Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 34 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग -66

सुगना ने अपने हाथ में पहनी हुई एक अंगूठी उस नर्स को देते हुए कहा



"हमार शरदा भगवान पूरा कर देले ई ल तहार नेग "

नर्स ने हाथ बढ़ाकर वह अंगूठी ले तो ली पर उसकी अंतरात्मा कचोट रही थी। उसे पता था कि उसने बच्चे बदल कर गलत कार्य किया था चाहे उसकी भावना पवित्र ही क्यों ना रही हो।

कुछ घटनाक्रम अपरिवर्तनीय होते हैं आप अपने बढ़ाएं हुए कदम वापस नहीं ले सकते वही स्थिति सोनी और उस नर्स की और शायद नियति की भी ..



अब आगे..

लाली की मा और कजरी लाली और सुगना से मिलने अंदर आ चुकी थीं। सुगना ने चहकते हुए कजरी से कहा..

"मां देख भगवान हमार सुन ले ले हमरा के बेटी दे दे ले"

कजरी ने बच्चे को गोद में ले लिया पर उसके चेहरे पर खुशी के भाव न थे।

"मां तू खुश नईखु का काहे मुंह लटकावले बाड़ू"

कजरी ने अपने होठों पर उंगलियां रखकर सुगना को चुप रहने का इशारा किया। और उसके कान में जाकर वस्तु स्थिति से सुगना को अवगत करा दिया।

सुगना सन्न पड़ गई जितनी खुशियां उसके दिलो-दिमाग मे थी. उन पर राजेश के मरने का गम भारी पड़ गया, अपनी सहेली के के लिए उसकी संवेदनाओं ने उन खुशियों को निगल लिया।

उधर लाली पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा था। वह एक बार फिर बेहोश हो गई। निष्ठुर नियति ने लाली का सुहाग छीन लिया था.

शाम होते होते सुगना और लाली अपने बच्चे के साथ अपने घर में आ चुकी थी।

राजेश की आत्मा ने अपने क्षत-विक्षत शरीर को त्याग कर सुगना के उसी गर्भ में अपना स्थान बनाया था जिसका निषेचन स्वयं उसके ही वीर्य से हुआ था। राजेश आज बालक रूप में अपनी ही पत्नी लाली की गोद में अपने घर में खेल रहा था और उन्हीं चुचियों पर बार-बार मुंह मार रहा था जिनको लाली उसे ज्यादा चूसने के लिए रोकती रहती थी।

काश लाली को यह पता होता वह बालक राजेश का ही अंश है तो शायद उसका दुख कुछ कम होता परंतु अपने पति को अपने बालक के रूप में देखकर शायद ही कोई महिला खुश हो।

पुरुष का पति रूप हर महिला को सबसे ज्यादा प्यारा होता है बशर्ते उन दोनों में और एक दूसरे के प्रति समझ आदर और प्यार हो।

सोनू भी घर पर आ चुका था। वह लाली को सांत्वना दे रखा था। लाली की मां को सोनू का इस तरह सांत्वना देना सहज तो लग रहा था परंतु कहीं ना कहीं कोई बात खटक रही थी।

स्त्री और पुरुष के आलिंगन को देखकर उनके बीच संबंधों का आकलन किया जा सकता है .. एक दूसरे के शरीर पर बाहों का कसाव खुशी और गम दोनों स्थितियों में अलग अलग होता है। शारीरिक अंगों का मिलन रिश्तो को परिभाषित करता है,

यदि आलिंगन के दौरान पुरुष और स्त्री के पेट आपस में कसकर चिपके हुए हों तो यह मान लीजिए की या तो उन दोनों में संबंध स्थापित हो चुके हैं या फिर निकट भविष्य में होने वाले हैं।

लाली और सोनू का यह मिलन जिन परिस्थितियों में हो रहा था वहां कामोत्तेजना का कोई स्थान न था परंतु लाली सोनू के जीवन में आने वाली पहली महिला थी जिसे वह मन ही मन प्यार करने लगा था यद्यपि इस प्यार में कामुकता का अहम स्थान था।

सोनू का शरीर पिछले कुछ ही महीनों में और मर्दाना हो गया था 6 फुट का लंबा शरीर भरने के बाद सोनू का व्यक्तित्व निखरने लगा था।

खबरों की अपनी गति होती है वह आज के युग में मोबाइल और व्हाट्सएप से पहुंचती हैं उस दौरान कानो कान पहुंचती थी। सुगना की पुत्री और राजेश की मृत्यु की खबर भी सलेमपुर पहुंची और अगले दिन अगले दिन सरयू सिंह भी बनारस में हाजिर थे।

अपनी पुत्री सुगना की गोद में मासूम बालिका को देखकर उनका हृदय भाव विह्वल हो उठा। उन्हें पता था की बनारस महोत्सव के दौरान सुगना की जांघों के बीच लगा वह वीर्य निश्चित ही राजेश का था। वह मन ही मन यह मान चुके थे कि सुगना का यह गर्भ राजेश से संभोग की देन थी।

उन्हें सुगना की पुत्री से कोई विशेष लगाव न था शायद इसकी वजह उसमें राजेश का अंश होना था परंतु सुगना... वह तो उन्हें जान से प्यारी थी उस कामुक रूप में भी और इस परिवर्तित पुत्री रूप में भी।

सुगना ने अपने बाबू जी के चरण छुए और एक बार फिर उनके आलिंगन में आने को तड़प उठी। परंतु सरयू सिंह ने अब मर्यादा की लकीर कुछ ज्यादा ही गहरी खींच रखी थी सुगना चाह कर भी उसे लांघ न पाई और सरयू सिंह ने सिर्फ उसके माथे को चूमकर उसे स्वयं से अलग कर दिया।

राजेश के मृत शरीर का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर किया गया यद्यपि वह इस लायक कतई न था वासना का जो खेल वह खेल रहा था वह न शायद प्रकृति को पसंद था और नहीं नियति को।

विधि का विधान है दुख चाहे कितना भी गहरा और अवसाद भरा क्यों ना हो इंसान की सहनशक्ति के आगे हार जाता है ।

राजेश के जाने से लाली का पूरा परिवार हिल गया था परंतु कुछ ही दिनों में दिनचर्या सामान्य होती गयी। सोनू ने अपने दोस्तों की मदद से राजेश के विभाग से मिलने वाली सारी मदद लाली तक पहुंचवा दी तथा उसकी अनुकंपा नियुक्ति के लिए अर्जी भी लगवा दी।

