजरें गौतम पर गाड़ दी

गौतम ने अपनी झुकी हुई गर्दन उठाई..एक निगाह अपने मामू को देखा...मामू ने उसे आखों-ही-आंखों में इशारा किया कि-"जो कहना है कह दो..देखा जायेगा।

"ताया अब्बू...बात यह है कि...।" गौतम ने बात शुरू की, लेकिन जुबान लड़खड़ा गई। वह रुक गया।

"देख, भई सुहेल...तुझे अगर मोहलत चाहिये तो मेरी बात कान खोल कर सुन ले। अब हम कोई मोहलत देने के लिए तैयार नहीं है। मैं अगले महीने हर कीमत पर नेहा की शादी कर देना चाहता हूं...।" राजा वकार का लहजा रोष से भरा था।

“ताया अब्बू...बात यह है कि मैं माफी चाहता हूं... ।'"

"देख भई, सुहेल...मैं मिडिल फेल बंदा हूं। यह मुहावरेबाजी अपनी समझ से बाहर है। जो बात कहनी है वह खुलकर कहो..।'' राजा वकार फैलकर बैठते हुए बोला।

"मैं नेहा से शादी नहीं कर सकूँगा...।' गौतम ने हिम्मत करके जवाब दिया।

"क्या...क्या...?" राजा वकार एकदम सीधा होकर बैठ गया। वह सोच में भी नहीं सकता था कि गौतम इस तरह की कोई बात भी मुंह से निकाल सकता है। शायद इसीलिये उसने तस्दीक के लिऐ गौतम के शब्द दोहराये-"तू नेहा से शादी नहीं करना चाहता...?"

"मैं शर्मिन्दा हूं..माफी चाहता हूं..।"

"माफी को छोड़...पहले यह बता, यही कहा है ना ?"

"जी हां...दरअसल बात यह है ताया अब्बू कि...'

"आये, भाड़ में गया ताया अब्बू..।" राजा वकार उसकी बात लपकते गुस्से से फुफकारा-"तूने यह कही क्या सोचकर ? क्या तू अपनी इस बात का अंजाम नहीं जानता ? सुखदेव, तूने इसे बताया नहीं..?''

"भाई जी, बात यह है कि...।'"

"ओये, अब तू भी शर्मिन्दगी...माफी की बात करेगा। ये शहर वाले एक तो शर्मिन्दा बहुत होते हैं और माफी मांगते फिरते हैं। अब तुम मेरी बात सुनो...और कान खोलकर सुन लो...अगर तूने मेरी बेटी को छोड़ा तो फिर याद रख, तुझे जिन्दगी भर कुंआरा रहना पड़ेगा। अगर तू यह सोच रहा है कि मेरी बेटी को ठुकरा कर तू कहीं और शादी कर लेगा तो ऐसा नहीं हो सकेगा...।" यह कहकर राजा वकार उठ गया। फिर जाते-जाते मामू सुखदेव से बोला-"यह बात इसे अच्छी तरह समझा देना और तुम खुद भी समझ लेना। मैं चलता हूं

मामू सुखदेव ने उसे लाख रोकना चाहा, लेकिन वह नहीं रुका |राजा वकार के जाने के बाद यूं महसूस हुआ जैसे इस घर में मौत हो गई हो।
 
जब कई दिनों तक निरन्तर सोचने के बाद समीर राय किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका तो अंततः उसने हिना से बातर करने का फैसला किया रात को खाने के बाद वह हिना को बंगले के पिछवाड़े लॉन में ले गया। वे दोनों टहलने लगे।

हिना समझ गई कि अब्बू कुछ बात करने की तैयारी में हैं। सो, उसने कोई सवाल न किया व खामोशी से उनके साथ टहलने लगी।

"बेटा, तू यह जानती है कि कुछ दिन पहले तुम्हारी सहेली हेमा का भाई गौतम अपने मामू के साथ मुझसे मिलने आया था.।" समीर राय टहलते-टहलते ही एकाएक बोला।