सोनू जो उम्र में लाली से लगभग चार-पांच वर्ष छोटा था अचानक ही उसे बड़ा दिखाई पड़ने लगा। सोनू जब भी लाली के घर आता सारे बच्चे उसका भरपूर आदर करते हैं उसकी गोद में खेलते और लाली अपने सारे गम भूल जाती। जितना समय सोनू लाली के घर व्यतीत करता उतना तो शायद अपनी सगी बहन सुगना के यहां भी नहीं करता।

धीरे धीरे जिंदगी सामान्य होने लगी सुगना अपने बिस्तर पर रहती और पुत्री से एक पल के लिये भी अलग न होती। कजरी और सोनी मिलकर घर का कामकाज संभालती। कजरी को एक-दो दिन के लिए सरयू सिंह के साथ सलेमपुर जाना पड़ा घर की जिम्मेदारी संभालने का कार्य सोनी और रतन पर आ पड़ा। सोनी दिनभर कॉलेज में बिताती और घर आने पर चूल्हा चौका करती।

घर की जिम्मेदारियां किशोरियों और युवतियों को कामुकता से दूर कर देती हैं पिछले दो-तीन महीनों में सोनी विकास से नहीं मिल पा रही थी जिन चूचियों और जांघों के बीच उस झुरमुट में छुपी मुनिया को पुरुष हथेलियों का संसर्ग मिल चुका था वह भी इस बिछोह से त्रस्त हो चुकी थीं।

रसोई में कभी-कभी रतन उसका साथ देने आ जाता सोनी की उपस्थिति रतन को उत्साहित किए रखती। युवा लड़की आसपास के पुरुषों में स्वता ही उर्जा भर देती है .. रतन अपने आसपास सोनी को पाकर उत्साहित रहता और उसके साथ मिलजुल कर घर का काम निपटा लेता।

उधर सुगना अपनी पुत्री के लालन-पालन में खो गई थी। वह उसे अपने शरीर से एक पल के लिए भी अलग ना करती जैसे उसके लिए उससे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं था। उसे सूरज की चिंता अवश्य थी जो उसके कलेजे का टुकड़ा था पर सूरज अब बड़ा हो चुका था और अपनी आवश्यकताएं अपने मुख से बोल कर अपनी प्यारी मौसी से मांग सकता था।

सुगना अपनी बच्ची को बार-बार चूमती और नियति को दिल से धन्यवाद देती जिसने उसे अपने ही पुत्र से संभोग करने से रोक लिया था परंतु जब जब वह अपनी फूल सी बच्ची के बारे में सोचती वह घबरा जाती..

एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई यही स्थिति सुगना की हो गई थी यह तो तय था की सुगना खाई में नहीं गिरेगी परंतु वह कैसे अपनी ही पुत्री को अपने ही पुत्र से संभोग करा कर उसे अभिशाप से मुक्ति दिलाएगी??

सुगना अपने विचारों में आज से 15- 20 वर्ष बाद की स्थिति सोचने लगी थी।

सुगना का ध्यान सूरज ने भंग किया जो उसकी ब्लाउज से दूसरी चूची को बाहर निकालकर पकड़ने का प्रयास कर रहा था..

"बाबू अब ना तू त बड़ हो गईला जा मौसी से दूध मांग ल में"

"मौसी के चूँची में दूध बा का? " सूरज ने अपना बाल सुलभ प्रश्न कर दिया तुरंत सुगना सिहर उठी उसने यह क्या कह दिया।

" बेटा मौसी गिलास में दूध दी"

सूरज ने मन मसोसकर दुखी मन से सुगना की सूचियां छोड़ी परंतु उसकी फूली चुचियों से दूध का कुछ अंश अपने होठों पर ले गया..

मौसी मौसी कहते हुए सूरज रसोई घर की तरफ चला गया.

सुगना अपनी पुत्री की खूबसूरती में खोई अपनी उसका नाम सोचने लगी... परंतु कोई भी नाम उसे सूझ नहीं सोच रहा था। वह अपने बाबूजी सरयू सिंह से उसका नाम कारण कराना चाहती थी । अब तक उसके जीवन में जो भी खुशियां आई थी उसके मूल में सरयू सिंह ही थे।

सुगना ने दिल से इच्छा जाहिर की और उसी शाम को सरयू सिंह हाजिर थे जो किसी शासकीय कार्य बस बनारस आए हुए थे।

"बाबूजी हम रउवे के याद करा तनी हां"

सुगना ने झुककर सरयू सिह के चरण छुए और सरयू सिंह की नशीली निगाहों ने ने एक बार फिर सुगना की पीठ और मादक नितंबों की तरफ दौड़ लगा दी। सरयू सिंह के मस्तिष्क ने निगाहों पर नियंत्रण किया और उनकी हथेलियां एक बार फिर सुगना के सर पर आशीर्वाद की मुद्रा में आ गयीं।

सरयू सिंह के अंग प्रत्यंग अब भी दिमाग का आदेश नजरअंदाज करने को उत्सुक रहते थे परंतु शरीर सिंह ने अपने काम भावना पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया था वह सुगना को सचमुच अपनी बेटी का दर्जा दे चुके थे।

"बाबूजी एकर का नाम रखाई" सुगना ने अपनी फूल सी बच्ची को सरयू सिंह जैसे मजबूत मर्द के हाथों में देते हुए कहा।

सरयू सिंह ने बच्ची को गोद में लिया.. सचमुच लाली और सोनू के अद्भुत प्यार और मिलन से जन्मी बच्ची बेहद कोमल और प्यारी थी। सरयू सिंह ने छोटी बच्ची को उठाया और उसके माथे को चूम लिया। सरयू सिंह के मुख से फूट पड़ा..

"सुगना बेटा ई ता शहद जैसन मीठा बिया एकर नाव मधु रखिह"

रतन पास ही खड़ा था उसने मिंकी को आगे कर दिया और बोला..

"चाचा एकरो त नाम स्कूल में लिखावे के बा मिन्की त ना नू लिखाई एकरो नाम तू ही ध द"

सरयू सिंह ने छोटी मिंकी को भी अपने पास बुलाया और बेहद प्यार से उसके माथे को सहलाते हुए बोले "एकर नाम मालती रही"

"हमरा सुगना बेटा के दुगो बेटी मधु - मालती"

सबके चेहरे पर खुशियां दिखाई देने लगी। सच सरयू सिंह ने दोनों ही बच्चों का नाम बड़ी सूझबूझ से रख दिया था।

"रतन तू ध्यान रखिह सुगना बेटी के कौनो कष्ट मत होखे"

रतन की निगाह में सरयू सिंह देवता तुल्य थे जिसने अपने निजी हित को ताक पर रखकर उसकी मां और पत्नी का ख्याल रखा था यहां तक की उन्होंने विवाह तक न किया था उसे सरयू सिंह की असलियत न पता थी और शायद यह उचित भी न था ।

रतन सरयू सिंह को पिता तुल्य मानता और उनके बड़प्पन के आगे हमेशा नतमस्तक रहता।

सुगना ने अपने बाबू जी सरयू सिंह की कामुकता को लगभग समाप्त मान लिया था उसे ऐसा प्रतीत होता जैसे उनकी उम्र हो चली थी। सुगना ने भी स्वयं पर नियंत्रण करना सीख लिया। वैसे भी अभी उसकी बुर अपना कसाव पाने की कोशिश कर रही थी। सुगना अपनी जांघों और बुर को सिकोड़ कर उसमें कसाव लाने का प्रयास करती। आज की कीगल क्रिया सुगना तब भी जानती थी।

समय दुख पर मरहम का कार्य करता है लाली के जीवन में भी खुशियां आने लगी। लाली को प्रसन्न देखकर सुगना भी धीरे धीरे धीरे खुश हो गई।

सूरज बार-बार मधु को अपनी गोद में लेने की कोशिश करता.. सुगना उसे रोकते परंतु वह जिद पर अड़ा रहा अंततः सुगना ने उसे बिस्तर पर पालथी मार कर बैठाया और उसकी गोद में अपनी फूल सी बच्ची मधु को दे दिया सूरज बेहद प्यार से मधु के माथे को चूम रहा था और उसके कोमल शरीर से खेल रहा था मधु भी अनुकूल प्रतिक्रिया देते हुए अपने कोमल होंठ फैला रही थी।

सुगना भाई बहन का यह प्यार देखकर द्रवित हो गयी। विधाता ने उसे कैसी अग्नि परीक्षा में झोंक दिया था कैसे हो इन दोनों मासूम भाई बहनों को परस्पर संभोग के लिए राजी करेंगी…

अगले कुछ दिनों में सुगना पूरी तरह स्वस्थ हो गई और अपने सभी इष्ट देवों के यहां जाकर मन्नत उतारने लगी रतन उसका साथ बखूबी देता।

सुगना द्वारा दी गई मोटरसाइकिल पर जब रतन सुगना को लेकर सुगना घुमाने और उसकी मन्नत पूरी कराने के लिए निकलता रतन की मन्नत स्वतः ही पूरी हो जाती। अपनी पत्नी सुगना के तन मन को जीतना रतन के जीवन का एकमात्र उद्देश्य था। हालांकि उससे अब इंतजार बर्दाश्त ना होता। पूरे 1 वर्ष तक वह सुगना के आगे पीछे घूमता रहा था उसने अपने प्रयश्चित के लिए हर कदम उठाए चाहे वह सुगना के पैर दबाना हो या उसके माथे पर तेल लगाना। सुगना इसके अलावा अपने किसी अंग को हाथ न लगाने देती।

परंतु पिछले चार-पांच महीनों में वह सोनी की कमनीय काया के दर्शन सुख का आनंद भी गाहे-बगाहे लेता रहा था। उसके मन में पाप था या नहीं यह तो रतन ही जाने पर सोनी की चढ़ती जवानी और उसके चाल चलन पर नजर रखना रतन अपना अधिकार समझ रहा था और अपने इसी कर्तव्य निर्वहन में वह अपना आनंद भी ढूंढ ले रहा था। एक पंथ दो काज वाली कहावत उसकी मनोदशा से मेल खा रही थी।

और एक दिन वह हो गया जो नहीं होना था..

रतन को आज अपने होटल जल्दी जाना था. घर के अंदर गुसल खाने में सोनी घुसी हुई थी उसे कॉलेज जाने की देरी हो रही थी। सुगना ने सोनी से कहा..

"तनी जल्दी बाहर निकल तोरा जीजा जी के होटल जल्दी जाए के बा"

सोनी ने अंदर से आवाज दी

"दीदी अभी 10 मिनट लागी"

रतन ने अंदाज लगा लिया कि यह 10 मिनट निश्चित ही 20 मिनट में बदल जाएंगे। वैसे भी रतन ने यह अनुभव किया था की सोनी बाथरूम में जरूरत से ज्यादा वक्त लगाती है उसने सुगना से कहा

"हम जा तानी आंगन में नल पर नहा ले तानी"

"ठीक बा आप जायीं हम ओहिजे कपड़ा पहुंचा देब"

सुगना भी अब अपने पति रतन को उचित सम्मान देने लगी थी।

रतन घर के आंगन में खुली धूप में नहाने लगा यह पहला अवसर था जब वह खुले में नहा रहा था। रतन और सुगना के बीच जो मर्यादा की लकीर खींची हुई थी उसने कभी भी रतन को सुगना के सामने निर्वस्त्र होने ना दिया था।

परंतु आज उसे सुगना को अपना गठीला शरीर दिखाने का मौका मिल गया था सुगना कुछ ही देर में उसके कपड़े और तोलिया लेकर आने वाली थी।

रतन की गठीली काया खुली धूप में चमक रही थी। रतन ने अपने शरीर पर साबुन लगाया और अपनी पत्नी सुगना की कल्पना करने लगा सुगना का शरीर अब वापस अपने आकार में आ रहा था रतन को पूरा विश्वास था कि वह सुगना को खुश कर उसे नजदीक आने के लिए राजी कर लेगा।

सुगना के मदमस्त बदन को याद करते करते रतन का लण्ड खड़ा हो गया वाह साबुन की बट्टी अपने लण्ड पर मलने लगा रतन अपनी आंखें बंद किए मन ही मन सोच रहा था काश सुगना इसी समय उसे तोलिया देने आ जाती तो वह अनजान बनकर ही अपने लण्ड के दर्शन उसे करा देता…

तभी पीछे आवाज आई..