“जी, अब्बू...।" हिना धीरे से बोली-"मैं जानती हूं...।''

"हिना, मैं नहीं जानता कि उनकी आमद की वजह की तुझे खबर है या नहीं, हो सकता है तुम जानती हो...हो सकता है तुम न जानती हो। मैं बताता हूं कि वे क्यों आए थे। वैसे यह कितनी अजीब बात है कि इस रिश्ते के आने से पहले ही मैं गौतम को तुम्हारे लिये चुन चुका था। मैं सोच रहा था कि इस बारे में तुमसे बात करके तुम्हारा फैसला भी सुन लूं और फिर बात आगे बढ़ाऊं। यह तुम जानती हो कि तुम्हारी अपनी पसन्द के बाद ही मैं कोई रिश्ता फाइनल करूंगा। जब यह रिश्ता आया तो मैं बहुत खुश हुआ। खासतौर पर यह हकीकत जान कर तो बहुत ही खुशी हुई कि अपने हिन्दू मामा के साथ रह रहा गौतम हकीकत में एक मुस्लिम परिवार से है और उसका असली नाम सुहेल है। मैं इसलिए भी खुश था कि जो बात मेरे जहन में थी, वह उधर भी अपना रंग दिखा रही थी। लेकिन शायद यह रिश्ता तुम्हारी किस्मत में नहीं...।" समीर राय ने गहरा सांस लिया।

"क्यों अब्बू..?" हिना ने बेअख्तयार और चिन्तित स्वर में पूछा था।

“गौतम या सुहेल के मामू ने उसकी फैमिली बैकग्राउण्ड के बारे में जो कुछ बताया, वह मैं बस एक हद तक ही सुन सका, मैं उसके हालात सुनते ही सकते में आ गया... ।'

"ऐसा क्या कह दिया उन्होंने.?"

"हिना...गौतम का दादा तुम्हारी मां का कातिल है...।'' समीर राय ने रहस्योद्घाटन किया।

"ओह...।'' हिना के जज्बात पर एकदम ओस पड़ गई-"लेकिन...लेकिन अब्बू इन लोगों ने इस कत्ल का इल्जाम अपने सिर किस तरह लिया ? ऐसा तो कोई नहीं करता...।" उसने पूछा ।

"उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं की। उन्होंने इल्जाम लगाया तो तुम्हारे दादा के सिर...जिससे चलती दुश्मनी के खौफ से ही सुहेल और हेमा अपने मामू के पास यहां आकर और हिन्दू नाम अपनाकर रहने को मजबूर हुये थे। उन्हें नहीं मालूम था कि जिस रोशन राय का वे जिक्र कर रहे हैं...वह मेरा बाप था। अगर उन्हें यह मालूम होता तो शायद वो यह रिश्ता लेकर आने की हिम्मत ही न करते। खैर, उन्होंने चर्चा की कि गौतम के मां-बाप को रोशनगढ़ी के रोशन राय ने कत्ल करवाया. और...और बेटा, यह बात बिल्कुल सही है।''

"क..क्या..?" हिना बाप की सूरत देखने लगी।

"हां, बेटा...।" बाप का सिर झुक गया था।

"लेकिन...अभी तो आप कह रहे थे कि मेरी मां को गौतम के दादा ने कत्ल करवाया ?"

"यह बात भी बिल्कुल सही है...।" समीर राय ने भारी दिल से बताया।

"पर अब्बू इससे पहले तो आप मेरी मां के बारे में एक दूसरी ही कहानी सुना चुके हैं...।" हिना उलझन का शिकार थी।

यही ना कि तुम्हारे दादा ने तुम्हें और तुम्हारी मां को रेगिस्तान में छुड़वा दिया था..ताकि तुम दोनों मर जाओ...