"जीजा जी लींआपन तोलिया"

रतन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

यह आवाज सोनी की थी। तो क्या सोनी ने उसे खड़े लण्ड पर साबुन बनते देख लिया था? हे भगवान…उसने झटपट अपनी लुंगी से अपने लण्ड को ढकने की नाकाम कोशिश की और अपना हाथ सोनी की तरफ बढ़ा दिया।

परंतु जो होना था वह हो चुका था. सोनी की सांसे तेज चल रही थीं। उसने आज जो दृश्य देखा था वह अनूठा था रतन एक पूर्ण मर्द था और उसका तना हुआ खूटे जैसा लण्ड देख कर सोनी अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं कर पा रही थी।

उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया था। रतन का लण्ड आज तो वह अपनी बहुप्रतीक्षित सुगना की बुर को याद कर खड़ा हुआ था उसमें दोहरी ऊर्जा थी।

सोनी उस अद्भुत लण्ड को याद करते हुए अंदर भाग गई। रतन के खड़े लण्ड का वह आकार कल्पना से परे था। रतन एक ग्रामीण और बलिष्ठ युवक था पर क्या पुरुषों का लण्ड इतना बड़ा होता है? सोनी अपने दिमाग में रतन के लण्ड की विकास के लण्ड से तुलना करने लगी।

निश्चित थी रतन विकास पर भारी था। सोनी ने विकास के लण्ड को न सिर्फ छुआ था अपितु कई बार अपनी हथेलियों में लेकर सहलाते हुए उसे स्खलित किया था।

सोनी अभी लिंग के आकार की अहमियत से अनजान थी। वह अपने आप को खुश किस्मत मान रही थी कि उसे भगवान ने विकास से ही मिलाया था .. जिसके लण्ड को सोनी अपनी बुर में जगह देने को तैयार हो रही थी। यदि उसके हिस्से में भगवान में रतन जीजा जैसे किसी ग्रामीण युवक को दिया होता तो उसका क्या हश्र होता ? जिस बुर में उसकी पतली सी उंगली न जा पाती हो उसमें इतना मोटा बाप रे बाप। सोनी मन ही मन अपने जीजा और सुगना दीदी के मिलन के बारे में सोच रही थी। सुगना दीदी कैसे झेलती होंगी...जीजा को..

"काहें हाफ तारे"

"ऐसे ही कुछो ना"

" बुझाता जीजाजी तोर इंतजार कर तले हा तू हमारा के भेज देलु हा"

"काहे अइसन बोल तारे"

"अपन खजाना खोल के बइठल रहले हा .. बुझात रहे धार लगावतले हा" सोनी ने मुस्कुराते हुए अपनी जांघे खोल दी और जांघों के बीच इशारा किया..

सुगना को अंदाजा तो हो गया कि सोनी क्या कहना चाह रहे हैं परंतु उसे इस बात का कतई यकीन न था कि रतन इतनी हिम्मत जुटा सकेगा और आंगन में उसका इंतजार करते हुए अपने लण्ड पर धार लगा रहा होगा।

"साफ-साफ बोल का कहल चाह तारे?"

सोनी क्या बोलती जो दृश्य उसने देखा था उसे बयां करना कठिन था।

"दीदी चल जाए दे हमरा देर होता" सोनी अपने बाल झाड़ने लगी। उसकी सांसे और सांसों के साथ हिलती हुई भरी-भरी चूचियां कुछ अप्रत्याशित होने की तरफ इशारा कर रही थी।

"का भईल बा साफ-साफ बताऊ" * अपनी अधीरता न छुपा पा रही थी क्या रतन सचमुच उसे सोच कर उत्तेजित था।

"कुछ भी ना दीदी, दे कुछ खाए कि भूख लागल बा"

सुगना मन ही मन अफसोस कर रही थी कि क्यों उसने लाली को तोलिया लेकर भेज दिया था यदि वह स्वयं जाती तो रतन की मनोदशा को देख पाती और उसके हथियार को भी देख पाती। सुगना मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

उधर रतन का खड़ा लण्ड अचानक ही सिकुड़ गया था। सोनी जैसी युवा लड़की ने जिस तरह उसे देखा था वह वास्तव में शर्मसार करने वाला था। वह सोनी के सामने क्या मुंह लेकर जाएगा ? यह सोच कर वह मन ही मन परेशान होने लगा। वह जानबूझकर अपने नहाने का समय बढ़ाता गया ताकि सोनी अपने कॉलेज के लिए निकल जाए। सुगना ने रतन को आवाज दी...

"अब देरी नईखे होत"

रतन अंदर आया और उसने सोनी को न पाकर राहत की सांस ली। सुगना ने रतन का नाश्ता निकाल कर रख दिया और वापस अपने कमरे में आकर अपनी पुत्री को दूध पिलाने की कोशिश करने लगी।

सुगना ने भी अब रतन के बारे में सोचना शुरू कर दिया था जैसे जैसे वह स्वस्थ हो रही थी उसकी बुर में कसाव आता जा रहा था और जांघों के बीच संवेदनाएं और सिहरन एक युवती की भांति होने लगे थे। पिछले छह आठ महीनों से जिस बुर ने कामकला से मुंह मोड़ लिया था वह मौका देख कर अपने होठों पर प्रेम रस लिए न जाने किसका इंतजार करती। सरयू सिंह की बेरुखी ने सुगना की बुर को रतन के लिए अपने होंठ खोलने पर मजबूर कर दिया था इसमें निश्चित जी रतन की लगन और पिछले कुछ महीनों में की गई सेवा का भी अहम योगदान था।

दिन बीत रहे थे...

जाने सुगना की चुचियों में क्या रहस्य था कि कुछ ही दिनों बाद बच्चे उसकी चूची ना पकड़ते यही हाल सूरज का भी था जब वह छोटा था

(पाठक एक बार अपडेट 4 पढ़ सकते हैं उनके दिमाग में यादें ताजा हो जाएंगी)

और अब यही स्थिति अब मधु की थी। कल शाम से वह सुगना की चूँचियां नहीं पकड़ रही थी। सुगना ने सारे जतन किए अपने हाथों से अपने निप्पलों को मसलकर दूध निकालने की कोशिश की और दूध निकला भी परंतु मधु चूँची पकड़ने को तैयार न थी।

सुगना अंततः कटोरी ले आई और अपनी चुचियों से दूध कटोरी में निकालने का प्रयास करने लगी.. परंतु यह कार्य अकेले संभव न था एक हाथ से वह कटोरी पकड़ती और दूसरे हाथ से अपनी मोटी मोटी चूचियों से दूध निकालने का प्रयास करती लाख जतन करने के बाद भी सुगना दूध की कुछ बूंदे ही कटोरी में निकाल पाई।

अपनी पुत्री को भूखा रखना सुगना को कतई गवारा न था जिस पुत्री का जन्म इतने मन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद हुआ था उसे भूख से तड़पाना सुगना को कतई गवारा न था। उसने अपनी लज्जा को ताक पर रख रतन से मदद लेने की सोची…

शेष अगले भाग में..
 
भगवान मृत आत्मा को शांति प्रदान करें। और आपके और आपके परिवार को इस असीम दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें।। अपना ध्यान रखिए यहां पर मिला तो होता ही रहेगा ओम शांति
 
आप सभी की त्वरित प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद यूं ही जुड़े रहे.

चंद लाइने अपनी पसंद और नापसंद के बारे में लिखकर लिखकर कहानी की दशा और दिशा बदलने में अपना योगदान देते रहें
 
सोनू और लाली की पुत्री इस कथा की प्रमुख पात्र है...

धन्यवाद.. कहानी अब जल्द ही आगे बढ़ेगी। आखिर इस फोरम के पाठकों को जो पसंद है उसके लिए वयस्क किरदारों को आवश्यकता है.. जुड़े रहें

आपको विशेष धन्यवाद..मुझे अब भी कोमल रानी की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है....

धन्यवाद जी

बड़े दिनों बाद आये भाईसाहब गति मंथर है ? आपकी यह बात sunoanuj जी से ठीक उलट है।

यही विरोधाभास मेरे आकर्षण का केंद है।

रतन के दिन आने वाले है..

इंतजार करिए...तबतक पुराने अध्याय पढ़कर सुगना और सरयू सिह की नजदीकियां महसूस करिए। जुड़े रहिये

धन्यवाद न्याय होगा।
 
नया साल 2022 आप सबके लिए ढेरों खुशियां लाएं और आप मर्यादा में रहते हुए अपनी कामुकता का आंनद लेते/ लेतीं रहें।





सोनी

अगला अपडेट आज शाम तक आएगा...
 
भाग -67

सुगना अंततः कटोरी ले आई और अपनी चुचियों से दूध कटोरी में निकालने का प्रयास करने लगी.. परंतु यह कार्य अकेले संभव न था एक हाथ से वह कटोरी पकड़ती और दूसरे हाथ से अपनी मोटी मोटी चूचियों से दूध निकालने का प्रयास करती लाख जतन करने के बाद भी सुगना दूध की कुछ बूंदे ही कटोरी में निकाल पाई।

अपनी पुत्री को भूखा रखना सुगना को कतई गवारा न था जिस पुत्री का जन्म इतने मन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद हुआ था उसे भूख से तड़पाना सुगना को कतई गवारा न था। उसने अपनी लज्जा को ताक पर रख रतन से मदद लेने की सोची…

अब आगे..

"ए जी थोड़ा मदद कर दीं देर त ना होई?"

सुगना की मधुर आवाज रतन के कानों तक पड़ी जो अब घर से बाहर निकलने के लिए लगभग तैयार था।

रतन सुगना की बात कभी टाल नहीं सकता था। दुनिया में यदि कोई रतन के लिए अहम था तो वह थी सुगना। उसकी नौकरी चाकरी इतनी अहम न थी कि वह अपनी सुगना की बात को नजरअंदाज करता। उसने सहर्ष कहा

"हां बतावा ना का करे के बा"

"हई तनी कटोरी पकड़ी और आपन आंख मत खोलब"

सुगना ने अपनी झील जैसी आंखें नचाते हुए कहा..

कुछ निषेधात्मक वाक्यों को कहने का अंदाज उनकी निषेधात्मकता को कम कर देता है।

सुगना ने राजेश को आँखें खोलने के लिए तो मना कर दिया था परंतु शायद जो उसके उद्बोधन में था वो उसके मन में नहीं।

रतन ने अपनी आंखें कुछ ज्यादा ही मीच लीं। उसने शायद सुगना को आश्वस्त करने की कोशिश की और सुगना द्वारा दी गई कटोरी को पकड़ लिया सुगना ने उसके हाथों को एक नियत जगह पर रहने का इशारा किया और अपनी एक चूँची को ब्लाउज से बाहर निकाल लिया…

नियति यह दृश्य देखकर मंत्रमुग्ध थी काश रतन अपनी आंखें खोल कर वह सुंदर दृश्य देख पाता। जिन चुचियों की कल्पना वह पिछले कई महीनों से कर रहा था वह उसकी आंखों के ठीक सामने थी परंतु उनकी मालकिन सुगना ने रतन को आंखें खोलने से रोक रखा था।

सुगना की कोमल हथेलियां उसकी चुचियों पर दबाव बढ़ाने लगी और दूध की धारा फूट पड़ी। कटोरी पर पढ़ने वाली धार सरररररर ... की मधुर आवाज पैदा कर रही थी जो रतन के कानों तक भी पहुंच रही थी।

रतन व्यग्र हो रहा था... कुछ दृश्य बंद आंखों से भी स्पष्ट दिखाई देते हैं वह अपने बंद आंखों के पीछे छुपी लालिमा में अपने हाथों में अपनी ही चूचियां पकड़े सुगना को देखने लगा।

सुगना के अथक प्रयास करने के बावजूद वह थोड़ा ही दूध बाहर निकाल पायी। जैसे-जैसे सुगना की हथेलियों का दबाव घट रहा था दूध की धारा धीमी पड़ती जा रही थी…

रतन ने हिम्मत जुटाई और बोला...

"तनी थपथपा ल ओकरा के(चुचियों को) तब दूध निकले में आसानी होगी"

रतन की बात ने सब कुछ खोल कर रख दिया था। सुगना ने उसकी आंखें बंद कर जिसे छिपाने की कोशिश की थी उसे रतन मैं बोलकर बयां कर दिया था हालांकि उसकी आंखें अब भी बंद थीं।

"ली तब आप ही करीं" सुगना अपनी चुचियों को दबाते दबाते थक चुकी थी उसने अनजाने में ही रतन को अपनी चूचियां छूने और उनसे दूध निकालने के लिए आमंत्रित कर दिया था।

रतन का दिल तेजी से धड़कने लगा आज वह पहली बार सुगना की चुचियों को छूने जा रहा था वह भी उसके आमंत्रण पर रतन के हाथ कांपने लगे और दिल की धड़कन तेज होती गई। सुगना ने उसके हाथ से कटोरी ले ली और उसके दोनों हाथों को आजाद कर दिया

"आंख अभियो मत खोलब" सुगना ने मुस्कुराते हुए कहा परंतु उसकी आवाज में नटखट पन स्पष्ट महसूस हो रहा था। सुगना ने स्वयं रतन की हथेलियों को अपनी चुचियों से सटा दिया..