''हां, अब्बू... । हिना बोली । यह बात भी सही है। तुम्हारे दादा और मेरे बाप ने ही तुम मां-बेटी की कत्ल की साजिश की थी...।''

"फिर..फिर गौतम का दादा बीच में कहां से आ गया। मेरी मां का कत्ल उसने किस तरह करवाया.?''

"बेटा ! बहुत-सी बातें मैंने तुमको बता दी थी, कुछ गैर जरूरी किस्से मैंने तुम्हें नहीं सुनाये हैं। तुम्हारे दादा दरअसल क्या थे, यह बात मैंने खुलकर तुम्हें नहीं बताई है। फिलहाल, हालात को समझने के लिए बस इतना ही समझ लो कि तुम्हारे दादा एक इन्तहाई संगदिल व हिसंक प्रवृत्ति के शख्स थे। अपनी आन के लिए अगर उन्हें मेरे कत्ल की भी जरूरत पड़ती तो यकीन करो वह कर गुजरते...।'' समीर राय कुछ क्षणों के लिए चुप ही रहा और फिर उसने थोड़ा और डिटेल में जाते हुये । बताया-"गौतम के दादा राजा सलीम और तुम्हारे दादा रोशन राय, एक जमाने में बहुत अच्छे दोस्त थे। फिर एक घोडी की वजह से उन दोनों के बीच मतभेद उभरे और फिर कुछ ही समय में वे एक दूसरे की जान के दुश्मन बन गये। संक्षेप में यह जान लो कि दुश्मनी मोल लेने में तुम्हारे दादा ने पहल की। राजा सलीम की उस घोड़ी को मरवाया...फिर राजा सलीम की बहू यानी इस गौतम या सुहेल की मां को कत्ल करवाया... | जवाब में राजा सलीम ने तुम्हारी मां को कत्ल करवा दिया...जो ऊंट पर भटकती हुई कंगनपुर पहुंच गई थी। इसके इंतकाम में तुम्हारे दादा ने गौतम के बाप राजा सलीम को कत्ल करवा दिया। फिर राजा सलीम मेरी जान का दुश्मन हो गया। मुझ पर कातिलाना हमले हुए। जब उसके बन्दे मेरा कत्ल करने में नाकाम हुए तो राजा सलीम खुद मेरे कत्ल के लिए निकला। उसने बड़ी प्लानिंग से मेरे कत्ल का मंसूबा बनाया, लेकिन अल्लाह को कुछ और ही मंजूर था। वो मुझे कत्ल करने की बजाय..गलती से खुद ही अपने मुलाजिम के हाथों मारा गया, तब जाकर यह सिलसिला रुका... | तुम्हारे दादा ने जो यातनापूर्ण और हौलनाक मौत पाई, उसके बारे में मैं तुम्हे पूरी डिटेल के साथ बता चुका हूं।" समीर राय ने बड़े दुख के साथ यह सब सुनाया

था।

"अब्बू... । यह इंसान इस कद्र सफाक (संगदिल निमर्म) किस तरह बन जाता है...।" हिना भर्राई आवाज के साथ बोली-"अगर दौलत, जायदाद और जमीन ही इन्सान को शैतान बना देती है अब्बू..तो फिर आप ऐसे क्यों नहीं हैं... । आप भी तो अपने इलाके के हाकिम और जागीरदार हैं...।''

"हिना बेटा...! दौलत का नशा..सबसे बड़ा और खतरनाक नशा है। इस नशे में डूबकर इन्सान घमण्ड व गरूर में डूब जाता है। खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी समझने लगता है और जब किसी को ताकत का नशा हो जाए तो फिर यह नशा कभी नहीं उतरता। बस, उसकी मौत ही इस नशे को उतारती है।" समीर राय ने उसे दुखी लहजे में ही समझाया था।

"खैर अब्बू.. | इस बात को छोड़ें...।" हिना ने फौरन ही खुद को संभाल लिया था। वह भावहीन व संजीदा लहजे में बोली थी-"अब आगे की बात करें..आपने क्या सोचा.?'
 
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