रतन सुगना की फूली हुई गोल-गोल सूचियों को अपने दोनों हथेलियों से महसूस करने लगा अपनी उंगलियों से उसके निप्पल को छूते हुए चुचियों के आकार और कसाव का अंदाजा लगाने लगा। धीरे-धीरे उसकी हथेलियों का दबाव बढ़ता गया और चूँचियों से दुग्ध धारा एक बार पुनः फूट पड़ी जिसे सुगना ने कटोरी में रोक लिया।

रतन मदहोश हो रहा था। उसका लण्ड खड़ा हो चुका था जो बिस्तर पर बैठी हुई सुगना की आंखों के ठीक सामने था। परंतु सुगना की निगाह अभी उस पर नहीं पड़ी थी। वह अपना ध्यान कटोरी पर लगाए हुए थी।

रतन का लण्ड अपने आकार में आकर रतन को असहज कर रहा था। उसे दिशा देने की आवश्यकता थी रतन ने अपना एक हाथ कुछ पल के लिए हटाया और लण्ड को ऊपर की तरफ किया। सुगना की निगाहों में यह देख लिया परंतु सुगना ने कुछ ना कहा।

रतन भी अब सहज हो चला था वह उसकी दोनों चूचियों को थपथपातता कभी उन्हें सहलाता और कभी अपनी हथेलियों के दबाव से उन्हें दुग्ध धारा छोड़ने पर मजबूर कर देता।

इसी क्रम में रतन की हथेलियों ने अपना दबाव कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया और सुगना करा उठी

"आह...तनी धीरे से …….दुखाता"

सुगना कि यह कराह मादक थी। रतन भाव विभोर हो गया उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने अपनी आंखें खोल दी वह सुगना की चूँचियों को सहलाने लगा।

रतन ने एक झलक उन दुग्ध कलशों को देख लिया परंतु अपनी निगाह वह ज्यादा देर तक उन खूबसूरत चुचियों पर ना रख पाए वह सुगना के चेहरे को देखते हुए बोला

"माफ कर द गलती से जोर से दब गइल हा"

सुगना का चेहरा लाल हो गया था यह दर्द के कारण था या उत्तेजना के रतन के लिए यह समझना मुश्किल था।

"जाए दीं कवनो बात ना। अब हो गई गईल अब आप जायीं " सुगना ने अपनी साड़ी के आंचल से दोनों चुचियों को ढक लिया।

सुगना ने रतन के आंख खोलने का बुरा न माना था। वह मुस्कुराती हुई अपनी सूचियों को अपनी ब्लाउज में अंदर करने लगी।

"आपन ख्याल रखीह" रतन में जाते हुए कहा

रतन वापस अपने होटल के लिए निकल गया आज का दिन रतन के लिए बेहद अहम था…

रतन रह रह कर अपनी हथेलियों को चूम रहा था आज पहली बार सुगना ने उसे अपनाने का संकेत दिया था वह उसका कृतज्ञ था जिसने उसे माफ कर अपने उस अंग को छूने दिया था जिस पर या तो उसके बच्चों का अधिकार होता है या पति का।

सुगना की पुत्री मधु ने उन दोनों को करीब लाने में अहम भूमिका अदा कर दी थी। अगले कुछ दिनों तक रतन सुगना की चुचियों से दूध निकालता रहा। धीरे धीरे आंखों का बंद होना भी सुगना की आवश्यक शर्त न रही थी।

जैसे-जैसे सुगना और रतन खुलते गए चुचियों से दूध निकालने के दौरान रतन उनसे अठखेलियां करने लगा सुगना उसे काम पर ध्यान देने को कहती परंतु रतन सुगना की चूँचियों को कामुक तरीके से सहला कर उसे उत्तेजित करने का प्रयास करता। इस दौरान उसका लण्ड हमेशा खड़ा रहता।

आखिरकार एक दिन सुगना ने भी उसे छेड़ दिया।

उसने रतन की जांघों की जोड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा

"दुधवा निकालत खानी इ महाराज काहे बेचैन हो जाले.."

रतन शर्मा गया परंतु उसमें अब हिम्मत आ चुकी थी उस ने मुस्कुराते हुए कहा..

"अइसन मक्खन मलाई जैसन चूची छुवला पर बुढ़वन के खड़ा हो जाए हम तो अभी नया बानी.".

"अच्छा चलीं बात मत बनाइ आपन काम करी"

"का करीं?"

"जवन कर तानी हां"

"साफ-साफ बोल…. ना"

" पागल मत बनी ई कुल बोलल थोड़ी जाला"

"एक बार बोल द हमरा खातिर"

"हम ना बोलब हमरा लाज लगाता"

रतन ने अपनी जगह बदल दी थी। वह सुगना के ठीक पीछे आकर खड़ा हो गया और उसकी दोनों चूचियों को दबा कर दूध निकाल रहा था। उसका खड़ा लण्ड सुनना की पीठ में सट रहा था। कभी वह नीचे झुक कर उसे सुगना के नितंबों से सटाने का प्रयास करता।

सुगना उसकी यह छेड़छाड़ समझ रही थी पर शांत थी। उसे भी अब यह अठखेलिया पसंद आने लगी थी। रतन अपना सर सुगना के कंधे पर रखकर अपने गाल सुगना के गाल से सटाने का प्रयास करता और उसकी गर्म सांसे सुगना के कोपलों से टकराती।

उत्तेजना दोनों पति पत्नी को अपने आगोश में ले रही थी। रतन ने मदहोश हो रही सुगना से एक बार फिर पूछा "बता द ना का करीं…"

"अब हमार चुंचीं मीसल छोड़ दीं और अपना होटल जाए के तैयारी करीं" सुगना ने बड़े प्यार से रतन के दोनों हाथों को अपनी चुचियों पर से हटा दिया और उन्हें ब्लाउज में बंद करते हुए कमरे से बाहर निकलने लगी। दरवाजे से निकलते समय उसने रतन को पलट कर देखा जो अभी भी सुगना के मुख से निकले चुंचीं शब्द की मधुरता में खोया हुआ उसे एकटक निहार रहा था।

नियति मुस्कुरा रही थी..रतन और सुगना करीब आ रहे थे।

उधर सोनू लाली के परिवार के साथ समय व्यतीत कर बच्चों को खुश करने का प्रयास करता और बच्चों की मां लाली अपने बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखकर स्वतः ही खुश हो जाती। सोनू का अपने परिवार के प्रति यह लगाव देखकर लाली अपने दिल और आत्मा से उसे धन्यवाद देती।

सुगना की पुत्री मधु 3 माह की होने वाली आने वाली पूर्णमासी को कुल देवता की पूजा होनी थी।

सरयू सिंह के खानदान में संतान उत्पत्ति होने पर अपने कुल देवता की पूजा करने विशेष प्रथा थी यह पूजा संतानोत्पत्ति के लगभग 3 माह पश्चात की जाती थी। पूजा की विशेष विधि थी और इसका उद्देश्य भी शायद विशेष था।

संतानोत्पत्ति के कुछ महीनों तक संतान के माता पिता का आपस में मिलना और संभोग करना अनुचित था। कुल देवता की पूजा करने के पश्चात उन्हें वापस एकाकार होने का अवसर प्राप्त होता।

सुगना मन ही मन सोचने लगी कि क्या वह इस पूजा में अपने पति रतन को शामिल करेगी? क्या पूजा के उपरांत वह अपने पति रतन को उसके साथ संभोग करने का अवसर देगी?

सुगना अपने पुराने दिनों को याद करने लगी जब सूरज के जन्म के 3 महीनों बाद उसे कुल देवता की पूजा करनी थी। उसका पति रतन उस समय उपस्थित न था। न तो सुगना के गर्भ धारण मैं रतन का योगदान था और नहीं अब सुगना की इस पूजा में उसकी उपयोगिता।

गांव के सभी मानिंद लोगों ने आपस में विचार-विमर्श कर यह निर्णय किया की यदि पति उपस्थित ना हो तो उसकी लाठी को साथ में रखकर कुल देवता की पूजा की जा सकती।

कजरी भी धर्म संकट में थी उसे पता था कुलदेवता की पूजा करने के पश्चात पति अपनी पत्नी को अपनी बाहों में उठा कर सीधा शयन कक्ष में ले जाता है और फिर अपनी पत्नी की योनि की पूजा करता और योनि को संतान प्राप्ति के लिए धन्यवाद देता और कई महीनों के अंतराल के बाद उसी दिन उसके साथ संभोग कर योनि को चरमोत्कर्ष प्रदान करता और वापस अपना गृहस्थ जीवन प्रारंभ करता।

कजरी ने तो गांव के बुजुर्ग लोगों की बात मानकर कुलदेवता की पूजन के लिए रतन की लाठी को मान्यता दे दी परंतु शयन कक्ष में होने वाली योनि पूजा कौन करेगा क्या कुंवर जी को ही यह पूजा करनी पड़ेगी? या सुगना को रतन की लाठी की मूठ से ही योनि स्खलित कर इस पूजा को पूर्ण करना होगा जैसे कि स्वयं उसने रतन के जन्म के बाद किया था।

(शायद पाठकों को याद हो रतन के पिता बिरजू जो आजकल विद्यानंद के नाम से जाने जाते थे कजरी को गर्भवती कर साधुओं की मंडली के साथ भाग गए थे उन्हें इस विशेष पूजा में बुला पाना असंभव था। कजरी ने भी अपने पति बिरजू उर्फ विद्यानंद की लाठी अपनी योनि से रगड़ कर बड़ी कठिनाई से उसे स्खलित किया था परंतु कजरी का वह अनुभव अच्छा नहीं रहा था उसने उसी दिन तय कर लिया था कि वह सरयू सिंह को अपने नजदीक आने का मौका देगी और अपनी स्वाभाविक काम इच्छा को पूरा करेगी।)

कजरी अपने मन में सुगना की पूजा का समापन सरयू सिंह से कराना चाहती थी। सच ही तो था.. जिसने सुगना को गर्भवती कर पुत्र रत्न से नवाजा था उसके द्वारा योनि पूजन कराना उचित ही था।

सरयू सिंह ने इस पूजा में उपस्थित रहने के लिए रतन से कई बार अनुरोध किया था परंतु वह मुंबई से आने को तैयार न था। अंततः परंपरा के निर्वहन के लिए सरयू सिंह ने इस पूजन की पूरी तैयारियां कर ली।

सलेमपुर गांव के सभी लोगों को पूजा के उपरांत होने वाले भोज में भारत में आमंत्रित किया गया। यह उत्सव परिवार के लिए बेहद सम्मान और मान प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला होता था।

सुगना की अपनी सहेली लाली भी ईसी विशेष पूजा के लिए सलेमपुर आई हुई थी। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उसे पता चला कि यह पूजा सुगना बिना रतन भैया के करने जा रही है।

उसने रतन की लाठी की मूड को पकड़कर सुगना को छेड़ते हुए पूछा..

"त हमार रानी अपना ओखली में रतन भैया के मुसल की जगह हई लाठी डाली का"

"हट पागल कुछो बोलेले"

"रतन भैया काहे ना अइले हा आज के दिन के सब मर्द लोग इंतजार करेला"

"जाकर उनके से पूछ लीहे"

"त इनके के भेज दी का तोर बुर...के पूजाइयो हो जायी और इनको साध बता जायी?" लाली ने अपने पति राजेश की तरफ इशारा करते हुए कहा।

सुगना मुस्कुराने लगी…

तभी सरयू सिंह बाजार से वापस आए और आंगन में पहुंचते ही सुगना से बोले..

"इ ला आपन कपड़ा पूजा में पहने खातिर"

सुगना ने सरयू सिंह की आंखों की चमक देखकर अंदाजा लगा लिया। कि वह भी इस पूजा का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे उसने झोला पकड़ लिया।

"दिखाओ ना कौन कपड़ा आइल बा?" लाली ने उत्सुकता से पूछा।

सुगना ने सरयू सिंह की आंखों की चमक देखकर अंदाजा लगा लिया था कि उसके बाबूजी ने निश्चित ही कुछ न कुछ शरारत की होगी विशेषकर उसके अंतरंग वस्त्रों को लेकर।

"दिखाओ ना का सोचे लगले?"

"जब काल पहनब तब देख लीहे"

"ए सुगना सलेमपुर कब चले के बा" लाली अपने पुत्र (जो दरअसल राजेश और सुगना का पुत्र था ) को लिए हुए सचमुच सुगना के पास आ रही थी।

सुगना अपनी मीठी यादों से बाहर आ गयी। यह एक महज संयोग था या दोनों सहेलियों की जांघों के बीच जागृति प्राकृतिक भूख दोनों ही उस पूजा को याद कर रही थी।

"काहे खातिर" सुगना ने लाली के भाव को समझ कर भी अनजान बनते हुए पूछा

लाली पास आ चुकी थी वह सुगना के बगल में बैठते हुए उसकी जांघों के बीच अपनी हथेलियां लेकर आई और बोली

"एकर पूजाई करावे"

दोनों सहेलियां हंसने लगी।

"अबकी बार काठ के मुसल के बदला में असली मुसल भेटाई" लाली, सुगना कि उस संभावित रात की कल्पना कर मन ही मन खुश हो रही थी। इस बार रतन उपस्थित था और सुगना की योनि पूजा करने को लालायित भी था।

सुगना ने लाली की हथेलियां अपने हाथ में ले ली और उसे प्यार से सहलाते हुए पूछा..

" एक बात कहीं "

"बोल ना"

"देख तोरा के सोनू से मिलावे वाला भी जीजा रहलन। अभी जिंदगी लंबा बा हमनी में दूसर बियाह ना हो सकेला लेकिन सोनुवा के अपनावले रहू जब तक ओकर ब्याह नईखे होत…"

सुगना ने लाली के मन की बात कह दी थी पिछले 2-3 महीनों में लाली की जिंदगी में आए दुख में भी अब ठहराव आ रहा था। दिन के 24 घंटों में खुशियां अपना अधिकार लगातार बढ़ा रही थीं और राजेश के जाने का गम धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा था।

सोनू भी ज्यादातर समय लाली के घर पर ही देता। वह राजेश के कमरे में अपनी पढ़ाई करता और अपने खाली समय में बच्चों के साथ खेल कर उनका मन लगाए रखता। परंतु विधवा लाली से सेक्स की उम्मीद रखना सोनू को उचित प्रतीत ना होता दोनों के बीच जमी हुई बर्फ को किसी ना किसी को पिघलाना था।

"काहे चुप हो गइले कुछ बोलत नईखे?" सुगना ने लाली के कंधे को हिलाते हुए पूछा।

"उ आजकल दिनभर पढ़त रहेला जब टाइम मिलेला तब बचवन संग खेलेला"

"त तेहीं आगे बढ़ के ओकरा के खेला दे" सुगना ने हंसते हुए कहा और लाली के चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई। जांघों के बीच एक अजब सी सनसनी हुई जो चुचियों के निप्पलओ तक पहुंची। तभी राजेश और सुगना के पुत्र जो इस समय लाली की गोद में था ने लाली की चूचियां पकड़ने की कोशिश की और लाली की चूचियां बाहर आ गई।

सुगना ने मधु को लाली की गोद में देते हुए कहा

"ले तनी एकरो के दूध पिला दे हमार दूध धरे में दिक्कत कर तिया"

मधु ने लाली की दूसरी चूची बड़े प्रेम से पकड़ ली और चूस चूस कर तृप्त होने लगी। अपनी माता का दूध पीने का यह सुख मधु ही जानती होगी लाली ने भी मधु के होठों और मसूड़ों का मासूम स्पर्स महसूस किया और भावविभोर हो गयी"

नियति सलेमपुर में सुगना की पूजा की तैयारियों में लग गई। काश कि दोनों सहेलियां इस पूजा में शामिल हो पाती? एक सुहागन एक विधवा परंतु दोनों में कुछ समानता अवश्य थी।

एक तरफ सुगना का वास्तविक सुहाग उजड़ चुका था। उसके बाबूजी सरयू सिंह जिसके साथ उसने अपने वैवाहिक जीवन के सुखद वर्ष बिताए थे वह अचानक ही वैराग्य धारण कर चुके थे। सुगना को यह एक विशेष प्रकार का वैधव्य ही प्रतीत हो रहा था। यह अलग बात थी कि प उस में कामेच्छा जगाने वाला उसका पति रतन आ चुका था और वह सुगना की योनि पूजा करने को लालायित भी था।

कमोबेश यही स्थिति लाली की भी थी उसका पति राजेश अपना शरीर छोड़ चुका था और अपने स्थान पर सोनू को लाली से मिलाकर उसकी कामेच्छा पूरी करने के लिए छोड़ गया था।

नियति अपनी उधेड़बुन में लगी लाली को तृप्त करने का संयोग जुटाने लगी… सुगना रतन बेसब्री से उस दिन का इंतजार करने लगे...

शेष अगले भाग में...
 
कहानी के इस पटल पर आपका स्वागत है आपकी कमेंट को देखकर ऐसा लगता है कि आप यह कहानी शुरू से पढ़ रहे हैं मुझे अच्छा लगा इसी तरह अपनी प्रतिक्रियाएं साझा करते रहे मेरे लिए यह पारितोषिक से कम नहीं है
 
आपकी प्रतिक्रिया देखकर ऐसा महसूस हुआ जैसे आप भी इस कहानी के पाठक है कहानी पर अपनी राय और अपेक्षाएं बता कर कहानी से अपने जुड़ाव का संकेत दें जुड़े रहे
 
Thanks

मैं पूरी कोशिश करूंगा

कहानी और लेखन शैली को पसंद करने के लिए धन्यवाद एक अपडेट को लिखने में 4 से 5 घंटे का वक्त लगता है उसे पढ़ने में शायद 15 मिनट का वक्त लगता हो..

यदि आप 2 मिनट का और वक्त निकालकर अपनी प्रतिक्रियाएं देते तो वह लेखक को अगले चार-पांच घंटे इस कहानी पर देने को प्रेरित करता है

जुड़े रहे और अपनी राय व्यक्त करते रहे

मुझे लगता है कहानी पर आप की यह पहली प्रतिक्रिया है कहानी से जुड़ने के लिए धन्यवाद यूं ही धीरे धीरे कहानी पर अपनी विस्तृत राय देखकर कहानी को और आकर्षक और मनोरंजक बनाने में सहयोग दें

कंचन जी धन्यवाद, आप भी बीच-बीच में छुट्टी मार देती हैं. जुड़े रहें

सराहना के लिए धन्यवाद आने वाला घटनाक्रम और भी मजेदार होगा ऐसा मैं उम्मीद करता हूं।
 
धन्यवाद आपके छोटे से कमेंट को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे आप हिंदी भाषा के जानकार हैं इस कहानी को पसंद करने और जुड़ने के लिए धन्यवाद आपकी प्रतिक्रियाओं की आगे भी अपेक्षा रहेगी
 
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